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ग्रामीण बिहार में “सूखा नशा” का बढ़ता जाल: 10 वर्षों से उभरता एक सामाजिक आपदा

प्रतिमा कुमारी की ख़ास रिपोर्ट

ग्रामीण बिहार के कई इलाकों में बीते कुछ वर्षों से एक खामोश लेकिन भयावह संकट फैल रहा है, जिसे स्थानीय लोग “सूखा नशा” कहते हैं। ब्राउन शुगर, स्मैक और सिंथेटिक ड्रग्स जैसे नशीले पदार्थ अब शहरों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि गाँवों की गलियों, खेतों के रास्तों और यहाँ तक कि स्कूलों के आसपास तक पहुँच चुके हैं। यह समस्या 2016 के बाद धीरे-धीरे उभरनी शुरू हुई, लेकिन शुरुआत में किसी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। परिवारों को लगा बच्चे बिगड़ रहे हैं, गलत संगत में पड़ गए हैं या जिद्दी हो गए हैं। असलियत तब सामने आई जब बच्चों का व्यवहार अचानक बदलने लगा — वे घर से पैसे चुराने लगे, गहने और बर्तन बेचने लगे और रात-रात भर गायब रहने लगे।

2017–18 तक स्थिति इतनी बिगड़ चुकी थी कि कई गाँवों में किशोर उम्र के बच्चों का एक बड़ा हिस्सा नशे की गिरफ्त में आ चुका था। लेकिन असली झटका 2020 में लगा, जब परसा बाजार क्षेत्र में ओवरडोज़ से पहली चर्चित मौत हुई। उस घटना ने पूरे इलाके को हिला दिया। तब जाकर अभिभावकों ने अपने बच्चों पर नजर रखनी शुरू की और कई परिवार मजबूरी में उन्हें नशा मुक्ति केंद्रों में भेजने लगे। समस्या यह थी कि जब तक लक्षण दिखते, तब तक लत गहरी हो चुकी होती थी।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह नशा अपने आप नहीं फैल रहा, बल्कि योजनाबद्ध तरीके से बच्चों तक पहुँचाया जा रहा है। स्कूलों के आसपास संदिग्ध लोग मंडराते दिखते हैं। पहले मुफ्त या बहुत सस्ते में नशा दिया जाता है, फिर धीरे-धीरे बच्चे पूरी तरह निर्भर हो जाते हैं। परिवारों को अक्सर तब पता चलता है जब घर से सामान गायब होने लगता है या बच्चा हिंसक हो जाता है। 2020 के आसपास हालात इतने खराब बताए जाते हैं कि हर पाँच-छह घरों में कोई न कोई बच्चा इस लत से जूझ रहा था।

इन वर्षों में कई दर्दनाक मौतें सामने आई हैं। परसा बाजार थाना क्षेत्र के एक गाँव में 8 सितम्बर 2025 को एक युवक का शव एक कुएँ से मिला। मृतक की पहचान “राहुल” (काल्पनिक नाम) के रूप में की गई है। गले में गमछा बंधा था और शरीर पर बर्बर पिटाई के निशान थे। हाथ-पैर टूटे हुए थे और बेल्ट जैसे गहरे दाग शरीर पर साफ दिख रहे थे। ग्रामीणों ने इसे हत्या बताया और आरोप लगाया कि वह कुआँ पहले भी अपराधियों द्वारा इस्तेमाल किया जाता रहा है। उनका कहना है कि पुलिस की गश्त और नशा विरोधी अभियान लगभग बंद हो चुके हैं, जिससे नशा कारोबारियों का मनोबल बढ़ा है।

इसी क्षेत्र के पास रेलवे लाइन के किनारे 22 वर्षीय एक अन्य युवक का शव मिला, जिसे यहाँ “अमित” (काल्पनिक नाम) कहा जा रहा है। परिवार इसे हत्या मानता है, जबकि कुछ लोगों का कहना है कि वह नशे की हालत में ट्रेन के सामने आ गया होगा। ऐसी मौतों में सच्चाई अक्सर धुंधली रह जाती है, क्योंकि परिवार बदनामी और पुलिस झंझट के डर से खुलकर सामने नहीं आते।

एक दिहाड़ी मजदूर, जिन्हें हम “सुरेश” (काल्पनिक नाम) कह रहे हैं, ने 2023 में अपने 13–14 साल के बेटे को ओवरडोज़ से खो दिया। वे कहते हैं, “माँ-बाप के लिए इससे बड़ा दुख क्या होगा कि बच्चा आँखों के सामने तड़प कर मर जाए और हम कुछ न कर सकें।” उनका आरोप है कि सिस्टम की नाक के नीचे यह ज़हर बिक रहा है, लेकिन कार्रवाई नहीं होती। शराबबंदी के बाद ग्रामीणों में यह डर भी बैठ गया है कि कहीं शिकायत करने पर उल्टा उन्हीं पर केस न दर्ज हो जाए। कई लोग कहते हैं कि थाने में जाने पर उन्हें टाल दिया जाता है या कहा जाता है कि बड़े अधिकारी ही कुछ कर सकते हैं।

एक अन्य परिवार, जिनका नाम यहाँ “महेश” (काल्पनिक नाम) के रूप में दिया जा रहा है, ने 23 वर्षीय बेटे को खो दिया। उसने पहले ब्राउन शुगर लेना शुरू किया, फिर इंजेक्शन तक पहुँच गया और आखिरकार ओवरडोज़ से उसकी जान चली गई। इसी तरह “राजीव” (काल्पनिक नाम) नाम से संदर्भित एक पिता ने 2020 में अपने इकलौते बेटे को खोया था। उनकी घटना के बाद ही कई परिवारों को समझ आया कि पहले जो बच्चों की “आत्महत्या” या “अचानक मौत” लगती थी, उसके पीछे नशे की भूमिका हो सकती है।

एक 16 वर्षीय लड़के की कहानी पूरे इलाके में लोगों की जुबान पर है, जिसे यहाँ “गुड्डू” (काल्पनिक नाम) कहा जा रहा है। उसके पिता का निधन उसके जन्म से पहले हो गया था। माँ घरों में काम करती थी, बड़ा भाई किसी तरह परिवार चलाता था। उसने 11–12 साल की उम्र में साथियों के साथ नशा शुरू किया और 2022 में रेलवे ट्रैक पर मृत मिला। उसका भाई आज भी कहता है, “ये लोग सौदागर नहीं, हत्यारे हैं।”

एक अन्य परिवार, जिसे यहाँ “शंकर” (काल्पनिक नाम) के नाम से दर्शाया गया है, के दो बेटे थे। बड़ा बेटा नशे का शिकार हुआ, जबकि छोटा बेटा, सिर्फ 18 साल की उम्र में, 2023 में नशे की हालत में फाँसी लगाकर मर गया।

कई परिवारों ने बच्चों को नशा मुक्ति केंद्रों में भेजा, लेकिन वहाँ से जो अनुभव सामने आए, वे खुद एक अलग चिंता का विषय हैं। कुछ युवाओं ने बताया कि उन्हें शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया, उल्टी साफ करने और गंदे शौचालय नंगे हाथों से साफ करने को मजबूर किया गया। कई बच्चे डर के मारे पूरी बात बताने से भी हिचकते हैं। उनके शब्दों में, “वहाँ रहना जीते-जी नरक में रहने जैसा है।” नतीजा यह कि इलाज के नाम पर भी परिवार असमंजस में हैं — घर रखें तो नशे का खतरा, भेजें तो अमानवीय व्यवहार का डर।

इस संकट ने गरीब परिवारों को आर्थिक रूप से भी तोड़ दिया है। इलाज और पुनर्वास के लिए लोगों ने माइक्रोफाइनेंस से कर्ज़ लिए, गहने बेचे, घर गिरवी रखे। एक कर्ज़ चुकाने के लिए दूसरा कर्ज़ लेना अब आम बात है। एक माँ ने रोते हुए कहा, “बच्चा गया, अब कर्ज़ भी नहीं उतर रहा। रोने का भी वक्त नहीं मिला।” स्थानीय लोगों का कहना है कि दलित, पिछड़े और बेहद गरीब परिवार इस मार को सबसे ज्यादा झेल रहे हैं।

राज्य स्तर के अधिकारियों ने भी माना है कि शराबबंदी के बाद सूखे नशे का चलन तेजी से बढ़ा है। स्मैक, ब्राउन शुगर और सिंथेटिक ड्रग्स युवाओं को बर्बाद कर रहे हैं। सरकार ने विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म और हेल्पलाइन व्यवस्थाएँ शुरू की हैं, लेकिन गाँवों के लोग कहते हैं कि कागजों से बाहर इनका असर बहुत कम दिखता है। स्थानीय स्तर पर कार्रवाई छिटपुट है और अक्सर कुछ दिनों के अभियान के बाद सब ठंडा पड़ जाता है।

आज हाल यह है कि स्कूल के छात्र, दिहाड़ी मजदूर, रिक्शा चालक — हर वर्ग के युवा इस जाल में फँसते दिख रहे हैं। यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदा का रूप ले चुका है। परिवार डर में जी रहे हैं, बच्चे भविष्य खो रहे हैं और समाज धीरे-धीरे भीतर से टूट रहा है। ग्रामीणों की एक ही मांग है — नशा बेचने वालों पर सख्त कार्रवाई, मानवीय पुनर्वास व्यवस्था और ऐसा माहौल जहाँ पीड़ित परिवार बिना डर अपनी बात कह सकें। जब तक यह नहीं होता, “सूखा नशा” गाँवों में चुपचाप अपनी अगली पीढ़ी निगलता रहेगा।

होना चाहती हूं मूक इतिहास की बोली: बापू टावर (पटना) में मुखरित हुआ स्त्री स्वर

बापू टावर (पटना) में युवा कवयित्रियों का स्त्रीवादी कविता-पाठ

पटना का साहित्यिक समाज लंबे समय से ध्रुवों, गुटों और आपसी गिरोहबंदियों में बंटा हुआ दिखाई देता है। ऐसे में किसी साहित्यिक समारोह में शामिल होने की इच्छा सहज ही क्षीण हो जाती है। विचारों से ज्यादा व्यक्तियों और खेमों की निष्ठा को प्राथमिकता देने वाला यह माहौल अक्सर साहित्य की मूल आत्मा को आहत करता है। लेकिन जब युवा कवि प्रत्यूष चंद्र मिश्रा की ओर से युवा कवयित्रियों के कविता-पाठ का निमंत्रण मिला, तो तमाम संकोचों के बावजूद उसे स्वीकार करने से स्वयं को रोक पाना संभव नहीं हुआ।

प्रत्युष मिश्रा की पहल से पटना के बापू टावर में आयोजित यह संगोष्ठी कई अर्थों में अपवाद थी। यह पूरी तरह स्त्रीवादी एप्रोच के साथ आयोजित कार्यक्रम था, कविता-पाठ से लेकर अध्यक्षता तक। मंच पर उपस्थित सभी प्रतिभागी स्त्रियां थीं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि ये कवयित्रियां अलग-अलग सामाजिक, भौगोलिक और वैचारिक पृष्ठभूमियों से आई थीं, जिसने इस आयोजन को एकरूपता से बाहर निकालकर बहुस्तरीय बना दिया।

कविता-पाठ में मंच से स्त्री दृष्टि के जरिए जिस यथार्थ की यात्रा कराई गई, वह न तो चिकनी थी और न ही पूरी तरह व्यवस्थित, बल्कि वह कच्चे-पक्के रास्तों से होकर गुजरने वाली वह यात्रा थी, जो स्त्री जीवन के संघर्ष, अस्मिता, प्रतिरोध और स्वप्नों को एक साथ उद्घाटित करती है। यह अनुभव इसलिए भी आह्लादकारी था क्योंकि मंच से कही जा रही कविताओं को श्रोताओं ने पूरे धैर्य और तल्लीनता से सुना। यह आज के साहित्यिक आयोजनों में विरल होता जा रहा है।

ज्योति स्पर्श, कंचन राय, चाहत अन्वी, ज्योति रीता, नताशा और गुंजन उपाध्याय पाठक—इन 6 युवा कवयित्रियों ने पाठ किया। इन सभी की कविताओं में अपने समय की व्यापक चिंताएं, स्त्री जीवन की जटिलताएं और सत्ता-संरचनाओं से टकराने की स्पष्ट आकांक्षा दिखाई दी। कहीं निजी अनुभव सामाजिक यथार्थ में रूपांतरित होता दिखा, तो कहीं राजनीतिक हिंसा और ऐतिहासिक चुप्पियों पर स्त्री दृष्टि से सवाल खड़े किये गए। विशेष रूप से कंचन राय की कविता “बंदूक की गोली” ने अपनी स्त्रीवादी तेवर और प्रतीकात्मक भाषा के कारण गहरा प्रभाव छोड़ा। कविता की ये पंक्तियां श्रोताओं के भीतर तक उतरती चली गईं—
चाहती हूं
आग होना..
पहाड़ होना..
पखेरू होना…

होना चाहती हूं
मूक इतिहास की बोली
जरूरत पड़े तो
बंदूक की गोली….
कविता स्त्री को केवल पीड़िता के रूप में नहीं, बल्कि इतिहास से संवाद करती, जरूरत पड़ने पर प्रतिरोध का रूप धारण करती एक सक्रिय शक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता सुनीता गुप्ता ने की। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने गांधी और उनके स्त्री सशक्तिकरण संबंधी विचारों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने यह रेखांकित किया कि ‘गांधी की राजनीतिक और नैतिक दृष्टि में स्त्री केवल सहायक नहीं, बल्कि परिवर्तन की केंद्रीय शक्ति थी।’ साथ ही उन्होंने पठित कविताओं में निहित विविध स्त्रीवादी अप्रोच को समकालीन साहित्य के लिए न केवल आवश्यक बल्कि श्रेयस्कर बताया।

संचालन युवा कवि प्रत्यूष चंद्र मिश्रा ने किया। संचालन में अनावश्यक औपचारिकता से बचते हुए उन्होंने संवाद और कविता को केंद्र में रखा, जिससे कार्यक्रम की प्रवाहशीलता बनी रही।
इस अवसर पर श्रोताओं के रूप में संजीव चंदन, कुमार मुकुल, वीरेंद्र यादव, नरेंद्र कुमार विद्याभूषण, श्रीधर करुणानिधि , सुशील, राजेश कमल, अरविंद पासवान, मुसाफिर बैठा, धर्मवीर यादव गगन और श्वेता शेखर सहित कई लेखक, कवि और साहित्यकार उपस्थित थे। यह उपस्थिति इस बात का संकेत थी कि यदि मंच वैचारिक रूप से ईमानदार हो, तो पटना का साहित्यिक समाज अभी पूरी तरह निष्क्रिय नहीं हुआ है।

कुल मिलाकर, यह आयोजन पटना के साहित्यिक परिदृश्य में एक ताजी हवा के झोंके की तरह था—जहां न गुट थे, न गिरोह, बल्कि स्त्री स्वर, स्त्री दृष्टि और कविता का ईमानदार संवाद था। ऐसे आयोजन यह उम्मीद जगाते हैं कि यदि मंच स्त्रीवादी, समावेशी और वैचारिक रूप से सजग हों, तो साहित्य अब भी समाज से गहरे संवाद की क्षमता रखता है।

हंस ब्राह्मणवाद के यम ही नहीं,डाइवर्सिटी आंदोलन के स्तम्भ भी रहे!


— एच. एल. दुसाध

पुरखे बुद्ध शरण हंस का हमेशा-हमेशा के लिए चले जाना

22 जनवरी की शाम हिंदी पट्टी की आंबेडकरवादी दुनिया स्तब्ध रह गई, जब पाँच बजे के करीब सोशल मीडिया पर यह खबर वायरल हुई कि महान बहुजन लेखक बुद्ध शरण हंस ने पटना एम्स में अंतिम सांस ली! किसी आंबेडकरवादी लेखक के निधन पर हिंदी पट्टी में शोक की ऐसी लहर इसके पूर्व नहीं देखी गई। उसके बाद तो उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए सोशल मीडिया पर सैलाब ही आ गया!

उनके परिनिर्वाण की खबर पाकर आम से लेकर खास लोगों ने तरह-तरह से उनके अवदानों को स्मरण करना शुरू किया, जिनमें डॉ. जय प्रकाश कर्दम, डॉ. विजय कुमार त्रिशरण, प्रो. विलक्षण बौद्ध, संजीव चन्दन, प्रो. हेमलता महिश्वर, मुसाफिर बैठा, हीरालाल राजस्थानी, सत्येन्द्र पासवान, प्रमोद पासवान, अनुराग दुसाध, डॉ. दिनेश पाल, डॉ. कर्मानंद आर्य, विधायक ललन पासवान, डॉक्टर एम.एल. परिहार, इंजी. हरिकेश्वर राम, मुनेश राम, प्रो. कालीचरण स्नेही इत्यादि जैसे बड़े-बड़े लेखक, शिक्षाविद, एक्टिविस्ट भी रहे।

इनकी भावना का उपयुक्त प्रतिबिम्बन प्रख्यात लेखक डॉ. सिद्धार्थ रामू के इन शब्दों में हुआ। डॉ. सिद्धार्थ ने ‘पुरखे बुद्ध शरण हंस का हमेशा-हमेशा के लिए चले जाना’ शीर्षक से फेसबुक पर लिखा—

‘यह सच है कि ब्राह्मणवाद के चाक-चौबंद किले में कैद दलितों की मुक्ति का द्वार आधुनिक युग में फुले दंपत्ति ने खोला था। उस द्वार को शाहू महाराज ने और चौड़ा किया। बाबा साहेब ने उसे एक विशाल हाईवे में बदल दिया। पर, जिन लाखों लोगों ने फुले-शाहू जी और बाबा साहेब के दलित मुक्ति के सपने को जन-जन का सपना बनाया और उसे जमीन पर उतारने के लिए अपने को पूरी तरह समर्पित कर दिया, उनमें एक बड़ा व्यक्तित्व बुद्ध शरण हंस भी थे!

बुद्ध शरण हंस जैसे लाखों मिशनरी लोगों ने यदि बाबा साहेब के मिशन को पूरा करने के लिए अपनी जिंदगी न लगाई होती, तो हम आज जहां खड़े हैं, हमारे पास प्रतिवाद, प्रतिरोध और संघर्ष की जो शक्ति और आवाज है, वह नहीं होती। बुद्ध शरण ने बाबा साहेब के आह्वान को स्वीकार करते हुए उच्च शिक्षा ग्रहण की। आईएएस बने, पर उन्होंने कभी इसका गुमान नहीं पाला कि वे आईएएस हैं। उनके लिए यह पद बाबा साहेब के मिशन को पूरा करने का एक साधन था, व्यक्तिगत अहंकार और पद-प्रतिष्ठा का विषय नहीं।

उन्होंने इस उपलब्धि को कभी अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं माना। वे हमेशा बातचीत में कहते थे कि यदि फुले-शाहू जी और बाबा साहेब ने संघर्ष न किया होता, तो हम आज भी अपने बाप-दादों (पुरखों) की तरह हलवाही कर रहे होते या सफाई कर्मी होते। उनके दिल-दिमाग में स्पष्ट था कि उन्हें जो कुछ पद-प्रतिष्ठा और धन के रूप में मिला है, वह बाबा साहेब और अन्य नायकों के नेतृत्व में चले सामूहिक संघर्षों की देन है। यह मेरी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है।

इसके चलते उन्होंने अपनी योग्यता, क्षमता, प्रतिभा और कमाई को दलित-बहुजनों की मुक्ति के लिए समर्पित कर दिया। जो कोई भी उनसे मिला होगा, उसे इसका अहसास होगा कि उनसे मिलकर लगता ही नहीं था कि यह व्यक्ति इतना बड़ा भारत सरकार का अधिकारी है या रहा है। बुद्ध शरण हंस एक सामान्य कार्यकर्ता की तरह मिशन के साथी थे।

मैं बड़ा हूं, तू छोटा है; मैं अफसर हूं, तो चपरासी—यह कभी उनके व्यवहार में नहीं दिखता था। उनका झोला पुस्तकालय, उनकी छोटी-छोटी पुस्तिकाएं, पत्रिकाएं और उनकी किताबें किसी विद्वान के विद्वतापूर्ण उपदेश नहीं थीं, बल्कि इस चिंता से प्रेरित थीं कि कैसे सहज-सरल और सामान्य तरीके से बाबा साहेब और उनके विचारों को लोगों तक पहुंचाया जाए, और कैसे ब्राह्मणवाद से पूर्ण मुक्ति का रास्ता प्रशस्त किया जाए।

ब्राह्मणवाद के चंगुल से दलित-बहुजन मुक्ति के संघर्ष में लगे हममें से बहुत सारे लोग यह शायद भूल रहे हैं कि लाखों बुद्ध शरण हंस इस देश में दलित-बहुजनों के मुक्ति संघर्ष की नींव में खपे, तब जाकर हम आज इस स्थिति में हैं कि ब्राह्मणवाद को हर स्तर पर चुनौती दे सकते हैं।

बुद्ध शरण हंस मेरे लिए मेरे परदादा की तरह थे—सिर्फ वैचारिक और संवेदनात्मक स्तर पर ही नहीं, व्यक्तिगत स्तर पर भी। परदादा की तरह का स्नेह, उसी तरह का ख्याल, उसी तरह की प्रेरणा देने वाले। पटना जाने पर करीब तीन-चार बार ही उनसे मिल पाया, पर उनका फोन अक्सर आ जाता था—इस विषय पर भी लिखो, उस विषय पर लिखो, तुम अच्छा लिखे हो।

निजी बात यह कि वे उन लोगों में से थे, जो पूछते थे—घर में रोटी बन रही है या नहीं; जेब में दो रुपये हैं या नहीं; कोई दिक्कत तो नहीं है, बताओ? बच्ची कैसी है?

पुरखे बुद्ध शरण हंस को सादर नमन के साथ अंतिम अलविदा।’

बुद्ध शरण हंस को अंतिम जोहार!
उनके अवदानों से धन्य पटना के आंबेडकरवादियों ने अभूतपूर्व भावभीनी विदाई दी। इस लेखक को हंस साहब के बेहद करीबी चर्चित लेखक मुसाफिर बैठा ने बताया कि घाट पर उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए ढाई सौ से अधिक लोग उपस्थित रहे। घर पर उनका अंतिम दर्शन करने के लिए हजार से अधिक लोग आए। उनके अंतिम दर्शन के लिए पटना के बुद्ध विहार में भी सैकड़ों की संख्या में लोग आए!

उनकी अंतिम विदाई का मार्मिक वर्णन चर्चित पत्रकार अरुण नारायण ने ‘बुद्ध शरण हंस सर को अंतिम जोहार!’ शीर्षक से इन शब्दों में किया है —

‘22 जनवरी, 2026 को हिन्दी समाज ने एक साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि एक सजग विवेक और एक निर्भीक वैचारिक पहरेदार को खो दिया। बुद्ध शरण हंस का जाना आज के इस अंधकारमय, फासीवादी समय में उस आवाज़ का मौन हो जाना है, जो सत्ता, सुविधा और समझौतों के विरुद्ध आजीवन खड़ी रही। यद्यपि उन्होंने एक पूरा जीवन जिया, पर उनकी अनुपस्थिति हाशिये के समाज के लिए एक गहरी रिक्ति है—एक ऐसी चुनौती, जिसे वे स्वयं जीवन भर गढ़ते और साधते रहे।

एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में कार्य करते हुए भी उन्होंने कभी सत्ता की चुप्पी को अपना आभूषण नहीं बनाया। पद, प्रतिष्ठा और सुविधा उनके लिए कभी विचारों का विकल्प नहीं बने। अंबेडकर मिशन पत्रिका के संपादक के रूप में उन्होंने फुले, पेरियार और आंबेडकर की परंपरा को केवल स्मरण की वस्तु नहीं, बल्कि संघर्ष की जीवित धारा बनाए रखा। अर्जक साहित्य को बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, बंगाल और मध्य प्रदेश तक पहुंचाने में उनकी भूमिका ऐतिहासिक थी।

वे उन विरले व्यक्तित्वों में थे, जिनके विचार और जीवन के बीच कोई फांक नहीं थी। समता और न्याय पर आधारित समाज का सपना उन्होंने केवल देखा ही नहीं, उसे जिया। अर्जक, बौद्ध और आंबेडकरवादी चेतना को उन्होंने अकादमिक विमर्श की सीमाओं से निकालकर जनभाषा, जनसाहित्य और जनसंघर्ष का औज़ार बनाया। हिन्दी कहानी, आत्मकथा और जीवनी विधा को उन्होंने जिन जमीनी अनुभवों से समृद्ध किया, उसका सम्यक मूल्यांकन अभी शेष है—और वह मूल्यांकन आने वाले समय की वैचारिक जिम्मेदारी है।

पिछले दस–बारह दिनों से वे एम्स में भर्ती थे। उनके निधन की सूचना जैसे ही फैली, पूरा बहुजन समाज स्तब्ध रह गया। उनकी अंतिम यात्रा भी उनके विचारों की ही प्रतिछाया थी—आंबेडकर और जोतीराव फुले की तस्वीरों व उद्धरणों से सजा मुक्ति रथ, उनके आवास बुद्धा सिटी हॉस्पिटल, विष्णुपुरी, चितकोहरा से निकलकर गौतम बुद्ध विहार (दारोगा राय मार्ग) पहुंचा।

‘जय भीम’ और ‘जीवन-मरण सत्य है’ के नारों के बीच हुई जनसभा में लोगों ने उन्हें स्मृतियों, संघर्षों और संकल्पों में याद किया। इसके बाद कारवां बांसघाट पहुँचा, जहां बौद्ध परंपरा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार किया गया। इस यात्रा में उनके सुपुत्र डॉ. यशपाल और डॉ. आनंद दीप सहित फुले–आंबेडकरवादी परिवार के सैकड़ों साथी शामिल थे।

उनकी शवयात्रा में उमड़ा जनसैलाब इस बात का प्रमाण था कि जो लोग निस्वार्थ भाव से समाज-निर्माण में लगे रहते हैं, समाज उन्हें सम्मान, स्मृति और कृतज्ञता के रूप में अपना प्रतिदान अवश्य देता है। हिन्दी के बौद्धिक परिसर में—विशेषकर बहुजन और अर्जक समाज के बीच—बुद्ध शरण हंस ने तर्कशीलता, वैज्ञानिक चेतना और नैतिक साहस की जो मशाल जलाई, वह बुझी नहीं है। वह मशाल अब हम सबके हाथों में है!’

निहायत ही अर्थाभाव में शिक्षा को मुक्ति का हथियार बनाए बुद्ध शरण हंस ने
पत्रकार अरुण नायर ने सही कहा कि बुद्ध शरण हंस ने तर्कशीलता, वैज्ञानिक चेतना और नैतिक साहस की जो मशाल जलाई, वह बुझी नहीं है। वह मशाल अब हम सबके हाथों में है! उनके परिनिर्वाण के बाद दर्जन भर से अधिक लेखक, शिक्षाविदों, एक्टिविस्टों से मेरी बात हुई—सब में उनके जलाए मशाल को आगे बढ़ाने का संकल्प पाया। उनकी तर्कशीलता और वैज्ञानिक चेतना की मशाल हम कैसे जलाए रखेंगे, इसका रोडमैप जल्द ही सामने आएगा!

बहरहाल, आंबेडकरी आंदोलन में दादा-परदादा और अभिभावक की हैसियत रखने वाले बुद्ध शरण हंस ने 8 अप्रैल, 1942 को गया जिला के वजीरगंज अंतर्गत तिलोरा गाँव को अपने जन्म से धन्य किया था। निहायत ही गरीबी में रहकर उन्होंने बाबा साहेब आंबेडकर के “शिक्षित बनो” आह्वान को स्वीकार करते हुए उच्च शिक्षा ग्रहण की, आईएएस बने और वर्ष 2000 में श्रम विभाग के विशेष सचिव के पद से सेवा-निवृत्त हुए।

उन्होंने कितने अभावों में रहकर शिक्षार्जन किया, इसकी जानकारी देते हुए एक चैनल पर कहा था, ‘स्कूल से आने के बाद मैं सबसे पहले घर का चूल्हा देखता था। अगर चूल्हा गरम मिलता, तब विश्वास हो जाता कि आज खाना मिलेगा। ठंडा मिलने पर मन मारकर थोड़ा आराम करता और फिर पढ़ाई में जुट जाता!’

आंबेडकरवादी चिंतन में ‘दलित’ शब्द की उत्पत्ति को लेकर अक्सर बहस होती रहती है। ढेरों लोग इस शब्द की उत्पत्ति के लिए सत्तर के दशक को चिन्हित करते हैं, किन्तु हंस साहब के साथ यह जन्म से जुड़ गया था। उनके बड़े भाई ने उनका नामकरण ‘दलित प्रसाद’ के रूप में किया था, जिसे बाद में उनके प्राइमरी स्कूल के प्राध्यापक ने ‘दलित पासवान’ कर दिया। किन्तु आंबेडकरवादी चेतना विकसित होने के बाद, सत्तर के दशक की शुरुआत में, उन्होंने बौद्ध धर्म अंगीकार करने के बाद इस नाम का परित्याग कर ‘बुद्ध शरण हंस’ नाम धारण किया।

वे साहित्य सृजन के जरिए इस नाम को भारतमय इतना विख्यात कर गए कि उनके चाहने वाले उनकी अंतिम यात्रा में बार-बार यह नारा उछालते रहे—
‘जब तक सूरज चाँद रहेगा – बुद्ध शरण हंस का नाम रहेगा!’

हंस का साहित्य सृजन आत्म-प्रतिष्ठा के लिए नहीं, बहुजन मुक्ति को समर्पित रहा

हंस साहब हिंदी दलित साहित्य की शुरुआत करने वाले चुनिंदा साहित्यकारों में एक रहे। उन्होंने साहित्य की प्रायः हर विधा—कविता, कहानी, आत्मकथा, निबंध, यात्रा-वृत्तांत—पर कलम चलाया। किन्तु साहित्य उनके लिए आत्म-प्रतिष्ठा का सुखबोध एन्जॉय करने का जरिया नहीं रहा। उन्होंने इस बात का जरा भी प्रयास नहीं किया कि उनकी किताबें प्रतिष्ठित लाइब्रेरियों में जगह पाएं या उनकी किताबें कोर्स में लगें।

उनके समकालीन ही नहीं, उनसे प्रेरणा लेकर साहित्य सृजन में जुटे ढेरों दलित साहित्यकारों की किताबें विश्वविद्यालयों के कोर्स में लगी हैं, लेकिन यह सुखद संयोग हंस साहब के साथ नहीं है। अरुण नारायण जी ने उनके विषय में ठीक ही लिखा है कि, ‘आंबेडकरवादी चेतना को उन्होंने अकादमिक विमर्श की सीमाओं से निकालकर जनभाषा, जनसाहित्य और जनसंघर्ष का औज़ार बनाया!’

इस विषय में डॉ. सिद्धार्थ रामू का यह कथन काबिले-गौर है कि जिन लाखों लोगों ने फुले-शाहू जी और बाबा साहेब के दलित मुक्ति के सपने को जन-जन का सपना बनाया और उसे जमीन पर उतारने के लिए अपने को पूरी तरह समर्पित कर दिया, उनमें एक बड़ा व्यक्तित्व बुद्ध शरण हंस भी थे। सच में, हंस साहब ने साहित्य को वंचित-बहुजनों तक फुले-शाहू जी—बाबा साहेब के बहुजन-मुक्ति के संदेश को पहुँचाने का जरिया बनाया।

इस दिशा में और लोगों ने भी प्रयास किया, किन्तु हंस साहब का प्रयास बहुत विरल इसलिए रहा क्योंकि उन्होंने फुले-शाहू जी—बाबा साहेब के संदेश को जन-जन तक पहुँचाने के लिए सिर्फ साहित्य-सृजन ही नहीं किया, बल्कि इससे आगे बढ़कर उन्होंने इसके प्रकाशन व वितरण का चुनौतीपूर्ण काम भी अंजाम दिया। इस क्रम में उनका सबसे महत्त्वपूर्ण काम दिखता है—पुस्तकों का वितरण!
यह काम सुचारू रूप से चल सके, इसके लिए उन्होंने अपनी जीवन-संगिनी कान्ति बाला के साथ अपने दोनों डॉक्टर पुत्रों और बहुओं को भी लगा दिया। एक बड़े अधिकारी होकर भी अपने परिवार के साथ सड़कों, मेलों इत्यादि में उन्हें स्टॉल लगाते देख लोग विस्मित होते। पूरे परिवार को आंबेडकरी मिशन में लगाने के कारण ही वह 1993 से लेकर अपने जीवन के शेष दिनों तक आंबेडकर मिशन पत्रिका का सफलतापूर्वक प्रकाशन और वितरण कर सके।

किताबों के जरिए फुले-आंबेडकर का संदेश गाँव-गाँव तक पहुँचाने के लिए वह मुकदमे झेलने के बावजूद ब्राह्मणवाद से बचो, तीन महाप्राणी जैसी अन्य कई विस्फोटक किताबें तैयार कर सके। इस साहस के जोर से ही बड़े अधिकारी होकर ललई सिंह यादव जैसे क्रांतिकारी को तीन दिन अपने घर पर रखकर अपना जीवन धन्य कर सके।

वह जन-जन तक किताबें पहुँचाने के लिए लगातार तरह-तरह के प्रयोग करते रहे। इसी क्रम में जीवन के शेष दिनों में उनके जेहन में ‘सावित्रीबाई झोला पुस्तकालय’ का अनूठा कॉन्सेप्ट उभरा। उम्मीद है, उनके नहीं रहने पर भी झोला पुस्तकालय फुले-शाहू जी—बाबा साहेब के विचारों को जन-जन तक पहुँचाने का काम करता रहेगा, जोकि महामानव हंस साहब का सपना था!

ऐसे मिली मुझे हंस की निकटता

आंबेडकर मिशन चलाकर बीसवीं सदी में ही किंवदंती बन चुके हंस साहब से एक नाटकीय घटना के माध्यम से निकटता प्राप्त करने का अवसर मुझे अप्रैल 2000 में मिला। उन दिनों मैं ‘ब्लूमून बुक्स’ प्रकाशन के लिए घूम-घूम कर लोगों के बीच किताबें पहुँचाने का काम किया करता था। यह संस्था खुद की किताबें प्रकाशित करने के साथ दूसरों की भी किताबें लेकर मिशन भाव से उन्हें जन-जन तक पहुँचाने का काम किया करती थी।

वहाँ जॉब करने के दौरान हंस साहब की ढेरों किताबें पढ़कर उनसे मिले बिना ही उनका एक अनुसरणकारी बन चुका था। अप्रैल 2000 में किसी दिन दिल्ली के मावलंकर हॉल में दलित साहित्यकारों का जुटान हुआ था। उस अवसर पर मैं भी ब्लूमून बुक्स की ओर से किताबों की प्रदर्शनी लगाने पहुँचा था। साहित्यकारों की भारी उपस्थिति को देखते हुए लगा कि हंस साहब भी शायद इस आयोजन में शिरकत करने आए होंगे।

इस बात का अनुमान लगाते हुए मैंने किसी साहित्यकार से उनके विषय में पूछा, तो पता चला कि वह भी आए हुए हैं। चूँकि मैंने हंस साहब को कभी देखा नहीं था, इसलिए उस सज्जन से उन्हें मिलवा देने का आग्रह किया और मेरे अनुरोध की रक्षा करते हुए उन्होंने उनसे मिलवा भी दिया। उनका शांत व सौम्य व्यक्तित्व और स्नेहपूर्ण व्यवहार देखकर अभिभूत हुए बिना न रह सका।

उस समय तक मेरी एक छोटी-सी पुस्तिका ‘प्रचारतंत्र और बहुजन समाज’ ही प्रकाशित हो पाई थी, जिसे मैंने साहस जुटाकर उन्हें भेंट किया। दस–पंद्रह मिनट की उस मुलाकात में कभी ऐसा नहीं लगा कि मैं किंवदंती बन चुके एक ऐसे बौद्धिक नायक से मिल रहा हूँ, जो आईएएस जैसे उच्च पद पर भी रहा हो।

उनकी सहजता देखकर पहली ही मुलाकात में जून में होने जा रही अपने बड़े बेटे की शादी में उपस्थित होने का अनुरोध कर डाला। जब उन्हें यह पता चला कि शादी अंतरजातीय होगी, जिसे अभिभावकों ने खुद आपसी सहमति से तय किया है, तो वह खुशी से उछल पड़े और आने की सहमति दे दी।


मेरे बेटे की शादी में शरीक होने वाले दूर-दराज के अतिथियों में हंस साहब पहले व्यक्ति थे, जो जून की भीषण गर्मी की उपेक्षा कर पुणे से चलकर सबसे पहले सपत्नीक लखनऊ पहुंचे थे। विवाह का आयोजन एक होटल में हुआ था। विवाह कार्य उन्होंने ही प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान अंगने लाल साहब के साथ मिलकर संपन्न करवाया था। जिस तरह जाति के बंधन को तोड़कर दहेज रहित वह शादी भव्यता के साथ हुई थी, वह बहुतों को प्रेरित की थी, लेकिन सबसे ज्यादा स्पर्श शायद हंस साहब को ही की थी। अगले दिन वह लखनऊ छोड़ते समय मुझे और मेरे समधी को एक अनुकरणीय विवाह आयोजित करवाने के लिए बधाई देते हुए आग्रह किए कि मेरे लिए भी इसी तरह उपयुक्त पात्र-पात्री ढूंढें, मैं भी अपने बच्चों की शादी इसी तरह करना चाहता हूँ। वह अपने बच्चों के अंतरजातीय विवाह के प्रति गंभीर थे, इस लिए पटना में बैठे-बैठे थोड़े-थोड़े अंतराल पर योग्य लड़का-लड़की ढूंढ देने के लिए हम दोनों को याद दिलाते रहे। अंततः कुछ अंतराल बाद उनकी छोटी बेटी ज्योति बाला की शादी मेरे समधी के मझले बेटे डॉ. प्रदीप चौधरी से तय हुई, जो बाद में चलकर अंतरजातीय विवाह की एक अनुकरणीय मिसाल बनी। इसके बाद तो हमें हंस साहब की और निकटता मिल गई और उनकी वजह से बिहार डाइवर्सिटी के वैचारिक आंदोलन का सबसे बड़ा केंद्र बन गया। हंस साहब के सहयोग से 2010 में भागलपुर और उसके निकटवर्ती इलाकों में बहुजन डाइवर्सिटी मिशन की ओर से छः दिवसीय डाइवर्सिटी यात्रा निकली। बाद में बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टियों के घोषणापत्रों में डाइवर्सिटी के एजेंडे को शामिल करवाने के लिए मैंने बिहार के 18 प्रमुख जिलों में प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के साथ उन सभी जिलों के छात्रावासों में संबोधित किया एवं वहां के कोर्ट-कचहरियों में परचे बांटे। हमारा प्रयास सफल रहा और कुछ पार्टियों के घोषणापत्रों में डाइवर्सिटी एजेंडे को जगह मिली। इसके पीछे सबसे बड़ी भूमिका हंस साहब की रही। उन्होंने इस यात्रा के लिए आर्थिक संसाधन सुलभ कराए और मैं जिस भी जिले में जाता, उनके कद्रदान हर तरह से सहयोग के लिए खड़े मिलते!

हंस साहब ब्राह्मणवाद के यम से आगे की चीज रहे

हंस साहब की पहचान मुख्यतः ब्राह्मणवाद के यम के रूप में रही। वह पूरे देश में घूम-घूम कर साहस के साथ ब्राह्मणवाद के खात्मे का गगनभेदी आह्वान तो करते ही रहते थे, सबसे बढ़कर उनकी ऐसी छवि निर्मित करने में उनकी ब्राह्मणवाद विरोधी किताबों का योगदान रहा! लेकिन ब्राह्मणवाद के खात्मे का उद्घोष करते रहने वाले हंस आंबेडकरवाद के गंभीर अध्येता रहे। उन्हें बाबा साहेब के 13 फरवरी, 1938 के मनमाड वाले ऐतिहासिक भाषण का निष्कर्ष याद था, जिसमें उन्होंने ‘पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद को सबसे बड़ा शत्रु’ बताते हुए कहा था, ‘अभी तक दलित वर्ग मुख्य रूप से सामाजिक कष्टों के निवारण के लिए ही आंदोलित होते रहे हैं। उन्होंने अपने आर्थिक कष्टों के निवारण का काम हाथ में लिया ही नहीं था। यह पहला अवसर है जब वे अपने आर्थिक कष्टों पर विचार करने के लिए एकत्रित हो रहे हैं… जिन आर्थिक समस्याओं से हम जूझ रहे हैं, अपनी उन आर्थिक समस्याओं पर सामाजिक समस्याओं जैसा जोर देने के काम की लंबे समय से उपेक्षा करते आए हैं।’ ऐसा कहकर बाबा साहेब ने मनमाड सम्मेलन को दलित आंदोलन का एक प्रस्थान बिंदु बताते हुए आंदोलन को आर्थिक कष्टों के निवारण पर केंद्रित करने का आह्वान किया था। उनका यह आह्वान जिन दलित लेखकों को स्पर्श किया, उनमें शीर्ष के लोगों में एक रहे बुद्ध शरण हंस साहब, जिसका साक्ष्य वहन करती है 1977 में प्रकाशित उनकी 32 पृष्ठीय पुस्तक: ‘शोषितों की समस्या और समाधान!’ दलित आंदोलनों में मान्यवर कांशीराम के उदय के बाद सामाजिक परिवर्तन व आर्थिक मुक्ति की बात खूब होती रही है। लेकिन मान्यवर के उदय पूर्व ही हंस साहब ने सामाजिक परिवर्तन व आर्थिक मुक्ति का निर्भूल नक्शा ‘शोषितों की समस्या और समाधान’ के जरिए पेश कर दिया था। उन्होंने जनसंख्या के अनुपात में इंजीनियर, डॉक्टर, मजिस्ट्रेट, टेक्निशियन, लेक्चरर, डॉक्टर, बैंकों के एजेंट, मैनेजर, कारखानों के मैनेजर और डायरेक्टर, सेना और पुलिस के उच्च पदाधिकारी, महलनुमा घरों के स्वामी, लेखक, चिंतक, नेता व अभिनेता बनने का सपना तब दिया था, जब समाज के बड़े-बड़े बुद्धिजीवी इसकी कल्पना करने की स्थिति में नहीं थे। लेकिन ब्राह्मणवाद जैसी अमूर्त समस्या के खात्मे में अपनी अधिकतम ऊर्जा लगाने वाले उनके कद्रदान इस पुस्तक की उपेक्षा कर गए! अगर ऐसा नहीं किए होते तो आज उनके निधन के उपरांत वे इस पुस्तिका का जरूर उल्लेख करते एवं इससे प्रेरणा लेने की अपील करते!

हंस ने ऐसे पेश किया था: सामाजिक परिवर्तन व आर्थिक मुक्ति का नक्शा
हंस साहब ने ‘शोषितों की समस्या और समाधान’ में आने वाले 50 वर्षों का दलित एजेंडा पेश करते हुए बहुजनों के विकास का मापदंड दे दिया था। कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र जैसी धारदार इस पुस्तिका में उन्होंने दलित और आदिवासियों को ‘अवर्ण’ के रूप में चिन्हित करते हुए उन्नत जीवन जीने की आकांक्षा पैदा करने का विरल प्रयास किया था। उन्होंने पुस्तिका के पृष्ठ 11 पर सवाल उठाया था, ‘क्या अवर्ण अभी भी पत्थर की गुफाओं में, झाड़ी-झुरमुटों, फूल और पत्तियों की झोपड़ी में जीवन गुजारें या बड़े-बड़े शहरों के ऊँचे विशाल महलों के स्वामी बनें? अवर्ण साधनहीन, संपत्तिहीन बनकर भूखे पेट आजीवन दुःख झेलते रहें या तेजी से बदलती हुई दुनिया और दौलत के साझीदार बन सुखोपभोग करें? क्या अवर्ण अभी भी सीधेपन का तमगा पहन, अपने धन और धरती गंवाते रहें या अन्य प्रगतिशील लोगों की तरह चुस्त और चतुर बन अपने अधिकारों के लिए दृढ़ संकल्प लें? ऐसे अनगिनत प्रश्न हैं, जिनका अंतिम और स्पष्ट उत्तर पाना आवश्यक है। इन प्रश्नों का उत्तर पाए बिना अवर्णों के विकास की बात सोचना मुश्किल है!’

पृष्ठ 15 पर वह सवाल उठाते हैं, ‘आजादी की इतनी लंबी अवधि के बाद अवर्णों को जिस अनुपात में इंजीनियर, मजिस्ट्रेट, डॉक्टर, टेक्निशियन, वकील, लेक्चरर, कारखाने के मैनेजर और डायरेक्टर, सेना और पुलिस के उच्च अधिकारी होना चाहिए, नहीं हो पाए हैं। ये सब ऐसे पद हैं जहाँ सुख-सुविधा, सम्मान, संपत्ति मिलने की गुंजाइश है। इन पदों पर ऐसी जगहों पर अवर्ण कम मात्रा में हैं, या अति-अल्प पहुँच पाए हैं, तो यह स्वतः सिद्ध होता है कि अवर्णों को सुख-सुविधा, सम्मान और संपत्ति बहुत ही कम मिल पाए हैं। आवश्यकता इस बात की है कि अवर्ण अधिक से अधिक योग्य बनें; भिन्न-भिन्न प्रकार की शिक्षा अपने बाल-बच्चों को दें और स्वयं भी लें। यह अत्यंत आवश्यक है कि भिन्न-भिन्न प्रकार की अधिक से अधिक शिक्षा प्राप्त कर सुखी जीवन जीने के लिए हर क्षेत्र में प्रवेश कर सकें। अवर्ण अपनी जनसंख्या के अनुपात में जब इंजीनियर, डॉक्टर, मजिस्ट्रेट, टेक्निशियन, लेक्चरर, बैंकों के एजेंट, मैनेजर, कारखानों के मैनेजर और डायरेक्टर, सेना और पुलिस के उच्च पदाधिकारी, लेखक, चिंतक, नेता व अभिनेता का पद प्राप्त कर लेंगे, तभी विकास का सही परिणाम देखा और समझा जा सकता है। ये सब विकास के चिन्ह और मापदंड हैं। इस मापदंड पर अवर्ण अभी अपनी स्थिति का अंदाजा लगाएँ कि वे कहाँ हैं!

अवर्णों के प्रत्येक परिवार में एक सदस्य को व्यवसायी बनाना चाहिए। दो-चार सदस्यों के परिवार में नियमित रूप से एक-दो सदस्यों को व्यवसाय में दिलचस्पी लेनी चाहिए। यह बात सत्य है कि अवर्ण एकाएक खान और कारखानों के मालिक नहीं बन सकते, विभिन्न प्रकार के साधनों का भंडार (आढ़त) नहीं बना सकते, स्टॉकिस्ट नहीं बन सकते, लेकिन खुदरा विक्रेता तो बन सकते हैं! अनाज, कपड़ों, दवाई, बर्तन, जूते आदि की दुकानें तो चला सकते हैं। शहरों में छोटे-बड़े होटल तो चला सकते हैं। अवर्ण को व्यवसाय के क्षेत्रों में जाना है, व्यवसाय करने का दृढ़ संकल्प लेना है और व्यवसाय की सफलता के लिए अथक परिश्रम करना है!’ (वही, पृष्ठ 20)

और सामाजिक परिवर्तन व आर्थिक मुक्ति की चाह में: हंस साहब बन गए डाइवर्सिटी के स्तंभ!
सत्तर के दशक में उन्होंने ‘शोषितों की समस्या और समाधान’ के जरिए सामाजिक परिवर्तन व आर्थिक मुक्ति का जो सपना देखा था, 2002 के भोपाल सम्मेलन—जहाँ दलित–आदिवासियों को उद्योगपति-व्यापारी बनाने वाले डाइवर्सिटी के विचार का उदय हुआ था—के बाद उनके सपनों को पंख लग गए। और जब 2007 में भोपाल सम्मेलन से निकले डाइवर्सिटी के विचार को आगे बढ़ाने के लिए ‘बहुजन डाइवर्सिटी मिशन’ (बीडीएम) की स्थापना हुई, वे न सिर्फ इससे सक्रिय रूप से जुड़े, बल्कि देखते ही देखते इसके प्रमुख स्तंभ बन गए। वे बीडीएम की ओर से हर साल औसतन हजार पृष्ठों में प्रकाशित होने वाली जिस ‘डाइवर्सिटी ईयर बुक’ को बहुजनों के आर्थिक विकास का बाइबिल, कुरान, धम्मपद और गुरु ग्रंथ कहा करते थे, उसके मुख्य परामर्शदाता बनकर इसके प्रकाशन में योगदान करने लगे। यह ईयर बुक 2006 से 2020 तक नियमित रूप से उनकी देखरेख में प्रकाशित होती रही। औसतन हजार पृष्ठों की ईयर बुक में कम से कम 50 पृष्ठों में उनके लेख फैले हुआ करते थे। इस तरह देखा जाए तो हंस साहब ने नई सदी में कम से कम 750 पृष्ठों का लेखन सिर्फ डाइवर्सिटी के विचार को फैलाने के लिए किया। उनकी आत्मकथा ‘टुकड़े-टुकड़े आईने’ के पाँच खंडों को छोड़ दिया जाए तो नई सदी में इतना लेखन किसी अन्य विषय पर नहीं किया। वह ऐसा क्यों कर सके, इसका साक्ष्य 1400 पृष्ठों में प्रकाशित ‘डाइवर्सिटी ईयर बुक: 2009-10’ सुलभ कराती है। इसमें पृष्ठ 1339 से 1383 तक उनके लेख हैं। इसके पृष्ठ 1344–45 पर डाइवर्सिटी की अहमियत का अहसास कराते हुए वे कहते हैं—

‘बहुजन डाइवर्सिटी मिशन अपने आप में एक सामाजिक क्रांति है। इसे किसी राजनीति के पक्ष-विपक्ष से कुछ लेना-देना नहीं है। बहुजन डाइवर्सिटी मिशन कोई राजनीति है ही नहीं; यह स्पष्ट तौर पर एक सामाजिक क्रांति है। यह बहुजन कल्याण, बहुजन विकास का खुला आंदोलन है। आज की तारीख में बेहतर विकास के रास्ते की इजाद डाइवर्सिटी मिशन ने की है। कारण की पहचान हो जाने से कार्य में सुगमता आती है। देश में व्याप्त आर्थिक स्रोतों पर सरकारी व्यवस्था कम, लूटपाट ज्यादा है। आर्थिक स्रोतों पर सुव्यवस्था की मांग डाइवर्सिटी मिशन करता है और साथ ही इनमें हो रही लूट का विरोध भी करता है। इस मिशन के आंदोलन की गति सर्जनात्मक है। बहुजन विकास के इस सर्जनात्मक आंदोलन में किसी के विरोध की गुंजाइश कहाँ! डॉ. राम मनोहर लोहिया ने अपने कार्यक्रम में राजनीति, व्यापार, पलटन और ऊँची सरकारी सेवाओं में सभी वर्गों की आबादी के अनुपात में स्थान सुरक्षित करने की मांग की थी। बहुजन डाइवर्सिटी मिशन ने आज की तारीख में भूमि, व्यापार, रोजगार, उद्योग-धंधों, मीडिया, स्पोर्ट्स, परिवहन, पार्किंग, फिल्म, उच्च शैक्षणिक संस्थाओं, कॉन्ट्रैक्ट, सप्लाई—यानी कमतर से लेकर बेहतर आय के सभी स्रोतों पर सभी वर्गों की आबादी के अनुसार हिस्सेदारी की मांग और पूर्ति का आंदोलन चलाया है। इस आंदोलन में सभी वर्गों का सुख, सभी वर्गों का हित शामिल है; न किसी वर्ग की उपेक्षा है और न ही किसी को वेटेज। बहुजन डाइवर्सिटी मिशन का एजेंडा समय की मांग है। आज की तारीख में डाइवर्सिटी की मांग को नकारने वाले बहुजनों के द्वारा नकार दिए जाएंगे! भूमि, व्यापार, रोजगार, उद्योग-धंधों, मीडिया, स्पोर्ट्स, परिवहन, पार्किंग, फिल्म, उच्च शैक्षणिक संस्थाओं, कॉन्ट्रैक्ट, सप्लाई इत्यादि आय के सर्वोत्तम स्रोत हैं। इन आय के स्रोतों पर ब्राह्मण-सवर्ण लोगों का एकाधिकार बना हुआ है। सरकार की नीति में न तो आय के सभी स्रोतों में सभी वर्गों के लिए आरक्षण है और न ही डाइवर्सिटी की नियत व्यवस्था। फलतः संपन्न समाज के लोग आय के बेहतर साधनों पर कब्ज़ा जमाकर मालामाल हो रहे हैं और शेष बहुजन बदतर स्थिति में जाने के लिए बाध्य हो रहे हैं। इसी दोरंगी स्थिति से उबरने के लिए डाइवर्सिटी आंदोलन का सूत्रपात किया गया है!’

हंस साहब के सामाजिक परिवर्तन व आर्थिक मुक्ति एजेंडे को आगे बढ़ाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी

हंस साहब का परिनिर्वाण एक ऐसे समय में हुआ है, जब निकट भविष्य में साधु-संतों द्वारा हिंदू राष्ट्र का संविधान लागू किए जाने की घोषणा हो चुकी है एवं शक्ति के स्रोतों का असमान बंटवारा खतरनाक बिंदु पर पहुँच चुका है। 2024 के मई में आई ‘वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब’ के मुताबिक देश के 89% धन-संपदा पर संघ के चहेते अपर कास्ट का कब्ज़ा हो गया है और दलित-आदिवासी 2.8% धन पर, जबकि विशाल पिछड़ा समाज मात्र 9% वेल्थ पर गुजर-बसर करने के लिए विवश है। वहीं विश्व में सबसे ज्यादा बदहाली का शिकार भारत की आधी आबादी को ग्लोबल जेंडर गैप की 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक पुरुषों की बराबरी में आने में 257 साल लगने हैं। ऐसी कठिन स्थिति में ज़रूरत इस बात की है कि हम हंस साहब के गुणानुरागी ब्राह्मणवाद जैसी अमूर्त समस्या के खात्मे के बजाय अपनी अधिकतम ऊर्जा उनके सामाजिक और आर्थिक मुक्ति के विचार को आगे बढ़ाने में लगाएँ। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। संपर्क: 9654816191)

“धरती भर आकाश” में स्त्री शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता का प्रतिरोध

तसनीम पटेल की आत्मकथा : शोध आलेख

आत्मकथा धरती भर आकाशमें स्त्री शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता का प्रतिरोध

अहमद अली

शोध सार – हिंदी आत्मकथात्मक साहित्य में तसनीम पटेल की आत्मकथा “धरती भर आकाश” स्त्री जीवन के संघर्षों  का एक सशक्त दस्तावेज़ है। यह कृति केवल लेखिका के निजी अनुभवों को अभिव्यक्त नहीं करती बल्कि भारतीय समाज में स्त्री शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता के प्रति व्याप्त सामाजिक, धार्मिक और पितृसत्तात्मक प्रतिरोध को भी उजागर करती है।प्रस्तुत आत्मकथा बताती है कि समाज  में स्त्री की शिक्षा को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है, और कैसे उसकी आर्थिक आत्मनिर्भरता को पारिवारिक ‘इज़्ज़त’ और पुरुष-सत्ता के लिए ख़तरा माना  गया है

आत्मकथा में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि जब लेखिका की बहन के लिए शिक्षिका की नौकरी का प्रस्ताव आता है वह अवसर उसके जीवन को नई दिशा दे सकता था किंतु पिता द्वारा उस प्रस्ताव का कठोर विरोध पितृसत्ता की जड़ मानसिकता को उजागर करता है। बेटी की कमाई को ‘भाड़’ कहना केवल व्यक्तिगत प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि उस सामाजिक सोच का प्रतीक है जिसमें पुरुष को ही परिवार का एकमात्र कमाऊ सदस्य माना जाता है और स्त्री की आर्थिक स्वतंत्रता को पुरुषत्व पर आघात समझा जाता है।

इसके अतिरिक्त आत्मकथा में मज़हबी फ़िरक़ेबंदी भी स्त्री शिक्षा के मार्ग में बाधा बनकर उभरती है। मेहदवी फ़िरक़े से संबंधित होने के कारण परिवार का सामाजिक बहिष्कार और धार्मिक असहिष्णुता बच्चों के मानसिक विकास को भी प्रभावित करती है। इस प्रकार स्त्री शिक्षा का प्रतिरोध केवल लिंग आधारित नहीं रह जाता बल्कि उसमें मज़हब, समाज और परंपरा की कई परतें जुड़ जाती हैं।

धरती भर आकाश यह स्थापित करती है कि स्त्री की शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता केवल व्यक्तिगत अधिकार का प्रश्न नहीं यह सामाजिक परिवर्तन का आधार है। यह आत्मकथा पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए स्त्री अस्मिता, संघर्ष और आत्मसम्मान की सशक्त अभिव्यक्ति बन जाती है।

बीज शब्द – स्त्री आत्मकथा, स्त्री शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता, पितृसत्ता, मज़हबी फ़िरक़ेबंदी, सामाजिक प्रतिरोध, मुस्लिम समाज, स्त्री अस्मिता

मूल आलेख – हिंदी साहित्य में आत्मकथा विधा ने हाशिए पर पड़े जीवनानुभवों को अभिव्यक्ति देने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। विशेषतः स्त्री आत्मकथाएँ उस सामाजिक यथार्थ को सामने लाती हैं जिसे पुरुष-प्रधान इतिहास और साहित्य प्रायः अनदेखा करता रहा है। तसनीम पटेल की आत्मकथा धरती भर आकाश इसी परंपरा की एक सशक्त कड़ी है। यह कृति स्त्री जीवन की उन जटिल परिस्थितियों को उजागर करती है जहाँ शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता जैसे मूलभूत अधिकार भी संघर्ष का विषय बन जाते हैं। गरिमा श्रीवास्तमव के मतानुसार, “ इन आत्मकथाओं को स्त्री के आक्रोश और प्रतिरोध की रचनात्मक अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए।”1 

धरती भर आकाश आत्मकथा में जब हम देखते है कि तसनीम को उसके सर बुलाकर उसके घर के हाल चाल पूछते है और उसको पिता को बुला कर लाने के लिए कहते है “प्रार्थना के बाद जोग सर ने मुझे अपने कार्यालय में बुलाया और मेरे घर के हालत की जानकारी ली। मुझसे कहा अभी घर जाकर अपने अब्बा से कहना- ‘सर ने बुलाया है।’ मैं तुरंत घर गई और अब्बा को साथ लेकर जोग सर के ऑफिस में आ गई। सर ने मेरी तारीफ़ करते हुए अब्बा के सामने एक सुझाव रखा कि ‘आपकी बड़ी बेटी’ अभी-अभी मैट्रिक पास हुई है। ऐसा तसनीम ने मुझे बताया है। शिक्षा विभाग में बड़े अधिकारी मेरे परिचित है। स्त्री शिक्षिकाओं की आज भी कमी है। मैं उसकी शिक्षिका की नौकरी लगा सकता हूँ। आपके घर की हालत सुधरेगी। इस बच्ची की पढ़ाई अच्छी होगी। इस बात पर अब्बा वहाँ शांत रहे। सर से कुछ नहीं बोले। घर आकर अम्मी से कहने लगे- हेडमास्टर रानी को नौकरी लगाने को कह रहा है, इस बात को सुनकर ही मेरा खून खौल रहा था। सभी को जहर देकर, मैं भी जहर खाकर मर जाऊँगा लेकिन बेटी की कमाई खाने वाला भाँड़ (नामर्द) मैं नहीं बनूँगा, मैं उसकी भाड़ नहीं खाऊँगा”2 

भारतीय समाज में स्त्री शिक्षा को लंबे समय तक संदेह और भय की दृष्टि से देखा गया है। आत्मकथा में जब लेखिका के लिए शिक्षिका की नौकरी का प्रस्ताव आता है।  तब यह क्षण सामाजिक बदलाव की संभावना लेकर आता है। शिक्षा विभाग में नौकरी का सुझाव न केवल लेखिका की प्रतिभा की स्वीकृति है बल्कि यह संकेत भी देता है कि स्त्री आत्मनिर्भर होकर परिवार की आर्थिक स्थिति सुधार सकती है। किंतु पिता द्वारा इस प्रस्ताव का तीव्र विरोध यह दर्शाता है कि पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री की कमाई को सहज रूप से स्वीकार नहीं किया जाता। मंजु आर्या लिखती है, “वैसे तो महिलाएं सदैव हाशिये पर रही है। चाहे वो कोई भी समाज हो हिन्दू सिख ईसाई अथवा मुसलमान। इतना हुआ की समय के साथ – साथ और धर्मों में तो काफी चीजे बदल गई और महिलाओं की स्थिति में भी उतरोत्तर सुधार होता गया किन्तु मुस्लिम समाज में महिलाओं की स्थिति जस की तस रही।”3 

पिता का यह कथन कि “बेटी की कमाई खाने वाला भाँड़ मैं नहीं बनूँगा” स्त्री के श्रम को अपमानजनक ठहराने वाली मानसिकता को उजागर करता है। यहाँ शिक्षा और नौकरी स्त्री की प्रगति के साधन न होकर पुरुष की प्रतिष्ठा के लिए चुनौती बन जाते हैं। यह प्रतिरोध केवल व्यक्तिगत नहीं है बल्कि उस सामाजिक सोच का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें पुरुष की पहचान ‘कमाऊ मुखिया’ के रूप में स्थापित है और स्त्री की भूमिका घरेलू दायरे तक सीमित कर दी जाती है।

“हम मेहदवी फ़िरक़े से थे। कुरान, नमाज़, रोज़ा, ज़कात, हज आदि इस्लाम के पाँच अरकान (पाँच तत्व) मेहदवी फ़िरक़े में भी मानते हैं। फ़र्क़ बस इतना है, सुन्नी फ़िरक़े के लोग यह मानते हैं कि मेहदी अले-सलाम ज़माने आख़िर में आएँगे। और मेहदवी यह कहते हैं कि मेहदी अलैह सलाम इस दुनिया में आकर चले गए। फिर वापस कैसे आएँगे? ऐसी कोई बात नहीं है, यह बहुत बुनियादी फ़र्क़ है। दूसरे धर्मों में जैसे भेदभाव और संप्रदाय हैं, वैसा ही इस्लाम में भी है। इस्लाम में भी 76 फ़िरके (पंथ) हैं। अब्बा पंथाभिमान के कारण नमाज़ अदा करने नहीं जाते थे। इसलिए बिलोली के मुस्लिम समाज का रोष हमारे परिवार पर था। श्रेष्ठ और स्वजन यदि साथ में हों तो इन्सान मुसीबतों का – सामना करता है। अब्बा बिलोली में अकेले ही थे इसलिए वहाँ के मुस्लिम हमें अपना नहीं मानते थे। अब्बा और समाज के बीच मज़हब की श्रेष्ठता की लड़ाई चलती थी और हम बच्चों को मुस्लिम समाज के ताने झेलने पड़ते थे। इस मज़हबी जंग में अब्बा बड़ी हिम्मत से लड़ते रहे लेकिन धर्मांध और नासमझ लोगों से कभी हार नहीं मानी, न उनके सामने झुकना पसंद किया।”4     

आत्मकथा में मज़हबी फ़िरक़ेबंदी का प्रश्न भी स्त्री शिक्षा के प्रतिरोध से गहराई से जुड़ा हुआ है। मेहदवी फ़िरक़े से संबंधित होने के कारण परिवार को सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। नमाज़ न पढ़ने और धार्मिक मतभेदों के कारण समाज द्वारा तिरस्कार झेलना पड़ता है। इस सामाजिक अलगाव का प्रभाव सीधे बच्चों पर पड़ता है। ऐसे वातावरण में स्त्री शिक्षा और आत्मनिर्भरता को और अधिक संदेह की दृष्टि से देखा जाता है, क्योंकि समाज पहले से ही परिवार को ‘अलग’ और ‘विरोधी’ मान चुका होता है।

“बिलोली में घर के सामने किराना की दुकान थी। उसके मालिक गनी सेठ से फूफी के नैन लड़ गए, लेकिन यह मुहब्बत दादी को रास नहीं आई। बेटी की हरकत को दादी ने पहचान लिया और अपने बेटे को सब बता दिया। अब्बा बहुत नाराज हुए, क्योंकि गनी सेठ कच्छी मुसलमान था जबकि अब्बा मेहदवी मुसलमान थे। लिहाजा, दोनों में बेटी-व्यवहार जुर्म करने के बराबर था। अब्बा फिर से हैदराबाद पहुँचे और अपने मुर्शिद (धर्मगुरु) से बहन के हालात बताए। अब्बा और अम्मी के जीवन में फुंफू खमरुन्निसा बानो ने एक तूफान खड़ा कर दिया था। हैदराबाद के अशरफुद्दीन को अब्बा ने पसंद किया। उनकी पहली पत्नी मर चुकी थी। अब्बा के सामने एक ही लक्ष्य था, बहन की शादी करना। वह उन्होंने पूरा कर दिया। फूफी का निकाह अशरफुद्दीन से हो गया और फूफी हैदराबाद रहने चली गई।”5 

स्त्री शिक्षा के प्रति यह प्रतिरोध विवाह संस्था से भी जुड़ा हुआ है। आत्मकथा में फूफी की प्रेमकथा यह स्पष्ट करती है कि स्त्री की इच्छा और चयन को सामाजिक अनुशासन के विरुद्ध माना जाता है। विवाह के माध्यम से स्त्री को ‘सुरक्षित’ दायरे में बाँध देना ही समाज का लक्ष्य बन जाता है। ऐसी स्थिति में शिक्षा और नौकरी जैसी स्वतंत्रताएँ स्त्री को उस दायरे से बाहर निकालने वाली शक्तियाँ प्रतीत होती हैं जिनसे समाज भयभीत रहता है।

आर्थिक स्वतंत्रता स्त्री को निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करती है। यही कारण है कि पितृसत्ता इसे सबसे बड़ा खतरा मानती है। धरती भर आकाश में शिक्षा और नौकरी का विरोध केवल आर्थिक प्रश्न नहीं है, बल्कि वह स्त्री की सोच, आत्मविश्वास और भविष्य पर नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश है। पिता का आक्रोश दरअसल उस व्यवस्था का आक्रोश है, जिसमें स्त्री की स्वतंत्र पहचान की कोई जगह नहीं है।

इसके बावजूद आत्मकथा का स्वर पूरी तरह निराशावादी नहीं है। संघर्षों, अपमान और अस्वीकार के बीच लेखिका की चेतना विकसित होती है। शिक्षा के महत्व की समझ, समाज की सच्चाइयों की पहचान और आत्मसम्मान की भावना धीरे-धीरे आकार लेती है। यही संघर्ष आगे चलकर स्त्री की अस्मिता को सुदृढ़ बनाता है।

इस प्रकार धरती भर आकाश स्त्री शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता के प्रतिरोध को केवल समस्या के रूप में नहीं सामाजिक संरचना के भीतर छिपे सत्ता-संबंधों के रूप में प्रस्तुत करती है। यह आत्मकथा पाठक को यह सोचने पर विवश करती है कि जब तक स्त्री की शिक्षा और आत्मनिर्भरता को सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक सामाजिक समानता का सपना अधूरा ही रहेगा।

यह कहा जा सकता है कि तसनीम पटेल की आत्मकथा न केवल एक स्त्री के जीवन संघर्ष की कथा है बल्कि यह भारतीय समाज में स्त्री शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता के प्रति व्याप्त विरोध की गहरी पड़ताल भी है। यह कृति स्त्री आत्मकथात्मक लेखन को नई दिशा देते हुए सामाजिक परिवर्तन की चेतना को मजबूत करती है।

निष्कर्ष – धरती भर आकाश स्पष्ट करती है कि किसी भी समाज में स्त्री की शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता केवल व्यक्तिगत विकास का विषय नहीं है यह सामाजिक संरचना की परीक्षा है। तसनीम पटेल अपने अनुभवों के माध्यम से यह दिखाती हैं कि धार्मिक पहचान, पारिवारिक निर्णय और सामाजिक प्रतिष्ठा ये तीनों मिलकर स्त्री के अवसरों को सीमित कर देते हैं। शिक्षा और नौकरी का विरोध दरअसल उस मानसिकता का परिणाम है जो स्त्री को परिवार की मर्यादा से बँधी भूमिका में देखना चाहती है।

आत्मकथा यह भी संकेत देती है कि स्त्री का संघर्ष अकेले बाहरी दुनिया से नहीं बल्कि घर के भीतर उपस्थित पितृसत्ता से भी होता है। पिता का कठोर रुख, समाज का अविश्वास और फ़िरक़ों का दबाव इन सबके बीच लेखिका की चेतना धीरे-धीरे मजबूत होती है। यही आंतरिक विकास इस कृति को विशिष्ट बनाता है।

संदभ ग्रंथ सूची

  1. चुप्पियाँ और दरारें’स्त्री आत्मकथाः पाठ और सै‌द्धांतिकी, गरिमा श्रीवास्तव, राजकमल पेपरबैक्स, नई दिल्ली, पृ. 21
  2. धरती भर आकाश, तसनीम पटेल, अगोरा प्रकाशन, ग्राम अहिरान, पोस्ट चमॉव, शिवपुर, पृ.110 -111 
  3. साहित्य में मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे, मंजु आर्य, साखी प्रकाशन, पृ. 13 
  4. धरती भर आकाश, तसनीम पटेल, अगोरा प्रकाशन, ग्राम अहिरान, पोस्ट चमॉव, शिवपुर, पृ.99 
  5. धरती भर आकाश, तसनीम पटेल, अगोरा प्रकाशन, ग्राम अहिरान, पोस्ट चमॉव, शिवपुर, पृ.30 

अहमद अली
शोधार्थी (पीएच.डी.)
अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय
[विभाग का नाम – हिंदी विभाग]
Email – sayaadali99@gmail.com

स्त्री सुन्दरता के नये पैमाने : आत्ममुग्धता से आत्मकुंठा तक

मेट्रो में, बस में, सड़क पर,बाज़ार और यहाँ तक की घर में आप गौर करेंगे तो स्त्री-पुरुष के बीच अप्राकृतिक रूप से सुंदर लगने के प्रति एक खास रुझान दिखाई देगा। दिखने और देखे जाने की इस प्रवृत्ति ने मानवजाति को अन्य पशु-जातियों से अलग एक ऐसे प्राणी के रूप में लाकर खड़ा कर दिया है की वह अजूबा बना चुका है।खुद को श्रेष्ठ मानने की मानसिकता ने इन्सान के भीतर कई कोम्प्लिकेश्न्स को भी जन्म दिया है।ऐसा लगता है मानवजाति के पास खुद को संवारने-सजाने और ‘सुंदर’ दिखाने की एक प्रतिस्पर्धा छिड़ गई हो। यह प्रवृत्ति स्त्री-पुरुष दोनों के बीच देखी जा सकती है। इस मानसिकता ने मानव शरीर में कई भिन्नताओं को खोज निकाला जो उन्हें एक-दूसरें से ‘भिन्न’ ही नहीं बतलाते बल्कि इस धरती पर सबसे अनूठा और हास्यपद प्राणी के रूप में पेश करता है। सुंदर दिखने, आकर्षण लगने, रिझाने की यह कला अन्यों प्रजातियों में भी है।अपनी सुन्दरता से मोहने या आकर्षक लगने का काम नर ही किया करते हैं।मोर अपनी सुंदरता से मोरनी को आकर्षित करता है, ऐसे ही कई नर जीव संबंध और प्रजनन के लिए अपनी सुन्दरता का उपयोग भी करते हैं।लेकिन सुन्दरता ही उनके लिए सर्वोपरी कभी नहीं रही न ही यह जीने-मरने का प्रश्न से जुड़ा था जैसे आज स्त्री-पुरुष के बीच है।

सुदंरता और उसे महसूस करने के अनुभवों को केवल कुछ खास इन्द्रियों तक सीमित कर दिया गया है और इससे सौन्दर्य शरीर के कुछ खास अंगों तक सिमट कर रह गया। वह आन्तरिक विशेषता से ज्यादा देखे जाने, उपभोग किये जाने में बदल गई है।सुंदर लगने की यहप्रवृत्ति, यह दबाव धीरे-धीरे पुरुषों से  स्त्रियों के जिम्मे आगया है। सामाजिक-सांस्कृतिक कारणों से उपजीसौन्दर्य की क्रूर और दकियानूसी धारणाओं ने नर-मादा को‘स्त्री’ और ‘पुरुष’ बनने पर अत्यधिक जोर दिया है। स्त्री-पुरुष की शारीरिक भिन्नताओं के आधार पर आज उनमें इतनी भिन्नताएं पैदा कर दी है की वह नितांत एक-दूसरे से भिन्न दिखे। पितृसत्तात्मक समाज ने सुन्दरता का जिम्मा स्त्रियों के लिए इसउपक्रम को बहुत सामान्य बनाकर पेश किया।असाधारण दिखने की लालसा, अन्य स्त्रियों से भिन्न नजर आने की कुंठा ने स्त्री को अपने ही शरीर के प्रति संदेह को पाला और पोषित किया।इसने शरीर के प्रति महसूस करने वाली स्वभाविक संवेदनाओं को भी बदल कर रख दिया है। आधुनिक समाज में आज स्त्रियाँ अपने चेहरे और शरीर के प्रति कई धारणाओं, चिंताओं से घिरा हुआ महसूस करती हैं, उनका चेहरा बहुत सुंदर और आत्मविश्वास से भरा दिखाई देगा लेकिन भीतर से वह खुद को सुंदरदिखाने के अत्यधिक दबाव से दबी हुई महसूस करती हैं।

सुन्दरता के पैमानों पर खरे उतरने का दबाव उन पर हमेशा रहता है। मेकअप और सजने-संवरने की यह प्रवृत्ति बचपन से उनके भीतर डाल दी जाती है। कपड़े,आभुषण, सौन्दर्य प्रसाधन की सामग्रियों की कभी न खत्म होने वाली सूची है जिसमें सभी वर्ग,उम्र और पद की स्त्रियों के लिए कुछ न कुछ मौजूद है।यह हस्तक्षेप इतना बढ़ गया है की खुद स्त्री ने इस देह को उस तरह दिखाने के लिए क्या कुछ नहीं किया।साहित्य, फैशन, फिल्मों और सोशल मीडिया ने स्त्री देह को प्रस्तुत करने के कई तरीके ईजाद कर दिए है। जिसने स्त्री की एक अलग ही छवि को गढ़ा है।इस नई छवि को लेकर स्त्री स्वयंआत्ममुग्ध और दुविधाग्रस्त दोनों है।क्योंकि यह छवियाँ पितृसत्तात्मक प्रतिमान से गढ़ी गई हैं जिसने स्त्री को केवल वस्तु में रूपांतरित कर दिया है। उसके चारों तरफ भ्रम फैलाया है। उसे एक तरफ नई पहचान देकर उसे ‘आजाद’ दिखाने का दावा करती हैं, वहीं दूसरी तरफ स्त्री के भीतर आत्मविश्वास और संदेह को भी बरकरार रखा है, जैसे स्त्री शरीर उपभोग की जाने वाली कोई वस्तु हो।आधुनिक पूंजीवादी समाज में सुंदर दिखने के लिए स्त्री अपनी जान को खतरें में डाल कर तमाम तरह के हथकंडे अपनाने से भी पीछे नहीं है। गोरा दिखने, एच डी ग्लो पाने, क्रिस्टल क्लियर ग्लास स्किन, स्किन ब्राईट, फ्यूचर ब्राईटजैसी अतार्किकबातों को सबसे जरूरी बातें बना कर पेश की जाती है।

‘नारीवादी निगाह से’ पुस्तक में निवेदिता मेनन न्यूड मेकअप के पीछे की जालसाजी पर लिखती हैं“न्यूड मेकअप में आपकी त्वचा एकदम ताज़ा और ओस से भीगी नजर आती है।ऐसा मेकअप करने के बाद आपको यह लगता ही नहीं कि आपने मेकअप जैसा कुछ किया भी है। इसके लिए कुल मिलाकर एक आई-लाइनर, मस्कारे,न्यूड लिपस्टिक और एक ब्लश की जरूरत पड़ती है जिससे आपकी त्वचा में एक प्राकृतिकचमक पैदा हो सके। इसमें घंटों लगते हैं और इतना फिजूल है की उसके बाद साफ़ करने में भी आपकी शक्ति लगती है।”[1]कुलमिलाकर मेकअप एक ऐसा मुखौटा है जिसके पीछे आप अपने असली रूप को छिपा रहे हैं। सुंदर दिखना आज प्राकृतिकरहा ही नहीं। आज सर्जरी और चिकित्सक के जरिये असुन्दर को सुन्दर भी बनाया जा रहा है।वह भी खरीदी और बेची जाने का व्यवसाय का रूप ले चुकी है, जिसके ग्राहकों की संख्या दिनों-दिन बढ़ रही है।जाहिर है इस तरह की अर्जित सुन्दरता भी एक खास वर्ग की मुट्ठी भर स्त्रियों के पास ही है। गरीब, श्रमशील स्त्रियों के लिए नहीं उन्हें असुन्दर ही समझा जाएगा।सुंदर औरअसुंदर स्त्रियों को उपेक्षित और शोषित करता है।क्योंकि तमाम सौंदर्य प्रसाधनों पर पहुंच सबके वश की बात नहीं।यह एक तरह से पितृसत्तात्मक सौन्दर्य के यह पैमाने स्त्री-पुरुषमें भिन्नता ही नहीं पैदा करते बल्कि यह अमीर और गरीबमें भी एक बहुत बड़ा फर्क पैदा करते हैं।यह जातिवाद को बढ़ावा देता है।हीनता बोध महसूस करवाता है।

क्योंकी स्त्री सुन्दरता और उससे जुड़े मुद्दे स्त्री के सोचने, उसके जीने और महसूस करने से जुड़ता है तो यह बहुत जरूरी है जानना की वह कौन से कारण हैं जो स्त्री सुन्दरता, स्त्री छवि को वैसा बनाये रखने में सहयोग करती है। इस तरह यह मुद्दा स्त्री मुक्ति और स्त्री सौन्दर्य के बीच के रिश्ते से भी जुड़ा हुआ है।क्यूंकि यह आज उतनी ही अधिक सख्ती और क्रूर रूप से स्त्री सौन्दर्य की छवियाँ पर हावी है जो आत्मघृणा, बढ़ती उम्र का आतंक, अपना नियन्त्रण खोने का डर जैसे विभिन्न रूपों में प्रकट हो रहा है। इससे अनजाने ही एक विभाजन खड़ा होजाता है कौन सुंदर है और कौन असुन्दर।पितृसत्तात्मक समाज के चलते स्त्रियाँ सहमती से, कभी दबाव से इन पैमानों पर खरा उतरने की कोशिश करती है।सुंदरता का पैमाना भी समय और समाज, विभिन्न समुदायों, वर्गों में अलग-अलग है लेकिन इसने हमेशा एक को कमतर, असहज और अप्राकृतिकदिखाने पर जोर दिया है। यह न केवल स्त्रियों के बीच एक तरह का विभेद कायम रखता है वरन पुरुषों के समक्ष स्त्री शरीर को उपभोग की जाने वाली किसी रहस्यमयी वस्तु के रूप में रखता है।

नारीवादी चिंतक और लेखिका नाओमी वुल्फ के अनुसार सुन्दरता कीविचारधारा पुरानी स्त्री विचारधाराओं में से आखरी बची हुई विचारधारा है, जो अभी भी महिलाओं को नियंत्रित करने की शक्ति रखती है।मेरे ख्याल से यह बात विकाशील हो या विकसित देशों में सभी पर समान रूप से कायम है।सौन्दर्य मिथक स्त्रीके शरीर के प्रति गलत धारणाओं को मजबूत कर रहा है बल्कि, राजनीतिक हथियार के रूप में स्त्री सौन्दर्य की छवियों का उपयोग भी करता है।वहीं दूसरी तरफ स्त्रियों ने इसे अपनी शक्ति को बचाए रखने, अपना नियन्त्रण बनाये रखने की जुगत के रूप में समझा।सौन्दर्य आज शक्ति संबधों की अभिव्यक्तिव है। यह एक तरह से पुरुष वर्चस्व में अपनी हिस्सेदारी से भी जुड़ा है।जो असल में पुरुष प्रभुत्व को बनाये रखने उसे बरकरार रखने पर जोर देती है।जैसा की नाओमी वुल्फ अपनी किताब ‘द ब्यूटी मिथ’ में बताती हैं की सौन्दर्य मिथक महिलाओं के बारें बिलकुल नहीं है यह पुरुषों की संस्थाओं और संस्थागत शक्ति के बारे में है। सौन्दर्य के प्रति आपकी सचेतता वास्तव में व्यवहार को निर्धारित करता है। महिलाओं के बीच प्रतिस्पर्धा को मिथक का हिस्सा बना दिया है ताकि महिलाओं को एक-दूसरे से न सिर्फ अलग देखा जाये बल्कि इस सोच को और ज्यादा मजबूत भी करता है की वह उन जैसी बिलकुल नहीं है, वह असाधारण हैं।

जब से पितृसत्ता है, तब से किसी न किसी रूप में सौन्दर्य मिथक रहा है।आज जिसे सामान्य व्यवहार की तरह आदत में शामिल कर लिया गया है।नाक, होंठकेआकारयात्वचा के रंगकेप्रतिहीनतबोधस्त्रियों में एक प्रकार की समस्या के रूप में उन पर हावीरहता हैजिससेउन्हें बॉडीडिसफॉर्मिकडिसॉर्डरजैसीगंभीरबीमारीघेरलेतीहैं।ऐसेलोगआजीवनअपनेशरीरकेप्रतिअसन्तुष्टरहतेहैं।असहजताहीसुंदरताकापर्यायबनचुकीहैंऔरस्त्रियांइसमेंअपनेआपकोढालनेकाकामबखूबीकरतीहैं।दुनियाभरमें नारीवादियों ने स्त्रियों को चेताया है स्त्री शरीर को लेकर भ्रमित और रूढ़ छवियों को तोड़ा है। अलग-अलग देशों मेंमहिलाएंअपनेकम्फर्टऔरसुरक्षाकेलिएबेझिझकलड़ीहै ‘बर्निंगब्रा’मूवमेंटइसकाउदाहरणहै।“मुक्ति की निशानी मिनीस्कर्ट पर भी बात कर ली जाये ।प्रतिबंधों से त्रस्त बहुत से नारीवादियों ने जिनमें पश्चिम के नारीवादी भी शामिल हैं, यह बात दर्ज की है कि झीने या देह-दिखाऊ कपड़े पहने की ‘आजादी भी उस लैंगिक संस्कृती का ही अंग है जो बाज़ार की सदारत में परवान चढ़ती है क्योंकि इसमें देह के एक खास हिस्से-जवान, तराशे हुए और रंग-रोगन से दमकते हिस्से का ही प्रदर्शन किया जाता है।”[2]

सुंदरताको इतनी अहमियत क्यों मिलती है? और ऐसेसौंदर्यकीसामाजिकभूमिकाक्याहै? जबचारोंतरफएकजैसेलोगही दिखनेवालेहैं।मानवीय संवेदनाओं, इन्द्रियों को सम्मोहन शक्ति को कुछ समय तक अपने नियन्त्रण करने की प्रबल इच्छा इसे जन्म देती है।हम समूह से अलग तो नही दिख रहे इस का जरा सा भी डर हमारा आत्मविश्वास कम कर देता है। दुखद तो यह है की हर रोज ऐसा उपक्रम किया जाता है की पहले से अधिक सुंदर और भिन्न कैसे दिखा जाये जो एक थका देने वाला काम है। यह कभी न संतुष्ट होने वाला काम बन चुका है। बाहरी आवरण को ही सब कुछ मान लेने से सुन्दरता आज बहुत सस्ती और साथ ही बहुत गैर जरूरी लेकिन उपयोगी बन चुकी है।

नामोमी वुल्फ़ कहती है “ब्यूटी एक मर्दवादी पूंजीवादी मिथ है[3]मीडिया, विज्ञापन, फिल्मों में भावरहित कामुकता पर जोर दिया जा रहा है। क्या ‘ग्लैमर’ पुरुष की नई व्यवस्था नहीं है?”[4] जिसमें स्त्री का मनचाहा प्रयोग हो रहा है वो भी स्त्री की बगैर इजाजत के।क्योंकि वह तो देह से जुड़े झूठे लुभावनो में जकड़ी हुई होती है।‘सौन्दर्य पोर्नग्राफी’ कृत्रिमरूप से एक वस्तुगत ‘सौन्दर्य’ को सीधे और स्पष्ट रूप से कामुकता से जोड़ती है। पश्चिम के देशों में फिल्म, फैशन इंडस्ट्री, सौन्दर्य आयोजन और प्रतिस्पर्धाओं, मेट गाला जैसे आयोजनों ने स्त्री छवियों को उनकी कामुकता का उपभोग करने, प्रदर्शनी की तरह कई मौके दिए।जिसमें अभिनेत्रियां ही नहीं अभिनेता भी अजीबो गरीब वेशभूषा में दिखाई देते है। एक-दूसरे से अलग दिखने की उनके बीच एक तरह की होड़ को देखा जा सकताहै।

आज भारत में भी उसी तर्ज पर उर्फी जावेद का नाम लिया जा सकता है।कद काठी में सामान्य, सामन्ती परिवार की लड़की जो अपनी छवि को लेकर,अपनेशरीरके प्रति आत्ममुग्धताने उसे एकप्रदर्शनी में बदलदिया है। अब आकर्षित करने का तरीका बदल गया।अब कपड़े आपको परिभाषित नहीं करते बल्कि, आप उन्हें परिभाषित कर रहे है।यह वह सांस्कृतिक दबाव है जो स्त्रियों को एक खास तरह के कपड़े पहनने के लिए मजबूर करता है।यह दबाव उन्हें चाहें अपनी देह को ज्यादा दिखाने के लिए विवश करता है या छुपाने के लिए दोनों ही मामलों में यह सरोकार वेशभूषा पहनावे से ज्यादा उस ताकत से है जो उन्हें ऐसादिखने के लिए, ऐसा महसूस करने के लिए मजबूर करती है।उसे ही सबसे बड़ा सच मान बैठती हैं।कपड़ो के नाम पर कतरनें, शरीर को रंगना, जंजीर, मार्बल, फूलों, चांदी की वर्क,चाबी, नेट, सिम कार्ड, चेस्टेटी बेल्ट जैसी दिखने वाली ड्रेसज, घड़ियों से बनी पोशाकें हैं जिन्हें आकर्षक कहना भी गलत होगा। यह उसे फूहड़ दिखता है।उर्फी की यह देह प्रदर्शन एक तरह की यौन अश्लीलता नहीं तो और क्या है ?

इस झूठी चयनशीलता ने स्त्री को और भी असुरक्षित भावना से भर दिया है। देह के बनाये इस तिलिस्म का प्रभाव इस कदर है की उससे अलग दिखने वाली साधारण देह जो बनावटी न हो, सहज और स्वस्थ है उसे नकारे जाने पर जोर देती है।सुन्दरता का पैमाना एक खास तरह से ढाली गई देह से जोड़ दिया गया है।एक नयामूल्यबोधबनचुकाहैस्त्रीसौंदर्य का। स्त्री देह देखने निहारने और घूरने अचंभित कर देने वाली कोई चीज बन गई है। शायद स्त्री की कृत्रिमछवि का सर्वाधिक दोहन आज आधुनिक समाज में किया जा रहा है। स्त्री खुद इसमें अपना सहयोग दे रहीं है।नारीवादी लेखिका नाओमी वुल्फ पुस्तक ‘ब्यूटी मिथ’ में लिखती हैं की “ब्यूटी मिथ ने औरत की आजादी को मोड़ कर उसे चेहरे और देह में बदल दियावह सवाल उठाती है क्या हम स्त्री देह की अन्य अवधारणा और रूप की कल्पना कर सकते है ? क्या सुन्दरता वाकई सेक्स है? क्या एक स्त्री की यौनता उसके रूप में निहित है[5]

पारंपरिकऔरआधुनिककेमिलेजुलेइससमाजमेंकेंद्रमेंबनेरहनेकेलिए, जल्दीप्रभावितकरनेऔरआकर्षकदिखनेकीभूखभीबड़ीहै। लेकिन “आधुनिक औरत की छवि को सुन्दरता की मिसाल की तरह पेश करना एक अंतर्विरोधी बात है[6] पूंजीवादी, उपभोगतावादी नजरिये ने स्त्री को जितना ‘आजाद’ महसूस करवाया उससे ज्यादा उसने उसे अपनी शर्तों पर कैद भी किया है। एक स्वतंत्र ख्यालों वाली, मजबूत स्त्री के मुकाबले उसने स्त्रियों का ऐसा वर्ग तैयार किया जो पल भर में किसी को भी, कहीं भी सुंदर और आकर्षित करने की क्षमता रखती है।भले ही व्यहारिक रूप से वह एकबिम्बोही हो। वह उन तंग कपड़ो में भी अपने आपको सहज करवाने की भरपूर कोशिश करती है और उन जूतों से भी जो तकलीफदेह हो।जिसे पहन वह ज्यादा आत्मविश्वासी होने का ढोंग करती दिखाई देती है।जो मेडोना की ‘मटिरियल गर्ल’ की छवि को ही दिखाता है।जिसके बारे में “कहा गया है की मडोना ने एक ऐसा यौन-यूटोपिया प्रस्तुत किया है जो महान अमरीकी स्वप्न को साकार करता है[7] क्या उर्फी मडोना की इस मटिरियल गर्ल से ही प्रेरित नहीं है। यह स्त्री छवि पुराने प्रतिमानों को बदल रही है जो खुद एक मानक बनने को आतुर नजर आती है।

    नारीवादीलेखिका,चिंतक जर्मेन ग्रीयर कहती हैं “हर युवा और खुबसुरत स्त्री के मन में सपना हो सकता है कि वह छलांग लगाकर सामाजिक  सीढ़ी के शीर्ष पर पहुंच जाए और अपने शुद्ध, सहज, सौन्दर्य से ऐश्वर्य की दमक को फीका कर दे[8]उर्फी जावेद की निर्भीकता चौकांती है लेकिन उसके भीतर के हीनताबोध को भी दिखाती है जो स्वभाव से मुंहफट लगती है लेकिन अपनी सहज दिखने को लेकर उसका यह मुंहफट अदृश्य हो जाता है और अजीब पोशाकों के बीच दबी-धंसी हुई एक कमजोर लड़की दिखाई देगी जो अपने चेहरे के निशान, लकीरों से, बिना मेकअप के खुद कोदेखना उसे भयभीत करता है, गिल्ट पैदा करता है।

मेरी वोल्स्टनक्राफ्ट के शब्दों में “सुन्दरता स्त्री का राजदंड है, बचपन से ही यह सीखते हुए मांस खुद को शरीर के अनुरूप ढल लेता है और अपने सुनहरे पिंजड़े में घूमता सिर्फ अपने कारागार को सजाना चाहता है[9]जिसे स्त्री के लिए कमी समझा गया है वह सुन्दरता निजी देखभाल से बहुत अलग है।स्त्री देह से जुड़े कई अंतर्विरोध हमेशा से रहे है आज भी है। अपनी देह को परिभाषित करने का जिम्मा भले आज स्त्री ने अपने हाथ में ले लिया हो लेकिन उसकी कमान हमेशा पुरुषों ने अपने हाथ में रखी है।स्त्री को अपनी ही आत्ममुग्धता में इतना व्यस्त रखा गया की उसके भीतर हमेशा खालीपन रहा। वह व्यक्तिवान प्राणी नहीं रह जाती।

देहकेप्रसंगमेंसौंदर्यऔरअश्लीलताकीबहसबहुतपुरानीहै।स्त्री और पुरुष दोनों की ही प्रतिमाओं में नग्नता सराही भीगई है। अजन्ता कि गुफाओं से लेकर राजा रवि वर्मा तक, कला का कोई भी रूप देह की नग्नता को उसके वीभत्स रूप अश्लीलता में नहीं देखता। बल्कि, यह हमारे देखे जाने के आग्रह उन मानको को बदलने का प्रयास भी करता रहा है जो हमें बताता है क्या अश्लील है और क्या अश्लील नहीं है।असल में अश्लीलता एक अर्थ में पुरुषवर्चस्व को कायम रखने का माध्यम रहा है।हिंदी के नारीवादी साहित्य में भी यह एक मूल्य बन चुका है जिसकी परिभाषा भी वह अपने हिसाब से रचता-गढ़ता है। देह को लेकर हमारी सतकर्ता, सचेतता ही है की आजकल तो भगवान की मूर्तियों को भी कपड़े पहनाया जाता है। लेकिन एक ऐसा समय भी था जब स्त्री शरीर के ऊपरी भाग में कोई कपड़ा पहनने की मनाही थी। “जब ब्रिटिश राज के दौरान उच्चवर्गीय महिलाएं साड़ी के नीचे ब्लाउज पहनने लगीं तो उस दौर में इसे उत्तेजक माना जाता था|”[10]वैसे स्त्री देह चाहें बुर्के में हो, दस घुंघट में या जींस में वह कुछ भी पहने आलोचना का शिकार होती है।कपड़ो को लेकर मोरल पुलिसिंगतो आम बात है।जेंडर जो समाज से निर्मित होता है वह यह तय करता है स्त्री-पुरुष को कैसा दिखना चाहिए।स्त्रियों को भी मूंछे आती है यह बात लोगों कोआश्चर्य करती है जबकि, हाथ-पैरों पर उगे बालों को साफ़ करके मोम की तरह चिकना दिखाना सामान्य नजर आता है। लड़की के भी चहरे पर उगी मूंछे देख कर असुविधाजनक लगने लगता है। उस वर्ग को जो अपने इन्सान होने के सभी चिन्हों को मिटा देना चाहते हैं। सर से लेकर अंगूठे का नाख़ून तक सब कुछ नकली है। सुन्दरता को लेकर यह भ्रमआज मानसिक गुलामी को दर्शाती है।आप इस मानसिकता से जितना दूर हो रह सकते उतना ही अपने आप से प्रेम कर सकते हैं, फिर चाहें आप कैसे भी दिखते और बोलते हैं।लेकिन देह के बनाये तिलिस्म अगर आपके सोचने-समझने की शक्ति को ही प्रभावित करने लगे तो समस्या गंभीर हो सकती है।क्या इस देह की सबसे बड़ी उपयोगिता यहीं है दूसरों को आकर्षित करना? दूसरों के लिए महज आकर्षण वस्तु की तरह देखे जाने वाली यह लालसा पहले से ही दूषित मानसिकता को उकसा जरुर सकती है।लेकिन कोई स्वस्थ नजरिया नहीं देती।

बच्चे की देह हो या स्त्री-पुरुष की देह, देह से जुड़े हमारे मन में भ्रांतियां है।जिसके प्रति हम सचेत रहते है अपनी देह के भी और दूसरों की देह के प्रति भी। समय के साथ इस देह के प्रति हमारी चेतना बनती और बदलती भी रही है।बहरहाल, स्त्री देह और उसके वस्तुकरण की उस चरमस्थिति को महसूस किया जा सकता है जिसने पुरुष और स्त्री दोनों ने सहजता से अपना लिया है, इतना ही नहीं उससे भी खतरनाक यह की उसे अपनी ‘आजादी’ से जोड़ लिया है। लेकिन इसी समाज में कुछ लोग है जो सौन्दर्य के पितृसत्तात्मक प्रतिमानों का विरोध करते हैं, सहज और प्राकृतिकरूप से दिखना-देखना पसंद करते हैं। और यही स्वस्थ और प्राकृतिकतरह से जीना और सुन्दरता को महसूस करना है।

सन्दर्भ


[1]निवेदिता मेनन, नारीवादी निगाह से, अनु. नरेश गोस्वामी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2021, पृष्ठ 07

[2]वहीं, पृष्ठ 160

[3]राजेन्द्र यादव संपा, प्रभा खेतान, अभय कुमार दुबे, पितृसत्ता के नये रूप, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2003, देखे लेख ‘एक अधखुला क्षण: सौंदर्य मिथक की द्वन्दात्म्कता’ सुधीर पचौरी, पेज 40

[4]वहीं, पृष्ठ47

[5]वहीं,पृष्ठ39

[6]वहीं,पृष्ठ37

[7]देवेन्द्र इस्सर,स्त्री मुक्ति के प्रश्न,राजकमल प्रकाशन,नई दिल्ली,पृष्ठ108

[8]जर्मेन ग्रीयर, विद्रोही स्त्री, अनु. मधु बी. जोशी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2001, पृष्ठ57

[9]मेरी वोल्स्टनक्राफ्ट, स्त्री अधिकारों का औचित्य, 1792, पृष्ठ 90

[10]ग्लोरिया स्टाय्नेम, वजूद औरत का- स्त्री विमर्श : प्रतिनिधि पाठ, अनु. भावना मिश्र, चयन एंव संपा रुचिरा गुप्ता, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2020, पृष्ठ78

एक निर्भीक श्रमण को आखिरी जोहार! वीरेंद्र यादव (5 मार्च 1950-16 जनवरी 2026)

अरुण नारायण

वीरेंद्र यादव हिन्दी के उन विरल आलोचकों में थे, जो प्रगतिशील परंपरा में खड़े होकर भी उसकी जड़ता को प्रश्नांकित करने का साहस रखते थे। वे ऐसे बौद्धिक थे जिन्होंने प्रगतिशीलता को किसी एक विचारधारा या वर्गीय सीमाओं में कैद नहीं किया, बल्कि उसे जाति, नस्ल, पितृ सत्ता, औपनिवेशिक विरोध और फासीवाद-विरोधी संघर्ष की बहुस्तरीय जमीन पर विस्तार दिया।

उनका लेखन उन आवाज़ों का पक्षधर था जिन्हें हिन्दी की मुख्यधारा ने या तो अनसुना किया या हाशिये पर धकेल दिया। उनकी वैचारिक रेंज जितनी व्यापक थी, उतनी ही विविध और गहन भी। 1857 की क्रांतिकारी विरासत से लेकर प्रेमचंद, रेणु, यशपाल, राही मासूम रजा, निर्मल वर्मा की साहित्यिक परंपरा तक, और समकालीन समय में विनोद कुमार शुक्ल से लेकर महुआ माजी और अरुंधति राय के हस्तक्षेपों तक—इन सभी विषयों को उन्होंने जिस ऐतिहासिक चेतना और आलोचनात्मक सूझबूझ के साथ संबोधित किया, वह हिंदी की प्रगतिशील आलोचना में दुर्लभ है।

जीवनकाल में ही उन्होंने रामविलास शर्मा और नामवर सिंह जैसे प्रतिष्ठित आलोचकों को जिस निर्भीकता से प्रश्नांकित किया, उससे उनकी स्वतंत्र बौद्धिक मेधा और वैचारिक ईमानदारी का पता चलता है। वे किसी भी स्थापित सत्ता—चाहे वह साहित्यिक हो या वैचारिक—के आगे नतमस्तक नहीं हुए।

हिन्दी की प्रगतिशील आलोचना परंपरा में वीरेंद्र यादव संभवतः पहले ऐसे बौद्धिक थे जिन्हें फुले, आंबेडकर, पेरियार और रामस्वरूप वर्मा की वैचारिकी की स्पष्ट, गहन और वैज्ञानिक समझ थी। उनसे पूर्व की प्रगतिशील आलोचना में इस बहुजन वैचारिक धारा की लगभग अनुपस्थिति रही है। इस अर्थ में वीरेंद्र यादव ने न सिर्फ आलोचना को नया दृष्टिकोण दिया, बल्कि उसकी वैचारिक सीमाओं को भी तोड़ा।

उनकी कृतियां—
उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता, उपन्यास और देस, प्रगतिशीलता के पक्ष में, विवाद नहीं, हस्तक्षेप, विमर्श और व्यक्तित्व आदि हिन्दी साहित्य की अमूल्य वैचारिक थाती हैं। ये पुस्तकें सिर्फ आलोचना नहीं हैं, बल्कि सत्ता, समाज और साहित्य के अंतर्संबंधों को समझने की वैचारिक कुंजी भी हैं।

दुखद यह है कि उनकी रचनात्मक मेधा का श्रेष्ठ अभी आना शेष था। उनके विचारों की यात्रा अधूरी रह गई।

आज, जब देश और समाज एक गहरे फासीवादी अंधकार से गुजर रहा है, वीरेंद्र यादव जैसे निर्भीक, विवेकशील और बहुजन-पक्षधर आलोचक की अनुपस्थिति और अधिक खलती है। उनकी वैचारिक रोशनी की जरूरत इस अंधेरे समय में पहले से कहीं ज्यादा है।

भारी मन से उन्हें आखिरी जोहार!

शिवनंदन पासवान को क्यों भुला दिया गया : जननायक कर्पूरी ठाकुर को दिया था ‘मरणोपरांत न्याय’ !

प्रखर समाजवादी नेता, पूर्व मंत्री, विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष शिवनंदन पासवान की 90वीं जयंती आयोजित

पटना: बिहार के वरिष्ठ समाजवादी नेता , पूर्व मंत्री, विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष और कार्यकारी अध्यक्ष शिवनंदन पासवान की 90वीं जयंती सह व्याख्यामाला मंगलवार को विधानसभा के विस्तारित भवन में आयोजित की गयी। इस मौके पर उन पर एकाग्र एक स्मारिका का भी विमोचन किया गया।
इस मौके पर वक्ताओं ने कहा, शिवनंदन पासवान ने जननायक कर्पूरी ठाकुर को मरणोपरांत न्याय दिया। नेता प्रतिपक्ष पद से विस्थापित कर दिये गये जननायक को मरणोपरांत नेता प्रतिपक्ष पद पर पुनर्स्थापित करने वाला ऐतिहासिक निर्णय सुनाया। तब वे विधानसभा के कार्यकारी अध्यक्ष थे। अपने संक्षिप्त कार्यकाल में उन्होंने इतिहास रच दिया। लेकिन वे बिसार दिये गये। अपनों ने, दोस्तों ने, राजनीतिक संगी साथियों ने उन्हें बिसार दिया। इतिहास ने उनके साथ न्याय नहीं किया।

राष्ट्रीय जनता दल के प्रदेश अध्यक्ष मंगनी लाल मंडल की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यक्रम को पूर्व केंद्रीय मंत्री संजय पासवान, विधान पार्षद अब्दुलबारी सिद्दिकी, पूर्व एमएलसी गणेश भारती,पूर्व विधायक रमाकांत पांडे, वरिष्ठ पत्रकार हेमंत कुमार, संजीव चंदन, श्वेता सागर और पंकज आनंद सहित कई लोगों ने संबोधित किया । इस अवसर पर पत्रकार वेदप्रकाश, वीरेंद्र यादव, अरविंद कुमार, मुसाफिर बैठा , कंचनमाला आदि लोगों की उपस्थिति रही।



अपने अध्यक्षीय भाषण में मंगनी लाल मंडल ने कहा कि शिवनंदन बाबू समाजवादी पार्टी के जमे हुए नेता थे उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन में जिस ईमानदारी और साहसिक व्यक्तित्व का परिचय दिया, उसका उदाहरण वीरल है। श्री मंडल ने आपातकाल के दिनों को याद किया और कहा कि इंदिरा गांधी की इमरजेंसी में पक्षी भी डरते थे लेकिन प्रशासनिक अधिकारी के रूप में शिवनंदन बाबू ने जिस साहस का परिचय दिया वह अपने आप में दुर्लभ है। उन्होंने कहा कि आज के विपरीत माहौल में शिवनंदन बाबू जैसे नेताओं को याद करना अपनी पुरानी समाजवादी परंपरा से को जुड़ना है।


उपस्थित वक्ताओं और भागीदारों का स्वागत करते हुए शिवनंदन पासवान के सुपुत्र पंकज आनंद ने कहा कि ‘ शिवनंदन पासवान उन लोगों में से थे—जो सत्ता के पीछे नहीं चले,बल्कि सत्ता से सवाल करते हुए चले। वे पद के मोह में नहीं पड़े,बल्कि मूल्यों की राजनीति करते रहे।वे मानते थे—राजनीति का अर्थ कुर्सी नहीं, जिम्मेदारी है; और नेतृत्व का अर्थ भाषण नहीं, बलिदान है।’
पूर्व केंद्रीय मंत्री संजय पासवान ने कहा कि आज के बदले हुए समय में शिवनंदन पासवान जैसे नेताओं को याद करना अपनी पुरानी राजनीतिक परंपरा को पुनर्जीवित करने के समान है। उन्होंने कहा कि उनके परिवार ने उनकी स्मृति में जो कार्यक्रम किया है ,वह स्वागत योग्य है।
पूर्व मंत्री एवं एमएलसी अब्दुल बारी सिद्दीकी ने कहा कि शिवनंदन बाबू बिहार की समाजवादी परंपरा के जीवंत मिसाल थे आज के समय में उनको याद करना अपनी पुरानी विरासत को जीवित करने के समान है।पूर्व एमएलसी गणेश भारती ने कहा कि शिवनंदन बाबू हासिए के समाज से आने वाले अपने दौर के चमकते सितारे थे उन्होंने समाजवादी राजनीति में जिस साहस और सादगी का परिचय दिया वह आज के समय में दुर्लभ है।
पूर्व विधायक रमाकांत पांडे ने कहा कि शिवनंदन बाबू सादा जीवन उच्च विचार के प्रतीक थे उन्होंने अपने समय में जिस सादगी और ईमानदारी का परिचय दिया आज की राजनीति में वह एक नजीर की तरह याद किए जाने योग्य है।
स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने कहा कि समाजवादी परंपरा में शिवनंदन बाबू जैसे लोगों को याद करना अपने समय के ज्वलंत शख्सियतों को याद करने के समान है। उन्होंने कहा कि आज बिहार में जिस तरह का अपर कास्ट नैरैटिव काम कर रहा है मीडिया और अकादमी की जगत में उसको तोड़ने की जरूरत है। और आज की बहुजन राजनीति को यह कार्यभार अपने ऊपर लेना चाहिए।
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत ने कहा कि शिवनंदन पासवान अपने समय के वीरल नेता थे। उन्होंने जननायक कर्पूरी ठाकुर को ‘मरणोपरांत न्याय’ दिया। उन्होंने नेता प्रतिपक्ष के पद से हटा दिये गये जननायक को नेता प्रतिपक्ष के पद पर पुनर्स्थापित किया। लेकिन इतिहास ने उनके साथ न्याय नहीं किया। अपनों और राजनीतिक संगी साथियों ने उन्हें बिसार दिया। उन्होंने राजस्व एवं भूमिसुधार राज्यमंत्री, बिहार विधानसभा के अध्यक्ष कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में उन्होंने अपनी कार्य पद्धति की जो मिसाल पेश की वह दुर्लभ है।

जयंती का आयोजन शिवप्रभा फॉउंडेशन ने किया।

खालिदा जिया बेगम (1945-2025): अधिकार, विरोधाभास और दक्षिण एशिया की जटिल विरासत

दक्षिण एशिया की राजनीति में कुछ स्त्रियाँ केवल सत्ता तक नहीं पहुँचीं, उन्होंने सत्ता की संरचना में स्त्री की उपस्थिति को दृश्य बनाया। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा ज़िया बेगम ऐसी ही एक ऐतिहासिक शख़्सियत थीं। उनके निधन के साथ बांग्लादेश की राजनीति का वह दौर समाप्त हुआ जिसमें महिला नेतृत्व एक अपवाद नहीं, बल्कि लोकतंत्र की केंद्रीय धुरी बन चुका था—भले ही वह धुरी अंतर्विरोधों से भरी रही हो।

खालिदा ज़िया का सार्वजनिक जीवन एक सैन्य शासक जनरल ज़ियाउर रहमान की विधवा के रूप में शुरू हुआ, लेकिन उन्होंने स्वयं को केवल ‘राजनीतिक उत्तराधिकार’ तक सीमित नहीं रखा। 1991 में वे बांग्लादेश की पहली निर्वाचित महिला प्रधानमंत्री बनीं। यह उपलब्धि प्रतीकात्मक भर नहीं थी—यह उस समाज में एक निर्णायक हस्तक्षेप था जहाँ राजनीति लंबे समय तक पुरुष कुलीनता, सेना और नौकरशाही के नियंत्रण में रही।

महिला अधिकारों के पक्ष में नीतिगत हस्तक्षेप

अपने कार्यकालों (1991–1996, 2001–2006) में खालिदा ज़िया सरकार ने महिलाओं से जुड़े कई महत्वपूर्ण क़ानूनी और संस्थागत कदम उठाए, जिन्हें दक्षिण एशिया के महिला अधिकार इतिहास में दर्ज किया जाना चाहिए।

स्थानीय शासन में महिलाओं का आरक्षण:

यूनियन परिषदों और स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों को प्रभावी रूप देने की प्रक्रिया को उनकी सरकार ने आगे बढ़ाया। इससे ग्रामीण और निम्नवर्गीय महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को औपचारिक मान्यता मिली।

महिला और बाल उत्पीड़न निरोधक क़ानूनों का सुदृढ़ीकरण:

उनके कार्यकाल में Women and Children Repression Prevention Act को सख़्त बनाया गया, जिसमें बलात्कार, घरेलू हिंसा, तेज़ाब हमले और मानव तस्करी जैसे अपराधों के लिए कठोर दंड का प्रावधान किया गया। यह कानून बाद के वर्षों में महिला अधिकार संघर्षों का एक अहम औज़ार बना।

तेज़ाब हिंसा के विरुद्ध राज्य हस्तक्षेप:

बांग्लादेश में तेज़ाब हमले एक गंभीर सामाजिक अपराध रहे हैं। खालिदा ज़िया सरकार के दौरान इस हिंसा को रोकने के लिए विशेष क़ानूनी ढाँचे और पीड़ित सहायता तंत्र को मज़बूती मिली—जिससे यह मुद्दा निजी शर्म से निकलकर सार्वजनिक अपराध के रूप में स्थापित हुआ।

महिला शिक्षा और रोज़गार पर ज़ोर:

माध्यमिक स्तर पर लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने वाली योजनाएँ, महिला शिक्षकों की नियुक्ति और कुछ क्षेत्रों में रोज़गार कोटा—ये सब उस नीति दृष्टि का हिस्सा थे जिसमें महिला सशक्तिकरण को केवल नैतिक प्रश्न नहीं, बल्कि विकास का प्रश्न माना गया।

इन पहलों की सीमाएँ थीं—कई क़ानून ज़मीनी स्तर पर पूरी तरह लागू नहीं हो सके, और पितृसत्तात्मक संस्थाएँ जस की तस बनी रहीं। फिर भी यह सच है कि महिला अधिकारों को राज्य की ज़िम्मेदारी के रूप में स्वीकार करने की प्रक्रिया में खालिदा ज़िया सरकार की भूमिका रही।

सत्ता, द्वंद्व और आलोचना

खालिदा ज़िया का राजनीतिक जीवन शेख़ हसीना के साथ लंबे और तीखे द्वंद्व में बीता। यह टकराव केवल दो महिलाओं का नहीं था, बल्कि राष्ट्र की स्मृति, मुक्ति संग्राम की व्याख्या और सत्ता के नैतिक अधिकार को लेकर था। इस संघर्ष ने बांग्लादेशी राजनीति को जीवंत भी रखा और कई बार जकड़ भी दिया।

उन पर संस्थागत राजनीतिकरण, परिवार-केंद्रित राजनीति और भ्रष्टाचार के आरोप लगे। बाद के वर्षों में जेल, बीमारी और राजनीतिक अलगाव ने उनके जीवन को त्रासद आयाम दिया। एक स्त्री नेता के पतन को जिस कठोर नैतिकता से देखा गया, वह भी दक्षिण एशियाई राजनीति की लैंगिक असमानता को उजागर करता है।

स्त्रीवादी मूल्यांकन

स्त्रीवादी दृष्टि से खालिदा ज़िया न तो आदर्श नायिका थीं, न ही मात्र सत्ता की कठपुतली। वे उस पीढ़ी की महिला नेता थीं जिन्होंने पितृसत्तात्मक राजनीति में प्रवेश किया, उसमें टिके रहने के लिए समझौते किए, और कुछ दरवाज़े अगली पीढ़ियों के लिए खोल दिए।

उनके निधन के साथ यह स्पष्ट होता है कि दक्षिण एशिया में महिला नेतृत्व का इतिहास सरल रेखा में नहीं चलता—वह संघर्ष, सत्ता, क़ानून, सीमाएँ और संभावनाओं का मिश्रण होता है।

स्त्रीकाल खालिदा ज़िया बेगम को उनके योगदान, विरोधाभासों और महिला अधिकारों के इतिहास में उनकी जगह के साथ स्मरण करता है।

“धुरंधर” के लड़ाके

इस तरह भले ही इन रक्तपाती रोमांचक क्रूरतम खेल की शुरुआत वीडियो गेम्स से न हुई हो लेकिन माँग और पूर्ति के नियमानुसार वीडियो गेम खेलने वाली अधीर जेनरेशन का डोपामिन (डिजिटल एडिक्शन) आज ‘और ज़्यादा’ ख़ून की माँग कर रहा है अत: ‘धुरंधर’ जैसे सिनेमा को ‘प्रोपेगंडा’ कहना बेवकूफी ही है । क्या सिनेमा क्या राजनीति दोनों ने देश और समाज की नब्ज़ को पकड़ा हुआ है।

धुरंधरों की लड़ाई ! जी हाँ, यह लड़ाई ही है कोई ‘युद्ध’ नहीं जिसे देख देश-प्रेम जागे। धुरंधर फ़िल्म देखते हुए ‘शतरंज के खिलाड़ी’ का एक दृश्य याद आ रहा था, आप सभी को याद होगा जबकि दो नवाबों को पत्नी के क्रोध से बचकर ‘शतरंज की बिसात और चालें’ छोड़नी पड़ती हैं। रास्ते में वे भेड़ों की लड़ाई देखने रुक जाते हैं। उनमें से एक रुस्तम नामक भेड़ पर बोली यानी सट्टा भी लगा देता है लेकिन हार जाता है। “शतरंज” जैसे बेहतरीन खेल के खिलाड़ी भेड़ों की लड़ाई को ज्यादा बर्दाश्त नहीं कर पाते और वहां से निकल लेते हैं।  धुरंधर ‘खिलाड़ी’ दूसरों के ‘खेल’ में देखने में समय और पैसा बर्बाद नहीं किया करते। मुझे कभी समझ नहीं आता कि तीतर,बटेर, मुर्गों या कि भेड़,बकरों की लड़ाई देखने वालों को क्या ही मजा आता है। उनका ख़ून बहता है और ‘ये’ ‘आदमी लोग’ मज़ा ले रहे (आनंद नहीं) होते हैं । घायल की देह से बहता खून आज मज़ा देने लगा है । फ़िल्म का संवाद भी है “घायल हूँ इसलिए घातक हूँ” वैसे यह जानना भी रोचक है कि तीतर, बटेर, मुर्गा, भेड़ और बकरा लड़ाई सभी पुल्लिंग हैं और इस क्रूर, हिंसक खून भरी (‘माँग’ नहीं) लड़ाई को देखने वाले भी अधिकतर आदमी ही होते हैं। शायद ‘अधिकतर’ भी नहीं ‘सभी’ कहना चाहिए। ‘धुरंधर’ फ़िल्म देखते हुए कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ मानो सभी लड़ाकों के सर पर भेड़ों की तरह सींग निकल आए हैं और एक दूसरे को लहू-लुहान कर रहे हैं। कौन कितना ज्यादा क्रूर हो सकता है ! इसका कंपटीशन चल रहा है। अजब-गजब तो यह है कि जिसने सबसे ज्यादा क्रूरता दिखाई उन्हीं अक्षय खन्ना को सबसे ज़्यादा प्रशंसा मिल रही है।

लगभग साढ़े तीन घंटे की इस “हिंसा-प्रधान” फ़िल्म में लड़कियों की क्या भूमिका रही होगी कहने की जरूरत नहीं वे लड़ाकुओं (तथाकथित ‘योद्धाओं’) को सुकून देने का खिलौना भर। एक बार कहानीकार उदय प्रकाश जी ने अपनी वॉल पर लिखा था ‘देखना चाहता हूँ कि फ़िल्मों में हिंसा कितने क्रूरतम रूप में हो सकती है’ उनके लिए एक फ़िल्म और ऐड हो चुकी है! संभवतः उनकी ओर से कुछ अलग विश्लेषण या निष्कर्ष सामने आएं। वैसे एक चीज और समझ में आई कि हक़, बारामूला के बाद धुरंधर तीसरी फ़िल्म है जो ‘कला के नाम’  पर अपनी पूरी सज-धज के साथ आई है। सिनेमा में हमेशा जनता की नब्ज को समझते हुए फ़िल्म निर्माण किया जाता रहा है। वरना लोग थियेटर तक कैसे जाएंगे! ओटीटी और टेलीग्राम की सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद लोग थियेटर में हिंसा का मज़ा लेने जा रहे हैं। तो बाकी सभी फैक्टर्स के अतिरिक्त समाज का मनोविज्ञान यहां काम कर रहा है। डिजिटल सूचना के युग में  आपने डोपामाइन के विषय में सुना ही होगा! डोपामाइन एक हार्मोन जो अपने रक्त प्रवाह में स्रावित होता है। यह “लड़ों या भागो” सिंड्रोम में भूमिका निभाता है।“लड़ो या भागो” प्रतिक्रिया अर्थात् किसी वास्तविक या काल्पनिक तनावपूर्ण स्थिति में खतरे से बचने या निपटने के लिए शरीर की प्रतिक्रिया । डोपामाइन की कमी से शरीर की हरकतें धीमी और कठोर हो सकती हैं जिसे ADHD यानी अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर । दो-ढाई दशकों पूर्व बच्चों को वीडियो गेम्स का चस्का लगा था। इनमें नज़र आने वाले एनीमेटेड लड़ाकू निरंतर अपडेटेड होते रहे हैं । इन गेम्स को बनाने वाले “डोपामाइन” के खेल भी समझ चुके हैं, इसलिए उनकी हिंसात्मक गतिविधियों को क्रूरतम किया जाता रहता है । PUBG,Free Fire, COD mobile या LUDO KING के अलावा स्ट्रीट फाइटर , मोर्टल कोम्बेट टेक्कन,सुपर स्मैश, किंग ऑफ़ फाइटर जैसी गेम्स में काल्पनिक किरदारों के बीच रोमांचक लड़ाईयां होती हैं और बच्चे और युवा सभी उनका मज़ा लेते हैं ।

क्रूरतम खेलों से रोमांच या मज़ा लेने की शुरुआत इन वीडियो गेम्स से हुई हो ऐसा नहीं है! वास्तव में वर्चस्व की यह लड़ाई सदियों पुरानी है । इस सन्दर्भ में मुर्गा लड़ाई जो एक रक्तपातपूर्ण खेल है जिसमें पालतू मुर्गों को लड़वाया जाता है । “गेम” खेल मनोरंजन या शौक के रूप में मुर्गे का उपयोग के लिए ‘गेमेकॉक’ का पहला दस्तावेज़ी प्रयोग 1636 में दर्ज़ किया गया ऐतिहासिक रूप में (16 वीं शताब्दी में) इस लड़ाई को उन्मादपूर्ण मनोरंजक गतिविधियों के लिए भी किया जाता रहा है अक्सर अखाड़े के किनारे घेरा बनाकर खड़े लोग सट्टेबाजी में अपनी पूरी सम्पति तक गँवा दिया करते थे ।

https://en.wikipedia.org/wiki/Cockfighting

जैसे कि मैंने शतरंज के खिलाड़ी में भेड़ों की लड़ाई का उदाहरण दिया तो उसके लिए मैंने गूगल बाबा से गुहार लगाई तो उन्होंने बताया कि ये RAMS: यानी बड़े सींग वाले नर मेढ अपने झुण्ड में सामाजिक पदानुक्रम (hierarchy) स्थापित करने और अपनी स्थिति बनाये रखने के लिए लड़ते हैं । इन जंगली नर भेड़ों में एक-दूसरे के सिर पर टक्कर मारकर ‘अल्फ़ा मेल’ का दर्ज़ा हासिल किया जाता है जो एक स्वाभाविक प्रवृति होती है । याद आया “एनिमल” फ़िल्म का नायक भी नायिका पर रौब जमाने के लिए “अल्फ़ा मेल” पर एक टिप्पणी करता है और नायिका रीझ भी जाती है खैर! आने आने वाले समय में कुछ संस्कृतियों में इसे एक खेल के रूप में विकसित किया गया इसे राष्ट्रीय मनोरंजन के रूप में मनाया जाने लगा और इसमें सट्टेबाजी भी शामिल है । अधिकतर देशों में यह बैन हो चुका है कुछ देशों में आज भी यह स्वीकार्य है । https://en.wikipedia.org/wiki/Ram_fighting

(Ram fight in Tbilisi,1884)

गूगल बाबा कुछ मेहरबान हुए तो उन्होंने एक दिलचस्प पेज ओपन कर दिया https://www.theguardian.com/news/2018/feb/16/algeria-sheep-fighting-illegal-sport-angry-young-men इसमें बताया गया है कि Combat taa lkbech जिसका अल्जीरिया अरबी बोली में अर्थ है ‘भेड़ों की लड़ाई’, कुछ हद तक फुटबाल जैसी है । यह निष्क्रिय पुरुषों की दबी हुई ऊर्जा को बाहर निकालती है और उन्हें राष्ट्रीय, क्षेत्रवाद और पड़ोस के गौरव जैसी विभाजनकारी भावनाओं को खुलकर व्यक्त करने का मौका देती हैं।अजीब तो नहीं है कि ‘फुटबाल’ लड़कियों में अभी तक क्रिकेट की तरह लोकप्रिय नहीं हो पाया है हाँ,फ़िल्में इस पर भी बनी हैं । आगे लिखा था कि ‘भेड़ों की लड़ाई के लिए प्रशिक्षित करने वाले अल्जीरियाई लोग भय ,भ्रष्टाचार, कर्फ्यू के दुआर में पले-बढ़े हैं जिनके पास रोजगार के अवसर बहुत कम हैं और समाज में उनकी कोई सार्थक भूमिका नहीं है’। अल्जीरियर्स फोटोग्राफर युसूफ क्राचे का कहना है “इन लोगों को मौज-मस्ती करने देना अन्य परिस्थितियों में हिंसा कम करता है कि ये लोग राजनीति में उलजहने के बजाय तमाशों में ही उलझे रहें ।” आपको क्या लगता है “धुरंधर” जैसी फ़िल्में किन लोगों की ख़ुराक है?

इस तरह भले ही इन रक्तपाती रोमांचक क्रूरतम खेल की शुरुआत वीडियो गेम्स से न हुई हो लेकिन माँग और पूर्ति के नियमानुसार वीडियो गेम खेलने वाली अधीर जेनरेशन का डोपामिन (डिजिटल एडिक्शन) आज ‘और ज़्यादा’ ख़ून की माँग कर रहा है अत: ‘धुरंधर’ जैसे सिनेमा को ‘प्रोपेगंडा’ कहना बेवकूफी ही है । क्या सिनेमा क्या राजनीति दोनों ने देश और समाज की नब्ज़ को पकड़ा हुआ है। अभी हाल ही में 50 वर्ष पूरे करने वाली ‘शोले’ जिसे मनोरंजक फ़िल्म माना जाता है लेकिन इसमें अपने समय के हिसाब से हिंसा का चरम रूप था। गब्बर ठाकुर के परिवार का नरसंहार करता है,निहायत क्रूरता से ठाकुर के मासूम पोते के सीने पर गोली चला देता है। हालाँकि उस समय सेंसर बोर्ड ने अत्यधिक हिंसा के कारण क्लाईमेक्स पर आपति दर्ज की थी। फिर आता है उदारीकरण जो अपने साथ लाता है प्रेम कहानियाँ-मैंने प्यार किया, क़यामत से क़यामत तक, दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे। साथ में लाता है पूँजी तो खर्च करने के लिए बाज़ार खुला बाज़ार!     

कहा जा रहा है कि ‘धुरंधर’ फ़िल्म हिंसा अपने चरम रूप में है क्या ये ठीक वैसे ही ही नहीं है जैसे 50 वर्ष पहले शोले में हिंसा का चरम रूप था । उत्तर आधुनिकता की एक विशेषता है कि यहाँ से आलोचना को अपदस्थ कर दिया गया है जबकि हम तो पूर्व आधुनिक युग में रिवर्स लौट रहे हैं लेकिन आलोचना को अब बर्दाश्त नहीं किया जाता साहित्य में यदि आलोचना (प्रशंसात्मक) कमज़ोर हो रही है तो राजनीति में इसका वज़ूद कुचल दिया गया है लेकिन आज सिनेमा के समीक्षक भी (यहाँ आलोचक शब्द नहीं प्रयोग होता) असमंजस में हैं, लगता है अंतिम साँस गिन रहे हैं । अन्यथा ऋतिक रोशन जैसे सुपर स्टार को अपनी टिप्पणी बदलनी नहीं पड़ती । कहावत है “मुर्गा जान से गया और खाने वाले को मज़ा भी न आया” वो दिन दूर नहीं जब और-और-और की माँग पर ये ‘खून’ वीडियो गेम्स से बाहर बहना शुरू हो जाएगा । ये नायक मानो पर्दे से निकलकर सड़कों पर उतर आयेंगे। समाज का यह हिंसात्मक रवैया उसे किस दिशा में ले जाएगा? क्या ये मान न लिया जाए कि समाज क्रूरता की हदें पार कर रहा है? फिलहाल तो यह फ़िल्म ओटीटी के समय भी सिनेमाघरों के लिए संजीवनी का काम कर रही है युवा भले ही गर्त में धंसे चले जा रहे हो! धुरंधर फ़िल्म का अंत पार्ट -2 के संकेत पर होता है यानी हमारे डोपामाइन को हिंसा के अगले क्रूरतम (चरम?) रूप के लिए तैयार किया जा रहा है।’वर्चस्व के खिलाड़ी’ भेड़ों को लड़वा रहेंगे और आम जन बहते खून का मज़ा!

और अंत में- आपकी जानकारी के लिए बतला दूं कि धुरंधर फ़िल्म में कई दफा विहंगम दृश्यों में (ड्रोन) पाकिस्तान /कराची को दिखाया है। अगर ‘पाकिस्तान’ ही देखना है तो पाकिस्तान के सीरियल यूट्यूब पर उपलब्ध है, देखे जा सकते हैं  आपको पता लगेगा कि वहाँ पर भी हमारे भारत जैसे ही संवेदनशील इंसान रहते हैं वहाँ की औरतें भी अपने ‘हक’ के लिए अपने ढंग से लड़ रही हैं ।

शिवानी सिद्धि

स्वतंत्र पत्रकार  

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की पहली महिला अध्यक्ष: संगीता बरुआ पिशरोटी

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की पहली महिला अध्यक्ष: संगीता बरुआ पिशरोटीएक ऐतिहासिक उपलब्धि, एक स्त्रीवादी संकेत

“प्रतिनिधित्व कोई ‘कृपा’ नहीं, बल्कि अधिकार है”

नई दिल्ली। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में दर्ज यह क्षण केवल एक संस्थागत बदलाव नहीं है, बल्कि यह उस दीर्घ स्त्री-संघर्ष का सार्वजनिक प्रतिफल है, जो मीडिया संस्थानों के भीतर वर्षों से अदृश्य बना रहा। वरिष्ठ पत्रकार संगीता बरुआ पिशरोटी को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया (PCI) की पहली महिला अध्यक्ष चुना गया है। दशकों पुराने इस प्रतिष्ठित संस्थान में महिला नेतृत्व का यह पहला अवसर न केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि मीडिया जगत में बदलते सामाजिक‑पेशेवर संतुलन का भी संकेत देता है।

चुनाव में ऐतिहासिक जीत

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के हालिया चुनावों में संगीता बरुआ पिशरोटी के नेतृत्व वाले पैनल ने लगभग सर्वसम्मति के साथ जीत दर्ज की। अध्यक्ष पद पर उनकी जीत ने यह स्पष्ट कर दिया कि पत्रकार समुदाय के एक बड़े हिस्से ने उनके अनुभव, वैचारिक स्पष्टता और संगठनात्मक दृष्टि पर भरोसा जताया है। यह चुनाव केवल पद परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रेस क्लब के इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत माना जा रहा है।

कौन हैं संगीता बरुआ पिशरोटी

संगीता बरुआ पिशरोटी एक जानी‑मानी वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका हैं। असम से आने वाली पिशरोटी ने राष्ट्रीय पत्रकारिता में अपनी अलग पहचान बनाई है। वे लंबे समय से नई दिल्ली में सक्रिय हैं और राष्ट्रीय राजनीति, शासन, उत्तर‑पूर्व भारत तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं पर उनकी रिपोर्टिंग और लेखन को विशेष महत्व दिया जाता है।

उन्होंने अपने करियर की शुरुआत यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया (UNI) से की और बाद में द हिंदू जैसे प्रतिष्ठित अख़बार में विशेष संवाददाता के रूप में कार्य किया। वर्तमान में वे डिजिटल मीडिया मंच द वायर से जुड़ी रही हैं, जहाँ उन्होंने राष्ट्रीय मामलों पर संपादन और लेखन का कार्य किया।

पत्रकारिता में योगदान और पहचान

संगीता बरुआ पिशरोटी की पत्रकारिता की पहचान सत्ता से सवाल पूछने, हाशिये के क्षेत्रों और समुदायों की आवाज़ सामने लाने तथा संवैधानिक मूल्यों के पक्ष में स्पष्ट रुख रखने के लिए रही है। उत्तर‑पूर्व भारत से जुड़े राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ मानी जाती है।

वे कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों और फ़ेलोशिप्स से सम्मानित की जा चुकी हैं। इसके अलावा वे लेखन के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं। उनकी पुस्तक “Assam: The Accord, The Discord” असम समझौते और उससे जुड़े राजनीतिक‑सामाजिक विरोधाभासों पर एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ मानी जाती है।

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और महिला नेतृत्व

1958 में स्थापित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया लंबे समय से देश के पत्रकारों का एक प्रमुख मंच रहा है। इसके इतिहास में पहली बार किसी महिला का अध्यक्ष बनना, भारतीय मीडिया संस्थानों में लैंगिक प्रतिनिधित्व को लेकर एक महत्वपूर्ण संकेत है।

संगीता बरुआ पिशरोटी की अध्यक्षता ऐसे समय में आई है, जब पत्रकारिता अभूतपूर्व दबावों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े सवालों और पेशेवर असुरक्षाओं के दौर से गुजर रही है। ऐसे में उनसे अपेक्षा की जा रही है कि वे प्रेस क्लब को एक अधिक सक्रिय, समावेशी और हस्तक्षेपकारी मंच के रूप में आगे बढ़ाएंगी।

आगे की राह

अपने वक्तव्यों में संगीता बरुआ पिशरोटी ने संकेत दिया है कि उनकी प्राथमिकता प्रेस क्लब को केवल एक सामाजिक स्थल तक सीमित न रखकर, पत्रकारों के अधिकारों, सुरक्षा और पेशेवर गरिमा से जुड़े मुद्दों पर सशक्त आवाज़ बनाने की होगी। महिला पत्रकारों, युवा मीडिया कर्मियों और क्षेत्रीय पृष्ठभूमि से आने वाले पत्रकारों के लिए अधिक प्रतिनिधित्व और संवाद के अवसर भी उनकी कार्यसूची में शामिल माने जा रहे हैं।

संगीता बरुआ पिशरोटी का प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की पहली महिला अध्यक्ष बनना केवल एक उपलब्धि नहीं, बल्कि उस पितृसत्तात्मक संरचना में दरार है जो दशकों से मीडिया संस्थानों को संचालित करती रही है। यह घटना याद दिलाती है कि प्रतिनिधित्व कोई ‘कृपा’ नहीं, बल्कि अधिकार है। Streekaal के लिए यह क्षण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पत्रकारिता के भीतर स्त्री नेतृत्व की उस संभावना को रेखांकित करता है, जिसे अक्सर योग्यता के बावजूद हाशिये पर रखा गया। यह पद एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस सामूहिक संघर्ष का है जो स्त्रियों ने न्यूज़रूम से लेकर प्रेस क्लबों तक लड़ा है।

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