शहादत दिवस विशेष
विकाश सिंह मौर्य
भारतीय सामाजिक इतिहास और बहुजन राजनीति के अध्ययन में बाबू जगदेव प्रसाद (1922-1974) का व्यक्तित्व एक क्रांतिकारी मोड़ का प्रतिनिधित्व करता है। जिन्हें ‘बिहार का लेनिन’ या ‘भारत लेनिन’ की उपाधि दी गई, जगदेव प्रसाद ने न केवल शोषित-वंचित-पिछड़े वर्गों के लिए एक मौलिक राजनीतिक-सांस्कृतिक ढाँचा तैयार किया, बल्कि प्रतीक-राजनीति के क्षेत्र में भी एक वैकल्पिक संस्कृति का निर्माण किया। 5 सितम्बर 1974 को बिहार के अरवल (पूर्व जहानाबाद) ज़िले के कुर्था में पुलिस फ़ायरिंग में उनकी हत्या को ‘शहादत दिवस’ के रूप में याद किया जाता है, और यह घटना भारतीय लोकतंत्र, बहुजन चेतना और सवर्ण-विरोधी संघर्ष के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ बन गई।
जगदेव प्रसाद के जीवन और विचारधारा पर हिंदी अकादमिक साहित्य में पर्याप्त कार्य नहीं हुआ है, जबकि उनकी विरासत पर राजनीतिक दलों द्वारा लगातार दावा किया जा रहा है। बिहार की राजनीति में मंडल आंदोलन से लेकर नीतीश कुमार तक, और बहुजन समाज पार्टी से लेकर राष्ट्रीय जनता दल तक, हर दल जगदेव बाबू के नाम से जुड़ना चाहता है, लेकिन मूल विचारधारा से विचलन स्पष्ट दिखाई देता है। इसलिए, एक व्यवस्थित अकादमिक विश्लेषण की आवश्यकता है जो उनकी विचारधारा, प्रतीक-राजनीति और शहादत दिवस के ऐतिहासिक-समाजशास्त्रीय आयामों को समझे। यह लेख निम्नलिखित केंद्रीय बिंदुओं पर केंद्रित है:
- बाबू जगदेव प्रसाद की हत्या (5 सितम्बर 1974) को ‘शहादत दिवस’ के रूप में स्मरण करने की राजनीति ने बिहार और उत्तर भारत की बहुजन चेतना को कैसे आकार दिया?
- प्रतीक-राजनीति में भैंस, गोरी कलइयां और लोक-संस्कृति के प्रयोग ने सवर्ण-हिंदुत्व की गाय-प्रतीकता के विरुद्ध कैसे एक वैकल्पिक सांस्कृतिक-राजनीतिक ढाँचा तैयार किया?
- जगदेव प्रसाद के समय (1922-1974) की सामाजिक संरचना, राजनीतिक संदर्भ और सांस्कृतिक द्वंद्व को कैसे समझा जा सकता है, और इसकी निरंतरता वर्तमान पिछड़ावाद की राजनीति में कैसे दिखाई देती है?
- जगदेव प्रसाद का ‘नब्बे बनाम दस प्रतिशत’ सिद्धांत जाति-वर्ग विश्लेषण के सैद्धांतिक ढाँचे में कैसे फिट होता है, और इसकी वर्तमान प्रासंगिकता क्या है?
यह अध्ययन ऐतिहासिक-समाजशास्त्रीय पद्धति पर आधारित है, जिसमें निम्नलिखित स्रोतों का उपयोग किया गया है:
– प्राथमिक स्रोत: जगदेव प्रसाद के भाषण, साक्षात्कार, शोषित समाज दल के दस्तावेज़, समकालीन समाचार रिपोर्ट।
– द्वितीयक स्रोत: अकादमिक लेख, शोध-पत्र, जीवनी, विश्लेषणात्मक निबंध।
– मौखिक इतिहास: प्रत्यक्षदर्शियों के विवरण, श्रद्धांजलि सभाओं के अभिलेख।
– सांस्कृतिक विश्लेषण: लोक-गीत, लोक-कथाएं, प्रतीक-राजनीति के उदाहरण।
डेटा संग्रह की प्रक्रिया में वेब-आधारित स्रोतों, अकादमिक डेटाबेस और मौखिक इतिहास के रिकॉर्ड का उपयोग किया गया। डेटा विश्लेषण के लिए गुणात्मक पद्धति अपनाई गई, जिसमें विषय-वार कोडिंग, थीमेटिक विश्लेषण और तुलनात्मक अध्ययन शामिल है।
सैद्धांतिक ढाँचा
इस अध्ययन के लिए निम्नलिखित सैद्धांतिक ढाँचे का उपयोग किया गया है:
– जाति-वर्ग अंतःक्रिया: फुले, अंबेडकर, लोहिया और जगदेव प्रसाद के विचारों का संश्लेषण।
– प्रतीक-राजनीति: सांस्कृतिक अध्ययन, प्रतीक-विश्लेषण और बहुजन संस्कृति का सैद्धांतिक आधार।
– शहादत और स्मृति-राजनीति: शहीद की स्मृति का राजनीतिक उपयोग, स्मृति-स्थलों का निर्माण और विचारधारा की निरंतरता।
– सामाजिक आंदोलन सिद्धांत: शोषित समाज दल का संगठन, नेतृत्व, और आंदोलन की गतिशीलता।
– बहुजनवाद: दलित-पिछड़े-मुसलमान-आदिवासी के संयुक्त राजनीतिक-सांस्कृतिक ढाँचे का विश्लेषण।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: जगदेव प्रसाद का समय और संदर्भ
बाबू जगदेव प्रसाद का जन्म 2 फरवरी 1922 को बिहार के जहानाबाद (वर्तमान अरवल) ज़िले के कुर्था प्रखंड के कुरहरी गाँव में एक कुशवाहा (कोइरी/दाँगी) कृषक परिवार में हुआ। यह वह समय था जब भारत अभी भी ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के अधीन था और स्वतंत्रता आंदोलन जोर पकड़ चुका था। औपनिवेशिक भारत की सामाजिक संरचना अत्यंत जटिल थी। जाति व्यवस्था, ज़मींदारी प्रथा और सामंती शोषण गहराई से जड़ें जमाए हुए थे। ऊँची जाति के लोग (ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ, भूमिहार) राजनीति, प्रशासन, शिक्षा और अर्थव्यवस्था पर हावी रहे। दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्ग, मुसलमान और अन्य शोषित समूह सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक शोषण के शिकार रहे।
स्वतंत्रोत्तर भारत (1947 के बाद) में सामाजिक संरचना में कोई मौलिक बदलाव नहीं आया। संविधान में समानता और सामाजिक न्याय के प्रावधान थे, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर जाति व्यवस्था, ज़मींदारी प्रथा, और सामंती शोषण बरकरार रहे। 1950 के दशक में ज़मींदारी उन्मूलन के प्रयास हुए, लेकिन इनका लाभ मुख्य रूप से मध्यम किसान वर्ग (कुलक) को मिला न कि दलित-पिछड़े मज़दूरों को।
1950 से 1974 के बीच बिहार की राजनीति में कई महत्वपूर्ण बदलाव आए:
– कांग्रेस का वर्चस्व: स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस पार्टी का बिहार पर पूर्ण वर्चस्व रहा, लेकिन यह वर्चस्व ऊँची जाति के नेताओं के हाथों में केंद्रित था। श्रीकृष्ण सिंह, बिनुदानंद झा और अन्य ऊँची जाति के नेता कांग्रेस पर हावी रहे।
– समाजवादी आंदोलन: राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में समाजवादी आंदोलन ने बिहार में जड़ें जमाईं और जगदेव प्रसाद इससे प्रभावित हुए। लोहिया ने जाति और वर्ग के अंतःसंबंध को समझा और पिछड़े वर्गों के अधिकारों की बात की।
– किसान आंदोलन: 1960 और 1970 के दशक में बिहार में किसान आंदोलन जोर पकड़े, जिसमें नक्सलवादी धारा भी शामिल थी। नक्सलबाड़ी आंदोलन (1967) का प्रभाव बिहार में भी दिखा। जगदेव प्रसाद ने इससे प्रेरणा ली, लेकिन वे नक्सलवाद की सीमाओं को भी समझते थे।
पिछड़े वर्ग और दलितों में जातिगत चेतना बढ़ी, और उन्होंने अपनी राजनीतिक पहचान बनानी शुरू की। 1967 के आम चुनावों में पिछड़े वर्ग के उम्मीदवारों की संख्या बढ़ी, और जगदेव प्रसाद भी इसी लहर में विधायक चुने गए। जगदेव प्रसाद की राजनीतिक यात्रा समाजवादी आंदोलन से शुरू हुई। वे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य बने और 1967 में बिहार विधान सभा के सदस्य चुने गए। 1968 में सतीश प्रसाद सिंह मंत्रिमंडल में वे चार दिनों के लिए बिहार के उपमुख्यमंत्री भी बने। लेकिन उन्होंने जल्दी ही महसूस किया कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस दोनों पर सवर्ण-कुलक वर्चस्व बना हुआ है। 25 अगस्त 1967 को उन्होंने ‘शोषित दल’ की स्थापना की, जो बाद में ‘शोषित समाज दल’ (SSD) बना। 7 अगस्त 1972 को रामस्वरूप वर्मा के साथ मिलकर उन्होंने शोषित समाज दल का गठन किया।
इस दल ने बिहार में पिछड़े वर्ग और दलितों की राजनीतिक चेतना को एक नई दिशा दी। जगदेव बाबू ने कहा था कि “भविष्य शोषित दल का ही है। हम किसी पर जुल्म नहीं करना चाहते, लेकिन किसी का ज़ुल्म बर्दाश्त करने के लिए तैयार भी नहीं हैं।” अपने लोगों के अंदर जागृति लाने के लिए वे “शोषित” नाम से पत्रिका निकालते थे।
5 सितम्बर 1974 का दिन भारतीय राजनीति और सामाजिक इतिहास में एक काला दिन माना जाता है। उस समय भारत में आपातकाल की तैयारी चल रही थी, और जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में ‘संपूर्ण क्रान्ति’ आंदोलन जोर पकड़ चुका था। जगदेव प्रसाद ने इस आंदोलन से खुद को अलग कर लिया था, क्योंकि उनके अनुसार इसमें शोषित वर्गों (दलित, पिछड़े, मुसलमान) की भागीदारी मनोकुल नहीं थी। उस दिन शोषित समाज दल (SSD) ने ज़िले के कई ब्लॉकों में इंदिरा गांधी की तानाशाही के विरोध में कार्यक्रम आयोजित किए थे। जगदेव बाबू ने करपी ब्लॉक में एक विरोध सभा को संबोधित करने के बाद कुर्था प्रखंड के कार्यक्रम में भाग लिया।
कुर्था प्रखंड कार्यालय के सामने हजारों प्रदर्शनकारियों के बीच जब वे सत्याग्रह कर रहे थे और भीड़ को संबोधित कर रहे थे, तभी पुलिस ने उन पर गोली चला दी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, पुलिस केवल गोली मारने तक ही नहीं रुकी थी। गोली लगने के बाद भी जगदेव बाबू ने पुलिस की बर्बरता के खिलाफ खड़े रहने का प्रयास किया, लेकिन पुलिस ने उन्हें घायल अवस्था में घसीटते हुए थाने ले जाकर मार डाला। एक छात्र लक्ष्मण चौधुरी (लक्ष्मण पासवान) भी इसी फ़ायरिंग में घायल हुए और बाद में उनकी भी मृत्यु हो गई। जगदेव प्रसाद भारत के पहले जननायक थे जिनकी हत्या भाषण देते समय हुई। उनकी हत्या के बाद बिहार में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए, और शोषित समाज दल ने इस घटना को शोषक वर्ग की बर्बरता के प्रतीक के रूप में पेश किया।
राजनीतिक प्रेरणाएँ और साजिश
जगदेव प्रसाद की हत्या के पीछे केवल एक व्यक्तिगत विरोध नहीं, बल्कि एक व्यवस्थागत साजिश थी। उस समय बिहार में समाजवादी आंदोलन, जातिगत संघर्ष और कृषक आंदोलन चरम पर थे। जगदेव बाबू ने 1967 में ‘शोषित दल’ की स्थापना की थी, जिसने बिहार में पिछड़े वर्ग और दलितों की राजनीतिक चेतना को एक नई दिशा दी। उनका विश्लेषण था कि भारतीय समाज स्पष्ट रूप से दो वर्गों में विभाजित है: दस प्रतिशत शोषक (पूंजीपति, सामंती, ऊँची जाति) और नब्बे प्रतिशत शोषित (किसान, मज़दूर, दलित, मुसलमान, आदिवासी)। उन्होंने कहा था कि “दस का शासन नब्बे पर, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा।” यह विचारधारा सवर्ण-सत्ता के लिए सीधी चुनौती थी।
जगदेव बाबू ने केवल आर्थिक शोषण का विरोध नहीं किया, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक शोषण का भी विरोध किया। उन्होंने हिंदुत्व की गाय-प्रतीकता के विरुद्ध ‘भैंस’ को बहुजन संस्कृति का प्रतीक बनाया, और ‘गोरी कलइयां’ के मुद्दे को उठाया। यह सब सवर्ण वर्चस्व के लिए सीधी चुनौती थी।
5 सितम्बर को ‘शहादत दिवस’ के रूप में याद किया जाता है और हर साल बिहार और उत्तर भारत के कई ज़िलों में श्रद्धांजलि सभाएं, रैलियां और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि इस स्मृति का राजनीतिक उपयोग अक्सर मूल विचारधारा से विचलन के साथ होता है। जगदेव प्रसाद की विरासत पर कब्जा जमाने के लिए बिहार की सियासी पार्टियों (RJD, JDU, BSP, BJP) में होड़ मची हुई है। अधिकांश नेता जगदेव बाबू की मूर्ति तो पूजते हैं, लेकिन उनकी विचारधारा (शोषितों का 90 प्रतिशत हिस्सा, भैंस का प्रतीक, सवर्ण-विरोधी चेतना) से विचलित हैं। शहादत दिवस केवल एक व्यक्ति की मौत की याद नहीं, बल्कि उस विचारधारा की निरंतरता का प्रश्न है जो शोषित वर्गों को सत्ता, शिक्षा, ज़मीन और संस्कृति में बराबर का हिस्सा देने की बात करती थी।
शहादत के बाद की राजनीतिक निरंतरता
जगदेव प्रसाद की हत्या के बाद बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। मंडल कमीशन के लागू होने, बिहार में लगातार किसान-दलित मुख्यमंत्रियों (दरोगा प्रसाद राय से नीतीश कुमार और उनके सम्राट चौधरी) के सत्ता में आने के पीछे उनकी चेतना का योगदान रहा। जगदेव प्रसाद शोषित दल और अर्जक संघ से जुड़े और गरीबों, पिछड़ों, दलितों और वंचितों के अधिकार के लिए आंदोलन चलाते रहे। बाद में कांशीराम ने बसपा की स्थापना की, जिसने जगदेव बाबू की विचारधारा को आत्मसात किया, लेकिन उसकी क्रान्तिकारी धारा को कमज़ोर कर दिया।
प्रतीक-राजनीति: भैंस, गोरी कलइयां और सांस्कृतिक प्रतिरोध का सैद्धांतिक विश्लेषण
जगदेव प्रसाद की सबसे मौलिक देन प्रतीक-राजनीति के क्षेत्र में है, जहाँ उन्होंने हिंदुत्व की गाय-प्रतीकता के विकल्प के रूप में भैंस को बहुजन संस्कृति का प्रतीक बनाया। हिंदुत्व की राजनीति में गाय को पवित्र, आध्यात्मिक और सवर्ण संस्कृति का प्रतीक माना जाता है, जबकि भैंस को अशुद्ध, नीच और दलित-पिछड़ों से जुड़ा माना जाता है। जगदेव बाबू ने इस द्वंद्व को उलट दिया और भैंस को गरिमा, श्रम और प्रतिरोध का प्रतीक बनाया। उन्होंने कहा था:
“सदा भैसिया दाहिने, हाथ में लीजै लट्ठ। पाँच देव रक्षा करें, दूध दही घी मट्ठ।।”
यह नारा केवल एक लोक-कथन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक-राजनीतिक घोषणा थी, जो कृषि-आधारित, श्रम-प्रधान बहुजन संस्कृति को सवर्ण-हिंदुत्व की आध्यात्मिक-पौराणिक गाय-प्रतीकता के विरुद्ध खड़ा करती है। भैंस, जो दलित-पिछड़े वर्गों की आर्थिक जीवनरेखा रही है, को उन्होंने गरिमा और प्रतिरोध का प्रतीक बनाया। “अबकी सावन-भादों में गोरी कलइयां काँदों में” जैसे नारे में ‘गोरी कलइयां’ का मुद्दा भी इसी संदर्भ में आता है, जहाँ सवर्ण वर्चस्व की पहचान गोरे रंग, संस्कृत-प्रधान संस्कृति और ऊँची जाति की शारीरिक-सांस्कृतिक विशेषताओं से जोड़ी गई है, जबकि बहुजन समाज की पहचान मेहनत, कृषि, पशुपालन और लोक-संस्कृति से है। जगदेव प्रसाद ने इस द्वंद्व को स्पष्ट किया और बहुजन समाज को अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करने का आह्वान किया। उनका मानना था कि भारतीय समाज में सवर्ण वर्चस्व केवल आर्थिक या राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक भी है। गोरी कलइयां, संस्कृत भाषा, पौराणिक कथाएं और ऊँची जाति के शारीरिक लक्षण सवर्ण संस्कृति के प्रतीक हैं, जबकि काली त्वचा, मेहनत, कृषि, पशुपालन और लोक-कथाएं बहुजन संस्कृति के प्रतीक हैं।
जगदेव प्रसाद ने उत्तर भारत में ‘सामाजिक-सांस्कृतिक क्रान्ति’ के प्रस्तावक के रूप में भारतीय समाज की एक ऐसी नींव को मजबूत किया जो कृषि और आग पर आधारित संस्कृति को प्रवाहित करती है। बहुजन-श्रमण संस्कृति को बहाव की धारा में लाया जा सकता है, जो कृषि, आग, प्रेम और परिश्रम पर आधारित है, न कि नफ़रत, ढकोसलेबाजी और शोषण पर। उन्होंने अर्जक संस्कृति और साहित्य के प्रवक्ता के रूप में काम किया, जो दलित-पिछड़ों की मौखिक परंपराओं, लोक-गीतों, लोक-कथाओं और लोक-प्रतीकों को पुनर्स्थापित करने का प्रयास था। उनका मानना था कि शोषित वर्गों को अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करना चाहिए और सवर्ण संस्कृति की नकल नहीं करनी चाहिए।
प्रतीक-राजनीति का सैद्धांतिक आधार: एक तुलनात्मक विश्लेषण
जगदेव प्रसाद की प्रतीक-राजनीति का सैद्धांतिक आधार उनके सामाजिक विश्लेषण में निहित है। उन्होंने भारतीय समाज को दो संस्कृतियों में विभाजित देखा:
| आयाम | सवर्ण संस्कृति | बहुजन संस्कृति |
| प्रतीक | गाय,कमल, स्वास्तिक | भैंस, हल, मुट्ठी |
| भाषा | संस्कृत, हिंदी (शुद्ध) | लोक-भाषाएं, बोलियाँ |
| साहित्य | पौराणिक कथाएं, महाकाव्य | लोक-कथाएँ, लोकगीत |
| शारीरिक लक्षण | गोरी कलाइयाँ, ऊंची नाक | काली त्वचा, मेहनत से जुड़े लक्षण |
| आर्थिक आधार | जमींदारी, व्यापार, नौकरी | कृषि,पशुपालन, मजदूरी |
| धार्मिक प्रतीक | यज्ञ, पूजा, मंदिर | अखाड़ा, भैंस पालन, लोक-देवता |
| राजनीतिक प्रतीक | कांग्रेस (हाथ) बीजेपी (कमल) | शोषित दल (हल-मुट्ठी) बीएसपी (हाथी) |
उनका तर्क था कि सवर्ण संस्कृति ने बहुजन संस्कृति को नीचा दिखाकर अपने वर्चस्व को वैध ठहराया है। इसलिए, बहुजन राजनीति को केवल आर्थिक या राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक स्तर पर भी लड़ना चाहिए।
जगदेव प्रसाद का सामाजिक विश्लेषण: ‘नब्बे बनाम दस प्रतिशत’ सिद्धांत का सैद्धांतिक विस्तार
जगदेव प्रसाद का ‘नब्बे बनाम दस प्रतिशत’ सिद्धांत भारतीय समाज की जाति-वर्ग संरचना का एक मौलिक विश्लेषण है, जिसमें वे कहते हैं कि भारत की कुल आबादी का नब्बे प्रतिशत हिस्सा शोषित वर्ग (दलित, आदिवासी, पिछड़े, मुसलमान, किसान, मज़दूर) है, जबकि केवल दस प्रतिशत शोषक वर्ग (ऊँची जाति, पूँजीपति, सामंती) के हाथ में सत्ता, धन और ज़मीन का अधिकांश हिस्सा केंद्रित है। उनका प्रसिद्ध नारा इस सिद्धांत को स्पष्ट करता है:
“दस का शासन नब्बे पर, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा।
सौ में नब्बे शोषित हैं, नब्बे भाग हमारा है।
धन, धरती और राजपाट में, नब्बे भाग हमारा है।”
जगदेव प्रसाद ने इस सिद्धांत को 1960 के दशक में विकसित किया, जब दलित-पिछड़ों के अधिकारों की बात करना लगभग असंभव था। उन्होंने भारतीय समाज को स्पष्ट रूप से दो भागों में विभाजित देखा:
– शोषक वर्ग (10%): ऊँची जाति के लोग, पूँजीपति, सामंती, ब्राह्मणवादी तत्व।
– शोषित वर्ग (90%): दलित, आदिवासी, मुसलमान, सभी पिछड़े वर्ग, किसान, मज़दूर।
उनका विश्लेषण था कि भारत का असली वर्ग संघर्ष केवल आर्थिक नहीं, बल्कि जातिगत और सांस्कृतिक भी है। वे मानते थे कि भारतीय मार्क्सवाद भी सवर्ण वर्चस्व से मुक्त नहीं है, क्योंकि उस पर ऊँची जाति के नेताओं का कब्ज़ा है। इस सिद्धांत के कई गहरे राजनीतिक निहितार्थ हैं:
– सामाजिक न्याय की परिभाषा: जगदेव बाबू के अनुसार, सही सामाजिक न्याय तभी है जब नब्बे प्रतिशत शोषितों को सभी महकमों (सरकारी नौकरियों, शिक्षा, सत्ता) में नब्बे प्रतिशत हिस्सा मिले। इससे कम मिलना घोर अन्याय है।
– बहुजन राजनीति का आधार: यह सिद्धांत मंडल आंदोलन और बाद की पिछड़ावाद की राजनीति का वैचारिक आधार बना।
– सवर्ण वर्चस्व पर प्रहार: यह सीधे तौर पर सवर्ण-सवर्णाधिपत्य की राजनीतिक और आर्थिक सत्ता को चुनौती देता है।
इस सिद्धांत की कुछ सीमाएँ भी हैं, जैसे 90-10 का विभाजन अत्यंत सरलीकृत है और जाति-वर्ग की जटिल अंतःक्रियाओं को पूरी तरह नहीं समझाता। यह सिद्धांत जाति को वर्ग से अधिक महत्व देता है, जिससे अंतः-पिछड़ा संघर्ष (जैसे OBC बनाम दलित) की समस्याएँ उभरीं। 90 प्रतिशत हिस्से का दावा व्यावहारिक राजनीति में कैसे लागू हो, यह प्रश्न बना रहता है। लेकिन इस सिद्धांत की संभावनाएँ भी हैं:
यह सिद्धांत शोषित वर्गों को उनकी संख्यात्मक शक्ति और नैतिक अधिकार के प्रति सचेत करता है। यह केवल आर्थिक वितरण का प्रश्न नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और गरिमा का भी प्रश्न है। आज भी, जब सामाजिक न्याय, आरक्षण और पिछड़ावाद की बहसें चल रही हैं, यह सिद्धांत प्रासंगिक बना हुआ है।
निरंतरता और वर्तमान प्रासंगिकता: मंडल से नीतीश तक और आगे
जगदेव प्रसाद की विचारधारा और संगठनात्मक मेहनत का प्रभाव बिहार की राजनीति पर गहरा रहा। मंडल कमीशन के लागू होने, बिहार में लगातार किसान-दलित मुख्यमंत्रियों (दरोगा प्रसाद राय से नीतीश कुमार और सम्राट चौधरी तक) के सत्ता में आने के पीछे उनकी चेतना का योगदान रहा।
– दरोगा प्रसाद राय (1968): बिहार के पहले पिछड़े वर्ग के मुख्यमंत्री।
– कर्पूरी ठाकुर (1968–1969): पिछड़े वर्ग के मुख्यमंत्री।
– भोला पासवान शास्त्री (1969): दलित मुख्यमंत्री।
– लालू प्रसाद यादव (1990–1997): पिछड़े वर्ग के मुख्यमंत्री, मंडल आंदोलन के प्रतीक।
– नीतीश कुमार (2005-2026): पिछड़े वर्ग के मुख्यमंत्री, जगदेव प्रसाद की विचारधारा से प्रभावित।
– सम्राट चौधरी (वर्तमान): अभी इनका मूल्यांकन जल्दबाजी होगी।
सितम्बर 2025 में जगदेव प्रसाद की शहादत दिवस पर बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से लेकर बिहार भाजपा के सभी प्रमुख नेताओं ने सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि अर्पित की, जो एक अभूतपूर्व घटना थी। यह पहला अवसर था जब सवर्ण नेताओं ने, जो दशकों तक जगदेव बाबू की विचारधारा से दूरी बनाए रहे, उन्हें खुले तौर पर याद किया और उनकी विरासत को स्वीकार किया। भाजपा, जो ऐतिहासिक रूप से सवर्ण-केंद्रित राजनीति करती रही है, ने 2024 में पहली बार जगदेव प्रसाद की जयंती समारोह का आयोजन रबींद्र भवन में किया, जहाँ उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा जैसे नेताओं ने संबोधित किया।
इस विलंबित स्वीकृति के पीछे दो प्रमुख कारक काम कर रहे हैं: पहला, राजनीतिक मजबूरी और दूसरा, जनचेतना का दबाव। 2025 में बिहार में विधानसभा चुनाव थे और पिछड़े वर्ग, अत्यंत पिछड़े वर्ग (EBC) और दलित वोट बैंक की राजनीतिक महत्वपूर्णता किसी भी पार्टी के लिए अनदेखी नहीं की जा सकती थी। जगदेव प्रसाद, जो कुशवाहा (दाँगी) जाति से थे और कर्पूरी ठाकुर, जो नाई जाति से थे, दोनों EBC राजनीति के प्रतीक बन चुके हैं। भाजपा और अन्य सवर्ण-केंद्रित पार्टियों के लिए अब यह संभव नहीं रहा कि वे इन नेताओं को नजरअंदाज करें या उनके प्रति विरोधी रुख अपनाएं।
दूसरी ओर, जनचेतना का स्तर इतना ऊपर चला गया है कि जगदेव बाबू और कर्पूरी ठाकुर जैसे नेताओं को अब बहुत देर तक इग्नोर नहीं किया जा सकता, न ही उन्हें गाली दी जा सकती है। सोशल मीडिया, डिजिटल साक्षरता और बहुजन आंदोलन के प्रसार ने ऐतिहासिक रूप से उपेक्षित नेताओं की विरासत को पुनर्स्थापित किया है। अब हर राजनीतिक दल को यह अहसास हो गया है कि शोषित-वंचित-पिछड़े वर्गों की चेतना जाग चुकी है और उनकी विरासत को स्वीकार करना राजनीतिक अस्तित्व का प्रश्न बन गया है।
सरकारों और बहुजन आंदोलन की भूमिका
जगदेव प्रसाद की विलंबित स्वीकृति की तुलना जोतीराव फुले, सावित्रीबाई फुले और बाबा साहेब अंबेडकर की पुनर्स्थापना से की जा सकती है। जोतीराव और सावित्रीबाई फुले की मृत्यु के लगभग 100 साल बाद वे राजनीतिक और सामाजिक डिस्कोर्स में केंद्र में आए। इसी तरह, बाबा साहेब अंबेडकर की मृत्यु के कई दशकों बाद, विशेषकर पिछले 10-12 सालों से, वे पूरे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में हैं। इस पुनरुद्धार में सरकारों की प्राथमिकताओं और बहुजन आंदोलन की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। कुछ समय बाद फ़ातिमा शेख़ का नाम भी जन चेतना में आयेगा ही। यह इस मामले में महत्वपूर्ण होगा कि सत्यशोधक समाज की विरासत पर विमर्श के साथ-साथ हिन्दू-मुस्लिम सांप्रदायिकता को भी यह ख़ारिज करने वाला होगा।
केंद्र और राज्य सरकारों ने फुले और अंबेडकर की विरासत को संस्थागत रूप देने के लिए कई कदम उठाए हैं। अंबेडकर जयंती (14 अप्रैल) को अब राष्ट्रीय अवकाश के रूप में मनाया जाता है, और संसद में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई। फुले दंपत्ति की जयंती और परिनिर्वाण दिवस पर सरकारी कार्यक्रम आयोजित होते हैं और उनकी जीवनी को स्कूल-कॉलेज की पाठ्यपुस्तकों में शामिल किया गया है। लेकिन यह सरकारी स्वीकारोक्ति अक्सर प्रतीकात्मक रहती है और मूल विचारधारा से विचलन बना रहता है।
फुले और अंबेडकर के पुनरुद्धार में बहुजन आंदोलन की भूमिका सरकारों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण रही है। दलित पैंथर आंदोलन (1970s), बसपा का उदय (1980s-1990s) और बाद के बहुजन संगठनों ने इन नेताओं की विचारधारा को जन-जन तक पहुँचाया। सोशल मीडिया, स्वतंत्र प्रकाशन और लोक-संस्कृति के माध्यम से फुले और अंबेडकर के विचारों का व्यापक प्रसार हुआ। आज युवा पीढ़ी में फुले-अंबेडकरवादी चेतना इतनी गहरी है कि कोई भी राजनीतिक दल उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकता।
जगदेव प्रसाद और कर्पूरी ठाकुर का मामला भी इसी प्रकार का है। शुरुआत में सवर्ण-केंद्रित पार्टियों ने इन नेताओं को नजरअंदाज किया, यहाँ तक कि उन पर हमले भी किए। लेकिन बहुजन आंदोलन, ईबीसी चेतना और सोशल मीडिया के प्रसार ने इनकी विरासत को इतना मजबूत कर दिया कि अब सवर्ण नेताओं को भी इन्हें स्वीकार करना पड़ रहा है। यह स्वीकारोक्ति विलंबित है, लेकिन यह जनचेतना की जीत है।
5 सितम्बर को शहादत दिवस के रूप में याद करना केवल एक औपचारिकता नहीं होनी चाहिए। यह उस विचारधारा की निरंतरता का प्रश्न है जो शोषित वर्गों को सत्ता, शिक्षा, ज़मीन और संस्कृति में बराबर का हिस्सा देने की बात करती थी। जगदेव प्रसाद का ‘नब्बे बनाम दस प्रतिशत’ सिद्धांत आज भी प्रासंगिक है, जब सामाजिक न्याय, आरक्षण और पिछड़ावाद की बहसें चल रही हैं। लेकिन इस सिद्धांत को केवल एक नारे के रूप में नहीं, बल्कि एक कार्यक्रम के रूप में लागू करने की आवश्यकता है।
बाबू जगदेव प्रसाद का जीवन और विचारधारा एक ऐसे मौलिक भारतीय क्रान्ति का प्रतिनिधित्व करती है जो केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक स्तर पर भी लड़ी गई। भैंस का प्रतीक, शहादत दिवस की स्मृति, और ‘गोरी कलइयां’ जैसे लोक-कथन आज भी उस संघर्ष की निरंतरता को दर्शाते हैं, जिसमें शोषित-वंचित-पिछड़े वर्ग अपनी पहचान, गरिमा और सत्ता के लिए लड़ रहे हैं। लेकिन विडंबना यह है कि उनकी विरासत पर कब्जा जमाने के लिए राजनीतिक दलों में होड़ मची हुई है, जबकि मूल विचारधारा से विचलन बढ़ता जा रहा है। शहादत दिवस और प्रतीक-राजनीति के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि जगदेव प्रसाद का सच्चा सम्मान तभी होगा जब उनकी विचारधारा को क्रान्तिकारी कार्यक्रम के रूप में लागू किया जाएगा, न कि केवल मूर्ति-पूजा और नारों तक सीमित रखा जाएगा।
विकाश मौर्य सामाजिक, राजनीतिक विषयों पर चिंतन एवं लेखन करते हैं। सत्यशोधक आंदोलन पर, फातिमा शेख के विशेष संदर्भ में, इनका शोधकार्य है।
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