जब मौन की चादर ओढ़कर
न्याय कोने में रोता है,
तब कोई चिंगारी मन में
क्यों नहीं विद्रोह बोता है?
बस्तियों में भूखे पेट
जब सपने दम तोड़ते हैं,
तब महलों में जश्न मनाकर
क्यों लोग मुंह मोड़ते हैं?
यह कैसा समाज है जहां
इंसान की क़ीमत नहीं,
जहां सच को दबाने की
झूठी रीतें चलती हैं
उठो, अब आवाज़ उठाओ,
और अन्याय के खिलाफ़ खड़े हो जाओ
चीलों और चमगादड़ों से बचाओ
लड़ो अन्याय ख़िलाफ़
कि अन्याय से लड़ना भी
एक नया धर्म बन जाए l
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महानगर की बेचैनी
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कांच की ऊंची-ऊंची
सपनों को क़ैद करती दीवारें
रोशनी की चकाचौंध में इंसान
झेलता अकेलापन
भागती-दौड़ती बेतहाशा जिंदगियां
रिश्तों को भूल बाज़ार बन बैठी
सोशल मीडिया के जाल में
सबकी असली मुस्कान खो सी गई है
शोरगुल भरी सड़कों पर
चीख़ती हुई ख़ामोशी बहरा बना रही है
तन्हाई के अंधेरे में
बुझ रही उम्मीदों की लौ
प्रदूषण की धुंध और गर्म हवा में
सांस लेना मुश्किल
विकास की दौड़ में
हांफती प्रकृति
मशीनों की दुनिया में
इंसानियत ख़त्म हो रही
भावनाओं के सागर में
तैरती उदासी
पर अभी भी
एक उम्मीद बाक़ी है
बदलते वक़्त के साथ
एक नयी सुबह ज़रूर आएगी….l
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शब का फ़साना
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ये रात की सियाही, कब तक रहेगी साथी?
ये ग़म के साए कब तक,
देंगे दिलों पर आघात?
हर सुबह का पैग़ाम, झूठ सा लगता है,
जब तक न बदले ये हालात
वो महफ़िलें, जहां रौशन थे चंद चेहरे,
मज़दूर के लहू से रंगे हैं हर नक़्शे
वो क़स्र-ए-शाही, जिनकी बुलंदी है फ़रेब,
ग़रीब की आहों से हैं वो लर्ज़ते
मगर सुनो, उस पार, इक शोर उठ रहा है,
जंज़ीरें टूटती हैं, हौसला जवान है
वो हाथ, जो पत्थर भी तोड़ सकते हैं,
अब हक की लड़ाई के लिए भी उठ सकते हैं
ये जुल्मत की दीवारें, ज़रूर गिरेंगी एक दिन,
ये ख़ून के चराग़ों से कब तक जलेंगी?
दीवानों के घर
वो सुबह आने को है , जब हर एक इंसान,
बराबर की ज़मीं पर चलेगा
न होगा कोई मालिक, न कोई गुलाम,
हर चेहरा हंसेगा, आज़ादी का आलम होगा
वो गीत जो दबे थे सीनों में कब से,
हर होंठ पर नाचेगा, हर दिल में होगा
उठो मेरे साथी! क़दम से क़दम मिलाओ,
ये राह-ए-तरक़्क़ी है, इसे अब तुम्हें ही तय करना है
यह शब का फ़साना अब ख़त्म होने को है,
कल का उजाला हमारा ही तो है
हमारा ही तो है….l
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धरा का धरा रह जाता है
तुम्हारा सारा का सारा ज्ञान
जब तुम निष्ठुर हो जाते हो एक स्त्री के प्रति
अचानक
भुला देते हो
वो सारे क्षण
जिसने रचा था तुम्हें प्रेम से
बनाया था सम्पूर्ण प्रेमी
जो कभी महका करती थी तुम्हारी सांसों में
रात रानी की ख़ुशबू बनकर
कि तुम एकदम अनजान बन जाते हो
उदासीन
अजनबीपना
ओढ़े
घूमते हो
पुरुष अभिमान से
जबकि नींद में आज भी वह
रोते हुए बुदबुदाती है तुम्हारा नाम!
क्या तुम किसी ऐसी औरत को जानते हो जो नींद में भी रोती है…?
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स्त्रियां उतारी गयीं
सिर्फ़ काग़ज़ या कैनवास पर
नहीं उतारीं गयीं तो बस रूह में…l
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जाने क्या पयाम लेकर सबा आयी थी,
फूल हंस तो दिया चेहरा मुरझा सा गया था।
~ प्रो असीमा भट्ट, मुंबई (महाराष्ट्र) / नवादा / बोधगया (बिहार) / दिल्ली
क्रांति सुरेश भट्ट

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