लापता लड़की

अरविंद जैन
स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने महत्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब 'औरत होने की सजा' हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
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कहानी तो बस इतनी ही है कि वह लड़की घर लौटने के बाद, सारी रात सपनों का सफेद स्वेटर बुनती और सारा दिन दफ्तर में ऊंघते-ऊंघते उधेड़ती रहती। इस उधेड़बुन में उसे यह पता ही नहीं चला कि उसने कब मेंहदी हाथों में रचाने की बजाए, बालों में लगानी शुरू कर दी थी।

कहानी के इस कंकाल में मुझे सिर्फ लड़की का ‘बायोडॉटा’ भरना है। मांस (गोरा या काला) और खून, (उच्च, मध्यम या निम्न) आवश्यकतानुसार भरा या बदला जा सकता है। अगर रंगभेद न करना चाहें तो मान लें कि वह एक सांवली लड़की थी मगर दिखने में आकर्षक नैन-नक्श वाली (बदसूरत नायिका का साहित्य में क्या काम)। जब तक वर्गविहीन समाज की स्थापना हो, तब तक इसे मध्यवर्गीय परिवार की लड़की समझ लेते हैं। धर्म (हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई) कुछ भी हो, शादी के बाद पतिधर्म में विलीन हो जाएगा। इसलिए लड़की के पिता हिन्दू और मां मुस्लिम थी। खुद न मंदिर जाती है न मस्जिद। जन्म जिस गांव में हुआ था वह न जाने कब ‘डूब’ गया? शिक्षा-दीक्षा कस्बे में हुई और फिर कस्बे की लड़की राजधानी पहुंच गई। (लिफ्ट लेते-लेते।)
लड़कियों (औरतों) के अपने घर भी कहां होते हैं? वह तो अक्सर पिता या पति (और उनके मर्द वारिसों) का ही होता है न। इस लड़की का घर तो न पिता का है और न पति का- किराए का है। सपने बुन-बुन उधेड़ती रहती है लड़की। सपने बुनेगी तो उधेड़ने भी पड़ेंगे। दफ्तर-सरकारी, गैर सरकारी, अखबार, एड एजेंसी, ट्रेवल एजेन्ट, प्रॉपर्टी डीलर या शेयर ब्रोकर कोई भी हो सकता है और दफ्तरों में ऊंघती ही हैं लड़कियां (लड़के भी)। ब्याही हों या अनब्याही-क्या फर्क पड़ता है?

ओह! लड़की का नामकरण संस्कार तो रह ही गया। कुछ भी रख लो फ़रहा शर्मा या सावित्री खान। पसंद नहीं तो आकांक्षा या मुक्ता या फिर सभी नामों के बीच उर्फ भी लगाया जा सकता है। वैसे भी लड़की बदलती रही है नाम, घर, धर्म, नौकरियां, संबंध, सपने, शहर, देश-हर बार घर की कैद से भागने की कहानी के बाद। जब-जब भागी है लड़की जिंदगी के घुन लगे फ्रेम और परंपरा की चौखट तोड़कर, तब-तब कुछ दिनों के हल्ले और भागदौड़ के बाद फिर से पकड़ी गयी है। (जिंदा या मुर्दा) दरअसल घर से भागी लड़कियां फौरन पहचान ली जाती हैं और नायक (खलनायक) अक्सर भाग खड़ा होता है।

नौकरी की तलाश में राजधानी पहुंची इस लड़की को हॉस्टल में कैसे जगह मिली, वह मैं ही जानता हूँ। यहां सभी लड़कियां (ज्यादातर) चिरकुंआरी, तलाकशुदा या विधवा। हर एक का तथ्य और सत्य मिलता-जुलता-सा। ऐसी ही लड़कियों के लिए बने हैं हॉस्टल और हॉस्टल में जीवन भी ऐसी ही लड़कियों से है। लड़कियों को लगता है जैसे हॉस्टल घर और घर हॉस्टल बन गया है।



वह सुबह निकलती नहा-धो और नाश्ता करके दफ्तर। कभी-कभी पैदल ही। सारे रास्ते सिगरेट फूंकते हुए और अपने आप से बात करते हुए। पीछे मुड़कर वह कभी देखती ही नहीं थी। शाम को पढ़ने या पढ़ाने जाती और रात देर गए लौटती तो कमरा नम्बर 69 में मेज पर ठंडा खाना रखा होता... कभी खुद खा लेती और कभी कुत्तों को खिला देती। बहुत दिनों तक तो उसे समझ ही नहीं आया कि लड़कियां उसे मिस सिक्स्टी नाइन क्यों कहती हैं। और जब पता लगा तो वह ऐसे बेहूदा आरोपों से परेशान हो उठी। कमरे का नम्बर तो कुछ समय बाद बदल गया लेकिन उसे अभी लगता था जैसे ‘सिक्स्टी नाइन’ का बिल्ला उसकी देह पर चिपक गया है। ठीक वैसे ही जैसे कॉलेज के दिनों में ‘टच-मी-नॉट’ का स्टीकर चिपक गया था।

स्लीपिंग पार्टनर

वहीं रहते हुए रात-रात भर जाग कर उसने ‘सैकेंड सेक्स’ से लेकर ‘सेक्स” और “मदर’ और “सूटेबल ब्यॉय” तक पर चिंतन किया (और चिंता भी)। फिल्म और नाटक देखने बहुत दूर नहीं जाना पड़ता था। हां। कभी-कभार किसी गोष्ठी, सेमिनार या चित्र प्रदर्शनी में चली जाती और इसी बहाने थोड़ा बहुत पी.आर. हो जाता। “डेंटिंग पेंटिंग” के लिए ‘ब्यूटी पार्लर’ जाना उसका साप्ताहिक कार्यक्रम था।

कभी-कभी उसे नींद आती ही नहीं थी, बिना नींद की गोलियां खाए और गोलियां वह तब खाती थी जब भीतर अंधेरा बाहर से ज्यादा गहरा और भयावह हो जाता था। नींद में वह भटकती थी यहां, वहां न जाने कहां-कहां? नहीं मालूम वह कब सोती और कब जागती थी। उसे लगने लगा था जैसे रात को बिल्लियां नहीं, सपने में रोती हैं लड़कियां या शायद वह स्वयं।

दफ्तर में उसका काम था बॉस की बीवी का शोध ग्रंथ टाइप करना, कागजों पर ठप्पा लगाना, टेलीफोन के नम्बर घुमाना, शाम को हर कागज पर बॉस की घुग्घी मरवाना और खाली समय लायब्रेरी में पत्र-पत्रिकाओं के पन्ने पलटना। जब कभी किसी बड़ी कम्पनी के विज्ञापन में  सूट-बूट और टाई पहने आदमी के धड़ पर भेडि़ए या रीछ का चेहरा देखती तो मुंह से निकलता, ‘‘ओह! माई बॉस।’’ और वह सामने दीवार पर लगे किसी एक घोड़े पर बैठ भाग खड़ी होती। सूरज डूबने से पहले घोड़ा उसे हॉस्टल पटकता और वापस दीवार पर आ चिपकता। सुबह होश आता तो अखबार बताता कि कल इसके साथ बलात्कार हुआ और उसका उपहरण, इसने आत्महत्या कर ली और उसने हत्या। पहले चाय कुछ कड़वी लगती और फिर सोचती, चलो, मैं तो बच गई खबर बनते-बनते।’

धीरे-धीरे उसे समझ आने लगी राजधानी। उसे लगता अब यहां इतने बड़े शहर में किसको किसकी परवाह है? न तालाब में डूबी लड़कियों की चिंता और न ‘स्टोव फटने से जलकर मरी बहुओं की। कुछ भी हो जाए आंखों के सामने घटना या दुर्घटना-हमने कुछ नहीं देखा जी (कौन करता फिरेगा कोर्ट-कचहरी?)। यहां किसी को नहीं आती महीनों बगल में बंद मकान के अंदर सड़ती लाशों की दुर्गन्ध। मगर किसी भी लड़की के व्यक्तिगत (प्रेम) संबंधों की खबर फौरन फैक्स हो जाती है।

फिर एक दिन अचानक लड़की ने सोचा और फैसला कर लिया कि वह अब और नहीं रहेगी हॉस्टल में।
लड़की नहीं रहना चाहती हॉस्टल में या हॉस्टल छोड़ किराए के मकान में एक सरदार (दंगों के बाद से क्लीन शेव्ड ) के साथ रहना चाहती है। शायद अब वह भी मां बनना चाहती है। मां।



क्या हुआ? आप नाक-भौं क्यों सिकोड़ रहे हैं? अच्छा। अच्छा। सरदार जी के साथ बिना सात फेरे लिए कैसे रह सकती है? यही ऐतराज है न आपको? पर इसका तर्क यह हो सकता है भाई दोनों एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, ‘दे वांट टु लिव टु गेदर।’ सरदार जी के पहले सात फेरों को अभी तलाक की डिक्री मिली नहीं है। अदालत में पांच साल से तारीख पड़ रही है और पता नहीं कब तक पड़ती रहेगी। अकेली लड़की को कोई तो ‘बहादुर’ सुरक्षा गार्ड चाहिए न। बाहर अकेली लड़की कैसे रह सकती है? क्यों बिलावजह पुलिस रिकार्ड में एक और ‘अवार्ड’ बढ़ाना चाहते हो?

नहीं...लगता है आपको लड़की का इस तरह (बिना सात फेरे) सरदार जो (या किसी और) के साथ रहना नैतिक नहीं लग रहा। आगे खतरा नजर आ रहा है कि ऐसे साथ रहेगी तो गर्भ, गर्भपात, बच्चा (हरामी)... नहीं, कहानी खतरे की सीमा रेखा से बाहर जा रही है और नायिका नारी फ्रेम में फिट नहीं हो रही। शहर में दंगा-फसाद पहले थोड़ा हो चुका है।

यस पापा

चलिए, मान लेते हैं, नहीं रहेगी लड़की सरदार जी के साथ। पर अब क्या करें? हॉस्टल में रहना नहीं चाहती और सरदार जी के साथ आप रहने नहीं देना चाहते। आपको ही सौंप देता हूँ।
‘ऐ लड़की। सुनो, अब से तुम इन पाठक (जी) के साथ रहोगी...ठीक।
पाठक (जी) के साथ भेज दी लड़की। एक बार तो मैंने भी राहत महसूस की। चलो ‘आफत’ टली। ऐसी शिक्षित और स्वावलंबी लड़की को संभालना जेब में हरदम टाइम बम लिए घूमने जैसा है।

मैंने सोचा भी नहीं था कि एक दिन लौटेगी लड़की। पर कुछ ही दिनों बाद लड़की सचमुच लौट आई। मुझे देखते ही सुबक-सुबक कर ऐसे रोने लगी जैसे ससुराल वालों ने और दहेज लाने के लिए मारपीट कर घर से निकाल दिया हो। पूछा तो कहने लगी, ‘‘कहां भेज दिया आपने मुझे? वो तो सारा दिन पूछता है, “इसके पीछे क्या है? और उसके पीछे क्या है?” “नीली फिल्में” देखता है और “गर्म पत्रिकाएं” पढ़ता है। हर वक्त मुझे ऐसे देखता है जैसे फाड़ खाएगा। वह तो सिर्फ मेरे प्रेम-प्रसंगों और सहवास वर्णनों को ही कंठस्थ करने में लगा रहता है। बाहर लोगों के सामने मुझे ‘बदचलन’, ‘चरित्रहीन’ और ‘कुलटा’ कह कर बदनाम करता है और आप पर अश्लीलता का इलजाम लगाता है। कहता है ‘सैकेंड हैंड हूँ, पहले आपने खुद... और अब मुझे परोस दिया।’’ नहीं, मैं नहीं रह सकती अब और उसके पास। आप मुझे वापस बुला लो प्लीज। मैं अभी और जीना चाहती हूँ।’’

सुनते-सुनते जी मैं आया कि नींद की गोलियां खाकर सो जाऊं या फिर सारे कागद (कारे) फाड़ कर रद्दी की टोकरी में फेंक दूँ। भाड़ में जाए लड़की और लड़की की कहानी। बाकी सारे पात्र भी भगा दिए। अब कहां से ढूढ़ कर लाऊंगा? नहीं, मुझे और बहुत से जरूरी काम करने हैं। मैंने अपना पीछा छुड़ाना चाहा। मगर वह जिद्दी लड़की मानने को तैयार ही न हो।
‘‘अच्छा, बाबा अच्छा। मैं अभी तुम्हारा इंतजाम करता हूँ’’ कहते हुए टेलीफोन के बटन दबाने लगा।
‘‘हैलो। प्रकाश मैं बोल रहा हूँ। क्या हो रहा है? यार, वो लड़की फिर वापस आ गई। क्या करूं। बड़ी मुसीबत में हूँ। मैंने तो पहले ही कहा था कि मेरे बस की नहीं है कहानी-वहानी।... नहीं यार। वह ‘अच्छी लड़की है’ बहुत अच्छी लड़की... नहीं...नहीं यार। उसे भी तुम्हीं ‘एडॉप्ट’ कर लो... अच्छा... जल्दी आना प्लीज।’’
फोन रखा तो लड़की का भाषण शुरू- ‘‘नहीं जाऊंगी, अब किसी के भी साथ, कहीं भी। आपने पैदा किया है तो भुगती भी आप ही। क्या समझते हो मुझे... जब चाहा पैदा किया, जैसा बनाना चाहा बना दिया। नहीं संभाल पाए तो  बेसहारा छोड़कर भाग गए या किसी और के हाथों मरवा दिया। नहीं, मैं आपको यूँ न भागने दूँगी और न किसी हादसे में मरवाने।’’
मैं झल्लाया मन ही मन- ‘मैंने भी क्या मुसीबत गले डाल ली।’’

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शाम को पार्टी में एक और दोस्त से सलाह ली तो बोले, ‘‘अरे, इसमें क्या मुसीबत है? समझा-बुझा कर भेज दो प्रकाश के साथ... कुछ दिन बाद खुद ही वापस आ जाएगी और कहेगी कि वो तो मुझे ‘मझधार किनारे’ या बीच सड़क पर छोड़ कर भाग गया। फिर कुछ दिन अपने साथ रहने दो। रह पाएगी तो रह लेगी, नहीं तो तुम्हारे यहां से भी अपने आप चली जाएगी। सबको देखने के बाद ही शायद वह स्वयं अपना रास्ता तलाश पाएगी। इससे अधिक भला तुम और कर भी क्या सकते हो?’’
मैंने कुछ कहना चाहा तो बोले, ‘अपने को एक्सपोज’ करने में डर लगता है? डरो मत... होने दो कहानी को पूरा... और कोई रास्ता भी नहीं है।’’
वापस लौटा तो नशे में बुरी हालत थी और लड़की प्रतीक्षा करते-करते सो गई थी। सारी रात यूँ लगा जैसे दोनों दौड़ रहे हैं। कभी वो आगे और कभी मैं। दौड़ते-दौड़ते में एकदम निढाल हो गिर पड़ता हूं और वो न जाने कितनी दूर तक दौड़ती रहती है। आंख खुली तो लड़की नहीं थी। शायद समझ गई होगी सारी कहानी

सामने नजर पड़ी तो दीवार पर लगे कैलेंडर में लड़की, वही लड़की घोड़े पर बैठी मुस्कुरा रही थी।



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