‘सोनिया और राजीव’ ‘मेलोनी और मोदी’

यद्यपि यह विवाह नहीं है न घोषित प्रेम फिर भी आइए मेलोनी और मोदी दृश्य की सोनिया और राजीव के साथ होने के दृश्य से तुलना करें। क्योंकि दोनों के भक्त एक तरह से तय होते हैं और विरोधी भी: 

1. सोनिया गांधी, जो कि इटली में पली-बढ़ी, भारत में एक राजनीतिक परिवार की बहू बनकर आयी, 

जिसके दो-दो सदस्य (पंडित जवाहरलाल नेहरू तथा श्रीमती इंदिरा गांधी) इस देश के प्रधानमंत्री बन चुके थे, तीसरे का बनना तब शेष था। यह परिवार राजनीति की धूरि में था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय राजनीति का चक्का इसी धूरि के इर्द-गिर्द नाचता रहा। देश को ( गांधी परिवार के समर्थकों को) इस विवाह पर कोई विशेष एतराज नहीं था बल्कि एक गर्व-भाव ही रहा होगा, जो अक्सर पितृसत्तात्मक समाज के वर-पक्ष को होता है, विजेता भाव एक भारतीय की गैर भारतीय नस्ल, वह भी गोरे नस्ल ,की कन्या पर विजय। विदेशी कन्या, गोरे नस्ल की अंग्रेज कन्या पर विजय, आहत भारतीय मन को आत्मतुष्ट करता है, जिसके स्वाभिमान को उपनिवेशवादी गुलामी ने चोट पहुंचाई थी।

(22 साल पहले सोनिया गांधी विवाद पर मेरे एक शोध आलेख से उपरोक्त उद्धरण का साम्य अब भी है।)

मोदी के साथ मेलोनी को देखकर उनके भक्त हर जगह प्रसन्न होंगे, किसी भी स्तर के, कही भी बैठे हों फर्श से अर्श तक। यद्यपि यह दो राजनयिकों का मिलना है, ऐसी तस्वीरें इतिहास के आर्काइव में और भी मिल जाएंगी। नेहरू की भी। भारतीय पुरुष मन, स्त्रियों के भीतर भी बैठा वह मन आह्लादित होता है। मोदी में माचोईज्म खोजने वाले प्रसन्न हैं। अपने राजा में यूं ही खोजा भी जाता है- उसे छूट होती है स्त्री उसकी पत्नी हो सकती है, केवल दोस्त हो सकती है, प्रेमिका या कुछ भी – रखैल भी तो राजाओं/ समर्थ लोगों के गौरव का शब्द ईजाद है।

यह छूट इंदिरा गांधी को नहीं थी। इसीलिए उन्होंने और अन्य कारणों से भी अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन के साथ डांस का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया था। 

यह भी क्या कम संयोग है कि सोनिया गांधी के विदेशी मूल पर बवाल काटने वाले,अलग पार्टी बनाने वाले शरद पवार ने इस तस्वीर के प्रसारण के साथ ही कहा कि मोदी ने दुनिया में देश का मान बढ़ाया है।

2.ब्रिटिश उपनिवेश ने अपने आर्थिक प्रभावों के अतिरिक्त और ज्यादा समय तक असरकारी प्रभाव सांस्कृतिक स्तर पर डाले थे। गुलाम भारतीयों के लिए अंग्रेज स्त्रियां आदर्श थीं, उनके रहन-सहन बोल-चाल के मद्देनजर सुधारवादी भारतीयों ने अपनी पत्नियों को भी सुशिक्षित गृहिणी बनाने के भरपूर प्रयास किए थे, परंतु आकर्षण की हदें गोरे चमड़े में बसी थीं, गोरी नस्ल में समाहित थीं। गोरों का यह आतंक आज भी है, इसलिए सोनिया गांधी का श्वेत नस्ल से होना भी एक विशेष स्थिति पैदा करता है। कैम्ब्रिज से एक व्यक्ति ने इंटरनेट पर एक सवाल छोड़ रखा है कि क्या सोनिया गांधी Mary Antonitee नाम से इटली मूल की होने के बजाय ‘अबेबी गांधी’ नाम से अफ्रीकन मूल की काली महिला होती तब भी क्या उसके प्रधानमंत्री होने के प्रति आग्रह-दुरग्रह ऐसे ही होते। स्पष्ट है कि रंगीन भारतीयों के लिए काले नस्ल की विविधता श्रेष्ठता पूर्ण चुनौती नहीं देती है या आकर्षण पैदा नहीं करती है, स्पष्ट ही है कि सोनिया के प्रसंग में आहत राष्ट्रीयता और नस्ल-श्रेष्ठता के आधार पर भेद-भाव की दुहरी प्रवृत्ति है। यहां अफ्रीकी नामांकन में एक सचेत संदर्भ भी है। नाइजीरिया में अबेबी का अर्थ होता है ‘चाहा और पा लिया’ अर्थात् आसानी से प्राप्य। आसानी से प्राप्यता की गुंजाइश गोरे नस्ल की सोनिया गांधी के साथ नहीं बनती है,अर्थात् विजेता भाव की संभावना और भी प्रबल हो जाती है तथा आगे चलकर अतिरिक्त आग्रह को प्रेरित भी करती है। ( उसी शोध आलेख से) 

मोदी के मामले का गर्व, मोदी भक्तों का गर्व भाव भारतीय मूल के मर्दों और भारतीय समाज के मन का गर्व भाव है। यदि इटली की पीएम मैलोनी न होकर वे नामीबिया, तंजानिया आदि की राष्ट्रध्यक्ष होती, काले मूल की तब क्या होता उस आह्लाद का?

नेहरू और एडवीना माउंटबेटन की दोस्ती में गंदगी तलाशते मोदी भक्तों को आज ईश्वरीय आह्लाद मिल रहा होगा। और मोदी विरोधी आज मोदी भक्त निशिकांत दुबे हुए जा रहे हैं या संघ के नेताओं सरीखे भाषा के चमत्कार में निशिकांत सरीखा बातें कर रहे हैं।

3.इतिहास बड़ा निर्मम होता है। इटली मूल की डिसेंट स्त्री सोनिया गांधी का विरोध करते भक्तों को मेलोनी थमा दिया है, मेलोडी चाकलेट का मिठास दे दिया है। वह मेलोनी, जिसके पिता वास्तव में ड्रग तस्करी में गिरफ्तार हुए थे, सोनिया गांधी के लिए भक्त इसी तरह की कल्पनाएं करते हैं, अफवाहें पेश करते हैं

इतिहास ने उतनी ही निर्ममता से कांग्रेस समर्थक मर्दवादियों को उन्हीं तर्कों और भावनाओं से लैस कर दिया है, जिससे संघी थे, भाजपाई थे। उन तर्कों और भावनाओं को खाद पानी मिलता है भारतीय समाज और संस्कृति से ही।

यह भी संयोग है कि अभी एक सिरफिरे राजनेता ने भारतीय राजनीति की 90% स्त्रियों को नेताओं के बेड रूम से जोड़ने वाला बयान दे दिया और उसे खूब सुर्खियां मिलीं, और प्रहसन यह कि उसी वक्त सड़कों पर वे लोग महिला आरक्षण के लिए आंदोलन कर रहे थे जिन्होंने मिलजुलकर संबंधित कानून को ही कुंद कर दिया है।

संस्थापक संपादक

संजीव चंदन

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

ISSN 2394-093X
418FansLike
783FollowersFollow
73,600SubscribersSubscribe

Latest Articles