पूर्ण लोकतंत्र की स्थापना : एक किताब,एक पहल

इंजीनियर ललन कुमार की ‘किताब पूर्ण लोकतंत्र की स्थापना’ के विमोचन के अवसर पर भारत में डायवर्सिटी के प्रवक्ता एच एल दुसाध का अध्यक्षीय भाषण

इस प्रस्तुति के लिए डा. दुसाध की भूमिका
देश के 80 वें स्वाधीनता दिवस की पूर्व संध्या पर ” पूर्ण लोकतंत्र की स्थापना ” पुस्तक के विमोचन के जरिए देश में इंजी. ललन कुमार के रूप में एक विरल लेखक का उदय हुआ! इस ऐतिहासिक आयोजन में भारत सरकार के वर्तमान मंत्री श्री जीतन राम मांझी,पूर्व केंदीय मंत्री डॉ संजय पासवान, कांग्रेस ओबीसी विभाग के चेयरमैन व राहुल गांधी के मिशन डॉ अनिल जयहिंद साहब, वर्तमान में राहुल गांधी के बाद राजनीतिक रूप से सर्वाधिक सक्रिय एआईसीसी के अनुसूचित विभाग चेयरमैन और उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य के कांग्रेस प्रभारी मान्यवर राजेंद्र पाल गौतम, चर्चित महिला पत्रकार अणुशक्ति सिंह, प्रख्यात पत्रकार सह विधि विशेषज्ञ एसएएस किरमानी सहित ढेरों गणमान्य शख्सियतों ने शिरकत किया। इस आयोजन की अतिरिक्त उपलब्धि महान लेखक पत्रकार और वाजपेई जी के समय पीएमओ का कार्यभार संभालने वाले श्री सुधींद्र कुलकर्णी साहब की गरिमामयी उपस्थिति रही।पुस्तक विमोचन से जुड़े इस ऐतिहासिक आयोजन की अध्यक्षता का सौभाग्य लाभ मुझे प्राप्त हुआ! यह निश्चय ही मेरे लिए गौरव की बात थी , लेकिन जिनसे राजनीति का पाठ पढ़ा, जिन्होंने दुसाध के निर्माण में विराट भूमिका अदा की उनकी उपस्थिति किसी कार्यक्रम की अध्यक्षता करना एक बड़ा कठिन काम था, जो मैने सकुचाते हुए किसी तरह अध्यक्ष के रूप में अपनी भूमिका को पूरा किया।

अध्यक्षीय भाषण
मुख्य अतिथि मांझी साहब वह व्यक्ति रहे, जिन्होंने उस समय मूलनिवासी की आवाज बुलंद कर समाज में ऊर्जा का संचार किया था,जब समाज पूरी तरह उदभ्रांत व सुस्त पड़ा था।तब मुझे संजय पासवान साहब के साथ उन पर दो किताबें ला कर समाज में ऊर्जा भरने का अवसर मिला। डॉ संजय पासवान साहब वह शख्स हैं जिन्होंने मुझे 2004 से लेकर 2014 तक लेखन के लिए बेहद अनुकूल अवसर सुलभ कराया।उनके दिल्ली वाले आवास में ही रहकर मैने अपने जीवन का 60% लेखन किया और उन्हीं की देखरेख में बहुजन डाइवर्सिटी मिशन संगठन की स्थापना कर डायवर्सिटी मैन ऑफ इंडिया कहलाने के योग्यता अर्जित किया।आज मंच पर बैठे राहुल गांधी के मिशन मैन डॉ अनिल जयहिंद और राहुल जी के बाद राजनीतिक रूप से सबसे सक्रिय राजेंद्र पाल गौतम वो दो शख्स मंच की शोभा बढ़ा रहे हैं, जिनके बयान ही मुझे लेख लिखने की सामग्री सुलभ कराते है।अपने ऐसे आइकॉन्स के बीच कार्यक्रम की अध्यक्षता करना मेरे विवेक पर बड़ा बोझ पैदा कर दिया है, जिसका निर्वहन करने का दुस्साहस कर रहा हूँ.

खैर, सम्मानित मंच और सभागार में उपस्थित लोकतंत्र व पुस्तक प्रेमियों का हार्दिक अभिनंदन करते हुए कहना चाहता हूं आज की शाम हम इस सभागार में एक विरल लेखक के उदय का साक्षी बनने जा रहे हैं: आप खड़े होकर तालियों से इनका स्वागत करें!लोकतंत्र जैसे बेहद गंभीर मुद्दे पर लिखी गई इस पुस्तक को पढ़कर आपको कहीं से भी नहीं लगेगा कि आप किसी लेखक की पहली किताब पढ़ रहे हैं, इतने परफेक्शन के साथ यह किताब लिखी गई है!


बहरहाल इस पुस्तक के बारे में लेखक का कहना है कि “यह पुस्तक केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि लोकतंत्र के प्रति मेरी आस्था, सार्वजनिक जीवन के अनुभव, दीर्घकालीन अध्ययन , सतत चिंतन और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व की भावना का परिणाम है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि लोकतंत्र मानव सभ्यता की अब तक की सर्वश्रेष्ठ शासन व्यवस्था है । आज तक इससे बेहतर कोई ऐसी व्यवस्था विकसित नहीं हो सकी है, जो जनता को समान राजनीतिक अधिकार, शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा सामाजिक प्रगति का अवसर प्रदान करती हो। किंतु लोकतंत्र कोई स्थिर व्यवस्था नहीं है। वह समय, समाज और मानव चेतना के साथ निरंतर विकसित होने वाली व्यवस्था है। इसलिए प्रत्येक पीढ़ी का दायित्व है कि वह लोकतंत्र का अध्ययन करे, उसकी उपलब्धियों और कमियों का निष्पक्ष मूल्यांकन करे तथा उसे और अधिक प्रभावी बनाने के लिए रचनात्मक विचार प्रस्तुत करे! “

लेखक ने पूर्ण लोकतंत्र की अनिवार्य शर्तों का उल्लेख करते हुए कहा है,” जब तक जनता के भीतर अपने लोकतांत्रिक मालिक होने का बोध विकसित नहीं होगा और सरकार में बैठे तमाम जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों एवं कर्मचारियों के भीतर जनता के प्रति सेवा-भाव, उत्तरदायित्व और जवाबदेही स्थापित नहीं होगी, तब तक लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति सामान्य नागरिक के जीवन तक पूर्ण रूप से नहीं पहुँच सकती।इसलिए भारत में पूर्ण लोकतंत्र की स्थापना का पहला आधार है—जनता में मालिकाना भाव और सरकार में :बैठे जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और कर्मचारियों में सेवा-भाव!

लेकिन पूर्ण लोकतंत्र की अवधारणा केवल यहीं तक सीमित नहीं है। लेखक दृढ़ता से कहते हैं कि भारत विविधताओं का देश है। यहाँ विभिन्न सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय पृष्ठभूमि के लोग रहते हैं। लोकतंत्र की सार्थकता तभी संभव है, जब इस विविधता का सम्मान हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं और व्यवस्था में भी दिखाई दे।

इसीलिए हमारा दूसरा महत्वपूर्ण विचार है कि समाज के सभी वर्गों को उनकी संख्या के अनुपात में शासन, प्रशासन, सत्ता, संसाधनों, अवसरों, रोजगार तथा नीति एवं निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में न्यायपूर्ण भागीदारी प्राप्त हो! ऐसा कहकर लेखक ने पूर्ण लोकतंत्र की सबसे जरूरी शर्त राष्ट्र के समक्ष पेश करते हुए कहते कि कि शक्ति के समस्त स्रोतों में भारत की सामाजिक और लैंगिक विविधता का प्रतिबिम्बन ही लोकतंत्र की पूर्णता की सबसे जरूरी शर्त है!

वह कहते हैं लोकतंत्र में भागीदारी का अर्थ केवल मतदान के दिन वोट डालना नहीं हो सकता। जनता की भागीदारी शासन की प्राथमिकताओं के निर्धारण से लेकर संसाधनों के वितरण और नीति एवं निर्णय-निर्माण तक दिखाई देनी चाहिए।हम यह भी मानते हैं कि लोकतंत्र का अंतिम उद्देश्य केवल सरकार बनाना नहीं, बल्कि जनता के सामाजिक और आर्थिक जीवन में शांतिपूर्ण तरीके से सकारात्मक एवं क्रांतिकारी परिवर्तन लाना है। यहां सभागार में बैठे तमाम लोगों को यह जानना चाहिए कि आज हम लोग लोकतांत्रिक अधिकारों का जो भोग कर रहे हैं , वह कई सौ वर्षों के संघर्ष और असंख्य लोगों के प्राण बलिदान का परिणाम है,जिसका प्रायः संपूर्ण श्रेय ब्रिटेनवासियों को जाता है!

आज हम रामराज और दूसरे आदर्श राज्यों की जितनी भी तारीफ क्यों न कर लें, हमें याद रखना कि लोकतंत्र के पूर्व जो राजतंत्रीय व्यवस्था थी, उसमें आवाम के लिए न तो कोई राजनीतिक हस्तक्षेप का अवसर था और न ही सत्ता में भागीदारी का! हजारों साल के इतिहास में अवाम ने पहली बार थोड़ा अधिकार का स्वाद चखा 1096 में जब ब्रिटेन के नॉरमंडी के राजा ने अपने व्यक्तिगत हित में लॉर्ड्स, बैरन इत्यादि के सहयोग की सीधे उपेक्षा कर जनता से कुछ शर्तों पर युद्ध में साथ देने का गुजारिश किया और जनता कुछ अधिकार पाने के लोभ में उसके पक्ष में युद्ध करने का आश्वासन दिया।इतिहास में यह oath salisbury के नाम से दर्ज है!; जनता राजा को युद्ध में विजयी बनाकर थोड़े से अधिकार का जो स्वाद चखी,वह राजतंत्रीय व्यवस्था के लिए काल साबित हुआ!

ओथ सेलिसबरी से मिला अधिकार का स्वाद आवाम को 1215 में एक लंबी छलांग लगाने का सबब बना। तब स्वाक्षरित हुआ राजा और प्रजा के बीच एक संधि पत्र: चार्टर ऑफ ‘मैग्नाकार्टा’ ! मैग्नकार्टा के बाद अधिकार अर्जन का संघर्ष रुकने के बजाय और तेज होते गया और ब्रितानी जनता संपूर्ण अधिकार के लिए अगले 500 सालों तक लगातार खुद को गृह युद्ध में झोंकती रही जो 1688 में ब्रिटेश पार्लियामेंट की स्थापना तक तक लगातार संघर्षरत रही।उसे सुकून मिला तब जब 1689 में बिल ऑफ राइट्स पारित हुआ। इसके बाद ब्रिटेन बना दुनिया के लोकतंत्र की जननी और दुनिया में शुरू हुआ राजतंत्र के ध्वंस और लोकतंत्र की स्थापना का सिलसिला !

जैसा कि इस किताब के लेखक ललन कुमार ने कहा है कि लोकतंत्र कोई स्थिर विचार नहीं, बल्कि चेतना के विकास के साथ निरंतर विकसित होने वाली व्यवस्था है। बिल ऑफ राइट्स पास होने के बाद दुनिया राजतंत्र के ध्वंस और लोकतंत्र के स्थापना व्यस्त हुई तो ब्रिटेन वासी लगातार और अधिकार हासिल करने में संघर्षरत रहे! 1689 के बाद लगातार चलता रहा रहा ब्रिटेनवासियों का संघर्ष 1969 में तब जाकर थमा जब सार्विक मतदान के बाद मतदान की आयु घटाकर 18 वर्ष कर दी गई!

लेकिन लोकतंत्र की यात्रा 1969 में हो रुकी नहीं।उसके बाद 20 वीं सदी के उत्तरार्द्ध में ब्रिटेन,फ्रांस, अमेरिका ,ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड जैसे लोकतांत्रिक रूप से अग्रसर देशों ने देशों ने महसूस किया कि हजारों साल और करोड़ो लोगो के प्राण बलिदान से विकसित लोकतंत्र के लिए जनता को सिर्फ वोट देकर सत्ता परिवर्तन का अधिकार देने से ही लोकतंत्र को चिरस्थाई नहीं बानाया जा सकता : लोकतंत्र तभी बच पाएगा जब समाज के विविध सामाजिक समूहों का देश के शासन प्रशासन , संपदा संसाधनों, उद्योग,व्यापार मीडिया इत्यादि सहित शक्ति के समस्त स्रोतों में वाजिब हिस्सेदारी नहीं सुलभ कराया जाता। यह एक नई सोच थी, जिसकी पहल अमेरिका ने की।1950 से 1960 के बीच जब महान अश्वेत नेता मार्टिन लूथर किंग ने नरपशु ह्यूमन cattle बने कालों के लिए रोजगार और वोटाधिकार हेतु सिविल राइट्स मूवेंट छेड़ा उससे 1955 में नागरिक अधिकारों की पहली महिला रोजा पार्क मैकाले को बस से उतारने की घटना ने कालों के तेवर में आचानक बदलाव ल दिया और वे अपने अधिकार के लिए दंगों का सैलाब पैदा कर ने लगे।इस स्थिति से चिंतित अमेरिकी प्रेसिडेंट लिंडन बी जॉन्सन ने जस्टिस ऑटो कर्नर की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया, जिसने 8 महीने में अपनी रिपोर्ट दे दी। आयोग ने कहा था यदि देश में शांति स्थापित करना और लोकतंत को सुरक्षित रखना है तो अमेरिका के अल्पसंख्यकों : कालों,रेड इंडियन,हिस्पैनिक,एशियन मूल के लोगों संख्यनुपात देश की संपदा इत्यादि में हर जगह दिखे। लेकिन दुनिया में ऐसा कोई मिसाल नहीं था।ऐसे में लिंडन ने भारत के अंबेडकरी आरक्षण प्रणाली की आइडिया को उधार लिया और उसने भारत की तरह नौकरियों इत्यादि तक सीमित न कर जीवन के हर क्षेत्र तक प्रसारित कर दिया। उससे अमेरिकी दलित सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों, सप्लाई,डीलरशिप,हॉलीवुड फिल्मों, टीवी इत्यादि ही नहीं नासा और हार्वर्ड विश्वविद्यालय तक में वाजिब हिस्सेदारी पाने लगे। अमेरिका ने अपने विविध समाजों को ए टू जेड हर क्षेत्र में वाजिब हिस्सेदारी दिलाने का जो पॉलिसी अख्तियार किया, उसका नकल इंग्लैंड,फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया,कनाडा,न्यूजीलैंड: हर देश ने अपने अपने तरीके से किया।इस तरह विविधता नीति डायवर्सिटी पॉलिसी के जरिए पूरी दुनिया में लोकतंत्र को पूर्णता मिली। दुर्भाग्य से शक्ति के स्रोतों में विविधता नीति के जरिए लोकतंत्र को पूर्णता प्रदान कने का जो उद्योग दूसरे देशों ने लिया ,विदेशियों की बात में बात नकल करने वाले भारत के शासक वैन कर सके।किंतु तमाम क्षेत्रों में विविधता नीति लागू करके ही भारत के लोकतंत्र को पूर्णता प्रदान किया जा सकता है,इस बात को शिद्दत से महसूस किए हैं ललन कुमार ।उनकी यही चाह इस पुस्तक में बहुत असरदार तरीके से सामने आई है। इसलिए वह भारत में लोकतंत्र की पूर्णता के लिए यहां की सामाजिक और लैंगिक विविधता की झलक शासन प्रशासन, संपदा संसाधन ,रोजगार इत्यादि कर क्षेत्र में देखने की मंशा से यह ऐतिहासिक किताब तैयार किए हैं! इसके लिए वह आज से वह आज से भारत में पूर्ण लोकतंत्र की स्थापना के राष्ट्रीय अभियान के शुरुआत का शुभारंभ भी कर दिए है!

लेकिन यहां किताब के लेखक और पीपुल डेमोक्रेटिक फोरम के संस्थापक अध्यक्ष इंजी ललन कुमार से एक सवाल है, वह यह कि क्या आपने सोचा है कि आप जो अभियान शुरू करने जा रहे हैं उसके राह की क्या है चुनौतियां? इस समय साधु संतों , लेखक , पत्रकारों की मदद से एक ऐसी सरकार अप्रतिरोध्य रूप से सत्ता पर काबिज है जो इस बात में मन प्राण से विश्वास करती है कि हिंदू ईश्वर के मुख, बाहु और जंघे से उत्पन्न 7. 5% संख्या के स्वामी पुरुष ही शक्ति के स्रोतों के भोग के दैवीय अधिकारी हैं, उनको ही सब चीजों के भोग का divine rights है: शेष 92 % आबादी का शक्ति के स्रोतों का भोग अधर्म है । यही नहीं शक्ति के समस्त स्रोतों पर 80 से 90 % प्रतिशत अधिकार जमाए दैवीय अधिकारी वर्ग के लोगों की सोच भी वर्तमान सत्ताधारी वर्ग से जरा भी भिन्न नहीं है। ऐसे में मेरा सुझाव है कि आप 90 % वंचित वर्गों में शक्ति के स्रोतों को हासिल करने की उग्र चाह पैदा करने और सापेक्षिक वंचना के उभारने पर विशेष बल दें: जबतक वंचितों समूहों में शक्ति के स्रोतों पर कब्जा जमाने की उग्र चाह नहीं पनपेगी , पूर्ण लोकतंत्र की स्थापना एक सपना ही बना रहेगा!


एच एल दुसाध
संस्थापक अध्यक्ष, बहुजन डायवर्सिटी मिशन

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ISSN 2394-093X
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