आपातकाल के दौरान उनका तबादला ओडिशा कर दिया गया। उन्होंने नौकरी छोड़ दी और जयप्रकाश नारायण के साथ काम करने लगे। यह उनके संघर्ष का दौर था। इसी समय उन्होंने पत्रकारिता संस्थान की स्थापना की और उसके लिए मगध विश्वविद्यालय से स्वीकृति प्राप्त की। उनके संस्थान के पहले बैच के छात्र राजेश शुक्ला थे। रामवचन राय ने कहा कि राजेश शुक्ला ने इस पुस्तक का प्रकाशन कर गुरु-ऋण और पितृ-ऋण, दोनों से उऋण होने का प्रयास किया है।
आपातकाल के दौरान उनका तबादला ओडिशा कर दिया गया। उन्होंने नौकरी छोड़ दी और जयप्रकाश नारायण के साथ काम करने लगे। यह उनके संघर्ष का दौर था। इसी समय उन्होंने पत्रकारिता संस्थान की स्थापना की और उसके लिए मगध विश्वविद्यालय से स्वीकृति प्राप्त की। उनके संस्थान के पहले बैच के छात्र राजेश शुक्ला थे। रामवचन राय ने कहा कि राजेश शुक्ला ने इस पुस्तक का प्रकाशन कर गुरु-ऋण और पितृ-ऋण, दोनों से उऋण होने का प्रयास किया है।
आपातकाल के दौरान उनका तबादला ओडिशा कर दिया गया। उन्होंने नौकरी छोड़ दी और जयप्रकाश नारायण के साथ काम करने लगे। यह उनके संघर्ष का दौर था। इसी समय उन्होंने पत्रकारिता संस्थान की स्थापना की और उसके लिए मगध विश्वविद्यालय से स्वीकृति प्राप्त की। उनके संस्थान के पहले बैच के छात्र राजेश शुक्ला थे। रामवचन राय ने कहा कि राजेश शुक्ला ने इस पुस्तक का प्रकाशन कर गुरु-ऋण और पितृ-ऋण, दोनों से उऋण होने का प्रयास किया है।
वे बचपन में अपनी ही माँ के उस अनपेक्षित गुस्से और ज़हनी तौर पर बिठाए गए तानाशाही पहरे से किस क़दर ख़ौफ़ खाती थीं। यह रिश्ता महज़ ममता का कोई मखमली झूला नहीं था, बल्कि कलेजे को कुतर देने वाला, नियंत्रण, डर और अपने वजूद को जिंदा रखने की एक बेहद कड़वी जद्दोजहद का मैदान बन गया था। इसी दमघोंटू माहौल और माँ के उस सख़्त, निष्ठुर ढर्रे से तंग आकर आखि़रकार उन्होंने महज़ 18 बरस की उम्र में उस घर की दहलीज को हमेशा के लिए लांघ दिया।
सवाल है कि क्या अपने लिए परायेपन का वातावरण बनाने में सम्राट चौधरी ने खुद अपना योगदान दिया है? क्या उनके लिए एक परसेप्शन बन जाएगा कि वे सबके तो नहीं ही हैं, जैसे नीतीश कुमार सबके होने का अहसास देते थे, वे किसी के हो भी नहीं सके हैं। क्या यह अर्जित परायापन है? जब से सम्राट ने शपथ ली है तब से मीडिया का एक बड़ा तबका, समाज का एक बड़ा तबका स्थायी नहीं मान रहा है, समय-समय पर उनकी जगह दूसरा मुख्यमंत्री बनाए जाने की डेडलाइन तय करता है, जिसमें प्रशांत किशोर के बयान सहित भाजपा नेताओं की समय-समय पर टिप्पणियाँ उद्दीपन पैदा करती हैं।
यह एक बड़ी राजनीतिक विडंबना है। राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गाँधी लगातार सोशल जस्टिस, दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की बात करते रहे हैं। कांग्रेस की वैचारिकी में एक पैराडाइम शिफ्ट" राहुल गाँधी इसी की बात करते रहे हैं। और यह भी कि दलित, आदिवासी और मुस्लिम खासतौर पर कर्नाटका में कांग्रेस के वोटर रहे हैं। कर्नाटका में दलितों की आबादी 18 प्रतिशत के करीब है और अनुसूचित जनजाति की लगभग 7 फीसद। और इस इतनी बड़ी आबादी का ज्यादातर कांग्रेस को ही वोट करती है। लेकिन फिर भी कांग्रेस कई संवेदनशील, धार्मिक, सांस्कृतिक मुद्दों पर बहुसंख्यक भावनाओं या ताकतवर जातियों के साथ खड़ी हो जाती है।
आपातकाल के दौरान उनका तबादला ओडिशा कर दिया गया। उन्होंने नौकरी छोड़ दी और जयप्रकाश नारायण के साथ काम करने लगे। यह उनके संघर्ष का दौर था। इसी समय उन्होंने पत्रकारिता संस्थान की स्थापना की और उसके लिए मगध विश्वविद्यालय से स्वीकृति प्राप्त की। उनके संस्थान के पहले बैच के छात्र राजेश शुक्ला थे। रामवचन राय ने कहा कि राजेश शुक्ला ने इस पुस्तक का प्रकाशन कर गुरु-ऋण और पितृ-ऋण, दोनों से उऋण होने का प्रयास किया है।