दो दिन पहले एक साथी मेरे घर आई थीं। उन्हें राहुल गांधी से प्यार है। उनके हथेलियों में ‘ रैक्व ‘ की आत्मा है।
उन्होंने कहा कि आप राहुल गांधी के खिलाफ क्यों लिखते हैं? वही एकमात्र विकल्प हैं, हमें उन्हें ताकत देनी चाहिए।मैंने उन्हें कहा कि वही एकमात्र विकल्प नहीं हैं, बल्कि विकल्पों की सबसे बड़ी धूरी हैं फिलहाल!
उन्होंने पूछा कि क्या राहुल के लिए, कांग्रेस के लिए आपके मन में कोई अच्छी कामना नहीं है? कोई एक?
मैंने कहा, है न, बंगाल और केरल से जहां धूरी विकल्पों की परिधि से लड़ रही है। सर्वश्रेष्ठ कामना है।
उन्होंने मेरी ओर देखा।
मैंने कहा, ‘कामना सर्वश्रेष्ठ यही कि ममता बनर्जी बड़े दल के रूप में उभरते हुए उतनी ही सीटों से बहुमत से पीछे रह जाएं जितनी सीटें राहुल गांधी लेकर आने वाले हैं। और केरल में भी न एलडीएफ और यूडीएफ बहुमत तक पहुंचे, इस कदर पीछे रहे कि दोनों का साथ आना जरूरी हो जाए।
उन्होंने कहा कि कर दी न भाजपाइयों वाली कामना, इससे क्या होगा?
‘ इस कमना में एक प्रसंग ऐसा जरूर है जो ‘भाजपाइयों वाली बात ‘ आरोप के लिए आधार हो सकता है। वह केरल के संदर्भ में। मेरी कामना के फलीभूत होने के लिए केरल में भाजपा की सीटें ठीक ठाक आनी होगी, इतनी कि वाम दल और कांग्रेस एक साथ सरकार बनाने के लिए मजबूर हों।’
‘इससे होगा यह कि इंडिया गठबंधन सीमेंट की तरह चिपक जाएगा, पांच साल के लिए फेविकोल का जोड़ । नहीं तो टूट चुके गठबंधन ने अघोषित रूप से तीसरा मोर्चा का पुराना वातावरण बना दिया है।’ इससे यह भी होगा कि राहुल गांधी के नेतृत्व को एक श्रेय जायेगा, जो गठबंधन के दलों को ही हराने के कारण नकारात्मक होते हुए भी सकारात्मक असर पैदा करेगा।’
मैंने फिर उनसे पूछा कि क्या यह राहुल गांधी की राजनीति के लिए भी सर्वोत्तम कामना नहीं है!
वो कुछ सोचने लगीं। चेहरे पर फिर भी थोड़ी चमक थी।
मैंने कहा कि राहुल गांधी सौभाग्य से भरे हैं कि कांग्रेस में 20 सालों से उन्हें कोई चुनौती नहीं है। वे अपने गैर जिम्मेवार भूमिकाओं से पार्टी और पार्टी के बाहर भाजपा के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करते हैं। इसके पहले खुद उनके परिवार के नेहरू, इंदिरा, राजीव और सोनिया में से कोई इतना सौभाग्य से भरा नहीं था, हर किसी को पार्टी में और पार्टी के बाहर चुनौतियों से निपटना पड़ा।
उनके चेहरे पर फिर से गुस्सा वापस आया, ‘ कैसे? ‘
उन्हें राजनीति में एक ही कला आती है विरोधी पक्ष के नेता को आक्रामकता से डिस्क्रेडिट करो। केरल के मुख्यमंत्री के बाद बंगाल के मुख्यमंत्री को उनपर एक भी मुकदमा न होने के आधार पर घेर रहे हैं वे। कहते हैं कि सांठ गांठ है इनका भाजपा से। पलटकर वह सूती साड़ियां पहने ‘भद्र मन की महिला’ मंहगे लिवास में डी क्लास होने की तस्वीरें/ वीडियो जारी करते ‘ युवराज ‘ से कभी नहीं पूछती कि इतने मुकदमे के बाद भी आप या आपके परिवार का कोई व्यक्ति, रॉबर्ट वाड्रा भी, जेल नहीं भेजा गया, जैसे हेमंत सोरेन या अरविंद केजरीवाल को भेजा गया!
उनके चेहरे पर एकदम से क्रोध का आवेग आया। लेकिन फिर वे संयत हो गईं क्योंकि उनके क्रोध से अधिक प्रभावी है उनका मेरे प्रति स्नेह। राहुल गांधी उनके लिए आकाश कुसुम सरीखा दूर हैं – मैं उनके सुख दुख का साथी, एक फोन कॉल की दूरी पर हूं।
‘ लेकिन एकमात्र राहुल गांधी हैं जो निडर खड़े हैं। संघ के खिलाफ बोलते हैं।’
बोलने से सत्ता नहीं बदलती। राहुल गांधी से पहले भी इतिहास में सत्ता के खिलाफ सीधे पीएम के खिलाफ बोलने वाले बड़े नेता रहे हैं, लेकिन सत्ता में बदलाव के लिए उन्हें संगठन की जरूरत पड़ी है, लम्बा वक्त भी लगा है। राहुल गांधी इस मामले में भी सौभाग्य से भरे हैं कि उन्हें एक पुरानी पार्टी मिली है, जिसका मरता हुआ संगठन भी कई राज्यों में बेहद मजबूत है। लेकिन…
लेकिन?
लेकिन राहुल संगठन के स्तर पर भी सबसे गैर जिम्मेवार संगठक रहे हैं। संगठन के लिए भी उनकी पार्टी का ही इतिहास उन्हें देखना चाहिए। गांधी आए तो उन्होंने जिला स्तर तक के संगठनों के लिए अनुकूल वातावरण बनाया। राज्य और जिला की समितियों के लिए जाने वाला फंड भी बढ़ा दिया। आप पता करें कि कांग्रेस का अधिकांश फंड किन गतिविधियों पर खर्च हो रहा है?
कांग्रेस के पास फंड कितना है?
पर्याप्त। जितना होना चाहिए एक सत्ता से दूर हो चुकी पार्टी के पास। राज्यों में जितनी सत्ता है उसके हिसाब से फंड है। आज भी फंड भाजपा के बाद कांग्रेस को ही तो जा रहा है।
वे बोलीं, ‘ आपके पोस्ट पढ़ता हूं, किताब भी पढ़ी है, कभी कभी कुछ बातों से सहमति भी होती है लेकिन आप कुछ ज्यादा आक्रामक होते हैं तो ठीक नहीं लगता। क्या करूं मुझे राहुल से प्यार है? ‘
यह मामला दिल का था। मेरी मित्र कोमल दिल/ मन वाली हैं। मुझे चुप रह जाना पड़ा।
मैं कहना तो बहुत कुछ चाहता था। जैसे, यह प्यार नहीं प्रचार तंत्र का प्रभाव है। सिविल सोसायटी, पेड – अनपेड के तंत्र और प्रोपगंडा का प्रभाव है । यह फॉल्स नेतृत्व की चमक है। मीडिया का माहौल है। मोदी के बाद सबसे अधिक कैमरे राहुल के लिए हैं। मोदी के पहले से रहा है। जब वे महज युवराज थे तब से। पीपली लाइव / नत्था दृश्य याद ही होगा मेरी मित्र को। उनके एक साथी ने इस फिल्म के लिए असिस्टेंट के रूप में काम किया था।
मैं कहना यह भी चाहता था कि राहुल गांधी सच में सौभाग्य से भरे हैं 22 सालों से उन्हें पार्टी में कोई चुनौती नहीं है और 12 सालों से पार्टी के बाहर भी एकमात्र उम्मीद की तरह टंकित किए गए हैं।
मेरे बहुत से साथी इतने सौभाग्य से भरे नहीं थे। वे बदलाव का स्वप्न लिए, अपनी सीमाओं में हस्तक्षेप करते हुए दुनिया से ही चले गए। राहुल गांधी तब भी इसी जोश, बेखौफ बोलों और गैर जिम्मेवार निर्णयों के साथ चमकती उम्मीद थे और आगे भी रहेंगे। पता नहीं मैं भी रहूं या न रहूं।
मैं अपने उन साथियों से भी कहा करता था कि एक इवेंट के जवाब में दूसरे इवेंट से ज्यादा जरूरी है संगठन, मुद्दे, मुद्दों की विश्वसनीयता के लिए उदाहरण। भारत जोड़ो यात्रा ठीक लेकिन एक चुनावी हार उसका सारा कुछ खत्म कर देगा। मैं तब अपनी इन मित्र को कहा करता था कि फॉरेस्ट गंप की तरह सिर्फ चलना ही हासिल नहीं हो सकता। कुछ – कुछ, संकेतों में ही सही कांग्रेस के ही अखबार में, नेशनल हेराल्ड में लिखा भी था – पता नहीं राहुल जी पढ़ते हैं या नहीं अपना अखबार!
लेकिन वे उन्हीं दिनों राहुल के प्रेम में आ गई थीं। बड़ी पापड़ बेल कर, इवेंट मैनेज कर रही टीम में से कुछ से अपने पुराने संबंधों के आधार पर वे एक जगह राहुल से हाथ मिला आई थीं, तब से उनके हाथ में ‘ रैक्व ‘ हजारी प्रसाद द्विवेदी के पात्र की आत्मा आ गई थी।
मैंने भारत जोड़ो के पहले फेज के बाद हुए चुनावों की हार के बाद फिर से यही कहा था, छत्तीसगढ़ भी हार जाया गया था- पद यात्रा की निरंतरता नहीं, चुनावी जीत जरूरी है। मैंने उस वक्त भी कहा था जब लोकसभा चुनावों के बीच में ही निकल पड़े थे राहुल। भारत जोड़ो यात्रा रूट पर सहयोगी दलों की मदद से महज 16 से 17 सीटें जीत पाई थी कांग्रेस।
बड़ी देर से मौन मेरी मित्र ने कहा, ‘ चाय पिलाओ यार! ‘
मुझे लगा वे विषय बदल रही हैं, या वक्त चाहती हैं सोचने के लिए। लेकिन मैं जब चाय बनाने उठा तो उन्होंने कहा, ‘ कुछ भी हो यार राहुल बन्दा है बड़ा ईमानदार । दिल से राजनीति करता है। क्या करें जब ईवीएम हैक हो जाए, चुनाव लूट लिया जाए।
क्या था यह। मेरी मित्र की धारणा या हारे का ‘ हरिनाम? ‘ न मेरी मित्र का और न मेरी उम्र इतनी कम है कि हमने उन चुनावों को न देखा हो जब चुनाव कराने वालों और प्रशासन की मिलीभगत से बूथ के बूथ लूट लिए जाते थे। तब भी सरकारों को बदलते देखा है हमने। आज भी 12 सालों में कई बार हारी है भाजपा। उन हार पर मैं अपनी मित्र को यह कहते सुन चुका हूं कि बड़ी जीत के लिए छोटी कुर्बानी थीं भाजपा की वे हार।
मैं जानता हूं कि वे अपनी धारणाओं को भी प्रेम करती हैं। धारणाएं उम्मीद भी हैं इस दौर में।
मैंने जाते हुए उनकी ओर मुड़ कर देखा, ‘ रैक्व ! ‘ सोचा , उनकी उम्र लंबी हो! ‘
