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जिंदगी की ओर लौटते हुए…

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जयश्री रॉय

जयश्री रॉय कथा साहित्य में एक मह्त्वपूर्ण नाम हैं. चार  कहानी संग्रह , तीन उपन्यास और एक कविता संग्रह प्रकाशित हैं . गोवा में रहती हैं. संपर्क: jaishreeroy@ymail.com

दर्द की एक नीली नदी मेरी शिराओं-उपशिराओं के संजाल में फैली हुई है… बूँद-बूँद रिसते हुए  विष की तरह, देह के प्रत्येक-रंध्र में मर्मांतक कष्ट की गहरी जड़ें  रोपते हुए… सारी रात इसकी जद में रही हूँ- बहुत कातर और असहाय…अब बस, इसके उतार के इंतजार में हूँ, क्योंकि इसके सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं है मेरे पास… विकल्प का न होना- विवशता का चरम है ! इसी चरम से गुजरने के लिए प्रतिपल अभिशप्त हूँ- मुझे कैंसर हुआ है !

उसदिन खिडकी के बाहर आकाश के फीके नील में भोर का वह तारा कितना उजला था… मैं उसे न जाने कितनी देर तक देखती रही थी . पूरी रात न सो पाने से अंदर गहरी थकान और तनाव था, कनपटी पर कोर्ई नस रह-रहकर धडक उठती थी . दर्द… अब वह सारी सीमाओं के पार चला गया था, एक शून्य, अवश हो जाने की-सी स्थिति ! इस दर्द का स्वाद भी कितना अद्भुत है, अबतक के सारे दर्दों से अलग, इसमें डर का नील भी घुला हुआ है !

कल देर शाम मेरा ऑपरेशन हुआ है, सारे लींप नोड्स बगल से निकाल दिए गये हैं . शायद इक्कीस..अब उन्हें परीक्षण के लिए मुम्बई कैंसर फैला है या नहीं देखने के लिए.उसी के आधार पर मेरा आगे का ईलाज निर्धारित किया जायेगा. दस दिन के भीतर मेरा यह दूसरा ऑपरेशन है.लेपकटॉमी . मुझे स्तन का कैंसर हुआ है.दायीं तरफ .पता नहीं क्यों,ऑपरेशन के ऐन वक्त मेरा रक्तचाप सांघातिक रूप से बढ गया था. हालांकि मैं भीतर से बिल्कुल शांत थी.ओ. टी. में जाने से पहले तक सबसे हँसी-मजाक करती रही थी.गहरे नशे की-सी अवस्था में ऑपरेशन टेबल पर मैं अपने चारों तरफ मची हडबडी को महसूस कर सकती थी . मेरी इस हालत के लिए ओ. टी.में मौजूद स्टाफ एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे थे.

होश में आने के बाद मेरी हालत पानी से निकली हुई किसी मछली की तरह हो रही थी . एक-एक साँस के लिए तडपती हुई… ओह , कैसा  गहरा आतंक से भरा अनुभव था वह- जीभ, गला सूखकर काठ, श्वासनली में गहरी पीडा… मैं जानती थी, मुझे एनेसथेसिया गलत ढंग से दिया गया है, या जरूरत से ज्यादा की मात्रा में . पहले भी एकबार ऐसा मेरे साथ हो चुका था . तब मैं कोलकाता में अपनी पहली बांगला फिल्म की शूटिंग में व्यस्त थी और अचानक से दायें सीने में निकल आये एक गाँठ का ऑपरेशन मुझे करवाना पड गया था . गलत एनेसथेसिया की वजह से मेरा गला जख्मी हो गया था . कई दिनों तक साँस लेने में भी तकलीफ होती रही थी . यह १९८७ की बात है .

न जाने इस तरह से हर साल कितने मरीज ऑपरेशन थियेटर में अपनी जान गँवा देते हैं . मेरे परिवार के लोग ओ. टी. के बाहर अधीर प्रतीक्षा में खडे थे . उन्हें मेरी इस स्थिति के विषय में कोई खबर नहीं दी गयी थी . मुझे लगा था, अंततः मैं भी डॉक्टर की लापरवाही की शिकार हो गयी .

हव्वा की बेटी: उपन्यास अंश 


इसके बाद सारी रात मैं सो नहीं पायी थी . मुझे प्रतीत हो रहा था,  किसी ने मुझे जिंदा काटकर छोड दिया है . दर्द के लिए बहुत अच्छी दवाइयाँ उपलब्ध होती हैं, मगर पता नहीं क्यों डॉक्टर मुझे कोई राहत पहुँचा नहीं पाये थे . मेरे बार-बार अनुरोध करने के बावजूद . मेरी स्थिति किसी जिबह किये हुए जानवर की-सी थी, रातभर दर्द से छटपटाते हुए, हर करवट… कुछ अनुभव शब्दातीत होते हैं .

उस रात की सुबह बहुत फिकी और उदास उतरी थी . रोशनी तो थी, मगर कहीं उजाला नहीं था… शायद यह मेरे अंदर का अंधकार था… सुबह की बैंजनी उजास में अपने अस्पताल की खिडकी से बाहर सोये पडे शहर को देखते हुए उसदिन अनायास लगा था, मैं जिंदगी से बहुत दूर, एक बहुत बडे शून्य में किसी नक्षत्र की तरह भटक गयी हूँ… अस्पताल के बिस्तर से उस दिन सबकुछ अपनी पहुँच से परे और कितना सुंदर लग रहा था- जिंदगी… नींद, स्वप्न और खुमार में डूबी हुई… क्या यह सब फिर कभी मेरा हो सकेगा ? अपनी मुट्ठी  में एक बहुत बडा शून्य बाँधे उसदिन मैं पडी रही थी, अंदर कुछ क्षरता रहा था निःशब्द, नीरव… पतझर के उलंग, उदास पेड की तरह . चुकने की, खत्म होने की वह  शुरूआत थी . आगे एक लबा सफर पडा था, सामान के साथ ढेर सारा हौसला भी बाँध लेना था . हर कदम पर जरूरत पडेगी इसकी .

अपने पीछे एक पूरी दुनिया छोड आयी हूँ-प्रांजल, स्नेहिल और एकदम टटकी, सब्ज ! कितनी बाँहें मुझे घेरी हुई हैं, कितनी विकल है आँखों की चावनी… प्रार्थना, मान-मनुहार, उपालंभ… कुछ भी तो मुझे रोक नहीं पाया !  नियति का इशारा ऐसा ही होता है- दुर्वार, सांघातिक… चल देना पडता है, सबकुछ छोडकर, एकदम से…

घर से आते वक्त मेरी नौ साल की बेटी का प्रश्न- माँ, तुम चली जाओगी तो स्कूल के लिए मेरी चोटी कौन गूँथेगा ! मेरे पास उसके सवालों का कोई जबाव नहीं . कलतक मेरे बिना मेरा घर एक पल के लिए भी नहीं चलता था, आज सबकुछ जस का तस छोड आयी हूँ ! विवशता किसे कहते हैं, बहुत शिद्दत से महसूस कर रही हूँ, मगर रोना नहीं चाहती, मेरे रोते ही सबका धैर्य तिनके की तरह आकुल वन्या में बह जायेगा . मुझे बाढ नहीं, तटबंध बनना है- अपने लिए, अपनों के लिए…

एक छोटा-सा क्षण पूरे जीवन की दिशा बदल देता है . एक पल सबकुछ है, दूसरे ही पल कुछ भी नहीं !   मुझे याद है, कितनी खूबसूरत थी वह शाम जब मुझे अपनी बीमारी का पता चला था . सुनहरी धूप में दुनिया नहायी हुई थी, रेशम की तरह मसृन थी हल्की बहती हवा . उसमें जाडे की खुनक अभी बाकी थी . बसंत की हल्की आहट भी . नहाते हुए मेरा हाथ सीने के उस सख्त गाँठ पर अनायास पड गया था . मैं तत्काल समझ गयी थी . मेरी माँ को भी स्तन कैंसर हुआ था .

इसके बाद अस्पताल और लैब्स  के अन्तहीन चक्कर… हाथ में फाईल लिए मैं यहाँ-वहाँ अपनी जिंदगी की मियाद पूछती फिर रही थी . कहीं कोई सटीक जबाव नहीं था . बहुत कठीन और दुरूह था सबकुछ . पहले मेरे पास एक साधारण रूटीन चेकअप के लिए भी समय नहीं हुआ करता था . बच्चों का स्कूल, यह काम, वह काम… अब समय ठहर गया था हमारे लिए . सबकुछ छोडकर अस्पताल में पडे थे . पीछे एक पूरी दुनिया तहस-नहस हो रही थी- बच्चे बिना टीफिन के स्कूल चले जाते, होम वर्क पूरा न होने की वजह से उन्हें डाँट पडती, उनके युनीफार्म पर प्रेस नहीं होता . संजय (मेरे पति) के हाथ खाना बनाते हुए कई बार जल चुके थे . उसदिन माही (बेटी) के लंबे बाल काटकर कंधे तक कर देने पडे . उससे चोटी बनायी नहीं जाती थी . कितने खूबसूरत लंबे बाल थे उसके… मैंने उसे समझाया था, जब मैं घर वापस आ जाऊंगी, वह फिर से अपने बाल बढा सकेगी . उसदिन मैंने बडी मुश्किल से अपने आँसू रोके थे . आखिर किस-किस बात का दुख मनाती !

हव्वा की बेटी : उपन्यास अंश, भाग 2

मेरा कैंसर दूसरे स्टेज पर था . गनीमत थी कि काँख के लींप नोड्स में नहीं फैला था . रिपोर्ट ने कैंसर की पुष्टि की थी- डक्टल इनवेसिव कारसीनोमा… पढकर अंदर कोई प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं हुई थी . मेडिकल एनसाइक्लोपेडिया पढते रहने के कारण मैं अधिकतर बीमारियों के विषय में जानती- समझती हूँ . न जाने क्यों मैं शुरू से अस्वाभाविक रूप से शांत और सयंत थी . बहुत निरपेक्ष भाव से सबकुछ देख-सुन रही थी . जैसे यह सब मेरे साथ न होकर किसी और के साथ घट रहा हो . अंदर विश्वास था, मुझे कुछ नहीं होगा . ईश्वर के प्रति गहरी आस्था ने ही मुझे यह बल  दिया था . जीवन समर में गीता मेरा संबल थी, कृष्ण मेरे सारथी… विजयी मुझे होना ही था . अपनों का साथ तो था ही .

ऑपरेशन के करीब एक महीने बाद से मुझे केमो थेरापी करवानी पडी . छह चक्र- २१,२२   दिन के अंतराल से . इसके लिए मुझे पूने जाना पडा . वहाँ ईलाज की बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध हैं . मेरी छोटी बहन भी थी वहाँ .

वहाँ कितने बडे-बडे अस्पताल, लोगों की भीड… आदमी अचानक स्वयं को ऐसी जगह पहँचकर खोया हुआ महसूस करता है . कैंसर डिपार्टमेंट का दृश्य ही अद्भुत होता है . सभी यहाँ सहमे और आतंकित दिखते हैं . नरक के बाहर का दृश्य यहाँ से मिलता-जुलता होगा . आतंक- कुछ भीषण के घट जाने का, अपनों से बिछड जाने का, मौत का… अज्ञात का डर- न जाने क्या होनेवाला है उनके साथ !  और इसी में दुनियादारी, लेनदेन से जुझना…

आजकल के अस्पताल एक व्यवसायिक केंद्र ही होते हैं . बस, पैसे कमाने का जरिया . आपके सामने तरह-तरह के पैकेज रखे जाते हैं . आप जितना पैसा खर्च करेंगे आपको उतनी ही सुविधाएँ दी जायेगी . साथ में आपके प्रति उनका रवैया भी इसी पैसे से निर्धारित होता है . अमीर मरीजों को ईलाज के साथ डॉक्टर, नर्स तथा दूसरे मेडिकल स्टाफ से अच्छा सौहाद्रपूर्ण व्यवहार मिलता है . उनके लिए डॉक्टरों की मुलायम आवाज तथा नर्सों की स्पेशल हँसी होती है . साथ में ए. सी. कमरा, टी. वी. अवेन, फ्रिज, अच्छी रूम सर्विस तो है ही . मतलब की जितनी चीनी, उतना मीठा . हमारे देश में हेल्थ इंशोरेस का अभी उतना चलन नहीं है . ऐसे में जब कोई गंभीर बीमारी होती हैं, लोग रास्ते में बैठ जाते हैं . ईलाज बहुत महंगा हो गया है . वहाँ ख्याल आया था, गरीबों के लिए तो जीवन से भी अधिक मृत्यु महंगी हो गयी है . अब उसके पास मरने का विकल्प भी नहीं .

कितने सारे टेस्ट, कितने मशविरे और राय . मेरा जीवन अब डॉक्टरों के हाथों में है . वह तय करेंगे, मेरा क्या करना है . कोई कहता है, मेरे बीमार अंग को शरीर से काटकर फेंक दिया जाय, कोई कहता है, इसकी जरूरत नहीं . मैं सुनती हूँ, ठीक जैसे कोई अपराधी अपनी मौत की सजा सुनता है . बाहर सडकों पर लोग चल रहे हैं, हंस रहे हैं, बातें कर रहे हैं… उन्हें पता नहीं, आज कौन उनसे छुट कर जिंदगी में पीछे रह गया है… ऐसा तो शायद हमेशा से होता आया है, खबर मुझे आज हो रही है . मैंने भी भला कब पीछे मुडकर देखा था कि कौन चलते-चलते रूक गया है, कौन गुमनामी के अंधकार में धीरे-धीरे खो रहा है… आज मैं पीछे रह गयी हूँ तो मुझे लग रहा है, यह दुनिया कितनी स्वार्थी है, ऐसा ही होता है…


मेरी दुनिया बदल गयी है- सिरे से ! पहले सबकुछ टेकेन फॉर ग्रॉटेड हुआ करता था, अब कुछ भी निश्चित नहीं . एक कदम उठाते हुए नहीं जानती, दूसरे कदम पर क्या घटनेवाला है . अचानक लोभी हो गयी हूँ- मुझे सबकुछ चाहिए… आषाढ की नीली संध्या, बसंत की अबीरी धूप, चाँद रात, सोनिया सांझ… यह भी, वह भी…इतना मोह ! पूरी दुनिया को अपनी बाँहों में बाँध लेना चाहती हूँ . गालों में चूम लेना चाहती हूँ… छोटी-छोटी बातें लुभा रही है, अपने पास बुला रही है… शरत् की निझुम दुपहरी में खिडकी से झरते हुए नीले आकाश के नीचे टैगोर की स्वप्निल कविताओं की मायावी दुनिया, देवदास की रोमानी उदासी, खुले वातायन में बूँद-बूँद रिसता अगस्ती रातों का शबनम भीगा चाँद, नवम्बर का चटक सुर्ख गुलाब…गुलाबी जाडे की  पशमिने-सी नर्म हरारतभरी धूप… सबकुछ कितना दुलर्भ, कितना लोभनीय हो गया है !

केमो लेने के लिए 10-12 घंटे बिस्तर में बिना हिले-डुले पडे रहना पडता है . एक गहरे पीले या नारंगी रंग का जहरीला कॉकटेल धीरे-धीरे जिस्म में उतार दिया जाता है . जितनी ज्यादा तकलीफ, दवाई उतनी ही कारगर.. मेरा हैंडसम डॉक्टर मुझे समझाता है . उसकी देह से महंगी आफ्टर सेव की गंध उठ रही है . सुबह-सुबह एकदम ताजा- स्वास्थ्य और आत्मविश्वास से चमकता हुआ चेहरा, डिजाइनर कपडों में किसी फिल्म अभिनेता की तरह… देखकर रश्क होता है, अच्छा भी लगता है .मेरे हाथों में अब कोई नस नहीं मिलती . आई. वी. लगाने में मुश्किल . नर्से कोशिस करके हार गयी हैं,  मेरे दोनों हाथ सुजकर काले पड गये हैं, फर्श पर खून ही खून… बचपन में टीका लगवाने से इतना डरती थी, अब तो पूरा जिस्म ही जैसे छलनी हो गया है . खासकर एनेसथेसिस्ट को बुलाया गया है, मेरे हाथों में कोई नस नहीं, वे स्ट्रा की तरह कडे हो गये हैं . अब वे मेरे पाँवों में नस ढूँढ रहे हैं . मैं सोचती हूँ, जो हो रहा है, मेरे भले के लिए हो रहा है . यह सोच मुझे तसल्ली देती है.



केमो का असर दो, तीन दिन बाद शुरू होता है . मुझे प्रतीत हो रहा है, किसी ने मुझे जहर देकर मरने के लिए छोड दिया है . उस भीषण अनुभूति को शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता ! दर्द, घबराहट और तकलीफ… रातदिन कहाँ से गुजर रहे हैं, नहीं जानती . बस, एक अंधेरे कमरे में पडी हूँ . कुछ खाया-पीया नहीं जाता, भोजन की गंध से उल्टी आती है .कुछ सोच, समझ नहीं पाती, दिमाग में एक कुहरीला अंधकार है और भीतर लहरों की तरह उठता हुआ एक बीमार अनुभूति .

परहेज करना जरूरी है . साफ-सफाई, ताजा भोजन, यह नहीं, वह नहीं… डॉक्टर की कडी हिदायतें… साथ में इतनी सारी दवाइयाँ… निगली नहीं जाती, उल्टी हो जाती है . साथ में हजार दिक्कतें- ब्लड काउंट गिर गया है, खून आना शुरू हो गया है, आँखों में इनफेक्शन, सीने में दर्द… डायबिटीज है, उच्च रक्तचाप भी . इन्हें संभालना बहुत जरूरी . केमो थेरापी रोककर अब मेरा हजार तरह का परीक्षण करवाया जा रहा है- सीटी स्कैन, सोनोग्राफी, आँखों का परीक्षण, कारडियोग्राम, हेमोग्राम… बैठकर एक साथ कई लीटर पानी पीना पड रहा है, कभी-कभी उल्टी आ जाती है . सोचती हूँ, अब भले प्यास से मर जाऊँ, पानी कभी नहीं पियूंगी .  हिरो डॉक्टर तसल्ली देता है- यह दवाई जहर है, तुम्हें जिंदा रहने के लिए जहर पीना है- इट्स अ नाइस पॉयजन, गीवस् यु लााईफ…

लोग मुझे मेरी आँखों और बालों से ही पहचानते थे- बंगाली बाला- बड़ो-बड़ो शोख- एक माथा चुल… जिंदगी के कुछेक नियामतों मे से एक मेरे बाल थे- खूब लंबे, घने, बकौल सबके रेशम से… केमो के पहले चक्र में ही झर गये ! सुबह उठकर आईने में देखा, बाल जटा बनकर पीछे लटक रहे हैं, सामने का पूरा हिस्सा साफ ! गंजे माथे पर बिंदी कितनी भद्दी लग रही थी !

संजय-मेरे पति-कभी उन्हें  केस  को हाथ भी लगाने नहीं देता था, आज उसी को हाथ में कैंची लेकर मेरा सर मुंडाना पडा…! गर्मी हो रही थी, बालों के उतरते ही माथे की त्वचा में हवा लगी, ठंडा हो गया . सोचा सबके कुछ न कुछ फायदे होते हैं . बी पासीटिव ! जयश्री बी पासीटिव!
दो दिन सर पर रूमाल लपेटकर घूमी, फिर छोर दिया- मुझे नहीं छुपना है, कोई अपराध नहीं किया है मैंने . बस, परिचित देखते तो पहचान नहीं पाते . बेटे ने कहा, माँ नाउ यु लुक लाईक ए बुद्धीस्ट मंक… चलो, बौद्ध भिक्षुणी बनने की इच्छा भी पूरी हो गयी .

अस्पताल के बिस्तर में पडे-पडे बस मैंने सपने देखे और इंतजार किया- न जाने किन-किन चीजों का- अपने घर लौटने का, एकबार फिर छत में बैठकर बारिश देखने का, अपनों के बीच होने का- जिनसे हम छुट गये, अब वो जहाँ कैसे हैं, शाखे-गुल कैसी हैं, खुशबू के मकां कैसे हैं… सारे सवाल अनुत्तरित पडे रहे, समय के पास उनका जवाब था, और कहीं नहीं… छह महीने इसी तरह कटे तो नहीं, मगर बीत ही गये .
!
इस बीच मेरे लेखन ने मेरा साथ दिया– हर जगह, लंबे इंतजारों के बीच- हस्पताल के बिस्तर पर, डॉकटरों की क्लीनिक में, लैब में- लिखती रही… मेरे अंदर कोई चिंता, डर नहीं था, कुछ थी तो बस गहरी चाह और उम्मीद, बहुत भरोसा और खूबसूरत संवेदनाएँ- कहानी, कविताओं में  में ढलती हुई…बचपन में थोडा बहुत लिखती थी, फिर लिखना छुट  गया था . बीमार पडी तो ख्याल आया- अंदर कितना कुछ रह गया है कहने के लिए, शेयर करने के लिए… कलम उठायी तो लगा किसी नदी का बाँध टूट गया !! उफन आयी संवेदनाएँ, कूल-किनारा डूब गया… एक प्लावन जो न जाने कब से अंदर बंधा पडा था .

पहले लिखकर अपनी रचनाएँ बिस्तर के नीचे छिपाकर रख  देती थी, मेरे बिस्तर के नीचे न जाने कितनी कविता, कहानियाँ आज भी दबी पडी हैं . पहली बार इच्छा हुई कि मेरी बात लोगों तक पहुँचे, गोवा में हिन्दी पत्रिकाएँ मिलती नहीं . कहीं से कुछ पते मिले तो बिना सोचे-समझे उन पत्रिकाओं में मेरी रचनाएँ भेज दीं . पहली कहानी हंस में मुबारक पहला कदम के लिए स्वीकृत हुई, इसके साथ ही छपने का सिलसिला चल निकला- कथादेश, वागार्थ, पाखी, परीकथा, नया ज्ञानोदय, वसुधा, कथाक्रम आदि-आदि… शायद कुछ बुरा होता है कुछ बहुत अच्छा होने के लिए ही .

केमो थेरापी के बाद मुझे रेडियेशन लेना था – पूरे ३१ सायकलस्! दो महीने तक पूने में रहना था . हफ्ते में पाँच दिन लगातार- ५ मिनट तक . फिर वही लंबे इंतजार- घंटों वेटिंग रूम में बैठे रहना . चारों तरफ मुंडे हुए सर, झुकी हुई नजरें, उनमें ठहरा हुआ सन्नाटा . एक डर जिसकी अब आदत हो गयी है . पेट में कुछ धडकता है, नसों में बेआवाज सडता है, सब थक गये हैं- अपनी ही चौंक और बेतरतीव धडकनों से . अपने दर्द से निजात के लिए दूसरों के जख्म में झाँकते हुए पूछते हैं वह सवाल जो खुद से नहीं पूछे जाते- क्या कहते हैं डॉक्टर, क्या चांसेस हैं ? एक-दूसरे को तसल्ली देकर स्वयं को बहलाते हैं, एक झूठ जो जीने के लिए बहुत जरूरी हो गया है… सच तो बस आतंक है !

एक बच्ची की तरल आँखें, उसकी पारे-सी चमकती हुई चावनी… वहाँ अब भी जीवन, उसका पूरा सपना है . अपने दर्द से बेखबर हँसती है, अपनी दादी की गोद में सिमटकर सोती है, शायद सपने भी देखती है . उसके गालों के खूबसूरत गड्डों में एक गुलाबी मुस्कान नींद में कुनमुनाती है . उसे देखकर अक्सर सोचने लगती हूँ, हम इतने बडे क्यों हो गये, रोना-गाना सब भूल गये…


अस्पताल के बाहर कांक्रीट के जंगल में एक कोयल तपती दुपहरी में गाती रहती है- बिना रूके, निरंतर… मैं किसी अमराई की घनी, सब्ज छाँव में पहुँच जाती हूँ, ए. सी. से पानी की बूँदें टपकती है, मुझे लगता है, रसभीना महुआ टपक रहा है- बेघर मन कहाँ-कहाँ टप, टप…टरेडियोलॉजिस्ट ने कहा था नो साइड अफेक्ट, बहुत विश्वास के साथ मान ली थी उनकी बात . मगर रेडियेशन के साथ ही त्वचा लाल पडने लगी थी . पहले हल्की गुलाबी, फिर लाल, फिर गहरा लाल ! साथ में जलन, बेचैनी . और फिर पूरी चमडी जले हुए बैगन की तरह काला पडकर यहाँ-वहाँ से फटने लगी, अंदर का लाल मांस बाहर झाँकता, खून और पानी रिसता . हिलना-डूलना तक मुश्किल हो गया . कपडों में रहना कठिन था, एक ही तरह से रातभर लेटने से त्वचा थोडा दुरूस्त होने लगती, मगर जरा सा  हिलते ही चमडी में खिंचाव पडता और तेज दर्द से मैं दुहरी हो जाती .

इसी हाल में शाम के समय मैं अपनी बहन और जीजाजी के साथ पूने के मशहूर रेस्तराँ और क्लबों में जाती, लोगों से हँसती-बोलती . जब लोगों को पता चलता, मैं वहाँ घूमने नहीं, बल्कि कैंसर के ईलाज के लिए आयी हूँ, सब आश्चर्य से मुझे देखते रह जाते . एकबार किसी के मेरे बालों की तारीफ करने पर मैंने अपने बालों का विग खोलकर उसके हाथों में रख दिया था . इस आक्समिक् घटना से आसपास के लोग स्तब्ध रह गये थे . पूरी पार्टी में सन्नाटा छा गया था .

जिस दिन मेरा रेडियेशन खत्म हुआ था, मैं उसी दिन घर वापस आ गयी थी . घर लौटकर मैंने महसूस किया था, मैंने अपने परिवार को इन कई महीनों में कितना मिस किया था . जो बात, जो दुख मैं खुद से भी छिपाती थी, वह इस कैंसर से भी ज्यादा तकलीफदेह थी, इससे भी ज्यादा कठिन… जीवन छुट जाय, मगर मेरे अपने नहीं… अपनी माही से लिपटकर मैं उसदिन बहुत रोयी थी . खुशी में रोने का यह मौका मुझे बहुत दिन बाद मिला था .

घर लौटकर मैंने एक नये सिरे से जीवन को जीना शुरू किया है, छोटे-छोटे निबालों में- अपने घर के टेरास में बैठकर एक कप चाय पीना, सुबह का अखबार पढना, बच्चों को उनके स्कूल के लिए तैयार करना-इनमें  जीवन का भरपूर स्वाद है और मैं इन्हें पूरी तरह एनज्वाय करना चाहती हूँ .  आगे भी बार-बार चेकअप करवाना है, सावधान रहना है, कैंसर के लौट आने की भी संभावना है, मगर मुझे इन बातों की बिल्कुल चिंता नहीं . जानती हूँ, मरने से पहले नहीं मरूंगी और फिर मौत भी कौन- सी बडी मौत है. हम जीवन में सबकुछ करते हैं , और इस भागदौड में बस जीना ही भूल जाते हैं . अब मैं पहले यही करना चाहती हूँ, जीना चाहती हूँ  ! मौत से पहले मरना नहीं चाहती . बाकी चीजें होती रहेंगी . आराम से- जिंदगी रही तो !  और वह तो है मेरे पास- इत्ता सारा…

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तुम और अन्य कविताएँ

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मीनाक्षी भालेराव

 राष्ट्रीय मानवाधिकार सुरक्षा संघ , पुणे में महिला अध्यक्ष पद पर कार्यरत.प्रकाशित पुस्तकें : हम नन्हें मुन्ने,पथ का राही ,आओ तुम्हें जगा दूँ. संपर्क:meenakshibhalerao24 gmail.com

तुम


बुनते रहे स्वप्न
मैं जागती रही
रात भर
तुम निकल पड़े
जब मंजिल की ओर
मैं राहे तुम्हारी
बुहारती रही
पहर दर पहर
तुम्हारी सफलता
की सीढ़ीयों पर
जितने भी कांटे थे
अपने ह्रदय के
सूनेपन मैं चूभोती रही
कोई पत्थर तुम्हें
जख्मी ना कर दे
अपने सिने पर
धैर्य  के  पत्थर
रखती रही
सावन को पतझड
बना लिया था
ताकि तुम्हारी
सफलता को
बून्दें भिगोकर
साही सा बहा ना दे
तुम्हारे मन का सारा
बोझ हर रात तुम
जब मेरे मन पर
ड़ाल कर चैन की
नींद  सो जाते थे

तब मेरा होना
मुझे सार्थक लगता
तुम्हारे सपनों को
साफ जमीन देने के लिए
कई बार
मैंने
अपनी आत्मा को
मैला किया
तब जाकर
तूम ,तूम बने
और मैं , मैं ही
नहीं रही ।

मैं

मिली नहीं खुद से
बरसों हो गए ।
पहचान लेती हूँ
दरवाजे से
दाखिल होने
वाली हवाओं के
चेहरों की
मंशा  को भी
मैं जानती हूँ घर
की हर दीवार के
मन की बातें
भी
सहला लेती हूँ
उन्हें भी
बतिया लेती हूँ पास
बैठ कर
उनकी सुंदरता को
जब संवार देती हूँ
तब वो मूझे
अपने आगोश में
लेकर मेरा मन
सन्तुष्ट कर देती है
बाहरी ही नहीं
घर के अंदर भी
सराही जाती हूँ
तब खुद से
बरसों तक
नहीं मिल पाने का

दुख
नहीं होता ।
पहचान गुम
होने का दुख
नहीं होता ।

कितनी


पिसती है
हर रोज
चकला ,बेलन
के मध्य स्त्री
हाँ स्त्री रोटी सी स्त्री
कभी कभी यूँ ही
सोचकर मन
भारी हो जाता है
मां बाप के घर में
आटे सा
तैयार किया जाता है
बारीक
ताकि कोई
कमी नहीं रह जाये
ब्याही
जाने पर
ससुराल जाकर
उसका मंथन
किया जाता ताकि
नर्म नर्म
रोटी सी
बन कर पूरे
परिवार को संतुष्ट
कर सके
पिसती रहे
रोटी सी
चकला , बेलन के

बीच
अपने
अस्तित्व को दबाए
चूप
हाँ बिलकुल
चूप
स्त्री हाँ रोटी सी स्त्री ।


लकड़ी

काट कर अपनी
जड़ो से
गीली लकड़ी को
गठ्ठर बाना
बांध कर
रस्सी से
ला कर
घर के किसी कोने में
ड़ाल कर
छोड दिया जाता है
सूखने के वास्ते
ताकि
जब चूल्हे में
ड़ाली जाये तो
जलकर आसानी से
राख हो जाए ।
धुआँ धुआँ हो जाये
वो
पर
किसी और की
आंखें में पानी नहीं
आने दे
जलती हुई
सुखी लकड़ी  ।

देह

उसकी देह आज
चुपचाप पड़ी थी
म्रत
बिना कम्पन के
मारकर
अपने
मन को
जब मुर्दा सी
पड़ी रहती थी

तब कोई नहीं
आया
रोने को
देह निष्क्रीय
देह
सब कोई धहाड़े
मार मार कर
दुखी होने का स्वांग ।
क्यो ?

औरत

ठोकर लगी तो पत्थर
औरत बन गया
यहीं से सिलसिला
शुरू हुआ
औरत को ठोकर
में रखने का
फिर सभी ने
मान लिया
शापित है स्त्री

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मैंने अमित शाह को गुंडा (इसलिए) कहा…..राना अय्यूब



मुकुल सरल 


 “ये किताब एंटी मोदी या एंटी अमित शाह नहीं है, ये किताब उन लोगों के लिए जस्टिस की किताब है। हम आपको सिर्फ ये याद दिलाना चाहते हैं कि जो 2002 में हुआ जो 1984 में हुआ इसका मतलब ये नहीं कि वो हुआ नहीं हम भूल चुके हैं, हमारा जमीर मर चुका है, इसलिए इसको हम भूल चुके हैं, ये किताब या ऐसे इवेंट हम इसलिए करते हैं कि आप अपने जमीर को याद दिलाते रहें कि ऐसी ज़्यादतियां हुई हैं और जिन लोगों ने ये ज़्यादतियां की हैं वो आज हमारे हुक्मरान हैं और आप और हमें इस चीज की शर्मिंदगी होनी चाहिए, मुझे इस बारे में बोलने में कोई शर्म नहीं आती कि हम शायद मुर्दा हो चुके हैं कि हमें शर्मिंदगी नहीं होती कि ऐसे लोग हमारे प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष हैं।”

ये कहना है पत्रकार राना अय्यूब का जो शनिवार को दिल्ली के प्रेस क्लब में अपनी किताब ‘गुजरात फाइल्स’ के हिंदी संस्करण के विमोचन के अवसर पर बोल रही थीं।


इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार और टीवी एंकर रवीश कुमार ने कहा कि उस समय अविश्वास के माहौल में जो खूनी खेल खेला जा रहा था मुझे लगता है कि उसका ये दस्तावेज़ है। जब तक यह किताब है वो ये याद दिलाती रहेगी कि आप कुछ कहने से डर रहे हैं। और जब तक आपको याद है कि आप कुछ कहने से डर रहे हैं तो इस किताब का मकसद कामयाब है मेरी नजर में।

कार्यक्रम की शुरुआत पिछले दिनों अतिवादियों की गोली का शिकार हुईं पत्रकार और एक्टिविस्ट गौरी लंकेश की याद में दो मिनट के मौन के साथ हुई। ‘गुजरात फाइल्स’ की लेखक राना अय्यूब ने अपने सफर को याद करते हुए बताया कि “मुझे बहुत खुशी हुई क्योंकि हिंदी में इस किताब का आना बहुत ज्यादा जरूरी था। अंग्रेजी समेत 12 और ज़बानों में यह किताब आ चुकी है। इस मुल्क की जो हिंदी बेल्ट है हिंदी पापुलेशन है उसके लिए यह किताब बहुत जरूरी थी। हमारी मातृभाषा है हिंदी। मुझे अंदर से एक कुढ़न हो रही थी कि यह किताब हिंदी में नहीं आई है।”



शुक्रिया के बहाने…

राना ने थोड़े दुख और थोड़े व्यंग्य के साथ बताया कि “मई 2016 में इसका लांच हुआ और आज 1 साल तीन महीने हो चुके हैं। इस किताब की सच्चाई यही है इस सरकार ने अब तक न मेरे ऊपर डेफमेशन (मानहानि) का केस किया, न मेरी इस किताब को बैन किया। उनका शुक्रिया। अफसरों ने जिनकी स्टिंग आपरेशन हुआ है उनमें से किसी ने आज तक यह इल्ज़ाम नहीं लगाया कि इस किताब में जो कुछ लिखा है गलत लिखा है। उनका भी शुक्रिया। सवा साल हो गया है एसआईटी ने भी हमें एप्रोच नहीं किया है। उसका भी शुक्रिया।”

उनका यह शुक्रिया कई सवालों को जन्म दे रहा था। उन्होंने कहा कि “ये एक किताब थी ही नहीं, न मुझे किताब लिखने का कभी शौक था, यह एक जर्नलिस्टिक एफर्ट (पत्रकारीय प्रयास) था, 2010 में मेरी इन्वेस्टिगेशन (जांच-पड़ताल) के बाद अमित शाह जो जेल गए हैं उसके बाद मुझे इस बात की ज़रूरत लगी कि मैं अंडर कवर जाऊं और कुछ सच्चाई है, कुछ चीजें हैं जो बाहर नहीं आई थी, उन्हें बाहर लाऊं।

उन्होंने इस किताब के लिए मैथिली त्यागी के किरदार का सफर बताया। और छुपे कैमरे और माइक्रोफोन से की गई इस पूरी पड़ताल की कहानी जिसमें तमाम मुश्किलें और जोखिम रहे, उन्हें संक्षेप में बताया।

“सबने स्टिंग छापने से मना किया”


राना ने कहा कि “8 महीने तक मैंने मैथिली त्यागी बनकर उन्हीं के समाज का हिस्सा बनकर यह स्टिंग ऑपरेशन किया। ‘तहलका’ ने छापने से मना कर दिया, फिर मैं इसे हिंदुस्तान में जितने भी एडिटर दोस्त हैं मेरे, उनके पास लेकर गई, उन सबका मेरे लिए एक सजेशन (सुझाव) था कि अब 2014 में मोदी पावर में आ रहे हैं, इसे करने की जरूरत नहीं है। जब किताब आई तो हिन्दुस्तान के सब एडिटर जो मेरे दोस्त हैं सबने मुझे बधाई दी कि बहुत साहस का काम किया लेकिन किसी ने भी अपने पब्लिकेशन में इसके बारे में कुछ मेंशन नहीं किया, जैसे यह किताब एग्ज़िस्ट (वजूद) ही नही करती।”

“बड़े जर्नलिस्ट, कन्सलटेंट बन गए हैं”


राना ने कहा कि “आजकल हिंदुस्तान में जितने भी बड़े अच्छे जर्नलिस्ट हैं वे सब कन्सलटेंट बन गए हैं। या सबने अपनी-अपनी पर्सनल वेबसाइट खोल ली है, बहुत कम लोग हैं जो इस पावर में रहकर इस पोजिशन में रहकर सच्चाई बोल पा रहे हैं। रवीश यहां पर हैं लेकिन  कभी कभी मुझे लगता है कि हम रवीश पर बहुत ज्यादा बोझ डाल देते हैं।”

“हां, मैंने अमित शाह को गुंडा कहा”


राना ने भावुक अंदाज में कहा कि मैं जो इस किताब को पिछले एक साल से पागलों की तरह हर जगह लेकर ढो रही हूं, अपने साथ लेकर घूम रही हूं, इसकी बात कर रही हूं ताकि मैं शायद आपके जमीर तक इस बात को पहुंचा पाऊं कि जिन लोगों को आपने आज पावर में बैठाया है, उन लोगों से हमारी कोई पर्सनल दुश्मनी नहीं है, किसी की कोई पर्सनल दुश्मनी नहीं है, हम सिर्फ एक सहाफी (पत्रकार) के तौर पर काम कर रहे हैं। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि जिस तरह मुझे बना दिया गया है कि मैं एंटी मोदी हूं, एंटी अमित शाह हूं, नहीं, मैंने अमित शाह को गुंडा इसलिए कहा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह वो एक इंसान है, सुप्रीम कोर्ट ने एक्सटॉर्शनिस्ट (Extortionist) कहा। एक्सटॉर्शनिस्ट का सीधा सीधा हिंदी शब्द होता है गुंडा, तो इसलिए मैंने उन्हें गुंडा कहा जिसे कहने में मुझे कोई शर्म  नहीं आती। न  मुझे कोई नौकरी बचाने का डर है न किसी एडिटर का डर है तो मैं कुछ चीजें तो कह सकती हूं जो मेरे कलीग नहीं कह सकते हैं। कई कलीग मुझसे कहते हैं कि तुम्हें कई चीजों का फायदा मिलता है, तुम्हे कोई नौकरी नहीं बचानी है, तुम्हारे बच्चे नहीं है, तुम्हारे कोई लोन नहीं है देने के लिए, मेरा उनसे एक ही सवाल है कि अगर लोन  के लिए आए थे या नौकरी बचाने के लिए आए थे या पैसे कमाने के लिए आए थे तो फिर जर्निलिज़्म में क्यों आए, फिर कुछ और कर लेते। कुछ लोग हमें सनकी भी कहते हैं। लेकिन यह सफर जो है इस किताब का मैं आपको यकीन दिला सकती हूं कि ये यहीं पर नहीं खत्म होगा, ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने हमारा साथ दिया है, ऐसे कई लोग हैं जिनको मैं रोज़ देखती हूं, जिनके बारे में जानती हूं। रवीश के मेरे पास बड़े सारे वीडियो आते रहते हैं कि देखो एक बहादुर जनर्लिस्ट। कभी कभी चिढ़ भी हो जाती है कि आप लोग (मीडिया के लोग) जो हमें बहादुर कहते हैं हमारे कंधे पर बंदूक रखके चलाते हैं तो आप यह बहादुर कहना बंद कर दीजिए, पहले खुद बहादुर बनिये हम आपकी लड़ाई नहीं लड़ने वाले हम अपने जमीर को जवाब देने के लिए ये काम कर रहे हैं। आगे अपने जमीर को जवाब देने की लड़ाई आपको खुद लड़नी होगी।”

84 का जिक्र


दूसरे दौर की बातचीत में राना ने 84 और गुजरात दंगों की तुलना भी की। उन्होंने वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह की बात का उल्लेख किया कि अगर हम 84 को नरसंहार कहते तो 1993 नहीं होता, 1993 नहीं होता तो 2002 नहीं होता।

मीडिया पर सवाल


उन्होंने मीडिया पर भी खुलकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि आज जो कुछ हो रहा है या आज मोदी और अमित शाह जहां पर बैठे हैं उसकी जिम्मदारी या जवाबदेही हम पत्रकारों को भी लेनी होगी, क्योंकि आज भी हम मोदी और अमित शाह के बारे मे बड़ा खुसर-पुसर कर बात करते हैं, जोर से बात नहीं करते।
गौरी लंकेश को याद करते हुए उन्होंने कहा कि सारी पत्रकार बिरादरी के लिए कहा कि ये हमारे घर में घुसकर हमें मारने की इजाजत हमने खुद दी है क्योंकि हम कभी साझा थे ही नहीं।

इस किताब से डरिये मत : रवीश


वरिष्ठ पत्रकार और टीवी एंकर रवीश कुमार ने कहा कि हिंदी पट्टी में ऐसी किताबें आती हैं तो मुझे व्यक्तिगत रूप पर बहुत खुशी होती है। क्योंकि खुद भी इन सब चीजों को जानने के लिए संघर्ष  कर पहुंचना पड़ता है खासकर गुजरात की रिपोर्टिंग हो रही थी जब उस वक्त ज्यादातर लोग खासकर पत्रिकाएं जो एक हद से आगे जाकर जानने की कोशिश कर रही थीं वो अंग्रेजी की ही थीं। उन्हीं के जरिये चीजें पहुंच रही थीं तो हिंदी के प्रदेशों में इसके बारे में कम सूचनाएं हैं, धारणाएं बहुत हैं, तरह तरह की धारणाएं हैं चाहे वो झूठ हों चाहे वो सही हों, यह किताब उनको एक तरह से एंपावर (सशक्त) करेगी, उनको ताकत देगी, चीजों को फिर से लौटकर समझने की।

“हमें भूल जाने की आदत”


उन्होंने कहा कि भूल जाने की हमको आदत होती है, हर दंगे को हम भूल गए, हम बड़े बड़े दंगों को भूल गए, हम जब बिहार में होते थे तो लगता था कि भागलपुर का दंगा कोई नहीं भूलेगा लेकिन हम वो भूल गए, दिल्ली आए तो पता ही नहीं था कि इतना बड़ा नरसंहार इस शहर में हुआ है लेकिन उसको भी भूल गए, लेकिन कुछ लोग हैं जो उसकी याद को लेकर कहीं प्रदर्शन कर रहे होते हैं, इतनी ही संख्या में छोटी संख्या में लोग जमा हो रहे होते हैं और नारे लगा रहे होते हैं उसे याद दिलाने के लिए कि किसी नतीजे पर हम नहीं पहुंच सके।

रवीश ने कहा कि कई बार सोचता हूं कि हम क्यों भूल जाते हैं इन सब अपराध को। लगता है कभी कभी कि हम नेताओं के अपराध को जनता के तौर पर अपना अपराधबोध बना लेते हैं और उस अपराधबोध से भागने के लिए हम नेता के अपराध पर परदा डालने लगते हैं। उसे हर साल दर साल बड़ा करते चले जाते हैं। और नतीजा यह होता है कि वो पर्दा इतना बड़ा हो जाता है कि किसी किताब को फिर कहीं से लौटकर आना पड़ता है, किसी न्यायाधीश को जिस तरह अभी राम रहीम के मामले में जस्टिस जगदीप सिंह ने फैसला दिया कोई अकेला आता है और वो अपनी कलम चला देता है तो ये वो किताब है जिसपर कोई बात नहीं करना चाहता है। मैंने जब यह किताब पढ़ी थी तो मुझे लगा था कि इस किताब पर बात करने से लोग डरेंगे। उनके डर को मैं समझता हूं, यही इस किताब का मकसद है कि जब तक यह किताब है वो ये याद दिलाती रहेगी कि आप कुछ कहने से डर रहे हैं। और जब तक आपको याद है कि आप कुछ कहने से डर रहे हैं तो इस किताब का मकसद कामयाब है मेरी नजर से।

रूपक के जरिये साज़िश का परदाफ़ाश


रवीश ने मुख्य पृष्ठ (आवरण) के रूपक के माध्यम से राजनैतिक साजिशों की तरफ इशारा किया। उन्होंने कहा कि “मुझे लगता है कि एक छिपकली एक अंधेरी सुरंग के पास पहुंची है और अंदर कुछ साजिशों की आवाज आ रही है जिससे वह ठिठक  गई है और गर्दन उठाकर देखना चाहती है कि कोई यहां पर है या नहीं मेरे अलावा कोई जानता है या नहीं। तो मैं इसे इस रूप में देखता रहता हूं तो उसी छिपकली के रूप में यह किताब है। तो तकलीफ होगी। अगर लोगों को इमरजेंसी पर फिल्में बनाने से फुर्सत हो गई हो मेरी राय में वो गुजरात फाइल्स पर भी फिल्में बना सकते हैं।”

“गुजरात दंगों का दस्तावेज़”


रवीश ने कहा कि “उस समय अविश्वास के माहौल में जो खूनी खेल खेला जा रहा था मुझे लगता है कि उसका ये दस्तावेज़ है। इसके प्रथम पाठक कौन होने चाहिए इसके पाठक वो होने चाहिए जिन्होंने गुजरात दंगों में सज़ा पाई है चाहे वो हिंदू परिवार हों या चाहे मुस्लिम परिवार हों, मेरे लिए बेहतर स्थिति यही है कि मैं उनको पढ़कर सुनाऊं और देखना चाहता हूं कि उनकी अपनी प्रतिक्रिया क्या है। यह अधूरी किताब है क्योंकि इसे किसी और को पूरा करना है, वो अभी विपक्ष को निपटाने में लगी है सीबीआई, वो एक राष्ट्रीय जिम्मेदारी का काम कर रही है आजकल, उसने अभी तक लोअर कोर्ट के जो फैसले हैं उनको शायद चुनौती नहीं दी है, कौसर बी का पता नहीं है, नजीब का भी पता नहीं है, तो बहुत सारे सवाल हैं और अक्सर जब भी वंजारा साहब को तलवार लेकर नाचते देखता हूं घबराहट होती है। मुझे डर लगता है कि वो शायद हमारी हैवानियत का एक ऐसा प्रतीक है जो हमे ललकार रहा है कि लो हमारी तलवारें खून से सनी हुई हैं भले ही अदालतों ने हमें बरी किया है। लेकिन उनके नाचने का अंदाज बहुत डरावना है।


“मैं चाहूंगा जो हिंदी के पत्रकार हैं इस किताब पर प्रोजेक्ट रिपोर्ट करें और कोई न भी दे तो प्रोजेक्ट रिपोर्ट करके अपने प्रोफेसर साहब को दे दें कि ठीक लिखा है या नहीं लिखा है। और उम्मीद करता हूं कि इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन के जितने भी जनर्लिजम के कोर्स हैं वहां पर यह किताब होगी।


मेरा यही कहना है कि इस किताब से डरिये मत। मुझे यकीन है कि राना ने स्टिंग के दौरान तहलका और हिंदू की कापी जिस कमरे में देखी थी उनके कमरे में यह किताब होगी।”


विपक्षी दलों से भी सवाल


रवीश ने कहा कि आज भी बिहार में भी उसी तरह से है, यूपी में भी उसी तरह से है और गुजरात में भी ऐसा नहीं कि उसी वक्त था आज भी वही काम हो रहा  होगा, उसी तरह साजिशें रची जा रही होगी तो यह ज्यादा याद दिलाने की जरूरत है कि लीगल स्टेटस इस केस का क्या है, क्यों नहीं विरोधी राजनीतिक दल हैं वो मांग करते कि इस मामले की अभी तक क्यों नहीं बड़ी अदालत में अपील की गई है। कुछ आता है फिर सब गायब हो जाता है कुछ भी कानूनी चीज आगे नहीं बढ़ती है, हमें एक अच्छे पाठक होने के नाते यही जिम्मेदारी निभा देने की जरूरत है कि कि हम उन पहलुओं को जाने और कम से कम दस लोगों को बता दें।

किसी केस में अपील नहीं : वृंदा ग्रोवर


इस मौके पर वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर ने कहा कि सीबीआई किसी मामले में अपील नहीं डाल रही, कौन सवाल पूछेगा उससे, जाहिर है देश के गृहमंत्री ही पूछ सकते हैं हमें नहीं मालूम की क्या बातचीत चल रही है उनके बीच में लेकिन अपील किसी केस में नहीं डाली जा रही है।

84 और 2002 के दंगे अलग : पंकज बिष्ट


कार्यक्रम में वरिष्ठ लेखक-पत्रकार पंकज बिष्ट ने कहा कि “मैं जिस भाषा से आता हूं और एक लेखक के नाते भी मैं मानता हूं कि किसी किताब का महत्व या कोई समाज या उसकी विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि उस समाज या भाषा का मीडिया उसे किस तरह लेता है, किस तरह से वो बताता है अपने पाठकों को, अपने समाज को कि यह किताब क्या है और इसका क्या महत्व उनके लिए हो सकता है। जैसी हालत आज के हिंदी मीडिया की है, हालांकि अंग्रेजी मीडिया की भी बहुत अच्छी हालत नहीं है लेकिन उसकी तुलना में हिंदी मीडिया की जो हालत है तो बड़ा शक होता है। इसके बावजूद मैं मानता हूं कि एक हिन्दी में भी एक बड़ा समाज है जो बेचैन है, जो चीजों को जानना चाहता है, समझना चाहता है। अपनी बातचीत में उन्होंने 1984 और 2002 के दंगों के अंतर को भी स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि वो (1984) दंगा एक हद तक अचानक स्वत शुरू हुआ था, वो करवाया नहीं गया था, बाद में उसको भड़काया गया, इसमें कहीं कोई शक नहीं है, मैं उसका विरोध आजीवन करता रहा हूं, लेकिन गुजरात का जो दंगा हुआ उसका आज तक यह फैसला नहीं हो सका कि गोधरा में उस गाड़ी में आग कैसे लगी, इसके बारे में आज तक कोई अंतिम निर्णय नहीं है कोई फैसला नहीं है, ये बताता है कि यह पूरी की पूरी घटना संदेह के दायरे में है। इसलिए मैंने कहा कि आजाद भारत के इतिहास में इससे बड़ा ऑर्गनाइज़ क्राइम (संगठित अपराध) जिसमें राजनीति है, ब्यूरोक्रेसी है, जिसमें मीडिया इनवाल्व है और बाद में ज्युडेशरी (न्यायपालिका) इनवाल्व है। ऐसा लग रहा है कि इस लोकतंत्र की सारी संस्थाए एक साथ अपनी विश्वसनीयता खो रही हैं। ये सब तभी बचेगी जब लोग उठेंगे। ऐसे छोटे छोटे प्रयास और होंगे।

ताकि बनी रहे लहूलुहान याददाश्त : अजय सिंह


प्रकाशक गुलमोहर किताब की ओर से वरिष्ठ कवि और पत्रकार अजय सिंह ने इस किताब की हिंदी में जरूरत को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि गुलमोहर किताब की ओर से इस किताब का हिंदी अनुवाद इसलिए लाया जा रहा है ताकि हम गुजरात-2002, को हरगिज़ न भूलें और उसे अपनी लहूलुहान याददाश्त का हिस्सा बराबर बनाए रखें। मानवता के खिलाफ अपराध करने वाले असली गुनाहगारों को सज़ा मिलनी अभी बाक़ी है।


कार्यक्रम का संचालन पत्रकार भाषा सिंह ने किया। इस मौके सवाल-जवाब का भी छोटा सा दौर हुआ। कार्यक्रम में यह उपलब्धि रही कि इसमें वरिष्ठ लेखक, पत्रकारों के साथ बड़ी संख्या में युवा खासकर पत्रकारिता के छात्र भी मौजूद रहे।
साभार: जनचौक 

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जन्मदिन पर जनता को दिया जल समाधि का तोहफा

आज भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जन्मदिन पर सरदार सरोवर बांध के 30 दरवाज़े खोल कर इस परियोजना का उदघाटन किया. हालांकि इसका एक परिणाम जहां कुछ राज्यों को मिलने वाली ऊर्जा की सुविधायें हैं तो दूसरा परिणाम है, कई गांवों का जलमग्न हो जाना. इस कहानी का सच यह भी है कि इन डूब रहे गांवों के विस्थापितों का समुचित पुनर्वास नहीं हुआ है. इसीलिए  सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर अपने सहयोगियों के साथ मध्य प्रदेश के छोटा बड़दा गांव के घाट पर जल सत्याग्रह कर रही हैं. नर्मदा बचाओ आंदोलन की संस्थापक मेधा पाटकर सहित 30 से ज्यादा महिलाएं जल सत्याग्रह कर रही हैं. उनका आरोप है कि बेहतर पुनर्वास किए बिना सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाने से बड़ी संख्या में लोग विस्थापित होंगे. मेधा पाटकर ने कहा है कि जल समाधि ले लेंगे लेकिन इस जगह को खाली नहीं करेंगे.
मेधा का आंदोलन अभी भी जारी है, सरकार ने उन्हें नजरबंद कर रखा है

मेधा पाटकर का सरकारी उत्पीड़न जारी
सरदार सरोवर का जलस्तर बढ़ाने से मध्य प्रदेश के 192 गांव पूरी तरह डूब जाएंगे. वहीं रविवार को अपने जन्मदिन पर प्रधानमंत्री नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध के 30 दरवाज़े खोले. ज्ञात हो कि सरदार सरोवर का जलस्तर बढ़ाने से मध्य प्रदेश की नर्मदा घाटी स्थित धार, बड़वानी, सहित अन्य इलाकों के 192 गांव और एक नगर का डूब में आना तय माना जा रहा है. धीरे-धीरे जल स्तर बढ़ रहा है और कई गांवों में पानी भी भरने लगा है. इसके बावजूद प्रभावित गांव के लोगों ने अब तक घर नहीं छोड़े हैं.




समाज, संसाधन और संविधान बचाने के लिए एकजुट हों – मेधा पाटकर
बेहतर पुनर्वास और मुआवजा दिए बिना सरदार सरोवर की ऊंचाई बढ़ाए जाने का लोग विरोध कर रहे हैं. इसी के तहत मेधा पाटकर ने शुक्रवार से सत्याग्रह शुरू किया, वे नर्मदा नदी के छोटा बड़दा गांव के घाट पर बैठी हैं, जहां पानी लगातार बढ़ रहा है, स्थिति यह है कि उनका सत्याग्रह जल सत्याग्रह में बदल गया है. मेधा ने उद्घाटन से पूर्व कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन को धूमधाम से मनाने के लिए हजारों परिवारों की जलहत्या की तैयारी हो रही है. यह कैसा जश्न है कि एक तरफ लोग मरने की कगार पर होंगे और गुजरात में 17 सितंबर रविवार को जश्न मनाया गया. यह दिन देश के सबसे बुरे दिनों में से एक होगा.

मुल्‍क में बड़े जन आंदोलन की जमीन तैयार हो रही है: मेधा पाटेकर
सवाल है कि क्या लोकतंत्र में राज्यों का यही आचरण होगा कि विकास के नाम पर हजारो लोग जल-समाधि के लिए मजबूर किये जायेंगे? क्या प्रभावितों के बिना समुचित पुनर्वास के ऐसी योजनाओं के लिए राजहठ जनता के खिलाफ राज्य का निर्णायक युद्ध और अधिनायकवाद नहीं है.

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जन्मदिन पर झूठ, फर्जी जश्न और निर्दोषों का घर-बदर: क्या खूब मोदी जी!

1. सरदार सरोवर बाँध की ऊँचाई 138.68 मीटर है और वह 1979 में नर्मदा ट्रिब्यूनल में दिए गए फैसले के              अनुसार तय हुई। 1961 में पंडित नेहरु ने जो शिलान्यास किया था वो मात्र 162 फीट उचाई बाँध का था              जिसमें मध्यप्रदेश का कोई डूब क्षेत्र नहीं होना था, इसलिए आज सरदार सरोवर को 56 साल पुराना नहीं कह      सकते, 38 साल पुराना कह सकते हैं।

2. इस बाँध को बुनियादी अभ्यास और नियोजन के अधूरा होते हुए तमाम शर्तों के साथ 1987 में पर्यावरणीय        मंजूरी दी गयी लेकिन आज तक उन शर्तों की पूर्ति भी नहीं हुई है। सन 2000 तथा 2005 के सर्वोच्च अदालत      के फैसले से भी यह बात साबित होती है क्योंकि पुनर्वास और अन्य मुद्दों पर भी बाँध का कार्य आगे बढाने की     मंजूरी सशर्त ही दी गई है।



3. सरदार सरोवर से 214 किलोमीटर तक फैले 40 हज़ार हेक्टेयर क्षेत्र के जलाशय से मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र             और गुजरात राज्यों के 244 गाँव और एक नगर धरमपुरी प्रभावित हैं जिसकी बात सालों से चलती आई है।         इसमें मध्यप्रदेश के 192 गाँव और एक नगर है। कुल प्रभावित परिवारों की संख्या बार-बार बदली गयी है           जिसे गेम ऑफ़ नंबर (संख्या का खेल) उच्चतम न्यायालय ने भी (2005) उजागर किया है।


4. 2008-2010 के दौरान अवैज्ञानिक रूप से एक तकनीकी समिति द्वारा न ही केन्द्रीय जल आयोग द्वारा बैक     वाटर लेवल कम करने के सम्बन्ध में जो निर्णय लिया गया उसे केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ             कमेटी ने नकारा, फिर भी मध्यप्रदेश और केंद्र शासन ने मिलकर 15,946 परिवारों को उनके मकानों का             भूअर्जन हो कर नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के नाम नामांतरण होने के बावजूद डूब के बाहर घोषित किया    और उन्हें आधे-अधूरे पुनर्वास का लाभ देकर छोड़ दिया। आज भी इनका भविष्य अनिश्चित है जबकि कई के     द्वार से 129 मीटर पानी आ चुका है।


5. आज भी डूब क्षेत्र में करीबन 40 हज़ार परिवार निवासरत हैं जबकि 2008 से मध्यप्रदेश एवं केंद्र के                     प्राधिकरणों ने सभी का पुनर्वास पूरा हुआ यानि जीरो बैलेंस का झूठा दावा उच्चतम न्यायालय तक अपने            शपथ पत्रों में एवं वार्षिक रिपोर्ट में किया गया।


6. आज के रोज़ उच्चतम न्यायालय के 1992, 2000, 2005 के फैसले और ट्रिब्यूनल के भी फैसले का पुनर्वास  पालन आज तक नहीं हुआ है। गुजरात और महाराष्ट्र में ज़मीन के साथ करीबन 15 हज़ार परिवारों का पुनर्वास  किया जिसमे भी त्रुटियाँ हैं और सैकड़ों परिवारों का पुनर्वास बाकी है इसलिए संघर्ष जरी है। गुजरात के सैकड़ों  विस्थापित आज भी केवड़िया कॉलोनी में बाँध के पास 1 साल तक क्रमिक अनशन करने के बाद धरना  कार्यक्रम चला रहे हैं।

7.मध्यप्रदेश में उच्चतम न्यायालय ने ज़मीन की पात्रता के अनुसार 2 हेक्टेयर खरीदने के लिए 60 लाख और     15 लाख रूपए के जो पैकेज फरवरी 2017 में आदेशित किये उसका लाभ आधा लाभार्थियों को नहीं मिला है        तथा 88 पुनर्वास स्थलों पर बुनियादी सुविधाएं भी तैयार नहीं हैं| सैलून से भ्रष्टाचार हुआ है और शुरू हुआ कार्य  भी अधिकांश अस्थायी पुनर्वास का है, स्थायी का नहीं| जैसे टिन शेड, चारा भोजन इत्यादि देने की बात है।  करोड़ों रूपए के कार्य अभी-अभी नियोजित हो रहे हैं और होने वाले हैं।


8. गाँव भरे पूरे हैं, उपजाऊ खेती, हजारों घर, हजारों पेड़, दसों धार्मिक स्थल, हजारों मवेशी, तमाम सुविधाएं       होते  हुए कम से कम निमाड़ मध्यप्रदेश के 192 गाँव और धरमपुरी नगर जीवित हैं जिसे उखाड़ने की बात 139   मीटर पानी भरने से होगी इसलिए संघर्ष जारी है। आज के रोज़ कई महीनो से सशक्त संघर्ष, दमन, जेल             इत्यादि भुगतने के बावजूद हजारों महिला-पुरुषों के संघर्ष करने पर 900 करोड़ का पैकेज घोषित हो चुका है     लेकिन उसमें भी भ्रष्टाचार है और अमल नहीं के बराबर।

पर्यावरणीय


1.1987 में दी गयी पर्यावरणीय मंजूरी में अमल बाकी है जिसमे बाँध के निचले वास पर असर, घाटी में स्वा.स्य्ं   पर असर, बाँध में गाद न भरने के लिए जलग्रहण क्षेत्र का उपचार, भूकंप का खतरा व पुनर्वास योजना आदि  शामिल हैं।

2.पर्यावरणीय कार्यपूर्ति के दावे झूठे साबित हो चुके हैं लेकिन सरकार ने झूठी रिपोर्ट के आधार पर बाँध की           ऊँचाई हर बार बढ़ाई है। उदाहरणत:, मध्यप्रदेश के डूब क्षेत्र में कुछ हज़ार मंदिर, धार्मिक स्थल होते हुए      सरकार ने सिर्फ तीन ही मंदिर के स्थानांतरण होने का झूठा आधार लिया गया है। कुछ दस लाख पेड़ों की कटाई   नहीं हुई न ही वैकल्पिक वनीकरण।

3. दुनिया की सबसे पुरानी घाटी होते हुए नर्मदा घाटी के डूब क्षेत्र में सभी युगों के अवशेष उत्खनन करना बाकी      होते हुए मानवीय इतिहास डुबाया जायेगा।


सरदार सरोवर के लाभों में विकृति


1. मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र राज्य पानी के लाभ बिलकुल न पाते हुए मात्र 56% और 27% (अनुक्रमिक) बिजली          का हिस्सा उन्हें मिलना है लेकिन महाराष्ट्र ने भी 1800 करोड़ की नुकसान भरपाई मांगी है।

2.गुजरात में पानी के लिए कोका-कोला, कार फैक्ट्री इत्यादि अडानी-अम्बानी उद्योग व औद्योगिक गलियारों     के क्षेत्रो को प्राथमिकता दी जा रही है, गाँवो को व सूखाग्रस्तों को नहीं। कच्छ और सौराष्ट्र के तालाब इस साल   लबालब भरे हुए हैं तो पानी की तत्काल ज़रूरत अभी नहीं है। मध्यप्रदेश में बिजली के प्लांट बने हुए हैं क्यों कि  ज़रूरत से अधिक बिजली का निर्माण हो रखा है इसलिए राज्य को बिजली की ज़रूरत इस वक्त नहीं है फिर   भी गुजरात के चुनाव के मद्देनज़र बाँध परियोजना को पूरा घोषित करते हुए उसका उद्घाटन कर दिया जायेगा।

आर्थिक लाभ-हानि


1. 1983 में 4200 करोड़ की लागत बता कर जिसकी लाभ हानि का अभ्यास किया गया था तथा 1988 में 6400      करोड़ रूपए की लागत को योजना आयोग ने मंजूरी दी थी उसके बाद आज की बढती लागत 99000 करोड़ तक    पहुच चुकी है। खबर है कि करीबन हज़ार करोड़ रूपए का घाटा हुआ है। आज की लाभ-हानि का निश्चित            ब्यौरा भी सामने नहीं है।


2.गुजरात में 41,000 किलोमीटर की नहर का निर्माण बाकी है इसलिए सिंचाई का लाभ 20-30 प्रतिशत ही मिल    पाया है और पानी उद्योगों को देने के लिए वो पाइपलाइन योजना भी आगे धकेली जा रही है।

अपने जन्मदिन पर  सरदार सरोवर बांध का फर्जी  लोकार्पण कर ही दिया मोदी जी आपने !

मेधा पाटकर, कमला यादव, दयाराम यादव, पवन यादव, आनंद तोमर, विनोद भाई, सपना कनहेरा, कमेंद्र मंडलोई, सुमित यादव
(एनएपीएम की प्रेस विज्ञप्ति)
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लगभग 25 करोड़ अनीमिया ग्रस्त महिलाओं को लेकर दौड़ेगी बुलेट ट्रेन (!)

स्त्रीकाल डेस्क 
ठीक उसी दिन जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत की जनता को बुलेट ट्रेन का सपना बेच रहे थे संयुक्त राष्ट्र ने अपनी एक प्रकाशित रिपोर्ट में कहा है भारत में प्रजनन की आयु में 51.4% महिलायें खून की कमी से जूझती हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ ने खाद्य सुरक्षा और पोषण की स्थिति के संदर्भ में 2017 की अपनी रिपोर्ट में कहा कि 2016 में दुनिया में कुपोषित लोगों की संख्या अनुमानित तौर पर 815 मिलियन थी, जो 2015 में 777 मिलियन से काफी अधिक है । रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि भारत इन कुपोषितों की जनसंख्या का 14.5% आबादी वाला देश है यानी  190.7 मिलियन लोग भारत में कुपोषित हैं ।



आंकड़ों के मुताबिक भारत में पांच साल से कम उम्र के 38.4% बच्चे अविकसित एवं कमजोर हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि बच्चों का शारीरिक रूप से अविकसित होना लम्बे समय तक कुपोषण का परिणाम है जो उनके मानसिक विकास, बौद्धिक क्षमता को प्रभावित कर सकता है।


दुखद है कि श्रीलंका में 14.7% और चीन में 9.4% की तुलना में भारत में  38.4% बच्चे शारीरिक कमजोरी और अल्पविकास के शिकार हैं. रिपोर्ट कहती है कि विश्व स्तर पर, उप-सहारा अफ्रीका में कुपोषण (आबादी के प्रतिशत के अनुसार) सबसे ज्यादा बनी हुई है और बड़ी आबादी के कारण एशिया में सबसे ज्यादा कुपोषित रहते हैं, उसके बाद अफ्रीका में 243 मिलियन और लैटिन अमेरिका में 42 मिलियन हैं लोग कुपोषित हैं।



रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि उप-सहारा अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और पश्चिमी एशिया के कुछ हिस्सों में खाद्य सुरक्षा की स्थिति काफी खराब है, खासकर तनाव और संघर्ष की स्थिति के कारण भी तथा सूखे और बाढ़ के कारण ।


सवाल है कि भारत में गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा और बीमारियों से मुक्कम्मल लड़ाई की जगह चमचमाती सड़कों और बुलेट ट्रेन के सपनों को विकास का दर्जा देना क्या महज सत्तावानों की चालाकियां हैं या भारत की जनता से धोखा और उनके खिलाफ स्टेट और पूंजीपतियों का अघोषित युद्ध है, उनके खात्मे की नियत से.

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ये न थी हमारी किस्मत

कविता

 चर्चित साहित्यकार,कहानी संग्रह: मेरी नाप के कपड़े, उलटबाँसी, नदी जो अब भी बहती है.उपन्यास : मेरा पता कोई और है प्रकाशित. संपर्क : kavitasonsi@gmail.com

वर्जीनिया वूल्फ की किताब  ‘ A Room of One’s Own’ का प्रकाशन 1929 में हुआ था, उसका केन्द्रीय स्वर है कि एक स्त्री का अपने लेखन के लिए अपना कमरा होना चाहिए, अपने निजी को सुरक्षित रखने के लिए भी अपना कमरा, इसके लिए उसकी आर्थिक स्वतंत्रता जरूरी है.


कमरे से भी पहले कहें तो एक स्त्री के सपने में उसका एक घर होता है,  कुछ अपना बिलकुल अपना रचने का अहसास औरत के मन में सबसे पहले एक घर रचता है. घरएक सपना है, औरतों के नींद में बचपन से सुगबुगाता, डग भरता, ढहता,टूट जाता .

कोई घर कहीं नहीं होता एक स्त्री का, बस एक धुंधला सा अहसास होता है घर, जिसे अपने सीने से चिपकाए औरतें यहाँ से वहाँ डोलती हैं, इस घर से उस घर.सबको अपना बनाती हुई याकि फिर मानती हुई…रेगिस्तान में नखलिस्तान जैसा होता है स्त्री के लिए उसक  अपने कहे जा सकने वाले  घरका सपना .

कमरा तो बहुत बाद की परिकल्पना है, जो लेखन और अन्य क्षेत्र के कामकाजी स्त्रियों में अपने काम, अपनी स्वतंत्रता और अपने वजूद के लिए सजग होने के बाद जगा. किसी ऐसे कोने के तलाश के उपक्रम में वे वहां तक आई , जहाँ वे अपनी तरह रह सकें, डूबकर काम कर सकें और रच सकें, अपने साथ जी सकें कुछ पल को.
हालाँकि यह कल्पना अभी भी बहुत मुश्किल है . अपना कमरा आज भी सपना ही है. नौकरीशुदा और आत्म निर्भर होती स्त्रियों के बहुतायत वाली हमारी आबादी और  तथाकथित वाली आजादी  के बाबजूद… चंद अपवादों को अगर इस बहस के किनारे रखें तो..इसके मूल में स्त्री का अपना स्वभाव भी कम बाधक नहीं…अक्सरहां पति का कमरा उसका पनाहगाह होता है, बाद में बच्चों के साथ वह भी रह लेती है कि बच्चे बगैर उसके कैसे रह सकते हैं ,असंभव-असंभाव्य जैसा कुछ बहुत हद तक …जो सबसे बच जाए वही औरत का अपना हिस्सा है, या फिर ये कि जो सबका है, वही तो उसका है..यही तो उसे घुट्टी में पिलाये गए संस्कार ठहरे. हालाँकि ऐसी स्त्रियों के मन में भी चोर दरवाजे से अपना कोई कमरा और घर झांकता ही झांकता है, चाहे वो लाख ताले जड़े, चाहे लाख  दीवारें-कपाट  बंद करती फिरें …

खुद अपने अनुभवों से भी यह साफ़ साफ़ देख और कह सकती हूँ..लीव इन के उस संघर्षशीलदौर में कुल दो वर्ष एक माह में 13  बदले गए मकानों की कहानियाँ भी इससे कहीं से भी जुदा नहीं…

तब अपनी सीमित आय को देखते हुए हम मित्रों के साथ मिलकर एक साझा मकान लेते…वहां लड़की और कई बार एक मात्र लड़की होने के कारण बहुत कुछ स्वतः मेरे हिस्से आ जाता था, सफाई, खाना आदि आदि घरेलू काम, हालाँकि मित्र समझदार और संवेदनशील थे, हाथ भी बंटाते, फिर भी लम्बे समय तक फ्रीलांस तौर पर काम करने के कारण अधिक समय पर घर पर टिकने वाली अकेली मैं ही होती, स्वतः जिम्मेदारियां भी मेरे ही सर आनीथी .और भरे पूरे परिवार से निकल कर आने के कारण अभी घरेलूपन स्वभाव से निकला नहीं था.बात सिर्फ स्वभाव या मूल में कहें तो संस्कार की थी, वरन घर पर गिने चुने काम  को छोड़ अधिकतर में हाथ नहीं लगाती थी. घर की छोटी बेटी होने से यह छूट थी और शायद पढ़ने लिखने वाली लड़की के नाम पर भी, तो अकेले अपने कमरे के बारे में सोचना यहाँ भीदिवा स्वप्न जैसा ही कुच्छ होता. हालाँकि -वह कमरा अब आकार लेने लगा था, मेरे  मन में बतौर कहानीकार – पत्रकार, मुझे एकांत की हूक खूब खूब होने लगी थी, तोदिन में जब सब निकल जाते या फिर कोई एक दो बचा होता,मैं अपनी सुभीते से कोई एक कमरा बंद करती और लिखने की कोशिश में रम जाती….हालाँकि यह भी रोज संभव नहीं होने वाला था, दिन के नाम अखबारों के दफ्तरों तक लेख पहुँचाने का काम होता था, उर वक्त बचे तो घर के काम .पर सबसे ज्यादा लिखना इसी वक्त और इसी दौर में हुआ., छिटपुट कहानियाँखुदरा कविताएँ और थोक भाव में लेख इसी काल खंड में लिखे गए.

और तब वह घर जो पीछे रह गया था , या कि जिसे बहुत पीछे  छोड़ आई थी बहुत बहुत याद आता ,खासकर उस घर का वह कोनाजहाँ बैठकर घंटों अपने से बतियाती रहतीथी .उस कोने में एक बड़ी सी खिड़की थी.उससे लगा अमरुद का एक छतनार पेड़, जिस पर अल्लसुबह से परिंदों के कलरव की आवाज मुझे दिन को ख़ुशी ख़ुशी जीने का सन्देश देती- माँ हंसकर कहती –तेरा जन्म इसी कमरे में हुआ था, इसी जगह भी, तुझे इसीलिए पसंद है यह जगह इतना’

घर से बाहर निकलते ही सीढ़ियों का वह तीसरा पायदान भी, जहाँ मैं बैठकर डूबते सूरज को निहारा करती.
मेरी दुनिया तब बहुत छोटी हुआ करती थी.देश की राजधानी तो क्या प्रदेश की राजधानी तक को नहीं देखा था . आसपास  के शहर भी मेरे लिए तिलस्म थे.एक ऐसा तिलस्म जिसको जानने की इच्छा भी कहीं भीतर नहीं से नहीं होती थी.बहनें बुलवाती अपने अपने बसेरों याकि ससुराल से…और मैं नहीं जाती….पर उसे इस तरह याद  करते हुए मैं यह अक्सर भूल जाती कि अल्ल बचपन की बातें ठहरीये .  बड़े होने तक स्थितिया बदलने लगी थी, घर का रंग रूप भी बदलने लगा था, रहन्वारों की संख्या बढ़ने लगी थी रिश्ते बढ़ने लगे थे और होते होते वो कमरा जो तब भी केवल मेरा नहीं  था, मेरा बिलकुल नहीं रह गया था, कभी वह तुरत के हुए जमाई और बेटी का होता . कभी वह पैदा हुए नौनिहालों का सौरी गृह और अंततः घर में आई बड़ी बहू का निश्चित वाला  हो गया था.
फिर कुछ दिनों तक रसोई को जो अक्सर अब आँगन और बरामदे में खाना बनने के कारण मात्र सामानों के लिए रखे जाने के काम आकर आ रही थी, को हथियाया. किताबें, बिछावन , अपने सारे अल बल सहित उसमें दाखिला हुई.रसोई बड़ी थी , सो पढने रहने सोने सबकी स्वतंत्रता और आज़ादी मिल गई एकदम से. कि अचानक बहन के घर जाना हुआ, कई महीनों तक रही वहां..लौटी तो वह कमरा रसोई में पुनः तब्दील था, पर सबके नहीं सिर्फ भाभी के रसोई गृह में…कुछ क्षण आंसू बहाने और फिर अपने नए आसरे की तलाश में हम घर के छुटके से भण्डार गृह  तक पहुंचे थे, माँ से पूछा तो उन्हों ना नहीं कहा, बस इतना कहा उनका जांता (चक्की)  वहां से नहीं हटेगा , इसके आगे तुम जो चाहो…मय माँ के जांता मैं भी उस कमरे में स्थानांतरित हो गई थी. जांते के साथ  इतनी सी ही जगह बचती थी किउस घर में किघर का सबसे बड़ा टेबल किसी तरह अंट जाए.(जांते उसके अंदर और कुर्सी थोडा अन्दर घुसा कररखा जा सके वहां ) हाँ  राशन घर होने के कारन रैक ढेर सरे थे उस कमरे में .सो किताबें सारी ठौर ठिकाने लग गई थी, हाँ कपड़ों बिछावन, आदि की जगह नहीं बचती थी बिलकुल ..कोई खिड़की नहीं थी , की बाहर का आसमान या फिर हरियाली ही दिख जाए. पढने में जरा सा तल्लीन हुई नहीं कि पाँव खट से जांते से जा टकराते …फिर भी खुश थे कि कोई अपना कमरा तो था, क्या हुआ कि बंद और छोटा सा था..वह भी इस घर में कितनों के हिस्से था? पर बहुत जल्दी उससे बाहर आना पडा…किस्सा अलग ठहरा उसका …बाद में जब समझ आया कि क्यों हुआ था ऐसा, तो न रो सकी , न हंस सकी ….

उसके बाद कुछ महीने ही बीते होंगे कि आँगन के बीचो बीच एक निर्माणाधीन कमरे में  जिसमें न अभी प्लास्टर हुआ था सो बगैर रंगाई पुताई वाली. न ही खिड़कियाँ लगी थी, बस छत थी एस्बेस्टस की…और खिड़की और दरवाजे की जगह खुली सी बड़ी सी जगहें , मैं इस बार पूरी तैयारी से हूँ और मन से भी…कि इसमें भला कौन रहने आ सकता है मेरे अतिरिक्त ..और वह भी वजह नहीं बचती कि  यह कमरा उस तरह बंद भी नहीं ठहरा, कि मेरे लड़के मित्रों के उसमें जाने से किसी को कोई दिक्कत होकिवहाँ से निक अन्दर क्या चल रहा , कुछ भी बाहर से नहीं दीखता…यह तो इतना खुला था कि सब कहीं से किसी भी छोर से घर के साफ़ साफ़ समझ आ जाये. मैंने यहाँ अखबार बिछाकर अपनी किताबें सजा दी हैं. एक पुरानी साड़ी का पर्दा सिला है, कुर्सी का गद्दा और टेबल क्लाथ भी.. टूटी फूटी ही सही,चाहे पुराने स्टाईल की ही हो पर पापा के शौक से कुर्सी टेबिलों की घर में कमी नहीं रही कभी.मैं घंटों यहाँ बैठकर पढ़ती लिखती रहती हूँ,इस कमरे से निकलने का मेरा मन ही नहीं होता…चाहे गर्मी से कमरा तपने ही क्यूं न लगे , चाहे जाड़े की ठंढी हवा हाड़ही क्यों न कंपाने लगे…मजबूर रात को किसी कमरे में सोने जाती हूँ …

देखते- देखते धीरे-धीरे घर  की सब फालतू और टूटी फूटी चीजें उसी कमरे में डाली जाने लगी हैं.मैं यथा संभव उन्हें भी सहेजकर रखने की कोशिश करती हूँ…
जब बर्दाश्त से बाहर होता है चीख पड़ती हूँ-यह कमरा कूड़ेदान नहीं’
कूड़ेदान नहीं तो ? और क्या है?’
मैं मन ही मन बडबडाती हूँ-हां मैं जो रहती हूँ इस कमरे में…

दूसरी घोषणा और दिल जलाती है-घर के सभी बच्चे इसी कमरे में पढेंगे .मेरी बी.ए की परीक्षा सर पर है यह कोई क्यों नहीं समझ पा रहा?..खींचते खांचते एक दो वर्ष गुजर ही गए थे उस कमरे में …दिल्ली आने तक पना बसेरा वही रहा..

दिल्ली के अनुभव सिखाते रहे-रैनबसेरे घर नहीं होते.यहाँ अपना कमरा खोजने क तो स्वप्न भी न पालूँ. अलग अलग रुचियों, जगहों,वाले लोगों का जमावड़ा घर कैसे हो सकता भला? , आदतें, स्वभाव जब भी टकराते रैनबसेरे से अलग अलग दिशाओं में कई राहें फूटती..औरर मैं एकबारगी सन्न और हतप्रभ…शादी से एक राहत मिली थी, अब यह सबकुछ नहीं …अ यह घर मेरा होगा…और सचमुच मेहमानों से भरे घर में भी एक कमरे का अपने नाम सुरक्षित होना कम भला न लगा था..ससुराल में भी एक कमरा होता था अपने पास , जहाँ थक हारकर बैठ सो सकते थे…ये अनुभव खूबसूरत था पूरी जिन्दगी से गुजरते हुए किसी खूबसूरत दृश्य में आँखें अटक जाने की मानिंद…

बेटी हुई घर घर हुआ …दिन रात उस घर को बसाने रचने में भूल गई बिलकुल-घर हवाएं होती हैं , और हवाएं घर…और उन्हें मुठ्ठी में बाँधने की हमारी हर कोशिश नाकामयाब ….यह याद तब आया जब  एक दिन वह घरभी पीछे छूट गया,…फिर एक बार अकेलापन…और अकेले वाला घर ..वही जिसे हर सर्जन शील व्यक्ति ढूंढता और चाहता है.पर घर और अपना कमरा जैसे शब्द से उस वक्त तक मोह टूटता रहा था…अगर काम पर न जाऊं तो दीवारें काटने दौड़ती थी वहां की…बहुत मुश्किल से अकेले रहना सीखा …धीरे धीरे ये दीवारें बाँधने लगी थी फिर से मोह में…एक कमरे से एक घर में भी दाखिल हुई…और दाखिल होकर ही कहीं यह समझ पाई , कमरे और घर के लिए जद्दोजहद लिखने के लिए हो सकता है, पर लिखने के लिए यह और यही कत्तई जरुरी नहीं, कि सबसे ज्यादा तो उन्हीं दिनों में  लिखा, जब एक कमरे के लिए छतपटाती फिर रही थी.

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महिला अधिकारः वैधानिक प्रावधान

साधना गुप्ता

 राजकीय स्नातकोतर महाविद्यालय, झालावाड़ मे कार्यरत. संपर्क : sadhanagupta0306.sg@gmail.com

स्त्री मातृत्व के बोझ तले दब कर धीरे.धीरे घर की चारदीवारी तक सीमित होती गई। परिणामतः आर्थिक उत्पादन के साधन एवं शिक्षा से भी वंचित होती गई। अंगों की कोमलता को उसकी शक्ति हीनता के रूप में आंका गया और सौन्दर्य एवं शील की रक्षार्थ उसे चारदीवारी तक सीमित कर दिया गया जिससे स्त्री की स्वतन्त्र विचारधारा एवं अधिकार बीते युग की बात हो गई।

हमारी पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था में यह स्थिति बद से बदतर होती चली गई। पतन का यह ग्राफ बढ़ता ही जा रहा था जिस पर राजाराम मोहन राय की दृष्टि गई। उन्होंने 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना कर महिलाओं की स्थिति में सुधार के प्रयास किए। एवं बाल-विवाह, बहु-विवाह, उत्तराधिकार में अधिकार प्राप्ति, विषयों को व्यावहारिक धरातल पर उठाते हुए ’’ वामा बोधनी ’’ नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया।’’ मैंअपनी झांसी नहीं दूंगी ’’ के दृढ़, निश्चय के साथ 1857 में रानी लक्ष्मी बाई द्वारा किया गया स्वतन्त्रता का प्रयास रंग लाया। स्वाधीनता के संघर्ष में अपने आधे अंग के जंग-जर्जरित रूप का एहसास प्रथम बार पुरूष प्रधान समाज को हुआ। परिणामतः सुधार के लिए प्रार्थना सभा, आर्य समाज इत्यादि की स्थापना हुई, कई वैधानिक प्रावधान किए गए।

1872 में ’ सिवल मैरिज एक्ट ’ पास किया गया जिसमें विवाह हेतु लड़की-लड़के की आयु क्रमश 14 एवं 18 वर्ष निर्धारित की गई। प्रार्थना सभा 1867 द्वारा 1869 में बाम्बे वीडोज रिमामर्स एसोशियसन की स्थापना की गई और इसी वर्ष प्रथम पुनर्विवाह करवाया गया। आर्य समाज द्वारा जाति प्रथा, स्त्री-पुरूष हेतु शिक्षा, कानून व बाल-विवाह निषेध इत्यादि पर बल दिया गया। 1916 में पूना एवं बम्बई में प्रथम महिला विश्वविद्यालय की स्थापना ’’ श्रीमती नथीबाई दामोदार ठाकरे विमन्स युनिवर्सिटी ’’ नाम से हुई। यह दक्षिणी पूर्वी एशिया का प्रथम महिला विश्वविद्यालय था।1916 में ही भोपाल की बेगम ’’ सैयद अहमद खा ’’ ने अपने कुछ साथियों के साथ अखिल भारतीय मुस्लिम महिला समझौते का सूत्रपात कर बहु विवाह उन्मुलन के प्रयास किए।

1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद 1889 में बम्बई अधिवेशन में दस महिलाओं द्वारा भागीदारी की गई थी, जो नाकाफी थी। स्वतन्त्रता संग्राम में महिलाओं की अहम् भूमिका के बिना गांधीजी को स्वतन्त्रता का सपना अधूरा लगा। आपके सतत प्रयास से 1918 के बाद स्वतन्त्रता संग्राम में महिलाओं की खुली भागीदारी दिखलाई दी। 1927 में  ’’आल इण्डिया वीमेन्स कांफ्रेस’’ नामक संस्था का गठन हुआ तथा इसी वर्ष ’डाॅ. मधुलक्ष्मी रेड्डी’मद्रास में पहली विधान मण्डल परिषद् सदस्य बनी।


सविनय अवज्ञा आन्दोलन एवं स्वेदशी आन्दोलन में विदेशी वस्तुओं का घेराव, शराब की दुकानों की तालाबन्दी एवं प्रभातफेरी में सक्रिय भागीदारी करते हुए महिलाएँ जेल गई।

महिला संगठनों के प्रयास से सातवें-आठवें दशक में अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस, अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष एवं महिलाओं सम्बधित सभा-गोष्ठियों का आयोजन किया गया। महिलाओं की स्थिति के आकलन हेतु भारत सरकार द्वारा 1971 में एक समिति का गठन किया गया जिसने अपनी रिपोर्ट 1974 में प्रस्तुत की। इसी कड़ी में ’’ कमेटी आॅन स्टेट्स आॅफ वीमेन इन इण्डिया 1974,’’ नेशनल कमीशन आॅन सेल्फ इम्प्लायड वीमेन 1988, नेशनल पर्शपेक्टिव प्लान फार वीमेन 1988 इत्यादि अस्तित्व में आए।

वैधानिक प्रावधान:-


भारतीय संविधान की निर्माण प्रक्रिया के दौरान ’’महिलओं की वैधानिक समानता’’ एवं ’’हिन्दू कोड’’, विचार के महत्वपूर्ण मुद्दे रहे। अतः महिला उत्थान के लिए किए गए वैधानिक प्रावधानों का विवरण निम्न हैं:-

1. बाल विवाह निषेध:-शारदा एक्ट 1929 में संशोधन कर 1954 में लड़की-लड़के की विवाह हेतु आयु क्रमशः 18        एवं 21 वर्ष की गई। परन्तु कानून के प्रभावी क्रियान्वयन को न देखकर 2006 में संसद में पारित ’’बाल             विवाह निवारण अधिनियम विधेयक 2004’’ में कानून मंत्रालय की निम्न सिफारिशों को स्वीकार किया           गया:-

1. बाल विवाह सम्पन्न होते ही अवैध माना जाएगा।
2. 2 वर्ष का कठोर कारावास एवं एक लाख रू. का जुर्माना।
3. बाल विवाह के शिकार बच्चों का सरकार द्वारा पुनर्वास आदि शामिल हैं।

परन्तु अभी भी हम सफल नहीं हुए हैं। यूनीसेफ की रिपोर्ट के अनुसार 2000 से 2012 के बाल-विवाह के              मामले में भारत दूसरे स्थान पर हैं। शीर्ष दर बांग्लादेश में हैं यहाँ तीन में से दो कन्याओं की शादी 18 वर्ष            की उम्र के पहले हो जाती हैं। (अन्तर्राष्ट्रीय क्राॅनोलोजी नवम्बर 2014, पृ.15)

2. महिलाओं के विरूद्ध अपराध:-

अ. सती प्रथा पर रोक:-सती निवारण
अधिनियम 1987 द्वारा न केवल सती हेतु दण्डकी व्यवस्था है वरन् सती     की प्रशंसा को भी अपराध की श्रेणी में रखा गया हैं। लेकिन आधुनिक भारत में भी सती प्रथा के मामले               समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहते हैं। केशरिया तथा कुटु बाई के सती मामले इसी के उदाहरण हैं। (महिला       सशक्तिकरण-वीरेन्द्रसिंह यादव पृ. 305)

आ. दहेज:- दहेज निषेध अधिनियम 1961 में पारित एवं 1984, 1986 में संशोधित किया गया। भारतीय साक्षी       अधिनियम में भी संशोधन किया ताकि गवाह जुटाने की परेशानी से बचा जा सके। विवाह के सात वर्ष के            अन्दर विवाहिता की मृत्यु को असामान्य परिस्थितियाँ देने के लिए उत्तरदायी माना गया। परन्तु इन              प्रावधानों का दुरूपयोग देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति चन्द्रमौलि कुमार प्रसाद की अध्यक्षता        वाली पीठ ने सभी राज्य सरकारों को अपने पुलिस अधिकारियों को यह निर्देश देने के लिए कहा –                      भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498 क के तहत मामला दर्ज होने पर स्वयं गिरफ्तारी न करें। गिरफ्तारी             की आवश्यकता के बारे में स्वयं को संतुष्ट करे क्योंकि उन्हें मजिस्ट्रेट के समक्ष कारण व सामग्री पेश               करनी होगी। (अन्तर्राष्ट्रीय क्राॅनोलोजी सितम्बर 2014 च.12) पर, दहेज की सुरसा का मुँह बड़ा ही होता जा         रहा हैं।

इ. घरेलू हिंसा:-महिलाओं के प्रति हिंसा को रोकने के लिए भारतीय संसद के अपराधी कानून अधिनियम 1963        के अनुसार कोई भी घरेलू अत्याचार जो पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा किया गया हो, कानूनन अपराध            होगा। इसी प्रकार घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 जो 26 अक्टूबर 2006 से कानून रूप में सम्पूर्ण भारत में           लागू हुआ, के अनुसार शारीरिक मारपीट ही नहीं, अपितु उत्पीड़न, यौनिक, मौखिक, भावनात्मक एवं                 आर्थिक पक्ष के साथ-साथ महिला को घर से निकालना या इसकी धमकी देना घरेलू हिंसा की श्रेणी में रखा         गया हैं। इसके तहत उसे अपने पैतृक या ससुराल के मकान के एक भाग में रहने का अधिकार भी दिया गया       हैं।

ई. भ्रूण हत्या निषेध:-भारतीय दण्ड संहिता 1860 में 312 से 314 के द्वारा ऐसे गर्भपात को दण्डनीय माना गया     है जो स्त्री के जीवन रक्षक रूप में या उसकी सहमति से न किया गया हो। मेडिकल टर्मिनेशन आॅफ                  प्रिंगनेंसी एक्ट 1971 में भी इस प्रकार की व्यवस्था हैं परन्तु असफल होने से सरकार ने प्रसव पूर्व निदान            तकनीक विनिमय दुरूपयोग निवारण अधिनियम का निर्माण किया जिसे 2002 में संशोधित किया गया।          पी.सी.पी. एन. डी. टी. कानून 2002 के अनुसार –

A.  लिंग चयन में पहली बार दोषी जाए जाने पर तीन वर्ष की सजा एवं पचास हजार जुर्माना।
B. दूसरी बार दोषी पाए जाने पर पाँच वर्ष की सजा, एक लाख जुर्माना।
C. सभी अल्ट्रा साउण्ड क्लिनिकों को अल्ट्रासाउण्ड मशीन का पंजीकरण एवं जांच का प्रमाण-पत्र आवश्यक            किया। साथ ही अपनी मासिक रिर्पोट स्वास्थ विभाग की लाइसेंसिंग शाखा को भेजना भी अनिवार्य कर              दिया।

अधिनियम का उल्लंघन करने पर मशीन जब्त करने का प्रावधान भी हैं। 14 फरवरी,2003 को लागू यह कानून देशभर में प्रभावी हैं। परन्तु पालना न होने पर 19 अगस्त 2008 को उच्चतम् न्यायालय के हस्तक्षेप से लिंग परीक्षण सम्बन्धी उत्पादों और सेवाओं संबन्धित विज्ञापन दिखाने वाली साइडो के विरूद्ध कानूनी कार्यवाही की चेतावानी के बाद गूगल और माइक्रोसाफ्ट ने अपने ऐसे विज्ञापन हटा लिए। परन्तु कटु सत्य यह है कि अभी भी यह कार्य अधिकांश अस्पतालों में छद्म रूप से किया जाता हैं। यहाँ वहाँ पड़े कन्या भ्रूणों के समाचार-पत्रों में प्रकाशित समाचार किसी से छिपे नहीं हैं। पुत्र मोह गया नहीं हैं। एक सामाजिक संस्था का संवेक्षण- राजस्थान में 2015 में 2100 एवं 2016 सितम्बर तक 1984 महिलाएँ 5 बेटियों के बाद भी गर्भवती हैं (राज.पत्रिका 18.10.16)

उ. बलात्कार, वेश्यावृत्ति एवं क्रय-विक्रय निषेधः– भारतीय दण्ड संहिता की धारा 375 के तहत बलात्कार को        दण्डनीय माना गया हैं। सह अपराधी के रूप में महिला को दण्डित न करने के साथ यह प्रावधान है कि              शिकायत कर्ता भा. द. स. 1860 की धारा 45 के तहत प्रक्रिया शुरू करने की चाहे या न चाहे परन्तु जिलाधिकार/   शिकायत समिति को कार्यवाही करनी ही होगी। 16 दिसम्बर 2012 को घटित निर्भया काण्ड एवं उसके बाद       दिन-प्रतिदिन बढ़ती बलात्कार की घटनाएँ इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि कानून की पालना नहीं हो रही हैं।   धारा 370 से 373 के तहत महिला को दास के रूप में या वेश्यावृत्ति हेतु क्रय-विक्रय पर भी रोक लगाई गई हैं।

3. तलाक:- पर्सनल लाॅ द्वारा पति-पत्नी दोनों को तलाक लेने का पूर्ण अधिकार दिया गया हैं। विशेष विवाह          अधिनियम 1959 के अनुसार प्रत्येक धर्म समुदाय के स्त्री-पुरूष पसन्द से विवाह कर सकते हैं। इसमें विवाह      एवं तलाक के समान प्रावधान हैं।

4. मातृत्व लाभ:-अधिनियम 1961 के अनुसार माॅ बननें पर बच्चे की देखभाल के लिए 24 सप्ताह के सवैतनिक अवकाश का प्रावधान है साथ ही बालक के 18 वर्ष का होने तक आवश्यकता होने पर समय-समय पर दो वर्ष के सवैतनिक अवकाश का भी प्रावधान हैं। मातृत्व लाभ (संशोधन) विधेयक 2016 के द्वारा 24 सप्ताह के अवकाश में वद्धि की गई हैं। अब यह अवकाश दो बच्चों के जन्म तक 26 सप्ताह का एवं इसके बाद 12 सप्ताह तक मिलेगी। (अन्तर्राष्ट्रीय क्राॅनोलोजी, अक्टूबर 2016 पृ.15)

5. बाल सुरक्षा:-ठेका मजदूर अधिनियम 1970 के अनुसार महिला मजदूर के बच्चों की देखभाल के लिए एक         बच्चा गृह भी होना चाहिए। यह प्रावधान अप्रवासी अधिनियम 1979 में भी हैं।

6. समान भुगतान:-समान भुगतान अधिनियम 1973 के अनुसार एक जैसे कार्य के लिए स्त्री-पुरूष दोनों को         समान वेतन दिया जाएगा।

7. अभद्र प्रदर्शन निषेध:-महिलाओं का अभद्र प्रदर्शन (निषेध)अधिनियम 1989 के द्वारा किसी भी रूप में             महिला के अभद्र प्रदर्शन पर रोक लगाई गई हैं।

8. सम्पत्ति एवं उत्तराधिकार:-17 जून 1956 को लागू हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम पिता की सम्पत्ति में        पुत्री को भी पुत्र के समान अधिकार देता हैं। पति की सम्पत्ति पर भी उसके जीवन काल में पत्नी को पूर्ण            अधिकार एवं पति की मृत्यु के बाद संतान के समान एक हिस्से का अधिकार देता हैं। समय-समय पर इसमें      संशोधन कर महिलाओं के अधिकार का विस्तार किया जा रहा हैं। अभी कुछ दिन पूर्व हुए संशोधन के अनुसार    पिता की मृत्यु पर विवाहित पुत्री को भी अनुकम्पा नौकरी पाने का अधिकार दिया गया हैं।

अस्तु, इन सभी कानूनी प्रावधानों के अतिरिक्त भी भारत सरकार ने न जाने  कितनी योजनाएँ महिलाओं के कल्याण के लिए बना रखी है जिनमें करोड़ों रू. खर्च होते हैं। 67 करोड़ रू. का तो अकेला राष्ट्रीय महिला कोष है जो मुसीबत में फंसी महिला की मदद करता हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ से भी करोड़ों रू. प्राप्त होते हैं परन्तु जानकारी के अभाव में इनका दुरूपयोग ही होता हैं।

अन्त में केवल इतना कि बालिका के जन्म से पूर्व ही उसके संरक्षण का प्रयास करता है भारतीय कानून। आज आवश्यकता इस बात की है कि जनसाधारण को इन प्रावधानों से परिचित करवाया जाए। पूर्ण दायित्वों के साथ प्रशासन द्वारा इनकी अनुपालना की जाए, सार्वजनिक स्थलों पर इनकी जानकारी लिखी हो ताकि अपराधी अपराध करने से पूर्व कई बार सोचे, न्याय प्रक्रिया सरल हो। महिलाओं को स्वयं भी अपने अधिकारों के प्रति सचेत होना होगा साथ ही भोग एवं वासना की विस्तार धारा को छोड़ पुरूष समाज को एक स्वस्थ विचारधारा अपनानी होगी, एक ऐसा सांस्कृतिक वातावरण विकसित करना होगा जिस में नारी भय मुक्त होकर शील की रक्षा करते हुए, पूर्ण क्षमताओं को उजागर कर सके। यदि हम ऐसा कर पाए तो फिर महिलाओं को संरक्षण हेतु किसी आरक्षण या कानून की आवश्यकता नहीं रहेगी। अर्द्धनारीश्वर की कल्पना साकार हो सकेगी। अस्तु वर्षो से खामोश पड़ी शिलाओं से हीे लावा निकलता है अतः हम आशावान हैं।

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प्रेम कथा में हाड़ा रानी की पुनर्वापसी बनाम बैताल का अनुत्तरित प्रश्न

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संजीव चंदन
इस कहानी का बीज उस दिन ही अंकुरित हो गया था, जिस दिन पिछली कहानी यानी रूमी की कहानी का यथार्थतः अंत हुआ था, जुहू बीच पर, जब कथावाचक, श्रोता, नायिका इकट्ठे हुए थे. तब श्रोता यानी नानू ने वहाँ से लौटते –लौटते कथावाचक की ओर एक मौन प्रश्न उछाल दिया था ‘कही मोहित तुम ही तो न थे?’ सवाल और भी थे मौन आँखों में …. मोहित और फर्नांडीज की पत्नी की पीड़ा के सवाल ….

घबड़ाइये नहीं, मैं पिछली कहानी को दुहरा कर आपको दुहराव की बोरियत से भरने नहीं जा रहा हूँ. हो सकता है कि इस कहानी के तार पिछली कहानी से जुड़ें, लेकिन यह कहानी होगी एकदम अलग –एकदम अलहदा. ऐसा नहीं है कि आपने मेरी ऐसी दो कहानियां पहले नहीं सुनी हैं, जिनके तार एक –दूसरे से जुड़े थे, पहले भी सुनी हैं, पढी हैं , आपने- तार जुड़े हुए, लेकिन दोनो स्वतंत्र कहानियां- दोनो के अलग आस्वाद. कहानियां सिक्वल हैं, सिक्वल नहीं भी. कहानी ही क्यों आप तो फ़िल्में भी सिक्वल में देखते रहे, आज भी गूँज रहा है सवाल ‘ कटप्पा को क्यों मारा?’ जवाब के लिए देखें बाहूबली पार्ट टू. मेरी यह कहानी जवाब नहीं है, किसी प्रश्न का, न नानू के प्रश्न का और न उन अन्य श्रोताओं या पाठकों के सवालों का, जिन्होंने कहानी सुनकर और हंस कथामासिक में पढ़कर पूछा था, ‘‘कही मोहित तुम ही तो न थे?’ और वैसे ही कई कई सवाल, जो नानू के भीतर अनुत्तरित उमड़ने –घुमड़ने लगे थे.

रंगमहल में प्रेम : पग घूँघरू बाँध मीरा नाची थी

सच इस कहानी का बीज उसी दिन जुहू
बीच पर अंकुरित हो गया था, जब नानू ने सवाल किया. लेकिन कहानी तब नहीं कही गई थी, जब हम ट्रेन में लौट रहे थे, मुम्बई से अपने घर वापस. आप सोच सकते हैं कि वह कहानी पिछली बार मुम्बई जाते हुए कही गई थी तो तभी अंकुरित हुई कहानी वापस लौटते हुए नानू को सुना दी गई होगी. लेकिन तबतक मुझे पता कहाँ था कि कहानी का बीज अंकुरित हो गया है. तब तक पता नहीं चला, जबतक इस नई कहानी की नायिका से मेरी मुलाक़ात नहीं हुई. इस बीच कितना कुछ घटित होता गया था. दक्षिण के एक विश्वविद्यालय में एक दलित छात्र को इसलिए आत्महत्या करनी पडी कि वह मेधावी था, वह प्रश्नाकुल था, वह सत्ता के तर्क और सत्ता द्वारा आरोपित विमर्शों को खारिज करता था, कि वह खान –पान की आजादी का पक्षधर था, कि वह राज्य प्रायोजित हत्याओं के खिलाफ था, कि वह मनुष्य की गरिमा को सर्वोपरि मानता था, कि वह समता, बंधुता और स्वतंत्रता में यकीन करता था, कि वह ‘शिक्षित बनो, संगठित हो, संघर्ष करो’ की प्रेरणा में यकीन करता था- उसने आत्महत्या की, लेकिन सच ही इस पर लोगों को यकीन नहीं हुआ – उसे सांस्थानिक ह्त्या माना गया.


इसी बीच देश की राजधानी में स्थित एक बड़े विश्वविद्यालय में खपत होने वाले कंडोमों, हड्डियों और शराब की बोतलों की गणना में देश के शीर्ष नेतृत्व की रुचि बन गई. हम सबको इसके आंकड़े बताये जाने लगे. उसी विश्वविद्यालय के कुछ ‘राष्ट्रभक्त- चरित्रवान’ शिक्षकों ने एक विस्तृत रपट जारी कर विश्वविद्यालय को सेक्स वर्क का अड्डा घोषित कर दिया. इस बीच और भी बहुत कुछ घटा, देश की संसद में शिक्षा मंत्री, जो कभी किसी सोप ओपेरा में बहू भी थीं और सास भी थीं, ने प्रभाशाली नाटकीयता से भरा भाषण दिया, भाषण देते –देते वे हुंकार – फटकार के आरोह –अवरोह से गुजरते हुए हांफने लगीं. वे आवेग में थीं, इतना कि एक बड़े राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री के चरणों में अपने शीश अर्पित करने की इच्छा जाहिर करने लगीं- बलि और बलिदान का नाटकीय मंच बन गयी थी संसद. इस बीच कोलकाता की गलियों से दुर्गा की मूर्तियाँ संसद के गलियारों में स्थापित हो गईं और संसद के कंगूरे से ‘या देवी सर्वभूतेषु’ की गूँज होने लगी. देश दुर्गा भक्तों और महिषासुर के अनुयायियों में विभाजित हो गया. देश का एक बड़ा उद्योगपति बैंको को करोडो का चपत लगाकर विदेश में जा बसा और उधर अपने ही देश का एक राज्य केरल अफ्रीका का सोमालिया बन गया– ऐसा मैं नहीं कह रहा देश के प्रधानमंत्री ने घोषित किया. कितना कुछ घटित हुआ, दिल्ली के बाद बिहार ‘वाटरलू’  हो गया.
इतना कुछ घटित होने के साथ-साथ एक घटना और घटी, कहानी की नायिका से मेरी मुलाक़ात. इसके साथ ही यह कहानी, जो मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ और नानू को हाल ही में नियमित कहानी सुनाने के प्रसंग में सुना चुका हूँ, मुझे उसी नायिका ने सुनाई थी.


यह कहानी भी प्रेम कहानी है. कहानी तब आधी से अधिक घटित हो गई थी, जब नायक यानी प्रतीप ने मंच से घोषणा की कि मैं पिछले छह महीने से प्रेम में हूँ. प्रतीप नाटककार था, युवा नाटयनिदेशकों में एक नाम था उसका. उस दिन वह एक अजनबी शहर में था, पह्ली बार आया था वहां, जब मंच से उसने घोषणा की. इस घोषणा का अर्थ वहां उपस्थित श्रोताओं में सबसे अधिक जिसने ग्रहण किया था, वह थी उससे 10 साल उम्र में बड़ी नीलिमा नीलकेशी. नीलिमा तब पुलकित थी, उसके साहस पर कि वह मंच से घोषणा कर रहा है, और डर रही थी कि कहीं वह नाम भी न ले ले- उसने बगल में बैठे अपने पति को देखा, कहीं वह मेरी ओर तो नहीं देख रहा है, उसके चेहरे का भाव न पढ़ ले. उधर प्रतीप ने ऐसा कहते हुए अपनी निगाहें नीलिमा पर टिका दी थी. सच में पिछले 6 महीने में ही तो पनपा था उनका प्यार – एक नाट्यनिदेशक और एक लेखिका का प्यार – पहली बार मिले थे वे दिल्ली में श्रीराम सेंटर के बाहर कुछ कॉमन मित्रों के साथ- सब एक दूसरे से परिचित हुए और नंबरों का आदान –प्रदान हुआ. जल्द ही प्रतीप और नीलिमा एक दूसरे से व्हाट्स ऐप पर मुखातिब हुए, एक दूसरे से खुले और अन्तरंग होते गये- नीलिमा ने प्रतीप को हमराज बना लिया और प्रतीप? प्रतीप ने भी बहुत कुछ जाहिर कर दिया उसपर अपना भूत –वर्तमान? वे व्हाट्स ऐप चैट से जल्द ही देर रात के फोन संवाद तक बढ़ते गए-जब अपने–अपने घरों में दोनो अकले होते – तब तक संवाद करते, जबतक सो न जाएँ, यह साथ-साथ होने का अहसास था.


यहाँ, दिल्ली से दूर एक छोटे शहर में, एक नाट्यमहोत्सव और नाटक पर परिचर्चा के सिलसिले में दूसरी बार मिले वे – नीलिमा का शहर था यह. यहाँ प्रतीप मंच से घोषणा कर रहा था कि उसे छः महीने से मुहब्बत है. उसकी घोषणा जितना वहाँ उपस्थित लोगों को संबोधित थी, उससे ज्यादा नीलिमा से एक सीधा और बोल्ड संवाद थी. नीलिमा रोमांचित थी, नीलिमा संशकित थी कि कहीं……. !  वह उसके बिंदासपन और बातों को रहस्य न रहने देने के अंदाज पर ही तो मुग्ध हुई थी. कितने तफसील से उसने बताया था उसे सबकुछ कि वह शादी –शुदा है, दो बच्चे हैं उसके. शादी कम उम्र में हुई थी, इसलिए बच्चे भी अब कॉलेज जाने लगे हैं. कि उसके ही शहर में उसे दिलोजान से चाहने वाली एक लडकी भी है, जो उसके प्रेम में अविवाहित है. वह दोनो जिंदगियां – पति और प्रेमी का एक साथ सफलता से जी रहा है- सफल प्रेमी, सफल पति और सफल पिता – जीवन के रंगमंच की सारी भूमिकाएं वह एक साथ सफलता से निभा रहा था. यह सब सच सुनते हुए कोई रसायन बना नीलिमा के भीतर- वह इस व्यक्तिव के प्रति मुग्ध होती गई- एक व्यक्तित्व, जिसे बिना विवाद के दो स्त्रियाँ प्यार कर रही थीं – कुछ –कुछ नीलिमा के भीतर भी उससे बात करते हुए आकार लेने लगा- जिसे आज मंच से प्रतीप एक नाम दे रहा था –मुहब्बत! हाँ, सच में पिछले छह महीने से उनकी बातचीत का अंतराल कम हुआ था, जिस दिन वे बात न करें उस दिन नीलिमा अपने भीतर कुछ खाली सा, कुछ बेचैन महसूस करती- व्हाट्स ऐप पर कई मेसेज छोड़ जाती- ‘साथी कहाँ हैं ? कुछ ख़ास तो नहीं, आज आप कहीं ज्यादा ही मशगूल हैं शायद?.’ नीलिमा जानती थी कि वह पिता, पति और प्रेमी की रूटीन भूमिकाओं को जीता हुआ एक सफल निदेशक है – नाटक मंडली की भी जिम्मेवारियां हैं. फिर भी उसका दिल नहीं मानता और व्हाट्स ऐप के लिए मोबाइल पर उंगलियाँ रेंग जातीं …… मतलब प्रतीप इन छः महीनों में ख़ास हो गया था और आज वह एक सीधा संवाद दे रहा है, सार्जनिक कि वह छः महीने से प्यार में है.



प्रतीप आश्वस्त था कि उसकी कहीं बातों के श्रोता सभा मंडप में ही बैठे हैं, या उसकी कही बातें एक सीधा संवाद है उसकी अपनी नई प्रेयसी से. लेकिन बातें हैं, बातों के अपने पंख  होते हैं – वे सभा मंडप तक ही कहाँ रुकने वाली थीं – वे उडीं और पहुँच गई उसके अपने शहर तक, जहां वह, जिम्मेदार पति –पिता और प्रेमी था. मंच से इस नये इजहार- ए मुहब्बत को उसकी प्रेमिका तबस्सुम ने सुना. तबस्सुम, यानी इस कथा की नायिका या नायिकाओं में से एक. प्रतीप और उसकी दोस्ती जनवादी नाट्य मंडली की दोस्ती थी.

तबस्सुम, प्रतीप के ही शहर में एक कॉलेज में पढ़ाती थी, नाटकों में रुचि थी, अभिनय करती थी. अत्यंत साधारण परिवार से आने वाली तबस्सुम ने अपने मुकाम खुद ही तय किये थे- सेल्फ मेड गर्ल ! परिवार राजस्थान  का एक पारम्परिक मुस्लिम परिवार था, इसलिए घर से, बुर्के से उसकी आजादी के पक्ष में नहीं था. अम्मी का समर्थन उसे हासिल हुआ, लेकिन एक शर्त पर कि वह पढाई से लेकर नौकरी तक बाहर करे- अपने शहर से बाहर. नाटकों में मर्दों के साथ काम – वह तो उसके अपने शहर में किसी सूरत में भी किसी को भी गंवारा न था. लेकिन तबस्सुम अपनी जिद्द पर अड़ी रही. उसे पता था कि घर की माली हालत कुछ ऐसी नहीं है कि वह शहर से बाहर जाकर पढ़ सके. इसलिए पढाई से नौकरी तक उसने शहर में ही की- उसे नौकरी उसके शहर के ही एक कॉलेज में मिल भी गई. कॉलेज के दिनों से ही वह नाटकों में काम करने लगी थी.

प्रतीप से दोस्ती इन्हीं दिनों हुई. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली से निदेशन में डिग्री लेकर वह अपने शहर में ही एक ग्रूप बनाकार एक कामयाब निदेशक के रूप में दर्ज हो गया. वह देश के विभिन्न नाट्य महोत्सवों में अपने नाटक लेकर जाता था. प्रतीप वाचाल था, हमेशा मजाहिया अंदाज में बात करने वाला. तबस्सुम खुद भी नहीं समझ पाती कि क्यों उसकी जैसी खुदमुख्तार लड़की प्रतीप के आगे बेवश होती गई थी. पहले नाटक के रिहर्सल से ही प्रतीप ने उसे कुछ ख़ास तबज्जो देनी शुरू की थी, लडकियां कई और थीं नाट्य मंडली में, लेकिन तबस्सुम के प्रति उसका अंदाज कुछ अलग था. एक दिन वह देर से आई रिहर्सल में. प्रतीप रिहर्सल वाले कमरे के बाहर सिगरेट फूंकता दिखा था उसे-उसने पूछा, ‘देर हो गई मोहतरमा!’ उसने कहा, ‘ दोपहर में थोड़ी आँख लग गई थी.’ प्रतीप ने छूटते ही चुटकी ली,’ और सपने में मुझे तो नहीं देख रही थीं न साथी !’

उस दिन तबस्सुम को रिहर्सल में मन नहीं लगा. उसे बार –बार यह वाक्य घेर रहा था, ‘और सपने में मुझे तो नहीं देख रही थीं न साथी!’ कहने का अंदाज, कहते हुए देखने का अंदाज और बाहर सिगरेट पीते हुए इन्तजार की मुद्रा. यह सब इस सवाल को सामान्य नहीं रहने दे रहा था. रिहर्सल से लौटते वक्त भी वह इस वाक्य के गिरफ्त में ही रही- इन दिनों उसे प्रतीप से मिलने वाले ख़ास तबज्जो का एक अर्थ बन गया था इस वाक्य के साथ. घर पहुँचकर एकांत मिलने पर उसने आइने में देखा खुद को. इसके पहले खुद को देखने, खुद पर विचार करने का समय ही कहाँ मिला था उसे- घर की माली हालत के बीच अपने परिवार के लिए कुछ करते हुए खुद का करियर बनाते वक्त !  परिवार के लिए वह ट्यूशन लेती थी, बच्चों का.  कुछ बेरुखापन भी उसके व्यक्तित्व में शामिल हो गया था.

आईने में उसका सांवला रंग उतर आया, इस ख़ास रंगत के साथ जो उसकी शख्सियत थी, वह सात तहखाने से बाहर आती दिखी. बेरुखापन का आवरण उतरने लगा धीरे –धीरे. उसने खुद को देखा, खुद पर गौर किया और कुछ क्षण के लिए पीछा कर रहे वाक्य से मुक्त हुई कि अगले ही क्षण एक सवाल ने घेर लिया उसे उस वाक्य के प्रभाव की पुनर्वापसी के साथ कि ‘क्या प्रतीप ने सिर्फ मजाक भर किया था उससे या….. !’ दूसरे दिन तबस्सुम कुछ अलग ही निखार के साथ रिहर्सल में पहुँची-प्रतीप ने गौर किया. प्रतीप का व्यक्तित्व कितना आकर्षक है- हमेशा खुशमिजाज और साथी कलाकारों के लिए मददगार- तबस्सुम ने मह्सूस  किया. इस तरह वे एक दूसरे के लिए ख़ास हो गये.

नाट्यमहोत्सव के लिए दूसरे शहर में पूरी नाटक मंडली पहुँची. वहां तबस्सुम और प्रतीप को और वक्त मिला एक –दूसरे से बात करने का. तबस्सुम ने पाया कि प्रतीप जितना हंसमुख और मजाहिया अंदाज में जीने वाला शख्स है, उतना ही संजीदा भी. वह शादीशुदा है, थोड़ी कम उम्र में शादी के कारण दो बड़े बच्चों का पिता भी है. बेटी अभी –अभी कॉलेज में पहुँची है और बेटा स्कूल के अंतिम दिनों में है- पत्नी घरेलू जिम्मेवारियां संभालती है. प्रतीप एक जिम्मेदार पिता है और जिम्मेदार पति. परिवार में उसके दादा के समय में जमींदारी थी, आज भी अच्छी –खासी जमीन है गाँव में – शहर से लगकर. प्रतीप इस खानदान का इकलौता लड़का है, जमीन –जायदाद की जिम्मेदारी, पत्नी और बच्चों का ख्याल और सांस्कृतिक सक्रियता – हर भूमिका के प्रति वह ईमानदार है. इन दिनों वह तबस्सुम के प्रति जितना बेतकल्लुफ होता गया था, उतनी ही संजीदगी से अपनी पत्नी कुसुम की चर्चा भी उससे करता. यह साफगोई तबस्सुम को और भी आकर्षित कर रही थी उसके प्रति.
महोत्सव में अपने नाटक के प्रदर्शन के बाद उनकी मंडली तो वापस लौट गई, लेकिन वे वहीं रुके रहे और नाटकों को देखने –समझने के लिए. एक शाम नाटक के बाद प्रतीप और वे काफी देर तक शहर में टहलते रहे. टहलते हुए प्रतीप ने उसके हाथ को अपने हाथ में ले लिया. पहले तो तबस्सुम थोड़ी असहज हुई, अपने हाथ को खींचना चाहा, लेकिन फिर उसने यूं ही ढीला छोड़ दिया. वे देर तक घूमकर, बाहर ही खाना खाकर वापस अपने होटल में आये. प्रतीप उसके साथ तबस्सुम के कमरे की ओर बढ़ने लगा तो वह शरारत के साथ मुसकुराई, ‘इधर नहीं जनाब, आपका कमरा उधर है.’ प्रतीप झेंप गया. फिर संभला, और अपने अंदाज में वापस आया. आंखों में शरारत भरकर उसने कहा, ‘एक टॉप सीक्रेट बताऊँ? ‘ तबस्सुम चुप रही. वह थोड़े और पास आकर बोला, ‘ मझे प्यार हो गया है, पिछले दो महीने से.’ ऐसा कहकर उसने ठहाका लगाया और अपने कमरे की ओर बढ़ गया.
तबस्सुम ने जल्दी से अपना कमरा खोला और बिस्तर पर बिछ गई. ‘यह दूसरा वाक्य था, जिसने उसे घेर लिया.’ पिछले एक महीने में यह दूसरा वाक्य, यह दूसरा बाण, जिससे वह बिंध गई – हाँ, दो ही तो महीने हुए थे उनकी मुलाक़ात के.’ उसने सोचा क्या वह फ्लर्ट कर रहा है ? एक शादीशुदा मर्द उसपर डोरे डाल रहा है ? दूसरे ही पल उसे ये सवाल निरर्थक लगे. प्रतीप एक अच्छा इंसान है, संजीदा- कोई भी उससे मुहब्बत करना चाहेगा. उसने खुद से सवाल किया ‘क्या इन दो महीनों में उसे भी इस इंसान से मुहब्बत हो गई है, एक शादीशुदा इंसान से मुहब्बत ?’ इस सवाल से वह डर गई. ख्यालों से निकलने के लिए टीवी ऑन किया. जो चैनल खुला,  उसपर फरीदा खानम का गीत आ रहा था  –आज जाने की जिद न करो, यूं ही पहलू में बैठे रहो.
गीत वह पूरा सुन नहीं सकी. थककर आई थी, नहाने चली गई.

थोड़ी देर बार दरवाजे पर दस्तक हुई. दरवाजा खोला तो प्रतीप सामने खड़ा था. उसने पूछा अन्दर आ जाऊं, और जवाब की प्रतीक्षा किये बिना अन्दर दाखिल हो गया, ‘ दिल नहीं लग रहा था, सोचा और गुफ्तगू हो जाये.’ तबस्सुम उसके इस तरह अचानक आ जाने से असहज हो गई. असहजता को छिपाते हुए उसने उसका स्वागत किया, ‘जरूर –जरूर.’ वे दोनो काफी देर तक बातें करते रहे. बातों का सिलसिला कब उनकी रूहानी –जिस्मानी नजदीकियों पर ख़त्म हुआ, तबस्सुम समझ नहीं पाई. वह आज भी सोचती है क्या, इसके लिए वह तैयार थी, वह यह भी सोचती है क्या इसके लिए वह तैयार नहीं थी? वह आज भी यह नहीं सोचना चाहती है कि पहल किसकी थी, पहल किसने ली.


वाइफ स्वैपिंग के जमाने में हाडा रानी का अमरत्व

जब तबस्सुम मुझसे यानी कथावाचक से
मिली उस समय तक केन्द्रीय सत्ता की दृश्य और अदृश्य शक्तियां भारतीय परम्परा की पुनर्वापसी के लिए हर संभव प्रयास कर रही थी. हालांकि चुनौतियां भी कम न थी. एक ऐसे समय में जब पत्नियों की अदला –बदली करने वाले लोग समाज के कुलीन वर्ग में शुमार थे, जब देश की अदालतों ने  सेना के व्हाईट कॉलर जॉब वाले लोगों के खिलाफ इस पत्नी-प्रयोग (पत्नियों की अदला- बदली, जिसे भद्र रूप देने के लिए वाइफ स्वैपिंग शब्दावली का आवरण दिया गया था) के लिए जांच के आदेश दे दिये थे, देश की राष्ट्रभक्त सरकारें बच्चों को हाड़ा रानी की कहानी सुना रही थीं. हाड़ा रानी, यानी राजपूताने की शान. रानी, जिसने युद्ध के लिए जाते अपने पति चुडावत को अपना सिर इसलिए काट कर स्मरण –चिह्न के रूप में दे दिया था कि वह राष्ट्र के प्रति काम करते वक्त पत्नी की याद –आसक्ति में कर्तव्यच्यूत न हो जाये. ऐसी सती रानियों की कई कहानियां राजस्थान के रेगिस्तान में दर्ज हैं. पत्नियों का अनुकूलन तब से अब तक यथावत है, राष्ट्र के लिए काम करते चुडावत से लेकर राष्ट्र की सीमाओं की रक्षा में लगे आधुनिक सैनिकों तक. फर्क हुआ है तब वे सिर देती थीं अब देह. सत्ता की दृश्य -अदृश्य शक्तियां पत्नियों के बलिदान को बस अपने पुराने स्वरुप में वापस लाना चाहती थीं – इसलिए बच्चों को हाडा रानी पढ़ाया जा रहा था. राजस्थान की सरकार हाडा रानी को राजस्थान की अक्षुण्ण सांस्कृतिक चेतना बनाना चाह रही थी, राजस्थान पर से मीरा का ‘बदनुमा दाग’ मिटा देना चाहती थी. हाड़ा रानी मतलब सती स्त्री – विवाह ही बेदी पर होम होने वाली, मीरा मतलब विवाह को चुनौती देने वाली आवारा स्त्री! तबस्सुम आई थी कथा मासिक हंस में मेरी कहानी ‘इनबॉक्स में रानी सारंगा’ पढ़कर, मुझसे लड़ने, मुझसे सवाल करने. उसे लगता था कि यह क्या किया मैंने उस कहानी में, रूमी को एक के बाद एक प्रेम करते हुए दिखाया, धोखा –फरेब करते हुए दिखाया फिर भी न कोई ग्लानि और न अंतर्द्वंद्व. और तो और आख़िरी तौर पर उसे सारे पिछले प्रेम से मुक्त निर्द्वंद्व नये प्रेम के लिए आजाद कर दिया. बेटी को भी उसके साथ खडा कर दिया. आखिर क्यों नहीं, क्यों नहीं दिखा मुझे मोहित की पत्नी का दर्द या, फर्नांडिस की पत्नी का दुःख. नहीं दिखी नानू के मौन प्रश्न के भीतर की विह्वल तड़प . वह सवाल करती है कि और तो और रूमी के पति शीतांशु से ख़ास सहानुभूति भी नहीं है लेखक की, न प्रेमी मोहित से ही. ये सारे सवाल उसने आक्रोश में पूछे और गहरी पीड़ा में भी.



हुआ यूं था कि जिन दिनों उसे प्रतीप की नई घोषणा की खबर मिली थी कि वह छः महीने से प्रेम में है, और उसकी घोषणा के साथ नीलिमा नीलकेशी के चेहरे के मिश्रित भाव का बिम्ब खीचा था किसी ने, और उसे बताया था कि प्रतीप ने कब –कब और कैसे एकांत तलाशा उस शहर में नीलिमा के साथ, यह भी कि कि विदा होते वक्त प्रतीप और नीलिमा के गले लगने के अंदाज पर उपस्थित कई लोगों की निगाह गई थी, सिर्फ नीलिमा के उद्योगपति पति को छोड़कर, उन्हीं दिनों उसने ‘इनबॉक्स में रानी सारंगा’ भी पढ़ा था. इस खबर और कहानी के मिश्रित प्रभाव के पूर्व तक तबस्सुम प्रतीप के प्रति खुद को समर्पित कर चुकी थी. राजस्थान के उस छोटे शहर में आधुनिक मीरा बनना आसान नहीं था, वह भी किसी जीवित कृष्ण के प्रेम में- लेकिन तबस्सुम तो बनी ही किसी और मिट्टी की थी.

 नाट्य महोत्सव के बाद जब वे शहर लौटे थे तब  तबस्सुम को लगा कि वह नाट्यमहोत्सव की एक रात की सारी जिम्मेवारी प्रतीप पर डाल दे. लेकिन यह विचार ज्यादा देर तक नहीं टिक सका. तबस्सुम ने खुद क्या प्रतीप के प्रति अपना लगाव महसूस नहीं किया था? क्या उसके पहले अप्रत्याशित सवाल ने कि ‘कहीं सपने में..’ ने उसके भीतर से एक नए तबस्सुम को ही बाहर लाकर नहीं खडा किया था, जो इस शख्स की संजीदगी, खुशमिजाजी और मददगार व्यक्तित्व के प्रति सहज स्नेह से बिंध गई थी? आखिर क्यों नहीं लौटी वह नाट्य मंडली के अन्य सदस्यों के साथ नाटक के बाद. क्या वह खुद भी नहीं चाह रही थी प्रतीप के साथ होना –जीना !
इश्क और मुश्क छुपाये नहीं छिपते. शहर छोटा था, प्रतीप के प्रेम की खबर रिहर्सल के छोटे से कमरे से बाहर तक फ़ैली और जल्द ही उसकी पत्नी कुसुम को दस्तक दे बैठी. खबर पर यकीन होना उसके लिए नामुमकिन था. प्रतीप ने कभी उसे अहसास होने ही नहीं दिया था कि वह उससे बाहर भी …. ! कुसुम को वह खूब समय देता था, भरपूर प्यार – वह एक जिम्मेदार पति था, जिम्मेदार पिता. वह कभी –कभी सोचती कि कितना फर्क है प्रतीप और उसके पिता और दादा में- कुनबे में ही सामंती ठस्स था, राजपूताने का आन –बान –शान. यह सब प्रतीप को छू तक नहीं गया था. उसकी दो –दो सास थी – प्रतीप दो माओं का एक लाडला बेटा. उसकी सास उससे कहती, ‘ प्रतीप के सात पुश्तों से चला आ रहा है दो –दो विवाह. इस घर में सौतनें बड़े प्रेम से रहती रही हैं. वे दो होने पर खुद को खुशनसीब मानती थीं, अन्यथा इसी राजपूताने में एक जमींदार की कई –कई पत्नियों की कहानियां भी हैं.’ सास कहती, ‘ लेकिन तू तो हमसे भी ज्यादा खुशनसीब है, मेरा प्रतीप तुम्हारे सिवा किसी और की ओर देखता तक नहीं है. अब तक नहीं लाया किसी को व्याह कर तो अब क्या ?’ दूसरी सास जवाब में कहती, ‘ क्योंकर लायेगा वो किसी और को, इतनी खूबसूरत बहू है, दो –दो बच्चे जाने हैं इसने,  लेकिन देख देखो तो एकदम कंचन सी काया- सांचे में कसी देह. मैं तो बिना बच्चा पैदा किये ही ढलक गई थी जगह –जगह से. ढीली पड़ गई थी,’ ऐसा कहते हुए वे खिलखिला उठतीं.

‘ लेकिन खबर सच निकली तो…! क्या मुंह दिखायेगी अपनी सास को… ! कैसे समझाएगी खुद को,’ खबर का सच होना उसके अभिमानी मन के टुकड़े कर देने वाला था. उसने खुद को समझाया, ‘ नहीं मेरा प्रतीप, ऐसा नहीं है..’ लेकिन सच तो सच था, छोटे शहर का सच. ऐसा भी नहीं था कि तबस्सुम के आ जाने से प्रतीप के उसके प्रति व्यवहार में कोई फर्क पडा था, किसी दूसरे की उपस्थिति छू तक नहीं रही थी उसे. संयुक्त परिवार में रहते हुए वे अलग –अलग कमरों में होते थे रात को, खासकर तबसे जबसे बच्चे बड़े हो गये थे. प्रतीप का शयनकक्ष ही उसकी स्टडी भी था, जहां उसके कंप्यूटर से लेकर किताबें तक थीं. उनके अपने जिस्मानी रिश्ते अब उस बारंबारता में नहीं थे, जो शादी के शुरुआती दिनों में हुआ करते थे- और भी गम हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा. जीवन में कोई बदलाव लेकर नहीं आई थी तबस्सुम, फिर भी सच किसी न किसी रूप में उसे डंके के चोट पर अहसास दे रहा था कि सच है, जिसका सच होना कुसुम के विश्वास का टूटना था.


एक दिन उसने पूछ ही लिया उससे, ‘ क्या आपको मुहब्बत है किसी से ?’
प्रतीप चौका, ‘ नहीं तो.’
‘ सच बताइये, मुझे अच्छा ही लगेगा सच सुनकर. आपके खानदान में कोई अकेली बीबी होने का सुख हासिल नहीं कर सकी है. मैं भी तैयार हूँ किसी सौतन के लिए.’
‘ जो बात मुझे भी नहीं पता है, उसे सच या झूठ मैं क्या कहूं!’
‘ पूरे शहर के दरो –दिवार तक इस मुहब्बत के दास्तान बता रहे हैं और आप कहते हैं, आपको ही नहीं पता.’
प्रतीप बिफर गया, ‘ तुम्हें ऐसा क्यों लगता है, क्या मेरा किसी के साथ उठना –बैठना भी अब तुम्हें गवारा नहीं. सार्जनिक जीवन में हूँ लडकियां ..’
‘ लडकियां नहीं तबस्सुम कहिये…’
प्रतीप का चेहरा लाल हो गया, वह बिना बोले झटके से उठा और बाहर निकल गया. कुसुम उसके ही कमरे में बेड पर निढाल गिर गई. फूट –फूट कर रोने लगी. वहाँ कोई नहीं था, जो उसके आंसुओं को पोछ सके. उसे खुद ही चुप होना था, आंसू पोछने थे. सासों के सामने ‘अकेली बीबी’ का मान था उसे- वे जान गइं तो जाता रहेगा. बच्चों पर भी जाहिर नहीं होने देना था सबकुछ – बेटी कॉलेज जाने लगी थी, क्या सोचेगी !

वह खुद ही गई तबस्सुम से मिलने उसके कॉलेज. औपचारिक बातचीत के बाद कॉलेज की कैंटिन में कुसुम ने बात शुरू की, ‘ चाहती तो मैं फोन कर, समय लेकर आ सकती थी. लेकिन सोचा चलूँ सीधे ही चलकर मिलते हैं, बड़े चर्चे हैं आपके शहर में’
तबस्सुम चुप रही, वह इशारा समझ रही थी.
‘अच्छा अभिनय करती हैं आप…’
‘ क्या हम और कहीं चलें बात करने, यहाँ कॉलेज कैंटीन में..’
कुसुम को ध्यान आया कि वह सब्र खो रही है, पत्नी का दर्प भी. उसने सोचा,  ‘एक वाहियात लडकी के लिए, जो किसी शादीशुदा मर्द से इश्क कर रही है.’ प्रत्यक्षतः उसने कहा, ‘हां, हाँ कहीं और चलते हैं.
कॉलेज में ही एक कमरे के एकांत में उन दोनो के बीच जो संवाद हुआ, उसका मूल भाव और स्वरुप यह रहा कि तबस्सुम ज्यादातर चुप रही और कुसुम ने अंततः एक निष्कर्ष दिया कि ‘ जमींदार परिवार की बहु के रूप में वह तबस्सुम का स्वागत करने के लिए तैयार है. आखिर खानदान का चलन है तो फिर प्रतीप ही क्यों पीछे रहे.’ और  यह भी कि उस खानदान में सौतनें, ‘ एक –दूसरे से मिलकर रहती हैं, तो वह भी वही चलन निभायेगी,’ ऐसा कहते हुए उसकी आँखें डबडबाई हुई थीं, लेकिन होठों से मुसकान जाने नहीं दिया था उसने.



उसके सामने तबस्सुम इस असह्य मंजर को झेल गई और जाते ही उसी कमरे में घुटनों पर सर टिकाकर सुबकती रही. उसने प्रतीप से न मिलने का निर्णय लिया. कई संवाद भिजवाये प्रतीप ने, वह नहीं गई. यह जरूर था कि वह खुद को समझा नहीं पा रही थी कि प्रतीप से पूरी तरह अलग भी हो सकती है. मां ने इन्हीं दिनों समझाया कि उम्र निकल रही है, शादी कर ले. वह सोचती, ‘ किससे !’ ‘ प्रतीप की तरह या प्रतीप से बेहतर नहीं मिला तो …!’

एक दिन खुद प्रतीप उसके कॉलेज आ धमका, ‘ साथी हम एक जरूरी नाटक कर रहे हैं. आपके बिना पूरा नहीं हो सकता. आखिर हो क्या गया है आपको.’ उसका मन हुआ वह कह दे कि अब उसे नाटक नहीं करना है. लेकिन चुप ही रही.
‘ क्या किसी ने कुछ कहा… क्या नाटक छोड़ रही हैं आप साथी.’
वह भर्रा उठी, ‘ क्या आपको कुछ भी नहीं पता ?’
प्रतीप ने बड़े इत्मीनान से कहा, ‘ मुझे सिर्फ इतना पता है कि आपका कोई भी निर्णय ज्यादा दिन नहीं टिकने वाला. आप मेरे बिना नहीं रह सकती हैं.’
‘ सच कहते हैं आप, एकदम सच,’ तबस्सुम उसके सीने से लगकर रोने लगी. प्रतीप ने उसके बालों में हाथ फिराते हुए कहा, ‘ साथी मैं जानता हूँ कि आपका अपराधी हूँ मैं, लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि आपसे बेपनाह मुहब्बत है मुझे. लेकिन …’
‘ लेकिन क्या ..’ तबस्सुम बिफर पड़ी
‘ लेकिन छोडिये, आप आज शाम के रिहर्सल में मिल रही हैं.’

और हुआ भी यही तबस्सुम शाम को रिहर्सल के लिए पहुँच ही गई. उसने निर्णय ले लिया था, प्रतीप के बिना वह रह नहीं सकती और वह एक मानिनी पत्नी का मान रखते हुए, अपना भी मान रखते हुए एक निर्णय पर पहुँची कि आजीवन क्वांरी रहेगी. कई बार प्रतीप ने भी समझया की शादी कर लो, फिर भी हम मिलते रहेंगे. तबस्सुम ने तय किया जीवन में और भी उलझाव नहीं- वह अकेली रहेगी, प्रतीप के लिए अकेली – जीवित कृष्ण की मीरा.
इस तरह राजस्थान के उस छोटे से शहर में एक कृष्ण – एक रुक्मिणी और एक मीरा का जीवन एक सरल रेखा पर चलने लगा, जबतक प्रतीप के नये प्रेम – छः महीने वाले प्रेम की खबर वहाँ नहीं पहुँची. खबर के साथ ही एक बड़ा बदलाव हुआ, तबस्सुम ने खुद के भीतर की प्रेमिका को पत्नी में बदलते पाया. उसके भीतर रासायनिक प्रतिक्रया तीव्र हुई, शायद वैसी ही जैसी कुछ दिनों ही पहले कुसुम के भीतर हुई थी. इसके पहले तक वह अपनी ‘ मीरा वाली स्थिति के प्रति आश्वस्त थी. शायद वह नहीं समझ पाई होगी कि विवाह न करने, प्रतीप के घर दूसरी बीबी के रूप में न जाने के बावजूद प्रतीप की अपने प्रति निष्ठा के प्रति वह वैसे ही आश्वस्त होती गई थी, जैसी इसके पहले कुसुम थी. लेकिन इस खबर ने तो ….

उसके सामने एक और धमाका हुआ. एक दिन बाजार में कुसुम मिल गई. तबस्सुम उससे बच कर निकलना चाहती थी, लेकिन आगे बढ़ कर कुसुम ने ही उसे रुका. अरे, तबस्सुम कहाँ भाग रही हैं मुझसे. चलिए कोल्ड कॉफ़ी पीते हैं. तबस्सुम आवाक उसे देखती रही. कॉफ़ी पीते हुए कुसुम ने उसे बड़े इत्मीनान से बताया,
‘ तबस्सुम तुम्हें, बुरा लगेगा. लेकिन सच्चाइयां होती हैं, जैसे देखो न मेरी ही जिन्दगी में. मैं अपनी उम्र के ४०वे साल तक सोचती थी कि प्रतीप अपने खानदान के पूर्वजों की तरह नहीं है, घर में सौतन नहीं लाएगा. हालांकि उसने मेरा इतना मान तो रखा कि सौतन घर में नहीं लाया, लेकिन मैं इस हकीकत के प्रति अभ्यस्त हो गई कि इसी शहर में मेरी एक सौतन रहती है.’
‘……’
‘ मेरी ही तरह भोली और मासूम ! वैसे भी हमारे ही खानदान में एक और चलन है – दो मासूम सौतनें आपस में बिगाड़ नहीं रखतीं’ वह खिलखिला उठी.
‘…..’
‘ तुम्हें लग रहा होगा कि मैं तुम्हें चिढाने आई हूँ. लेकिन नहीं मेरी सखि, तुम तो अचानक से मिल गई. मैं तुम्हारे पास एक दिन आना चाहती थी.’
तबस्सुम को लगा कि वह फट पड़ेगी .
‘ नहीं बहन तुम्हें दुखी करने का मेरा कोई इरादा नहीं है. लेकिन सच तुम्हें जानना चाहिए. जीवन भर कई मासूम भ्रम में रहते हैं. मुझे उस दिन ही लग गया था कि मर्द ने एक बार घर से खूंटा तुड़वाया है तो वह रुकेगा नहीं. मैंने उसके व्हाट्स अप और फेसबुक मेसेज देखे हैं. वह कई नायिकाओं की तलाश में है – कई –कई नाटकों  में भूमिका के लिए. और तो और वह किसी से भी मेरे होने या तुम्हारे होने को छुपाता नहीं है. बड़े इत्मीनान से बताता है कि हम दोनों ही एक ही शहर में रहती हैं – और उससे बहुत मुहब्बत करती हैं.’

तबस्सुम को काटो तो खून नहीं. उसे याद आया कि नीलिमा नीलकेशी ने इन्हीं दिनों उससे बातचीत शुरू कर दी थी. बड़ी बहन की तरह व्यवहार करतीं. उसे समझ में आया प्रतीप का पैटर्न. तो वह सहज बनाता है अपनी नई प्रेमिकाओं को अपनी पत्नी और प्रेमिका के प्रति .. ! ‘ या हो सकता है वह हम दोनो का एक उद्दीपक की तरह इस्तेमाल करता हो, एक ही शहर में दो महिलायें किसी पुरुष पर जान दें तो वह पुरुष कुछ ख़ास होने की छवि तो ले ही लेता है . तबस्सुम को लगा कि उसे चक्कर आयेगा.

‘ बहन, मैं तो अभयस्त हो गई हूँ , समझौता कर लिया है, सिर्फ इसलिए कि मेरे अलावा किसी को व्याह कर तो नहीं ला रहा है न. हम कम-पढी लिखी स्त्रियों के लिए इसके अलावा कोई चारा भी नहीं है. इन दिनों नीलिमा नाम की कोई मेरी बड़ी बहन फोन करती हैं,’ उसकी आंखें डबडबा गयीं.
और भी बहुत कुछ कहा कुसुम ने जाने के पहले तक. जाते- जाते उसने कहा था कि ‘ हम इतिहास की हाडा रानियाँ हैं सखि, पति के लिए समर्पित !  लेकिन हमें क्या पता कि मीराओं की भी कोई विवशता होती है?’
उसके जाते ही तबस्सुम ने सोचा क्या यह मुझे चिढ़ाने आई थी … क्या यह मुझे सचेत करने आई थी ..


लोग कहे मीरा भई बावरी…. मीरा का राधा और फिर रुक्मिणी हो जाना


जिस समय ये दोनो स्त्रियाँ राजस्थान के एक शहर में मिलीं, उस समय एक बड़े राजवंश की स्त्री राजस्थान पर शासन कर रही थी. वह न मीरा थी और न हाड़ा. विवाह के साल भर के भीतर अपने पति से अलग होने का साहस रखने वाली उस स्त्री ने राजस्थान की नई पीढी को ‘हाड़ा रानी का बलिदान’ पढ़ाने में रुचि जरूर ली थी. हालांकि हाड़ा रानी पढाये जाने के इस दौर में केन्द्रीय सत्ता के द्वारा उच्च स्तर की सुरक्षा से घेर दी गई एक पत्नी जानना चाह रही थी कि उसे उसे सुरक्षा क्यों और यह भी समझना चाह रही थी कि यदि सुरक्षा किसी शीर्ष सत्ताधीश की पत्नी होने के नाते है, तो उसके हक़ –अधिकार क्यों नहीं मिलते उसे – रायसीना उससे इतनी दूर क्यों है – उसे इस सवाल का जवाब न मिलना था, न मिला – क्योंकि जवाब देने वाली एजेंसियों पर अघोषित पहरा था. उसके पड़ोसी राज्य की सीमाओं में भटकने वाली हाड़ा रानी की रूह उसे समझाना चाह रही थी कि ‘ अरी पगली तुम्हारा पति जब निकल रहा था अध्यात्म, धर्म और राज्य की सत्ता के संधान में तुम्हें छोड़कर, तो तुमने अपना सर क्यों नहीं दिया- मुझसे सीख इसके दो फायदे होते तुम्हें एक तो तुम्हें भ्रम बना रहता कि तुम्हारा पति तुम्हें याद रखता होगा और दूसरा कि तुम अमर हो गई होती, मेरी तरह. सत्ता की शीर्ष पर बैठा तुम्हारा पति सार्वजनिक स्थलों पर रोता तुम्हारे लिए, करवा चौथ के दिन रखता उपवास तुम्हारे लिए.’ उन्हीं दिनों बॉलीवुड का एक चर्चित जोड़ा- पिछले कई वर्षों से आदर्श पति –पत्नी के रूम में ख्याति में बंधा जोड़ा,  अलग हो गया- पत्नी को प्यार हुआ एक सह अभिनेता से और बाद में पति को भी. यानी यह वह दौर था, जब विवाह टूटने और विवाह को किसी तरह बनाये रखने की जद्दोजहद समाज के सहजबोध में शामिल था.
इसी समय के टुकड़े पर इस कहानी की नायिका, या नायिकाओं में से तबस्सुम मुझसे मिलने आई थी- मेरी कहानी ‘इनबॉक्स में रानी सारंगा’ पढ़कर. मुझसे मिलने के कुछ दिन पहले ही बाजार में मिली थी कुसुम उससे.
वह मुझ पर बिफरी, ‘ क्यों ऐसी महिलाओं का कोई लगाम नहीं होता, क्यों रूमी को निर्द्वन्द्व बहने दिया आपने.. !

मैंने उसे सहज करते हुए कहा, ‘ रूमी प्यार करने के लिए ही बनी थी, उसने प्रेम विवाह किया था, सफल प्रेम जीवन जिया, लेकिन प्रेम तटबंधों को तोड़ता है, एक समय आकर वह टूटा और वह नदी की तरह बही –क्योंकि प्रेम करने में उसे कोई कुंठा महसूस नहीं होती थी.’
‘ यह ख्याली इमेज है उसका आपके मन में, कई बार मुझे भी लगा कि कहीं मोहित कथाकार ही तो नहीं है, जिसने एक इमेज बना रखा है रूमी का, अपनी इमेज में कैद रूमी का मनचाहा व्यक्तित्व गढ़ रहा है. अन्यथा यह बाताइये कि क्या प्रेम एक वक्त में ईमानदारी नहीं मांगता..’
‘ लेकिन ..’
‘आप बिलकुल न समझें कि मैं किसी एक प्रेम में बंधने की हिमायत लेकर आपसे मिलने आई हूँ, लेकिन मुझे लगता है कि कम से कम आप जिस वक्त जिस प्रेम में हैं उस वक्त उस प्रेम के प्रति ईमानदार हों.’
‘ क्या प्रेम शर्तों पर निर्धारित होता है…. हर प्रेम के अपने किस्से हैं, हर प्रेम की अपनी तासीर….’
‘ प्रेम की एक कहानी मेरे पास भी है,’ वह बेचैनी से टहलने लगी.
मैंने निरपेक्ष भाव में कहा, ‘ सुना डालिये… देखूं इस प्रेम की तासीर क्या है ?’
तबस्सुम की पूरी कहानी सुनकर मैंने सोचा कि इस मीरा के भीतर रुक्मिणी ने सिर उठाया है. वह इस कथा –प्रसंग के साथ कई बार भावुक हुई, कई बार आक्रोश में आई. मैंने उसे उसकी कहानी के प्रभाव से निकालना चाहा.

मैंने उसे फिर से अपनी कहानी की बहसों में लाना चाहा, ‘ अच्छा यह बताइये आप क्या चाहती थीं आप , मैं अपनी कहानी की नायिका रूमी को किसी ग्लानी से भर देता या सन्यास के लिए प्रेरित करता.’
‘ फर्नांडिस या मोहित तक तो ठहर सकती थी वह !’
‘ क्या प्रतीप ठहर जायेगा !.. यदि नहीं तो रूमी ही क्यों ठहरे भला.’
‘ लेकिन ..’
‘ कहीं नीलिमा में रूमी तो नहीं देख रही हैं आप,’ मैंने सवाल किया. फिर कहा, ‘ तबस्सुम आप अपने ही सवालों से घिर रही हैं, वही परेशान कर रहा है आपको … ! आप अनिर्णय की स्थिति में हैं.’
‘ कैसा अनिर्णय ? ‘
‘ आपकी कहानी की तबस्सुम क्या करने वाली हैं, सच जानकार.’
वह चुप रही
‘क्या आपकी तबस्सुम सती होगी अपने प्रिय के इमेज के साथ, जो उसने बनाई थी. या वह मुकदमा करेगी अपने यौन उत्पीडन का.’
‘…..’
‘ प्रतीप गतिमान है, तबस्सुम का क्या होगा, क्या चिर क्वांरी तबस्सुम …..’
‘ वह जाएगा कहाँ, लौटकर अपने ही शहर आयेगा, उसका आख़िरी ठौर अपना शहर, अपना घर और अपनी नाटक मंडली है’ वह बिदक गई थी.
‘ आप कोई आदर्श और आधुनिक बोध का बखान नहीं कर रही हैं. हमारी परम्परा राधाओं का है, 18 हजार पटरानियों वाले कृष्ण के लिए समर्पित राधा.’
‘ मैंने उसे समग्रता में प्यार किया है, उसकी अच्छाइयों-बुराइयों के साथ,’ जाने के लिए उठी वह.
‘ मैं अगली बार आपके शहर आ रहा हूँ, एक कथा गोष्ठी में.’ मैंने विदा दिया और सोचा मैं तबस्सुम को नहीं कुसुम को विदा कर रहा हूँ – मीरा को नहीं राधा को विदा कर रहा हूँ.
नानू ने आखिर में मुझसे पूछा, ‘ इतना निरीह क्यों है आपकी कुसुम और तबस्सुम. क्या कुसुम और तबस्सुम के लिए प्यार के और मौके और पात्र नहीं हैं..’
मैंने कहा, ‘ नानू, मैं यथार्थ की कहानी कह रहा हूँ, कोई कल्पना नहीं.’

इस बार कथा पूरी होने के बाद कथावाचक ने बैताल की तरह प्रश्न किया, ‘ तो हे मेरी मीठी नानू, इस कहानी में कौन किससे धोखा कर रहा है, प्रतीप कुसुम और तबस्सुम से, नीलिमा अपने पति, कुसुम और तबस्सुम से , तबस्सुम कुसुम से या कुसुम खुद से और तबस्सुम भी खुद से ! विक्रम की तरह नानू आदतन मजबूर नहीं थी मुंह खोलने को इसलिए उसने कुछ नहीं कहा. मैं जानता हूँ कि वह क्या सोच रही थी उस वक्त …. !

उस वक्त वह श्रोता नहीं कथावाचक होना चाह रही थी, वह चाह रही थी परकाया प्रवेश. वह चाह रही थी कि कथावाचक के पास से लौटकर तबस्सुम फूट –फूट कर रोये नहीं. वह चाह रही थी कि तबस्सुम उसी शहर में ऐसी स्थितियां पैदा करे कि कोई ‘ प्रतीप’ किसी ‘तब्बसुम’ को तब्बसुम न बना पाये अगली बार और यह भी कि वह ‘ कुसुम को खींच लाये अपनी सासों की परम्परा से. वह नहीं जानती नीलिमा का निर्णय, लेकिन वह चाहती है उसकी कहानी की नीलिमा को वह ग्लानि, क्षोभ और संताप से भर दे – दिल बहलाने को ‘ग़ालिब’ ख्याल ये अच्छा है. यथार्थ ऐसा था नहीं और नानू इस वक्त श्रोता थी, कथावाचक नहीं…! शायद फिर कभी, फिर कभी ऐसा हो कि नानू बैताल की तरह विक्रम के कंधे पर हो और सुना रही हो कथा, ‘वाल्मीकि’ , ‘वेदव्यास’ से लेकर लल्लू लाल मिश्र तक को और हाँ इस कथावाचक को भी.

संवेद के अंक 106 (भूमंडलीकरण के दौर में हिन्दी कहानी) में प्रकाशित 

संजीव चंदन (25 नवंबर 1977) : प्रकाशन संस्था व समाजकर्मी समूह ‘द मार्जनालाइज्ड’ के प्रमुख संजीव चंदन चर्चित पत्रिका ‘स्त्रीकाल’(अनियतकालीन व वेबपोर्टल) के संपादक भी हैं। श्री चंदन अपने स्त्रीवादी-आंबेडकरवादी लेखन के लिए जाने जाते हैं। स्त्री मुद्दों पर उनके द्वारा संपादित पुस्तक ‘चौखट पर स्त्री (2014) प्रकाशित है तथा उनका कहानी संग्रह ‘546वीं सीट की स्त्री’ प्रकाश्य है। 


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गुजरात दंगों में साहब कौन थे और क्या कर रहे थे बताने वाली किताब अब हिन्दी में/अग्रिम बुकिंग शुरू



राजीव सुमन 

राणा अयूब की यह किताब  गुजरात दंगे की भीतरी परत के पीछे के सच को नंगा करती है एकदम जासूसी उपन्यास के अंदाज़ में–रोमांच भय और अविश्वसनीय। लेकिन उतनी ही प्रमाणिक। एक अमरीकी फिल्मकार और संस्था से जुडी मैथिली  त्यागी के छद्म रूप में की गई खोजी पत्रकारिता की निर्भीक मिसाल  पेश करती राणा अयूब ने उस सच को जनता के सामने लाने का काम किया है जो लोकतंत्र के इतिहास में किये गए सबसे अमानवीय और घृणित कार्यों में था,  जो स्वयं सरकार और सरकारी मशीनरी की स्पष्ट संलिप्तता को हमारे सामने लाती है। मैं जब गुजरात फाइल्स पढ़ रहा था तो कई भाव एक साथ आपस में गुत्थमगुत्था थे, समझ में नहीं आ रहा था कि बेबसी क्या और किस हद तक हो सकती है और व्यक्ति कितना धीर गंभीर दिखने के बावजूद कितना अमानवीय  हो सकता है!

पुलिस थाने का वह दृश्य बार-बार जीवित हो रहा था जब किसी बड़े अधिकारी के पास फोन आया कि जिन दो लोगों(मुसलमानो) को पकडे हो, उड़ा दो। लेकिन उस अधिकारी को सैल्यूट करने का मन हो आया जिसने प्रतिवाद करते हुए कहा कि मैंने इन दोनो से पूछताछ की है और पाया कि ये दंगे शांत करा रहे थे। उधर से कहा गया कि ‘साहब’ का आदेश है। (फोन करनेवाला अब भी साहब का खास है।) इस आदेश के बावजूद भी उस पुलिस अधिकारी ने उन्हें छोड़ दिया।  पूरी किताब में इस इक्का दुक्का उदाहरण के विपरीत वृतांतों से भरे-पड़े हैं। कई बड़े अधिकारियो का पश्चाताप, आत्म स्वीकृतियां- भले ही कई सालों बाद आई, किसी के अपने  इकलौते बेटे की असामयिक मौत के बाद ही सही.  भारत के लोगों के सामने यह नंगा सच लाने के लिए राणा अयूब को सैल्यूट ! गुजरात फाइल्स किताब अब गुलमोहर प्रकाशन ने हिन्दी में प्रकाशित की है.

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राना अय्यूब की मशहूर किताब
‘गुजरात फाइल्स’ अब हिंदी में
विमोचन और बातचीत
16 सितंबर, दोपहर- 3.30 बजे
प्रेस क्लब, रायसीना रोड, नई दिल्ली
आप सब सादर आमंत्रित हैं।
निवेदक- गुलमोहर किताब

प्रकाशक ‘गुलमोहर किताब’ ने  295 रुपये की ये किताब अग्रिम बुकिंग में 200 रुपये में देने की बात कही है। पैसा गुलमोहर किताब के बैंक खाते में जमा कराके उसकी सूचना ई-मेल, व्हाट्स-एप या एसएमएस द्वारा अवश्य दें। 
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GULMOHAR KITAB
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