‘द सेकंड सोच’: कटी हुई जुबानों के बीच सच का परचम

मीरा के पदों को तत्कालीन रूढ़िग्रस्त समाज से मिले अनादर और कड़वे बोलों ने मधुर बना दिया। जितनी गहरी वेदना एवं पीड़ा, उतनी ही उत्कृष्ट भावाभिव्यक्ति—यह बड़ा ही विचित्र समीकरण है। विष मीरा के संघर्ष में तपकर अमृत बन जाता है; उसी प्रकार निराला के विशद दुःख, काव्य में आकर सुख और सौंदर्य में रूपांतरित हो जाते हैं। रचनाधर्मिता की प्रक्रिया ही ऐसी है कि उसमें परस्पर विरोधी तत्व सिमट कर एक हो जाते हैं।
बड़े कवि जिस द्वंद्व और विषमता की अनुभूति का चित्रण करते हैं, उस द्वंद्व से मुक्त जीवन का स्वप्न भी अवश्य दिखा देते हैं। यही अनुभूति की प्रामाणिकता है। तुलसी ने जिस दुःख-द्वंद्व का अनुभव किया, साहित्य में उन दुखों से मुक्ति के लिए ‘रामराज्य’ का सपना दिखाया। कबीर ने विषम परिस्थितियों और तज्जनित दुखों से मुक्ति के लिए तीखे दंश और प्रखरता का मार्ग चुना। शेक्सपियर की त्रासदीपूर्ण रचनाएं कहीं न कहीं नई व्यवस्था को संकेतित करती हैं। संत ज्ञानेश्वर की ‘ज्ञानेश्वरी’ का उत्स उनके दुखी जीवन में ही ढूंढा जा सकता है।
इन सभी व्यक्तियों ने दुःख को अपने जीवन की शक्ति बनाया। वे टूटे नहीं, बिखरे नहीं, बल्कि दुखों से ऊर्जा ग्रहण कर जनहित के लिए समर्पित हो गए। दुःख मानव-जीवन का अटूट अंग है। दुःख प्रायः मनुष्य को तोड़ देता है, असफलता की ओर धकेल देता है; पर कब? जब दुखों को व्यक्ति अपनी कमजोरी बना लेता है। किंतु जब इसी कमजोरी को शक्ति बना लिया जाता है, तो वह सृजन बन जाता है।

चेखव के शब्दों में— “मनुष्य अपने दुखों को महिमा मंडित करता है, इसमें उसे सुख मिलता है, यह स्वपीड़न-प्रमोद है। पर कुछ समय बाद मैं इस व्यक्तिगत दुःख के इस मोहजाल से बाहर निकल गया। वही दुःख जीवन में आता जाए, तो उन पर कहाँ तक लिखा जाए? फिर मैंने देखा कि दुख और भी है। इसमें मेरी संवेदना का विस्तार हुआ फिर मैंने देखा कि जीवन में बेहद विसंगतिया है— अन्याय, पाखंड, छल, दुमुँहापन, अवसरवाद और असामंजस्य आदि।“
चेखव की भांति सुनीता झाड़े ने भी अपने दुखों को महिमामंडित करने के स्थान पर अपनी संवेदना का विस्तार करते हुए दूसरों के दुखों को कम करने का प्रयास किया है। यह सच ही है कि दुखों की तपिश मनुष्य के जीवन में और भी अधिक तराश और निखार ले आती है। अज्ञेय ने भी कहा है कि “दुःख मनुष्य को माँजता है।” सुनीता झाड़े के जीवन को निकट से देखने पर ऐसा ही प्रतीत होता है। उनकी जगह कोई दूसरा होता तो वह बहुत पहले ही जीवन के दुखों से विचलित हो जाता अथवा हीनता-ग्रंथि का शिकार बन जाता, किंतु सुनीता झाड़े निरंतर चुनौतियों का सामना करती दिखाई देती हैं।
उनके काव्य संग्रह का शीर्षक ‘द सेकंड सोच’ बेहद संवेदनशील एवं विचारोत्तेजक है। कहीं न कहीं यह शीर्षक सीमोन द बोउआर की पुस्तक ‘द सेकंड सेक्स’ की याद दिलाता है। सीमोन जहाँ अपनी पुस्तक के माध्यम से स्त्री-प्रश्नों की जड़ पर प्रहार करती हैं, वहीं सुनीता झाड़े ‘द सेकंड सोच’ से स्त्री जीवन की चौतरफा लड़ाई को मुखर करती दिखाई देती हैं। वे मानती हैं कि स्त्री के संघर्ष की लड़ाई उसे घर-बाहर, दोनों ही जगह हर स्तर पर लड़नी पड़ती है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने स्त्री को हमेशा दोयम दर्जा दिया है। भारत ही नहीं, संपूर्ण विश्व में (यहाँ तक कि पाश्चात्य संस्कृति में भी) स्त्रियों को पुरुषों से हीन एवं कमतर आंका गया है। स्त्री की व्याख्या ही ‘अपूर्ण पुरुष’ (Imperfect Man) के रूप में की गई है। सीमोन द बोउआर के अनुसार— “कोई भी स्त्री बनकर पैदा नहीं होती, बल्कि बना दी जाती है (She is not born, but rather becomes a woman)।” बोउआर का यह कथन स्त्री मुक्ति आंदोलन के शीर्ष स्थान पर है।
सुनीता झाड़े ने स्त्री जीवन की पीड़ा को बहुत नजदीक से देखा है। बचपन से लेकर बड़े होने तक अपने आसपास की महिलाओं की घुटन भरी जिंदगी को समझा है। वे स्वयं भी इस दर्द को महसूस करती हैं। यही कारण है कि ‘द सेकंड सोच’ की अधिकांश कविताओं में स्त्री-वेदना की अनेक परतें खुलती चली जाती हैं। लेकिन मूक रहकर उनका सामना करने के बजाय वे कहती हैं:
“तब सहस्र शस्त्रों की उस दुनिया में मुझे भी एक शस्त्र मिला कलम का शस्त्र…”
इसी कलम के शस्त्र द्वारा वे शोषण और यातना के अंधकार में छटपटाने वाली स्त्री को उबरने की प्रेरणा देती हैं।
20वीं शताब्दी में आधुनिक स्त्रीवादी विचारधारा को स्पष्ट रूप से सामने लाने का श्रेय प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखिका वर्जीनिया वूल्फ को है। ‘अ रूम ऑफ वन्स ओन’ पुस्तक के माध्यम से वर्जीनिया ने वैचारिक जगत में स्त्री के स्वतंत्र स्थान निर्माण की आवश्यकता पर बल दिया। यदि हम अपने ही देश के इतिहास में झांकें, तो स्त्री की अस्मिता पर सर्वप्रथम प्रश्न खड़ा करने वाली स्त्री द्रौपदी है, जिसने भरी सभा में यह सवाल उठाया था कि वह कोई वस्तु नहीं है जिसे जुएं में दांव पर लगा दिया जाए।
स्त्रियों को ‘उपभोग की वस्तु’ के रूप में देखने का दृष्टिकोण आज भी जारी है। आज भी समाज उन्हें उपेक्षित और कमजोर ही देखना चाहता है। सुनीता झाड़े की कविताओं में इसी घृणित मानसिकता के विरुद्ध चीख सुनाई देती है।
इस संदर्भ में कई बार औरतें भी दोषी साबित होती हैं। ‘हम गुनहगार औरतें’ में इसी भयावह सच्चाई को बेनकाब किया गया है। औरतें आजीवन अपने ही घर में ‘सजायाफ्ता’ बनकर जुर्म के कागजों पर दस्तखत करती रहती हैं। पहल करने के बजाय वे अपने साथ होने वाले जुल्मों-अत्याचारों को बर्दाश्त करती रहती हैं, लेकिन कुछ कहने का साहस नहीं जुटा पातीं। कविता की अंतिम पंक्तियां, जो पाकिस्तान की मशहूर शायरा किश्वर नाहिद की हैं, काबिले-गौर हैं। औरतों के विरोध न करने का कारण भी उसमें छुपा हुआ है:
“हाँ, हम गुनहगार औरतें हैं,
कि सच का परचम उठा के निकलें
तो झूठ की शाहराहें अटी मिली हैं,
हर एक दहलीज पे सजा की दास्तानें रखी मिली हैं,
जो बोल सकती थीं वो ज़बानें कटी मिली हैं।”
जब मुँह खोलने की सजा सीधे ज़बान काट कर दी जाती हो, तो कोई कैसे बगावत करे? स्त्री जीवन की वेदना और छल पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, लेकिन एक बात यकीन के साथ कही जा सकती है कि सुनीता ने जिस प्रकार स्त्री जीवन के विभिन्न प्रश्नों को उजागर किया है, उसमें ताजगी और नयापन है।
एक अन्य कविता ‘मुझ पर टिकी सारी निगाहें’ में स्त्री जीवन की भयावह सच्चाई को बेनकाब किया गया है। स्त्रियों की ओर उठती बेकाबू नजरें जो अक्सर उन्हें अपने शिकंजे में दबोच लेना चाहती हैं, उनसे बच पाना कितना मुश्किल है। औरतें मानो पुरुषों के लिए वक्ष से लदे वृक्ष के समान होती हैं, जिसे अपनी हवस का शिकार बनाने के लिए वे हमेशा आतुर रहते हैं।
‘रेप’ की घटनाओं पर केंद्रित कविता ‘सुर्खियों के पल में पल रही…’ में खबरों का भयानक सच उजागर होता है। जब एक मासूम बेटी पूछती है— “पापा यह रेप क्या होता है?”—तो पिता के पास कोई जवाब नहीं होता।
स्त्री जीवन की एक और त्रासदी जो पति के गुजर जाने पर उन्हें कुमकुम लगाने से रोकती है। ‘कुमकुम में लिपटी औरतों’ के माध्यम से सुनीता झाड़े समाज की इसी रूढ़ि पर तंज कसती हैं। विशेष अवसरों पर उन्हें टाल दिया जाना, मानो वैधव्य कोई छूत की बीमारी हो, सबसे बड़ी विडंबना है। पुरुषों को ‘विधुर’ होने के बाद ऐसी किसी रोक-टोक का सामना नहीं करना पड़ता।
सुनीता झाड़े का यह पहला हिंदी काव्य संग्रह होते हुए भी मनुष्यता की गहरी और साझी सृजनात्मकता का जीवंत प्रमाण है। मानव-मन को गहराई से छूने वाली रचना ही सही मायने में मुकम्मल होती है। रॉबर्ट फ्रॉस्ट कहते हैं,
“गहन सघन मनमोहक वन तरु मुझको आज बुलाते हैं,
किंतु किए जो वादे मैंने, याद मुझे आ जाते हैं।
अभी कहाँ आराम बदा है, मूक निमंत्रण छलना है,
अरे अभी तो मीलों मुझको, मीलों मुझको चलना है।” सुनीता पर यह बात पूरी तरह लागू होती है। खुद से जो वादा उन्होंने किया है, उसे वे पूरी ईमानदारी और निष्ठा से निभा रही हैं। साहित्यिक लेखन तभी वजूद में आता है, जब लेखक के भीतर एक ऐसी ‘अंदरूनी शक्ति’ मौजूद हो, जिसे न वह समझ सकता है और न ही नजर अंदाज कर सकता है। ऐसा लगता है कि सुनीता के साथ भी कुछ ऐसा ही है। क्योंकि लिखने की जब बात होती है, तो सभी लोग लिख नहीं पाते, वरना इस दुनिया में हर व्यक्ति रचनाकार होता। आप तभी लिख पाते हैं, जब लेखन आपकी रूह से खुद से ही एक रॉकेट की तरह स्वतः ही बाहर न आएं; आने को बेताब न हो जाए; जब तक वह आपको पागलपन की हद तक मजबूर न कर दे। एक अच्छी कविता वक्त मांगती है, जुनून मांगती है आपसे आपका वजूद मांगती है। ये किसी की फरमाइश या पैसों के लिए नहीं लिखी जा सकती और इनके साथ किसी भी तरह का कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
सुनीता की कविताओं में बनावटीपन या कृत्रिमता नहीं है। वे पूरी पारदर्शिता और प्रामाणिकता के साथ लिखी गई हैं। सुनीता ने स्वयं कहा है कि असमानता और यथार्थ के बोध से जन्मी इन कविताओं में एक टीस है, सब्र है और एक कचोट है। उनकी कविता ‘धार’ इसकी मिसाल है, जहाँ वे समाज की लूटपाट और भ्रष्टता के खिलाफ लड़ने के लिए अपने ‘भीतरी अंगों’ में धार लगवा लेने की बात करती हैं।
सुनीता की नज़र से उन बेबस-लाचार लोगों की पीड़ा छिप नहीं पाती, जो सड़क पर लगी अपनी दुकान को तहस-नहस होते देखते हैं, लाठियां खाते हैं और चीखते-चिल्लाते रह जाते हैं। ‘बसेरा लुटे फड़फड़ाते पंछियों’ के माध्यम से उन्होंने गरीब दुकानदारों की मर्मांतक पीड़ा को व्यक्त किया है। सुनीता की पैनी नज़र इन बेबस मासूमों की वेदना को अपनी कविता ‘बुलबुल’ में बखूबी महसूस करवाती है।
आज हम पर्यावरण के बढ़ते प्रदूषण से पीड़ित हैं। सुनीता की एक छोटी सी कविता है ‘तस्वीर’, जो आकार में लघु होने के बावजूद अत्यंत सशक्त है। इसमें वे मानती हैं कि जीवन के लिए—
‘एक प्याली पानी,
एक थाली धूप,
एक कटोरी हवा
और बाहों भर पेड़’ — बस!
जीवन के लिए इतना ही काफी है, ऎसी मानती हैं।
इसी संदर्भ में ‘एक घर पेड़ों का’ अत्यंत संवेदनशील कविता है। अक्सर कहा जाता है कि घरों में इंसान रहते हैं, लेकिन सुनीता की नज़र में इस घर में सिर्फ पेड़ रहते हैं।
चार बुजुर्ग पेड़ों में
बारिश-बाढ़ पर बातें चलती हैं
फलक, पंछी, प्राणी और पानी
की खुशहाली के लिए
घर के ‘जवान पेड़’ व्यस्त रहते हैं
इन पेड़ों में
इंसानों का नाम सुनते ही
पत्तों में कंपकंपी सी होती है
उन कातिलाना हमलों को याद कर…
आज के सोशल मीडिया के दौर में प्रचलित क्षणिक प्रतिक्रियाओं पर उनकी कविता ‘इनबॉक्स लव’ में अच्छा-खासा कटाक्ष मिलता है।
शायद ही किसी रचनाकार ने इतनी ईमानदारी से अपनी बात कही हो, जैसी सुनीता ने ‘खून मेरे में’ कही है:
“अब जैसा चाहती हूँ वैसा लिख नहीं पाती,
बजाय जैसे चाहिए वैसा लिख देती हूँ…
कोई अगर मुझे मेरी कलमकारी के पैसे दे,
तो शायद मैं मेरा कुछ लिखूँ…
मुनाफाखोरी ने खून कर दिया है
मेरे अंदर के कवि का
मगर अफसोस
यह खून मेरे अकेले का नहीं है…”
किसी भी कवि के लिए अपने भीतर की आवाज़ को दबाकर कुछ और लिखना आसान नहीं होता। इस पीड़ा को केवल वही समझ सकता है जो इस द्वंद्व से गुजरता है।
‘द सेकंड सोच’ संग्रह के दूसरे भाग ‘मैं और मेरी चुस्की भर चाय’ में 14 कविताएँ हैं, जिनका कोई पृथक शीर्षक नहीं है। इनकी खूबी यह है कि दोपहर 4:00 बजे सड़क किनारे चाय पीने के दौरान आसपास घटने वाली छोटी से छोटी बात का इसमें बखूबी आकलन हुआ है।
“साले, मरा हुआ कुत्ता खाकर पैदा हुआ था क्या, एक रुपया नहीं छोड़ता…”
जैसे लोक-कथनों को सुनकर उन पर कविता रच डालना हर किसी के बस की बात नहीं। यहाँ कहीं सुकून भरी चाय की चुस्की है, तो कहीं उस चुस्की में खलल डालती अजीब सी बेचैनी। यहाँ चाय पीते हुए शिफ्ट से लौटते दादाजी हैं, कहीं किसी औरत का बेफिक्र अंदाज़ है, तो कहीं इयरफोन लगाए संगीत में खोया युवक। कहीं पार्क में प्रेमी युगल को देख अपने खोए हुए प्यार की याद है, तो कहीं कुत्ते और इंसान के व्यवहार की विचित्र समानता।
‘तुम्हारे बाद’ जो इस संग्रह का तीसरा भाग है, उसमें 11 कविताएँ हैं। ये सभी रचनाएँ पति की स्मृतियों में लिपटी हुई हैं। पति के बिछोह की पीड़ा केवल उस क्षण तक सीमित नहीं होती, वह तो ताउम्र साथ चलती है। वेंटिलेटर की स्क्रीन पर दौड़ती रेखाओं को देखकर सुनीता का यह सोचना कि —
“मैं ढूँढ रही थी कि
इनमें से कौन सी रेखा खींचकर लाऊँ
तुम्हारे हाथों की लकीरों के लिए”
पाठक को भावुक कर देता है।
इस दर्द को वही समझ सकता है जिसने अपना कोई खास खोया है। उन यादों को फिर से याद करना…
“देखो तो, देखो तो इसे
क्या हो गया है, कुछ बोलती नहीं
बेबस अपनी ही, लाश के समीप बैठ
जग जाने की गुहार लगाता दिल
बार-बार..”
दिल को न केवल छू लेती है बल्कि द्रवित कर देती है।
यादें भी कैसी जो कभी गुदगुदाती हैं, कभी खोजती हैं, तो कभी रुलाती हैं। “कितना मुश्किल होता है
किसी अपने का नहीं होना,
अपने सपने का कहीं
नहीं होना…” खास-तौर पर उस समय जब आप किसी हँसते-खिलखिलाते परिवार को देखते हों।
ये सभी कविताएँ पाठक की आँखों को भिगो देती हैं। इनमें प्रामाणिकता है, पारदर्शिता है और कहीं कोई बनावटीपन नहीं, केवल सच्चाई का बयान है। वह सोचती हैं कि,
“पता नहीं तुम मेरे बारे में क्या सोचते हो,
जबकि तुम कहीं नहीं हो…
पता नहीं तुम क्या सोचोगे,
क्या कहोगे…
अभी भी सीखना है यह ‘जहर’
बाद तुम्हारे… तुम्हारे बाद”
कविताओं की भाषा अत्यंत सहज-स्वाभाविक है। इन्हें पढ़कर लगता है मानो जो बात दिल से निकली, वह ज्यों की त्यों कागज़ पर उतर गई हो। हिंदी मातृभाषा न होते हुए भी सुनीता ने जिस बेबाकी और पकड़ के साथ लिखा है, वह प्रशंसनीय है। उनकी शैली संवादपरक है, जिसमें कोई व्यर्थ की तुकबंदी नहीं है। चाहे लघु कविताएँ हों या दीर्घ, प्रत्येक रचना सशक्त और प्रभावशाली है। कविता यदि पाठक को अपनी सी लगे, तभी वह सफल मानी जाती है। इस मानदंड पर सुनीता झाड़े की कविताएँ पूरी तरह खरी उतरती हैं। ये कविताएँ न केवल पाठक को द्रवित करती हैं, बल्कि उनके मानस को झकझोरती भी हैं।

-डॉ. वीणा दाढे
प्रोफेसर एवं पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष
रा.तु.म नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर

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