खबरें

साहित्य

कला-संस्कृति

महकार की महागाथा: लोकतंत्र का एक जीवित महाकाव्य है महकार

हमारा तो उद्देश्य था महकार के महाकाव्य के पन्नों से गुजरना, उसकी काव्यात्मकता का आनंद लेना। बहुत कुछ हम पहले से सुन चुके थे। आज फिर उकसा कर सुन रहे थे। आज देख भी रहे थे। जीतन राम मांझी बड़े अच्छे किस्सागो हैं। वे नेता नहीं होते तो साहित्यकार होते। अच्छा हुआ नेता हुए -महाकाव्य पन्नों पर नहीं, पगडंडियों पर रचा गया, घटित हुआ।जितना संभव हो सके पुराने क्षणों का रिप्लिका तैयार हो रहा था। पुराने का कुछ ढांचागत अवशेष नहीं है, लेकिन पुराने अवशेष पर ही खड़ा है सपनों का यथार्थ, वर्तमान का यथार्थ।

स्वास्थ्य

महकार की महागाथा: लोकतंत्र का एक जीवित महाकाव्य है महकार

हमारा तो उद्देश्य था महकार के महाकाव्य के पन्नों से गुजरना, उसकी काव्यात्मकता का आनंद लेना। बहुत कुछ हम पहले से सुन चुके थे। आज फिर उकसा कर सुन रहे थे। आज देख भी रहे थे। जीतन राम मांझी बड़े अच्छे किस्सागो हैं। वे नेता नहीं होते तो साहित्यकार होते। अच्छा हुआ नेता हुए -महाकाव्य पन्नों पर नहीं, पगडंडियों पर रचा गया, घटित हुआ।जितना संभव हो सके पुराने क्षणों का रिप्लिका तैयार हो रहा था। पुराने का कुछ ढांचागत अवशेष नहीं है, लेकिन पुराने अवशेष पर ही खड़ा है सपनों का यथार्थ, वर्तमान का यथार्थ।
ISSN 2394-093X
418FansLike
783FollowersFollow
73,600SubscribersSubscribe

पढ़ी जा रही हैं

समसामयिकी

महकार की महागाथा: लोकतंत्र का एक जीवित महाकाव्य है महकार

हमारा तो उद्देश्य था महकार के महाकाव्य के पन्नों से गुजरना, उसकी काव्यात्मकता का आनंद लेना। बहुत कुछ हम पहले से सुन चुके थे। आज फिर उकसा कर सुन रहे थे। आज देख भी रहे थे। जीतन राम मांझी बड़े अच्छे किस्सागो हैं। वे नेता नहीं होते तो साहित्यकार होते। अच्छा हुआ नेता हुए -महाकाव्य पन्नों पर नहीं, पगडंडियों पर रचा गया, घटित हुआ।जितना संभव हो सके पुराने क्षणों का रिप्लिका तैयार हो रहा था। पुराने का कुछ ढांचागत अवशेष नहीं है, लेकिन पुराने अवशेष पर ही खड़ा है सपनों का यथार्थ, वर्तमान का यथार्थ।

ग्रामीण बिहार में “सूखा नशा” का बढ़ता जाल: 10 वर्षों से उभरता एक सामाजिक आपदा

प्रतिमा कुमारी की ख़ास रिपोर्ट ग्रामीण बिहार के कई इलाकों में बीते कुछ वर्षों से एक खामोश लेकिन भयावह संकट फैल रहा है, जिसे स्थानीय...

होना चाहती हूं मूक इतिहास की बोली: बापू टावर (पटना) में मुखरित हुआ स्त्री स्वर

बायें से ज्योति रीता, चाहत अन्वी, कंचन राय, सुनीता गुप्ता, प्रत्युष मिश्रा, ज्योति स्पर्श, नताशा, गुंजन उपाध्याय

हंस ब्राह्मणवाद के यम ही नहीं,डाइवर्सिटी आंदोलन के स्तम्भ भी रहे!

— एच. एल. दुसाध पुरखे बुद्ध शरण हंस का हमेशा-हमेशा के लिए चले जाना 22 जनवरी की शाम हिंदी पट्टी की आंबेडकरवादी दुनिया स्तब्ध रह गई,...

“धरती भर आकाश” में स्त्री शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता का प्रतिरोध

तसनीम पटेल की आत्मकथा : शोध आलेख आत्मकथा धरती भर आकाशमें स्त्री शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता का प्रतिरोध अहमद अली शोध सार - हिंदी आत्मकथात्मक साहित्य में...

बड़ी ख़बरें

महकार की महागाथा: लोकतंत्र का एक जीवित महाकाव्य है महकार

हमारा तो उद्देश्य था महकार के महाकाव्य के पन्नों से गुजरना, उसकी काव्यात्मकता का आनंद लेना। बहुत कुछ हम पहले से सुन चुके थे। आज फिर उकसा कर सुन रहे थे। आज देख भी रहे थे। जीतन राम मांझी बड़े अच्छे किस्सागो हैं। वे नेता नहीं होते तो साहित्यकार होते। अच्छा हुआ नेता हुए -महाकाव्य पन्नों पर नहीं, पगडंडियों पर रचा गया, घटित हुआ।जितना संभव हो सके पुराने क्षणों का रिप्लिका तैयार हो रहा था। पुराने का कुछ ढांचागत अवशेष नहीं है, लेकिन पुराने अवशेष पर ही खड़ा है सपनों का यथार्थ, वर्तमान का यथार्थ।

Latest Articles

लोकप्रिय