सीवान की संस्कृति एवं कला

सीवान बिहार राज्य के पश्चिमोत्तर सीमा पर स्थित जिला है। यह दाहा नदी के किनारे बसा है।  यह पहले सारण जिले के अंतर्गत शामिल था। सन 1972 में इसे स्वतंत्र जिला बना दिया गया। सीवान ने देश को अनमोल रत्न दिए हैं। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद सहित, महेंद्र प्रसाद ,मौलाना मजहरूल हक, डॉक्टर सैयद मोहम्मद, बृज किशोर प्रसाद, खुदा बक्श खाँ, इत्यादि प्रमुख हैं। प्राचीन समय से ही सीवान संघर्ष और बलिदान की भूमि रही है। स्वतंत्रता संग्राम के समय सीवान के बलिदानों की याद में,  शहीद सराय में शहीद स्तंभ खड़ा है। वर्षों पुराने शांति वट वृक्ष को सीवान का हृदय स्थल कहा जा सकता है।  सीवान जिले में हिंदू और मुस्लिम आबादी अपनी साझा संस्कृति को बचाए हुए है। दुर्गा पूजा, मुहर्रम,  शिवरात्रि, के मेले सभी में उत्साह जगाते हैं। सीवान में भारत की समावेशी संस्कृति, विभिन्नता में एकता, को महसूस किया जा सकता है।

 त्योहार:-  बिहार में मनाये जाने वाले सभी त्योहार सीवान में भी मनाये जाते हैं। दुर्गा पूजा, रामनवमी, शिवरात्रि, मुहर्रम,  जन्माष्टमी (महावीरी झंडा), चेहल्लुम इत्यादि में जुलूस निकाला जाता है।  दाहा नदी के किनारे,  छठ पूजा घाट की सफाई, हिंदू मुस्लिम दोनों मिलकर करते हैं। मुहर्रम के ताजिये की सजावट भी दोनों मिलकर करते हैं। पीड़िया यहाँ का विशेष त्योहार है। पीड़ीया में लड़कियाँ अपने भाई के लिए व्रत रखती हैं। एक महीने तक मिट्टी की दीवार में गोबर का पिंड बनाकर चिपकाती हैं।  एक महीने बाद उसे उखाड़ कर बैंड बाजे के साथ, नाचते गाते नदी पोखर में प्रवाहित कर देती हैं।

 रीति रिवाज:-  सीवान में जन्म,  विवाह, मृत्यु पर विभिन्न प्रकार के रीति रिवाज प्रचलित हैं। विवाह के समय मटकोर के लिए दूल्हा या दुल्हन भी साथ जाते हैं। बारात जाने के बाद सभी महिलाएं रात में डोमकच करती हैं। यह एक प्रकार का नाटक है, जो गीतों के साथ होता है। खाट के पाए का गुड्डा बनाया जाता है, जिसे “जलुआ” कहते हैं। दुल्हन के आने पर कोहबर घर में दूल्हा-दुल्हन का स्वागत होता है। दीवार पर गेरु से कुछ ज्यामितीय आकृतियां बनाई जाती हैं,  जिसे कोहबर लिखना कहते हैं। विवाह के पश्चात “चौठारी” छुड़ाया जाता है। इसमें घर की महिलाएँ गाँव के सभी लोक देवताओं के स्थान पर जाकर उनका आभार व्यक्त करती हैं।

लोकगीत:- सीवान में भोजपुरी बोली जाती है,  अतः भोजपुरी के लोकगीत यहाँ गाए जाते हैं। महिलाओं के लोकगीतों में कजरी, झूमर, सोहर, खेलवना, रोपनी के गीत आदि गाए जाते हैं। गाड़ीवान, कृषक, श्रमशील वर्ग के पुरुष बिरहा,  होरी, चैता इत्यादि गाते हैं। सीवान में कई चीनी मिले थीं। आसपास के गाँव के किसान,  बैलगाड़ी में गन्ना लादकर सीवान चीनी मिल में लाते थे।  यहाँ मिले नगद रुपए से बाजार से साड़ी,  कपड़ा, राशन, मिठाई इत्यादि खरीद कर ले जाते थे। लोकगीतों में सीवान भी मौजूद है।

 “पियवा सीवान से अन्हार भइले आई……”

 नेपाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं सीवान महामानव बुद्ध का जन्म,  परिनिर्वाण तथा भ्रमण का क्षेत्र रहा है। महाभिनिष्क्रमण का वर्णन करता लोकगीत मौजूद है

“सुतला में रहनी ऐ रामा, पियवा गइले हो चोरिया…..”

 लोक नृत्य:-  सीवान में शादी-विवाह, छठियार, बुजुर्गों की तेरहवीं, ऐसे मौकों पर नाच करवाने की परंपरा है। वर्तमान समय में इसका स्थान स्टेज कलाकार, ऑर्केस्ट्रा इत्यादि ने ले लिया है।  परंतु नब्बे के दशक तक हुड़का, लौंडा नाच, पखावज,  रास के नाच, धोबिया नाच, सती बिहुला, बाला लखन्दर इत्यादि नाच और नाटकों का राज था।  इसके विशेष जानकार और कद्रदान पाए जाते थे।  हुड़का नृत्य में एक नृतक महिला वेश धारण करके नाचता है, और एक हुड़का वादक उसके पीछे-पीछे घूम कर हुड़का बजाता है। अन्य वादक गोल घेरा बनाकर हुड़का बजाते हैं। उपरोक्त वर्णित सभी प्रकार के नृत्य में पुरुष ही महिलाओं का वेश धारण करते हैं। महिलाएँ विवाह के अवसर पर डोमकच करती हैं। सावन में झूमर, कजरी इत्यादि पर नृत्य करती हैं।

 खानपान:- सिवान के व्यंजनों में गुड़ का खास उपयोग मिलता है। यह गन्ने के उत्पादन का क्षेत्र रहा है। गन्ने को पेर कर उसके रस से गुड़ बनाया जाता था। गन्ने के रस का रसियाव (एक प्रकार की खीर) यहाँ का विशेष व्यंजन है।  पकते हुए गुड़ में गाजर, बैंगन,  शकरकंद, के टुकड़े डालकर भी बहुत शौक से खाया जाता था। परंतु अब चीनी मिलें बंद हैं। गन्ने का उत्पादन बंद है,  तो गुड़ का बनना भी बंद है। गन्ने के रस और महिया से बनने वाले व्यंजन विलुप्ति की कगार पर हैं।

 सतुआ यहाँ का दूसरा प्रसिद्ध व्यंजन है। मक्का, चना, जौ, मटर इत्यादि को भूनकर, पीसकर सतुआ बनाया जाता है। यह एक तैयार (रेडी टू ईट)  व्यंजन है। केवल पानी और नमक मिलाकर सानिए और खा लीजिए। सीवान का दरौली, रघुनाथपुर, सिसवन का क्षेत्र दियारा  कहलाता है।  दियारा में बिना बर्तन के, गमछे में सतुआ सानकर  खाने का प्रचलन था । बैलों को  खरीदने बेचने, या फिर बैलगाड़ियों में बारात जाने के दौरान,  बीच दोपहर में ठहर कर सतुआ खाया जाता था। दो व्यक्ति गमछा पकड़ कर खड़े हो जाते थे, और एक व्यक्ति उसी गमछे में सतुआ सानता था। आज भी कचहरी के बाहर की सतुआ की दुकानों पर भीड़ देखकर, सीवान के सतुआ प्रेम का अंदाजा लगाया जा सकता है।

 चने के सत्तू की लिट्टी, और चोखा तो पूरे बिहार में प्रसिद्ध है। परंतु सीवान की लिट्टी थोड़ी अलग है। यहाँ सत्तु भरी लिट्टी को  पानी में उबाल लिया जाता है। पूरी तरह पक जाने के बाद, पानी से निकालकर परात में रख दिया जाता है। थोड़ा ठंडा होने के पश्चात, कढ़ाई में थोड़े से तेल में सरसों या  जीरा का तड़का लगाकर शैलो फ्राई किया जाता है। यह लिट्टी बहुत स्वादिष्ट लगती है।

 मकर संक्रांति (खिचड़ी) के मौके पर चावल और तिल के लड्डू तो पूरे बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश में बनते हैं। सीवान की विशेषता चिउरा के लड्डू  हैं।

 वेशभूषा:-  सीवान का पारंपरिक पहनावा महिलाओं के लिए साड़ी और पुरुषों के लिए धोती कुर्ता पगड़ी रहा है।  मुस्लिम समाज में पुरुष कुर्ता पजामा टोपी धारण करते हैं। महिलाएँ सूट सलवार और बुर्का या नकाब धारण करती हैं। समय के साथ आधुनिक परिधानों पैंट-शर्ट, गाउन, प्लाजो, सूट, जींस इत्यादि का प्रचलन बढ़ा है।

 भाषा:-  सीवान में हिंदी, उर्दू और भोजपुरी बोली जाती है। पढ़े-लिखे लोगों में, शहरों में हिंदी उर्दू का प्रचलन है। ग्रामीण इलाकों में भोजपुरी का बोलबाला है। कहावत है-  “कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी”  यहाँ की भोजपुरी और छपरा की भोजपुरी में अंतर मिलता है। छपरा की “बबी” यहाँ “बबुनी” हो जाती है।  जेवर गहने यहाँ “बीखो” हो जाते हैं।

 भ्रमण स्थल:-  सीवान में मैरवा धाम,  सोहगरा, राजेंद्र प्रसाद संग्रहालय जीरादेई, महेंद्रनाथ, बुढ़िया माई, कचहरी दुर्गा मंदिर, आदि प्रमुख हैं।

सीवान में हरिहाँस में टिकुली (बिन्दी) बनाई जाती है। सीवान की चूड़ियाँ भी बहुत मशहूर हैं। शांति वट वृक्ष के पास वाद्ययंत्रों की मरम्मत होती है। सीवान में प्रत्येक वर्ष डिज्नीलैंड मेला, सर्कस इत्यादि लगते हैं। फन पार्क एवं वाटर पार्क भी विकसित किए गए हैं। गाँधी मैदान पोखरा का सौंदर्यीकरण  किया गया है। पंचमंदिरा  पोखरा को जल जीवन हरियाली पार्क में विकसित किया गया है। राजेंद्र प्रसाद पार्क बच्चों के झूला झूलने एवं खेलने का प्रमुख स्थान बना हुआ है।

 सीवान बिहार का एक ऐसा जिला है,  जो अपने भीतर ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत समेटे हुए है। सीवान में प्रतिभाओं की कमी नहीं है,  केवल उन्हें निखारने और प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।

डाॅ० सुनीता मंजू

सहायक प्राध्यापिका

हिन्दी विभाग

राजा सिंह महाविद्यालय

सीवान

बिहार

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