सांस्कृतिक राष्ट्रवाद नहीं, लोकतान्त्रिक राष्ट्रवाद को मजबूत करने की जरूरत है: अनिता भारती

साहित्यिक मंच, मुजफ्फरपुर द्वारा “अस्मिता बनाम राष्ट्रवाद : कुछ प्रश्न,कुछ चिंतन” विषय पर एक सत्रीय संगोष्ठी अभिधा प्रकाश सभागार में आयोजित हुई। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो हरि नारायण ठाकुर ने की। मुख्य वक्ता के रूप में प्रसिद्द लेखिका/ आलोचक और दलित अधिकारों की मुखर प्रवक्ता अनिता भारती उपस्थित रही। स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन और साहित्यकार मुसाफिर बैठा ने अपने विचार रखे।

मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए अनिता भारती ने कहा कि राष्ट्रवाद मन में सोची गई एक बात है। असल में हमारा राष्ट्रवाद देशप्रेम से जुड़ा है। विश्व बंधुत्व की भावना से भरकर हम देश की बहुत सी चीजों से प्रेम करने लगते हैं। आजादी के समय में लिखे जाने वाला साहित्य राष्ट्र प्रेम की भावना से प्रेरित है जो राष्ट्रवाद की वकालत है। हम पहले भी भारतीय थे और अभी भी भारतीय हैं। हम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद की ओर बढ़े हैं। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में हम अपने अतीत का गुणगान करते हैं। किंतु लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद भारतीय संविधान में विश्वास करते हुए स्वतंत्रता,समानता और बंधुत्व की बात करता है। सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद में एक अंतर साफ नजर आता है। जब हिस्सेदारी की बात होती है तो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद असहज हो जाता है।अस्मिताओं ने जब-जब आवाज उठाई है लोगों द्वारा उसे राष्ट्रवाद के लिए खतरा बताया गया,जबकि ऐसा नहीं है। उन्होंने एक बात पर बल देते हुए कहा कि हम एक ऐसे राष्ट्र की परिकल्पना करें जिसमें सभी अस्मिताएं मिलकर एक हो जाएं।

संजीव चंदन ने कहा कि हम अपने धर्म में दो राष्ट्र हैं। पेशवाई राष्ट्र और भीमा कोरेगांव राष्ट्र। ये राष्ट्रवाद की ऐसी दो धुरी हैं जहां से अस्मिता विमर्श को देखा जाना चाहिए। अस्मिताएं कई बार राष्ट्रवाद के नाम पर दमित होती हैं। भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय महिलाओं को लेकर जो दो राष्ट्र अस्मिताएं थी उसे पर भी संजीव चंदन ने अपनी बात रखी। नंदेली,महात्मा अयंकाली को याद करते हुए अस्मिता के गहराते संकट पर भी दृष्टि डाली।

मुसाफिर बैठा ने विभिन्न विचारधाराओं से उपजे राष्ट्रवाद को रेखांकित किया।उन्होंने कहा कि रोटी, कपड़ा और मकान के अतिरिक्त अपनी अस्मिता के सम्मान की तलाश आवश्यक है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो हरिनारायण ठाकुर ने कहा कि हिंदू ,मुसलमान, सिख, इसाई, जैन, बौद्ध, दलित, पिछड़ा, स्त्री और आदिवासी अस्मिताएं हैं। ये सारी अस्मिताएं जब एक हुईं तो भारतीय संविधान बना। आपने कहा कि विविध अस्मिताएं ही राष्ट्रवाद की असली पहचान और ताकत हैं। विविधता जहां नहीं होगी वहां राष्ट्रवाद हो ही नहीं सकता। वैसे संविधान में राष्ट्र शब्द का प्रयोग नहीं है वहां स्टेट शब्द का प्रयोग है। भक्तिकाल की तरह राष्ट्रवाद के लिए आज सांस्कृतिक आंदोलन की आवश्यकता है।



इस संगोष्ठी में मंच का संचालन डॉ शिवेंद्र कुमार मौर्य ने, अतिथियों का स्वागत डॉ संतोष सारंग ने और धन्यवाद ज्ञापन डॉ रवि रंजन ने किया। इस मौके पर प्रो. पूनम सिंह, प्रो रमेश ऋतंभर, प्रो संजय सुमन, डॉ विनोद बैठा, डॉ विजय कुमार,डॉ नूतन कुमारी,डॉ ज्योति, डॉ अविनाश कुमार, डॉ रामदुलार साहनी, डॉ संदीप सिंह, विपिन बिहारी,शांति,अशोक गुप्त,मिथिलेश, हरेराम महतो,साधु शरण सिंह,रिंकू कुमारी, ऋषि कुमार,लवकेश,नीरज,सुजीत,विक्की,निधि,पवन काजल,बादल,मधु,अर्चना और कई अन्य छात्र/छात्राएं उपस्थित रहे।

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