अपने ही पराभव का जश्न मनाती है स्त्रियाँ ! ( दुर्गा पूजा का पुनर्पाठ )

नौ दिनों में दुर्गा की पूजा के बाद 10 वें दिन रावण की ह्त्या और विजयादशमी का उत्सव मनाना शाक्त परम्परा पर वैष्णव साम्राज्यावाद से ही संभव हुआ होगा , जो तथाकथित समन्वय के रूप में 'हिन्दू धर्म' की ताकत के रूप में प्रचारित हुआ है. यह ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक वर्चस्व का  भी आख्यान है . ब्राह्मणवादी मिथों ने 'गणनायिकाओं' को अपमानित करते हुए उन्हें उनके अपने ही लोगों , मसलन महिसासुर आदि से टकराते हुए दिखाकर  'देवियों' का स्वरुप दे दिया -क्रूर और वीभत्स.  आज स्त्रीकाल में चर्चित मराठी लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता नूतनमालवी का यह लेख विशेष पठनीय है. इस लेख में  राम के विजय-अभियान में स्त्रीगणों, शूर्पनखा , ताडका आदि की ह्त्या का पुनर्पाठ संभव है. समझना होगा कि भारत की बहुसंख्य आबादी ( दलित -बहुजन -स्त्री ) कैसे अपने ही पराभव का उत्सव मनाता है , यह सांस्कृतिक अनुकूलन है. स्त्रीकाल की ओर से धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस की शुभकामनायें ! 
                                                                                                         संपादक

दशहरे के पहले नवरात्रि का उत्सव- दुर्गा देवी का उत्सव, एक देशव्यापी उत्सव है. ब्राह्मण मिथों और इतिहासबोध से संचालित मीडिया और अन्य स्रोत आम मानस में नवरात्रि के ब्राह्मणवादी इतिहास/ मिथकीय इतिहास को प्रचारित –प्रसारित करती रहते हैं, हालांकि यह इतिहास का विकृतिकरण है। दुर्गा महिषासुर को मार रही है- शेर पर बैठकर, उसके गले में मुंडकों की हार है,  लेकिन मुद्रा शांत-बड़ी शांति से महिषासुर को मार रही है। यह प्रतिमा क्या दिखाती है? शांत चेहरा, और काम मारने का !

देवियों की हमारी गणपरंपरायें है । लेकिन उसे ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक वर्चस्व के कारण एक दूसरा ही रूप दे दिया गया है.  ‘लोकप्रभा’ नामक प्रसिद्ध मराठी पत्रिका और ‘आजकल’ नामक पत्रिका नवरात्रि स्पेशल इशू लेकर आई है । दोनो में बड़ी रोचक कहानियाँ मिलीं। ‘आजकल’ मे महाराष्ट्र के देवीयों की  ‘पीठ’ का उल्लेख है। लिखा है – देवी भागवत के अनुसार आदिशक्ति  के रूप के देवियों की 51 पीठें  (स्थान, धर्मपीठ, धार्मिक स्थल) हैं, उन्हें  कहा शक्तिपीठ कहा जाता है. उनमें 1 पाकिस्तान में, 1 बांगलादेश में, 1 श्रीलंका में, 1 तिब्बत में, 2 नेपाल में और 42 शक्तिपीठ भारत में हैं. बचे हुए 3 शक्तिपीठो के बारे मे जानकारी नहीं। कोल्हापुर या करवीर की महालक्ष्मी के  विदर्भ में माहुर की रेणुकामाता के , तुळजापूर की तुळजाभवानी और विदर्भ में चंद्रपूर के पास के वणी गाँव की – महिषासुर मर्दिनी, सप्तशृंगी देवी आदि के दूसरे नामकरण किये गये हैं . इन तीनो पीठों के साथ नाशिक की सप्तशृंगी देवी को ब्रम्हस्वरूपपीठी कहा जाने लगा है । इन देवियों के अनेक नाम रखे गये हैं - जैसे त्रिगुणात्मक महाकाली, महालक्ष्मी , महासरस्वती, जगदंबा, अंबा आदि फिर इन देवियों के मिथकीय आख्यान रचे गये । देवी को अठारह भुजावाली, सिन्दूर से भरी हुई, रक्तवर्ण, की आठ फुट की मूर्ति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. बताया गया की इस देवी को सभी देवों ने (भगवानो ने) मिलकर शस्त्र दिये - ताकि वह महिषासुर से लडे। लेकिन यह ब्राह्मणों का रचा मिथकीय आख्यान है।

प्रा. नीरज सालुंखे (लोकायत प्रकाशन, संस्करण, दिसंबर 2002)  देवियों को गणनायिकों के रूप में व्याख्यायित करते हुए कहते हैं,  ‘भारतीय इतिहास में पुरातन साधनों का बड़ा महत्व है, उसके आकलन के लिए भारतीय साहित्य और मिथकों की ¼Myths½ तरफ जाना पड़ता है। मूलनिवासी एशियाई जनों का कर्मकांड (Rituals) खुद को आवश्यक लगे वैसे स्वीकार करके आक्रामक आर्यो ने अर्थर्ववेद लिखा। मूलतः भटके आर्य एक प्रगत संस्कृति की तरफ आये थे। इस प्रगत हडप्पा संस्कृति के नियमों की, जीवन पद्धति की समझ उन्हें नहीं थी। इसलिऐ उन्होने अपनी प्रथा-परंपरायें रचित करते वक्त हडप्पा संस्कृति की बहुत सी बातें उधार ले ली। इन प्रतीकों को उन्होंने नई परंपराओं  में अपमान, तुच्छता पूर्वक रखा.  उनके प्रति क्रूरता की भावना, बेतुकी कहानियाँ, द्वेष निर्माण करनेवाली बातें रखी। ऐसे ही वेद की रचना की है।’’ लेकिन नकल की लिखी हुई बातें और मूल बातें अस्पष्ट रूप से तो अपनी मूल कहानियाँ बताती ही हैं ......।

‘‘निर्ऋती नामक गणनायिका के बारें में भी आर्यो ने ऐसा ही किया है, यह बात इससे साबित होती है। निऋति , एक कृषिदेवता मानी जाती है, वैदिकों ने इसे बहुत घृणा से देखा है। अमरकोष निर्ऋति को नरक देवता मानता है। विंध्य प्रदेश के दक्षिण के प्रदेश को तिरस्कार से पाताल, या नरक माना जाता था। इस अर्थ से दक्षिणात्य लोक नरक में रहते है।’’ का. शरद पाटील नरक का अर्थ ‘नर गण’ के अपत्य (संतान ) के रूप में करते हैं. इसका मतलब मूळनिवासी भारतीय ‘नर’  नाम से जाने जाते थे, बाद में नरक शब्द का अर्थ ‘पापियों का मृत्युलोक’ ऐसा कर दिया गया ।

निर्ऋति का पिशाचों से नजदीक का संबंध है । महाराष्ट्र के सातवाहन वंश के दौरान की भाषा पैशाची थी। उस वक्त महाराष्ट्र के लोग पिशाच नाम से पहचाने जाते थे और प्रथम भूत, यक्ष, राक्षस, पिशाच आदि नाम से भी. वैदिक ब्राह्मण निर्ऋति का द्वेष करते थे, साथ मे उसका दहशत, डर भी रखते थे। निर्ऋति के साथ यम का उल्लेख आता है, क्योंकि यमराज नरक का प्रमुख है, निर्ऋति, यम, रेडा, उल्लु, वराह इन सबकी प्रतिष्ठा- हनन की गई है। रेडा मतलब महिष। इस प्राणी का खूब तिरस्कार किया गया है। डी.डी कौसंबी भी निर्ऋति को मृत्युदेवता मानते है। जैन कल्पसूत्र बताता है कि महावीर का निर्वाण त्रिर्ऋती अमावस के दिन हुआ, वह उनके लिए सबसे पवित्र है। हडप्पा संस्कृति के अब्राह्मण मूल निवासी जैनों ने निर्ऋति का महत्व रखा है, वह अब्राह्मण की देवता लक्ष्मी है। निर्ऋती का खेती से धनिष्ठ संबंध है, उसे काली माँ, भूमिदेवता माना जाता है, उसके साक्ष्य मिलते है। वह वनस्पति सृष्टि -निर्मात्री थी। इसलिए उसका रूप पृथ्वी का है- शतपथ ब्राहमण में यह लिखा है।

निर्ऋति की पूजा एक आकारहीन पत्थर के रूप में होती थी। उसको सुफलता की देवी (Harvest Goddess)  भी माना जाता था। उसका खेती के साथ का संबंध वैदिक छिपा नहीं सके। ‘क्षत्रीय’ शब्द  क्षेत्र, मतलब ‘हल’ से बना है , यह स्थापना प्रो. निरज साळुंखे की है. काॅ. शरद पाटिल, ‘अब्राह्मण साहित्य का सौदर्य शास्त्र’ में लिखते है,  ‘‘सच तो ऐसा है कि अथर्ववेद को ‘क्षत्रवेद’ या ‘स्त्रीवेद’ कहना और वेदोत्तर वाङ्मय को ब्राह्मण कहना, इसमें ही भारत के दो युग दिखाई पड़ते है। उपनिषदीय अध्यात्मवाद के निर्माता क्षत्रिय राजर्षि उनके परतत्व को वैश्वानर, और विज्ञानमय पुरूष कहते थे, ‘ब्रह्म नही’. पंचाल का दार्शनिक राजर्षि प्रवाहन जैवालि , उद्यालक आरूणी इस महाश्रोत्रिय ब्राह्मण  को निःसंदिग्धता से बताता है कि सारे लोगों में आदिम शासन क्षेत्रों का, मतलब स्त्रियों का था। , (पृष्ठ 104)

इसका मतलब निर्ऋति,  दुर्गा या अंबा (निर्ऋति नतिनी)  नामक स्त्री शासकों का स्वतंत्र राज्य था। यह वैदिकों को स्वीकार्य नहीं था। दुर्गा का स्थान आज हमे यह बताता है कि स्त्री-सत्ताक व्यवस्था थी। इसका निर्देश हमे आज के नये ग्रंथ ‘‘दासशुद्रोंकी गुलामगिरी’’ काॅ. शरद् पाटील, ‘रामायण महाभारत का वर्ण संघर्ष’ - काॅ. शरद् पाटिल, ‘^ Myths & Reality *’ डी.डी.कौसंबी, ‘आर्टीकल आफ तुळजाभवानी’ - राजकुमार घोगरे, प्रा. नीरज सालुंके का - ‘दैत्य बली और कुंतल देश महाराष्ट्र’, डाॅ. आ. ह. सालुंखे  के ‘बलिराज्य’ और ‘‘गुढी और शिव पार्वती’ आदि में दिखाई देता है।

प्रारंभिक दिनों में स्त्रीप्रधान राज्य थे। सिंधु नदी के आसपास गणनायिका निर्ऋति का ( दुर्गा जिसकी नतिनी थी ) , यमुना नदी के पास उर्वशी का, नर्मदा नदी के पास ताटिका (ताड़का)  का, गोदावरी नदी के पास शुर्पनखा का (रावण की बहन), पंचगंगा नदी के पास अंबा का, तेरणा मांजरे नदी के पास में तुळजा का राज था। निर्ऋति ने खेती की खोज की, उसने पानी के बाँध की योजना बनाई. क्योंकि उस वक्त खेती और पशुपालन ही मुख्य निर्वाह का साधन था, देव राजा इंद्र उसे परेशान करके बांधों को तोड़ डालता था। हाथों की ऊँगलियों से अनाज साफ करने वाली किसान रानी शुर्पनखा नाशिक की आज की सप्तशृंगी देवी मानी जाती है। मावलाई ( देवी) से मावला शब्द आया, जो शिवाजी राजा के सैनिक ‘मावले’ थे । - तुला यानी गिनना। अपने राज्य में समभाव से सब को गिनने वाली तुळजा-भवानी, जो राजा शिवाजी की प्रेरणास्थान रही हैं, ये सब गणनायिकायें थीं- पराक्रमी महिलायें थी। उन को वैदिकों ने तुच्छतापूर्वक दिखाया है, क्योंकि उस वक्त स्त्री का राज था, स्वैर संभोग था, सब जगह स्त्री का अधिकार चलता था।

‘महाकाव्यकालीन (इसवी पूर्व 1000 से 800 तक) गणराज्यों में अपत्य (संतान) का वर्ण पिता पर नहीं,  माता पर निर्भर था। (क्षत्र )  (6-4.171) यह नियम तत्कालीन भाषा का था।’ (पुस्तक – अब्राह्मण साहित्य का सौदर्यशास्त्र का. शरद पाटील पृ. 105 ). बाद में महाभारतोत्तर गणराज्य में अपत्य का वर्ण पिता से जुड़ना शुरू हो गया। फिर स्थित्यंन्तर के कारण ‘ब्राह्मोजातो ’ (6.4.179) नियम उस वक्त के भाषा का है।‘ का. पाटील, ‘समग्र स्वातत्र्य व समता’,  में स्त्रीसत्ता केस्वातंत्र्य के बारे में कहते है, ‘खेती की खोज स्त्रियों ने की । यही कारण है कि दुनियाभर के आद्य कृषक समाज स्त्रीसत्ताक थे। और गणसमाज का प्रारंभ भी स्त्रीसत्ताक व्यवस्था से हुआ। (का. शरद् पाटील, स्त्री राज्य, नवभारत, सितम्बर –अक्टूबर , 75, दासशुद्रोंकी  गुलामगिरी, भाग 1, पृ. 135- 179) अब राबर्ट ब्रिफा, डब्ल्यू. राबर्टसन स्मिथ, जार्ज थामसन आदि ने यह सिद्ध किया है कि’ स्त्रीसत्ताक गणसमाज में स्त्रीवर्ण उत्पादक, शासक और पुरोहित था इसलिए वह स्वतंत्र था। (यहाँ मुक्त संभोग था, जिसपर सम्राट अशोक ने पाबंदी लगाई). लेकिन पुरूषवर्ण अनुत्पादक - अशासक - अपुरोहित था, इसलिए राजकीय दृष्टीकोण से परतंत्र था। लेकिन यह समाज अतिरिक्त उत्पादन न कर सकने के कारण, खेती या शिकार या युद्ध आदि से से मिले हुऐ ‘गणधन ’ को कुल के ज्ञाती माता या गणराज्ञी स्त्री पुरूषों में समान बॅटवारा करती थी । इस तरह आर्थिक समता तो थी , लेकिन स्त्रीवर्ण का स्वातंत्र्य और पुरूषवर्ण का पारंतत्र्य का द्वैत भी बनता गया. इसी द्वैत से स्त्रीसत्ताक पद्धति का अभ्युदय हुआ . स्त्रियो की गणराज्ञी का रूप सामने आता है - निर्ऋति, दुर्गा, रोहिणी, उषा, उर्वशी, सात जलदेवता (सातीआसरा) आदि भूदेवता /कृषकमाया/आदिमाया हमे हमारी परंपराओं में दिखती हैं।


Excavations at Harappa M.S. Vats, Seal 25 के अनुसार हडप्पा की खोज मे सात स्त्रीमूर्तियाँ एक साथ दिखती है, वेरूळ  ¼Ellora Dist. Aurangabad½ में भी दिखती हैं। इन्हें  कृतिका नक्षत्र के रूप में ‘साती आसरा’ (सप्त जलदेवता),  सप्तकृतिका या स्कंदमाता भी कहा जाता है। इन सप्तमूर्तियों की ग्रामीण स्त्रियाँ आज भी पूजा करती हैं . इनके बारे में महात्मा फुले ने भी बताया है। घटस्थापना, जो दुर्गा पूजा के वक्त होती हे, उसका संबंध स्त्री के गर्भ के साथ जुडा हुआ है। जब स्त्रीसत्तात्मक समाज में  मुक्त स्त्री- पुरूष संबंध थे,  तो स्त्री का गर्भाधारण होना महत्वपूर्ण माना जाता था। प्रजनन के कारण स्त्री को अलौकिक, प्राकृतिक शक्ति वाली महानदेवी माना जाता था, आगे चलकर स्त्रियों की इस शक्ति की पूजा होने लगी। स्त्री कि इस नैसर्गिकता का गण समाज ने सम्मान किया था उसे श्रेष्ठपद देकर गणनायिका, मुख्य रानी के स्थान पर रख दिया। यह परम्परा  में स्त्री –गर्भ की पूजा के साथ निरंतरता में बनी हुई है. भूमि में बीज डालने पर जो बीज अंकुरते हैं , उसे गणसमाज नैसर्गिक शक्ति मानता था, जिसे वे स्त्री के गर्भधान से जोड़कर देखने लगे और इस तरह भूमि और स्त्री के सम्मान की परंपरा रूढ हो गयी, स्त्री शासक उत्पादक, पुरोहित बनती गयी। आज हमने इसका स्वरूप सिर्फ कर्मंकांड तक रखा. लेकिन गणसमाज -असुर, पिशाच, राक्षस गण स्त्री को वास्तविक सम्मान देता था.  इस प्रकार देवियों का उद्भव हुआ । डाॅ. आ. ह. सालूंखे ने ‘गुढी और शंकर पार्वती’ में लिखा है कि ‘‘पार्वती का संबंध दुर्गा से है । इसके लिए उन्होने अनेक कथाओं का, पुराणों का संदर्भ दिया है - ‘देवी भागवत’ में (संपादक पं. श्री रामतेज पाण्डेय प्रकाशन चैखाबा विद्या भवन चौक वाराणसी 221001 (अध्याय 14-25) मे देवी के नवरात्र के बारे मे आयी हुई कथा ध्वजोत्सव के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।  देवी पुराण में चैत्र, अमावस और प्रतिपदा का दिन देवी के नवरात्र उत्सव का बताया गया है। दक्षिण भारत में फाल्गुन अमावस में देवी व्रत करते हैं, उत्तर भारतीय पूर्णिमान्त मास के दूसरा दिन , चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को चैत्र नवरात्र शुरू करते है। डा. सालुंखे  महाराष्ट्र मे मनाये जाने वाले गुढीपाड़वा नामक त्योहार में गुढी के रूप में पूजी जाने वाली देवी को देवी पार्वती मानते हैं । वे दुर्गादेवी को भी पार्वती मानते है। हमारे समाज में शंकर (शिव) पार्वती को सृष्टिकर्ता और जगन्माता माना जाता है। gSA Dr. Ambedkar, ‘Riddles in Hinduism’ में लिखते हैं , ^Let as take the case of shiva. That shiva was originally an Anti-vedic god it is abundantly clear.* There can be no better evidence to prove that shiva was an Anti-Vedic god than his distruction of Daksha’s Yajna  ( पेज 85)
प्रसिद्ध मराठी लेखक डाॅ. रा.चि. ढेरे ने ‘लज्जागौरी’ (श्री विद्या प्रकाशन, पुणे प्रथमावृत्ति  जून 1908 पृ. 19) में देवी के बारे में लिखा है, ‘ शक्त्यु उपासना का (शक्ती उपासना का इतिहास), मानव के इतिहास मे अत्यंत प्राचीन है। मानव के प्रथम देव की कल्पना की, फिर उसे पूजा, वह स्त्रीरूप में था। उनकी स्त्री यह सर्जनवादी , गहन गूढ शक्ति धारण की हुई देवी रूप में थी। वह मानवइतिहास की आद्य शक्ति है, उसे मानव ने स्थान दिया अलग रूपों में देखा। अलग नामों में डाला, उसकी अलग अलग प्रकारो से भक्ति की। अलग- अलग शक्ति उपासना का इतिहास खोजनेवाले को अलग- अलग दृष्टि  इसकी खोज करनी चाहिए। मानवी जीवन के अलग अलग प्रवाह रास्ते - झुकाव पडाव खोजने  चाहिए। शाक्तपंथ का इतिहास सब जगह खुला है। शाक्त सिर्फ तांत्रिक पंथो तक नहीं, भारतीयों के जीवन में व्याप्त है। अपने साहित्य के ऋग्वेद आदिति से आज दरवाजे की चैखट पर लिखे गीत- गान में भवानी, रेणुका आदि शक्तियों की महानता का वर्णन मिलता है. सिंधु नदी के पास मिली मातृमूर्तियाँ आज भी गावों में प्रभावशाली ग्रामदेवता मानकर पूजी जाती हैं।’’

अनेक विद्वानों ने अलग –अलग समय पर नवरात्र और देवियों के प्रति श्रद्धा पर लिखा है.महात्मा  जोतीबा फुले ने सत्यशोधक विवाह पद्धति में आशीर्वाद की यह व्यवस्था दी है .
वर कन्या हैं ये इन्हे भव्य शक्ति देने
समर्थ है वह दुनिया को बनाया जिसने।।
सुबुद्धि ज्ञान बल और वैभव मिलता ।
दया सब उसी के कृपा से होता ।।
मन में स्वकर्ता का सही स्मरण करो।
बली कुलस्वामी का ध्यान करो।।
वैसे ही विंध्यावली स्वामिनी को
स्मरण करो अपने काल भैरव को।
खंडेराव चाहिऐ तुम्हारी याद मे।
श्रद्धा अर्पित करो महिषासुर में।
न्यायकर्ता था जो नौखंडो का।।
सुखका कारण है स्मरण उसका
म. फुलेने तर सत्यशोधक विवाह पद्धति म. फुलेरचनावली खंड 2 पृ. 84)
इस प्रकार फुले का आशीर्वाद भी महिषासुर और दुर्गा में श्रद्धा अर्पित करने लिए कहता  है।

फुले कहते हैं कि वधु- वर को शक्ति देने के लिए – बळीराजा, विंध्यावली स्वामिनी यानी दुर्गा, कालभैरव, खंडेराव और महिषासुर को याद करो, वह नौखंडो के न्यायकर्ता हैं।

डा. साळुंखे यह मानते हैं कि चैत्र मास मे शुरू हुआ यह उत्सव,  जिसे गुढ़ीपाडवा, नवरात्र या शिवर्पावती का विवाह मिलन आदी अन्य परंपराओ में देखा जाता है,  बहुत  प्राचीन है। यह अब्राह्मण  संस्कृति  से आया है . फिर रावण जलाना या महिषासुर को मारते हुए देवी को दिखाना विकृति है. यह विकृतिकरण ब्राह्मण मानसिकता से हुआ है, यह स्पष्ट है.

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