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देवी से देवदासी तक संकट ही संकट: मानवाधिकार आयोग हुआ सख्त

स्त्रीकाल डेस्क 


भारत में लोकतंत्र अपना काम कर रहा है. एक ओर  छतीसगढ़ में देवी पूजा के नाम पर दूसरों की आस्थाओं पर हमले पर न्यायालय  और न्याय व्यवस्था सख्त है वहीं दो राज्यों से मानवाधिकार आयोग ने दक्षिण भारत में प्रचलित देवदासी जैसी कुप्रथा पर सवाल पूछे हैं. यह एक तरह से राज्य की स्वीकृति है देवदासी जैसी कुप्रथा के अस्तित्व पर.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने दक्षिण भारत में प्रचलित देवदासी जैसी कुप्रथा पर संज्ञान लेते हुए तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है। आयोग ने माना है कि इस तरह की परंपराओं के तहत लड़कियों व महिलाओं के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता है, और ये प्रथा आज भी कई राज्यों में जारी है।
आयोग ने  पिछले दिनों कहा कि तमिलनाडु के तिरूवलूर ज़िले और आसपास की जगहों में लड़कियों और महिलाओं को देवी मातम्मा के मंदिरों में ले जाया जाता है। आयोग ने इस परंपरा के जारी रहने संबंधी शिकायतों और मीडिया रिपोर्ट के अधार पर मामले में स्वत: संज्ञान लिया है।

जयभीम वाला दूल्हा चाहिए

आयोग ने तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के मुख्य सचिवों और पुलिस महानिदेशकों व आंध्र प्रदेश के तिरूवलूर और चितूर के ज़िलाधिकारियों और पुलिस अधीक्षकों को भी नोटिस जारी कर चार सप्ताह में रिपोर्ट तलब की है।

आयोग ने कहा, ‘कथित रूप से परंपरा के तहत लड़कियों को दुल्हन की तरह सजाया जाता है और समारोह समाप्त होने के बाद उनके वस्त्रों को पांच लड़के हटाते हैं| वे निर्वस्त्र रह जाती हैं। उन्हें उनके परिवारों के साथ नहीं रहने दिया जाता और शिक्षा ग्रहण नहीं करने दिया जाता। उन्हें मातम्मा मंदिर में रहने के लिए मजबूर किया जाता है जहां उन्हें यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।’

आयोग ने कहा कि यदि आरोप सही हैं तो ये मानवाधिकारों का उल्लंघन है। आयोग ने एक बयान में कहा कि यह कथित रूप से देवदासी प्रथा का ही अन्य रूप है जो कि अभी भी तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों में प्रचलन में है।


मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था , देना होता था स्तन टैक्स

क्या है देवदासी प्रथा ?

देवदासी या देवारदियार का मतलब होता है ‘सर्वेंट ऑफ गॉड’, यानी देव की दासी। देवदासी बनने का मतलब होता था भगवान या देव की शरण में चला जाना। उन्हें भगवान की पत्नी समझा जाता था। इसके बाद वे किसी जीवित इंसान से शादी नहीं कर सकती थीं। पहले देवदासियां मंदिर में पूजा-पाठ और उसकी देखरेख के लिए होती थीं। वे नाचने गाने जैसी 64 कलाएं सीखती थीं, लेकिन बदलते वक्त के साथ-साथ उसे उपभोग की वस्तु बना दिया गया।


इतिहासकारों का मानना है कि देवदासी प्रथा की शुरुआत छठी और सातवीं शताब्दी के आसपास हुई थी। इस प्रथा का प्रचलन मुख्य रूप से कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र में बढ़ा। दक्षिण भारत में खासतौर पर चोल, चेला और पांड्याओं के शासन काल में ये प्रथा खूब फली फूली।

शूद्रा: एक समाज शास्त्रीय अध्ययन (धर्मशास्त्रीय दृष्टिकोण से)

आजादी के पहले और बाद की सरकारों ने भी देवदासी प्रथा पर पाबंदी लगाने के लिए कानून बनाए। पिछले 20 सालों से पूरे देश में इस प्रथा पर पूरी तरह पाबंदी है। कर्नाटक सरकार ने 1982 में और आंध्र प्रदेश सरकार ने 1988 में इस प्रथा को गैरकानूनी घोषित कर दिया था, लेकिन राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 2013 में बताया था कि अभी भी देश में लगभग 4,50,000 देवदासियां हैं। जस्टिस रघुनाथ राव की अध्यक्षता में बने एक और कमीशन के आंकड़े के मुताबिक सिर्फ तेलंगाना और आँध्र प्रदेश में लगभग 80,000 देवदासिया हैं।

खबर  की भाषा और इनपुट पड़ताल पोर्टल से 

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छत्तीसगढ़ में दुर्गापूजा आयोजन समिति के खिलाफ केस दर्ज:आदिवासियों की धार्मिक भावना भड़काने का आरोप



नवल किशोर कुमार


छत्तीसगढ के कांकेर जिले के पखांजुर थाने में स्थानीय आदिवासी समुदाय के लोगों ने दुर्गापूजा समिति के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया है। इस कारण कांकेर जिले से लेकर छत्तीसगढ़ के शीर्ष पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है।

दरअसल अनुसूचित जाति मोर्चा के कांकेर जिला उपाध्यक्ष लोकेश सोरी ने अपने एफआईआर में कहा है कि महिषासुर अनुसूचित जनजाति के लोगों के पुरखे हैं। पखांजुर थाने परलकोट इलाके में दुर्गा पूजा पंडालों में मूर्तियों में दुर्गा द्वारा उनका वध करते हुए दिखाया गया है।

अपने ही पराभव का जश्न मनाती है स्त्रियाँ ! ( दुर्गा पूजा का पुनर्पाठ )

उन्होंने कहा है कि पांचवीं अनुसूची क्षेत्र के अनुच्छेद 244(1), अनुच्छेद 13(3) (क), अनुच्छेद 19(5) (6) के प्रावधानों के अनुसार आदिवासियों की भाषा, संस्कृति, पुरखों, देवी-देवताओं के उपर हमले एवं अपमान को अनुचित एवं दंडनीय बताया गया है।

उल्लेखनीय है कि इन्हीं कानूनी प्रावधानों के तहत पिछले वर्ष 12 मार्च 2016 को छत्तीसगढ़ के ही राजनंदगांव जिले के मानपुर थाने में सतीश दूबे नामक एक शख्स के उपर महिषासुर का अपमान करने और आदिवासियों को गाली देने के आरोप में मुकदमा दर्ज किया गया था। इस मामले में पांच अन्य लोगों को भी अभियुक्त बनाया गया था। इस मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक न्यायादेश में आरोपितों की जमानत याचिका को खारिज किया था। अपने न्यायादेश में अदालत ने महिषासुर के अपमान को आदिवासियों के धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला करार दिया था। और बचाव पक्ष के वकील का दावा खारिज कर दिया था. दुबे पर आरोप था कि उसने उस भीड़ का नेतृत्व किया है जो नारे लगा रही थी कि ‘ महिषासुर के औलादों को जूते मारो सालों को.’

एक सांस्कृतिक आंदोलन के चार साल

बहरहाल गुरूवार को कांकेर जिले के पखांजुर थाने में दर्ज कराये गये मामले की पुष्टि करते हुए जिला अधीक्षक एम एल कोटवानी ने फारवर्ड प्रेस को दूरभाष पर बताया कि आरोपितों के बारे में जानकारी खंगाली जा रही है। उनके मोबाइल नंबर के सहारे उनकी खोजकर गिरफ्तार करने की कार्रवाई की जा रही है। वहीं पखांजुर थाने के एसडीओपी शोभराज अग्रवाल ने भी मामले की पुष्टि की है।

लेखक फॉरवर्डप्रेस के हिन्दी सम्पादक है, रिपोर्ट फॉरवर्ड प्रेस की वाल से साभार

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बीएचयू में लड़कियों के आंदोलन को हड़पने की रस्साकशी

अनिता भारती 

बीएचयू में लड़कियों के स्वतःस्फूर्त आन्दोलन को एबीवीपी और एनएसयूआई द्वारा हड़पने की कोशिश के बारे में बता रही हैं आन्दोलन की एक भागीदार अनिता भारती. 

मैं व्यक्तिगत रूप से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के इस आन्दोलन में 22 सितम्बर 2017 की रात 11.20 बजे से सक्रिय रूप से शामिल हुई थी. बी.एच.यू. में एक विद्यार्थी के रूप में मेरा जीवन सन 2007-08 से शुरू होकर 2016 में एल.एल.एम. की उपाधि लेने के साथ ख़त्म हुआ. विश्वविद्यालय में इन आठ सालों में मुझे हमेशा यही महसूस हुआ कि यह परिसर आलोचनात्मक दृष्टिकोण पैदा करने लायक और स्वस्थ राजनीतिक गतिविधियों के के लिए कभी भी अनुकूल नहीं रहा. परिसर के अन्दर महिला छात्राओं एवं पुरुष छात्रों के लिए हमेशा ही दोहरा मापदंड अपनाया गया. जैसा कि विगत तीन सालों से संघी कुलपति की सरकारी नियुक्ति होने के बाद महिला, छात्राओं के अधिकारों के हनन की दर तेजी से बढ़ी है. उनपर संघी प्रकोप भी बढ़ा है. इस परिसर में छात्राओं को सुविधा के नाम पर वी.सी. की तरफ से केवल वाहियात किस्म के संघी फरमान सुनाये गए. छात्राओं के संवैधानिक अधिकारों का हनन किया गया जिसमे समानता का महत्वपूर्ण अधिकार भी है. उदाहरण के लिए छात्राओं को रात के समय में कहीं आने-जाने में पाबन्दी, महिला छात्रावासों में वाई-फाई सुविधा का न होना. मेस में मांसाहारी भोजन न देना. इत्यादि. हालांकि ये सभी मामले न्यायपालिका के समक्ष विचाराधीन हैं.

‘टच ही तो किया है न और कुछ नहीं किया न’ : प्रशासन के जवाब से आक्रोशित लडकियां

लेकिन महिला छात्राओं के लिए इन सभी में भी सर्वोपरि मामला उनकी सुरक्षा का रहा है. हालांकि परिसर में सुरक्षा की समस्या हमेशा ही रही है. किन्तु पहले ऐसी वारदात होने के बाद सुनवायी होती थी. किन्तु 2014 से एक ख़ास तरीके की विचारधारा से पोषित कुलपति को विश्वविद्यालय पर थोप दिया गया. यह इन्सान ऐसा बयान देता रहता है कि “लड़कियों को रात में नहीं पढ़ना चाहिए.” इक्कीसवीं सदी में ऐसी विचारधारा का स्थान कहाँ पर है. वी.सी. महिला छात्रावासों की मेस में मांसाहारी खाने पर इसलिए रोक लगाने के फैसले करते हैं कि उनके अनुसार “मांसाहारी भोजन से काम उत्तेजना बढ़ती है.” सवाल यह कि इस दौर में ऐसी सोच रखने वाला कुलपति विश्वविद्यालय और देश निर्माण में क्या सहयोग और योगदान करेगा? और विश्वविद्यालय ऐसी सोच के साथ किस ओर जायेगा? विगत तीन वर्षों में छात्राओं के साथ छेड़खानी और शारीरिक शोषण से सम्बंधित कई घटनायें हुईं जिनकी शिकायत बीएचयू  प्रशासन से की भी गयी. लेकिन सुरक्षा के नाम पर वीसी से केवल आश्वासन मिला और कभी-कभी तो कमिटी भी बनायी गईं  जो वस्तुतः निष्प्रयोज्य ही रहीं. इनका कोई निष्कर्ष नहीं मिला. इतने सालों के दबे आक्रोश में 21 सितम्बर की घटना ने एक चिंगारी दे दी और इसने 24 सितम्बर तक ‘शोले’ का रूप ले लिया. जिसने इस देशव्यापी आन्दोलन को जन्म दिया.
पूरे तीन दिन तक यह आन्दोलन स्वतन्त्र और सफल रूप से चला. इसमें महिला छात्राओं के साथ पुरुष छात्रों की समान भागीदारी रही. उम्मीद की सकती है कि यह आन्दोलन ऐतिहासिक होगा. क्योंकि महिला छात्राओं द्वारा प्रारंभ किया गया यह आन्दोलन बिना किसी राजनीतिक सहयोग के वृहत रूप लिया है. इस आन्दोलन से पूरे भारत में यह सन्देश गया है कि बी.एच.यू. में महिला छात्राओं के साथ कितना उच्चस्तर का भेदभाव होता है. इस आन्दोलन ने बी.एच.यू. को लेकर कई पहेलियों पर से पर्दा उठाया है.

आन्दोलन में शामिल लेखिका, छात्राओं के बीच में

मेरा मानना है कि प्रत्येक आन्दोलन अपने आप में कुछ नवीन सृजन होता है जो लोगों में बदलाव की उम्मीद जगाता है. इस आन्दोलन में भी कई लोगों के अन्दर नेता बनने की उम्मीद जगी है. इसमें कोई खराबी भी नहीं है. किन्तु जो लोग आन्दोलन में शरीक नहीं हुए वो इस तरीके की अनैतिक आकांक्षा को अपने भीतर जन्म लेने देते हैं तो यह कोरी अवसरवादिता ही होगी. इस आन्दोलन में बीस फीसदी के आस-पास वो लोग शामिल रहे जिनकी जिम्मेदारी  केवल फोटो और सेल्फी लेने की थी. यह दौर 23 सितम्बर की शाम तक बढ़ता जा रहा था. ये वो सेल्फियाये हुए लोग थे जिन्हें लगता है कि क्रान्ति फेसबुक से होकर बी.एच.यू. तक आ जाएगी. आन्दोलन में स्वघोषित राष्ट्रवादी और भाजपा का बगलबच्चा संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की एक महिला सदस्य ने आन्दोलन में हस्तक्षेप करके उस पूरे आन्दोलन को हड़पने तथा उसका श्रेय लेने का प्रयास किया किन्तु आन्दोलनरत विद्यार्थियों ने उसे भगा दिया. ये महिला आन्दोलन में तो शरीक नहीं थी किन्तु दिन में दो-तीन बार टी.वी. चैनल वालों को साक्षात्कार देकर हॉस्टल में आराम फरमाने चली जा रही थी. कुलपति  से मिलने वाली छात्राओं में ये भी शामिल थी. जबकि आन्दोलनकारियों की मांग थी कि कुलपति मुख्य गेट पर आकर छात्राओं से मिलें.

इसके बाद बारी आती है कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई का. ये खुद तो प्रत्यक्ष रूप से आ नहीं पा रहे थे. आन्दोलन में इनकी इंट्री ‘जॉइंट एक्शन कमेटी’ (जे.ए.सी.) के माध्यम से हुई. इनसे सम्बंधित विद्यार्थी भी आन्दोलन में पूरे समय मौजूद न रहकर केवल चैनलों पर अपना चेहरा दिखाने को बेकरार दिख रहे थे. एनएसयूआई. ने महिला महा विद्यालय की छात्रा मिनेशी मिश्रा को अपना मोहरा बनाया. ये मोहतरमा पूरी तरह से टी.वी. चैनल को बाइट देती थीं.

क्यों कर रही हैं लडकियां पीएम मोदी का विरोध (!)

अब मिनेशी मिश्रा 26 सितम्बर को दिल्ली के जंतर-मंतर में खुद को आन्दोलन की नायिका के रूप में प्रस्तुत कर रही हैं. मीडिया भी उन्हें आन्दोलन की नायिका के रूप में ही प्रस्तुत कर रही है जिसने आन्दोलन को राष्ट्र व्यापी बना दिया. इस बात पर यहाँ जीरो ग्राउंड पर लगे हुए आन्दोलनकारियों में निराशा और भारी नाराजगी है. इस आन्दोलन में जितनी भागीदारी महिला साथियों की रही उसी अनुपात में पुरुष साथियों का साथ और सहयोग भी रहा. सभी ने समान रूप से लाठियों और प्रशासन के तानाशाही रवैये का सामना किया है. इसलिये जो लोग दिल्ली में जाकर नेता बनने की कोशिश  में लगे हुए हैं वो सुधर जायें. इससे उनका और आन्दोलन का दोनों का ही भला होगा. अन्यथा  यदि आन्दोलन 2 अक्टूबर के बाद भी जारी रहा तो इसके बहकने और असफल हो जाने की संभावनाएं अधिक हो जाएँगी.  इतना तो तय है कि जो लोग दिल्ली जाकर नेता बनने की आकांक्षा पाले बैठे हैं वो केवल मोहरे बनेंगे या फिर कि चाटुकार.

लेखिका बीएचयू की विधि संकाय की पूर्व छात्रा है. 
 ईमेल: singhanita254@gmail.com


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बीएचयू में प्रशासन के गुंडे थे सक्रिय: लाठीचार्ज का आँखों देखा हाल

विकाश सिंह मौर्य


23 सितम्बर को दोपहर बाद अखिल विद्यार्थी परिषद् के उपद्रवी लड़कों ने अफवाह उड़ाई कि मुख्य गेट के सामने स्थित मदन मोहन मालवीय के काली रंग की प्रतिमा पर आन्दोलनरत विद्यार्थियों ने कालिख पोत दिया है. इसके बाद ही यहाँ पर पर माहौल में तबदीली आनी शुरू हो गयी. इसी बीच पहले एबीवीपी और अभी समाजवादी छात्र सभा के एक सदस्य ने आन्दोलन स्थल पर जाकर नारेबाजी करके महल को राजनितिक रंग देने का प्रयास किया. आरोप है कि उसे प्लान के तहत भेजा गया था. 23 सितम्बर को ही दोपहर बाद लगभग 3 बजे वीस. गिरीश चन्द्र त्रिपाठी ने आन्दोलनकारियों को सन्देश भिजवाया कि ‘वह केवल छात्राओं से बात करेंगे किसी भी छात्र के सामने नहीं, साथ में पांच से अधिक छात्राएं नहीं होंगी. और यह वार्ता धरना स्थल यानि मुख्य गेट पर न होकर महिला महाविद्यालय (एम.एम.वी.) में होगी.’ पांच की संख्या को लेकर सभी आन्दोलनकारियों ने विरोध किया. बाद में यह तय हुआ कि ठीक है चाहे जितनी संख्या में आयें पर केवल छात्राएं ही आयेंगी. मुख्य गेट से सभी धरनारत छात्राओं को एम.एम.वी. में बुलाकर एक घंटे से अधिक समय तक बैठाये रखा गया और उनसे कोई मुलाकात करने नहीं आया. इस दौरान एमएमवी के सामने सीआरपीएफ और पीएस. छावनी बनाकर खड़ी रहीं. फिर लगभग चार बजे कहा गया कि वीसी त्रिवेणी संकुल में मुलाकात करेंगे. कुछ छात्राएं वहां भी गयीं. पर मुलाकात नहीं हो पाई. कुछ छात्राएं वीसी आवास के सामने भी उनसे मिलने को लेकर धरने पर बैठ गयीं.

इस बीच चार की संख्या में लोग आये और मुख्य गेट से ‘वीसी जिंदाबाद’ के नारे लगाते हुए जबरदस्ती अर्धसैनिक बलों और वाराणसी पुलिस को अन्दर घुसाने का प्रयास करने लगे. जब इधर इन्बका प्रयास विफल हो गया तो ठीक बगल में कैंपस में ही स्थित सर सुन्दर लाल चिकित्सालय के दरवाजे से उनको एंट्री दिलवाई. तब इस टुकड़ी ने एमएमवी पर जाकर छात्राओं पर लाठी चार्ज किया. आन्दोलनकारी छात्राओं अवगन छात्रों पर भाजपा और एबीवीपी के नेताओं और कुछ पा जाने के लालचियों ने वामपंथी और देशद्रोही होने का आरोप भी लगाया है. छात्राओं को इतना बुरे तरीके से पीटा जा रहा था कि उनके हाथ, मुंह, सिर कहीं भी लाठियां भांज दी जा रही थीं. कुल मिलाकर खौफनाक मंजर की शुरुआत यहीं से होती है. मेरे एक सीनियर, विजेंद्र मीना जो देर रात तक मुख्य गेट पर थे, रात में लगभग 10.30 पर मेरे पास उनका फोन आया कि मामला बहुत बिगड़ रहा है और वहां पर कुछ लोग हंगामा कर रहे हैं. हम लोग मुख्य गेट की तरफ जा ही रहे थे कि सूचना मिली कि लगभग 15 मिनट के बाद रात में वीसी आवास के पास छात्राओं पर भयंकर लाठीचार्ज किया जा रहा है. छात्राओं की सुरक्षा में उतरे और महिला पुलिस की मांग कर रहे छात्रों पर भी निर्मम तरीके से लाठीचार्ज किया गया. इस बीच ऐसे उपद्रवियों ने आगजनी कर दिया और एक बाइक को आग के हवाले कर दिया जिन्हें सुरक्षाकर्मी देखते रहे और उनको रोका-टोका नहीं. जबकि इसी समय ट्रामा सेन्टर से एक मरीज को दिखाकर आ रहे लाल बहादुर शास्त्री छात्रावास के लड़के को इन लोगों ने दौड़ा-दौड़ा कर पीटा. 23-24 सितम्बर की रात 12 बजे से 12.30 बजे तक अर्धसैनिक बल, पीएसी और बीएचयू का प्रक्टोरिअल बोर्ड बिड़ला हॉस्टल में घुस आया और कमरों की तलाशी लेने लगा. इसी समय मुख्य गेट के पास धरने पर बैठी छात्राओं पर भी जिलाधिकारी की उपस्थिति में लाठीचार्ज किया गया. तब बीएचयू प्रशासन के अनुसार किसी छात्र ने पेट्रोल बम फोड़ दिया, जबकि छात्रों का कहना है कि बम भी प्रशासन ने फोड़े थे.


‘टच ही तो किया है न और कुछ नहीं किया न’ : प्रशासन के जवाब से आक्रोशित लडकियां

24 सितम्बर को एमएमवी के सभी महिला छात्रावास, त्रिवेणी संकुल के सभी महिला छात्रावास, बिड़ला ‘ए’, ‘बी’ तथा ‘सी’ छात्रावास, लाल बहादुर शास्त्री छात्रावास एवं विज्ञान संकाय का ब्रोचा छात्रावास (यह संभवतः एशिया का सबसे बड़ा रिहायसी छात्रावास भी है) जबरदस्ती करके खाली करवा लिए गये. लड़कियों से दबाव डलवाकर छुट्टी का प्रार्थना पत्र लिखवा लिया गया. इन सभी को इस तरीके से बाहर भगाया गया कि जैसे ये सभी छात्राएं और छात्र जबरदस्ती कब्ज़ा करके पहले से यहाँ पर रह रहे थे और प्रशासन ने अतिक्रमण हटवाया हो. 25 सितम्बर की शाम तक भी मुझे त्रिवेणी संकुल और एम.एम.वी. की कुछ लड़कियां परेशान हालत में मिली हैं जो कहीं रुकने का ठिकाना ढूढ़ रही थीं. बीएचयूमुख्य गेट से हॉस्टल रूट पर ब्रोचा छात्रावास तक सी.आर.पी.एफ. के जवानों को ऐसे तैनात किया गया है की जैसे आतंकवादियों को ढूढ़ने का कोई अभियान चलाया गया हो. बीच में चिकित्सालय के सामने महिला पुलिस के भी लगभग चालीस की संख्या में सिपाही लगे हुए हैं. यह स्थिति 25 सितम्बर की है. जवानों को भी सही सूचना उनके अधिकारीयों ने नहीं दिया है. सी.आर.पी.एफ. के एक जवान ने बातचीत के दौरान बताया कि उन्हें बताया गया है कि कुछ उग्रवादी और नक्सल समूहों ने विद्यार्थियों को भड़काया है.

इस आन्दोलन को जहाँ देशभर के विश्वविद्यालयों और देश का भला चाहने वाले लोगों का समर्थन मिल रहा है. वहीं दूसरी तरफ यहीं के कुछ तुलसीदासी परंपरा के बजबजाते हुए मस्तिष्क वाले प्रोफ़ेसर, विद्यार्थी एवं महिला अध्यापक भी लड़कियों को ही भला-बुरा कह रहे हैं. किन्तु ये लोग सहज ही दया के पात्र बनते नजर आ जा रहे हैं. पुलिस और पी.ए.सी. की पिटाई में एम.एम.वी. के समाजशास्त्र विभाग की अध्यापिका डॉ. प्रतिमा गोंड को भी चोटें आयी हैं. डॉ. प्रतिमा बीएचयू शिक्षक और कर्मचारियों में एकमात्र सदस्य हैं जो छात्राओं के समर्थन में खुलके आगे आई हैं. बहुत सारे सनातनी और खुद को प्रगतिशील कहने वाले अध्यापकों ने वीसी के पक्ष में बयान जारी किया है. ये बुद्धिजीवियों की उस प्रजाति से सम्बंधित हैं जिनका धर्म सत्ता की सेवा है. 25 सितम्बर की शाम को वीसी बनारस छोड़कर दिल्ली जा चुके हैं. यहाँ भी दोतरफा पेंच है. एक तो जो सबको दिख रहा है कि आन्दोलन से घबराकर भागा है. दूसरा मामला नियुक्तियों में भयानक भ्रष्टाचार और अनियमितता से सम्बंधित है. कुलपति ने कुछ महत्वपूर्ण पदों के लिए आज ही साक्षात्कार लिया है. जिसमे चिकित्सालय अधीक्षक सहित तमाम महत्वपूर्ण पदों का मामला शामिल है.  खबर है कि इनकी नियुक्तियों का लिफाफा दिल्ली में ही खुलेगा.

इस बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कमिश्नर से इस मामले की रिपोर्ट देने को कहा है. और इधर कमिश्नर ने फरमान जारी किया है कि जिसके पास भी इस मामले से सम्बंधित कोई तथ्य हो, उनसे उनके ऑफिस में मिल सकता है. इसका दूसरा पहलू यह भी हो सकता है कि कमिश्नर और उनकी टीम खुद बीएचयूकैंपस में नहीं आयेगी, जो अपने रिस्क पर सूचना देना चाहता हो जाए और बताये. एक मामला अहम मुद्दा यह है कि जब लगभग सभी पीड़ितों को यहाँ से भगा दिया गया है, तब ऐसे में पूछताछ किससे और कैसे होगी? रिपोर्ट में क्या दिखाया जाना है? लगता है यह भी फिक्स हो चुका है. क्या यह वीसी को बचाने और कोई जबरदस्त गेम खेलने की सरकार की कोई परियोजना तो नहीं बन रही है?

बीएचयू सहित बनारस के अन्य विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों का एक समूह जंतर-मंतर पर धरने के लिए रवाना हो चुका है और शायद रिपोर्ट पब्लिश किये जाने तक प्रदर्शन में शामिल भी हो जाये. छुट्टियों के बाद आन्दोलन की स्थिति क्या होगी? अभी से इस पर कुछ भी कहा जाना मुश्किल है. इसका कारण यह है कि संभवतः तब तक आन्दोलन का पूरी तरह से राजनीतिकरण हो जायेगा. और यही विश्वविद्यालय प्रशासन, राज्य एवं केंद्र सरकारें चाहती भी हैं. देखना यह है कि यह उत्तेजना, विश्वाश और प्रतिबद्धता कब तक कायम रहती है? क्या अगली बार कभी भी छेड़खानी होने पर कोई लड़की कुछ ऐसा कदम उठाएगी, जो बाकियों के लिए एक नजीर हो.

क्यों कर रही हैं लडकियां पीएम मोदी का विरोध (!)

बीएचयू के मामले को देखकर बीएचयू प्रशासन एवं वाराणसी प्रशासन सहित केन्द्रीय बलों के रवैये को देखते हुए और इन पर कुछ बड़े मीडिया घराने (जिनकी पहुँच व्यापक है) और प्रिंट मीडिया के रणनीतिक स्टैंड को देखकर तो लगता है कि कश्मीर घाटी जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को किस विकृत और अधकचरे ढंग से देश के सामने परोसा जाता होगा? वैसे इस मामले में मेरा अनुभव कोई पहली बार नहीं है. किन्तु इस बार तो यह पक्के तौर पर प्रतीत होता है कि आम कश्मीरी (जिसमें से एक नाम नजीब भी थे) जिन्हें सेना और सरकार द्वारा सताया जाता है. निर्दोष और भोले लोग होंगे. वैसे यही खेल बुंदेलखंड के तथाकथित दस्यु प्रभावित क्षेत्र के बारे में भी सही है. अब बनारस और अन्य जगहों के सरकारी बयानबाजी को सच मानने वालों को भी हैदराबाद, जेएनयू.और अन्य विश्वविद्यालयों की घटनाओं वहां के बयान और तोड़-मरोड़कर सच की ऐसी-तैसी करने वालों के बारे में अपनी सही समझ विकसित कर लें.

बनारस के आस-पास के गाँव जहाँ अभी भी दुर्गा पूजा जैसे धूर्तों के जाल में फंसे हुए हैं. और इधर लड़कियों पर सरकारी और सरकार प्रायोजित शोहदों की आफत बरस रही है. अब भी ये चेत जाएँ तो समय है. यह समय नींद से उठकर सुबह की तेज दौड़ करने का है. अब भी जो नहीं जागेगा, वह सोता ही रह जायेगा. तुलसीदास की ‘सकल ताड़ना के अधिकारी’ चरितार्थ हो ही रही है. यहाँ एक मामला यह भी है कि आन्दोलन में शामिल यही लड़कियां सावन में विश्वनाथ मंदिर में बगैर कुछ खाए-पिए सोमवार को दूध बरबाद करने भी बड़ी संख्या में जाती हैं. लगभग प्रत्येक दकियानूसी व्रत-त्यौहार को बिना अपने बुद्धि-विवेक का प्रयोग किये मानती हैं. इनके रक्षाबंधन का कौन सा सकारात्मक प्रभाव होता है हमें तो कहीं दिखाई नहीं देता.

आन्दोलन में शामिल इन सभी छात्राओं एवं छात्रों को कम से कम जोतिबा फुले और सावित्री बाई फुले जी के संघर्ष को, उनके साहित्य को, सत्य शोधक समाज के कार्यों को पढ़ना-समझना चाहिए. तभी आगे का रास्ता प्रशस्त होगा. यह इसलिए भी आवश्यक है कि आज शिक्षा प्राप्त करने वाली प्रत्येक महिला एवं लड़की इस दंपत्ति की कर्जदार है. और वाह भी ऐसा कर्ज जो कभी भी उतार पाना शायद संभव नहीं हो पाए. अन्यथा की स्थिति में तो छेड़खानी और बलात्कार होते रहेंगे. इनके खिलाफ आवाजें दबाई जाती रहेंगी और…और कभी-कभी ऐसे आन्दोलन भी हो जाया करेंगे जिन्हें बाद में राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित कर दिया जाता रहेगा. हाँ, ऐसे आंदोलनों और प्रदर्शनों से उम्मीद तो जगती है और इस बार भी उम्मीद बड़े पैमाने पर है. पर इसका भविष्य इसके रणनीतिकारों एवं भुक्तभोगियों की जागरूकता का स्तर ही तय करेगा. उम्मीद है कि छात्राओं की एक संवेदनशील, जिम्मेदार और समाज में स्थायी बदलाव के लिए प्रतिबद्ध पीढ़ी इस आन्दोलन के माध्यम से दक्षिण एशिया को प्राप्त होगी. क्योंकि,
औरों का घर जले तो होली फाग समझ में आती है.
अपने घर में चिंगारी भी आग समझ में आती है.

विकाश  इतिहास विभाग, डी.ए.वी.पी.जी. कॉलेज,  बीएचयू, वाराणसी में शोधार्थी हैं.  इमेल: vikashasaeem@gmail.com

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अरविंद जैन की कहानी कार्बन-कॉपी

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अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने महत्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

मिस्टर कानूनवाला सारी उम्र अपने चैम्बर में धुंआ और अदालत में धूल फेंकते रहे और आज सुबह घर से घूमने निकले तो अब तक लौट कर ही नहीं आए। न जाने कहा गायब हो गए? धुएं में… धूल में … या धुंध में…?
‘‘हुंह… क्या है?’’
टाइप करते-करते अंकिता रुकी तो ऐसा लगा कि जैसे किसी ने प्यानो बजाना बंद कर दिया हो। कल तक जिस अंकिता को देखकर कोई नहीं कह सकता था कि उसकी उम्र सोलह तिए अड़तालीस साल होगी, उसी अंकिता के चेहरे पर आज जैसे ग्रहण लग गया था।
बारह-तेरह साल की एक लड़की बगल में पोटली दबाए, दबे पांव, डरती-डरती अंकिता के सामने आ खड़ी हुई थी।
‘‘मैं ग्वालियर से आई हूँ। मेरे पिताजी को जमींदार की हत्या के जुर्म में सुप्रीम कोर्ट ने फांसी का हुक्म दिया था। राष्ट्रपति ने भी माफ नहीं किया। दस साल से जेल में पड़े-पड़े पागल हो गए हैं… बहुत नाम सुना है  कानूनवाला का… बड़ी मुश्किल से किराया जुटा कर आई हूँ। मेरे पिताजी बेकसूर हैं, बहन जी उन्हें फांसी लग गई तो…. ‘‘लड़की फर्श पर बैठ कर जोर-जोर से रोने लगी।
उसे बाहर बैठने को कह अंकिता फिर टाइप पर हाथ चलाने लगी- ‘जाने कहां से चली आई है इंसाफ मांगने?… भाग जा यहां से… भाग जा…।“
चाभियों से हटे हाथ गोद में आ गए। काफी देर तक अंकिता टाइपराइटर पर सिर टिकाए न जाने क्या सोचती रही।

तीन-चार बार… टर्न… टर्न… हुई। अंकिता ने टेलीफोन उठाया, ‘गुड मार्निंग, मिस्टर कानूनवाला चैम्बर, सॉरी, नो एप्वाइंटमेंट।’ अंकिता उठी और बाथरूम में घुस गई। वहां से वह मुंह पोंछती हुई निकली और मेज पर रखे थरमस से एक कप में थोड़ी चाय उड़ेल वापस अपनी सीट पर आकर बैठ गई। चाय पीते-पीते अंकिता ने टाइपराइटर पर चढ़े कागज पर छपे एक-एक शब्द को गौर से पढ़ा… कई बार पढ़ा और फिर से अंगुलियां टाइपराटर पर थिरकने लगीं।

दलाल स्ट्रीट के कोने पर विरासत में मिली मिस्टर कानूनवाला की कोठी नम्बर दस किसी आनन्द भवन से कम शानदार नहीं। कोठी के दोनों दरवाजों पर पहले जहां चार लठैत खड़े रहते थे, बाद में वहां बंदूकधारी आए और अब तो हरदम स्टेनगनें तनी रहती हैं। पोर्च में एंबेस्डर और फिएट की जगह मर्सडीज और टायटा के हार्न बजने लगे हैं। रंभाती गायों और हिनहिनाते काले अरबी घोड़ों की जगह भौंकते बुलडाग और म्याऊं-म्याऊं करती बिल्लियों ने ली है, गौशाला और घुड़साल में  रिकार्ड रूम और “एयरकंडीशंड गेस्ट हाउस” आबाद हो गए हैं और अखाड़े को मिटा कर इटालियन टाइल्स का स्वीमिंग पूल बनाया गया है। पिछड़वाड़े पहले आम के पेड़ पर कोयल कूकती थी, अब वहां यूक्लिप्टस के झुंडों में सिर्फ हवा सनसनाती है।
केवल कोठी के कोने में लोहे के एक बड़े-से पिंजर में बंद पहाड़ी तोता अब भी पंख फड़फड़ाता रहता है। इसे न जाने किस जुर्म की सजा में उम्र कैद हुई है?
अंकिता ने टाइपराटर पर दूसरा कागज और कार्बन लगाया और फिर उसी स्पीड से टक…टक…टक… अंकिता के देखते-देखते इस कोठी के साथ-साथ आदमियों के भी नक्शे बदल गए थे। पर अभी भी कोठी का हर पत्ता मिस्टर कानूनवाला के मूड के हिसाब से खिलता, हिलता, कांपता, डरता और हंसता है। वो जब तक कोठी के अंदर होते हैं आतंक चारों और चौकन्ना ही घूमता रहता है और जब वे बाहर निकलते हैं तब कोठी की सांस में सांस आती है।
अंकिता टाइप करती रही।



मिस… मिसेज… नहीं नीना… नीना भी नहीं अंकिता… और छोटा भाई कमल जब इस कोठी में पहली बार आए थे तब नीना दस की और कमल आठ साल का था। बीस रुपये रिश्वत लेने के जुर्म में पिता जेल में थे और मिस्टर कानूनवाला के पिताश्री थे जज। पिताश्री को छुड़वाने के लिए नीना अपने साथ पचास रुपये भी लाई थी। और कमल ने आगे बढ़ कर जज साहब से कहा था, “रुपये थोड़े हों तो….” और वह बीच में ही बोल पड़ी थी, “तो में एक दो दिन आपके पास रह सकती हूँ…।” सुनकर जज साहब सुन कर चुपचाप उठ कर चले गए थे मगर उनकी पत्नी मनमोहिनी ने समझाया था कि अब तो जज साहब भी कुछ नहीं कर सकते। तुम दोनों चाहो तो यहीं रह सकते हो।
वह और कमल यहीं रह गए। कमल तो साहब की गाड़ी साफ करते-करते ड्राइवर बन गया। ड्राइवरी छोड़ बाद में चश्मदीद गवाह और अब तो पेशेवर जमानती है। सारा दिन कोर्ट-कचरी और शाम को पीने-खाने से ही फुर्सत नहीं है उसे। जज साहब पांच-छह साल बाद अचानक दिल का दौरा पड़ने से चल बसे और मिस्टर कानूनवाला कोठी के अकेले मालिक बन गए। इस बीच नीना ने, जो अब अंकिता थी, टाइप और शार्टहैंड सीखा। बी.ए. और एल.एल.बी. किया और कुछ साल मिस्टर कानूनवाला की जूनियर भी रही।
अंकिता के टाइप करने और सोचने की स्पीड में शायद कोई अंतर नहीं। जनवरी की ठिठुरती सर्दियों में भी उसके माथे पर पसीना तैर रहा था।

लापता लड़की

मिस्टर कानूनवाला के चैम्बर की तीन दीवारों पर नीचे से ऊपर तक टीकवुड की बनी अलमारियों में चमचमाते शीशों के पीछे संविधान, इंडियन पैनल कोड, क्रिमिनल प्रोसीजर कोड, एविडेंस, ऑल इंडिया रिपोर्टर, ऑल इंग्लैण्ड लॉ रिपोर्ट्स के अलावा क्रिमिनल और मैडिकल ज्यूरिसप्रयूडंस, फेमस मर्डर केसेस व अन्य हजारों कीमती किताबें करीने से लगी रहती हैं। चौथी दीवार पर बीचो-बीच उनके पिताश्री की सुनहरे फ्रेम में जड़ी फोटो पर संदल की माला लटकी रहती है। और बाकी दीवार पर देश के बड़े-बड़े राजनेताओं, मंत्रियों, अफसरों और तस्करों  के स्वागत पर देश के बड़े-बड़े राजनेताओं, मंत्रियों, अफसरों और तस्करों के स्वागत में हाथ जोड़े खड़े मिस्टर कानूनवाला मुस्कराते दीखते हैं। वॉल टू वॉल पर्शियन लाल कार्पेट पर गद्देदार सोफों के सामने शीशे की टेबल पर कट ग्लास का फूलदान और ऐशट्रे चमकती रहती है। सामने लंबी-चौड़ी मेज पर एक तरफ किताबों का, तो दूसरी तरफ फाइलों का ढेर पड़ा होता है..मेज पर रखा टेलीफोन हर एक मिनट के बाद ट्रिन-ट्रिन करता रहता है। मेज के पीछे रखी रिवाल्विंग चेयर पर बैठते ही मिस्टर कानूनवाला एक हाथ से रिमोट बैल का बटन दबाते और दूसरे से ‘हवाना’ सिगार निकालते हैं। बैल दबाते ही मुंशी जी दौड़े-दौड़े अंदर आते हैं और फिर सिर झुका कर खड़े हो जाते हैं।
ढेर-स धुंआ उड़ेलने के बाद मिस्टर कानूनवाला मुंशी जी से पूछते हैं, ‘‘फीस…’’
मुंशी जी धीरे से कहते हैं, ‘‘आ गई, हुजूर’’ और बंडी से निकाल कर नीले नोटो की गड्डियां उनके सामने रख देते हैं।
मिस्टर कानूनवाला गड्डियां झटके से मेज की ऊपरी दराज में डालने के बाद फिर कहते हैं, ‘‘अच्छा… कॉफी…. और हां…, वो 302 वाले की बीबी को भेज देना।’’

मिस्टर कानूनवाला की रिवाल्विंग चेयर धीरे-धीरे घूमती है और चैम्बर में धुंआ ही धुंआ भर जाता है। दीवार घड़ी जब दस बार टन्न… टन्न… करती है तो मिस्टर कानूनवाला रिवाल्विंग चेयर से उठते हैं। अंकिता उन्हें हैंगर से उतार कर काला कोट पहनाती है और वो कलाई पर ‘रोलक्स’ बांधते, जेब में मोंट ब्लैंक कलम लगाते और सिगार पीते-पीते बाहर निकलते हैं तो सब लोग सावधान की मुद्रा में ‘स्टेच्यू’ बन जाते हैं। मर्सडीज का दरवाजा खुलता है, कार फर्राटे से आगे बढ़ती है और देखते ही देखते आंखों से ओझल हो जाती है।
अंकिता जरा-सी आहट होने पर चौंकी और फिर थोड़ा आश्वस्त हो टक-टक करने लगी।


मिस्टर कानूनवाला कभी चिडि़याघर के सामने और कभी अप्पूघर के सामने वाली अदालत में जाते थे। अप्पू घर के सामने वाली अदालत के अंदर घुसने के दो बड़े गेट थे और एक छोटा गेट था। मिस्टर कानूनवाला अक्सर एक ही गेट से अंदर जाते थे। मगर बाहर निकलने के बहुत से दरवाजे थे। इसलिए कभी पता नहीं चलता था कि मिस्टर कानूनवाला कौन-से दरवाजे से बाहर निकल गए। उनका अधिक समय उस किलेनुमा बिल्डिंग में ही गुजरता था। अदालत की किसी भी दीवार के पास खड़े होकर बात करते हुए मिस्टर कानूनवाला नाखून से दीवार खुरचते रहते और चूने की परतें इक्ट्ठी करते रहते। पत्थरों के ऊंचे-ऊंचे खंबों और दूर तक जाते लम्बे बरामदों वाली बिल्डिंग की गोल गुम्बद पर सुबह से शाम तक झंडा लहराता रहता था। बिल्डिंग के आसपास दूर-दूर से आए मुवक्किल और उनके रिश्तेदार बरामदों, पार्क और दरवाजों के इधर-उधर फैसले के इंतजार में सालों बैठे ऊंघते रहते।

अंकिता टाइप करने के लिए कागज और कार्बन बदल रही थी तभी उसने दो-तीन बार जोर से छींका। शायद सर्दी लग गई थी। छींकने के बाद उसने रुमाल से नाक पोंछी तो खांसी उठ खड़ी हुई। बलगम मेज के नीचे रखी बाल्टी में ही थूक दिया और फिर से टाइपराटर चलाने लगी।

अदालत में छोटे-मोटे सारे काम मुंशी व जूनियर ही निपटाते थे। मिस्टर कानूनवाला अदालत तभी जाते थे जब बहस करनी होती, वरना अपने चैम्बर में बैठे सिगार पीते या किताबें पलटते रहते। कोर्ट में नम्बर आने से पहले मुंशी या मुवक्किल आ कर उन्हें बताते तो वे सिगार पीते-पीते धीरे-धीरे अदालत की ओर चल पड़ते। उनके पहुँचने से पहले ही किताबें और फाइलें लिए जूनियर अदालत में मौजूद होते थे। मिस्टर कानूनवाला सिगार पीते-पीते जब अदालत तक पहुंच जाते तो दरवाजे पर जाकर उन्हें ध्यान आता था कि उनके मुंह में सिगार है। तब सिगार को अदालत के बाहर बरामदे की दीवार पर रखते, अंदर जाते, बहस करते, बाहर निकल कर दीवार पर रखे सिगार को उठाते, फिर से सुलगाते और धुंआ बिखेरते हुए वापस अपने चैम्बर की ओर बढ़ जाते। उनकी इस आदत से मुंशी, जूनियर और मुवक्किल ही नहीं बाकी सारे वकील, पेशकार आदि भी भली-भांति परिचित थे। जब भी किसी को मिस्टर कानूनवाला से कोई काम होता तो पहले वह अदालत के बरामदों में यह ढूंढता  कि मिस्टर कानूनवाला का सिगार कहां रखा है। और जहां सिगार रखा मिल जाता वह जान जाता कि वह सामने वाली अदालत में होंगे। अक्सर लोग मिस्टर कानूनवाला को नहीं बल्कि उनके सिगार को ढूंढते रहते। कभी-कभी तो लोग यह सोच कर कि आखिर आएंगे तो यहीं, घंटों सिगार के पास ही खड़े रहते।

कई बार ऐसा इसलिए भी होता था कि बाहर से आए व्यक्ति मिस्टर कानूनवाला को शक्ल से नहीं पहचानते थे। कुछ तो मिस्टर कानूनवाला को सिगारवाला कहते थे। सिगार मिस्टर कानूनवाला का ‘ट्रेडमार्क’ ही बन गया था और सिगार को लेकर बहुत से किस्से। बुझे हुए सिगार को देखकर मुवक्किलों को निराशा होती मगर जब मिस्टर कानूनवाला बुझे हुए सिगार को दुबारा सुलगाते तो मुवक्किलों के चेहरे पर चमक आ जाती। कुछ तो कहते भी थे कि हमारी जिंदगी का सिगार तो बुझ चुका है, दुबारा और कोई सुलगा सकता है तो वो है मिस्टर कानूनवाला। ऐसा विश्वास था मुवक्किलों का उन पर, फिर भी….
फोन की घंटी बजी तो झल्लाई अंकिता ने कहा, ‘‘गुड ऑफ्टरनून, मिस्टर कानूनवाला चैम्बर।’’
उधर से आवाज आती रही। अंकिता के चेहरे पर कई रंग आए-गए।
आखिर उसने कहा, ‘‘नो सॉरी… ही इज नाट इन टाउन।’’
अंकिता उठी, एक गिलास पानी पिया और फिर एक लम्बी उबासी लेने के बाद वापस अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गई। कागज और कार्बन बदला और फिर टक…टक… शुरू…

मिस्टर कानूनवाला के मुवक्किल सुबह से रात तक आते-जाते रहते। कुछ तो कई-कई दिन तक टिके रहते। कोठी के बाहर कोने में पड़ी बैंचों पर बैठे मुवक्किल माली, चपरासी, मुंशी और गार्डो से गप्पें हांकते रहते। पुराने मुवक्किल नए मुवक्किलों को मिस्टर कानूनवाला के मुकदमों की दास्तान सुनाते रहते। बलात्कार, हत्या और डकैती के मुकदमों में कैसे-कैसे मिस्टर कानूनवाला ने बचाया था, कैसी जोरदार बहस की थी, कैसे कानूनी नुक्ते निकाले थे। उनका विवरण सुनाते-सुनाते मुवक्किलों की जबान नहीं थकती थी। मिस्टर कानूनवाला के मुकदमों की कहानियां सुन-सुनकर नए मुवक्किलों के चेहरे खिल उठते थे।
बलात्कार के मुकदमों की कहानियां तो सभी बढ़-चढ़कर सुनाते थे और सुनने वाले भी रस ले-लेकर सुनते थे। बीच-बीच में कोई कहता ‘भई गजब।’ कोई कहता ‘कमाल के वकील हैं भैया’ और कोई-कोई तो यह दावा करता कि ‘कानूनवाला की टक्कर का कोई और वकील है ही नहीं, लाला! मुवक्किल और उनके रिश्तेदार यहां जो किस्से सुन कर जाते, जाकर अपने-अपने शहर या गांव में और लोगों को सुनाते। बहुत से मुवक्किल तो ऐसे ही किस्से सुन-सुन कर मिस्टर कानूनवाला की कोठी तक पहुंचते थे और अक्सर वह यह कहते थे कि भाई मुकदमा तो इन्हीं से लड़वाना है भले ही घर, खेत और सारे जेवर बेचने पड़ जाएं।
अंकिता ने मेज की दराज से ‘डनहिल’ के पैकेट से एक सिगरेट निकाल कर सुलगाई पर दो-तीन कश के बाद ही सिगरेट ऐश ट्रे में रखकर टाइप करने लगी।

मिस्टर कानूनवाला के पास देश भर कर के अनेक हाईकोर्ट के वकील अपील करने के लिए मुकदमें भेजते या चिट्ठी देकर मुवक्किल जूनियर्स फाइलें पढ़ते, अपील तैयार करते, केस लॉ ढूंढते, मिस्टर कानूनवाला को ब्रीफ करते, अपील टाइप करवाते, मिस्टर कानूनवाला के इफ और बट लगाने के बाद मुंशी कोर्ट में अपील फाइल करते, मुकदमे की सुनवाई के लिए तारीख लगवाते, हाई कोर्ट के वकीलों को धन्यवाद की चिट्ठियां भेजते, चैक व नगद बटोरते, बैंक में जमा करवाते और सारा हिसाब-किताब रखते। जितनी फीस आती उसका एक प्रतिशत दानपुण्य, मंदिरों और चंदों के लिए रखा जाता। जूनियर्स में किसी को एक हजार, किसी को डेढ़ हजार रुपया महीना मिलता। पर ज्यादातर जूनियर्स तो सिर्फ काम सीखने के लिए ही आते थे। पैसे उन्हें नहीं मिलते थे पर कभी-कभार मुवक्किल किसी छोटे-मोटे काम के लिए उन्हें कुछ न कुछ दे ही देते थे। ऐसे जूनियर्स थोड़े दिन के ही मेहमान होते। थोड़ा-बहुत काम सीखते और खुद अपनी वकालत शुरू कर देते। न जाने कितने जूनियर्स आए, कितने गए। कुछ तो ‘कंपिटीशन में बैठे और जज बन गए।
मिस्टर कानूनवाला का गोद लिया बेटा अनुभव अलबत्ता दो साल कंपिटीशन की तैयारी और ‘आर्डर! आर्डर! करने के सपने देखता रहा। लेकिन कहीं नम्बर नहीं आया। मिस्टर कानूनवाला उसे जज बनाने के हक में कभी नहीं थे। वो हमेशा उस वकालत में मन लगाने की सलाह देते रहते। ब्रेकफास्ट पर अक्सर दोनों में बहस होती। मिस्टर कानूनवाला उसे प्रैक्टिकल होने की राय देते मगर अनुभव बड़े-बड़े सिद्धांतों और आदर्शों, सामाजिक और आर्थिक न्याय, आम आदमी को सामनता और सम्मान से जीने के संवैधानिक अधिकारों, उबाऊ और खर्चीली न्याय व्यवस्था और इस पेशे से जुड़े लोगों के नैतिक चरित्र और मूल्यों पर लम्बी-चौड़ी दलीलें देने लगता। मिस्टर कानूनवाला चुपचाप सुनते रहते और ब्रेकफास्ट करके उठते हुए; कहते, ‘‘आई एप्रीशिएट यूअर फीलिंग्स बट…’’ और अपने चैम्बर की ओर बढ़ जाते।
अंकिता ने पेज बीच में ही रोक कर अपने पर्स से एक बच्चे की फोटो निकाली और काफी देर तक उसे गौर से देखती रही। फोटो देखते समय उसके चेहरे पर एक अजीब-सी चमक भी थी और गहरी उदासी भी। कुछ देर बाद ही पर्स वापस रख कर अंकिता टाइप करने लगी।

स्लीपिंग पार्टनर 

मिस्टर कानूनवाला सुबह निक्कर पहन कर घूमने जाते थे और लौट कर अदालत। घर आ कर लंच और थोड़ी देर आराम। शाम को मुंह-हाथ धोने के बाद कपड़े बदल थोड़ी देर चैम्बर में बैठते, फाइलें देखते, डिक्टेशन देते और क्लब चले जाते। हां। कभी-कभी किसी सेमिनार या साहित्य, कला और सांस्कृतिक समारोह में वे अध्यक्षता भी करते थे। कभी किसी फाइव स्टार होटल में पार्टी होती और कभी किसी महिला संस्था द्वारा आयोजित सभा में नारी कानूनी अधिकारों पर भाषण। घर हमेशा रात देर गए ही लौटते। सोने से पहले घंटे दो घंटे पढ़ते जरूर थे मिस्टर कानूनवाला। उनके बैडरूम में हर दीवार पर प्रसिद्ध चित्रकारों द्वारा बनाई बहुत-सी न्यूड पेंटिंग्स, कोने में रखी मेजों पर नग्न मूर्तियां ओर अल्मारियों में सेक्स, साइकोलॉजी, सस्पैंस और स्कैंडल की हजारों दुर्लभ और कीमती किताबें हैं। न जाने कहां-कहां से खरीद कर इकट्ठा किया है यह सब कुछ मिस्टर कानूनवाला ने।

दुनिया भर की ‘बैंड बुक्स’ का भंडार है मिस्टर कानूनवाला का बैडरूम। उसके बैडरूम में हर किसी को जाने की इजाजत नहीं। सिवाय अंकिता के, शायद ही कोई दूसरी बार उनके बैडरूम में गई हो। मिस्टर कानूनवाला किसी भी किताब को दुबारा नहीं पढ़ते थे और अपनी किताब किसी दूसरे को पढ़ने के लिए देते नहीं थे। सुबह अखबार, मैंगजीन आते तो सबसे पहले वही पन्ने पलटते थे। अगर किसी ने भी गलती से अखबार या मैंगजीन खोलकर पढ़ ली तो उसकी खैर नहीं। दरअसल ‘सैकेंड हैंड गुड्स’ इस्तेमाल करने से उन्हें चिढ़ थी। इसीलिए शायद ‘रॉल्स रायस’ खरीदने का प्लान अभी तक पूरा नहीं हो पाया। वह भी हो जाता अगर वह इस तरह न चले जाते।

अंकिता हर पेज टाइप करने के बाद ऐसे नजर आ रही थी जैसे अदालत में बयान देने के बाद गवाह। बत्तीस साल से यही रूटीन देख रही है। शुरू-शुरू में तो उनके पास काम ज्यादा नहीं था इसलिए इतना व्यस्त भी नहीं रहते थे, लेकिन धीरे-धीरे ज्यों-ज्यों काम बढ़ता गया, दौलत, शौहरत और व्यस्तता भी बढ़ती गई। पहले मिस्टर एण्ड मिसेज कानूनवाला की गर्मियों की छुट्टियां शिमला, मंसूरी, कुल्लू, मनाली, गुलमर्ग या पहलगांव में बीतती थीं। लेकिन पत्नी के देहान्त के बाद कई सालों से स्विट्जरलैण्ड पेरिस, न्यूयार्क, लंदन या सिडनी में बीतने लगीं। पिछले साल शायद पहली बार वो अकेले मास्को गए थे। लौट कर आए तो बहुत दिनों तक मास्को, मास्को करते रहे। गोर्बाचोव और प्रेमिका की याद में लिखी उनकी कविताएं जब भी एक मैंगजीन में छप कर आई तो उन्होंने पांच सौ प्रतियां खरीदवा कर न जाने कहां-कहां भेजी थी।

हत्या, दहेज-हत्या, बलात्कार और तस्करी के मुकदमों के अलावा मिस्टर कानूनवाला नक्सलवादियों, बंधुआ और दिहाड़ी मजदूरों, बाल अपराधियों वेश्याओं और आदिवासियों के मुकदमों की भी पैरवी करते थे। महिला संस्थाओं और जनकल्याण सोसायटियों के जनहित मुकदमों में हाथ डालते ही मिस्टर कानूनवाला का नाम अदालत से बाहर रिक्शावालों की जुबान तक पहुंच गया था। स्कूलों और कालेजों में उनके ऑटोग्राफ के लिए छात्र-छात्राओं की भीड़ लग जाती और उनका फोटोग्राफ लेने के लिए प्रेस फोटोग्राफरों में धक्का-मुक्की मचती। कुछ महीनों से तो अब उनके साथ दो-दो सिक्योरिटी गार्ड रहने लगे थे। उनका सारा समय भाग-दौड़ में बीतने लगा था और उनसे पांच मिनट बात करने के लिए हफ्ते भर बाद का टाइम मिलता था। अंकिता को भी दफ्तर के अलावा समय न दे पाते थे उन्हें आराम की जरूरत थी। ऐसा मौका मिलना क्या मुश्किल था, मगर…
अंकिता बीते हुए कल को शब्दों में कैद करती जा रही थी। बिना सांस लिए टक…टक…टक…।

मिस्टर कानूनवाला के लिए यह नया साल न जाने क्यों अच्छा नहीं आया। शुरू से ही कुछ न कुछ गड़बड़ होने लगी। एक कांड में अमेरिकन कम्पनी की पैरवी की, अच्छा-भला समझौता भी हो गया लेकिन समझौते के बाद भयंकर आलोचना, जलसे, जुलूस, घेराव, प्रदर्शन दूसरे दाह-कांड में ट्रस्टियों की ओर से पेश हुए तो फिर चारों ओर थू-थू होने लगी। रही-सही कसर बलात्कार वाले मामले में पुलिस पक्ष की ओर से बहस करने के बाद पूरी हो गई। पुलिस वालों की सजा तो कम हो गई लेकिन औरतों, अखबारों और पत्रकारों ने मिस्टर कानूनवाला के खिलाफ इतना उल्टा-सीधा लिख मारा कि कानूनवाला को कई संस्थाओं से इस्तीफा देना पड़ा और सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी थी।

मिस्टर कानूनवाली पहले ही परेशान ये तिस पर पिछले हफ्ते जिस आदमी को अपने एक दोस्त की हत्या करने के अपराध से बरी करवाया था, उसने आत्महत्या कर ली और मिस्टर कानूनवाला और प्रेस वालों के नाम लिख कर एक लम्बी चिट्ठी छोड़ गया। चिट्ठी में लिख गया कि हत्या तो मैंने ही की थी और मैं सच-सच बता कर सजा भुगताने को भी तैयार था लेकिन आपकी सलाह पर ही झूठी कहानी गढ़ी गई कि मेरी पत्नी के मेरे दोस्त के साथ नाजायज़ सम्बन्ध थे। मैंने उन्हें आपत्तिजनक अवस्था में देखा इसलिए गुस्से में  हत्या कर दी। पत्नी की गवाही झूठी थी, सारा मुकदमा झूठा था और अब मैं अपनी ही पत्नी से आंख मिला कर बात तक करने के काबिल नहीं रहा। लानत है ऐसी रिहाई पर। मेरे लिए मुक्ति का एक ही रास्ता है। लेकिन मिस्टर कानूनवाला, अब के बाद फिर किसी और को इस तरह रिहा मत करवाना।
इसके बाद से अनुभव और मिस्टर कानूनवाला में तेज झड़प होने लगी थी। अनुभव बार-बार कहता, ‘‘डैड, यूअर डेज आर गोन नाऊ, यू हेव लॉस्ट यूअर मैजिक। इट इज बैटर टु रिटायर विद ऑनर।’’
मिस्टर कानूनवाला की आंखों में खून उतर आता, हाथ कांपने लगते और जुबान लड़खड़ाने लगती, लेकिन वो किसी तरह अपने पर काबू करते और कड़वाहट भरे लहजे में कहते, ‘‘द किंग एण्ड लॉयर मे डाई, वट दे नेवर रिटायर’ और खाना आधे में ही छोड़, उठ कर चले जाते थे।

अंकिता को भी अनुभव पर बहुत गुस्सा आता था लेकिन चुप रह जाती थी। मन ही मन सोचती कि बेटा होकर बाप से इतनी जुबान लड़ाता है?
फोन फिर बजने लगा। अंकिता ने फोन उठाया, ‘‘गुड इवनिंग, कानूनवालॉज चैम्बर।’’ अंकिता कुछ देर सुनती रही और बीच-बीच में ‘‘नो… नो…. सारी… नॉट पॉसिबल प्लीज…. कांट से वेन ही विल बी बैक … ओ.के. इफ इट इज सो अर्जेट यू केन डिसकस विद हिज सन।’’
अंकिता अचानक रुक गई। ऐशट्रे की ओर देखा तो सिगरेट रखी-रखी पूरी जल चुकी थी। मेज की दराज से डनहिल का पैकेट निकाला ही था कि तभी मुंशी जी आ गए। अंकिता ने बिना सिगरेट निकाले ही पैकेट दराज में वापस रख दिया। अंकिता ने मुंशी जी से पूछा कि क्या हुआ?

‘‘मैं तो सुबह से ही साहब को ढूढ़ रहा था। पार्क, अदालत, चैम्बर, क्लब होटल, पुलिस स्टेशन सब जगह हो आया पर उनका कहीं पता नहीं लगा। वापस आ कर छोटे साहब को बताने गया तो वो चैम्बर में इधर-उधर टहल रहे थे। मेज पर ऐशट्रे के नीचे एक चिट्ठी रखी थी और ऐशट्रे में अधजला सिगार। छोटे साहब ने पहले चिट्ठी उठाकर पढ़ी और फिर चुपचाप अपनी जेब में रख ली। ऐशट्रे से सिगार उठा कर बहुत देर घूरते रहे और न जाने क्या सोचते रहे। मैं कुछ देर तो चुप रहा फिर मैंने कहा कि साहब का कुछ पता नहीं चल सका। कल के मुकदमों में तारीख ले लें? छोटे साहब ने जैसे सुना ही नहीं। लाइटर उठाया और सिगार सुलगाने लगे। दो-तीन बार सुलगाने पर तो सिगार जला। कश खींचने लगे तो खांसी पर खांसी। मन हुआ भी कि उन्हें मना करूं, मैं कुछ दर चुप रहा, लेकिन कब तक रहता? मैंने फिर पूछा कि कल के मुकदमों में तारीख ले लें? मेरा इतना कहना था कि छोटे साहब ने पहले मुझे घूर कर देखा फिर रिवाल्विंग चेयर पकड़ कर जोर से घुमा दी। कुछ देर चेयर चक्कर काटती रही। फिर छोटे साहब ने घूमती चेयर रोकी, झटके से उसी पर बैठे सिगार का लम्बा कश खींच कर धुंआ उगला और बोले, ‘यस’?

मैंने फिर दोहराया कि कल के में तारीख ले लें? तो बोले, क्यों … फाइलें निकलवाइये … आई विल आरग्यू।’
मैंने ‘जी हुजूर’ कहा और बाहर आने लगा तो बोले, ‘सुनो, कॉफी और हां, वो 302 वाले की बेटी को भेज देना…’
मैं तो ‘जी हुजूर’ कहकर बाहर आ गया और वो बैठे सिगार पी रहे होंगें ओफ…. मेरी समझ में नहीं आ रहा कि बारह साल की बच्ची से बात क्या करेंगे छोटे साहब?’’

बड़बड़ाता हुआ मुंशी कॉफी लेने चला गया। गौर से सुनती रही अंकिता और उसके चेहरे पर विषैली मुस्कान की रेखा खिंच गई।

अंकिता ने फिर टाइपराइटर पर नया कागज चढ़ाया और तेजी से टक…टक… करने लगी।

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बीएचयू: शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रही लड़कियों को देर रात योगी-मोदी-त्रिपाठी की पुलिस ने घेर कर पीटा

बनारस से, कलंकित बीएचयू से 

क्या लिखूं? लिखूं कि पत्नी को छोड़कर आया शासक नहीं जानता बेटियों से स्नेह-राग. माँ से ममत्व का नाटक करने वाला, बनारस में गायों को चारा खिलाने वाला ढोंगी शासक बनारस से लौटते ही लड़कियों पर कहर बनकर टूटा. क्या लिखूं कि कथित संन्यास के बाद ‘योगी’ लखनउ की गद्दी पर बैठा है-जाके पैर न फटे बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई- बेटियों पर पुलिस के डंडे बरसा रहा है!  क्या लिखूं कि गुजरात के ड्रायकुले हरियाणा में रक्त पिपासा को खुली छूट देते हैं, उपद्रवी भक्तों को तांडव करने देते हैं, पुलिस हाथ-पर-हाथ धरे बैठी रहती है और शांतिपूर्ण प्रदर्शन  कर रही  बेटियों पर आधी रात को लाठियां बरसवाते हैं. क्या लिखूं कि टिकधारी कुलपति के भीतर बैठा मनु लड़कियों के पढने से चिढ़ता है. क्या लिखूं कि पत्नी को छोड़कर आया ढोंगी से लेकर योगी तक बेटियों के सह्वास में खपत कंडोमों की गिनती कर अट्टहास कर रहा है, दिल्ली से लेकर लखनउ तक, और उनसे
उनकी किताबें छीन रहा है.

 सम्मान से पढने का हक़ मांग रही  जिन निहत्थी लड़कियों पर रात के 10-30 के बाद लाठियां चलवाई गई वे मांग क्या रही थीं, हृदयहीनों, सिर्फ सम्मान से जीने का हक़ ही तो मांग रही थीं, इत्मीनान से पढने का हक़ ही तो मांग रही थीं. मांग रही थीं कि जोड़-जुगाड़ से जो कुलपति बन बैठा है ( कुलपतियों की नियुक्ति यूं ही होती है) वह सचमुच कुल-पति सा आचरण करे. वह कम से कम शान्तिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लड़कियों से आकर मिले, सुरक्षा का सार्वजनिक आश्वासन दे. लेकिन उसे कहाँ फुर्सत उसके आका, जो बनारस में थे, उसकी रीढ़ की हड्डी सुरसुरा रही थी, वह क्योंकर मिलने आता लड़कियों से. उसने लाठियां भिजवा दी.

‘टच ही तो किया है न और कुछ नहीं किया न’ : प्रशासन के जवाब से आक्रोशित लडकियां 

और तुम, तुम शहर के पुलिस प्रधान,   जिले के कलक्टर  तुम्हारे यूपीएससी पास होने पर  जनता मगन होती है, बधाइयां देती हैं, लेकिन तुम तुम कब निकलोगे मालिक के आगे अपनी हिलती दम के आतंक से बाहर ! क्यों बेरहमी से पिटा बेटियों को, लड़कियों को जो घरों से बाहर पढने आयी हैं.

बनारस से, बीएचयू से लड़कियों की चीख क्या आपके  कानों तक अभी नहीं पहुँची है, तो सोये रहिये, अच्छे दिन के गुणगान में. अभी भक्तों का व्हाट्स ऐप मेसेज आता ही होगा, जो बनारस में खर्च कंडोमो की गिनती बतायेगा और आप भूतो न भविष्यति ढोंगी जोड़ियों के शासन के रास्ते हिन्दू राष्ट्र के सपने का साकार कर लीजियेगा. यह रपट आपके लिए नहीं है, उनके लिये है, जो सचमुच समझते हैं कि सम्मान  से जीयेंगी तभी तो पढ़ेंगी लड़कियां. लगातार लाइव रिपोटिंग कर रहे सिद्धांत मोहन की रिपोरर्ट, जो उन्होंने फेसबुक पर लिखा है:

मैं बनारस से बोल रहा हूं.
यहां बीएचयू के अंदर महिला महाविद्यालय है. रात बारह के करीब पुलिस ने जिलाधिकारी की मौजूदगी में बीएचयू के मेन गेट पर बैठे छात्रों और छात्राओं पर लाठीचार्ज कर दिया.
लड़के भागे अंदर. तो पुलिस ने भी दौड़ा लिया अंदर तक. लड़कियां भागीं महिला महाविद्यालय के अंदर तो कुछ लोगों ने महिला महाविद्यालय का दरवाजा भी तोड़ दिया. अब पुलिस महिला महाविद्यालय के अंदर भी घुस गयी. लड़कियों को दौड़ाकर पीटा. भागने में जो लड़कियां गिर गयीं, पुलिस ने उनके ऊपर चढ़कर पिटाई की.
पुलिस ने लड़कियों को जहां देखा, वहां पीटा. रोचक बात ये जानिए कि महिला पुलिसकर्मी एक भी नहीं. लड़कियां मुझे फोन कर-करके रोते हुए बदहवासी में जानकारियां दे रही हैं. एक लड़की बोलती हैं, “हमें इस खबर को किसी तरह बाहर पहुंचाना है.”

अब थोड़ा और अंदर चलें तो पुलिस बिड़ला हॉस्टल के अंदर घुस गयी है. बिड़ला चौराहे पर लड़कों पर आंसू गैस के गोले और रबर की गोलियां चलायी जा रही हैं. लड़के उधर से पत्थर चलाकर आंदोलन को दूसरी दिशा में मोड़ चुके हैं.
ऐसा दो टके का कुलपति नहीं देखा, जो मिलने का वादा करके मिलता नहीं है, और सीसीटीवी लगवाने की मांग करती लड़कियों पर लाठी चलवा देता है.
लेकिन लाठी चलना अच्छा है. लाठीचार्ज प्रदर्शन का एक पक्ष है, किसी प्रदर्शनकारी के जीवन में यह जितना जल्दी आ जाए, उतना अच्छा. डर उतना जल्दी भागता है. ये मत सोचिए कि मैं लाठीचार्ज को इंडोर्स कर रहा हूं. बल्कि मैं एक पहले से ज्यादा बेख़ौफ़ हुजूम का और खुले दिल से स्वागत कर रहा हूं.:

उन्होंने एक घंटे बाद फिर लिखा: 

अब सुनिये
लड़कियां वापिस गेट पर आ गयीं हैं. एसएसपी की गाड़ी को घेर लिया है और पूछ रही हैं, “हमें मारा क्यों?” और यह भी कि “अब तो जान देकर रहेंगे.”
कहा था न कि लाठी एक बेख़ौफ़ कौम का निर्माण करती है.

सुबह तक बीएचयू में पुलिस बल के तैनात होने की खबरें हैं, लडकियां  अभी भी डटी हैं.

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पत्रकारों, वार्डनों, छात्राओं सब पर बरसायी लाठियां: बीएचयू में पुलिसिया राज

सिद्धांत मोहन 


आज रविवार के दिन बीएचयू में कर्फ्यू की स्थिति बनी हुई है. मैं तीन-चार लाठियां खाने के बाद थोड़ी दूरी पर बैठा हुआ हूं. सुना है कि अमर उजाला का कोई फोटोग्राफर भी लाठियां खाकर बैठा है. यह मीडिया पर भी हमला है, लेकिन मैं उन लड़कियों के लिए चिंतित हूं जो कल रात से लगातार फोन कर रही हैं.
लड़कियों के हॉस्टल के गेट बाहर से बंद कर दिए गए हैं. कल रात की पिटाई में पुलिस ने छात्राओं के साथ-साथ किसी-किसी वार्डेन को भी पीट दिया. अब लड़कियों को कहा जा रहा है कि जिसको भी दुर्गापूजा की छुट्टी के लिए घर जाना है, आज ही निकल जाओ.

बीएचयू: शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रही लड़कियों को देर रात योगी-मोदी-त्रिपाठी की पुलिस ने घेर कर पीटा

ऐसे में कुछ लड़कियों-लड़कों ने हिम्मत की है निकलने की तो कैम्पस में मौजूद सीआरपीएफ और पीएसी के जवान पीटने लग रहे हैं. स्थिति गंभीर है. बीएचयू का आधिकारिक बयान कह रहा है कि “राष्ट्रविरोधी ताकतें राजनीति कर रही हैं”. शायद बलात्कार और यौन शोषण का विरोध करना राष्ट्रविरोधी राजनीति है, ऐसा मुझे हाल के दिनों में पता चला है.
बहुत सारे लोग बाहर से जुट रहे हैं. बहुत सारे लोग अंदर जुटना चाह रहे हैं तो कुलपति त्रिपाठी उन्हें पिटवा दे रहा है. कल रात का मुझसे किया गया वादा कि “भईया, हम लोग सुबह फिर से गेट पर बैठेंगे”, धीरे-धीरे टूट रहा है. अब एक नया संकल्प है कि छुट्टी के बाद फिर से आंदोलन करेंगे. हो सकता है कि ऐसा कुछ हो. लेकिन ऐसा नहीं भी हो सकता है. तीन अक्टूबर तक बहुत कुछ बदल जाएगा.
‘टच ही तो किया है न और कुछ नहीं किया न’ : प्रशासन के जवाब से आक्रोशित लडकियां 

अपनी बेटियों, पत्नियों, प्रेमिकाओं से कहिए ज़रूर कि लड़कियां लड़ रही हैं. मैं भी कह ही रहा हूं. मैंने लिखने वाली नौकरी पकड़ी है, लेकिन इतना तो भीतर बचा है कि कभी भी इन लड़कियों के लिए खड़ा हुआ जाए. इस वादे पर नहीं टिका तो घंटा जिएंगे?

इस कैम्पस के अंदर की प्रगतिशील आत्माएं मर गयी हैं. कोई अध्यापक गेट तक नहीं आया. एक साथ बीस अध्यापक भी गेट पर आ गए होते तो ये लड़कियां उन्हें जीवन भर के लिए अपना शिक्षक मानतीं. इन अध्यापकों का विश्वविद्यालय प्रशासन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी कुछ न कर पाता.
ये एक बार और क्यों न लिखा जाए कि यहां कोई राजनीतिक दल या विचारधारा शामिल नहीं है. कई लोग जुट रहे हैं आज. कई लोगों को जुटना भी चाहिए. क्या होगा नहीं पता? लेकिन बदलाव लाने का एक तो उजाला अब दिखने लगा है.

सिद्धांत मोहन अपने फेसबुक पेज पर लगातार रिपोर्ट कर रहे हैं ग्राउंड जीरो से 


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बीएचयू से लेकर जेएनयू तक लड़कियों को घर बैठाने की संघी साजिश: यौन उत्पीड़न विरोधी समिति को किया भंग



जेएनयू में परचम को आँचल बनाने की संघी साज़िश 


नीतिशा खलखो 

देश भर में महिलाओं की शिक्षा पर हमला हो रहा है, बीएचयू से लेकर जेएनयू तक. जेएनयू देश का पहला संस्थान था जिसने यौन उत्पीड़न के खिलाफ एक समिति बनाई थी, सुप्रीम कोर्ट के ‘विशाखा निर्देश’ के बाद किसी संस्थानों ने जहां ऐसी समिति बनाने में काफी देर लगाई, वहीं यह विश्वविद्यालय एक मिसाल कायम करने में सफल हुआ था. इसका असर यहाँ पढने वाली छात्राओं के पक्ष में बने माहौल में समझा जा सकता था. इस पर प्रशासन हमला कर रहा है. इस समिति (GSCASH)  का चुनाव लड़ चुकी नीतिशा खलखो इसे संघी साजिश बता रही हैं.

दिन भर की बारिश के बावजूद, जेएनयू छात्रों ने शुक्रवार की रात में आयोजित ‘असाधारण’ जनरल बॉडी मीटिंग में बड़ी संख्या में हिस्सा लिया जिसमें जेंडर-समानता के उद्देश्य के लिए बनायी गयी संस्था जिएसकैश (Gender Sensitization against Sexual Harassment or GSCASH) पर हुए हालिया प्रशासनिक हमले पर विचार-विमर्श हुआ. एकमत से सब ने जिएसकैश को बचाने और संघी जेएनयू प्रशासन के ख़िलाफ़ लड़ाई तेज़ करने की बात कही.

पिछले सप्ताह जेएनयू प्रशासन ने कुलपति के दफ़्तर से सटे जिएसकैश ऑफिस पर ताला-बंदी कर दी और उसकी जगह आईसीसी (Internal Complaint Committee) नाम की एक नई संस्था बना दी है. प्रशासन की इसी मनमानी के ख़िलाफ़ जेएनयू समुदाय में काफी गुस्सा है और छात्र और शिक्षक यूनियन इस मामले को दिल्ली हाई कोर्ट में ले गये  हैं जिसपर कोर्ट ने फ़िलहाल ‘स्टे’ लगा दी है. उपरोक्त मीटिंग प्रशासन के इसी हमले से निपटने के लिए बुलाई गई थी. मेरी राय में जिएसकैश की लड़ाई को राजनैतिक तौर पर भी उठाये जाने की आवश्यकता है.

GSCASH के समर्थन में विद्यार्थी समूह

सवाल है कि जेएनयू कुलपति, आईसीसी के द्वारा जिएसकैश को ख़त्म करने के लिए, हर तरह की मनमानी क्यों कर रहे हैं? क्या “देशद्रोही” विमर्श, “सीट-कट” और “सैनिक टैंक” की तरह आईसीसी भी जेएनयू की प्रगतिशील विरासत के ऊपर एक नई संघी साज़िश है?

‘टच ही तो किया है न और कुछ नहीं किया न’ : प्रशासन के जवाब से आक्रोशित लडकियां 

कहने की ज़रुरत नहीं है कि संघ गिरोह की आँखों में जिएसकैश एक लम्बे समय से काँटों की तरह चुभ रही थी क्यूँकि इसने यौन उत्पीड़ित के ख़िलाफ़ उत्पीड़ितों को बोलने का प्लेटफार्म दिया था. यह बात सही है कि जिएसकैश संस्था को और मज़बूत बनाने और इसके दायरे को और अधिक बढ़ाने की ज़रुरत है. मगर इन तमाम कमियों के बावजूद जिएसकैश ‘जेंडर जस्टिस’ की राह में एक जलती हुई मशाल की तरह है जिसे संघी और ब्राह्मणवादी शक्तियों द्वारा  हर हाल में बुझाने की कोशिश कर रही हैं.

जिएसकैश जैसी संस्था जेएनयू, यूनिवर्सिटी ऑफ़ हैदराबाद समेत कई विश्वविद्दालयों में एक लम्बे समय से कार्यरत है. इसकी स्थापना सुप्रीम कोर्ट के द्वारा जारी किये गए विशाखा नीतिनिर्देश की रौशनी में हुई थी.

‘विशाखा और अन्य बनाम राजस्थान राज्य’ केस की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साल 1997 में तारीखी फैसला सुनाया था जिसमें उसने यौन उत्पीड़न के मामले को निपटने के लिए कई सारे नीतिनिर्देश जारी किये. इसके दो साल बाद जेएनयू में जियेसकैश जैसी स्वायत्त संस्था वजूद में आई. यह संस्था अब तक यौन उत्पीड़न से जुडी हुए शिकायत की जाँच और दोषी पाए गए लोगों के खिलाफ सज़ा की सिफारिश करती है.
23-सदस्यों वाली जेएनयू की जिएसकैश संस्था में 10 निर्वाचित प्रतिनिधि होते हैं जो छात्र, शिक्षक, कर्मचारी और अन्य समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं. जब  जियेसकैश किसी शिकायत की जांच करवाती है तो जाँच की प्रक्रिया में सिर्फ निर्वाचित सदस्य ही भाग लेते हैं जो इसकी लोकतान्त्रिक कार्यप्रणाली की खूबसूरती है.
संक्षेप में, जियेसकैश एक स्वायत्त संस्था है जिसके काम-काज में जेएनयू प्रशासन का दख़ल नहीं होता है. इसके प्रतिनिधि जेएनयू समुदाय के सभी वर्गों से आते हैं और यह संस्था बड़े से बड़े ऑफिसर तक के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कर सकती है और और उनके ख़िलाफ़, अगर वह दोषी पाए गए, सज़ा की सिफारिश कर सकती है. कैंपस के अन्दर महिला और पुरुष दोनों की  स्वतंत्रता और समानता के लिए इस तरह की संस्थाओं का होना बेहद आवश्यक है.


जेएनयू में दलित-ओबीसी छात्राएं चुनाव मैदान में: ऐतिहासिक चुनाव

मगर प्रशासन के द्वारा लाई गयी नई संस्था आईसीसी में उपरोक्त बहुत सारी खूबियाँ जानबूझ कर  ख़त्म कर दी गयी हैं. आईसीसी प्रशासन के अधीन कठपुतली की तरह काम करने वाली संस्था होगी क्योंकि उसके सदस्य कुलपति द्वारा मनोनीत होंगे. इसका ज़ोर जेंडर जस्टिस पर नहीं बल्कि यौन-उत्पीडन के मामले को ‘सुलझाने’ पर ज्यादा केन्द्रित होगा. प्रशासन ने अपनी मंशा  ज़ाहिर कर दी है कि वह सुलह के बहाने यौन-उत्पीडन के मामले को दबायेगा और उसके करीब लोगों को ‘इम्पयूनिटी’ मुहैया करेगा. दूसरे शब्दों में कहें तो आईसीसी परचम को आँचल बनाने की एक संघी साजिश है.

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि महिला अधिकार की लड़ाई किसी भी प्रगतिशील अन्दोलन का अभिन्न हिस्सा है. यही वजह है कि भगवा ताक़तें स्त्री- अधिकार के ऊपर निरंतर हमला करते रहे हैं. उन्हें पता है कि अगर स्त्री अपने अधिकार को लेकर बेदार हो गयी तो वह पितृसत्तात्मक अँधेरी कोठरियों से आज़ाद होने के लिए आंदोलित हो जाएँगी. फ़िर शादी, परिवार, धर्म, परंपरा आदि के भगवा बंधन उन्हें ज्यादा दिनों तक जकड़ कर नहीं रख पाएंगे.

लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलतराम कॉलेज में हिंदी पढ़ाती हैं और साल 2012 में जेएनयू छात्र प्रतिनिधि के बतौर जिएसकैश का चुनाव लड़ चुकी हैं.




स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
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विश्वविद्यालय पढ़ायेगा इंद्रजाल, जादूगरी, प्रेत बाधा दूर करने की कला:संघ का एनजीओ दे रहा मंत्रालय की तरह निर्देश

मनीषा 

 बीएचयू के बाद एक खबर यह भी:

अभी 23 सितंबर की देर रात बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में अपनी सुरक्षा की मांग के साथ शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रही छात्राओं पर डंडा बरसाने की खबर आयी ही थीं कि एक खबर और आ रही है विश्वविद्यालयों को संघ की विचार-परम्परा से जुड़े एक एनजीओ द्वारा संचालित करने की कोशिश की. विश्वविद्यालय प्राशासन में बैठे लोग या तो अपनी विचारधारा से प्रेरित होकर या संघ से डरकर उसके निदेशों का इस कदर अनुपालन कर रहे हैं, मानो यह एनजीओ नहीं यूजीसी हो या मानव संसाधन विकास मंत्रालय. इसके निर्देश के अनुसार पढ़ायेगा इंद्रजाल, जादूगरी, प्रेत बाधा दूर करने की कला आदि 64 कलायें.



12सितंबर को जागरुकता, देशभक्ति और राष्ट्रवाद के दृष्टिकोण से काम करने का दावा करने वाली संस्था       भारतीय शिक्षण मंडल ने ईमेल से महामा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय और कुछ संस्थानों को सुझाव भेजा है कि वे अपने पाठ्क्रमों को राष्ट्रवादी बनायें. विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार ने 22 सितम्बर को इस निर्देश के आलोक में यथाशीघ्र अपने विभागों को इसके सुझावों की दिशा में काम करने का निर्देश जारी किया है. यानी महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के छात्र अब इंद्रजाल (जादूगरी से लेकर प्रेत बाधा दूर करने की कला सीखेंगे. विश्वविद्यालय के कुलपति से जब स्त्रीकाल ने इसके बारे में सवाल किया तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया है.

‘टच ही तो किया है न और कुछ नहीं किया न’ : प्रशासन के जवाब से आक्रोशित लडकियां 

भारतीय शिक्षण मंडल संघ की विचार परम्परा से जुड़ा एक समाजिक संगठन है, जिसके कार्यक्रमों में मानवसंसाधन विकास मंत्री ( स्मृति इरानी, प्रकाश जावेडकर से लाकर भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री के अतिरिक्त पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी तक जाते रहे हैं. संस्था अपने ऑफिसियल वेबसाईट पर अपनी कार्यकारिणी का विवरण कुछ यूं देती है:

“भारतीय शिक्षण मंडल की नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की घोषणा 18 नवंबर को आगामी आगरा के उत्तम इंस्टीट्यूट ऑफ मॅनेजमेंट, आगरा में की गई। देश भर से आये भारतीय शिक्षण मंडल की सर्वसाधारण सभा के सदस्यों द्वारा में अध्यक्ष के रूप में श्री. सच्चिदानंद जोशी,  सदस्य सचिव इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र तथा महामंत्री के रूप में श्री. वामनराव गोगटे को निर्विरोध निर्वाचित किया गया। महामंत्री श्री. गोगटे जी ने जानकारी देते हुए बताया कि शिक्षण मंडल के वयोवृद्ध कार्यकर्ता जयपुर से श्री. धर्मनारायण अवस्थी तथा विशाखापट्ट्नम से डॉ. विश्वेश्वरम संरक्षक के रूप में मार्गदर्शन करेंगे।”

12 सितम्बर के अपने ईमेल में संस्थान ने कुलपति को लिखा:

भारतीय शिक्षण मंडल का पाठ्यक्रम एवं शिक्षा पद्धतिके पुनर्निमाण हेतु आह्वान


आदरणीय कुलपति महोदय जी,
सादर प्रणाम।

भारतीय शिक्षण मंडल ने सन् 1969 में शैक्षणिक क्षेत्र में जागरुकता, देशभक्ति और राष्ट्रवाद के दृष्टिकोण से अपना कार्य प्रारंभ किया। शिक्षण मंडल भारत के 22 राज्यों और 220 जिलों में सार्वभौमिक सिद्धांतों के आधार पर काम कर रहा है। भारतीय शिक्षण मंडल राष्ट्रीय उत्थान के लिए ‘भारतीयता’ के साथ भारतीय शिक्षा के विषय पर करने वाला संगठन है। शिक्षण मंडल का मुख्य उद्देश्य गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित एक शिक्षा प्रणाली तैयार करना जो विद्यार्थी के संपूर्ण ज्ञान का भी मूल्यांकन करे। भारतीय शिक्षण मंडल ने इस उद्देश्य के लिए एक पांच आयाम प्रारूप विकसित किया है. अनुसंधान, प्रबोधन, स्वाध्याय, प्रकाशन और संगठन।
भारतीय शिक्षण मंडल, शैक्षिक प्रकोष्ठ पाठ्यक्रम एवं शिक्षण पद्धतिमें भारतीयता के समावेश हेतु इस वर्ष से नवीन पाठ्यक्रमों का निर्माण तथा विषयानुकूल अध्यापन पद्धतिके विकास पर कार्य प्रारंभ कर रहा है।
ध्येय: पाठ्यक्रम एवं शिक्षण पद्धतिका निर्माण इस प्रकार से हो कि जिससे विद्यार्थी का समय व्यक्तित्व विकास एवं राष्ट्रीय एकता के साथ उसका भावनात्मक जुड़ाव सुनिश्चित किया जा सके। सत्व एवं रजस की उसके जीवन में प्रधानता रहे, निष्काम भाव से किये जाने वाले कर्म के महत्व को समझकर एक कर्मयोगी के रूप में अपने समसत कर्तव्यों का निर्वहन कर सके। 16 विद्याओं एवं 64 कलाओं में से कम से कम एक विद्या व एक कला पर उसका अधिपत्य हो, शास्त्रीय एवं मौलिक, विजिक्षु दृष्टिकोण हो, विश्वबंधुत्व के भाव से संपूर्ण विश्व को आच्छादित करने का अजिसमें सामथ्र्य हो, अभय के साथ पूर्णता अथवा शून्य की ओर उन्मुख होकर आने वाले युग का पथ प्रदर्शक बन सके। स्वामी विवेकानंद के शब्दों मेंµ‘मनुष्य, मनुष्य मात्रा हमें चाहिए’, इन्हीं मनुष्यों का निर्माण हमें पाठ्यक्रम एवं शिक्षण पद्धतिद्वारा करना है। यही शैक्षिक प्रकोष्ठ का ध्येय है।

प्रथम चरण में स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर पर निम्न विषयों के पाठ्यक्रमों का निर्माण करना है.
1. इतिहास, 2. समाजशास्त्र, 3. दर्शनशास्त्र, 4. राजनैतिकशास्त्र, 5. मनोविज्ञान, 6. अर्थशास्त्र, 7. लोक प्रशासन, 8. अंतर्राष्ट्रीय संबंध, 9. व्यूहरचनात्मक अध्ययन, 10. शिक्षा एवं शिक्षण पद्धतियाँ, 11. मानव कर्तव्य एवं अधिकार, 12. भूगोल, 13. हिन्दी साहित्य, 14. अंग्रेजी साहित्य, 15. संस्कृत साहित्य, 16. क्षेत्रीय साहित्य, 17. नाट्यकला, 18. नृत्यकला, 19. संगीत एवं गायन, 20. चित्राकला, 21. खगोलशास्त्र, 22. रसायनशास्त्र, 23. भौतिकशास्त्रा, 24. गणित, 25. तकनीकि का भारतीय इतिहास, 26. कम्प्यूटर प्रोग्राम में संस्कृत, 27. नृशास्त्र, 28. खाद्य विज्ञान, 29. गृह विज्ञान, 30. कृषि शास्त्र, 31. पर्यावरण विज्ञान, 32. शोध प(ति, 33. पर्यटन, 34. आपदा प्रबंधन, 35. सेवा प्रबंधन, 36. उध्यमिता विकास, 37. पत्राकारिता एवं संचार, 38. वित्तीय प्रबंधन, 39. नैतिकशास्त्र, 40. स्थापत्य एवं वास्तुकला, 41. वनस्पतिशास्त्र, 42. प्राणीशास्त्र, 43. विधि
इसी राष्ट्रीय कार्य में आहूति देने हेतु शैक्षिक प्रकोष्ठ विशेषज्ञों का आह्वान करता है। आपसे निवेदन है कि भारतीय शिक्षा पद्धतिएवं पाठ्यक्रम के पुनरुत्थान हेतु आपके अमूल्य विचार, सुझाव एवं पाठ्यक्रम ;संदर्भ सहितद्ध दिनांक 19 अक्टूबर 2017 ;दीपावलीद्ध तक ई-मेल द्वारा भेजने का कष्ट करें।

इस कार्य हेतु निम्न बिन्दुओं पर विचार किया जा सकता है.
1. विद्यार्थी को पुस्तकीय ज्ञान के साथ-साथ अनुभूतिजन्य ज्ञान कैसे दिया जा सकता है?
2. विद्यार्थी में राष्ट्रीय स्वाभिमान का जागरण कैसे हो सकता है? अध्यापन में भारतीय ज्ञान परम्परा का समावेश कैसे हो सकता है? उसी के अनुरूप पाठ्यक्रम का निर्माण कैसे हो?
3. विषयों के चयन में जिस प्रकार विद्यार्थी को विकल्प दिए जाते हैं, उसी प्रकार से परीक्षा पद्धतिमें भी विकल्प किस प्रकार दिए जा सकते हैं? उदाहरण स्वरूप राजनैतिक विज्ञान की परीक्षा एवं गणित की परीक्षा एक ही तरीके से होती है, यह न तो विद्यार्थी के साथ न्याय है न ही विषय के साथ।
4. विषय तो बहुत हैं पर उनके अध्यापन का तरीका लगभग एक जैसा है। विषयानुरूप अध्यापन-पद्धतिहो?
5. सिद्धांतों के व्यावहारिक अनुप्रयोग के शिक्षण की व्यवस्था किस प्रकार से की जा सकती है?

भारतीय शिक्षा में परिवर्तन हेतु शिक्षकों का सहयोग परम आवश्यक है। इस राष्ट्रीय कार्य में आपकी एवं आपके विश्वविद्यालय के विद्वान आचार्यों की सक्रिय सहभागिता की हम आशा करते हैं, अतः आपसे विनम्र अनुरोध है कि विश्वविद्यालय के समस्त आचार्यों को इस प्रकल्प से अवगत करावें ताकि उन सभी के सुझावों से एक सुदृढ़ शिक्षा व्यवस्था का निर्माण किया जा सके। इस हेतु हिंदी, अंग्रेजी अथवा किसी अन्य भारतीय भाषा में  भेज सकते हैं।

क्यों कर रही हैं लडकियां पीएम मोदी का विरोध (!)

क्या हैं चौसठ कलायें

1- नृत्य – नाचना
2- वाद्य- तरह-तरह के बाजे बजाना
3- गायन विद्या – गायकी।
4- नाट्य – तरह-तरह के हाव-भाव व अभिनय
5- इंद्रजाल- जादूगरी
6- नाटक आख्यायिका आदि की रचना करना
7- सुगंधित चीजें- इत्र, तेल आदि बनाना
8- फूलों के आभूषणों से श्रृंगार करना
9- बेताल आदि को वश में रखने की विद्या
10- बच्चों के खेल
11- विजय प्राप्त कराने वाली विद्या
12- मन्त्रविद्या
13- शकुन-अपशकुन जानना, प्रश्नों उत्तर में शुभाशुभ बतलाना
14- रत्नों को अलग-अलग प्रकार के आकारों में काटना
15- कई प्रकार के मातृका यन्त्र बनाना
16- सांकेतिक भाषा बनाना
17- जल को बांधना।
18- बेल-बूटे बनाना
19- चावल और फूलों से पूजा के उपहार की रचना करना। (देव पूजन या अन्य शुभ मौकों पर कई रंगों से रंगे चावल, जौ आदि चीजों और फूलों को तरह-तरह से सजाना)
20- फूलों की सेज बनाना।
21- तोता-मैना आदि की बोलियां बोलना – इस कला के जरिए तोता-मैना की तरह बोलना या उनको बोल सिखाए जाते हैं।
22- वृक्षों की चिकित्सा
23- भेड़, मुर्गा, बटेर आदि को लड़ाने की रीति
24- उच्चाटन की विधि
25- घर आदि बनाने की कारीगरी
26- गलीचे, दरी आदि बनाना
27- बढ़ई की कारीगरी
28- पट्टी, बेंत, बाण आदि बनाना यानी आसन, कुर्सी, पलंग आदि को बेंत आदि चीजों से बनाना।
29- तरह-तरह खाने की चीजें बनाना यानी कई तरह सब्जी, रस, मीठे पकवान, कड़ी आदि बनाने की कला।
30- हाथ की फूर्ती के काम
31- चाहे जैसा वेष धारण कर लेना
32- तरह-तरह पीने के पदार्थ बनाना
33- द्यू्त क्रीड़ा
34- समस्त छन्दों का ज्ञान
35- वस्त्रों को छिपाने या बदलने की विद्या
36- दूर के मनुष्य या वस्तुओं का आकर्षण
37- कपड़े और गहने बनाना
38- हार-माला आदि बनाना
39- विचित्र सिद्धियां दिखलाना यानी ऐसे मंत्रों का प्रयोग या फिर जड़ी-बुटियों को मिलाकर ऐसी चीजें या औषधि बनाना जिससे शत्रु कमजोर हो या नुकसान उठाए।
40-कान और चोटी के फूलों के गहने बनाना – स्त्रियों की चोटी पर सजाने के लिए गहनों का रूप देकर फूलों को गूंथना।
41- कठपुतली बनाना, नाचना
42- प्रतिमा आदि बनाना
43- पहेलियां बूझना
44- सूई का काम यानी कपड़ों की सिलाई, रफू, कसीदाकारी व मोजे, बनियान या कच्छे बुनना।
45 – बालों की सफाई का कौशल
46- मुट्ठी की चीज या मनकी बात बता देना
47- कई देशों की भाषा का ज्ञान
48 – मलेच्छ-काव्यों का समझ लेना – ऐसे संकेतों को लिखने व समझने की कला जो उसे जानने वाला ही समझ सके।
49 – सोने, चांदी आदि धातु तथा हीरे-पन्ने आदि रत्नों की परीक्षा
50 – सोना-चांदी आदि बना लेना
51 – मणियों के रंग को पहचानना
52- खानों की पहचान
53- चित्रकारी
54- दांत, वस्त्र और अंगों को रंगना
55- शय्या-रचना
56- मणियों की फर्श बनाना यानी घर के फर्श के कुछ हिस्से में मोती, रत्नों से जड़ना।
57- कूटनीति
58- ग्रंथों को पढ़ाने की चातुराई
59- नई-नई बातें निकालना
60- समस्यापूर्ति करना
61- समस्त कोशों का ज्ञान
62- मन में कटक रचना करना यानी किसी श्लोक आदि में छूटे पद या चरण को मन से पूरा करना।
63-छल से काम निकालना
64- कानों के पत्तों की रचना करना यानी शंख, हाथीदांत सहित कई तरह के कान के गहने तैयार करना।

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
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बीएचयू की छात्राओं के समर्थन में आये लेखक संगठन : 25 सितंबर को जंतर मंतर पर

‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के जवाबी नारे ‘बचेगी बेटी तो पढ़ेगी बेटी’ के साथ सड़क पर उतरी बीएचयू की छात्राओं पर बर्बर लाठीचार्ज करवाकर बीएचयू प्रशासन, प्रदेश सरकार और फ़ासीवादी आरएसएस ने अपने को पूरी तरह बेनक़ाब कर लिया है. छात्राएं अपने न्यूनतम नागरिक अधिकारों की मांग कर रही थीं, लेकिन आरएसएस के पक्ष में खुलकर बोलने और परिसर में शाखाएं लगवाने वाले कुलपति ने उनसे मिलकर बात करना तक मुनासिब नहीं समझा. छात्राओं के साथ छेड़खानी होती रहे, उन्हें बलात्कार की धमकियां मिलती रहें, और प्रशासन उनकी सुरक्षा के इंतज़ामात करने के बजाये सुरक्षा के नाम पर उन्हीं के ऊपर पाबंदियां बढ़ाता जाए – यह छात्राओं को नामंजूर था. इसका जवाब उन्हें भयानक पुलिसिया दमन से दिया गया.



असूर्यम्पश्या भारतीय नारी के निकृष्ट आदर्श को लागू करने पर आमादा आरएसएस का यह घिनौना चेहरा है, जो इन दिनों प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र के इस ऐतिहासिक विश्वविद्यालय में खुलकर सामने आया है. इसके ख़िलाफ़ छात्राओं का संघर्ष बराबरी के अधिकार के लिए चलने वाली अभूतपूर्व लड़ाई है. हम उन्हें क्रांतिकारी सलाम पेश करते हैं और उन्हें हतोत्साह करने की हिंसक शासकीय-प्रशासकीय कार्रवाइयों की कठोर भर्त्सना करते हैं.


कल 25 सितम्बर को कई संगठन छात्राओं के दमन के ख़िलाफ़ सम्मिलित रूप से दिल्ली के जंतर-मंतर पर 1 बजे दिन में प्रदर्शन करने जा रहे हैं. हम लेखकों-संस्कृतिकर्मियों से अपील करते हैं कि बड़ी संख्या में वहाँ भागीदारी करें.

मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (महासचिव)
संजीव कुमार (उप-महासचिव)  

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