ओटीटी और भारतीय समाज की बदलती ‘दर्शक संस्कृति’

भारतीय समाज प्रारंभ से ही उत्सव धर्मी रहा है। खेत खलिहान के कार्यों से फुर्सत मिलने पर, मनोरंजन के लिए, मेला  तमाशा, सॉन्ग, नौटंकी, आदि की परंपरा रही है। थोड़ा समय बदलने पर सर्कस आने लगे। उसके पश्चात शहरी क्षेत्रों में थियेटरों का प्रचार हुआ। थिएटर के पश्चात सिनेमा का युग आया। रविवार और अन्य अवकाश के दिनों में सिनेमा देखने का प्रचलन हो गया। दूरदर्शन के आने पर साप्ताहिक धारावाहिक आने लगे।  “हम लोग” “रामायण” “नुक्कड़” इत्यादि धारावाहिकों का बेसब्री से इंतजार होता। सभी लोग काम निपटाकर टीवी के सामने बैठ जाते थे। प्राइवेट चैनल आने के बाद प्रतियोगिता बढ़ गई। सास बहू वाले सीरियल इस दौर में खूब पसंद किए गए। साथ ही साथ मल्टीप्लेक्स मॉल में सिनेमा देखने का क्रेज भी बढ़ता गया। 21वीं सदी में मध्य वर्ग के हाथों में स्मार्टफोन आने शुरू हो गए थे।  दो दशक बीतते-बीतते लगभग हर परिवार में एक स्मार्टफोन तो आ ही गया। चाहे वह किस्त पर ही क्यों ना लिया गया हो। तभी कोरोना महामारी के कारण जीवन ठप्प हो गया।  सभी घरों में कैद हो गए। निम्न वर्ग तो पैदल हजारों मील नाप गया। उनका कष्ट असाध्य था। परंतु मध्यम वर्ग एवं उच्च वर्ग जो पूरी तरह संपन्न था, इनकी समस्या अलग थी। बैंक खाते में पैसा था, घर में पूरा राशन था, परंतु घर में रहने की विवशता ने मानसिक रोगों को बढ़ावा दिया। इसी समय ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने इनके लिए जीवन दान का कार्य किया। तब से लेकर आज तक, पाँच वर्षों में ओटीटी ने अपनी जगह भारतीय समाज के हर तबके में बना ली है। आज अमेजॉन प्राइम, नेटफ्लिक्स, डिज़नी प्लस, हॉटस्टार, जी फाइव, सोनी लिव, जिओ सिनेमा, इत्यादि अनेक ओटीटी प्लेटफॉर्म हैं, जो घर बैठे दर्शकों को मनोरंजन उपलब्ध करवा रहे हैं। इन प्लेटफॉर्म्स के कंटेंट न केवल रोचक हैं, बल्कि कई देशों में एक साथ प्रसारित होने के कारण ग्लोबल भी हैं। एक तरफ कोरियन सीरीज भारत में लोकप्रिय हो रही है, वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीय विषय और ग्रामीण परिवेश पर आधारित पंचायत सीरीज कई देशों में तहलका मचा रही है। कपिल शर्मा के काॅमेडी शो जैसे कार्यक्रम भी अब ओटीटी पर प्रसारित हो रहे हैं।

सिनेमा पर एक वर्ग विशेष का एकाधिकार समाप्त हो गया है। सोशल मीडिया पर रील्स  बनाने वाले प्रतिभाशाली युवाओं को भी ओटीटी पर मौका मिल रहा है। स्कैम 1992, दिल्ली क्राइम, हसीन दिलरूबा, जैसी फिल्मों ने आम आदमी को अपराध की एक नई दुनिया से रूबरू करवाया। सेंसर ना होने, और व्यक्तिगत रूप से देखने की स्वतंत्रता ने सिनेमा में अद्भुत बदलाव लाए। जहाँ एक ओर गाली गलौज, मारपीट, हिंसक दृश्य आम हो गए; वहीं दूसरी ओर, बोल्ड दृश्यों ने सीमा पार कर ली। जिन दृश्यों को व्यक्ति सिनेमा घर में सार्वजनिक रूप से देखकर असहज हो जाता था, अपने बेडरूम में अकेला या जीवनसाथी के साथ सहजता से देखने लगा। यह भारतीय दर्शकों में आया एकदम नया बदलाव था। यह पहले कभी नहीं देखा गया। पारंपरिक सिनेमा के मुकाबले ओटीटी प्लेटफॉर्म सस्ते भी है। इसकी पहुंच अमीर गरीब सभी तक है। इतने विशाल दर्शक वर्ग के लिए उसकी रुचि की विभिन्न सामग्रियां ओटीटी पर मौजूद हैं। क्षेत्रीय बोलियों,  परंपराओं, साहित्य, पर भी ओटीटी प्लेटफॉर्म सीरीज बना रहे हैं। ढके छुपे रीति रिवाज के सामने आने से विवाद भी खूब हो रहे हैं। उदाहरण के लिए “महाराज” पुष्टिमार्ग पर आधारित पाखंडों को सामने लाती है, तो पुष्टिमार्ग के अनुयायी उसके विरोध में सड़क पर आ जाते हैं। “आश्रम” सीरीज में तथाकथित बाबा का, अपराध और राजनीति से संबंध अनेक विवादों को जन्म देता है। “तांडव” को लेकर भी ऐसे ही विवाद हुए। “ओ माय गॉड-2” हस्तमैथुन जैसे संवेदनशील विषय पर बात करती है। हम देखते हैं कि ओटीटी प्लेटफॉर्म के माध्यम से भारतीय दर्शक वाद- विवाद, संवाद के जरिए परिपक्व हो रहा है। वह धीरोदात्त एवं साहसी नायक, सुंदर छुई मुई सी नाजुक नायिका, पूरी तरह नकारात्मक खलनायक, और सुखांत के परंपरागत सिनेमा के ढाँचे से बाहर निकल रहा है। ओटीटी प्लेटफार्म पर विविध नए-नए विषयों पर सिनेमा और सीरीज बनाई जा रही है। छोटे-छोटे शहरों के कलाकारों को भी इन प्लेटफॉर्म्स पर अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिल रहा है। महिला पात्र जो अभी तक पारंपरिक सिनेमा में सहायक पात्र की भूमिका निभाती थी, वह अब मुख्य पात्र की भूमिका में नजर आ रही हैं।  ओटीटी पर सामाजिक बुराइयों पर आधारित सिनेमा बहुतायत बन रहा है। “द ग्रेट इंडियन किचन” पितृसत्ता की बारीक परतों को उभारती है। समाज बहु को सिर्फ भोजन बनाने तक ही सीमित रखना चाहता है। अगर कुछ और करना है तो पहले भोजन बनाकर, खिलाकर, बर्तन धोकर, तब कहीं जाइए। “मिसेज” का कथानक भी कुछ ऐसा ही है।

 हाॅल में जाकर सिनेमा देखना, मनोरंजन की मांग करता है। व्यक्ति छुट्टी के दिन, परिवार के साथ आनंद मनाने सिनेमा हॉल जाता है। परंतु ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने सिनेमा को मनोरंजन और समय बिताने के साधन से आगे बढ़ा दिया है। ओटीटी का भविष्य उज्जवल है, अगर इसमें कुछ सुधार किए गए (गालियाँ और अंतरंग दृश्य), तो यह भारतीय समाज में लंबी रेस का घोड़ा साबित होगा। निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है की ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने भारतीय दर्शकों के साथ कदम मिलाया तो, भारतीय दर्शकों ने भी स्वयं को बदलते हुए उसे गले से लगाया है।

डाॅ० सुनीता सहायक

प्राध्यापिका,

हिन्दी विभाग,

राजा सिंह महाविद्यालय

सीवान

Related Articles

ISSN 2394-093X
418FansLike
783FollowersFollow
73,600SubscribersSubscribe

Latest Articles