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दलित कहानियों में संवेदनात्मक पक्ष, परिवर्तन और दिशा

 

दलित कहानियों में संवेदनात्मक पक्ष, परिवर्तन और दिशा

 राजकुमारी

असिस्टेंट प्रोफ़ेसर (हिन्दी )

ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज (सांध्य)

संवेदना मनुष्य और साहित्य की किसी भी विधा का मूलभूत आधार होती हैं। अपनी ज्ञानेंद्रियों के द्वारा ही मनुष्य जो सुखानुभूति और दु:खानाभूति करता है; उसकी अभिव्यक्ति ही वह रचना में करता रहा है। हिन्दी साहित्य में कथाओं का वृहद इतिहास रहा है, कभी कथाएँ  मौखिक तो कभी लिखित रूप में रही हैं। पाश्चत्य देशों से प्रारंभ हुई इस विधा ने हिन्दी साहित्य को अत्यंत प्रभावित किया और अंग्रेज़ी कथाओं का प्रत्यक्ष प्रभाव भी हिन्दी कथासाहित्य पर सप्ष्ट रूप में परिलक्षित होता है। आधुनिक युग में कहानी विधा का हिन्दी साहित्य में आगमन हो चुका था। भारतेंदु युग के अंतिम दशक में इस विधा की उत्पत्ति हो चुकी थी। प्रारंभिक कहानियों में सामाजिक कुरीतियों और समाज सुधार का स्वर दृष्टव्य होता है- “आज की हिन्दी कहानी गतिशील है, आधुनिकता की चुनौती को स्वीकार कर रही है और आधुनिकता एक प्रक्रिया है जिसे नई कहानी ने मूल्य में परिणित कर इसे रूढ़ बनाया है। इसीलिए नई कहानी अपने नयेपन को छोड़कर नए नाम धारण करने को विवश है।”1

नयापन और नवजागरण दलित साहित्य में भी बखूबी उभरा है। कविता, उपन्यास और कहानी, नाटक आदि विधाओं के रूप में इसे देखा जाता रहा है। इसी परम्परा में कथा के क्षेत्र में एक ख्याति प्राप्त नाम है रतनकुमार सांभरिया। सांभरिया जी दलित साहित्य लेखन के अप्रतिम साहित्यकार हैं। उनकी कहानियों में सामाजिक शोषित व्यक्तियों के संवेदनात्मक पहलुओं के साथ अस्मिताबोध, चेतना और आत्मचिन्तन की छवि   प्रत्यक्ष नज़र आती है। वर्तमान युग में हाशिए पर खड़े समुदाय और जातियों के अविकसित समाज की यथार्थ अभिव्यक्ति कथाओं में हुई है। एक ओर जहां बंजारे, कंजर, सपेरे, जैसी समस्त कहानियाँ खानाबदोश जीवन जीने वाली जातियों के खुरदुरे जीवन के कटुतापूर्ण सत्यों का उदघाटन करती हैं तो वहीं दूसरी ओर आँचलिक जीवन में सामान्य श्रमिक, लघु उद्योग से जुड़े लोगों, जातीय पेशे से जुड़े समाज, विधवा जीवन, स्त्री जीवन, विदुर पुरुष और वृद्धावस्था में कठिन परिस्थितियों में गुजरती जिंदगी और उनके साथ हो रहे मानवीय व्यवहार के सत्य को चित्रित करती हैं । ये कहानियाँ संवेदना की आत्मिक अभिव्यक्ति  को जीवंत करती हैं ।

उनकी कथाओं में सशक्त बात ये भी है कि एक ओर यथास्थिति के अनुकूल नारी पात्र अपने निर्णय स्वयं लेते हैं, तो वहीं दूसरी ओर अंतर्विरोध की स्थिति से निपटना भी भली- भांति जानते हैं। विपरीत परिस्थियों से जूझते जरूर हैं किंतु निराशावाद का दामन थामने के लिए विवश नहीं होते। जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ती है रोचक होती चली जाती है। पाठकों को मुग्ध करने की सारी गुणवत्ता कथाओं में निहित है और वही उनके कथानक को सुदृढ़ बनाती है। संघर्षरत पात्रों को निर्मिति परिवेश की जटिलताओं को साहसपूर्वक पार करती है। आंचलिक क्षेत्र में जातीयता की जटिलता, शोषण की पराकाष्ठा, अपमान की लीक , संघर्ष का संकल्प, जन चेतना, खानाबदोश जीवन की यथार्थ अभिव्यक्ति को बड़ी ईमानदारी के साथ कथाकार ने शब्दबद्ध किया गया है।

सांभरिया जी की कहानियों में नारी शोषण, भारतीय जन जीवन, वर्ग संघर्ष, मानवीय मूल्यों की स्थापना, मानवीय संबंधों में उभरता द्वंद, बहुत गहन चिंतन हृदय को गहराई से प्रभावित करता है। कहानियों के कथ्यों में चेतनता के स्वर उभरते हैं। वृद्ध सेवक जो अपने घर को वृद्धों के लिए वृद्धाश्रम बना देते हैं, ये उनकी जिंदगी से मिले सबक से वो सीखते हैं कि बुजुर्ग होने पर एक सहारे की अवश्यकता होती है। ‘ आश्रय ‘ कहानी का कथानक इसी मूल भाव को रुपायित करता है। सेवक का बेटा जो शहर में निवास करता है वो पिता के उस घर का भी सौदा करना चाहते हैं जिसमें सेवक जी दीन दुखी, रोगग्रस्त वृद्ध व्यक्तियों को आश्रय दिए हुए हैं जिन्हें उनके परिवार त्याग चुके हैं, रिटायरमेंट और पत्नी की मृत्यु के पश्चात वे धन और मन दोनों से ही बेसहारा लोगों के जीवन का संबल बने उदारवादी भावना से ओतप्रोत सेवक अपने बेटे परमेश्वर का कंधा थपका कर कहते हैं – “परमेश्वर जी, रिटारमेंट के बाद मुझे लगा कि बहु बेटे पर आश्रित होने की बजाय मेरा घर और धन बुजुर्गों का आश्रय बन जाए। आप जब भी आश्रय आएं, बेसहारा को जरूर लाएं।”2

पिता की गीली आंखों और इन शब्दों ने अपनी अंतर्वेदना के बहाव को बहा दिया। अप्रत्यक्ष रुप में उस मकान को न बेचने की घोषणा भी कर चुके थे। उनकी कहानियाँ नए सोपानों को स्पर्श करती हुई आगे बढ़ती हैं नारी पात्र जीवन की विभिन्न चुनौतियों को स्वीकार करते हुए आजीवन संघर्षशील बने रहते हैं। अस्मिता की धुरी पर घुमती स्त्रियां बहुयामी व्यक्तित्व में दिखाई पड़ती हैं।

भारतीय कृषक वर्ग, गरीब किसानों की पीड़ा को दर्शाती कहानी ‘ खेत ‘ जिसके माध्यम से कथाकार अपनी ज़मीन खोने की टीस लिए हैं, सड़क के किनारे स्थित ज़मीन हो या सड़क से दूर किसान का लगाव उससे माँ सरीखा होता है, उसी के सहारे से अपने परिवार का लालन-पालन करते हैं। ज़मीन उनकी जिंदगी होती है। औद्योगिकीकरण के कारण पूंजीपति वर्ग की पैनी नज़र उसी ज़मीन पर गड़ी रहती है जहाँ वे अपने लाभ हेतु कारखाने, मॉल निर्मित कर एक उद्योगिक नगर बनाकर अपनी आर्थिक स्थिति को अधिक मज़बूत कर सकें, किंतु इसके परिणामस्वरूप आर्थिक रूप से कमज़ोर किसान बलि का बकरा बन जाता है।

‘हथौड़ा’ कहानी “मूर्तिकार पत्थर पर बैठकर उसे मूर्ति बनाता है। मंदिर में जब मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा हो जाती है, वह उसे छू तक नहीं पाता है। मजूर की नियति। अपना श्रम स्वेद दफन कर जिस मकान का निर्माण करता है, नांगल मंगल के बाद उसी में जाते पीछे हटता है।”3

समाज में एक ये भी परंपरा रही कि खेत मजदूरी में जाने वाले निम्न जाति के लोग जिनके खेतों में काम करते उन्हें अपना जमींदार और वे उन्हें अपने चमार, नाई होने का हक जमाते थे वे उनके अतिरिक्त किसी अन्य बड़े परिवारों का काम नहीं कर सकते थे। वैसा ही एक उदाहरण हमें ‘ चमरवा ‘ कहानी में प्राप्त होता है चमारवा एक ऐसी जाति है जो पूर्वी और हरियाणा के पश्चिमी छोर पर रहती है, चमरवा एक बाभन जाति है जो चमारों के कर्मकांडों को पूर्ण कराते रहे हैं और अपना गुजर बसर करते हैं किंतु उसकी पहचान चमारों के बीच ब्राह्मण और ब्राह्मणों के मध्य चमार की है। प्रस्तुत कहानी में दरपन ब्राह्मण का पुत्र अपने दोस्त के मशवरे पर नौकरी के लिए जाति प्रमाण पत्र बनवाता है दरपण को इस प्रमाण पत्र को देखकर क्षोभ और झल्लाहट से भरकर क्रोधित हो उठता है और जातीय घृणा के कारण बौखला उठता है – ” करण के हाथों ‘ चमार’ का प्रमाण पत्र देखकर दरपन की आँखें मशाल बन गई। बाज़ परिंदे भी इतनी तेज़ नज़र नहीं खोजता होगा, जितना दरपन ने करण के हाथ पर झपटा मारा, प्रमाण पत्र फाड़ कर चिंदियां की और चूल्हे की जलती आग में भाड़ में भूसे की तरह झोंक दी, चमार बनने चला बेवकूफ।”4 

रस्सी जल गई पर बल नहीं गया। जातीय दंभ भरने वाले दरपन का पेट हालाँकि चमारों के कर्मकांडो से चलता है उनका दिया खाते हैं , लेकिन जाति प्रमाण पत्र को देखकर उनके अन्दर निम्न जाति के प्रति घृणा की पराकाष्ठा देखने को मिलती है। मृत्यु के वक्त अछूतपन की भावना भी सपष्ट दिखाई पड़ती है।

 कहानीकार अपनी कहानियों में सामंतवाद से टकराते सजीव पात्रों का भी चित्रण करते हैं और निम्न जातियों में सामाजिक चेतना का विकास भी करते हैं। उन्होंने गैर दलित समाज के व्यवहार को यथार्थ रूप में प्रस्तुत किया है। अत्याधिक लोग जातीय अभिमान में इंसानियत को भूला  दिया गया है।

 ‘बात ‘ जैसी कहानी में विधवा सुरती मर्द की तरह अपनी दी गई ज़बान को पूरा करती है और अपने बेटे की पढ़ाई के साथ-साथ अपनी इज्ज़त की रक्षा भी कर लेती है, इससे ये सिद्ध होता है कि ज़बान का पक्का होने में कहीं भी लिंग का कोई महत्व नहीं होता। वह स्त्री-पुरुष कोई भी हो सकता है। गरीब की भी इज्ज़त आबरू होती है तथा वह मेहनतकश भी है, यही कारण है कि सुरती अपने स्वाभिमान को सुरक्षित रख पाती है। असल में वह भारत की हर श्रमिक स्त्री के स्वाभिमान का प्रतिनिधित्व करती है। ‘ काल ‘ कहानी भारतीय गरीब किसान की व्यथित कथा है जिसमें सूरदास बैल को भूख प्यास से राहत दिलाने के लिए खूंटे से खोलकर न चाहते हुए भी आज़ाद कर देता है ताकि वह मर न जाए, किंतु कुएं के निकट स्थित सूरदास बैल की मौत अकाल के कारण भूख प्यास से हो ही जाती है। जो मनुष्य और जानवर दोनों की विवशता और मौत का परिदृश्य दिखाती है।

कहानीकार अपनी कथाओं के माध्यम से भारतीय आँचलिक, शहरी क्षेत्रों के समाज में अपनी मज़बूत जड़े जमा चुकी विद्रूपताओं, पिछड़ेपन की जटिलताओं को चित्रित करते हैं।  जनजातियों की दशा, सामंती मानसिकता, अभावग्रस्त जीवन, अकाल के समय की त्रासदी, भ्रष्टाचार की दिन ब दिन बढ़ती स्थिति ग्रामीण और देश की राजनीतिक स्थिति , जीवन में तीव्रता से हो रहे परिवर्तन आदि विभिन्न पहलुओं को जीवंत वातावरण के साथ प्रस्तुत करते हैं। स्त्रियों में अपनी अस्मिता को लेकर संजीदापन, अपने अपमान के प्रति प्रतिरोध, स्वर मुखरित करने की हिम्मत बा- कमाल है। शोषित वर्ग में चेतना, मनोवैज्ञानिक बदलाव, उनकी सक्रिय भूमिका को उभारते हैं। सभी कथाएं कालक्रमानुसार आए परिवर्तन का सार्थक निरूपण हैं।

 कथ्य में नवीनीकरण मिलता है,भाषा में ठेठ खड़ी बोली, राजस्थानी के शब्द प्रयोग हुए हैं, 

“जीवन पचासेक के नीडे था।”5

खाट, गुदड़गाबा, चौसड़, आदि शब्द 

 गुण, शब्द शक्ति, लोकोक्ति, मुहावरे सभी उनके लेखन के मज़बूत पक्ष हैं। वर्णनात्मकता, प्रवहमयता, बिंब, ध्वन्यात्मकता, प्रतीकात्मकता ,कलात्मकता कथा उद्देश्य, शिल्प को विशिष्टता प्रदान करता है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि उनकी कहानियों में आंचलिक मिट्टी की गंध समाई है, संवेदना पक्ष जनमानस के भावों का आदान-प्रदान करने में सफ़ल है। उनकी राजस्थानी, मेवाती मिश्रित भाषा उनके कथा संसार को सजीव बनाती है। सभी कहानियां सुन्दर सौष्ठव लिए सफ़ल कहानियां हैं।

‘पाठशाला’ युवा कथाकार सुनील पंवार की वर्ष 2018 में  लिखित कहानी है। कहानी का परिवेश राजस्थान का क्षेत्र है। लेखक ने जहाँ एक ओर सामाजिक कुरीतियों और रीति-रिवाजों को दृष्टिगत कराया है, वहीं दूसरी ओर समाज के परिवर्तित स्वरूप व दलित चेतना को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया है। कहानी ‘पाठशाला’ में नयापन ये है कि इसमें समस्याएँ एवं समाधान दोनों ही मौजूद हैं। शिक्षा के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन होंगे ये सुनिश्चित किया गया है। शिक्षा से दृष्टिकोण बदलेंगे और फिर नवजागरण से देश बदलेगा; यही दशा और दिशा कहानी की विषयवस्तु है।

कहानी के मुख्य पात्र ‘सुखिया’ के द्वारा बाल मन की जिज्ञासाओं ने प्रश्न को जन्म दिया और तर्क ने एक दिशा। पाठशाला में जाते समय बालक सुखिया की परेशानी, मन की उलझन, पाठशाला जाने से बचने की तरकीबें, कथा को रोचक बनाती हैं। घर से पाठशाला तक पहुँचने से पूर्व मध्य मार्ग में कहानीकार ने कथा के मूल पात्र सुखिया की बौद्धिक क्षमता, पाठशाला न जाने के भिन्न-भिन्न बहाने, उसकी जिज्ञासा से उपजी तर्कशील बुद्धि, बाई में बापू को समझाने की क्षमता की पहचान व हाज़िरज़वाबी का बेजोड़ चित्रण किया है। उसकी शिक्षा से कहीं अधिक गृहकार्यों में रुचि, बाई को प्रसन्न करने और रीति-रिवाज पर प्रश्न खड़े करने की अद्भुत शक्ति को कथाकार ने सूझबूझ के साथ लिखा है। बाई स्कूल नहीं जाती वह जानता है, बाई सारा दिन काम में व्यस्त रहती है इसलिए वह उनके मर्म को पकड़ कर उनकी फिक्र में घर के काम में हाथ बटाने की तरकीब लड़ाते हुए फिक्रमंद होने का नाटक करता है। तब बाई सुखिया की चालाकी को पहचानते हुए कहती है- 

“तू मेरी फिक्र न कर सुखिया, मेरा क्या है मैं तो पराया धन हूं, बापू मेरा ब्याह कर देगा, तो मैं चली जाऊंगी।”6

बाल मन चिंताग्रस्त होकर एक और प्रश्न कर बैठता है-

“तुम कहां चली जाओगी बाई?” सुखिया ने बडे़ आश्चर्य से पूछा।

“अपने घर… और कहां?” बाई ने उत्तर दिया।

 “तुम्हारा घर?  वह कहां है बाई?” सुखिया ने कौतूहल से पूछा।

“म्हारे सासरे में।” बाई ने हल्की सी हँसी के साथ ज़वाब दिया। 

“तो क्या बापू का घर तुम्हारा नहीं है?”7

 “नहीं!” 

“ये पराया धन क्या होता है?”

“बेटी पराई हाेती है। वो ब्याह के बाद दूसरे घर चली जाती है, जैसे मां नानी का घर छोड़कर हमारे घर आई।” 

“बापू मेरा ब्याह कर देगा तो क्या मैं भी चला जाऊंगा?” सुखिया के मासूम सवाल में बड़ा आश्चर्य था एवं स्त्री मन की दृढ़ता और स्वीकार्यता भी। वह खुद को पराया मान चुकी है। यह बात सामाजिक परंपरा ने उसे सीखा दी है। 

“हा हा हा! बावले! छोरे थोड़े ही जाते हैं, बेटियां होती हैं पराई।”8 बाई उसे समझाती है।

परम्पराओं ने दर्शाया है कि स्त्री धन है, संपत्ति है। वह मनुष्य नहीं बल्कि अपनी इच्छा एवं अधिकार से वंचित एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजी जाने वाली वस्तु मात्र है।  वह केवल पुरुष की सत्ता की वाहक, इससे अधिक कुछ नहीं। 

दोनों बहन-भाइयों के बीच बेहद रोचक संवाद शैली है, जो पाठकों में रुचि पैदा करने के साथ ही भेदीय नीतियों का भी खुलासा करती है।

 “बाई। तुम बापू को समझाती क्यों नहीं? मैं पढ़-लिखकर क्या करूंगा?” सुखिया ने एकाएक बाई से पूछा-

“तू अनपढ़ रहकर भी क्या करेगा?” बाई ने सवाल का ज़वाब सवाल से दिया।

 “मैं खेत में बापू की मदद करूंगा। तुम्हारी काम में भी मदद करूंगा और माँ का भी हाथ बटांऊंगा।” उसने चतुराई से ज़वाब दिया।9

“बाई…! अगर मैं रोज पाठशाला जाऊंगा, तो तुम्हारे साथ पानी लेने कौन जाएगा? बापू की रोटी देने खेत में कौन जाएगा? तुम बिल्कुल अकेली हो जाओगी बाई।” सुखिया ने बाई को काम का प्रलोभन दिया ताकि बाई अपना इरादा बदल दे और उसे पाठशाला के झमेले से मुक्ति मिल जाए। वह बातें बनाने में तो बहुत माहिर था, किंतु आज बाई के सामने दाल गलती नज़र नहीं आ रही थी। बाई निरक्षर होने के बावजूद भी शिक्षा के महत्व को समझती है यही मूल कारण है कि वह सुखिया का दाखिला करवाने पाठशाला जाती है।

सुखिया की माँ बाई ही थी ये तो कहानीकार ने लिखा लेकिन क्यों थी ? ये स्पष्टीकरण पूरी कहानी में कहीं भी नहीं लिखा गया। माँ जीवित थी या नहीं थी? कामकाज से घर से बाहर रहती थी? इसलिए वह बड़ी बहन होने के नाते देखभाल करती थी? या बीमार थी? इस बात का कोई भी संकेत कथा में नहीं मिलता। बाई जो की लड़की है और निम्न वर्ग से संबंध रखती है, पराया धन भी है शायद यही कारण है कि वह पाठशाला नहीं गई या उसे पाठशाला नहीं भेजा गया। कहानी का प्रथम भाग यही है।  दूसरे भाग में पाठशाला के बाह्य रूप को चित्रित किया गया है। गांव देहात की कच्ची मिट्टी की दीवार वाली लोहे की सलाखों वाला गेट, सफेदी से अंदर की लीपी-पुती दिवारे, पेड़ों के नीचे लगी कक्षाएं, पानी के मटकों की हालत, वातावरण की वास्तविकता और सरकारी स्कूलों की जर्जर हालत को बयान करती है। सुखिया की शरारतों और बौद्धिक शक्ति से गुरू जी भी परिचित हैं, किंतु सामाजिक बाध्यताओं के आगे वे भी बेबस हैं। यही कारण है कि वे सुखिया को पढ़ाने को राज़ी तो हुए परन्तु शर्त पर कि टाट और पानी ख़ुद का होगा। क्यों कि वो पढ़े लिखे तो हैं किंतु सामाजिक परपंराओं से टकराने की ताकत उनमें भी नहीं है। दूसरी महत्वपूर्ण बात ये थी कि वह गांव का पहला बच्चा था, जो नीची जाति से विद्यार्थी जीवन में भी प्रवेश करने वाला था। 

शिक्षक किस जाति से संबंध रखता है इसका भी कोई ब्यौरा नहीं दिया गया जो कहानीकार का शुरुआती कहानी होने के कारण क्षम्य है या अंडरस्टूड बात मान सकते हैं।

लेखक शिक्षक और शिक्षा पर बहुत अहम सवाल खड़ा करते हैं कि शिक्षा भी सामाजिक वर्ण विभाजन, रीति- रिवाज, जाति भेद, लिंग भेद नहीं बदल पाई। लेकिन गुरू जी इस बात का आश्वासन देते हैं कि भविष्य में ये होगा। शिक्षा केवल सामाजिक कायाकल्प ही नहीं करेगी वह वैचारिक काया भी पलट देगी। गुरू जी एक शिक्षक होने के नाते सर्व मानवाधिकार सुखिया को देते हैं। कथा स्वतंत्र भारत की पृष्ठ भूमि में लिखी गई है इसीलिए बहुत सहजता से विद्यालय प्रवेश तो हो गया, परंतु उच्च जाति का भय अब भी गले की फांस बनी हुई है। गुरू जी अपने शिक्षक होने के कर्तव्य का भली-भांति पालन कर रहे हैं। सहयोगी के रूप में अपना योगादान, स्थिति और गलत परम्पराओं से बाहर निकलने की दिशा दे, सुखिया का मार्ग दर्शन ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज की गलत परम्पराओं से मुक्ति का प्रतिनिधित्व भी कर रहे हैं। वहीं कहानी को नया मोड़ देने के लिए लेखक ने सुखिया की वेशभूषा सफ़ेद कमीज़ को, जिसका जिक्र विषयवस्तु के आधार पर कहानी में पूर्व में भी  होना चाहिए था, किन्तु नहीं हुआ। ऐसा लगता है जैसे कहानीकार को यकायक इसे लिखने की जरूरत पड़ी, ताकि कथा के उद्देश्य की पूर्ति हो सके। 

अंतिम भाग में डॉ.आंबेडकर के स्लोगन से चमकती दीवार शिक्षा की ताकत का महत्व बता रही है।

 “सुखिया देखो, अपने पीछे की इस भीत को देखो। जब तुम पाठशाला आए थे, तब क्या ये भीत ऐसी ही थी?” “नहीं।” 10 सुखिया ने पलटकर भीत को देखा जिस पर सफ़ेदी पुती थी, जिसने दिवारों और गिरे हुए लेवड़ो को ढक दिया था और उस पर मध्यम, मध्य में नीले रंग का अशोक चक्र बना था व नीचे बडे़ बड़े सुंदर अक्षरों से महापुरूषों के कथन अंकित थे। सुखिया उस कथन को तो पढ़ नहीं पाया किंतु भीत को देखकर उसे अच्छा लगा।

“अब ये दीवार अच्छी दिख रही है न?”

 “हां, गुरू जी।” 

“देखो। चार अक्षर लिखने के बाद ये भीत भी बोलती हुई नज़र आ रही है। इसकी दरारें, इसकी जर्जरता सब इन अक्षरों के नीचे दब गई है न?”

 “हां, गुरु जी।” 

“बस यही बदलाव लाएगी। तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई। जिसने दीवार को जीवंत कर दिया वह एक दिन रीतियों, कुरीतियों, जाति, वर्ग और सामाजिक व्यवस्था की सभी दरारों को ढक देती। नीला रंग क्रांति का, धोला रंग शांति का। ये दोनों ही शिक्षा से संभव हो सकेंगे। समय के साथ बदलाव ज़रूर होंगे सुखिया, ज़रूर होंगे।” 11

     कहानी सफ़ेद और नीले रंग के व्यापक अर्थ को दृष्टिगत कराती है। बालमन को आंदोलित कर मुक्ति की आस, सपने जगा रही है। समस्या और समाधान दोनों ही कहानी में हैं। कहानी में तर्कसम्मत विवेचन, कहानीकार की विचारक, चिंतक छवि का बोध भी कहानी कराती है।

प्रगतिशील कहानी है, जो स्वस्थ मानसिकता वाले समाज की परिकल्पना लिए है। संवादों की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है। कहानी पूर्णतः अधिकार चेतना, सामाजिक चेतना व समानता की बात करती है व गैर दलित जाति के इंसान के दलित समाज के सहयोग को स्थापित करती कथा है। कहानी संवाद, शैली वैविध्य, मौलिकता व आत्मीय स्वर लिए है। कहानी संवादों से आरंभ होकर भविष्य के उज्ज्वल सपने और नई सुबह जो नया प्रकाश फैलाएगी; पर अंत की गई है। कथावस्तु, गठन, वाक्य संरचना, व्यंग्य विनोद व सपाटबयानी कहानी की गुणवत्ता है। इसके लिए कहानीकार श्लाध्य योग्य हैं।

  1. हिन्दी कहानी एक नई दृष्टि – इंद्र मदान – पृष्ठ -35
  2. समकालीन भारतीय साहित्य – पत्रिका मार्च, अप्रैल अंक -2021
  3. हथौड़ा – 135
  4. चमरवा रतनकुमार सांभरिया की प्रतिनिधि कहानियां – डॉ. लोकेश गुप्ता – पृष्ठ – 44

 5 – खेत और अन्य कहानियां संग्रह – रत्नकुमार सांभरिया – पेज – 90

  1. एक कप चाय और तुम (कहानी संग्रह)- सुनील पंवार -73
  2. एक कप चाय और तुम द्वितीय संस्करण –  सुनील पंवार – 73
  3. एक कप चाय और तुम –           ”            – सुनील पंवार  -74
  4.   एक कप चाय और तुम –     ”             -सुनील पंवार – वही 
  5. एक कप चाय और तुम – (कहानी संग्रह) सुनील पंवार – 75

 

 

 


 

 

 

 

 

 


 

 सीवान की संस्कृति एवं कला

सीवान बिहार राज्य के पश्चिमोत्तर सीमा पर स्थित जिला है। यह दाहा नदी के किनारे बसा है।  यह पहले सारण जिले के अंतर्गत शामिल था। सन 1972 में इसे स्वतंत्र जिला बना दिया गया। सीवान ने देश को अनमोल रत्न दिए हैं। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद सहित, महेंद्र प्रसाद ,मौलाना मजहरूल हक, डॉक्टर सैयद मोहम्मद, बृज किशोर प्रसाद, खुदा बक्श खाँ, इत्यादि प्रमुख हैं। प्राचीन समय से ही सीवान संघर्ष और बलिदान की भूमि रही है। स्वतंत्रता संग्राम के समय सीवान के बलिदानों की याद में,  शहीद सराय में शहीद स्तंभ खड़ा है। वर्षों पुराने शांति वट वृक्ष को सीवान का हृदय स्थल कहा जा सकता है।  सीवान जिले में हिंदू और मुस्लिम आबादी अपनी साझा संस्कृति को बचाए हुए है। दुर्गा पूजा, मुहर्रम,  शिवरात्रि, के मेले सभी में उत्साह जगाते हैं। सीवान में भारत की समावेशी संस्कृति, विभिन्नता में एकता, को महसूस किया जा सकता है।

 त्योहार:-  बिहार में मनाये जाने वाले सभी त्योहार सीवान में भी मनाये जाते हैं। दुर्गा पूजा, रामनवमी, शिवरात्रि, मुहर्रम,  जन्माष्टमी (महावीरी झंडा), चेहल्लुम इत्यादि में जुलूस निकाला जाता है।  दाहा नदी के किनारे,  छठ पूजा घाट की सफाई, हिंदू मुस्लिम दोनों मिलकर करते हैं। मुहर्रम के ताजिये की सजावट भी दोनों मिलकर करते हैं। पीड़िया यहाँ का विशेष त्योहार है। पीड़ीया में लड़कियाँ अपने भाई के लिए व्रत रखती हैं। एक महीने तक मिट्टी की दीवार में गोबर का पिंड बनाकर चिपकाती हैं।  एक महीने बाद उसे उखाड़ कर बैंड बाजे के साथ, नाचते गाते नदी पोखर में प्रवाहित कर देती हैं।

 रीति रिवाज:-  सीवान में जन्म,  विवाह, मृत्यु पर विभिन्न प्रकार के रीति रिवाज प्रचलित हैं। विवाह के समय मटकोर के लिए दूल्हा या दुल्हन भी साथ जाते हैं। बारात जाने के बाद सभी महिलाएं रात में डोमकच करती हैं। यह एक प्रकार का नाटक है, जो गीतों के साथ होता है। खाट के पाए का गुड्डा बनाया जाता है, जिसे “जलुआ” कहते हैं। दुल्हन के आने पर कोहबर घर में दूल्हा-दुल्हन का स्वागत होता है। दीवार पर गेरु से कुछ ज्यामितीय आकृतियां बनाई जाती हैं,  जिसे कोहबर लिखना कहते हैं। विवाह के पश्चात “चौठारी” छुड़ाया जाता है। इसमें घर की महिलाएँ गाँव के सभी लोक देवताओं के स्थान पर जाकर उनका आभार व्यक्त करती हैं।

लोकगीत:- सीवान में भोजपुरी बोली जाती है,  अतः भोजपुरी के लोकगीत यहाँ गाए जाते हैं। महिलाओं के लोकगीतों में कजरी, झूमर, सोहर, खेलवना, रोपनी के गीत आदि गाए जाते हैं। गाड़ीवान, कृषक, श्रमशील वर्ग के पुरुष बिरहा,  होरी, चैता इत्यादि गाते हैं। सीवान में कई चीनी मिले थीं। आसपास के गाँव के किसान,  बैलगाड़ी में गन्ना लादकर सीवान चीनी मिल में लाते थे।  यहाँ मिले नगद रुपए से बाजार से साड़ी,  कपड़ा, राशन, मिठाई इत्यादि खरीद कर ले जाते थे। लोकगीतों में सीवान भी मौजूद है।

 “पियवा सीवान से अन्हार भइले आई……”

 नेपाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं सीवान महामानव बुद्ध का जन्म,  परिनिर्वाण तथा भ्रमण का क्षेत्र रहा है। महाभिनिष्क्रमण का वर्णन करता लोकगीत मौजूद है

“सुतला में रहनी ऐ रामा, पियवा गइले हो चोरिया…..”

 लोक नृत्य:-  सीवान में शादी-विवाह, छठियार, बुजुर्गों की तेरहवीं, ऐसे मौकों पर नाच करवाने की परंपरा है। वर्तमान समय में इसका स्थान स्टेज कलाकार, ऑर्केस्ट्रा इत्यादि ने ले लिया है।  परंतु नब्बे के दशक तक हुड़का, लौंडा नाच, पखावज,  रास के नाच, धोबिया नाच, सती बिहुला, बाला लखन्दर इत्यादि नाच और नाटकों का राज था।  इसके विशेष जानकार और कद्रदान पाए जाते थे।  हुड़का नृत्य में एक नृतक महिला वेश धारण करके नाचता है, और एक हुड़का वादक उसके पीछे-पीछे घूम कर हुड़का बजाता है। अन्य वादक गोल घेरा बनाकर हुड़का बजाते हैं। उपरोक्त वर्णित सभी प्रकार के नृत्य में पुरुष ही महिलाओं का वेश धारण करते हैं। महिलाएँ विवाह के अवसर पर डोमकच करती हैं। सावन में झूमर, कजरी इत्यादि पर नृत्य करती हैं।

 खानपान:- सिवान के व्यंजनों में गुड़ का खास उपयोग मिलता है। यह गन्ने के उत्पादन का क्षेत्र रहा है। गन्ने को पेर कर उसके रस से गुड़ बनाया जाता था। गन्ने के रस का रसियाव (एक प्रकार की खीर) यहाँ का विशेष व्यंजन है।  पकते हुए गुड़ में गाजर, बैंगन,  शकरकंद, के टुकड़े डालकर भी बहुत शौक से खाया जाता था। परंतु अब चीनी मिलें बंद हैं। गन्ने का उत्पादन बंद है,  तो गुड़ का बनना भी बंद है। गन्ने के रस और महिया से बनने वाले व्यंजन विलुप्ति की कगार पर हैं।

 सतुआ यहाँ का दूसरा प्रसिद्ध व्यंजन है। मक्का, चना, जौ, मटर इत्यादि को भूनकर, पीसकर सतुआ बनाया जाता है। यह एक तैयार (रेडी टू ईट)  व्यंजन है। केवल पानी और नमक मिलाकर सानिए और खा लीजिए। सीवान का दरौली, रघुनाथपुर, सिसवन का क्षेत्र दियारा  कहलाता है।  दियारा में बिना बर्तन के, गमछे में सतुआ सानकर  खाने का प्रचलन था । बैलों को  खरीदने बेचने, या फिर बैलगाड़ियों में बारात जाने के दौरान,  बीच दोपहर में ठहर कर सतुआ खाया जाता था। दो व्यक्ति गमछा पकड़ कर खड़े हो जाते थे, और एक व्यक्ति उसी गमछे में सतुआ सानता था। आज भी कचहरी के बाहर की सतुआ की दुकानों पर भीड़ देखकर, सीवान के सतुआ प्रेम का अंदाजा लगाया जा सकता है।

 चने के सत्तू की लिट्टी, और चोखा तो पूरे बिहार में प्रसिद्ध है। परंतु सीवान की लिट्टी थोड़ी अलग है। यहाँ सत्तु भरी लिट्टी को  पानी में उबाल लिया जाता है। पूरी तरह पक जाने के बाद, पानी से निकालकर परात में रख दिया जाता है। थोड़ा ठंडा होने के पश्चात, कढ़ाई में थोड़े से तेल में सरसों या  जीरा का तड़का लगाकर शैलो फ्राई किया जाता है। यह लिट्टी बहुत स्वादिष्ट लगती है।

 मकर संक्रांति (खिचड़ी) के मौके पर चावल और तिल के लड्डू तो पूरे बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश में बनते हैं। सीवान की विशेषता चिउरा के लड्डू  हैं।

 वेशभूषा:-  सीवान का पारंपरिक पहनावा महिलाओं के लिए साड़ी और पुरुषों के लिए धोती कुर्ता पगड़ी रहा है।  मुस्लिम समाज में पुरुष कुर्ता पजामा टोपी धारण करते हैं। महिलाएँ सूट सलवार और बुर्का या नकाब धारण करती हैं। समय के साथ आधुनिक परिधानों पैंट-शर्ट, गाउन, प्लाजो, सूट, जींस इत्यादि का प्रचलन बढ़ा है।

 भाषा:-  सीवान में हिंदी, उर्दू और भोजपुरी बोली जाती है। पढ़े-लिखे लोगों में, शहरों में हिंदी उर्दू का प्रचलन है। ग्रामीण इलाकों में भोजपुरी का बोलबाला है। कहावत है-  “कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी”  यहाँ की भोजपुरी और छपरा की भोजपुरी में अंतर मिलता है। छपरा की “बबी” यहाँ “बबुनी” हो जाती है।  जेवर गहने यहाँ “बीखो” हो जाते हैं।

 भ्रमण स्थल:-  सीवान में मैरवा धाम,  सोहगरा, राजेंद्र प्रसाद संग्रहालय जीरादेई, महेंद्रनाथ, बुढ़िया माई, कचहरी दुर्गा मंदिर, आदि प्रमुख हैं।

सीवान में हरिहाँस में टिकुली (बिन्दी) बनाई जाती है। सीवान की चूड़ियाँ भी बहुत मशहूर हैं। शांति वट वृक्ष के पास वाद्ययंत्रों की मरम्मत होती है। सीवान में प्रत्येक वर्ष डिज्नीलैंड मेला, सर्कस इत्यादि लगते हैं। फन पार्क एवं वाटर पार्क भी विकसित किए गए हैं। गाँधी मैदान पोखरा का सौंदर्यीकरण  किया गया है। पंचमंदिरा  पोखरा को जल जीवन हरियाली पार्क में विकसित किया गया है। राजेंद्र प्रसाद पार्क बच्चों के झूला झूलने एवं खेलने का प्रमुख स्थान बना हुआ है।

 सीवान बिहार का एक ऐसा जिला है,  जो अपने भीतर ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत समेटे हुए है। सीवान में प्रतिभाओं की कमी नहीं है,  केवल उन्हें निखारने और प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।

डाॅ० सुनीता मंजू

सहायक प्राध्यापिका

हिन्दी विभाग

राजा सिंह महाविद्यालय

सीवान

बिहार

ओटीटी और भारतीय समाज की बदलती ‘दर्शक संस्कृति’

भारतीय समाज प्रारंभ से ही उत्सव धर्मी रहा है। खेत खलिहान के कार्यों से फुर्सत मिलने पर, मनोरंजन के लिए, मेला  तमाशा, सॉन्ग, नौटंकी, आदि की परंपरा रही है। थोड़ा समय बदलने पर सर्कस आने लगे। उसके पश्चात शहरी क्षेत्रों में थियेटरों का प्रचार हुआ। थिएटर के पश्चात सिनेमा का युग आया। रविवार और अन्य अवकाश के दिनों में सिनेमा देखने का प्रचलन हो गया। दूरदर्शन के आने पर साप्ताहिक धारावाहिक आने लगे।  “हम लोग” “रामायण” “नुक्कड़” इत्यादि धारावाहिकों का बेसब्री से इंतजार होता। सभी लोग काम निपटाकर टीवी के सामने बैठ जाते थे। प्राइवेट चैनल आने के बाद प्रतियोगिता बढ़ गई। सास बहू वाले सीरियल इस दौर में खूब पसंद किए गए। साथ ही साथ मल्टीप्लेक्स मॉल में सिनेमा देखने का क्रेज भी बढ़ता गया। 21वीं सदी में मध्य वर्ग के हाथों में स्मार्टफोन आने शुरू हो गए थे।  दो दशक बीतते-बीतते लगभग हर परिवार में एक स्मार्टफोन तो आ ही गया। चाहे वह किस्त पर ही क्यों ना लिया गया हो। तभी कोरोना महामारी के कारण जीवन ठप्प हो गया।  सभी घरों में कैद हो गए। निम्न वर्ग तो पैदल हजारों मील नाप गया। उनका कष्ट असाध्य था। परंतु मध्यम वर्ग एवं उच्च वर्ग जो पूरी तरह संपन्न था, इनकी समस्या अलग थी। बैंक खाते में पैसा था, घर में पूरा राशन था, परंतु घर में रहने की विवशता ने मानसिक रोगों को बढ़ावा दिया। इसी समय ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने इनके लिए जीवन दान का कार्य किया। तब से लेकर आज तक, पाँच वर्षों में ओटीटी ने अपनी जगह भारतीय समाज के हर तबके में बना ली है। आज अमेजॉन प्राइम, नेटफ्लिक्स, डिज़नी प्लस, हॉटस्टार, जी फाइव, सोनी लिव, जिओ सिनेमा, इत्यादि अनेक ओटीटी प्लेटफॉर्म हैं, जो घर बैठे दर्शकों को मनोरंजन उपलब्ध करवा रहे हैं। इन प्लेटफॉर्म्स के कंटेंट न केवल रोचक हैं, बल्कि कई देशों में एक साथ प्रसारित होने के कारण ग्लोबल भी हैं। एक तरफ कोरियन सीरीज भारत में लोकप्रिय हो रही है, वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीय विषय और ग्रामीण परिवेश पर आधारित पंचायत सीरीज कई देशों में तहलका मचा रही है। कपिल शर्मा के काॅमेडी शो जैसे कार्यक्रम भी अब ओटीटी पर प्रसारित हो रहे हैं।

सिनेमा पर एक वर्ग विशेष का एकाधिकार समाप्त हो गया है। सोशल मीडिया पर रील्स  बनाने वाले प्रतिभाशाली युवाओं को भी ओटीटी पर मौका मिल रहा है। स्कैम 1992, दिल्ली क्राइम, हसीन दिलरूबा, जैसी फिल्मों ने आम आदमी को अपराध की एक नई दुनिया से रूबरू करवाया। सेंसर ना होने, और व्यक्तिगत रूप से देखने की स्वतंत्रता ने सिनेमा में अद्भुत बदलाव लाए। जहाँ एक ओर गाली गलौज, मारपीट, हिंसक दृश्य आम हो गए; वहीं दूसरी ओर, बोल्ड दृश्यों ने सीमा पार कर ली। जिन दृश्यों को व्यक्ति सिनेमा घर में सार्वजनिक रूप से देखकर असहज हो जाता था, अपने बेडरूम में अकेला या जीवनसाथी के साथ सहजता से देखने लगा। यह भारतीय दर्शकों में आया एकदम नया बदलाव था। यह पहले कभी नहीं देखा गया। पारंपरिक सिनेमा के मुकाबले ओटीटी प्लेटफॉर्म सस्ते भी है। इसकी पहुंच अमीर गरीब सभी तक है। इतने विशाल दर्शक वर्ग के लिए उसकी रुचि की विभिन्न सामग्रियां ओटीटी पर मौजूद हैं। क्षेत्रीय बोलियों,  परंपराओं, साहित्य, पर भी ओटीटी प्लेटफॉर्म सीरीज बना रहे हैं। ढके छुपे रीति रिवाज के सामने आने से विवाद भी खूब हो रहे हैं। उदाहरण के लिए “महाराज” पुष्टिमार्ग पर आधारित पाखंडों को सामने लाती है, तो पुष्टिमार्ग के अनुयायी उसके विरोध में सड़क पर आ जाते हैं। “आश्रम” सीरीज में तथाकथित बाबा का, अपराध और राजनीति से संबंध अनेक विवादों को जन्म देता है। “तांडव” को लेकर भी ऐसे ही विवाद हुए। “ओ माय गॉड-2” हस्तमैथुन जैसे संवेदनशील विषय पर बात करती है। हम देखते हैं कि ओटीटी प्लेटफॉर्म के माध्यम से भारतीय दर्शक वाद- विवाद, संवाद के जरिए परिपक्व हो रहा है। वह धीरोदात्त एवं साहसी नायक, सुंदर छुई मुई सी नाजुक नायिका, पूरी तरह नकारात्मक खलनायक, और सुखांत के परंपरागत सिनेमा के ढाँचे से बाहर निकल रहा है। ओटीटी प्लेटफार्म पर विविध नए-नए विषयों पर सिनेमा और सीरीज बनाई जा रही है। छोटे-छोटे शहरों के कलाकारों को भी इन प्लेटफॉर्म्स पर अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिल रहा है। महिला पात्र जो अभी तक पारंपरिक सिनेमा में सहायक पात्र की भूमिका निभाती थी, वह अब मुख्य पात्र की भूमिका में नजर आ रही हैं।  ओटीटी पर सामाजिक बुराइयों पर आधारित सिनेमा बहुतायत बन रहा है। “द ग्रेट इंडियन किचन” पितृसत्ता की बारीक परतों को उभारती है। समाज बहु को सिर्फ भोजन बनाने तक ही सीमित रखना चाहता है। अगर कुछ और करना है तो पहले भोजन बनाकर, खिलाकर, बर्तन धोकर, तब कहीं जाइए। “मिसेज” का कथानक भी कुछ ऐसा ही है।

 हाॅल में जाकर सिनेमा देखना, मनोरंजन की मांग करता है। व्यक्ति छुट्टी के दिन, परिवार के साथ आनंद मनाने सिनेमा हॉल जाता है। परंतु ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने सिनेमा को मनोरंजन और समय बिताने के साधन से आगे बढ़ा दिया है। ओटीटी का भविष्य उज्जवल है, अगर इसमें कुछ सुधार किए गए (गालियाँ और अंतरंग दृश्य), तो यह भारतीय समाज में लंबी रेस का घोड़ा साबित होगा। निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है की ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने भारतीय दर्शकों के साथ कदम मिलाया तो, भारतीय दर्शकों ने भी स्वयं को बदलते हुए उसे गले से लगाया है।

डाॅ० सुनीता सहायक

प्राध्यापिका,

हिन्दी विभाग,

राजा सिंह महाविद्यालय

सीवान

आजादी के आंदोलन में आम लोगों की हिस्सेदारी रेखांकित करना: नाटक

इंदौर से रुखसाना मिर्ज़ा की रिपोर्ट

इंदौर. भारत की आजादी का आंदोलन एक महान आंदोलन था जिसमें एक तरफ महात्मा गांधी, नेहरू जी, सुभाष चंद्र बोस और कई नेता थे दूसरी तरफ समाज का हर वर्ग इसमें शामिल था। खासतौर से आम आदमी जिसमें मजदूर, किसान, मछुआरे, विद्यार्थी, और गृहिणियां तक शामिल थे। आजादी के तराने शीर्षक से यह नाटक ऐसे ही आम लोगों के बलिदानों को सामने लाता है। विनीत तिवारी और जया मेहता के लिखे इस नाटक को इप्टा की इंदौर इकाई के कलाकारों ने गुलरेज खान और सारिका श्रीवास्तव के निर्देशन में अभिनव कला समाज के मंच पर 19 मई 2026 को खेला।

इप्टा के कलाकारों ने किया नाटक आजादी के तराने का मंचन

नाटक 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से लेकर 1947 में देश की आजादी तक के कई आंदोलनों के बारे में दर्शकों को बताता है। शुरुआत भारत छोड़ो आंदोलन के दौर से होती है। 9 अगस्त 1942 को मुंबई के गवालिया टैंक मैदान की ओर जाते आम लोगों का उत्साह है। उत्तर भारत से लेकर दक्षिण तक से आए लोग मैदान की ओर बढ़ रहे हैं जिन्हें रोकने में अंग्रेज पुलिस नाकाम रहती है। तभी 8 अगस्त की रात महात्मा गांधी और अन्य कई बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए जाते हैं। इसके बावजूद लोगों का उत्साह कम नहीं होता। लोग लाठी, डंडे , गोलियां खाते हैं पर पीछे नहीं हटते। इन लोगों में कई ऐसे ग्रामीण थे जो कई मील पैदल चल कर पहुंचे थे और मुंबई के कई मजदूर अपनी मजदूरी छोड़ कर आए थे।

नाटक आंदोलन के दौरान तीन अलग- अलग स्थानों पर जनता के संघर्ष की अनजानी सी पर सच्ची घटनाएं भी दर्शकों के सामने लाता है। इसमें पहली घटना महाराष्ट्र के चिमूर की है जहां दो दिन के लिए पूरे कस्बे में आंदोलनकारियों का कब्ज़ा हो जाता है। दूसरी घटना उत्तर प्रदेश के बलिया की है। वहां भी लोग एक स्थानीय नेता की गिरफ्तारी के विरोध मे सडक़ों पर उतरते हैं। उन्हें स्थानीय कलेक्टर का सहयोग मिलता है और चार दिन के लिए पूरे बलिया की व्यवस्था आंदोलनकारियों के हाथ में आ जाती है।

तीसरी घटना बंगाल के मिदनापुर की है। यहां के आंदोलन पर द्वितीय विश्वयुद्व के असर के बारे में भी बताया गया है। अंग्रेजी सरकार हजारों भारतीय सिपाहियों को युद्ध के मोर्चे पर भेजती है जिससे आम जनता में रोष उपजता है। यहां पर नाविकों, मछुआरों को भी सरकार परेशान करती है। लोग आंदोलन करते हैं जिसमें तमाम आम जनता शामिल होती है और करीब दो साल तक मिदनापुर में आंदोलनकारी ही सरकार चलाते हैें।

नाटक में कहानी को आगे बढ़ाने में सूत्रधार मंच पर आते हैं जिससे कहानी में तारतम्य बना रहता है। आंदोलन के माहौल को प्रभावी बनाने में वंदेमातरम सहित कुछ अन्य गीत भी शामिल किए गए हैं।

अंत में आजादी के जश्न का दृश्य है यहां पर ख्वाजा अहमद अब्बास द्वारा 15 अगस्त 1947 को जन्मे बच्चों के नाम लिखे खत का भी जिक्र है जिसमें इस जश्न का वर्णन है।

नाटक में 20 से ज्यादा कलाकार मंच पर रहते हैं। यहां पर हॉल का छोटा मंच कलाकारों के मूवमेंट्स को बाधित कर रहा था। अगर यह नाटक किसी बड़े मंच पर होता तो अधिक प्रभावी होता। साउंड की भी दिक्कत थी जिसके कारण पीछे बैठे दर्शकों को कुछ कलाकारों के संवाद सुनाई नहीं पड़े। इन तमाम परेशानियों के बावजूद कम से कम संसाधनों में नाटक खेल लेना भी तारीफ़ की बात है।

इस नाटक में वरिष्ठ पत्रकार हरनाम सिंह, मधु, नीपा, नीता, राशि, गीतांजलि, इशिका, शब्बीर, भास्कर, उजान, शाहरुख, देवराज, आयुष, विशाल, राघवेंद्र, निर्मल, अभित, राजवीर ने अपनी प्रस्तुति के ज़रिए नाटक को जीवंत किया।

गौरतलब है कि यह नाटक मुंबई में जारी इप्टा के राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव में 23 मई को मंचित किया जाएगा। अगले दिन 24 मई को इसकी प्रस्तुति शंकर ब्रह्मे समाज विज्ञान ग्रंथालय की ओर से पुणे में इसकी प्रस्तुति होगी। मध्य प्रदेश से यह एकमात्र प्रस्तुति है जो इप्टा के राष्ट्रीय महोत्सव में शामिल की गई है।

आवाज़

असीमा भट्ट की कविताएं।

जजब मौन की चादर ओढ़कर
न्याय कोने में रोता है,
तब कोई चिंगारी मन में
क्यों नहीं विद्रोह बोता है?
बस्तियों में भूखे पेट
जब सपने दम तोड़ते हैं,
तब महलों में जश्न मनाकर
क्यों लोग मुंह मोड़ते हैं?
यह कैसा समाज है जहां 
इंसान की क़ीमत नहीं,
जहां सच को दबाने की
झूठी रीतें चलती हैं
उठो, अब आवाज़ उठाओ,
और अन्याय के खिलाफ़ खड़े हो जाओ
चीलों और चमगादड़ों से बचाओ 
लड़ो अन्याय ख़िलाफ़ 
कि अन्याय से लड़ना भी
एक नया धर्म बन जाए l

महानगर की बेचैनी

कांच की ऊंची-ऊंची  
सपनों को क़ैद करती दीवारें
रोशनी की चकाचौंध में इंसान 
झेलता अकेलापन 
भागती-दौड़ती बेतहाशा जिंदगियां 
रिश्तों को भूल बाज़ार बन बैठी 
सोशल मीडिया के जाल में
सबकी असली मुस्कान खो सी गई है 
शोरगुल भरी सड़कों पर
चीख़ती हुई ख़ामोशी बहरा बना रही है 
तन्हाई के अंधेरे में
 बुझ रही उम्मीदों की लौ 
प्रदूषण की धुंध और गर्म हवा में 
सांस लेना मुश्किल 
विकास की दौड़ में
हांफती प्रकृति 
मशीनों की दुनिया में
इंसानियत ख़त्म हो रही
भावनाओं के सागर में
तैरती उदासी 
पर अभी भी 
एक उम्मीद बाक़ी है
बदलते वक़्त के साथ
एक नयी सुबह ज़रूर आएगी….l

शब का फ़साना

1.
ये रात की सियाही, कब तक रहेगी साथी?
ये ग़म के साए कब तक,
 देंगे दिलों पर आघात?
हर सुबह का पैग़ाम, झूठ सा लगता है,
जब तक न बदले ये हालात
वो महफ़िलें, जहां रौशन थे चंद चेहरे,
मज़दूर के लहू से रंगे हैं हर नक़्शे
वो क़स्र-ए-शाही, जिनकी बुलंदी है फ़रेब,
ग़रीब की आहों से हैं वो लर्ज़ते
मगर सुनो, उस पार, इक शोर उठ रहा है,
जंज़ीरें टूटती हैं, हौसला जवान है
वो हाथ, जो पत्थर भी तोड़ सकते हैं,
अब हक की लड़ाई के लिए भी उठ सकते हैं 
ये जुल्मत की दीवारें, ज़रूर गिरेंगी एक दिन,
ये ख़ून के चराग़ों से कब तक जलेंगी?
दीवानों के घर 
वो सुबह आने को है , जब हर एक इंसान,
बराबर की ज़मीं पर चलेगा
न होगा कोई मालिक, न कोई गुलाम,
हर चेहरा हंसेगा, आज़ादी का आलम होगा
वो गीत जो दबे थे सीनों में कब से,
हर होंठ पर नाचेगा, हर दिल में होगा
 उठो मेरे साथी! क़दम से क़दम मिलाओ,
ये राह-ए-तरक़्क़ी है, इसे अब तुम्हें ही तय करना है
यह शब का फ़साना अब ख़त्म होने को है,
कल का उजाला हमारा ही तो है
हमारा ही तो है….l

2. धरा का धरा रह जाता है
तुम्हारा सारा का सारा ज्ञान
जब तुम निष्ठुर हो जाते हो एक स्त्री के प्रति
अचानक
भुला देते हो 
वो सारे क्षण
जिसने रचा था तुम्हें प्रेम से
बनाया था सम्पूर्ण प्रेमी
जो कभी महका करती थी तुम्हारी सांसों में
रात रानी की ख़ुशबू बनकर
कि तुम एकदम अनजान बन जाते हो 
उदासीन 
अजनबीपना 
ओढ़े 
घूमते हो 
पुरुष अभिमान से
जबकि नींद में आज भी वह
रोते हुए बुदबुदाती है तुम्हारा नाम!
क्या तुम किसी ऐसी औरत को जानते हो जो नींद में भी रोती है…?

3. स्त्रियां उतारी गयीं
सिर्फ़ काग़ज़ या कैनवास पर
नहीं उतारीं गयीं तो बस रूह में…l

4. जाने क्या पयाम लेकर सबा आयी थी,
फूल हंस तो दिया चेहरा मुरझा सा गया था।

मौत और जिंदगी का जंग जीत कर असीमा इन दिनों नवादा,,बिहार में रह रही हैं।

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‘सोनिया और राजीव’ ‘मेलोनी और मोदी’

यद्यपि यह विवाह नहीं है न घोषित प्रेम फिर भी आइए मेलोनी और मोदी दृश्य की सोनिया और राजीव के साथ होने के दृश्य से तुलना करें। क्योंकि दोनों के भक्त एक तरह से तय होते हैं और विरोधी भी: 

1. सोनिया गांधी, जो कि इटली में पली-बढ़ी, भारत में एक राजनीतिक परिवार की बहू बनकर आयी, 

जिसके दो-दो सदस्य (पंडित जवाहरलाल नेहरू तथा श्रीमती इंदिरा गांधी) इस देश के प्रधानमंत्री बन चुके थे, तीसरे का बनना तब शेष था। यह परिवार राजनीति की धूरि में था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय राजनीति का चक्का इसी धूरि के इर्द-गिर्द नाचता रहा। देश को ( गांधी परिवार के समर्थकों को) इस विवाह पर कोई विशेष एतराज नहीं था बल्कि एक गर्व-भाव ही रहा होगा, जो अक्सर पितृसत्तात्मक समाज के वर-पक्ष को होता है, विजेता भाव एक भारतीय की गैर भारतीय नस्ल, वह भी गोरे नस्ल ,की कन्या पर विजय। विदेशी कन्या, गोरे नस्ल की अंग्रेज कन्या पर विजय, आहत भारतीय मन को आत्मतुष्ट करता है, जिसके स्वाभिमान को उपनिवेशवादी गुलामी ने चोट पहुंचाई थी।

(22 साल पहले सोनिया गांधी विवाद पर मेरे एक शोध आलेख से उपरोक्त उद्धरण का साम्य अब भी है।)

मोदी के साथ मेलोनी को देखकर उनके भक्त हर जगह प्रसन्न होंगे, किसी भी स्तर के, कही भी बैठे हों फर्श से अर्श तक। यद्यपि यह दो राजनयिकों का मिलना है, ऐसी तस्वीरें इतिहास के आर्काइव में और भी मिल जाएंगी। नेहरू की भी। भारतीय पुरुष मन, स्त्रियों के भीतर भी बैठा वह मन आह्लादित होता है। मोदी में माचोईज्म खोजने वाले प्रसन्न हैं। अपने राजा में यूं ही खोजा भी जाता है- उसे छूट होती है स्त्री उसकी पत्नी हो सकती है, केवल दोस्त हो सकती है, प्रेमिका या कुछ भी – रखैल भी तो राजाओं/ समर्थ लोगों के गौरव का शब्द ईजाद है।

यह छूट इंदिरा गांधी को नहीं थी। इसीलिए उन्होंने और अन्य कारणों से भी अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन के साथ डांस का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया था। 

यह भी क्या कम संयोग है कि सोनिया गांधी के विदेशी मूल पर बवाल काटने वाले,अलग पार्टी बनाने वाले शरद पवार ने इस तस्वीर के प्रसारण के साथ ही कहा कि मोदी ने दुनिया में देश का मान बढ़ाया है।

2.ब्रिटिश उपनिवेश ने अपने आर्थिक प्रभावों के अतिरिक्त और ज्यादा समय तक असरकारी प्रभाव सांस्कृतिक स्तर पर डाले थे। गुलाम भारतीयों के लिए अंग्रेज स्त्रियां आदर्श थीं, उनके रहन-सहन बोल-चाल के मद्देनजर सुधारवादी भारतीयों ने अपनी पत्नियों को भी सुशिक्षित गृहिणी बनाने के भरपूर प्रयास किए थे, परंतु आकर्षण की हदें गोरे चमड़े में बसी थीं, गोरी नस्ल में समाहित थीं। गोरों का यह आतंक आज भी है, इसलिए सोनिया गांधी का श्वेत नस्ल से होना भी एक विशेष स्थिति पैदा करता है। कैम्ब्रिज से एक व्यक्ति ने इंटरनेट पर एक सवाल छोड़ रखा है कि क्या सोनिया गांधी Mary Antonitee नाम से इटली मूल की होने के बजाय ‘अबेबी गांधी’ नाम से अफ्रीकन मूल की काली महिला होती तब भी क्या उसके प्रधानमंत्री होने के प्रति आग्रह-दुरग्रह ऐसे ही होते। स्पष्ट है कि रंगीन भारतीयों के लिए काले नस्ल की विविधता श्रेष्ठता पूर्ण चुनौती नहीं देती है या आकर्षण पैदा नहीं करती है, स्पष्ट ही है कि सोनिया के प्रसंग में आहत राष्ट्रीयता और नस्ल-श्रेष्ठता के आधार पर भेद-भाव की दुहरी प्रवृत्ति है। यहां अफ्रीकी नामांकन में एक सचेत संदर्भ भी है। नाइजीरिया में अबेबी का अर्थ होता है ‘चाहा और पा लिया’ अर्थात् आसानी से प्राप्य। आसानी से प्राप्यता की गुंजाइश गोरे नस्ल की सोनिया गांधी के साथ नहीं बनती है,अर्थात् विजेता भाव की संभावना और भी प्रबल हो जाती है तथा आगे चलकर अतिरिक्त आग्रह को प्रेरित भी करती है। ( उसी शोध आलेख से) 

मोदी के मामले का गर्व, मोदी भक्तों का गर्व भाव भारतीय मूल के मर्दों और भारतीय समाज के मन का गर्व भाव है। यदि इटली की पीएम मैलोनी न होकर वे नामीबिया, तंजानिया आदि की राष्ट्रध्यक्ष होती, काले मूल की तब क्या होता उस आह्लाद का?

नेहरू और एडवीना माउंटबेटन की दोस्ती में गंदगी तलाशते मोदी भक्तों को आज ईश्वरीय आह्लाद मिल रहा होगा। और मोदी विरोधी आज मोदी भक्त निशिकांत दुबे हुए जा रहे हैं या संघ के नेताओं सरीखे भाषा के चमत्कार में निशिकांत सरीखा बातें कर रहे हैं।

3.इतिहास बड़ा निर्मम होता है। इटली मूल की डिसेंट स्त्री सोनिया गांधी का विरोध करते भक्तों को मेलोनी थमा दिया है, मेलोडी चाकलेट का मिठास दे दिया है। वह मेलोनी, जिसके पिता वास्तव में ड्रग तस्करी में गिरफ्तार हुए थे, सोनिया गांधी के लिए भक्त इसी तरह की कल्पनाएं करते हैं, अफवाहें पेश करते हैं

इतिहास ने उतनी ही निर्ममता से कांग्रेस समर्थक मर्दवादियों को उन्हीं तर्कों और भावनाओं से लैस कर दिया है, जिससे संघी थे, भाजपाई थे। उन तर्कों और भावनाओं को खाद पानी मिलता है भारतीय समाज और संस्कृति से ही।

यह भी संयोग है कि अभी एक सिरफिरे राजनेता ने भारतीय राजनीति की 90% स्त्रियों को नेताओं के बेड रूम से जोड़ने वाला बयान दे दिया और उसे खूब सुर्खियां मिलीं, और प्रहसन यह कि उसी वक्त सड़कों पर वे लोग महिला आरक्षण के लिए आंदोलन कर रहे थे जिन्होंने मिलजुलकर संबंधित कानून को ही कुंद कर दिया है।

संजीव चंदन सोनिया गांधी के नागरिकता विवाद पर संजीव चन्दन का लेख भी पढ़ें।

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सांस्कृतिक राष्ट्रवाद नहीं, लोकतान्त्रिक राष्ट्रवाद को मजबूत करने की जरूरत है: अनिता भारती

साहित्यिक मंच, मुजफ्फरपुर द्वारा “अस्मिता बनाम राष्ट्रवाद : कुछ प्रश्न,कुछ चिंतन” विषय पर एक सत्रीय संगोष्ठी अभिधा प्रकाश सभागार में आयोजित हुई। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो हरि नारायण ठाकुर ने की। मुख्य वक्ता के रूप में प्रसिद्द लेखिका/ आलोचक और दलित अधिकारों की मुखर प्रवक्ता अनिता भारती उपस्थित रही। स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन और साहित्यकार मुसाफिर बैठा ने अपने विचार रखे।

मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए अनिता भारती ने कहा कि राष्ट्रवाद मन में सोची गई एक बात है। असल में हमारा राष्ट्रवाद देशप्रेम से जुड़ा है। विश्व बंधुत्व की भावना से भरकर हम देश की बहुत सी चीजों से प्रेम करने लगते हैं। आजादी के समय में लिखे जाने वाला साहित्य राष्ट्र प्रेम की भावना से प्रेरित है जो राष्ट्रवाद की वकालत है। हम पहले भी भारतीय थे और अभी भी भारतीय हैं। हम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद की ओर बढ़े हैं। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में हम अपने अतीत का गुणगान करते हैं। किंतु लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद भारतीय संविधान में विश्वास करते हुए स्वतंत्रता,समानता और बंधुत्व की बात करता है। सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद में एक अंतर साफ नजर आता है। जब हिस्सेदारी की बात होती है तो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद असहज हो जाता है।अस्मिताओं ने जब-जब आवाज उठाई है लोगों द्वारा उसे राष्ट्रवाद के लिए खतरा बताया गया,जबकि ऐसा नहीं है। उन्होंने एक बात पर बल देते हुए कहा कि हम एक ऐसे राष्ट्र की परिकल्पना करें जिसमें सभी अस्मिताएं मिलकर एक हो जाएं।

संजीव चंदन ने कहा कि हम अपने धर्म में दो राष्ट्र हैं। पेशवाई राष्ट्र और भीमा कोरेगांव राष्ट्र। ये राष्ट्रवाद की ऐसी दो धुरी हैं जहां से अस्मिता विमर्श को देखा जाना चाहिए। अस्मिताएं कई बार राष्ट्रवाद के नाम पर दमित होती हैं। भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय महिलाओं को लेकर जो दो राष्ट्र अस्मिताएं थी उसे पर भी संजीव चंदन ने अपनी बात रखी। नंदेली,महात्मा अयंकाली को याद करते हुए अस्मिता के गहराते संकट पर भी दृष्टि डाली।

मुसाफिर बैठा ने विभिन्न विचारधाराओं से उपजे राष्ट्रवाद को रेखांकित किया।उन्होंने कहा कि रोटी, कपड़ा और मकान के अतिरिक्त अपनी अस्मिता के सम्मान की तलाश आवश्यक है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो हरिनारायण ठाकुर ने कहा कि हिंदू ,मुसलमान, सिख, इसाई, जैन, बौद्ध, दलित, पिछड़ा, स्त्री और आदिवासी अस्मिताएं हैं। ये सारी अस्मिताएं जब एक हुईं तो भारतीय संविधान बना। आपने कहा कि विविध अस्मिताएं ही राष्ट्रवाद की असली पहचान और ताकत हैं। विविधता जहां नहीं होगी वहां राष्ट्रवाद हो ही नहीं सकता। वैसे संविधान में राष्ट्र शब्द का प्रयोग नहीं है वहां स्टेट शब्द का प्रयोग है। भक्तिकाल की तरह राष्ट्रवाद के लिए आज सांस्कृतिक आंदोलन की आवश्यकता है।



इस संगोष्ठी में मंच का संचालन डॉ शिवेंद्र कुमार मौर्य ने, अतिथियों का स्वागत डॉ संतोष सारंग ने और धन्यवाद ज्ञापन डॉ रवि रंजन ने किया। इस मौके पर प्रो. पूनम सिंह, प्रो रमेश ऋतंभर, प्रो संजय सुमन, डॉ विनोद बैठा, डॉ विजय कुमार,डॉ नूतन कुमारी,डॉ ज्योति, डॉ अविनाश कुमार, डॉ रामदुलार साहनी, डॉ संदीप सिंह, विपिन बिहारी,शांति,अशोक गुप्त,मिथिलेश, हरेराम महतो,साधु शरण सिंह,रिंकू कुमारी, ऋषि कुमार,लवकेश,नीरज,सुजीत,विक्की,निधि,पवन काजल,बादल,मधु,अर्चना और कई अन्य छात्र/छात्राएं उपस्थित रहे।

स्त्री भागीदारी पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी: उपलब्धियों के साथ नई चुनौतियों पर जोर


पटना, 5 मई 2026। श्रीअरविंद महिला कॉलेज, पटना में राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) और स्त्रीकाल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं कविता पाठ का आज सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। कार्यक्रम का केंद्रीय विषय था— “सांस्कृतिक–सामाजिक–राजनीतिक स्पेस में स्त्रियों की भागीदारी: परिदृश्य और उम्मीदें।”
संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रो. अंजलि प्रसाद ने की। इस अवसर पर अनिता भारती, एडवोकेट अलका वर्मा, डॉ. माधवी, अरुण नारायण और अरुण कुमार सहित कई वक्ताओं ने अपने विचार रखे। संचालन डॉ प्रिया जायसवाल ने किया।
वक्ताओं ने अपने संबोधन में कहा कि वर्तमान सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिदृश्य में महिलाओं की भागीदारी निश्चित रूप से बढ़ी है, लेकिन इसे और सुदृढ़ एवं सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि आज जो स्त्री-भागीदारी दिखाई दे रही है, वह अचानक नहीं बनी, बल्कि इसके पीछे लगभग 100 से 150 वर्षों का लंबा संघर्ष, सामाजिक सुधार आंदोलनों और निरंतर प्रयासों का इतिहास है।


वक्ताओं ने कहा कि शिक्षा, कानून, सामाजिक आंदोलनों और राजनीतिक चेतना के विस्तार ने महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में स्थान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि, उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि अभी भी निर्णय लेने की प्रक्रिया, नेतृत्व के उच्च पदों और नीति-निर्माण में महिलाओं की भागीदारी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंची है।
दिल्ली से आई स्त्रीवाद और दलित अधिकार की प्रवक्ता – चिंतक लेखिका अनिता भारती ने सोशल मीडिया, AI आदि के इस्तेमाल के साथ विद्यार्थियों को इतिहास और ज्ञान से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा कि
आप इसके जरिए भारत की पहली महिला डॉक्टर आनंदी बाई जोशी, परम्परा से संघर्ष के लिए जानी जाने वाली रखमा बाई, स्त्री शिक्षा की नेतृ सावित्री बाई फुले, पहली दलित लेखिका मुक्ता साल्वे जैसी स्त्रियों के जीवन, संघर्ष और हासिल के बारे में जानें।

Anita Bharti

एडवोकेट अलका वर्मा ने स्त्रियों की भागीदारी के परिदृश्य को आशावादी नजरिए से देखते हुए कहा कि हम, पहली दूसरी जेनरेशन की महिला कानून के क्षेत्र में हैं। खासकर बहुजन समाज की महिलाएं, लड़कियां आएं हमें अपना पूर्व का जेनरेशन मानते हुए आत्मविश्वास के साथ आएं।

आलोचक और साहित्यकार अरुण नारायण ने महिलाओं के मताधिकार के इतिहास को संक्षिप्त में रखते हुए साहित्य और भाषा में स्त्रियों की भागीदारी से, उनके जाति लोकेशन से अभिव्यक्ति और स्पेस की विविधता पर चर्चा की।

मोकामा में हिंदी के प्राध्यापक एवं आलोचक अरुण कुमार ने स्त्रियों के सामाजिक इकाई होने की बात कही और यह भी कहा कि पुरुष की सत्ता उन्हें अपने ही खिलाफ सोच में जकड़ लेती है। एक अलग किस्म से अच्छी लड़की होने की जिम्मेवारी में बांध देती है। अच्छी लड़की की परिभाषा भी बदल जाती है। कभी स्कूल जाने वाले लड़की को भी समाज का बड़ा हिस्सा अच्छी लड़की नहीं मानता था।

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विषय प्रवेश कराते हुए स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने कहा कि हमें सावधानी से हमारे हासिल मजबूत करना होगा। हमें आज जो सामान्य लगता है वह सौ सालों में संघर्ष से पाया हासिल है। आज से सौ साल पहले महिलाएं डॉक्टर के रूप में प्रैक्टिस नहीं कर सकती थी। कुछ दिन भागलपुर में रहीं कादम्बिनी पहली महिला डॉक्टर थीं। संघर्ष कर, लड़कर 1923 में पहली बार महिला वकालत करने का अधिकार पा सकी। आज भी सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला चीफ जस्टिस बनने में सालों लगेंगे। मताधिकार भी 100 साल पहले नहीं था।
उन्होंने महिलाओं की भागीदारी से भाषा, परिदृश्य सबकुछ सकारात्मक रूप से बदल जाने के उदाहरण दिए और सचेत रूप में इस हासिल को बनाए रखने के लिए और संघर्ष पर जोर दिया।

कविता सत्र में प्रतिभागियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से स्त्री-अनुभव, संघर्ष और आकांक्षाओं को अभिव्यक्त किया। अनिता भारती, प्रत्युष चंद मिश्रा, अरुण नारायण,नेहा, प्रतिमा पासवान, सदानंद चौधरी, डॉ सपना ने अपनी कविताओं से श्रोताओं को संवेदित एवं प्रेरित किया। अंत में धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सपना बरुआ ने किया . कार्यक्रम में मंजीत आनंद, वीरेंद्र यादव आदि के साथ बड़ी संख्या में छात्राएं उपस्थित रही।

केरल: सुशासन और सामाजिक एकता का इतिहास विरोधी तर्क : शशि थरूर का एजेंडा क्या है ?

सबरीमाला मंदिर में रजस्वला महिलाओं के प्रवेश पर पारंपरिक प्रतिबंध के समर्थक अंग्रेजी (भयंकर शब्दों में गुंथी अभिव्यक्ति वाली अंग्रेजी ) के विद्वान शशि थरूर की चिंता है कि केरल में ‘पहचान की राजनीति’ के उभार ने वहां सामाजिक संबंधों/ समरसता और शासन के लिए खतरा पैदा किया है। (TharoorThink ( The Indian Express, April 30, 2026)

वाह शशि थरूर वाह ! यह सच है कि भाजपा की बांटने की राजनीति या व्याप्त खाई पर अपने प्रसार/विस्तार की राजनीति ने अस्मिता की राजनीति को और गहराया होगा , लेकिन आप जिस केरल के समाज को या केरल की राजनीति को महिमा मंडित कर रहे हैं उसका सारा सच आप नहीं जानते? जानते हैं लेकिन लगभग समरसता ( आरएसएस की नीति) का गौरव प्रस्तुत करते हुए आप नैरेटिव रच रहे हैं।

क्या केरल में आबादी के बड़े हिस्से की महिलाओं को अधोवस्त्र  पहनने पर रोक नहीं थी? क्या ब्रेस्ट टैक्स देने नहीं पड़ते थे, नांगोळी की कथा क्या कहती है ?

क्या नायर घरों में नम्बूदरियों के दर्जनों विवाह  होते नहीं थे?  क्या कठोर छुआछूत नहीं था। क्या पुलाया जाति से आने वाल अय्यंकाली का आंदोलन, सुधार केरल का इतिहास नहीं है ? क्या उन्हें सार्वजनिक मार्ग अदि का प्रयोग का अधिकार था ? क्या जाति विरोधी नारायण गुरु का सामाजिक आंदोलन सच नहीं है केरल के समाज का ? क्या कोई राजनीति इससे अछूती थी ? हाँ, वामपंथी राजनीति भी और आज आप जिस पार्टी यानी कांग्रेस की, राजनीति कर रहे हैं उसकी भी।  क्या यह सच नहीं है कि वैकोम मंदिर में प्रवेश और  उसके रास्तों के इस्तेमाल से केरल की बड़ी गैर ब्राह्मण जातियां वंचित की गई थीं और इसके खिलाफ आंदोलन से महात्मा गांधी भी पीछे हट गए थे ?

क्या वामंथियों के किसानों के बीच काम करने और एझवा समुदाय की पहचान के सवाल के उपस्थित होने में कोई विरोधाभाष था ? क्या टिकट बंटवारे में अघोषित रूप से जाति और धर्म के संतुलन नहीं किये जा रहे थे?

शशि थरूर के दावे के विरुद्ध प्रमाण खोजने के लिए बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। इसका एक स्पष्ट संदर्भ 23 मई 2016 को The Indian Express में प्रकाशित लोकनीति-सीएसडीएस के पोस्ट-पोल विश्लेषण में मिलता है, जिसका शीर्षक था — “Why This Vote for Change Was Different” और जिसे संदीप शास्त्री तथा के. एम. साजिद इब्राहिम ने लिखा था। यह लेख स्वयं इस बात के पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत करता है कि केरल की राजनीति और चुनावी परिदृश्य में जाति, समुदाय और पहचान की राजनीति लंबे समय से गहराई से अंतर्निहित रही है — ठीक इसके विपरीत उस नॉस्टैल्जिक छवि के, जिसे थरूर अब प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे हैं। लेख में कहा गया है, “भाजपा के उभार ने दलों के सामाजिक आधार में भी बदलाव पैदा किया है। ईसाई और मुस्लिम समुदायों को बड़े पैमाने पर यूडीएफ का वोट आधार माना जाता रहा है, जबकि एझवा समुदाय अक्सर एलडीएफ के साथ खड़ा रहा। पिछली चुनावों में नायर समुदाय यूडीएफ की ओर झुक गया था। अब नायर और एझवा वोटों में त्रिकोणीय विभाजन दिखाई देता है, जिसमें भाजपा को नायरों के बीच बेहतर समर्थन मिल रहा है, जबकि यूडीएफ एझवाओं के बीच बेहतर प्रदर्शन कर रही है।”

आपका नैरेटिव है कि केरल की राजनीति विकास आधारित और जाति-मुक्त राजनीति का प्रदेश था ? वाह, क्या सफ़ेद झूठ-   ‘ Why  I AM A HINDU ‘ का लेखक और महिलाओं के मंदिर प्रवेश-निषेध का समर्थक राजनेता लिख  रहा है  ? क्या आपके हिसाब से ‘पहचान की राजनीति’ और हमारे हिसाब से अस्मिता बोध और जाति विरोध की राजनीति ने केरल के समाज में बदलाव नहीं किये हैं, जिसे आप जानबूझकर इतिहास से गायब कर रहे हैं ? आप जानबूझकर जाति, जेंडर की पहचान के उभरने और उसकी समतावादी राजनीति का केरल के समाज पर प्रभाव को गायब कर देना चाहते हैं?

 क्या मुस्लिम और क्रिश्चन समाज की भिन्नताएं भेद के स्तर पर नहीं थीं ? क्या इन धार्मिक पहचानों के साथ वहां कई संस्थाओं का वजूद नहीं है? आखिर आपको क्यों हिन्दू होने की पहचान के पक्ष में किताब लिखनी पड़ा ? क्या इन्हीं सामाजिक भेदों पर आरएसएस और भाजपा राजनीति नहीं कर रहे, खाई को और गहरा करते हुए ?

इतिहास के तथ्य को छिपाते हुए इतिहास के विरूद्ध जिस नैरेटिव को आप गढ़ना चाहते हैं वह कांग्रेस की राजनीति में अपनी जगह को कायम रखने के तात्कालिक स्वार्थ से प्रेरित है या ज्ञान की ब्राह्मणवादी सीमाओं और षड्यंत्रों से प्रेरित ? क्या ज्ञान का संकुचन, इतिहास लेखन में बहुत कुछ अनदेखा किया जाना आदि ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का एक जरूरी अवयव नहीं रहा है? क्या यह राजनीति नहीं है? और क्या केरल की संसदीय राजनीति इससे अलग रही है?

वह राहुल गांधी से प्यार करती है, हथेलियों में रैक्व की आत्मा है

दो दिन पहले एक साथी मेरे घर आई थीं। उन्हें राहुल गांधी से प्यार है। उनके हथेलियों में ‘ रैक्व ‘ की आत्मा है।
उन्होंने कहा कि आप राहुल गांधी के खिलाफ क्यों लिखते हैं? वही एकमात्र विकल्प हैं, हमें उन्हें ताकत देनी चाहिए।मैंने उन्हें कहा कि वही एकमात्र विकल्प नहीं हैं, बल्कि विकल्पों की सबसे बड़ी धूरी हैं फिलहाल!

उन्होंने पूछा कि क्या राहुल के लिए, कांग्रेस के लिए आपके मन में कोई अच्छी कामना नहीं है? कोई एक?

मैंने कहा, है न, बंगाल और केरल से जहां धूरी विकल्पों की परिधि से लड़ रही है। सर्वश्रेष्ठ कामना है।

उन्होंने मेरी ओर देखा।

मैंने कहा, ‘कामना सर्वश्रेष्ठ यही कि ममता बनर्जी बड़े दल के रूप में उभरते हुए उतनी ही सीटों से बहुमत से पीछे रह जाएं जितनी सीटें राहुल गांधी लेकर आने वाले हैं। और केरल में भी न एलडीएफ और यूडीएफ बहुमत तक पहुंचे, इस कदर पीछे रहे कि दोनों का साथ आना जरूरी हो जाए।

उन्होंने कहा कि कर दी न भाजपाइयों वाली कामना, इससे क्या होगा?

‘ इस कमना में एक प्रसंग ऐसा जरूर है जो ‘भाजपाइयों वाली बात ‘ आरोप के लिए आधार हो सकता है। वह केरल के संदर्भ में। मेरी कामना के फलीभूत होने के लिए केरल में भाजपा की सीटें ठीक ठाक आनी होगी, इतनी कि वाम दल और कांग्रेस एक साथ सरकार बनाने के लिए मजबूर हों।’

‘इससे होगा यह कि इंडिया गठबंधन सीमेंट की तरह चिपक जाएगा, पांच साल के लिए फेविकोल का जोड़ । नहीं तो टूट चुके गठबंधन ने अघोषित रूप से तीसरा मोर्चा का पुराना वातावरण बना दिया है।’ इससे यह भी होगा कि राहुल गांधी के नेतृत्व को एक श्रेय जायेगा, जो गठबंधन के दलों को ही हराने के कारण नकारात्मक होते हुए भी सकारात्मक असर पैदा करेगा।’

मैंने फिर उनसे पूछा कि क्या यह राहुल गांधी की राजनीति के लिए भी सर्वोत्तम कामना नहीं है!

वो कुछ सोचने लगीं। चेहरे पर फिर भी थोड़ी चमक थी।

मैंने कहा कि राहुल गांधी सौभाग्य से भरे हैं कि कांग्रेस में 20 सालों से उन्हें कोई चुनौती नहीं है। वे अपने गैर जिम्मेवार भूमिकाओं से पार्टी और पार्टी के बाहर भाजपा के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करते हैं। इसके पहले खुद उनके परिवार के नेहरू, इंदिरा, राजीव और सोनिया में से कोई इतना सौभाग्य से भरा नहीं था, हर किसी को पार्टी में और पार्टी के बाहर चुनौतियों से निपटना पड़ा।

उनके चेहरे पर फिर से गुस्सा वापस आया, ‘ कैसे? ‘

उन्हें राजनीति में एक ही कला आती है विरोधी पक्ष के नेता को आक्रामकता से डिस्क्रेडिट करो। केरल के मुख्यमंत्री के बाद बंगाल के मुख्यमंत्री को उनपर एक भी मुकदमा न होने के आधार पर घेर रहे हैं वे। कहते हैं कि सांठ गांठ है इनका भाजपा से। पलटकर वह सूती साड़ियां पहने ‘भद्र मन की महिला’ मंहगे लिवास में डी क्लास होने की तस्वीरें/ वीडियो जारी करते ‘ युवराज ‘ से कभी नहीं पूछती कि इतने मुकदमे के बाद भी आप या आपके परिवार का कोई व्यक्ति, रॉबर्ट वाड्रा भी, जेल नहीं भेजा गया, जैसे हेमंत सोरेन या अरविंद केजरीवाल को भेजा गया!

उनके चेहरे पर एकदम से क्रोध का आवेग आया। लेकिन फिर वे संयत हो गईं क्योंकि उनके क्रोध से अधिक प्रभावी है उनका मेरे प्रति स्नेह। राहुल गांधी उनके लिए आकाश कुसुम सरीखा दूर हैं – मैं उनके सुख दुख का साथी, एक फोन कॉल की दूरी पर हूं।

‘ लेकिन एकमात्र राहुल गांधी हैं जो निडर खड़े हैं। संघ के खिलाफ बोलते हैं।’

बोलने से सत्ता नहीं बदलती। राहुल गांधी से पहले भी इतिहास में सत्ता के खिलाफ सीधे पीएम के खिलाफ बोलने वाले बड़े नेता रहे हैं, लेकिन सत्ता में बदलाव के लिए उन्हें संगठन की जरूरत पड़ी है, लम्बा वक्त भी लगा है। राहुल गांधी इस मामले में भी सौभाग्य से भरे हैं कि उन्हें एक पुरानी पार्टी मिली है, जिसका मरता हुआ संगठन भी कई राज्यों में बेहद मजबूत है। लेकिन…

लेकिन?

लेकिन राहुल संगठन के स्तर पर भी सबसे गैर जिम्मेवार संगठक रहे हैं। संगठन के लिए भी उनकी पार्टी का ही इतिहास उन्हें देखना चाहिए। गांधी आए तो उन्होंने जिला स्तर तक के संगठनों के लिए अनुकूल वातावरण बनाया। राज्य और जिला की समितियों के लिए जाने वाला फंड भी बढ़ा दिया। आप पता करें कि कांग्रेस का अधिकांश फंड किन गतिविधियों पर खर्च हो रहा है?

कांग्रेस के पास फंड कितना है?

पर्याप्त। जितना होना चाहिए एक सत्ता से दूर हो चुकी पार्टी के पास। राज्यों में जितनी सत्ता है उसके हिसाब से फंड है। आज भी फंड भाजपा के बाद कांग्रेस को ही तो जा रहा है।

वे बोलीं, ‘ आपके पोस्ट पढ़ता हूं, किताब भी पढ़ी है, कभी कभी कुछ बातों से सहमति भी होती है लेकिन आप कुछ ज्यादा आक्रामक होते हैं तो ठीक नहीं लगता। क्या करूं मुझे राहुल से प्यार है? ‘

यह मामला दिल का था। मेरी मित्र कोमल दिल/ मन वाली हैं। मुझे चुप रह जाना पड़ा।

मैं कहना तो बहुत कुछ चाहता था। जैसे, यह प्यार नहीं प्रचार तंत्र का प्रभाव है। सिविल सोसायटी, पेड – अनपेड के तंत्र और प्रोपगंडा का प्रभाव है । यह फॉल्स नेतृत्व की चमक है। मीडिया का माहौल है। मोदी के बाद सबसे अधिक कैमरे राहुल के लिए हैं। मोदी के पहले से रहा है। जब वे महज युवराज थे तब से। पीपली लाइव / नत्था दृश्य याद ही होगा मेरी मित्र को। उनके एक साथी ने इस फिल्म के लिए असिस्टेंट के रूप में काम किया था।

मैं कहना यह भी चाहता था कि राहुल गांधी सच में सौभाग्य से भरे हैं 22 सालों से उन्हें पार्टी में कोई चुनौती नहीं है और 12 सालों से पार्टी के बाहर भी एकमात्र उम्मीद की तरह टंकित किए गए हैं।

मेरे बहुत से साथी इतने सौभाग्य से भरे नहीं थे। वे बदलाव का स्वप्न लिए, अपनी सीमाओं में हस्तक्षेप करते हुए दुनिया से ही चले गए। राहुल गांधी तब भी इसी जोश, बेखौफ बोलों और गैर जिम्मेवार निर्णयों के साथ चमकती उम्मीद थे और आगे भी रहेंगे। पता नहीं मैं भी रहूं या न रहूं।

मैं अपने उन साथियों से भी कहा करता था कि एक इवेंट के जवाब में दूसरे इवेंट से ज्यादा जरूरी है संगठन, मुद्दे, मुद्दों की विश्वसनीयता के लिए उदाहरण। भारत जोड़ो यात्रा ठीक लेकिन एक चुनावी हार उसका सारा कुछ खत्म कर देगा। मैं तब अपनी इन मित्र को कहा करता था कि फॉरेस्ट गंप की तरह सिर्फ चलना ही हासिल नहीं हो सकता। कुछ – कुछ, संकेतों में ही सही कांग्रेस के ही अखबार में, नेशनल हेराल्ड में लिखा भी था – पता नहीं राहुल जी पढ़ते हैं या नहीं अपना अखबार!

लेकिन वे उन्हीं दिनों राहुल के प्रेम में आ गई थीं। बड़ी पापड़ बेल कर, इवेंट मैनेज कर रही टीम में से कुछ से अपने पुराने संबंधों के आधार पर वे एक जगह राहुल से हाथ मिला आई थीं, तब से उनके हाथ में ‘ रैक्व ‘ हजारी प्रसाद द्विवेदी के पात्र की आत्मा आ गई थी।

मैंने भारत जोड़ो के पहले फेज के बाद हुए चुनावों की हार के बाद फिर से यही कहा था, छत्तीसगढ़ भी हार जाया गया था- पद यात्रा की निरंतरता नहीं, चुनावी जीत जरूरी है। मैंने उस वक्त भी कहा था जब लोकसभा चुनावों के बीच में ही निकल पड़े थे राहुल। भारत जोड़ो यात्रा रूट पर सहयोगी दलों की मदद से महज 16 से 17 सीटें जीत पाई थी कांग्रेस।

बड़ी देर से मौन मेरी मित्र ने कहा, ‘ चाय पिलाओ यार! ‘

मुझे लगा वे विषय बदल रही हैं, या वक्त चाहती हैं सोचने के लिए। लेकिन मैं जब चाय बनाने उठा तो उन्होंने कहा, ‘ कुछ भी हो यार राहुल बन्दा है बड़ा ईमानदार । दिल से राजनीति करता है। क्या करें जब ईवीएम हैक हो जाए, चुनाव लूट लिया जाए।

क्या था यह। मेरी मित्र की धारणा या हारे का ‘ हरिनाम? ‘ न मेरी मित्र का और न मेरी उम्र इतनी कम है कि हमने उन चुनावों को न देखा हो जब चुनाव कराने वालों और प्रशासन की मिलीभगत से बूथ के बूथ लूट लिए जाते थे। तब भी सरकारों को बदलते देखा है हमने। आज भी 12 सालों में कई बार हारी है भाजपा। उन हार पर मैं अपनी मित्र को यह कहते सुन चुका हूं कि बड़ी जीत के लिए छोटी कुर्बानी थीं भाजपा की वे हार।

मैं जानता हूं कि वे अपनी धारणाओं को भी प्रेम करती हैं। धारणाएं उम्मीद भी हैं इस दौर में।

मैंने जाते हुए उनकी ओर मुड़ कर देखा, ‘ रैक्व ! ‘ सोचा , उनकी उम्र लंबी हो! ‘

बागमती किनारे बढ़ती प्यास

राइडर राकेश

बागमती किनारे के बाशिंदों का बाढ़ से पुराना नाता रहा है। बाढ़ के पानी और माटी पर बागमती कछार में समृद्धि-कथाएँ लिखी जाती रही हैं। बाढ़ यहाँ की संस्कृति का हिस्सा रही है। बाढ़ का बागमती वालों के लिए मेहमान-सा नाता रहा है। आज आए। कल दोपहर से चलने की तैयारी शुरू कर दी। परसों शाम तक चले गए। कभी ऐसा नुकसान नहीं किया जो याद रहे। न, विस्थापन भी नहीं।

बागमती का इलाका आज अजीब दोराहे पर खड़ा है। पानी अब भी आता है। कभी मेहरबान बनकर। कभी आफत बनकर। कभी कौतूहल भर ही! हकीकत मगर यही है कि यह इलाका अब प्यासा रहने लगा है। चार साल हो गए, प्यास साल दर साल बढ़ती ही जा रही है। खेत सूखे हैं। कुएँ भरते चले गए। हैंडपंप जवाब दे रहे हैं। पोखर-तालाब घटे हैं। जो हैं वे सूखे रहते हैं। शिवहर, सीतामढ़ी, मुज़फ्फरपुर जिलों में बागमती कछार पर पसरे गॉवों में पानी की कहानी एक सी है। चार सालों में यह संकट और गहरा हुआ है। ये कोई इत्तेफाक नहीं है। इसके पीछे वजहें हैं। बहुत साफ।

सबसे पहली बात। जलवायु बदल चुकी है। बारिश का मिजाज़ बदल गया है। चक्र बदल गया है। पहले जो पानी महीनों में गिरता था, अब कुछ दिनों में गिर जाता है। तेज बारिश होती है। धरती को सोखने का मौका नहीं मिलता। पानी बह जाता है। बाढ़ बनता है। फिर कुछ हफ्तों बाद वही जमीन प्यास से फटने लगती है। अजीब चरम की अवस्था है। एकाएक बहुत ज्यादा पानी। फिर एकदम से कमी। यही असली संकट है।

दूसरी बात। जैव विविधता का नुकसान। पहले मेड़ों पर पेड़ थे। आसपास किस्म-किस्म की झाड़ियाँ थीं। घास थी। ये सब मिलकर पानी को रोकते थे। धीरे-धीरे सोखते थे। अब खेत साफ कर दिए गए हैं। एक ही फसल। एक ही पैटर्न। न पेड़। न परिंदा। न कीड़े। जमीन जिंदा नहीं रही। जमीन जिंदा नहीं रहती तो वह पानी को पकड़कर रख भी नहीं सकती।

तीसरी बात। मिट्टी पर कार्बन की गड़बड़ कहानी। रासायनिक खेती ने मिट्टी को सख्त बना दिया है। जैविक पदार्थ घट गया है। जो कार्बन मिट्टी के भीतर जिंदा रूप में होना चाहिए था, वो अब उस तरह मौजूद नहीं है। ऊपर एक तरह की सख्त परत बन गई है। पानी अंदर नहीं जाता। बह जाता है। यही वजह है कि ग्राउंड वाटर रिचार्ज नहीं हो पा रहा।

चौथी बात। खेती का बदलता ढर्रा। धान-गेहूँ का चक्र। ज्यादा पानी लेने वाली फसलें। ट्यूबवेल पर बढ़ती निर्भरता। धड़ाधड़ बढ़ती बोरिंगें। पानी निकालने की रफ्तार तेज। भरने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं। मानो टंकी खाली करते जाएँ और भरने का नल बंद हो।

पाँचवीं बात। नदियों की हालत। बागमती खुद परेशान है। उसका रास्ता सिकुड़ गया है। तटबंधों ने उसे बाँध दिया है। जहाँ उसे फैलना था, वहाँ दीवार खड़ी है। नतीजा ये कि बाढ़ का पानी दबाव बनाकर निकलता है। कहीं टूटता है। कहीं जमता है। और जब उतरता है, तो मोटी गाद छोड़ जाता है। ये गाद भी जमीन की पानी सोखने की ताकत को कम करती है।

छठी बात। पारंपरिक जल स्रोतों का छिजते जाना। पहले हर गाँव में पोखर थे। तालाब थे। गबरे-डबरे थे। ये छोटे-छोटे ढाँचे पानी को रोकते थे। धीरे-धीरे जमीन में उतारते थे। अब ये या तो भर दिए गए हैं, या भुला दिए गए हैं। बारिश का पानी आता है और बिना रुके निकल जाता है।

सातवीं बात। कॉंक्रीटिकरण अब शहरों तक सीमित नहीं रही। उसने गाँव-देहात का रास्ता भी देख लिया है। सड़कें पक्की। आँगन पक्का। छत पक्की। हर तरफ सीमेंट की परत। पक्का मकान की योजनाओं ने इस रफ्तार को और तेज किया है। पहले जहाँ मिट्टी साँस लेती थी, अब वहाँ कंक्रीट जम गया है। पानी के लिए जगह ही नहीं बची। वो जमीन में जाएगा कहाँ? नालियों से भागेगा। तेजी से भागेगा। बाढ़ को और उकसाएगा। मगर धरती खाली ही रहेगी। भूजल नहीं भरेगा।

आठवीं बात। भूजल का अंधाधुंध दोहन। हर साल पानी के सतह की बढ़ती गहराई। 20 बरस पहले 20 फीट पर पानी था। अब कहीं-कभी 60 फीट पर। वरना औसतन150-200 फीट पर। ये गिरावट खतरनाक है। जमीन का पानी रिचार्ज नहीं होगा तो ये सिलसिला चलता रहेगा। एक दिन बोरिंग भी बेकार हो जाएगी।

नौवीं बात। नीति और समझ का फर्क। हमने पानी को सिर्फ संकट के वक्त याद किया। बाढ़ आई तो राहत। सूखा पड़ा तो टैंकर। मगर बीच के समय में कोई गंभीर योजना नहीं। न जल संरक्षण की ठोस पहल। न सामुदायिक जिम्मेदारी। न स्थानीय ज्ञान का इस्तेमाल।

अब सवाल उठता है कि रास्ता क्या है।

रास्ता आसान नहीं है। मगर है। सबसे पहले जमीन को जिंदा करना होगा। जैविक पदार्थ बढ़ाना होगा। गोबर। कम्पोस्ट। हरी खाद। इससे मिट्टी मुलायम होगी। पानी सोखेगी। जैव विविधता को फिर से समृद्ध करना होगा। खेत को फिर से जंगल की तरह सोचना होगा। एक फसल नहीं। कई फसलें। पेड़, झाड़ियाँ, घास: सब साथ। कीड़े लौटेंगे। परिंदे लौटेंगे। जमीन जिंदा होगी। और जब जमीन जिंदा होगी, तभी पानी ठहरेगा।

इसके साथ-साथ पानी को रोकने की छोटी-छोटी तरकीबें भी जरूरी हैं। हर खेत में मेड़ मजबूत करनी होगी। मेड़ पर घास और पेड़ लगाने होंगे। बारिश का पानी खेत में ही रुके। धीरे-धीरे नीचे जाए। गाँव में छोटे-छोटे गड्ढे। सोख्ता। कूँओं का पुनर्जीवन। छत का पानी भी बेकार न जाए। उसे जमीन में उतारने का इंतजाम हो। वर्षा जल संचय की व्यवस्था भी।

चरागाह और खुली जमीन को बचाना होगा। हर जगह पक्का बना देना हल नहीं है। कुछ जगहों को सांस लेने के लिए छोड़ना होगा। यही जगहें पानी को जमीन तक पहुँचाती हैं।

नदी के साथ रिश्ता भी बदलना होगा। ये उसे बाँधकर नहीं हो सकता। उसे समझकर सहजीवन से होगा। जहाँ उसे फैलने की जरूरत है, वहाँ जगह देनी होगी। बाढ़ के पानी को दुश्मन की तरह दुत्कारना या डराना नहीं होगा। बढ़ के पानी को मेहमान की तरह संभालना होगा।

सबसे जरूरी, पानी को सिर्फ सरकार का काम समझना बंद करना होगा। समुदाय तय करे। गाँव खुद तय करे। पंचायत मिलकर काम करे। पानी बचाने का काम जितना स्थानीय होगा, उतना ही असरदार होगा।

यह धरती पानी से खाली नहीं है। बस पानी को ठहरने की जगह नहीं मिल रही। पानी आता है। हम उसे रोक नहीं पाते। बहने देते हैं। सहेज नहीं पाते। यही भूल है। लिहाज़ा वक्त की ज़रुरत है कि हम खेती के अपने तरीके बदलें। जमीन को जिंदा करें। पानी को ठहरने दें। उसे अपना बनाएं। वरना आने वाले दिनों में बागमती के किनारे रहने वाले लोग पानी के बीच खड़े होकर भी प्यासे ही रह जाएंगे।

(राइडर राकेश जेंडर सापेक्षता, क्लाइमेट रेसिलियेंस और क्लाइमेट एजुकेशन के प्रति समर्पित एक लेखक, शोधार्थी और किसान हैं। फ़िलहाल वे तरियानी छपरा, शिवहर में रहते हैं।)