नारे, प्रतिरोध और मज़ा-मज़ाक

प्रतिरोध में गढ़े गए जिन नारों का विस्तार हमें फेसबुक पर दिखाई पड़ रहा है क्या सचमुच क्रिएटिव माना जाना चाहिए? बात वैसे प्रतिरोध की भाषा पर ही होनी चाहिए
मेरी दृष्टि में …ये नारे सृजनशीलता’ के मानक पर कतई खरे नहीं ठहरते ये नारे कैसे प्रतिरोध की भाषा निर्मित कर रहे हैं ?
नारा आंदोलन की आवाज़ होता है। वह छोटा होता है, लेकिन उसके भीतर एक बड़ा सवाल, आक्रोश या माँग समाई होती है।
अच्छे नारे की ताकत उसकी तुकबंदी में नहीं, बल्कि इस बात में होती है कि वह भीड़ की सामूहिक बेचैनी को कितनी सटीक भाषा दे पाता है।
लड़कियों के प्रोटेस्ट के कुछ तथाकथित जेनज़ी के स्लोगन …
ख़ासकर रसोईघर से जुड़े…
* एक कचौड़ी दो समोसा,मर्द जात का क्या भरोसा
* एक सुट्टा दो चाय मर्द जात हाय हाय.
* आलू लो पूरी लो इन मर्दों से दूरी लो
* ठंडे समोसे गर्म करो मर्द जात शर्म करो
* चाय गरम दूध गरम मर्द समाज बेशरम
* एक जीरा दो अजवाइन मर्द जात टू रिजाइन

क्या वास्तव में ये क्रीएटीविटी है? मेरा सबसे मुखर सवाल कि -यहाँ
किन मर्दों की बात हो रही है?
क्या ये सामान्यीकरण नहीं ?

मर्द जात को एक समूची श्रेणी के रूप में निशाना बनाने वाले नारे पितृसत्ता की आलोचना और पुरुष-विरोध के बीच की सीमा को धुंधला कर देते हैं। यदि लक्ष्य पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर सवाल उठाना है, तो अधिक सटीक नारा व्यवस्था, सत्ता, हिंसा, नियंत्रण या लैंगिक भेदभाव को निशाना बनाएगा।

दूसरे –
जिसे हम जेनज़ी मानते/कहते हैं वे रसोई में पानी पीने भी कम ही जाती है। हाँ, सभी नहीं…

भारत के संदर्भ में जेन ज़ी को परिभाषित करना अभी बाकी है। कोई “जेन ज़ी का तोता” इसके मौलिक चरित्र को परिभाषित करने के लिए नाकाफ़ी है, बल्कि यह हर पुरानी पीढ़ी के पूर्वाग्रहों से नयी पीढ़ी के लिए रटी-रटाई थकाऊ-पकाऊ बाते हैं,जिसे कोई भी नई पीढ़ी कभी गंभीरता से नहीं लेती !

खैर, यहां मैं भी उन्हीं युवाओं की बात कर रही हूं जिन्हें कालेजों में जाने का अवसर मिला। इन नारों पर इनकी प्राध्यापकों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई पड़ रहा है। ज़ाहिर है वे परंपरागत रूप में नारों से खुद को जोड़ पा रही/रहे हैं। ‘नारे’ प्रतियोगिता की तरहां ही इनमें जो शुष्कता है वे ‘मर्दों’ को संवेदनशील नहीं बना सकते ! ये नारे न केवल मज़ाक की तरह लिए जा रहे हैं बल्कि इनके विलोम में स्त्री द्वेषी नारे बनाए फैलाएं जा रहे हैं। इनमें से अधिकांश नारे एक ही रचनात्मक फार्मूले की पुनरावृत्ति हैं। खाने-पीने की वस्तु, तुकबंदी, ‘मर्द जात’ व्यंग्य,धिक्कार। मौलिकता और वैचारिक गहराई का अभाव है।

कचौड़ी, समोसा, चाय, सुट्टा और आलू-पूरी के बीच पितृसत्ता का विरोध चल रहा है नारे पढ़ते-पढ़ते आंदोलन से ज्यादा नाश्ते की इच्छा होने लगे तो इसे क्रिएटिविटी कहें या चटपटा-प्रतिरोध?
खाद्य-सामग्री को लेकर बनी परिचित बोलचाल की लय को विरोध के नारे में बदल दिया गया है। इसी तरह “कचौड़ी समोसा”, “चाय सुट्टा”, “जीराअजवाइन” जैसी जोड़ियाँ नारे को याद रखने और सामूहिक रूप से बोलने योग्य बनाती हैं।

एक और अफ़सोसजनक तथ्य कि इन नारों के विरोध में “मर्द-लोग” स्त्री द्वेषी नारे गढ़कर आनन्द उठा रहे हैं और आन्दोलन को गंभीरता से ले ही नहीं रहे !

नारों ने हमेशा उत्तेजित किया है लेकिन उद्वेलित नहीं।
ये बाढ़ रेप (कल्चर?)मानसिकता की कीचड़ को बहाकर समुद्र में नहीं मिलाने वाली। सिनेमा की बात करूं तो ‘अस्सी’ आज भी उद्वेलित करती है। हमारी ये लड़कियां और लड़के भी फ़िल्म नहीं देखते। आज का सिनेमा हमेशा काल्पनिक या अतिरंजित नहीं रह गया
तो …
इन नारों में हमें समोसा कचौरी याद रह जायेंगे थोड़े ही समय बाद सेमेस्टर एग्जाम आने वाले हैं सभी उसमें जुट जायेंगे जाहिर है वो अनिवार्य है तो ये नारे जो विचार की जटिलता या सामाजिक संरचना की पहचान में नहीं करते । नारा सुनते ही मुस्कान आ जरूर जाती है, लेकिन क्या वह मुस्कान किसी असमानता, हिंसा या पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर सोचने के लिए भी विवश करती है?

बेशक इन लड़कियों के विरोध को सलाम लेकिन नारे सुनकर अपने फेवरेट नारे या मजेदार नारा को रेखांकित करना और किस पर सबसे ज्यादा हँसी आई यहाँ हास्य और जानबूझकर हास्यास्पद बनाए जा रहे इस आन्दोलन पर नए सिरे से सोचना होगा ।

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ISSN 2394-093X
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