Home Blog Page 73

‘मैं हिन्दू क्यों नहीं’ के लेखक पर हमला, ‘दुर्गा’ के कथित अपमान के आरोप में दिल्ली विवि का शिक्षक प्रताड़ित

स्त्रीकाल डेस्क 

हिन्दू भावनाओं के कथित अपमान के आरोप में देश भर में लेखकों, बुद्धिजीवियों पर होने वाले हमलों की कड़ी में कुछ और मामले जुड़ गये हैं. ताजा मामला  ‘मैं हिन्दू क्यों नहीं?’ के लेखक पर हमले की है तो दिल्ली विश्वविद्यालय के  एक कॉलेज में प्राध्यापक केदार कुमार मंडल पर एफआईआर का है.

वारंगल जिले में शनिवार को वैश्य समुदाय के लोगों ने लेखक ‘मैं हिन्दू क्यों नहीं?’  जैसी किताबों के  लेखक कांचा आयलैय्या पर हमला बोल दिया। इस दौरान उनपर चप्पल भी फेंके गए। द इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में अपनी नई किताब ‘सामाजिका स्मगलेर्लु कोमाटोलु’ को लेकर लेखक कांचा आयलैय्या की वैश्य समुदाय के लोगों ने कथित रूप से हमला कर दिया।

आरोप है कि वैश्य समुदाय ने किताब के विरोध में उनके साथ कथित तौर पर चप्पलों से मारपीट की। पुलिस का कहना है कि कांचा इलैया तेलंगाना के वारंगल जिले में एक इवेंट में पहुंचे थे। जहां लोगों ने विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया। इसके बाद इलैया को पुलिस स्टेशन ले जाना पड़ा। हालांकि इसके बाद पुलिस स्टेशन में तनाव और बढ़ गया।

क्यो हो रहा है विरोध

एक वकील करुणसागर ने सईदाबाद पुलिस स्टेशन में इलैया के खिलाफ मामला दर्ज करवाया। वकील ने आरोप लगाया कि उन्होंने अपनी किताब में हिंदुओं के खिलाफ आपत्तिजनक बातें कही हैं। पुलिस ने बताया वकील का आरोप है कि लेखक ने अपनी चार किताबों में हिंदुओं के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया था।

जीभ काटने की धमकी

लेखक डॉ. कांचा इलैय्या ने सोमवार दावा किया कि वह उन्हें रविवार की दोपहर के बाद से कई फोन कॉल आ रहे हैं, जिसमें उनकी जीभ काट देने की भी धमकी दी गई। उन्होंने कहा,”किसी ने मेरी जीभ काटने की धमकी दी, मेरा पुतला जलाया गया, मुझे लगता है कि उनके दुर्व्यवहार, फोन कॉल और संदेशों द्वारा बहुत खतरा है। यदि मेरे साथ कुछ भी होता है तो वे जिम्मेदार होंगे”

मिथक और स्त्री आंदोलन का अगला चरण

डीयू के प्रोफेसर के खिलाफ सक्रिय संघ-समूह 


दिल्ली विश्वविद्यालय से सम्बद्ध एक कॉलेज के प्राध्यापक द्वारा दुर्गा के कथित अपमान पर उनके खिलाफ उनके ही शिक्षक संगठन के पदाधिकारियों ने एफआईआर करा दिया है. ‘जिस असुर नायक, (महिषासुर)की ह्त्या के उत्सव के रूप में दुर्गा पूजा मनाया जाता है, उसकी परम्परा पर विस्तृत शोध करने वाले बुद्धिजीवी और फॉरवर्ड प्रेस के संपादक प्रमोद रंजन ने अपने फेसबुक पेज पर केदार कुमार मंडल की प्रताड़ना की निंदा की है:

“दिल्ली यूनिवर्सिटी के दयाल सिंह कॉलेज में प्राध्यापक  केदार कुमार मंडल के एक फेसबुक पोस्ट से कल हंगामा खडा हो गया। । उन्होंने दुर्गा को लेकर जिस अंदाज में बातें कहीं थीं, वे कुछ हद तक अशोभनीय थीं।
लेकिन ​उसके बाद जो कुछ हुआ, वह उससे कहीं अधिक अशोभनीय था। बीजेपी से जुडे शिक्षक संगठन ने उन पर एफआईआर दर्ज करवाई, उन्हें फेसबुक पर भद्दी गालियां दीं गई और कहा गया कि नौकरी से बर्खास्त करवा दिया जाएगा। भयभीत केदार ने माफी मांग ली।

यात्रा वृतांत : महोबा में महिषासुर

लेकिन सवाल यह कि वे कौन से हिंदू हैं, जिनकी भावनाएं केदार के पोस्ट से आहत हो गईं थीं? क्या केदार स्वयं हिंदू नहीं हैं? शायद नहीं। वे शूद्र हैं। हिंदू धर्म तो कहता है कि सभी शूद्र-अतिशूद्र वर्णसंकर हैं। वेश्याओं की औलाद हैं। ढोल हैं, ताडन के अधिकारी हैं। जिन धर्मग्रंथों में यह लिखा है, उनका सडकों पर खुलेआम लाऊडस्पीकर लगाकर पाठ होता है। इन्हीं में से कुछ ग्रंथों को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने की मांग भी भाजपा वाले करते रहते हैं। इनसे किसी की भावना आहत होती है या नहीं?

केदार जी ने जो लिखा था, वह कथानक अनेक आदिवासी समुदायों की कथाओं में अलग-अलग रूपों में आता है। अनेक लेखकों ने इस पर लिखा है। भाजपा वाले बताएं कि महिषासुर, रावण, मेघनाथ आदि को जलाने से आदिवासी समुदायों की भावनाएं आहत होतीं हैं या नहीं?
दुर्गा पूजा के अवसर पर दुर्गासप्तशती के जिन श्लोकों का पाठ होता है, उनमें आदिवासी समुदायों में पुरखा के रूप में पूजे जाने वाले महिषासुर के बारे में अशोभनीय बातें होतीं हैं। महिषासुर को अप्राकृतिक यौनाचार की पैदाइश बताया जाता है। कहा जाता है कि “भैंस के गर्भ से पैदा हुआ वह असुर पशुओं से भी नीच है”। यही कारण है कि छत्तीसगढ में कुछ जगहों पर आदिवासियाें ने महिषासुर का अपमान करने वालों पर मुकदमा दर्ज करवाया था और हाईकोर्ट से जमानत खारिज होने के बाद आरेापी पिछले कई महीने तक जेल में थे।
भावनाएं तो सबकी होतीं हैं। केदार कुमार मंडल को अपनी भावनाओं के लिए लडना चाहिए था।”

नाटक : असुरप्रिया

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के हिन्दी विभाग की विभागाध्यक्ष ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा:
“तुम स्तन निचोड़ कर शादीशुदा होना चिन्हित करो तो जायज़
तुम आदिवासी स्त्री की योनि में पत्थर ढूँसो तो क़ानून सम्मत
पर केदार कुमार मंडल  तुम्हारी कहानी को ढोने से इंकार कर दे, अपना पक्ष बताए तो अपसंस्कृति है।
इतने वर्षों से तुम आदिवासी भावनाओं से खिलवाड़ कर रहे हो तो कुछ नहीं और एक में तुम्हारा समर्थन नहीं किया तो पिल पड़े।
तुम्हारी संस्कृति में दम होगा तो खड़ी रहेगी वरना उसे भहराकर गिरने से कोई नहीं रोक सकता।”

आउटलुक और फेसबुक से साभार 




स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

 




मोदी के मंत्री भी महिला आरक्षण विधेयक के पक्ष में

केंद्र की सरकार में समाज कल्याण मंत्री (राज्य) राम दास अठावले अपने कई बयानों और विचारों में भाजपा-संघ के फायर-ब्रांड नेताओं से अलग विचार व्यक्त करते हैं. एक लम्बी बातचीत के इस छोटे से हिस्से में उन्होंने महिला आरक्षण की जरूरत और जाति-धर्म से परे प्रेम-विवाहों के पक्ष में अपनी बात कही है. पूरी बातचीत ‘द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन’ से शीघ्र प्रकाश्य ‘भारत के राजनेता सीरीज’ की किताब में संकलित है. किताब की अग्रिम बुकिंग जल्द ही.

एक विचार ऐसा आ रहा है, खासकर हिंदी क्षेत्र में यह ज्यादा है कि जो दलित लड़कियां है उनको दलितों में ही शादी करनी चाहिए. एक, दूसरा कि जो पढ़े-लिखे दलित लड़के हैं जिनकी नौकरी लग जाती है उन को ब्राह्मण लड़कियां ले जाती हैं. ये खास विचार पढ़े लिखे बुद्धिजीवी प्रोफ़ेसरों के बीच विमर्श में है. इसको आप कैसे देखियेगा. 
मुझे ऐसा नहीं लगता है. दलित लड़कियों ने भी ब्राह्मण और मराठा आदि लड़कों के साथ शादियां की है. जब कोई लड़का-लड़की किसी भी वक्त पर एक दूसरे के निकट आते हैं, उनकी पहचान हो जाती है, तब उनको जाति, धर्म मालूम होने के बावजूद भी वे अपना साथी चुनते हैं और उनकी शादी होती है. यहाँ एक बात ऐसी भी है कि कुछ लोगों को लगता है कि भाई इन्होने ब्राह्मण की लड़की के साथ शादी की है, इन्हें अपने समाज की लड़की के साथ करनी चाहिए थी. लेकिन जब प्रेम विवाह होता है तो कोई जाति का विषय होता नहीं है. चार-पांच प्रतिशत जगह पर गड़बड़ होती है. लेकिन 95 प्रतिशत जगह पर दोनों आपस में मिलते हैं और अपने माँ-बाप को बताते हैं. फिर, आज कल के माँ बाप भी सेक्यूलर  होते हैं, बोलते हैं, ठीक बात है. माँ-बाप भी लड़का-लडकी ढूंढने से बच जाते हैं. शादी कोर्ट में होने से कम खर्चों में भी हो जाता है. मेरा व्यक्तिगत मानना है कि अंतरजातीय विवाह का बाबा साहब ने समर्थन किया है. . विश्वेश्वर,जो कर्णाटक के लिंगायत धर्म के संस्थापक हैं, ने अंतरजातीय विवाह को 12वीं शताब्दी में प्रोत्साहित किया था. जातिवाद ऐसे तो ख़त्म होगा नहीं लेकिन अंतरजातीय विवाह से जातिवाद ख़त्म हो सकता है.

महिला आरक्षण को लेकर आपकी क्या राय है?


बाबा साहब अम्बेडकर ने हिन्दू कोड बिल लिखा था. उसमें उन्होंने महिलाओं को समान न्याय और सामान अधिकार सुनिश्चित किये थे. महिला ब्राह्मण हो या किसी भी जाति की हो उन सब के ऊपर अन्याय हुआ है और इसीलिए बाबा साहब ने हिन्दू कोड बिल लाया था. मुझे लगता है कि महिलाओं को जिस तरह पूरे देश भर के स्थानीय स्वराज संस्थाओं में 50 प्रतिशत आरक्षण दे दिया गया है और इस मुद्दे को सब ने स्वीकार कर लिया था उसी तरह लोकसभा और विधानसभा में भी किया जाना चाहिए. लेकिन यहाँ क्यों विरोध कर रहे हैं मेरे समझ में नहीं आ रहा है. पिछली बार यूपीए  के समय पर कांग्रेस पार्टी भी चाहती थी, बीजेपी भी चाहती थी, दोनों का बहुमत था उसके बावजूद भी समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव और अन्य लोगों ने इसका क्यों विरोध किया मालूम नहीं. उनको शायद ये लगता था की उच्च वर्ग की महिलायें उसमें ज्यादा आ जायेंगी.

सोनिया गांधी का मास्टर स्ट्रोक: महिला आरक्षण के लिए लिखा पीएम मोदी को खत

आरक्षण के बारे में आप क्या सोचते हैं?


आरक्षण के मुद्दे पर मैंने यह प्रस्ताव रखा था कि अगर कुछ लोगों को डर लगता है कि अपनी सीट महिलाओं को जायेगी तो 545 सीटों (543 एलेक्टेड और 2 एंग्लो इंडियन) की लोकसभा सीटों में 181 सीटें और जोड़ दी जायें, इससे 181 जगह पर दो-दो उम्मीदवार होंगे. एक पार्टी का एक महिला उम्मीदवार और एक अन्य उम्मीदवार होगा. मैंने बोला था कि लोकसभा के लिए जगह कम हो तो सेंट्रल हाल को लोकसभा बनाओ. मेरा व्यक्तिगत मत है कि महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण लोकसभा में और विधानसभा में मिलना ही चाहिए.

महिला आरक्षण पर जदयू की बदली राय: कहा पहले 33% पास हो फिर वंचितों तक हो विस्तार

लेकिन आरक्षण के भीतर आरक्षण वाली बात, जो मुलायम सिंह यादव, लालू यादव, या अन्य लोग उठा रहे हैं, हम सब भी इसी पक्ष के हैं. इसपर आपका पक्ष क्या है?


हमारा कहना था कि अनुसूचित जाति की 69 सीटों को अलग ही छोड़ दो और 181 में हमारी महिलाओं को भी आरक्षण चाहिए अलग से. लेकिन वैसा हुआ नहीं. क्योंकि सामान्य वर्ग और आरक्षित वर्ग दोनो से ही 33% महिलाओं के लिए आरक्षित होना था.

ओबीसी महिलाओं के लिए भी मांग थी न? .

लेकिन ओबीसी महिलाओं को आरक्षण नहीं मिलेगा क्योंकि अभी राजनितिक आरक्षण ओबीसी को नहीं है. ओबीसी को जबतक आरक्षण नहीं मिलेगा तब तक ओबीसी महिलाओं को भी नहीं मिलेगा. इसके लिए भी संविधान संशोधन करना पड़ेगा.

महिला आरक्षण : मार्ग और मुश्किलें

अपनी पार्टी के भीतर महिलाओं के प्रतिनिधित्व के लिए क्या कर रहे हैं, कुछ कुछ किया आपने कभी? 


हमारी पार्टी तो ज्यादातर अलायंस में रही. कांग्रेस पार्टी के साथ हम तीन चार इलेक्शन लड़े, उसमें दस सीट-बारह सीट ऐसे मिलती थी.  कारपोरेशन में हमने काफी महिलाओं को टिकट दिया, खासकर जहां महिला वर्ग के लिए आरक्षित सीटें थीं.

33 प्रतिशत आरक्षण की राजनीति

बाबा साहब ने 1942 में सबसे बड़ा सम्मलेन महिलाओं का किया था, लेकिन अभी दलित आंदोलन से महिलायें गायब दिखती हैं, कम दिखती हैं, खास कर लीडरशिप के पोजीशन पर ?

हमारी कोशिश यह है कि महिलायें जुड़ें.

आपके यहाँ एक-दो चेहरे ही तो दिखते हैं.


हमने महिलाओं का संगठन बनाया, जिसमें रजनी तिलक को भी अपनी पार्टी में जिम्मेदारी दी थी. हमें महिला विंग को स्ट्रांग करना चाहिए. महाराष्ट्र में हमारा महिला विंग है. जिले-जिले में महिला विंग है, लेकिन सुशिक्षित, पढी-लिखी महिलाएं ज्यादा नहीं आती हैं. बचत गट (सेल्फ हेल्प ग्रुप) के माध्यम से महिलाओं को इकठ्ठा करना, उनके ऊपर अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना, उनको छोटे-मोटे उद्योग देना, यह काम हो तो महिलायें पार्टी में आएँगी ही.

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

‘टच ही तो किया है न और कुछ नहीं किया न’ : प्रशासन के जवाब से आक्रोशित लडकियां

विकाश सिंह मौर्य

21 सितम्बर 2017 को बीएचयू के दृश्य कला संकाय में बीएफए की छात्रा अनन्या (बदला हुआ नाम) शाम को लगभग 6.30 बजे अपने फैकल्टी से हॉस्टल जा रही थी, तभी भारत कला भवन एवं डीन ऑफ़ स्टूडेंट कार्यालय के पास के चौराहे पर कुछ अज्ञात लड़कों ने उनको अपनी तरफ हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींचा. इसके बाद उसके कपड़े फाड़ डाले एवं कपड़े के अन्दर हाथ भी डाला. इस जघन्य वारदात के समय लड़की चीखती रही और वहां पर उपस्थित प्राक्टोरिअल बोर्ड के सिपाहियों ने उसकी कोई मदद नहीं की. पीड़िता ने जब इस बात की त्रिवेणी हॉस्टल की प्रशासनिक संरक्षिका से किया तो इतना वाहियात जवाब दिया कि किसी का भी खून खौल जाये. उसने कहा कि “टच ही तो किया है न कुछ और नहीं न किया है.” इतने में जब लड़कियां चीफ प्राक्टर ऑफिस में शिकायत दर्ज करवाने पहुचीं तो वहां भी इनकी शिकायत सुनने के बजाय अशोभनीय टिप्पणियाँ सुननी पड़ीं.

क्यों कर रही हैं लडकियां पीएम मोदी का विरोध (!)

इसके बाद अगली सुबह बीएचयू गेट के पास ही स्थित महिला महाविद्यालय की छात्राओं ने सुबह 6 बजे से ही मुख्य गेट के पास न्याय और सुरक्षा की मांग को लेकर धरने पर बैठ गयीं. वार्डेन ने त्रिवेणी हॉस्टल का दरवाजा बंद करवा दिया था जिससे छात्राएं आन्दोलन में शामिल न होने पायें. किन्तु भरी दबाव के चलते दोपहर बाद त्रिवेणी हॉस्टल से भी दरवाजा खुलने के बाद सैकड़ों की  संख्या में छात्राएं आन्दोलन में शामिल हो गयीं. दिन भर धरना चलता रहा और अपराधियों को पकड़ने एवं सजा देने के स्थान पर विश्वविद्यालय प्रशासन एवं वाराणसी प्रशासन ने इस आन्दोलन में शामिल विद्यार्थियों को अंदाज में उनका कैरियर बर्बाद करने व जेल में भेजने की धमकी देते रहे. कुलपति गिरीश चन्द्र त्रिपाठी ने पहले तो छात्राओं से मिलने से एकदम इनकार कर दिया. यहाँ तक कि एस.डी.एम. के अनुरोध पर भी नहीं गये. लगभग 4 बजे कुलपति ने कुछ महिला प्रोफेसरों को धरनास्थल पर भेजकर पांच छात्राओं को बातचीत के लिए अपने आवास पर बुलवाया किन्तु छात्राओं ने यह कहते हुए ऐसी मुलाकात से इंकार कर दिया कि “वे अकेले में कुलपति से बात करने को लेकर खुद को सुरक्षित नहीं महसूस कर रही हैं.” आन्दोलन में शामिल शैलेन्द्र वर्मा ने बताया कि इस प्रकार की धमकियाँ शोधार्थियों को लगातार दी जा रही थीं तो ऐसे में अधिक संख्या में शामिल स्नातक के विद्यार्थियों को किस तरीके से दबाने का प्रयास किया होगा इसका अंदाजा मात्र लगाया जा सकता है. इस बीच आन्दोलन को अपनी दिशा से भटकाने के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के अराजक तत्वों ने कुलपति की शह पर धरनास्थल पर जाकर मारपीट व अश्लील किस्म की गाली-गलौज कर मामले को बिगड़ने का भी प्रयास किया. और यह प्रयास पूरे दिन में कई बार किया गया. हद तो तब हो गयी जब शाम लगभग 7.30 बजे अशांति और अराजकता के इन दूतों ने धरने पर बैठे विद्यार्थियों से इस बात का झूठा आरोप लगाकर मारपीट की कि ये लोग गेट पर लाल झंडा लगाना चाह रहे हैं. जब कि वास्तविकता यह है कि यहाँ पर किसी के मन में ऐसा कोई विचार नहीं था.

22-23 सितम्बर की रात लगभग 12 बजे यह अफवाह भी फैलाई गयी कि “ये आन्दोलनकारी विश्वविद्यालय के प्रमुख संस्थापक मदन मोहन मालवीय की प्रतिमा कालिख पोतने का प्रयास कर रहे थे इसलिए कुलपति ने इनसे मुलाकात नहीं की. अभी 23 सितम्बर को दोपहर 1.00 बजे ये रिपोर्ट लिखे जाने के समय तक विश्वविद्यालय की छात्राएं एवं छात्र हजारों की संख्या में धरना स्थल पर डटे हुए हैं. और यह जुटान 22 तारीख को चिलचिलाती धूप और पूरे रात तक भी इसी तरह से थी. अभी भी यहाँ पर चिलचिलाती धूप और उनमें अन्याय के खिलाफ एवं न्याय को लेकर विद्यार्थियों की कटिबद्धता भी अपनी चरम पर है.
होली पर पिंजडा खोलो ऋचा : अनुपम सिंह की चिट्ठी

इससे पहले लगभग एक सप्ताह से नवीन महिला छात्रावास में रात को कुछ अराजक तत्व पत्थर फेंक रहे थे. इतना ही नहीं लगभग एक महीने से त्रिवेणी संकुल (यह बी.एच.यू. महिला छात्रावासों की एक सीरीज है) के सामने लड़कियों को देखकर कुछ छात्र उनकी तरफ हस्तमैथुन की मुद्रा में अश्लील हरकतें करते रहे हैं. इन छात्रावासों में रहने वाली छात्राएं बताती हैं कि कई बाद शिकायत करने के बाद भी इन असामान्य आपराधिक घटनाओं को रोकने के लिए कोई उपाय नहीं किये गये. पिछले दिनों बी.ए. के एक लड़के के साथ विश्वविद्यालय के ही विज्ञान संस्थान के कुछ कर्मचारियों ने दुष्कर्म किया था. उस मामले को भी ठन्डे बसते में दाल दिया गया है.

बीएचयू के मुख्य प्राक्टर प्रो. ओ.एन. सिंह और बीएचयू प्रशासन इस मामले को लेकर पूरी तरह से लीपापोती पर उतारू हैं. इस आन्दोलन का एक तात्कालिक असर यह हुआ कि वाराणसी दौरे पर पूजा-पाठ करने आये प्रधानमंत्री के रास्ते का रूट बदलकर उन्हें उनके निर्दिष्ट पूजास्थल मानस मंदिर तक संकट मोचन की पतली गली से ले जाया गया. यहाँ ओ.एन. सिंह से पहले के चीफ प्राक्टर तथा अन्य प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी व शिक्षक, शिक्षिकाएं महिलाओं को लेकर दकियानूसी पितृसत्तात्मक वैचारिकी से न केवल ग्रस्त हैं. जो अभी भी स्त्री को अपनी सुविधानुसार मात्र सेक्स करने और दासी बनाकर मनमाफिक काम करवाने की ही परम्परा है. निकट अतीत तक यहाँ पर बलात्कार जैसे जघन्य मामलों को भी रफा-दफा कर दिया जाता रहा है. एक उदाहरण समाजशास्त्र विभाग का है जहाँ पर एक शोधछात्र ने एम.ए. की लड़की को लालच, फुसलावे और बहलावे में लेकर लम्बे समय तक उसका यौन शोषण करता रहा. और आखिर में उस लड़की को गर्भपात जैसा कदम उठाने को मजबूर होना पड़ा. चूँकि वह लड़का जाति से ब्राम्हण है और उस पर विभागाध्यक्ष (ये पूर्व में कई वर्षों तक यहाँ के चीफ प्राक्टर भी रह चुके हैं) की विशेष कृपा भी रहती है. हालाँकि लड़की की जाति भी ब्राह्मण  ही है किन्तु इस सनातनी परंपरा ने स्त्री को मात्र उपभोग और सेक्स करने का संसाधन ही माना है. ये उसी परंपरा के वाहक हैं. ऐसी ख़बरें यहाँ के कई प्रोफेसरों के बारे भी मिलती रहती हैं.

बीते लगभग तीन वर्षों में कैंपस का माहौल जिस तरीके से अराजक हुआ है वह भी इधर के समय में अभूतपूर्व है. लड़कियों की स्थिति तो हमेशा से ही यहाँ पर बेचारी और दयनीय रही है. विश्वविद्यालय में ऐसे अराजक तत्व कहीं भी मौजूद मिल जायेंगे जो किसी को भी पीट देंगे, गाली देकर बात की शुरुआत करना इनकी आमतौर पर इनकी आदत है. कोढ़ में खाज की स्थिति तो इसलिए है क्योंकि ये अराजक तत्त्व कुलपति और प्रशासन के संरक्षण में अपना काम करते हैं. यानि की इन्हें पुलिस, अदालत जैसी किसी भी चीज का भय है और न ही इन सबकी कोई इज्जत. हाँ एक बात अवश्य है कि ये देशभक्त शाखा में और रास्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यक्रमों में अक्सर आयोजक और अन्य प्रमुख भूमिकाओं में नजर आते रहते हैं. इनका इंसाफ भी लात, घूंसों और कई बार तो पिस्तौल वाला होता है. लड़कियों के मामले में तो बी.एच.यू.  सहित लगभग पूरा बनारस दकियानूसी और कूड़ा-कचरा वाले दिमाग से लैश है. वैसे पुलिस के साथ भी इनके सम्बन्ध मधुर ही होते हैं. यहाँ पर सवाल यह है कि ये बच्चे जो दूसरे किसी मास्टर माइंड के इशारे पर इस तरीके के काम करते हैं, उनका भविष्य क्या है? देश का भविष्य और उनका भविष्य अलग-अलग तो है नहीं.   ‘

मोदी जिनके प्रशंसक वे दे रहे महिला पत्रकार को रेप की धमकी

इस मामले को लेकर जिस तरीके की उत्तेजना, मानसिक-शारीरिक उद्वेग, प्रतिबद्धता और एकता बीएचयू के विद्यार्थियों ने दिखाई है, वह बनारस के लिए अभूतपूर्व है. इसका सबसे प्रमुख कारण यह है कि यहाँ पढने वाली लगभग सभी लड़कियां प्रतिदिन बी.एच.यू. कैंपस में छेड़खानी का शिकार होती है. प्रथम तो वो किसी से ऐसे मामलों का जिक्र तक नहीं करती हैं. इस प्रकार के मानसिक उत्पीड़न के साथ में घुट-घुट कर जीना इनमे से अधिकांश ने तो इसे अपनी नियति मान ली है. संभवतः इसका कारण यह डर है कि अगर घर वालों को पता चला तो उनकी पढ़ाई घर वाले बंद करवा देंगे. बी.एच.यू. के अधिकांश विद्यार्थी उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और बिहार के हैं. इन क्षेत्रों में इतने सामाजिक-राजनीतिक आन्दोलनों के बाद भी सामाजिक सोच का दायरा पारंपरिक दकियानूसी दिमागी कचड़े को समृद्ध करने के अतिरिक्त कुछ अधिक नहीं है. बच्चियों, लडकियों और महिलाओं के मामलों में तो और भी अधिक. ऐसे दमघोंटू समाजीकरण के बाद की स्थिति खतरनाक न हो तो आश्चर्य ही है. बी.एच.यू. में ही समाजशास्त्र विभाग में पीएच.डी. कर रहीं अनीता ने कहा कि “कमेंटबाजी तक तो ठीक है, इसको हम लोग रोज कई बार झेलते हैं, पर ऐसी घटना स्वीकार्य नहीं है.” यहाँ यह स्मरण रहे कि यह बयान एक शोधछात्रा का है. आज भी  पर आज जब बी.एच.यू. में किसी तरह के शोषण, उत्पीडन और दमन की खबर आम नहीं हो पाती है. यहाँ का ऐसा आभासी वातावरण बना दिया गया है कि ‘यह सर्वविद्या की राजधानी है और यहाँ पर होने वाला हर अपराध आँख बंद किये रहने वाला ही होता है.’

वैसे भी इन क्षेत्रों में बहुत सारे समाज सुधारक और क्रांतिकारी पैदा होने का मतलब ही यह है कि यहाँ पर गंदगी अधिक है. इन क्षेत्रों में जितने भी आन्दोलन और जन कार्यक्रम हुए हैं, उनमे लड़कियों और महिलाओं की भागीदारी अत्यल्प ही रही है. यही स्थिति अभी भी है. यहाँ तक कि महिलओं के लिए होने वाले सेमिनार जैसे आयोजनों में भी. इस आन्दोलन में अभी तक जो चीज निराश कर रही है वो है, शोधार्थी छात्राओं का इसमें हिस्सा न लेना. इसके पीछे वजह चाहे जो कुछ भी हो. संभव है कि इसके पीछे उनके शोध निर्देशकों का दबाव हो. या फिर उन्होंने अपने ऊपर खुद से ही मनोवैज्ञानिक दबाव बना लिया हो. बीएचयू से ही एल.एल.एम. करने वाली अनीता सिंह भारती कहती हैं कि ‘ये हिंदी पट्टी में जो निकृष्ट स्तर की सोच है, महिलाओं को लेकर, जातियों को लेकर, मजदूरों को लेकर और बच्चो के समाजीकरण को लेकर, यह यहाँ के पारंपरिक सामन्ती धर्म और ब्राम्हणवादी सत्ता के मजबूत आधार तथा पिलर दोनों ही हैं.’ इसके पीछे सामाजिक मूल्यों का बजबजाता कचरा और उसको मात्रात्मक तथा गुणात्मक रूप से खाद-पानी देते यहाँ के शिक्षण संस्थानों सहित विश्वविद्यालय प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं. ऐसा इसलिए  क्योंकि शिक्षण संस्थान व्यावसायिक निगमों की तरह काम करते हैं. विश्वविद्यालय और उनके शिक्षक अपने विद्यार्थियों में जड़ परम्पराओं, तमाम तरह की संकीर्णताओं, अंधविश्वास और संविधानविरोधी डेली प्रैक्टिस में उपयोग में आने वाली प्रतिगामी विचारधाराओं के प्रचारक-प्रसारक की सक्रिय भूमिका में हैं. ये अपने विद्यार्थियों में और अपने शोधार्थियों में स्वतन्त्र चिंतन, वैज्ञानिक मिजाज  और आलोचनात्मक दृष्टिकोण पैदा कर पाने में सफल नहीं रहे हैं.

विकाश  इतिहास विभाग, डी.ए.वी.पी.जी. कॉलेज,  बीएचयू, वाराणसी में शोधार्थी हैं.  इमेल: vikashasaeem@gmail.com

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

बीएचयू की बेटियों को देश भर से समर्थन



बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में छात्राओं ने छेड़छाड़ के खिलाफ पिछले कई घंटों से प्रदर्शन कर रही हैं. बीएचयू के कुलपति प्रधानमंत्री से अपने निजी संबंधों के लिए जाने जाते हैं. जब प्रदर्शन शुरू हुआ तो प्रधानमंत्री दो दिवसीय दौरे पर अपने संसदीय क्षेत्र बनारस में थे, लेकिन लड़कियों के प्रदर्शन से घबडाये प्रशासन ने उनका रूट बदल दिया. वे स्याम भी  लड़कियों से मिलने नहीं पहुंचे. दरअसल चौराहे पर कुछ अज्ञात लड़कों ने बीएचयू की एक छात्रा को  तरफ हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींचा. इसके बाद उसके कपड़े फाड़ डाले एवं कपड़े के अन्दर हाथ भी डाला. जिससे घबड़ाई लड़की जब प्रशासन से शिकायत करने पहुँची तो प्रशासन ने भी उसपर अश्लील टिप्पणी की. अआक्रोषित लडकियां धरने पर हैं, प्रदर्शन कर रही हैं. देश भर से उन्हें समर्थन मिल रहा है. सोशल मीडिया में लोग उनकी हौसला आफजाई कर रहे हैं :

‘टच ही तो किया है न और कुछ नहीं किया न’ : प्रशासन के जवाब से आक्रोशित लडकियां 

प्रीति कुसम लिखती हैं: 

बीएचयू के नवीन गर्ल्स हॉस्टल का मामला, होती है छेड़छाड़,रात में खिड़कियों पर फेंके जाते है पत्थर,लड़के करते हैं अश्लीलता, गालीगलौज व MASTURBATION
#शर्मनाक
—————————————————————————–
दिन का सूरज डूबने से पहले ही बीएचयू के नवीन गर्ल्स हास्टल की लड़कियों के जीवन में सूर्यास्त हो जाता है। शाम के 6:30 बज़े हीे उन्हें 12 बिस्तरों के कमरों वाले हॉस्टल में सिर्फ इसलिए बंद कर दिया जाता है क्योंकि 800 करोड़ के बजट वाली यूनिवर्सिटी उनके लिए सुरक्षा और रास्ते में उचित प्रकाश की व्यवस्था नहीं कर सकती।

इन सबकेे बावजूद ऐसी घटनाएं सामने आयी हैं जो आपको बेचैन कर सकती हैं, बहुत बेचैन।
आए दिन आपने हॉस्टल जा रही छात्राओं को रास्ते में कुछ मनचलों द्वारा छेड़खानी और मोलेस्टेशन का सामना करना पड़ रहा है। हॉस्टल बन्द होने के बाद भी देर रात में कुछ लड़के हॉस्टल की खिड़कियों पे पत्थर मारते हैं, अश्लील इशारे करते हैं , खिड़कियों के सामने हस्तमैथून के साथ गालीगलौज कर रातभर परेशान करते हैं। लड़कियां बार बार इसकी शिकायत वार्डेन से लगायत प्रशासन के अन्य लोगों से करती आयीं हैं लेकिन इस गंभीर मामले पर भी हुक्मरानों में अजीब सी ख़ामोशी है।

यह घटनाएं बहुत पहले से चली आ रही है जिस पर अभी तक कोई कार्यवाही नही हुई है, वार्डन मैम का कहना है कि लड़कियां अपनी खिड़कियों को खोलती ही क्यो है?
जानकारी के लिए बता दे हमारे बीएचयू के पास पर्याप्त सुरक्षाबल है जिसपर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है। हॉस्टल में रहने वाली छात्राओं ने कहा है कि अगर उनके साथ कुछ गलत होता है तो उनके जिम्मेदार बोएचयू प्रशासन होगा।
आज नवीन गर्ल्स हॉस्टल की छात्राएं चीफ प्रॉक्टर और छात्र अधिष्ठाता से मिलकर अपनी समस्याओं को सामने रखा और हमेशा की तरह कुछ एक्शन होने की उम्मीद लेकर हॉस्टल गयीं थी।

क्यों कर रही हैं लडकियां पीएम मोदी का विरोध (!)

कमलेश वर्मा की फेसबुक टिप्पणी:

“जली ठूँठ पर बैठकर गयी कोकिला कूक
बाल न बाँका कर सकी शासन की बंदूक”

बीएचयू से सेवानिवृत्त प्रोफेसर चौथीराम यादव ने लिखा: 
जब आँचल परचम बन जाय
तो इंकलाब होता है!
खुदा चाहे या न चाहे
मामला आर-पार होता है।
जय हो,जोहार हो,लड़ाई आर-पार हो।

अनुपमा यादव लिखती हैं:

ये तो गज़ब तमाशा हो गया कभी बीएचयू से सफ़र सुरु करने वाले आज बीएचयू से दूर दूर भाग रहे है।कहीं बेटियाँ न्याय न मांग ले,,
#ढोंगी_मोदी

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

अकेली अकेली और अन्य कविताएँ..

0
मीना खोंड

 मीना खोंड कवितायें लिखती हैं, लन्दन  में रहती हैं. संपर्क : meenakhond@gmail.com

अकेली-अकेली

मै अकेली  बाते करती हूं।
यहाॅ आसपास कोई नहीं ।
फिर किस से बात करती  हूँ?
अपने आप से बात करने की आदत है।
जिंदगी भर  घर के लोगों का साथ था ।
उनकी  सेवा मे मेरा हर पल गुजारा था ।
उनके लिये मेरा जीना था ।
अब अकेली रहती हूं ।
ईश्वर मेरा दोस्त है।
वो मेरा सखा है।
वो मेरे मन मे है
उससे मेरी बाते होती है ।
मेरे साथ मेरा मन है
मन मे ढेर सारी यादें हैं
यादों  मे रिश्ते बसते है
उनसे मेरी बातें होती है
चार दिवारों का घर है
घर मे मेरे कोई नही होता
मै अकेली-अकेली हूँ
मै अकेली बातें करती हूँ।

गरिमा से रहो

जब  कोई दे रही है बिंदियाॅ ,
हरे कांच की चुडियाॅ
कोई लगा रही है कुंकुंम
तो  परहेज क्यों ?
महिलाओं का यह बचपन का हक  है ।
अपना हक अदा करना है ।
पति नही है जब तेरा,
तुझे  दुगनी जिम्मेदारी  संभालनी है ।
इसलिये समाज में  तुम्हे आम महिला की तरह रहना है।
पहले समाज  मे  पतिविहिन औरतों पर बहुत  बंधन थे ।
अन्याय ,अत्याचार ,जुल्म  होते थे ।
अब समाज तुम्हे अपना रहा है ।
समाज मे स्थान दे रहा है ।
तो फिर क्यों दूर भाग रही हो ?
अपने हक का सम्मान से स्वीकार करो ।
अपना अस्तित्व संभालो ।
अपना व्यक्तित्व निखारो ।
जीवन में गरिमा से रहो।

तू लडकी है


तू नही जायेगी वहाॅ
क्वांरी कन्या की पूजा के लिये ।
तू नही है कोई देवी माॅ
तू नही बनेगी माताजी !
तेरे पांव छूना ,तुझे खाना खिलाना
अब नही होगा  ये !!
इधर वे क्वांरी  कन्या के पाँव छूते
उधर उनके गाल चूमते।
देवी समझकर पूजते
और उनके साथ कुकर्म करते ।
अब लडकियाॅ देवी नहीं बनेगी ।
लडकी हैं ,लडकी रहेंगी ।

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

क्यों कर रही हैं लडकियां पीएम मोदी का विरोध (!)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बनारस दौरे के पूर्व बनारस के प्रशासनिक हलके में हड़कम्प मच गया जब बीएचयू की छात्राओं ने बीएचयू गेट के सामने छेड़खानी के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन किया. यहां तक कि विरोध में एक छात्रा ने अपना सिर तक मुंडवा लिया.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज से वाराणसी के दो दिन के दौरे पर होंगे और उनके पहुंचने से पहले यह विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया. पीएम के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में पढ़ने वाली छात्राएं ही खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहीं हैं.

जिस तरह से इन छात्राओं ने प्रदर्शन किया उससे ज़िला प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए  और धरना स्थल पर भारी फोर्स को तैनात कर दिया गया. इन छात्राओं का आरोप है इनके साथ कैंपस में लगातार छेड़खानी होती है. लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होती. इन छात्राओं का आरोप है कि छेड़खानी  प्राक्टोरियल बोर्ड के लोग भी शामिल हैं जिसकी वजह से कोई कार्रवाई नहीं होती.



छात्राओं ने बताया कि उनके साथ हॉस्टल के गेट या क्लास में हर जगह आए दिन छेड़खानी होती है. गुरुवार शाम को भी त्रिवेणी हॉस्टल के बाहर कुछ छात्राओं के साथ छेड़खानी हुई तो छात्राओं ने चीफ प्रॉक्टर प्रो.ओएन सिंह को फोन पर बताया तो कार्रवाई के बजाय उल्टा छात्राओं को ही वे भला बुरा कहने लगे और कहा कि 6 बजे के बाद हॉस्टल के बाहर क्यों घूम रही थीं. फिलहाल छात्राएं कार्रवाई की मांग को लेकर धरने पर बैठी गयीं.

सोनिया गांधी का मास्टर स्ट्रोक: महिला आरक्षण के लिए लिखा पीएम मोदी को खत

छात्राओं के अनुसार भारत कला भवन के पास छात्रा के साथ बाइक सवारों ने की छेड़खानी की. छात्रा के चिल्लाने के बाद भी चंद कदम की दूरी पर मौजूद बीएचयू के सुरक्षाकर्मियों ने कोई मदद नहीं की. जिससे घबराई छात्रा हॉस्टल वापस आई. उसने छात्राओं को पूरी बात बताई. जिसके बाद छात्राएं आक्रोशित हो गईं. छात्राएं हॉस्टल से निकलकर नारेबाजी करती हुई बीएचयू की ओर बढ़ी. छात्राओं के आक्रोशित झुंड को आता देखकर बीएचयू का गेट बंद कर दिया. छात्राओं में इतना गुस्सा था कि बैलर ऑफ फाइन आर्ट्स की एक छात्रा ने उसका सिर मुंडा लिया.
क्या भारत की बेटी है सिंगापुर की पहली महिला राष्ट्रपति (!)

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी के दो दिनों के दौरे पर रहेंगे. इस दौरान वह कई इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स का उद्घाटन करेंगे. साथ ही पीएम कई सभाएं भी करेंगे. प्रधानमंत्री जुलाहों और हथकरघा उद्योग में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए ट्रेड सेंटर के दूसरे चरण की शुरुआत करेंगे. साथ ही प्रधानमंत्री वाराणसी से वडोदरा जाने वाली तीसरी महामाना एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाएंगे.

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें    :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें  उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

जेंडर-स्वतन्त्रता के नाम एक “कवितामय” शाम

स्त्रीकाल और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के हिंदी विभाग द्वारा जेंडर-स्वतंत्रता को संबोधित कविता  पाठ का आयोजन किया गया. जेंडर से मुक्त समाज का उद्देश्य लिए 19 हज़ार किलोमीटर की साइकिल यात्रा पूरी कर चुके राकेश कुमार सिंह इस कार्यक्रम में विशिष्ट तौर पर उपस्थित हुए. कार्यक्रम में मुख्य अतिथि प्रख्यात कथाकार एवं कवि उदयप्रकाश शामिल थे. इस आयोजन में लगभग 35 रचनाकारों ने अपनी कवितायेँ पढ़ीं. जामिया के विद्यार्थियों ने स्त्रीवादी समाज के सपनों को संबोधित कविताओं का पाठ किया.

वरिष्ठ साहित्यकार उदय प्रकाश ने इन नये कवियों में से कई को हिन्दी कविता के भविष्य के रूप में उभरने की आशा व्यक्त की. दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू के कुछ शोधार्थियों ने भी अपनी कवितायेँ पढीं. ‘जी लेने दो’, ‘तेजाब से जलती औरत’ आदि शीर्षक से पढी गई कवितायेँ स्त्रियों के खिलाफ क्रूर हिंसा के प्रति स्वाभाविक आक्रोश की अभिव्यक्ति थीं. नीतिशा खालको ने तो ‘क्या सवाल और कलम कभी होंगे चुप’ शीर्षक कविता का पाठ कर उपस्थितों को कौटुम्बिक यौन-उत्पीड़न के खिलाफ आक्रोश से भर दिया, वह स्वयं भी भावुक हुईं और उपस्थित लोग भी. श्रोताओं ने खड़े होकर खालको का सम्मान किया. भारती संस्कृति ने अंग्रेजी में ‘द वुमन’ शीर्षक से स्त्री देह से आगे स्त्री के अस्तित्व के पक्ष में अपनी कविता पढ़ी.



कार्यक्रम की शुरुआत में उदय प्रकाश की कविता पर आधारित लघु फिल्म ‘औरतें’ दिखायी गयी. कविता स्त्रियों के दुःख, उनके उत्पीडन और समाज तथा परिवार ले लिए उनके अहर्निश समर्पण की मजबूरियों की तस्वीर पेश करती है, माइम विधा के माध्यम से इसे फिल्म के फॉर्म में व्यक्त किया गया है. इस लघु फिल्म के प्रोडूसर विकास डोगरा हैं तथा जानेमाने अभिनेता इरफ़ान खान ने इसे अपनी आवाज़ दी है. कार्यक्रम के अंत में उदय प्रकाश ने अपने संक्षिप्त संबोधन में कहा कि खड़ी-बोली कविता के पहले कवि अमीर खुसरो की कविता से ही जेंडर से मुक्ति के स्वर हिन्दी कविता की एक खासियत बन गये हैं. उन्होंने अपनी एक छोटी सी कविता भी पढी. “आदमी मरने के बाद कुछ नहीं बोलता, आदमी मरने के बाद कुछ नहीं सोचता, कुछ नहीं सोचने ओर कुछ नहीं बोलने पर आदमी मर जाता है”



जेंडर-फ्रीडम के स्वपन और एजेंडे के साथ देश भर में सायकल से घूम रहे राकेश कुमार सिंह ने बताया कि वे 42 महीने से लोगों से मिल रहे हैं और अपनी बात कह रहे हैं. वे अब तक 12 राज्यों की यात्रा कर चुके हैं, दिल्ली उनका 13वाँ राज्य है. इस यात्रा का समापन 2018 में बिहार में राकेश के अपने गाँव तरियानी छपरा में तीन दिवसीय जन-जुटान के साथ होगा.



जामिया मिल्लिया इस्लामिया के हिन्दी विभाग की विभागाध्यक्ष  प्रो. हेमलता महिश्वर ने भी प्रतिभागियों कि प्रशंसा की और ‘विद्रोही’ शीर्षक से एक कविता भी सुनाई| कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन करते हुए स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने कहा कि यहाँ पर हुई कविता पाठ का एक संकलन जल्द ही प्रकाशित किया जायेगा| उन्होंने कहा कि लगभग 35 कवियोँ को सुनने के बाद, जिनमें 20 से अधिक कवयित्रियां हैं मैं इस निष्कर्ष पर हूँ कि यद्यपि पुरुषों की कविताएं स्त्री के प्रति संवेदना से पूरित हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश की कविताओं में स्त्री विक्टिम है। लेकिन स्त्रियों की अधिकांश कविताओं में स्त्री कर्ता है, आक्रोश और पितृसत्ता का सम्पूर्ण नकार उनका मुख्य स्वर है। स्त्री अनिवार्य पीड़ित नहीं है।

इस कविता शाम में राजनी अनुरागी, मेधा पुष्कर, मधुमिता भट्टाचार्जी नैय्यर, कमला सिंह जीनत, विपिन चौधरी, शालिनी श्रीनेट, रचना त्यागी, अनुपम सिंह, नीतिशा खाल्खो,ईश्वर शून्य, हेमलता यादव, आरती प्रजापति, पूजा प्रजापति, भारती संस्कृति आदि आमंत्रित रचनाकारों के साथ-साथ जामिया में अध्ययनरत, राय बहादुर, सुशील, द्विवेदी, अदनान कफीर, तहसीन मजहर, आजम शेख, जीनत, इरम सैफी, शिवम राय सहित कई विर्यार्थियों ने अपनी कवितायेँ पढीं. मंच संचालन किया अरूण कुमार ने. पढ़ी गई कवितायेँ कविता के क्षेत्र में नये भाव, विषय, स्वर और मुद्दों के साथ कविता की आलोचना के लिए नये विमर्श उपलब्ध कराती हैं.

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

जीवित पत्नी का मृत्यु प्रमाणपत्र बनाकर केंद्रीय रिजर्ब पुलिस बल के जवान ने की दूसरी शादी: पुलिस गिरफ्तार करने से बच रही है

जी आप नवरात्र मनायें, नारी शक्ति की पूजा करें और एक स्त्री अपनी पीड़ा के साथ पटना की गलियों में भटक रही है यह कहती हुई कि ‘देखो मैं ज़िंदा हूँ.’ मेरे पति और तुम्हारे देशभक्त जवान ने मेरे जीते जी मृत्यु प्रमाण पत्र बनाकर दूसरी शादी कर ली है.  तुम्हारी पुलिस हाँ, नीतीश जी की पुलिस, राष्ट्रभक्तों और देवीभक्तों की पुलिस उसे गिरफ्तार करने से हिचक रही है.

यह कहानी अभी और इन्हीं नवरात्रों में घट रही है.जब आप अपने घर में स्त्रीपूजा के लिए कलश बैठा रहे हैं तब नीलम कुमारी अपने ज़िंदा होने के सबूत के साथ महिला थाने का चक्कर लगा रही है हाथ में पति द्वारा बनवाया गया मृत्यु प्रमाणपत्र (कोलकाता महानगरपालिका से जारी) लेकर यह गुहार लगाते हुए कि मुझे  और मेरे दो बच्चों को न्याय दिलवाओ.

नीलम ने स्त्रीकाल से बातचीत करते हुए बताया कि ‘ मेरे पति मनोज कुमार सिंह, जो सीआरपीएफ 173 बटालियन, मणिपुर में हेड कांस्टेबल हैं, मेरे साथ मार -पीट करते रहे और जबरदस्ती तलाक पेपर पर साइन लेकर बिना मेंटेनेंस दिये मेरे दो बच्चों के साथ मुझे छोड़कर चले गये. मैं इस जबरदस्ती के खिलाफ मुकदमा लड़ ही रही थी, अपने बच्चों के और अपने हक़ के लिए कि मुझे सूचना मिली कि मेरा मृत्यू प्रमाणपत्र बनाकर मनोज कुमार सिंह ने दूसरी शादी भी कर ली है. मैंने सीआरपीएफ के कार्यालय से सूचना अधिकार के तहत प्रमाणपत्र की कॉपी मंगवाई और पटना के गांधी मैदान महिला थाना में प्रमाण सहित शिकायत की. पुलिस पहले तो शिकायत ले नहीं रही थी फिर एसपी के कहने पर उन्होंने एक और एफआईआर दर्ज कर लिया. हालांकि पुलिस कार्रवाई में सुस्त दिख रही है.’

लड़की पर तेज़ाब फेकने की धमकी दे रहा है सेना का अफसर
स्त्रीकाल से बातचीत करते हुए महिला थाने की इंचार्ज विभा कुमारी ने बताया कि ‘ सीआरपीएफ के संबंधित बटालियन को लिखा गया है कि आरोपी को गिरफ्तार कर भेजें.’ हालांकि विभा कुमारी यह नहीं बता पायीं कि दो महीने गुजर जाने के बाद भी उसे गिरफ्तार करने की कोई पहल महिला थाने ने क्यों नहीं ली!

सोनिया गांधी का मास्टर स्ट्रोक: महिला आरक्षण के लिए लिखा पीएम मोदी को खत



कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने महिला आरक्षण को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खत लिखा है. सोनिया ने महिला आरक्षण के विषय में पहल लेकर मास्टर स्ट्रोक दागा है साथ ही उन्होंने बहुत दिनों से ठंढे बस्ते में डाल    दिये गये महिला आरक्षण का मुद्दा फिर से गर्म कर दिया है. उन्होंने इसे लेकर सरकार को समर्थन का वादा भी किया है. जहां एक और राहुल गांधी अमेरिका दौरे पर लगातार मोदी सरकार पर निशाना साध रहे हैं वहीं सोनिया गांधी का यह खत राजनीति में एक नयी बहस को जन्म देगा.

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से कहा है कि उन्हें लोकसभा में अपनी पार्टी के बहुमत का लाभ उठाते हुए महिला आरक्षण विधेयक को पारित करवाना चाहिए.
महिला आरक्षण: मार्ग और मुश्किलें 

यह विधेयक 9 मार्च 2010 में कांग्रेस नीत संप्रग सरकार के शासनकाल में राज्यसभा में पारित हो चुका है, किन्तु अभी इसको लोकसभा की मंजूरी मिलनी शेष है. उन्होंने इसे महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है.

महिला आरक्षण के लिए संवाद 
कांग्रेस अध्यक्ष ने पीएम मोदी को भेजे पत्र में कहा, “मैं आपको यह अनुरोध करने के लिए लिख रही हूं कि लोकसभा में आपके बहुमत का लाभ उठाते हुए अब महिला आरक्षण विधेयक को निचले सदन में भी पारित करवाइए.” यह पत्र 20 सितंबर को लिखा गया है.उन्होंने यह भी स्मरण करवाया है कि कांग्रेस और उनके दिवंगत नेता राजीव गांधी ने संविधान संशोधन विधेयकों के जरिये पंचायतों एवं स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण के लिए पहली बार प्रावधान कर महिला सशक्तीकरण की दिशा में कदम उठाया था. सोनिया ने कहा कि उन विधेयकों को 1989 में विपक्ष ने पारित नहीं होने दिया. किन्तु बाद में 1993 में ये दोनों सदनों में पारित हुए. हालांकि भाजपा सरकार प्रचंड बहुमत के बावजूद महिला आरक्षण को लेकर गंभीर नहीं दिख रही है. 



माहिला आरक्षण विधेयक पारित करना स्त्रीत्व का सम्मान है 
स्त्रीकाल महिला आरक्षण के लिए प्रतिबद्ध कोशिशें करता रहा है. यह एक स्वागतयोग्य पहल है.

आदिवासी लेखिकाओं ने की आदिवासी महिलाओं के खिलाफ लेखन की निंदा लेकिन लेखन पर प्रतिबंध के पक्ष में नहीं

देश की वरिष्ठ और युवा आदिवासी महिलाओं ने एक स्वर से हांसदा सौभेन्द्र शेखर के लेखन की भर्त्सना की है जिसमें उसने आदिवासी स्त्रियों की गरिमा का नकारात्मक चित्रण और गरिमा का हनन किया है. रांची में 7-8 सितंबर को आयोजित ‘अखिल भारतीय आदिवासी लेखिका सम्मिलन’ के अवसर पर जुटी उत्तर से लेकर कई राज्यों से आई आदिवासी महिला साहित्यकारों ने संयुक्त रूप से यह प्रस्ताव लिया था. प्रस्ताव में कहा गया है कि हम झारखंड की भाजपा सरकार द्वारा हांसदा सौभेन्द्र शेखर की किताब पर लगाए गए प्रतिबंध का विरोध करती हैं परंतु इसी के साथ कड़े शब्दों में लेखक की भी भर्त्सना करती हैं जिसने श्रमशील आदिवासी महिलाओं की बहुत ही आपत्तिजनक तस्वीर अपने लेखन में खींची है.

आदिवासी लेखिकाओं ने अपने प्रस्ताव में कहा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जरूरी है. लेकिन यह भी सच है कि स्वतंत्रता के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी अनिवार्य रूप से जुड़ी होती है. खासकर जब लेखन का विषय भारतीय समाज के कमजोर वर्ग हो. चिंता की बात यह भी है कि लेखक का समर्थन कर रहे लोग भारत के आदिवासी महिलाओं की गरिमा पर उसके लेखन के प्रभाव की अनदेखी कर रहे हैं. जबकि इस गंभीर मुद्दे पर कोई आदिवासी लेखक चुप नहीं रह सकता है. इसलिए, अखिल भारतीय लेखिका सम्मलेन, रांची में जुटी हम सभी आदिवासी लेखिकाएं कड़े शब्दों में हांसदा सौभेन्द्र शेखर के लेखन की निंदा करती हैं।

निंदा प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने वाली प्रमुख आदिवासी लेखिकाएं हैं-
1. डॉ. रोज केरकेट्टा, खड़िया-हिंदी की वरिष्ठ साहित्यकार, रांची (झारखंड)
2. प्रो. स्ट्रीमलेट डखार, वरिष्ठ खासी साहित्यकार और विभागाध्यक्ष, खासी विभाग, नॉर्थ-हिल युनिवर्सिटी,           शिलांग (मेघालय)
3. डॉ. दमयंती बेसरा, वरिष्ठ संताली साहित्यकार और आलोचक, बारीपदा (उड़ीसा)
4. निर्मला पुतुल, चर्चित संताली कवयित्री, दुमका (झारखंड)
5. इंदुमती लमाणी, वरिष्ठ बंजारा लेखिका, बिजानगर (कर्नाटक)
6. क्रैरीमोग चौधरी, वरिष्ठ मोग साहित्यकार, (त्रिपुरा)
7. एस. रत्नम्मा, वरिष्ठ आदिवासी साहित्यकार, (कर्नाटक)
8. जोराम यालाम नाबाम, चर्चित आदिवासी कथाकार व एसोसिएट प्रोफेसर, राजीव गांधी विश्वविद्यालय,           ईटानगर (अरुणाचल प्रदेश)
9. सरोज केरकेट्टा, वरिष्ठ खड़िया कवियत्री, सिमडेगा (झारखंड)
10. डॉ. दमयंती सिंकु, वरिष्ठ हो आदिवासी लेखिका, रांची (झारखंड)
11. सोनलबेन राठवा, सोशल एक्टिविस्ट व आदिवासी लेखिका, (गुजरात)
12. प्यारी टूटी, वरिष्ठ मुंडारी लेखिका, खूंटी (झारखंड)
13. डॉ. शांति खलखो, वरिष्ठ कुड़ुख लेखिका, रांची (झारखंड)
14. डॉ. शोभा लिम्बू, वरिष्ठ आदिवासी लेखिका व प्राध्यापिका, हिंदी विभाग, कलिम्पोंग कॉलेज (प. बंगाल)
15. डॉ. हीरा मीणा, आदिवासी लेखिका व प्राध्यापक, दिल्ली विश्वविद्यालय (दिल्ली)
16. उज्ज्वला ज्योति तिग्गा, चर्चित आदिवासी कवयित्री (दिल्ली)
17. ज्योति लकड़ा, आदिवासी लेखिका, रांची (झारखंड)
18. विश्वासी एक्का, चर्चित आदिवासी कवियत्री (छत्तीसगढ़)
19. सुषमा असुर, चर्चित आदिवासी कवियत्री, नेतरहाट (झारखंड)
20. ग्लोरिया सोरेंग, वरिष्ठ खड़िया लेखिका, सिमडेगा (झारखंड)
21. डॉ. आइवी हांसदा, संताली लेखिका व प्राध्यापक, अंग्रेजी विभाग, जामिया मिलिया विश्वविद्यालय                  (दिल्ली)
22. के. वासमल्ली, वरिष्ठ टोडा साहित्यकार, निलगीरी (केरल)
23. डॉ. मिलन रानी जमातिया, आदिवासी लेखिका व प्राध्यापक, त्रिपुरा विश्वविद्यालय (त्रिपुरा)
24. वंदना टेटे, चर्चित आदिवासी लेखिका, रांची (झारखंड)
25. अलमा ग्रेस बारला, युवा आदिवासी लेखिका, बैंगलुरू (कर्नाटक)
26. कुसुम माधुरी टोप्पो, आदिवासी लेखिका (छत्तीसगढ़)
27. दीपा मिंज, सोशल एक्टिविस्ट और आदिवासी लेखिका, रांची (झारखंड)
28. सुषमा केरकेट्टा, आदिवासी कवियत्री, रांची (झारखंड)
29. प्रीति रंजना डुंगडुंग, नवोदित आदिवासी लेखिका, रांची (झारखंड)
30. सरोज तेलरा, आदिवासी कवियत्री, महुवाडांड़, (झारखंड)
साथ में और 35 आदिवासी लेखिकाएं और लेखक।

अखिल भारतीय आदिवासी लेखिका सम्मेलन की ओर से
वंदना टेटे

संलग्न: प्रस्ताव और हस्ताक्षर

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com