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‘कथाक्रम’ का 33 वां ‘आनंद सागर स्मृति सम्मान’ लेखक श्री भालचंद्र जोशी को

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 –लेखन मेरे लिए पहले और अंतिम विकल्प की तरह है — भालचन्द्र जोशी

हिन्दी त्रैमासिक पत्रिका ‘कथाक्रम’ का तैंतीसवां वार्षिक समारोह 7 दिसंबर को लखनऊ के कैफ़ी आज़मी सभागार में आयोजित किया गया , जिसमें वरिष्ठ कथाकार श्री भालचंद्र जोशी को ‘आनंद सागर स्मृति सम्मान’ प्रदान किया गया | श्री भालचंद्र जोशी को सम्मान स्वरूप मानपत्र और रु.21000 प्रदान किये गए | सम्मान समारोह में अध्यक्ष के रूप में प्रसिद्ध आलोचक श्री वीरेंद्र यादव, मुख्य अतिथि के रूप में कथाकार श्री शिवमूर्ति आमंत्रित थे | सम्मानित कथाकार भालचंद्र जोशी ने अपने वक्तव्य में शैलेंद्र सागर और कथाक्रम सम्मान से जुड़े सभी लोगों के प्रति कृतज्ञता प्रकट की और उन्होंने कहा कि ऐसे ही लोग और ऐसे ही संस्थाएँ हैं , जो पुरस्कार और सम्मानों की प्रतिष्ठा बचाए हुए है । अपने लेखन के बारे में उन्होंने कहा कि – “लिखना मेरे लिए पहले और अंतिम विकल्प की तरह है क्योंकि इसके सिवा मुझे कुछ आता भी नहीं है । मेरे लिए शब्दों का संसार ही अंतिम विकल्प है । लेखन मेरी अंतिम शरणस्थली है । लेखक के लिए लिखने से बड़ा सुख कुछ भी नहीं है । एक लेखक जो दुनिया में हारता है या जो दुनिया से हारता है , अपने जैसे सैकड़ो , हजारों , असंख्य लोगों को हारते हुए देखता है तो लेखक उसकी विजय का स्वप्न लेखन में देखता है ।संभवतः इसी स्वप्न में लेखन की सार्थकता और सामाजिकता छिपी होती है । दुष्टता की ललक के बीच शब्द ही आसरा देने आते हैं । कला और कला -अभ्यास अलग-अलग चीजें हैं । जो व्यक्ति एक जैसी सैकड़ो मूर्तियाँ बना लेता है वह कला का अभ्यास है लेकिन मेरे लिए हर कहानी एक बड़ी चुनौती की तरह सामने होती है । हर बार उसके लिए पहली रचना की तरह ही श्रम करना पड़ता है । मेरे जीवन का लंबा हिस्सा आदिवासियों के बीच घने जंगलों में बीता है इसलिए मेरे भीतर भी आदिवासियों की तरह एक जंगली संकोच मौजूद है , जो शहरी संपर्क में दाखिल होने पर प्रकट होता है ।”

भालचंद्र जोशी के कृतित्व पर बोलते हुए सुप्रसिद्ध कथाकार रूपा सिंह ने कहा – “भालचन्द्र जोशी एकमात्र ऐसे कहानीकार हैं जिनकी कहानियाँ गंभीर और गहरे सरोकारों से जुड़ी हैं । वे हिंदी के संभवतः पहले ऐसे कहानीकार हैं , जिनकी कहानियों में छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के आदिवासियों के जीवन के अभाव , दुख और संघर्ष इतने गहरे यथार्थ और मानवीय मार्मिकता के साथ आए हैं ।” सुप्रसिद्ध कथाकार शिवमूर्ति ने कहा कि कथाक्रम सम्मान के लिए बहुत तठस्थता से चुनाव होता है । और संबंधित लेखक की रचनात्मकता को गंभीरता से देखा परख जाता है । और निर्णय लिया जाता है । इस बार भालचन्द्र जोशी के चयन पर सब लोग एक मत से सहमत थे और इस बात की हम सब लोगों को प्रसन्नता है । कार्यक्रम के संयोजक तथा कथाक्रम पत्रिका के संपादक शैलेंद्र सागर ने अपने वक्तव्य में कहा कि लिट फेस्ट जैसे चकाचौंध वाले कार्यक्रमों की तुलना में सादे ढंग से आयोजित इस सम्मान समारोह को लेखक और पाठकों का भरपूर प्यार मिला है । चकाचौंध की होड़ में हम नहीं हैं । कथाक्रम सम्मान का यह तैंतीसवाँ वर्ष है और भालचन्द्र जोशी को यह सम्मान देते हुए हम सब लोगों को बेहद प्रसन्नता है । कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे सुप्रसिद्ध आलोचक वीरेंद्र यादव ने कहा कि – भालचंद्र जोशी ने ग्रामीण जीवन और सांप्रदायिकता जैसे विषयों को लेकर बहुत गंभीरता से लिखा है । उनकी ‘रिहाई’ कहानी और ‘जस का फूल’ जैसा उपन्यास सांप्रदायिकता के विषयों को बहुत गंभीरता से प्रस्तुत करता है । उन्होंने इसी संदर्भ में प्रेमचंद का स्मरण किया और कहा कि वैसे ही दायित्व बोध भालचंद्र जोशी की कहानियों में मौजूद है । और इनकी रचनाएँ गंभीर सरोकारों से जुड़ी हैं । सत्र का संचालन इरा श्रीवास्तव ने किया ।

प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी ‘आनंद सागर स्मृति सम्मान’ के अवसर पर ‘हिन्दी साहित्य और जनपदीय भाषाएँ ‘ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया । इस सत्र में प्रो. राजकुमार ने साहित्य और जनपदीय भाषाओं के अंतर्संबंधों पर बात की । लोक बाबू ने छत्तीसगढ़ की बोलियों के नष्ट होने के खतरे की ओर संकेत किया । अवधेश मिश्र ने जनपदीय भाषाओं की आंतरिक संरचना पर बात रखी । ईश्वर सिंह दोस्त ने कहा कि यह सिर्फ अकादमी चिंता की बात नहीं है। इसके अतिरिक्त जगदीश्वर चतुर्वेदी ,कालीचरण सनेही , प्रो. रामबहादुर मिश्र , सुश्री सुजाता , परमेश्वर वैष्णव , प्रकाश उदय ने भी इस विषय पर वक्तव्य दिए ।

सत्र संचालन प्रो. श्रुति तथा नलिन रंजन सिंह द्वारा किया गया |

और संपूर्ण कार्यक्रम के अंत में वीरेंद्र सारंग ने लेखन और श्रोताओं का आभार व्यक्त किया ।

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नीले गुलाब का रहस्य :डॉ सुनीता मंजू

वनमाली कथा के अगस्त2025 अंक में युवा कथाकार वैशाली थापा की कहानी “नीले गुलाब का संगीत” की समीक्षा

वनमाली कथा के अगस्त2025 अंक में युवा कथाकार वैशाली थापा की कहानी “नीले गुलाब का संगीत” पढ़ी। ऐसा लगा ताजी हवा का खुशबूदार झोंका चेहरे को छूकर निकल गया। एक प्रतिभाशाली, संगीत प्रेमी लड़की ऐसी ही कल्पना कर सकती है। कहानी का नायक बहुत रसूखदार घराने का दिखाया गया है। वह अपने अमीर और पाई-पाई जोड़ने वाले परिवार से ऊबा हुआ है। प्रकृति, संगीत, कलाएं, उसे आकर्षित करते हैं। मात्र 10 वर्ष की उम्र में “मोगरे के फूल” पर लिखी कविता इसे प्रमाणित करती है। परिवार की समृद्धि और हिसाब किताब का एक नमूना देखिए। “मेरे लिखे को बड़े संदेह से देखकर, उन हवेली वालो ने, मेरे ही सामने नष्ट कर दिया। सफाई में कहा गया कि मैं स्टेशनरी खराब कर रहा हूँ। उन कागजों और स्याही से कई सारी दी गई उधारी का हिसाब हो सकता था।”01 एक ऐसे नीरस परिवार को छोड़कर, नायक एक नए शहर के गुमनाम मोहल्ले में किराए पर रहने लगा। वह कहता है “मैं इस शहर आया था, सिर्फ उस एक ही लय में बजने वाली जंजीरों से बचने के लिए, जो इंसान को कुछ नया नहीं करने देती।”02 यह नया करना ही मनुष्य के मनुष्य होने की पहचान है। संवेदनशील और भावुक नायक को अपनी पसंद के गीत, सामने की बालकनी से बजते हुए सुनाई देते हैं। आश्चर्य है कि, सामने की बालकनी में रहता शख्स उसकी पसंद कैसे जानता है। जबकि उसकी मित्र मंडली में, उसकी पसंद के गीत, किसी को पसंद नहीं। “मेरे सारे दोस्त मेरे पसंद के गानों से खींझते थे। वह लोग वही सुनते थे, जिससे मेरा सिर दर्द करता था। वह मुझे संगीत की पसंद के मामले में एक वृद्ध व्यक्ति समझते थे।”03 नायक की यह पसंद उसकी माँ की देन है। उसकी माँ को मेहंदी हसन की गजलें, रजिया सुल्तान के गीत, पसंद थे। वह टेप रिकॉर्डर पर सुनती थी। परंतु दकियानूस परिवार ने उससे टेप रिकॉर्डर छीन लिया। संभवत जेनेटिक प्रभाव के कारण नायक को यह गजलें पसंद हैं। परंतु वह सामने की बालकनी वाले को कैसे पता?? यह रहस्य है।

 कुछ दिनों बाद नायक उस गीत बजाने वाले को देख पाता है। वह एक बेहद खूबसूरत लड़की है। हमेशा चुपचाप रहती है। उसकी बालकनी का नीला गुलाब एक रहस्य है। नायक ने सफेद, गुलाबी, लाल रंग के गुलाब देखे थे, परंतु नीला गुलाब कभी नहीं देखा था। मकान मालिक की डरावनी शक्ल और घूरती लाल आँखों के बावजूद, नायक उस लड़की से पहचान बढ़ाता है। दोनों की पसंद एक जैसी, विचार एक जैसे हैं। दोनों में दोस्ती होती है।साथ घूमना, खाना पीना, शॉपिंग करना, शुरू होता है। नायक के लिए सबसे महत्वपूर्ण और अजीब बात थी- “बातें जो पल प्रतिपल प्यार को पोषित कर रही थीं। बातें जिनकी देह नहीं थी, और देह नहीं थी, तो वासना नहीं थी। मैंने पहले कभी किसी लड़की से इतनी सारी बातें नहीं की। पहले लड़कियों से जब मिलता था, पहले उनकी देह दिखती, फिर सुंदरता, और फिर कुछ छोटी-मोटी बातें। यहाँ सब उलट था। पहले बातें थी, विचार थे, फिर खूबसूरती थी, फिर चुप्पी थी। देह का फिलहाल कहीं कोई निशान नजर नहीं आता था।”04 तो यह इस कहानी की सबसे महत्वपूर्ण बात है। स्त्री देह के अलावा भी बहुत कुछ है। उसके विचार, उसके गुण, उसकी पसंद-नापसंद। वह एक मोम की गुड़िया नहीं है, जो जरा सी आँच से पिघल जाए। परंतु पितृसत्तात्मक पुरुष वर्ग, स्त्री की केवल सुंदरता देखता है। रंग-रूप देखता है। कहानी के अन्य पात्र- मकान मालिक, नायक/नायिका के मित्र नंदू, राघव, नायक के पिता, इसी पुरुष वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। नंदू को अपने पिता और दूसरी महिला दोनों पर भरोसा नहीं। राघव अपने से बड़ी उम्र की लड़की से प्रेम करता है, परंतु वह प्रेम वासना रहित नहीं है। नायक के पिता को, उसकी माँ का टेप रिकॉर्डर पर गीत सुनना पसंद नहीं है। वह उसके गीत सुनने पर पाबंदी लगा देते हैं। कहानी में एक संवाद है- “ऊपर वाला औरतो को इतने दुख क्यों देता है?

 मैंने सिर्फ दूसरे प्रश्न का उत्तर दिया – क्योंकि शायद जिसने यह दुनिया बनाई, वह भी मर्द ही था।”05

कहानी चरम पर आती है। अब नायक की बजाय, नायिका के दृष्टिकोण से कही जाती है। एक लड़की अपने लिए कैसा प्रेमी चाहती है? ऐसा जो उसे पूरी तरह समझे। उसकी भावनाओं की कदर करे। उसके विचारों का सम्मान करे। ऐसा लड़का वास्तविक दुनिया में मिलना मुश्किल है। नायक का यह संवाद बहुत महत्वपूर्ण है- “उसकी पुकार सुनते हुए मुझे लगा, वह और कोई नहीं था। उस पार मैं ही था। मैं ही वहाँ सारे गीत सुन रहा था। मैं ही था, जो मैं को बुला रहा था।”06 अंत में नायिका/नायक के मित्र राघव और नंदू उसकी मदद करते हैं। कल्पना और वास्तविकता में अंतर समझाते हैं। यहीं नीले गुलाब का रहस्य भी खुलता है। परंतु एक और रहस्य पाठकों के मन में रह जाता है। “अगली सुबह मैं उस घर में गयी। सीढ़ियों से होते हुए, उसके कमरे तक। मैंने दरवाजा खोला। होश फाख़्ता हुए। कमरे के दृश्य ने आत्मा को आतंकित किया। पैरों के नीचे की जमीन, बर्फ़ की तरह चटक गयी। वह कमरा रंगा हुआ था, पूरा रंगा हुआ।”07 

कथानक बिल्कुल कसा हुआ है। कहीं व्यर्थ के प्रसंग नही हैं। रोचकता अंत तक बनी रहती है। रहस्य ऐसे, कि एक बैठक में कहानी पूरी किए बिना, आप कहीं हिल भी नहीं सकते। शिल्प भी एकदम नया है। ‘वैशाली थापा’ ने सिद्ध किया है, कि नयी पीढ़ी कहानी के नए शिल्प और नए तेवर लेकर आई है। गीता श्री के शब्दों में “कथा की नई पीढ़ी आ चुकी है। लैंड कर चुकी है। कथा की जमीन पर नया तेवर, नया कंटेंट, नया शिल्प भी। सब कुछ अलग पहले से।”08 हालाँकि यह टिप्पणी, वनमाली कथा के एक अन्य युवा विशेषांक पर है, परंतु “वैशाली थापा” की कहानी “नीले गुलाब का संगीत” पर भी पूरी तरह फिट होती है।  

संदर्भ सूची

1.वनमाली कथा, अगस्त 2025 पृष्ठ संख्या 97

2.वही पृष्ठ संख्या 96

3.वही पृष्ठ संख्या 97

4.वही पृष्ठ संख्या 104

5.वही पृष्ठ संख्या 97

6.वही पृष्ठ संख्या 102

7.वही पृष्ठ संख्या 107

8.वही पृष्ठ संख्या 13

डॉ० सुनीता मंजू 

सहायक प्रोफेसर 

हिंदी विभाग 

राजा सिंह महाविद्यालय 

सीवान

बिहार 

सभी चित्र गूगल से साभार

One response to “नीले गुलाब का रहस्य :डॉ सुनीता मंजू”

  1. रक्षा गीता Avatar
    रक्षा गीता

    बहुत बढ़िया
    बधाई

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समाज, संस्कृति और पितृसत्ता से ‘जूली’ का संघर्ष

जूली’ फ़िल्म के पचास वर्ष

हिंदी सिनेमा की प्रेम कहानियाँ अमूमन एक सीधी-सरल रेखा की तरह विवाह की परिणति तक पहुँचती हैं। अमीरी-गरीबी की आड़ में हिंदी सिनेमा का प्रेम जाति-धर्म की चुनौतियों को नज़रंदाज़ कर देता है । हिंदी सिनेमा की तुलना में दक्षिण भारतीय सिनेमा विशेषकर मलयालम सिनेमा हमेशा प्रगतिशील रहा है । ‘जूली’ मलयालम फिल्म ‘चट्ट्कारी’ का ही हिंदी रीमेक थी जिसके निर्देशक थे के.एस. सेथूमाधवन । 1975 का वर्ष हिंदी सिनेमा के लिए शानदार और ऐतिहासिक रहा । दर्शक जहाँ एक ओर ‘शोले’ में हिंसा का चरम रूप देख अचंभित-रोमांचित थे तो दूसरी ओर ‘जय संतोषी माता’ का धार्मिक उन्माद उन्हें थियटर तक खींच कर ला रहा था । हिन्दी सिनेमा की रोमांटिक-ट्रेजेडी-कॉमेडी प्रेम कहानियों के बीच एक एंग्लो इंडियन लड़की जूली  महत्वपूर्ण मोड़ लेकर आती है । सतही तौर पर एक प्रेमकथा और पारिवारिक संघर्ष को दिखाती ‘जूली’ में धर्म, संस्कृति और सामाजिक रूढ़ियों का टकराव स्पष्ट दिखाई देता है। पतिता, धर्मपुत्र , एक फूल दो माली, हमराज , दाग़ जैसी फ़िल्में उदाहरण हैं जिसमे नायिका को विवाह पूर्व गर्भवती होने के कारण संघर्ष करना पड़ा । विवाह पूर्व बार गर्भवती होने पर ‘जूली’ आत्महत्या नहीं करती बल्कि बच्चा होने के बाद भी उसे पालने का निश्चय करती है लेकिन माँ की धमकी के आगे विवश हो जाती है । ‘जूली’ का संघर्ष इसके अलावा सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक भेदभाव का भी है । एक एंग्लो इंडियन परिवार जिनका रहन-सहन, खान-पान आज भी भारतीय परिवेश के अनुरूप नहीं हो पाया । ‘जूली’ की माँ (नादिरा) के किरदार में विस्थापित प्रवासी का दर्द भी झलकता है जो भारत को अपना मुल्क नहीं मानती । जूली के पिता की विदेशी गाड़ी का बीच रास्ते में रुक जान एस बात को रेखांकित करता है कि उनका जीवन यहाँ ठहर-सा गया है ।   जबकि ‘जूली’ को उसकी सहेली उषा का हिन्दू-परिवार अपने परिवार से आकर्षित करता है ।

सत्तर का दशक जबकि मध्यमवर्गीय परिवारों के भीतर आधुनिकता और परंपरा के टकराव गहरे स्तर पर सामने आ रहे थे। शिक्षित युवाओं को पाश्चात्य संस्कृति लुभा रही थी । ‘जूली’ फिल्म  इन्हीं सामाजिक और सांस्कृतिक टकरावों का एक मार्मिक चित्रण है।इसलिए फ़िल्म सिर्फ  प्रेमकथा नहीं , बल्कि उस दौर के भारतीय समाज में स्त्री की स्थिति, धर्म और विवाह की राजनीति, और परिवार की रूढ़ियों के बीच प्रगतिशील दृष्टिकोण की खोज का आख्यान है। हिंदी सिनेमा के इतिहास में ‘जूली’ एक साहसिक प्रयोग के रूप में भी याद की जाती है। ईसाई युवती ‘जूली’ है, जो एक हिंदू युवक से प्रेम करती है और विवाह-पूर्व गर्भवती हो जाती है। यहाँ ‘स्त्री और नैतिकता’ के प्रश्न फ़िल्म में स्पष्ट होता है कि विवाह-पूर्व गर्भधारण के लिए केवल लड़की को दोषी माना जाता है। उषा अपनी माँ को कहती है ‘जूली ने शशि को खराब नहीं किया बल्कि शैतान तो ये आपका बेटा है जिसने जूली को शादी से पहले माँ बना दिया जो अब माँ-बाप दोनों के होते अनाथालय में पल रहा है’। उषा जो जूली और शशि के रिश्ते की गवाह है वह स्त्रियों के बीच भावनात्मक सह-अस्तित्व का प्रतीक भी बन जाती है ।

अन्य पक्ष यहाँ यह भी है कि  जूली की स्थिति सिर्फ “लड़की” होने से कठिन नहीं है, बल्कि एक एंग्लो इंडियन  समुदाय से होने सके कारण उसका संघर्ष और जटिल हो जाता है। उसके साथ होने वाले इस भेदभाव को उषा प्रखरता से उजागर करती है, तब उसका पिता भी साथ देता है उसका सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार प्रगतिशील भी है और यहाँ हम ‘सिस्टरहुड’ की खूबसूरत झलक देखते हैं । ‘जूली’ का उन हज़ारों स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती है जिन्हें अपनी भावनाओं और इच्छाओं पर नियन्त्रण करने के लिए बाध्य किया जाता है। फ़िल्म स्त्री की देह पर नियंत्रण की प्रवृत्ति की गहरी पड़ताल करती है। जूली का दयनीय मातृत्व हमें विचलित करता है जब उसे अपने बच्चे को दूध तक पिलाने नहीं दिया जाता।  जूली की माँ हिंदू लड़के से विवाह करने के बजाय उसके बच्चे को अनाथालय भेजने को तैयार हो जाती है। दूसरी ओर, लड़के की माँ केवल इस वजह से लड़की और बच्चे को अस्वीकार करती है क्योंकि वे ईसाई समुदाय से हैं। यह अंतर्द्वंद्व दर्शाता है कि भारतीय समाज में धर्म और जातीय पहचान प्रेम और मानवीय रिश्तों पर हावी रहती है। लेकिन उत्पल दत्त का प्रगतिशील चरित्र नादिरा को चुनौती देता है- ‘जाओ उस बच्चे को गोद में उठाओ और बताओ कि उसकी जात या धर्म क्या है ?  वह सामाजिक बंधनों से ऊपर उठकर मानवीयता की बात करता है। वह धर्म या जाति की दीवारों को नहीं मानता और जूली को बहू के रूप में स्वीकार करने को तैयार रहता है। उनका यह दृष्टिकोण भारतीय सिनेमा में प्रगतिशील सोच का प्रतीक है। मानवीयता के सन्दर्भ में इसी तरह ‘धूल का फूल’ का गीत ‘तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा इन्सान की औलाद है इंसान बनेगा’ उल्लेखनीय है।

फ़िल्म में नायक विवाह करने को तैयार भी है, किंतु परिवारों की संकीर्ण सोच विशेषकर दोनों की माएँ इस रिश्ते को अस्वीकार कर देती है। जो इस तथ्य को भी उजागर करता है कि पितृसत्ता हो या धार्मिक रुढ़ियाँ स्त्रियाँ उनकी सबसे बड़ी पोषक और संवाहक हैं। जबकि जूली का पिता अपने परिवार विशेषकर जूली से बहुत प्रेम करता है लेकिन उसे हर वक्त नशे में दिखाया गया है जो ट्रेन भी शराब पीकर चलाता है। जूली की यथास्थिति से वह अवगत नहीं और समय से पहले ही मर जाता है । फ़िल्म में जूली, मैगी और उषा तीनों स्त्रियाँ पितृसत्ता से अलग-अलग स्तर पर टकराती हैं जूली का किरदार मातृत्व प्रेम के संघर्ष के साथ विद्रोही बनता है जबकि उसकी माँ मैगी परंपरागत मातृत्व और सामाजिक दबाव का प्रतिनिधित्व करती है लेकिन बेटी की पीड़ा उसे बदलने को विवश करती है। उसकी सहेली उषा नई पीढ़ी की प्रगतिशील आवाज़ है, जो सहानुभूति और दोस्ती से बदलाव का संकेत देती है।

इस स्तर पर फ़िल्म केवल एक निजी प्रेमकथा नहीं रह जाती, बल्कि प्रेम और विवाह,समाज संस्कृति और  धर्म के बीच देह पर स्त्री के अधिकार पर भी गंभीर प्रश्न उठाती है। फ़िल्म अपने समय के समाज की मानसिकता, धार्मिक पूर्वाग्रहों और सांस्कृतिक संक्रमणों को भी दर्शाती है। फ़िल्म में हिन्दू और गैर-हिन्दू (एंग्लो इंडियन) पात्रों का चित्रण विशेष ध्यान देने योग्य है। हिन्दू परिवार को जहाँ उदार, सहिष्णु और प्रगतिशील बताया गया है, वहीं ईसाई परिवार को संकीर्ण मानसिकता और शराब-प्रेमी से जोड़ा गया है। हालाँकि ईसाई परिवार को शराबी और असंयमी दिखाना एकमात्र सच्चाई नहीं है । अकेले घर में नायक शशि भी नायिका जूली को शराब पीने पर विवश करता है यह कहकर कि ‘क्यों तुम तो पीती होंगी न अपने घर में’ जो वास्तव में शोचनीय है । इस दृष्टि से यह फ़िल्म एंग्लो इंडियन परिवारों के प्रति नकारात्मक छवि को उभारती है। मिश्रा जी नामक किरदार नादिरा और जूली दोनों को मात्र इसाई होने के कारण आसान उपलब्ध वस्तु मान लेता है । बाद में जूली मिश्रा का विरोध करती है कि- ‘अगर कल को कोई तुम्हारी बेटी को कोई 300 रुपये में खरीदना चाहे तो तुमको कैसा लगेगा’ इसी तरह जूली एक दूकानदार को भी थप्पड़ मार देती है जब वह उसके साथ छेड़छाड़ करता है । वह अपनी माँ से शिकायत करती है कि ‘आप नहीं जानती कि वो हमें किस कीमत पर उधार दे रहा है।’  फ़िल्म सामाजिक यथार्थ के साथ ही सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों को भी दिखाती है। एक दृश्य में जूली उषा के पिता से कहती है ‘आपके घर से कितनी अच्छी सुगंध आती है जबकी हमारे घर से अंडे मांस मछली शराब की और एक बदबू वो जो इन सबसे मिलकर बनी है।’  

गीतों की बात करें तो ‘ऊँची ऊँची दीवारों सी इस दुनियां की रस्में’ जैसा गीत समाज की कठोरता और प्रेम की तरलता के बीच संवाद स्थापित करती है। राजेश रोशन का संगीत फिल्म की आत्मा है। हिंदी सिनेमा में पहली बार कोई गीत पूरा अंगेजी में है ‘माय हार्ट इस बीटिंग’ एक अनूठा सफल प्रयोग रहा जिसका आज भी रिकॉर्ड नहीं टूट पाया यद्यपि प्रीति सागर को इसके लिए फिल्फेयर पुरस्कार नहीं मिल पाया । यह गीत एंग्लो इण्डियन  संस्कृति के सम्मिश्रण और परिवार की जीवन्तता को सामने लाता है। गीत का फीमेल गेज़ जो जूली की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है आज भी प्रासंगिक है । फिल्म के लिए लक्ष्मी को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का व नादिरा को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का पुरस्कार मिला ।  विक्रम मकंदार, नादिरा, रीता भादुरी, ओमप्रकाश, बाल कलाकार श्रीदेवी और उत्पल दत्त जैसे कलाकारों के प्रभावी अभिनय से सजी यह फ़िल्म जूली अपने समय से आगे जाकर समाज में स्त्री के संघर्ष और संभावनाओं की कहानी कहती है। समाज, संस्कृति, धर्म, विवाह, प्रेम, प्रगतिशीलता और स्त्री भावों की मार्मिक अभिव्यंजना का समावेश है ‘जूली’। विवाह, धर्म और नैतिकता के प्रश्नों पर समाज अब भी गहरी रूढ़ियों से बँधा हुआ था। इस मायने में आज भी यह फ़िल्म प्रासंगिक है। हम जानते हैं कि भारतीय समाज अभी भी अंतर्धार्मिक विवाह, स्त्री की स्वायत्तता और नैतिकता के सवालों से जूझ रहा है।  

सभी चित्र गूगल से साभार

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नीतीश के राज में महिलाओं का सशक्तिकरण या आंकड़ों का भ्रम?

पलायन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और अपराध के आंकड़ों पर नजर

नीतीश कुमार ने 2005 में सत्ता संभालने के साथ ही महिलाओं को केंद्र में रखकर राजनीति की नई पटकथा लिखी। पंचायत चुनावों में 50% आरक्षण, साइकिल योजना, पोशाक योजना और महिला स्वयं सहायता समूहों की शुरुआत करके एक बड़ी लकीर खींचने की कोशिश की। दसवीं, बारहवीं और ग्रेजुएशन पास करने पर प्रोत्साहन राशि का भी ऐलान किया। शराबबंदी का फैसला भी उन्होंने महिलाओं की मांग पर किया, जबकि इससे राज्य को राजस्व के रूप में भारी आर्थिक नुकसान होता रहा है। इसी साल जुलाई में मूल निवासी महिलाओं के लिए सरकारी नौकरियों में 35% आरक्षण को भी मंजूर किया गया है। जीविका दीदी योजना, दहेज़ के विरोध में विश्व की सबसे लम्बी मानव श्रृंखला और अब तक 1.21 करोड़ महिलाओं के खाते में रोजगार शुरू करने के लिए 10 हजार की रकम ट्रांसफर की जा चुकी है। लेकिन 2025 विधानसभा चुनाव से ठीक पहले लॉन्च हुई योजनाएं महिला सशक्तिकरण से ज्यादा चुनावी रणनीति होने की इसकी पुष्टि करते हैं।


नीतीश कुमार की योजनाओं की वाहवाही से अलग जमीनी पड़ताल कुछ और भी बयां करती है। मसलन, 2021 के पंचायत चुनाव के आकड़ों के आधार पर मौजूदा समय में बिहार में लगभग 1.10 लाख महिलाएं निर्वाचित हुईं है जो कुल प्रतिनिधियों का 55.35% है यानी 50 प्रतिशत के आरक्षण सीमा से भी ज्यादा। लेकिन सरपंच पति सिंड्रोम’ इसका दूसरा पक्ष और अलग चुनौती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 25% महिला सरपंच स्वतंत्र निर्णय लेती हैं। इससे स्पष्ट है कि निर्णय-क्षमता अभी भी पुरुष-प्रधान ढांचे में सीमित है।

बिहार में 2025, SIR के तहत जारी अंतिम मतदाता सूची में कुल 7.43 करोड़ मतदाता हैं जिनमें 48% यानी कुल 3.72 करोड़ महिलाएं हैं, यह संख्या पुरुषों (3.92 करोड़) से थोड़ा कम हैं, लेकिन पिछले वर्षों की तुलना में 15 लाख की वृद्धि हुई है। बिहार की महिलायें पुरुषों के मुकाबले ज्यादा वोट करती हैं, 2010 के चुनाव में 51.12% पुरुषों ने वोट किया था तो महिलाओं का वोट प्रतिशत 54.49 % था। 2015 के चुनाव में 53.32% पुरुष और 60.48% महिलाओं ने वोट किया था, 2020 विधानसभा चुनाव में 54.45 % पुरुषों के मुकाबले 59.69 % महिलाओं ने वोट किया, यानी पिछले 3 चुनावों में हर बार महिलाओं ने ज्यादा वोट किया है। बल्कि उत्तरी बिहार के 167 में से अधिकांश निर्वाचन क्षेत्रों में महिलाओं ने पुरुषों से अधिक वोट डाले। यह ट्रेंड 2015 से जारी है, जहां महिलाओं ने 202 निर्वाचन क्षेत्रों में अधिक भागीदारी दिखाई।


कुल मिलाकर आंकड़े यह बताने के लिए काफी हैं कि बतौर मतदाता महिलायें क्यों महत्वपूर्ण हैं। लेकिन, इन आंकड़ों के पीछे ये सवाल भी हैं कि क्या सिर्फ भागीदारी का बढ़ना सशक्तिकरण है? बिहार की महिलाओं की राजनीति में भागीदारी कितनी है, प्रतिनिधित्व और नेतृत्व के पदों पर कितनी है? कैबिनेट में कितनी है और प्रशासन में कितनी है ?
हकीकत ये है कि मौजूदा 243 सदस्यीय विधानसभा में साल 2020 के चुनाव के आंकड़ों के मुताबिक 24 महिलाएं हैं यानी मात्र 10% जबकि राष्ट्रीय औसत 14% है। और हर चुनाव के साथ हिस्सेदारी घटते क्रम में है मसलन 2005 में 37 महिलाएं थीं जो 15% था, 2010 में 27 यानी 11% फीसदी, और 2020 में 24 (10%) रह गई। ADR के विश्लेषण के अनुसार, महिलाओं की जीत का प्रतिशत लगातार कम हो रहा है, जबकि वे मतदान करने में आगे हैं।
बिहार कैबिनेट में महिलाओं की संख्या सीमित है। वर्तमान नीतीश कुमार सरकार (NDA) में कुल 31 मंत्रियों में 3 महिलाएं हैं ( केंद्रीय कैबिनेट राष्ट्रीय औसत 11% से कम लगभग 10%)। ये हैं, रेनू देवी,लेशी सिंह, शीला मंडल। 2022 के कैबिनेट विस्तार के बाद भी मंत्रिपद पर 3 महिलाओं को ही रखा गया।और वित्त या गृह जैसे प्रमुख विभाग उन्हें नहीं दिए जाते।

हालाँकि 2020 में JDUने कुल 115 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, इनमें से 22 महिलाओं को टिकट दिया गया था। यानि महिला उम्मीदवारों का प्रतिशत लगभग 19.13% था, जो JDU का उच्चतम स्कोर कहा जा सकता है और नीतीश कुमार की महिलाओं के प्रति प्रतिबद्ध नीति को दर्शाता है, लेकिन राज्य स्तर पर कुल उम्मीदवारों में महिलाओं की संख्या केवल 3% थी। राजनीति में महिलाओं की भागीदारी के सन्दर्भ में इसका जिक्र उल्लेखनीय है और समग्रता में पिछले 20 साल में बिहार में महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण की असली तस्वीर रखता है।


इसी तरह बिहार कैडर में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम है। राज्यवार भर्ती में बिहार से 16% महिला IAS अधिकारी आती हैं, राष्ट्रीय औसत 30% है। कुल बिहार कैडर लगभग 350 IAS में महिलाओं की संख्या 50-60 यानि 15-17% अनुमानित है। वर्तमान जिलाधिकारियों (DM) में केवल 8% महिलाएं हैं (38 जिलों में 3-4 महिलाएं)। अंडमान-निकोबार, जम्मू-कश्मीर, दादरा नगर हवेली को छोड़ दें तो विधायिका से लेकर उच्च प्रबंधकीय पदों तक बिहार की महिलाएं ही सबसे कम संख्या में केवल 7.8 % तक ही पहुंच रहीं है, जबकि राष्ट्रीय औसत 22.2% का है। हाँ पुलिस बल में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 29 % तक है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी ऊपर है।

2006 में जीविका योजना, ग्रामीण महिलाओं के SHG के माध्यम से आर्थिक सशक्तिकरण के लिए शुरू हुई। इसके तहत 11 लाख SHG बने और 1.40 करोड़ महिलाएं जुड़ीं; 2025 तक के आंकड़े के मुताबिक इसके मार्फ़त अब तक ₹12,200 करोड़ बैंक लोन दिया गया लेकिन रिकवरी का आंकड़ा ₹5,000 ही करोड़ है और 10 लाख SHG का लक्ष्य ही हासिल हुआ है। इण्डिया टुडे की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक बिहार की 1.09 करोड़ महिलाओं ने माइक्रोफाइनेंस कंपनियों से औसतन 30 हजार रुपए का कर्ज ले रखा है। और पिछले डेढ़ साल में बीस से अधिक लोगों ने इस कर्ज के जाल में फंस कर खुदकुशी कर ली है। इस तस्वीर को CPIML से संबद्ध ऐपवा की महिला साथियों के द्वारा निर्मित डॉक्यूमेंटरी “क़र्ज़ फांस” भी सामने लाती है,मीडिया में प्रचलित नीतीश कुमार की महिला पक्षधर छवि से अलग जो बताती है कि गरीबी, माइक्रोफाइनेंस कंपनियों की लूट और कर्ज के जाल में फंसी बिहार की गरीब महिलाओं सरकार की बेरुख़ी के कारण कर्ज़ के दलदल में हैं, आत्महत्याएं कर रही हैं, उनका परिवार रातों रात अपना गांव -घर छोड़कर निकल जा रहा है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2021) बताता है कि बिहार में केवल 25% महिलाएं ही किसी प्रकार की निजी आय अर्जित करती हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत करीब 43% है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक महिलाओं के लिए बेरोजगारी के मामले में देश में पटना शीर्ष पर है।

बिहार आर्थिक सर्वे 2024–25 के अनुसार बिहार का क्रेडिट-डिपॉजिट (सीडी) अनुपात सिर्फ 47.6% है, जो पूरे देश में सबसे कम है। इसका मतलब यह है कि बिहार के बैंकों में जितना पैसा जमा होता है, उसका बहुत छोटा हिस्सा ही बिहार में ऋण के रूप में वापस आता है। बाकी पैसा दूसरे राज्यों में निवेश या उधार के रूप में चला जाता है और वहीं की अर्थव्यवस्था को मज़बूत करता है। बिहार में अंतरराज्यीय पलायन पूरे भारत की तुलना में पाँच गुना ज्यादा है, यानी यहाँ बुनियादी रोजगार के मौके भी नहीं हैं। बिहार में महिलाओं के लिए श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) राष्ट्रीय औसत से काफी कम है, जिसका मतलब है कि बहुत कम महिलाएँ श्रम बल का हिस्सा हैं या नौकरी की तलाश कर रही हैं। 2022-23 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, बिहार में पुरुष एलएफपीआर 70.6% है जबकि महिला एलएफपीआर केवल 15.6 % और कुल एलएफपीआर 43.4%है, जो राष्ट्रीय औसत 56.0% से बहुत कम है। पुरुष और महिला भागीदारी दर के बीच का अंतर बहुत अधिक है, कामकाजी आबादी में महिलाओं का अनुपात बिहार में सबसे कम है।

बिहार में 15 से 29 आयु वर्ग के करीब एक तिहाई लोग शिक्षा, रोजगार या ट्रेनिंग से नहीं जुड़े हुए हैं। इस मामले में महिलाओं की स्थिति ज्यादा चिंताजनक है। इस आयु वर्ग की आधी से ज्यादा महिलाएं इनसे महरूम हैं। बिहार की वार्षिक बेरोजगारी दर 3.9% राष्ट्रीय औसत 3.2 %से थोड़ी अधिक है। नीतीश के शासनकाल में GSDP में औसतन 10% वृद्धि दर रही, लेकिन बेरोजगारी दर 12% (CMIE, 2024) तक जा पहुँची। दूसरी ओर एक हकीकत ये भी है कि बिहार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड के तहत ₹4 लाख तक का लोन लेने वाले लगभग 55 हजार छात्र गायब हो गए हैं, जिस पर सरकार मुकदमा करने की योजना बना रही है। जबकि कितनी लड़कियां स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड के तहत लोन लेकर पढ़ाई करती हैं इसका कोई आंकड़ा ही उपलब्ध नहीं है। इण्डिया टुडे की ही रिपोर्ट के मुताबिक बिहार की लगभग 83 % महिलाएँ स्वरोजगार में हैं नियमित वेतनभोगी लगभग 4.8 % ही हैं। स्वरोजगार का सच आप सब जानते हैं, एशियन रिव्यु ऑफ़ सोशल साइंस के एक सर्वें में बिहार में ग्रामीण महिला-पुरुष आय असमानता 58 % है बिहार 27वें स्थान पर है हाँ शहरी महिला-पुरुष आय असमानता 11.53 प्रतिशत है और बिहार 10वें स्थान पर है। नीति आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 2012-13 और 2021-22 के बीच बिहार का वास्तविक जीएसडीपी औसतन 5.0 प्रतिशत की दर से बढ़ा, लेकिन राष्ट्रीय औसत वृद्धि दर 5.6 प्रतिशत से कम ही रहा। यही नहीं पिछले तीन दशकों के दौरान, राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद में बिहार का हिस्सा 1990-91 में 3.6 प्रतिशत से घटकर 2021-22 में 2.8 प्रतिशत हो गया। 2021-22 में इसकी प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय प्रति व्यक्ति आय का केवल 30 प्रतिशत थी। अब समझा जा सकता कि बिहार से बड़े पैमाने पर पलायन क्यों हुआ है, 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 74.54 लाख लोग राज्य से बाहर हैं, जो राज्य-जनसंख्या का लगभग 7.2 % है।ग्रामीण बिहार में लगभग 18.8 % आबादी ‘माइग्रेंट’ है एवं इनमें 85.2 % पुरुष हैं।

कुछ और मानकों पर भी देखें तो 2023 में राष्ट्रीय प्रजनन दर जहाँ प्रति महिला 1.98 है वहीँ बिहार में प्रजनन दर 2.8 है यानी राष्ट्रीय औसत से अधिक। पूर्ण टीकाकरण वाले बच्चों की हिस्सेदारी, 71 प्रतिशत, भी 2019-21 के राष्ट्रीय औसत 93.5% से कम है। साक्षरता दर 61.8 प्रतिशत है, जो 2011 के राष्ट्रीय औसत 73 प्रतिशत से काफी कम है। लेकिन महिलाओं के मामले में प्रदर्शन और ख़राब है, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2020-21) के आकड़ों के मुताबिक महिलाओं की राष्ट्रीय औसत साक्षरता दर लगभग 70.30% है जबकि बिहार की महिलाओं की 51.50% ही। 5 से 49 वर्ष की महिलाओं की साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से 21.4 प्रतिशत अंक कम है। राष्ट्रीय औसत 40.7 से काफी कम महज 27.8% ही महिलाएं आठवीं या दसवीं पास हैं। तकनीकी दक्षता के आधार पर रोजगार के मामले में भी बिहार की महिलाएं देश में सबसे पीछे हैं 100 में मात्र 32 महिलाओं को ही टेक्निकल काम मिल पाता है। बिहार में ग्रेजुएट या पोस्ट ग्रेजुएट की डिग्री रखने वाली मात्र 0.4% महिलाओं को ही काम मिल पा रहा है. यह देश में सबसे कम है, राष्ट्रीय औसत 2.4% का है। इसी तरह आर्थिक स्वतंत्रता के संदर्भ में महिला श्रम-भागीदारी में हिस्सेदारी भी बिहार में देश में सबसे कम है, देश का आंकड़ा 25 % – 27 % है और बिहार का 12 % – 15 %। महिलाओं की अनुमानित औसत वार्षिक आय देश स्तर पर जहाँ ₹ 1,03,000 है वहीँ बिहार की महिलाओं की ₹ 33,000 – ₹ 35,000 सालाना।

udiseplus.gov.in के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में महिलाओं का GPI राष्ट्रीय से बेहतर (1.12 माध्यमिक पर) है, साइकिल योजना आदि से नामांकन बढ़ा। उच्च शिक्षा में महिलाओं का नामांकन 49.2% (UG/PG) पहुंचा। लेकिन माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट 25.6% (राष्ट्रीय 14.1%) है, ट्रांजिशन रेट 31.5% (राष्ट्रीय 75.1%)है। उच्च शिक्षा GER 14.9% (राष्ट्रीय 28.4%), ग्रामीण क्षेत्र, गरीबी और बाल विवाह के कारन 24.5% लड़कियां 7-18 वर्ष में ड्रॉपआउट से प्रभावित होती है। कुल नामांकन में 87 लाख की गिरावट (2023-24), बिहार में सबसे अधिक रहा है। NEP 2020 के तहत माध्यमिक स्कूलों की कमी का आंकड़ा बिहार में राष्ट्रीय 9.8% के मुकाबले 2% है।

लिंगानुपात की बात करें तो बिहार में 2022 में प्रति 1,000 लड़कों पर केवल 891 लड़कियों का जन्म हुआ था, जो पूरे देश में जन्म के समय का सबसे कम लिंगानुपात था। भारत के रजिस्ट्रार जनरल के कार्यालय की नागरिक पंजीकरण प्रणाली की रिपोर्ट के अनुसार, यह अनुपात 2020 में 964 था जो 2021 में घटकर 908 और 2022 में 891 हो गया है, यानी जन्म के समय लड़कियों की संख्या में पिछले तीन साल से लगातार गिरावट दर्ज की गई है। 2022 के नवीनतम आँकड़े में भी बिहार में प्रति 1,000 लड़कों पर 891 लड़कियों का लिंगानुपात है। राष्ट्रीय स्तर पर यह भारत के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जन्म के समय का सबसे कम लिंगानुपात रहा है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, 2010 से 2023 के बीच बिहार में महिला अपराधों में 40% की वृद्धि दर्ज की गई है। दहेज हत्या, घरेलू हिंसा और यौन अपराध अब भी गंभीर चुनौती बने हुए हैं। दहेज़ उत्पीड़न मामलों में बिहार उत्तर प्रदेश के बाद दूसरे स्थान पर है यूपी में इसकी संख्या 7151 है, बिहार में 3665 तक। और दहेज़ हत्या के मामले में भी एनसीआरबी रिपोर्ट कहती है कि साल 2023 में कुल 6156 महिलाओं की जान गई। इसमें उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 2122 मौतें हुईं। बिहार दूसरे नंबर पर रहा, जहां 1143 मौतें दर्ज की गईं। और यूनिसेफ की 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में 2.2 करोड़ लड़कियों की शादी 18 साल से पहले होती है और नाबालिग लड़कियों के विवाह के मामले में बिहार का स्थान उत्तर प्रदेश के बाद है। NCRB की रिपोर्ट के मुताबिक ही वर्ष 2023 में पटना में अपहरण दर सबसे अधिक 71.3 प्रतिशत रहा। हत्या और अपहरण के मामलों में उत्तर प्रदेश और बिहार टॉप पर रहे। हत्या के दर्ज मामलों में देशभर में सबसे अधिक हत्याएं उत्तर प्रदेश में हुई। जबिक दूसरे नंबर पर बिहार राज्य रहा। 2018-22 में महिला-विरुद्ध अपराध के लगभग 89,038 मामले दर्ज हुए जो सीधे16.3 % का इजाफा है। यानी नीतीश ने केवल “सुरक्षित समाज” का नारा दिया, आंकड़े बताते हैं कि सुरक्षा का अनुभव आम नागरिक तक नहीं पहुंच पाया।
बिहार के इस चुनावी माहौल में लगातार 2005 से पहले के जंगलराज की बात की जा रही है, और नितीश कुमार धराधर महिलाओं के लिए योजनाओं और पैसों की बरसात कर रहे हैं। जबकि तस्वीर का दूसरा पहलू कुछ और है, हाँ ये जरूर है कि उन्होंने महिलाओं के लिए जो अच्छा किया उसे ख़ारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन ये भी सच है कि 2025 चुनाव में खुद उन्हें अपने काम या रिपोर्टकार्ड पर भरोसा नहीं है, आत्मविश्वास की कमी ने ही इस बार JDU – BJP की डबल इंजन सरकार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार को रेवड़ियों पर ला दिया। इसलिए 23 योजनाओं से महिला वोटरों को साधने की कोशिश की है। देखते हैं महिलाएं कितना आकर्षित होती हैं।
राजद समाचार से समाचार

 “स्पंदन सम्मान, 2025” फ़िल्म और रंगमंच में अभिनय के लिए विभा रानी को मिलेगा ‘ललित कला सम्मान’

अपनी ताज़ातरीन फिल्म “माँ” में पुरोहिता की भूमिका से चर्चित अभिनेत्री, रंगकर्मी तथा मैथिली और हिंदी की साहित्यकार, अनुवादक और नाट्य-लेखक विभा रानी को “स्पंदन ललित कला सम्मान, 2025” से सम्मानित किया जा रहा है। यह सम्मान उन्हें उनके नाटकों और फिल्मों में उत्कृष्ट अभिनय के लिए प्रदान किया जाएगा।

27 जून, 2025 को देशभर के थिएटरों में रिलीज़ देवगन फिल्म्स की काजोल स्टारर फिल्म “माँ” में विभा रानी की पुरोहिता की प्रभावशाली भूमिका ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान दिलाई है। अब यह फ़िल्म नेटफ्लिक्स पर भी उपलब्ध है, जहाँ इसे देश-विदेश के दर्शक देख रहे हैं। अंग्रेज़ी सबटाइटल्स के कारण विदेशी दर्शकों तक भी यह फ़िल्म पहुँची है, और विभा रानी को प्रशंसा व सराहना के असंख्य संदेश मिल रहे हैं।

विभा रानी कहती हैं-“सच पूछिए तो फिल्मों में काम करना, और खासकर माँ  फिल्म में काजोल जैसी सुपरस्टार के साथ अभिनय करना, मेरे लिए बचपन के स्वप्न के साकार होने जैसा अनुभव रहा।”

विभा रानी की फ़िल्मी यात्रा वर्ष 2018 में नवदीप सिंह निर्देशित फिल्म “लाल कप्तान” से शुरू हुई, जिसमें उन्होंने ‘लाल परी’ का किरदार निभाया था। इसके बाद उन्होंने शमशेरा, अनवांटेड, ए ब्रोकन स्टोरी, सजनी शिंदे का वायरल वीडियो, मॉनसून फुटबॉल, भोर, वेब सीरीज़ महारानी 1, ताज 2, ताज़ा खबर (1 और 2), तथा धारावाहिक अवंतिका, एकलव्य, टिकुली आदि में यादगार भूमिकाएँ निभाईं।

इसके पहले उन्होंने ‘फिल्म्स डिविज़न’ के लिए भारतेंदु हरिश्चंद्र और जयशंकर प्रसाद पर दो फ़िल्में लिखीं।सीमा कपूर के मेगा सीरियल ‘अवंतिका’ के चालीस से अधिक एपिसोड्स के लिए संवाद लेखन किया। नितिन चंद्रा की राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फ़िल्म ‘मिथिला मखान’ के लिए दो गीत लिखे तथा कामाख्या नारायण सिंह की बहु-पुरस्कृत फ़िल्म ‘भोर’ में वोकल दिया। साथ ही ‘पाथेर पांचाली’ की मैथिली डबिंग में “बुआ” के किरदार की आवाज़ भी दी।

वर्तमान में वे नेटफ्लिक्स और अमेज़न प्राइम जैसी ओटीटी प्लेटफॉर्म्स की फिल्मों व वेब सीरीज़ के लिए भी डबिंग का कार्य कर रही हैं।

विभा रानी का मानना है कि-“लेखन, अनुवाद, नाट्यलेखन, सोलो मंचन, मोटिवेशनल स्पीकिंग और POSH Enabler के रूप में सक्रिय रहते हुए भी फिल्मों में अपनी पहचान बनाना संभव है, क्योंकि लेखन से लेकर अभिनय तक हर विधा एक-दूसरे की पूरक है।”

उनके अनुसार, फ़िल्म क्षेत्र में मिला यह “स्पंदन ललित कला सम्मान 2025” इस विश्वास को और सुदृढ़ करता है कि रचनात्मकता की कोई उम्र नहीं होती; रचनारत व्यक्ति न तो बूढ़ा होता है, न ही रिटायर।

भविष्य में विभा रानी के कई नए प्रोजेक्ट्स – फिल्में, सीरीज़ और धारावाहिक – आने वाले हैं। वे कहती हैं,

“आप सबका स्नेह और सहयोग ही मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा है।”
विभा स्पष्ट करती हैं कि फिल्मों में सक्रियता का अर्थ यह नहीं कि उन्होंने साहित्य को अलविदा कह दिया है। उनके शब्दों में-“अभिनय, लेखन और प्रस्तुति – ये मेरे लिए हृदय, फेफड़े और मस्तिष्क की तरह हैं; इनके बिना अपने अस्तित्व की कल्पना भी नहीं कर सकती।”

खनकते स्वर में वे बताती हैं कि जब उर्मिला शिरीष जी का फोन उन्हें बधाई देने आया, तो उन्हें लगा कि यह बधाई उनके नाती अकीरा नूर के जन्म की खुशी में दी जा रही है, क्योंकि उस समय अकीरा उनकी गोद में था। विभा कहती हैं-“अकीरा के शरीर का स्पंदन मेरे शरीर के साथ मिल रहा था। उसी स्पंदन में उर्मिला जी के स्वर, स्नेह और उनके शब्द – ‘मुझे आपका काम हमेशा आकर्षित करता रहा है। आज इस सम्मान की घोषणा करते हुए मुझे बेहद खुशी हो रही है।’ मुझे और भी स्पंदित कर गए।”

विभा रानी बताती हैं कि स्पंदन संस्था की शुरुआत से ही वह उन्हें आकर्षित करती रही है “शायद इसलिए कि इसे उर्मिला जी जैसी जागरूक और संघर्षशील लेखिका ने प्रारंभकिया। मुझे लगता है कि स्त्रियों के हर रचनात्मक कार्य से उनकी सृजनात्मकताऔर भी ऊर्जस्वित होती है।” 

भोपाल से घोषित इस सम्मान को लेकर वे भावुक होकर कहती हैं-

“भोपाल मेरा प्रिय स्थल रहा है। यहाँ आना हमेशा अपने दूसरे घर आने जैसा लगता है। इस शहर की सजीव सांस्कृतिक हलचल और आत्मीय लोग हर बार मन को छू जाते हैं। मैंने यहाँ अपने एकल नाटक नौरंगी नटनी का मंचन भी किया है, बालेंदु सिंह ‘बालू’ के थिएटर फेस्टिवल में।”

लड़की और चाँद

बॉडी शेमिंग पर संदीप तोमर की कविता “लड़की और चाँद “बॉडी शेमिंग जबकि किसी व्यक्ति को उसके शरीर के आकार और बनावट के बारे में अपमानजनक ढंग से मज़ाक बनाया जाता है| विशेषकर लड़कियों के सन्दर्भ में जबकि  उन पर अच्छा दिखने का दबावहमेशारहता है और खरा न उतरने पर उन्हें भावनात्मक आघात हो सकते हैं उन्हें मानसिक रूप से कमजोर बनाता है| भाई-बहन,दोस्त,सहेलियों के साथ-साथ, माता-पिता भी इस व्यवहार में शामिल हो सकते हैं ।   

अब भी शरीर से बेडौल हो गयी लड़कियां

पहनती हैं ढीले और हल्के रंग के वस्त्र

अब भी वे चलती हैं नज़रें नीची करके
उनके कंधे भी झुके होते हैं नज़रों से भी कहीं अधिक

अब भी कोई हमउम्र नहीं देखता उनके लिए सपने
उनके हिस्से नहीं आया है प्रेमी का सुख

अब भी वे नहीं हंस पाती हैं खिलखिलाकर
दब जाती हैं उनकी हंसी उनके वजन के बोझ तले

अब भी उनकी सखी-सहेलियां देती हैं ताने
नहीं करती शामिल उनको अपनी हँसी ठिठोली में

बहुत कुछ बदला है इन सालों में
नहीं बदली है स्थूलकाय लड़कियों के लिए दुनिया

मनुष्य जरूर पहुंचा है चाँद और मंगल पर
लेकिन नहीं बदली उसकी सोच शरीर को लेकर।

चित्र गूगल से साभार

सन्दीप तोमर

साहित्यकार

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सभी शैक्षणिक संस्थानों पर लागू होता है मातृत्व लाभ कानूनः NCW

राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने वाराणसी स्थित सनबीम वीमेंस कॉलेज वरुणा को को सात दिनों के अंदर मातृत्व लाभ मुहैया कराने का दिया आदेश।
कहा- मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के अनुसार मातृत्व लाभ प्रत्येक शैक्षणिक संस्थान पर लागू होता है, क्योंकि यह प्रत्येक महिला का मूलाधिकार है।

नई दिल्ली/वाराणसी। कानून के तहत कामकाजी महिलाओं को वेतनयुक्त छह महीने का मातृत्व अवकाश मुहैया नहीं कराने के मामले में सनबीम समूह को राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) से झटका लगा है। राष्ट्रीय महिला आयोग ने सनबीम समूह के वाराणसी स्थित सनबीम वीमेंस कॉलेज वरुणा को सात दिनों के अंदर शिकायतकर्ता को मातृत्व लाभ देने का आदेश दिया है।
आयोग की सदस्य एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अर्चना मजूमदार ने बुधवार को जारी अपने आदेश में लिखा है, “मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के अनुसार मातृत्व लाभ प्रत्येक शैक्षणिक संस्थान में लागू होता है, क्योंकि यह प्रत्येक महिला का एक मौलिक अधिकार है।”

आयोग के इस आदेश के बाद उत्तर प्रदेश के निजी शैक्षणिक संस्थानों में कार्यरत महिलाओं के लिए वेतनयुक्त छह महीने के मातृत्व अवकाश का रास्ता खुल गया है। संभवतः यह राज्य का पहला मामला है जिसमें किसी आयोग या न्यायालय ने किसी निजी शैक्षणिक संस्था में कार्यरत महिला कर्मचारी को छह महीने का मातृत्व लाभ प्रदान करने का आदेश दिया है। प्रदेश में संचालित निजी शैक्षणिक संस्थान अपने यहां कार्यरत शिक्षकाओं एवं शिक्षणेत्तर महिला कर्मचारियों को वेतनयुक्त छह महीने का मातृत्व अवकाश नहीं देते हैं। सनबीम समूह अपने यहां कार्यरत और कर्मचारी राज्य बीमा निगम के प्रावधानों से आच्छादित महिला कर्मचारियों को भी वेतनयुक्त छह महीने का मातृत्व लाभ मुहैया नहीं कराता है।
बता दें कि सनबीम वीमेन्स कॉलेज वरुणा में 15 दिसम्बर 2021 से पुस्तकालयाध्यक्ष के रूप में कार्यरत संगीता प्रजापति ने पिछले साल 2 अगस्त को एक बच्चे को जन्म दिया था। उन्होंने उत्तर प्रदेश शासन के शासनादेशों और यूजीसी रेगुलेशन-2018 समेत मातृत्व लाभ कानून में उल्लिखित प्रावधानों के तहत महाविद्यालय प्रशासन से वेतनयुक्त छह महीने का मातृत्व अवकाश मांगा था लेकिन उसने उनके अनुरोध को यह कहकर खारिज कर दिया कि वह एक स्ववित्तपोषित निजी संस्थान है और उस पर मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के प्रावधान लागू नहीं होते हैं। साथ ही उसने संगीता प्रजापति को कानूनी प्रावधानों में उल्लिखित छह महीने के मातृत्व अवकाश के बाद नौकरी पर वापस लेने से भी मना कर दिया था।

संगीता प्रजापति ने महाविद्यालय प्रबंधन के आदेश को पहले क्षेत्रीय श्रम प्रवर्तन अधिकारी सुनील कुमार द्विवेदी और अपर श्रमायुक्त/उप श्रमायुक्त डॉ. धर्मेंद्र कुमार सिंह के समक्ष चुनौती दी। उन्होंने माना कि सनबीम वीमेन्स कॉलेज वरुणा पर मातृत्व लाभ कानून के प्रावधान लागू होते हैं। क्षेत्रीय श्रम प्रवर्तन अधिकारी सुनील कुमार द्विवेदी ने गत 7 फरवरी को लिखित रूप से सनबीम वीमेन्स कॉलेज वरुणा को संगीता प्रजापति के मातृत्व हित लाभ की देयता सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था लेकिन महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. राजीव सिंह और प्रशासक डॉ. शालिनी सिंह समेत उसके प्रबंधन तंत्र ने पीड़िता को मातृत्व लाभ मुहैया नहीं कराया और ना ही उसे नौकरी पर वापस लिया।
पीड़िता ने इसकी शिकायत उत्तर प्रदेश शासन के श्रमायुक्त मार्कण्डेय शाही, श्रम मंत्री डॉ. अनिल राजभर, जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ की कुल-सचिव डॉ. सुनीता पाण्डेय, कुलपति ए.के. त्यागी, क्षेत्रीय उच्च शिक्षाधिकारी डॉ. ज्ञान प्रकाश वर्मा से भी लिखित रूप में की लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी इनमें से किसी ने भी कोई कार्रवाई नहीं की और ना ही पीड़िता की शिकायत के संदर्भ में उसे कोई सूचना देना मुनासिब समझा।
उत्तर प्रदेश सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था से निराश संगीता प्रजापति ने गत 6 अगस्त को राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य डॉ. अर्चना मजूमदार से न्याय की गुहार लगाई। उनकी पहल पर आयोग ने 8 अगस्त को उच्च शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव महेंद्र प्रसाद अग्रवाल को नोटिस जारी कर पूरे प्रकरण पर कार्रवाई रिपोर्ट (एटीआर) तलब की लेकिन दो महीना बीत जाने के बाद भी उन्होंने आयोग या शिकायतकर्ता को किसी कार्रवाई की कोई सूचना नहीं दी। आयोग की सदस्य डॉ. अर्चना मजूमदार ने गत 7 अक्टूबर को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए इस मामले पर सुनवाई की। सुनवाई में शिकायतकर्ता संगीता प्रजापति शामिल हुईं। वहीं, सनबीम वीमेन्स कॉलेज वरुणा की ओर से प्राचार्य डॉ. राजीव सिंह, प्रशासक डॉ. शालिनी सिंह और महाविद्यालय के लीगल हेड एवं अधिवक्ता देवेश त्रिपाठी शामिल हुए।
आयोग की सुनवाई के बारे में पूछे जाने पर पीड़िता संगीता प्रजापति ने कहा, “मैं राष्ट्रीय महिला आयोग की सुनवाई से बहुत खुश हूं लेकिन नौकरी पर वापसी से संबंधित कोई सूचना नहीं होने से थोड़ी निराशा भी है। हालांकि अभी आयोग का अंतिम फैसला आना बाकी है, इसलिए इस पर विचार होने की पूरी संभावना है। मैं माननीय डॉ. अर्चना मजूमदार मैम की आभारी हूं कि उन्होंने मेरे अनुरोध का संज्ञान लेकर इस पर सुनवाई की और न्याय के पक्ष में खड़ी हुईं। मुझे पूरा विश्वास है कि राष्ट्रीय महिला आयोग से मुझे न्याय मिलेगा। मैं उन सभी लोगों को धन्यवाद देना चाहती हूं जो न्याय की इस लड़ाई में मेरा सहयोग कर रहे हैं। यह केवल मेरी लड़ाई नहीं है। यह उन सभी कामकाजी महिलाओं की लड़ाई है जिन्हें मातृत्व लाभ के उनके मूलाधिकार से वंचित किया जा रहा है।”

अडानी पावर प्रोजेक्ट नया रोजगार नहीं देगा,बल्कि मौजूदा रोजगार छीन लेगा: दीपंकर

भाकपा-माले महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य के नेतृत्व में पार्टी की एक उच्चस्तरीय जांच टीम 2 अक्टूबर को भागलपुर जिले के पीरपैंती का दौरा कर वहां की स्थिति का निरीक्षण किया. टीम ने उन किसानों से विस्तृत बातचीत की जिनकी जमीन पावर प्लांट के नाम पर अधिग्रहित की जा रही है. जांच दल में घोषी विधानसभा से विधायक रामबली सिंह यादव, पूर्व विधायक मनोज मंजिल तथा स्थानीय नेता महेश यादव, रणधीर यादव,गौरीशंकर और रिंकु यादव सहित भाकपा-माले,इंडिया गठबंधन और नागरिक समाज के कई प्रतिनिधि शामिल थे. जांच दल ने पीरपैंती नगर पंचायत के सुंदरपुर और कमालपुर गांवों के किसानों से लंबी चर्चा की और उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुना.

गांधी की प्रतिमा पर माल्यार्पण
पीरपैंती प्रस्थान करने से पूर्व भाकपा-माले महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर गांधी विचार विभाग पहुंचे और गांधी की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया.उन्होंने कहा कि गांधी लूट,झूठ,गुलामी और नफरत के खिलाफ संघर्ष के प्रतीक हैं.इस मौके पर डॉ.के.के. मंडल,डॉ.मनोज दास,डॉ.संजय रजक सहित विश्वविद्यालय के कई एक शिक्षक,छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद थे.

कटाव पीड़ितों की समस्याओं से भी हुए रूबरू
पीरपैंती जाने के क्रम में गंगा कटाव पीड़ितों ने भी अपनी व्यथा सुनाई. कहलगांव प्रखंड के किसनदासपुर पंचायत के रानी दियारा के 2 वार्ड (वार्ड नंबर 12 एवं 13) और पीरपैंती के रानी दियारा पंचायत के रानी दियारा गांव के 10 वार्ड 2016 में ही गंगा में बह गए. ये सभी लोग पिछले 10 साल से रेलवे की जमीन पर रह रहे हैं, लेकिन अभी तक इनका स्थायी पुनर्वास नहीं हो सका है. कई लोगों ने शिकायत की कि उनका नाम वोटर लिस्ट से काट दिया गया.कॉ.दीपंकर भट्टाचार्य ने सरकार से इन सभी लोगों का तत्काल स्थायी पुनर्वास करने की मांग की.

माले महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य ने पीरपैंती के सुंदरपुर और कमालपुर गांव के किसानों से लंबी चर्चा के बाद कहा है कि पीरपैंती की उपजाऊ ज़मीन 1 रुपये प्रति एकड़, अडानी को सौंपना – किसानों की रोज़ी-रोटी, बागानों और पर्यावरण पर सीधा हमला है।किसान कह रहे हैं: नया रोज़गार नहीं मिलेगा, बल्कि मौजूदा रोज़गार छिन जाएगा। यह विकास नहीं, विनाश का सौदा है।कमालपुर टोले में विस्थापित होने वाले परिवारों का आरोप है कि इतने कम मुआवजा में वे कहां जमीन खरीदेंगे? सरकार उन्हें मकान बनाकर जमीन के बदले जमीन दे. यहां तकरीबन 64 घर विस्थापित किये जाएंगे, उन्हें लगातार नोटिस भेजी जा रही है.
माले महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि बिहार में चुनाव नजदीक है. चुनाव से पहले अडानी को 1 रुपये की सालाना दर से 1050 एकड़ जमीन पावर प्लांट के नाम पर लीज पर दी जा रही है. पूरे इलाके में लाखों पेड़ काटे दिए जाएंगे. पावर प्लांट का सब्जबाग दिखाकर सच्चाई छुपाई जा रही है. लोग बताते हैं कि उन्हें पहले से ही रोजगार मिल रहा है – आम के बगीचे लाखों परिवारों को आजीविका प्रदान करते हैं. जिनके पास जमीन है और जिनके पास नहीं है – दोनों को यहाँ रोजगार मिलता है. इतनी बड़ी संख्या में लोगों को उनकी जमीन, रोजगार और आजीविका से बेदखल करके अडानी को लाभ पहुँचाना मोदी व नीतीश सरकार की साजिश है.

उन्होंने कहा कि किसानों ने जिला प्रशासन से यह अपील की थी कि उपजाऊ जमीन की बजाय बगल की एकफसला जमीन को अधिग्रहण किया जाए ताकि नुकसान कम हो. बाद में वे उच्च न्यायालय गए लेकिन कोर्ट ने इस मामले में अजीब फैसला दिया गया. कोर्ट ने कहा कि सरकार किसानों से पूछ कर जमीन खरीदेगी क्या? तो यह पहला अन्याय था वहाँ के किसानों के साथ.

यहां 40-50 साल के पुराने पेड़ मौजूद हैं. लेकिन प्रशासन कहता है कि ये पेड़ 2011 के बाद लगाए गए. अब मोदी जी से यह सवाल करना होगा कि वे माँ के नाम पर पेड़ लगाते हैं या अडानी के नाम पर पेड़ कटवाते हैं? अडानी का पावर प्रोजेक्ट नया रोजगार नहीं देगा, बल्कि मौजूदा रोजगार छीन लेगा और पूरे इलाके की हवा, पानी और जमीन को जहरीला बना देगा.

उन्होंने आगे कहा कि भाजपा के स्थानीय विधायक लोगों को डराकर विरोध न करने के लिए दबाव डाल रहे हैं और कह रहे हैं कि विरोध करने पर लोगों को जेल में डाल दिया जाएगा. इसके उद्घाटन के दिन मुखिया दीपक सिंह को जेल भेज दिया गया था और कई लोगों को नजरबंद कर दिया गया था. किसानों पर जमीन खाली कराने का दबाव डाला जा रहा है. इस तरह के डराने-धामकाने की साजिश का जवाब दिया जाएगा.

उन्होंने कहा कि कहलगाँव में एनटीपीसी का पावर प्लांट पहले से है, जहां जमीन गंवाने वाले बहुत कम लोगों को रोजगार मिला है. लोग प्रदूषण की मार झेल रहे हैं. गोड्डा की भी ऐसी ही स्थिति है – वहां कोयला ऑस्ट्रेलिया से आता है और बिजली बांग्लादेश को जाती है. झारखंड के लोगों को भी कुछ नहीं मिला. पूरे इलाके को खनन-ऊर्जा परियोजनाओं के माध्यम से घेर कर बर्बाद करने की योजना चल रही है. यहां कोल ब्लॉक और गैस पाइप लाइन की भी चर्चा चल रही है.पीरपैंती की उपजाऊ जमीन अडानी को सौंपना विकास नहीं, विनाश का सौदा है. यह सौदा किसानों की खेती, बागानों और पूरे इलाके की जिन्दगी पर सीधा हमला है.

जांच में सामने आए प्रमुख बिन्दु

  1. एनटीपीसी के नाम पर 2010 में 7 पंचायतों की जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई. अचानक 15 वर्षों के बाद यह जमीन अडाणी को दे दी गई. किसानों का कहना है कि जमीन उन्होंने बिहार सरकार को दी थी अडाणी को नहीं.
  2. मुआवजे में तीन तरह की अनियमितताएं हैं. (क) एक ही मौजा, खाता, खेसरा की जमीन के लिए अलग-अलग दर पर मुआवजा दिया गया है. (ख) जिन किसानों ने जमीन खरीदी थी लेकिन कागज नहीं बना पाए थे, उन्हें मुआवजा नहीं मिल रहा. मामला कोर्ट में लंबित है (ग) कई लोगों को कोई भी मुआवजा नहीं मिला है. मुआवजे में ताकतवार लोगों को फायदा पहुंचाने की कोशिश की गई है जबकि गरीबों को सही से मुआवजा नहीं मिला.
  3. कमालपुर टोले में विस्थापित होने वाले परिवारों का आरोप है कि इतने कम मुआवजा में वे कहां जमीन खरीदेंगे? सरकार उन्हें मकान बनाकर जमीन के बदले जमीन दे. यहां तकरीबन 64 घर विस्थापित किये जाएंगे, उन्हें लगातार नोटिस भेजी जा रही है.
  4. आम के बगीचे साल में 7 महीने लाखों लोगों के रोजगार का माध्यम है. इन सभी लोगों की आजीविका का साधन छीन जाएगा.
  5. पहले से कार्यरत कहलगांव, गोड्डा और अब पीरपैंती का पावर प्लांट पूरे इलाके के पर्यावरण को नष्ट कर देगा.

भाकपा-माले के उच्चस्तरीय जांच टीम के पीरपैंती दौरा में
भागलपुर से एसके शर्मा,सामाजिक न्याय आंदोलन(बिहार) के राज्य अध्यक्ष रामानंद पासवान,संयुक्त सचिव अर्जुन शर्मा,बहुजन स्टूडेंट्स यूनियन(बिहार) के सोनम राव,सोनू,आइसा के प्रवीण कुशवाहा,ऐपवा की आशा देवी भी शामिल थे.

-गौरी शंकर राय
जिला कमिटी सदस्य,भाकपा-माले

जगजीवन राम और उनका नेतृत्व पुस्तक सामाजिक संस्कारों में विन्यस्त करने को प्रेरित करती है

कर्मेन्दु शिशिर

पता नहीं क्यों बाबू जगजीवन राम जिन्हें प्यार से लोग बाबूजी कहते हैं को याद करने अथवा उन पर चर्चा करने को लेकर लोगों में एक हिचक बनी हुई रही।

यहाँ तक कि बिहार सरकार ने भी उनको उनके कद के अनुरूप प्रतिष्ठा न दी। यहाँ तक कि ललितनारायण मिश्र के नाम पर जिस तरह विश्वविद्यालय बिजनेस शिक्षा संस्थान और सरकारी भवनों का नामकरण हुआ उस तरह स्मृति-स्मारक बाबू जगजीवन राम के सम्मान में न बने। बेशक बाबू जगजीवन राम का योगदान और कद कहीं ज्यादा ऊँचा था। क्या इसके पीछे सरकारी-गैरसरकारी स्तर पर जातिवादी कुंठा थी। एक ऐसी कुंठा जो सवर्णों से पिछड़ों तक में पसरी हुई है।

यह कितनी बड़ी विडंबना है कि हमने एक ऐसा समाज बनाया कि दिवंगत महापुरुषों को भी उसी संकीर्ण नजरिये से देखा जाता है। वे सब जो सार्वजनिक व्यक्तित्व थे।  वे दिवंगत होकर भी जातिमुक्त नहीं रह जाते। वे पूरे समाज के पूर्वज नहीं बन पाते। हम उनमें से अपनी जाति के अनुसार चयन करते हैं और वर्त्तमान में अपनी सहूलियत के मुताबिक इस्तेमाल करते हैं। हम न उनके विचारों से प्रेरित हुए और न ही व्यक्तित्व से प्रभावित।

        ऐसे दौर में यह बेहद सुखद बात है कि बाबू जगजीवन राम की सम्यक और प्रामाणिक जीवनी के लिए इं0 राजेन्द्र प्रसाद जी ने बड़ी निष्ठा से चुपचाप अथक श्रम किया। उन्होंने उनके जीवन विचार और योगदान को लेकर जो बीहड़ शोध-यात्रा की है उसका मूर्त्त साक्ष्य है- ‘जगजीवन राम और उनका नेतृत्व’ नामक पुस्तक। हिन्दी पाठकीयता के मौजूदा अकाल को देखते हुए यह विस्मय होता है कि छपने के साथ ही इस जीवनी के आठ संस्करण हो चुके हैं और यह सिलसिला अब भी जारी है। इस पुस्तक के अंग्रेजी और बांग्ला भाषा संस्करण भी प्रकाशित हो चूके हैं। एक बार डॉ० रामविलास शर्मा ने कहा था कि जिनकी सायास उपेक्षा होती है, उनके पाठक जब परिदृश्य पर आते हैं तो वे अपने नायकों की पहचान करने में कोई कंजूसी नहीं करते। आज बाबू जगजीवन राम का एक विशाल पाठक वर्ग मौजूद है। यह बात सही है कि इं0 राजेन्द्र प्रसाद कोई पेशेवर लेखक नहीं हैं । मगर बाबूजी के इस जीवनी को इस रूप में लिखकर उन्होंने एक बड़े लेखक जैसा ही कार्य किया है।

            उनकी पुस्तक से गुजरते हुए यह बात बिलकुल स्पष्ट दिखती है कि उनका उद्देश्य एक ऐसी जीवनी लिखने का था जिसमें बाबू जगजीवन राम को लेकर जो लोगों’ में आधी-अधूरी धारणा बनी है या बनाई गई है वह दूर हो। उनका कोई वांग्मय उपलब्ध नहीं थी न कोई दस्तावेज सहित प्रामाणिक जीवनी उपलब्ध थी। उन पर लिखी जो सामग्री उपलब्ध थी वह एक तरह से औपचारिकता का निर्वाह भर था। राजेन्द्र प्रसाद जी न सिर्फ उनके बारे में फैली अनेक भ्रांतियों को दूर करना चाहते थे बल्कि उनकी इच्छा थी कि उनके व्यक्तित्व के विविध पक्ष उनके सामाजिक आर्थिक धार्मिक और राजनीतिक विचार और उनके द्वारा किए गए विभिन्न क्षेत्रों में योगदान को संपूर्णता में प्रस्तुत किया जाय। यह एक मुश्किल काम था क्योंकि इसके लिए दीर्घ शोध कार्य जरूरी था। इस जीवनी को पढ़ने के बाद यह बात पूरे विश्वास से कही जा सकती है कि इसमें वे बिलकुल सफल हुए हैं। राजेन्द्र प्रसाद जी सासाराम संसदीय क्षेत्र के निवासी और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के अपने छात्र जीवन से ही जगजीवन राम से जुड़े रहे । जिस कारण उन्हें बाबूजी के क्रियाकलाप और राजनैतिक सफर की गुत्थियों की ज्यादा समझदारी रही। इसलिए राजेन्द्र प्रसाद जी ठोस और प्रामाणिक सामग्री की तलाश-उनके जीवन के लंबे कार्यकाल में जुड़े मुख्य अवसरों और प्रसंगों पर उनकी भूमिका को लेकर मूल सच्चाई तक आसानी से पहुँच बना पाए। बहुत सारे ऐसे ऐतिहासिक प्रसंग थे जिसकी आधुनिक भारतीय इतिहास में चर्चा तो खूब होती है मगर उसमें बाबू जगजीवन राम की क्या भूमिका थी इस पर कोई चर्चा नहीं मिलती अथवा उनकी भूमिका को अत्यन्त गौण कर दिया जाता है। जैसे पूना-पैक्ट में उनके विचारों और भूमिका की चर्चा नहीं होती और होती भी है तो डॉ० आंबेडकर के धुर विरोधी के रूप में एक खलनायक के रूप में। डॉ० राजेन्द्र प्रसाद के दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के प्रसंग में भी बाबू जगजीवन राम की प्रमुख भूमिका थी जिसका कहीं कोई जिक्र नहीं होता जबकि पं॰ जवाहरलाल नेहरू को उन्होंने ही समझाया कि यही उचित निर्णय होगा। उसी तरह जब बिहार में मुख्यमंत्री डॉक्टर श्रीकृष्ण सिंह और उनके मंत्री अनुग्रह नारायण सिंह के बीच में जब भी गंभीर मतभेद हो जाते थे तो नेहरूजी बाबूजी को ही सुलह कराने का यह काम सौंपते थे और बाबूजी दोनों नेताओं में सुलह सपाटा कराते थे। इस तरह इं0 राजेन्द्र प्रसाद जी की यह पुस्तक अनेक नये तथ्यों का उद्घाटन करती है और आधुनिक भारतीय इतिहास लेखन की कमियों को पूरा भी करती है। इं0 राजेन्द्र प्रसाद जी ने पुस्तक में काफी तटस्थता बरतते हुए बाबूजी का मूल्याकंन किया है।

         इस पुस्तक को पढ़ते हुए इं0 राजेन्द्र प्रसाद जी के घोर शोध-श्रम और संलग्नता का सुफल है कि उन्होंने ऐसी-ऐसी सामग्री पहली बार प्रकाश में लाई है जिसको पढ़ते हुए पाठक बार-बार विस्मित होता है। ऐसे अनछुए पहलुओं को लेकर उनकी जानकारी और सूझबूझ आपको जगह-जगह ठिठककर सोचने पर विवश करती है। मसलन यह पुस्तक बाबू जगजीवन राम के बारे में एक तरह का पुनर्मूल्यांकन करने का अनुरोध करती है। यह पुस्तक बाबू जगजीवन राम के अदीठ व्यक्तित्व से योगदान और उपलब्धियों से, पाठकों को नये आलोक में परिचित कराती है। इसमें उन्होंने बाबू जगजीवन राम के बौद्धिक व्यक्तित्व को जिस तरह उनके सामाजिक राजनीतिक आर्थिक धार्मिक और अल्पसंख्यकों पर विचार प्रसंगानुसार रखा है वह पुस्तक का बहुत ही मूल्यवान खंड है। बाबूजी संवैधानिक आरक्षण को सामाजिक क्रांति लाने का जरिया कहते थे। जाति विभेद के जहर को समाप्त करने के लिए अंतर्जातीय विवाह की अनिवार्यता कानून की वकालत करते थे। वे कहते थे कि जातिवाद और राष्ट्रवाद दोनों एक दूसरे के धुर विरोधी हैं ।

 बाबू जगजीवन राम की बुद्धिमत्ता की चर्चा तो होती है लेकिन वे बौद्धिक स्तर पर कितने समृद्ध और ठोस थे इसका अहसास लोगों को नहीं था। इं0 राजेन्द्र प्रसाद ने भारतीय समाज की संरचना को लेकर, उसकी तमाम तरह की जटिलताओं को लेकर उनकी समझ कितनी स्पष्ट और दृढ़ थी यह सब इसमें शामिल है। गाँधीवाद से राष्ट्रीय समस्याओं का निर्माण उसके प्रयोग करने की नीति और दक्षता पर निर्भर है। इसलिए व्यावहारिक स्तर पर उनकी प्रशासनिक सूझ और क्षमता को लेकर इं0 राजेन्द्र प्रसाद जी ने जो लिखा है उसे खासकर आज के राजनेताओं को सीखना चाहिए। देश का आर्थिक विकास मौजूदा संसाधनों में भी संभव है मगर कैसे? इस पर उनके विचार व्यवहार और कार्य के स्तर पर यथार्थ परक थे। वे आदर्शवादी नहीं व्यावहारिक राजनेता थे।

अक्सर यह देखा जाता है कि बाबू जगजीवन राम की चर्चा करते हुए बाबासाहेब आंबेडकर को प्रतिमान के रूप में ला खड़ा कर दिया जाता है। यह किसी व्यक्तित्व के मूल्यांकन का एक गलत तरीका है। हर व्यक्तित्व की भूमिका और उपलब्धि एक-दूसरे से भिन्न होती है। सबके टॉस्क अलग होते हैं । इसलिए एक ही प्रतिमान से आप सबका आकलन नहीं कर सकते। देखना यह होता है कि उक्त व्यक्तित्व जिस भूमिका में था वहाँ उसका योगदान क्या था और कैसा था?

जो लोग बाबू जगजीवन राम को सत्तावादी और अवसरवादी कहकर उनके योगदान को एकदम रिड्यूस कर देते हैं उनको यह जीवनी जरूर पढ़नी चाहिए। लोगों को यह भ्रम है कि सत्ता में ऊँचे पद पर जाकर बाबू जगजीवन राम को आंबेडकर की तरह अपमान नहीं झेलना पड़ा। संघर्ष नहीं करना पड़ा। वे अय्याशी और ऐश्वर्य का जीवन जीते रहे। इं0 राजेन्द्र प्रसाद जी ने इस झूठ से पर्दा उठाया है। कोई गौर करे कि ऊँचे पद पर पहुँच जाने के बावजूद उनको सवर्ण मानसिकता का दंश छल प्रपंच और तंज पूरे जीवन भर झेलना पड़ा। किस तरह से लोग उनको लांछित करते थे। उन पर अपमानजनक टिप्पणियाँ करते थे। उनके जीवन और परिवार को झूठे आरोपों में डालकर कलंकित करते थे कींचड़ उछालते थे। दलित विरोधी मानसिकता वाली मीडिया उनकी उपलब्धियों पर चुप्पी साध लेती थी अथवा गौण रूप में प्रस्तुत करती थी। उनका श्रेय दूसरे के हिस्से में दे दिया जाता था और उनके योगदान और चरित्र को कलंकित कर बौना बना दिया जाता था। उनको अभद्र और गंदे विशेषणों’ से नवाजा जाता था। बावजूद बाबू जगजीवन राम ने यह सब झेलते हुए एक योद्धा की तरह निरंतर आगे बढते रहे । खाद्य मंत्री से रक्षा मंत्री तक जो भी मंत्रालय उनको मिला। उस पर अपनी गहरी छाप छोड़ी। उन्होंने ऐसे-ऐसे मौलिक निर्णय लिए ऐतिहासिक फैसले किये कि उसका असर पूरे देश में महसूस किया गया और उन्होंने उस मंत्रालय की काया ही बदल डाली। राष्ट्र और जनता के हित में सरकार का क्या रुख होना चाहिए- इसका उन्हें सम्यक बोध होता। सबसे बड़ी बात यह कि उनकी प्रतिभा और दृष्टि बहुमुखी थी। वे आर्थिक सामाजिक राजनीतिक सवालों और समस्याओं को बड़ी गहराई और बारीकी से समझते थे। कैसे उसे समय के अनुरूप जनमुखी किया जाय यह उनकी सोच के केन्द्र में रहता था। भारतीय समाज की सबसे बड़ी और जटिल रूढ़ि जाति थी। एक विशाल दलित समाज गर्त में पड़ा हुआ था। जगजीवन राम को पता था कि यह समस्या आर्थिक स्तर को सुलझाने से नहीं सुलझने वाली। इसके लिए वे अक्सर संतों के सांस्कृतिक जड़ों को कुरेदते थे। डॉ० रामविलास शर्मा संत कवियों की भूमिका को लोकजागरण कहते थे। बाबू जगजीवन राम को इसका ज्ञान अपने पिता शोभी राम से ही संस्कार में मिला था। इसलिए वे अक्सर संत कवियों की उस ऐतिहासिक धारा और विचारों के साथ सामाजिक बदलाव की पहल करते थे। संत कवियों पर उनकी समझ बहुत विलक्षण थी। अनेक संत कवियों के पद उन्हें कंठाग्र थे। भले उन्होंने लिखा नहीं लेकिन अपने भाषणों में वे जब भी संत कवियों की चर्चा करते, उनके पद उद्धृत करते तो उनकी समझ विद्वानों को भी विस्मित कर देती थी। एक तो वे वक्ता बहुत प्रभावशाली थे। हिन्दी और भोजपुरी का उच्चारण इतना मोहक और उत्कृष्ट होता था कि सुनने वाला मुग्ध हो जाता था। आचार्य हजारी प्रसाद द्वेदी बाबूजी को संत साहित्य का अप्रतीम विद्वान कहते थे।

        इं0 राजेन्द्र प्रसाद की इस जीवनी लेखन को पढ़ते हुए आजाद भारत में सवर्ण ताकतों की छटपटाहट और धूर्त्तता का बखूबी अहसास होता है। जब संविधान में प्रदत्त दस साल के आरक्षण को बढ़ाने का प्रस्ताव आया तो सवर्ण ताकतों ने अपनी पूरी मेधा का इस्तेमाल किया। उस समय सरकार और विपक्ष की सवर्ण ताकतों में कोई भेद न रहा। इं0 राजेन्द्र प्रसाद जी ने इसे बड़े ही प्रभावशाली ढंग से रखा है। सत्ता में बदलाव तो हुआ था मगर समाज से प्रशासन तक ढाँचा यथावत था। सवर्ण ताकतें ऑक्टोपस की तरह पूरी व्यवस्था को जकड़े हुई थी। इस कपट और कुटिल चाल को समझना एक बात है और इसे रोकना बिलकुल ही अलग। इसे बाहर के विरोध से रोकना तो लगभग असंभव था। सरकार के भीतर रहकर बाबू जगजीवन राम ने कैसे इस चाल को निरस्त किया, इसका विस्तृत वर्णन राजेन्द्र प्रसाद जी ने किया है। बाबू जगजीवन राम ने सरकार के भीतर रहकर ऐसे नाजुक और संवेदनशील मामले में दलित समाज के हित में क्या किया इस पर गौर करना चाहिए। इं0 राजेन्द्र प्रसाद की दृष्टि और समझ का महत्व ऐसे स्थलों पर देखने लायक है। उन्होंने हर ऐसे संवेदनशील पक्षों पर एकदम आवेगहीन होकर एक बौद्धिक बहस खड़ी की है। आज यह काम अपेक्षाकृत आसान है लेकिन तब स्थिति ज्यादा प्रतिकूल और जटिल थी। आप कल्पना कीजिए जवाहरलाल नेहरू जी जैसे प्रचंड विचारक प्रधानमंत्री के सामने उनके कथन के विपरीत विचारों को रखना कितना साहसिक काम रहा होगा। मसलन वैचारिक निर्भीकता को लेकर बाबू जगजीवन राम एक स्पष्ट, दृढ़ और बिलकुल खरे इंसान थे।

       यह आत्मविश्वास यह वैचारिक दृढ़ता और खरापन कभी-कभी खतरनाक निर्णय लेने को भी प्रेरित करता है। ऐसा निर्णय जिसका विपरीत परिणाम पूरी प्रतिष्ठा को गर्त में मिला सकता है। लेकिन ऐसे निर्णयों से ही व्यक्तित्व की दृढ़ता भी निखरकर सामने आती है। ऐसे ही एक निर्णय का उल्लेख इं0 राजेन्द्र प्रसाद जी ने किया है। जब  बाबूजी 1971 में  रक्षा मंत्री थे तो पाकिस्तान से युद्ध हो गया। उनके पास लोगों के लगातार टेलीफोन चिट्ठियाँ मशविरे आये थे कि युद्ध में सीमा पर वे अगली कतार में मुसलमानों के सैन्य जत्थे को नहीं भेजें। बाबू जगजीवन राम ने ठीक इसके उल्टा किया। उन्होंने बाबू जगजीवन राम के शब्दों में ही यह उद्धरण दिया है-“मैंने एक मुस्लिम बहुल बटालियन को सबसे आगे शंकरगढ़ में भेजा। क्यों भेजा, क्योंकि मुसलमानों की देशभक्ति पर मुझे संदेह नहीं था। मैं लड़ाई हारना नहीं चाहता था । मैं लड़ाई जीतना चाहता था। लेकिन मैं लड़ाई यह दिखाकर जीतना चाहता था कि पाकिस्तान का मुसलमान पाकिस्तानी है और भारत का मुसलमान भारतीय है।“ इं0 राजेन्द्र प्रसाद जी की दृष्टि सूक्ष्म भी है और व्यापक भी। उन्होंने ऐसे अनेक स्थलों, प्रसंगों और घटनाओं को देकर उनकी सोच की विविधता और विलक्षणता को उद्घाटित किया हैं। उनकी कोशिश रही है कि लोग बाबू जगजीवन राम के व्यक्तित्व के विस्तार और बहुमुखी क्षमता को जान सकें। देश के निर्माण में तमाम धार्मिक अल्पसंख्यकों पारसी, ईसाई, सिक्ख, जैन, बौद्ध और मुसलमानों के योगदान को रेखांकित करें। वे मजहब और राष्ट्रीयता के फर्क को समझते थे- इसमें तनिक संदेह नहीं। गौर करने वाली बात विचारों की स्पष्टता नहीं उसे आचरण में उतारने की है।

          बाबू जगजीवन राम के प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए समाजवादी कांग्रेसी सवर्ण और पिछड़े समुदाय के नेताओं तक ने ऐसी कुटिल चाल चली। चरण सिंह और राजनारायण ने एक बार ऐसी घृणित चाल चली कि 1978 में उनके बेटे सुरेश कुमार का अपहरण कर उसके साथ किसी लड़की की नंगी तस्वीर के चित्र को मेनका गांधी ने अपनी पत्रिका सूर्या में छाप दिया। सवर्ण मानसिकता की मीडिया ने बाबू जगजीवन राम की बुरी तरह चरित्र-हत्या करने की कोशिश की। चरण सिंह जैसे लोगों ने भी उनको प्रधानमंत्री न बनने देने के लिए कुटिल चाल चली। जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद अधिकांश सांसद चाहते थे कि बाबू जगजीवन राम प्रधानमंत्री बने। अगर जगजीवन राम प्रधानमंत्री बने होते तो सरकार निश्चित रूप से पाँच साल चलती। उनका लंबा राजनीति अनुभव देश की समझ और प्रशासनिक क्षमता ऐसी थी कि देश का शासन अपेक्षाकृत बेहतर होता। महात्मा गाँधी का सपना कि कोई दलित प्रधानमंत्री बने, इसका न सिर्फ देश में सकारात्मक संदेश जाता बल्कि विश्व में भी भारत की प्रतिष्ठा बढ़ जाती। मगर राजनारायण जो बड़े समाजवादी नेता थे उन्होंने ही पहला प्रहार किया। इसे अंतिम परिणति दी लोकनायक कहे जाने वाले जयप्रकाश नारायण और आचार्य कृपलानी ने। इन दोनों नेताओं ने गैरलोकतांत्रिक तरीके से मोरारजी भाई देसाई को प्रधानमंत्री बनवा दिया। मोरारजी भाई पूँजीपतियों को भी प्रिय थे और भाजपाइयों को भी। उनका ऐसा अकडँ स्वभाव था कि जनता पार्टी की  सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी बल्कि इसके विपरीत टूट कर बुरी तरह बिखर गई। 1980 में फिर कांग्रेस की वापसी भी हो गई। सवर्ण मानसिकता नहीं दलित विरोधी मानसिकता का यह सबसे कलंकित उभार था। बाबू जगजीवन राम प्रधानमंत्री न बने इसके आये अवसरों और उसे असफल करने की कोशिशों को राजेन्द्र प्रसाद जी ने प्रमाण और इसमें शामिल नेताओं के नाम सहित पूरा वाकया विस्तार से लिखा है। बेशक इसकी चर्चा आधुनिक भारत के इतिहास में शामिल की जानी चाहिए। ये सारे प्रसंग इस पुस्तक को अत्यन्त महत्वपूर्ण बनाते हैं। पाठक इसे पुस्तक में पढ़े इसलिए मैंने इसे विस्तार नहीं दिया।

           इं0 राजेन्द्र प्रसाद की इस पुस्तक को सम्यक मानने के पीछे सिर्फ यह कारण नहीं है कि उन्होंने बाबू जगजीवन राम के जीवन विचार उनकी प्रशासनिक क्षमता और उपलब्धियों को प्रमाणिक साक्ष्यों के साथ लिखा है। इसको सम्यक कहने के पीछ सबसे बड़ा कारण पुस्तक का परिशिष्ट भाग है। उन्होंने उनकी स्मृति में स्थापित विभिन्न 14 संस्थानों का विवरण । खुद इं0 राजेन्द्र प्रसाद के द्वारा लिया गया साक्षात्कार जो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और आत्मीय है। डॉ० आंबेडकर पर मद्रास में दिया उनका व्याख्यान इस पुस्तक का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। ये उनके वैचारिक व्यक्तित्व का साक्ष्य है। फिर उन्होंने बाबू जगजीवन राम के बारे में संसद में दी गई श्रद्धांजलियों का संकलन है। इसमें उनके व्यक्तित्व के विविध पहलुओं और व्यापक सरोकारों का अंदाज होता है। फिर राज्यसभा में दी गई श्रद्धांजलियों का संकलन भी है।

         राजेन्द्र प्रसाद जी ने  बाबूजी के संपूर्ण जीवन की महत्त्वपूर्ण घटनाओं को कालानुक्रम से एक बहुत ही  उपयोगी विवरणी दी है, जिससे पाठक उनकी एक नज़र में संपूर्ण जीवन छवि से परिचित हो जाता है। संदर्भ-ग्रंथों की सूची इं0 राजेन्द्र प्रसाद के अकथ शोध-श्रम का प्रमाण है। लेकिन संदर्भ-ग्रंथों की सूची और अनुक्रमणिका अधुनातन शोध-ग्रंथों का अनिवार्य हिस्सा है। यह हिस्सा आने वाले शोधार्थियों के लिए आत्यन्त उपयोगी है। इसलिए राजेन्द्र प्रसाद जी की इस पुस्तक को मैं अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और सम्यक मानता हूँ। पाठकों को इसे जरूरी टॉस्क समझकर पढ़ना चाहिए क्योंकि इसमें भारत के निकटतम अतीत का इतिहास है। न सिर्फ राजनीतिक इतिहास की कुछ अनदिखी सच्चाइयों पर रोशनी पड़ती है बल्कि सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि भारतीय समाज के संक्रमणकाल से भी वे परिचित होते हैं। अगर हम ईमानदारी निष्पक्षता और मानवता के सचमुच पक्षधर हैं तो यह पुस्तक सामाजिक न्याय को न सिर्फ विचारों में बल्कि संस्कारों में विन्यस्त करने को प्रेरित करती है। मानवकृत कृत्रिम जातिवाद ने हमारी चेतना को कुंद कर दिया है। हमारी बुद्धि को जड़ बना दिया है और देश की प्रगति को रोक दिया है। इसलिए अगर यह जीवनी इस दिशा में जड़ता को खत्म कर लोगों में गतिशील चेतना की स्वीकार्यता लाती है तो यह बहुत बड़ा काम होगा। यह सभी के लिए प्रेय और करणीय है और सबके हित में है।

    कर्मेन्दु शिशिर

सम्प्रति : बी.डी. कॉलेज, मीठापुर, पटना में प्राध्यापक
प्रकाशित कृतियाँ : बहुत लम्बी राह (उपन्यास), कितने दिन अपने, बची रहेगी जिन्दगी, लौटेगा नहीं जीवन (कहानी-संग्रह), नवजागरण और संस्कृति, राधामोहन गोकुल और हिन्दी नवजागरण, हिन्दी नवजागरण और जातीय गद्य परम्परा, 1857 की राजक्रान्ति : विचार और विश्लेषण, भारतीय नवजागरण और समकालीन सन्दर्भ, निराला और राम की शक्ति- पूजा (शोध-समीक्षात्मक लेख, आलोचना)।
सम्पादन : भोजपुरी होरी गीत (दो भाग), सोमदत्त की गद्य रचनाएँ, ज्ञानरंजन और पहल, राधामोहन गोकुल- समग्र (दो भाग), राधाचरण गोस्वामी की रचनाएँ, सत्यभक्त और साम्यवादी पार्टी, नवजागरण पत्रकारिता और सारसुधानिधि (दो खंड), नवजागरण पत्रकारिता और मतवाला (तीन खंड), नवजागरण पत्रकारिता और मर्यादा (छह खंड), पहल की मुख्य कविताएँ और वैचारिक लेखों का संकलन (दो भाग)। 8 पुस्तिकाएँ और समकालीन कविता, कहानी पर आलोचना लेख

*यह पुस्तक फ्लिपकार्ट अमेजन गुडरीड्स और गूगलबुक्स पर उपलब्ध है। इस पुस्तक के अंग्रेजी और बंगला संस्करण भी प्रकाशित हैं और फ्लिपकार्ट अमेजन गुडरीड्स और गूगलबुक्स पर उपलब्ध हैं। पुस्तक की छपाई और जिल्द उम्दा किस्म की है। पुस्तक रेड साइन प्रकाशन से प्रकाशित की गई है जिसका मूल्य ₹600 है।

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बिहार की राजनीति के लिए एकमात्र सुकून है कि विपक्ष भाजपा की बनाई पिच पर खेलने से बच पा रहा है। रोजगार के सवाल या नागरिकता के प्रश्न विपक्ष के सरोकारों में हैं। बिहार को यदि भाजपा शासित राज्यों के उन्मादी वातावरण से बचाना है, जनता के जीवन के मूल सवालों को शासकों के केंद्रीय सरोकार में लाना है तो भाजपा को ताकत देने से बचना एक जरूरी अभियान होना चाहिए, बिहार के नागरिकों का कर्तव्य होना चाहिए।

यह 2012  की बात है। साप्ताहिक शुक्रवार के लिए रिपोर्टिंग करते हुए मैं भागलपुर के कुछ इलाकों में घूम रहा था। भागलपुर की बिहपुर विधानसभा सीट से दूसरी बार विधायक बने थे इंजीनियर शैलेन्द्र। यह विधानसभा सीट परिसीमन में भागलपुर लोकसभा का हिस्सा हो गई थी, इसके पहले खगड़िया लोकसभा का हिस्सा थी।

इस वक्त तक नीतीश कुमार भारतीय जनता पार्टी से थोड़ा अलग दिखने की कोशिश करने लगे थे। यह कोशिश 2009 में गुजरात के तब के सीएम नरेंद्र मोदी के लिए बिहार में आयोजित भोज रद्द किये जाने के समय से ही स्पष्ट थी। 2010 में नीतीश कुमार NDA में बड़े भाई की भूमिका में आ गये थे। 115 सीटें थीं उनके पास। जिस वक्त की मैं बात कर रहा हूं, 2012 के अंतिम महीनों में से किसी दिन की, नीतीश कुमार भाजपा से दो-दो हाथ के मूड में आ चुके थे, लेकिन सबकुछ उतना सतह पर नहीं था। इसके बावजूद कि 2009 में नरेंद्र मोदी का भोज रद्द होना और 2010 में संयुक्त पोस्टर पर नीतीश कुमार का आग बबूला होना राजनीतिक दृश्य में स्थाई रूप से अंकित हो गया था।

तब तक 7 सालों से भाजपा-नीतीश कुमार की अगुआई में सरकार में थी, जिसका जहरीला असर मुझे बिहपुर विधानसभा में साफ दिखा। बिहपुर बाजार में रह रहे डोम जाति के लोगों को नीतीश सरकार की 3 डिसमिल रिहायशी जमीन की योजना के तहत जमीन मिली थी। कागज पर सब अच्छा-अच्छा था, लेकिन डोम जाति के परिवारों को तीन डिसमिल जमीन अधिकारियों ने या यूं कहें कि विधायक के प्रभाव ने जहां दिलवाई थी, वहां कोई मजार थी, इमामबाड़ा था। ठीक सामने डोम जाति, जिनके दैनंदिन में पालतू सूअर होते हैं, को जमीन देना सांप्रदायिक शरारत का एक खास नमूना था। सूअर मुसलमानों के लिए नापाक माना जाने वाला जानवर है। यह नफरती मानस से उपजा एक दृश्य था मेरे सामने। जमीन मिली भी काफी गड्ढे में थी। आमतौर पर डलिया खचिया का काम करने वाली परिवार की महिलाओं ने बताया था कि ‘ जानबूझकर  यह लड़ाने – भिड़ाने के इरादे से हुआ था।’ बल्कि उनका मानना था कि बिहपुर बाजार में उनके सामान बिकने की सहूलियत भी इसके खत्म हो जायेगी,  रोजगार पर असर होगा। इस घटना को भाजपा की सीधी सरकारों, या गठबंधन की सरकारों के जहरीले असर के रूप में तब से मैं याद रखता हूं।नीतीश सरकार पर भाजपा के प्रभाव का यह साफ असर था। भागलपुर लोकसभा सीट से तब भाजपा के सांसद थे शाहनवाज हुसैन।

भाजपा और संघ परिवार की जुगलबंदी एवं सरकारी तंत्र का आश्रय समाज में मीठे जहर का काम करता है। यह एक पैटर्न का हिस्सा है, समाज के साम्प्रदायीकरण का। पिछले कुछ वर्षों में, खासकर 2002 के गुजरात दंगों के बाद संघ से जुड़े संगठनों और सांप्रदायिक जमातों ने एक नई नीति अपना ली है। समाज में निरंतर सुलगते साम्प्रदायिक माहौल की नीति। छोटे और मध्यम आकार के झगड़े, तनाव और दंगे। यह बिहार में भी खास पैटर्न बन गये।
एक रिपोर्ट के अनुसार बिहार पुलिस के आँकड़ों बताते हैं कि 2005 में दंगों के केवल 205 मामले दर्ज हुए थे। वहीं, 2024 में ये संख्या बढ़कर लगभग 3,186 हो गई। पिछले लगभग दो दशकों में दंगों की वारदातों में करीब तीन गुना वृद्धि दर्ज हुई है

कुणाल पुरोहित की किताब है H-Pop: H-Pop: The Secretive World of Hindutva Pop Stars . यह किताब हिंदुत्वादी साम्प्रदायिक इरादों का पॉपुलर कल्चर में ढल जाने की पड़ताल करती है। कुणाल ने अपने अनुभव से बताया है कि कैसे झारखंड बिहार सहित पूरे देश में हिंदू त्योहारों के दौरान हिंदू संगठनों से जुड़े युवा तनाव पैदा करते हैं। मस्जिदों के पास जाकर डीजे के जरिए उत्तेजक सम्प्रदायिक गाने बजाये जाते हैं। भाजपा की रघुबर सरकार के दिनों की एक केस स्टडी इस किताब में कुणाल ने शामिल किया है।

आजकल तो योगी मॉडल भी चलन में आ चुका है। उत्तर प्रदेश में कई मस्जिदों पर भगवा झंडे लहराने की खबरें आती रहती हैं। बिहार में भी यह पैटर्न बन रहा है। 2024 के नवंबर में काली मूर्ति विसर्जन के दौरान टमटम चौक पर एक मस्जिद पर भगवा झंडा लहरा दिया गया। ऐसा नहीं है कि संघ परिवार और उससे जुड़े हिंदुत्ववादी संगठनों का यह बिल्कुल नया पैटर्न है। बल्कि इसकी जड़ें ऐतिहासिक रूप से संघ और उसके भी पहले हिंदू महासभा के जन्म के समय से ही है। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद ने 1948 में भारत के तत्कालीन गृह मंत्री सरदार पटेल को लिखे पत्रों में स्पष्ट बताया है कि संघ से जुड़े लोगमुसलमानों जैसे वेश भूषा में हिंदू मुस्लिम दंगों की आग भड़काते हैं।

14 मार्च 1948 को वे सरदार बल्लभ भाई पटेल को लिखते हैं, ” मुझे यह बताया गया है कि आरएसएस के लोग उपद्रव करने की योजना बना रहे हैं। उनमे से बहुत से लोगो मे मुसलमानों की तरह की वेशभूषा और उन्ही की तरह दिखने की योजना बना कर हिंदुओ पर हमला करके दंगे फैलाने की योजना बना रखी है। इसी प्रकार से उन्हीं में से कुछ लोग मुसलमानों पर हमला करके उन्हें दंगे के लिये भड़काएँगे। इस प्रकार के उपद्रव से हिंदुओं और मुसलमानों में दंगे की आग भड़केगी। ”( नीरजा सिंह द्वारा संपादित पुस्तक, नेहरू पटेल, एग्रीमेंट विदिन डिफरेंसेज, सेलेक्ट डॉक्यूमेंट एंड करेस्पोंडेंस, 1933 – 1950, एनबीटी, पृ.43 )

ये प्रवृत्तियां सरकारों के संरक्षण के बाद और बलवती हो जाती हैं, संरक्षण पा लेती हैं। भाजपा सरकारों में हुए मॉब लिंचिंग की घटनाओं में शामिल लोगों पर कार्रवाई नहीं होती रही है, बल्कि भाजपा के नेता मॉब लिंचर उन्मादियों को प्रोत्साहित करते समाने आये हैं। साम्प्रदायिक उन्मादियों के साथ खड़ी दिखती सरकार अपने अफसरों के लिए भी न्याय सुनिश्चित नहीं करा पाती। दंगाइयों से मुकाबला करते हुए मारे गए उत्तर प्रदेश के इंस्पेक्टर सुबोध सिंह का परिवार आज भी न्याय से महरूम है।

ये कुछ चंद उदाहरण हैं इतिहास के, वर्तमान के, निजी अनुभवों के, जो पर्याप्त हैं इस संकल्प के लिए कि भाजपा को वोट दिया जाना किस तरह समाज के वंचित और अकलियत तबके के लिए खतरनाक है। सामाजिक शांति और सौहार्द के लिए खतरनाक है।

भागलपुर के बिहपुर की घटना एक अनुभव जन्य उदाहरण है, केस स्टडी है कि कैसे भाजपा के प्रभाव का सरकारी तंत्र दलित बहुजन जमात को अल्पसंख्यकों के साथ लड़वाने के उन्मादी इरादे में सहयोगी होता है। डोम जाति के लोगों ने तब इस उन्मादी इरादे को भांप लिया था, लेकिन वह घटना जिसमें सड़क से बेहद नीचे,गड्ढे में जमीन दी गई थी, जो रोजगार के केंद्र से बहुत दूर भी थी, दलितों के प्रति भाजपा और उसके प्रभावी तंत्र का दलितों के प्रति असंवेदनशीलता और क्रूरता को दर्शाती घटना है।

जनता को बेहोशी में रखने और जीवन के मौलिक सवालों से दूर रखने में भाजपा और संघ परिवार के लोगों से कोई मुक़ाबला नहीं कर सकता। कोई गौर करे तो साफ दिखेगा कि भाजपा के नेताओं के पास भाषा, भंगिमा और मुद्दों के स्तर पर क्या है जनता के लिए। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह पाकिस्तान और झटका, हलाल मीटों की शब्दावली और मेटाफर में अपनी राजनीति की दुकान चलाते हैं, जनता बेगूसराय से दूसरे राज्यों में ले जाये जा रहे उद्योगों का सवाल पूछना भूल जाती है।

डिप्टी सीएम विजय सिन्हा की भाषा और भंगिमा हमेशा उन्मादी होती है। बुलडोजर राज का सपना देख रहे विजय सिन्हा राज्य में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार चाहते हैं। इन नेताओं के पास अपने कार्यकर्ताओं के लिए भी क्या कार्यक्रम है। राष्ट्रवाद भी उन्मादी शक्ल में ही इनके एजेंडे हैं, उनके कार्यक्रम हैं। पिछले दो तीन महीने में भाजपा के कार्यकर्ताओं को क्या कार्यक्रम मिले हैं? ऑपरेशन सिंदूर का जायगान और पीएम मोदी को मिली गाली के खिलाफ प्रदर्शन। वास्तव में लेकिन हुआ क्या? कौन से सवाल भाजपा के कार्यकर्ताओं के सामने भी नहीं आने दिए गये?

देखते देखते प्रधानमंत्री कथित ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान का साथ देने वाले चीन से गलबहियां कर आये। भाजपा कार्यकर्ताओं और देश को बता दिया गया कि अब ट्रंप हमारे दोस्त नहीं रहे, जिनपिंग का जायगान करिए। अबकी बार ट्रंप सरकार का नरेंद्र मोदी का उद्घोष और भारत में जगह जगह ट्रंप के लिए हुए हवन यज्ञ के कार्यक्रम बदल गए चीन से दोस्ती में। जवाहर लाल नेहरू की चीन नीति पर तीखा हमलावर रही जमात के लिए ‘ हिंदी चीनी भाई -भाई ‘ का नारा नरेंद्र मोदी का गिफ्ट बन गया है, यह नारा अब भाजपा कार्यकर्ताओं को नये शब्दों में थमा दिया गया, और थमा दिये गये नरेंद्र मोदी के आंसू – नरेंद्र मोदी की मां का मान। वह नरेंद्र मोदी जिन्होंने राहुल गांधी से लेकर नीतीश कुमार की मां के मान को मान नहीं माना।

क्या जानबूझकर कोई आधुनिक समाज अपने बच्चों को आधुनिक ज्ञान विज्ञान से दूर मिथकीय राष्ट्र गौरव का शिकार होने देगा? भाजपा और उसकी सरकारें जिस तरह कथित भारतीय ज्ञान आम जनता को देना चाहती है क्या उसे कोई सचेतन नागरिक संभव होने देना चाहेगा? क्या कोई मां या पिता अपने बच्चों से किसी अनुराग ठाकुर द्वारा पाया वह ज्ञान सुनना चाहेंगे कि हनुमान अंतरिक्ष के पहले यात्री थे और पुष्पक विमान दुनिया में पहला वायुयान आविष्कार! क्या पश्चिमी सभ्यताओं में मिथकीय धारणाओं की कोई कमी रही है? लेकिन क्या उन धारणाओं को आधुनिक आविष्कारों पर, ज्ञान पर कथित राष्ट्रवादी ज्ञान के आवरण में हावी होने दिया गया? क्या चीन का ज्ञान अमेरिकियों ने प्रतिबंधित कर दिया?


बिहार की राजनीति के लिए एकमात्र सुकून है कि विपक्ष भाजपा की बनाई पिच पर खेलने से बच पा रहा है। रोजगार के सवाल या नागरिकता के प्रश्न विपक्ष के सरोकारों में हैं। बिहार को यदि भाजपा शासित राज्यों के उन्मादी वातावरण से बचाना है, जनता के जीवन के मूल सवालों को शासकों के केंद्रीय सरोकार में लाना है तो भाजपा को ताकत देने से बचना एक जरूरी अभियान होना चाहिए, बिहार के नागरिकों का कर्तव्य होना चाहिए।

मोहन भागवत ने बिहार के मुजफ्फरपुर में अपने कार्यकर्ताओं को बिहार चुनाव का एक एजेंडा दिया है। उन्होंने कह कि ‘ दुर्भाग्य बहुत दिनों तक नहीं। रहता। ‘ वे भाजपा की अपनी सरकार का एजेंडा दे गये हैं। बिहार की जनता के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि भागवत के इरादे को कैसे सफल नहीं होने देना है। बिहार के विभूतियों में से एक राजेंद्र प्रसाद की चेतावनी की अनुगूंज हमारे लिए लोकतंत्र के खतरे से बिहार को बचाने की स्थाई कार्यनीति होनी चाहिए।
राजद समाचार से साभार