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रेखा का खत अमिताभ बच्चन के नाम (!): काश, तुम्हारी जिंदगी लंबी के साथ बड़ी भी होती ?

आज तुम्हारा जन्मदिन है अमित
मुबारक हो

जीवन में कुछ इच्छाएं अधूरी रह जाएं, कुछ हसरतें पूरी न हो पाएं तो जीने की ललक बनी रहती है। हमने जो वक्त साथ बिताया उसे याद करती हूं तो आज के अमिताभ में उस पहले अमित को खोज नहीं पाती हूं। तुम हमेशा पॉलिटिकली करेक्ट बने रहे और मैं..मुझ पर से तुम्हारा नशा जब तक उतरा बहुत देर हो चुकी थी अमिताभ।

कल मेरा जन्मदिन था और आज तुम्हारा है। इस तरह नियति ने हमारा साथ सुनिश्चित किया। यह बात अलग है कि मेरे और तुम्हारे दोनों के जन्मदिन पर हमारा वह रिश्ता सुर्खियां बनता है जिसे तुम न तो कभी स्वीकार कर सके न नकार सके। सिलसिला फिल्म में आखिरी बार साथ में फिल्म किए हुए साढ़े तीन दशक बीत चुके हैं। लेकिन हमारा जिक्र एक साथ आज भी ऐसे आता है जैसे कल ही की बात हो।

तुम्हें तो याद भी नहीं होगा कि शुरुआती दौर में हमारे रिश्ते को अखबार किस तरह याद किया करते थे? वे कहते थे कि मोटी-काली और भद्दी रेखा पर अमिताभ का साथ मिलते ही निखार आ गया। यह किसी ने नहीं बताया कि यह कैसे होता है? मेरे नैसर्गिक साहस को तुम्हारे प्यार से जुड़ी बोल्डनेस करार दिया गया। मेरी अभिनय क्षमता को तुम्हारे नाम से जोड़कर उसे मेरी किस्मत का नाम दिया गया।



     फैंड्री : एक पत्थर जो हमारे सवर्ण जातिवादी दिलों में धंस गया है

आज चार दशक बाद भी हालात रत्ती भर भी नहीं बदले हैं। तुम्हें पता है आज एक वेबसाइट ने क्या लिखा है, ‘अमिताभ पर अपने हुस्न का जादू चलवाने के लिए रेखा ने खुद को पूरी तरह बदल दिया था। बतौर अभिनेत्री पहली हिंदी फिल्म ‘सावन भादो’ में मोटी सी दिखने वाली रेखा, अमिताभ से प्यार के बाद काफी बोल्ड दिखने लगी थीं। ‘

क्या यह सबकुछ तुम्हारी वजह से था अमित? मेरी दशकों की खुद्दारी, मेरी मेहनत का श्रेय मैं किसी और को नहीं लेने दूंगी। इतने दशकों तक यह अपमान-बदनामी और व्यंग्यात्मक सवालिया निगाहों का सामना करती हुई अपना वजूद कायम रखने में कामयाब रही तो केवल और केवल अपनी वजह से। मैं इस पत्र के माध्यम से ऐसा सोच रखने वाले हर शख्स को बताना चाहती हूं कि सन 1972 में जब मैंने 18 वर्ष की उम्र में मुंबई में अपना पहला फ्लैट खरीदा था तब तक मैं तुमसे मिली भी नहीं थी। वह दिन है और आज का दिन है। रेखा ने जो भी हासिल किया अपनी मेहनत और काबिलियत से।

मैंने चार शादियां की, मैं तुम्हारे नाम का सिंदूर लगाती हूं, मेरे पति ने आत्महत्या कर ली क्योंकि मैंने कभी उसे पति का दर्जा नहीं दिया। हर कोई जानता है कि इन बातों में कोई सच्चाई नहीं लेकिन चटखारे लेने का मौका कोई क्यों गंवाएगा?

रिश्ते में तो हम दोनों थे अमिताभ! फिर हमेशा मुझे ही विलेन के तौर पर क्यों पेश किया गया? क्या मैं तुम्हारा घर तोड़ रही थी? क्या यह एकतरफा रिश्ता था? मैंने कभी तुम्हारे बारे में कहा था कि एक गुलाब हमेशा गुलाब ही रहता है उसे चाहे किसी भी नाम से पुकारो। मुझे तुम्हारी ईमानदारी, सत्यनिष्ठ पर नाज था लेकिन 2004 में एक साक्षात्कार में यह कहकर तुमने मुझे बहुत बड़ा झटका दिया था कि मैं तुम्हारी सिर्फ सह-कलाकार रही। यह भी कि मेरा तुम्हारा कभी इसके अलावा कोई रिश्ता नहीं रहा।

 सावधान ! यहाँ बुर्के में लिपस्टिक भी है और जन्नत के लिप्स का आनंद लेती उषा की अधेड़ जवानी भी

तुम जानते हो हमारे रिश्ते से मेरी कोई उम्मीद जुड़ी नहीं थी। मुझे बस तुम्हारा साथ अच्छा लगता था। वह भी कुछ ही दिन का था। जैसा कि मैंने ऊपर कहा मेरे जीवन में तुम प्रेम की तरह आये लेकिन एक बुरे ग्रह की तरह तुम्हारा साया मेरे जीवन की हर अच्छी बुरी बात पर पड़ गया।  वह कहावत तो सुनी ही होगी तुमने कि आदमी की जिंदगी लंबी नहीं बड़ी होनी चाहिए। बढ़ती उम्र के साथ तुम्हारा कद लगातार छोटा होता जा रहा है अमिताभ। क्या तुम्हें इस बात का अहसास है? आज तुम्हारा 75वां जन्मदिन है  ईश्वर से मैं  यह कामना करना चाहती हूं कि तुम्हें जिंदगी में थोड़ी खुद्दारी अता फरमाए।

(अमिताभ के नाम रेखा का वह खत जो कभी लिखा ही नहीं गया)
यह काल्पनिक खत पत्रकार पूजा सिंह ने लिखा है. पूजा अपने स्त्रीवादी तेवर और हस्तक्षेप करती रपटों के लिए जानी जाती हैं. 

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वह आईएएस की पत्नी नहीं निर्वाचित मुखिया हैं, महिला-नेतृत्व की मिसाल

एक सक्रिय, सक्षम मुखिया ऋतु जयसवाल का आईएएस की पत्नी के रूप में ख़बरों की सुर्खियाँ बनना क्या एक उदाहरण है समाज और मीडिया में गहरे पैठे पुरुष मानसिकता का? ऋतु जयसवाल के काम, उनकी प्रतिभा, काम के प्रति समर्पण और राजनीतिक क्षमता को  आईएएस की पत्नी होने तक सीमित करती खबरें क्या कहना करना चाहती हैं? बिहार सहित कई राज्यों में ‘मुखियापति’, ‘सरपंच पति’ का अस्तित्व और महिला मुखिया के काम में उनकी दखल जिस मनोविज्ञान की परिघटना है क्या उससे इतर कोई मनोविज्ञान इन खबरों के प्रस्तोताओं का है? आइये समझते हैं ऋतु जयसवाल क्यों महिला नेतृत्व के लिए एक उदाहरण हैं, वे स्वयं एक खबर हैं अपनी वैवाहिक स्थिति और स्टेटस से अलग: 


अर्थशास्त्र में स्नातक ऋतु जयसवाल ने दिल्ली में होममेकर की अपनी सफल जिन्दगी से शिफ्ट लेते हुए 2014 में सीतामढी की  सिंहवाहिनी पंचायत में सामाजिक गतिविधियाँ शुरू की, जिसे वे इस इलाके की बदहाल सूरत को देखते हुए लिया गया निर्णय बताती हैं. उनका दावा है कि उनके ही प्रयासों से आजादी के बाद ‘नरकटिया’ गाँव में बिजली आयी. इसके अलावा उन्होंने सामाजिक जागृति कार्यक्रमों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, शैक्षणिक सेमिनारों के जरिये इस इलाके के प्रति अपने स्वप्न से लोगों को जोड़ना शुरू किया. जल्द ही 2016 में वे सिंहवाहिनी पंचायत की मुखिया चुनी गयीं. इस तरह दिल्ली में अपेक्षाकृत सुविधाजनक जिन्दगी को छोड़कर अपने बल पर कुछ करने की जिद्द के साथ वे उन्होंने पंचायत में नियमित और जिम्मेदारीपूर्वक अपेक्षाकृत कठिन जीवन का चुनाव किया.

बदल रही हैं पंचायत की सूरत 
मुखिया बनने के पूर्व और उसके बाद ऋतु जायसवाल ने इस पंचायात की बुनियादी सुविधाओं परा अपना ध्यान दिया, बिजली, शौचालय सड़क जैसे इंफ्रास्ट्रक्चरल विकास पर पहल लेने के अतिरिकित शिक्षा उनकी प्राथमिकताओं में है. स्त्रीकाल से बात करते हुए वे कहती हैं, ‘ यहाँ के लगभग 85% लोग शौचालय के लिए बाहर जाते रहे हैं. हमने 2100 से ज्यादा शौचालय अपनी पंचायत में अभी तक बनवाये हैं.’ ऋतु कहती हैं कि शिक्षा उनकी बड़ी प्राथमिकताओं में है और वे उसपर विशेष ध्यान देती हैं. वे स्वयं बच्चों को अपने स्तर पर पढवा रही हैं. वे कहती हैं कि ‘यहाँ दलितों की, खासकर मुसहर जाति की आबादी सबसे ज्यादा है. यह समुदाय बमुश्किल अपने लिए दो जून की रोटी जुटा पाता है. मूलतः खेत मजदूर और अन्य रूपों में मजदूर इस समुदाय के बच्चों को स्कूल तक पहुँचना बहुत मुश्किल काम है. इस काम के लिए हमने 12 लड़कियों की एक टीम बनाई है. उन्हें भी प्रशिक्षित किया गया है, सिलाई, बिनाई और ब्यूटीशियन, तथा कम्प्यूटर के कोर्स सीख रही हैं वे. उन्होंने और हमने बड़ी मुश्किल से इन दलित घरों से बच्चों को पढाई के लिए प्रेरित किया है. आज 500 से अधिक बच्चों को हम स्कूल के बाद, स्कूल के बाहर पढ़ा रहे हैं. हालात यह है कि मेरे पंचायत में एक भी ढंग का स्कूल नहीं है. सर्व शिक्षा अभियान के तहत एक स्कूल ऐसा है, जो कभी खुलता ही नहीं है. मैं कई दिनों से उस स्कूल पर जा रही हूँ, शिक्षक आता ही नहीं है.’ ऋतु कहती हैं, ‘ बिहार में शिक्षा की स्थिति बहुत बुरी है. पिछले कुछ एक दशक से यह और गर्त में ही गयी है. इस बार मैट्रिक की परीक्षा का परिणाम बहुत बुरा रहा. स्कूलों में बच्चे सिर्फ मिड डे मिल के लिए जा रहे हैं. उनके अटेंडेंस रजिस्टर में मेंटेन किये जा रहे हैं. बहुत बुरा हाल है, इस पर काम करने की जरूरत है.’

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आरक्षण जरूरी लेकिन वह आख़िरी उपाय नहीं  
खुद ओबीसी से आने वाली ऋतु यह मानती हैं कि समाज में समानता के लिए आरक्षण तबतक जरूरी है, जबतक समानता के दूसरे कारगर उपाय नहीं किये जायें. कहती हैं ‘ स्कूलों में, प्रायमरी स्तर पर जबतक समान शिक्षा लागू नहीं होती समता का रास्ता तबतक नहीं बनेगा. समान शिक्षा, समान स्कूल-जहाँ आम और ख़ास, सभी के बच्चे पढ़ते हों.’ ऋतु कहती हैं कि हमें निरंतर जाति के खिलाफ काम करने की जरूरत है. वे इसके लिए खुद को सजग भी बताती हैं. उनके अनुसार उनकी पंचायत में उनकी जाति से मात्र छः परिवार आते हैं. वे यहाँ जाति से ऊपर स्वीकृत हैं. कहती हैं ‘हालात यह कि जातियों का वर्गीकरण देश में एक समान नहीं है. बिहार में मेरी जाति ओबीसी है उत्तर प्रदेश में जनरल. जरूरत है जातियों में प्रतिभा निर्माण की, जरिया आरक्षण हो यह आख़िरी उपाय नहीं है, इसके लिए ठोस और कारगर कदम की जरूरत है.

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राजनीति में छलांग की जल्दी नहीं 
ऋतु अपने काम के प्रति गंभीर हैं. वे राजनीति में आगे बढ़ने को लेकर कहती हैं कि जनता ने उन्हें एक भूमिका के लिए चुना है तो वे उसे ईमानदारी से अपना वक्त और समर्पण देंगी. कहती हैं, ‘ऐसा नहीं है कि आप मुखिया बनें, फिर विधायक बनने की हड़बडी में हों और फिर संसद तक पहुँचने की जल्दीबाजी में. जनता आपको विश्वास से चुनती है. यदि आपको मुख्यमंत्री चुन चुकी है तो आप इसपर खुद को सिद्ध करें न कि प्रधानमंत्री बनने की होड़ में लग जायें. ऋतु कहती हैं कि ‘अभी तो हमारे पास सबसे बड़ा लक्ष्य है कि अपनी पंचायत को सुविधा संपन्न करूं. खुद को साबित करने की सबसे बड़ी जरूरत वंचित समूहों को ही होता है. महिला जनप्रतिनिधियों के मामले में, खासकर बिहार में, हालत यह है कि उनके पति निर्णय लेते हैं. वे अपनी गाड़ियों पर शौक से मुखियापति, प्रमुखपति से लेकर विधयाकपति तक लिखवाकर घूमते हैं और अपनी पत्नी की जगह उनके निर्वाचन क्षेत्र के सारे निर्णय खुद लेते हैं. वास्तविक और चुनी हुई जनप्रतिनिधि स्टैम्प बन जाती है. अपने मामले में मैं खुशनसीब हूँ कि मेरे पति दिल्ली में कार्यरत हैं और उनके स्वभाव में मेरे कामों में दखल देना नहीं है.” ऋतु जयसवाल उच्च शिक्षित आदर्श युवा सरपंच (मुखिया) के तौर पर सम्मानित भी हो चुकी हैं.

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निजी जीवन 
ऋतु जयसवाल ( 26 अगस्त 1977) का जन्म एक व्यवसायी परिवार में हाजीपुर, बिहार में हुआ. 1996 में उनका विवाह 1995 बैच के सिविल सर्विस ऑफिसर अरुण कुमार से हुआ. पति इस समय सेन्ट्रल विजिलेंस कमिशन में डायरेक्टर के पद पर कार्यरत हैं. इनके दो बच्चे, बेटा आर्यन और बेटी अवनी हैं. सेंट पॉल स्कूल से प्रारम्भिक शिक्षा और वैशाली महिला कॉलेज से अर्थशास्त्र में स्नातक ऋतु भरत नाट्यम और कथक की नृत्यांगना भी हैं.

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बाबा साहेब डा. अम्बेडकर की पत्नी (माई साहेब) को बदनाम किया नेताओं ने:रामदास आठवले

केन्द्रीय सामाजिक  न्याय और अधिकारिता मंत्री  (राज्य) रामदास आठवले ने कहा कि “नेताओं ने जानबूझ कर माई साहब को बदनाम करने की कोशिश की.  बाबा साहब डा. अम्बेडकर के साथ 1948 में उनकी शादी हुई..मैंने यह स्टैंड लिया कि माई साहब अम्बेडकर पर अन्याय हुआ है और ब्रह्मणों में यदि ऐसी कोई साजिश होती तो बाबा साहब के बुद्धिस्ट बनने से पहले ही ऐसा कुछ हो सकता था.”


यह बातचीत रामदास आठवले ने अपने ऊपर आ रही किताब ‘भारत के राजनेता: रामदास आठवले ( द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन की सीरीज किताब के तहत) के लिए की है. विस्तृत बातचीत किताब में शामिल: 


 भारत के राजनेता: अली अनवर 
  संपादक : राजीव सुमन 
  श्रृंखला संपादक : प्रमोद रंजन



राज्य (महाराष्ट्र )  में कोई ऐसी घटना घटी हो या केंद्र में, जिसके बारे में आपको लगा हो कि कुछ घटित हो रहा है और तब आप भी एकदम सक्रिय रूप से राजनीति में आ गये हों?

वह समय दलित पैंथर का था. मतलब जब मैं मुंबई आया था और सिद्धार्थ हास्टल में था. दलितों पर अत्याचारों की घटना सुनाने को मिलती. मतलब जगह-जगह पर अत्याचार होते रह रहे थे. दलित पैंथर का आंदोलन पहले ही शुरू था. मैं तो बाद में उधर आ गया. मैं जिस हॉस्टल में रहता था, उधर ही राजा ढाले मिलते थे और फिर राजा ढाले से मेरे अच्छे संबंध बनते गये. उनके साथ मेरे विचार अच्छे होते गये और फिर उसी तरह माई साहब अम्बेडकर,जो बाबा साहब अम्बेडकर की पत्नी थीं, उनके साथ भी मेरे बहुत ही अच्छे संबंध हो गये थे. मैंने उनके साथ हुए अन्याय के मुद्दे को उठाया था, राजा ढाले ने भी उठाया था कि माई साहब अम्बेडकर पर अन्याय हुआ है. ये जो बाबा साहब के बाद वाले लीडर्स थे, वे माईसाहब को ही बाबा साहब अम्बेडकर की मौत के लिए जिम्मेदार मानते थे और लगातार ऐसी चर्चायें करते थे कि ब्राह्मण लोगों ने जानबूझ कर बाबा साहब की हत्या माई साहेब से करवाई है. लेकिन यह सही बात नहीं है. सही बात यह है कि माईसाहब अम्बेडकर  बुद्धिस्ट थी. वह कुमकुम नहीं लगाती थी. तिलक नहीं लगाती थी. वे ब्राह्मण होने के बावजूद भी खुद को बुद्धिस्ट समझती थी. बाबा साहब अम्बेडकर के बारे में उन्होंने किताब भी लिखी है. किताब उनकी यादों के बारे में है. मैंने यह भूमिका ली कि माई साहब अम्बेडकर को जान-बूझ कर इन नेताओं ने बदनाम करने का काम किया ताकि माई साहब के पास कोई न जाये. इसलिए माई साहब अम्बेडकर  के बारे में समाज में इन लोगों ने इस तरह की गलतफ़हमी फैलाई थी. माई साहब अम्बेडकर मुंबई या महाराष्ट्र भी नहीं आती थी. वो दिल्ली रहती थीं. दिल्ली के महरौली में एक फॉर्महाउस था, वहां माईसाहब अम्बेडकर कई सालों तक रहीं. लेकिन जब मैंने यह स्टैंड लिया कि माई साहब अम्बेडकर पर अन्याय हुआ है और ब्रह्मणों में यदि ऐसी कोई साजिश होती तो बाबा साहब के बुद्धिस्ट बनने से पहले ही ऐसा कुछ हो सकता था. बाबा साहब अम्बेडकर के बुद्धिस्ट बनने के समारोह में 14 अक्टूबर 1956 को माई साहब अम्बेडकर मौजूद थी. सफ़ेद साड़ी पहन कर बाबा साहब के साथ उन्होंने धम्म की दीक्षा ली और बौद्ध धम्म ग्रहण किया.

तो आपको क्या लगता है नानकचन्द्र रत्तू और सोहनलाल शास्त्री, जो बाबा साहब के साथ थे,- ये दोनों, या कई अन्य नेता क्यों गये होंगे माईसाहब के खिलाफ?

साथ रहे थे. लेकिन इसी तरह का प्रचार उन्होंने समाज में किया और नेताओं ने जानबूझ कर माई साहब को बदनाम करने की कोशिश की. माई साहब बहुत सरल स्वभाव की थीं. सीधी-सादी औरत थी. बाबा साहब अम्बेडकर के साथ 1948 में उनकी शादी हुई. वे एमबीबीएस थीं, पुणे में पढाई की थीं. उनका परिवार कबीर सरनेम रखता था. . उन्होंने बीमारी में बाबा साहब की देख-भाल की. बाबा साहब की तबियत भी ठीक नहीं रहती थी इसीलिए बाबा साहब ने उनके सामने प्रस्ताव रखा कि मैं शादी करना चाहता हूँ इसलिए कि मुझे किसी केयर टेकर की आवश्यकता है. और मैं ऐसे ही किसी औरत को रखूँगा तो मेरे बारे में गलत-फ़हमी बनाई जा सकती है. मेरे साथ अभी कोई भी नहीं है इसीलिए शादी का प्रस्ताव उन्होंने रखा. उनकी उम्र का काफी अंतर भी था. उसके बावजूद माई साहब, जिनका नाम शारदा कबीर था  और पेशे से डाक्टर थीं, इतने बड़े आदमी के प्रस्ताव को ठुकरा नहीं पायीं और उन्होंने इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया. उनका नाम बाबा साहब ने सविता रख दिया.  वे कई सालों तक बाबा साहब के साथ रहीं. लगभग आठ सालों तक.

बहुजन परंपरा की ये किताबें पढ़ें

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डॉ. अंबेडकर का स्त्रीवाद (एक विश्लेषणात्मक पुनरावलोकन )

अमोल निमसडकर

शोधार्थी,टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, मुंबई . संपर्क : amolnimsadkar@gmail.com,मो.7028385569

स्त्री सशक्तिकरण के प्राचीन दस्तावेजों पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि  इसकी शुरुआत महात्मा गौतम बुद्ध की  विरासत  से  हुई और सम्राट अशोक के काल में विकसित रूप धारण किया । आगे चलकर भारत के अलग-अलग कालों के अलग-अलग महापुरुषों ने इस महत्वपूर्ण आंदोलन को जारी रखा, उसमें से इस आंदोलन के डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर आधुनिक भारतीय कालखंड के सबसे महत्वपूर्ण अग्रदूत थे । पर इस आंदोलन के आद्य प्रवर्तक के रूप में महात्मा जोतिबा फुले ने सबसे पहले नीव रखी । उन्हीं  से प्रेरणा लेकर और उन्हीं  को वैचारिक गुरु बनाकर डॉ.अंबेडकर ने इस आंदोलन को लोकतांत्रिक देश में सफल बनाने की कोशिश की । स्वतंत्र भारत का समकालीन स्त्री आंदोलन महिलाओं की उपेक्षा, शोषण, और श्रम में लिंग आधारित भेदभाव को समाप्त करने तथा बराबरी के सिद्धांत का दृढ़तापूर्ण पालन करने की नीति के साथ शुरू हुआ ।

20 वी सदी के पूर्वार्ध में स्त्री के माँ रूप का प्रतीक उभरा नारी शक्ति के अनुसार राष्ट्रमाता के रूप में रक्षा करने वाली उग्र रूपधारिणी महाकाली के रूप में देखा गया । 20 वी सदी की शुरुआत में मैडम कामा तथा सरोजिनी नायडू ने मातृशक्ति का बयान करते हुए चेतावनी दि कि “याद रखो जो हाथ पालना झुलाते हैं वही दुनिया पर राज करते है ।” तथा गांधीवादी विचारधारा के अनुसार स्त्री को कष्ट सहनेवाली सहनशील माँ के रूप में देखा गया । स्त्री के प्रति स्व-स्त्रैण विचारों एवं राजनीति का नारीकरण करने की प्रवृति के कारण उन्हे भारतीय महीला जागृति आंदोलन के जनक के रूप में ख्याति मिली ।  आजाद भारत में महिला सबलीकरण के विमर्श में  महात्मा गांधी कहा करते थे “जब तक आधी मानवता के आँखों में आंसू है, मानवता पूर्ण नहीं कही जा सकती” ।

स्त्री सशक्तिकरण मूलत: एक मानवतावादी विचारधारा का नाम है, इस तथ्य से हम सभी परिचित है यह विचारधारा और आचरणशास्त्र मात्र कोरा आदर्श नहीं । मनुष्यता का इतिहास देखा जाए तो सब शास्त्रों की रचना पुरुषों ने की है स्त्री ने रची हुई रचना हाथ पर गिनी हुई दिखाई देती है । इसलिए हमारे पास मौजूद स्त्री की जो छवि है वह आरोपित है । मगर दोनों के मनोविज्ञान में जमीन आसमान का फर्क है । विश्व की आदि आबादी की रुचि सन्यास या ईश्वर में भी नहीं के बराबर देखने को मिलती है । एक नजर से देखी  जाए तो धर्म भी पुरुष के मस्तिष्क की देन है । पूर्व हो की पश्चिम, वर्ग उच्च हो या निम्न,  जाति  हो या धर्म स्त्री   को प्रजनन की प्रक्रिया से तो गुजरना ही पड़ता है । स्त्री  का माँ बने रहने का इतिहास हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है । पर बगैर श्रेष्ठता से क्योंकि पिता ही सर्वोच्च है और उसी का वंश चलता है ।

इन्हीं तथ्यों का गंभीर अध्ययन करके डॉ.अंबेडकर ने मनु को दोषी ठहराया, जिसके क़ानून ने  महिलाओं को बंधन में रखा, उन पर घोर असमानताएँ लादी। उन्होंने मनु को ही भारत में महिलाओं के ह्रास और पतन के लिए जिम्मेदार ठहराया । इसी प्रासंगिक बात को आगे गर्डा लर्नर  अपनी पुस्तक ‘दि क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की’ में  स्त्री के अनवरत दमन, शोषण का एक कारण स्त्री का इतिहास न होना, उसके अपने नायकों आदि-आदि के रूप में देखती हैं । उससे पहले स्वतंत्रता के पक्षधर  जॉन स्टुअर्ट मिल ने अपनी पुस्तक ‘दि राइज़, दि सब्जेक्शन ऑफ वुमन’ में स्त्री के ऐतिहासिक दमन के लिए कानून व्यवस्था को जिम्मेदार माना, तथा कहा कि  मानव जाति की सभ्यता और संस्कृति के विकास का मूल स्त्रोत ‘महिला’ है ।”

डा. अम्बेडकर और स्त्री अधिकार – सुजाता पारमिता

डॉ. अंबेडकर के स्त्री सशक्तिकरण विषयक दृष्टिकोण :

डॉ. अंबेडकर के सम्पूर्ण विचार  में सबसे महत्वपूर्ण मंथन का हिस्सा महिला सशक्तीकरण   था । उन्होंने भारतवर्ष की तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एंव राजनैतिक व्यवस्था के अंदर का सूक्ष्म अध्ययन करके जाना  कि सभी समस्या के समाधान की मूल शर्त सामाजिक न्याय और परिवर्तन की क्रांति से है, न कि अन्य किसी भी बदलाव या क्रांति से है । एक महान फ्रांसीसी लेखक ने एक बार कहा था – “अगर आप मुझसे यह जानना चाहते हैं  कि कोई राष्ट्र कैसा है, या कोई सामाजिक संगठन कैसा है, तो मुझ यह बताइए कि उस राष्ट्र की  महिलाओं की स्थिति कैसी है ……” मतलब यह कि किसी भी देश का चरित्र सबसे आधिक इस बात से तय होता है कि वहाँ महिलाओं की क्या स्थिति है, और उस समाज में महिलाओं का क्या स्थान है ? यही बात डॉ. अंबेडकर ने  कही कि भारतीय समाजव्यवस्था में शैक्षणिक, सामाजिक, आर्थिक और अन्य क्षेत्रों पर भी उतनी ही लागू होती है ।


सामाजिक दृष्टिकोण

प्राचीन कालीन भारतीय समाज में वर्ण एंव जाति व्यवस्था आधारित सामाजिक संरचना होने के कारण भारतीय समाज का व्यावहारिक दर्शन महिला के लिए मुक्ति आन्दोलन से दूर  दिखाई पड़ता है । डॉ. अंबेडकर के समग्र अध्ययन और दूरदृष्टि में महिला प्रश्न (शोषण,उत्पीड़न, अज्ञान, अपमान एंव सामाजिक विषमता) का निर्णायक स्वरूप सदियों से  चली आ रही विषम समाज व्यवस्था और दृढ़ निरक्षरता की मौजूदगी के कारण है । संदर्भ के तौर पर उनके जीवन का प्रथम आंदोलन के रूप में महाड़ सत्याग्रह एक महिला सशक्तीकरण की प्रारंभिक शुरुआत हम मान सकते है । हालांकि  यह आंदोलन पीने के पानी के संबंध में था पर महिलाओं के सामाजिक परिवर्तन के उद्देश्य  से वह वहाँ कहते है कि, “तुम्हारी कोख से जन्म लेना गुनाह क्यों माना जाए और ब्राह्मण स्त्रियों की कोख से जन्म  लेना पुण्य क्यों माना जाए ?”  आगे  उन्होंने महिलाओं को सम्यक शील और आत्मसमान का महत्व समझाते हुए कहा कि, “हमे अपने स्वाभिमान की बलि दिए बगैर गरीबी में ही सही तरीके से और इज्जत से जीना सीखना चाहिए । ताकि समग्र शोषित नारी अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व का विकास कर कैसे अपना और अपने परिवार के उद्धार में सहयोग कर सकेगी ।

किसी भी देश के समग्र विकास के लिए उस देश के संतुलित सुशासन के लिए उस देश दिशा-निर्देश नीति जनकल्याणकारी होना पूर्व शर्त है । पर स्वतंत्रता पूर्व काल में राष्ट्र व्यवस्था में धार्मिक नीति निर्देशों का ही बोलबाल होने के कारण डॉ. अंबेडकर ने महिला सशक्ती करण के रूप में प्राचीन नीति निर्देश विधि मनुस्मृति दहन किया । जो भारतीय स्त्री उत्थान के इतिहास  में एक आविस्मरणीय घटना है । मनुस्मृति का दहन सार्वजनिक रूप से प्रतीकात्मक विरोध था । यह  भारतीय विशाल शोषित वर्ग के मुक्ति का दरवाजा खुलने जैसा था । मनुस्मृति के विरोध के निम्न बिन्दु थे-  सभी स्त्री-पुरुषों को शूद्र कहा था, सभी को  सारे सामाजिक आधिकारों से वंचित कर दिया था, इतना ही नहीं तो इस व्यवस्था ने स्त्रियों में भी भेद निर्माण कर दिया था । इस व्यवस्था को पूर्णतः अमान्य कर उसे तिलांजलि दे दी गई थी । इसलिए मनुस्मृति दहन स्त्री स्वतंत्रता (सशक्तिकरण) की दिशा में एक उज्जवल कदम माना जाता है । इस घटना के बाद स्त्री आंदोलन को एक व्यापक रूप मिला ।
जयभीम वाला दूल्हा चाहिए



डॉ. अंबेडकर के सामाजिक दृष्टिकोण में भारतीय महिलाओं, आंदोलन से जुड़ी हर तबके की महिलाओं की विविध  आंदोलोनों में हिस्सेदारी से स्त्री का  सामाजिक महत्व और उसके मूल आवश्यकता का अहसास  जिंदा हुआ । हाल ही के दिनों में स्टेट्स  ऑफ वीमेन कमिटी ने नारी की स्थिति का जायजा  लेने के लिए सुविधाओं की उपलब्धता को मापदंड बनाया परंतु धर्म और जाति  ने भी नारी की स्थिति को प्रदर्शित किया है । अंतः आर्थिक आधार के साथ-साथ सामाजिक और धार्मिक आधार पर भी नारी की स्थिति का मूल्याकन आवश्यक है ऐसा निष्कर्ष दिया । लिहाजा यह कि मूलतः : डॉ. अंबेडकर के की स्त्रीमुक्ति की दृष्टि  ही निर्णायक निष्कर्ष है । सामाजिक न्याय, सामाजिक पहचान, समान अवसर एंव संवैधानिक स्वतंत्रता के रूप में नारी सशक्तीकरण
के लिए उ नका योगदान हर पीढ़ी हमेशा याद रखेगी ।

सांस्कृतिक दृष्टिकोण :

भारतीय समाज का सांस्कृतिक स्वरूप विश्व के अन्य किसी भी देश के सांस्कृतिक स्वरूप से भिन्न है । एक ही देश में अनेक रीति रिवाज, परंपरा, खानपान, होने के कारण समाज के अंतर्गत सांस्कृतिक भेद  निश्चित दिखाई पड़ता है, जिसका संबंध सीधा देश की जीवन-व्यवस्था  से अटूट जुड़ा है । इस व्यवस्था में स्त्री की हैसियत दोयम है.

डॉ. अंबेडकर के विचार में महिला विषयक विषम सांस्कृतिक वर्चस्व का गंभीर कारण एक तो पितृसत्ताक मनुवादी व्यवस्था है  और दूसरा स्व: महिला ही इस बात से इंकार है । इसलिए महिलाओं  को संबोधित करते हुए  महाड़ सम्मेलन 25 दिसंबर 1927 में वे  सांस्कृतिक सीख देते हुए कहते हैं कि आप को कभी अछूत मत समझो । स्वच्छ जीवन जियो । सवर्ण महिलाओं कि तरह कपड़े पहनों यह मत देखो कि तुम्हारे कपड़ों में जगह-जगह चिंगारिया लगी हैं , बस यह देखो कि वे साफ तो हैं, कपड़े चुनने  और गहनों में धातु के इस्तेमाल की तुम्हारी आजादी पर कोई रोक नहीं लगा सकता । मन को सांस्कृतिक करने और आत्म-सहायता की भावना पर अधिक ध्यान दो ……..।” आगे कहते है – अगर तुम्हारा आदमी और बेटे पियक्कड़ है तो उन्हे किसी भी सूरत में खाने को मत दो । अपने बच्चों को स्कूल भेजो । शिक्षा औरत के लिए उतनी ही जरूरी है, जितनी कि मर्दो के लिए । अगर तुम पढ़ना लिखना सीख जाओ, तो अधिक प्रगति होगी । जैसी तुम होगी वैसे ही तुम्हारे बच्चे होंगे । उसके जीवन को सद्गुणों से भरो, क्योंकि बेटे ऐसे होने चाहिए कि उनपर दुनिया नाज करें …..।

जिस देश में मान कल्याण रहित परंपरा- रूढ़ियाँ, रिवाज ही कानून का स्थान ले चुकी हैं.कानून अगर धैर्य संहिता और आग्रह से चलना हो वहाँ कहीं न कहीं, शोषण एवं उत्पीड़न मौजूद होता ही है ।’ जहां यह उद्घोष हो की ‘रुधिविधेग्रारियासी’ अर्थात रिवाज कानून से भी अधिक शक्तिशाली है । वहाँ महिलाओं  में सांस्कृतिक पहचान एंव गरिमा जिंदा करने का काम डॉ. अंबेडकर ने विरोधी व्यवस्था के खिलाफ चलाया ।

शैक्षणिक दृष्टिकोण :

ग्रीक (यूनान) में सुकरात ने कहा था ‘knowledge is virtue’ अर्थात ज्ञान सबसे बड़ा सद्गुण है, जबकि महान अग्रेंजी दार्शनिक फ़्रांसिस बेकन ने कहा था ‘knowledge is power’ मतलब ज्ञान सबसे बड़ी शक्ति है । इसलिए डॉ. अंबेडकर को आधुनिक भारत का सुकरात और बेकन भी कहना गलत नहीं होगा । क्योंकि भारत में समाज के लिए शिक्षा का महत्व बताने वाले और शील (Virtue) के बगैर शिक्षा  बेकार है इस दर्शन का आग्रह करने वाला इकलोती विभूति डॉ. अंबेडकर थे यह सर्व मान्य है । विलियम्स शेक्सपियर ने ठीक ही कहा है की “ इंसान के जीवन में उतार-चढ़ाव आते है उससे लड़कर  यदि इस बाद को पार कर लिया जाए तो किस्मत बन जाती है और यदि नजरंदाज कर दिया तो उनके जीवन का सफर उथला हो जाता है और कष्टों से घिर जाता है ।” बिल्कुल इसी अंदाज में उनके शुरुआती शिक्षा सफर में रहते हुये शिक्षा का महत्व और आवश्यकता को संबोधित करते हुये 4 अगस्त 1913 को जमादार को न्यूयार्क से पत्र में लिखते हैं  कि, “हमें पूरी तरह भाग्य वाली धारणा को छोड़ देना चाहिए  ।  अभिभावक  बच्चे को ‘जन्म’ देते हैं न कि ‘कर्म’ । वे अपने बच्चों का भाग्य भी बदल सकते हैं और यदि हम  इस सिद्धान्त का अनुसरण करते हैं,  तब हमे निश्चित रूप से मान लेना चाहिए की हम जल्द ही बेहतर दिन देखेंगे और हमारे समाज का विकास और बढ़ जाएंगा । (गंगू-जमादार की एक लड़की महार समाज की वह पहली लड़की थी जो उस समय में चौथी कक्षा में पढ़ रही थी । ) पुरुष शिक्षा के साथ-साथ महिला शिक्षा भी चलनी चाहिए, उसका फल एंव परिश्रम आपको अपनी पुत्री के शिक्षित होने पर देखने को मिल सकता है ।”

डॉ. अंबेडकर की  सोच में यह स्पष्ट था कि “यदि हम लड़कों के साथ-साथ लड़कियों की शिक्षा की ओर भी ध्यान देने लग जाएं तो प्रगति कर सकते हैं ।  शिक्षा किसी खास   वर्ग की बापौती नहीं । उस पर किसी एक ही वर्ग का अधिकार नहीं । समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए  शिक्षा का समान अधिकार है । नारी शिक्षा पुरुष से भी अधिक महत्वपूर्ण है । चूंकि पूरी पारिवारिक व्यवस्था की धूरी भी नारी है, उसे नकारा नही जा सकता है ।”

डॉ. अंबेडकर के प्रसिद्ध मूलमंत्र की शुरुआत ही शिक्षित करो से होती है (‘Educate-Agitate-Organize’), इस मूलमंत्र से आज कितनी महिलाएं शिक्षित और सुशिक्षित होकर अपने पैरों पर जीवन यापन कर रही हैं । हजारों साल  से पीछे रह गया   एस.सी., एस.टी. और ओ.बी.सी. वर्ग आज के सामान्य वर्ग के साथ बराबरी से खड़ा है । आज दलित महिला मुख्यमंत्री (मायावती) पद तक पहुँच चुकी है । इस संदर्भ में डॉ. अंबेडकर का महिला शिक्षा आंदोलन एंव योगदान वर्तमान राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरणा स्त्रोत सिद्ध होता है ।

राजनैतिक दृष्टिकोण

जब तक किसी राष्ट्र में सामाजिक,आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और शैक्षणिक क्रांति नहीं होती तब तक राजनैतिक क्रांति पैदा नहीं हो सकती । यह डॉ. अंबेडकर के राजनैतिक दर्शन का सार था । इस दर्शन के सार में आधी आबादी की मुक्ति  का निर्धारण भी मुख्य रूप से शामिल है । सन 1932 का पुना करार, हिंदू कोड बिल आदि इस दर्शन शाखाओं के प्रतिकात्मक दस्तावेज़ हैं । किसी भी प्रकार का आंदोलन एक राजनितिक हितसंबंध से संबंधित होता  है । क्योंकि कानून के रूप में एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनैतिक आकार ही सारी समस्याओं के ताले खोल सकती है ।

इसके गहन अध्ययन के बाद डॉ. अंबेडकर ने सर्वांगीण भारतीय समाज व्यवस्था का आधा हिस्सा महिला वर्ग के सशक्तीकरण के लिए हिंदू कोड बिल नामक प्रामाणिक कानूनी दस्तावेज़ सन 1951 में तत्कालीन प्रधान मंत्री पंडित ज. नेहरू के मंत्रिमण्डल में केंद्रीय विधि मंत्री रहते हुए संसद में पेश किया । पर कुछ धार्मिक मतभेदों के कारण बहुत सांसदों  ने बिल का  विरोध किया । लिहाजा यह कि बिल पारित नहीं हो सका । डॉ. अंबेडकर की मनीषा में हिंदू समाज के मुक़ाबले में मुस्लिम समाज का एंव ईसाई समाज का अपना-अपना पर्सनल लॉ है जो सारे संसार में एक समाज व्यवस्था की तरह है । किसी भी स्वस्थ समाज के लिए उसे एक दायरे या कतार में रखने के समान सामाजिक कायदे कानून होने चाहिए ताकि वह उनका पालन करता हुआ अपना अस्तित्व बनाये रखे । इसलिए संवैधानिक रूप से भारत में  महिला सशक्तीकरण  के लिए पहला कानूनी दस्तावेज़ हिंदू कोड बिल पेश करने का  निर्णय  किया था ।

इस संदर्भ में ‘जेव्हा मी जात चोरली’(when I had concealed my caste) इस प्रसिद्ध कृति के मराठी दलित लेखक बाबुराव बागुल कहते है,  “हिन्दू कोड बिल महिला  सशक्तीकरण का असली आविष्कार है (“Hindu code bill is real invention of women empowerment.”)।  और गंभीर राष्ट्रीय विमर्श की भावना से कहते हैं कि  “अस्पृश्यता को नकारने वाली भीम स्मृति और अस्पृश्यता का पालन करने वाली मनुस्मृति एक ही सभागृह में और एक ही घर में साथ-साथ राज करती हैं । यानी देश एक ही समय में दो स्मृतियों, दो सत्ताओं और दो जीवंत-पद्धतियों में जीता है ।” तात्पर्य यह कि. अंबेडकर यह बात समझते थे कि स्त्रियॉं की स्थिति सिर्फ ऊपर से उपदेश देकर नहीं सुधरने वाली, कानूनी में उसके लिए व्यवस्था करनी होगी । डॉ.अंबेडकर निर्मित हिंदू कोड़ बिल के प्रस्तुति के बिन्दु  निम्नलिखित थे-

1 यह बिल हिंदू  स्त्रियों की  उन्नति के लिए प्रस्तुत किया गया था । 
2 इस बिल की वजह से ही स्त्रियों  को तलाक    देने का आधिकार । 
3 तलाक मिलने पर गुजारा भत्ता मिलने का अधिकार । 
4 एक पत्नी होते दूसरी शादी न करने का अधिकार । 
5 गोद लेने का अधिकार । 
6 बाप-दादा की संपत्ति में हिस्से का अधिकार । 
7 स्त्रियों   को अपनी कमाई पर अधिकार । 
8 लड़की को उत्तराधिकारी का अधिकार । 
9 अंतरजातीय विवाह करने का अधिकार ।
10 अपना उत्तराधिकारी निश्चित करने कि स्वतंत्रता । 

सभी मुख्य बिंदुओं का अवलोकन से स्पष्ट होता है कि हिंदू कोड बिल भारतीय महिलाओं  के लिए सभी मर्ज कि दवा थी । क्योंकि वह समझते थे कि असल में समाज की  मानसिक सोच जब तक नहीं बदलेगी तब तक व्यावहारिक सोच विकसित नहीं हो सकेंगी । माओत्से तुंग ने सच ही कहा है “सही विचार कहां से आते है ? क्या वे आसमान से टपकते है ? नहीं । क्या वे दिमाग में अंतरजात है ? नहीं । वे सामाजिक व्यवहार से आते है । पर अफसोस कि यह बिल संसद में पारित नहीं हो पाया इसी कारण डॉ. अंबेडकर ने विधि मंत्री पद का इस्तीफा दे दिया । जिससे यह स्पष्ट होता है कि उनको महिला उन्मूलन के लिए अपने पद तक को निछावर कर देने वाला भारतीय महिला क्रांति का ‘मसीहा’ कहा जाय तो अतिशयोक्ति  नहीं होगी ।

हिंदू महिलाओं के उत्थान और परिवर्तन के लिए जो कष्ट एंव परिश्रम डॉ.अंबेडकर ने सहे इस तुलना में अन्य किसी का नाम इतिहास में मिलना मुश्किल है ।

अम्बेडकरोत्तर भारतीय समाज में नारी का उत्पीड़न 

20 वी सदी के मध्य में डॉ. अंबेडकर के  गुजर जाने के बाद 21 वी सदी का आधुनिक समाज में  परिवार के भीतर स्त्री का उत्पीड़न आज भी मौजूद है । विश्व में पहला महिला मुक्ति का मेनिफिस्टो देने वाली मेरी वॉलस्टोनक्राफ्ट और बाद में बेट्टी फ्रेडेन वैश्विक जगत को महिला सशक्तीकरण  की  स्रोत रही । पर डॉ.अंबेडकर गुजरने के बाद के भारतीय परिदृश्य में महिला सशक्तीकरण का आंदोलन धीमी गति से प्रगति पर रहते दिखता है । अम्बेडकरोत्तर सामाजिक, आर्थिक एंव सांस्कृतिक बदलाव  के संबंध में एम.बी. फुलर कि रचना ‘द रोम्स ऑफ इंडियन विमेजहुड’ में वह लिखती हैं कि “पर्दे के पीछे क्या होता है यह भारत में बहुत थोड़े लोगों को मालूम होता है उसके अनुसार, भारतीय समाज `सुधारक भी स्त्री की वास्तविक स्थिति से अनभिज्ञ थे ।” भारतीय स्त्रियों  की गहराई का एहसास नहीं था जिससे वे उस समय थी । अमानवीय अत्याचार सहन  करने के बावजूद स्त्रियाँ समाज के सामने अपना दुख-दर्द रखने के लिए तैयार नहीं होती क्योंकि दूसरों के सामने अपने घर परिवार की तौहीन कर अपनी प्रतिष्ठा कम करने का भय रहता था ।

आधुनिक तकनीकी विकास ने भी स्त्री, दमन, शोषण तथा उसके विरुद्ध हिंसा को बढ़ावा दिया है । मसलन भ्रूणहत्या को बढ़ावा मिला (हालांकि विदेशों में भ्रूण परीक्षण विकलांगता जानने के लिए किए जाते है) है । इसका ताजा उदाहरण जनगणना 2011 के अनुसार हरियाणा में सेक्स रेशियो , 1000:861  है । यही हजार पुरुषों के पीछे 861 स्त्री मतलब भ्रूणहत्या और अन्य कारणों से 139 स्त्रियों की कमी हुई है  । लिहाजा यह कि सामाजिक संतुलन बनाएँ रखने में राष्ट्र नीति मुश्किल में है ।
स्त्रीवादी आंबेडकर की खोज
अंबेडकरोत्तर काल में स्त्री सशक्तीकरण की अवधारणा पुरानी होती नजर आ रही है । हमें एक लोकतन्त्र ढंग से इस समस्याओं का निराकरण करना होगा, जैसे एक लोकतन्त्र में सत्ताधारक पक्ष उतना ही महत्त्वपूर्ण होता है, जितना विरोधी पक्ष  इस लिहाज से जो तत्व हमने राजनीतिक मानवता से सम्पूर्ण देश को दिए है, वह तत्व अगर हम व्यावहारिकता में भी चलाने में कामयाब  होते तो शायद समस्या न होती । सरकारी तंत्र प्रणाली की  कोशिशों के बावजूद सही मात्रा में सफल नहीं हो पाये हम ।

अंबेडकरोत्तर काल में पुरुष इस सत्य को हमेशा झुठलाता रहा है की समाज की उन्नति और निर्माण में नर और नारी समान रूप से सहभागी है । इस संदर्भ में पूर्व राष्ट्रपति के.आर. नारायण महिलाओं पर अत्याचार अपने क्रूरतम रूप में जारी है और महिलाओं तथा दलितों के साथ भेदभाव उन्हे प्रजातन्त्र के अधिकार से जुदा करने जैसा है । स्त्रियों  के लिए आत्मनिर्भरता कोई हर समस्या का समाधान या हर मर्ज की दवा नहीं लेकिन परंपरा से हटकर जीवन गुजरने के रास्ते को सरल जरूर बनाती है । व्यक्तित्व को गंभीर जोखिम उठाने के लायक जरूर बनाती है । टूटने के स्थिति में जीवन को खो देने के दर्दनाक अहसास से बचाकर विकल्प की मानसिकता जरूर विकसित करती है । परंपरा या रिवाज के खिलाफ जाकर सहजीवन को भी जीने के लिए औरतों का अपने ऊपर निर्भर होना सबसे जरूरी शर्त हो जाती है ।

स्वतन्त्रता की अवधारणा ऐसे संबंध प्रारूप में अंतर्निहित है । इसलिए स्वतन्त्रता को जोखिम को झेलने का साहस भी हमेशा समेटकर रखना पड़ता है । यह सुकून का विषय है की अंबेडकरोत्तर भारत में महिलाओं का सम्मानजनक स्थान  सुनिश्चित करने के उद्देश्य से कई स्त्री हितकारी योजनाए सरकार ने आरंभ की है ।

अंतत: डॉ.बाबासाहेब अंबेडकर के अवलोकन में स्त्री-प्रश्न भारत में किसी भी दूसरे विकसित या पिछड़े मुल्क की तुलना में अधिक जटिल था । यह जटिलता परिवार, समाज, संस्कृति, कानून, रोजगार हर स्थल पर सैकडों रूपों में मौजूद था । वह समझते थे कि इस जटिलता को नजरंदाज करना देश के आधी आबादी के लिए नई गुलामी की बेड़ियाँ गाड़ने वाला जैसा था ।  उनका दावा था कि इस विशाल और जटिल देश में स्त्रियॉं के संघर्ष कहीं गहरे है । इन संघर्षों की संस्कृतिक जमीन को पुख्ता करना स्त्री-स्वतन्त्रता की प्राथमिक और अनिवार्य शर्त है । उनकी दृष्टि में स्त्रियॉं की गुलामी और प्रताड़ना की कुंठा के साथ नहीं , बल्कि अपने इतिहास की इस पूरी गरिमा के साथ उन्हे समता का एक नया दावा प्रस्तुत करने का एक अवसर देने से था ।

संदर्भसूची :
1. लर्नर, ग. (1986). द क्रिएशन ऑफ़ पैट्रिआर्की
2. मिल, जॉ. स. (1969). सब्जेक्शन ऑफ़ वीमेन
3. स्टेट ऑफ़ वीमेन कमिटी रिपोर्ट 
4. डॉ. अम्बेडकर द्वारा 4 ऑगस्ट 1013 को जमादार को न्यूयार्क से पत्र 
5. बागुल, बा. (1963). जेव्हा मी जात चोरली होती (When I had Concealed My Caste). अक्षर प्रकाशन.
6. फुलर एम्. बी.(1900) द रॉंग ऑफ़ इंडियन वीमेनहुड. रेवेल्ल : न्यूयार्क
7. जनगणना 2011

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ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया

प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका  (गजल,ठुमरी,दादरा ) बेगम अख्तर के जयंती पर विशेष 
प्रियंका 
अख्तरीबाई जब अपनी शोहरत की बुलंदियों पर थीं, तब उन्हें लखनऊ के एक जाने माने  वकील इश्तियाक अहमद अब्बासी से मोहब्बत हो गयी,यह मोहब्बत एकतरफा नहीं रही, लेकिन शादी इस शर्त पर तय हुई कि उन्हें गाना छोड़ना पड़ेगा ।इश्क के लिए यह बड़ी कीमत मांगी गयी थी, जिसे अख्तरीबाई ने स्वीकार कर लिया था ।1945 में उनकी शादी हुई और इसके बाद से ही वे बेगम अख्तर कहलाने लगीं ।

सिगरेट की बुरी लत ने बेगम अख्तर को फेफड़े की बीमारी तो दी ही थी, इसके साथ ही शादी के बाद उनकी छूट चुकी गायकी और माँ के देहांत से मिले सदमे ने उन्हें अवसाद की ओर भी धकेल दिया। अपनी माँ से उनका जुड़ाव बहुत गहरा था। मैं मानती हूँ कि गायकी से भी उनका जुड़ाव उतना ही गहरा था, लेकिन मानवीय सम्बंधों और संवेदनाओं को वे गायकी से भी बहुत अधिक महत्व देती थीं । लगभग चार वर्षों तक गायन से दूर रहने के बाद, अवसाद के दिनों में जब उन्हें एक डॉक्टर के पास ले जाया गया, तब डॉक्टर ने गायकी से उनकी जबरन बनायी गयी दूरी को अवसाद के एक बड़े कारण के रूप में पहचाना और अब्बासी साहब से कहा कि उन्हें अवसाद से बाहर लाने का एक ही रास्ता है कि उन्हें फिर से गाने दिया जाए। महफिलों में तो नहीं लेकिन बेगम को आकाशवाणी के लखनऊ केन्द्र में गाने की इजाज़त मिल गयी। गायन के फिर से शुरू हुए इस सिलसिले ने उन्हें अवसाद से बाहर आने में बहुत मदद की।

मोहब्बत और शादियों से जुड़ी शर्तें और समझौते न जाने कितनी औरतों की जिंदगी में अवसाद भरते रहे हैं। मोहब्बत या शादी के एवज में किसी औरत की ख़ास पहचान याउसके व्यक्तिव के मूल में मौजूद विशेषता को ही खत्म कर देने की शर्ते, कोई किस तरह रख सकता है!कई संभावनाशील और प्रतिष्ठित अभिनेत्रियों को उनके पतियों ने शादी के बाद अभिनय से दूर कर दिया। कई  स्पोर्ट्स वुमन के प्रदर्शनों से प्रभावित प्रेमियों ने उनसे इस शर्त पर ही शादी की कि वे बहुत खेल चुकीं, अब सिर्फ परिवार चलाने पर ध्यान देंगी। इसी तरह शिक्षा और कौशल के क्षेत्र में बहुत प्रतिभा सम्पन्न रही लड़कियों से ब्याह करते हुए यह शर्त रखी गयी कि वे नौकरियों या व्यवसाय में नहीं जाएँगी। यह वैसा ही है जैसे जिस विशेषता से हम प्रभावित हों, उसे ही नष्ट करने पर तुल जाएँ,कि जिससे हम प्यार करें, उसे ही ख़त्मकर देने पर आमदा हो जाएँ!

बेगम अख्तर की गायकी के छूटने और उनके अवसाद में चले जाने से अकेले उन्हीं का नुकसान होना था, ऐसा नहीं है । फर्ज़ करिए कि उन्होंने 1945 के बाद गाया ही नहीं होता तो आज उनके गाने के कई बेहतरीन रिकॉर्ड से हम और हमारी सांस्कृतिक विरासतवंचित ही रह जाते  ।इसी तरह जब किसी भी कुशल और प्रतिभाशाली स्त्री को विवाह संस्था, प्रतिष्ठा वगैरह की दुहाई देकर घर तक सीमित कर दिया जाता है, तो वह स्त्री जितना अधिक घाटा उठाती है, उससे भी कहीं अधिक घाटा यह समाज उठाता है, जो संभावित उपल्ब्धियों और बेहतरी से बुरी तरह चूक जाता है।


शोधार्थी, हिंदी विभाग
हैदराबाद विश्वविद्यालय




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लोकतंत्र की हत्या हो रही है.. अब एक सिर्फ जुमला नहीं है !

भारती वत्स


निर्भीक पत्रकार गौरी लंकेश की ह्त्या के एक महीने के बाद भी उनके हत्यारों की गिरफ्तारी नहीं हुई है. उनकी ह्त्या पर सामाजिक चुप्पी को भयावह बता रही हैं भारती वत्स 

साथी गौरी लंकेश को एक दुःसाहसी पत्रकार के रूप में जानते है और यही उसका सर्वाधिक ताकतवर पक्ष है भी, पर मेरे लिये गौरी सिर्फ एक पत्रकार, लेखक, कार्यकर्ता नहीं बल्कि एक महिला पत्रकार, महिला लेखक, और महिला कार्यकर्ता है. यहां महिला लगाना इसलिये जरूरी है क्योकि गौरी उन्ही सामाजिक असमानताओं , लैंगिक विभेदों के बीच स्वतंत्र छवि हासिल करती हैं, जिनके चलते औरतों की एक बहुत बड़ी आबादी पराजित-सी, घुटी हुई, छटपटाती हुई या अनुकूलित हो जीवन जी रही है, इसलिये गौरी का संघर्ष दोहरा और दुगना है।

गौरी के जाने के बाद उनका धर्म, जाति, विचार-धारा खोजने और उस पर विशिष्ट ठप्पा लगाने की कवायद तेजी से चल रही है, क्या किसी भी तरह की  जातीय पहचान गोली चलाने की अनुमति दे देती है ??? क्या किसी भी प्रकार का विचार गोली चलाने की अनुमति दे देता है? गौरी को उन लोगों के बीच ढूंढा जा रहा है, उन लोगों द्वारा व्याख्यायित किया जा रहा है जिनसे गौरी का कोई संवाद, विचार का कोई साझापन नहीं था.  जिनके साथ वो काम कर रही थी, जो उसके मन के साथ बहते थे विचार के साथ रहते थे उनसे गौरी को जानने की कोशिश की जानी चाहिये और उससे भी ज्यादा गौरी का लिखा हुआ वो सब कुछ जो इतने वर्ष उसने पूरी संजीदगी और जिम्मेदारी से लिखा। मैं गौरी से मिली नहीं कभी, उनको जाना नही; पर जब से वो गई हैं  मेरे सपनों में, मेरी सांसो में वो बसने लगी है एक पारदर्शी निडर , बेबाक और निश्छल करूणा से भरी स्त्री की तहर। बार-बार सोचती हूॅ, आखिर गौरी क्या कर रही थी ? बस उन बातों को प्रश्नांकित कर रही थी, जो मानव विरोधी है, प्रकृति विरोधी हैं। एक प्यार समानता और भाईचारे की दुनिया को बनाने में लगी थी गौरी, तब क्यों डर गये वे  लोग ? क्या उनके पास घृणा और, क्रोध से भरे शब्द कम पड़ गये ? क्या उनके विचार और मन इतने पंगु हो गये कि उन्हें हत्या के अलावा और कोई तरीका अपनी बात कहने का नहीं मिला ?

इतिहास ऐसे लोगों की हत्यायों से भरा पड़ा है जो मानवता के लिये जीते रहे, परन्तु क्या हुआ ? व्यक्ति गये पर विचार तो नहीं मरे ? हम किस तरह के आजाद देश में रह रहें ? असहमतियों  ओर आलोचना से मुक्त समाज क्या जीवित रह सकता है ? और क्या द्वंदविहीन समाज क्या वाकई में मानव समाज ही कहलायेगा ? दो प्रकार की चुप्पियाँ इन बोलने और लिखने वाले लोगों के साथ सामान्तर चल रही हैं. एक वे सत्ताधीश जो बात-बेबात बोलते हैं पर आज चुप हैं, और दूसरे वो जो जानते हैं सही-गलत पर, चुप्प हैं. ये डरे हुये लोगों की चुप्पी है. कारण कुछ भी हो चुप्पी हमेशा उसी तरफ खड़ी होती है जहां नाइंसाफी होती है इसलिये चुप रहना भी उतना ही बड़ा गुनाह है जितना बड़ा गुनाह गौरी के हत्यारों ने गौरी के साथ किया है। लोगों के पक्ष में खड़े होने वाले और सत्ता के पक्ष में रहे खड़े होने वाले मानस हमेशा से मौजूद थे परन्तु जनपक्ष मे खड़े होने वालों के विरूद्ध दमन की भयावहता आज जिस तरह दिखाई दे रही है वह भयाक्रांत करने वाली राजनीति का कुरूप चेहरा है जो पहले कभी नही दिखा, और देखा जाये तो वो भयभीत करने में सफल हो गये है। दिल्ली प्रेस क्लब मे उपस्थित पत्रकार जनतंत्र के पक्ष में खड़े लोग थे परन्तु वहां वे अपनी निर्भीकिता से ज्यादा भय को व्यक्त कर रहे थे. यही सत्तायें चाहती है इसलिये मैंने कहा कि वे इसमे सफल हो रहे है; सवाव यह है कि साहस निर्भीकता और बेबाकी की दीवार इस कदर कमजोर कैसे और क्यों हो गई ? क्या इस दीवार में सेंध लगा दी गई है ? कौन सी बजहें है इस पर हमें चिन्तन करना पड़ेगा कि हमें क्यों इस कदर डरने लगे है, ब्रेख्त की जिस कविता को तब बोला जाता था, गाया जाता जब शायद वह बहुत मौजूं नहीं थी परन्तु आज हम उसे बोलने में डर रहे हैं।

असहिष्णुता की बात पिछले 2वर्ष से की जा रही थी और जिसके चलते अनेक बुद्धिजीवियों और संस्कृति कर्मियो ने सम्मान वापस किये, फिर भी  सोचिये एक बार भी किसी तरह कि चिन्ता या हलचल सत्ता के गलियारों में महसूस नही हुई, आप हंस  रहे होंगे मेरे भोलेपन मूर्खता पर कि किससे उम्मीद कर रही है ?
दरअसल में उन सत्ताधीशों से उम्मीद नहीं कर रही, मैं  उम्मीद इस आम जनमानस, समाज के उस संवेदन शील वर्ग से कर रही हूॅ, जो इन खबरों को सिर्फ सुनता है। गौरी की हत्या के विरोध में दर-दर छोटे-बड़े शहरों में औसतन 500 से 1000 – दो हजार लोग जुड़े रास्ते पर आते-जाते लोगों ने सुना और चल दिये, तब मैंने सोचा कि मैं किन लोगों से उम्मीद कर रही हूॅ वे लोग जो 10 गुने ज्यादा बिजली के दाम देकर चार गुना दाम पेट्रोल के देकर भी चुप रहते हैं, जो काम न मिलने की लंबी चिन्ता के साथ जीते-जीते भी खौलते नहीं हैं, वे   भला एक कन्नड़ पत्रकार के लिये क्यों एकजुट होंगे ?

सोचिये सोशलमीडिया पर कुछ लोग सीधे-सीधे धमकी, घटिया भाषा में दे रहे है पर उन्हें न कोई कानून रोकता है न कोई संगठन। इन अंधे भक्तों ने आंख खोलकर न कभी नक्सलवाद को जानने की कोशिश की, न आतंकवाद को जानने की कोशिश की, न ही किसी भी माइथोलाॅजी को गहराई से जाना-पढ़ा। आलोचना किसे कहते हैं इन्हें नही मालूम। भाषा इन्हें  आती नहीं परन्तु ये गाली देने और गोली चलाने में महारथी हैं। संवाद कीजिये बाद-विवाद कीजिये भारत की परम्परा शास्त्रार्थ की है, गोली और गाली की नहीं। यह बीमार और विकृत मानस है, जिन्हें इलाज की जरूरत है। अंतर्मन   के इन उलझावों को सुलझाने का कोई रास्ता संभवतः मनोविज्ञान की उन परतों में हो जो बहुत पहले रूक गया है, उन्हीं  को खोलने की अपर्रिहायता आज महसूस हो रही है। लोकतंत्र में कार्यपालिका यानि राज्य हमेशा से दमनकारी भूमिका में रहा है जो लोकतंत्र के पाखंड को बनाये रखता है। ऐसी स्थिति में न्याय पालिका, विधायिका और मीडिया ऐसे स्तंभ हैं जिनसे जनपक्षधरता की, न्याय की, उम्मीद की जाती हैं परन्तु यदि यहीं स्तंभ सत्ता पक्ष में खड़े हो जायें तो स्थिति भयानक हो जाती है, ऐसे हालातों में हमेशा विरोधीपक्ष ’’लोकतंत्र की हत्या हो गयी या की जा रही है जैसे जुमलों का प्रयोग करता रहा है, और सही मायने में ये तब जुमले की तरह ही था, परन्तु आज इसे सिर्फ जुमला कहकर टाला नही जा सकता यह एक सच बन चुका है, जिसका उदाहरण है, लगभग पूरा का पूरा मीडिया जो सत्तापक्ष में खड़ा दिखाई दे रहा है। और फिर चाहे वह मुख्यधारा का मीडिया हो या सोशल मीडिया और सिर्फ खड़ा नहीं है इतने गहरे स्तर पर भ्रमित करने वाली सूचनाओं का संजाल फैलाये हुये है जिसमे एवं सहज-सरल नागरिक असर में आने बाध्य हो जाता है।

अभिव्यक्ति की आजादी व्यक्तिगत नहीं होती, उसका फैलाव सामुदायिक होता है, उसकी जरूरत सामुदायिक होती है, तब उसके लिये लड़ना वैयक्तिक कैसे हो सकता है ? वामपंथ हो या दक्षिण पंथ यदि बोलने, काम करने की आजादी वहाँ नही है और भयाक्रान्त करने की राजनीति हो, वहाँ लोकतंत्र नहीं हो सकता , जनपक्षधरता नहीं हो सकती है। ये गहरे चिन्तन के विषय हैं कि कौन से कारण हैं, कौनसी मानसिकतायें जिनके चलते हम इस कदर भयाक्रान्त हो  गये हैं,  यद्यपि इतिहास इस बात को पुष्ट करता है कि हमेंशा कुछ संवेदनशील, ईमानदार, निर्भीक लोगों के जीवन की शर्त पर ही मानवता के संघर्ष, आजादी के संघर्ष चलते रहे हैं। इसलिये बात सिर्फ गौरी की नहीं है, दुनिया मे हर जगह ये संघर्ष चल रहे हैं।

स्त्री की चेतना और संसार का कहानी संग्रह है शरद सिंह की किताब ’तीली-तीली आग’

डॉ.जीतेंद्र प्रताप 


कथाकार डॉ. शरद सिंह का कथा संग्रह तीली तीली आग मुझे जिन प्रमुख कारणों से आकर्षित और प्रभावित करता है,उन कारणों की संख्या महज एक या दो नहीं, कई है। तीली-तीली आग कथा संग्रह स्त्रियों के जीवन को रेखांकित करता कहानी संग्रह है। इसका प्रकाशन सन् 2003 में सामयिक प्रकाशन, दिल्ली से हुआ । गौरतलब है कि उक्त कथा संग्रह में लेखिका ने जिन सत्रह कहानियों को प्रस्तुत किया है उनमें  आये स्त्री  पात्रों के माध्यम से लेखिका ने समय और समाज के समानान्तर आ रहे स्त्री चेतना के बदलावों  को विस्तॄत एवं व्यापक फलक पर उतारने की कोशिश की है।


कथा संग्रह की प्रथम कहानी मरद की मुख्य स्त्री पात्र सुंदरा है। इस कहानी की शुरुआत ही कुछ इस तरह होती है,“सुंदरा शेरनी की तरह दहाड़ रही थी। अपनी साड़ी का छोर कमर पर कसे हुए वह खांटी बुंदेली गालियों की बौछार कर रही थी।” कहानी का यह प्रथम वाक्य ही यह बताने के लिए काफी है कि सुंदरा शेरनी बनी हुई थी। जरूर इसके पीछे कोई न कोई अनुचित और अमानवीय कारण रहा होगा, खासकर वर्तमान समाज के लिए। तभी तो उसे शेरनी का रूप धारण करना पडा था। जब हम कहानी में आगे बढ़ते हैं तो पाते हैं कि सुन्दरा जिन दो समस्याओं से विकट रूप से जूझ रही थी, वे थीं- उसकी बेटी पर जमींदार की कुदॄष्टि और उसकी तथा बेटी के शौच के लिए बाहर जाने की समस्या। इन दोनों समस्याओं से लड़ने वाली सुंदराबाई का जुझारू रूप यह साबित करता है कि आज की स्त्री  की सोच में व्यापक बदलाव आ रहा है। बस जरूरत है, समाज के प्रत्येक सदस्य उसके साथ कंधे से कंधा मिलाएं और मानवीय समाज की स्थापना में अपना योगदान दें।

तीली तीली आग इस कथा संग्रह की दूसरी कहानी है। इस कहानी की स्त्री पात्रों में मुख्य रूप से दो पात्र हैं- कहानी की वक्ता और प्रीतो। इन दोनों के बीच वैसे तो खून का कोई रिश्ता नहीं है ,फिर भी उनका आपसी रिश्ता खून के किसी भी रिश्ते से कहीं ज्यादा ही मज़बूत है। प्रीतो का प्रेम प्रसंग एक डाक्टर से चल रहा है। कहानी की वक्ता को यह भली भांति पता है कि यह गलत है फिर भी समय़ और समाज की मांग को देखते हुए उसने भी अपनी सोच में प्रगतिशील बदलाव किया। उसने प्रीतो की मुलाकत उस डाक्टर से कराने में अपना अमूल्य योगदान दिया, लेकिन साथ ही प्रीतो को शारीरिक संबंध न बनाने या फिर सुरक्षित तरीके से बनाने की हिदायत भी दे डालती है। इस घटना के द्वारा लेखिका ने स्त्री की आधुनिक विकसीत सोच को उजागर करने का प्रयास किया है।


तीसरी कहानी आठ गुना आठ सुख है ।इसमें स्त्री पात्र रामरती जो एक नौकरानी है,को यही लगता है कि आठ गुना आठ माप वाले बिस्तर पर सोने वाले लोग ज्यादा सुखी होते हैं। यह एक तरफ उसकी निर्दोषता और अबोधता को व्यक्त करता है तो दूसरी ओर नौकरों और मालिकों के बीच के आर्थिक अंतर की भयावहता को भी दर्शाता है। आठ गुना आठ सुख पाने की कामना रखने वाली रामरती यह भी सोचती है कि क्या नौकरों को एक टूटी खाट भी नसीब नहीं होनी चाहिये। यह विचार अमीरी-गरीबी के फांक को समझते हुए वर्ग चेतना का प्रथम बिंदु है।


चौथी कहानी पांच लड़कियां और उनके सपने है। इसमें पांचों लड़कियों को पैसा, चमचमाती कारें, सजीले नौजवान आदि ही लुभाते हैं। उनकी इस प्रकार की सोच से आख़िरी तौर पर सहमत नहीं हुआ जा सकता  कि पैसा कमाने के लिए देह व्यपार ही एकमात्र साधन रह गया है। क्या यह स्त्रियों की बदलती सोच पुरातन से विद्रोह है?


किस किस को कटवाओगे केशू कहानी में एक स्त्री पात्र हिम्मा के साथ बलात्कार की घटना सुनकर कहानी की वक्ता उससे पूर्ण सहानुभूति रखती है। वह इस घटना को चाह कर भी नहीं भूल पाती है। वह कहती है ,“बलात्कार हिम्मा के साथ हुआ था लेकिन उससे उत्पन्न मानसिक पीड़ा को मैं भी झेल रही हूं। ‘उसका यह कथन इस बात की ओर इशारा करता है कि आज एक महिला दूसरी महिला पर हो रहे अत्याचार और अन्याय को देखकर शांत रहने वाली नहीं है। आज जब किसी लडकी के साथ किसी भी शहर में बलात्कार या अन्य अमानवीय अत्याचार होता है तो स्त्रियों का हुज़ूम सडकों पर उतर आता है। यह सब होना कोई मामूली बात नहीं है। यह  चेतस होती स्त्री की ओर ही संकेत करता है।



घो घो रानी कित्ता पानी कहानी में लेखिका शरद सिंह ने बडी ही कुशलता के साथ यह स्पष्ट किया है कि आज कोई भी प्रेमी किसी भी स्त्री के लिए जान देने के लिए तैयार नहीं होता है।वह समय बीत गया जब ऐसी घटनाएं सुनाई देती थीं। आज यदि कोई कुंआरी लडकी मां बन जाती है तो उस बच्चे का कथित बाप भी उसे अपना नाम देने को शायद ही तैयार हो। ध्यातव्य है कि आज की स्त्रियां इस बात को बखूबी समझने लगी हैं। और उनकी यही सोच और समझ मुझे व्यक्तिगत आत्मिक सुकून प्रदान करती है।


सुअरबाड़े की जान्ह्वी कहानी में जान्ह्वी ने अपनी समझदारी और बुद्धिमत्त्ता से अपने वैवाहिक जीवन में आने वाली उन कठिनाइयों, जिन्हें शायद आसानी से हल न किया जा सके,को दूर कर सुखद वैवाहिक जीवन व्यतीत किया। हथियारों वाले कहानी में मुख्य स्त्री  पात्र चाची ने अपनी सूझ-बूझ से ससुर के समक्ष मुंह न खोलने की रूढिवादी और गैरज़रूरी परंपरा को तोड़ते हुए अपने परिवार में होने वाले खून खराबे तथा गांव में प्रस्तावित दंगे को रोक पाने में सफल रही थीं।

एक अदद प्यार के लिए कहानी की पात्र विपुला को अंत तक प्यार की परिभाषा को ही समझ पाने की उधेड़बुन में परेशान दिखाया गया है। अंतत: एक पल ऎसा भी आता है जब वह अपने प्यार का इज़हार करना तो चाहती है,पर उसे कोई ऐसा व्यक्ति ही नहीं मिलता जिससे प्यार किया जा सके। इसी तरह कथा संग्रह में गीला तौलिया,वो गंदले मुंह वाली,बही खाता आदि ऐसी कहानियां है, जिनमें अभिव्यक्त स्त्रियों की सोच और मानसिकता को सलाम करने का जी चाहता है।


इस तरह कथा संग्रह की अधिकतर कहानियां पुरुषसत्तात्मक समाज को चुनौती देती हुई प्रतीत होती हैं। इन कहानियों की स्त्री पात्र अपनी सोच और विचारों की गहनता की सार्थकता एवं सच्चाई को साबित करती हैं। इन कहानियों में पुरुष की अहंवादी सोच को भी बेनकाब किया गया है। यही नहीं स्त्री चरित्रों की भीतरी हलचल भी विस्तार से सामने आती है।
’तीली-तीली आग’ 
लेखिका – डॉ. शरद सिंह
सामयिक प्रकाशन, दिल्ली 

डॉ.जीतेंद्र प्रताप 
जवाहर नवोदय विद्यालय, मुडिपु, 574153
दक्षिण कन्नड़, कर्नाटक, मो.9739198095)

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महिषासुर: मिथक व परम्पराएं

डेस्क 

स्त्रीकाल की अनुषंगी संस्था ‘द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन ‘ की आगामी किताबों की अग्रिम बुकिंग शुरू है. आगामी तीन से चार सप्ताह में आने वाली किताबों के लिए अग्रिम बुकिंग ‘पहले आओ पहले पाओ की नीति’ के तहत विशेष छूट के साथ शुरू की जा रही है. किसी एक किताब (पेपर बैक) की खरीद पर पायें 35% की विशेष छूट और दो किताबों पर 40% की. हार्ड बाउंड किताबों पर  45% की छूट दी जायेगी. बुकिंग ऑनलाइन या अकाउंट ट्रांसफर के जरिये की जा सकती है.

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महिषासुर: मिथक व परम्पराएं 
                   संपादक: प्रमोद रंजन 


असुर-विमर्श के आधार पर खड़ा हुआ ‘महिषासुर-रावेन आंदोलन’ फुले, आंबेडकर और पेरियार के भारतीय सांस्कृतिक इतिहास को देखने के नजरिए को व्यापक बहुजन तबके तक ले जाना चाहता है, जिसमें आदिवासी, दलित, पिछड़े और महिलाएं शामिल हैं। इस सांस्कृतिक संघर्ष का केंद्रीय कार्यभार पुराणों के वाक्-जाल में ढंक दिए गए बहुजन के इतिहास को उजागर करना है, हिंदू मिथकों में अपमानित और लांछित किए गए, असुर, राक्षस और दैत्य ठहराए गए बहुजनों के महान नायकों के वास्तविक चरित्र को सामने लाना है।

इस आंदोलन ने दो तरह की प्रतिक्रियाओं को जन्म दिया है। एक ओर इसके माध्यम से सांस्कृतिक अधीनता के शिकार तबके अपनी खोई हुई सांस्कृतिक पहचान को पाने की कोशिश कर रहे हैं तो दूसरी ओर, वर्चस्वशाली तबकों में बौखलाहट है। इस बौखलाहट की एक तीखी अभिव्यक्ति संसद में (फरवरी, 2016) भी हुई थी।
इस आंदोलन का मानना है कि स्थापित और आदर्श के रूप में प्रस्तुत की गई सांस्कृतिक संरचना को तोड़े बिना वर्तमान में स्थापित प्रभुत्व को तोड़ा नहीं जा सकता है। अपने अंतःस्वरूप में यह द्विज-राष्ट्रवाद के बरक्स बहुजन-राष्ट्रीयता को रखता है तथा हिंसा की संस्कृति के खात्मे की पुरजोर वकालत करता है।
विमर्श और आंदोलन के स्तर पर इसकी बढ़ती लोकप्रियता ने इसके सामने बहुत सारे प्रश्न भी खड़े किए हैं। ये प्रश्न दोनों स्तरों पर हैं। विमर्श के स्तर पर भी और आंदोलन के स्तर पर भी। ये प्रश्न महिषासुर आंदोलन की एक सैद्धांतिकी की मांग कर रहे हैं। इस बात की भी मांग कर रहे हैं कि इस आंदोलन की संरचनात्मक विश्लेषण की जाय। यह किताब इन आवश्यकताओं की पूर्ति करती है।

मूल्य:  अजिल्द: 350 रूपये
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‘छोटके चोर’



श्रीमती मोहिनी चमारिन


जब-जब हिन्दी दलित साहित्य की बात चलती है, तब-तब प्रथम दलित रचना की प्रामणिकता को लेकर यह प्रश्न उठता है कि आखिर प्रथम दलित रचना कौन-सी थी? प्राप्त दसतावेजों के आधार पर यह तो प्रमाणित होता है कि हिंदी की प्रथम दलित रचना एक कविता थी जो इंडियन प्रेस, इलाहाबाद से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन में प्रकाशित होनेवाली पत्रिका ‘सरस्वती’ के सितंबर 1914 के अंक में प्रकाशित हुई थी ‘अछूत की शिकायत’ शीर्षक से प्रकाशित इस कविता के रचयिता पटना (बिहार) के हीरा डोम माने जाते हैं । ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हिंदी की यह प्रथम दलित रचना संभवतः भोजपुरी की प्रथम रचना भी है। यह सही है कि उस समय तक हिंदी में दलित साहित्य जैसी कोई चीज नहीं थी। किसी अति निम्न दलित जाति, वह भी एक डोम द्वारा इस तरह की कविता लिखने की तो कल्पाना भी नहीं की जा सकती थी। 


मगर यहां एक प्रश्न व शोध का विषय यह है कि यदि हीरा डोम हिंदी के प्रथम दलित पुरूष रचनाकार थे, तो हिंदी की प्रथम दलित लेखिका कौन थी और किसे प्रथम दलित-स्त्री रचना माना जाए? हालांकि आलोचकों का एक तबका हीरा डोम की सरस्वती में प्रकाशित कविता में ‘दलित-चेतना’ का अभाव चिह्नित करता है. 
इसे महज संयोग कहा जाए या दलितों में तेजी से पैदा हाती चेतना का विकास कि एक ओर ‘सरस्वती’ के सितंबर 1914 के अंक में ‘अछूत की शिकायत’ कविता प्रकाशित होती है, तो दूसरी ओर उसके मात्र 11 माह बाद इलाहाबाद से ही ओंकारनाथ वाजपेयी के संपादन में प्रकाशित होने वाली एक अल्पज्ञात पत्रिका ‘कन्या-मनोरंजन’ के अगस्त 1915 के ग्याहरवें अंक में भाग दो में (पृष्ठ 307 से पृष्ठ 310 में फैली) एक कहानी प्रकाशित होती है, कहानी का शीर्षक है ‘छोटे का चोर’ । इस कहानी का रचयिता कोई पुरूष नहीं अपितु एक स्त्री है और इसका नाम है – श्रीमती मोहिनी चमारिन। लेखिका के बारे में इससे अधिक जानकारी नहीं मिली है। यहां यह उल्लेखनीय है कि श्रीमती मोहिनी चमारिन की यह कहानी ‘छोटै के चोर’ हिंदी की प्रथम दलित कहानी के रूप मं अवधी की पहली प्रकाशित रचना है।


‘छोटे का चोर’ की विषय-वस्तु शिल्प और तेवर को देखते हुए कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की ‘कफन’ की तरह यथार्थवादी आधुनिक कहानी के तत्व विद्यमान हैं। इसलिए इसे पथम यथार्थवादी आधुनिक दलित कहानी भी माना जा सकता है। यथार्थवादी आधुनिक इस मायने में कि उस दौर में होनेवाला पूरा स्त्री-लेखन सदाचार, नैतिकता, आदर्शवादी और एक हद तक शुचितावादी परंपराओं के नाम पर पूरी तरह पुरूष मानसिकता और वर्चस्व को पोषित करनेवाला लेखन था। 

यहां यह रेखांकित करनेवाली बात है कि संभ्रांत और तथाकथित बड़े घरों की शिक्षित स्त्रियां जहां अपने आपको खुलकर अभिव्यक्त करने में संकोच करती थी, वहीं श्रीमती मोहिनी चमारिन ने ऐसा कथ्य चुना जो कानून और व्यवस्था के रक्षकों से सीधे-सीधे मुठभेड़ करता है। शायद ऐसा लेखिका के जीवन-संघर्ष सामाजिक परिस्थितियों और विषमताओं के अंतर्विरोधों के चलते हुआ।

‘छोटके चोर’


एक दांव बहुत दिन भवा चोर बहुत उधरान रहें, कहुं आज ओकर लोटा थरिया उठैगे, कहुं ओकर टाठी, कहुं फलनवां खियाँ सेन्ध होयगै, सब बिन बटौर लैगा पानी पिये का लुटिया तक न बची- जहं देखौ उधरै यही सुनाय- बजार मां जेब मां पैसा रखके हाथे से दबाये जाउ औ तनीसा गाफिल भये कि पैसा नदारद, चोर का कि आंखी के काजर काढ़ लेत रहै- हाकिमों पुलिस आरी रहें- बहुत तलाशी तहकियात करे मुदा कुछ पता चलै न – चोरी दुइ चार छः रोजे होय-जब बहुत उत्पात होय लाग तो हाकिम ई हुकुम निकारेस कि जो कौनौ एक चोर या गिरह कट पकड़ के लै आव ओ का 100 इनाम मिलै,


एक बिचारी अहिरिन रहै, ओकर मनई पांच छ – बरिस भवा मरगा रहै, मेहनत मजूरी कैके तीन लड़कन का पालत पोसत रही लड़कवन छोटे-छोटे रहैं उनका खवाव पियाव कपड़ा लत्ता का अकेले मेहराख के कमाई में कहां अटै, तौन बिचारी दिन ज्ञभ् मजूरी करै और रात के पिसौनी, इतना मेहनत करत करत औके देहीं के बल बिलकुल टूट गया, औ बेराम रहै



लग महतारी का बेराम देख के बड़का और मझिलका लड़का दुइनौ कौनों खियां काम करै लागे, पै कहूं थूकन सतुआ सनात है, नान नान लड़कन के कमाई से चार चार जने के गिरिस्तीके खरचा चल सकत है? बिचारी अहिरिनया थेरमिऊं मों काम थोड़ा बहुत करतै जाय, ए हिंयां तक भा कि एक दम्मै खटिया लै लिहिस, अब कर कीन जाय महतारी बेराम, घर मां खाय का नहीं, मझिलका और छुटका लड़का मनावें लागे कि हेराम एक ठो चोर कहुं से मिल जाय तो बहुत अच्छा।
छोटा लड़का – आऔ जी चली कहूं चोर ढूंढी काजानी मिलन जाया तौ, नारायन दै दें, चोर केह तरह के होत है,
मझिलका – चोर काला-काला होत है मोट के ओकर लाल आंखी होत है।
छोटा – जसे जगेसरा है, का जगेसरा चोर आय?
मझिलका – अबे धू पगला! जगेसरा तो मनई आय।
छोटा – तौ फिर चोर केह तरह के होत है?
मझिलका – अबग! चेर चोरी करत थे, रात के निकरत हैं, उनका देखे बड़ी डर लागत थी, मुरदानी माटी लिहे रहत थें, जहां घर मां घुस के फेंक दिहेन कि मनई वेहोस सोवे लागें।
छोटा – तैं चोर देखे हस?
मझिलका – मैं देखौं तो नहीं एक्का कि सुनेउ है ननका देखेस ही तीन मोसे बतावह रहा।
छोटा – ओ ननका कहां देखेस?
मझिला – एक दिन ऊ अपने बाप के साथ रात के पांचायत से आवत रहा तौ चोर तलाब मां पानी पियर रहें तीन ऊ मोका झुटकावे कि चोर मनईन के तरह होत हैं?
छोटा – तौन तैं फिर का कहे।
मझिला – मैं कहि दिहेऊं कि मोसे न छट्टैली बताव मैं जनतेवे नहीं काकि चोर दमसर, मनई दूसर।
बड़का लड़का – अरे ओ द्वारका ओ लल्लू चलौ दौड़ौ बुआ आई है। द्वाराका, औ (मझिला) औ लल्लू (सबसे छोटा) दौड़ै। एक तो बुआके लपेटे दूसर जने गठरी मुठरी खोलै लागैं, गठरी से गुड़ लाई चना निकार के खाय चबाय लागै औ बुआ से बातैं छुअन लागीं।
द्वारका – बुआरे तैं चोर कभों देखे हस केह तरह के होत हैं?
बुआ – चोर मनई के तरह होत है और केह तरह के?
द्वारका – मैं तौं सुनेउं हैं कि चोर करिया करिया होत हैं औ ओकर लाल-लाल आंखी होत है, बुआ! मैं दोई चीज अबै तक कबहुं नहीं देखेउं एक चोर और एक हाकिम।
बुआ – अरे तैं तो बड़ऊ जान परत थे, चोरौ मनई आय औ हाकिमों मनई आय। चोरी करैं लागे चोर बाज लागे। हमही तहीं जौ चोरी करी गठरी मारी तौ हमही तैं चोर कहे जाय लागी। चोर के का कुछ कान पूंछ थेरौ होत थी जसे हम तुम मनई तैसे उनहूं मनई रात के चोर दिन के खासे मनई। और हाकिम हुद्दा पाय गयें कपड़ा पहिर लिहिन हाकिम हुय गयें। मनई छोड़ को जनाऊर थोडै़ अहीं।
द्वारका – हां बुआ होई ऐसन, परसों हियां हाकिम आये रहें तौन उनके खातिर तीन चार दिन पहिलेन से बहुतासा खूटा ऊंटा गाड़े जातर रहैं, मैं सोचेऊं कि कौनौं बड़ा जनाउर होई तौ तो इतने खूंटा मां बांधा जात है। नहीं भैंस गाय बिचारी तो एकय खूंटा मो रहती हैं। तौन बुआ मैं रस्ता मां खेलत रहेउं कि मनई कहेन भाग-भाग हाकिम आवत है। सब कौनों इधर-उधर लुकै दिपाय लागें। मैं तो भैया पहिलेन से डेरान रहेऊं भागेऊं जिव लैके कि कहुं काट न लेय। पे तनी साह पिछउंड़ होय के मैं देखऊं तौ मोका निनार मनईहस लाग। ऐसेन चोरै निनार मनइन के तरह होत हैं?
बुआ – इ दहिजरवा न बौरहै मां, न सरेख मां, अरे नास गड़वा हाकिमों मनई आय और चोरौ मनई आय।
द्वारका – मैं तोसुनउ है कि हाकिम मारत हे मनई का पकड़त है। ओका ताकै का सिपाही रहत है।
बुआ – बिना कसूर के हाकिम के बाप दहि जरा तो सजा दैय दई। औ कसूर कौन किहे होय तो हमही तुम सजा दै सकि त थी हाकिम से डराय न चाही हाकिम चोर बदमास का मारत और सजा देत है कुछ भले मनई का नहीं।
द्वारका – अच्छा जौ चोर दिन को चला जात होय तौ चिह्नय पडै़ कि चोर आय।
बुआ – चोर के कान पूंछ थेरै होत है जौन चिह्नय पडे़ जब तक पकड़ न जाए तब तक सब कौनों साकहैं है। आज चले मोरे साथ मैं तोका हाकिम और चोर दोइनों दिखाव दैहौं।

बुआ के साथ जाए के द्वारका व लल्लू चोर और हाकिन देख आये। अब अकीन आया कि हां चोर और हाकिम मनइन आहोए इतनी लम्बी चैड़ी बात सुनत सुनत तुम उकताय गई हौवौ पै जौन बात के बारे मैं ई सब बात कहेउं है ऊ अबहिन कहइन का काफी है – घर मां पैसा कौड़ी की तंगी रावे करै –  महतारी बेराम होय गेदवा दरमा का अब खर्चा कहां से आव, और द्वारका विचारे के दिनौं रात के मनाये से भगवान एहौ चोर न भेजन तौ लल्लू द्वारका एक दिन कहेन कि ‘‘भययाहो! मैं तो कुछ घर के काम काज करतै नहीं अहिऊं – मोका कौनौ नौकरो नहीं राखत, मैं घर मां खात भी हौं । औ न कहूं से रूप्या मिलै औ न चोर – तौ ऊअस काम न कीन जाय कि मैं चोर बन जाऊं औ तुम मोका पकड़ के हाकिम के पास लै जाय जौन रूप्या मिलै आसे घर के काम-काज की जाय। औ महतारी के दवा दरमत होय। मोका सजा होइ तौन होई।

द्वारका – जौ एसेन करै का हैं – तौ फिर में कहे न चोर बनौ तै इतना छोट
चोर के कान पूंछ थेरै होत है जौन चिन्हाय पडे़ जब तक पकड़ न जाए तब तक सब कौनों साकहैं है। आज चले मोरे साथ मैं तोका हाकिम और चोर दोइनों दिखाव दैहौं।
हम भला तोसे घर से बाहर जोल खाना मा कैसे रहि जाई – महतारिऊ तोरे बिना जिऊ दै देई।
लल्लू – नहीं भरूया तु हौ तो कुछ काम काज कै के कुछ खरिच वरिच का लैइन आयत हो महतारिव के कुछ सेवा टहल कै देत हौ। मैं तो कुछौ नहीं कै सकतेऊं तौ मोरै चोर बनव अच्छा है – महतारी पूंछे तो कहि दिहेव कि बुआ के साथ जबरजस्ती भाग गाए।

बहुत कहा सुनो के पीछे द्वारका राजी भयो दूसरे दिन डिपटी के सामने गये – लल्लू कबूलेन कि हां हम चोरी करत रहे द्वारका कहेन कि हां साहब मैं इस चोर का पकडे़व है – डिप्टी सोचेन कि कसत भाई चोर औ रचोर के पकड़वयया आहों- खर खानची से कहेन कि सौ रूप्या इनाम दें देव – रूप्या लै के घर कैतो चले – डिप्टी रहै हुशियार, द्वारका जस कहे रहा औ रजसे बहुत से हाकिम होत हैं इ डिप्टी जनाउर न रहै, इ सोचेन कि इनाम पायके ओर लोग तौ बड़े खुशी होत रहें पद इ बड़ा उदास है हैं न है, कुछ दाल मां काला है – इ सोच के ऊ द्वारका के पीछे-पीछे चले कि देखो तौ का बात है – द्वारका रूपया लै के घर आये महतारी के खातिर कुछ फल फलायी और दवाई लेत आयें इ डर के मारे कि कहूं महतारी लल्लू का पूंछ न तुरतै। दुआरे का भागैं, जौ बेर होइ चल औ लल्लू न देखाने तौ महतारी के जिव मों सकका भै कि लल्लू कहां गा- बोलायस ‘द्वारका’ औ द्वारका! द्वारका के जिव अब चुंदई कैती से उड़ा कि होय न होय महतारी लल्लू का पूंछी जौ महतारी बहुत नरियान चिल्लान बकी भूं की तौ द्वारका का सामने आये पड़ा।



महतारी पूछेस कि लल्लू का कहां छोंड़ आये – अब सो बहकावं के तरकीव भूल गै जो कौनों कबहूं झूंठ न हीं बोलत का जनी कहो ओके मुहंना से झूंठ निकरतै नहीं बुलुक से रोय दिहेन औ सब हाल सच-सच कहि दिहेन अब तौ महतारी बहुत रिसान कहेस ‘‘किमोर जिव तौ ऐसेन कल नहीं रहत मां नाराइन हम का लड़का अस सपूत दिहेन कि हमरे जिउ का एक न एक चिढ़येन रहत हैं – मैं जिव सम्हारौ नहीं परितिउं और जिव का एक न एक कलकान ठाढे़ रहत हैं – नारायेन मोका मौतो नहीं देतें एतना बेरामी अरामी होत थी महारानी भवानी हैं- मोका कौनों भूलिऊ के नहीं पूंछत – पूछैं कैसे मोका तौ भोगै कबदा है अब लल्लू का जौ जल्दी न लिअए तौ मैं न कुछ खइहौं न पीहौं आपन जिउ दइहे-दों द्वारका विचरऊ का अब हसिया के लालच होइगा। काकरैं! क्रेंन तौ अच्छे का होईगै बुराई ‘‘होम करत हाथ जरगा’’ इधर इ रोचैं कि कहां से हम अस करबौ भयेन उधर मंहतारी रोय -रोय जिव देय कि मोर ललुआ का जनी कसत होय कस न होय, डिप्टी परधी लोग के इ सब बात सुनत रहैं। वही पावं तुबू का लौट गये।औ लल्लू का बुलायिन पूछेन कि सच-सच की तुम चोराये हो लल्लू जेो कुछ चुराये हों तो कहैं। डिप्टी पूछेन कि हमैं सब हाल बतायगयें कि महतारी के दवा दरमत के खातिर इ सब हुत भेई हाकिम बउे़ खुसी भे। मारे पियाह के लल्लू का गोदी मों बैठाय के मुंह चूमंन कि भगवान हमहूं का ऐसेन लड़का दिहेव, और कहेंन कि बेटा तुम ऐस काम किहेवह ळे कि तुम्हारे हस लड़का पाय हे तुम्हार गरीब महतारी सातें मुलुक के राजा से भी बढ़के अमीर है,’’ खजानची का हुकुम दिहिनकि इ लड़का का दुइ थैली रूपिया औ रदेव और सिपाही का साथ् के देव। लल्लू रूप्या लैके हंसी खुसी घर लौ द्वारका के जिव में में जिरा आवा और महतारी तौ इतना खुसी भई कि जानौं सांप के हेरान मन मिलगा होय बिना दवा दरमत के आठ दिन मां चंड़ी होयगै।
नरायण करै ऐसन बिटिया बेटवा सब के होए।

प्रथम दलित स्त्री-रचना ‘छोटे का चोर’ हमें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की नैया के सौजन्य से प्राप्त हुई है। यह रचना उन्हें अपने शोध के दौरान हासिल हुई। 

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बहुजन परंपरा की ये किताबें पढ़ें

डेस्क 

स्त्रीकाल की अनुषंगी संस्था ‘द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन ‘ की आगामी किताबों की अग्रिम बुकिंग शुरू है. आगामी तीन से चार सप्ताह में आने वाली किताबों के लिए अग्रिम बुकिंग ‘पहले आओ पहले पाओ की नीति’ के तहत विशेष छूट के साथ शुरू की जा रही है. किसी एक किताब (पेपर बैक) की खरीद पर पायें 35% की विशेष छूट और दो किताबों पर 40% की. हार्ड बाउंड किताबों पर  45% की छूट दी जायेगी. बुकिंग ऑनलाइन या अकाउंट ट्रांसफर के जरिये की जा सकती है.

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1.               सावित्रीबाई फुले रचना समग्र :
                  संपादक: रजनीतिलक, मराठी से अनुवाद: शेखर पवार

यह किताब 19वीं सदी की उस युगनायिका के लेखन का समग्र संकलन है, जिसे आधुनिक भारत में स्त्री शिक्षा की मशाल जलाने का श्रेय जाता है. पुस्तक में संकलित सावित्रीबाई फुले की रचनायें, उनके विचार पाठकों के विचारोन्मेष के लिए जितने उपयोगी हैं, उतना ही इतिहास, साहित्य और समाजशास्त्र के शोधार्थियों के लिए भी.

मूल्य:  अजिल्द: 160 रूपये
सजिल्द: 350 रूपये

2. चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु ग्रन्थावली (चार खण्डों में प्रकाशित)
   संपादक : कँवल भारती 


डा. भीमराव अम्बेडकर (बाबा साहेब) के जीवन और कार्यों से उत्तर भारत को परिचित कराने वाले चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु  और कँवल भारती द्वारा संपादित उनकी ग्रंथावाली पर चिंतक/ साहित्यकार प्रेमकुमार मणि की टिप्पणी:
बोधानन्द और अछूतानंद की वैचारिकता को चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु ने  आगे बढ़ाया और इस पूरे संघर्ष को एक व्यवस्थित गति दी . यह चुनौती पूर्ण कार्य था . लखनऊ के सआदतगंज में उन्होंने एक प्रेस और प्रकाशन की स्थापना की . प्रकाशन का नाम था बहुजन कल्याण प्रकाशन और प्रेस का नाम समाज सेवा प्रेस .  उन्होंने स्वयं बोधानन्द और अछूतानंद की जीवनियां लिखी और प्रकाशित की . बाबासाहेब का जीवन संघर्ष उनकी लिखी ऐसी महत्वपूर्ण कृति है ,जिसे पढ़कर हिंदी भाषी भारत के लोग आंबेडकर के जीवन और कृतित्व से परिचित हुए . आंबेडकर की अनेक पुस्तकों के अनुवाद और प्रकाशन का श्रेय जिज्ञासु जी को जाता है . हिंदी भाषी इलाके को उन्होंने आंबेडकर  से परिचित कराया . लेकिन इतना ही कहना शायद उनके महत्त्व को सीमित करना होगा  .  उन्होंने एक मन्त्र दिया कि दलित और पिछड़ी जातियों को एक साथ आये बिना ब्राह्मणवाद से निर्णायक लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती . मार्क्सवाद ,गांधीवाद ,लोहियावाद और अन्य दूसरे समाजवादी संघर्षों से चुपचाप अलग रहते हुए उन्होंने मनोयोग पूर्वक फुले -अम्बेडकरवाद की ज़मीन उत्तरभारत में तैयार की

इतने महत्त्व पूर्ण लेखक -विचारक की रचनावली उपलब्ध नहीं थी . उन्ही की परम्परा के योद्धा लेखक कँवल भारती ने जिज्ञासु जी की रचनावली परिश्रम पूर्वक सम्पादित कर ऐतिहासिक महत्त्व का कार्य किया है . यह रचनावली बहुजनों के समग्र संघर्ष को बल तो प्रदान करेगी ही ,एक नए आधुनिक भारत का स्वरूप भी निर्धारित करेगी ,जो अधिक लोकतान्त्रिक और न्यायपूर्ण होगा .

मूल्य:  अजिल्द: 450 रूपये ( चौथे खंड का मूल्य 250 रूपये)
सजिल्द: 900 रूपये ( चौथे खंड का मूल्य 500 रूपये)
नोट:   पूरा सेट खरीदने पर ( 1000 रूपये में अजिल्द और 1900 रूपये में सजिल्द उपलब्ध है)

3. भारत के राजनेता: अली अनवर 
  संपादक : राजीव सुमन 
  श्रृंखला संपादक : प्रमोद रंजन 


यह किताब एक खास उद्देश्य से एक सुनिश्चित श्रृंखला के तहत प्रकाशित की जा रही किताबों का हिस्सा है. ‘भारत के राजनेता’ सीरीज के तहत प्रकाशित किताबों का उद्देश्य है कि लोग यह समझें कि जिन विचारों, जिन मुद्दों के लिए वे अपने नेता को चुनकर विभिन्न सदनों में भेजते हैं, जिन्हें अपने हितों के लिए जनादेश देते हैं वे क्या और कितना उनकी उम्मीदों पर खरे उतरते हैं. चुने हुए प्रतिनिधि अपनी जनता की समस्याओं, उनके दुःख-दर्द  और अपने क्षेत्र की मूलभूत समस्याओं के साथ-ही-साथ राज्य और देश के विकास में कितने मुखर रूप से और प्रभावी ढंग से संसद के या विधान सभा के पटल पर रख पाते हैं. सदनों के पटल पर उनका हर कार्य-व्यवहार उनकी बोली और भाषा उनके भाषण, मुद्दे उठाने और उनके जुझारूपन का सीधा संबंध उन सबकी सामूहिक चेतना और उत्तरदायित्व से जुड़ता है और उसी का प्रतिबिम्बन माना जा सकता है, जिनकी और जिस क्षेत्र की वे नुमाइंदगी कर रहे होते हैं. संसदीय या विधानसभा की कार्यवाहियों में उनकी सक्रीय भागीदारी और हिस्सेदारी उनका व्यक्तिगत मसला नहीं होता. वे कितनी सिद्दत और कितनी सहजता से अपने लोगों, अपने क्षेत्र की समस्याओं को आवाज दे पाने में सफल होते हैं उससे उनकी नियत की झलक मिलती है.

यह किताब भारत में ‘पसमांदा आन्दोलन के सूत्रधार राज्यसभा में दो बार चुने हुए प्रतिनिधि ‘अली अनवर’ की संसदीय सहभागिता और समाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर उनकी पहलों को केन्द्रित है.  इस किताब के संपादन में ऐसी रूपरेखा और सम्पादन के क्रम में ऐसे मानक तय किये जो विश्वसनीय हों और जिसके द्वारा तय हो सके कि जनता का वोट जाया नहीं गया. हम संसद के दोनों सदनों और या विधानसभाओं में विभिन्न मसलों पर उनके वक्तव्यों, उनके दर्ज भाषणों और उनके हस्तक्षेपों के साथ-साथ स्पेशल मेंशन, शून्य काल, और तारांकित प्रश्नों-उत्तरों के माध्यम से उनके कंसर्न को देखने समझने की कोशिश कर रहे हैं. इन सबके अलावा एक लंबा साक्षात्कार भी इस पुस्तक में शामिल किया गया है जिससे उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि से लेकर उनके सामाजिक राजनैतिक और आर्थिक पृष्ठभूमि को समझने में मदद मिल सके.  यह किताब आधुनिक भारत के समाज शास्त्र, राजनीति विज्ञान और इतिहास के शोधार्थियों तथा राजनीति और अपने जन प्रतिनिधि को समझने के लिए आम जन के लिए उपयोगी है.

मूल्य:  अजिल्द: 200 रूपये
सजिल्द: 400 रूपये




4. प्रसाद काव्य-कोश 
    संपादक : कमलेश वर्मा 
               सुचिता वर्मा 


हिन्दी कविता के शिखर कवि जयशंकर प्रसाद का यह काव्य-कोश हिन्दी के पाठकों शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण पुस्तक है.

मूल्य:  सजिल्द: 950 रूपये

अग्रिम बुकिंग

संपर्क: द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन
इग्नू रोड, नेबी सराय, दिल्ली, 68
रजिस्टर्ड कार्यालय: सनेवाड़ी, वर्धा, महाराष्ट्र-1
ईमेल: themarginalisedpublication@gmail.com, फोन: 9650164016, 8130284314

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