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“पेड़,पानी और प्रतिबद्धता : विजयपुरा की हरियाली की अद्भुत कहानी”

‘विजयपुरा का कोटि वृक्षा अभियान,हरियाली की नई इबारत को मनेरेगा का संबल’ : दैनिक भास्कर से साभार

ग्राउंड स्टोरी:मनोरमा

कर्नाटक का विजयपुरा (पूर्व नाम बीजापुर) राज्य के सबसे सूखाग्रस्त जिलों में से एक रहा है। बल्कि इसे कर्नाटक का जैसलमेर कहा जाता था। लेकिन 2016 में हुई एक शुरुआत ने 2026 तक आते आते सूखे को हरियाली में बदल दिया, भूमिगत जलस्तर को कई तालुके में साल दर साल बेहतर किया। लगातार यहाँ की AQI या एयर क्वालिट  बेहतर हुई है। साथ ही तापमान में  0.6°C से 2-3°C तक की कमी दर्ज हुई।  हालाँकि बीजापुर अपने 51 मीटर ऊँचे गोल गुम्बज (जो विश्व के सबसे बड़े बिना सहारे वाले गुंबदों में से एक है और वैसे विश्व का दूसरा सबसे बड़ा गुंबद है) के लिए  प्रसिद्ध है  लेकिन अब इसकी चर्चा इसकी हरियाली के कारण हो रही है, अंतर्राष्ट्रीय अख़बारों में एक केस स्टडी के तौर पर यहाँ के ग्रीन इनिसिएटिव का जिक्र हो रहा है।

 आखिर इसकी शुरुआत कैसे हुई?

संतोष अजूर, जो विजयपुरा में रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर (आरएफओ) हैं और कोटि वृक्ष अभियान (मिलियन ट्रीज़ मूवमेंट) का नेतृत्व करते हैं बताते हैं, साल  2016 की गर्मियों में तत्कालीन जल संसाधन मंत्री एम.बी. पाटिल को एक फॉरेस्ट अधिकारी ने बताया कि विजयपुरा का फारेस्ट कवर सिर्फ 0.17% है जबकि पूरे कर्नाटक का औसत फारेस्ट कवर 20% से कुछ ज्यादा ही था। इस जानकारी ने उन्हें तुरंत इस पर कार्य करने को बाध्य कर दिया और यहीं से विजयपुरा के कोटि वृक्षा अभियान की शुरुआत हुई। जिसमें एम.बी.पाटिल के साथ फॉरेस्ट अधिकारियों, अलग अलग विभागों, स्कूल कॉलेज के बच्चों, छात्रों, आम लोगों, पंचायतों और कई एनजीओ सबने मिलकर काम करना शुरू किया।

एम.बी. पाटिल ने जिले के तीन वन विभागों टेरिटोरियल, सोशल फॉरेस्ट्री और केबीजेएनएल समेत  50 से ज्यादा एनजीओ, शिक्षा-संस्थानों, किसानों, राजनीतिक दलों और आम नागरिकों को इस अभियान के साथ जोड़ा। एक नॉन-प्रॉफिट संगठन बनाया गया ताकि सरकारी प्रक्रियाएं तेज हों सके। इसके कार्यान्वयन के लिए लगभग 200 करोड़ रुपये जुटाए गए थे और सरकारी के अलावा पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी ) मॉडल से भी अभियान के लिए पर्याप्त फण्ड जुटाया गया। एमबी पाटिल दूसरे मंत्रालय में होने के बाद भी इस अभियान से जुड़े हैं और सरकारी के साथ निजी स्तर पर भी लगातार मदद करते रहे हैं। एक अच्छी बात अन्य सरकारी विभागों का इस अभियान के लिए बेहतर संयोजन और सहयोग भी है, राजस्व विभाग से वन लगाने के लिए जमीन इसलिए आसानी से मिल जाती है।

अभियान की चुनौतियों में सबसे पहले सिंचाई, बंजर अनुपजाऊ मिट्टी और पौधों का सर्वाइवल था। विजयपुरा के स्थानीय पत्रकार फिरोज रोजींदार कोटि वृक्षा अभियान की सफलता को सबसे पहले एम बी पाटिल के द्वारा 2016 से भी पहले बतौर सिंचाई मंत्री किये गए सिंचाई और जल प्रबंधन के कार्यों से जोड़कर देखते हैं और बताते हैं कि जिले की लगभग 60 फीसदी कृषि भूमि सिंचित भूमि की श्रेणी में है इससे लम्बे समय में पेड़ लगाने के साथ खेती करना भी आसान हुआ है। वो कहते हैं आज बीजापुर अरहर दाल के उत्पादन में राज्य में दूसरे स्थान पर आता है इसके अलावा पारम्परिक मोटे अनाजों की खेती के साथ बीजापुर नीम्बू, अनार, गन्ना, आम इन सभी के उत्पादन में आगे आ रहा है। क्या इससे किसानों की आमदनी, रोजगार में फर्क आया है? फिरोज कहते हैं ऐसा कोई अध्ययन नहीं है लेकिन एग्रो फॉरेस्ट्री से किसानों की आमदनी के नए स्रोत बने हैं और सिंचाई की सुविधा ने खेती -किसानी में मजदूरों के कार्यदिवस में बढ़ोतरी की है। और इसकी तस्दीक संतोष अजूर भी करते हैं और इस अभियान के संयोजक प्रोफ़ेसर मुरुगेश पट्टनशेट्टी भी।  अक़्वा डक्ट को यहाँ लोग आधुनिक समय का गोल गुम्बज जैसा बड़ा निर्माण कहते हैं।  वैसे इस शहर में आदिलशाही के समय से ही जल संग्रह तालाबों, नहरों और जलसेतु का जाल मौजूद था जिसे बाद में अलमाटी डैम के अलावा खासतौर पर एमबी पाटिल ने अक़्वा डक्ट और नहरों के मार्फ़त और बेहतर किया।

संतोष अजूर बताते हैं, हमने चरणबद्ध तरीके से काम किया और सबसे ज्यादा फोकस पौधों के सर्वाइवल पर रहा। सामान्य प्लांटेशन में सर्वाइवल रेट 60-70% होता है, लेकिन यहां 95-98% पौधे जिंदा रहे। पहले 14 सरकारी नर्सरी बनाई गईं।दो सौ से ज्यादा देसी (नेटिव) प्रजातियों पर फोकस किया गया नीम, बरगद, पीपल , अंजीर, आम, इमली, पीपल, बरगद, जामुन, चन्दन, बांस आदि। फलदार पेड़ों को प्राथमिकता दी ताकि किसानों को लाभ हो। पौधे 25-80 किलो के बड़े बैगों में उगाए गए जिसमें मिट्टी में  नमी बरकरार रहती है। सब्सिडाइज्ड रेट पर या फ्री में किसानों और आम लोगों में पौधा वितरण किया गया (1-10 रुपये प्रति पौधा) CSR के तहत कंपनियोन को शामिल किया गया। उपहार में पौधे देने को प्रचारित किया गया, स्कूलों में वृक्षारोपण के साथ बच्चों को चॉकलेट देकर प्रोत्साहित किया गया। कम्युनिटी पार्टिसिपेशन के तहत  ‘जन्मदिन पर पेड़ लगाओ’, रक्षाबंधन के दिन ‘वृक्ष बंधन, अप्रैलकूल, कैंपेन, शादियों में गुलदस्ते की जगह पौधा गिफ्ट, ‘वृक्षाथॉन’आदि शुरू किया गया।

सिंचाई की मौजूदा सभी सुविधा के अलावा सौर ऊर्जा से चलने वाला  ड्रिप इरिगेशन सिस्टम अपनाया गया जिसमें  पानी की बर्बादी लगभग नहीं होती है। मियावाकी मेथड को भी अपनाया गया। कृष्णा नदी के पानी को पाइपलाइन और अक़्वा डक्ट से जिले के पुराने तालाबों, झीलों और कुओं में मोड़ा गया। सदियों पुराने जल स्रोतों को पुनर्जीवित किया। फिर देखभाल और सस्टेनेबिलिटी 24 घंटे निगरानी, निरिक्षण और मेंटेनेंस पर ध्यान दिया गया। किसानों को एग्रोफॉरेस्ट्री से जोड़ा गया , फसल (गन्ना, कपास) के साथ पेड़ लगाने से उनकी आय बढ़ी। एंटी-पोचिंग टीम बनाई गई, फॉरेस्ट गार्ड्स को इंश्योरेंस दिया गया।

भूतनाल झील जहां 545 एकड़ पथरीली और बिल्कुल बंजर जमीन पर ड्रिप सिंचाई से जंगल उगाया गया

संतोष अजुर कहते हैं, विजयपुरा 10 लाख हेक्टेयर के साथ कर्नाटक का दूसरा सबसे बड़ा जिला है जिसमें 0 .17 या 1700 हेक्टेयर नोटिफाइड फारेस्ट है और 8 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि है। बाकी 2 लाख हेक्टेयर जमीन ही बाकी और जरूरतों और वृक्ष अभियान के लिए है। सबसे उल्लेखनीय बात ये है कि इस अभियान से हर साल लगभग 247 एकड़ जमीन फारेस्ट कवर में बदल रहा है। जिसके तहत गांवों में कम्युनिटी फॉरेस्ट ब्लॉक, स्कूल-कॉलेज, सड़क किनारे, कब्रिस्तान, निजी खेतों में एग्रोफॉरेस्ट्री, पहाड़ियों पर रोपण किया जा रहा है। मामादपुर आरक्षित वन  इस अभियान का सबसे प्रमुख क्षेत्र है। यहाँ 600 एकड़ से अधिक बंजर भूमि को हरे-भरे वन में बदला गया है, और 60,000 से अधिक देशी प्रजातियों के पौधे लगाए गए हैं। इसके अलावा विजयपुरा शहर के बाहरी इलाकों में बड़े शहरी वन  विकसित किए गए हैं। टिकोटा और बबलेश्वर  तालुका के ग्रामीण इलाकों में भी बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया गया है। दोमानल गाँव की बंजर पहाड़ियों को हरा-भरा किया गया है।

भूतनाल झील के पास अब 547 एकड़ में नीम, पीपल, बरगद, पाइकस जैसे लगभग 67 हजार स्थानीय पेड़ों का हरा -भरा जंगल तैयार है लेकिन नौ साल पहले यह बिल्कुल बंजर जमीन थी चट्टानों से भरी हुई राजस्व विभाग की जमीन को इस अभियान ने वन भूमि में बदल दिया, चट्टानों को ब्लास्ट करके तोड़ा गया और झील के गाद या सिल्ट को मिट्टी की तरह भरा गया, ख़ास बात ये है कि जंगल पूरी तरह से ड्रिप इरिगेशन से सिंचित है, अस्सी के करीब एचपी पम्प हैं और ढ़ाई लाख लीटर पानी का इस्तेमाल होता है, ड्रिप मॉडल से पहले टैंकर से पानी डाला जाता था।  मुरुगेश कहते हैं यहाँ अब 180 प्रजाति की चिड़िया देखी जा सकती हैं, इसके अलावा एक दर्जन से ज्यादा दुर्लभ सांप और सियार, लोमड़ी, तीतर, खरगोश  जैसे जानवर भी हैं।

संतोष अजुर कहते हैं, बीजापुर के ग्रीन कवर में नरेगा और मनरेगा का भी बहुत बड़ा हाथ है, और हम ये गर्व से कह सकते हैं कि मनरेगा का बहुत प्रभावी तरीके से हमने इस्तेमाल ग्रीन कवर विकसित करने में किया। तो क्या मनरेगा में बदलाव से क्या इस अभियान पर फ़र्क़ पड़ेगा? संतोष कहते हैं मुझे नहीं लगता इससे कोई फ़र्क़ पड़ेगा, अभी नए बदलाव के तहत काम नहीं लिया गया है।

ग्रीन मैराथॉन जिसे वृक्षाथॉन कहते हैं इस अभियान को लेकर जागरूकता और फण्ड के लिए एक सालाना आयोजन है जहाँ 23  हजार से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया इसके अलावा यहाँ के सीटिंग एमएलए बसनागौड़ा आर. पाटिल हर साल इसमें हिस्सा लेते हैं और अपनी ओर से 10 लाख से ज्यादा राशि का सहयोग इस अभियान के लिए करते हैं, और वृक्षाथॉन को स्पांसर भी करते हैं। ये भी उल्लेखनीय है कि यहाँ पिछले चार टर्म से भाजपा के सांसद हैं और 8 विधायकों में 6 कांग्रेस के और 1-1 भाजपा और जेडीएस के हैं लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता राज्य में किसी की भी पार्टी की सरकार रही हो लेकिन पेड़ लगाने का यह अभियान बगैर रोक टोक के जारी रहा है।  मुरुगेश इसके पीछे एक ख़ास प्रेरणा का जिक्र करते हैं और कहते हैं सिद्धगंगा मठ के दिवंगत प्रमुख डॉ. शिवकुमार स्वामीजी जिन्हें यहाँ लोग “नदेदादुवा देवरु” (चलते-फिरते भगवान) कहते रहे हैं, उन्होंने शिक्षा और समाजसेवा के जरिए बीजापुर (विजयपुरा) इलाके में बहुत बड़ा बदलाव किया , खासकर गांवों के विकास और गरीब लोगों की मदद करने में। किसी भी राजनीतिक विचारधारा, जाति धर्म से अलग यहाँ के लोगों और राजनीतिज्ञों में कोटि वृक्षा अभियान के प्रति प्रतिबद्धता के पीछे वो एक सशक्त प्रेरणा रहे हैं।सफलता की एक और बड़ी वजह संतोष पौधों की कैजुअल्टी कम होना बताते हैं। लगभग 15 नर्सरी में पौधे तैयार होते हैं, जिसमें बरगद, इमली, चन्दन, पाइकस , जामुन, मिस्वाक, महोगनी, बांस, जैसे पौधे तैयार किये जाते हैं लेकिन बरगद और इमली जैसे पौधों को तीन साल तक नर्सरी में ही रखा जाता है वो भी 25 X 25 के बड़े बैग में, बाकी पौधे भी एक -दो साल नर्सरी में रहते हैं, इसके कारण पौधे दूसरी जगह लगाने पर मरते नहीं हैं।  इस अभियान की सफलता इन नर्सरियों के मार्फ़त निः शुल्क या बहुत कम कीमत पर पौधों का वितरण भी है।

संतोष बताते हैं, अपने स्तर पर पेड़ लगाने के लिए पौधों के लिए यहाँ लोगों की लम्बी लाइन लगती है ।

मुरुगेश इस अभियान की सफलता ये भी मानते हैं कि देखिये महाराष्ट्र के 170 अधिकारी यहाँ से प्रशिक्षण लेकर गए और अब देखिये वहां मुख्यमंत्री ने 300 करोड़ पेड़ लगाने के अभियान की घोषणा की है। हम इसे सकरात्मक असर मान सकते हैं। अब आगे पांच करोड़ पेड़ लगाने के लिए आप लोगों की क्या योजना है ? संतोष बताते हैं , अभी निर्देश नहीं आया है लेकिन यह आइडिया के तौर पर सरकार के द्वारा जाहिर किया जा चूका है।

वैसे बीजापुर शहर में हरियाली बढ़ी है यह पूछने पर स्थानीय निवासी और गोल गुम्बज में कर्मचारी सविता ( नाम परिवर्तित ) बताती है बढ़ी है लेकिन पिछले चार -पांच साल में निर्माण कार्यों में बढ़ोतरी के कारण शहर के पेड़ कटे भी हैं। इसके जवाब में एक और स्थानीय निवासी सतीश कहते हैं लोगों को चौड़ी सड़कें, फ्लाईओवर भी चाहिए आखिर इसके लिए पेड़ काटेंगे ही। लेकिन संतोष अजुर कहते हैं इस अभियान ने लोगों को पहले से बहुत अधिक जागरूक किया है, बीजापुर में पेड़ काटने के लिए वन विभाग की अनुमति नहीं चाहिए लेकिन फिर भी लोग पेड़ कटते देखने पर हमारे हेल्पलाइन पर फ़ोन करते हैं। स्टेशन रोड पर हमने अपने हस्तक्षेप से सौ साल से ज्यादा पुराने चार इमली के पेड़ को बचाया जो सड़क निर्माण के दौरान अनिवार्य रूप से काटे जाने थे। लेकिन हमेशा यह संभव नहीं है, संतुलन जरूरी है और पुराने पेड़ों के बदले नए पेड़ लगाकर क्षतिपूर्ति नहीं की जा सकती उसमें पचास, सौ साल लगेंगे। संतोष अजुर बताते हैं पेड़ों का प्रत्यारोपण या ट्री ट्रांसप्लांटिंग सभी प्रजाति के वृक्षों में सफल नहीं होता अतः उन्हें कटने नहीं देना ही सबसे बढ़िया विकल्प है। निर्माण कार्यों के लिए शहर में साल में 300 -400 पेड़ जरूर कटते हैं इसकी भरपाई निर्माण में शामिल पार्टी को ज्यादा जवाबदेह बनाकर ही किया जा सकता है।

लेकिन ज्यादा महत्वपूर्ण बात ये है कि इस अभियान के कई प्रकृति प्रेमी हीरोज में से एक 71 वर्षीय सेवानिवृत्त जिला पंचायत अधीक्षक एन.डी. पाटिल जैसे लोग भी हैं जो बीजापुर में “डोमनल के हरित पुरुष” के रूप में जाने जाते हैं, उन्होंने अपने रिटायमेंट के पैसे लगाकर एक बंजर पहाड़ी को नीम, अंजीर और जामुन जैसे स्थानीय प्रजाति के पेड़ों से हरे-भरे जंगल में बदल दिया है। इस जंगल को तैयार करने में उन्होंने शुरूआती तीन -चार साल एक एक पौधे की खुद से देखभाल की ताकि पौधे बच सकें और बढ़ सकें। फिरोज बताते हैं ऐसे कई छोटे छोटे प्रयास भी महत्वपूर्ण हैं जिसमें लोग अपने घर में उपलब्ध थोड़ी सी भी खाली जमीन पर पेड़ लगा रहे हैं। खुद से देखभाल की ताकि पौधे बच सकें और बढ़ सकें। फिरोज बताते हैं ऐसे कई छोटे छोटे प्रयास भी महत्वपूर्ण हैं जिसमें लोग अपने घर में उपलब्ध थोड़ी सी भी खाली जमीन पर पेड़ लगा रहे हैं।

आस्था का सम्मान

कहानी :अभय कुमार

चौबे टोला गाँव के बाज़ार के पास एक मंदिर था। मंदिर के पास ही एक पुराना बरगद का पेड़ था। लोग कहते हैं कि यह कई सौ साल पुराना पेड़ है। हज़ारों चिड़ियाँ यहाँ रहती थीं। कई बार साँप को भी पेड़ की जड़ों में घुसते हुए देखा गया था। विशाल बरगद के नीचे दिन में लोग ताश खेलते थे, और शाम से लेकर देर रात तक गाँव के सवर्ण वहाँ बैठते और चिलम फूँकते थे। बरगद के पेड़ के नीचे लगने वाली महफ़िल में वे लोग बिना नागा के पहुँचते थे, जो घर की ज़िम्मेदारियों से ख़ुद को ‘फ़ारिग’ कर चुके थे।

वहाँ बैठने वालों में बहुत ऐसे भी थे, जिनकी पत्नियाँ मर चुकी थीं, या फिर कुछ वैसे भी थे, जिनकी पत्नियाँ ज़िंदा तो थीं, मगर उनसे बनती नहीं थी। वे ऐसे ‘सज्जन’ और ‘उदार’ थे कि अपनी बीवी को छोड़कर गाँव की तमाम औरतों के सबसे बड़े ‘खैरख्वाह’ बन जाते थे। कुछ तो ऐसे भी थे, जो कई बार दलित बस्तियों की महिलाओं पर बुरी नज़र डालने के कारण गालियाँ भी खा चुके थे और लात भी।

बरगद के पेड़ के नीचे सब लोग रात के खाने से पहले बैठते थे। उनमें कुछ गांजा पीते थे, कुछ खैनी खाते थे। मोबाइल पर ‘न्यूज़ एंकर’ के ‘ज्ञान’ को ग्रहण कर फिर उसे कई जगहों पर छितराते थे। देश-दुनिया की बातें खूब होती थीं, मगर उनकी बातों को सुनकर ऐसा लगता था कि बातें वे बोल रहे हैं, लेकिन उनके मुँह में ‘कैसेट’ किसी और का बज रहा हो।

ऐसी ही एक शाम मास्टर संजय मिसिर ने चिलम सुलगाते हुए कहा,

“मोबाइल पर न्यूज़ देखी आप लोगों ने? मंत्री जी इस इतवार को ज़िला मुख्यालय में भव्य मंदिर का उद्घाटन करने आ रहे हैं। मानना पड़ेगा कि नेता जी के पास ग़ज़ब की हिम्मत है। ऐसे धर्मवीर सौ साल में एक बार जन्म लेते हैं, जो अपने धर्म की रक्षा के लिए सब कुछ त्याग देते हैं।”

मास्टर संजय मिसिर पेशे से शिक्षक थे। रिटायरमेंट में कोई दो-चार साल और बचे होंगे। बच्चों को पढ़ाने और स्कूल में समय देने से ज़्यादा उनकी दिलचस्पी मुखिया और विधायक के आगे-पीछे घूमने में थी। साल भर घूम-घूमकर खाते थे। बच्चों को पढ़ाने से ज़्यादा यह पूछते थे कि उनके घर में कौन-सी फसल, फल और सब्ज़ी उगती है। यह भी पूछते थे कि अगर घर में गाय या भैंस है, तो गुरुजी के लिए दही और घी भेंट करें।

मास्टर संजय मिसिर माथे पर चंदन और टीका लगाए रहते थे, और जब मौक़ा मिलता, तो जजमानी भी करने लगते थे और जजमान के घर में मौजूद सारी चीज़ों को अपने झोले में लपेट लेना चाहते थे। सिर्फ़ मैट्रिक पास थे और पैरवी की मदद से टीचर बन गए, मगर नेताओं के बीच में रहकर, टी.वी. न्यूज़ देखकर और लाठी-धारी संगठनों की कार्यशालाओं में शामिल होकर उनके पास बोलने की कला आ गई थी। 

मगर उस दिन लालबहादुर पाड़े भी उनकी बातों को सुन रहे थे। पाड़े की उम्र कोई चालीस साल थी। वह इंटर पास थे और कॉलेज के दिनों में लाल-परचम वाली पार्टी से जुड़ गए थे। एक पाड़े ही थे, जिनके पास मास्टर संजय मिसिरसे बहस करने की कुछ क्षमता थी।

बरगद की नीचे बैठे बैठें लालबहादुर पाड़े सारी बातें सुन रहे थे फिर अचानक से उन्होंने मास्टर संजय मिसिर को धीरे से टोका, “मगर सुना है कि वह मंदिर एक दूसरे समुदाय के धार्मिक स्थल को गिराकर बनाया गया है…”।

चिलम फूँकने के कारण मास्टर संजय मिसिर को काफ़ी नशा चढ़ गया था, मगर पाड़े की बात सुनकर उनका कुछ नशा उतर गया। मास्टर मिसिर ने पाड़े की बात कुछ यूँ काटी: “पाड़े जी, आप भले आदमी हैं, लेकिन लाल-झंडे वालों के असर में आपका दृष्टिकोण उल्टा हो गया है। आप कुतर्क करने में माहिर हो गए हैं। ‘एंटी-नेशनल’ लोगों के साथ रहेंगे, तो सोहबत का असर पड़ेगा ही। एक ब्राह्मण के मुँह से जब देश-विरोधी और हिंदू-विरोधी बातें सुनता हूँ, तो बहुत तकलीफ़ होती है। पाड़े जी, बार-बार मैंने आपसे अनुरोध किया है कि देश जोड़ने वालों के साथ रहिए और उनका साथ छोड़ दीजिए, जो खाते देश का हैं, गाते विदेशियों का हैं। यही तो इस देश की त्रासदी है। देशद्रोहियों के तुष्टिकरण का ज़हर इस देश को खा गया है! और इस ज़हर की प्रयोगशाला लाल-झंडे वाली पार्टियाँ हैं।”

पास बैठे शंभु सुकुल ने मास्टर संजय मिसिर की बातों की हिमायत करते हुए कहा, “मास्टर जी की बात में तो दम है। आजकल के बच्चों को कॉलेज और यूनिवर्सिटी में पढ़ने भेजो, तो वे पढ़ाई कम और राजनीति ज़्यादा करते हैं। मेरा भी एक मामा का लड़का दिल्ली गया था पढ़ने। जाने से पहले तो बड़ा संस्कारी था, मगर जब पढ़ाई पूरी करके आया, तो एक दिन वह मंगरुआ डोम के घर जाकर चाय पी रहा था। यह देखकर मैंने उसे खूब डाँटा और मंगरुआ डोम को मन भर गालियाँ दीं।”

यह बात सुनकर मास्टर संजय मिसिरको बल मिला और अब वे और ज़ोरों से बोलने लगे, “अब तुम ही बताओ, पाड़े जी, यह देश किसका है? हमारा, या उनका जो खाते हैं देश का और गाते हैं औरों का?”

यह सुनकर लालबहादुर पाड़े शांतिपूर्ण अंदाज़ में बोले: “मगर मंदिर-मस्जिद के झगड़ों का कोई अंत है क्या? अगर आप मस्जिद से पहले मंदिर की बात करेंगे और मस्जिद तोड़ने की बात करेंगे, तो फिर आपको इस बात के लिए भी तैयार रहना होगा कि मंदिरों से पहले भी तो कुछ था। क्या वे बुद्ध के स्थल थे? क्या वे आदिवासियों के जाहेरथान थे?”

यह सुनकर मास्टर संजय मिसिर का चेहरा तमतमा गया। ग़ुस्से से उनकी नाक फड़कने लगी। उन्होंने ऊँची आवाज़ में कहा, “देखो लालबहादुर पाड़े, अपना महान ज्ञान अपने पास रखो। देश के एक संत ने हमारे समाज का सत्यानाश कर दिया। पायजमा की चापलूसी करते रहे और उनके कट्टरपन पर आँख बंद किए रहे, और उल्टा हमें उपदेश देते रहे कि सब धर्म एक ही हैं!”

“मगर यह तो सच है,” पाड़े ने बीच में कहा।

यह सुनकर मास्टर संजय मिसिर आग-बबूला हो गए और बोले: “हमारे समाज के बुद्धिजीवियों के दिमाग़ में गोबर भर गया है। सब धर्म कैसे बराबर हो गए? जिस धर्म में बचपन से मुर्गी और बकरी काटने की तालीम दी जाती हो, वह हमारे धर्म के बराबर कैसे हुआ, जहाँ चींटियों को भी दाना खिलाया जाता है?”

“चींटियों को दाना तो खिलाया जाता है, मगर एक इंसान को अछूत कहकर क्यों दुत्कारा जाता है?” पाड़े ने प्रश्न उठाया।

“देखिए पाड़े, समाज में इतना ज़हर आप लोग ही घोल रहे हैं। जात-पात कभी यहाँ नहीं थी। यह तो विदेशी-आक्रांताओं ने यहाँ लाकर हमारे समाज को बाँटा। यह बात आप लोग कभी नहीं समझेंगे, क्योंकि आपको उनकी बिरयानी खानी है। अरे, हमारा समाज धर्म को मज़बूत करने से ही मज़बूत होगा, क्योंकि धर्म से बड़ा कुछ नहीं होता। जात-पात, ये सब अपने समाज को तोड़ने के बहाने हैं। करते रहिए आप लोग जात-पात की बात, और जो टोपी वाले हैं, वे अपनी संख्या बढ़ा रहे हैं और हम आपस में बँट रहे हैं,” मास्टर संजय मिसिर बोले।

इस बीच चिलम एक हाथ से दूसरे हाथ तक घूमता रहा। घूमकर चिलम फिर मास्टर संजय मिसिर के पास आया। उन्होंने चिलम को अपने हाथों में लिया और “जय भोले शंकर” कहकर चिलम को इतनी ज़ोर से खींचा कि उसमें लौ जल उठी और आस-पास कुछ लम्हों के लिए रोशनी फैल गई।

धुआँ मुँह से छोड़ते हुए, मास्टर संजय मिसिरबोले, “याद रखिए, नेताजी ठीक कहते हैं कि बाँटिएगा तो कटिएगा।”

मास्टर संजय मिसिर इतना ही कहकर चुप नहीं रहे, बल्कि अपने हाल के दिनों में नेताजी के आवास पर हुई एक मुलाक़ात का ज़िक्र करने लगे। “हमारे मंत्री जी ने साफ़ कहा है कि जहाँ भी हमारे मंदिर तोड़े गए हैं, वहाँ हम मंदिर बनाएँगे, चाहे प्यार से बनें या लाठी के ज़ोर पर। और अब हम डरने वाले नहीं हैं। याद रखिए, पाड़े, यह पहले का देश नहीं है। आज हमारा समाज जाग गया है और उसे जगाने वाली सरकार आ गई है। आज उसी जागरण के कारण वह मंदिर तैयार हुआ है। यही वजह है कि कल हर भक्त मंदिर के उद्घाटन समारोह में जाएगा और प्रभु का दर्शन करेगा। जिनको बिरयानी की फ़िक्र है, वे घर में चुपचाप चादर तानकर लेटे रहें या फिर कल छाती पीटकर मातम मनाएँ।”

इसी बीच, मंत्री जी के प्रतिद्वंद्वी और पिछली बार मात्र पाँच सौ वोटों से चुनाव हार चुके गजेंद्र चौबे के एक समर्थक, भोला तिवारी बोले, “देखिए संजय भाई, हम सब आपका आदर करते हैं। यह आपको शोभा नहीं देता कि आप विपक्षी पार्टियों के योगदान को भुला दें। मंदिर बनवाने का सारा श्रेय मंत्री जी को देना ठीक नहीं है। इस काम की पहल तो हमारी पार्टी ने सालों पहले की थी। मंदिर के हक़ में कोर्ट में मामला भी हम ही लोग ले गए थे। उस वक़्त तो मंत्री जी को कोई जानता भी नहीं था।”

भोला तिवारी की बातों को सुनकर कुछ लोगों ने हामी भरी, और फिर वे तक़रीर के मूड में आ गए: “आज अगर गजेंद्र बाबू चुनाव हार गए हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि उनका योगदान मंदिर निर्माण में किसी से कम हो गया है। दरअसल, हमारे समाज के जागरण का काम गजेंद्र बाबू से ज़्यादा किसी ने नहीं किया है। वह किसी भी पार्टी में हों, उनके दिल में हमेशा हमारे धर्म और समाज का हित ही सर्वोपरि रहा है। जब भी माहौल बिगड़ा, उन्होंने लाल-झंडे धारियों की तरह टोपी वालों को खुश करने की कोशिश नहीं की, बल्कि अपने समाज के साथ खड़े हुए। आप इस बात को भी तो बोलिए।”

“बात में दम तो है,” वहाँ बैठे शंभु सुकुल ने कहा।

यह सुनकर भोला तिवारी का जोश और बढ़ गया, और वे अधिक आत्मविश्वास के साथ बोलने लगे: “संजय भाई, यह मत भूलिए कि आज ही के न्यूज़पेपर में उन्होंने मंदिर उद्घाटन का स्वागत किया है और कहा है कि वे अपने समर्थकों के साथ ज़िला मुख्यालय जाएँगे और मंदिर के प्रांगण में कीर्तन-भजन करेंगे। इसलिए मंत्री जी को सारा क्रेडिट देना कहीं से उचित नहीं है।”

यह सारी बातें सुनकर मास्टर संजय मिसिर बोले: “देखिए, आप जिनका खाते हैं, उनका गाते भी हैं। आप कुछ भी कह लीजिए, काम तो मंत्रीजी ने ही किया है। अगर ऐसा नहीं होता, तो मंदिर पहले के दौर में ही बन जाता। देखिए, आज हमारा समाज जग गया है, इसलिए बहुत लोग अपना सुर बदल रहे हैं।”

बहस काफ़ी लंबे वक्त तक चली। रात भी काफ़ी हो चुकी थी। बरगद के पेड़ के नीचे की मजलिस आज के लिए ख़त्म हो गई। सभी लोग अपने-अपने घर चले गए।

जब सुबह हुई, तो पाड़े ने देखा कि गाँव में लोगों को मंदिर के उद्घाटन में ले जाने के लिए मंत्रीजी ने गाड़ियाँ भेज दी हैं। मास्टर संजय मिसिर भी लोगों से मंदिर उद्घाटन में जाने के लिए कह रहे थे। कुछ लोग तो जाने के लिए तैयार हो गए, मगर बहुत से लोग यह कहकर टाल-मटोल कर रहे थे कि उन्हें मज़दूरी करने जाना है।

मास्टर संजय मिसिर को लगा कि अगर बस की सीटें नहीं भरेंगी, तो उन्हें डाँट पड़ेगी। इसलिए उन्होंने मंत्रीजी के निजी प्रतिनिधि को सारा मामला बता दिया। फिर निजी सचिव ने उन्हें फोन पर कुछ सलाह दी और कहा कि एक व्यक्ति कार से उनके पास थोड़ी देर में पहुँच रहा है।

कार की डिक्की में पूड़ी, लड्डू और सब्ज़ी के पैकेट थे। मास्टर हेमंत मिसिर घर-घर जाकर कहने लगे कि मंदिर के उद्घाटन पर जाने के लिए खाना मिलेगा और हर व्यक्ति को दो सौ रुपये भी मिलेंगे।

कुछ लोगों ने सोचा कि मज़दूरी में भी दो सौ रुपये मिलते हैं, तो अगर बस में बैठकर शहर घूमने और पूड़ी खाने के लिए इतने ही पैसे मिल रहे हैं, तो इसमें क्या बुरा है। देखते ही देखते चार बसें पूरी तरह भर गईं, और मास्टर संजय मिसिरने हर सीट पर बैठे व्यक्ति को सौ-सौ के दो नोट दे दिए। बस फिर शहर के लिए रवाना हो गई।

इधर लालबहादुर पाड़े ने लाल-झंडे वाली पार्टी के अपने सीनियर लीडर को फोन किया और कहा कि मंदिर उद्घाटन के दिन एक बड़ा विरोध प्रदर्शन किया जाए। अपनी दलील में वे कहते हैं, “साथी, नफ़रत काफ़ी बढ़ गई है। लोगों को धर्म के आधार पर बाँटा जा रहा है। हमें लोगों को नफ़रती ताक़तों के ख़िलाफ़ एकजुट करना होगा। कमज़ोर तबकों के साथ खड़ा होना होगा।”

पाड़े की बात सुनकर पार्टी मुख्यालय के सीनियर नेता ने कहा, “साथी, आप शांत हो जाइए और आप परेशान न हों। हम इसका जवाब चुनाव में देंगे।”

“मगर चुनाव के इंतज़ार में हम समाज को जलते हुए तो नहीं देख सकते?” पाड़े ने जवाब दिया।

यह सुनकर सीनियर लीडर ने कहा, “शांत हो जाइए, साथी। जोश में होश नहीं खोना है। यह बात याद रखिए कि आज मंदिर के प्रति लोगों की श्रद्धा काफ़ी बढ़ गई है। इसलिए हमें कोई भी ऐसा काम नहीं करना है जिससे जन-मानस हमसे नाराज़ हो जाएँ। अभी वक़्त फूँक-फूँक कर क़दम रखने का है। हमें लोगों की आस्था का सम्मान करना है; नहीं तो जब चुनाव आएगा, तो हमारे विरोधी हमें धर्म-विरोधी, समाज-विरोधी और देश-विरोधी बताकर बदनाम करेंगे।”

यह बात सुनकर लालबहादुर पाड़े फ़ोन पर ही ज़ोर से चिल्लाने लगे, “समझ गया आपको। लाल परचम की आड़ में आप लोग अपना चेहरा छुपाए हुए हैं। समझ गया आप लोगों को। अब मुझे शर्म आती है कि मैं आप लोगों के साथ क्यों जुड़ा और काम किया।” यह कहकर पाड़े ने अपना फ़ोन काट दिया और वहीं ज़मीन पर बैठ गए। उनकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया था और उन्हें सब कुछ लुटा हुआ नज़र आ रहा था।

अभय कुमार : लेखक

‘शतरंज’ की बिसात पर सोशल मीडिया ‘के खिलाड़ी’

व्यंग्य आप सह्रदय समाज से हैं इसलिए मैं निश्चिन्त होकर मान ले रहीं हूँ कि ‘शतरंज के खिलाडी’ कहानी से आप परिचित होंगे ही, जिसमें वे नवाबी शौक में डूबे और जनता को ‘डुबाते’ सामंती,जागीरदारों के ‘शतरंज की दलदल’ में गोते लगाते ‘लती’ मित्रों का मनोरंजक चित्र खींचा है| प्रेमचंद की इस कहानी पर सत्यजीत रे ने अपना ‘सत्व’ जोड़, जो सॉलिड फ़िल्म बनायी उसकी भी क्या ही कोई मिसाल है! प्रेमचंद जी ने वाज़िदअली शाह के समयकाल की ‘बिसात’ पर अपना कथानक/ प्लाट सजाया,‘यथा राजा तथा प्रजा’ की तर्ज़ पर बुना कथानक अवध के बादशाह वाज़िदअली शाह के सिंहासन से बेदखल होने और उसकी रियाआ विशेषकर सामंतवाद के पतन की दास्ताँ कहता है, “जिनकी सारी अक्ल और हिम्मत तो शतरंज ने चार ली” सामंती समाज की अकर्मण्यता और खोखली शान लेकिन विलासिता का अत्यंत सजीव चित्रण करते हैं,नवाब-जागीरदारों या सामंतों में कबूतरबाजी,तीतर,बटेर,बकरी,भेड़ लड़ाना, शतरंज-गजीफा रईसों के चोंचले ही थे, जिसमें समय और ‘पैसा उड़ाना ही उनका काम था’ | कहानी में ‘शतरंज’ को सोशल मीडिया के संदर्भ में पढ़ें तो बड़ा ही रोचक तथ्य मेरे सामने आता है,जैसे आज की अकर्मण्यता यानी बेरोज़गारी,और उसकी खोखली शान को सोशल मीडिया में पूरे ‘ठाठ-बाट’ के साथ परोसा जाता है| फेसबुक,ट्विटर, टिक-टाक,यूट्यूब,वीडियो गेमज़ नेट सर्फिंग आदि ‘आभासी दुनिया’ की लत, फ्री डाटा के साथ, भरपूर मनोरंजन और सूचनाओं के नाम पर लगाई जा रही है और फ्री में मिल क्या रहा है- ‘वैचारिक विखंडन, बौद्धिक शून्यता सूचनाओं का जंजाल जिसमें फँसकर दिमागी दिवालियापन हमें कब खोखला कर जाता है हमे एहसास तक नहीं होने पाता| यूं कह लीजिये बेतार की तकनीक वैश्वीकरण तो किया लेकिन ‘वर्चस्ववादी मानसिकता’ वही ‘ढाक के तीन पात’ विखंडवादी प्रवृति में इसके नाम-रूप बदल गए हैं बस! वे अपनी चालें फेंक घंटों,दिनों इंतज़ार करते हैं,सामने वाले की प्रतिक्रिया का मज़ा लेंतें हैं| प्रेमचंद जी कहतें हैं- “नए-नए नक़्शे हल किये जाते ;,नये नए किले बनाये जाते;नित्य नई व्यूह-रचना होती;कभी कभी खेलते-खेलते झौड़ हो जाती;तू-तू मैं-मैं की नौबत आ जाती;पर शीघ्र ही दोनों मित्रों में मेल हो जाता,कभी कभी ऐसा भी होता कि बाजी उठा दी जाती” आज भी तोफेसबुक-वाल पर यह नज़ारा आम है कभी मित्र, कभी शत्रु आरोप लांछन,की बॉल कभी इस वाल कभी उस वाल, फ़ॉलो-अनफ़ॉलो का खेल कभी ब्लॉक, नये नये चक्रव्यूह रचे जातें हैं जिसकी डोर किस ‘बेतार’ बादशाह से जुड़ी है नहीं मालूम या अनजान बने हैं, ‘तू-तू मैं-मैं’ भी उसकी कृपा से और के बाद में  मित्रता भी उसी के भरोसे क्योंकि इस अनोखी स्थायी बिसात पर ‘स्थायित्व’ कहीं नहीं मित्रता शत्रुता भी नहीं |

थोड़ा कहना;ज्यादा समझना’  सोशल मीडिया का प्रमुख लक्षण है, लेकिन ये जो डिजिटल cloud  है न, जिसमें असंख्य सैलानी ज्ञान के काले बादल उड़ा रहे हैं, हवाएं इन्हें बुलबुलों के सामान झटके में भटका कर, कहाँ से कहाँ उड़ा ले जाती है और  फोड़ भी देती है,कई बार अवशेष तक नहीं बचते| लेकिन काली घटा का घमंड ना घटा, नित नए उमड़ते घुमड़तें हैं, पल भर को सुहाते हैं, फुर्र हो जातें हैं| हाँ,‘ज्ञान राशि के संचित कोष’ ‘जलद’ भी यहाँ आतें हैं लेकिन सैर करने को नहीं! ‘जलद’ जो जल्दबाजी में नहीं बनते, आपको भी सराबोर कर, भिगोकर सृजन ने निशां छोड़ जातें हैं, समझने वाले अंतर समझ ही जाते हैं जो न समझे मेरी नजर में वे अनाड़ी तो हरगिज नहीं, ‘बाप रे बाप’ इनकी समझदारी का पुलिंदा चारों ओर तीव्रगति से यों प्रसारित होता है कि हवा भी मात खा जाए| सोशल मीडिया भी समाज ही की बेतार कड़ी   है जिससे आज सभी बंधे हैं| कहानी पर लौटते हैं, समाज में मिरजा और मीर जैसे कुछ लोगों को कई लाभ और सुविधाएँ जन्मजात प्राप्त होती है, जबकि सामाजिक इकाई के रूप में आम ‘मनुष्य’ आज भी विषमताओं से दो चार हाथ कर रहें हैं| लेकिन सामाजिक दायित्व के नाम पर रईस या उच्च वर्ग आज भी सिर्फ अपना पेट भरने और शौक पूरा करने सुख-सुविधाओं हेतु आनंद-मग्न रहतें हैं, शासन व्यवस्था से जब ऐसे लोग जुड़ जातें हैं तो जनता और देश दोनों बर्बाद हो जाते हैं| शासक वर्ग की ‘विलासिता का कीड़ा’ धीरे धीरे जनता के भीतर उतर आता है और संक्रामक रोग की तरह फैल जाता है फिर ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’| सत्यजीत रे का वाजिदअली शाह कहता है‘पहले ही तख़्त पर बैठने से इनकार कर देते तो बेहतर था लेकिन हीरे जवाहरात की चमक-दमक, शाही शानों-शौकत, हमारा मन लुभा गये’ मानव प्रकृति बदलती हैं कहीं? नहीं न !! चमक-दमक और सत्ता के मद में कोई भी शासक लापरवाह हो, राज-काज के अलावा सब काम करता है,वाजिदअली शाह और उनके नवाब-जागीरदारों को भी अपनी गरीब जनता की कोई फ़िक्र नहीं थी,इसलिए देश को गुलाम होने से कोई नहीं बचा सका|तत्कालीन शासक वर्ग की कर्तव्यहीनता का चरम तब देखने को मिलता है जब बादशाह वाजिदअली शाह  को अँगरेज़ कैद कर लेते हैं लेकिन उनके जागीरदार,आज के प्रशासकीय वर्ग की भाँति ‘कोऊ नृप को हमको का हानी’ का मखौल उड़ाते दुःख या भय से ट्रस्ट नहीं दिखाई देते बल्कि उनका उपाहास उड़ाते है|

वाजिदअली शाह के जागीरदार मिरजा और मीर, शाही ठाठ-बाट में ‘बादशाहों-सी विलासिता के रंग में डूबे,   आजीविका की कोई चिंता नहीं,पैतृक सम्पति के ‘नगर-पोते’ आलसी, कामचोर ‘शतरंज की बिसात’ पर हाथी-घोड़े हांकने वाले|वही ‘बिसात’ रूप बदल आज हमारी हथेली पर विराजमान है,जिस पर हमारी उँगलियाँ बेनागा दिमाग के घोड़े दौड़ा रही हैं, कोई एकाध समय ही ऐसा होता है जबकि हम इससे दूर होते हैं| मज़े की बात यह कि इस बिसात पर सभी खुद को खिलाडी समझे बैठें हैं!! धुरुन्धर खिलाड़ी!!! गौर फरमाइए,“वाजिदअली शाह का समय था। लखनऊ विलासिता के रंग में डूबा हुआ था। छोटे-बड़े, गरीब-अमीर सभी विलासिता में डूबे हुए थे। कोई नृत्य और गान की मजलिस सजाता था, तो कोई अफीम की पीनक ही में मजे लेता था। जीवन के प्रत्येक विभाग में आमोद-प्रमोद का प्राधान्य था। शासन-विभाग में, साहित्य-क्षेत्र में, सामाजिक अवस्था में, कला-कौशल में, उद्योग-धंधों में, आहार-व्यवहार में सर्वत्र विलासिता व्याप्त हो रही थी। राजकर्मचारी विषय-वासना में, कविगण प्रेम और विरह के वर्णन में, कारीगर कलाबत्तू और चिकन बनाने में, व्यवसायी सुरमे, इत्र,मिस्सी और उबटन का रोजगार करने में लिप्त थे।सभी की आँखों में विलासिता का मद छाया हुआ था”

आइये अब आज के डिजिटल युग जनित सोशल मीडिया से उद्भूत माहौल पर नज़र डालतें हैं- ग्लोबलाइजेशन में देशकाल को इग्नोर करने का लाभ लिया जा सकता है  ‘आज सभी  सोशल मीडिया के रंग में डूबे हुए हैं आश्चर्य हो सकता है,बेतार की इस तकनीक से विविध जाती-धर्म सम्प्रदाय के,छोटे, बड़े, स्त्री-पुरुष,अमीर, गरीब ‘एकसाथ एक मंच  पर कैसे तो जुड़ गये! टिक-टाक पर कोई नृत्य गान की मज़लिस सजाता है तो कोई यूट्यूब पर अपने विडियो अपलोड करके अपने शौक  पूरे कर रहा है,जीवन के प्रत्येक विभाग में आमोद-प्रमोद का प्राधान्य है, व्ट्सअप पर सुबह से लेकर शाम तक हँसी का माहौल चुटकुलों के रूप में अग्रसरित फॉरवर्ड हो रहा है चुटकुलों का केंद्र समाज का कमजोर वर्ग ही होता है लेकिन फॉरवर्ड करने में हम अचानक ताकतवर हो जाते हैं यही तो ख़ूबी है सोशल मीडिया की| क्या शासन,प्रशासन, राजनीति,धर्म, साहित्य सभी क्षेत्रों में,सामाजिक अवस्था में, कला-कौशल उद्द्योग धंधो में आहार-व्यवहार में सर्वत्र  सभी ट्विटर,फेसबुक,कुहू  आदि पर अपनी-अपनी बाज़ी खेल रहे हैं|सभी की आँखों में ‘स्क्रीन का मद छाया’ हुआ है| प्रेमचंद जी  गंभीरता से मनोरंजन का यथार्थ लिखतें हैं– संसार में क्या हो रहा है, इसकी किसी को खबर न थी। बटेर लड़ रहे हैं। तीतरों की लड़ाई के लिए पाली बदी जा रही है”|इस मामले में,हम भी कम गंभीर नहीं-संसार-भर की सूचनाओं के दाने तो डिजिटल युग में खूब बिखेरे जाते हैं, ये अलग बात है कि हम ‘चुग’ कितना पाते हैं फिर पंछी का ‘पेट’ होता ही कितना बड़ा है, चुग कर वहीँ बीट बिखेर, सिर्फ गन्दगी मचातें हैं| हाँ,घर-संसार में क्या चल रहा है, इसकी किसी को खबर नहीं होती पर ट्विटर पर  लड़ाई चल रही है, लाइक, शेयर, फॉरवर्ड के  लिए हर दांव-पेंच खेले जा रहें हैं क्योंकि महोब्बत और जंग में सब जायज़ है| और तो और राजा से लेकर रंक तक इसी धुन की धुनि रमायें हैं, यहाँ तक कि “फकीरों को पैसे मिलते तो वे रोटियाँ न लेकर अफीम खाते या मदक पीते”| आज लोकतन्त्र का प्रत्येक ‘जन-मन-मस्तिष्क’ या कहें ‘लोकतंत्र’ ही ‘डिजिटल एडिक्शन’ की लत में फंस चुका है , क्या मंतरी क्या संतरी! मंतरियों के शोहदे साइबर सेल में व्यस्त हैं तो संतरी भी अपने मस्त,दुरुस्त वीडियो शेयर करने से चूकते नहीं| यहाँ तक कि फकीरों (तथाकथित परमपूज्य ‘महाराज’ साधु-संत) राजा-महाराजाओं-सा जीवन लेकिनसाधू-संत ये भारत में ही संभव है जी!! उनको भी भिक्षा (चंदा)  मिलती रहे इसलिए तो वे दिन-रात अपने सोशल मीडिया के अकाउंट पर (अकाउंट की डिटेल के साथ) ऑनलाइन मिल जाते हैं| इनके फालोवर की संख्या भी लाखों में मिल जाएगी है| उस युग में यदि “शतरंज, ताश, गंजीफ़ा खेलने से बुद्धि तीव्र होती है, विचार-शक्ति का विकास होता है, पेंचीदा मसलों को सुलझाने की आदत पड़ती है।ये दलीलें ज़ोरों के साथ पेश की जाती थीं (इस सम्प्रदाय के लोगों से दुनिया अब भी खाली नहीं है)तब भला आप और हम, मुंशी जी की बात से क्यों न सहमत होंगे,दुनिया आज भी बिलकुल न बदली ज़नाब,सोशल मीडिया में कौन तीरंदाज़ बैठें हैं, वहां पर भी तो वैचारिकी और बौद्धिक-चिंतन जंग छिड़ी हुई है सभी अपने हिसाब से ‘दायें-बाएं’ कर रहें है जी| यह ‘धारणा घर कर दी गई’ है कि फेसबुक ,यूट्यूब ,ट्विटर आदि सोशल मीडिया से जुड़े रहने पर हमारी बुद्धि तीव्र होती है| अब यह फैशन जोरों पर है –‘गूगलबाबा के झरोखें’ में लगातार ताक-झाँक करो,आपकी ज्ञानशक्ति  (वैचारिक  नहीं) का विकास होगा, लाइक, कमेंट शेयर  करने भर से पेचीदा मसलों को सुलझाने की आदत पड़ती है| कोरोना ने इस पर मोहर भी लगा दी, जब ये दलीलें रोज़ ही विद्यालय-विश्वविद्यालयों और वेबिनारों में ऑनलाइन शिक्षण के संदर्भ में भी जोरों के साथ पेश की जाती है ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ के परिप्रेक्ष्य में सर्वाधिक मज़बूत औजार या स्तम्भ भी   मान सकते है, जनता जनार्दन इस औजार का कैसे इस्तेमाल करेगी ये वो जाने!

एक स्थान पर प्रेमचंद जी ने लिखा है “जितनी अक्ल आपकी जिव्हा/जीभ में है उतनी मस्तिष्क में भी होती तो क्या बात होती” भला हो सोशल मीडिया का जहाँ पर अक्ल बाँटी जा रही है फिर नाम चाहे सज्जाद हो चाहे सच्चिदानंद, चाहे रोशन अली हो अथवा ऋत्विक रोशन,सभी अपना अधिकाँश समय सोशल मीडिया में व्यतीत करें भी तो किसी विचारशील व्यक्ति को क्या आपत्ति हो सकती है| इन ‘सायबर सेल के शोहदों’ को कमी किस बात की,सरकारी नौकर जो ठहरे!! न कहीं जाना-आना, घर बैठे ‘फेसबुक,ट्विटर कूह किसी पर भी ‘डिवाइस-बिसात’ बिछाई,  इधर-उधर (आग) लगाई (बुझाई नहीं),और अच्छी खासी रकम खाते में आई| ज़रा भी तो श्रम नहीं, देश वैसे भी अब ‘कृषि प्रधान’ नहीं रहा बल्कि ‘चुनाव प्रधान’ हो चुका है श्रम को कौन पूछेगा,लेकिन काम-धंधे की कमी तो है नहीं, ‘जुमले उछालो’ इस खेल में अब ‘तंत्र’ में फँसा ‘लोक’ भी एक्सपर्ट हो चुका है,क्या कैच करना है,कहाँ बाज़ी पलटनी है प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष सभी के तार जुड़े हैं इस बेतार-तंत्र से, जय हो सोशल मीडिया!! सबको खिलाड़ी बना रहा है, लेकिन समस्या तब आती है जब हम भूल जाते हैं कि सामने वाला भी ‘खेल’ खेल रहा है- सोशल मीडिया में ‘खेल’ के आनंद को बड़े-बूढ़े, माताएँ कितना ही कह लें “बड़ा मनहूस खेल है घर को तबाह कर देता है खुदा न करे किसी को इसकी चाट पड़े दुनिया किसी काम की नहीं रहती,न घर का न घाट का| बुरा रोग है” मगर कानों में तो हमारे ईयरफ़ोन लगे हैं जूं रेंगेंगी कहाँ? बेचारी!! उधर मिरजा की बेग़म लताड़ा करती थी “तुम्हें निगोड़ी शतरंज इतनी प्यारी है! चाहे कोई मर ही जाय, पर उठने का नाम नहीं लेते ! नौज, कोई तुम-जैसा आदमी हो”आज इधर देखो तो,  घर में माँ परेशान, स्कूल में टीचर दुखी, प्रोफाइल का स्टेटस देख प्रेमी-प्रेमिका की अलग जवाबदेही बनी रहती है, लेकिन ‘लत वाले को लताड़’ समझ कहाँ आती है! घर फूंक तमाशा देख…| झटका तो तब लगता है, जब लाइक न मिले,शेयर न हो,सबस्क्राइबर न बढ़े!!! जब अक्ल की भैंस आभासी घास चरती है तो तो सोशल के अंधे को कुछ नहीं सूझता,भूले भटके जब अक्ल के पत्थर पर झटके लगते हैं तब तक, घास चिड़िया चुग जाती है| कहने वाले कहा करे,‘चीनी’वायरस ने बिना युद्ध लाखों बेकसूरों को निगल लिया,काम धंधे छीन लिए,लेकिन प्रतिदिन लाखों कमाने वाला सोशल मीडिया का उद्गम देश!उफ़ तक न की !! कैसे इन विषम परिस्थितयों का भी सम आँकड़ा बना लिया, आपकी नेट सर्फिंग में सेकेंड्स की पाई-पाई का हिसाब रखा और अपना सिक्का जमाया हुआ है|

हाल ही में सोशल मीडिया से ही एक ज्ञान प्राप्त हुआ हैं कि ‘मन से ज्यादा उपजाऊ कोई जगह नहीं क्योंकि वहाँ जो कुछ बोया जाये,बढ़ता ज़रूर है,चाहे वह ‘विचार’ हो,‘नफरत’ हो या फिर ‘प्यार’| लेकिन यह सुंदर और टिकाऊ बात आज के यथार्थ में कहीं लागू होती हैं तो हीरे-सी कठोर लेकिन चमकदार आभासी माने जाने वाली दुनिया में, बस एक ट्वीट भर कर दो, कंक्रीट के जंगलों में सेकंड्स में आग की तरह फैल जाती है| हाँ,प्यार,विचार भले ही कुछेक ग्रुप्स में सिमट कर रह जाए लेकिन नफरत की चिंगारी तमाम सीमायें लांघ जाती है| मिरजानी क्या खूब कहतीं हैं– “इतनी लौ खुदा से लगाते,तो वली हो जाते ! आप तो शतरंज खेलें,और मैं यहाँ चूल्हे-चक्की की फ़िक्र में सर खपाऊं”|ये समां भी कहाँ बदला है,   ‘चूल्हा-चौका आज भी ‘स्त्रियों की जागीर’ है, और ‘हमारे महाशय’ भी इसी बात पर अडिग हैं कि “घर का इंतजाम करना उनका काम है; दूसरी बातों से उन्हें क्या सरोकार ?” बताइए भला!!! बना लीजिये – स्त्री-विमर्श के कितने ही ‘पेज या ग्रुप’,पर इसी ग्रुपबाजी ने विमर्शों की बैंड बजा रखी है, क्यों न हो,‘अपनी-अपनी ढफली अपने-अपने गाल! बजाओ या थपथपाओ’ एक के विमर्श में दूसरा अब्दुल्ला क्यों बने जी,  हम ठहरे ‘चिन्तक’ दीवाने क्यों कहलायें| सब अपनी मजलिस सजाये बैंठें हैं-

अपनी-अपनी मजलिस;   

अपनी-अपनी बिसात, या कहो वाल,

रंग बिरंगे मोहरे,अपनी-अपनी चाल|

जहाँ तक ऊपरवाले से‘लौ लगाने’ की बात है तो वहां भी तो मज़हब और धर्म के नाम पर ‘सौदाई-सौदागरों’ कहीं कमी नहीं,बल्कि इजाफा ही हो रहा है| गठजोड़ की राजनीति ने सबसे ज्यादा ‘धागे’ यहीं तो बांधें’ हैं,और उनकी मन्नतें पूरी भी हो रहीं हैं| लोकतंत्र में ‘राज-धर्म’ का ‘तंत्र’ तो है,पर ‘लोक’ के पास ‘बंधने के लिए बेतार का नेटवर्क’ का हवाई पिटारा भर है पर लोकतंत्र में बाँधने के लिए ‘धागे !!वे  नदारद हैं| ‘बिसात’ जिस पर मंत्री, संतरी, ऊँट घोड़े हाथी सभी सवार हैं लेकिन धरतीपुत्र!! वो तो चाल भर देख खुश हो लेता है| प्रेमचंदजी ने तो कह ही दिया था “जब हमारे रईसों का यह हाल है,तो मुल्क का खुदा ही हाफ़िज़ है, यह बादशाहत शतरंज के हाथों तबाह होगी, आसार बुरे है” आसार तो आज भी भले नहीं देश के,जाने कौन ‘मालिक’ है “चारों ओर हाहाकार मचा हुआ था, (है) प्रजा दिन-दहाड़े लूटी जाती थी (है) कोई फ़रियाद सुनने वाला न था (है )देहातों से सारी दौलत लखनऊ खिचीं आती थी( सह्रदय, आप वैश्वीकरण का लाभ लेते हुए अपनी सुविधानुसार कोई भी शहर नाम दे दें ) और वह वेश्याओं में,भांडों में और विलासिता के अन्य अंगों की पूर्ति में उड़ जाती थी (है)”आज पोर्न की मार्केट आपकी टिप्स पर बैठी है क्लिक करने भर की देर है सामने हाज़िर ! शैक्षणिक साईट तो और भी गुलज़ार है आप भी गएँ ही होंगे ,बगल में कोई भी अश्लील विज्ञापन दिख ही जाया करता है , नवयुवक-युवती-विद्यार्थियों की जिज्ञासा और ज़रूरतों को ये साईटस अभिभावक से ज्यादा समझते हैं, क्या कीजियेगा ? बेतार में इस ‘रैकेट का तार’ कहाँ से ढूँढ कर लाईयेगा|

बचपन में कहीं पढ़ा था नहीं मालूम किसी शायरा का है या शायर का,कि

उदासियों का उस की सब हिसाब कर दूँगी,

हँसा-हँसा के उस को गुलाब कर दूंगी,

देखने को मिल जाए कहीं अब के वह,

पढ़ूंगी इतना कि चेहरा किताब कर दूँगी”

किताब और चेहरे पर आपको बहुत-सी शायरी मिल जाती है पर किसी ने सोचा न होगा कि चेहरा को किताब बनाने वाला एक इतना बड़ा प्लेटफार्म तैयार हो जाएगा फेसबुक ! आज फेसबुक पर शब्दों का ज़जीरा है, हालाँकि ‘भीतर का चेहरा’ नदारद है| नाम ! नाम में रखा क्या है जी? नाम गुम जायेगा, चेहरा भी बदल जाएगा, तेरी वाल ही पहचान है| ज्ञान का अम्बार “क्लाउड” पर तैर रहा है, चिंतन-विमर्श के बादल समेटे नहीं सिमटते,  न हम तुम्हें, न तुम हमें समझते’| खैर,शतरंज खेलते-खेलते कहानी के विलासी वीर वास्तविक बादशाह और उसकी बादशाहत के लिए तो नहीं लेकिन व्यक्तिगत वीरता का प्रदर्शन करते हुए ‘शतरंज के वजीर/रानी’ की रक्षा में प्राण दे देते हैं’ हालाँकि फ़िल्म में सत्यजीत रे के समय से उपजा यथार्थ और भी पैना हो जाता है जब दोनों में पुन: बिसात बिछाकर नई बाज़ी शुरू करतें हैं| उनका सूत्रधार फिल्म के आरम्भ में ही कहता है बादशाह गया तो खेल ख़तम  लेकिन अंत आते आते दोनों नए सिरे से बिसात बिछातें हैं, पुराने मोहरों से ‘नई चाल का खेल’ शुरू करतें हैं| पहले ही लिख आई हूँ मेरा देश अब कृषि प्रधान नहीं रहा,इसका किसी को अफ़सोस नहीं जंक फ़ूड जिंदाबाद! सोशल मीडिया आबाद रहे !! आज की आभासी दुनियां से नाना प्रकार के बीज टपककर जब  यथार्थ की धरती से टकराते हैं तो सृजन नहीं, विध्वंस होता है| नेता किस्म के चिंतक, विद्वान, मनमर्जी की फसल तैयार कर रहें हैं, किसानों को तो आंदोलनों में उलझा दिया जब वे (संभवत:निराश) लौटेंगे तो वहाँ शॉपिंग मॉल, ऊँची बिल्डिंगें, और तारकोल की सड़कें मिलेंगी जिसपर जब बूँदे गिरती हैं, तो हमें भले ही टिप-टिप अच्छी लगे लेकिन वे बूंदों के दर्द से उपजी आवाज़ होती है, धीरे धीरे बूँदे अपना मार्ग बदल कहीं ओर चली जाती हैं, जहाँ नरम मिट्टी उन्हें अपने भीतर समां लेती हैं और उनका गिरना भी सार्थक हो जाता है|

बहरहाल,’बिसात’ शतरंज की हो या सोशल मीडिया की, देश के ‘साहिब’ वाजिदअली शाह हों या कोई भी, नाम में रक्खा क्या है??…हमारे खिलाड़ी खेल में मग्न हैं,रोटी और सर्कस में हमारे ‘खिलाडियों’ ने सर्कस का चुनाव किया सभी जोकर बने या ‘टिक-टाक’ कर रहें हैं, तोते बने ट्विटर पर टें-टें कर चहक रहें हैं,फेस-बुक की वाल पर मन बहला रहें हैं| इस खेल में गर आपका भी मन रम जाये तो हो जाइए शामिल इस आभासी दुनिया में कुछ ठोस करने को भी ये मंच उतना भी कच्चा नहीं फिर इसके बिना अब गुज़ारा भी नहीं है जी!     

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स्वर की बहुरंगी विरासत और स्त्री-अभिव्यक्ति की स्वतंत्र आवाज़

अलविदा आशा भोसले :

(8 सितम्बर 1933–12 अप्रैल 2026):

भारतीय संगीत जगत की महान पार्श्वगायिका आशा भोसले का 12 अप्रैल 2026 को 92 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके साथ हिंदी फिल्म संगीत की एक सशक्त, प्रयोगधर्मी और बहुरंगी परंपरा का एक बड़ा अध्याय विराम लेता है।

आठ दशकों से अधिक लंबे अपने करियर में आशा भोसले ने हजारों गीतों को अपनी आवाज़ दी और भारतीय संगीत को शैली, भाषा और भाव के स्तर पर असाधारण विस्तार प्रदान किया। हिंदी के साथ-साथ मराठी, बंगाली, गुजराती, पंजाबी, तमिल, मलयालम और कई अन्य भाषाओं में गाकर उन्होंने उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक विविधता को स्वर दिया।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता उनकी बहुमुखी प्रतिभा रही—जहाँ एक ओर उन्होंने शास्त्रीयता से सने गीतों में गहराई दिखाई, वहीं दूसरी ओर पॉप, कैबरे, ग़ज़ल और लोकधुनों में अद्भुत सहजता के साथ खुद को ढाला। “पिया तू अब तो आजा”, “दम मारो दम”, “इन आँखों की मस्ती” और “दिल चीज़ क्या है” जैसे गीत उनकी इसी विविधता के प्रमाण हैं।

संगीतकार राहुल देव बर्मन के साथ उनकी रचनात्मक साझेदारी ने हिंदी फिल्म संगीत में आधुनिकता, लय और प्रयोगधर्मिता का नया मुहावरा गढ़ा। यह सहयोग केवल लोकप्रियता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने संगीत की संरचना और स्त्री-स्वर की प्रस्तुति दोनों को नए आयाम दिए।

आशा भोसले को उनके योगदान के लिए अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़ा गया, जिनमें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार और पद्म विभूषण शामिल हैं।

स्त्रीकाल के दृष्टिकोण से आशा भोसले का महत्व इस बात में निहित है कि उन्होंने लोकप्रिय संस्कृति में स्त्री की आवाज़ को सीमित नहीं रहने दिया। उनके गीतों में स्त्री केवल भावुक या निष्क्रिय पात्र नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं, अपने आनंद और अपने आत्मविश्वास के साथ उपस्थित होती है।

उनका जीवन भी एक स्वतंत्र, संघर्षशील और आत्मनिर्माण करती स्त्री की कहानी है जहाँ व्यक्तिगत चुनौतियों के बीच उन्होंने अपनी कला को लगातार विस्तार दिया और अपनी पहचान स्वयं गढ़ी।

आशा भोसले की विरासत केवल उनके गीतों में नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक बदलाव में भी दर्ज है, जिसमें एक स्त्री की आवाज़ ने अपनी शर्तों पर जगह बनाई। उनकी आवाज़ आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेगी।

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एनडीए के राज में सुरक्षित नहीं हैं महिलाएं

महिला सशक्तिकरण का नारा धोखा है

प्रेस विज्ञप्ति ,04, अप्रैल 2026 पटना

महिला संगठनों की एक संयुक्त जांच टीम जिसमें अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोशिएशन, ऐपवा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सरोज चौबे, ऐडवा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रामपरी, बिहार महिला समाज की रिंकू व कृष्णा, बिहार महिला समाख्या फेडरेशन की रत्ना, इप्तदा नेटवर्क की अख्तरी बेगम व दलित महिला विकास मंच की प्रतिमा शामिल थीं, नालंदा जिला के नूरसराय थाना के अजयपुर गांव का दौरा किया. अजय पुर में 26 मार्च की शाम सरेआम एक महिला को गुंडों ने सामूहिक बलात्कार की कोशिश की, उसके निजी अंगों में हाथ डाला और मानवता को शर्मसार किया। गांव के ही कुछ लोगों के प्रयास से महिला को बचाया जा सका। 

 अत्यंन्त पिछड़ी जाति की महिला के पति पूना में मजदूरी करते हैं। महिला बूढ़ी सास के एवं अपने बच्चों के साथ रहती है और उसके तीन बच्चे हैं। 

उसे अपना सब काम खुद हीं करना पड़ता है। घटना की खबर सुन कर गांव लौट आए पति ने बताया कि ,इससे गांव के कई लोग इर्ष्या करते थे l 

दिनांक 26 /3/2026 को शाम उसकी पत्नी अपनी बेटी के पास पढ़ाई के लिए ऑनलाइन पेमेंट करवाने के लिए एक ग्रामीण के यहां है थी l 

उसी समय अकेली महिला पुरुष के पास देख कर ग्रामीण लोगों ने इस तरह की घटना को अंजाम दिया। जिसमें मुख्य अभियुक्त यादव ने उसके साथ सार्वजनिक तौर पर उसके निजी अंगों के पकड़ा , मसला और विडियो बनवाया उनके साथ बलात्कार करने की कोशिश की करीब तीस पैंतीस लोगों की भीड़ ने महिला को परेड कराया और महिला के गालियां दी अपमानित,जलील किया गया l मेरी पत्नी का चरित्र हरण कर रहे लोग यदि कोई ऐसी बात होगी तो मैं फैसला करता । 

गांव के असामाजिक तत्व कौन होते हैं? इस तरह की घटना को अंजाम देने की l 

   जब टीम गांव में पहुंची तो कुछ लोग बैठे थे एक चबूतरे पर और इस घटना पर महिला संगठनों, सामाजिक । संगठनों एवं राजनीतिक पार्टियों के आने – जाने पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि इस गाँव जब यज्ञ हुआ तो कोई नहीं दिखाई पड़ा। 

   गांव में कई महिलाएं पुलिस की कार्यशैली पर भी सवाल उठा रहीं थीं कि उन्होंने निर्दोष लोगों को फंसा दिया है। आमतौर पर तो लोग बोलने को तैयार नहीं थे। बहुत कुरेदने पर कोई महिला के चरित्र पर सवाल उठाता तो किसी का कहना था गलत हुआ। ऐसा रहा तो यह किसी के साथ भी हो सकता है।

    टीम जब नूरसराय डीएसपी से मिली तो उनका कहना था कि 13 लोगों को गिरफ्तार किया गया है जिसमें 10 को जेल भेज दिया गया है। के चार्जशीट की तैयारी चल रही है। स्पीडी ट्रायल करके दोषियों को सजा दी जाएगी। केस इंचार्ज दीप्ति कुमारी से भी टीम की मुलाकात हुई। 

     महिला संगठनों ने सरकार से मांग किया कि:- 

 – महिला को शर्मशार करने के हुजूम में शामिल सभी दोषियों को स्पीडी ट्रायल के तहत सजा दें।

– पीड़िता को सुरक्षा की गारंटी करें।

पूरे बिहार में महिला उत्पीड़न की घटनाओं पर अविलंब रोक लगनी चहिए। 

संयुक्त महिला संगठनों की ओर से

‘रजत रानी मीनू’ की कविताओं में स्त्री – रुपक कुमार  

शोध सारांश: क्यों समाज में और देश स्त्री को अभी भी वह जगह नहीं मिली है जिसके वो हकदार हैं? स्त्री और पुरुष दोनों समान रूप से समाज को निर्मित करने में अपना योगदान निभाते हैं लेकिन समाज में पुरुष को तो जगह मिल गया, जिसके वो हकदार वो नहीं भी थे या यूं कहें कि उससे ज्यादा ही मिला लेकिन अभी भी स्त्री को जगह नहीं मिल पाया है। जिसके लिए स्त्रियाँ आज भी संघर्ष कर रही है तथा अपने अस्तित्व और अस्मिता के लिए लड़ रही है। स्त्रियों के साथ भेदभाव की बात कुछ दशक पहले की नहीं बल्कि सदियों से यह चलता आ रहा है। हमारे धर्म-ग्रंथ और शास्त्र में ही भले लिखा गया हो कि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता’ यानी जिस समाज में और परिवार में स्त्रियों का आदर होता है, वहां देवता निवास करते हैं। यह शब्द ही सिर्फ प्यारा है और सुनने में भी मधुर लगता है मगर स्त्री को उस लायक नहीं समझ ही नहीं गया और ना वो स्थान समाज में मिला, जिसके वो हकदार थी।

बीज शब्द: स्त्री, समाज, स्थिति, हालात, पितृसत्ता, भेदभाव, पुरुष, दलित स्त्री। 

ब्राह्मणवादी, मनुवादी, पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था जो स्त्री को हमेशा गुलाम बनाए रखने का काम करता है। मनुस्मृति में जो स्त्री विरोधी बातें लिखी गई है और वो अभी तक समाज में लागू है। मनुस्मृति में लिखा है कि ‘नारी को कभी स्वतंत्र नहीं छोड़ना चाहिए। वह जिस भी अवस्था में हो उसे सदा पुरुषों के संरक्षण में ही रहना चाहिए। मनुस्मृति में यह भी लिखा गया है कि ‘स्त्री अपवित्र है। उसे पढ़ने-लिखने, धन रखने एवं उपनयन का स्त्रियों का अधिकार नहीं है।’ आगे और जब हम बढ़ाते हैं तो वहीं ब्राह्मणवादी मानसिकता से ग्रसित पितृसत्तात्मक समाज के उत्तराधिकारी स्त्री के बारे में लिखते हैं कि “ढोल गंवार शूद्र पशु नारी सकल ताड़ना के अधिकारी।” रामचरितमानस से पता चलता है कि स्त्री की इस ब्राह्मणवादी, मनुवादी, पितृसत्तात्मक समाज में क्या स्थान था। आजादी से पहले तक स्त्रियों की हालत बद से बदतर रही और आज भी स्त्री की स्थिति में अमूल चूल ही सुधार हुई है। 

अक्सर आंखों में इंसान के भीतर की स्थिति यानी उसके भीतर छुपे हुए या समाये हुए दर्द, खुशी आदि सब दिख जाती है। औरत के तमाम दर्दों को उनके तकलीफों को गोरख पांडेय पहचानते हैं और वह लिखते हैं- “ये आँखें हैं तुम्हारी/तकलीफ़ का उमड़ता हुआ समुंदर/इस दुनिया को/जितनी जल्दी हो/बदल देना चाहिए।”1 और समाज और देश में ब्राह्मणवादियों, सामंतवादियों, पितृसत्तात्मक सोच के लोगों को अक्सर यह डर बना हुआ रहता है कि उसका यह वर्चस्ववादी सत्ता जो है या परंपरा ध्वस्त ना हो जाए कहीं बराबरी की ना बात करने लग जाए इसके लिए वह हमेशा उठने वाले विरोध और प्रतिरोध की आवाजों को कुचलने  का काम करता है। उनकी आवाजों को उठाने वाले समता, भाईचारा की आवाजों को उठाने वाले लोगों को वह देशद्रोही या आग भरकाने वाले लोग का उसका प्रतिकार करते हैं। हम देख रहे हैं किस तरह देश में जो भी सत्ता के गलत कानून और नीतियों का विरोध करते हैं उसे या तो जेल में बंद कर देते हैं या उसका मोबलिंचिंग करके हत्या कर दी जाती है या उसे अलग-अलग यातनाएं दी जाती है।  इसी को जब महिलाओं, दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों के हक और अधिकार की आवाजों को जब बुलंद कर रहे होते हैं तो उसे कुचलने का काम करता है, आग भड़काने का आरोप लगता है, झूठ बोलने या झूठ फैलाने का आरोप लगाया जाता है। जिसे गोरख पांडेय इस तरह से दर्ज करते हैं- “हजार साल पुराना है उनका गुस्सा/हजार साल पुरानी है उनकी नफरत/मैं तो सिर्फ/उनके बिखरे हुए शब्दों को/लय और तुक के साथ/लौटा रहा हूँ/मगर तुम्हें डर है कि/आग भड़का रहा हूँ।”2 

समाज में पुरुषों और महिलाओं की बराबर आबादी है और समाज और देश के विकास में दोनों की समान भागीदारी भी है, फिर भी कुछ वर्चस्ववादी, ब्राह्मणवादी, सामंतवादी एवं पितृसत्तात्मक विचार के लोग खासकर औरत के हक को छीनकर वह अपने नाम कर लिया है। समाज में पितृसत्तात्मक सोच ने महिलाओं के जन्म के पहले से लेकर मृत्यु के बाद तक उसका हर एक रूप में शोषण किया है। इस घिनौना पितृसत्तात्मक सोच समाज में किस तरह से स्थापित हुआ, जिसे जनवादी कवि रामाशंकर यादव विद्रोही इस तरह से दर्ज करते हैं- 

“इतिहास में पहली स्त्री हत्या

उसके बेटे ने अपने बाप के कहने पर की

जमदग्नि ने कहा, ओ परशुराम !

मैं तुमसे कहता हूँ कि अपनी माँ का वध कर दो

और परशुराम ने कर दिया

इस तरह पुत्र, पिता का हुआ

और पितृसत्ता आई।”3

ब्राह्मणवादी, वर्णाश्रम और पितृसत्तात्मक व्यवस्था आजादी के पचहत्तर वर्ष बाद भी समाज में कायम है। इस व्यवस्था में आछूतों, दलितों, स्त्रियों आदि की हालत बद से बदतर रहा है और अभी भी है। इस व्यवस्था में इसको हमेशा से अछूत ही समझा गया और इनके साथ दुर्व्यवहार ही किया गया। इस घनघोर अमानवीय ब्राह्मणवादी व्यवस्था में दलित स्त्रियों को ‘स्तन कर’ भी चुकाना पड़ा है। इस व्यवस्था में इंसान को इंसान नहीं समझा, हमेशा इनके साथ भेदभाव किया। स्त्रियों में भी अधिक दलित स्त्रियों को जहालत झेलनी पड़ी। स्त्रियों के जीवन में सुधार लाने के ज्योतिबा फुले सावित्री बाई फुले फातिमा शेख, इशवेरचन्द्र विद्यासागर, पेरियार आदि ने कठिन संघर्ष किए। ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले को इस प्रयास में अत्यधिक संघर्ष करना पड़ा और जहालत झेलनी पड़ी। कठिन संघर्ष और बलिदानों के बावजूद देश आजाद हुआ और बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने बहुत कठिन प्रयास एवं संघर्षों के बाद संविधान लागू हुआ एवं सभी को समान स्थान दिया गया। जब संविधान में संवैधानिक रूप से समान अधिकार मिलने के बावजूद भी समाज में आज आजादी के दशकों के बाद भी पूरी तरह सुधार नहीं हो पाया है। देश के आजादी के पहले जिस प्रकार स्त्रियों पर अत्याचार होता था उस प्रकार से तो नहीं मगर पुरुष मानसिकता से यह स्त्री आज भी प्रताड़ित हो रही है। महापुरुषों के बलिदानों और संघर्षों के बावजूद भी महिलाओं की स्थिति में मामूली सुधार हुआ है। 

रजत रानी मीनू कविता संग्रह ‘पिता भी होते हैं मां’ पुस्तक की भूमिका में लिखती है “मैं जब देश के उसे सामाजिक हिस्से से आती हूँ जिसे सहने को  समुद्र भर संताप है और कहने को बूंद भर अवसर नहीं। स्त्री के हक में आधी आबादी की बात की जाती है, पर इस आदि में वें कौन है जो मेरे जैसियों को हिस्से का बोल जाती हैं। मेरी काया में प्रवेश कर मुझसे बहनापा बनाती है? पर क्या वे सुविधाभोगी, मेरी गैरदलित बहनें स्त्री-मुक्ति की उपलब्धियां मेरे साथ साझा कर पाती हैं? जाहिर है नहीं।”4 ब्राह्मणवादी व्यवस्था में सदियों से दलित स्त्री ही नहीं बल्कि दलित पुरुष भी अपने मूलभूत अधिकारों से वंचित रहे हैं और सामाजिक गुलाम बनर रहे। यह सब कैसे हुआ और किस वजह से हुआ इसका सबसके बड़ा कारण जाहिर है कि इनलोगों को शिक्षा और सम्पत्ति और सामाजिक व्यवस्था से बेदखल रखा। अशिक्षा, निर्धनता, भेदभाव, सामाजिक अस्पृश्यताएं आदि दलितों के साथ बहुत बड़ी समस्याएं हैं। 

समाज में पितृसत्तात्मक व्यववस्था ने पुरुषों एवं महिलाओं को कभी भी बराबरी या समानता के लायक नहीं समझा, इस व्यवस्था में खुद को ही उच्चतर बताया। महात्मा ज्योतिबा फुले कहते हैं ‘स्त्री और पुरुष जन्म से ही स्वतंत्र है इसलिए दोनों को सभी समाज सभी अधिकार समान रूप से भोगने का अवसर प्रदान होना चाहिए’ और डॉक्टर अंबेडकर कहते हैं ‘किसी भी समुदाय को की प्रगति को उसे समाज की महिलाओं की प्रगति से मापा जा सकता है।’ स्त्री की मुक्ति के लिए शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण है और यही एकमात्र हथियार भी डॉक्टर अंबेडकर जी कहते हैं ‘शिक्षा व श्रेणी का दूध है जो जितना पिएगा वह उतना दहरेगा।’ इसी पुस्तक की भूमिका में मीनू  जी लिखती है कि “पितृसत्ता से अधिक जाति व्यवस्था से उपजी गरीबी, अधिकारहीनता, अशिक्षा, बेरोजगारी, आवासहीनता जैसे अभावों से जूझते हुए जीवन गुजारती हैं। इसलिए यह स्पष्ट दिखाई देता है कि दलित स्त्री समस्याएं गैर-दलित स्त्री की अपेक्षा बहुपरतीय और अलग हैं। इसलिए उनकी मुक्ति के प्रश्न भी अलग समाधानों की मांग करते हैं।”5  

मीनू जी अपनी माँ को याद करते हैं और अपनी मां को पिता के भीतर देखते है यानी पिता को मां की जगह पाती हैं। उनके पिता माँ के द्वारा किया जाने हर कार्य को करते है क्योंकि उनकी माँ की मृत्यु बचपन मे ही हो जाती है। मीनू जी के जीवन में मां की भूमिका के उनके पिता निर्वहन कर रहे हैं। मीनू जी लिखतीं हैं कि 

“मैंने पापा की, आंखों में देखा

अपनी मां का चेहरा

पापा मन हो ही होते हैं

ऐसा महसूस, मां गुजर जाती है

अक्षर सिखाते-सिखाते

और पापा ले लेते हैं, मां की जगह

जो दुख की जगह भी है।”

रजत रानी मीनू दलित छात्राओं के साथ सामूहिक बलात्कार हुए और उनकी पीड़ा को दर्ज करते हैं। अभिजात स्वर्ण छात्रा के साथ बलात्कार होने पर पूरा सांसद और महिला आयोग चीखने लगते हैं। उसके लिए सजा में मौत मांगते हैं, वहीं दलित बालिकाओं के साथ जब बलात्कार होने पर सब चुप रह जाते हैं एवं सिर्फ आंखों से देखते तथा सुनते रहते हैं। अपने मुंह से कुछ नहीं बोलता है वो  गुलामों की भांति में चुप रहती है। मीनू लिखती है-  

“हमारे साथ जब होता है बलात्कार

सामूहिक बलात्कार –

तब क्यों हिलता नहीं पत्ता एक भी?

और जब तुम्हारे साथ हुआ बलात्कार

तब क्यों हिल गयी संसद भी ?

चीख उठीं महिला सांसद बलात्कार के खिलाफ

क्यों उड़ गयी ‘महिला आयोग’ की चैन की नींद ?

आज क्यों उठी बलात्कारियों को

सजा-ए-मौत की माँग, कल क्यों मौन थीं तुम?”

मीनू दलित स्त्री और अभिजात स्वर्ण स्त्री के अंतर को पहचान कर उसे दर्ज करती है। भारतीय समाज में दोनों वर्णों के स्त्री का अलग सनगरक्ष संघर्ष है और दोनों में धरती और आसमान की अंतर है। समाज में दोनों महिलाओं की सामाजिक अंतर हम साफ रूप से देख सकते हैं कि कैसे स्त्री के साथ घिनौना घटना जो बलात्कार हो रहा है अंतर सिर्फ वर्ण की है जिसमें एक दलित परिवार से आती है और एक स्वर्ण परिवार से आती है। समाज में एक स्वर्ण लड़कियों के साथ बलात्कार होने पर पूरा समाज और देश न्याय के उमड़ जाता है वहीं दलित लड़कियों के साथ बलात्कार होने पर उसे छुपा दिया जाता है या दबा दिया जाता है, साथ दलित परिवार को धमकाकर चुप कर दिया जाता हैं। दलित लड़की के साथ बलात्कार होने की घटना पर हिन्दी के मशहूर शायर और जनवादी कवि अदम गोंदवी लिखते है- 

“आइए महसूस करिए ज़िंदगी के ताप को

मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

*****

कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें

और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें

******

गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही

या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही

हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए

बेचती है जिस्म कितनी कृष्णा रोटी के लिए!”

अदम गोंदवी नव इस गजल समाज के हकीकत के साथ पुलिस प्रशासन की दलितों और स्वर्णों के प्रति व्यवहार को उजागर कर रख देते है। मीनू वहीं जब दलित लड़कियों के साथ जब बलात्कार होता है तब समाज और देश का क्या व्यवहार होता। जो लोग यानी बोलने वाले चुप हो जाते है मुक होकर सिर्फ देखते रहते है। जो स्वर्ण लड़कियों के साथ हुए बलात्कार पर कैन्डल मार्च निकलते है मगर दलित लड़कियों के बलात्कार पर चुप रह जाते है जिसे मीनू पहचान करती है इसके दोहरी नीति को और उसे अपनी रचनाओं मे दर्ज इस तरह से करती है- 

“जब मेरे साथ हो रहा था बलात्कार/सामूहिक बलात्कार

कारण मालूम है मुझे

क्योंकि तुम हो अभिजात स्वर्ण

और मैं ठहरी दलित

यदि हजारों बालाओं के साथ

किये जा रहे बलात्कारों पर

तुम खामोश नहीं रही होतीं

तो तुम्हारे बोलने से मिल जाता मेरी आवाज को

थोड़ा संबल/और आज तुम्हारी बच्ची के साथ

भी नहीं होता बलात्कार”

इन पंक्तियों के माध्यम से मीनू जी ने दलित और स्वर्ण स्त्रियों के बीच भेदभाव की मानसिकता, विचार एवं संघर्ष को दिखाया है। समाज में स्वर्ण और दलित स्त्रियों के जीवन यापन और जीवन जीने में तमाम अंतर को उजागर करती  है और स्त्री होने के बावजूद भी दोनों का जीवन एक समान नहीं है।

समाज में दलित बालिकाओं की इच्छाओं, सपनों और जाति दंश का शिकार सदियों से आज तक हो रहें हैं। इनके साथ खासकर लड़कियों की चुनौती  को देखते हैं तो  वह घर से बाहर तक निरंतर संघर्ष करती है और उनके साथ मुशीबतों का लगातार हमला होते राहत है। दलित लड़कियां एक घर में पितृसत्ता से लड़ती है और जब मुक्ति के लिए एवं शिक्षा के जब स्कूल जाति है तो वहाँ भी उन मुसीबतों का सामना करना पद रहा है। जो सदियों से शिक्षा पर जिसने या जिस विचारधारा ने कब्जा जमाए हुए है वो आज भी अपने कब्जा मे रखा है एवं रखना चाहता है जिसके लिए आने वाले पिछड़े और दलित लोगों के साथ निरंतर अपना शिकार बना रहा है। दलितों के साथ स्वर्ण शिक्षिका उसे गाली देती है और उसे जलील करती है तथा उसे जाति का नाम लेकर उसे गाली देती है। एक दलित लड़की सोचती है कि उसका क्या दोष है जो उनके साथ ये घिनौना भेदभाव कर रही है जिसे वह समझ नहीं पाती है और वह उदास बाथकर सोचती है कि काश कोई उसे सुनता कि वह भी पढ़ना चाहती है एवं आगे बढ़ना चाहती है। दलित लड़कियों के होने वाले स्कूल में भेदभाव को उजागर मीनू अपनी कविताओं में उजागर करती है- 

“एक दलित बाल, बैठी उदास

कक्ष मेरी भी, कोई सुनता

मैं भी पढ़ना चाहती हूँ आगे बढ़ना चाहती हूँ

मगर- मेरी स्वर्ण शिक्षिका ने

लिख दिया था मेरे माथे पर

काली स्याही से ‘तू चमारी है’

तू नहीं पढ़ सकती

तमाशा बनी थी मैं, उसे दिन।”10 

मीनू अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की उपलक्ष पर समाज और देश में विभिन्न प्रकार की औरतों को पहचान कर उसे अपनी कविता में दर्ज करती है। समाज अधिकार या सघनता से देखें तो दो प्रकार की स्त्रियाँ दिखाई देती है एक वो जो शिक्षित है और अपने अधिकार के बारें में जानती है और दूसरी प्रकार की वो स्त्री है जो सदियों से अपने अधिकार के बारें में जानती ही नहीं है वो सदियों से उसी गुलामी को जीती हुई आती है जिनके लिए अधिकार शब्द से भी अनभिज्ञ है उनका क्या होता होगा उनको कब मुक्ति मिलेगी। हर साल महिला दिवस कुछ महिलायें एकजुट होतीं है और इसको बढ़िया से जश्न मानती है और बहुसंख्यक स्त्रियां नहीं जानती कि उसे उनके समाधान का कोई एक दिन भी होता है उनकी हर तोड़ मेहनत का कोई मूल्य देता है तथा जिनको अपने अधिकार के बारें में जानकारी है ही नहीं। मीनू इस घटनाओं को इस परकर दर्ज करती है- 

वे नहीं जानतीं, किसे कहते हैं, अधिकार?

कैसी होती है-नारी मुक्ति ? उन्हें नहीं पता,

कहाँ, किसके पास, रहते हैं उनके अधिकार?

पाये नहीं, देखे नहीं।

और जिनकी, सुनती है सरकार जो हैं चैनलों,

अखबारों की सम्पादक, जज और प्रोफेसर,

वाइसचांसलर, सांसद और मिनिस्टर जो पाती हैं

विदेशी यात्राओं के टिकट, और मोटी पगार जो- जानती हैं

अपने अधिकार, क्या वे जानती हैं?

उन स्त्रियों के बारे में, जो नहीं जानतीं अपने अधिकार ।

जिनके लिए पैंसठ बार आया यह

प्रकाशमान दिन, किंचित भी कम नहीं कर सका

अंधकार, अंधकार, अंधकार॥”11  

बीसवीं सदी में बहुसंख्यक स्त्रियाँ आज भी अपने हक और अधिकार नहीं जान पाई है। इनका जीवन में अंधकारमय है जो अपने हक और अधिकार से अनभिज्ञ है यानी कोसों दूर हैं तथा इनके लिए अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अनसुना शब्द है, अनसुना, अनजान सा दिन है। 

माँ तो मां होती है। माँ किसी खास दिन के मोहताज नहीं रहती है उनका हर दिन खास दिन ही होता हैं। वो हमेशा अपने बच्चों पर ममता लुटाती है। प्यार करती है। जिसे किसी एक दिन खास दिन मन कर उसे मनाया जाए मां के लिए हर दिन एक जैसा ही होता है। कुछ लोग मदर्स डे को मनाने की दिखावा करते है इस दिन बहुत माँ के प्रति प्यार दिखाता है और बकीं बाकी दिन इनका दुर्गति करता है। इन्हीं विषयों को मीनू कविता में दर्ज करती है-

“पर- माँ तो माँ, होती है-

सारे जहान की, एक सी।

जो किसी डे की, मोहताज नहीं।

उसका आँचल, होता है-

हमेशा अपने, बच्चों के लिए,

हर पल, हर दिन

ममता से लबालब।

नामी-गिरामी लोगों के

फोटो और बयानों से भरे होते हैं”12   

समाज का और देश के प्रगतिशील का जो भी ढिंग पीट रहा है उसके सच्चाई को बयां करती है। आज राजनीति पार्टी के लोग अपने शशन साशन कल काल को विकसित बताने का कोशिश करता है बाकी पीछे हुए विकास को नकार देता है और अपने समाज समय के कमजोरी या कामों को देख नहीं पाता है और आलोचना तो बिल्कुल भी सुनना पसंद नहीं करता है। विषवगुरु बनने की होड में समाज और देश के जिश हिस्से को विकास पर ध्यान देना है उसपर नहीं देता है बल्कि अपनी कमी या कमजोरी को छूओने की कोशिश करती है। देश का सही विकास यानी यथार्थ को एक कवि या साहित्यकार अपनी राचानों के माध्यम से देश के सामने लाने का काम करता है। ठीक उसी प्रकार मीनू महत्वपूर्ण मुद्दों को अपनी रचनों के माध्यम से समाज और पाठकों के सामने रखती है। स्त्रियों की हकीकत को दर्ज करती है। उन मुद्दों और सवालों को सामने रखती है जो प्रासंगिक भी है जिसपर काम करना चाहिए जिसे नहीं कर पाया है या यूं कहे इस मुद्दे पर ध्यान भी नहीं देते है। जो इस शिक्षित और स्वर्ण नहीं है तथा वह सलीके से नहीं रहती है जो समाज की शैली के अर्थ तय किया है। समाज में कोई नहीं उसका और उसका कोई खानदान भी नहीं है इसलिए इसकी ऐसी हालात है। इसका इस दुनिया में कोई नहीं है, जिसके वजह से यह अपना जीवन लावारिस की तरह जीती है। इसको पहचान कर मीनू लिखती है- 

वह सड़क किनारे बैठी-

बस से ऑटो से उतरती चढ़ती

सवारियों से बेखबर।

फटी पुराने बोरी में

रखती तुड़े- मुड़े कागज- गत्ते को सलीके से

****

वह स्त्री मैले कुचले कपड़ों में?

क्यों सूख रहे थे उसके गाल ?

क्यों बिखर रहे थे उसके बाल?

क्यों दिख रही थी वह बेहाल?

******

यदि वह स्वर्ण होती

तो क्या हुआ अपढ़ होती?

यदि वह पढ़ी-लिखी, होती तो

क्या यही होता? उसका हाल”13 

इक्कीसवीं सदी में खासकर गरीब महिलाओं के साथ गाँव ही नहीं, निजी अस्पताल में ही नहीं सरकारी अस्पताल में भी देखने वाला कोई नहीं नहीं होता है ध्यान भी कोई नहीं देता है। यहाँ लोकतंत्र की धज्जियां उदय देता है नेता,  डॉक्टर, पुलिस प्रसासन आदि। बलात्कार की शिकार दलित स्त्री की चीख किसी को सुनाई नहीं देती है। एक गर्भवती दलित महिला प्रसव की कराहती रही और  सड़क पर ही अपनी बच्चा को जन्म देती है कोई कुछ नहीं करता है बल्कि सिर्फ देखता रहता है। ऐसे ही कई महिलाओं की जान भी चली जाती है। मीनू इस तरह दर्ज करती है- 

“सुनाई देती है, अगली चीख, 

सामूहिक बलात्कार की,

शिकार दलित स्त्री की, सुनाई देती है चीख

एक गर्भवती दलित महिला की

प्रसव से कराहती, सड़क पर जनती बच्चे को

उफ् दम तोड़ती, अस्पताल के बाहर स्त्री को चीख।”14 

इस कविता के माध्यम से मीनू दर्ज की है कि कैसे वर्णाश्रम एवं सामंती  व्यवस्था में गरीबी और जाति की वजह से आदमी आदमी नहीं जानवर जैसा व्यवहार किया जाता है। समाज और देश में पितृसत्ता के पोषक पुरुषों पर सवाल खड़ा करती है साथ ही व्यवस्था को भी कटघरे में भी खड़ा करती है। स्त्री दम तोड़ती है और तोड़ने को मजबूर किया जाता है। इस बाजरवाद ने गरीबों का जिन दुर्भर कर दिया है और यह घटना सत्य को भी उजागर करती है।

निष्कर्ष: रजत रानी मीनू इस समाज में इतिहास से लेकर वर्तमान में हो रहे रोज घटनाओं से रूबरू होती है और पाठकों को रूबरू कराती है। अखबारों से, समाचार पत्रों से और अपने आसपास होने वाले घटनाओं को देखती है। दलित महिलाओं के साथ होने वाले घटनाओं,  अत्याचारों, बलात्कारों, शोषण आदि तमाम रूपों उजागर करती है। समाज में शोषण के जितने भी रूप हैं उस सभी को देखती हैं और उसे महसूस करती है, उसे अपनी कविताओं में दर्द कर  ती है और वो एक  जागरूक और जिंदा मनुष्य होने का प्रमाण देती है। मानव दिलों को मिलाने और मानव की भीतर प्रेम की ज्योति जगाने की कोशिश करती है।

संदर्भ सूची:-

  1. गोरख पांडेय, गोरख पांडेय समग्र कविताएं, सांस्कृतिक संकुल, इलाहाबाद, 2023, पृष्ठ 20
  2. वही पृष्ठ 21
  3. रामाशंकर यादव विद्रोही नई खेती नवरंग प्रकाशन गाजियाबाद 2018 पृष्ठ 51 52
  4. पिता भी होते हैं माँ, रजत रानी मीनू, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली,2015  भूमिका, पृष्ठ सं 08
  5. वही, पृष्ठ सं 10
  6. पिता भी होते हैं माँ, रजत रानी मीनू, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2015  पृष्ठ सं 30
  7. वही, पृष्ठ सं 39 
  8. धरती की सतह पर, अदम गोंडवी, सं ओम निश्चल, सर्वभाषा प्रकाशन, 2023, पृष्ठ सं 102
  9. पिता भी होते हैं माँ, रजत रानी मीनू, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2015  पृष्ठ सं 39-40 
  10. वही, पृष्ठ सं 45 
  11. वही, पृष्ठ सं 52  
  12. वही, पृष्ठ सं 55 
  13. वही, पृष्ठ सं 59,60 
  14. वही, पृष्ठ सं 75 

रुपक कुमार   शोधार्थी, हिन्दी विभाग  ल. ना. मिथिला विश्वविद्यालय दरभंगा 

मो नं 9709771436  ईमेल-  kumarrupak993@gmail.com 

नीतिशा खलखो की कविताएं

अकादमिक हत्या की गूंज

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 सहसा ; कौंधता है मेरा वह वजूद

जो मैंने पाया

छोटे शहर से बाहर जब निकली थी तो लगता था

सहज होगा हर कुछ

पर शिक्षा के मंदिर के द्वार

जब राजधानी में खटखटाए

 तो वेलकम वार्म नहीं हुआ था

चिकुटी काट जगाया गया था

कि लड़की हो

शरीर  सहेजना होगा

भाषा में इतनी मिठास और धैर्य ?

यह  कहाँ से पाया है,

 उसे भी खोना होगा?

सबके प्रति संवेदना ऐसे बाँटे फिर रही

जैसे हो कोई मुफ़्त की चीज़

ओह प्लीज़

अपने यूटोपिया को

अपने घनेरे जंगल के संस्कारों में छोड़ आओ ।

यहाँ प्रतिस्पर्द्धा  करनी होगी

दौड़ना, हाँफना होगा बहुत।

चलने होंगे कई कई चाल

‘फिटेस्ट की थ्योरी’ जो है केंद्र में ।।

एक मायावी दुनिया से

मेरा हुआ था पहला पहला परिचय

अपने आदिवासियत पर गुमान को

लोग मद्धिम मद्धिम ही सही

लेकिन मुझे प्रतिक्षण  बदल रहे थे।

ख़्वाब था  –

घर से बाहर कुछ बड़ा सीखा जाएगा

पर

मालूम कहाँ था यह द्रोणाचार्यों की नगरी है

प्रतिपल कोई ना कोई

कुछ लूटकर ही जाएगा

कुछ अपने भी भेष बदले आयेंगे

कोई कुछ लूट रहा होगा, कोई कुछ।

पर लूटेंगे सब।।

कुछ को मेरी असहमतियों से दिक़्क़त है,

कुछ को मेरे भोलेपन से।

वह सब लूट लेना जानते हैं।

मुझे भी

और

 मेरी सामर्थ्यता को भी

मेरे सपनों सहित मुझे लूटा गया।।

मैं कुछ नहीं हूँ,

यह मुझे बताया गया ।

और जो बता रहा था

 वह ख़ुद क्या है

 वह आज सब कोई बतिया रहा  है।।

बस कुर्सी और सत्ता के डर से

कुछ निज  हित में

कुछ बहुत हासिल कर लेने के उद्देश्य से,

वो चापलूस  बन चुप्पी साधते हैं।

  वो रीढ़ विहीन

और  मृत्प्राय  तक हो जाते हैं ।

अकादमिक हत्या का सिलसिला

यह नया

या

मात्र मेरे तक नहीं है

ऐसी कई हत्याएँ मेरे पुरखा, पुरखिनों ने  झेले हैं।

मेरे समकालीनों ने  झेले हैं

और

ना जाने

कितनी पीढ़ियाँ इसे झेलेंगी।

एकलव्य और द्रोणाचार्य की संस्कृति

हर बार मिथकिय कह

दोहराई जाएगी ।

चुप्पी और सर्वश्व देने का भाव

तब भी एकलव्य के पास था

और आज भी वही भाव

एकलव्य ने

अपनी पीढ़ियों को सुपुर्द की है ।।

पर मन  अब मानता नहीं

उसने भूत

और आज तक को तो स्वीकारा  है

पर घुटन,

संत्राश ने बदले हैं

मेरे अंदर का जैव तत्व ।

भावी पीढ़ियों द्वारा यह हत्याएँ

अब  ना होने दी जायेंगीं ।

वह जूझेंगी –

प्रतिरोध करेंगी –

प्रतिशोध भी लेंगी –

पर बावजूद इसके

सृजन को ही बोयेंगी ।।

उन अमानवीय द्रोणाचार्यों के

मन मस्तिष्क  और चेतना में

कुहरेंगे वो

अपनी मृत्युसैया  में।

जब इन अकादमिक हत्याओं की चीखें

इन्हें चित्कारने तक का मौक़ा नहीं देंगीं।।

जलता है –

धधकता है –

अंदर ही अंदर

 वह प्रयास हत्या के

मीठे ज़हरों से सराबोर होती देह पर

 असंख्य विषैले साँपों के झुंड में

लिपटी पाती हूँ

अपनी सीखने की अभिलाषा को।।

दम तोड़ते ,

उखड़ती साँसों के बीच भी

एक जिजीविषा रहती है

कि  

अब माफ़ करने का समय

चाह  कर भी नहीं रह गया।।

बदलना होगा ही

अपने हथियार

इन हत्याओं के ख़िलाफ़ –

क्योंकि

मेरा होना

अब जज्ब  करना होगा ही तुम्हें

अवतार और परम ज्ञान में लिपटे

 तुम्हारी अर्द्ध नंगी  सोच को

समझ लिया है मैंने।

मैं मज़बूत रही ना रही,

मेरी भावी संततियाँ

मेरे लेखन को औज़ार बना तुमसे जूझेंगी

खेल शुरू किया तुमने था

 ख़त्म करना हमें है।

 हिंसा ; शायद तुम्हारी तरह

वे नहीं करेंगी

जैसा अब तक तुम करते आये हो ।

वह बदलेगी अपने उपक्रम –

और धराशायी होगी  तुम्हारी सांस्कृतिक धरोहर

सर्वश्रेष्ठ होने का भाव बोध भी होगा तार-तार

लो अब तुम्हें  बिखरना  ही पड़ेगा बार-बार

हर बार।।

युद्ध होंगे नहीं

लहू गिरेगा नहीं

पर

तू अचेत बन

परास्त शून्य में ताकते

अपने अहम को धिक्कारते

तजोगे जान ।

और  याद रखना

वह जान भी तुमसे दूरी ना बना पाएगा ।

वह मथेगा तुम्हारे कृत्य

तुम्हारे सामने

और तुम सिसकोगे उतना

जितना मेरे पुरखिन  और पुरखा सिसके थे।।

हत्या का बोझ

ना आदमी को जीने देता है

ना ही मरने ।।

जैसे तुमने कहा था ना –

“ना उगला जा रहा है;  

ना ही निगला जा रहा”

वही बात

तुम्हें तुम्हारे अंत समय तक

“ना जान छोड़ा जा रहा है

 ना ही जान को जिया जा रहा है।।“

वाले पायदान पर

तुम्हें तुम्हारे कृत्य याद दिलवायेगी।।

रघुवीर सहाय के भी ‘रामदास’ को पता था

कि

 उसकी हत्या होगी

वह उदास भी था

लेकिन यहाँ की आदिवासी पात्र

को पता तक ना था

  कि उसकी हत्या होगी ।।

वह भी अकादमिक हत्या ।।

इतनी तो जघन्यता से बच जाते ना तुम अकर्मणा ।।।

2.एक शोर है सभ्यताओं के पास

———/—————/————-

एक शोर है सभ्यताओं के पास—
इतना घना
कि वह सुन ही नहीं पाता
वे धीमी, महीन आवाज़ें
जो प्रकृति
हमसे करना चाहती है।

हम उलझे हुए हैं
कुछ नाकाम-से कामों में;
जबकि वही
हमारी असली ‘हीलर’ है।
फिर भी
उसे भुलाकर
न जाने किस जंग में
जलते जा रहे हैं हम।

 प्राकृतिक आपदाएँ
अब उतनी स्वाभाविक नहीं रहीं;
बल्कि आज हम
मानव-निर्मित आपदाओं से
लगातार जूझ रहे हैं।

न कोई सब्र,
न प्रेम,
न बंधुत्व—
बस एक अंधी होड़
सत्ता और शक्ति को
मुट्ठी में बंद रखने की।

जबकि
कितना सरल है
ज़िंदगी को जीना
यदि वह श्रम पर आधारित हो।

प्रकृति में बिखरी खुशियाँ समेटना—
जैसे हर नए दिन
फूलों का खिलना,
और हर रात
चुपके से झर जाना
महुआ के मदमाते फूलों का,
किसी के हिस्से का हो जाना—
टोकरी में बंद
या थाली में परोसा जाना।

क्योंकि प्रकृति
स्वयं उपभोक्ता नहीं होती।
वह बनी ही है
किसी ‘और’ को देने के लिए,
और किसी ‘और’ से कुछ लेकर
जीने के लिए।

पेड़ों को देखिए—
फल-फूल सब ढोते हैं
अपनी देह पर,
पर उनका उपयोग
दूसरों के लिए होता है।

मेरे बाग के फूलों का रस
कितनी मक्खियाँ, मधुमक्खियाँ
धीरे-धीरे चुनती हैं—
हौले से,
बिना उसे सुखाए,
बिना उसे मुरझाए।

मेरे पेड़ों के आम, कटहल, पपीते
खाते हैं असंख्य चिड़ियाँ,
गिलहरियाँ,
और छोटे-छोटे जीव भी।

पेड़ की ऊँचाइयों को देखिए—
जहाँ ज़मीन पर चलने वाली
चींटियाँ, कीड़े-मकोड़े
नहीं पहुँच पाते,
वहाँ से वह पेड़
खुद गिरा देता है
अपने फलों का एक हिस्सा
उनके लिए।

बाँटना
हम इनसे क्यों नहीं सीखते?

संग्रह करना
मनुष्य ने अपनी प्रवृत्ति बना ली है,
पर देना—
कितना सुकून देता है,
यह प्रकृति
हमें बार-बार सिखाती रही है।

नदियाँ भी
अपना सारा पानी
खुद नहीं पी जातीं,
न समुद्र
अपने भीतर का
सारा विस्तार।

जल के हर स्थल में
जीवन बसता है—
केकड़े, मछलियाँ, साँप
और न जाने कितने जीव।

वे नहीं माँगते किराया,
न कोई कर।

फिर मनुष्य ने
कहाँ से सीखा
यह लेन-देन,
यह संग्रह,
यह अनैतिक व्यवहार?

सुना है—
प्रकृति की जड़ें भी
अपने आसपास की जड़ों का
ख़याल रखती हैं।

उनके सुख-दुख में
भागीदार बनती हैं,
संसाधन बाँटती हैं,
बीमारी में
उन्हें जिलाने की कोशिश करती हैं।

उन्हें चिंता होती है
हर एक के अस्तित्व की।

फिर हमने
यह धूर्तता
कहाँ से सीख ली?

कैसे भूल गए हम
कि हमारा अस्तित्व भी
संभव नहीं
प्रकृति के इन तत्वों के बिना।

हम पूजते भी हैं
और उजाड़ते भी हैं।

पेड़ पूजते हैं—
जंगल काटते हैं।
नदी पूजते हैं—
उसमें कूड़ा डालते हैं।
पहाड़ पूजते हैं—
उसे उजाड़ देते हैं।
भूमि पूजते हैं—
और उसी को खोद डालते हैं।

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की बात करते हैं
और हर दिन
अपने पड़ोसियों को 
रेत डालते हैं।

‘विभिन्नता में एकता’ पर लेख लिखते हैं,
और अपने से भिन्न संस्कृति पर
मॉब बनकर
लिंचिंग तक कर डालते हैं।

पढ़ती हुई बच्चियों पर
बमबारी करते हुए
चल पड़ते हैं
मंगल और चंद्रमा पर
जीवन खोजने।

जो जीवन
इस धरा ने दिया है,
उसकी कद्र
हमसे हुई ही नहीं।

तो अन्य ग्रहों से
क्या भाईचारा
और बहनापा
उम्मीद करेंगे हम?

बल्कि
इस धरती को ही
नरक बनाने पर
सवाल होने चाहिए।

अन्य ग्रहों को
नष्ट करने की कोशिश भी
नहीं होनी चाहिए।

मनुष्य को
अपने अस्तित्व पर
थोड़ा कम गुमान करके
 उसे ठहरना चाहिए।

बहुत कम जाना है हमने
प्रकृति को।

इतना इतराना
नेस्तनाबूद होने की ओर
बढ़ना है।

जिए तो डायनासोर भी थे
इसी धरती पर—
वे अपनी बृहत् काया पर इतराए थे,
और तुम
अपने मस्तिष्क पर इतराते हो।

आओ—
इन पक्षियों की बोलियों पर ठहरें,
गिलहरी की चंचलता से
मोहित हो जाएँ।

हत्याओं और संहारों का आयोजन रुके,
और कुछ नया रचा जाए।

ग्रंथ—
वह भी धार्मिक नहीं,
न ही वर्चस्व की संस्कृतियाँ।

बस सहेजा जाए
प्रेम और सहअस्तित्व—
चर और अचर के साथ।
इस संपूर्ण धरातल के साथ।।
दसों दिशाओं के साथ।।।
और उसमें बसे
हर एक कण-कण के साथ।

एक अंतहीन अनंत उत्पत्ति के विस्तार के साथ।।

3.हिन्द रज़ब

———/—————/————-

तुमने पुकारा था
उस इंसानी क़ौम को,
जिसकी गोद में
तुमने जन्म लिया था

तुम आई थीं इस दुनिया में
दो मासूम अनुभूतियों के साथ—
एक,
अपनी तकलीफ़ को
रोकर कह देना,

और दूसरी—
इस सृष्टि की सुंदरता पर ठहरकर
साँसों की लय में
धीरे से मुस्का  देना।

पर एक तीसरी अनुभूति—
जो तुम्हारी उम्र की थी ही नहीं —
हमने ही बो दी तुम्हारे भीतर वह :
डर…
ख़ौफ़…

और इसके लिए—
हम हमेशा
शर्मिंदा रहेंगे।

भी तो तुम्हें
जीवन के  अनगिनत रंगों से गुजरना था,
अनुभूतियों के आकाश में
उड़ना था,

पर तुम्हारे हिस्से जो आया वह धूसर था,

मटमैला था,

खून से लथपथ वीभत्स था।

पर हमने—
अपनी अंधी आस्थाओं में—

धार्मिक उन्माद में

सत्ता शक्ति की भूख में
तुम्हारी काँपती हुई आवाज़ तक को
अनसुना कर दिया।

वह आवाज़,
जो कह रही थी—
एक नन्हीं-सी जान
डर रही है।

एक बंद कार में,
अपने ही अपनों की निस्तब्ध चेतानहीन  हो चुके

लहू में भीगे देहों के बीच,
तुम सिमट गई थीं
एक कॉल में—

समेट रही थी तुम अपना अस्तित्व भी

और भय से लिपटकर
बस इतना ही कह पाईं—

“मुझे यहाँ से ले जाओ ना…”

तुम्हारे चारों ओर
मौत का शोर था—
टैंकों की गड़गड़ाहट,
गोलियों की बरसात,
और हर दिशा में
विनाश का फैलता अंधकार—

जिसमें तुम्हें भी
समा जाना था

ना जाने अब

और तब ।

पर तुम्हारी वह निरीह पुकार—
मानवता के नाम—
समय की दीवारों पर
हमेशा गूँजती रहेगी।

वह आवाज़
हमारी चेतना में
काँटे की तरह चुभेगी,

और हमें हमारे ‘मानव’ होने पर
एक अंतहीन प्रश्न बनकर
ठहरी रहेगी।

कितना रोया होगा
यह आकाश, धरा, वायु  भी—
तुम्हारी हर एक जीने की पुकार के साथ!

अगर यह कोई प्राकृतिक अंत होता,
तो शायद
सब्र होता…

पर यह—
हमारी ही रची हुई
एक नृशंस कहानी थी,

जहाँ पहले से तय था
कि तुम्हारी साँसें छीन ली जाएँगी,
और दुनिया—
बस देखती रहेगी।

वजह  ??

बस तुम्हारी पहचान

तुमसे तुम्हारी साँसें ले लेगा।।

कभी उल्कापिंडों ने भी
डायनासोरों को खत्म किया था—
वह प्रकृति थी।

पर यह—
यह मनुष्य है।

और उसकी
सबसे भयावह रचना।

हम शर्मिंदा हैं, हिन्द रज़ब—
कि तुम्हें
बस छह बरस की उम्र दे सके।

घृणा है हमें
इन युद्धों से,
इन खोखले धार्मिक आडंबरों से—

सत्ता व शक्ति की आराधना से

जिन्होंने
इंसानियत को
निगल लिया है।

हम गुनाहगार हैं तुम्हारे—
और शायद
क्षमा के योग्य भी नहीं।

अगर फिर कभी
जन्म चुनना—
तो यह धरा मत चुनना,

जहाँ आदमीयत ही
ज़िंदगियों पर भारी पड़ती है।

जहां सृजन का

शांति का अमन का

कोई मोल नहीं।।

ज़िंदगियाँ जो दे नहीं सकते

उसको लूटने का हक़

एक इनसान के पास

कैसे भला हो सकता था?

शायद नहीं बल्कि यकीनन
जानवर होना बेहतर है —
जहाँ युद्ध होते हैं,
पर सिर्फ
जीवित रहने के लिए।

सर्वाइयवल के लिये।

परंतु

यहाँ युद्ध हैं
हड्डियों को चबाने के लिए,
मांस के लोथड़ों  को नोचने के लिए,

और वह भी—
मासूमों का।

आज मनुष्य
हैवानियत की नई परिभाषा लिख रहा है।

और तुम जीने की ;
अपनी अंतिम कोशिशों में—
हमें एक प्रश्न दे गई :

क्या हमने पाया?

मौत!!
या मौत का विस्तार!!

फिर भी; याद रखें
गाज़ा की सरज़मीं कहती है –
वह ज़िंदा था,
 वह ज़िंदा है,
और  वह ज़िंदा रहेगा—

इन तमाम आहुतियों के बाद भी।

कहीं और ज़्यादा मज़बूती से।।

तुम्हारी शहादत
अब एक मशाल  है—
जो हर आँसू में,
हर सिसकी में
जलता रहेगा।

अब हमें तय करना ही होगा

कि

हम अपने हिस्से का अपराध माने,

और यह संकल्प लें

कि
अब कोई और  हिन्द रज़ब नहीं,
अब कोई और  युद्ध नहीं।

क्योंकि
सृजन की इस दुनिया में
कोई स्थान नहीं;

विध्वंस का,
हत्याओं का,
लूट का,
और शक्ति-पूजा का।

नीतिशा खलखो मैथन, बृहत् झारखण्ड

‘गूज बम्प्स’

कहानी- चंद्रसेन

‘डूड’…

 “इस यूनिवर्सिटी का यही झंझट है,” नैना ने बालों के जूड़े में पेन खोंसते हुए बोली,

“इतनी साहित्यिक हिंदी मुझसे नहीं होती…

वो भी ये इलाहाबादी, संस्कृतनिष्ठ टाइप!”

दीपक की आंखों में हल्की-सी शरारत तैर गई।

“तो क्या हुआ? इलाहाबाद की ज़ुबान है… थोड़ा वक़्त दो, खुद-ब-खुद समझ आ जाएगी।”

“अब आप अपना ज्ञान-प्रदर्शन न करें प्लीज़?” नैना ने भौंहें चढ़ाईं।

“ओके… सेंट स्टीफेंस प्रोडक्ट!”

“डोंट से दिस अगेन… आई एम वार्निंग यू,” नैना बनावटी गुस्से में बोली।

“अच्छा मिस जोशी” दीपक ने और छेड़ा ।

“यार दीपक!”

“कब ये जोशी वाली पूंछ को नोचते रहोगे? तीन साल से इरिटेट किए जा रहे हो।”

“सॉरी…” दीपक ने तुरंत हाथ जोड़ लिए।

“वंस अगेन?”

“सॉरी…”

नैना ने सिर हिलाया-

“नो… ऐसे नहीं।”

वो थोड़ा और करीब आई, धीमी और गर्माहट भरी आवाज में कहा –

“बोलो… ‘सॉरी डार्लिंग’…”

एक पल को समय की रफ़्तार थम सी गई।

दीपक ने उसकी आंखों में झाँका -जहाँ नाराज़गी कम और शरारत ज़्यादा थी।

वो हल्का-सा झुका, और उसके कान में फुसफुसाया-

“सॉरी… डार्लिंग…”

दीपक जैसे ही नैना के कान में फुसफुसा कर सॉरी डार्लिंग बोला। दीपक के होंटो की गरमाहट और फुसफुसाहट से नैना के रोम-रोम चहक गए। 

देखो-

‘गूज बम्प्स’।

“हूँ… अब ठीक है,” नैना इतराई,

नैना ने मुस्कुराते हुए दीपक की बाँह थाम ली-

इस पकड़ में थोड़ा-सा हक़ था, थोड़ा-सा लाड़… और बहुत सारा भरोसा।

“जानती हो, नैना…” ?

दीपक ने दीवार पर पेंट से उकेरी कविता को निहारते हुए बोला ,

“दिस इज़ अ वेरी लांग पोएम…”

नैना ने आँखें घुमाईं, मुस्कुराते हुए लापरवाही से झट से बोली –

“अरे… पूरी मत सुनाना, झेल नहीं पाऊँगी।”

वो थोड़ा और करीब आई, उसकी आवाज़ अब धीमी और नर्म थी-

“ये जो मोटा-मोटा तीन शब्द लिखा है… बस वही बता दो…”

दीपक कुछ पल उसे देखता रहा-

जैसे उन शब्दों को ढूंढ रहा हो, जो सिर्फ कहे नहीं… महसूस किए जाएँ।

फिर वो हल्का-सा झुका, उसकी आँखों में उतरते हुए बोला-

‘बदलाव’। ‘बदलाब’। ‘बदलाव’। 

एक लंबा, खामोश पल उनके बीच ठहर गया।

नैना की हँसी इस बार कहीं खो गई थी- बस उसकी आँखों में नमी-सी चमक रही थी, और होंठों पर एक हल्की, ठहरी हुई मुस्कान उभरी- चेहरे पर दृढ़ आत्मविश्वास ऐसे झलका, मानो किसी ने खाली कैनवास पर अचानक एक स्पष्ट रेखा खींच दी हो।

‘हूँ’।

 ‘इम्प्रेसिव’।  

‘आई लव इट’।  

‘मी टू नैना’। 

नैना की बड़ी-बड़ी आंखों में झांकते हुए दीपक मुस्कुराया-

“इलाहाबाद का असर है…”

नैना ने उसकी टी-शर्ट पकड़कर अपनी तरफ खींचते हुआ बोला –

“तो… थोड़ा और असर होने दो…”

और उस पल,

कविता खत्म नहीं हुई-

बस… जीने लगी।

“ओके-ओके, मिस्टर इलाहाबादी…” नैना मुस्कुराई,

“चलो पुरानी दिल्ली-हॉस्टल का खाना खा-खा कर पक गए हैं। साला आज कुछ अच्छा खाते हैं।”

दोनों येलो लाइन मेट्रो में चढ़ गए।

ट्रेन चल पड़ी।

नैना हल्का-सा उसके करीब झुकी-

“तो गाइड साहब, कहाँ ले जा रहे हो?”

दीपक मुस्कुराया-

“जहाँ आप कॉम्फर्टेबल हों …”

नैना ने नजरें मिलाईं-

“इम्प्रेसिव… मिस्टर इलाहाबादी।”

दिल्ली वाली दोपहर अपने चरम पर थी ।

फॉर्मल ड्रेस, पीठ पर टंगे बैग, प्रेसेंटेशन, मीटिंग और फाइल्स की उधेड़बुन में ऑफिस जाने वाले जा चुके थे। मतलब ऑफिस टाइम की भगदड़ निकल चुकी थी, इसलिए मेट्रो में थोड़ी राहत थी, एकरूपता की नीरसता गायब थी -क्योंकि परिवार-बच्चे-बूढ़े झोला-झंडी गाने-रील्स और हसी-ठिठोली बीच जमीन के अंदर ट्रेन पूरी रफ़्तार में समाये जा रही थी। भीड़ थोड़ी कम थी-लेकिन दिल्ली की मेट्रो पूरी तरह खाली हो, सोचना पड़ेगा ।

एक ही सीट मिली। नैना बैठ गई और दीपक उसके पास पोल की आड़ लेकर टिक गया।

“कितने जेंटलमैन हो तुम…” नैना ने ऊपर देखते हुए चुटकी ली।

“सीट खुद ले ली और मुझे खड़ा कर दिया,” दीपक ने पलटवार किया ।

“अरे… तुम तो खड़े होकर ज़्यादा अच्छे लगते हो,” उसने शरारत से कहा।

दीपक थोड़ा झुका-

“और तुम… बैठकर भी उतनी ही खतरनाक लगती हो।”

नैना हँस पड़ी।

फिर वही-

कभी छेड़ना, कभी बहस करना, कभी किसी बात पर सहमत, तो अगले ही पल असहमत।

मेट्रो अपनी रफ्तार से चल रही थी- और उनके बीच बातों का एक छोटा-सा अपना-सा संसार भी।

एक अटूट हिस्सा जो छूटे न छूट रहा है। 

बहस-खटपट और आर्ग्यूमेंट में मुंह फुलावा-फुलाई भी होता रहता है। 

ये गुस्सा, पांच मिनट से ज्यादा टिक जाए तो इस गुस्से की खैर नही। 

उनका संबंध अब एक ऐसी कड़ी बन चुका था-जो टूटने के लिए नहीं, बस और गहराने के लिए बनी हो।

हौज खास से मेट्रो एम्स, दिल्ली हॉट होते हुए केंद्रीय सचिवालय पार कर गई। स्टेशन आता, गेट खुलता। स्टेशन आते रहे, लोग बदलते रहे-

पर वो दोनों वहीँ के वहीँ ।न कोई हड़बड़ी, न कोई भय- केवल साथ होने का एक गहरा मौन आश्वासन।

बस कभी-कभी मेट्रो में हो रहे अनाउंसमेंट से पल भर का खलल जरूर आ जाता। गेट बंद होते सब नॉर्मल। 

अगला स्टेशन चांदनी चौक है।

इलाहाबद के कुम्भ जैसी भीड़ वाला राजीव चौक भी निकल गया। 

 दीपक अभी भी पोल के सहारे टिका हुआ है। नैना बैठी है। दीपक के हाथों को आददतन ऐसे जोर से पकड़ रखी है। मानो किसी अदृश्य झटके से उसे बचा रही हो, या शायद… खुद को ।  

मेट्रो थमी।

दरवाज़े खुले।

एक यांत्रिक, निर्विकार आवाज़ गूँजी-

“अटेंशन प्लीज़…”। 

लेकिन यह अनाउंसमेंट महज एक नार्मल अनाउंसमेंट नहीं था। अपने-आप में एक इतिहास समेटे हुए था।

‘अटेंशन प्लीज़’। 

क्षण भर को समय ठहरा।

चांदनी चौक स्टेशन।

और फिर-

“प्लीज़ डोंट टच एनी ‘अनटचेबल’ मटेरियल… इट मे बी एक्सप्लोसिव।”

शब्द जैसे हवा में नहीं,

सीधे भीतर गिरे।

‘अनटचेबल’…

 नैना और दीपक के कानों को चीरता हुआ ये चिरपरिचित शब्द ‘अनटचेबल’ रूह तक धंस गया । 

‘अनटचेबल’। 

अनाउन्समेंट के वे सामान्य-से लगने वाले शब्द-‘अनटचेबल मैटेरियल’-

 दोनों के सीने में एक तीखी हूक बनकर उठे।

चेहरों पर एक मौन विषाद उतर आया, जिसे भागती हुई भीड़ पढ़ ही न सकी।

वही समाज की विद्रूपता-

जिसकी सड़ांध में कितने दीपक-नैना घुंट गए-आज फिर एक शब्द बनकर सामने खड़ी थी।

किसे पता था- एक शब्द के मात्र उच्चारण ही- दोनों को सदियों की बनायी गयी खाईं में धकेल देगा।

शायद मेट्रो रुपी तंत्र के लिए यह शब्द महज़ एक चेतावनी भर हो-

इसलिए वह इतनी सहजता और सलीके से बार-बार दोहराया जाता है।

पर क्या सचमुच लोगों के लिए भी यह इतना ही सामान्य हो गया है?

क्या कोई शब्द अपने भीतर की सदियों की गूँज खो सकता है-

क्या इसके मायने बदल दिए गए हैं या बदले जा सकते हैं ?

या वह हर उच्चारण के साथ फिर से वही इतिहास जगा सकता है?

नैना और दीपक चुप थे-

मन व्याकुल और आँखें बेचैन।

नज़रें जैसे एक-दूसरे से नहीं,

उन अनगिनत सवालों से उलझी थीं

जो कहे नहीं जाते, सुनाई नहीं देते।

अनकहा।

अनसुना।

एक क्षण को लगा-

मानो किसी ने उन्हें उठाकर

कहीं दो दूर छोरों पर फेंक दिया हो।

जहाँ दूरी दिखती नहीं-

बस महसूस होती है,

जैसे असमय बारिश की बारीक बौछार…

नज़र न आए,

पर भीतर तक भेदती चली जाए।

ट्रेन अपने धुन में सरपट भागी जा रही थी।

दीपक और नैना की पकड़ ढीली पड़ने लगी। गर्माहट कम होती गयी। दोनों भरसक कोशिश में हैं, पकड़ वैसी ही रहे जैसी हुआ करती थी। लेकिन जैसे रेत फिसलती है। मानो रिश्ते भी फिसल रहे हों। छूट रहे हों । 

गले रुंधे हुए से। चेहरे पर बेचैनी और उलझन उपट आयी थी । 

नैना से रहा न गया। हाथ पकड़ कर खड़ी हो गई। डबडबाई आँखों से दीपक को निहारा। फिर खींच कर ऐसे गले लगी, जैसे सदियों से न मिली हो। लोग क्या देख रहे होंगे, सोच रहे होंगे। इसकी परवाह न रही।दोनों की पकड़ इस बार बड़ी मजबूत रही।टूटे न टूटे। छूटे न छूटे। 

फिर अचानक से नैना दीपक को पकड़े-पकड़े चिल्लाई –

‘मुझे सारी जिंदगी इसी ‘अनरीचेबल-अनट्रेसबल-एक्सप्लोसिव-अनटचेबल मटेरियल’ के साथ रहना। 

‘समझे’। 

दीपक नैना के कान में विश्वास और प्यार से फुसफुसाया। 

‘ओके डार्लिंग’।

जैसे ही दीपक ये बोला –

नैना की रोई पलकों ने हल्का-सा काँपकर जवाब दिया-

“देखो… गूज़बम्प्स…”

और फिर चुपचाप

दीपक की बाँहों में समा गई। ।

चंद्रसेन, लेखक व रिसर्च ऑफिसर आईआईपीए, नई दिल्ली।

बेटी दिवस पर विशेष : संजना तिवारी की कविताएं

बेटियों के लिए 

सुबह 

किरणों के रथ पर 

आती हैं बेटियां 

इन्हीं से खुशबू उधार लेकर 

फूल बिखेरते हैं खुशबू 

बेटियाँ ही कोयल को

सिखलाती हैं तान

जहाँ जन्म लेती हैं ये

बसंत खूद-ब-खूद 

वहां आ जाता है।

अनमोल धरोहर हैं ये धरती की 

फिर भी इनके आगमन पर 

उदासी क्यों छा जाती?

आखिर हम

कब समझेंगे 

कि बेटियों के हाथ में ही 

जगती की डोर है

इन्हीं से अंजोर है।

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बेटियाँ 

बेटियाँ नियामत हैं पृथ्वी की 

उन्हें जन्म देती हुई माँएं 

खुद को ही नए रूप में अवतरित करती हैं 

और बेटी के रूप में अपने को पाकर 

गहरे आनंद में डूब जाती हैं 

बेटी जैसे-जैसे बड़ी होती है 

माँ भी उसके साथ ही

वैसे-वैसे बड़ी होती है 

मगर बड़ी होती हुई बेटी पर 

माँ अपने दुख की छाया 

नहीं पड़ने देना चाहती 

बड़ी होती हुई बेटियाँ भी 

माँ की इस पीड़ा को समझती हैं 

इसलिए वह माँ के दुख को 

भगाना चाहती हैं 

मगर दुख है कि 

भागने का नाम ही नहीं लेता

माँ के दुख को भगाने के लिए बेटियाँ 

न जाने कबसे दुख से लड़ रही हैं,

लङती हुई बेटियाँ आगे बढ रही हैं ।

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बेटियों को बचाएँ 

विश्वास को बचाएं 

इसीसे बचेंगे रिश्ते 

रिश्तों को बचाएं 

इसीसे बचेगी खुशी   

प्यार को बचाएं 

इसीसे बचेगा का घर 

घर को बचाएं 

इसीसे बचेगी शांति  

त्याग को बचाएँ 

इसीसे बचेगा समाज 

समाज को बचाएँ 

इसीसे बचेगी मनुष्यता

पेड़ को बचाएँ 

इसीसे बचेगी आक्सीजन 

आक्सीजन को बचाएँ 

इसीसे बचेगा जीवन 

बेटियों को बचाएँ 

इसीसे बचेगा मनुष्य 

मनुष्य को बचाएँ 

इसीसे बचेगी जिजीविषा।

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रिश्ते 

पेङों को जमीन से रिश्ते हैं 

जीवन को हवा से

नदियों को समुद्र से रिश्ते हैं 

रोगी को दवा से

पत्तियों को टहनियों से रिश्ते हैं 

मछलियों को पानी से

धरती को सूरज से रिश्ते हैं 

सरहद को जवानी से

चिङियों को आकाश से रिश्ते हैं 

पाठक को किताब से

कवि को कविता से रिश्ते हैं 

चांदनी को आफताब से

ये रिश्ते प्रेम से संचालित हैं 

मगर जो लोग 

बाजार में रिश्ते ढूंढते हैं 

वे यह भूल जाते हैं 

कि जहां बाजार है 

वहां प्रेम नहीं है 

और जहाँ प्रेम नहीं है 

वहां रिश्ते कहाँ से होंगे। 

सच्चे रिश्ते बाजार में नहीं 

वे होते हैं दिल के पास 

जो रिश्ते बाजार में बनते 

वे हैं रिश्तों की लाश।

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अजन्मा होता है प्रेम 

पेट में पल रहे बच्चे के साथ 

प्रेम भी पल रहा होता है 

मगर वह बच्चे की तरह 

जन्म नहीं लेता 

प्रेम अजन्मा होता है 

अगर वह जन्म लेगा 

तो उसका अंत भी निश्चित है 

इसलिए जिससे हम प्रेम करते हैं 

उसके नहीं रहने के बाद भी

हम उससे प्रेम करते रहते हैं 

बल्कि उससे हम विशेष प्रेम करते हैं 

जो प्रेम के लिए 

अपने को निछावर कर देते हैं 

प्रेम के साथ जीने वाला भी 

प्रेम की तरह ही अजन्मा हो जाता है 

दुनिया के सारे तानाशाह 

प्रेम को ही मारना चाहते हैं 

मगर वे इस काम में 

कभी सफल नहीं हो पाते

भगत सिंह, खुदीराम बोस, गांधी 

और न जाने कितने ही 

ऐसे लोग मार दिए गए 

मगर फिर भी वे 

इसलिए बचे रह गए 

कि उन्होंने अपने देश 

और मनुष्यता से प्रेम किया था

जीवन प्रेम का ही परिणाम है 

जो लोग घृणा और गैर बराबरी 

कायम कर

हथियारों के बल पर 

 दुनिया बनाना चाहते हैं 

वे प्रेम की ताकत को नहीं समझते।

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आजादी का मतलब 

हमेशा हमें कमजोर कहा गया

कि हमें अपनी सीमाओं में चाहिए 

वही कहना चाहिए 

जिससे पुरुष प्रधान व्यवस्था को 

आघात न लगे

स्त्री होने का मतलब अबला होना

मान लिया गया 

कवियों ने भी दया भाव से 

खूब कविताएँ लिखी कि-

“अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, 

आंचल में है दूध और आंखों में पानी।”

गोया हमारे पास प्रतिरोध की 

शक्ति ही न हो

मगर यह सोच किसकी है?

पुरुष के साथ कदम से कदम मिलाकर 

चलनेवाली स्त्री 

जिस दिन अबला हो जाएगी 

उस दिन पुरुष भी असहाय हो जाएगा 

वह समय आ गया है 

कि अपने इस सोच को बदलना होगा 

एक-दूसरे का सम्मान करते हुए 

साथ-साथ चलना होगा 

आजादी का एक मतलब यह भी है।

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बेटियाँ 

बेटियाँ कभी निराश नहीं करतीं 

वह जीवन के हर मोर्चे पर 

साथ देने को तत्पर रहती हैं 

वह सुबह की किरणों की तरह आती हैं 

और रात में चांदनी जैसी हो जाती हैं 

जिसकी शीतलता से 

निहाल हो जाता है मन

बेटियों का जीवन 

उस फूल की तरह है 

जिसकी खुशबू से धरती का आंगन 

महकता रहता है

वे कितने भाग्यवान हैं 

जिनके घर में बेटियाँ हैं। 

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लङकियां 

कठिनाइयों को पार कर 

आसमान छूने की 

कोशिश कर रही हैं लङकियां 

अब चारदीवारी तोड़ कर 

बंधनों को छोड़ कर 

खुली हवा में सांस 

ले रही हैं लङकियां 

अब अपने जीवन का फैसला 

स्वयं करने में सक्षम हैं लङकियां 

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सावन

आखिर सखी 

क्या है इस सावन में 

कि धरती की छाती 

जुड़ा जाती 

हरियाली वसन पहन

बादल को ललचाती 

हर्षित हो मेघ

बरस जाते

परदेशी याद बहुत आते

आखिर सखी 

क्या है इस सावन में। 

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समुद्र और स्त्री 

समुद्र से बड़ा होता है 

स्त्री का विस्तार 

मगर वह अपने में सिमटी 

घर के किसी कोने में 

दुबकी रहती है चुपचाप 

चंद्रमा के आकर्षण में 

समुद्र में उठते ज्वार भाटा को 

दुनिया देखती है 

मगर स्त्री के भीतर उठते 

ज्वार भाटा को 

कोई नहीं देखता 

सुनामी में 

समुद्री जहाज का 

कुछ खास नहीं बिगड़ता 

मगर तटीय इलाके 

हो जाते हैं तबाह 

प्रेम ही है वह जहाज 

जिस पर दुनिया को थामे

भटकती रहती है स्त्री 

अपने विस्तृत दुख के सागर में।

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संजना तिवारी
साहित्यकार व संजना बुक्स की फाउंडर

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“मैं अभागा सुअर हूं”

कहानी: चंद्रसेन

हॉय, डॉ. मोहन!”

“हेलो, बेंसन।”

मोहन अभी अपनी क्लॉस लेकर बाहर निकले ही थे कि उनका सबसे प्रिय, किंतु नटखट चीनी छात्र बेंसन सामने आ खड़ा हुआ। चेहरे पर वही आधी मुस्कान, नुकीला सवाल।

ज़रा ठहरिए। पहले डॉ. मोहन को जान लीजिए।

कभी वे ‘मोहना’ थे-इलाहाबाद के छोटे से गाँव-भीमपुर के।

 ऊसर ज़मीन, लहलहाते सपने।

 वहीं से शुरुआती पढ़ाई, फिर संघर्ष, फिर शोध। भारत से पीएचडी पूरी कर आज वे कोलंबिया विश्वविद्यालय में पोस्ट-डॉक्टोरल शोधार्थी हैं। कक्षाएँ लेते हैं-पर वे सिर्फ़ सिलेबस नहीं पढ़ाते। समाज पढ़ाते हैं, गढ़ते हैं इतिहास की तहों में छिपे वर्तमान को निचोड़ते हैं।

बेंसन चीनी है, लेकिन उसका शोध भारत की जाति-व्यवस्था पर है। चीन से आए छात्रों को सबसे ज़्यादा हैरानी इस बात की नहीं होती कि यहाँ हज़ारों देवता हैं, बल्कि यह कि इंसान अब भी इंसान नहीं है।

ब्राह्मणों की इस ‘अतुल्य खोज’ ने उन्हें चकित कर रखा है-एक ऐसी खोज, जिसमें यह तय कर लिया गया कि कौन छूने लायक है और कौन नहीं। 

वे बार-बार पूछते हैं: “क्या सच में इंसान-इंसान को नहीं छूता?”

और हमें जवाब देते हुए शर्म नहीं आती, क्योंकि सदियों की मूढ़ता, क्रूरता और गुलामी को यहाँ परंपरा कहा जाता है। 

खैर आज बेंसन डॉ मोहन का मजा लेने के मूड में हैं।

“डॉ. मोहन, क्या आप हमें ग़लत पढ़ाते थे?”

बेंसन ने मासूमियत से पूछा।

“आपने तो हमें यही पढ़ाया था कि भारत में हिंदू हैं-और आजकल सब कट्टर हिंदू हो चुके हैं।

अखंड भारत बनाना है।

प्रधानमंत्री ईश्वर के अवतार हैं?”

डॉ. मोहन मुस्कराया-वह मुस्कान, जो जवाब नहीं होती, स्वीकारोक्ति होती है।

“बेंसन, यही तो है आज का नूतन भारत,” डॉ. मोहन ने कहा।

“यही सब अब किताबों में है। जाओ, बॉलीवुड की फ़िल्में देखो।

सब जगह यही कथा चल रही है-संसद में भी और हमारी सनातनी मीडिया में तो खासकर।

वहाँ सब हिंदू हैं और जो नहीं हैं, वे जल्द समझा दिए जाते हैं।”

बेंसन चुप रहा।

डॉ. मोहन ने बात पूरी की-

“और हाँ, हमारे प्रधानमंत्री अब केवल प्रधानमंत्री नहीं रहे।

वे हिंदू-हृदय सम्राट हैं-लोकतंत्र के सिंहासन पर विराजमान एक पवित्र नॉन-बायोलॉजिकल आत्मा।”

बेंसन अपने बाल नोचने लगा। डॉ मोहन को सिगरेट बढ़ाते हुए एक वीडियो का लिंक शेयर कर दिया।

“आप रूम पर जाइए और इस वीडियो को देखिए”। 

“मस्ट वॉच इट”। बेंसन चिल्लाते हुए निकल गया।

डॉ मोहन दिन भर की थकान से फ्लैट पर आया। वाइन की बोतल निकाली। मोरक्कन डिश ऑर्डर करते-करते वीडियो देखने लगा। 

“यूजीसी हाय-हाय”।

‘इस तेली को किसने पीएम बनाया’?’ इसका तो सुबह-सुबह मुंह देखना अशुभ होता है’।

 एक मिश्रा महराज इंटरव्यू दे रहें हैं।

टीवी खोला तो विचित्रा त्रिपाठी एंकरिंग नहीं श्राप देने की मुद्रा में एंकर कम ‘राष्ट्रीय शर्मा संगठन’ की नेता ज्यादा लग रहीं हैं। 

विपक्ष का नेता चुप है।

सब हिन्दू अगड़ा-पिछड़ा में बट गया है। 

मसला यह नहीं है कि भारत के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जातिवाद रोकने के लिए कोई नया नियम आ गया है।

मसला यह है कि जिन्हें पीढ़ियों से जातिवाद करने की आदत रही है, वे यह सच्चाई अच्छी तरह जानते हैं कि आदत नियम से नहीं जाती।

वे यह भी जानते हैं कि हम किसी न किसी के साथ करेंगे ही-

फिर पकड़े जाएँगे,

फिर पीड़ित बनेंगे,

और अंत में “हमारे साथ अन्याय हो रहा है” का राष्ट्रीय विलाप शुरू होगा। होगा क्या ?हो ही चुका है। 

भेदभाव के महज अंदेशे से सवर्ण हिन्दू दिन रात एक किए पड़ा है। 

आदत सुधारी नहीं जा सकती, क्योंकि यही आदत तो पहचान है, परंपरा है और ज़रूरत पड़ने पर संस्कृति भी।

सदियों से सीखी गई सामाजिक हिंसा को कोई विश्वविद्यालयी गाइडलाइन कैसे मिटा दे?

जातिवाद यहाँ अपराध नहीं, स्वभाव है-और स्वभाव बदलना तो पश्चिमी साज़िश मानी जाती है।

फलस्वरूप तथाकथित हिंदू समाज अगड़ा और पिछड़ा में नहीं, बल्कि विशेषाधिकार और असुरक्षा में बँट गया है।

जो ऊपर हैं, वे डर रहे हैं कि बराबरी न आ जाए।

जो नीचे हैं, वे अब भी समझा रहे हैं कि वे भी इंसान हैं। 

सवर्ण लड़कियां ब्राह्मणवाद जिंदाबाद के नारे लगा रही हैं।थिरक रहीं है। सनातन धर्म को बचाने के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी में जोर आजमाइश कर रहीं हैं।

हिंदू-एकता का महान राजनीतिक भ्रम अब टूट चुका है-वह नारे से उतरकर ज़मीन पर बिखर गया है-सूखे पत्तों की तरह ।

शायद यही बात बेंसन कहना चाहता था।

वीडियो देखते-देखते, स्क्रॉल करते हुए मोहन को एक और वीडियो दिखा।

स्क्रीन पर एक तीस-पैंतीस धरा का सूअर था-पूरी तरह निश्चिंत, आत्ममुग्ध।

चर्बी लटक रही थी, आत्मविश्वास से भरी हुई।

वह झूम-झूमकर चल रहा था, जैसे किसी सत्ता का प्रतीक हो-भारी, सुरक्षित और बेख़ौफ़।

वीडियो के साथ एक कविता चल रही थी—

“मुझे मार डालो,

मेरे रोम-रोम उखाड़ डालो, राजा।”

विडंबना यह थी कि उस सूअर के बाल (बरौंछी) बहुत घने थे—

लहलहाते हुए, स्वस्थ, संरक्षित।

हिंसा की पुकार कविता में थी,

और ऐश्वर्य देह पर।

 “कम से कम आधा किलो तौ होबय करी”?

“का रे मोहना”? 

“होई बप्पा”।

“अच्छा बहुत तेज बनत हस”?

“एक छटांक के पांच रुपया मिली तो आधा किलो कित्ते के होई”?

“अरे अपने गांव का सबसे नीक गदेल है। काहे का चिल्लात रहत हस बिरजू”?

राम सुरेमन बाबा ने मोहना का पक्ष लिया।

“ठीक है, ठीक है। चल अच्छा। स्कूल जाय से पहले सूअरन का चराय आवा जाय”। 

“हम न जाब”।

“मारब ससुर के नाती दुइ पनही”।

“फीस मांगय बप्पय के पास आवत हस”। 

“हां पांच रुपिया कब से पड़ी है फीस। वू श्रीवास्तव मास्टर तीन दिन से क्लॉस से भगाय देत हैं”।

“ई बात है। चल कल बार उखाड़य वाले आइये हैं”।

“ई मोटका सुअरा के बाल दस-बारह रुपिया म बिक जाई”।

मोहना के बप्पा ने उसे आश्वासन दिया।

मोहना और बप्पा सुअर ढील कर खेतों की तरफ चल दिए।

हूछी-हूछी की आवाज करते हुए मोहना पीछे-पीछे और उसका बप्पा कंधे पर लाठी रखे आगे-आगे। सुवारों का झुंड विष्ठा चपर-चपर खाते बढ़े जा रहे थे। सुवरों को बराबर जमीन अच्छी नहीं लगती। अपने थूथनो से ऊबड़-खाबड़ कर रहें हैं।

इस प्रजाति को एक साथ चलना ही नहीं आता। कहीं भी धड़ल्ले से घुसे जा रहे हैं।

एक जगह पर टिकते नहीं। कभी सर्र से गेहूं के खेत में तो कभी सर्र से चना के खेत में घुस जाते हैं। माघ का महीना है। मोहना ठंड में डंडा लिए खेत, मेड़ इधर-उधर भाग रहा है। ओस से भीग गया है। चप्पल लस्सर-फ़सर हो रही है। ओस और माटी से सनी चप्पल बार-बार पैर से सरक-सरक जा रही है। जितना वह इन सुवरों का पीछा करता उतना ही ये चालबाजी करके आगे निकल भागते। 

अचानक मोहना—जो कभी भीमपुर की गलियों में इन कथाओं को सिर्फ़ चमत्कार समझता था-अब समझ पाया कि इन्हें भगवान विष्णु के दस अवतारों में से एक क्यों माना गया है।  

“भगवान को कोई नहीं पा सकता। वही जो भगवान का सबसे प्रिय हो… जो खुद भगवान हो… जो भगवान के मुख से पैदा हुआ हो।”

“अइसन कऊनव भगवान होई सकत है, मोहना?”

शाम को खाना खाते हुए बप्पा यही समझा रहे थे। आख़िरी बात कहकर उन्होंने महुआ का बड़ा-सा घूँट भरा।

मोहना चुप था। अब उसे समझ में आने लगा था कि अवतार सिर्फ़ कहानी नहीं होते- वे एक षड्यंत्रकारी व्यवस्था भी बन जाते हैं।

 “अरे मोहना तय खूब पढ़। हम्मय सब का ई सब भगवान न चाही” ।

 “हमार सब जने का भगवान तै बन”। 

“लेकिन बप्पा कल वू बाल उखाड़य वाला आयी न? कल फीस न देब तौ ऊ श्री ..

“अरे रोवां बोल मोहना रोवां”।

मोहना की बात काटते हुए बप्पा नशे में बड़बड़ाया।

“एक भौंकी म राख, तेल अउर गुड़ लाओ”।

“ई मोटका सुअर का गुआरी से खींच लाओ”।

“मुंह बांध देव लस्सी से नहीं तव बहुतय नारिआयी”।

“गोड़ पकड़व हो सुक्खू। बहुतय चर्बियान है। बांधव सारे के दुईनव पांव”।

मोहना पांव पकड़े है। बप्पा जौरी से बंधे जबड़े पर पैर रखे हैं। 

बप्पा की भाषा में रोवां उखाड़ने वाले रोवां उखाड़ रहा है। 

मोहना रोवां पर नजर लगाए है। डर रहा है कि ये कम से कम दुई छटांक हो जाए।

अगर इससे कम हुआ तो फीस नहीं भर पाएगी।

तौलकर जब मोहना के बप्पा को दस रुपये मिले, तो मोहना खुशी से चिल्ला उठा।

 “हो गई फीस”।

डॉ मोहन– डॉ मोहन।

आज मोहना-मोहना के स्थान पर मुझे डॉ मोहन क्यों सुनाई दे रहा है। 

आंख खुली ।

 दरवाजा खोला।

 बेंसन की सामने से चीरती हुई आवाज आयी ।

“गुड मॉर्निंग डॉ मोहन”।

डॉ चंद्रसेन लेखक व रिसर्च ऑफिसर आईआईपीए नई दिल्ली।

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