फ़िलिस्तीन: एक नया कर्बला-लेखिका नासिरा शर्मा
प्रकाशक: लोकभारती प्रकाशन
पुस्तक अंश: बच्चों की क़त्लगाह ग़ाज़ा पट्टी

कई दशकों की लड़ाई एक बार फिर ख़बर मीडिया पर छा गई। जिसने कौतूहल पैदा किया गाज़ा पट्टी के इतिहास को जानने के लिए गोकि यह फ़िलिस्तीन का ही एक समन्दर से लगा किनारा है जिसे भूमध्यसागर का साहिल कहा जा सकता है जहाँ झूमते जैतून के दरख्त और कैक्टस की अपनी पैदावार है। कैक्टस काँटो से भरी ऐसी वनस्पति है जो हर मौसम को झेल लेती है मगर बारूदी बारिश को नहीं। इसलिए जो हिस्सा इजरायल के क़ब्ज़े में है वहाँ पर पेस्ट के कारण कैक्टस ने उगना बन्द कर दिया है मगर कुछ अरसे बाद, हर जंग के बाद बारूद को झाड़ ग़ाजा में कैक्टस उग आता है जब पहला कैक्टस उगा तो एक पत्रकार ने उसकी तसवीर ली और मीडिया के ज़रिये खुशखबरी सुना दी कि फ़िलिस्तीनियों की जिजीविषा अभी बाक़ी है जिसे कोई कुचल नहीं सकता और न ही वह जीना भूला है। उस घटना के बाद जब 1967 में इज़रायल फ़ौज ने जमीन पर क़ब्ज़ा करके 8000 जैतून के दरख्तों को देखते-देखते जड़ से उखाड़ दिया था। यह वही जैतून का दरख्त था जिसकी शाख फ़ाख़्ता के चोंच में फँसी रहती है। और पी.एल.ओ. के लीडर यासिर अराफ़ात ने यूएन में खड़े होकर अपना यह तारीख़ी वाक्य कहा था जब उनके एक हाथ में पिस्टल और दूसरे हाथ में शान्ति का पैग़ाम देती, जीवन की शाख चोंच में पकड़े फ़ाख़ता थी।
‘यू वान्ट दिस और यू वान्ट दिस!!’
यह वही यासिर अराफ़ात थे जिनके सर पर हमेशा चारखाने का रूमाल बँधा होता जिसकी एक नोक या कोना उनके कन्धे पर लटका रहता था जो स्टाइल नहीं बल्कि फ़िलिस्तीन का नक़्शा था आज उन्हीं के तर्ज पर ढेरों फ़िलिस्तीनी उस स्कार्फ़ का प्रयोग करते हैं या फिर अपने गले के चारों तरफ़ लपेटे रहते हैं। इस स्कार्फ़ पर जो डिज़ाइन बुनी नज़र आती है उसका भी गहरा अर्थ है। इस स्कार्फ़ को कूफिया (KUFFIEYH!) कहते हैं जो जमीन की जबान है और फ़िलिस्तीन का प्रतिरोध और शक्ति का सम्बल है। इसमें जो चारों ओर चौड़ी लाइनें हैं वह प्राचीन व्यापारिक रूट्स को दिखाती है जो फ़िलिस्तीन यूरोप और मध्यपूर्वी देशों से करता है। जो बीच का डिजाइन है, जाल की तरह वह मछवारों का जाल है जैसाकि वह भूमध्यसागर से लगा है जो इस पेशे की विराटता का रूपक है और वह डिज़ाइन जो दो पट्टियों के बीच है वह जैतून के दरख्तों और उसकी पत्तियों जो फ़िलिस्तीन के हेरिटेज और कल्चर को दिखाता है। साथ ही साथ अपनी हिम्मत और हौसले को बुलन्द रखने के लिए वह इस तरह के गीत भी गाते हैं जब धुआँ और आग गिरते बमों से उठते हैं:
नाचो मेरे साथ नाचो
स्वतंत्रता का नाच
इस धरती का नाच !
हमको ग़ाज़ा की तारीख़ की ओर चलना चाहिए। गाज़ा शब्द अरबी भाषा का है जिसका अर्थ है-पतला पारदर्शी सर्जिकल कपड़ा जो मेडिसिन में काम आनेवाली मुलायम पट्टियाँ। महसूस हुआ कि ‘ढाके की मलमल’ की तरह वह कपड़े भी ड्रेसेज के लिए बुनते हैं और मशीनों की मदद लेकर हर तरह के वेस्ट से वह यह काम का अंजाम देते हैं जिसमें फटे-पुराने कपड़े और प्लास्टिक के टूटे सामान भी शामिल हैं। जब इज़रायल के कुछ लोगों ने यह बताना शुरू किया कि जब हम यहाँ आए थे तो यहाँ कुछ नहीं था सब कुछ हमने किया है। इन बातों से आहत हो फ़िलिस्तीन के पत्रकार Bayan-Al-Hout का कहना था कि फ़िलिस्तीन अपने व्यापार और पैदावार में ही नहीं बल्कि स्कूल, रेल, विश्वविद्यालय, मेडिसिन, शिक्षा हर क्षेत्र में विकसित था। यह इलाक़ा उस सभ्यता एवं संस्कृति का हिस्सा रहा है जिसे मानव-विकास का पालना कहते हैं। इस बात के सबूत में 1920 के कई वीडियो सामने आए जिसमें फ़िलिस्तीन अपने टाइम के हिसाब से आत्मनिर्भर और खुशहाल देश था। ब्रिटिश इतिहासकार LAN BLOCK का कहना है कि 19वीं सदी में फ़िलिस्तीन की शहरी ज़िन्दगी शुरू हो चुकी थी जिसमें हैफा और जाफ़ा और कुछ हद तक यरुशलम का नाम लिया जा सकता है। इनका व्यापार मध्यपूर्वी देशों से लेकर यूरोप तक होता था। यहाँ के कपड़े मशहूर थे।
यदि हम ग़ाज़ा को देखें तो हमें 4,000 साल पुरानी तारीख मिलती है। 350 साल पहले यह मिस्त्र साम्राज्य में उससे असीरियन 730 BC फिर 332 BC में इसे सिकन्दर महान ने जीता। इस बीच कई हुकूमतों के अन्दर रहा जैसे ग्रीक, मिस्र, सीरियन हुकूमतें आती-जाती रहीं फिर रोमन ने इस जगह को रीबिल्ट किया और जब दोबारा बसा तो उसमें यहूदी, मिस्त्री इत्यादि हर तरह के लोग एक साथ रहते थे। 637 AD में एक मुसलमान जनरल MAR-IBN-AL-AS ने इसे जीता और ग़ाज़ा के नागरिकों ने काफ़ी संख्या में इस्लाम स्वीकार कर लिया। लम्बे अरसे के बाद 16 शताब्दी में तुर्क ऑटोमन एम्पायर आया फिर ब्रिटिश और उसके बाद यहूदियों का क़ब्ज़ा शुरू हुआ। जिन्होंने जीत कर नहीं बल्कि क़ाबिज होने की नियत से गाजा को यहदी, मुसलमान, क्रिश्चियन को खदेडने की राजनीति अपनाई जिससे वह अपना एक मुल्क इज़रायल के नाम से बना सकें।
इस समय जो विरोध अन्दर-बाहर बसे फ़िलिस्तीनियों में उमड़ रहा है जिनके साथ विश्व के देशों के नागरिकों के साथ वहाँ बसे ज्यूश भी शामिल हैं जो फ़िलिस्तीन को स्वतंत्र करा के उनकी अपनी जमीन पर अधिकार उन्हें वापस दिलाने के लिए दिल की गहराइयों से कभी जुलूस निकालकर, कभी बच्चों के असंख्य खून से रंगे कफ़न के साथ बडे कलात्मक ढंग से उस व्यथा को दिखा रहे हैं जो इस समय ग़ाज़ा में गुज़र रहा है जहाँ खाने-पीने और दवा की कमी से फ़िलिस्तीनी परेशान हैं। इस परेशानी में वह गा रहे हैं और दबका डांस इन्तिफादा कर रहे हैं :
जिन्दाबाद फ़िलिस्तीन!
कुचल दो जियानिज़्म को
हमने ज़मीन को सींचा है
हमने गेहूँ की फ़सल काटी है
हमने नीबू तोड़े हैं और हमने
जैतूनों को निचोड़ा है
और पूरी दुनिया जानती है कि
यह हमारी जमीन है
हमने पत्थर फेंके हैं सोल्जर और पुलिस पर
हमने रॉकेट भी छोड़े हैं अपने दुश्मनों पर
पूरी दुनिया जानती है हमारे संघर्ष को
हम अपनी ज़मीन को आज़ाद कराएँगे
इम्पीरियलिज्म से और बनाएँगे सोशलिज्म
और सारी दुनिया इसकी शाहिद हो!
कूफिए और स्वीडेश बैंड का यह गीत पोलिश भाषा में है। इसको 1976 में Leva Palestine och Karossa Sionismen से गाया जाता रहा है। वास्तव में वाचक कविताओं की परम्परा रही है जो ग़ाज्जा-फ़िलिस्तीन में जबानी याद रह सके। ग़ाजा राइट्स बैंक, जवान लेखकों द्वारा लिखी गई कहानियों का संग्रह है जिसमें पन्द्रह कहानियाँ हैं और जिसे रिफअत अल-अरीर ने सम्पादित की है जिसमें गाजा की उस जवान होती पीढ़ी की कहानियाँ हैं जिन्होंने गाजा में रहते हुए इज्तरायलियों द्वारा अपने को हर तरह से सिकुड़ते हुए देखा है। रिफअत अल-अरीर ने 2008 से 2009 के आक्रमण Cast lead operation के अनुभवों को लिया है, जिसने लेखन और ज़िन्दगी पर गहरा प्रभाव डाला है। उनकी कहानियों ली हैं जिनके शब्द माँ-बाप के दिलों को गहरे भेद देते हैं। भूखे बच्चे, विद्यार्थी और बुजुर्ग स्वाभिमान से जिन्दगी जीते हैं जो दुनिया के सबसे संकटमय समुदायों में से एक करुणा और अर्थपूर्ण जीवन जीने का प्रयास कर रहे हैं। इस पुस्तक की एक कहानी का टुकड़ा देखें :
“बम की आवाज से डरे हम बैठे थे तभी बेटी ने पूछा, ‘यहूदी को किसने बनाया?’ माँ-बाप चुप रह गए क्योंकि बेटी के सवाल में एक सवाल और था कि खुदा तो रहीम है, प्यार करनेवाला है, वह इन्हें कैसे पैदा कर सकता है? जब दो दिन का सीजफ़ायर होता है तो डैड ऊपर पानी की टंकी देखने जाता है तभी गोली उसकी गर्दन में आकर लगती है। इसी तरह की घटनाओं और प्रश्नों से भरी बच्चों द्वारा लिखी दूसरी कहानियाँ भी हैं जिन्हें पढ़कर या तो आप क़लम उठाकर कुछ लिखने लगेंगे या फिर जुनूनी हालत में अपने को सहज करने के लिए दबका नाच-नाचकर गाने लगेंगे”
ख़ुदा हमारे फ़िलिस्तीन भाइयों की मदद कर
जिनका दिल ईमान से भरा है
जो इतनी मौतों के बाद,
कुचलन, उदासी और
आँसुओं के मुक़ाबले में खड़े हैं
क्या नाच के बीच कोई फ़र्क होता है?
मिशाल मियान स्पोक पर्सन ऑफ़ इजरायल से पूछा गया कि आप ग़ाज़ा की तरफ़ जानेवाले लोगों के अधमरे बदन पर गोली क्यों चला रहे हैं? जवाब था कि हम उन्हें जेल में नहीं डाल सकते हैं? यह जवाब उसी ज़मीन पर रहनेवाली इजरायल की जवान ज़िम्मेदार औरत के मुँह से निकलता है जिसके दादा और नाना अपने परिवार की बदहाली के साथ फ़िलिस्तीन के पनाहगीर बने थे। एक दौर ऐसा भी था जब शुरू के दौर में यहूदी और क्रिश्चियन अरबी व हिब्रो दोनों भाषा बोलते थे और यही भाषा अरब या तुर्क जानते थे। वह दोनों किस तरह 1948 से पहले साथ-साथ रहते थे। इस सच को बहुत सादे ढंग से लेखक डोरिट सिलवर मैन ने अपनी पुस्तक ‘गेट ऑफ़ मरसी’ में बयान किया है। दोनों भाषाओं के शब्द कितने आपस में मिलते-जुलते हैं। यह किशोर अवस्था से गुज़रते दो लड़कों के आपसी प्यार और फ़िलिस्तीन के बदलते परिदृश्य की कहानी है। यह लेखक की अपनी कहानी के सच्चे टुकड़े भी शामिल हैं जैसाकि लेखक ने 1948 में बदलाव देखा, मगर इस समय भी यह कोई सोच नहीं सकता था कि 2019 में एक पाँच वर्ष का बच्चा इसलिए जेल में डाला जा सकता है कि उसने पत्थरबाजी की थी। उस बच्चे के चेहरे पर चकराहट भरी गम्भीरता है और हाथों में चॉकलेट, मिठाई का थैला है और दूसरे हाथ की उँगली बाप के हाथ में हैं। यह बच्चा समय से पहले बूढ़ा अपनी आँखों से लग रहा है।
2023 में Knoyville Tennesse में vtf-e-mira के सौजन्य से वीडियो देखने को मिला। वह ग़ाज़ा में 4500 बच्चों के मरने के विरोध में निकाला एक अलग तरह का जुलूस था जिसमें रस्सी में नत्थी 1500 बच्चों के कपड़े थे जिन्हें ख़ामोशी से दिखाया जा रहा था। उसे देखकर स्थानीय लोग ठिठके खड़े रह गए। मगर दूसरी जगहों पर इजरायली जवान यह नारे लगाते रहे, ‘वी बिल अकृपाई गाजा’ और पूरे माहौल पर कटाक्ष करता यह वाक्य भी वायरल हो रहा है- Gaza Turn Trash in the Cash!
गाजा में 1.5 बिलियन बैरेल ऑयल और 1.4 ट्रिलियन क्यूबिक फीट नेचुरल गैस का अभी पता चला है और तब से इजरायल इस इलाके को किसी-न-किसी रूप से अपने कब्जे में करना चाह रहा है जिसके पीछे अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन की बैंकिंग है और इसी वजह से सीजफायर करने के लिए इजरायल तैयार नहीं है। चार दिन के सीजफायर के बाद फिर से इजरायल की ओर से जंग शुरू कर दी गई है।
डॉ. घोसान अबू सिट्टाह (Dr. Ghossan Abu-Sittah) मिडिल ईस्ट आई पर बोलते हुए कह रहे हैं कि जख्मी 7 से 8 हजार और इन चालीस दिनों में सात हजार मौतें, यह सभी रोगी और मरनेवाले व्हाइट फासफोरस इनसेंडरी वेपन से प्रभावित थे।
मिनिसिपल ऑफ़ ग़ाज़ा ने जो रिपोर्ट दी है उसमें नॉर्थ ग़ाज़ा 60,000 बिल्डिंगें धमाकों में गिरीं और 56 से 450 हाउस यूनिट तबाह जिसमें अस्पताल, स्कूल, कोचिंग सेंटर, अस्पताल व पुस्तकालय हैं। यह वह पुरानी लाइब्रेरी थी जिसमें हमारे ऐतिहासिक डॉक्यूमेंट्स थे। यह सरासर साजिश के तहत हो रहा है।
इसमें कोई शक नहीं है कि जब-जब किसी देश का वजूद मिटाया जाता है तो सबसे पहले उसके कला, भाषा और संस्कृति पर प्रहार किया जाता है ताकि उनकी ऐतिहासिक पहचान ख़त्म कर दी जाए। यह फ़िलिस्तीन के लोग जान चुके हैं कि इजरायल से निकालकर उन्हें गाजा पट्टी से भगाकर वेस्ट बैंक की तरफ़ भेजा जा रहा है और यह भी समझ चुके हैं कि हमले स्कूल, अस्पताल व घरों पर इसलिए कर रहे हैं ताकि युद्ध बन्द होने के बाद उन्हें इलाज व शिक्षा न मिले। वर्क परमिट भी वह अब इज़रायल में काम करने को नहीं देंगे। तब यहाँ भूख और बेकारी से टूटे फ़िलिस्तीनी आपस में ही लड़ने लगेंगे और उनका एक बहुत बुरा अन्त होगा।
यदि उन्होंने यह जंग हारी तो उनका वजूद मिट जाएगा। जिस समय यासिर अराफात की PLO शान्ति की बातें कर रही थीं तब उनका संसार भर में बढ़ता प्रभाव देख उनके विरुद्ध हमास की बुनियाद डाली और आज उसी हमास के फेंके 5000 रॉकेट का शिकायत ऊँची अवाज़ में कर रहे हैं। हमास एक बहाना है वरना जहाँ ग़ाज़ा में इतने बम गिरे और लाशें बिछ गई वहाँ हमास को ढूँढ़ने के बाहाने ग़ाज़ा खाली कराया जा रहा है ठीक ओसामा बिन लादेन को ढूँढ़ने के बहाने उन्होंने कलस्टर बम अफगानी आबादियों पर गिराए और उसकी भौगोलिक अस्मिता को भी अमेरिका ने गहरी चोट पहुँचाई। यह सारी बर्बादी झूठ-मूठ हमास के बहाने करने के विरुद्ध पत्रकार Pales Plestia Allqqad को कहना पड़ा कि क्या हमने इराक्र से कुछ नहीं सीखा?
यह आश्चर्य की बात है कि फ़िलिस्तीनी पत्रकार अस्पताल से लेकर आम इनसानों की तबाह हाली को जिस तरह फोटे के जरिये सनद के रूप में कैद कर रहा है वह क़ाबिले तारीफ़ है उसमें पत्रकार Motaz azaiza का नाम लेना जरूरी है जिन्होंने अपना पूरापरिवार इजरायली हमलों में खो दिया। उनका कहना है कि जब मेरा अपना कुछ बचा नहीं है तो फिर मुझे डर किस बाता का? अब मैं कैमरा का प्रयोग ज्यादा से ज्यादा करूँगा ताकि तसवीरें समय के इस संहार को पूरी दुनिया अपनी आँखों से देखेगी जो इजरायल के झूठे प्रचार को मिटाकर सच सामने लाएगी।
इजरायल ने जब-जब आक्रमण करअपने पैर फैलाए फ़िलिस्तीनी अपनी जमीन का टुकड़ा खोते गए। यह टकराहटें 1948, 1949, 1956, 1967, 1973, 1982 और 2006 जिसमें 1967 और 1979 का साल बहुत मुसीबतों का था। छह दिवसीय युद्ध 5-10 जून, 1967 में सीरिया ने गोलान हाइट्स की स्थिति से इजरायली गाँव पर बम्बारी की और इजरायल ने छह सीरियाई मिग लड़ाकू विमानों को मार गिराया। तो मिस्र के नासीर ने सिनाई सीमा के पास अपनी फ़ौजें लगा दीं। और एलाट को अवरुद्ध करनरे की माँग की। मई 1967 में मिस्र, जॉर्डन के साथ एक ‘आपसी रण समझौता’ पर हस्ताक्षर हुए। इज़रायल ने अरबों की इस भीड़ का जवाब अचानक हवाई हमला करके दिया और ज़मीन पर मिस्त्र की वायु सेना को नष्ट कर दिया। यह इजरायल की ज़मीन पर जीत ज़बर्दस्त थी। इज़रायली फ़ौज ने सीरियाई सेना को गोलन हाइड्स से वापस खदेड़ दिया और मिस्त्र से ग़ाज़ा पट्टी और सिनाई प्रायद्वीप पर नियंत्रण कर लिया और जॉर्डन की फ़ौज को वेस्ट बैंक से खदेड़ दिया। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यरुशलम पर अब एकमात्र नियंत्रण इजरायल का हो गया। इस बीच छुटपुट टकराहटें चलती रहीं।
6 अक्टूबर यहूदियों के पवित्र दिन योम किप्पुर इज़रायल को मिस्त्र की सेनाओं द्वारा पार करते पकड़ लिया गया। स्वेज नहर और सीरियाई सेनाओं द्वारा गोलन हाइट्स में प्रवेश किया। इस बार अरब सेना ने पहले से कहीं अधिक आक्रामकता दिखाई और इज़रायली सेनाओं को भारी क्षति उठानी पड़ी थी। यहाँ केवल 1967 के युद्ध का संकेत भर है वरना तो युद्ध का एक लम्बा वृत्तान्त है। दरअसल 1967 के बाद फ़िलिस्तीनियों को भारी क़ीमत जान-माल और हर प्रकार से चुकानी पड़ी और पूरा दृश्य बदलकर रह गया। काम के लिए फ़िलिस्तीनी लोगों को सिक्योरिटी से गुज़र वर्क परमिट दिखाना पड़ता था। एक तरह से ग़ाज़ा वाले दीवार के उस पार एक तंग गलियारे से होकर अपने घरों की तरफ़ जाने लगे। यह बहुत बड़ा सच है कि जब-जब खनिज से भरे इन मुल्कों ने अपनी तरह अपने जमीनी सोर्स के साथ जीना चाहा वह सत्ता में नहीं रह पाता है या फिर उसकी हत्या करा दी जाती है। 17 नवम्बर, 2023 में अपने ग़ाज़ा की यह हालत देखकर फ़िलिस्तीनी प्रधानमंत्री मोहम्मद शतय्येह (Mohammad Shatyyeh) कैबिनेट स्पीच में बोलते-बोलते रोने लगे और कहने लगे कि ‘शहीदों पर रहम हो!’ ‘शर्म आए दुश्मनों को!’ यह छोटा सा बाइट ट्रकिश टेलीविज़न की तरफ़ से वायरल हुआ था। किसी ज़िम्मेदार ओहदे पर बैठा इनसान इस तरह रो पड़े। यह बड़ी बात है।
चार दिन के युद्ध विराम में कई शादियाँ जो रुकी हुई थीं वह हुईं। लेकिन पाँचवें दिन बिना किसी पूर्व सूचना के सुबह सात बजे इज़रायल ने बम्बारी शुरू कर दी। वार प्लेन बहुत निचाई पर उड़ रहे थे और नॉर्थ से साउथ की ओर सफे की ओर बम गिर रहे थे। यूनिसेफ के प्रवक्ता जेम्स एडलर उस समय ग़ाज़ा के एक अस्पताल में मौजूद थे जिसके 15 मिनट की दूरी पर बम फटा है। इस अस्पताल में 200 बच्चों की कैपेसिटी है जहाँ हजारों बच्चे मौजूद हैं यह जख्मी, रोगी बच्चे जगह-जगह से जले हुए ज़ख़्मों से चूर जमीन पर, कुर्सी-मेज़ पर, बेड पर जहाँ भी जगह है वहाँ लेटे हुए हैं। दरअसल इज़रायल नर संहार नहीं कर रहा है बल्कि बच्चों का नरसंहार है अर्थात War on Childred ढूँढ़ ढूँढ़कर उन जगहों पर बम फेंके जा रहे हैं जहाँ सिर्फ़ औरतें और बच्चे हैं। मलबे के ढेर में दबे अपने बच्चों को निकालते हुए औरतें चीख़ रही हैं। रिपोर्टर ने कहा कि ग़ाज़ा चीखों का शहर बनकर रह गया है। ग़ाज़ा के स्वास्थ्य मंत्री का कहना है कि यह हमला बहुत तबाहकुन है। युद्ध विराम के समय को बढ़ाने की बात चल रही थी और अचानक विस्फोट होने लगे। गम्य ठिजेम्स एलडर ने बम्बारी से पहले ग़ाज़ा के स्थानीय लोगों से बातचीत की जिसका खुलासा करते हुए उन्होंने बताया कि वहाँ कोई भी शख्स ऐसा नहीं है जिसने अपना कोई खोया न हो। इज़रायल डिफेंस फोर्स जिस तरह बच्चों को निशाना बना रही उससे साफ़ ज़ाहिर है कि वह नस्लकुशी कर रहे हैं। इस तरह की रिपोर्ट सुनकर फ़िलिस्तीन का राष्ट्रीय वृक्ष ऑलिव (जैतून) याद आता है और जो 20 साल में बढ़ता है और 20 साल फल आने में लगता है। यह दरख्त दरअसल फ़िलिस्तीनियों की विरासत है जो एक नस्ल से दूसरी नस्ल तक पहुँचते हैं। हरे, पीले, मायल हरे, काले, छोटे-बड़े आकार के ऑलिव (जैतून) फ़िलिस्तीनियों की जान है। ग़ाजा से गुज़रते हुए पदयात्रा वाले शरणार्थियों ने जब रास्ते में खड़े पेड़ों को जैतून से लदा देखा तो तोड़ने लगे जिस पर डिफ्रेंस आर्मी के सिपाहियों ने रोक लगा दी। मैं 2004 में सीरिया गई थी हमें गोलन हाइट्स तक ले जाया गया था। जहाँ की आबादी पर इज़रायली फ़ौज ने बम गिराए थे। टूटे घरों के बीच में जैतून के दरख्त थे जिसमें घुँघरू की तरह छोटे-छोटे जैतून लगे थे। मैंने इससे पहले जैतून के दरख्त नहीं देखे थे। पता चलते ही मैंने उसे छुआ और एक तसवीर खिंचवाई। जबकि जैतून का तेल और फल दोनों वर्षों से खा रही थी। मेरी कहानी ‘जैतून के साये’ को लिखते हुए मुझे इस तख्त के बारे में ज्यादा पता नहीं था। फ़िल्मों में जरूर देखा था कि फ़िलिस्तीनी माँ रोटी को खोल उसमें सलाद या कुछ खाने का रखती है और ऊपर से ऑलिव ऑयल डाल देती है। सीरिया में भी सलाद जहाँ जैतून से सजा होता है वहीं पर उस पर ऑयल भी डला होता है।
दोनों तरफ़ से होस्टेज आजाद किये गए युद्ध विराम के साथ और फिर सुनने को मिलने लगीं दर्दनाक दास्तानें। यह ऐसी दर्द की गाँठें थीं जो टीसने के अलावा और ख़ुदा का शुक्र अदा करने के सिवा कुछ दे नहीं सकती थीं। यही वह ठहराव था जो उन्हे लगातार उजड़ने और खोने के साथ उनके अन्दर पनप उठा था। उन जवान माँओं के चेहरे जो अपने बच्चों के जनाजे के पास बैठी रहती हैं। जुल्म की शिद्दत इनसान के अन्दर एक तरह का विकार ले आती है, तब वह रोना-चीखना भूल जाता है। इनसानी धैर्य की जो मिसाल हमें इस लम्बी खिंचती युद्ध में नज़र आती है। आज इजरायली मिजाज को समझने के लिए यह जरूरी है कि हम अतीत में घटी घटनाओं को दोहराएँ जो हमारी नई पीढ़ी नहीं जानती है और हममें से भी बहुत लोग नहीं जानते हैं।
संयुक्त राष्ट्र ने 1947 में ग्रेट ब्रिटेन के फ़िलिस्तीनी जनादेश को विभाजित करने के लिए मतदान किया था। संयुक्त राष्ट्र ट्रस्टशिप के तहत एक यहूदी राज्य, एक अरब राज्य और एक स्वतंत्र यरुशलम की स्थापना की जानी थी। अरबों ने इस विभाजन का विरोध किया जब 15 मई, 1948 का जनादेश समाप्त हुआ तो इज़रायल ने अपनी आज़ादी का एलान किया तो पहला अरब व इजरायल के बीच युद्ध छिड़ गया। अरब फ़िलिस्तीनियों के लिए कोई अलग राज्य स्थापित नहीं किया गया। मिस्त्र ने भूमध्यसागर के साथ गाजा पट्टी पर नियंत्रण कर लिया और जॉर्डन ने पूर्वी यरुशलम सहित इजरायल की पूर्वी सीमा और जॉर्डन नदी (वेस्ट बैंक) के बीच के क्षेत्र पर। 1967 के छह दिवसीय युद्ध के दौरान इजरायल ने उन क्षेत्रों के साथ-साथ गोलान हाइट्स-इजरायल की उत्तर-पूर्वी सीमा पर सीरियाई भूमि के एक टुकड़े पर क़ब्ज़ा कर लिया था फिर सिनाई पर मिस्त्र प्रायद्वीप पर क़ब्ज़ा कर लिया। अपने चुनाव के बाद राष्ट्रपति कार्टर ने UN संकल्प 242 (नवम्बर, 67) के आधार पर एक व्यापक मध्यपूर्व शान्ति समझौते की दिशा में काम किया जिसमें क़ब्ज़े वाले क्षेत्रों से इजरायल की वापसी और अरब मान्यता एवं दोनों देशों के बीच शान्ति (शर्तों) की शुरुआत था। मगर अरब इस पर राजी न हुए और इजरायल की स्थापना 1967 के युद्ध से विस्थापित फ़िलिस्तीनी शरणार्थियों की समस्या का उचित समाधान। सआदत ने क़ब्ज़ा किये हिस्सों को लौटाया और कार्टर को प्रोत्साहन दिया। राष्ट्रपति कार्टर ने बेगिन से मुलाक़ात की जो राष्ट्रपति बन चुके थे। राष्ट्रपति बेगिन ने अपनी सहमति दी। नवम्बर 1977 में सआदत ने इजरायल से सीधा सम्पर्क स्थापित किया। रोजलिन कार्टर ने सुझाव दिया कि बेगिन को ग्रामीण मैरी लैंड कैम्प डेविड में दावत जहाँ बातचीत भली प्रकार होगी।
शिखर सम्मेलन 5 सितम्बर, 1978 को आरम्भ हो पूरे 13 दिन तक चला मगर उन्हें कामयाबी की कम उम्मीद थी इसलिए इसे गोपनीय रखा गया ताकि नाकामी की चर्चा बाहर न फैले। इस तरह 17 सितम्बर, 1978 को व्हाइट हाउस वाशिंगटन डीसी में कैम्प ??? डेविड समझौते पर हस्ताक्षर हो गए। सआदात और बेगिन को इस समझौते के लिए 1978 का नोबेल पुरस्कार मिला।
इस सम्मिट के बाद मित्र ने दोनों देशों के बीच सामान्य राजनयिक सम्बन्ध स्थापित करने और स्वेज नहर खोलने व इजरायली जहाजों के गुजरने का वायदा किया। इसका विधिवत् पालन हुआ लेकिन अधिकतर अरब देशों ने मिस्त्र का अनुसरण करने की जगह मिस्र को ही बहिष्कृत कर दिया। और उसे अरब लीग से निकाल बाहर किया। पीएलओ ने भी समझौता ख़ारिज कर दिया। लेकिन 1993 में इज़रायल और पीएलओ द्वारा हस्ताक्षरित ओस्लो समझौते में वेस्ट बैंक और ग़ाज़ा के सम्बन्ध में प्रावधान शामिल थे जो कैम्प डेविड की तरह ही थे!
1993 में नार्वे में शान्ति वार्ता ओस्लो में शुरू हुई थी। कुछ इजरायली पीएलओ को आतंकवादी मानते थे इसलिए इस शान्ति समझौते का विरोध हुआ। उधर अरब एक यहूदी स्टेट को मान्यता देने के पक्ष में नहीं थे। यह समझौता जिसमें यासर अराफ़ात, पूर्व इजरायली प्रधानमंत्री शिमोन परेज, इज्जरायली प्रधानमंत्री यित्जाक राबिन और नार्वे के विदेशमंत्री जान इगलैंड शामिल थे। ओस्लो द्वितीय पर दो साल बाद हस्ताक्षर हुए। 1998 में फ़िलिस्तीनी अधिकारियों ने इजरायल पर ओस्लो समझौते में ग़ाजा और हेब्रोन से सेना की वापसी का पालन न करने का आरोप लगाया। आरम्भ में संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के अनुरोध पर वेस्ट बैंक में निपटान निर्माण को धीमा करने के बाद 2000 के दशक की शुरुआत में इस क्षेत्र में नये इजरायली आवास का निर्माण फिर से शुरू कर दिया। इस समझौते के आलोचकों का कहना था कि इसके परिणाम में, इजरायली नागरिकों के विरोध में, फ़िलिस्तीनियों की हिंसा में इज्ज़ाफ़ा हुआ है। फ़िलिस्तीन प्राधिकरण गाजा और वेस्ट बैंक पर पर्याप्त रूप से पुलिस लगाने और सन्दिग्ध आतंकवादियों की पहचान करने और उन पर मुक़दमा चलाने में सफल नहीं रहा। इस आशा के साथ कि ओस्लो समझौते के अनुसार देनों पक्ष सही रूप से पालन करें जिसके लिए एक बार फिर कैम्प डेविड में वार्ताकार जुटे। सितम्बर, 2000 में फ़िलिस्तीनी उग्रवादियों ने दूसरा इन्तिफादा घोषित किया जिसमें शेरोन ने टेम्पल माउंट यहूदी और मुसलमानों दोनों के लिए पवित्र स्थल है। वहाँ के दौरे के बाद स्थिति में कोई फ़र्क़ नहीं आया। महसूस यही होता है कि दोनों पक्षों को उकसाने में पहल किस पक्ष द्वारा होती है समझना मुश्किल है।
अंग्रेज़ों ने 1947 में भारत-पाकिस्तान बँटवारा किया। वहीं फ़िलिस्तीन में भी 1948 में फसाद का बीज बो दिया। बार-बार शान्ति वार्ता का उल्लंघन बच्चों का गुड्डे-गुड़िया की शादी का खेल-सा नजर आता है। अब इस बार यदि शान्ति वार्ता युद्ध विराम के बाद हो तो कोई ठोस क़दम उठाया जाए। यह समस्या बहुत उलझ गई है मगर इस बार इसको तर्क व तथ्य की कसौटी पर सुलझाना बहुत जरूरी है। ख़ासकर पुराने अनुभवों को सामने रखते हुए अभी जलवायु पर हो रहे सम्मेलन का होस्ट इस बार UAE बना जहाँ ईरान ने यह कहकर शिरकत नहीं की कि वहाँ इज्जरायल आ रहा है जिसने बड़े पैमाने पर बच्चों का नरसंहार किया है उसका बायकाट होना जरूरी है। बिलकुल होना चाहिए परन्तु यहाँ पर ईरान को आगे बढ़कर फ़िलिस्तीनियों की समस्या को इस तरह सुलझाना अन्य देशों के साथ मिलकर करना चाहिए जिससे ग़ाज़ा में हुए नरसंहार और बर्बादी का खमियाजा पूरा दिया जाए। ग़ाज़ा में दोबारा ज़िन्दगी बहाल हो इसके लिए UNECO को गम्भीरता से क़दम उठाने हैं और अन्य देशों को भी आगे बढ़कर फ़िलिस्तीनियों की मदद हर क्षेत्र में करनी होगी। जब भी कोई नया राष्ट्रपति अमेरिका की सत्ता में आता है विश्व के शान्तिप्रिय नागरिकों की आशा बँधने लगती है कि इस बार कुछ बेहतर होगा मगर ऐसा होता नहीं है। हथियार पहले की तरह बिकते हैं और अमेरिका की दोस्ती का पहला मंत्र यहीर होता है कि हम आपको नवीन से नवीन हथियार देंगे।
इधर 14.11.23 को एक सूचना सामने आई थी Gilles Devers की ओर से कि उन्होंने वेंटेरन लायर्स फोरम ने 10 दिनों में संसार भर के वकीलों की फ़ौज फ़िलिस्तीन के समर्थन में बना ली है इसलिए फ़िलिस्तीनियों को यह नहीं सोचना चाहिए कि उनके लिए कोई खड़ा नहीं हो पा रहा है। इस तरह की थपकियाँ भी ज़रूरी हैं मगर यह इतनी कारगर नहीं होंगी जितना कि अमेरिका द्वारा लिया गया फ़ैसला, जर्मन, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों की गवाही के साथ वरना ओस्लो के बाद फिर एक बार नये नाम से समझौता होगा और फिर कुछ वर्षों बाद ढाक के वही तीन पात। इस सिलसिले में यह देश दूसरे राष्ट्रों का दोहन व शोषण करने से अब बाज आएँ और अपने लिए डेमोक्रेसी के नये अध्याय व धाराएँ तय करें।
अमेरिकन कवयित्री एम. बैरी की सुन्दर कविता के शब्द उन बहरे कान वालों तक पहुँच सकें। ग़ाज़ा के बुनकरों को धन्यवाद दे रही है-
हमारे जाने कितने घावों पर
पट्टी बाँधी गई
उन लोगों की वजह से
और जाने वहाँ कितने लोग
छूट गए हैं
हमारी वजह से।
