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दलित कहानियों में संवेदनात्मक पक्ष, परिवर्तन और दिशा

 

दलित कहानियों में संवेदनात्मक पक्ष, परिवर्तन और दिशा

 राजकुमारी

असिस्टेंट प्रोफ़ेसर (हिन्दी )

ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज (सांध्य)

संवेदना मनुष्य और साहित्य की किसी भी विधा का मूलभूत आधार होती हैं। अपनी ज्ञानेंद्रियों के द्वारा ही मनुष्य जो सुखानुभूति और दु:खानाभूति करता है; उसकी अभिव्यक्ति ही वह रचना में करता रहा है। हिन्दी साहित्य में कथाओं का वृहद इतिहास रहा है, कभी कथाएँ  मौखिक तो कभी लिखित रूप में रही हैं। पाश्चत्य देशों से प्रारंभ हुई इस विधा ने हिन्दी साहित्य को अत्यंत प्रभावित किया और अंग्रेज़ी कथाओं का प्रत्यक्ष प्रभाव भी हिन्दी कथासाहित्य पर सप्ष्ट रूप में परिलक्षित होता है। आधुनिक युग में कहानी विधा का हिन्दी साहित्य में आगमन हो चुका था। भारतेंदु युग के अंतिम दशक में इस विधा की उत्पत्ति हो चुकी थी। प्रारंभिक कहानियों में सामाजिक कुरीतियों और समाज सुधार का स्वर दृष्टव्य होता है- “आज की हिन्दी कहानी गतिशील है, आधुनिकता की चुनौती को स्वीकार कर रही है और आधुनिकता एक प्रक्रिया है जिसे नई कहानी ने मूल्य में परिणित कर इसे रूढ़ बनाया है। इसीलिए नई कहानी अपने नयेपन को छोड़कर नए नाम धारण करने को विवश है।”1

नयापन और नवजागरण दलित साहित्य में भी बखूबी उभरा है। कविता, उपन्यास और कहानी, नाटक आदि विधाओं के रूप में इसे देखा जाता रहा है। इसी परम्परा में कथा के क्षेत्र में एक ख्याति प्राप्त नाम है रतनकुमार सांभरिया। सांभरिया जी दलित साहित्य लेखन के अप्रतिम साहित्यकार हैं। उनकी कहानियों में सामाजिक शोषित व्यक्तियों के संवेदनात्मक पहलुओं के साथ अस्मिताबोध, चेतना और आत्मचिन्तन की छवि   प्रत्यक्ष नज़र आती है। वर्तमान युग में हाशिए पर खड़े समुदाय और जातियों के अविकसित समाज की यथार्थ अभिव्यक्ति कथाओं में हुई है। एक ओर जहां बंजारे, कंजर, सपेरे, जैसी समस्त कहानियाँ खानाबदोश जीवन जीने वाली जातियों के खुरदुरे जीवन के कटुतापूर्ण सत्यों का उदघाटन करती हैं तो वहीं दूसरी ओर आँचलिक जीवन में सामान्य श्रमिक, लघु उद्योग से जुड़े लोगों, जातीय पेशे से जुड़े समाज, विधवा जीवन, स्त्री जीवन, विदुर पुरुष और वृद्धावस्था में कठिन परिस्थितियों में गुजरती जिंदगी और उनके साथ हो रहे मानवीय व्यवहार के सत्य को चित्रित करती हैं । ये कहानियाँ संवेदना की आत्मिक अभिव्यक्ति  को जीवंत करती हैं ।

उनकी कथाओं में सशक्त बात ये भी है कि एक ओर यथास्थिति के अनुकूल नारी पात्र अपने निर्णय स्वयं लेते हैं, तो वहीं दूसरी ओर अंतर्विरोध की स्थिति से निपटना भी भली- भांति जानते हैं। विपरीत परिस्थियों से जूझते जरूर हैं किंतु निराशावाद का दामन थामने के लिए विवश नहीं होते। जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ती है रोचक होती चली जाती है। पाठकों को मुग्ध करने की सारी गुणवत्ता कथाओं में निहित है और वही उनके कथानक को सुदृढ़ बनाती है। संघर्षरत पात्रों को निर्मिति परिवेश की जटिलताओं को साहसपूर्वक पार करती है। आंचलिक क्षेत्र में जातीयता की जटिलता, शोषण की पराकाष्ठा, अपमान की लीक , संघर्ष का संकल्प, जन चेतना, खानाबदोश जीवन की यथार्थ अभिव्यक्ति को बड़ी ईमानदारी के साथ कथाकार ने शब्दबद्ध किया गया है।

सांभरिया जी की कहानियों में नारी शोषण, भारतीय जन जीवन, वर्ग संघर्ष, मानवीय मूल्यों की स्थापना, मानवीय संबंधों में उभरता द्वंद, बहुत गहन चिंतन हृदय को गहराई से प्रभावित करता है। कहानियों के कथ्यों में चेतनता के स्वर उभरते हैं। वृद्ध सेवक जो अपने घर को वृद्धों के लिए वृद्धाश्रम बना देते हैं, ये उनकी जिंदगी से मिले सबक से वो सीखते हैं कि बुजुर्ग होने पर एक सहारे की अवश्यकता होती है। ‘ आश्रय ‘ कहानी का कथानक इसी मूल भाव को रुपायित करता है। सेवक का बेटा जो शहर में निवास करता है वो पिता के उस घर का भी सौदा करना चाहते हैं जिसमें सेवक जी दीन दुखी, रोगग्रस्त वृद्ध व्यक्तियों को आश्रय दिए हुए हैं जिन्हें उनके परिवार त्याग चुके हैं, रिटायरमेंट और पत्नी की मृत्यु के पश्चात वे धन और मन दोनों से ही बेसहारा लोगों के जीवन का संबल बने उदारवादी भावना से ओतप्रोत सेवक अपने बेटे परमेश्वर का कंधा थपका कर कहते हैं – “परमेश्वर जी, रिटारमेंट के बाद मुझे लगा कि बहु बेटे पर आश्रित होने की बजाय मेरा घर और धन बुजुर्गों का आश्रय बन जाए। आप जब भी आश्रय आएं, बेसहारा को जरूर लाएं।”2

पिता की गीली आंखों और इन शब्दों ने अपनी अंतर्वेदना के बहाव को बहा दिया। अप्रत्यक्ष रुप में उस मकान को न बेचने की घोषणा भी कर चुके थे। उनकी कहानियाँ नए सोपानों को स्पर्श करती हुई आगे बढ़ती हैं नारी पात्र जीवन की विभिन्न चुनौतियों को स्वीकार करते हुए आजीवन संघर्षशील बने रहते हैं। अस्मिता की धुरी पर घुमती स्त्रियां बहुयामी व्यक्तित्व में दिखाई पड़ती हैं।

भारतीय कृषक वर्ग, गरीब किसानों की पीड़ा को दर्शाती कहानी ‘ खेत ‘ जिसके माध्यम से कथाकार अपनी ज़मीन खोने की टीस लिए हैं, सड़क के किनारे स्थित ज़मीन हो या सड़क से दूर किसान का लगाव उससे माँ सरीखा होता है, उसी के सहारे से अपने परिवार का लालन-पालन करते हैं। ज़मीन उनकी जिंदगी होती है। औद्योगिकीकरण के कारण पूंजीपति वर्ग की पैनी नज़र उसी ज़मीन पर गड़ी रहती है जहाँ वे अपने लाभ हेतु कारखाने, मॉल निर्मित कर एक उद्योगिक नगर बनाकर अपनी आर्थिक स्थिति को अधिक मज़बूत कर सकें, किंतु इसके परिणामस्वरूप आर्थिक रूप से कमज़ोर किसान बलि का बकरा बन जाता है।

‘हथौड़ा’ कहानी “मूर्तिकार पत्थर पर बैठकर उसे मूर्ति बनाता है। मंदिर में जब मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा हो जाती है, वह उसे छू तक नहीं पाता है। मजूर की नियति। अपना श्रम स्वेद दफन कर जिस मकान का निर्माण करता है, नांगल मंगल के बाद उसी में जाते पीछे हटता है।”3

समाज में एक ये भी परंपरा रही कि खेत मजदूरी में जाने वाले निम्न जाति के लोग जिनके खेतों में काम करते उन्हें अपना जमींदार और वे उन्हें अपने चमार, नाई होने का हक जमाते थे वे उनके अतिरिक्त किसी अन्य बड़े परिवारों का काम नहीं कर सकते थे। वैसा ही एक उदाहरण हमें ‘ चमरवा ‘ कहानी में प्राप्त होता है चमारवा एक ऐसी जाति है जो पूर्वी और हरियाणा के पश्चिमी छोर पर रहती है, चमरवा एक बाभन जाति है जो चमारों के कर्मकांडों को पूर्ण कराते रहे हैं और अपना गुजर बसर करते हैं किंतु उसकी पहचान चमारों के बीच ब्राह्मण और ब्राह्मणों के मध्य चमार की है। प्रस्तुत कहानी में दरपन ब्राह्मण का पुत्र अपने दोस्त के मशवरे पर नौकरी के लिए जाति प्रमाण पत्र बनवाता है दरपण को इस प्रमाण पत्र को देखकर क्षोभ और झल्लाहट से भरकर क्रोधित हो उठता है और जातीय घृणा के कारण बौखला उठता है – ” करण के हाथों ‘ चमार’ का प्रमाण पत्र देखकर दरपन की आँखें मशाल बन गई। बाज़ परिंदे भी इतनी तेज़ नज़र नहीं खोजता होगा, जितना दरपन ने करण के हाथ पर झपटा मारा, प्रमाण पत्र फाड़ कर चिंदियां की और चूल्हे की जलती आग में भाड़ में भूसे की तरह झोंक दी, चमार बनने चला बेवकूफ।”4 

रस्सी जल गई पर बल नहीं गया। जातीय दंभ भरने वाले दरपन का पेट हालाँकि चमारों के कर्मकांडो से चलता है उनका दिया खाते हैं , लेकिन जाति प्रमाण पत्र को देखकर उनके अन्दर निम्न जाति के प्रति घृणा की पराकाष्ठा देखने को मिलती है। मृत्यु के वक्त अछूतपन की भावना भी सपष्ट दिखाई पड़ती है।

 कहानीकार अपनी कहानियों में सामंतवाद से टकराते सजीव पात्रों का भी चित्रण करते हैं और निम्न जातियों में सामाजिक चेतना का विकास भी करते हैं। उन्होंने गैर दलित समाज के व्यवहार को यथार्थ रूप में प्रस्तुत किया है। अत्याधिक लोग जातीय अभिमान में इंसानियत को भूला  दिया गया है।

 ‘बात ‘ जैसी कहानी में विधवा सुरती मर्द की तरह अपनी दी गई ज़बान को पूरा करती है और अपने बेटे की पढ़ाई के साथ-साथ अपनी इज्ज़त की रक्षा भी कर लेती है, इससे ये सिद्ध होता है कि ज़बान का पक्का होने में कहीं भी लिंग का कोई महत्व नहीं होता। वह स्त्री-पुरुष कोई भी हो सकता है। गरीब की भी इज्ज़त आबरू होती है तथा वह मेहनतकश भी है, यही कारण है कि सुरती अपने स्वाभिमान को सुरक्षित रख पाती है। असल में वह भारत की हर श्रमिक स्त्री के स्वाभिमान का प्रतिनिधित्व करती है। ‘ काल ‘ कहानी भारतीय गरीब किसान की व्यथित कथा है जिसमें सूरदास बैल को भूख प्यास से राहत दिलाने के लिए खूंटे से खोलकर न चाहते हुए भी आज़ाद कर देता है ताकि वह मर न जाए, किंतु कुएं के निकट स्थित सूरदास बैल की मौत अकाल के कारण भूख प्यास से हो ही जाती है। जो मनुष्य और जानवर दोनों की विवशता और मौत का परिदृश्य दिखाती है।

कहानीकार अपनी कथाओं के माध्यम से भारतीय आँचलिक, शहरी क्षेत्रों के समाज में अपनी मज़बूत जड़े जमा चुकी विद्रूपताओं, पिछड़ेपन की जटिलताओं को चित्रित करते हैं।  जनजातियों की दशा, सामंती मानसिकता, अभावग्रस्त जीवन, अकाल के समय की त्रासदी, भ्रष्टाचार की दिन ब दिन बढ़ती स्थिति ग्रामीण और देश की राजनीतिक स्थिति , जीवन में तीव्रता से हो रहे परिवर्तन आदि विभिन्न पहलुओं को जीवंत वातावरण के साथ प्रस्तुत करते हैं। स्त्रियों में अपनी अस्मिता को लेकर संजीदापन, अपने अपमान के प्रति प्रतिरोध, स्वर मुखरित करने की हिम्मत बा- कमाल है। शोषित वर्ग में चेतना, मनोवैज्ञानिक बदलाव, उनकी सक्रिय भूमिका को उभारते हैं। सभी कथाएं कालक्रमानुसार आए परिवर्तन का सार्थक निरूपण हैं।

 कथ्य में नवीनीकरण मिलता है,भाषा में ठेठ खड़ी बोली, राजस्थानी के शब्द प्रयोग हुए हैं, 

“जीवन पचासेक के नीडे था।”5

खाट, गुदड़गाबा, चौसड़, आदि शब्द 

 गुण, शब्द शक्ति, लोकोक्ति, मुहावरे सभी उनके लेखन के मज़बूत पक्ष हैं। वर्णनात्मकता, प्रवहमयता, बिंब, ध्वन्यात्मकता, प्रतीकात्मकता ,कलात्मकता कथा उद्देश्य, शिल्प को विशिष्टता प्रदान करता है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि उनकी कहानियों में आंचलिक मिट्टी की गंध समाई है, संवेदना पक्ष जनमानस के भावों का आदान-प्रदान करने में सफ़ल है। उनकी राजस्थानी, मेवाती मिश्रित भाषा उनके कथा संसार को सजीव बनाती है। सभी कहानियां सुन्दर सौष्ठव लिए सफ़ल कहानियां हैं।

‘पाठशाला’ युवा कथाकार सुनील पंवार की वर्ष 2018 में  लिखित कहानी है। कहानी का परिवेश राजस्थान का क्षेत्र है। लेखक ने जहाँ एक ओर सामाजिक कुरीतियों और रीति-रिवाजों को दृष्टिगत कराया है, वहीं दूसरी ओर समाज के परिवर्तित स्वरूप व दलित चेतना को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया है। कहानी ‘पाठशाला’ में नयापन ये है कि इसमें समस्याएँ एवं समाधान दोनों ही मौजूद हैं। शिक्षा के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन होंगे ये सुनिश्चित किया गया है। शिक्षा से दृष्टिकोण बदलेंगे और फिर नवजागरण से देश बदलेगा; यही दशा और दिशा कहानी की विषयवस्तु है।

कहानी के मुख्य पात्र ‘सुखिया’ के द्वारा बाल मन की जिज्ञासाओं ने प्रश्न को जन्म दिया और तर्क ने एक दिशा। पाठशाला में जाते समय बालक सुखिया की परेशानी, मन की उलझन, पाठशाला जाने से बचने की तरकीबें, कथा को रोचक बनाती हैं। घर से पाठशाला तक पहुँचने से पूर्व मध्य मार्ग में कहानीकार ने कथा के मूल पात्र सुखिया की बौद्धिक क्षमता, पाठशाला न जाने के भिन्न-भिन्न बहाने, उसकी जिज्ञासा से उपजी तर्कशील बुद्धि, बाई में बापू को समझाने की क्षमता की पहचान व हाज़िरज़वाबी का बेजोड़ चित्रण किया है। उसकी शिक्षा से कहीं अधिक गृहकार्यों में रुचि, बाई को प्रसन्न करने और रीति-रिवाज पर प्रश्न खड़े करने की अद्भुत शक्ति को कथाकार ने सूझबूझ के साथ लिखा है। बाई स्कूल नहीं जाती वह जानता है, बाई सारा दिन काम में व्यस्त रहती है इसलिए वह उनके मर्म को पकड़ कर उनकी फिक्र में घर के काम में हाथ बटाने की तरकीब लड़ाते हुए फिक्रमंद होने का नाटक करता है। तब बाई सुखिया की चालाकी को पहचानते हुए कहती है- 

“तू मेरी फिक्र न कर सुखिया, मेरा क्या है मैं तो पराया धन हूं, बापू मेरा ब्याह कर देगा, तो मैं चली जाऊंगी।”6

बाल मन चिंताग्रस्त होकर एक और प्रश्न कर बैठता है-

“तुम कहां चली जाओगी बाई?” सुखिया ने बडे़ आश्चर्य से पूछा।

“अपने घर… और कहां?” बाई ने उत्तर दिया।

 “तुम्हारा घर?  वह कहां है बाई?” सुखिया ने कौतूहल से पूछा।

“म्हारे सासरे में।” बाई ने हल्की सी हँसी के साथ ज़वाब दिया। 

“तो क्या बापू का घर तुम्हारा नहीं है?”7

 “नहीं!” 

“ये पराया धन क्या होता है?”

“बेटी पराई हाेती है। वो ब्याह के बाद दूसरे घर चली जाती है, जैसे मां नानी का घर छोड़कर हमारे घर आई।” 

“बापू मेरा ब्याह कर देगा तो क्या मैं भी चला जाऊंगा?” सुखिया के मासूम सवाल में बड़ा आश्चर्य था एवं स्त्री मन की दृढ़ता और स्वीकार्यता भी। वह खुद को पराया मान चुकी है। यह बात सामाजिक परंपरा ने उसे सीखा दी है। 

“हा हा हा! बावले! छोरे थोड़े ही जाते हैं, बेटियां होती हैं पराई।”8 बाई उसे समझाती है।

परम्पराओं ने दर्शाया है कि स्त्री धन है, संपत्ति है। वह मनुष्य नहीं बल्कि अपनी इच्छा एवं अधिकार से वंचित एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजी जाने वाली वस्तु मात्र है।  वह केवल पुरुष की सत्ता की वाहक, इससे अधिक कुछ नहीं। 

दोनों बहन-भाइयों के बीच बेहद रोचक संवाद शैली है, जो पाठकों में रुचि पैदा करने के साथ ही भेदीय नीतियों का भी खुलासा करती है।

 “बाई। तुम बापू को समझाती क्यों नहीं? मैं पढ़-लिखकर क्या करूंगा?” सुखिया ने एकाएक बाई से पूछा-

“तू अनपढ़ रहकर भी क्या करेगा?” बाई ने सवाल का ज़वाब सवाल से दिया।

 “मैं खेत में बापू की मदद करूंगा। तुम्हारी काम में भी मदद करूंगा और माँ का भी हाथ बटांऊंगा।” उसने चतुराई से ज़वाब दिया।9

“बाई…! अगर मैं रोज पाठशाला जाऊंगा, तो तुम्हारे साथ पानी लेने कौन जाएगा? बापू की रोटी देने खेत में कौन जाएगा? तुम बिल्कुल अकेली हो जाओगी बाई।” सुखिया ने बाई को काम का प्रलोभन दिया ताकि बाई अपना इरादा बदल दे और उसे पाठशाला के झमेले से मुक्ति मिल जाए। वह बातें बनाने में तो बहुत माहिर था, किंतु आज बाई के सामने दाल गलती नज़र नहीं आ रही थी। बाई निरक्षर होने के बावजूद भी शिक्षा के महत्व को समझती है यही मूल कारण है कि वह सुखिया का दाखिला करवाने पाठशाला जाती है।

सुखिया की माँ बाई ही थी ये तो कहानीकार ने लिखा लेकिन क्यों थी ? ये स्पष्टीकरण पूरी कहानी में कहीं भी नहीं लिखा गया। माँ जीवित थी या नहीं थी? कामकाज से घर से बाहर रहती थी? इसलिए वह बड़ी बहन होने के नाते देखभाल करती थी? या बीमार थी? इस बात का कोई भी संकेत कथा में नहीं मिलता। बाई जो की लड़की है और निम्न वर्ग से संबंध रखती है, पराया धन भी है शायद यही कारण है कि वह पाठशाला नहीं गई या उसे पाठशाला नहीं भेजा गया। कहानी का प्रथम भाग यही है।  दूसरे भाग में पाठशाला के बाह्य रूप को चित्रित किया गया है। गांव देहात की कच्ची मिट्टी की दीवार वाली लोहे की सलाखों वाला गेट, सफेदी से अंदर की लीपी-पुती दिवारे, पेड़ों के नीचे लगी कक्षाएं, पानी के मटकों की हालत, वातावरण की वास्तविकता और सरकारी स्कूलों की जर्जर हालत को बयान करती है। सुखिया की शरारतों और बौद्धिक शक्ति से गुरू जी भी परिचित हैं, किंतु सामाजिक बाध्यताओं के आगे वे भी बेबस हैं। यही कारण है कि वे सुखिया को पढ़ाने को राज़ी तो हुए परन्तु शर्त पर कि टाट और पानी ख़ुद का होगा। क्यों कि वो पढ़े लिखे तो हैं किंतु सामाजिक परपंराओं से टकराने की ताकत उनमें भी नहीं है। दूसरी महत्वपूर्ण बात ये थी कि वह गांव का पहला बच्चा था, जो नीची जाति से विद्यार्थी जीवन में भी प्रवेश करने वाला था। 

शिक्षक किस जाति से संबंध रखता है इसका भी कोई ब्यौरा नहीं दिया गया जो कहानीकार का शुरुआती कहानी होने के कारण क्षम्य है या अंडरस्टूड बात मान सकते हैं।

लेखक शिक्षक और शिक्षा पर बहुत अहम सवाल खड़ा करते हैं कि शिक्षा भी सामाजिक वर्ण विभाजन, रीति- रिवाज, जाति भेद, लिंग भेद नहीं बदल पाई। लेकिन गुरू जी इस बात का आश्वासन देते हैं कि भविष्य में ये होगा। शिक्षा केवल सामाजिक कायाकल्प ही नहीं करेगी वह वैचारिक काया भी पलट देगी। गुरू जी एक शिक्षक होने के नाते सर्व मानवाधिकार सुखिया को देते हैं। कथा स्वतंत्र भारत की पृष्ठ भूमि में लिखी गई है इसीलिए बहुत सहजता से विद्यालय प्रवेश तो हो गया, परंतु उच्च जाति का भय अब भी गले की फांस बनी हुई है। गुरू जी अपने शिक्षक होने के कर्तव्य का भली-भांति पालन कर रहे हैं। सहयोगी के रूप में अपना योगादान, स्थिति और गलत परम्पराओं से बाहर निकलने की दिशा दे, सुखिया का मार्ग दर्शन ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज की गलत परम्पराओं से मुक्ति का प्रतिनिधित्व भी कर रहे हैं। वहीं कहानी को नया मोड़ देने के लिए लेखक ने सुखिया की वेशभूषा सफ़ेद कमीज़ को, जिसका जिक्र विषयवस्तु के आधार पर कहानी में पूर्व में भी  होना चाहिए था, किन्तु नहीं हुआ। ऐसा लगता है जैसे कहानीकार को यकायक इसे लिखने की जरूरत पड़ी, ताकि कथा के उद्देश्य की पूर्ति हो सके। 

अंतिम भाग में डॉ.आंबेडकर के स्लोगन से चमकती दीवार शिक्षा की ताकत का महत्व बता रही है।

 “सुखिया देखो, अपने पीछे की इस भीत को देखो। जब तुम पाठशाला आए थे, तब क्या ये भीत ऐसी ही थी?” “नहीं।” 10 सुखिया ने पलटकर भीत को देखा जिस पर सफ़ेदी पुती थी, जिसने दिवारों और गिरे हुए लेवड़ो को ढक दिया था और उस पर मध्यम, मध्य में नीले रंग का अशोक चक्र बना था व नीचे बडे़ बड़े सुंदर अक्षरों से महापुरूषों के कथन अंकित थे। सुखिया उस कथन को तो पढ़ नहीं पाया किंतु भीत को देखकर उसे अच्छा लगा।

“अब ये दीवार अच्छी दिख रही है न?”

 “हां, गुरू जी।” 

“देखो। चार अक्षर लिखने के बाद ये भीत भी बोलती हुई नज़र आ रही है। इसकी दरारें, इसकी जर्जरता सब इन अक्षरों के नीचे दब गई है न?”

 “हां, गुरु जी।” 

“बस यही बदलाव लाएगी। तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई। जिसने दीवार को जीवंत कर दिया वह एक दिन रीतियों, कुरीतियों, जाति, वर्ग और सामाजिक व्यवस्था की सभी दरारों को ढक देती। नीला रंग क्रांति का, धोला रंग शांति का। ये दोनों ही शिक्षा से संभव हो सकेंगे। समय के साथ बदलाव ज़रूर होंगे सुखिया, ज़रूर होंगे।” 11

     कहानी सफ़ेद और नीले रंग के व्यापक अर्थ को दृष्टिगत कराती है। बालमन को आंदोलित कर मुक्ति की आस, सपने जगा रही है। समस्या और समाधान दोनों ही कहानी में हैं। कहानी में तर्कसम्मत विवेचन, कहानीकार की विचारक, चिंतक छवि का बोध भी कहानी कराती है।

प्रगतिशील कहानी है, जो स्वस्थ मानसिकता वाले समाज की परिकल्पना लिए है। संवादों की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है। कहानी पूर्णतः अधिकार चेतना, सामाजिक चेतना व समानता की बात करती है व गैर दलित जाति के इंसान के दलित समाज के सहयोग को स्थापित करती कथा है। कहानी संवाद, शैली वैविध्य, मौलिकता व आत्मीय स्वर लिए है। कहानी संवादों से आरंभ होकर भविष्य के उज्ज्वल सपने और नई सुबह जो नया प्रकाश फैलाएगी; पर अंत की गई है। कथावस्तु, गठन, वाक्य संरचना, व्यंग्य विनोद व सपाटबयानी कहानी की गुणवत्ता है। इसके लिए कहानीकार श्लाध्य योग्य हैं।

  1. हिन्दी कहानी एक नई दृष्टि – इंद्र मदान – पृष्ठ -35
  2. समकालीन भारतीय साहित्य – पत्रिका मार्च, अप्रैल अंक -2021
  3. हथौड़ा – 135
  4. चमरवा रतनकुमार सांभरिया की प्रतिनिधि कहानियां – डॉ. लोकेश गुप्ता – पृष्ठ – 44

 5 – खेत और अन्य कहानियां संग्रह – रत्नकुमार सांभरिया – पेज – 90

  1. एक कप चाय और तुम (कहानी संग्रह)- सुनील पंवार -73
  2. एक कप चाय और तुम द्वितीय संस्करण –  सुनील पंवार – 73
  3. एक कप चाय और तुम –           ”            – सुनील पंवार  -74
  4.   एक कप चाय और तुम –     ”             -सुनील पंवार – वही 
  5. एक कप चाय और तुम – (कहानी संग्रह) सुनील पंवार – 75

 

 

 


 

 

 

 

 

 


 

एनडीए के राज में सुरक्षित नहीं हैं महिलाएं

महिला सशक्तिकरण का नारा धोखा है

प्रेस विज्ञप्ति ,04, अप्रैल 2026 पटना

महिला संगठनों की एक संयुक्त जांच टीम जिसमें अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोशिएशन, ऐपवा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सरोज चौबे, ऐडवा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रामपरी, बिहार महिला समाज की रिंकू व कृष्णा, बिहार महिला समाख्या फेडरेशन की रत्ना, इप्तदा नेटवर्क की अख्तरी बेगम व दलित महिला विकास मंच की प्रतिमा शामिल थीं, नालंदा जिला के नूरसराय थाना के अजयपुर गांव का दौरा किया. अजय पुर में 26 मार्च की शाम सरेआम एक महिला को गुंडों ने सामूहिक बलात्कार की कोशिश की, उसके निजी अंगों में हाथ डाला और मानवता को शर्मसार किया। गांव के ही कुछ लोगों के प्रयास से महिला को बचाया जा सका। 

 अत्यंन्त पिछड़ी जाति की महिला के पति पूना में मजदूरी करते हैं। महिला बूढ़ी सास के एवं अपने बच्चों के साथ रहती है और उसके तीन बच्चे हैं। 

उसे अपना सब काम खुद हीं करना पड़ता है। घटना की खबर सुन कर गांव लौट आए पति ने बताया कि ,इससे गांव के कई लोग इर्ष्या करते थे l 

दिनांक 26 /3/2026 को शाम उसकी पत्नी अपनी बेटी के पास पढ़ाई के लिए ऑनलाइन पेमेंट करवाने के लिए एक ग्रामीण के यहां है थी l 

उसी समय अकेली महिला पुरुष के पास देख कर ग्रामीण लोगों ने इस तरह की घटना को अंजाम दिया। जिसमें मुख्य अभियुक्त यादव ने उसके साथ सार्वजनिक तौर पर उसके निजी अंगों के पकड़ा , मसला और विडियो बनवाया उनके साथ बलात्कार करने की कोशिश की करीब तीस पैंतीस लोगों की भीड़ ने महिला को परेड कराया और महिला के गालियां दी अपमानित,जलील किया गया l मेरी पत्नी का चरित्र हरण कर रहे लोग यदि कोई ऐसी बात होगी तो मैं फैसला करता । 

गांव के असामाजिक तत्व कौन होते हैं? इस तरह की घटना को अंजाम देने की l 

   जब टीम गांव में पहुंची तो कुछ लोग बैठे थे एक चबूतरे पर और इस घटना पर महिला संगठनों, सामाजिक । संगठनों एवं राजनीतिक पार्टियों के आने – जाने पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि इस गाँव जब यज्ञ हुआ तो कोई नहीं दिखाई पड़ा। 

   गांव में कई महिलाएं पुलिस की कार्यशैली पर भी सवाल उठा रहीं थीं कि उन्होंने निर्दोष लोगों को फंसा दिया है। आमतौर पर तो लोग बोलने को तैयार नहीं थे। बहुत कुरेदने पर कोई महिला के चरित्र पर सवाल उठाता तो किसी का कहना था गलत हुआ। ऐसा रहा तो यह किसी के साथ भी हो सकता है।

    टीम जब नूरसराय डीएसपी से मिली तो उनका कहना था कि 13 लोगों को गिरफ्तार किया गया है जिसमें 10 को जेल भेज दिया गया है। के चार्जशीट की तैयारी चल रही है। स्पीडी ट्रायल करके दोषियों को सजा दी जाएगी। केस इंचार्ज दीप्ति कुमारी से भी टीम की मुलाकात हुई। 

     महिला संगठनों ने सरकार से मांग किया कि:- 

 – महिला को शर्मशार करने के हुजूम में शामिल सभी दोषियों को स्पीडी ट्रायल के तहत सजा दें।

– पीड़िता को सुरक्षा की गारंटी करें।

पूरे बिहार में महिला उत्पीड़न की घटनाओं पर अविलंब रोक लगनी चहिए। 

संयुक्त महिला संगठनों की ओर से

‘रजत रानी मीनू’ की कविताओं में स्त्री – रुपक कुमार  

शोध सारांश: क्यों समाज में और देश स्त्री को अभी भी वह जगह नहीं मिली है जिसके वो हकदार हैं? स्त्री और पुरुष दोनों समान रूप से समाज को निर्मित करने में अपना योगदान निभाते हैं लेकिन समाज में पुरुष को तो जगह मिल गया, जिसके वो हकदार वो नहीं भी थे या यूं कहें कि उससे ज्यादा ही मिला लेकिन अभी भी स्त्री को जगह नहीं मिल पाया है। जिसके लिए स्त्रियाँ आज भी संघर्ष कर रही है तथा अपने अस्तित्व और अस्मिता के लिए लड़ रही है। स्त्रियों के साथ भेदभाव की बात कुछ दशक पहले की नहीं बल्कि सदियों से यह चलता आ रहा है। हमारे धर्म-ग्रंथ और शास्त्र में ही भले लिखा गया हो कि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता’ यानी जिस समाज में और परिवार में स्त्रियों का आदर होता है, वहां देवता निवास करते हैं। यह शब्द ही सिर्फ प्यारा है और सुनने में भी मधुर लगता है मगर स्त्री को उस लायक नहीं समझ ही नहीं गया और ना वो स्थान समाज में मिला, जिसके वो हकदार थी।

बीज शब्द: स्त्री, समाज, स्थिति, हालात, पितृसत्ता, भेदभाव, पुरुष, दलित स्त्री। 

ब्राह्मणवादी, मनुवादी, पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था जो स्त्री को हमेशा गुलाम बनाए रखने का काम करता है। मनुस्मृति में जो स्त्री विरोधी बातें लिखी गई है और वो अभी तक समाज में लागू है। मनुस्मृति में लिखा है कि ‘नारी को कभी स्वतंत्र नहीं छोड़ना चाहिए। वह जिस भी अवस्था में हो उसे सदा पुरुषों के संरक्षण में ही रहना चाहिए। मनुस्मृति में यह भी लिखा गया है कि ‘स्त्री अपवित्र है। उसे पढ़ने-लिखने, धन रखने एवं उपनयन का स्त्रियों का अधिकार नहीं है।’ आगे और जब हम बढ़ाते हैं तो वहीं ब्राह्मणवादी मानसिकता से ग्रसित पितृसत्तात्मक समाज के उत्तराधिकारी स्त्री के बारे में लिखते हैं कि “ढोल गंवार शूद्र पशु नारी सकल ताड़ना के अधिकारी।” रामचरितमानस से पता चलता है कि स्त्री की इस ब्राह्मणवादी, मनुवादी, पितृसत्तात्मक समाज में क्या स्थान था। आजादी से पहले तक स्त्रियों की हालत बद से बदतर रही और आज भी स्त्री की स्थिति में अमूल चूल ही सुधार हुई है। 

अक्सर आंखों में इंसान के भीतर की स्थिति यानी उसके भीतर छुपे हुए या समाये हुए दर्द, खुशी आदि सब दिख जाती है। औरत के तमाम दर्दों को उनके तकलीफों को गोरख पांडेय पहचानते हैं और वह लिखते हैं- “ये आँखें हैं तुम्हारी/तकलीफ़ का उमड़ता हुआ समुंदर/इस दुनिया को/जितनी जल्दी हो/बदल देना चाहिए।”1 और समाज और देश में ब्राह्मणवादियों, सामंतवादियों, पितृसत्तात्मक सोच के लोगों को अक्सर यह डर बना हुआ रहता है कि उसका यह वर्चस्ववादी सत्ता जो है या परंपरा ध्वस्त ना हो जाए कहीं बराबरी की ना बात करने लग जाए इसके लिए वह हमेशा उठने वाले विरोध और प्रतिरोध की आवाजों को कुचलने  का काम करता है। उनकी आवाजों को उठाने वाले समता, भाईचारा की आवाजों को उठाने वाले लोगों को वह देशद्रोही या आग भरकाने वाले लोग का उसका प्रतिकार करते हैं। हम देख रहे हैं किस तरह देश में जो भी सत्ता के गलत कानून और नीतियों का विरोध करते हैं उसे या तो जेल में बंद कर देते हैं या उसका मोबलिंचिंग करके हत्या कर दी जाती है या उसे अलग-अलग यातनाएं दी जाती है।  इसी को जब महिलाओं, दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों के हक और अधिकार की आवाजों को जब बुलंद कर रहे होते हैं तो उसे कुचलने का काम करता है, आग भड़काने का आरोप लगता है, झूठ बोलने या झूठ फैलाने का आरोप लगाया जाता है। जिसे गोरख पांडेय इस तरह से दर्ज करते हैं- “हजार साल पुराना है उनका गुस्सा/हजार साल पुरानी है उनकी नफरत/मैं तो सिर्फ/उनके बिखरे हुए शब्दों को/लय और तुक के साथ/लौटा रहा हूँ/मगर तुम्हें डर है कि/आग भड़का रहा हूँ।”2 

समाज में पुरुषों और महिलाओं की बराबर आबादी है और समाज और देश के विकास में दोनों की समान भागीदारी भी है, फिर भी कुछ वर्चस्ववादी, ब्राह्मणवादी, सामंतवादी एवं पितृसत्तात्मक विचार के लोग खासकर औरत के हक को छीनकर वह अपने नाम कर लिया है। समाज में पितृसत्तात्मक सोच ने महिलाओं के जन्म के पहले से लेकर मृत्यु के बाद तक उसका हर एक रूप में शोषण किया है। इस घिनौना पितृसत्तात्मक सोच समाज में किस तरह से स्थापित हुआ, जिसे जनवादी कवि रामाशंकर यादव विद्रोही इस तरह से दर्ज करते हैं- 

“इतिहास में पहली स्त्री हत्या

उसके बेटे ने अपने बाप के कहने पर की

जमदग्नि ने कहा, ओ परशुराम !

मैं तुमसे कहता हूँ कि अपनी माँ का वध कर दो

और परशुराम ने कर दिया

इस तरह पुत्र, पिता का हुआ

और पितृसत्ता आई।”3

ब्राह्मणवादी, वर्णाश्रम और पितृसत्तात्मक व्यवस्था आजादी के पचहत्तर वर्ष बाद भी समाज में कायम है। इस व्यवस्था में आछूतों, दलितों, स्त्रियों आदि की हालत बद से बदतर रहा है और अभी भी है। इस व्यवस्था में इसको हमेशा से अछूत ही समझा गया और इनके साथ दुर्व्यवहार ही किया गया। इस घनघोर अमानवीय ब्राह्मणवादी व्यवस्था में दलित स्त्रियों को ‘स्तन कर’ भी चुकाना पड़ा है। इस व्यवस्था में इंसान को इंसान नहीं समझा, हमेशा इनके साथ भेदभाव किया। स्त्रियों में भी अधिक दलित स्त्रियों को जहालत झेलनी पड़ी। स्त्रियों के जीवन में सुधार लाने के ज्योतिबा फुले सावित्री बाई फुले फातिमा शेख, इशवेरचन्द्र विद्यासागर, पेरियार आदि ने कठिन संघर्ष किए। ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले को इस प्रयास में अत्यधिक संघर्ष करना पड़ा और जहालत झेलनी पड़ी। कठिन संघर्ष और बलिदानों के बावजूद देश आजाद हुआ और बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने बहुत कठिन प्रयास एवं संघर्षों के बाद संविधान लागू हुआ एवं सभी को समान स्थान दिया गया। जब संविधान में संवैधानिक रूप से समान अधिकार मिलने के बावजूद भी समाज में आज आजादी के दशकों के बाद भी पूरी तरह सुधार नहीं हो पाया है। देश के आजादी के पहले जिस प्रकार स्त्रियों पर अत्याचार होता था उस प्रकार से तो नहीं मगर पुरुष मानसिकता से यह स्त्री आज भी प्रताड़ित हो रही है। महापुरुषों के बलिदानों और संघर्षों के बावजूद भी महिलाओं की स्थिति में मामूली सुधार हुआ है। 

रजत रानी मीनू कविता संग्रह ‘पिता भी होते हैं मां’ पुस्तक की भूमिका में लिखती है “मैं जब देश के उसे सामाजिक हिस्से से आती हूँ जिसे सहने को  समुद्र भर संताप है और कहने को बूंद भर अवसर नहीं। स्त्री के हक में आधी आबादी की बात की जाती है, पर इस आदि में वें कौन है जो मेरे जैसियों को हिस्से का बोल जाती हैं। मेरी काया में प्रवेश कर मुझसे बहनापा बनाती है? पर क्या वे सुविधाभोगी, मेरी गैरदलित बहनें स्त्री-मुक्ति की उपलब्धियां मेरे साथ साझा कर पाती हैं? जाहिर है नहीं।”4 ब्राह्मणवादी व्यवस्था में सदियों से दलित स्त्री ही नहीं बल्कि दलित पुरुष भी अपने मूलभूत अधिकारों से वंचित रहे हैं और सामाजिक गुलाम बनर रहे। यह सब कैसे हुआ और किस वजह से हुआ इसका सबसके बड़ा कारण जाहिर है कि इनलोगों को शिक्षा और सम्पत्ति और सामाजिक व्यवस्था से बेदखल रखा। अशिक्षा, निर्धनता, भेदभाव, सामाजिक अस्पृश्यताएं आदि दलितों के साथ बहुत बड़ी समस्याएं हैं। 

समाज में पितृसत्तात्मक व्यववस्था ने पुरुषों एवं महिलाओं को कभी भी बराबरी या समानता के लायक नहीं समझा, इस व्यवस्था में खुद को ही उच्चतर बताया। महात्मा ज्योतिबा फुले कहते हैं ‘स्त्री और पुरुष जन्म से ही स्वतंत्र है इसलिए दोनों को सभी समाज सभी अधिकार समान रूप से भोगने का अवसर प्रदान होना चाहिए’ और डॉक्टर अंबेडकर कहते हैं ‘किसी भी समुदाय को की प्रगति को उसे समाज की महिलाओं की प्रगति से मापा जा सकता है।’ स्त्री की मुक्ति के लिए शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण है और यही एकमात्र हथियार भी डॉक्टर अंबेडकर जी कहते हैं ‘शिक्षा व श्रेणी का दूध है जो जितना पिएगा वह उतना दहरेगा।’ इसी पुस्तक की भूमिका में मीनू  जी लिखती है कि “पितृसत्ता से अधिक जाति व्यवस्था से उपजी गरीबी, अधिकारहीनता, अशिक्षा, बेरोजगारी, आवासहीनता जैसे अभावों से जूझते हुए जीवन गुजारती हैं। इसलिए यह स्पष्ट दिखाई देता है कि दलित स्त्री समस्याएं गैर-दलित स्त्री की अपेक्षा बहुपरतीय और अलग हैं। इसलिए उनकी मुक्ति के प्रश्न भी अलग समाधानों की मांग करते हैं।”5  

मीनू जी अपनी माँ को याद करते हैं और अपनी मां को पिता के भीतर देखते है यानी पिता को मां की जगह पाती हैं। उनके पिता माँ के द्वारा किया जाने हर कार्य को करते है क्योंकि उनकी माँ की मृत्यु बचपन मे ही हो जाती है। मीनू जी के जीवन में मां की भूमिका के उनके पिता निर्वहन कर रहे हैं। मीनू जी लिखतीं हैं कि 

“मैंने पापा की, आंखों में देखा

अपनी मां का चेहरा

पापा मन हो ही होते हैं

ऐसा महसूस, मां गुजर जाती है

अक्षर सिखाते-सिखाते

और पापा ले लेते हैं, मां की जगह

जो दुख की जगह भी है।”

रजत रानी मीनू दलित छात्राओं के साथ सामूहिक बलात्कार हुए और उनकी पीड़ा को दर्ज करते हैं। अभिजात स्वर्ण छात्रा के साथ बलात्कार होने पर पूरा सांसद और महिला आयोग चीखने लगते हैं। उसके लिए सजा में मौत मांगते हैं, वहीं दलित बालिकाओं के साथ जब बलात्कार होने पर सब चुप रह जाते हैं एवं सिर्फ आंखों से देखते तथा सुनते रहते हैं। अपने मुंह से कुछ नहीं बोलता है वो  गुलामों की भांति में चुप रहती है। मीनू लिखती है-  

“हमारे साथ जब होता है बलात्कार

सामूहिक बलात्कार –

तब क्यों हिलता नहीं पत्ता एक भी?

और जब तुम्हारे साथ हुआ बलात्कार

तब क्यों हिल गयी संसद भी ?

चीख उठीं महिला सांसद बलात्कार के खिलाफ

क्यों उड़ गयी ‘महिला आयोग’ की चैन की नींद ?

आज क्यों उठी बलात्कारियों को

सजा-ए-मौत की माँग, कल क्यों मौन थीं तुम?”

मीनू दलित स्त्री और अभिजात स्वर्ण स्त्री के अंतर को पहचान कर उसे दर्ज करती है। भारतीय समाज में दोनों वर्णों के स्त्री का अलग सनगरक्ष संघर्ष है और दोनों में धरती और आसमान की अंतर है। समाज में दोनों महिलाओं की सामाजिक अंतर हम साफ रूप से देख सकते हैं कि कैसे स्त्री के साथ घिनौना घटना जो बलात्कार हो रहा है अंतर सिर्फ वर्ण की है जिसमें एक दलित परिवार से आती है और एक स्वर्ण परिवार से आती है। समाज में एक स्वर्ण लड़कियों के साथ बलात्कार होने पर पूरा समाज और देश न्याय के उमड़ जाता है वहीं दलित लड़कियों के साथ बलात्कार होने पर उसे छुपा दिया जाता है या दबा दिया जाता है, साथ दलित परिवार को धमकाकर चुप कर दिया जाता हैं। दलित लड़की के साथ बलात्कार होने की घटना पर हिन्दी के मशहूर शायर और जनवादी कवि अदम गोंदवी लिखते है- 

“आइए महसूस करिए ज़िंदगी के ताप को

मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

*****

कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें

और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें

******

गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही

या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही

हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए

बेचती है जिस्म कितनी कृष्णा रोटी के लिए!”

अदम गोंदवी नव इस गजल समाज के हकीकत के साथ पुलिस प्रशासन की दलितों और स्वर्णों के प्रति व्यवहार को उजागर कर रख देते है। मीनू वहीं जब दलित लड़कियों के साथ जब बलात्कार होता है तब समाज और देश का क्या व्यवहार होता। जो लोग यानी बोलने वाले चुप हो जाते है मुक होकर सिर्फ देखते रहते है। जो स्वर्ण लड़कियों के साथ हुए बलात्कार पर कैन्डल मार्च निकलते है मगर दलित लड़कियों के बलात्कार पर चुप रह जाते है जिसे मीनू पहचान करती है इसके दोहरी नीति को और उसे अपनी रचनाओं मे दर्ज इस तरह से करती है- 

“जब मेरे साथ हो रहा था बलात्कार/सामूहिक बलात्कार

कारण मालूम है मुझे

क्योंकि तुम हो अभिजात स्वर्ण

और मैं ठहरी दलित

यदि हजारों बालाओं के साथ

किये जा रहे बलात्कारों पर

तुम खामोश नहीं रही होतीं

तो तुम्हारे बोलने से मिल जाता मेरी आवाज को

थोड़ा संबल/और आज तुम्हारी बच्ची के साथ

भी नहीं होता बलात्कार”

इन पंक्तियों के माध्यम से मीनू जी ने दलित और स्वर्ण स्त्रियों के बीच भेदभाव की मानसिकता, विचार एवं संघर्ष को दिखाया है। समाज में स्वर्ण और दलित स्त्रियों के जीवन यापन और जीवन जीने में तमाम अंतर को उजागर करती  है और स्त्री होने के बावजूद भी दोनों का जीवन एक समान नहीं है।

समाज में दलित बालिकाओं की इच्छाओं, सपनों और जाति दंश का शिकार सदियों से आज तक हो रहें हैं। इनके साथ खासकर लड़कियों की चुनौती  को देखते हैं तो  वह घर से बाहर तक निरंतर संघर्ष करती है और उनके साथ मुशीबतों का लगातार हमला होते राहत है। दलित लड़कियां एक घर में पितृसत्ता से लड़ती है और जब मुक्ति के लिए एवं शिक्षा के जब स्कूल जाति है तो वहाँ भी उन मुसीबतों का सामना करना पद रहा है। जो सदियों से शिक्षा पर जिसने या जिस विचारधारा ने कब्जा जमाए हुए है वो आज भी अपने कब्जा मे रखा है एवं रखना चाहता है जिसके लिए आने वाले पिछड़े और दलित लोगों के साथ निरंतर अपना शिकार बना रहा है। दलितों के साथ स्वर्ण शिक्षिका उसे गाली देती है और उसे जलील करती है तथा उसे जाति का नाम लेकर उसे गाली देती है। एक दलित लड़की सोचती है कि उसका क्या दोष है जो उनके साथ ये घिनौना भेदभाव कर रही है जिसे वह समझ नहीं पाती है और वह उदास बाथकर सोचती है कि काश कोई उसे सुनता कि वह भी पढ़ना चाहती है एवं आगे बढ़ना चाहती है। दलित लड़कियों के होने वाले स्कूल में भेदभाव को उजागर मीनू अपनी कविताओं में उजागर करती है- 

“एक दलित बाल, बैठी उदास

कक्ष मेरी भी, कोई सुनता

मैं भी पढ़ना चाहती हूँ आगे बढ़ना चाहती हूँ

मगर- मेरी स्वर्ण शिक्षिका ने

लिख दिया था मेरे माथे पर

काली स्याही से ‘तू चमारी है’

तू नहीं पढ़ सकती

तमाशा बनी थी मैं, उसे दिन।”10 

मीनू अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की उपलक्ष पर समाज और देश में विभिन्न प्रकार की औरतों को पहचान कर उसे अपनी कविता में दर्ज करती है। समाज अधिकार या सघनता से देखें तो दो प्रकार की स्त्रियाँ दिखाई देती है एक वो जो शिक्षित है और अपने अधिकार के बारें में जानती है और दूसरी प्रकार की वो स्त्री है जो सदियों से अपने अधिकार के बारें में जानती ही नहीं है वो सदियों से उसी गुलामी को जीती हुई आती है जिनके लिए अधिकार शब्द से भी अनभिज्ञ है उनका क्या होता होगा उनको कब मुक्ति मिलेगी। हर साल महिला दिवस कुछ महिलायें एकजुट होतीं है और इसको बढ़िया से जश्न मानती है और बहुसंख्यक स्त्रियां नहीं जानती कि उसे उनके समाधान का कोई एक दिन भी होता है उनकी हर तोड़ मेहनत का कोई मूल्य देता है तथा जिनको अपने अधिकार के बारें में जानकारी है ही नहीं। मीनू इस घटनाओं को इस परकर दर्ज करती है- 

वे नहीं जानतीं, किसे कहते हैं, अधिकार?

कैसी होती है-नारी मुक्ति ? उन्हें नहीं पता,

कहाँ, किसके पास, रहते हैं उनके अधिकार?

पाये नहीं, देखे नहीं।

और जिनकी, सुनती है सरकार जो हैं चैनलों,

अखबारों की सम्पादक, जज और प्रोफेसर,

वाइसचांसलर, सांसद और मिनिस्टर जो पाती हैं

विदेशी यात्राओं के टिकट, और मोटी पगार जो- जानती हैं

अपने अधिकार, क्या वे जानती हैं?

उन स्त्रियों के बारे में, जो नहीं जानतीं अपने अधिकार ।

जिनके लिए पैंसठ बार आया यह

प्रकाशमान दिन, किंचित भी कम नहीं कर सका

अंधकार, अंधकार, अंधकार॥”11  

बीसवीं सदी में बहुसंख्यक स्त्रियाँ आज भी अपने हक और अधिकार नहीं जान पाई है। इनका जीवन में अंधकारमय है जो अपने हक और अधिकार से अनभिज्ञ है यानी कोसों दूर हैं तथा इनके लिए अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अनसुना शब्द है, अनसुना, अनजान सा दिन है। 

माँ तो मां होती है। माँ किसी खास दिन के मोहताज नहीं रहती है उनका हर दिन खास दिन ही होता हैं। वो हमेशा अपने बच्चों पर ममता लुटाती है। प्यार करती है। जिसे किसी एक दिन खास दिन मन कर उसे मनाया जाए मां के लिए हर दिन एक जैसा ही होता है। कुछ लोग मदर्स डे को मनाने की दिखावा करते है इस दिन बहुत माँ के प्रति प्यार दिखाता है और बकीं बाकी दिन इनका दुर्गति करता है। इन्हीं विषयों को मीनू कविता में दर्ज करती है-

“पर- माँ तो माँ, होती है-

सारे जहान की, एक सी।

जो किसी डे की, मोहताज नहीं।

उसका आँचल, होता है-

हमेशा अपने, बच्चों के लिए,

हर पल, हर दिन

ममता से लबालब।

नामी-गिरामी लोगों के

फोटो और बयानों से भरे होते हैं”12   

समाज का और देश के प्रगतिशील का जो भी ढिंग पीट रहा है उसके सच्चाई को बयां करती है। आज राजनीति पार्टी के लोग अपने शशन साशन कल काल को विकसित बताने का कोशिश करता है बाकी पीछे हुए विकास को नकार देता है और अपने समाज समय के कमजोरी या कामों को देख नहीं पाता है और आलोचना तो बिल्कुल भी सुनना पसंद नहीं करता है। विषवगुरु बनने की होड में समाज और देश के जिश हिस्से को विकास पर ध्यान देना है उसपर नहीं देता है बल्कि अपनी कमी या कमजोरी को छूओने की कोशिश करती है। देश का सही विकास यानी यथार्थ को एक कवि या साहित्यकार अपनी राचानों के माध्यम से देश के सामने लाने का काम करता है। ठीक उसी प्रकार मीनू महत्वपूर्ण मुद्दों को अपनी रचनों के माध्यम से समाज और पाठकों के सामने रखती है। स्त्रियों की हकीकत को दर्ज करती है। उन मुद्दों और सवालों को सामने रखती है जो प्रासंगिक भी है जिसपर काम करना चाहिए जिसे नहीं कर पाया है या यूं कहे इस मुद्दे पर ध्यान भी नहीं देते है। जो इस शिक्षित और स्वर्ण नहीं है तथा वह सलीके से नहीं रहती है जो समाज की शैली के अर्थ तय किया है। समाज में कोई नहीं उसका और उसका कोई खानदान भी नहीं है इसलिए इसकी ऐसी हालात है। इसका इस दुनिया में कोई नहीं है, जिसके वजह से यह अपना जीवन लावारिस की तरह जीती है। इसको पहचान कर मीनू लिखती है- 

वह सड़क किनारे बैठी-

बस से ऑटो से उतरती चढ़ती

सवारियों से बेखबर।

फटी पुराने बोरी में

रखती तुड़े- मुड़े कागज- गत्ते को सलीके से

****

वह स्त्री मैले कुचले कपड़ों में?

क्यों सूख रहे थे उसके गाल ?

क्यों बिखर रहे थे उसके बाल?

क्यों दिख रही थी वह बेहाल?

******

यदि वह स्वर्ण होती

तो क्या हुआ अपढ़ होती?

यदि वह पढ़ी-लिखी, होती तो

क्या यही होता? उसका हाल”13 

इक्कीसवीं सदी में खासकर गरीब महिलाओं के साथ गाँव ही नहीं, निजी अस्पताल में ही नहीं सरकारी अस्पताल में भी देखने वाला कोई नहीं नहीं होता है ध्यान भी कोई नहीं देता है। यहाँ लोकतंत्र की धज्जियां उदय देता है नेता,  डॉक्टर, पुलिस प्रसासन आदि। बलात्कार की शिकार दलित स्त्री की चीख किसी को सुनाई नहीं देती है। एक गर्भवती दलित महिला प्रसव की कराहती रही और  सड़क पर ही अपनी बच्चा को जन्म देती है कोई कुछ नहीं करता है बल्कि सिर्फ देखता रहता है। ऐसे ही कई महिलाओं की जान भी चली जाती है। मीनू इस तरह दर्ज करती है- 

“सुनाई देती है, अगली चीख, 

सामूहिक बलात्कार की,

शिकार दलित स्त्री की, सुनाई देती है चीख

एक गर्भवती दलित महिला की

प्रसव से कराहती, सड़क पर जनती बच्चे को

उफ् दम तोड़ती, अस्पताल के बाहर स्त्री को चीख।”14 

इस कविता के माध्यम से मीनू दर्ज की है कि कैसे वर्णाश्रम एवं सामंती  व्यवस्था में गरीबी और जाति की वजह से आदमी आदमी नहीं जानवर जैसा व्यवहार किया जाता है। समाज और देश में पितृसत्ता के पोषक पुरुषों पर सवाल खड़ा करती है साथ ही व्यवस्था को भी कटघरे में भी खड़ा करती है। स्त्री दम तोड़ती है और तोड़ने को मजबूर किया जाता है। इस बाजरवाद ने गरीबों का जिन दुर्भर कर दिया है और यह घटना सत्य को भी उजागर करती है।

निष्कर्ष: रजत रानी मीनू इस समाज में इतिहास से लेकर वर्तमान में हो रहे रोज घटनाओं से रूबरू होती है और पाठकों को रूबरू कराती है। अखबारों से, समाचार पत्रों से और अपने आसपास होने वाले घटनाओं को देखती है। दलित महिलाओं के साथ होने वाले घटनाओं,  अत्याचारों, बलात्कारों, शोषण आदि तमाम रूपों उजागर करती है। समाज में शोषण के जितने भी रूप हैं उस सभी को देखती हैं और उसे महसूस करती है, उसे अपनी कविताओं में दर्द कर  ती है और वो एक  जागरूक और जिंदा मनुष्य होने का प्रमाण देती है। मानव दिलों को मिलाने और मानव की भीतर प्रेम की ज्योति जगाने की कोशिश करती है।

संदर्भ सूची:-

  1. गोरख पांडेय, गोरख पांडेय समग्र कविताएं, सांस्कृतिक संकुल, इलाहाबाद, 2023, पृष्ठ 20
  2. वही पृष्ठ 21
  3. रामाशंकर यादव विद्रोही नई खेती नवरंग प्रकाशन गाजियाबाद 2018 पृष्ठ 51 52
  4. पिता भी होते हैं माँ, रजत रानी मीनू, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली,2015  भूमिका, पृष्ठ सं 08
  5. वही, पृष्ठ सं 10
  6. पिता भी होते हैं माँ, रजत रानी मीनू, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2015  पृष्ठ सं 30
  7. वही, पृष्ठ सं 39 
  8. धरती की सतह पर, अदम गोंडवी, सं ओम निश्चल, सर्वभाषा प्रकाशन, 2023, पृष्ठ सं 102
  9. पिता भी होते हैं माँ, रजत रानी मीनू, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2015  पृष्ठ सं 39-40 
  10. वही, पृष्ठ सं 45 
  11. वही, पृष्ठ सं 52  
  12. वही, पृष्ठ सं 55 
  13. वही, पृष्ठ सं 59,60 
  14. वही, पृष्ठ सं 75 

रुपक कुमार   शोधार्थी, हिन्दी विभाग  ल. ना. मिथिला विश्वविद्यालय दरभंगा 

मो नं 9709771436  ईमेल-  kumarrupak993@gmail.com 

नीतिशा खलखो की कविताएं

अकादमिक हत्या की गूंज

———/—————/————-

 सहसा ; कौंधता है मेरा वह वजूद

जो मैंने पाया

छोटे शहर से बाहर जब निकली थी तो लगता था

सहज होगा हर कुछ

पर शिक्षा के मंदिर के द्वार

जब राजधानी में खटखटाए

 तो वेलकम वार्म नहीं हुआ था

चिकुटी काट जगाया गया था

कि लड़की हो

शरीर  सहेजना होगा

भाषा में इतनी मिठास और धैर्य ?

यह  कहाँ से पाया है,

 उसे भी खोना होगा?

सबके प्रति संवेदना ऐसे बाँटे फिर रही

जैसे हो कोई मुफ़्त की चीज़

ओह प्लीज़

अपने यूटोपिया को

अपने घनेरे जंगल के संस्कारों में छोड़ आओ ।

यहाँ प्रतिस्पर्द्धा  करनी होगी

दौड़ना, हाँफना होगा बहुत।

चलने होंगे कई कई चाल

‘फिटेस्ट की थ्योरी’ जो है केंद्र में ।।

एक मायावी दुनिया से

मेरा हुआ था पहला पहला परिचय

अपने आदिवासियत पर गुमान को

लोग मद्धिम मद्धिम ही सही

लेकिन मुझे प्रतिक्षण  बदल रहे थे।

ख़्वाब था  –

घर से बाहर कुछ बड़ा सीखा जाएगा

पर

मालूम कहाँ था यह द्रोणाचार्यों की नगरी है

प्रतिपल कोई ना कोई

कुछ लूटकर ही जाएगा

कुछ अपने भी भेष बदले आयेंगे

कोई कुछ लूट रहा होगा, कोई कुछ।

पर लूटेंगे सब।।

कुछ को मेरी असहमतियों से दिक़्क़त है,

कुछ को मेरे भोलेपन से।

वह सब लूट लेना जानते हैं।

मुझे भी

और

 मेरी सामर्थ्यता को भी

मेरे सपनों सहित मुझे लूटा गया।।

मैं कुछ नहीं हूँ,

यह मुझे बताया गया ।

और जो बता रहा था

 वह ख़ुद क्या है

 वह आज सब कोई बतिया रहा  है।।

बस कुर्सी और सत्ता के डर से

कुछ निज  हित में

कुछ बहुत हासिल कर लेने के उद्देश्य से,

वो चापलूस  बन चुप्पी साधते हैं।

  वो रीढ़ विहीन

और  मृत्प्राय  तक हो जाते हैं ।

अकादमिक हत्या का सिलसिला

यह नया

या

मात्र मेरे तक नहीं है

ऐसी कई हत्याएँ मेरे पुरखा, पुरखिनों ने  झेले हैं।

मेरे समकालीनों ने  झेले हैं

और

ना जाने

कितनी पीढ़ियाँ इसे झेलेंगी।

एकलव्य और द्रोणाचार्य की संस्कृति

हर बार मिथकिय कह

दोहराई जाएगी ।

चुप्पी और सर्वश्व देने का भाव

तब भी एकलव्य के पास था

और आज भी वही भाव

एकलव्य ने

अपनी पीढ़ियों को सुपुर्द की है ।।

पर मन  अब मानता नहीं

उसने भूत

और आज तक को तो स्वीकारा  है

पर घुटन,

संत्राश ने बदले हैं

मेरे अंदर का जैव तत्व ।

भावी पीढ़ियों द्वारा यह हत्याएँ

अब  ना होने दी जायेंगीं ।

वह जूझेंगी –

प्रतिरोध करेंगी –

प्रतिशोध भी लेंगी –

पर बावजूद इसके

सृजन को ही बोयेंगी ।।

उन अमानवीय द्रोणाचार्यों के

मन मस्तिष्क  और चेतना में

कुहरेंगे वो

अपनी मृत्युसैया  में।

जब इन अकादमिक हत्याओं की चीखें

इन्हें चित्कारने तक का मौक़ा नहीं देंगीं।।

जलता है –

धधकता है –

अंदर ही अंदर

 वह प्रयास हत्या के

मीठे ज़हरों से सराबोर होती देह पर

 असंख्य विषैले साँपों के झुंड में

लिपटी पाती हूँ

अपनी सीखने की अभिलाषा को।।

दम तोड़ते ,

उखड़ती साँसों के बीच भी

एक जिजीविषा रहती है

कि  

अब माफ़ करने का समय

चाह  कर भी नहीं रह गया।।

बदलना होगा ही

अपने हथियार

इन हत्याओं के ख़िलाफ़ –

क्योंकि

मेरा होना

अब जज्ब  करना होगा ही तुम्हें

अवतार और परम ज्ञान में लिपटे

 तुम्हारी अर्द्ध नंगी  सोच को

समझ लिया है मैंने।

मैं मज़बूत रही ना रही,

मेरी भावी संततियाँ

मेरे लेखन को औज़ार बना तुमसे जूझेंगी

खेल शुरू किया तुमने था

 ख़त्म करना हमें है।

 हिंसा ; शायद तुम्हारी तरह

वे नहीं करेंगी

जैसा अब तक तुम करते आये हो ।

वह बदलेगी अपने उपक्रम –

और धराशायी होगी  तुम्हारी सांस्कृतिक धरोहर

सर्वश्रेष्ठ होने का भाव बोध भी होगा तार-तार

लो अब तुम्हें  बिखरना  ही पड़ेगा बार-बार

हर बार।।

युद्ध होंगे नहीं

लहू गिरेगा नहीं

पर

तू अचेत बन

परास्त शून्य में ताकते

अपने अहम को धिक्कारते

तजोगे जान ।

और  याद रखना

वह जान भी तुमसे दूरी ना बना पाएगा ।

वह मथेगा तुम्हारे कृत्य

तुम्हारे सामने

और तुम सिसकोगे उतना

जितना मेरे पुरखिन  और पुरखा सिसके थे।।

हत्या का बोझ

ना आदमी को जीने देता है

ना ही मरने ।।

जैसे तुमने कहा था ना –

“ना उगला जा रहा है;  

ना ही निगला जा रहा”

वही बात

तुम्हें तुम्हारे अंत समय तक

“ना जान छोड़ा जा रहा है

 ना ही जान को जिया जा रहा है।।“

वाले पायदान पर

तुम्हें तुम्हारे कृत्य याद दिलवायेगी।।

रघुवीर सहाय के भी ‘रामदास’ को पता था

कि

 उसकी हत्या होगी

वह उदास भी था

लेकिन यहाँ की आदिवासी पात्र

को पता तक ना था

  कि उसकी हत्या होगी ।।

वह भी अकादमिक हत्या ।।

इतनी तो जघन्यता से बच जाते ना तुम अकर्मणा ।।।

2.एक शोर है सभ्यताओं के पास

———/—————/————-

एक शोर है सभ्यताओं के पास—
इतना घना
कि वह सुन ही नहीं पाता
वे धीमी, महीन आवाज़ें
जो प्रकृति
हमसे करना चाहती है।

हम उलझे हुए हैं
कुछ नाकाम-से कामों में;
जबकि वही
हमारी असली ‘हीलर’ है।
फिर भी
उसे भुलाकर
न जाने किस जंग में
जलते जा रहे हैं हम।

 प्राकृतिक आपदाएँ
अब उतनी स्वाभाविक नहीं रहीं;
बल्कि आज हम
मानव-निर्मित आपदाओं से
लगातार जूझ रहे हैं।

न कोई सब्र,
न प्रेम,
न बंधुत्व—
बस एक अंधी होड़
सत्ता और शक्ति को
मुट्ठी में बंद रखने की।

जबकि
कितना सरल है
ज़िंदगी को जीना
यदि वह श्रम पर आधारित हो।

प्रकृति में बिखरी खुशियाँ समेटना—
जैसे हर नए दिन
फूलों का खिलना,
और हर रात
चुपके से झर जाना
महुआ के मदमाते फूलों का,
किसी के हिस्से का हो जाना—
टोकरी में बंद
या थाली में परोसा जाना।

क्योंकि प्रकृति
स्वयं उपभोक्ता नहीं होती।
वह बनी ही है
किसी ‘और’ को देने के लिए,
और किसी ‘और’ से कुछ लेकर
जीने के लिए।

पेड़ों को देखिए—
फल-फूल सब ढोते हैं
अपनी देह पर,
पर उनका उपयोग
दूसरों के लिए होता है।

मेरे बाग के फूलों का रस
कितनी मक्खियाँ, मधुमक्खियाँ
धीरे-धीरे चुनती हैं—
हौले से,
बिना उसे सुखाए,
बिना उसे मुरझाए।

मेरे पेड़ों के आम, कटहल, पपीते
खाते हैं असंख्य चिड़ियाँ,
गिलहरियाँ,
और छोटे-छोटे जीव भी।

पेड़ की ऊँचाइयों को देखिए—
जहाँ ज़मीन पर चलने वाली
चींटियाँ, कीड़े-मकोड़े
नहीं पहुँच पाते,
वहाँ से वह पेड़
खुद गिरा देता है
अपने फलों का एक हिस्सा
उनके लिए।

बाँटना
हम इनसे क्यों नहीं सीखते?

संग्रह करना
मनुष्य ने अपनी प्रवृत्ति बना ली है,
पर देना—
कितना सुकून देता है,
यह प्रकृति
हमें बार-बार सिखाती रही है।

नदियाँ भी
अपना सारा पानी
खुद नहीं पी जातीं,
न समुद्र
अपने भीतर का
सारा विस्तार।

जल के हर स्थल में
जीवन बसता है—
केकड़े, मछलियाँ, साँप
और न जाने कितने जीव।

वे नहीं माँगते किराया,
न कोई कर।

फिर मनुष्य ने
कहाँ से सीखा
यह लेन-देन,
यह संग्रह,
यह अनैतिक व्यवहार?

सुना है—
प्रकृति की जड़ें भी
अपने आसपास की जड़ों का
ख़याल रखती हैं।

उनके सुख-दुख में
भागीदार बनती हैं,
संसाधन बाँटती हैं,
बीमारी में
उन्हें जिलाने की कोशिश करती हैं।

उन्हें चिंता होती है
हर एक के अस्तित्व की।

फिर हमने
यह धूर्तता
कहाँ से सीख ली?

कैसे भूल गए हम
कि हमारा अस्तित्व भी
संभव नहीं
प्रकृति के इन तत्वों के बिना।

हम पूजते भी हैं
और उजाड़ते भी हैं।

पेड़ पूजते हैं—
जंगल काटते हैं।
नदी पूजते हैं—
उसमें कूड़ा डालते हैं।
पहाड़ पूजते हैं—
उसे उजाड़ देते हैं।
भूमि पूजते हैं—
और उसी को खोद डालते हैं।

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की बात करते हैं
और हर दिन
अपने पड़ोसियों को 
रेत डालते हैं।

‘विभिन्नता में एकता’ पर लेख लिखते हैं,
और अपने से भिन्न संस्कृति पर
मॉब बनकर
लिंचिंग तक कर डालते हैं।

पढ़ती हुई बच्चियों पर
बमबारी करते हुए
चल पड़ते हैं
मंगल और चंद्रमा पर
जीवन खोजने।

जो जीवन
इस धरा ने दिया है,
उसकी कद्र
हमसे हुई ही नहीं।

तो अन्य ग्रहों से
क्या भाईचारा
और बहनापा
उम्मीद करेंगे हम?

बल्कि
इस धरती को ही
नरक बनाने पर
सवाल होने चाहिए।

अन्य ग्रहों को
नष्ट करने की कोशिश भी
नहीं होनी चाहिए।

मनुष्य को
अपने अस्तित्व पर
थोड़ा कम गुमान करके
 उसे ठहरना चाहिए।

बहुत कम जाना है हमने
प्रकृति को।

इतना इतराना
नेस्तनाबूद होने की ओर
बढ़ना है।

जिए तो डायनासोर भी थे
इसी धरती पर—
वे अपनी बृहत् काया पर इतराए थे,
और तुम
अपने मस्तिष्क पर इतराते हो।

आओ—
इन पक्षियों की बोलियों पर ठहरें,
गिलहरी की चंचलता से
मोहित हो जाएँ।

हत्याओं और संहारों का आयोजन रुके,
और कुछ नया रचा जाए।

ग्रंथ—
वह भी धार्मिक नहीं,
न ही वर्चस्व की संस्कृतियाँ।

बस सहेजा जाए
प्रेम और सहअस्तित्व—
चर और अचर के साथ।
इस संपूर्ण धरातल के साथ।।
दसों दिशाओं के साथ।।।
और उसमें बसे
हर एक कण-कण के साथ।

एक अंतहीन अनंत उत्पत्ति के विस्तार के साथ।।

3.हिन्द रज़ब

———/—————/————-

तुमने पुकारा था
उस इंसानी क़ौम को,
जिसकी गोद में
तुमने जन्म लिया था

तुम आई थीं इस दुनिया में
दो मासूम अनुभूतियों के साथ—
एक,
अपनी तकलीफ़ को
रोकर कह देना,

और दूसरी—
इस सृष्टि की सुंदरता पर ठहरकर
साँसों की लय में
धीरे से मुस्का  देना।

पर एक तीसरी अनुभूति—
जो तुम्हारी उम्र की थी ही नहीं —
हमने ही बो दी तुम्हारे भीतर वह :
डर…
ख़ौफ़…

और इसके लिए—
हम हमेशा
शर्मिंदा रहेंगे।

भी तो तुम्हें
जीवन के  अनगिनत रंगों से गुजरना था,
अनुभूतियों के आकाश में
उड़ना था,

पर तुम्हारे हिस्से जो आया वह धूसर था,

मटमैला था,

खून से लथपथ वीभत्स था।

पर हमने—
अपनी अंधी आस्थाओं में—

धार्मिक उन्माद में

सत्ता शक्ति की भूख में
तुम्हारी काँपती हुई आवाज़ तक को
अनसुना कर दिया।

वह आवाज़,
जो कह रही थी—
एक नन्हीं-सी जान
डर रही है।

एक बंद कार में,
अपने ही अपनों की निस्तब्ध चेतानहीन  हो चुके

लहू में भीगे देहों के बीच,
तुम सिमट गई थीं
एक कॉल में—

समेट रही थी तुम अपना अस्तित्व भी

और भय से लिपटकर
बस इतना ही कह पाईं—

“मुझे यहाँ से ले जाओ ना…”

तुम्हारे चारों ओर
मौत का शोर था—
टैंकों की गड़गड़ाहट,
गोलियों की बरसात,
और हर दिशा में
विनाश का फैलता अंधकार—

जिसमें तुम्हें भी
समा जाना था

ना जाने अब

और तब ।

पर तुम्हारी वह निरीह पुकार—
मानवता के नाम—
समय की दीवारों पर
हमेशा गूँजती रहेगी।

वह आवाज़
हमारी चेतना में
काँटे की तरह चुभेगी,

और हमें हमारे ‘मानव’ होने पर
एक अंतहीन प्रश्न बनकर
ठहरी रहेगी।

कितना रोया होगा
यह आकाश, धरा, वायु  भी—
तुम्हारी हर एक जीने की पुकार के साथ!

अगर यह कोई प्राकृतिक अंत होता,
तो शायद
सब्र होता…

पर यह—
हमारी ही रची हुई
एक नृशंस कहानी थी,

जहाँ पहले से तय था
कि तुम्हारी साँसें छीन ली जाएँगी,
और दुनिया—
बस देखती रहेगी।

वजह  ??

बस तुम्हारी पहचान

तुमसे तुम्हारी साँसें ले लेगा।।

कभी उल्कापिंडों ने भी
डायनासोरों को खत्म किया था—
वह प्रकृति थी।

पर यह—
यह मनुष्य है।

और उसकी
सबसे भयावह रचना।

हम शर्मिंदा हैं, हिन्द रज़ब—
कि तुम्हें
बस छह बरस की उम्र दे सके।

घृणा है हमें
इन युद्धों से,
इन खोखले धार्मिक आडंबरों से—

सत्ता व शक्ति की आराधना से

जिन्होंने
इंसानियत को
निगल लिया है।

हम गुनाहगार हैं तुम्हारे—
और शायद
क्षमा के योग्य भी नहीं।

अगर फिर कभी
जन्म चुनना—
तो यह धरा मत चुनना,

जहाँ आदमीयत ही
ज़िंदगियों पर भारी पड़ती है।

जहां सृजन का

शांति का अमन का

कोई मोल नहीं।।

ज़िंदगियाँ जो दे नहीं सकते

उसको लूटने का हक़

एक इनसान के पास

कैसे भला हो सकता था?

शायद नहीं बल्कि यकीनन
जानवर होना बेहतर है —
जहाँ युद्ध होते हैं,
पर सिर्फ
जीवित रहने के लिए।

सर्वाइयवल के लिये।

परंतु

यहाँ युद्ध हैं
हड्डियों को चबाने के लिए,
मांस के लोथड़ों  को नोचने के लिए,

और वह भी—
मासूमों का।

आज मनुष्य
हैवानियत की नई परिभाषा लिख रहा है।

और तुम जीने की ;
अपनी अंतिम कोशिशों में—
हमें एक प्रश्न दे गई :

क्या हमने पाया?

मौत!!
या मौत का विस्तार!!

फिर भी; याद रखें
गाज़ा की सरज़मीं कहती है –
वह ज़िंदा था,
 वह ज़िंदा है,
और  वह ज़िंदा रहेगा—

इन तमाम आहुतियों के बाद भी।

कहीं और ज़्यादा मज़बूती से।।

तुम्हारी शहादत
अब एक मशाल  है—
जो हर आँसू में,
हर सिसकी में
जलता रहेगा।

अब हमें तय करना ही होगा

कि

हम अपने हिस्से का अपराध माने,

और यह संकल्प लें

कि
अब कोई और  हिन्द रज़ब नहीं,
अब कोई और  युद्ध नहीं।

क्योंकि
सृजन की इस दुनिया में
कोई स्थान नहीं;

विध्वंस का,
हत्याओं का,
लूट का,
और शक्ति-पूजा का।

नीतिशा खलखो मैथन, बृहत् झारखण्ड

‘गूज बम्प्स’

कहानी- चंद्रसेन

‘डूड’…

 “इस यूनिवर्सिटी का यही झंझट है,” नैना ने बालों के जूड़े में पेन खोंसते हुए बोली,

“इतनी साहित्यिक हिंदी मुझसे नहीं होती…

वो भी ये इलाहाबादी, संस्कृतनिष्ठ टाइप!”

दीपक की आंखों में हल्की-सी शरारत तैर गई।

“तो क्या हुआ? इलाहाबाद की ज़ुबान है… थोड़ा वक़्त दो, खुद-ब-खुद समझ आ जाएगी।”

“अब आप अपना ज्ञान-प्रदर्शन न करें प्लीज़?” नैना ने भौंहें चढ़ाईं।

“ओके… सेंट स्टीफेंस प्रोडक्ट!”

“डोंट से दिस अगेन… आई एम वार्निंग यू,” नैना बनावटी गुस्से में बोली।

“अच्छा मिस जोशी” दीपक ने और छेड़ा ।

“यार दीपक!”

“कब ये जोशी वाली पूंछ को नोचते रहोगे? तीन साल से इरिटेट किए जा रहे हो।”

“सॉरी…” दीपक ने तुरंत हाथ जोड़ लिए।

“वंस अगेन?”

“सॉरी…”

नैना ने सिर हिलाया-

“नो… ऐसे नहीं।”

वो थोड़ा और करीब आई, धीमी और गर्माहट भरी आवाज में कहा –

“बोलो… ‘सॉरी डार्लिंग’…”

एक पल को समय की रफ़्तार थम सी गई।

दीपक ने उसकी आंखों में झाँका -जहाँ नाराज़गी कम और शरारत ज़्यादा थी।

वो हल्का-सा झुका, और उसके कान में फुसफुसाया-

“सॉरी… डार्लिंग…”

दीपक जैसे ही नैना के कान में फुसफुसा कर सॉरी डार्लिंग बोला। दीपक के होंटो की गरमाहट और फुसफुसाहट से नैना के रोम-रोम चहक गए। 

देखो-

‘गूज बम्प्स’।

“हूँ… अब ठीक है,” नैना इतराई,

नैना ने मुस्कुराते हुए दीपक की बाँह थाम ली-

इस पकड़ में थोड़ा-सा हक़ था, थोड़ा-सा लाड़… और बहुत सारा भरोसा।

“जानती हो, नैना…” ?

दीपक ने दीवार पर पेंट से उकेरी कविता को निहारते हुए बोला ,

“दिस इज़ अ वेरी लांग पोएम…”

नैना ने आँखें घुमाईं, मुस्कुराते हुए लापरवाही से झट से बोली –

“अरे… पूरी मत सुनाना, झेल नहीं पाऊँगी।”

वो थोड़ा और करीब आई, उसकी आवाज़ अब धीमी और नर्म थी-

“ये जो मोटा-मोटा तीन शब्द लिखा है… बस वही बता दो…”

दीपक कुछ पल उसे देखता रहा-

जैसे उन शब्दों को ढूंढ रहा हो, जो सिर्फ कहे नहीं… महसूस किए जाएँ।

फिर वो हल्का-सा झुका, उसकी आँखों में उतरते हुए बोला-

‘बदलाव’। ‘बदलाब’। ‘बदलाव’। 

एक लंबा, खामोश पल उनके बीच ठहर गया।

नैना की हँसी इस बार कहीं खो गई थी- बस उसकी आँखों में नमी-सी चमक रही थी, और होंठों पर एक हल्की, ठहरी हुई मुस्कान उभरी- चेहरे पर दृढ़ आत्मविश्वास ऐसे झलका, मानो किसी ने खाली कैनवास पर अचानक एक स्पष्ट रेखा खींच दी हो।

‘हूँ’।

 ‘इम्प्रेसिव’।  

‘आई लव इट’।  

‘मी टू नैना’। 

नैना की बड़ी-बड़ी आंखों में झांकते हुए दीपक मुस्कुराया-

“इलाहाबाद का असर है…”

नैना ने उसकी टी-शर्ट पकड़कर अपनी तरफ खींचते हुआ बोला –

“तो… थोड़ा और असर होने दो…”

और उस पल,

कविता खत्म नहीं हुई-

बस… जीने लगी।

“ओके-ओके, मिस्टर इलाहाबादी…” नैना मुस्कुराई,

“चलो पुरानी दिल्ली-हॉस्टल का खाना खा-खा कर पक गए हैं। साला आज कुछ अच्छा खाते हैं।”

दोनों येलो लाइन मेट्रो में चढ़ गए।

ट्रेन चल पड़ी।

नैना हल्का-सा उसके करीब झुकी-

“तो गाइड साहब, कहाँ ले जा रहे हो?”

दीपक मुस्कुराया-

“जहाँ आप कॉम्फर्टेबल हों …”

नैना ने नजरें मिलाईं-

“इम्प्रेसिव… मिस्टर इलाहाबादी।”

दिल्ली वाली दोपहर अपने चरम पर थी ।

फॉर्मल ड्रेस, पीठ पर टंगे बैग, प्रेसेंटेशन, मीटिंग और फाइल्स की उधेड़बुन में ऑफिस जाने वाले जा चुके थे। मतलब ऑफिस टाइम की भगदड़ निकल चुकी थी, इसलिए मेट्रो में थोड़ी राहत थी, एकरूपता की नीरसता गायब थी -क्योंकि परिवार-बच्चे-बूढ़े झोला-झंडी गाने-रील्स और हसी-ठिठोली बीच जमीन के अंदर ट्रेन पूरी रफ़्तार में समाये जा रही थी। भीड़ थोड़ी कम थी-लेकिन दिल्ली की मेट्रो पूरी तरह खाली हो, सोचना पड़ेगा ।

एक ही सीट मिली। नैना बैठ गई और दीपक उसके पास पोल की आड़ लेकर टिक गया।

“कितने जेंटलमैन हो तुम…” नैना ने ऊपर देखते हुए चुटकी ली।

“सीट खुद ले ली और मुझे खड़ा कर दिया,” दीपक ने पलटवार किया ।

“अरे… तुम तो खड़े होकर ज़्यादा अच्छे लगते हो,” उसने शरारत से कहा।

दीपक थोड़ा झुका-

“और तुम… बैठकर भी उतनी ही खतरनाक लगती हो।”

नैना हँस पड़ी।

फिर वही-

कभी छेड़ना, कभी बहस करना, कभी किसी बात पर सहमत, तो अगले ही पल असहमत।

मेट्रो अपनी रफ्तार से चल रही थी- और उनके बीच बातों का एक छोटा-सा अपना-सा संसार भी।

एक अटूट हिस्सा जो छूटे न छूट रहा है। 

बहस-खटपट और आर्ग्यूमेंट में मुंह फुलावा-फुलाई भी होता रहता है। 

ये गुस्सा, पांच मिनट से ज्यादा टिक जाए तो इस गुस्से की खैर नही। 

उनका संबंध अब एक ऐसी कड़ी बन चुका था-जो टूटने के लिए नहीं, बस और गहराने के लिए बनी हो।

हौज खास से मेट्रो एम्स, दिल्ली हॉट होते हुए केंद्रीय सचिवालय पार कर गई। स्टेशन आता, गेट खुलता। स्टेशन आते रहे, लोग बदलते रहे-

पर वो दोनों वहीँ के वहीँ ।न कोई हड़बड़ी, न कोई भय- केवल साथ होने का एक गहरा मौन आश्वासन।

बस कभी-कभी मेट्रो में हो रहे अनाउंसमेंट से पल भर का खलल जरूर आ जाता। गेट बंद होते सब नॉर्मल। 

अगला स्टेशन चांदनी चौक है।

इलाहाबद के कुम्भ जैसी भीड़ वाला राजीव चौक भी निकल गया। 

 दीपक अभी भी पोल के सहारे टिका हुआ है। नैना बैठी है। दीपक के हाथों को आददतन ऐसे जोर से पकड़ रखी है। मानो किसी अदृश्य झटके से उसे बचा रही हो, या शायद… खुद को ।  

मेट्रो थमी।

दरवाज़े खुले।

एक यांत्रिक, निर्विकार आवाज़ गूँजी-

“अटेंशन प्लीज़…”। 

लेकिन यह अनाउंसमेंट महज एक नार्मल अनाउंसमेंट नहीं था। अपने-आप में एक इतिहास समेटे हुए था।

‘अटेंशन प्लीज़’। 

क्षण भर को समय ठहरा।

चांदनी चौक स्टेशन।

और फिर-

“प्लीज़ डोंट टच एनी ‘अनटचेबल’ मटेरियल… इट मे बी एक्सप्लोसिव।”

शब्द जैसे हवा में नहीं,

सीधे भीतर गिरे।

‘अनटचेबल’…

 नैना और दीपक के कानों को चीरता हुआ ये चिरपरिचित शब्द ‘अनटचेबल’ रूह तक धंस गया । 

‘अनटचेबल’। 

अनाउन्समेंट के वे सामान्य-से लगने वाले शब्द-‘अनटचेबल मैटेरियल’-

 दोनों के सीने में एक तीखी हूक बनकर उठे।

चेहरों पर एक मौन विषाद उतर आया, जिसे भागती हुई भीड़ पढ़ ही न सकी।

वही समाज की विद्रूपता-

जिसकी सड़ांध में कितने दीपक-नैना घुंट गए-आज फिर एक शब्द बनकर सामने खड़ी थी।

किसे पता था- एक शब्द के मात्र उच्चारण ही- दोनों को सदियों की बनायी गयी खाईं में धकेल देगा।

शायद मेट्रो रुपी तंत्र के लिए यह शब्द महज़ एक चेतावनी भर हो-

इसलिए वह इतनी सहजता और सलीके से बार-बार दोहराया जाता है।

पर क्या सचमुच लोगों के लिए भी यह इतना ही सामान्य हो गया है?

क्या कोई शब्द अपने भीतर की सदियों की गूँज खो सकता है-

क्या इसके मायने बदल दिए गए हैं या बदले जा सकते हैं ?

या वह हर उच्चारण के साथ फिर से वही इतिहास जगा सकता है?

नैना और दीपक चुप थे-

मन व्याकुल और आँखें बेचैन।

नज़रें जैसे एक-दूसरे से नहीं,

उन अनगिनत सवालों से उलझी थीं

जो कहे नहीं जाते, सुनाई नहीं देते।

अनकहा।

अनसुना।

एक क्षण को लगा-

मानो किसी ने उन्हें उठाकर

कहीं दो दूर छोरों पर फेंक दिया हो।

जहाँ दूरी दिखती नहीं-

बस महसूस होती है,

जैसे असमय बारिश की बारीक बौछार…

नज़र न आए,

पर भीतर तक भेदती चली जाए।

ट्रेन अपने धुन में सरपट भागी जा रही थी।

दीपक और नैना की पकड़ ढीली पड़ने लगी। गर्माहट कम होती गयी। दोनों भरसक कोशिश में हैं, पकड़ वैसी ही रहे जैसी हुआ करती थी। लेकिन जैसे रेत फिसलती है। मानो रिश्ते भी फिसल रहे हों। छूट रहे हों । 

गले रुंधे हुए से। चेहरे पर बेचैनी और उलझन उपट आयी थी । 

नैना से रहा न गया। हाथ पकड़ कर खड़ी हो गई। डबडबाई आँखों से दीपक को निहारा। फिर खींच कर ऐसे गले लगी, जैसे सदियों से न मिली हो। लोग क्या देख रहे होंगे, सोच रहे होंगे। इसकी परवाह न रही।दोनों की पकड़ इस बार बड़ी मजबूत रही।टूटे न टूटे। छूटे न छूटे। 

फिर अचानक से नैना दीपक को पकड़े-पकड़े चिल्लाई –

‘मुझे सारी जिंदगी इसी ‘अनरीचेबल-अनट्रेसबल-एक्सप्लोसिव-अनटचेबल मटेरियल’ के साथ रहना। 

‘समझे’। 

दीपक नैना के कान में विश्वास और प्यार से फुसफुसाया। 

‘ओके डार्लिंग’।

जैसे ही दीपक ये बोला –

नैना की रोई पलकों ने हल्का-सा काँपकर जवाब दिया-

“देखो… गूज़बम्प्स…”

और फिर चुपचाप

दीपक की बाँहों में समा गई। ।

चंद्रसेन, लेखक व रिसर्च ऑफिसर आईआईपीए, नई दिल्ली।

बेटी दिवस पर विशेष : संजना तिवारी की कविताएं

बेटियों के लिए 

सुबह 

किरणों के रथ पर 

आती हैं बेटियां 

इन्हीं से खुशबू उधार लेकर 

फूल बिखेरते हैं खुशबू 

बेटियाँ ही कोयल को

सिखलाती हैं तान

जहाँ जन्म लेती हैं ये

बसंत खूद-ब-खूद 

वहां आ जाता है।

अनमोल धरोहर हैं ये धरती की 

फिर भी इनके आगमन पर 

उदासी क्यों छा जाती?

आखिर हम

कब समझेंगे 

कि बेटियों के हाथ में ही 

जगती की डोर है

इन्हीं से अंजोर है।

———————

बेटियाँ 

बेटियाँ नियामत हैं पृथ्वी की 

उन्हें जन्म देती हुई माँएं 

खुद को ही नए रूप में अवतरित करती हैं 

और बेटी के रूप में अपने को पाकर 

गहरे आनंद में डूब जाती हैं 

बेटी जैसे-जैसे बड़ी होती है 

माँ भी उसके साथ ही

वैसे-वैसे बड़ी होती है 

मगर बड़ी होती हुई बेटी पर 

माँ अपने दुख की छाया 

नहीं पड़ने देना चाहती 

बड़ी होती हुई बेटियाँ भी 

माँ की इस पीड़ा को समझती हैं 

इसलिए वह माँ के दुख को 

भगाना चाहती हैं 

मगर दुख है कि 

भागने का नाम ही नहीं लेता

माँ के दुख को भगाने के लिए बेटियाँ 

न जाने कबसे दुख से लड़ रही हैं,

लङती हुई बेटियाँ आगे बढ रही हैं ।

——————————

 

बेटियों को बचाएँ 

विश्वास को बचाएं 

इसीसे बचेंगे रिश्ते 

रिश्तों को बचाएं 

इसीसे बचेगी खुशी   

प्यार को बचाएं 

इसीसे बचेगा का घर 

घर को बचाएं 

इसीसे बचेगी शांति  

त्याग को बचाएँ 

इसीसे बचेगा समाज 

समाज को बचाएँ 

इसीसे बचेगी मनुष्यता

पेड़ को बचाएँ 

इसीसे बचेगी आक्सीजन 

आक्सीजन को बचाएँ 

इसीसे बचेगा जीवन 

बेटियों को बचाएँ 

इसीसे बचेगा मनुष्य 

मनुष्य को बचाएँ 

इसीसे बचेगी जिजीविषा।

—————————

रिश्ते 

पेङों को जमीन से रिश्ते हैं 

जीवन को हवा से

नदियों को समुद्र से रिश्ते हैं 

रोगी को दवा से

पत्तियों को टहनियों से रिश्ते हैं 

मछलियों को पानी से

धरती को सूरज से रिश्ते हैं 

सरहद को जवानी से

चिङियों को आकाश से रिश्ते हैं 

पाठक को किताब से

कवि को कविता से रिश्ते हैं 

चांदनी को आफताब से

ये रिश्ते प्रेम से संचालित हैं 

मगर जो लोग 

बाजार में रिश्ते ढूंढते हैं 

वे यह भूल जाते हैं 

कि जहां बाजार है 

वहां प्रेम नहीं है 

और जहाँ प्रेम नहीं है 

वहां रिश्ते कहाँ से होंगे। 

सच्चे रिश्ते बाजार में नहीं 

वे होते हैं दिल के पास 

जो रिश्ते बाजार में बनते 

वे हैं रिश्तों की लाश।

———————————

अजन्मा होता है प्रेम 

पेट में पल रहे बच्चे के साथ 

प्रेम भी पल रहा होता है 

मगर वह बच्चे की तरह 

जन्म नहीं लेता 

प्रेम अजन्मा होता है 

अगर वह जन्म लेगा 

तो उसका अंत भी निश्चित है 

इसलिए जिससे हम प्रेम करते हैं 

उसके नहीं रहने के बाद भी

हम उससे प्रेम करते रहते हैं 

बल्कि उससे हम विशेष प्रेम करते हैं 

जो प्रेम के लिए 

अपने को निछावर कर देते हैं 

प्रेम के साथ जीने वाला भी 

प्रेम की तरह ही अजन्मा हो जाता है 

दुनिया के सारे तानाशाह 

प्रेम को ही मारना चाहते हैं 

मगर वे इस काम में 

कभी सफल नहीं हो पाते

भगत सिंह, खुदीराम बोस, गांधी 

और न जाने कितने ही 

ऐसे लोग मार दिए गए 

मगर फिर भी वे 

इसलिए बचे रह गए 

कि उन्होंने अपने देश 

और मनुष्यता से प्रेम किया था

जीवन प्रेम का ही परिणाम है 

जो लोग घृणा और गैर बराबरी 

कायम कर

हथियारों के बल पर 

 दुनिया बनाना चाहते हैं 

वे प्रेम की ताकत को नहीं समझते।

——————————————

आजादी का मतलब 

हमेशा हमें कमजोर कहा गया

कि हमें अपनी सीमाओं में चाहिए 

वही कहना चाहिए 

जिससे पुरुष प्रधान व्यवस्था को 

आघात न लगे

स्त्री होने का मतलब अबला होना

मान लिया गया 

कवियों ने भी दया भाव से 

खूब कविताएँ लिखी कि-

“अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, 

आंचल में है दूध और आंखों में पानी।”

गोया हमारे पास प्रतिरोध की 

शक्ति ही न हो

मगर यह सोच किसकी है?

पुरुष के साथ कदम से कदम मिलाकर 

चलनेवाली स्त्री 

जिस दिन अबला हो जाएगी 

उस दिन पुरुष भी असहाय हो जाएगा 

वह समय आ गया है 

कि अपने इस सोच को बदलना होगा 

एक-दूसरे का सम्मान करते हुए 

साथ-साथ चलना होगा 

आजादी का एक मतलब यह भी है।

————————————–

बेटियाँ 

बेटियाँ कभी निराश नहीं करतीं 

वह जीवन के हर मोर्चे पर 

साथ देने को तत्पर रहती हैं 

वह सुबह की किरणों की तरह आती हैं 

और रात में चांदनी जैसी हो जाती हैं 

जिसकी शीतलता से 

निहाल हो जाता है मन

बेटियों का जीवन 

उस फूल की तरह है 

जिसकी खुशबू से धरती का आंगन 

महकता रहता है

वे कितने भाग्यवान हैं 

जिनके घर में बेटियाँ हैं। 

—————————–

लङकियां 

कठिनाइयों को पार कर 

आसमान छूने की 

कोशिश कर रही हैं लङकियां 

अब चारदीवारी तोड़ कर 

बंधनों को छोड़ कर 

खुली हवा में सांस 

ले रही हैं लङकियां 

अब अपने जीवन का फैसला 

स्वयं करने में सक्षम हैं लङकियां 

————————–

सावन

आखिर सखी 

क्या है इस सावन में 

कि धरती की छाती 

जुड़ा जाती 

हरियाली वसन पहन

बादल को ललचाती 

हर्षित हो मेघ

बरस जाते

परदेशी याद बहुत आते

आखिर सखी 

क्या है इस सावन में। 

——————

समुद्र और स्त्री 

समुद्र से बड़ा होता है 

स्त्री का विस्तार 

मगर वह अपने में सिमटी 

घर के किसी कोने में 

दुबकी रहती है चुपचाप 

चंद्रमा के आकर्षण में 

समुद्र में उठते ज्वार भाटा को 

दुनिया देखती है 

मगर स्त्री के भीतर उठते 

ज्वार भाटा को 

कोई नहीं देखता 

सुनामी में 

समुद्री जहाज का 

कुछ खास नहीं बिगड़ता 

मगर तटीय इलाके 

हो जाते हैं तबाह 

प्रेम ही है वह जहाज 

जिस पर दुनिया को थामे

भटकती रहती है स्त्री 

अपने विस्तृत दुख के सागर में।

———————————–

संजना तिवारी
साहित्यकार व संजना बुक्स की फाउंडर

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“मैं अभागा सुअर हूं”

कहानी: चंद्रसेन

हॉय, डॉ. मोहन!”

“हेलो, बेंसन।”

मोहन अभी अपनी क्लॉस लेकर बाहर निकले ही थे कि उनका सबसे प्रिय, किंतु नटखट चीनी छात्र बेंसन सामने आ खड़ा हुआ। चेहरे पर वही आधी मुस्कान, नुकीला सवाल।

ज़रा ठहरिए। पहले डॉ. मोहन को जान लीजिए।

कभी वे ‘मोहना’ थे-इलाहाबाद के छोटे से गाँव-भीमपुर के।

 ऊसर ज़मीन, लहलहाते सपने।

 वहीं से शुरुआती पढ़ाई, फिर संघर्ष, फिर शोध। भारत से पीएचडी पूरी कर आज वे कोलंबिया विश्वविद्यालय में पोस्ट-डॉक्टोरल शोधार्थी हैं। कक्षाएँ लेते हैं-पर वे सिर्फ़ सिलेबस नहीं पढ़ाते। समाज पढ़ाते हैं, गढ़ते हैं इतिहास की तहों में छिपे वर्तमान को निचोड़ते हैं।

बेंसन चीनी है, लेकिन उसका शोध भारत की जाति-व्यवस्था पर है। चीन से आए छात्रों को सबसे ज़्यादा हैरानी इस बात की नहीं होती कि यहाँ हज़ारों देवता हैं, बल्कि यह कि इंसान अब भी इंसान नहीं है।

ब्राह्मणों की इस ‘अतुल्य खोज’ ने उन्हें चकित कर रखा है-एक ऐसी खोज, जिसमें यह तय कर लिया गया कि कौन छूने लायक है और कौन नहीं। 

वे बार-बार पूछते हैं: “क्या सच में इंसान-इंसान को नहीं छूता?”

और हमें जवाब देते हुए शर्म नहीं आती, क्योंकि सदियों की मूढ़ता, क्रूरता और गुलामी को यहाँ परंपरा कहा जाता है। 

खैर आज बेंसन डॉ मोहन का मजा लेने के मूड में हैं।

“डॉ. मोहन, क्या आप हमें ग़लत पढ़ाते थे?”

बेंसन ने मासूमियत से पूछा।

“आपने तो हमें यही पढ़ाया था कि भारत में हिंदू हैं-और आजकल सब कट्टर हिंदू हो चुके हैं।

अखंड भारत बनाना है।

प्रधानमंत्री ईश्वर के अवतार हैं?”

डॉ. मोहन मुस्कराया-वह मुस्कान, जो जवाब नहीं होती, स्वीकारोक्ति होती है।

“बेंसन, यही तो है आज का नूतन भारत,” डॉ. मोहन ने कहा।

“यही सब अब किताबों में है। जाओ, बॉलीवुड की फ़िल्में देखो।

सब जगह यही कथा चल रही है-संसद में भी और हमारी सनातनी मीडिया में तो खासकर।

वहाँ सब हिंदू हैं और जो नहीं हैं, वे जल्द समझा दिए जाते हैं।”

बेंसन चुप रहा।

डॉ. मोहन ने बात पूरी की-

“और हाँ, हमारे प्रधानमंत्री अब केवल प्रधानमंत्री नहीं रहे।

वे हिंदू-हृदय सम्राट हैं-लोकतंत्र के सिंहासन पर विराजमान एक पवित्र नॉन-बायोलॉजिकल आत्मा।”

बेंसन अपने बाल नोचने लगा। डॉ मोहन को सिगरेट बढ़ाते हुए एक वीडियो का लिंक शेयर कर दिया।

“आप रूम पर जाइए और इस वीडियो को देखिए”। 

“मस्ट वॉच इट”। बेंसन चिल्लाते हुए निकल गया।

डॉ मोहन दिन भर की थकान से फ्लैट पर आया। वाइन की बोतल निकाली। मोरक्कन डिश ऑर्डर करते-करते वीडियो देखने लगा। 

“यूजीसी हाय-हाय”।

‘इस तेली को किसने पीएम बनाया’?’ इसका तो सुबह-सुबह मुंह देखना अशुभ होता है’।

 एक मिश्रा महराज इंटरव्यू दे रहें हैं।

टीवी खोला तो विचित्रा त्रिपाठी एंकरिंग नहीं श्राप देने की मुद्रा में एंकर कम ‘राष्ट्रीय शर्मा संगठन’ की नेता ज्यादा लग रहीं हैं। 

विपक्ष का नेता चुप है।

सब हिन्दू अगड़ा-पिछड़ा में बट गया है। 

मसला यह नहीं है कि भारत के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जातिवाद रोकने के लिए कोई नया नियम आ गया है।

मसला यह है कि जिन्हें पीढ़ियों से जातिवाद करने की आदत रही है, वे यह सच्चाई अच्छी तरह जानते हैं कि आदत नियम से नहीं जाती।

वे यह भी जानते हैं कि हम किसी न किसी के साथ करेंगे ही-

फिर पकड़े जाएँगे,

फिर पीड़ित बनेंगे,

और अंत में “हमारे साथ अन्याय हो रहा है” का राष्ट्रीय विलाप शुरू होगा। होगा क्या ?हो ही चुका है। 

भेदभाव के महज अंदेशे से सवर्ण हिन्दू दिन रात एक किए पड़ा है। 

आदत सुधारी नहीं जा सकती, क्योंकि यही आदत तो पहचान है, परंपरा है और ज़रूरत पड़ने पर संस्कृति भी।

सदियों से सीखी गई सामाजिक हिंसा को कोई विश्वविद्यालयी गाइडलाइन कैसे मिटा दे?

जातिवाद यहाँ अपराध नहीं, स्वभाव है-और स्वभाव बदलना तो पश्चिमी साज़िश मानी जाती है।

फलस्वरूप तथाकथित हिंदू समाज अगड़ा और पिछड़ा में नहीं, बल्कि विशेषाधिकार और असुरक्षा में बँट गया है।

जो ऊपर हैं, वे डर रहे हैं कि बराबरी न आ जाए।

जो नीचे हैं, वे अब भी समझा रहे हैं कि वे भी इंसान हैं। 

सवर्ण लड़कियां ब्राह्मणवाद जिंदाबाद के नारे लगा रही हैं।थिरक रहीं है। सनातन धर्म को बचाने के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी में जोर आजमाइश कर रहीं हैं।

हिंदू-एकता का महान राजनीतिक भ्रम अब टूट चुका है-वह नारे से उतरकर ज़मीन पर बिखर गया है-सूखे पत्तों की तरह ।

शायद यही बात बेंसन कहना चाहता था।

वीडियो देखते-देखते, स्क्रॉल करते हुए मोहन को एक और वीडियो दिखा।

स्क्रीन पर एक तीस-पैंतीस धरा का सूअर था-पूरी तरह निश्चिंत, आत्ममुग्ध।

चर्बी लटक रही थी, आत्मविश्वास से भरी हुई।

वह झूम-झूमकर चल रहा था, जैसे किसी सत्ता का प्रतीक हो-भारी, सुरक्षित और बेख़ौफ़।

वीडियो के साथ एक कविता चल रही थी—

“मुझे मार डालो,

मेरे रोम-रोम उखाड़ डालो, राजा।”

विडंबना यह थी कि उस सूअर के बाल (बरौंछी) बहुत घने थे—

लहलहाते हुए, स्वस्थ, संरक्षित।

हिंसा की पुकार कविता में थी,

और ऐश्वर्य देह पर।

 “कम से कम आधा किलो तौ होबय करी”?

“का रे मोहना”? 

“होई बप्पा”।

“अच्छा बहुत तेज बनत हस”?

“एक छटांक के पांच रुपया मिली तो आधा किलो कित्ते के होई”?

“अरे अपने गांव का सबसे नीक गदेल है। काहे का चिल्लात रहत हस बिरजू”?

राम सुरेमन बाबा ने मोहना का पक्ष लिया।

“ठीक है, ठीक है। चल अच्छा। स्कूल जाय से पहले सूअरन का चराय आवा जाय”। 

“हम न जाब”।

“मारब ससुर के नाती दुइ पनही”।

“फीस मांगय बप्पय के पास आवत हस”। 

“हां पांच रुपिया कब से पड़ी है फीस। वू श्रीवास्तव मास्टर तीन दिन से क्लॉस से भगाय देत हैं”।

“ई बात है। चल कल बार उखाड़य वाले आइये हैं”।

“ई मोटका सुअरा के बाल दस-बारह रुपिया म बिक जाई”।

मोहना के बप्पा ने उसे आश्वासन दिया।

मोहना और बप्पा सुअर ढील कर खेतों की तरफ चल दिए।

हूछी-हूछी की आवाज करते हुए मोहना पीछे-पीछे और उसका बप्पा कंधे पर लाठी रखे आगे-आगे। सुवारों का झुंड विष्ठा चपर-चपर खाते बढ़े जा रहे थे। सुवरों को बराबर जमीन अच्छी नहीं लगती। अपने थूथनो से ऊबड़-खाबड़ कर रहें हैं।

इस प्रजाति को एक साथ चलना ही नहीं आता। कहीं भी धड़ल्ले से घुसे जा रहे हैं।

एक जगह पर टिकते नहीं। कभी सर्र से गेहूं के खेत में तो कभी सर्र से चना के खेत में घुस जाते हैं। माघ का महीना है। मोहना ठंड में डंडा लिए खेत, मेड़ इधर-उधर भाग रहा है। ओस से भीग गया है। चप्पल लस्सर-फ़सर हो रही है। ओस और माटी से सनी चप्पल बार-बार पैर से सरक-सरक जा रही है। जितना वह इन सुवरों का पीछा करता उतना ही ये चालबाजी करके आगे निकल भागते। 

अचानक मोहना—जो कभी भीमपुर की गलियों में इन कथाओं को सिर्फ़ चमत्कार समझता था-अब समझ पाया कि इन्हें भगवान विष्णु के दस अवतारों में से एक क्यों माना गया है।  

“भगवान को कोई नहीं पा सकता। वही जो भगवान का सबसे प्रिय हो… जो खुद भगवान हो… जो भगवान के मुख से पैदा हुआ हो।”

“अइसन कऊनव भगवान होई सकत है, मोहना?”

शाम को खाना खाते हुए बप्पा यही समझा रहे थे। आख़िरी बात कहकर उन्होंने महुआ का बड़ा-सा घूँट भरा।

मोहना चुप था। अब उसे समझ में आने लगा था कि अवतार सिर्फ़ कहानी नहीं होते- वे एक षड्यंत्रकारी व्यवस्था भी बन जाते हैं।

 “अरे मोहना तय खूब पढ़। हम्मय सब का ई सब भगवान न चाही” ।

 “हमार सब जने का भगवान तै बन”। 

“लेकिन बप्पा कल वू बाल उखाड़य वाला आयी न? कल फीस न देब तौ ऊ श्री ..

“अरे रोवां बोल मोहना रोवां”।

मोहना की बात काटते हुए बप्पा नशे में बड़बड़ाया।

“एक भौंकी म राख, तेल अउर गुड़ लाओ”।

“ई मोटका सुअर का गुआरी से खींच लाओ”।

“मुंह बांध देव लस्सी से नहीं तव बहुतय नारिआयी”।

“गोड़ पकड़व हो सुक्खू। बहुतय चर्बियान है। बांधव सारे के दुईनव पांव”।

मोहना पांव पकड़े है। बप्पा जौरी से बंधे जबड़े पर पैर रखे हैं। 

बप्पा की भाषा में रोवां उखाड़ने वाले रोवां उखाड़ रहा है। 

मोहना रोवां पर नजर लगाए है। डर रहा है कि ये कम से कम दुई छटांक हो जाए।

अगर इससे कम हुआ तो फीस नहीं भर पाएगी।

तौलकर जब मोहना के बप्पा को दस रुपये मिले, तो मोहना खुशी से चिल्ला उठा।

 “हो गई फीस”।

डॉ मोहन– डॉ मोहन।

आज मोहना-मोहना के स्थान पर मुझे डॉ मोहन क्यों सुनाई दे रहा है। 

आंख खुली ।

 दरवाजा खोला।

 बेंसन की सामने से चीरती हुई आवाज आयी ।

“गुड मॉर्निंग डॉ मोहन”।

डॉ चंद्रसेन लेखक व रिसर्च ऑफिसर आईआईपीए नई दिल्ली।

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कहानी: टुकी मिसिर


अभय कुमार 

बारह साल की ललिता जब किराने की दुकान पर नमक, तेल, ज़ीरा, मिर्च इत्यादि सामान ख़रीदने जाती, तो पास बैठे कुछ बूढ़े-बुज़ुर्ग, अगर उसे पहचान न पाते, तो पूछ बैठते— “किसकी बेटी हो?” बाप का नाम पूछने पर उन्हें जवाब मिलता, “टुकी मिसिर (मिश्र) की।”

ललिता कई सालों से चौथी क्लास में ही है। जिस तरह पैसेनजर गाड़ी को स्टेशनों पर एक्सप्रेस रेलगाड़ियों के गुज़र जाने के लिए रोक दिया जाता है, उसी तरह टुकी मिसिर ने अपनी इकलौती बेटी को एक ही क्लास में रोक रखा है। पिछले साल की तरह ललिता का यह साल भी बर्बाद हो गया, क्योंकि पिता ने बेटी का परीक्षा शुल्क नहीं भरा।

टुकी मिसिर को लगता है कि बेटी इम्तहान दे या न दे, क्या ही फ़र्क़ पड़ता है। उनकी यह समझदारी है कि बेटा होता तो कुछ और बात होती। परीक्षा में बैठने के लिए स्कूल ने पूरे एक सौ रुपये माँगे थे। टुकी मिसिर को यह लगा कि सौ रुपये के मकई के बीज से दो कठा खेत आबाद हो जाएगा; वहीं बेटी को पाँचवीं में भेजकर छठी क्लास के ख़र्च की मुसीबत को दावत देना होगा।

एक समय था, जब ललिता या उसकी माँ किसी के मुँह से “टुकी मिसिर” सुन लेती थीं, तो बहुत लड़ाई करती थीं और गंदी-गंदी गालियाँ देती थीं। जब गाँव के कुछ निठल्लों को मनोरंजन करने का दिल करता, तो जानबूझकर वे परिवारवालों के सामने राजेंद्र मिसिर को “टुकी मिसिर” कहकर संबोधित करते थे। “टुकी मिसिर” सुनते ही ललिता, उसकी माँ, उसका भाई विकास—सब ऐसे भड़क जाते थे, गोया गैस सिलिंडर अचानक फट गया हो।

एक बार गाँव के बच्चों ने सरस्वती पूजा का आयोजन किया। पूजा की तैयारी और चंदे की रक़म जमा करने के बहाने बच्चों को स्कूल न जाने का मौक़ा मिल जाता था। इतना ही नहीं, पूजा के नाम पर उन्हें कई दिनों तक लाउडस्पीकर बजाने, प्रोजेक्टर की मदद से फ़िल्म स्क्रीन करने और मूर्ति-विसर्जन के दौरान डांस करने का भी पूरा मौक़ा मिल जाता था। यही वजह थी कि गाँव के बच्चों में पंडाल स्थापित करने का काफ़ी क्रेज़ था।

चंदा इकट्ठा करने के क्रम में बच्चे टुकी मिसिर के दरवाज़े पर गए और ज़ोर से बोले, “बाबूजी, गेट खोलिए।” अंदर से जब कोई आवाज़ नहीं आई, तो बच्चे और ज़ोर से चिल्लाने लगे।

भरी दोपहरिया थी। टुकी मिसिर अभी-अभी खाना खाकर लेटे ही थे। बाहर आते ही उन्होंने अपने कर्कश स्वर में कहा, “क्या करने आए हो तुम लोग? भागो यहाँ से!”

सच पूछिए तो बच्चों को टुकी मिसिर से चंदा लेने से ज़्यादा उनके साथ मनोरंजन करने में दिलचस्पी थी। यही वजह थी कि वे जितना ग़ुस्से में चिल्लाते और गालियाँ देते, बच्चों को उतना ही मज़ा आता था और वे ज़ोर-ज़ोर से हँसते थे।

“बाबूजी, चंदा दीजिए। मूर्ति वाले को पेशगी में पाँच सौ रुपये देने हैं। आपको एक सौ एक रुपये देना है।”

एक सौ एक रुपये चंदे की फ़रमाइश सुनकर टुकी मिसिर और ज़ोर से चिल्लाने लगे— “मेरे पास ज़हर खाने के लिए एक रुपया नहीं है!”

टुकी मिसिर की पत्नी कमला को भी अपने पैसे से कम मोह नहीं था। मगर बच्चों की ज़िद देखकर उन्हें यह एहसास हो गया कि ये बच्चे यमराज की तरह ख़ाली हाथ लौटकर जाने वाले नहीं हैं।

दिल पर पत्थर रखकर वे पाँच रुपये का नोट लेकर आईं और बच्चों के सामने उसे पेश करते हुए कहा, “अब हल्ला मत करो यहाँ पर। सर-दर्द से मैं मर रही हूँ। ये लो पाँच रुपये और जाओ। जिसकी जितनी औक़ात होगी, उतना ही तो चंदा देगा।”

बच्चों को भी यह समझ में आ गया था कि पत्थर से तेल निकालना और रेगिस्तान में खेती करना भी शायद आसान हो, मगर टुकी मिसिर से एक पाई निकलवाना बेहद मुश्किल है।

बच्चों की टोली में से एक ने पाँच रुपये का नोट जेब में रखा और चंदे की रसीद पर चंदे की रक़म और चंदा देने वाले का नाम लिखने लगा। फिर उसने धीरे से रसीद आगे बढ़ाते हुए कहा, “बाबूजी, रसीद ले लीजिए। हम लोग चंदा जमा करने में कोई बेईमानी नहीं करते हैं। सबको रसीद देते हैं और पाई-पाई का हिसाब होता है।”

टुकी मिसिर ने जब रसीद अपने हाथों में ली और उस पर एक नज़र डाली, तो बारूद की तरह भड़क उठे। बोले, “किस नालायक ने रसीद के ऊपर मेरा नाम ‘टुकी मिसिर’ लिखा है? दो मेरे नोट वापस, कुत्तों…!”

बच्चे तो इसी घड़ी के इंतज़ार में थे। उन्होंने अपने प्लान के तहत रसीद पर राजेंद्र मिसिर लिखने के बजाय टुकी मिसिर लिख दिया था। जैसे-जैसे टुकी मिसिर उन्हें गालियाँ दे रहे थे, वैसे-वैसे कुछ बच्चे उनसे दूर भागते हुए “टुकी मिसिर, चूक-चूक…!” कहकर उन्हें चिढ़ा रहे थे।

दरअसल, टुकी मिसिर के माई-बाबूजी ने बड़े प्यार से उनका नाम राजेंद्र रखा था, मगर उनकी कुछ ऐसी हरकत गाँववालों ने पकड़ ली कि राजेंद्र मिसिर, “टुकी मिसिर” कहलाए जाने लगे।

टुकी मिसिर किसानी किया करते थे। घर में पैसों की आमदनी बहुत कम थी। पिताजी एक सरकारी दफ़्तर में चपरासी का काम करते थे। तीन बेटियों की शादी की वजह से वे काफ़ी क़र्ज़ में डूबे हुए थे। खेती-बारी भी बहुत जोखिम का पेशा था। कभी बाढ़, तो कभी सूखाड़ की वजह से खेती में लगे पैसे भी कई बार नहीं निकल पाते थे। ऊपर से ज़मीन के झगड़े की वजह से पट्टीदारों से केस-मुक़दमा भी हो गया था। मोतिहारी कचहरी में तारीख़ के दिन काफ़ी पैसे ख़र्च होते थे। घर की महिलाओं के कुछ गहने भी गिरवी रखे हुए थे।

परिवार की समस्याओं की वजह से टुकी मिसिर पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाए और मैट्रिक किसी तरह ‘थर्ड डिवीज़न’ से पास हुए। पढ़ाई छूटने की एक बड़ी वजह पिताजी का अचानक देहांत होना भी था। जब मैट्रिक का रिज़ल्ट आया, उसके कुछ ही दिनों बाद पिताजी रात को खाना खाकर सोए, तो सोए ही रह गए।

घर की सारी ज़िम्मेदारी अचानक टुकी मिसिर के कंधों पर आकर गिर पड़ी। विधवा माँ, छोटा भाई वीरेंद्र, बेटी ललिता और छोटा बेटा विकास—इन सबका ख़र्च उठाना इतना आसान नहीं था। खेती से अनाज तो मिल जाता था, मगर तेल, मसाले, कपड़ा, दवा-दारू, खाद और न्योता के लिए तो नक़द चाहिए ही चाहिए। सिर्फ़ धान और गेहूँ बेचकर सब कुछ पूरा करना मुश्किल था। सामाजिक हालात ने टुकी मिसिर को कंजूसी के गुण सिखा दिए थे।

समय गुज़रने के साथ टुकी मिसिर की बख़ीली बढ़ती चली गई। किसी को चाय पिलाना तो दूर की बात, वे किसी को अपने दरवाज़े पर बैठने तक के लिए नहीं कहते थे। उन्हें डर लगता था कि अगर कोई उनके घर बैठ गया, तो शायद उसे कुछ खाने-पीने को देना पड़ सकता है। किसी को कुछ देना उन्हें काफ़ी पीड़ादायक लगता था। जैसे ख़ून को सिरिंज से खींचने पर कष्ट होता है, वैसे ही अपनी कोई भी चीज़ किसी दूसरे को देने पर उनकी जान हाथ में आ जाती थी।

जहाँ अपनी चीज़ दूसरों को देना उन्हें बिल्कुल भी नागवार गुज़रता था, उसके उलट दूसरों की चीज़ खाने और लेने में उनका दिल बाग़-बाग़ हो जाता था। पूरे गाँव में कहीं भी शादी हो, तो वे कई दिनों से कुछ नहीं खाते; और जब खाने को कुछ मिलता, तो रामायण के लोकप्रिय पात्र और रावण के भाई कुंभकर्ण को भी टक्कर दे देते थे। शादी से ज़्यादा उन्हें मृत्युभोज का इंतज़ार रहता था, क्योंकि ब्राह्मणों को वहाँ न सिर्फ़ खाना मिलता था, बल्कि कुछ दान भी मिल जाता था। भोले-भाले लोगों को ठगने में भी उन्हें महारत हासिल थी।

दिन भर टुकी मिसिर दूसरों के सामान को पलक झपकते ही उठाकर अपने घर में छुपा लेने की कला भी सीख गए थे। दो कमरों का उनका घर किसी गोदाम से कम नहीं था। यही वजह थी कि उनका घर चूहों का अड्डा बन गया था, क्योंकि वे घर का कचरा फेंकना तो दूर की बात, दूसरों के कचरों से भी कुछ चुनकर अपने घर में लाकर रख देते थे। वे जिस ऊर्जा के साथ अपने घर में हर तरह के सड़े-गले और टूटे-फूटे पुराने सामान जमा करते थे, मानो कुछ दिनों बाद वह सोने में तब्दील होने वाला हो! 

टुकी मिसिर को बीड़ी पीने की बड़ी बुरी लत लग गई थी। जब वे छोटे बच्चे थे, तो पड़ोस की बुधिया काकी के लिए दुकान से बीड़ी ख़रीद कर लाते थे। गाँव में ब्राह्मण औरतों के घर से निकलने पर एक तरह की पाबंदी होती है। घर के भीतर उनके साथ जैसा भी बुरा सलूक हो, सब जायज़ माना जाता है, क्योंकि यह सब तो घर के अंदर ही होता है।

बुधिया काकी के पति शंभु मिसिर दिन भर मुखिया के दरवाज़े पर बैठे रहते थे। एक तरह से वे मुखिया के चमचे थे—मुखिया की हर बात में ‘हाँ’ भरते थे, और बदले में मुखिया के यहाँ उन्हें चाय, नाश्ता और खाना मिल जाता था। जब भी मुखिया दारू पीते, तो गिलास धोने से लेकर चखने का इंतज़ाम तक शंभु मिसिर करते थे। जब दारू चलती, तो गाँजे की चिलम भी जलती थी।

बुधिया काकी ने खाया या नहीं, घर में तेल, मसाला, साग-सब्ज़ी है या नहीं—इससे उनके पति को कोई मतलब नहीं होता था। जिस दिन मुखिया के घर से खाना नहीं मिलता, उसी दिन वे घर का खाना खाते थे।

शाम होने के बाद बुधिया काकी बीड़ी पीते हुए अपने मालिक के घर आने का इंतज़ार करती रहती थीं। बचपन से ही टुकी मिसिर बुधिया काकी को बीड़ी पीते देख-देखकर बीड़ी पीना सीख गए। वक़्त गुज़रने के साथ टुकी मिसिर की बीड़ी पीने की लत उनके शरीर से भी ज़्यादा तेज़ी से जवान होने लगी।

बीड़ी की गंध सूँघते ही टुकी मिसिर बेचैन हो जाते थे। उनकी समस्या यह थी कि बीड़ी ख़रीदने के लिए उनके पास अक्सर पैसे नहीं होते थे। अगर कभी कुछ पैसे होते भी, तो कंजूसी की वजह से वे उन्हें खर्च नहीं करना चाहते थे। उन्हें बीड़ी भी पीनी है और पैसे भी खर्च करने से बचना है। यही वजह थी कि वे बीड़ी पीने वालों के पास बिन बुलाए जाकर बैठ जाते थे, ताकि कोई उन्हें बीड़ी पीने में शरीक कर ले। 

टुकी मिसिर कई सारी दुकानों से बीड़ी उधार पर ले चुके थे, और जब दुकानदार ने पैसे के लिए टोकना शुरू किया, तो उन्होंने उस दुकान पर जाना ही छोड़ दिया और नई दुकान की तलाश में लग जाते।

गाँव कोई शहर तो है नहीं कि हर क़दम पर दुकान मिल जाएगी। गाँव में तो कुल चार ही दुकानें थीं—तीन ब्राह्मण, बनिया और कायस्थ के इलाक़े में, जहाँ से सब जाति और धर्म के लोग सामान लेते थे, और एक दलितों की बस्ती में, जहाँ से दलितों को छोड़कर कोई नहीं जाता था।

मगर टुकी मिसिर की बीड़ी की लत ऐसी थी कि उन्होंने दलित बस्ती वाली दुकान से भी बीड़ी उधार लेना शुरू कर दिया था, और तब तक लेते रहे, जब तक कि दुकानदार ने पुराने हिसाब न चुकाने की वजह से नया सामान देने से मना नहीं कर दिया।

दलित बस्ती से बीड़ी ख़रीदने की वजह से ब्राह्मणों ने टुकी मिसिर को बुरा-भला भी कहा और जात से निकालने की धमकी भी दी, मगर मुफ़्त की बीड़ी कोई भी जात-बिरादरी का आदमी दे दे तो टुकी मिसिर को उससे बहुत फ़र्क़ नहीं पड़ता था। 

जब टुकी मिसिर को कहीं भी मुफ़्त की बीड़ी पीने को नहीं मिलती थी, तो मजबूरी में वे आधा किलो धान लेकर दुकान पर उसे बेचने के लिए निकल पड़ते थे। आधा किलो धान को बोरी से निकालने और बेचने में उनकी जान निकल जाती थी। 

घर में नक़द न होने की वजह से किसान के पास अनाज बेचने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचता था। चूँकि गाँव के दुकानदार अपना सामान नक़द से भी बेचते थे, और जिनके पास नक़द नहीं होता था उनसे अनाज के बदले सामान दे दिया करते थे। यह एक तरह के ‘बार्टर सिस्टम’ की तरह काम करता था। इस ‘एक्सचेंज’ प्रणाली में दुकानदारों को ज़्यादा फ़ायदा होता था, क्योंकि वे अनाज सस्ते दाम पर ख़रीदते थे और तौलते समय न सिर्फ़ डंडी मारते थे, बल्कि उनका एक किलो का पत्थर का बटखरा भी सवा किलो का होता था।

जब कभी टुकी मिसिर आधा किलो धान लेकर दुकान बीड़ी ख़रीदने जाया करते थे, तो वे सोचते रहते थे कि इस धान को उगाने में उन्हें कितनी मेहनत करनी पड़ी है, मगर बीड़ी के धुएँ के लिए वे अपनी ही मेहनत में आग लगा रहे हैं।

धान की रोपाई के समय का मंज़र उनकी आँखों के सामने उभर आता था—किस तरह उन्हें घंटों पानी से भरे खेत में खड़ा रहना पड़ता था। कीचड़ की वजह से उनके पैरों की उँगलियों में खुजली होने लगती और कई बार वे सड़ भी जाती थीं। कुछ अवसरों पर उन्हें कीड़ों ने भी काटा था। दिन भर खेत में रोपाई करने के बाद, जब शाम को वे घर लौटते, तो पैरों को धोते और फिर उँगलियों के बीच में गरम तेल डालते, ताकि सड़न जल्दी ठीक हो जाए।

रास्ते भर टुकी मिसिर सोचते रहते कि आधा किलो धान का भात बन जाए, तो एक इंसान का पेट भर जाएगा; मगर उसी धान को वे बीड़ी के लिए—जो मुफ़्त में खाँसी ही देती है—दुकानदार को बेच रहे हैं। हालाँकि अगले ही पल उनके दिमाग़ में यह ख़याल भी आता कि कमाया आखिर किस लिए जाता है? अगर शौक़ पूरे ही न हों, तो फिर सारे धन का क्या फ़ायदा?

मगर जब वे धान बेचकर बीड़ी लाते, तो बड़े आराम से उसे पीते। सोकर उठते ही जब गाँव के दूसरे ब्राह्मण भगवान का नाम लेते, टुकी मिसिर बीड़ी जलाना शुरू कर देते थे; और बीड़ी पीते-पीते खाँसने का सिलसिला भी शुरू हो जाता था।

एक दिन टुकी मिसिर सुबह-सुबह बीड़ी पी रहे थे कि अचानक उनके दिमाग़ में एक ‘आइडिया’ आया। वे यही चाहते थे कि उन्हें बीड़ी पीने को भी मिल जाए और घर का अनाज भी घर में ही बचा रहे। चूँकि गाँव के लोगों ने पहले ही उन्हें बीड़ी देना बंद कर दिया था और दुकानदारों ने भी कब का उधार देने से मना कर दिया था, इसलिए उन्हें किसी नए रास्ते की तलाश थी। आज रात वे उसी रास्ते पर चलकर अपनी तलब पूरी करने का इरादा कर चुके थे।

रात में जब सब लोग खाना-पीना खाकर सो रहे थे, तब टुकी मिसिर घर से टॉर्च लेकर बाहर निकले। उन्होंने अपने ‘प्लान’ के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया—अपनी पत्नी को भी नहीं, जो दूसरे कमरे में सो रही थी। रात के अँधेरे में वे टॉर्च लिए बाज़ार की तरफ़ निकल पड़े। 

गाँव से पूरब की ओर पाँच मिनट पैदल चलने पर एक प्राइमरी स्कूल था, जहाँ पर कुछ ज़मीन ख़ाली थी। हर शाम सब्ज़ी वाले यहाँ अपनी टोकरी रखकर अपना सामान बेचते थे। बग़ल में एक मंदिर था। मंदिर के पास बरगद का एक पुराना पेड़ था। कुछ साल पहले, जब मुखिया जी की माँ का स्वर्गवास हुआ था, तो पंडित के कहने पर मुखिया जी ने मंदिर की मरम्मत करवाई थी और पास के बरगद के चारों तरफ़ एक चबूतरा बनवाया था, जहाँ कुछ लोग दिन भर ताश खेलते थे और उनमें से कुछ वहीं बीड़ी भी पीते थे।

गाँव में लोग शाम ढलते ही खाने और सोने की तैयारी करने लगते हैं। शहर के लोग जब शाम को ‘मार्केटिंग’ करने निकलते हैं, तो आधा गाँव सोने के लिए बिस्तर पर लेट जाता है। शहरों की तरह गाँव में बिजली और ‘स्ट्रीट लाइट’ नहीं थी। इसलिए हर तरफ़ अंधेरा पसरा हुआ था। गाँव के कुत्ते भूख से भौंक रहे थे। मगर इन सब से टुकी मिसिर बेफिक्र थे। उनके ऊपर बीड़ी की लत का ऐसा नशा छाया था कि अगर कोई कह दे कि शेर की गुफा में बीड़ी का एक पैकेट रखा हुआ है, तो वह उसे पाने के लिए दौड़ पड़ते।

रात में जब सब सो रहे थे, तो टुकी मिसिर चुपके-चुपके मुखिया जी के बरगद के पेड़ की तरफ़ बढ़ने लगे। पूरे रास्ते भर वह यही सोच रहे थे कि अगर किसी ने उन्हें देख लिया तो कल से गाँव में मुँह दिखलाना मुश्किल हो जाएगा। अंदर से थोड़ा बहुत डर तो लग ही रहा था कि कहीं कुत्ता न काट ले। कुछ ही दिन पहले किशून पधेया (उपाध्याय) के घर के पास काले कुत्ते ने दो लोगों को काट लिया था और फिर उन्हें मोतिहारी सदर अस्पताल जाकर सुई लगवानी पड़ी थी।

जब वह किशून पधेया के घर से गुज़र रहे थे, तो मन ही मन हनुमान चालीसा पढ़ रहे थे। सांस को थामे वे चुपके से गुज़र रहे थे। काला कुत्ता सड़क के किनारे बैठा उन्हें देख रहा था। टुकी मिसिर को यह मालूम था कि कुत्ता कितना भी ख़तरनाक क्यों न हो, उसके पास से गुज़रते वक्त न तो डरना चाहिए और न ही भागना। हालाँकि, उनकी हालत अंदर से पतली थी, मगर वे बाहर से निडर बने हुए थे। जैसे-जैसे वे कुत्ते को पार करके आगे बढ़े, उनकी निकली हुई जान फिर से वापस आने लगी। मगर दूर तक वे पीछे मुड़कर देखते रहे कि कहीं कुत्ता उनका पीछा तो नहीं कर रहा है।

रात के काले अंधेरे में वह बरगद के पेड़ के नीचे पहुँच गए। इधर उधर देखा तो दूर तक कोई नज़र नहीं आया। उनको इस बात की ख़ुशी हुई कि वह जो कुछ भी करने जा रहे हैं उसे गाँव का कोई भी आदमी नहीं जान पाएगा। अचानक से टुकी मिसिर ने अपनी टॉर्च जलाई और पेड़ के चबूतरे के आस पास कुछ ढूँढने लगे। दिन भर चबूतरे के आस पास लोगों का जमावड़ा लगा रहता है। लोग वही बैठ कर ताश खेलते हैं। ताश खेलते वक़्त बीड़ी बात बात पर जलती है। बीड़ी के कश को खींचते वक़्त, ताश के खिलाड़ी पत्ते फेकते हैं और हारने वाले अपने प्रतिद्वंदी पर जुमले कसते हैं।

 

टॉर्च की लाइट में टुकी मिसिर बड़ी तेज़ी से वहाँ आस-पास बिखरी हुई बीड़ी के टुकड़े चुन रहे थे। अंदर से इस बात का डर भी था कि कोई उन्हें यह सब करते हुए देख न ले। मगर जैसे-जैसे उन्हें बीड़ी के टुकड़े मिलते, उनके दिलों में आँधी में आम चुनते छोटे बच्चों की तरह ख़ुशी होती। कुछ ही देर में उनके पास दर्जनों बीड़ी के टुकड़े मिल गए। वह अंदर ही अंदर खुश हो रहे थे कि चलो, कई दिनों का काम हो गया। 

बीड़ी के टुकड़े उन्होंने अपनी अगुच्ची में बंधा। सोचा कि घर जाकर इत्मीनान से पियेंगे। मगर तलब का ज़ोर ऐसा था कि रहा नहीं गया और झटसे बीड़ी के एक टुकड़े को उन्होंने जला दिया। बीड़ी को जैसे-जैसे वह खींचते, उन्हें ऐसा महसूस होता कि भगवान ने ज़िंदा रहते ही उन्हें स्वर्ग में पहुँचा दिया हो। बीड़ी खींचते वक़्त वह मन ही मन सोच रहे थे, “क्या बुराई है इसमें? लोगों के पास पैसे बहुत हैं, तो वह थोड़ी बीड़ी पीकर फेंक देते हैं। इस तरह से बीड़ी को बर्बाद करना ठीक थोड़े ही है? पैसे हैं तो क्या है, चीज़ों को नुक़सान करोगे?”

बीड़ी के अभी दो कश भी नहीं लिए थे कि उनके पीछे से आवाज़ आई।

“जा हो राजेंद्र, गाँव के नाम पर कलंक हो! ब्राह्मण के कुल में पैदा हो कर तुमने सब सत्यानाश कर दिया। तुम फेंकी हुई बीड़ी का टुकड़ा पी रहे हो। जब नशे के लिए जेब से पैसे नहीं निकलते, तो नशा छोड़ क्यों नहीं देते? भिकारी कहीं का… टुकी बीड़ी पिता है… टुकी बीड़ी…।”

दरअसल, किशून पधेया किसी मर्त्यु-भोज में पेट से चार गुना ज़्यादा खा कर लौटे थे। उम्र बढ़ने के साथ-साथ उनकी खुराक कम होने की जगह बढ़ती ही जा रही थी। कहीं भी भोज का मौका आता, तो उसकी तैयारी वह कई दिन पहले से करते थे। भोज से एक-दो दिन पहले हल्का खाना लेने लगते थे, ताकि मौके पर छक्के लगा सकें। मगर आज के भोज से लौटने के बाद उनका पेट भारी सा हो गया। कुछ घंटों के बाद पतला दस्त आने लगा। खेत से शौच कर के आते और हाथ भी नहीं धो पाते कि फिर लोटा लेकर खेत में निकल पड़ते थे।

जिस दिन टुकी मिसिर बीड़ी चुन रहे थे, उसी वक्त किशून पधेया बरगद के पास के खेत में शौच कर रहे थे, और टॉर्च की लाइट में उन्हें सब कुछ दिख गया। अगले ही दिन किशून पधेया ने पूरी बात गाँव में फैला दी। गाँववालों ने इस पूरे मामले को बड़े चटकारे से सुना और मिर्च-मसाला लगाकर इसे दूसरों को भी सुनाया। टुकी मिसिर को बात-बात पर लोग पकड़ कर इस मामले पर बात करना चाहते। दरअसल, यह सब उनका मज़ा लेने के लिए होता था।

न सिर्फ़ टुकी मिसिर, बल्कि उनके परिवार वालों का भी हर तरफ़ मज़ाक उड़ने लगा। देखते ही देखते राजेंद्र मिसिर को लोग टुकी मिसिर कह कर पुकारने लगे। गाँव में नाम बदलने के लिए कोई ‘एफिडेविट’ नहीं बनता। माँ-बाप ने भले ही उनका नाम बड़े प्यार से रखा हो, मगर गाँव वाले अपने ढंग से लोगों का नामकरण करते हैं। देखते ही देखते राजेंद्र मिसिर टुकी मिसिर हो गए। शुरू-शुरू में तो टुकी मिसिर के घरवालों ने काफ़ी एतराज किया, मगर धीरे-धीरे सब ‘नार्मल’-सा हो गया।

लेखक अभय कुमार कई भाषाओं के जानकार और राजनीतिक समाज विज्ञानी है। उन्होंने कहानी में भी हाथ आजमाया है

One response to “कहानी: टुकी मिसिर”

  1. Raksha Geeta Avatar
    Raksha Geeta

    अच्छी कहानी आपको बधाई 💐

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जदयू में उतराधिकार : नीतीश मॉडल की नयी पटकथा

अरुण आनंद

बिहार की राजनीति में वंशवाद शब्द पिछले तीन दशकों से एक खास राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल होता रहा है। जब भी इस शब्द का उच्चारण होता है तो निशाना लगभग तय होता है; लालू प्रसाद और उनका परिवार। लेकिन हाल के दिनों में रालोसपा सुप्रीमो उपेन्द्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को बिहार विधान मंडल के किसी भी सदन का सदस्य नहीं होने के बावजूद मंत्री बनाया गया, या जदयू का सदस्य बनते ही नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार को जिस तरह प्रोजेक्ट किया गया उसने इस ‘नैरेटिव’ की सारी नैतिकता को नंगा कर दिया है।

जिस राजनीति ने वर्षों तक यह दावा किया कि वह परिवारवाद से मुक्त है, वही राजनीति आज अपने भीतर वंशवाद की सबसे विडंबनापूर्ण मिसाल गढ़ रही है।

निशांत कुमार वे शख्स हैं जो कल तक जदयू के साधारण सदस्य भी नहीं थे। पार्टी के भीतर उनका कोई राजनीतिक इतिहास नहीं था, न कोई संगठनात्मक संघर्ष, न जनता के बीच कोई लंबा संवाद। लेकिन जैसे ही उन्होंने सदस्यता ग्रहण की, रातों-रात उन्हें राजनीतिक वारिस और पार्टी के भविष्य के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा। जिस पार्टी में हजारों कार्यकर्ता दशकों से संघर्ष कर रहे हैं, वहां अचानक एक व्यक्ति को केवल इसलिए तारणहार घोषित कर दिया जाता है क्योंकि वह मुख्यमंत्री का बेटा है। यह सब सिर्फ वंशवाद नहीं है; यह राजनीतिक नैतिकता की खुली हत्या है।

जदयू के उन कार्यकर्ताओं पर क्या गुजरती होगी जो पिछले तीस वर्षों से पार्टी के लिए गाँव-गाँव में पसीना बहा रहे हैं। वे लोग जिन्होंने आंदोलन किए, जेल गए, चुनाव लड़े, हार-जीत का सामना किया उनकी पूरी राजनीतिक यात्रा को एक झटके में अप्रासंगिक बना दिया गया। क्योंकि लोकतंत्र की जगह वंश ने ले ली है।

निशांत कुमार का राजनीतिक उभार इस मायने में भी विचित्र है कि उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश किया जा रहा है जो न तो सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहे हैं और न ही राजनीतिक संवाद में उनकी कोई पहचान रही है। लेकिन अचानक उन्हें ऐसे प्रस्तुत किया जा रहा है जैसे जदयू का भविष्य उन्हीं के हाथों में सुरक्षित है। यह दृश्य किसी लोकतांत्रिक दल का नहीं, बल्कि किसी सामंती दरबार का प्रतीक लगता है जहां राजा के बाद राजकुमार का राज्याभिषेक तय होता है।

बिहार की इस पूरी राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह सब कुछ उन तस्वीरों के सामने रखकर हो रहा था जिनमें महात्मा गांधी, राममनोहर लोहिया और भीमराव आंबेडकर जैसे महापुरुषों की छवियां अंकित थीं। गांधी का सपना लोकतांत्रिक नैतिकता का था। सिद्धांतविहीन राजनीति के आज के दौर में नीतीश सबसे बड़े प्रतीक रहे हैं। डॉ० राममनोहर लोहिया ने वंशवाद और सामंती राजनीति का खुलकर विरोध किया था। और आंबेडकर ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सामाजिक न्याय से जोड़ा था।

लेकिन उन्हीं की तस्वीरों के नीचे एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था खड़ी की गई जहां पार्टी का भविष्य तय करने का अधिकार कार्यकर्ताओं या जनता के पास नहीं, बल्कि परिवार के पास है। यह घटनाक्रम राजनीतिक स्मृतिहीनता का चरम है।

विडंबनापूर्ण बात यह कि यह सब उसी राजनीतिक खेमे में हो रहा है जो वर्षों से परिवारवाद के खिलाफ सबसे जोरदार भाषण देता रहा है। NDA के नेताओं ने लंबे समय तक बिहार में यह प्रचार किया कि वंशवाद केवल लालू प्रसाद के परिवार में है। लेकिन आज वही गठबंधन अपने भीतर उसी प्रवृत्ति को खुलकर बढ़ावा दे रहा है।

अगर किसी दल में नेता का बेटा अचानक राजनीति में आकर पार्टी का भविष्य घोषित कर दिया जाए, तो उसे क्या कहा जाएगा? अगर यह वंशवाद नहीं है, तो फिर वंशवाद की परिभाषा क्या है?

असल समस्या यह है कि बिहार की राजनीति में वंशवाद पर बहस भी वर्गीय और जातीय पूर्वाग्रहों से संचालित होती रही है। जब राजद नेता लालू प्रसाद अपने परिवार के साथ राजनीति में दिखते हैं तो उसे वंशवाद कहकर बदनाम किया जाता है। लेकिन जब सत्ता के भीतर वही काम रामविलास पासवान, जीतनराम मांझी, उपेन्द्र कुशवाहा, भाजपा, और नीतीश कुमार करते हैं तो उसे राजनीतिक विरासत कहकर सामान्य बना दिया जाता है।

कभी जदयू खुद को समाजवादी परंपरा की पार्टी कहा जाता था, जब यह पार्टी बिहार में स्थापित होने के लिए संघर्ष कर रही थी तो मंगनीलाल मंडल और उदयकांत चौधरी जैसे पिछड़े वर्ग के विचारवान नेता इसकी अगली कतार में होते थे, लेकिन जैसे ही यह पार्टी सत्तासीन हुई इसने साजिशन पिछड़े वर्ग से किसी नेता को उभरने ही नहीं दिया। उसका चरित्र तेजी से सवर्णमुखी होकर रह गया।

पार्टी के भीतर जिन लोगों का प्रभाव बढ़ा है, उनमें ललन सिंह, संजय झा और विजय चौधरी जैसे नेता शामिल हैं। बहुजन समाज के जिन नेताओं की उनकी पहुंच है वह अशोक चौधरी जैसे भ्रष्टतम नेता शामिल रहे हैं। जाहिर है नीतीश के इसी व्यक्तिवादी सोच के कारण जदयू में समाजवादी विचारधारा या जनआंदोलनों की विरासत की जगह सत्ता-केंद्रित राजनीति हावी होती गई है। परिणाम यह हुआ कि पार्टी धीरे-धीरे एक व्यक्ति और उसके परिवार के इर्द-गिर्द सिमटती चली गई। यही वह प्रक्रिया है जिसने जदयू को एक राजनीतिक आंदोलन की बजाय भ्रष्टतम प्रशासनिक तंत्र में बदल दिया।

निशांत कुमार की ताजपोशी को केवल परिवारवाद की घटना मानना अधूरा होगा। यह उस लंबी प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें नीतीश कुमार की राजनीति धीरे-धीरे व्यक्तिवाद में बदलती गई। एक समय वे सामाजिक न्याय और विकास के संतुलन की राजनीति का दावा करते थे। लेकिन समय के साथ उनकी राजनीति का केंद्रीय तत्व केवल सत्ता-प्रबंधन बनकर रह गया। इसी प्रक्रिया में उन्होंने बिहार की राजनीति का बड़ा हिस्सा भाजपा के लिए खुला छोड़ दिया।

आज स्थिति यह है कि भाजपा वैचारिक और संगठनात्मक रूप से लगातार मजबूत होती गई, जबकि जदयू अपने ही ढांचे में सिकुड़ती चली गई। ऐसे में निशांत कुमार की एंट्री केवल एक पारिवारिक घटना नहीं है। यह उस राजनीतिक खालीपन का प्रतीक भी है जो जदयू के भीतर पैदा हो चुका है।

राजनीति में कुछ क्षण ऐसे होते हैं जो केवल तत्कालीन घटना नहीं रहते, बल्कि इतिहास का प्रतीक बन जाते हैं। निशांत कुमार की यह ताजपोशी भी शायद वैसा ही एक क्षण है। यह क्षण याद दिलाएगा कि कैसे एक पार्टी, जिसने कभी समाजवाद और लोकतंत्र की बात की थी, धीरे-धीरे परिवार और व्यक्तिवाद की राजनीति में बदल गई। और यह भी याद किया जाएगा कि बिहार की राजनीति में एक समय ऐसा आया जब वंशवाद के खिलाफ सबसे जोरदार भाषण देने वाले ही उसी वंशवाद के सबसे बड़े संरक्षक बन बैठे।

संभव है कि आने वाले वर्षों में इतिहास नीतीश कुमार को केवल एक प्रशासक या गठबंधन-कुशल नेता के रूप में नहीं, बल्कि उस राजनेता के रूप में भी याद करे जिसने अंततः अपनी राजनीति को व्यक्तिवाद में बदल दिया और बिहार की पूरी राजनीतिक जमीन भाजपा के लिए खाली कर दी।

निशांत की ताजपोशी उसी कहानी का सबसे ताजा अध्याय है जहां वंशवाद के खिलाफ खड़ा किया गया नैरेटिव अंततः उसी के सामने नतमस्तक हो गया।

अरुण आनंद स्वतंत्र पत्रकार हैं

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इमाम आयतुल्लाह ख़ामेनेई से नासिरा शर्मा का साक्षात्कार

एक अत्यंत ज़हीन खूबसूरत, जिज्ञासु, तेज तर्रार और उत्साहित युवती। जिसे ईरान जाने का मौका मिला तो इंडो-ईरान संबंधों की और बहुत-सी महत्वपूर्ण बातें जानने समझने को मिली। जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता है उनकी दिलचस्पी मिडिल ईस्ट से भारतीय संबंधों में गहरी और गहन होती चली गई। इंडो-ईरान संबंधों की सांस्कृतिक विरासत हो अथवा इराक़ अफ़ग़ानिस्तान जैसे देशों की राजनैतिक, ऐतिहासिक,सामाजिक परिदृश्यों को पृष्ठभूमि में रखते हुए साहित्य- सृजन, आज भी उनसे बेहतर और संवेदनशील लेखन हमें नहीं मिल सकता,बल्कि इस विषय पर लेखन से बचा जा रहा है । उनका कथा-साहित्य और कथेतर साहित्य हमें वर्तमान के ईरान-इजरायल-अमेरिका के संबंधों के भीतर निहित गठजोड़ या उलझनों को समझने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं सुप्रसिद्ध प्रतिष्ठित वरिष्ठ लेखिका नासिरा शर्मा जी की, जिन्होंने 1982 में अली ख़ामनेई का साक्षात्कार लिया था संभवतः वे पहली स्त्री पत्रकार रही हैं जिन्हें ख़ामनेई की ओर से इस साक्षात्कार के लिए इजाज़त मिली थी।यह साक्षात्कार एक दस्तावेज़ है जो हमें आज युद्धों की कूट राजनीति को समझने में एक दृष्टि देता है । युद्ध के प्रश्न ज्यों के त्यों हैं ! क्रांतियाँ होती है! सफल होती हैं लेकिन क्यों वही क्रांतियाँ बाद में गलत भी साबित हो जाती हैं? क्रांति के देश ईरान से एक निर्भीक, निष्पक्ष और सच के साथ संवेदनशील भारतीय पत्रकार का यह इंटरव्यू आपके सामने है।

“मेरी श्रद्धांजलि ईरान के इमाम आयतुल्लाह ख़ामेनेई की शहादत की ख़बर सुनने के लिए इस समय कोई भी तैयार नहीं था ,ख़ासकर तब जब बातचीत चल रही हो। यह समय सिर्फ़ ईरान और उसके आसपास के इलाक़े के लिए नहीं बल्कि पूरे विश्व की राजनीति, सुरक्षा और शांति के लिए एक ग़ैरक़ानूनी व ग़ैरज़रूरी हस्तक्षेप माना जायेगा और तीसरे महायुद्ध की शंकाओं को हवा देना जैसा। पूरी दुनियाँ में ख़ुशी से ज़्यादा ग़म मनाया जा रहा है। मुझे वह दोपहर याद आई जब मैं इमाम के राष्ट्रपति कार्यालय पहुँची। यह उनका पहला इंटरव्यू उस हादसे के बाद था जिस में वह बुरी तरह घायल हो गए थे जब जून 1981 में इंटरव्यू के बहाने उनके पास पत्रकार पहुँचा और टेप का बटन दबाते ही विस्फोट हुआ । राष्ट्रपति बच गए मगर उनका दहिना हाँथ हमेशा के लिए बेकार हो गया। इस तरह के जानलेवा हमले के बाद उन्होंने मुझे लम्बे इंटरव्यू का समय दिया। जिसके लिए मैं उनकी शुक्रगुज़ार थी । जिस कमरे में मुझे इंटरव्यू लेना था वह सादा कमरा था जहाँ एक बड़ा तख़्त सफेद चादर के साथ दीवार से लगा पड़ा था और उसी के सामने एक कुर्सी थी जिस पर वह आकर तशरीफ़ फ़रमा हुऐ और मैं तख़्त पर बैठ गई। मेरे पच्चीस सवालों में से ज़्यादातर सवालों के जवाब उन्होंने दिये। यह सवाल आज के हालात के देखते हुए पाठकों को लग सकता है कि बहुत सरल हैं मगर 1981के उस दौर के लिए बहुत तीखे और ख़तरनाक थे मगर उन्होंने सवालों के जवाब बिना इरीटेट हुए दिए। यह इंटरव्यू फ़ारसी में लिया गया था जो दिल्ली के अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एकस्प्रेस में छपा और इस के कुछ अंश मिडिल ईस्ट अंग्रेज़ी पत्रिका लंदन मे 1982 में प्रकाशित हुआ । जिसको गीता रक्षा जी ने हिंदी में अनुवाद किया है। यह इंटरव्यू कल के और आज के ईरान को समझने के लिए किसी हद तक सहायक हो सकता है”।[नासिरा शर्मा ]

जानलेवा बम हमले में दाहिना हाथ घायल होने के बाद अपने पहले इंटरव्यू में, ईरान के राष्ट्रपति अली खामेनेई ने नासिरा शर्मा से इस्लामिक रिपब्लिक की उपलब्धियों के बारे में बात की और इसकी आलोचना करने वालों को जवाब दिया।

नासिरा शर्मा: आपकी क्रांति दुनिया के लिए बहुत दिलचस्प है, लेकिन लोग फांसी से परेशान हो रहे हैं, खासकर युवाओं की।

इमाम आयतुल्लाह ख़ामेनेई : कोई भी हमारी असली समस्याओं को नहीं समझता। वे हमारी उपलब्धियों से अनजान हैं और क्रांति के अच्छे पहलुओं से वाकिफ नहीं हैं। उन्हें दोष नहीं देना चाहिए, क्योंकि प्रेस हर जगह खबरों को तोड़-मरोड़कर पेश करता है।इस्लामिक रिपब्लिक ने कई लोगों को माफ कर दिया है और उन्हें इस्लामी नैतिकता सिखाई है और इस्लामी आध्यात्मिक प्रभाव डाला है। लेकिन कुछ लोग हैं जो मारते हैं, पब्लिक बसें जलाते हैं, पब्लिक प्रॉपर्टी को नुकसान पहुंचाते हैं और हथियारों के साथ प्रदर्शन करते हैं। हमें लगता है कि वे अपराधी हैं और उन्हें इस्लामिक कानून के तहत फांसी दी जानी चाहिए।

नासिरा शर्मा: क्या आप मुझे ईरान की विदेश नीति के बारे में बता सकते हैं? ईरान के दोस्त और दुश्मन कौन हैं?

खामेनेई : हमारी फॉरेन पॉलिसी कमजोर नहीं है, हालांकि हमारी डिप्लोमैटिक एक्टिविटीज़ जितनी होनी चाहिए उससे कम हैं। हमारी प्राथमिकताएं तय हैं, और हम जानते हैं कि हमारे हितों को सबसे अच्छे तरीके से कैसे पूरा किया जाए। हमने दुनिया को ग्रुप में बांट दिया है – भाईचारे वाले देश, दोस्त देश, न्यूट्रल देश और दुश्मन देश। दुश्मन वे सरकारें हैं जो हमारे खिलाफ हमला करती हैं और ईरान के खिलाफ रवैया रखती हैं। बाकी या तो भाई हैं, दोस्त हैं या न्यूट्रल हैं।

फ्रांस की बात करें तो, [पूर्व राष्ट्रपति] बनी-सद्र के वहां राजनीतिक शरण मांगने से पहले ही, उसने हम पर आर्थिक रोक लगा दी थी। हम फ्रांस के साथ दोस्ती नहीं करना चाहते। लेकिन फ्रांस ने अक्सर सामान और मिलिट्री हार्डवेयर न देकर और इज़राइल के साथ सहयोग करके क्रांति-विरोधी और ईरान-विरोधी इरादे दिखाए हैं। इसलिए यह पक्का है कि यह देश दोस्त नहीं है। इसने हमारे दुश्मन इराक को भी हथियार सप्लाई किए हैं। इन दिनों ईरानी एयर फ़ोर्स फ्रांसीसी मिराज को मार गिरा रही है।

नासिरा शर्मा: फ्रांस ईरानी विपक्षी ग्रुप्स को होस्ट कर रहा है, फिर भी फ्रेंच न्यूज़ एजेंसी यहां काम कर रही है, जबकि दूसरों को ऐसी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। क्यों?

इमाम आयतुल्लाह ख़ामेनेई :  न्यूज़ एजेंसियां पूरी दुनिया में आज़ाद हैं। लेकिन कभी-कभी हमें कुछ एजेंसियों की एक्टिविटीज़ पर कड़ा नज़रिया रखना पड़ता है। जैसे, हमने एक अमेरिकन जर्नलिस्ट को यह दिखाने के लिए एक सिंबॉलिक एक्शन के तौर पर निकाल दिया कि US हमारा असली दुश्मन है। ईरान में न्यूज़ एजेंसियां हैं, जिसमें AFP [एजेंस फ्रांस-प्रेस] भी शामिल है। अक्सर वे खबरों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं और मतलब को घुमा-फिराकर पेश करते हैं।वे अपनी पसंद के हिसाब से खबरों को कंडीशन करते हैं।हम उनका स्वागत करते हैं। यह हमारे देश में आज़ादी की बात करता है।

नासिरा शर्मा: बनी-सद्र ईरान पर फिर से राज करने का सपना देखते हैं। जनता के बीच, सेना में और सरकार में उनका कितना बड़ा बेस  है?

इमाम आयतुल्लाह ख़ामेनेई : कई और लोगों की भी ऐसी ही ख्वाहिशें हैं – एरियाना, बख्तियार, ओवेसी, राजवी और विदेशों में कई राजभक्त और क्रांति-विरोधी। हर कोई दावा करता है कि वह अगले दो या तीन महीनों में ईरान पहुँच जाएगा और ईरानियों के बीच उसका बड़ा बेस है।उन्हें दूसरे देशों का सपोर्ट है जो कंजर्वेटिव और ईरान विरोधी हैं। बनी-सद्र, बख्तियार और राजवी समेत सभी को इन देशों से फाइनेंशियल मदद मिल रही है और हमसे लड़ने के लिए पैसे दिए जा रहे हैं।

अपने भला चाहने वालों को भरोसा दिलाने के लिए उन्हें ईरानियों के बीच झूठा सपोर्ट बनाना पड़ता है। हम जानते हैं कि न तो बनी-सद्र का और न ही किसी और का आर्मी में लोगों के बीच कोई बेस है। अगर था, तो वे ईरान से क्यों भागे?

नासिरा शर्मा: ईरान-इराक युद्ध को एक साल से ज़्यादा हो गया है। क्या आप इसे खत्म करने के बारे में सोच रहे हैं ताकि देश आर्थिक रूप से तरक्की कर सके?

इमाम आयतुल्लाह ख़ामेनेई : हमें शांतिपूर्ण समाधान से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन यह विचार इराकी नेताओं के मन में नहीं आता।शांति के लिए जंग से ज़्यादा हिम्मत चाहिए और इराकी नेताओं में इसकी कमी है। हम शांति के लिए तैयार हैं, लेकिन इज्ज़त और सम्मान के साथ शांति और पक्के वादे भी।  ईरान अलगाववादी आंदोलनों से परेशान है और ऐसी अफवाहें हैं कि इसमें सोवियत यूनियन का हाथ है।  इसके कई वर्जन हैं। हम असली दुश्मन को जानते हैं। वेस्टर्न और अमेरिकन हाथ ज़्यादा दिख रहे हैं। वे कुछ हद तक इराक के साथ हैं और कुछ हद तक दूसरों के साथ हैं जिनका ईरान पर ऐसा ही इरादा है। हम ऐसे विदेशी एलिमेंट्स से सावधान हैं और हम अपने देश को उनसे बचाने के लिए पूरी लगन से काम करते हैं।

नासिरा शर्मा: ईरान कहता है कि ईरान के बाहर एंटी-रेवोल्यूशनरी एक्टिव हैं जो इंपीरियलिस्ट्स के लिए बेस तैयार कर रहे हैं, लेकिन मोजाहिदीन और फेदायीन जैसे रेवोल्यूशनरी प्रोग्रेसिव एलिमेंट्स को रोज़ाना मार दिया जाता है।

इमाम आयतुल्लाह ख़ामेनेई : ये एंटी-रेवोल्यूशनरी हैं जो रेवोल्यूशनरी होने का दावा करते हैं। एक पुराने सावक [मेंबर] और जो उनके खिलाफ लड़े लेकिन अब इस्लामिक रिपब्लिक के खिलाफ वही कर रहे हैं, उनमें क्या फर्क है? यह अजीब है कि आप उन लोगों को रेवोल्यूशनरी मानते हैं जिनके कुर्दिस्तान में फ्यूडलिस्ट्स से लिंक हैं।

सिर्फ़ राजभक्त ही क्रांति-विरोधी नहीं हैं, बल्कि वे सभी लोग हैं जो इस्लामी क्रांति के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं, चाहे वह आज मसूद राजवी हों या अली अमीनी। कल के बख्तियार और ओवेसी। उन्हें उनके लेबल से मत आंकिए। आज के क्रांतिकारी कल क्रांति-विरोधी हो सकते हैं।

मिडल ईस्ट  17 अप्रैल 1982 में प्रकाशित साक्षात्कार

महकार की महागाथा: लोकतंत्र का एक जीवित महाकाव्य है महकार

क्या आपने डॉन्स ऑफ डेमोक्रेसी देखा है? लोकतंत्र का संगीत सुना है? महकार गांव आइए, हमारी तरह।लोकतंत्र का एक जीवित महाकाव्य, घटित महागाथा है महकार- गया जिले के खिजरसराय प्रखंड का महाकार गांव!

संविधान आधारित लोकतांत्रिक गणराज्य की रोशनी से पहले अंधेरा था उस गांव में और इसके पड़ोस के गांवों में – आज से 83 साल पहले।

कल्पना करिए -धुप्प अंधेरा, उन्मादी बाढ़ से जलमग्न खेत,खलिहान, बरसात की रात में बरसता बादल, कड़कती बिजली और फुस व मिट्टी के घर में रहने वाला चार पांच मजदूर परिवार बरगद के पेड़ पर जान बचाने के लिए दुबका बैठा है।एक मां और पिता की गोद में कुछ सप्ताह का बच्चा भी है – साल 1944। इसके 70 साल बाद बंधुआ मजदूर मां और पिता का वह बच्चा बिहार का मुख्यमंत्री बना-जीतनराम मांझी। है न डांस ऑफ डेमोक्रेसी! है न महकार में रचा गया महाकाव्य!

कई सर्ग – उपसर्ग का महाकाव्य है महकार। जब महकार का जीतन स्कूल पढ़ने पहुंचा देश में दलितों का साक्षरता दर 15% से भी कम था। मुसहर – भुइंया जाति में साक्षरता दर शून्य के बराबर। आज भी साक्षरता दर बेहद कम है। 2011 की जनगणना के अनुसार 10% , महिलाओं की तो 10% से भी कम। आज भी मुसहर जाति में दस हजार की आबादी पर एक एमए है, जीतन राम मांझी ने एमए किया 7वें दशक में।

पिछले दिनों दिल्ली में बात बात में बात निकली कि ‘ महकार में लिट्टी ड्यू है।’ मन और व्यवहार से सरल मांझी जी ने पूछा, ‘ आइएगा महकार, खाइएगा लिट्टी!’ हमारा उत्तर सकारात्मक था और हम अगले दो दिन में खिजरसराय प्रखंड के गांव महकार में थे।गांव का काया कल्प हो चुका है। यह गांव अब उसी बंधुआ मजदूर के बेटे के नाम से जाना जाता है, जिसे घर बनाने के लिए मिली बंजर पथरीली जमीन भी उसके मालिकाना में नहीं थी, जमींदार की थी जमीन। यह गांव अब जीतन राम मांझी का गांव है।

हमलोग-सुबोध जी, अरुण नारायण, हुलासगंज और खिजरसराय के बीच से महकार जाने वाली सड़क पर मुड़े तो हमें कहां पता था कि लोकतंत्र के महाकाव्य की यथार्थ रचना देखने जा रहे हैं। हमारे मित्र जितेंद्र दिल्ली से नहीं पहुंच पाए थे, रास्ते में थे, बाय रोड। उनके न पहुंच पाने का हमें अफसोस था।

नहर के दो किनारों से सड़क है। बाईं वाली पकड़ेंगे आप तो 45 किलोमीटर के बाद राजगीर पहुंचेंगे, बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री की सांस्कृतिक अवधारणा का केंद्र। दाईं वाली से जायेंगे तो 11 किलोमीटर के बाद महकार पहुंचेंगे, पूर्व मुख्यमंत्री के सपनों का केंद्र।

हमसब चकित रह गए जब हमने देखा कि गांव शिक्षा का हब बन चुका है- पोलीटेक्निक कॉलेज, आईटीआई, अनुसूचित जाति के लड़कों और लड़कियों के लिए आवासीय स्कूल, प्राइमरी और हायरसेकेंड्री स्कूल। ये सारे संस्थान सरकार के उपक्रम हैं, उन्हें संभव करने वाला इस गांव का ही जीतन है, जो आज केंद्रीय मंत्री है – जीतन राम मांझी, जो बिहार का मुख्यमंत्री रहा है, जिसकी घोषित राजनीति है शिक्षा का सरकारीकरण, अफसर, नेता और जनता के बच्चे समान स्कूल में पढ़ें, समान पाठ्यक्रम में पढ़ें। निजी तौर पर मेरी एक शिकायत जाती रही मांझी जी से। वह यह कि अपने प्रयास से शिक्षा के लिए उन्होंने क्या किया। यह कि मुसहर और दलित समाज में शिक्षा के लिए क्या किया। अवसर मिला तो जितना संभव हो सका वह किया, यह महकार आकर समझ में आता है। वैसे मुख्यमंत्री रहते हुए गया में आईआईएम भी तो लेकर आए।

महकार को रात में देखिए। बिजली से जगमगाता गांव। बिजली का ग्रिड लगा है, गांव में 24 घंटे बिजली है। पइन/ नहर बना है, गांव के इलाके में सिंचाई की सुविधा है। महकार को प्रखंड बनाने का सपना मांझी जी का। प्रस्ताव पर नीतीश कुमार को एक्जिक्यूट करना है। प्रखंड कार्यालय के लिए भवन बनकर तैयार है। प्रखंड बना नहीं है लेकिन प्रखंड इलाके में डिग्री कॉलेज हो चुका है। बिहार सरकार की भी योजना है अब कि हर प्रखंड में होगा एक डिग्री कॉलेज।

जब हम गांव में पहुंचे तो मांझी जी इंतजार में थे। एक दिन उन्होंने अपने लिए तय किया था। हर सप्ताह आते हैं वे महकार, लोगों से मिलते हैं। उस दिन को उन्होंने अपने लिए रखा था, आराम के लिए, लेकिन अब वह पूरा दिन उन्होंने हमारे लिए कर दिया था।

‘ महकार की लिट्टी ‘ अब एक आयोजन बन गया था। हमारे आने को उन्होंने एक आयोजन में तब्दील कर दिया था, गेट टुगेदर। परिवार के लोगों को बुला लिया। बिहार सरकार में मंत्री और अपने बड़े बेटे संतोष कुमार सुमन को, उनकी विधायक पत्नी दीपा जी को। छोटे बेटे और उनके परिवार को। पार्टी के एक दो और विधायकों को। चुनिंदा कार्यकर्ताओं को। एक क्लोज गेट टुगेदर।

हर कोई पहुंचा लेकिन मांझी जी आज हमारे लिए थे। आज हम उनके खास मेहमान थे। ग्रामीणों के साथ बैठे थे, हमारे इंतजार में, खासकर उसी जमींदार परिवार के अपने हमउम्र मित्र के साथ, जहां उनके पिता, उनका परिवार कभी बंधुआ मजदूर था – सबसे मिलवाया, बैठे ग्रामीणों से, परिवार के सदस्य से।

हमारा तो उद्देश्य था महकार के महाकाव्य के पन्नों से गुजरना, उसकी काव्यात्मकता का आनंद लेना। बहुत कुछ हम पहले से सुन चुके थे। आज फिर उकसा कर सुन रहे थे। आज देख भी रहे थे। जीतन राम मांझी बड़े अच्छे किस्सागो हैं। वे नेता नहीं होते तो साहित्यकार होते। अच्छा हुआ नेता हुए -महाकाव्य पन्नों पर नहीं, पगडंडियों पर रचा गया, घटित हुआ।जितना संभव हो सके पुराने क्षणों का रिप्लिका तैयार हो रहा था। पुराने का कुछ ढांचागत अवशेष नहीं है, लेकिन पुराने अवशेष पर ही खड़ा है सपनों का यथार्थ, वर्तमान का यथार्थ।

वे हमें दिखाना चाहते हैं वह जगह, जहां बाढ़ में बरगद पर मां – पिता की गोद में बच सका था जीतन। 83 साल पहले की घटना। वे नॉस्टैल्जिया में हैं, वे कोमल उछाह से भरे हैं। कहते हैं 50 साल पहले आए थे यहां। 50 साल बाद फिर से आए हैं। हमें अच्छा लगा। हमलोग निमित्त बने हैं।

एक मृत पईन है, जिसके किनारे बसा था उनका परिवार, कुछ और मुसहर – भुइंया परिवार, एक – दो घुमंतू परिवार। बरगद कट चुका है। हमलोग कहते हैं रिप्लिका बनाइए। पुराने अवशेष की स्मृति। बेटे संतोष कुमार सुमन का विभाग है, पुराने पईन को जिंदा किया जा सकता है। झोपड़ियां खड़ी हो सकती है। 83 सालों में लोकतंत्र के महाकाव्य का बड़ा सर्ग है यह। झोपड़ी से महल तक।

जीतन राम मांझी अब लय में आ गए थे। गांव में ही अपना एक तालाब बनवाया है- पानी रचना है, पानी विध्वंस है। पानी के विध्वंस से पानी की रचना है! तालाब पर फिर से कहानियों का सिलसिला। कहानियां हम पहले भी सुन चुके हैं उनसे। कुछ नई बातें, कुछ नए उपसर्ग।

अब मांझी जी के सपनों के गांव का शैक्षणिक हब देखना है दुबारा। मांझी जी की निगाहों से, उनके विवरणों के साथ।एक हेलीपेड बना है। महकार का जीतन अब जीतनराम मांझी है बरगद से भी ऊंचा उड़ने की क्षमता, योग्यता और असवर वाला, हेलीपेड तो होना ही चाहिए महकार में। हेलीपेड दिखाकर ही नहीं रुकने वाले हैं मांझी जी।

जीवन का एक और यथार्थ है। लोकतंत्र का महाकाव्य अंतिम सर्ग वाला नहीं होता है। हमेशा शेष रहता है महाकाव्य, महागाथाओं में गाथाओं के सूत्र निरंतर होते है, लेकिन व्यक्ति शेष होगा। व्यक्ति रुकता है एक जगह – बरगद के पेड़ पर पिता की गोद में दुबका जीतन पूरा संसार लांघ चुका है। देश दुनिया पर अपनी अमिट छाप छोड़ चुका है। देश और विदेश के महान विश्व विद्यालयों में व्याख्यान दे चुका है। महकार की कस्तूरी फैल चुकी है। जीतन को महकार में लेनी है पर आखिरी नींद!

महकार में ही सोएंगे आखिरी नींद जीतन राम मांझी। बताते हैं, दिखाते हैं कि अपने लिए बना लिया है श्मशान। तय कर लिया है वह चबूतरा, जहां उनकी देह पंच तत्व में विलीन होगी ! क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर- गोरी सोवै सेज पर, मुख पर डारे केस। लेकिन लोकतंत्र के महाकाव्य के पन्नों पर रैन नहीं होता। जीतन राम मांझी खुद सो जायेंगे अपने भाई, पिता, मां और पत्नी के बगल में। लेकिन महकार में अपनी क्षमताओं के साथ रच दिया है आने वाले जीतन का भविष्य – अनुसूचित जाति के बच्चों के लिए 400 बेड का छात्रावास और बच्चियों के लिए 250 बेड का छात्रावास!

हमें तो महकार से विदा लेना ही था फिलहाल! संवैधानिक व्यवस्थाओं के भीतर, संसदीय लोकतंत्र का एक पुरोधा, लोकतांत्रिक हासिल का बड़ा रचनाकार हमें विदा दे रहा था और गांव की सीमा से हमने भी उन्हें विदा किया, महकार में ही रात होगी, अपने जिले में, बोध गया में, एक खादी उद्योग का हब बनाने का सपना लिए सोएंगे वे, सुबह अधिकारियों से उसके लिए मीटिंग हैं ।

पुनश्च: लोकतंत्र के महाकाव्य, महकार की महागाथा का एक स्थाई रस है, एक स्थाई भाव, स्टेट पावर को साथ लेकर समन्वय का भाव – इस भाव के साथ अपने स्पेस को बढ़ाते जाना, विराटता हासिल करना। भूमिहीन बंधुआ पिता का पुत्र एक गांव नहीं, एक प्रखंड नहीं, एक राज्य, एक देश पर काबिज हो जाता है। इस रस और इस भाव को समझने के लिए, उसके आस्वाद के लिए, उस आस्वाद के साथ उत्सव के लिए आपको भी पात्रता हासिल करनी होगी। जाति श्रेणी की ऊंची सीढ़ी से ‘ फासीवाद के खिलाफ विद्रोह का ‘वीर भाव ‘ खोजने पर हासिल नहीं होता है उसका आनंद। 10% से भी कम साक्षरता और 80% से भी अधिक परिवारों के 6 हजार रुपए में मासिक जीवन की सीढ़ी से फासीवाद कुछ अलग ढंग से दिखता है। तब ‘ घोषित आपातकाल ‘ में भी जीवन सुंदर दिखने लगता है, जैसे जीतनराम मांझी को दिखा था, अघोषित आपातकाल तो महकार का जीतन, इस देश का जीतन हर रोज झेलता है।

लेखक स्त्रीकाल के संपादक हैं।