'टच ही तो किया है न और कुछ नहीं किया न' : प्रशासन के जवाब से आक्रोशित लडकियां

विकाश सिंह मौर्य

21 सितम्बर 2017 को बीएचयू के दृश्य कला संकाय में बीएफए की छात्रा अनन्या (बदला हुआ नाम) शाम को लगभग 6.30 बजे अपने फैकल्टी से हॉस्टल जा रही थी, तभी भारत कला भवन एवं डीन ऑफ़ स्टूडेंट कार्यालय के पास के चौराहे पर कुछ अज्ञात लड़कों ने उनको अपनी तरफ हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींचा. इसके बाद उसके कपड़े फाड़ डाले एवं कपड़े के अन्दर हाथ भी डाला. इस जघन्य वारदात के समय लड़की चीखती रही और वहां पर उपस्थित प्राक्टोरिअल बोर्ड के सिपाहियों ने उसकी कोई मदद नहीं की. पीड़िता ने जब इस बात की त्रिवेणी हॉस्टल की प्रशासनिक संरक्षिका से किया तो इतना वाहियात जवाब दिया कि किसी का भी खून खौल जाये. उसने कहा कि “टच ही तो किया है न कुछ और नहीं न किया है.” इतने में जब लड़कियां चीफ प्राक्टर ऑफिस में शिकायत दर्ज करवाने पहुचीं तो वहां भी इनकी शिकायत सुनने के बजाय अशोभनीय टिप्पणियाँ सुननी पड़ीं.

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इसके बाद अगली सुबह बीएचयू गेट के पास ही स्थित महिला महाविद्यालय की छात्राओं ने सुबह 6 बजे से ही मुख्य गेट के पास न्याय और सुरक्षा की मांग को लेकर धरने पर बैठ गयीं. वार्डेन ने त्रिवेणी हॉस्टल का दरवाजा बंद करवा दिया था जिससे छात्राएं आन्दोलन में शामिल न होने पायें. किन्तु भरी दबाव के चलते दोपहर बाद त्रिवेणी हॉस्टल से भी दरवाजा खुलने के बाद सैकड़ों की  संख्या में छात्राएं आन्दोलन में शामिल हो गयीं. दिन भर धरना चलता रहा और अपराधियों को पकड़ने एवं सजा देने के स्थान पर विश्वविद्यालय प्रशासन एवं वाराणसी प्रशासन ने इस आन्दोलन में शामिल विद्यार्थियों को अंदाज में उनका कैरियर बर्बाद करने व जेल में भेजने की धमकी देते रहे. कुलपति गिरीश चन्द्र त्रिपाठी ने पहले तो छात्राओं से मिलने से एकदम इनकार कर दिया. यहाँ तक कि एस.डी.एम. के अनुरोध पर भी नहीं गये. लगभग 4 बजे कुलपति ने कुछ महिला प्रोफेसरों को धरनास्थल पर भेजकर पांच छात्राओं को बातचीत के लिए अपने आवास पर बुलवाया किन्तु छात्राओं ने यह कहते हुए ऐसी मुलाकात से इंकार कर दिया कि “वे अकेले में कुलपति से बात करने को लेकर खुद को सुरक्षित नहीं महसूस कर रही हैं.” आन्दोलन में शामिल शैलेन्द्र वर्मा ने बताया कि इस प्रकार की धमकियाँ शोधार्थियों को लगातार दी जा रही थीं तो ऐसे में अधिक संख्या में शामिल स्नातक के विद्यार्थियों को किस तरीके से दबाने का प्रयास किया होगा इसका अंदाजा मात्र लगाया जा सकता है. इस बीच आन्दोलन को अपनी दिशा से भटकाने के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के अराजक तत्वों ने कुलपति की शह पर धरनास्थल पर जाकर मारपीट व अश्लील किस्म की गाली-गलौज कर मामले को बिगड़ने का भी प्रयास किया. और यह प्रयास पूरे दिन में कई बार किया गया. हद तो तब हो गयी जब शाम लगभग 7.30 बजे अशांति और अराजकता के इन दूतों ने धरने पर बैठे विद्यार्थियों से इस बात का झूठा आरोप लगाकर मारपीट की कि ये लोग गेट पर लाल झंडा लगाना चाह रहे हैं. जब कि वास्तविकता यह है कि यहाँ पर किसी के मन में ऐसा कोई विचार नहीं था.

22-23 सितम्बर की रात लगभग 12 बजे यह अफवाह भी फैलाई गयी कि “ये आन्दोलनकारी विश्वविद्यालय के प्रमुख संस्थापक मदन मोहन मालवीय की प्रतिमा कालिख पोतने का प्रयास कर रहे थे इसलिए कुलपति ने इनसे मुलाकात नहीं की. अभी 23 सितम्बर को दोपहर 1.00 बजे ये रिपोर्ट लिखे जाने के समय तक विश्वविद्यालय की छात्राएं एवं छात्र हजारों की संख्या में धरना स्थल पर डटे हुए हैं. और यह जुटान 22 तारीख को चिलचिलाती धूप और पूरे रात तक भी इसी तरह से थी. अभी भी यहाँ पर चिलचिलाती धूप और उनमें अन्याय के खिलाफ एवं न्याय को लेकर विद्यार्थियों की कटिबद्धता भी अपनी चरम पर है.
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इससे पहले लगभग एक सप्ताह से नवीन महिला छात्रावास में रात को कुछ अराजक तत्व पत्थर फेंक रहे थे. इतना ही नहीं लगभग एक महीने से त्रिवेणी संकुल (यह बी.एच.यू. महिला छात्रावासों की एक सीरीज है) के सामने लड़कियों को देखकर कुछ छात्र उनकी तरफ हस्तमैथुन की मुद्रा में अश्लील हरकतें करते रहे हैं. इन छात्रावासों में रहने वाली छात्राएं बताती हैं कि कई बाद शिकायत करने के बाद भी इन असामान्य आपराधिक घटनाओं को रोकने के लिए कोई उपाय नहीं किये गये. पिछले दिनों बी.ए. के एक लड़के के साथ विश्वविद्यालय के ही विज्ञान संस्थान के कुछ कर्मचारियों ने दुष्कर्म किया था. उस मामले को भी ठन्डे बसते में दाल दिया गया है.

बीएचयू के मुख्य प्राक्टर प्रो. ओ.एन. सिंह और बीएचयू प्रशासन इस मामले को लेकर पूरी तरह से लीपापोती पर उतारू हैं. इस आन्दोलन का एक तात्कालिक असर यह हुआ कि वाराणसी दौरे पर पूजा-पाठ करने आये प्रधानमंत्री के रास्ते का रूट बदलकर उन्हें उनके निर्दिष्ट पूजास्थल मानस मंदिर तक संकट मोचन की पतली गली से ले जाया गया. यहाँ ओ.एन. सिंह से पहले के चीफ प्राक्टर तथा अन्य प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी व शिक्षक, शिक्षिकाएं महिलाओं को लेकर दकियानूसी पितृसत्तात्मक वैचारिकी से न केवल ग्रस्त हैं. जो अभी भी स्त्री को अपनी सुविधानुसार मात्र सेक्स करने और दासी बनाकर मनमाफिक काम करवाने की ही परम्परा है. निकट अतीत तक यहाँ पर बलात्कार जैसे जघन्य मामलों को भी रफा-दफा कर दिया जाता रहा है. एक उदाहरण समाजशास्त्र विभाग का है जहाँ पर एक शोधछात्र ने एम.ए. की लड़की को लालच, फुसलावे और बहलावे में लेकर लम्बे समय तक उसका यौन शोषण करता रहा. और आखिर में उस लड़की को गर्भपात जैसा कदम उठाने को मजबूर होना पड़ा. चूँकि वह लड़का जाति से ब्राम्हण है और उस पर विभागाध्यक्ष (ये पूर्व में कई वर्षों तक यहाँ के चीफ प्राक्टर भी रह चुके हैं) की विशेष कृपा भी रहती है. हालाँकि लड़की की जाति भी ब्राह्मण  ही है किन्तु इस सनातनी परंपरा ने स्त्री को मात्र उपभोग और सेक्स करने का संसाधन ही माना है. ये उसी परंपरा के वाहक हैं. ऐसी ख़बरें यहाँ के कई प्रोफेसरों के बारे भी मिलती रहती हैं.  


बीते लगभग तीन वर्षों में कैंपस का माहौल जिस तरीके से अराजक हुआ है वह भी इधर के समय में अभूतपूर्व है. लड़कियों की स्थिति तो हमेशा से ही यहाँ पर बेचारी और दयनीय रही है. विश्वविद्यालय में ऐसे अराजक तत्व कहीं भी मौजूद मिल जायेंगे जो किसी को भी पीट देंगे, गाली देकर बात की शुरुआत करना इनकी आमतौर पर इनकी आदत है. कोढ़ में खाज की स्थिति तो इसलिए है क्योंकि ये अराजक तत्त्व कुलपति और प्रशासन के संरक्षण में अपना काम करते हैं. यानि की इन्हें पुलिस, अदालत जैसी किसी भी चीज का भय है और न ही इन सबकी कोई इज्जत. हाँ एक बात अवश्य है कि ये देशभक्त शाखा में और रास्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यक्रमों में अक्सर आयोजक और अन्य प्रमुख भूमिकाओं में नजर आते रहते हैं. इनका इंसाफ भी लात, घूंसों और कई बार तो पिस्तौल वाला होता है. लड़कियों के मामले में तो बी.एच.यू.  सहित लगभग पूरा बनारस दकियानूसी और कूड़ा-कचरा वाले दिमाग से लैश है. वैसे पुलिस के साथ भी इनके सम्बन्ध मधुर ही होते हैं. यहाँ पर सवाल यह है कि ये बच्चे जो दूसरे किसी मास्टर माइंड के इशारे पर इस तरीके के काम करते हैं, उनका भविष्य क्या है? देश का भविष्य और उनका भविष्य अलग-अलग तो है नहीं.   '

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इस मामले को लेकर जिस तरीके की उत्तेजना, मानसिक-शारीरिक उद्वेग, प्रतिबद्धता और एकता बीएचयू के विद्यार्थियों ने दिखाई है, वह बनारस के लिए अभूतपूर्व है. इसका सबसे प्रमुख कारण यह है कि यहाँ पढने वाली लगभग सभी लड़कियां प्रतिदिन बी.एच.यू. कैंपस में छेड़खानी का शिकार होती है. प्रथम तो वो किसी से ऐसे मामलों का जिक्र तक नहीं करती हैं. इस प्रकार के मानसिक उत्पीड़न के साथ में घुट-घुट कर जीना इनमे से अधिकांश ने तो इसे अपनी नियति मान ली है. संभवतः इसका कारण यह डर है कि अगर घर वालों को पता चला तो उनकी पढ़ाई घर वाले बंद करवा देंगे. बी.एच.यू. के अधिकांश विद्यार्थी उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और बिहार के हैं. इन क्षेत्रों में इतने सामाजिक-राजनीतिक आन्दोलनों के बाद भी सामाजिक सोच का दायरा पारंपरिक दकियानूसी दिमागी कचड़े को समृद्ध करने के अतिरिक्त कुछ अधिक नहीं है. बच्चियों, लडकियों और महिलाओं के मामलों में तो और भी अधिक. ऐसे दमघोंटू समाजीकरण के बाद की स्थिति खतरनाक न हो तो आश्चर्य ही है. बी.एच.यू. में ही समाजशास्त्र विभाग में पीएच.डी. कर रहीं अनीता ने कहा कि “कमेंटबाजी तक तो ठीक है, इसको हम लोग रोज कई बार झेलते हैं, पर ऐसी घटना स्वीकार्य नहीं है.” यहाँ यह स्मरण रहे कि यह बयान एक शोधछात्रा का है. आज भी  पर आज जब बी.एच.यू. में किसी तरह के शोषण, उत्पीडन और दमन की खबर आम नहीं हो पाती है. यहाँ का ऐसा आभासी वातावरण बना दिया गया है कि ‘यह सर्वविद्या की राजधानी है और यहाँ पर होने वाला हर अपराध आँख बंद किये रहने वाला ही होता है.’

वैसे भी इन क्षेत्रों में बहुत सारे समाज सुधारक और क्रांतिकारी पैदा होने का मतलब ही यह है कि यहाँ पर गंदगी अधिक है. इन क्षेत्रों में जितने भी आन्दोलन और जन कार्यक्रम हुए हैं, उनमे लड़कियों और महिलाओं की भागीदारी अत्यल्प ही रही है. यही स्थिति अभी भी है. यहाँ तक कि महिलओं के लिए होने वाले सेमिनार जैसे आयोजनों में भी. इस आन्दोलन में अभी तक जो चीज निराश कर रही है वो है, शोधार्थी छात्राओं का इसमें हिस्सा न लेना. इसके पीछे वजह चाहे जो कुछ भी हो. संभव है कि इसके पीछे उनके शोध निर्देशकों का दबाव हो. या फिर उन्होंने अपने ऊपर खुद से ही मनोवैज्ञानिक दबाव बना लिया हो. बीएचयू से ही एल.एल.एम. करने वाली अनीता सिंह भारती कहती हैं कि ‘ये हिंदी पट्टी में जो निकृष्ट स्तर की सोच है, महिलाओं को लेकर, जातियों को लेकर, मजदूरों को लेकर और बच्चो के समाजीकरण को लेकर, यह यहाँ के पारंपरिक सामन्ती धर्म और ब्राम्हणवादी सत्ता के मजबूत आधार तथा पिलर दोनों ही हैं.’ इसके पीछे सामाजिक मूल्यों का बजबजाता कचरा और उसको मात्रात्मक तथा गुणात्मक रूप से खाद-पानी देते यहाँ के शिक्षण संस्थानों सहित विश्वविद्यालय प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं. ऐसा इसलिए  क्योंकि शिक्षण संस्थान व्यावसायिक निगमों की तरह काम करते हैं. विश्वविद्यालय और उनके शिक्षक अपने विद्यार्थियों में जड़ परम्पराओं, तमाम तरह की संकीर्णताओं, अंधविश्वास और संविधानविरोधी डेली प्रैक्टिस में उपयोग में आने वाली प्रतिगामी विचारधाराओं के प्रचारक-प्रसारक की सक्रिय भूमिका में हैं. ये अपने विद्यार्थियों में और अपने शोधार्थियों में स्वतन्त्र चिंतन, वैज्ञानिक मिजाज  और आलोचनात्मक दृष्टिकोण पैदा कर पाने में सफल नहीं रहे हैं.

विकाश  इतिहास विभाग, डी.ए.वी.पी.जी. कॉलेज,  बीएचयू, वाराणसी में शोधार्थी हैं.  इमेल: vikashasaeem@gmail.com

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