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बीएचयू: शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रही लड़कियों को देर रात योगी-मोदी-त्रिपाठी की पुलिस ने घेर कर पीटा

बनारस से, कलंकित बीएचयू से 

क्या लिखूं? लिखूं कि पत्नी को छोड़कर आया शासक नहीं जानता बेटियों से स्नेह-राग. माँ से ममत्व का नाटक करने वाला, बनारस में गायों को चारा खिलाने वाला ढोंगी शासक बनारस से लौटते ही लड़कियों पर कहर बनकर टूटा. क्या लिखूं कि कथित संन्यास के बाद ‘योगी’ लखनउ की गद्दी पर बैठा है-जाके पैर न फटे बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई- बेटियों पर पुलिस के डंडे बरसा रहा है!  क्या लिखूं कि गुजरात के ड्रायकुले हरियाणा में रक्त पिपासा को खुली छूट देते हैं, उपद्रवी भक्तों को तांडव करने देते हैं, पुलिस हाथ-पर-हाथ धरे बैठी रहती है और शांतिपूर्ण प्रदर्शन  कर रही  बेटियों पर आधी रात को लाठियां बरसवाते हैं. क्या लिखूं कि टिकधारी कुलपति के भीतर बैठा मनु लड़कियों के पढने से चिढ़ता है. क्या लिखूं कि पत्नी को छोड़कर आया ढोंगी से लेकर योगी तक बेटियों के सह्वास में खपत कंडोमों की गिनती कर अट्टहास कर रहा है, दिल्ली से लेकर लखनउ तक, और उनसे
उनकी किताबें छीन रहा है.

 सम्मान से पढने का हक़ मांग रही  जिन निहत्थी लड़कियों पर रात के 10-30 के बाद लाठियां चलवाई गई वे मांग क्या रही थीं, हृदयहीनों, सिर्फ सम्मान से जीने का हक़ ही तो मांग रही थीं, इत्मीनान से पढने का हक़ ही तो मांग रही थीं. मांग रही थीं कि जोड़-जुगाड़ से जो कुलपति बन बैठा है ( कुलपतियों की नियुक्ति यूं ही होती है) वह सचमुच कुल-पति सा आचरण करे. वह कम से कम शान्तिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लड़कियों से आकर मिले, सुरक्षा का सार्वजनिक आश्वासन दे. लेकिन उसे कहाँ फुर्सत उसके आका, जो बनारस में थे, उसकी रीढ़ की हड्डी सुरसुरा रही थी, वह क्योंकर मिलने आता लड़कियों से. उसने लाठियां भिजवा दी.

‘टच ही तो किया है न और कुछ नहीं किया न’ : प्रशासन के जवाब से आक्रोशित लडकियां 

और तुम, तुम शहर के पुलिस प्रधान,   जिले के कलक्टर  तुम्हारे यूपीएससी पास होने पर  जनता मगन होती है, बधाइयां देती हैं, लेकिन तुम तुम कब निकलोगे मालिक के आगे अपनी हिलती दम के आतंक से बाहर ! क्यों बेरहमी से पिटा बेटियों को, लड़कियों को जो घरों से बाहर पढने आयी हैं.

बनारस से, बीएचयू से लड़कियों की चीख क्या आपके  कानों तक अभी नहीं पहुँची है, तो सोये रहिये, अच्छे दिन के गुणगान में. अभी भक्तों का व्हाट्स ऐप मेसेज आता ही होगा, जो बनारस में खर्च कंडोमो की गिनती बतायेगा और आप भूतो न भविष्यति ढोंगी जोड़ियों के शासन के रास्ते हिन्दू राष्ट्र के सपने का साकार कर लीजियेगा. यह रपट आपके लिए नहीं है, उनके लिये है, जो सचमुच समझते हैं कि सम्मान  से जीयेंगी तभी तो पढ़ेंगी लड़कियां. लगातार लाइव रिपोटिंग कर रहे सिद्धांत मोहन की रिपोरर्ट, जो उन्होंने फेसबुक पर लिखा है:

मैं बनारस से बोल रहा हूं.
यहां बीएचयू के अंदर महिला महाविद्यालय है. रात बारह के करीब पुलिस ने जिलाधिकारी की मौजूदगी में बीएचयू के मेन गेट पर बैठे छात्रों और छात्राओं पर लाठीचार्ज कर दिया.
लड़के भागे अंदर. तो पुलिस ने भी दौड़ा लिया अंदर तक. लड़कियां भागीं महिला महाविद्यालय के अंदर तो कुछ लोगों ने महिला महाविद्यालय का दरवाजा भी तोड़ दिया. अब पुलिस महिला महाविद्यालय के अंदर भी घुस गयी. लड़कियों को दौड़ाकर पीटा. भागने में जो लड़कियां गिर गयीं, पुलिस ने उनके ऊपर चढ़कर पिटाई की.
पुलिस ने लड़कियों को जहां देखा, वहां पीटा. रोचक बात ये जानिए कि महिला पुलिसकर्मी एक भी नहीं. लड़कियां मुझे फोन कर-करके रोते हुए बदहवासी में जानकारियां दे रही हैं. एक लड़की बोलती हैं, “हमें इस खबर को किसी तरह बाहर पहुंचाना है.”

अब थोड़ा और अंदर चलें तो पुलिस बिड़ला हॉस्टल के अंदर घुस गयी है. बिड़ला चौराहे पर लड़कों पर आंसू गैस के गोले और रबर की गोलियां चलायी जा रही हैं. लड़के उधर से पत्थर चलाकर आंदोलन को दूसरी दिशा में मोड़ चुके हैं.
ऐसा दो टके का कुलपति नहीं देखा, जो मिलने का वादा करके मिलता नहीं है, और सीसीटीवी लगवाने की मांग करती लड़कियों पर लाठी चलवा देता है.
लेकिन लाठी चलना अच्छा है. लाठीचार्ज प्रदर्शन का एक पक्ष है, किसी प्रदर्शनकारी के जीवन में यह जितना जल्दी आ जाए, उतना अच्छा. डर उतना जल्दी भागता है. ये मत सोचिए कि मैं लाठीचार्ज को इंडोर्स कर रहा हूं. बल्कि मैं एक पहले से ज्यादा बेख़ौफ़ हुजूम का और खुले दिल से स्वागत कर रहा हूं.:

उन्होंने एक घंटे बाद फिर लिखा: 

अब सुनिये
लड़कियां वापिस गेट पर आ गयीं हैं. एसएसपी की गाड़ी को घेर लिया है और पूछ रही हैं, “हमें मारा क्यों?” और यह भी कि “अब तो जान देकर रहेंगे.”
कहा था न कि लाठी एक बेख़ौफ़ कौम का निर्माण करती है.

सुबह तक बीएचयू में पुलिस बल के तैनात होने की खबरें हैं, लडकियां  अभी भी डटी हैं.

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पत्रकारों, वार्डनों, छात्राओं सब पर बरसायी लाठियां: बीएचयू में पुलिसिया राज

सिद्धांत मोहन 


आज रविवार के दिन बीएचयू में कर्फ्यू की स्थिति बनी हुई है. मैं तीन-चार लाठियां खाने के बाद थोड़ी दूरी पर बैठा हुआ हूं. सुना है कि अमर उजाला का कोई फोटोग्राफर भी लाठियां खाकर बैठा है. यह मीडिया पर भी हमला है, लेकिन मैं उन लड़कियों के लिए चिंतित हूं जो कल रात से लगातार फोन कर रही हैं.
लड़कियों के हॉस्टल के गेट बाहर से बंद कर दिए गए हैं. कल रात की पिटाई में पुलिस ने छात्राओं के साथ-साथ किसी-किसी वार्डेन को भी पीट दिया. अब लड़कियों को कहा जा रहा है कि जिसको भी दुर्गापूजा की छुट्टी के लिए घर जाना है, आज ही निकल जाओ.

बीएचयू: शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रही लड़कियों को देर रात योगी-मोदी-त्रिपाठी की पुलिस ने घेर कर पीटा

ऐसे में कुछ लड़कियों-लड़कों ने हिम्मत की है निकलने की तो कैम्पस में मौजूद सीआरपीएफ और पीएसी के जवान पीटने लग रहे हैं. स्थिति गंभीर है. बीएचयू का आधिकारिक बयान कह रहा है कि “राष्ट्रविरोधी ताकतें राजनीति कर रही हैं”. शायद बलात्कार और यौन शोषण का विरोध करना राष्ट्रविरोधी राजनीति है, ऐसा मुझे हाल के दिनों में पता चला है.
बहुत सारे लोग बाहर से जुट रहे हैं. बहुत सारे लोग अंदर जुटना चाह रहे हैं तो कुलपति त्रिपाठी उन्हें पिटवा दे रहा है. कल रात का मुझसे किया गया वादा कि “भईया, हम लोग सुबह फिर से गेट पर बैठेंगे”, धीरे-धीरे टूट रहा है. अब एक नया संकल्प है कि छुट्टी के बाद फिर से आंदोलन करेंगे. हो सकता है कि ऐसा कुछ हो. लेकिन ऐसा नहीं भी हो सकता है. तीन अक्टूबर तक बहुत कुछ बदल जाएगा.
‘टच ही तो किया है न और कुछ नहीं किया न’ : प्रशासन के जवाब से आक्रोशित लडकियां 

अपनी बेटियों, पत्नियों, प्रेमिकाओं से कहिए ज़रूर कि लड़कियां लड़ रही हैं. मैं भी कह ही रहा हूं. मैंने लिखने वाली नौकरी पकड़ी है, लेकिन इतना तो भीतर बचा है कि कभी भी इन लड़कियों के लिए खड़ा हुआ जाए. इस वादे पर नहीं टिका तो घंटा जिएंगे?

इस कैम्पस के अंदर की प्रगतिशील आत्माएं मर गयी हैं. कोई अध्यापक गेट तक नहीं आया. एक साथ बीस अध्यापक भी गेट पर आ गए होते तो ये लड़कियां उन्हें जीवन भर के लिए अपना शिक्षक मानतीं. इन अध्यापकों का विश्वविद्यालय प्रशासन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी कुछ न कर पाता.
ये एक बार और क्यों न लिखा जाए कि यहां कोई राजनीतिक दल या विचारधारा शामिल नहीं है. कई लोग जुट रहे हैं आज. कई लोगों को जुटना भी चाहिए. क्या होगा नहीं पता? लेकिन बदलाव लाने का एक तो उजाला अब दिखने लगा है.

सिद्धांत मोहन अपने फेसबुक पेज पर लगातार रिपोर्ट कर रहे हैं ग्राउंड जीरो से 


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बीएचयू से लेकर जेएनयू तक लड़कियों को घर बैठाने की संघी साजिश: यौन उत्पीड़न विरोधी समिति को किया भंग



जेएनयू में परचम को आँचल बनाने की संघी साज़िश 


नीतिशा खलखो 

देश भर में महिलाओं की शिक्षा पर हमला हो रहा है, बीएचयू से लेकर जेएनयू तक. जेएनयू देश का पहला संस्थान था जिसने यौन उत्पीड़न के खिलाफ एक समिति बनाई थी, सुप्रीम कोर्ट के ‘विशाखा निर्देश’ के बाद किसी संस्थानों ने जहां ऐसी समिति बनाने में काफी देर लगाई, वहीं यह विश्वविद्यालय एक मिसाल कायम करने में सफल हुआ था. इसका असर यहाँ पढने वाली छात्राओं के पक्ष में बने माहौल में समझा जा सकता था. इस पर प्रशासन हमला कर रहा है. इस समिति (GSCASH)  का चुनाव लड़ चुकी नीतिशा खलखो इसे संघी साजिश बता रही हैं.

दिन भर की बारिश के बावजूद, जेएनयू छात्रों ने शुक्रवार की रात में आयोजित ‘असाधारण’ जनरल बॉडी मीटिंग में बड़ी संख्या में हिस्सा लिया जिसमें जेंडर-समानता के उद्देश्य के लिए बनायी गयी संस्था जिएसकैश (Gender Sensitization against Sexual Harassment or GSCASH) पर हुए हालिया प्रशासनिक हमले पर विचार-विमर्श हुआ. एकमत से सब ने जिएसकैश को बचाने और संघी जेएनयू प्रशासन के ख़िलाफ़ लड़ाई तेज़ करने की बात कही.

पिछले सप्ताह जेएनयू प्रशासन ने कुलपति के दफ़्तर से सटे जिएसकैश ऑफिस पर ताला-बंदी कर दी और उसकी जगह आईसीसी (Internal Complaint Committee) नाम की एक नई संस्था बना दी है. प्रशासन की इसी मनमानी के ख़िलाफ़ जेएनयू समुदाय में काफी गुस्सा है और छात्र और शिक्षक यूनियन इस मामले को दिल्ली हाई कोर्ट में ले गये  हैं जिसपर कोर्ट ने फ़िलहाल ‘स्टे’ लगा दी है. उपरोक्त मीटिंग प्रशासन के इसी हमले से निपटने के लिए बुलाई गई थी. मेरी राय में जिएसकैश की लड़ाई को राजनैतिक तौर पर भी उठाये जाने की आवश्यकता है.

GSCASH के समर्थन में विद्यार्थी समूह

सवाल है कि जेएनयू कुलपति, आईसीसी के द्वारा जिएसकैश को ख़त्म करने के लिए, हर तरह की मनमानी क्यों कर रहे हैं? क्या “देशद्रोही” विमर्श, “सीट-कट” और “सैनिक टैंक” की तरह आईसीसी भी जेएनयू की प्रगतिशील विरासत के ऊपर एक नई संघी साज़िश है?

‘टच ही तो किया है न और कुछ नहीं किया न’ : प्रशासन के जवाब से आक्रोशित लडकियां 

कहने की ज़रुरत नहीं है कि संघ गिरोह की आँखों में जिएसकैश एक लम्बे समय से काँटों की तरह चुभ रही थी क्यूँकि इसने यौन उत्पीड़ित के ख़िलाफ़ उत्पीड़ितों को बोलने का प्लेटफार्म दिया था. यह बात सही है कि जिएसकैश संस्था को और मज़बूत बनाने और इसके दायरे को और अधिक बढ़ाने की ज़रुरत है. मगर इन तमाम कमियों के बावजूद जिएसकैश ‘जेंडर जस्टिस’ की राह में एक जलती हुई मशाल की तरह है जिसे संघी और ब्राह्मणवादी शक्तियों द्वारा  हर हाल में बुझाने की कोशिश कर रही हैं.

जिएसकैश जैसी संस्था जेएनयू, यूनिवर्सिटी ऑफ़ हैदराबाद समेत कई विश्वविद्दालयों में एक लम्बे समय से कार्यरत है. इसकी स्थापना सुप्रीम कोर्ट के द्वारा जारी किये गए विशाखा नीतिनिर्देश की रौशनी में हुई थी.

‘विशाखा और अन्य बनाम राजस्थान राज्य’ केस की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साल 1997 में तारीखी फैसला सुनाया था जिसमें उसने यौन उत्पीड़न के मामले को निपटने के लिए कई सारे नीतिनिर्देश जारी किये. इसके दो साल बाद जेएनयू में जियेसकैश जैसी स्वायत्त संस्था वजूद में आई. यह संस्था अब तक यौन उत्पीड़न से जुडी हुए शिकायत की जाँच और दोषी पाए गए लोगों के खिलाफ सज़ा की सिफारिश करती है.
23-सदस्यों वाली जेएनयू की जिएसकैश संस्था में 10 निर्वाचित प्रतिनिधि होते हैं जो छात्र, शिक्षक, कर्मचारी और अन्य समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं. जब  जियेसकैश किसी शिकायत की जांच करवाती है तो जाँच की प्रक्रिया में सिर्फ निर्वाचित सदस्य ही भाग लेते हैं जो इसकी लोकतान्त्रिक कार्यप्रणाली की खूबसूरती है.
संक्षेप में, जियेसकैश एक स्वायत्त संस्था है जिसके काम-काज में जेएनयू प्रशासन का दख़ल नहीं होता है. इसके प्रतिनिधि जेएनयू समुदाय के सभी वर्गों से आते हैं और यह संस्था बड़े से बड़े ऑफिसर तक के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कर सकती है और और उनके ख़िलाफ़, अगर वह दोषी पाए गए, सज़ा की सिफारिश कर सकती है. कैंपस के अन्दर महिला और पुरुष दोनों की  स्वतंत्रता और समानता के लिए इस तरह की संस्थाओं का होना बेहद आवश्यक है.


जेएनयू में दलित-ओबीसी छात्राएं चुनाव मैदान में: ऐतिहासिक चुनाव

मगर प्रशासन के द्वारा लाई गयी नई संस्था आईसीसी में उपरोक्त बहुत सारी खूबियाँ जानबूझ कर  ख़त्म कर दी गयी हैं. आईसीसी प्रशासन के अधीन कठपुतली की तरह काम करने वाली संस्था होगी क्योंकि उसके सदस्य कुलपति द्वारा मनोनीत होंगे. इसका ज़ोर जेंडर जस्टिस पर नहीं बल्कि यौन-उत्पीडन के मामले को ‘सुलझाने’ पर ज्यादा केन्द्रित होगा. प्रशासन ने अपनी मंशा  ज़ाहिर कर दी है कि वह सुलह के बहाने यौन-उत्पीडन के मामले को दबायेगा और उसके करीब लोगों को ‘इम्पयूनिटी’ मुहैया करेगा. दूसरे शब्दों में कहें तो आईसीसी परचम को आँचल बनाने की एक संघी साजिश है.

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि महिला अधिकार की लड़ाई किसी भी प्रगतिशील अन्दोलन का अभिन्न हिस्सा है. यही वजह है कि भगवा ताक़तें स्त्री- अधिकार के ऊपर निरंतर हमला करते रहे हैं. उन्हें पता है कि अगर स्त्री अपने अधिकार को लेकर बेदार हो गयी तो वह पितृसत्तात्मक अँधेरी कोठरियों से आज़ाद होने के लिए आंदोलित हो जाएँगी. फ़िर शादी, परिवार, धर्म, परंपरा आदि के भगवा बंधन उन्हें ज्यादा दिनों तक जकड़ कर नहीं रख पाएंगे.

लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलतराम कॉलेज में हिंदी पढ़ाती हैं और साल 2012 में जेएनयू छात्र प्रतिनिधि के बतौर जिएसकैश का चुनाव लड़ चुकी हैं.




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विश्वविद्यालय पढ़ायेगा इंद्रजाल, जादूगरी, प्रेत बाधा दूर करने की कला:संघ का एनजीओ दे रहा मंत्रालय की तरह निर्देश

मनीषा 

 बीएचयू के बाद एक खबर यह भी:

अभी 23 सितंबर की देर रात बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में अपनी सुरक्षा की मांग के साथ शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रही छात्राओं पर डंडा बरसाने की खबर आयी ही थीं कि एक खबर और आ रही है विश्वविद्यालयों को संघ की विचार-परम्परा से जुड़े एक एनजीओ द्वारा संचालित करने की कोशिश की. विश्वविद्यालय प्राशासन में बैठे लोग या तो अपनी विचारधारा से प्रेरित होकर या संघ से डरकर उसके निदेशों का इस कदर अनुपालन कर रहे हैं, मानो यह एनजीओ नहीं यूजीसी हो या मानव संसाधन विकास मंत्रालय. इसके निर्देश के अनुसार पढ़ायेगा इंद्रजाल, जादूगरी, प्रेत बाधा दूर करने की कला आदि 64 कलायें.



12सितंबर को जागरुकता, देशभक्ति और राष्ट्रवाद के दृष्टिकोण से काम करने का दावा करने वाली संस्था       भारतीय शिक्षण मंडल ने ईमेल से महामा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय और कुछ संस्थानों को सुझाव भेजा है कि वे अपने पाठ्क्रमों को राष्ट्रवादी बनायें. विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार ने 22 सितम्बर को इस निर्देश के आलोक में यथाशीघ्र अपने विभागों को इसके सुझावों की दिशा में काम करने का निर्देश जारी किया है. यानी महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के छात्र अब इंद्रजाल (जादूगरी से लेकर प्रेत बाधा दूर करने की कला सीखेंगे. विश्वविद्यालय के कुलपति से जब स्त्रीकाल ने इसके बारे में सवाल किया तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया है.

‘टच ही तो किया है न और कुछ नहीं किया न’ : प्रशासन के जवाब से आक्रोशित लडकियां 

भारतीय शिक्षण मंडल संघ की विचार परम्परा से जुड़ा एक समाजिक संगठन है, जिसके कार्यक्रमों में मानवसंसाधन विकास मंत्री ( स्मृति इरानी, प्रकाश जावेडकर से लाकर भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री के अतिरिक्त पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी तक जाते रहे हैं. संस्था अपने ऑफिसियल वेबसाईट पर अपनी कार्यकारिणी का विवरण कुछ यूं देती है:

“भारतीय शिक्षण मंडल की नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की घोषणा 18 नवंबर को आगामी आगरा के उत्तम इंस्टीट्यूट ऑफ मॅनेजमेंट, आगरा में की गई। देश भर से आये भारतीय शिक्षण मंडल की सर्वसाधारण सभा के सदस्यों द्वारा में अध्यक्ष के रूप में श्री. सच्चिदानंद जोशी,  सदस्य सचिव इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र तथा महामंत्री के रूप में श्री. वामनराव गोगटे को निर्विरोध निर्वाचित किया गया। महामंत्री श्री. गोगटे जी ने जानकारी देते हुए बताया कि शिक्षण मंडल के वयोवृद्ध कार्यकर्ता जयपुर से श्री. धर्मनारायण अवस्थी तथा विशाखापट्ट्नम से डॉ. विश्वेश्वरम संरक्षक के रूप में मार्गदर्शन करेंगे।”

12 सितम्बर के अपने ईमेल में संस्थान ने कुलपति को लिखा:

भारतीय शिक्षण मंडल का पाठ्यक्रम एवं शिक्षा पद्धतिके पुनर्निमाण हेतु आह्वान


आदरणीय कुलपति महोदय जी,
सादर प्रणाम।

भारतीय शिक्षण मंडल ने सन् 1969 में शैक्षणिक क्षेत्र में जागरुकता, देशभक्ति और राष्ट्रवाद के दृष्टिकोण से अपना कार्य प्रारंभ किया। शिक्षण मंडल भारत के 22 राज्यों और 220 जिलों में सार्वभौमिक सिद्धांतों के आधार पर काम कर रहा है। भारतीय शिक्षण मंडल राष्ट्रीय उत्थान के लिए ‘भारतीयता’ के साथ भारतीय शिक्षा के विषय पर करने वाला संगठन है। शिक्षण मंडल का मुख्य उद्देश्य गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित एक शिक्षा प्रणाली तैयार करना जो विद्यार्थी के संपूर्ण ज्ञान का भी मूल्यांकन करे। भारतीय शिक्षण मंडल ने इस उद्देश्य के लिए एक पांच आयाम प्रारूप विकसित किया है. अनुसंधान, प्रबोधन, स्वाध्याय, प्रकाशन और संगठन।
भारतीय शिक्षण मंडल, शैक्षिक प्रकोष्ठ पाठ्यक्रम एवं शिक्षण पद्धतिमें भारतीयता के समावेश हेतु इस वर्ष से नवीन पाठ्यक्रमों का निर्माण तथा विषयानुकूल अध्यापन पद्धतिके विकास पर कार्य प्रारंभ कर रहा है।
ध्येय: पाठ्यक्रम एवं शिक्षण पद्धतिका निर्माण इस प्रकार से हो कि जिससे विद्यार्थी का समय व्यक्तित्व विकास एवं राष्ट्रीय एकता के साथ उसका भावनात्मक जुड़ाव सुनिश्चित किया जा सके। सत्व एवं रजस की उसके जीवन में प्रधानता रहे, निष्काम भाव से किये जाने वाले कर्म के महत्व को समझकर एक कर्मयोगी के रूप में अपने समसत कर्तव्यों का निर्वहन कर सके। 16 विद्याओं एवं 64 कलाओं में से कम से कम एक विद्या व एक कला पर उसका अधिपत्य हो, शास्त्रीय एवं मौलिक, विजिक्षु दृष्टिकोण हो, विश्वबंधुत्व के भाव से संपूर्ण विश्व को आच्छादित करने का अजिसमें सामथ्र्य हो, अभय के साथ पूर्णता अथवा शून्य की ओर उन्मुख होकर आने वाले युग का पथ प्रदर्शक बन सके। स्वामी विवेकानंद के शब्दों मेंµ‘मनुष्य, मनुष्य मात्रा हमें चाहिए’, इन्हीं मनुष्यों का निर्माण हमें पाठ्यक्रम एवं शिक्षण पद्धतिद्वारा करना है। यही शैक्षिक प्रकोष्ठ का ध्येय है।

प्रथम चरण में स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर पर निम्न विषयों के पाठ्यक्रमों का निर्माण करना है.
1. इतिहास, 2. समाजशास्त्र, 3. दर्शनशास्त्र, 4. राजनैतिकशास्त्र, 5. मनोविज्ञान, 6. अर्थशास्त्र, 7. लोक प्रशासन, 8. अंतर्राष्ट्रीय संबंध, 9. व्यूहरचनात्मक अध्ययन, 10. शिक्षा एवं शिक्षण पद्धतियाँ, 11. मानव कर्तव्य एवं अधिकार, 12. भूगोल, 13. हिन्दी साहित्य, 14. अंग्रेजी साहित्य, 15. संस्कृत साहित्य, 16. क्षेत्रीय साहित्य, 17. नाट्यकला, 18. नृत्यकला, 19. संगीत एवं गायन, 20. चित्राकला, 21. खगोलशास्त्र, 22. रसायनशास्त्र, 23. भौतिकशास्त्रा, 24. गणित, 25. तकनीकि का भारतीय इतिहास, 26. कम्प्यूटर प्रोग्राम में संस्कृत, 27. नृशास्त्र, 28. खाद्य विज्ञान, 29. गृह विज्ञान, 30. कृषि शास्त्र, 31. पर्यावरण विज्ञान, 32. शोध प(ति, 33. पर्यटन, 34. आपदा प्रबंधन, 35. सेवा प्रबंधन, 36. उध्यमिता विकास, 37. पत्राकारिता एवं संचार, 38. वित्तीय प्रबंधन, 39. नैतिकशास्त्र, 40. स्थापत्य एवं वास्तुकला, 41. वनस्पतिशास्त्र, 42. प्राणीशास्त्र, 43. विधि
इसी राष्ट्रीय कार्य में आहूति देने हेतु शैक्षिक प्रकोष्ठ विशेषज्ञों का आह्वान करता है। आपसे निवेदन है कि भारतीय शिक्षा पद्धतिएवं पाठ्यक्रम के पुनरुत्थान हेतु आपके अमूल्य विचार, सुझाव एवं पाठ्यक्रम ;संदर्भ सहितद्ध दिनांक 19 अक्टूबर 2017 ;दीपावलीद्ध तक ई-मेल द्वारा भेजने का कष्ट करें।

इस कार्य हेतु निम्न बिन्दुओं पर विचार किया जा सकता है.
1. विद्यार्थी को पुस्तकीय ज्ञान के साथ-साथ अनुभूतिजन्य ज्ञान कैसे दिया जा सकता है?
2. विद्यार्थी में राष्ट्रीय स्वाभिमान का जागरण कैसे हो सकता है? अध्यापन में भारतीय ज्ञान परम्परा का समावेश कैसे हो सकता है? उसी के अनुरूप पाठ्यक्रम का निर्माण कैसे हो?
3. विषयों के चयन में जिस प्रकार विद्यार्थी को विकल्प दिए जाते हैं, उसी प्रकार से परीक्षा पद्धतिमें भी विकल्प किस प्रकार दिए जा सकते हैं? उदाहरण स्वरूप राजनैतिक विज्ञान की परीक्षा एवं गणित की परीक्षा एक ही तरीके से होती है, यह न तो विद्यार्थी के साथ न्याय है न ही विषय के साथ।
4. विषय तो बहुत हैं पर उनके अध्यापन का तरीका लगभग एक जैसा है। विषयानुरूप अध्यापन-पद्धतिहो?
5. सिद्धांतों के व्यावहारिक अनुप्रयोग के शिक्षण की व्यवस्था किस प्रकार से की जा सकती है?

भारतीय शिक्षा में परिवर्तन हेतु शिक्षकों का सहयोग परम आवश्यक है। इस राष्ट्रीय कार्य में आपकी एवं आपके विश्वविद्यालय के विद्वान आचार्यों की सक्रिय सहभागिता की हम आशा करते हैं, अतः आपसे विनम्र अनुरोध है कि विश्वविद्यालय के समस्त आचार्यों को इस प्रकल्प से अवगत करावें ताकि उन सभी के सुझावों से एक सुदृढ़ शिक्षा व्यवस्था का निर्माण किया जा सके। इस हेतु हिंदी, अंग्रेजी अथवा किसी अन्य भारतीय भाषा में  भेज सकते हैं।

क्यों कर रही हैं लडकियां पीएम मोदी का विरोध (!)

क्या हैं चौसठ कलायें

1- नृत्य – नाचना
2- वाद्य- तरह-तरह के बाजे बजाना
3- गायन विद्या – गायकी।
4- नाट्य – तरह-तरह के हाव-भाव व अभिनय
5- इंद्रजाल- जादूगरी
6- नाटक आख्यायिका आदि की रचना करना
7- सुगंधित चीजें- इत्र, तेल आदि बनाना
8- फूलों के आभूषणों से श्रृंगार करना
9- बेताल आदि को वश में रखने की विद्या
10- बच्चों के खेल
11- विजय प्राप्त कराने वाली विद्या
12- मन्त्रविद्या
13- शकुन-अपशकुन जानना, प्रश्नों उत्तर में शुभाशुभ बतलाना
14- रत्नों को अलग-अलग प्रकार के आकारों में काटना
15- कई प्रकार के मातृका यन्त्र बनाना
16- सांकेतिक भाषा बनाना
17- जल को बांधना।
18- बेल-बूटे बनाना
19- चावल और फूलों से पूजा के उपहार की रचना करना। (देव पूजन या अन्य शुभ मौकों पर कई रंगों से रंगे चावल, जौ आदि चीजों और फूलों को तरह-तरह से सजाना)
20- फूलों की सेज बनाना।
21- तोता-मैना आदि की बोलियां बोलना – इस कला के जरिए तोता-मैना की तरह बोलना या उनको बोल सिखाए जाते हैं।
22- वृक्षों की चिकित्सा
23- भेड़, मुर्गा, बटेर आदि को लड़ाने की रीति
24- उच्चाटन की विधि
25- घर आदि बनाने की कारीगरी
26- गलीचे, दरी आदि बनाना
27- बढ़ई की कारीगरी
28- पट्टी, बेंत, बाण आदि बनाना यानी आसन, कुर्सी, पलंग आदि को बेंत आदि चीजों से बनाना।
29- तरह-तरह खाने की चीजें बनाना यानी कई तरह सब्जी, रस, मीठे पकवान, कड़ी आदि बनाने की कला।
30- हाथ की फूर्ती के काम
31- चाहे जैसा वेष धारण कर लेना
32- तरह-तरह पीने के पदार्थ बनाना
33- द्यू्त क्रीड़ा
34- समस्त छन्दों का ज्ञान
35- वस्त्रों को छिपाने या बदलने की विद्या
36- दूर के मनुष्य या वस्तुओं का आकर्षण
37- कपड़े और गहने बनाना
38- हार-माला आदि बनाना
39- विचित्र सिद्धियां दिखलाना यानी ऐसे मंत्रों का प्रयोग या फिर जड़ी-बुटियों को मिलाकर ऐसी चीजें या औषधि बनाना जिससे शत्रु कमजोर हो या नुकसान उठाए।
40-कान और चोटी के फूलों के गहने बनाना – स्त्रियों की चोटी पर सजाने के लिए गहनों का रूप देकर फूलों को गूंथना।
41- कठपुतली बनाना, नाचना
42- प्रतिमा आदि बनाना
43- पहेलियां बूझना
44- सूई का काम यानी कपड़ों की सिलाई, रफू, कसीदाकारी व मोजे, बनियान या कच्छे बुनना।
45 – बालों की सफाई का कौशल
46- मुट्ठी की चीज या मनकी बात बता देना
47- कई देशों की भाषा का ज्ञान
48 – मलेच्छ-काव्यों का समझ लेना – ऐसे संकेतों को लिखने व समझने की कला जो उसे जानने वाला ही समझ सके।
49 – सोने, चांदी आदि धातु तथा हीरे-पन्ने आदि रत्नों की परीक्षा
50 – सोना-चांदी आदि बना लेना
51 – मणियों के रंग को पहचानना
52- खानों की पहचान
53- चित्रकारी
54- दांत, वस्त्र और अंगों को रंगना
55- शय्या-रचना
56- मणियों की फर्श बनाना यानी घर के फर्श के कुछ हिस्से में मोती, रत्नों से जड़ना।
57- कूटनीति
58- ग्रंथों को पढ़ाने की चातुराई
59- नई-नई बातें निकालना
60- समस्यापूर्ति करना
61- समस्त कोशों का ज्ञान
62- मन में कटक रचना करना यानी किसी श्लोक आदि में छूटे पद या चरण को मन से पूरा करना।
63-छल से काम निकालना
64- कानों के पत्तों की रचना करना यानी शंख, हाथीदांत सहित कई तरह के कान के गहने तैयार करना।

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बीएचयू की छात्राओं के समर्थन में आये लेखक संगठन : 25 सितंबर को जंतर मंतर पर

‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के जवाबी नारे ‘बचेगी बेटी तो पढ़ेगी बेटी’ के साथ सड़क पर उतरी बीएचयू की छात्राओं पर बर्बर लाठीचार्ज करवाकर बीएचयू प्रशासन, प्रदेश सरकार और फ़ासीवादी आरएसएस ने अपने को पूरी तरह बेनक़ाब कर लिया है. छात्राएं अपने न्यूनतम नागरिक अधिकारों की मांग कर रही थीं, लेकिन आरएसएस के पक्ष में खुलकर बोलने और परिसर में शाखाएं लगवाने वाले कुलपति ने उनसे मिलकर बात करना तक मुनासिब नहीं समझा. छात्राओं के साथ छेड़खानी होती रहे, उन्हें बलात्कार की धमकियां मिलती रहें, और प्रशासन उनकी सुरक्षा के इंतज़ामात करने के बजाये सुरक्षा के नाम पर उन्हीं के ऊपर पाबंदियां बढ़ाता जाए – यह छात्राओं को नामंजूर था. इसका जवाब उन्हें भयानक पुलिसिया दमन से दिया गया.



असूर्यम्पश्या भारतीय नारी के निकृष्ट आदर्श को लागू करने पर आमादा आरएसएस का यह घिनौना चेहरा है, जो इन दिनों प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र के इस ऐतिहासिक विश्वविद्यालय में खुलकर सामने आया है. इसके ख़िलाफ़ छात्राओं का संघर्ष बराबरी के अधिकार के लिए चलने वाली अभूतपूर्व लड़ाई है. हम उन्हें क्रांतिकारी सलाम पेश करते हैं और उन्हें हतोत्साह करने की हिंसक शासकीय-प्रशासकीय कार्रवाइयों की कठोर भर्त्सना करते हैं.


कल 25 सितम्बर को कई संगठन छात्राओं के दमन के ख़िलाफ़ सम्मिलित रूप से दिल्ली के जंतर-मंतर पर 1 बजे दिन में प्रदर्शन करने जा रहे हैं. हम लेखकों-संस्कृतिकर्मियों से अपील करते हैं कि बड़ी संख्या में वहाँ भागीदारी करें.

मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (महासचिव)
संजीव कुमार (उप-महासचिव)  

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‘मैं हिन्दू क्यों नहीं’ के लेखक पर हमला, ‘दुर्गा’ के कथित अपमान के आरोप में दिल्ली विवि का शिक्षक प्रताड़ित

स्त्रीकाल डेस्क 

हिन्दू भावनाओं के कथित अपमान के आरोप में देश भर में लेखकों, बुद्धिजीवियों पर होने वाले हमलों की कड़ी में कुछ और मामले जुड़ गये हैं. ताजा मामला  ‘मैं हिन्दू क्यों नहीं?’ के लेखक पर हमले की है तो दिल्ली विश्वविद्यालय के  एक कॉलेज में प्राध्यापक केदार कुमार मंडल पर एफआईआर का है.

वारंगल जिले में शनिवार को वैश्य समुदाय के लोगों ने लेखक ‘मैं हिन्दू क्यों नहीं?’  जैसी किताबों के  लेखक कांचा आयलैय्या पर हमला बोल दिया। इस दौरान उनपर चप्पल भी फेंके गए। द इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में अपनी नई किताब ‘सामाजिका स्मगलेर्लु कोमाटोलु’ को लेकर लेखक कांचा आयलैय्या की वैश्य समुदाय के लोगों ने कथित रूप से हमला कर दिया।

आरोप है कि वैश्य समुदाय ने किताब के विरोध में उनके साथ कथित तौर पर चप्पलों से मारपीट की। पुलिस का कहना है कि कांचा इलैया तेलंगाना के वारंगल जिले में एक इवेंट में पहुंचे थे। जहां लोगों ने विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया। इसके बाद इलैया को पुलिस स्टेशन ले जाना पड़ा। हालांकि इसके बाद पुलिस स्टेशन में तनाव और बढ़ गया।

क्यो हो रहा है विरोध

एक वकील करुणसागर ने सईदाबाद पुलिस स्टेशन में इलैया के खिलाफ मामला दर्ज करवाया। वकील ने आरोप लगाया कि उन्होंने अपनी किताब में हिंदुओं के खिलाफ आपत्तिजनक बातें कही हैं। पुलिस ने बताया वकील का आरोप है कि लेखक ने अपनी चार किताबों में हिंदुओं के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया था।

जीभ काटने की धमकी

लेखक डॉ. कांचा इलैय्या ने सोमवार दावा किया कि वह उन्हें रविवार की दोपहर के बाद से कई फोन कॉल आ रहे हैं, जिसमें उनकी जीभ काट देने की भी धमकी दी गई। उन्होंने कहा,”किसी ने मेरी जीभ काटने की धमकी दी, मेरा पुतला जलाया गया, मुझे लगता है कि उनके दुर्व्यवहार, फोन कॉल और संदेशों द्वारा बहुत खतरा है। यदि मेरे साथ कुछ भी होता है तो वे जिम्मेदार होंगे”

मिथक और स्त्री आंदोलन का अगला चरण

डीयू के प्रोफेसर के खिलाफ सक्रिय संघ-समूह 


दिल्ली विश्वविद्यालय से सम्बद्ध एक कॉलेज के प्राध्यापक द्वारा दुर्गा के कथित अपमान पर उनके खिलाफ उनके ही शिक्षक संगठन के पदाधिकारियों ने एफआईआर करा दिया है. ‘जिस असुर नायक, (महिषासुर)की ह्त्या के उत्सव के रूप में दुर्गा पूजा मनाया जाता है, उसकी परम्परा पर विस्तृत शोध करने वाले बुद्धिजीवी और फॉरवर्ड प्रेस के संपादक प्रमोद रंजन ने अपने फेसबुक पेज पर केदार कुमार मंडल की प्रताड़ना की निंदा की है:

“दिल्ली यूनिवर्सिटी के दयाल सिंह कॉलेज में प्राध्यापक  केदार कुमार मंडल के एक फेसबुक पोस्ट से कल हंगामा खडा हो गया। । उन्होंने दुर्गा को लेकर जिस अंदाज में बातें कहीं थीं, वे कुछ हद तक अशोभनीय थीं।
लेकिन ​उसके बाद जो कुछ हुआ, वह उससे कहीं अधिक अशोभनीय था। बीजेपी से जुडे शिक्षक संगठन ने उन पर एफआईआर दर्ज करवाई, उन्हें फेसबुक पर भद्दी गालियां दीं गई और कहा गया कि नौकरी से बर्खास्त करवा दिया जाएगा। भयभीत केदार ने माफी मांग ली।

यात्रा वृतांत : महोबा में महिषासुर

लेकिन सवाल यह कि वे कौन से हिंदू हैं, जिनकी भावनाएं केदार के पोस्ट से आहत हो गईं थीं? क्या केदार स्वयं हिंदू नहीं हैं? शायद नहीं। वे शूद्र हैं। हिंदू धर्म तो कहता है कि सभी शूद्र-अतिशूद्र वर्णसंकर हैं। वेश्याओं की औलाद हैं। ढोल हैं, ताडन के अधिकारी हैं। जिन धर्मग्रंथों में यह लिखा है, उनका सडकों पर खुलेआम लाऊडस्पीकर लगाकर पाठ होता है। इन्हीं में से कुछ ग्रंथों को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने की मांग भी भाजपा वाले करते रहते हैं। इनसे किसी की भावना आहत होती है या नहीं?

केदार जी ने जो लिखा था, वह कथानक अनेक आदिवासी समुदायों की कथाओं में अलग-अलग रूपों में आता है। अनेक लेखकों ने इस पर लिखा है। भाजपा वाले बताएं कि महिषासुर, रावण, मेघनाथ आदि को जलाने से आदिवासी समुदायों की भावनाएं आहत होतीं हैं या नहीं?
दुर्गा पूजा के अवसर पर दुर्गासप्तशती के जिन श्लोकों का पाठ होता है, उनमें आदिवासी समुदायों में पुरखा के रूप में पूजे जाने वाले महिषासुर के बारे में अशोभनीय बातें होतीं हैं। महिषासुर को अप्राकृतिक यौनाचार की पैदाइश बताया जाता है। कहा जाता है कि “भैंस के गर्भ से पैदा हुआ वह असुर पशुओं से भी नीच है”। यही कारण है कि छत्तीसगढ में कुछ जगहों पर आदिवासियाें ने महिषासुर का अपमान करने वालों पर मुकदमा दर्ज करवाया था और हाईकोर्ट से जमानत खारिज होने के बाद आरेापी पिछले कई महीने तक जेल में थे।
भावनाएं तो सबकी होतीं हैं। केदार कुमार मंडल को अपनी भावनाओं के लिए लडना चाहिए था।”

नाटक : असुरप्रिया

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के हिन्दी विभाग की विभागाध्यक्ष ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा:
“तुम स्तन निचोड़ कर शादीशुदा होना चिन्हित करो तो जायज़
तुम आदिवासी स्त्री की योनि में पत्थर ढूँसो तो क़ानून सम्मत
पर केदार कुमार मंडल  तुम्हारी कहानी को ढोने से इंकार कर दे, अपना पक्ष बताए तो अपसंस्कृति है।
इतने वर्षों से तुम आदिवासी भावनाओं से खिलवाड़ कर रहे हो तो कुछ नहीं और एक में तुम्हारा समर्थन नहीं किया तो पिल पड़े।
तुम्हारी संस्कृति में दम होगा तो खड़ी रहेगी वरना उसे भहराकर गिरने से कोई नहीं रोक सकता।”

आउटलुक और फेसबुक से साभार 




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मोदी के मंत्री भी महिला आरक्षण विधेयक के पक्ष में

केंद्र की सरकार में समाज कल्याण मंत्री (राज्य) राम दास अठावले अपने कई बयानों और विचारों में भाजपा-संघ के फायर-ब्रांड नेताओं से अलग विचार व्यक्त करते हैं. एक लम्बी बातचीत के इस छोटे से हिस्से में उन्होंने महिला आरक्षण की जरूरत और जाति-धर्म से परे प्रेम-विवाहों के पक्ष में अपनी बात कही है. पूरी बातचीत ‘द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन’ से शीघ्र प्रकाश्य ‘भारत के राजनेता सीरीज’ की किताब में संकलित है. किताब की अग्रिम बुकिंग जल्द ही.

एक विचार ऐसा आ रहा है, खासकर हिंदी क्षेत्र में यह ज्यादा है कि जो दलित लड़कियां है उनको दलितों में ही शादी करनी चाहिए. एक, दूसरा कि जो पढ़े-लिखे दलित लड़के हैं जिनकी नौकरी लग जाती है उन को ब्राह्मण लड़कियां ले जाती हैं. ये खास विचार पढ़े लिखे बुद्धिजीवी प्रोफ़ेसरों के बीच विमर्श में है. इसको आप कैसे देखियेगा. 
मुझे ऐसा नहीं लगता है. दलित लड़कियों ने भी ब्राह्मण और मराठा आदि लड़कों के साथ शादियां की है. जब कोई लड़का-लड़की किसी भी वक्त पर एक दूसरे के निकट आते हैं, उनकी पहचान हो जाती है, तब उनको जाति, धर्म मालूम होने के बावजूद भी वे अपना साथी चुनते हैं और उनकी शादी होती है. यहाँ एक बात ऐसी भी है कि कुछ लोगों को लगता है कि भाई इन्होने ब्राह्मण की लड़की के साथ शादी की है, इन्हें अपने समाज की लड़की के साथ करनी चाहिए थी. लेकिन जब प्रेम विवाह होता है तो कोई जाति का विषय होता नहीं है. चार-पांच प्रतिशत जगह पर गड़बड़ होती है. लेकिन 95 प्रतिशत जगह पर दोनों आपस में मिलते हैं और अपने माँ-बाप को बताते हैं. फिर, आज कल के माँ बाप भी सेक्यूलर  होते हैं, बोलते हैं, ठीक बात है. माँ-बाप भी लड़का-लडकी ढूंढने से बच जाते हैं. शादी कोर्ट में होने से कम खर्चों में भी हो जाता है. मेरा व्यक्तिगत मानना है कि अंतरजातीय विवाह का बाबा साहब ने समर्थन किया है. . विश्वेश्वर,जो कर्णाटक के लिंगायत धर्म के संस्थापक हैं, ने अंतरजातीय विवाह को 12वीं शताब्दी में प्रोत्साहित किया था. जातिवाद ऐसे तो ख़त्म होगा नहीं लेकिन अंतरजातीय विवाह से जातिवाद ख़त्म हो सकता है.

महिला आरक्षण को लेकर आपकी क्या राय है?


बाबा साहब अम्बेडकर ने हिन्दू कोड बिल लिखा था. उसमें उन्होंने महिलाओं को समान न्याय और सामान अधिकार सुनिश्चित किये थे. महिला ब्राह्मण हो या किसी भी जाति की हो उन सब के ऊपर अन्याय हुआ है और इसीलिए बाबा साहब ने हिन्दू कोड बिल लाया था. मुझे लगता है कि महिलाओं को जिस तरह पूरे देश भर के स्थानीय स्वराज संस्थाओं में 50 प्रतिशत आरक्षण दे दिया गया है और इस मुद्दे को सब ने स्वीकार कर लिया था उसी तरह लोकसभा और विधानसभा में भी किया जाना चाहिए. लेकिन यहाँ क्यों विरोध कर रहे हैं मेरे समझ में नहीं आ रहा है. पिछली बार यूपीए  के समय पर कांग्रेस पार्टी भी चाहती थी, बीजेपी भी चाहती थी, दोनों का बहुमत था उसके बावजूद भी समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव और अन्य लोगों ने इसका क्यों विरोध किया मालूम नहीं. उनको शायद ये लगता था की उच्च वर्ग की महिलायें उसमें ज्यादा आ जायेंगी.

सोनिया गांधी का मास्टर स्ट्रोक: महिला आरक्षण के लिए लिखा पीएम मोदी को खत

आरक्षण के बारे में आप क्या सोचते हैं?


आरक्षण के मुद्दे पर मैंने यह प्रस्ताव रखा था कि अगर कुछ लोगों को डर लगता है कि अपनी सीट महिलाओं को जायेगी तो 545 सीटों (543 एलेक्टेड और 2 एंग्लो इंडियन) की लोकसभा सीटों में 181 सीटें और जोड़ दी जायें, इससे 181 जगह पर दो-दो उम्मीदवार होंगे. एक पार्टी का एक महिला उम्मीदवार और एक अन्य उम्मीदवार होगा. मैंने बोला था कि लोकसभा के लिए जगह कम हो तो सेंट्रल हाल को लोकसभा बनाओ. मेरा व्यक्तिगत मत है कि महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण लोकसभा में और विधानसभा में मिलना ही चाहिए.

महिला आरक्षण पर जदयू की बदली राय: कहा पहले 33% पास हो फिर वंचितों तक हो विस्तार

लेकिन आरक्षण के भीतर आरक्षण वाली बात, जो मुलायम सिंह यादव, लालू यादव, या अन्य लोग उठा रहे हैं, हम सब भी इसी पक्ष के हैं. इसपर आपका पक्ष क्या है?


हमारा कहना था कि अनुसूचित जाति की 69 सीटों को अलग ही छोड़ दो और 181 में हमारी महिलाओं को भी आरक्षण चाहिए अलग से. लेकिन वैसा हुआ नहीं. क्योंकि सामान्य वर्ग और आरक्षित वर्ग दोनो से ही 33% महिलाओं के लिए आरक्षित होना था.

ओबीसी महिलाओं के लिए भी मांग थी न? .

लेकिन ओबीसी महिलाओं को आरक्षण नहीं मिलेगा क्योंकि अभी राजनितिक आरक्षण ओबीसी को नहीं है. ओबीसी को जबतक आरक्षण नहीं मिलेगा तब तक ओबीसी महिलाओं को भी नहीं मिलेगा. इसके लिए भी संविधान संशोधन करना पड़ेगा.

महिला आरक्षण : मार्ग और मुश्किलें

अपनी पार्टी के भीतर महिलाओं के प्रतिनिधित्व के लिए क्या कर रहे हैं, कुछ कुछ किया आपने कभी? 


हमारी पार्टी तो ज्यादातर अलायंस में रही. कांग्रेस पार्टी के साथ हम तीन चार इलेक्शन लड़े, उसमें दस सीट-बारह सीट ऐसे मिलती थी.  कारपोरेशन में हमने काफी महिलाओं को टिकट दिया, खासकर जहां महिला वर्ग के लिए आरक्षित सीटें थीं.

33 प्रतिशत आरक्षण की राजनीति

बाबा साहब ने 1942 में सबसे बड़ा सम्मलेन महिलाओं का किया था, लेकिन अभी दलित आंदोलन से महिलायें गायब दिखती हैं, कम दिखती हैं, खास कर लीडरशिप के पोजीशन पर ?

हमारी कोशिश यह है कि महिलायें जुड़ें.

आपके यहाँ एक-दो चेहरे ही तो दिखते हैं.


हमने महिलाओं का संगठन बनाया, जिसमें रजनी तिलक को भी अपनी पार्टी में जिम्मेदारी दी थी. हमें महिला विंग को स्ट्रांग करना चाहिए. महाराष्ट्र में हमारा महिला विंग है. जिले-जिले में महिला विंग है, लेकिन सुशिक्षित, पढी-लिखी महिलाएं ज्यादा नहीं आती हैं. बचत गट (सेल्फ हेल्प ग्रुप) के माध्यम से महिलाओं को इकठ्ठा करना, उनके ऊपर अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना, उनको छोटे-मोटे उद्योग देना, यह काम हो तो महिलायें पार्टी में आएँगी ही.

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‘टच ही तो किया है न और कुछ नहीं किया न’ : प्रशासन के जवाब से आक्रोशित लडकियां

विकाश सिंह मौर्य

21 सितम्बर 2017 को बीएचयू के दृश्य कला संकाय में बीएफए की छात्रा अनन्या (बदला हुआ नाम) शाम को लगभग 6.30 बजे अपने फैकल्टी से हॉस्टल जा रही थी, तभी भारत कला भवन एवं डीन ऑफ़ स्टूडेंट कार्यालय के पास के चौराहे पर कुछ अज्ञात लड़कों ने उनको अपनी तरफ हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींचा. इसके बाद उसके कपड़े फाड़ डाले एवं कपड़े के अन्दर हाथ भी डाला. इस जघन्य वारदात के समय लड़की चीखती रही और वहां पर उपस्थित प्राक्टोरिअल बोर्ड के सिपाहियों ने उसकी कोई मदद नहीं की. पीड़िता ने जब इस बात की त्रिवेणी हॉस्टल की प्रशासनिक संरक्षिका से किया तो इतना वाहियात जवाब दिया कि किसी का भी खून खौल जाये. उसने कहा कि “टच ही तो किया है न कुछ और नहीं न किया है.” इतने में जब लड़कियां चीफ प्राक्टर ऑफिस में शिकायत दर्ज करवाने पहुचीं तो वहां भी इनकी शिकायत सुनने के बजाय अशोभनीय टिप्पणियाँ सुननी पड़ीं.

क्यों कर रही हैं लडकियां पीएम मोदी का विरोध (!)

इसके बाद अगली सुबह बीएचयू गेट के पास ही स्थित महिला महाविद्यालय की छात्राओं ने सुबह 6 बजे से ही मुख्य गेट के पास न्याय और सुरक्षा की मांग को लेकर धरने पर बैठ गयीं. वार्डेन ने त्रिवेणी हॉस्टल का दरवाजा बंद करवा दिया था जिससे छात्राएं आन्दोलन में शामिल न होने पायें. किन्तु भरी दबाव के चलते दोपहर बाद त्रिवेणी हॉस्टल से भी दरवाजा खुलने के बाद सैकड़ों की  संख्या में छात्राएं आन्दोलन में शामिल हो गयीं. दिन भर धरना चलता रहा और अपराधियों को पकड़ने एवं सजा देने के स्थान पर विश्वविद्यालय प्रशासन एवं वाराणसी प्रशासन ने इस आन्दोलन में शामिल विद्यार्थियों को अंदाज में उनका कैरियर बर्बाद करने व जेल में भेजने की धमकी देते रहे. कुलपति गिरीश चन्द्र त्रिपाठी ने पहले तो छात्राओं से मिलने से एकदम इनकार कर दिया. यहाँ तक कि एस.डी.एम. के अनुरोध पर भी नहीं गये. लगभग 4 बजे कुलपति ने कुछ महिला प्रोफेसरों को धरनास्थल पर भेजकर पांच छात्राओं को बातचीत के लिए अपने आवास पर बुलवाया किन्तु छात्राओं ने यह कहते हुए ऐसी मुलाकात से इंकार कर दिया कि “वे अकेले में कुलपति से बात करने को लेकर खुद को सुरक्षित नहीं महसूस कर रही हैं.” आन्दोलन में शामिल शैलेन्द्र वर्मा ने बताया कि इस प्रकार की धमकियाँ शोधार्थियों को लगातार दी जा रही थीं तो ऐसे में अधिक संख्या में शामिल स्नातक के विद्यार्थियों को किस तरीके से दबाने का प्रयास किया होगा इसका अंदाजा मात्र लगाया जा सकता है. इस बीच आन्दोलन को अपनी दिशा से भटकाने के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के अराजक तत्वों ने कुलपति की शह पर धरनास्थल पर जाकर मारपीट व अश्लील किस्म की गाली-गलौज कर मामले को बिगड़ने का भी प्रयास किया. और यह प्रयास पूरे दिन में कई बार किया गया. हद तो तब हो गयी जब शाम लगभग 7.30 बजे अशांति और अराजकता के इन दूतों ने धरने पर बैठे विद्यार्थियों से इस बात का झूठा आरोप लगाकर मारपीट की कि ये लोग गेट पर लाल झंडा लगाना चाह रहे हैं. जब कि वास्तविकता यह है कि यहाँ पर किसी के मन में ऐसा कोई विचार नहीं था.

22-23 सितम्बर की रात लगभग 12 बजे यह अफवाह भी फैलाई गयी कि “ये आन्दोलनकारी विश्वविद्यालय के प्रमुख संस्थापक मदन मोहन मालवीय की प्रतिमा कालिख पोतने का प्रयास कर रहे थे इसलिए कुलपति ने इनसे मुलाकात नहीं की. अभी 23 सितम्बर को दोपहर 1.00 बजे ये रिपोर्ट लिखे जाने के समय तक विश्वविद्यालय की छात्राएं एवं छात्र हजारों की संख्या में धरना स्थल पर डटे हुए हैं. और यह जुटान 22 तारीख को चिलचिलाती धूप और पूरे रात तक भी इसी तरह से थी. अभी भी यहाँ पर चिलचिलाती धूप और उनमें अन्याय के खिलाफ एवं न्याय को लेकर विद्यार्थियों की कटिबद्धता भी अपनी चरम पर है.
होली पर पिंजडा खोलो ऋचा : अनुपम सिंह की चिट्ठी

इससे पहले लगभग एक सप्ताह से नवीन महिला छात्रावास में रात को कुछ अराजक तत्व पत्थर फेंक रहे थे. इतना ही नहीं लगभग एक महीने से त्रिवेणी संकुल (यह बी.एच.यू. महिला छात्रावासों की एक सीरीज है) के सामने लड़कियों को देखकर कुछ छात्र उनकी तरफ हस्तमैथुन की मुद्रा में अश्लील हरकतें करते रहे हैं. इन छात्रावासों में रहने वाली छात्राएं बताती हैं कि कई बाद शिकायत करने के बाद भी इन असामान्य आपराधिक घटनाओं को रोकने के लिए कोई उपाय नहीं किये गये. पिछले दिनों बी.ए. के एक लड़के के साथ विश्वविद्यालय के ही विज्ञान संस्थान के कुछ कर्मचारियों ने दुष्कर्म किया था. उस मामले को भी ठन्डे बसते में दाल दिया गया है.

बीएचयू के मुख्य प्राक्टर प्रो. ओ.एन. सिंह और बीएचयू प्रशासन इस मामले को लेकर पूरी तरह से लीपापोती पर उतारू हैं. इस आन्दोलन का एक तात्कालिक असर यह हुआ कि वाराणसी दौरे पर पूजा-पाठ करने आये प्रधानमंत्री के रास्ते का रूट बदलकर उन्हें उनके निर्दिष्ट पूजास्थल मानस मंदिर तक संकट मोचन की पतली गली से ले जाया गया. यहाँ ओ.एन. सिंह से पहले के चीफ प्राक्टर तथा अन्य प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी व शिक्षक, शिक्षिकाएं महिलाओं को लेकर दकियानूसी पितृसत्तात्मक वैचारिकी से न केवल ग्रस्त हैं. जो अभी भी स्त्री को अपनी सुविधानुसार मात्र सेक्स करने और दासी बनाकर मनमाफिक काम करवाने की ही परम्परा है. निकट अतीत तक यहाँ पर बलात्कार जैसे जघन्य मामलों को भी रफा-दफा कर दिया जाता रहा है. एक उदाहरण समाजशास्त्र विभाग का है जहाँ पर एक शोधछात्र ने एम.ए. की लड़की को लालच, फुसलावे और बहलावे में लेकर लम्बे समय तक उसका यौन शोषण करता रहा. और आखिर में उस लड़की को गर्भपात जैसा कदम उठाने को मजबूर होना पड़ा. चूँकि वह लड़का जाति से ब्राम्हण है और उस पर विभागाध्यक्ष (ये पूर्व में कई वर्षों तक यहाँ के चीफ प्राक्टर भी रह चुके हैं) की विशेष कृपा भी रहती है. हालाँकि लड़की की जाति भी ब्राह्मण  ही है किन्तु इस सनातनी परंपरा ने स्त्री को मात्र उपभोग और सेक्स करने का संसाधन ही माना है. ये उसी परंपरा के वाहक हैं. ऐसी ख़बरें यहाँ के कई प्रोफेसरों के बारे भी मिलती रहती हैं.

बीते लगभग तीन वर्षों में कैंपस का माहौल जिस तरीके से अराजक हुआ है वह भी इधर के समय में अभूतपूर्व है. लड़कियों की स्थिति तो हमेशा से ही यहाँ पर बेचारी और दयनीय रही है. विश्वविद्यालय में ऐसे अराजक तत्व कहीं भी मौजूद मिल जायेंगे जो किसी को भी पीट देंगे, गाली देकर बात की शुरुआत करना इनकी आमतौर पर इनकी आदत है. कोढ़ में खाज की स्थिति तो इसलिए है क्योंकि ये अराजक तत्त्व कुलपति और प्रशासन के संरक्षण में अपना काम करते हैं. यानि की इन्हें पुलिस, अदालत जैसी किसी भी चीज का भय है और न ही इन सबकी कोई इज्जत. हाँ एक बात अवश्य है कि ये देशभक्त शाखा में और रास्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यक्रमों में अक्सर आयोजक और अन्य प्रमुख भूमिकाओं में नजर आते रहते हैं. इनका इंसाफ भी लात, घूंसों और कई बार तो पिस्तौल वाला होता है. लड़कियों के मामले में तो बी.एच.यू.  सहित लगभग पूरा बनारस दकियानूसी और कूड़ा-कचरा वाले दिमाग से लैश है. वैसे पुलिस के साथ भी इनके सम्बन्ध मधुर ही होते हैं. यहाँ पर सवाल यह है कि ये बच्चे जो दूसरे किसी मास्टर माइंड के इशारे पर इस तरीके के काम करते हैं, उनका भविष्य क्या है? देश का भविष्य और उनका भविष्य अलग-अलग तो है नहीं.   ‘

मोदी जिनके प्रशंसक वे दे रहे महिला पत्रकार को रेप की धमकी

इस मामले को लेकर जिस तरीके की उत्तेजना, मानसिक-शारीरिक उद्वेग, प्रतिबद्धता और एकता बीएचयू के विद्यार्थियों ने दिखाई है, वह बनारस के लिए अभूतपूर्व है. इसका सबसे प्रमुख कारण यह है कि यहाँ पढने वाली लगभग सभी लड़कियां प्रतिदिन बी.एच.यू. कैंपस में छेड़खानी का शिकार होती है. प्रथम तो वो किसी से ऐसे मामलों का जिक्र तक नहीं करती हैं. इस प्रकार के मानसिक उत्पीड़न के साथ में घुट-घुट कर जीना इनमे से अधिकांश ने तो इसे अपनी नियति मान ली है. संभवतः इसका कारण यह डर है कि अगर घर वालों को पता चला तो उनकी पढ़ाई घर वाले बंद करवा देंगे. बी.एच.यू. के अधिकांश विद्यार्थी उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और बिहार के हैं. इन क्षेत्रों में इतने सामाजिक-राजनीतिक आन्दोलनों के बाद भी सामाजिक सोच का दायरा पारंपरिक दकियानूसी दिमागी कचड़े को समृद्ध करने के अतिरिक्त कुछ अधिक नहीं है. बच्चियों, लडकियों और महिलाओं के मामलों में तो और भी अधिक. ऐसे दमघोंटू समाजीकरण के बाद की स्थिति खतरनाक न हो तो आश्चर्य ही है. बी.एच.यू. में ही समाजशास्त्र विभाग में पीएच.डी. कर रहीं अनीता ने कहा कि “कमेंटबाजी तक तो ठीक है, इसको हम लोग रोज कई बार झेलते हैं, पर ऐसी घटना स्वीकार्य नहीं है.” यहाँ यह स्मरण रहे कि यह बयान एक शोधछात्रा का है. आज भी  पर आज जब बी.एच.यू. में किसी तरह के शोषण, उत्पीडन और दमन की खबर आम नहीं हो पाती है. यहाँ का ऐसा आभासी वातावरण बना दिया गया है कि ‘यह सर्वविद्या की राजधानी है और यहाँ पर होने वाला हर अपराध आँख बंद किये रहने वाला ही होता है.’

वैसे भी इन क्षेत्रों में बहुत सारे समाज सुधारक और क्रांतिकारी पैदा होने का मतलब ही यह है कि यहाँ पर गंदगी अधिक है. इन क्षेत्रों में जितने भी आन्दोलन और जन कार्यक्रम हुए हैं, उनमे लड़कियों और महिलाओं की भागीदारी अत्यल्प ही रही है. यही स्थिति अभी भी है. यहाँ तक कि महिलओं के लिए होने वाले सेमिनार जैसे आयोजनों में भी. इस आन्दोलन में अभी तक जो चीज निराश कर रही है वो है, शोधार्थी छात्राओं का इसमें हिस्सा न लेना. इसके पीछे वजह चाहे जो कुछ भी हो. संभव है कि इसके पीछे उनके शोध निर्देशकों का दबाव हो. या फिर उन्होंने अपने ऊपर खुद से ही मनोवैज्ञानिक दबाव बना लिया हो. बीएचयू से ही एल.एल.एम. करने वाली अनीता सिंह भारती कहती हैं कि ‘ये हिंदी पट्टी में जो निकृष्ट स्तर की सोच है, महिलाओं को लेकर, जातियों को लेकर, मजदूरों को लेकर और बच्चो के समाजीकरण को लेकर, यह यहाँ के पारंपरिक सामन्ती धर्म और ब्राम्हणवादी सत्ता के मजबूत आधार तथा पिलर दोनों ही हैं.’ इसके पीछे सामाजिक मूल्यों का बजबजाता कचरा और उसको मात्रात्मक तथा गुणात्मक रूप से खाद-पानी देते यहाँ के शिक्षण संस्थानों सहित विश्वविद्यालय प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं. ऐसा इसलिए  क्योंकि शिक्षण संस्थान व्यावसायिक निगमों की तरह काम करते हैं. विश्वविद्यालय और उनके शिक्षक अपने विद्यार्थियों में जड़ परम्पराओं, तमाम तरह की संकीर्णताओं, अंधविश्वास और संविधानविरोधी डेली प्रैक्टिस में उपयोग में आने वाली प्रतिगामी विचारधाराओं के प्रचारक-प्रसारक की सक्रिय भूमिका में हैं. ये अपने विद्यार्थियों में और अपने शोधार्थियों में स्वतन्त्र चिंतन, वैज्ञानिक मिजाज  और आलोचनात्मक दृष्टिकोण पैदा कर पाने में सफल नहीं रहे हैं.

विकाश  इतिहास विभाग, डी.ए.वी.पी.जी. कॉलेज,  बीएचयू, वाराणसी में शोधार्थी हैं.  इमेल: vikashasaeem@gmail.com

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बीएचयू की बेटियों को देश भर से समर्थन



बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में छात्राओं ने छेड़छाड़ के खिलाफ पिछले कई घंटों से प्रदर्शन कर रही हैं. बीएचयू के कुलपति प्रधानमंत्री से अपने निजी संबंधों के लिए जाने जाते हैं. जब प्रदर्शन शुरू हुआ तो प्रधानमंत्री दो दिवसीय दौरे पर अपने संसदीय क्षेत्र बनारस में थे, लेकिन लड़कियों के प्रदर्शन से घबडाये प्रशासन ने उनका रूट बदल दिया. वे स्याम भी  लड़कियों से मिलने नहीं पहुंचे. दरअसल चौराहे पर कुछ अज्ञात लड़कों ने बीएचयू की एक छात्रा को  तरफ हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींचा. इसके बाद उसके कपड़े फाड़ डाले एवं कपड़े के अन्दर हाथ भी डाला. जिससे घबड़ाई लड़की जब प्रशासन से शिकायत करने पहुँची तो प्रशासन ने भी उसपर अश्लील टिप्पणी की. अआक्रोषित लडकियां धरने पर हैं, प्रदर्शन कर रही हैं. देश भर से उन्हें समर्थन मिल रहा है. सोशल मीडिया में लोग उनकी हौसला आफजाई कर रहे हैं :

‘टच ही तो किया है न और कुछ नहीं किया न’ : प्रशासन के जवाब से आक्रोशित लडकियां 

प्रीति कुसम लिखती हैं: 

बीएचयू के नवीन गर्ल्स हॉस्टल का मामला, होती है छेड़छाड़,रात में खिड़कियों पर फेंके जाते है पत्थर,लड़के करते हैं अश्लीलता, गालीगलौज व MASTURBATION
#शर्मनाक
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दिन का सूरज डूबने से पहले ही बीएचयू के नवीन गर्ल्स हास्टल की लड़कियों के जीवन में सूर्यास्त हो जाता है। शाम के 6:30 बज़े हीे उन्हें 12 बिस्तरों के कमरों वाले हॉस्टल में सिर्फ इसलिए बंद कर दिया जाता है क्योंकि 800 करोड़ के बजट वाली यूनिवर्सिटी उनके लिए सुरक्षा और रास्ते में उचित प्रकाश की व्यवस्था नहीं कर सकती।

इन सबकेे बावजूद ऐसी घटनाएं सामने आयी हैं जो आपको बेचैन कर सकती हैं, बहुत बेचैन।
आए दिन आपने हॉस्टल जा रही छात्राओं को रास्ते में कुछ मनचलों द्वारा छेड़खानी और मोलेस्टेशन का सामना करना पड़ रहा है। हॉस्टल बन्द होने के बाद भी देर रात में कुछ लड़के हॉस्टल की खिड़कियों पे पत्थर मारते हैं, अश्लील इशारे करते हैं , खिड़कियों के सामने हस्तमैथून के साथ गालीगलौज कर रातभर परेशान करते हैं। लड़कियां बार बार इसकी शिकायत वार्डेन से लगायत प्रशासन के अन्य लोगों से करती आयीं हैं लेकिन इस गंभीर मामले पर भी हुक्मरानों में अजीब सी ख़ामोशी है।

यह घटनाएं बहुत पहले से चली आ रही है जिस पर अभी तक कोई कार्यवाही नही हुई है, वार्डन मैम का कहना है कि लड़कियां अपनी खिड़कियों को खोलती ही क्यो है?
जानकारी के लिए बता दे हमारे बीएचयू के पास पर्याप्त सुरक्षाबल है जिसपर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है। हॉस्टल में रहने वाली छात्राओं ने कहा है कि अगर उनके साथ कुछ गलत होता है तो उनके जिम्मेदार बोएचयू प्रशासन होगा।
आज नवीन गर्ल्स हॉस्टल की छात्राएं चीफ प्रॉक्टर और छात्र अधिष्ठाता से मिलकर अपनी समस्याओं को सामने रखा और हमेशा की तरह कुछ एक्शन होने की उम्मीद लेकर हॉस्टल गयीं थी।

क्यों कर रही हैं लडकियां पीएम मोदी का विरोध (!)

कमलेश वर्मा की फेसबुक टिप्पणी:

“जली ठूँठ पर बैठकर गयी कोकिला कूक
बाल न बाँका कर सकी शासन की बंदूक”

बीएचयू से सेवानिवृत्त प्रोफेसर चौथीराम यादव ने लिखा: 
जब आँचल परचम बन जाय
तो इंकलाब होता है!
खुदा चाहे या न चाहे
मामला आर-पार होता है।
जय हो,जोहार हो,लड़ाई आर-पार हो।

अनुपमा यादव लिखती हैं:

ये तो गज़ब तमाशा हो गया कभी बीएचयू से सफ़र सुरु करने वाले आज बीएचयू से दूर दूर भाग रहे है।कहीं बेटियाँ न्याय न मांग ले,,
#ढोंगी_मोदी

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अकेली अकेली और अन्य कविताएँ..

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मीना खोंड

 मीना खोंड कवितायें लिखती हैं, लन्दन  में रहती हैं. संपर्क : meenakhond@gmail.com

अकेली-अकेली

मै अकेली  बाते करती हूं।
यहाॅ आसपास कोई नहीं ।
फिर किस से बात करती  हूँ?
अपने आप से बात करने की आदत है।
जिंदगी भर  घर के लोगों का साथ था ।
उनकी  सेवा मे मेरा हर पल गुजारा था ।
उनके लिये मेरा जीना था ।
अब अकेली रहती हूं ।
ईश्वर मेरा दोस्त है।
वो मेरा सखा है।
वो मेरे मन मे है
उससे मेरी बाते होती है ।
मेरे साथ मेरा मन है
मन मे ढेर सारी यादें हैं
यादों  मे रिश्ते बसते है
उनसे मेरी बातें होती है
चार दिवारों का घर है
घर मे मेरे कोई नही होता
मै अकेली-अकेली हूँ
मै अकेली बातें करती हूँ।

गरिमा से रहो

जब  कोई दे रही है बिंदियाॅ ,
हरे कांच की चुडियाॅ
कोई लगा रही है कुंकुंम
तो  परहेज क्यों ?
महिलाओं का यह बचपन का हक  है ।
अपना हक अदा करना है ।
पति नही है जब तेरा,
तुझे  दुगनी जिम्मेदारी  संभालनी है ।
इसलिये समाज में  तुम्हे आम महिला की तरह रहना है।
पहले समाज  मे  पतिविहिन औरतों पर बहुत  बंधन थे ।
अन्याय ,अत्याचार ,जुल्म  होते थे ।
अब समाज तुम्हे अपना रहा है ।
समाज मे स्थान दे रहा है ।
तो फिर क्यों दूर भाग रही हो ?
अपने हक का सम्मान से स्वीकार करो ।
अपना अस्तित्व संभालो ।
अपना व्यक्तित्व निखारो ।
जीवन में गरिमा से रहो।

तू लडकी है


तू नही जायेगी वहाॅ
क्वांरी कन्या की पूजा के लिये ।
तू नही है कोई देवी माॅ
तू नही बनेगी माताजी !
तेरे पांव छूना ,तुझे खाना खिलाना
अब नही होगा  ये !!
इधर वे क्वांरी  कन्या के पाँव छूते
उधर उनके गाल चूमते।
देवी समझकर पूजते
और उनके साथ कुकर्म करते ।
अब लडकियाॅ देवी नहीं बनेगी ।
लडकी हैं ,लडकी रहेंगी ।

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