शूद्रा: एक समाज शास्त्रीय अध्ययन (धर्मशास्त्रीय दृष्टिकोण से)

डा .कौशल पंवार
  युवा रचनाकार, सामाजिक कार्यकर्ता ,  मोती लाल नेहरू कॉलेज , दिल्ली विश्वविद्यालय, में संस्कृत  की  असिस्टेंट प्रोफ़ेसर संपर्क : 9999439709

सांस्कृतिक अतीत के दीर्ध पटल पर दृष्टिपात कर ‘शूद्रा’ के संदर्भ में क्या अवधारणाएं मिलती हैं और उसके सामाजिक निहितार्थ क्या रहे हैं उसका अध्ययन करने का यहाँ उपक्रम है. भारतीय संस्कृति का इतिहास अत्यन्त प्राचीन माना गया है. मिथकों की मानें तो सतयुग, त्रेता, द्वापर व कलियुग के रूप में चार युगों का वर्णन है. प्रत्येक युग की अपनी ही विशेषताएँ है, अपने ही बनाए गये नियम है तथा अपने ही जनमानस के लिए विभिन्न आदर्श है. स्मृतियाँ भी इसी प्रकार विभिन्न युगों के जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए निर्धारित किए गए नियमों का संकलन है. सतयुग में मनु प्रोक्त धर्मशास्त्र की प्रधानता थी, त्रेता युग में गौतम प्रणीत धर्मशास्त्र की प्रधानता रही, द्वापर में शंख के द्वारा कहे गये धर्मशास्त्र प्रधान रहे तथा कलियुग में पूर्वयुगीन पाराशर के धर्मशास्त्रों में धर्म-व्यवस्था समुचित बताई गयी. (1)

जितो धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं वानृतेञ्च, 
जिताश्चैरेश्च राजानः स्त्रीभिश्च पुरुषा जिताः.
सीदन्ति चाग्निहोत्राणि गुरुपूजा प्रणशयति,
कुर्मायश्च प्रसूयन्ते तस्मिन्कलियुगे सदा॥ (2) 

यदि स्त्री धूर्त पति का अवदान करती है तो वह मृत्यु के अनन्तर कुतियां अथवा सूकर योनि को प्राप्त करती है. यथा:
दरिद्रं व्याधितं धूर्तं भर्तारं याऽवमन्यते.
सा शुची जायते मृत्वा सूकरी च पुनः पुनः॥ (3)

पति के जीवित रहने पर जो नारी निराहार रहकर व्रत का आचरण करती है, वह स्त्री पति की आयु का हरण करती है और नरक को प्राप्त करती है. मनु के द्वारा कहा गया है कि जो स्त्री पति की आज्ञा के बिना व्रत का आचरण करती है, वह उसका तामस व्रत कहलाता है. महर्षि पाराशर ने स्त्रियों के गर्भ ठहरने व गर्भपात के लिए उन्हें ही दोषी ठहराया है. यथा:

बान्धवानां सजातीनां दुर्वृतं कुरुते तु या,
गर्भपातं च या कुर्यान्न तां संभाषयेत्क्वचित्.
यत्पापं ब्रह्महत्या द्विगुणं गर्भपातके,
प्रायश्चिते न तस्यास्ति तस्यास्त्यागो विधीयते॥ (4) 

जो स्त्री बन्धुओं, सजातियों के साथ दुराचारिणी हो जाये अथवा जो गर्भपात कराये, उससे कभी वार्तालाप न करें. जो पाप ब्रह्महत्या करने पर लगता है, उसका कोई प्रायश्चित नहीं है. इसलिए उस स्त्री का त्याग ही उचित है. स्त्री द्वारा गर्भ का धारण किया जाना स्त्री के दुराचार का परिणाम है या पुरुष (बन्धु-बान्धव या सजातीय) द्वारा बलपूर्वक सम्बन्ध बनाना. इस बात को ऋषि ने स्पष्ट नहीं कहा है. गर्भपात के पीछे ब्रह्महत्या के पाप को जोड़कर एक स्त्री के जीवन को आस्था व विश्वास के नाम पर जंजीरों मे जकड़ा गया है. महर्षि पाराशर ने स्त्रियों के लिए सती व ब्रह्मचर्य का समर्थन करते हुए कहा हैः

मृते भर्तरि या नारि ब्रह्मचर्यवृते स्थिता.
सा मृता लभते स्वर्गं यथा ते ब्रह्मचारिणः.
तिस्रः कोटयोऽर्धंकोटी च यानि लोमानि मानवे.   
तावत्कालं वसेत्स्वर्गें भर्तारं याऽनुगच्छति॥ (5)

महर्षि पाराशर ने स्त्रियों के लिए सती व ब्रह्मचर्य का समर्थन करते हुए कहा है:

मृते भर्तरि या नारि ब्रह्मचर्यवृते स्त्रिता,
सा मृता लभते स्वर्गं यथा ते ब्रह्मचारिणः.
तिसृ कोटयोऽर्धंकोटि च यानि लोमानि मानवे,
तावत्काल वसेत्स्वर्गें भर्तारं याऽनुगच्छति॥ (6)  



पति के मर जाने पर जो स्त्री ब्रह्मचर्य व्रत से परायण होकर अपना जीवन बिताती है, वह स्त्री, जिस प्रकार अपने आचरण में स्थित हुए ब्रह्मचारी स्वर्ग में जाते हैं, उसी प्रकार स्वर्ग को प्राप्त करती है. मनुष्य के शरीर में साढे तीन करोड़ रोग बताए गए हैं, उतने ही वर्ष तक वह स्त्री स्वर्ग को प्राप्त होती है. जो स्त्री पति की मृत्यु के उपरान्त दूसरा विवाह नहीं करती तथा विधवा के रूप में जीवन व्यतीत नहीं करती तो वह पति के साथ सती हो सकती है. इसका पुण्यफल भी उसे प्राप्त होगा. यथा:

व्यालग्राही यथा व्यालं बलाद्धरते बिलात्,
एवं स्त्री पतिमुद्धृत्य तेनैव सह मोदते॥ (7)

पति के मर जाने पर सती होती है वह स्त्री, जिस प्रकार सर्प को पकड़ने वाला बलपूर्वक बिल में से सर्प को निकाल लेता है, उसी प्रकार वह स्त्री भी पति का उद्धार करके स्वर्ग में उसी के साथ आनंद प्राप्त करती है.

इससे प्रतीत होता है कि स्त्री पर आस्था, विश्वास तथा स्वर्ग का लोभ आदि के नाम पर कर्तव्य आरोपित किए गए हैं. बालिकाओं के विवाहादि संस्कार शीघ्रातिशीघ्र सम्पन्न कर दिये जाने का विधान निर्मित कर दिया गया ताकि उनकी अपनी निर्णय शक्ति का विकास ही न हो पाए, इसके लिए अवश्य ही स्त्रियों की रक्षा का कारण बताया गया है. यथा:

अष्टवर्षा भवेद् गौरी नववर्षा तु रोहिणी,
दशवर्षा भवेत्कन्या अत ऊधर्वं रजस्वला.
प्राप्ते तु द्वादशे वर्षे यः कन्यां न प्रयच्छति,
मासि-मासि रजस्वत्याः पिबन्ति पितरोऽनिशम्.
माता चैव पिता चैव ज्येष्ठो भ्राता तथैव च,
त्रयस्ते नरकं यान्ति दृष्ट्वा कन्यां रजस्वलाम्॥ (8)  

आठ वर्ष की गौरी, नौ वर्ष की रोहिणी, दस वर्ष या उसके ऊपर की कन्या रजस्वला होती है. बारहवां वर्ष प्राप्त होने पर जो कन्यादान नहीं करता, प्रत्येक मास में होने वाले रज का सदा उसके पितर पान करते हैं. माता-पिता व बड़ा भाई तीनों रजस्वला कन्या को देखकर नरक को प्राप्त करते हैं. वस्तुतः नारी को समस्त रूपों में कठोर अनुशासन से बांधा गया है.

धर्मशास्त्रों में स्त्री  की महत्त्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार करते हुए भी समाज में उनकी स्वतंत्रता तथा अधिकारों का हनन करके उनकी प्रगति के मार्ग को अवरुद्ध सा कर दिया था जिसमें सामाजिक विकास की प्रक्रिया में स्त्री की भूमिका काफी निर्बल हो गयी थी. उनसे तो साक्ष्य देने का देने का भी अधिकार छीन लिया गया था यथाकृ “स्त्री की बुद्धि अस्थिर होती है अतः वह गवाही के योग्य नहीं है.” (9) परन्तु स्त्रियों की साक्ष्य स्त्रियां हो जाती है “स्त्रीणां साक्ष्य स्त्रियः कुर्यः.” (10) धर्मसूत्रों और स्मृतियों का युग स्त्री सन्दर्भ की दृष्टि से बहुत उज्ज्वल नहीं था. तत्कालीन समाज में धर्म और समाज की रक्षा के नाम पर अनेकों ऐसी व्यवस्थाओं का नियमन हुआ जो स्त्री की गरिमा के विरुद्ध था.

‘ऋग्वेद’ की उपमा “अनवधा पतिणुष्टेव नारी” (11) से स्पष्ट है कि तत्कालीन समाज में पति संसर्ग में रहने वाली और पति के द्वारा सेवित पतिव्रता नारी को अनिन्धा, विशुद्ध चरित्र वाली माना जाता था. (12) ‘अथर्ववेद’ में पति के सहचर्य में रहने वाली साध्वी नारी को सुपत्नी कहा गया है. (13) ‘अथर्ववेद’ में विवाह संस्कार के एक मन्त्र में वधू को पति की अनुवर्तिनी बनने को कहा गया है. (14) वह अपने जीवन में वस्तुतः पति का अनुवर्तन करती थी. ‘ऋग्वेद’ के सायण भाष्य से विदित होता है कि देव-शाप से नपुंसक बने हुए आसंग नामक राजा को उसकी पत्नी ने अपनी तपस्या के बल पर पुंसत्व की प्राप्ति कराई थी. (15)

‘मनुस्मृति’ व ‘याज्ञवल्क्यस्मृति’ में नारी की मुक्ति सम्बन्धी अवधारणा और श्रेष्ठता को पाने का कारण बताते हुए मनु कहते हैं:
अक्षमाला वसिष्ठेन संयुताऽधमयोनिजा.
शारङ्गी मन्दकाले न जगामाश्चयर्हणीयताम्॥ (16) 

नीच योनि से उत्पन्न हुई अक्षमाला नामक स्त्री वशिष्ठ से विवाहित होने से तथा शरङ्गी नामक स्त्री मन्दपाल ऋषि से विवाहित होकर पुत्रता को प्राप्त हो गयी. आगे कहा गया है:

एताश्चान्याश्च लोकेऽस्मिन्नपकृष्ट प्रसूतयः.
उत्कर्ष योषितः प्राप्तः स्वैः स्वैः भ्रर्तृगुणैः शुचैः॥ (17)

भिन्न और नीच योनि से उत्पन्न हुई स्त्रियां इस संसार में अपने-अपने पति के शुभ गुणों के कारण श्रेष्ठता को प्राप्त हुई है.

उपर्युक्त दोनों श्लोकों में देखने योग्य बात यह है कि पति के प्रताप से ही पत्नियां मुक्त हो रही हैं तथा दूसरा शब्द आया है “नीचयोनि” इसका अर्थ क्या है? उपर्युक्त उद्धरणों में जो भावार्थ निकलता है वह स्त्री समुदाय की अस्मिता, उनके गुणों को न केवल पूरी तरह नकार देता है बल्कि पुरुष के संसर्ग में ही उसकी मुक्ति की बात करता है. पति जैसा चाहे, वैसा पत्नी करे. उसकी अपनी इच्छाएं, सपनें, धड़कनों, चाहतों का कोई मोल नहीं. वह अगर गुलाम बनकर रहे, कोई प्रतिकार न करे तो गुणवान और संस्कारित कही जायेगी. लेकिन अगर उसने जहाँ अपने सपनों को, चाहतों को स्वतन्त्र रूप से पंख लेने की कोशिश की तो सर्वप्रथम उसे चरित्रहीन, कलंकनी कहा जाएगा. एक और शब्द गढ़ा है पितृसत्तात्मक मूल्यों के निर्वहन वाले विद्वत् जनों ने “पतिता” यानि पति से इतर किसी से भी सम्बन्ध बनने पर वह पतिता कही जाती है. देह व्यापार करने पर वेश्या. इसी के समानान्तर यदि कोई पुरुष ऐसा करता है तो उनके लिए कोई ऐसा शब्द नहीं है, जो उसकी पहचान अलग बनाए? असल में प्राचीनकाल से लेकर आज तक पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने निरन्तर ऐसे शब्दों, अर्थों और अवधारणाओं का निर्माण किया कि स्त्री के भीतर प्रतिरोध की चेतना विकसित ही न होने पाए. वह सेविका, मातृसत्ता की मूर्ति, अच्छी घरेलू पत्नी, पतिव्रता, सुगढ़ ग्रहणी, सेविका ही बनी रहे. जरा सा प्रतिवाद करने या घर की चैखट लाघंने पर चरित्रहीन होने का तमगा उस पर लगा दिया जाता है. इसलिए यहां पर कहा जाना चाहिये कि ब्राह्मणवादी वैचारिकी से निर्मित संस्कृति ने ऐसे पितृसतात्मक मूल्यों एवं जातिवादी चेतना का निर्माण किया जो आज तक भी निरन्तर समाज में स्थापित है और इसमें संस्कृत के धर्मग्रन्थों ने अनिवार्य भूमिका भी निभाई है. किसी भी तरह से इस व्यवस्था के नियमों को तोड़ने पर उनके लिए अनेक तरह से कड़े विधान और प्रायश्चित के नियम बनाये गये हैं. यथा:

१. भक्ष्याभक्ष्य का विधानरू स्त्री के वश में रहने वाले का अन्न नहीं खाना चाहिए -
अवीशस्त्री स्वर्गकारस्त्रीणित ग्रमयाणिनाम्.
शस्त्रविक्रयिकर्मारतन्तु वायश्र्ववृतिनाम्॥ (18)
२. वेश्यों के अन्न को नहीं खाना चाहिए.
३. मनु पत्नी के साथ भोजन का निषेध करते हैं यथा:
नाश्नीयाद्भार्यया सार्थं नैनामीक्षेत चाश्नतीम्.
युवतीं जृभ्भमानां व न चासीनां यथासुखम्॥ (19)

पुरुष स्त्री के साथ एक थाली में न खाये, भोजन करती हुई, छींकती हुई, जंभाई लेती हुई, मनमाने ढंग से बैठी हुई स्त्री को न देखे.
४. पुरुष पत्नी के सामने एक वस्त्र पहनकर एवं खड़ा होकर भोजन न करें.
५. याज्ञवल्क्य ने अपने से उच्च जाति की कन्या से बलात्कार करने पर मृत्यु दण्ड तथा अपनी या अपने से नीच जाति की कन्या से अनाचार पर भारी अर्थदण्ड की व्यवस्था की है.
६. पति की हत्या, गर्भपात या किसी नीच जाति के पुरुष संसर्ग से गर्भवती होने पर मृत्युदण्ड का विधान किया गया है. (20)
७. यदि कोई पुरुष किसी दासी, अपने बच्चे की दाई या नौकर की पत्नी से सम्भोग करता था तो उसे ५० पणों का दण्ड दिया जाता है. (21)

धर्मशास्त्र, जो मूलतः सूत्रों, स्मृतियों, कौटिलीय अर्थशास्त्र, महाकाव्यों, पुराणों टीकाओं एवं निबन्धकारों से मिलकर बने है, भारतीय ज्ञान-परम्परा का अकिंचन अंग माने गये है. इन सभी धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में स्त्रियों के लिए असाम्यता का विधान ही वर्णित किया गया है स्त्री के लिए प्रयुक्त किए गए सम्बोधन लैंगिक असाम्यता के स्वर को मुखरित करते है. यथारू ओजस्वती (22), सहस्रवीर्या (23) सहीयसी (24) अत्यन्त बल वाली साम्राज्ञी (शासिका) (25) मनीषा (मन को वश में करने वाली) (26) राज्ञी (दीप्तिमान्) (27) सभा सदा (सभा के अधिकारी) (28) अषाढा (अपराजिता घोषित किया जाना) (29) यज्ञिया (यज्ञ करने वाली उपाधि से युक्त) (30) स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ (ब्रह्मा स्त्री से विभूषित है). (31)

किसी सभ्यता की आत्मा को समझने तथा उसकी उपलब्धियों एवं श्रेष्ठता के मूल्यांकन का सर्वोत्तम आधार उसमें महिलाओं की स्थिति का अध्ययन करना है. तदर्थ स्त्रियों की सामाजिक स्थिति को जानने का सर्वोत्तम उपाय है, उसको दिए गये अधिकारों के बारे में जानना.

* शिक्षा का अधिकार

‘ऋग्वेद’ में शिक्षा को मनुष्य की श्रेष्ठता का आधार माना गया है. (32) शिक्षा से व्यक्ति विशेष में बुद्धि, आत्मविश्वास एवं कार्य क्षमता का विकास होता है. वस्तुतः शिक्षा ही मनुष्य को सही अर्थों में मानवता से भूषित करती है. यह पिता के समान पथ-प्रदर्शक, माता के समान संरक्षिका होती है जो सदैव सच्चे मित्र की भांति मार्ग में सहायक होती है. प्राचीन काल में नगर एवं ग्राम से दूर आचार्यों के गुरुकुल के सन्दर्भ मिलते हैं.

भारतीय मनीषियों ने सम्पूर्ण जीवन को चार आश्रमों ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास में विभाजित करते हुए ब्रह्मचर्य को शिक्षा काल से जोड़ा था जिसका अर्थ था- ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वेदाध्ययन एवं धर्म के अर्थ को समझना और सदा अस्तेयपूर्ण जीवन बिताते हुए व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करना.

वैदिक युग में कुछ सन्दर्भ प्राप्त होते हैं. जहां पर ब्रह्मचारिणी के रूप में स्त्रियां शिक्षा प्राप्त करती थी. ऐसी कन्याओं को दो वर्गों में विभाजित किया गया था - 1. साधुवधू 2. ब्रह्मवादिनी. (33)

1. साधुवधू - जो विवाह पूर्व तक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करती थी.
2. ब्रह्मवादिनी - जो गृहस्थ जीवन से विमुख होकर अपना जीवन तपस्या करके बिताती थी.
कुछ स्त्रियों का उल्लेख ही हमें प्राचीन साहित्य में मिलता है. केवल सन्तोषजनक कहा जा सकता है.

‘ऋग्वेद’ में मन्त्र की रचना करने वाली लगभग २० ऋषिकाओं का वर्णन मिलता है. यथा: घोषा काक्षीवती (ऋ.१०/३९/१-१४), गोधा (ऋ. ५/२८१-६), विश्ववारा (ऋ. ५/२८/१-६), अपाला (ऋ. ८/९१/१-७), निषत् बुहू (ऋ. १०/१०९/१७), अदिति (ऋ. १०/७२/ध्१-९), इन्द्राणी (ऋ. १०/८६/१-२३/१०, १४५/१-६), सरमा देवशुनी (ऋ. १०, १०८, २, ४, ६, ८, १०, ११), रोमशा (ऋ. १/१७९/१-६), उर्वशी (ऋ. १०/९५/२, ४, ७, ११, १३, १५, १६, १८), लोपामुद्रा (ऋ. १/१७९/१-६), यमीवैवस्वती ऋ.१०/१०/१, ३, ५, ६, ७, ११, १३), शाश्वती अङिरसी (ऋ. ८/१/३४), सूर्या (ऋ. १०/८५/१-४७), सावित्री (ये स्त्री ब्रह्मवादि स्त्रियां है, ऋ. १०/८५/१-४७), सिकतानिनावरी (ऋ.९/८६/११/२०), यमी वैवस्वती (ऋ. १०/१०/२, ३, ४, ६, ७, ११, १३), इन्द्रस्नुषा (ऋ. १०/२८/१), अगस्त्य स्वसा (ऋ. १०/६०/६), दक्षिणा प्रजापत्या (ऋ. १०/१०७/१-११), वागाम्भृणी (ऋ. १०/१२५/१-८), कुशिका रात्रि (ऋ. १०/१२७/१-८), ऋद्धा कामायनी (ऋ. १०/१५१/१-५), इन्द्र मातरः (ऋ. १०/१५३/१-५), शची पौलोमी (ऋ. १०/१५९/१-६), सार्दराज्ञा (ऋ. १०/१८९/१-३).

इन ऋषिकाओं से स्वतः सिद्ध होता है कि ऋग्वैदिक काल में कुछ ऋषिकाएँ अवश्य रही होंगी जिन्होने मन्त्रों और सूक्तों की रचना की थी. प्राचीन भारत में स्त्री शिक्षा निषेध के बारे में आभा मिश्रा पाठक (पृ. २६१) लिखती हैं कि उच्च वर्ग की कन्याओं का उपनयन संस्कार सम्पन्न होता था और वे विशिष्ट विषयों का अध्ययन करती थी परन्तु उच्च अध्ययन के लिए गुरुकुल में भेजने की प्रथा मान्य नहीं होने के कारण वह घर पर ही शिक्षा प्राप्त करती थी. परिवार के निकट सम्बन्धी उसे शिक्षा देते थे. उन्हें धर्म और दर्शन की विशेष शिक्षा दी जाती थी. ‘ऋग्वेद’ में अपाला द्वारा अपने पिता की कृषि कार्य में सहायता करने का वर्णन प्राप्त होता है. (34) गृह-कृषि कार्य हेतु कूपों से जल लाने वाली, (35) गाय दुहने वाली एवं मक्खन तैयार करने वाली, (36) कताई, बुनाई (37) एवं सिलाई (38) में निपुणता रखने वाली स्त्रियों के उदाहरण इस तथ्य को स्पष्ट करते हैं कि तत्कालीन स्त्रियाँ प्रतिदिन के कामों में भी पर्याप्त कुशल थी. गाय दुहने में निपुणता रखने के कारण ही उन्हें दुहिता भी कहा गया है. (39) तत्कालीन स्त्रियाँ युद्ध कला में भी निपुण थी. विश्पाल द्वारा युद्ध में घायल होना एवं अश्विनी कुमार द्वारा उसके पैरों की शल्य क्रिया किया जाना इस बात को ओर स्पष्ट करते हैं. (40) स्त्रियों के लिए गायन एवं नृत्य कला में पारंगत होने के सन्दर्भ भी प्राप्त होते हैं. (41) ‘तैत्तिरीय संहिता’ एवं ‘मैत्रायणी संहिता’ में स्त्रियों द्वारा नृत्य एवं गायन की शिक्षा प्राप्त करने का उल्लेख भी मिलता है. (42)


उपर्युक्त संदर्भ से ऐसा प्रतीत होता है कि ऋग्वैदिक काल में स्त्रियों की शिक्षा की व्यवस्था के लिए कुछ सन्दर्भ दिखते हैं लेकिन उनमें “शूद्रा” के लिए क्या व्यवस्था थी? इस सन्दर्भ में ‘ऋग्वेद’ भी मौन दिखाई देता है. द्विज वर्णा के लिए भी यह व्यवस्था सुदृढ़ रूप से दिखाई नहीं देती. कालान्तर में उसे भी सब अधिकारों से वंचित कर दिया गया.

संभवतः कहीं पर भी ऐसा उदाहरण नहीं मिलता कि शूद्र या शूद्र स्त्री भी ऋचाओं का सृजन किया करती थी. जिस प्रकार का विधान शूद्रों के लिए बना दिया गया था उसमें शूद्र स्त्री कैसे अलग रह सकती थी? उस पर भी शूद्र के लिए बनाये गये विधान पूरी तरह से लागू होते थे.

हमने पहले भी उल्लेख किया है कि धर्मशास्त्रों ने ऐसी विलगावपूर्ण सूक्तियों और मन्त्र/श्लोकों का निर्माण किया जिसमें स्त्री व पुरुष के रूप में ही समाज का विभाजन नहीं हुआ बल्कि ऊंची एवं नीची जाति के रूप में समाज बंटता चला गया. हालांकि इस बंटवारे का कोई ठोस वैज्ञानिक या प्रकृतिजन्य आधार नहीं था  बल्कि अपने वर्चस्व, प्रभुता एवं अपने वर्ग को बचाए रखना था. जिस प्रकार शिक्षा के क्षेत्र से शूद्र व अछूतों को बाहर किया गया, उसी प्रकार स्त्री को भी उससे बाहर किया गया. हालांकि कहीं-कहीं पर यह उल्लेख आता है कि प्राचीन समय में कुछ स्त्रियाँ शिक्षित थी और पिता और पति के साथ यज्ञ में शामिल हुआ करती थी. हम इस तथ्यात्मक, वास्तविकता या प्रमाणिकता का विश्लेषण करेंगें. लेकिन उससे पहले यहां शिक्षा के लिये यज्ञोपवीत संस्कार का सर्वप्रथम उल्लेख करेंगे. भारत में प्राचीन काल से ही वर्ण-व्यवस्था कायम कर दी गई थी. समाज चार वर्णों में बंटा हुआ था. ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र. एक अन्य वर्ग था अछूत जिसको किसी भी वर्ग में स्थान नहीं दिया गया था. अन्य जातियों की तरह स्त्रियाँ भी जातियों में बंट गई थी क्योंकि ब्रह्मा के अंगों से ये चार वर्ण प्रमुख रूप से बने थे. इसी से पुरुषों की उत्पत्ति हुई थी. स्त्री की उत्पत्ति ब्रह्मा के किस अंग से हुई? यह नहीं बताया गया और न ही यह अनिवार्यता समझी गई. पुरुषों की जातियाँ निर्धारित थी. केवल पुरुषों के कर्मों के आधार पर ही जातियाँ निर्मित की गई थी. स्त्रियों के कर्मों के आधार पर जातियाँ नहीं बनी, यह घोर आश्चर्य है. स्त्रियाँ तो किसी कर्म के लायक नहीं समझी गई थी. ब्राह्मण मुख है- क्योंकि वही वेद मन्त्रों व धार्मिक कार्यों का कर्ता व रचयिता था. उसी के आधार पर पत्नी ब्राह्मण हुई. यानि उसकी कोई पहचान नहीं थी. क्षत्रिय बाहु है - उसका गुण लड़ना, रक्षा करना इत्यादि है. वही देश, समाज, कुटुम्ब व परिवार का रक्षक है. वह शस्त्र धारण करता है इसलिए उसकी पत्नी क्षत्राणी कहलाएगी. उसकी भी कोई पहचान नहीं. तीसरे पायदान पर आता है वैश्य यानि जंघा- उसका गुण है चलना, व्यापार करना आदि. इसकी पत्नी भी वैश्य कहलाएगी. इसकी भी कोई पहचान नहीं. फिर चैथे पायदान पर खड़ा है शूद्र- यानि सेवाकार्य करने वाला. इसकी पत्नी शूद्राणी यानि सेविका. यहां पर यह ध्यान रखना चाहिये कि उपर्युक्त तीनों वर्गों की पत्नियाँ भी सेविकाएं ही हैं. पति के गुणों से ही उनकी पहचान है. वह न तो शास्त्र की शिक्षा ले सकती हैं या न ही शस्त्र की तथा वह न ही व्यापार कर सकती है और न ही स्वतन्त्र भ्रमण. इसी प्रकार तीनों वर्णों के पुरुष का ही उपनयन संस्कार होने की बात धर्मशास्त्रों में कही गई है. स्त्रियों के उपनयन संस्कार को मनु ने अलग ढंग से स्थापित किया है. शूद्र का उपनयन होता ही नहीं था क्योंकि उसकी जरुरत नहीं थी. उपनयन संस्कार को विद्यार्थी का श्रुति विहित संस्कार कहा गया है. यानि ‘उपनयनम् विद्यार्थस्य श्रुतिः संस्कारः’ इससे ऐसा प्रतीत होता है कि शिक्षा ग्रहण करने से पूर्व विद्यार्थी का उपनयन संस्कार अनिवार्य था. लेकिन स्त्रियों के लिये भी उपनयन संस्कार का विधान था, वर्णन करते हुये कहा गया है. यथा:

अमन्त्रिकास्तु कार्येयं स्त्रीणामावृदशेषतः.
संस्काराद्ये शरीरस्य यथाकालं यथाक्रमम्॥ (43)

केशान्त पर्यन्त नारी के समस्त कार्य (संस्कार) ठीक उसी प्रकार किये जाये, किन्तु वे वैदिक मन्त्रोच्चारण के बिना हो और नारियों का विवाह संस्कार ही उपनयन संस्कार के समान है. (44)


मनु की अनुसार स्त्रियों का विवाह ही यज्ञोपवीत हो, पतिसेवा ही गुरुकुल निवास हो और गृहकार्य ही यज्ञ के समान हो. इससे स्पष्ट होता है कि स्त्रियों को शिक्षा का अधिकार नहीं था क्योंकि शिक्षा के पूर्व उपनयन एक अनिवार्य धार्मिक एवं कार्मिक अनुष्ठान था. स्त्रियों के लिये पतिसेवा ही सर्वश्रेष्ठ विद्या एवं धर्म का पालन माना गया.

अब हम पुनः लौटते हैं उस कथन की प्रमाणिकता की ओर, जब यह कहा जाता है कि प्राचीन समय में बहुत सी स्त्रियां शिक्षित थी और यज्ञ अनुष्ठान आदि में बैठा करती थी. इस संदर्भ में प्राचीन धर्मग्रंथ के अध्येता मुद्राराक्षस का कहना है कि बहुत से लोग तर्क देते हैं कि, “‘ऋग्वेद’ की ऋचाओं की लेखिकायें लोपाद्रुमा जैसी स्त्रियां थी. वे वहां थी, शायद उन्हें ऋषिका का दर्जा मिलता रहा होगा पर निश्चय ही वे गिनी-चुनी स्त्रियों में रही होंगी जो मध्य एशिया से ब्रह्मणों के साथ आई होंगी” पर भारत में ‘ऋग्वेद’ गवाही देता है कि, “ब्रह्मण, ऋचाओं में इन्द्र से शत्रु को जीतकर स्त्रियां दिलाने की प्रार्थना कर रहा था.” (45) इस प्रकार के विचार अन्य धर्मग्रन्थों में तथा महाकाव्यों में भी दिखाई देते हैं जो स्त्रियों की कारुणिक दशा का वर्णन करते हैं. महाभारत में भी स्त्री के लिये द्रष्टव्य है- “क्षुरधारा विषं सर्पौ वन्हिरेत्येभेतः स्त्रियः” (46) यानी छुरे की धार, विष, सांप और आग एक तरफ और स्त्री दूसरी तरफ. किस प्रकार के धार्मिक ग्रन्थों से स्त्रियों की तुलना की जा रही है? इसी प्रकार आगे यह बताया गया है कि किस प्रकार से विधि विधान एवं क्रियाओं में स्त्री की भागीदारी नहीं थी या नहीं होनी चाहिये थी. भीष्म पितामह महाभारत में इस प्रकार से कहते हैं - ‘न स्त्रीणां क्रियाः काश्चिदिति धर्मौ व्यवस्थितः’ (47) अर्थात् स्त्री के लिये किसी भी धार्मिक कर्मों-क्रियाओं का विधान नहीं है. इसी प्रकार से ‘मैत्रायणी संहिता’ में भी स्त्रियों को झूठ से उत्पन्न होने वाली कहा गया है यानी कि उस पर विचार नहीं किया जाना चाहिये. इसी प्रकार से आपस्तम्बधर्मसूत्र में भी कहा गया है - “असतो वा एष संभूर्ता तय शूद्रः” यानी कि शूद्र भी झूठ से ही उत्पन्न हुआ है.

भारतीय समाज की दो धार्मिक ग्रन्थों में बहुत आस्था बनी हुई है. कभी भी वे उसे स्त्री व शूद्र निन्दक ग्रन्थों के रुप में देखने का प्रयास नही कर सके. दोनों ग्रन्थों में स्त्री सम्बन्धी घोर अपमान सम्बन्धी बातें लिखी गयी हैं. महाभारत के अनुशासन पर्व के 20वें अध्याय में आया है कि,“नास्ति स्वतन्त्रता स्त्रीणां अस्वतंत्रा हि योषित” (48) यानी स्त्रियां स्वतन्त्र नहीं रह सकती हैं, क्योंकि वह तो पराधीन रहने के लिये बनी हुई है. इसी अध्याय में आगे कहा गया है कि, “प्रजापतिमतं हि एतद् स्त्री स्वतन्त्रयं अर्हति” (49) यानी कि स्त्री स्वतन्त्र नहीं होनी चाहिये. मुद्राराक्षस अपनी पुस्तक में महाभारत के अनुशासन पर्व के दान पक्ष का विश्लेषण करते हैं कि अश्वनिकुमार सुदर्शन जब घर से बाहर गया हुआ था तब एक ब्राह्मण आ जाता है और वह सुदर्शन की पत्नी से कहता है कि -

यदि प्रमाणं धर्मस्ते ग्रहस्थाश्रमसम्मतः.
प्रदानेनात्मनो राशि कर्तुमर्हसि मे प्रियम॥ (50)

यदि तुम गृहस्थ धर्म को मानती हो तो मुझे अपना शरीर देकर प्रसन्न करो. जब ब्राह्मण और सुदर्शन की पत्नी अन्दर चले जाते हैं तो उस समय सुदर्शन वापिस आ जाता है. वह ब्राह्मण की करतूत को जानकर सिर्फ इतना ही कहता है कि, “सुरतं ते अस्तु विप्राग्रय प्रीतिहि परमा मम” यानी तुम रति क्रिया करो और यह मुझे भी पसन्द है. (51) उपर्युक्त विश्लेषण एवं उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि धार्मिक शास्त्रों के अन्तर्गत जिस प्रकार से स्त्रियों का चित्रांकन हुआ है, वह किसी भी प्रकार से एक आदर्श समाज की कल्पना को प्रस्तुत नहीं करता है. स्त्रियों के सम्बन्ध में जिस प्रकार के मन्त्रों व श्लोकों की रचना की गई है, वह निन्दनीय है. धर्मग्रन्थों से पता चलता है कि वहां पर भी स्त्री का शरीर ही महत्त्वपूर्ण है. इसलिये शरीर का वर्णन बहुत ही थोड़े व अश्लील रूप में आया है. बहुत ही कम रूप में उसकी चाहतों, इच्छाओं व सपनों का उल्लेख हुआ है. स्त्री किसी भी रूप में स्वतन्त्र नहीं होनी चाहिये. वह सारे पिण्ड की दासी बनी रहे और उसकी मुक्ति केवल पुरुष मात्र से ही संम्भव हो. वह केवल पुरुषों की सेवा के लिये, नाचने के लिये तथा पुरुषों के मनोरंजन के लिये ही पैदा हुई है. किसी भी प्रकार के अधिकार उसके हिस्से में नहीं आये. जननी के रूप में वह ब्रह्मा थी. परन्तु कल्पना करके उसकी कोख को अपमानित किया गया. जिस योनि में नये सृजन का आगमन होता है, उसे भी पितृसत्तात्मक मूल्यों के अन्वेषक मनीषियों ने नीच योनि और उच्च योनि में विभक्त कर दिया. जैसे कि समाज में निम्न समुदाय है तथा उच्च समुदाय. उसी प्रकार जनसमुदाय का भी निर्धारण कर दिया. इस काल में स्त्रियां ज्ञान, बुद्धि एवं चातुर्य में कौशल प्राप्त करने के साथ-साथ दर्शन, तर्क, मीमांसा, साहित्य आदि विषयों में पारंगत है. काशकृत्स्नी ने मीमांसा जैसे क्लिष्ट विषय पर ग्रन्थ लिखकर विशेष ख्याति प्राप्त की जो ग्रंथ उसी के नाम से विख्यात हुआ और उस पुस्तक का अध्ययन करने वाला वर्ग “काशकृत्स्नी” कहलाया. वस्तुतः धर्मग्रंथों व धर्मशास्त्रों का अध्ययन करने पर नारी के सम्बन्ध में बहुधा परस्पर विरोधी बातें मिलती है जिस कारण से किसी एक निष्कर्ष पर पहुंचने में कठिनाई होती है. यथा जहां एक तरफ वैदिक कालीन समाज में स्त्रियां ऋषिकाओं के रूप में प्राप्त होती है. लेकिन बहुत से सन्दर्भ ऐसे भी प्राप्त होते है कि स्त्रियां को वेदाध्ययन या ब्रह्मचर्य आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार नहीं होता था. यथा:

वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः,
पतिसेवा गुरौवासो गृहार्थोऽग्नि परिक्रिया॥ (52)



विवाह संस्कार ही स्त्रियों का उपनयन संस्कार है, पति सेवा ही गुरुकुल में वास तथा घर के काम ही दोनों समय का होम रूपी अग्नि की सेवा है. इससे प्रतीत होता है कि तत्कालीन समाज में स्त्री के लिए सिर्फ विवाह संस्कार की ही मान्यता थी और उस पर भी पुरुष वर्ग का ही.  वही तय करता था कि कन्या का विवाह कब और किन परिस्थितियों में करना है? स्त्री की स्वतन्त्रता का पूर्णतः निषेध किया गया है. जन्म से लेकर मृत्यु तक स्त्रीको पुरुष के नियंत्रण में रखने का निर्देश दिया गया है.

सन्दर्भ: 

1. पाराशर स्मृति, प्रथमोऽध्याय 7 श्लोक 1.
2. पा. प्रथमोऽध्याय ३०-३१.
3. पा. ४.१७.१८.
4. पा. ४.१९.२०.
5. पा. ४.३१.३२.
6. पा. ४.३१-३२.
7. पा. ४.३३.
8. पा. ७.६-८.
9. मनु ८/७७.
10. मनु ८/६८.
11. ऋग्वेद १/७३/३.
12. अथर्ववेद ११/१/२४.
13. अथर्ववेद १४/१/४२.
14. ऋग्वेद ८/१/३४.
15. मनुस्मृति, 9.23.
16. मनुस्मृति,9.24.
17. याज्ञ. आचाराध्याय १६३.
18. मनु ४.४३.
19. वशिष्ठ धर्मसूत्र २१.१०, 
20. याज्ञ. १.७२.
21. याज्ञ. आ ८९९२/२९०,
22. नारद १५.७९.
23. यजु. १०/३.
24. यजु. २३ध्/२६.
25. अथर्व. १०/५/४३.
26. ऋ. १/८५/४६.
27. ऋ. ९६/८.
28. यजु. १४/१३.
29. अथर्व. ८/८/९.
30. यजु. १३/२६.
31. यजु. ४/१९.
32. ऋ .८/३३/१९.
33. ऋ. १०.७१.७.
34. भारत वर्ष का सामाजिक इतिहास - विमलचन्द्र पाण्डेय, इलाहबाद, १९६०, पृ ११६.
35. भारतवर्ष का सामाजिक इतिहास - विमल चन्द्र पाण्डेय, पृ. ११६.
36. ऋ. ८.९१.५-६.
37. ऋ. १.११.१४.
38. ऋ. १.१३५.७.
39. ऋ. २.३.६.
40. ऋ. २.३२.४.
41. प्राचीन भारत का सामाजिक इतिहास - जयशंकर मिश्र, पटना, १९९९, पृ ४१०.
42. ऋ १.९४.४, ९.६६.८, १०.७१.११.
43. तै. ६.१.६.५,
44. मै. ३.७.३.
45. मनुस्मृति, 2.66.
46. वैवाहिकोविधिः स्त्रीणांसंस्कारोंवैदिकः स्मृतः, मनुस्मृति 2.67.
47. धर्मग्रन्थों का पुनर्पाठ - मुद्राराक्षस इतिहास बोध प्रकाशन पृष्ठ 127.
48. महाभरत, अनुशासनपर्व, अध्याय 20.
49. वही 20.
50. धर्मग्रन्थों का पुनर्पाठ - मुद्राराक्षस इतिहास बोध प्रकाशन पृष्ठ 209-10.
51. मनु. २.३७.
52. नारद स्मृति, स्त्री, पुसं, ५/४५.

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