पुस्तक अंश – अनुदित और मूल कविताएँ

इस किताब की पहली कविता
“इक्खट दुक्खट” एक पारंपरिक खेल जो विशेषकर लड़कियां खेलती हैं।
बचपन से
कोई-न-कोई व्यथा
साथ हो लेती है किसी हमजोली की तरह
हम पूरी मासूमियत से हो लेते हैं उसके साथ
खेलते हैं इक्खट दुक्खट लंगड़ी टाँग से
ज़मीन पर खिंचे ख़ानों पर फेंक कर सिटकी
जीत लेते हैं घर या फिर हार बैठते हैं और
खेल के अन्त में ठीक उसी तरह हम
फुंक उठते हैं जैसे घर से बेदखल हुआ कोई
इसी तरह
खेलना सीखते हैं बचपन से व्यथा के संग
उसी मासूमियत के साथ जैसे इक्खट दुक्खट।
समय बीतता है और व्यथा
अचानक बन जाती है ज़िम्मेदारी उसी मासूमियत से और
सरोकार बदल जाते हैं ज़मीन पर खिचे ख़ानों से
पहुँच जाते हैं तबाह हाल बस्तियों की तरफ़
खून बहता है कहीं दूर पर और व्याकुलता बढ़ती है
हमारे सीने में न ही हम मरते हैं और न उजड़ते हैं
फिर भी बन जाते हैं उस नरसंहार का हिस्सा ख़्वाहमख़्वाह दिमागी तौर पर।
फिर
दिल दहल जाता है
इक्खट दुक्खट के इस खेल से
जो खेला जा रहा है बरसों से उस जमीन पर
जो हम खेलते थे घर के आँगन में
और हार जीत के बाद मिटा देते थे उन कोयले-ख़रिया से
खिंचे ख़ाने को कच्ची पक्की जमीन से।
ठीक उसी तरह से अब भुला दिये जाते हैं संवाद, वार्ताएँ और बारहा किये गए
युद्ध विराम के वायदे।
अब आँखों के सामने
उन दृश्यों को
दिखा देती है नई तकनीक
कैसे पल भर में उड़ा दिए जाते हैं मुक़ाम, घर और बच्चे
कैसे दफ़्न कर दिये जाते हैं इनसान अपने ही घर के मलबे में
और
फिर शरणार्थी बन लावारिस से भटकते फिरते हैं अपमानित सारी दुनिया में।
बस!
यही फ़र्क़ है कल और आज के इस खेल में।{नासिर शर्मा }
फ़दवा तूकान ब्रिटेन में एक जॉर्डनियन फ़िलिस्तीनी महिला
ईसा मसीहतूकान के लिए इजरायल के रक्षामंत्री जनरल मोशे दयान ने कहा। था कि इस कवयित्री की एक-एक पंक्ति बीस कमांडों पर भारी पड़ती है। इसके बाद फ़दा के लिखने, छपने, पढ़ने पर रोक लगा दी गई। जेल जाना, पूछताछ और कई तरह के अत्याचारों को सहती फ़दवा अपने देश में जमी रहीं जब तक उन्हें मौत की सजा नहीं सुनाई गई। वह मौत नहीं जंग चाहती थीं। इसलिए शरणार्थी बनना मंजूर कर लिया। 1917 में नेबलुस में पैदा हुई फ़दवा पहले गीत, संगीत और घुमक्कड़ी की शौक़ीन थीं। पिता चाहते थे कि फ़दवा अपने भाई इब्राहीम तूकान की तरह विरोधी कविताएँ लिखें, मगर उन्हें यह मंजूर न हुआ। 1967 में जब फ़िलिस्तीन की करारी हार हुई तो फ़दवा ख़्वाबों से जागीं और एक कविता ‘मैं हरगिज़ नहीं रोऊँगी’ लिखी और अपनी शायरी का अन्दाज बदल लिया। उनके कई संग्रह हैं- ‘एक दिन’, ‘उसे मैंने पा लिया’, ‘मुझे मुहब्बत दो’, ‘अकेले दुनिया की छत पर’, ‘रात और शहसवार’। उनकी आत्मकथा का नाम (पहाड़ी रास्ता बेढब रास्ता’ है। फ़दवा तूकान की नई इंक़लाबी कविताओं ने पढ़नेवालों की धमनियों में बगावत का संचार तेज़ कर उनका लहू गर्म करना शुरू कर दिया था। यह देखकर उस समय की अनेक लिखनेवाली महिलाओं ने अपनी शायरी के मौजू बदल डाले फ़दवा का देहान्त 2003 में हुआ।
अमर फ़िलिस्तीन {अनुदित}
ओ मेरे महान देश! मेरे फ़िलिस्तीन !
संघर्ष के रात-दिन घूमते पाट घूमते-घूमते बदल न जाएँ दर्द से धुँधली रातों में मगर मेरे महान देश,
तुम्हारे प्रकाश को बुझाने के लिए उनके हाथ, छोटे… बहुत छोटे हैं।
तुम्हारी नाकाम इच्छाओं के बावजूद तुम्हारे विकास के रुके पहियों के बावजूद तुम्हारी उदास जख्मी मुस्कान के बावजूद तुम्हारी औलादें मुतमइन और ख़ुश हैं।
मलबों के ढेर से जुल्म व सितम के कारावास से खून में डूबी उन दीवारों से मौत और ज़िन्दगी के तरकश से ज़िन्दगी एक दिन आज़ाद होगी! ओ मेरे महान देश! ओ मेरे गहरे घाव ! मेरी जन्मभूमि मेरा तन्हा प्यार है।
दूसरी कविता {अनुदित}
ईसा मसीह
ख़ुदा ! सारे जहाँ के मालिक ! इस साल यरुशलम की ज़िन्दगी सलीब पर टाँगी जा रही है।
आज आपका दिन है! सारी घंटियाँ मेरे ख़ुदा, ख़ामोश हैं।
वह बजती रही थीं! वह बजती रही थीं! दो हज़ार वर्ष के लम्बे समय तक
लेकिन अब वह ख़ामोश हो चुकी हैं सारे गुम्बद सियाह अँधेरे ने उन्हें अपने आगोश में छुपा लिया है! यरुशलम बढ़ रहा है दुख और दर्द के कँटीले रास्तों पर। यरुशलम कराह रहा है दोराहे पर खड़ा यरुशलम खून आलूदा है जुल्म व सितम के हाथों और दुनिया खामोश है!
कमाल नासिर का जन्म 1923 में बिरजैत में हुआ। उनकी हत्या 1973 में ऑपरेशन वरदून के तहत इजरायली कमांडो द्वारा हुई।
आख़िरी बात {अनुदित}
मेरे प्यार !
अगर तुम यह ख़बर सुनो उस वक़्त जब खिला रही हो
अपने पहलौठी के बेटे को अपनी बाँहों में थामे जो इन्तज़ार कर रहा है मेरे आने का।
रोना मत यह सुनकर कि मैं अब कभी नहीं लौटूंगा,
दुख और ग़रीबी में जीना कुछ भी नहीं जब, देश को तुम्हारी जरूरत हो।
मेरे प्यार!
जब पढ़ना मेरे कॉमरेड साथी की आँखों में मँडराता ख़ौफ़,
तो मुस्कराहट से अपनी उसे तसल्ली देना
मेरी मौत तुम सब में नया खून दौड़ाएगी
और मेरा फंदा बदल जाएगा शीत ऋतु में।
मैं कभी नहीं मरूँगा,
होती है जब दोपहर अमर हो जाऊँगा
हर उस कल्पना में उस विचार में, जो वजूद में आएगा।
कहना हमारे बेटे से कितना गहरा था मेरा प्यार।
मैंने उसके लिए कुछ नहीं छोड़ा सिवाय अपनी बाँसुरी और शायरी के।
जब कभी मेरी क़ब्र पर वह रोये तो समझाना
उसे कि एक दिन मैं लौटूंगा जरूर
अपनी कुर्बानी का मीठा फल चखने के लिए।
तौफ़ीक़ ज़याद 7 मई, 1929 में ब्रिटिश अमानती फ़िलिस्तीन में गालीली के नेज़रेथ नाम के स्थान पर जन्मे। वे जब रूसी भाषा साहित्य पढ़कर देश लौटे तो उन्हें 9 दिसम्बर, 1973 को नेज़रेथ का मेयर चुना गया।
साम्यवादी पार्टी रूस के अध्यक्ष बने जिससे इज़रायली चौंके भी और होशियार भी हुए। तौफ़ीक़ ज़याद की पूरे समय यह कोशिश रही कि वह इजरायल पर दबाव डालें कि वह हर हालत में जैसे भी हो अपनी नीतियाँ अरबों के प्रति बदलें। एक रिपोर्ट ‘फ़िलिस्तीनी कैदियों पर अत्याचार’ जिसके सह-लेखक तौफ़ीक़ थे, अनुवाद होकर इजरायली समाचार-पत्र ‘अल-हामिशामार’ में छपी। वह रिपोर्ट यू.एन.ओ. में तौफ़ीक़ तोउबी और जयाद के ज़रिये तब पेश हुई जब वह अल-फ़रहा जेल का मुआयना करके 29 अक्टूबर, 1987 में लौटे थे। यू.एन.ओ. में इस रिपोर्ट के बारे में कहा गया कि फ़िलिस्तीनी क़ैदियों के अत्याचार की इससे बेहतर सनदें नहीं हो सकती हैं। तौफ़ीक़ ज़याद का देहान्त 5 जुलाई, 1994 को जॉर्डन घाटी में एक दुर्घटना में हुआ जब वह यासिर अराफ़ात से मिलकर आ रहे थे जो ‘फ़िलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन’ (पी.एल.ओ.) पार्टी के अध्यक्ष थे। उनको ‘लीडिंग अरब लेजिस्लेटर’ का खिताब भी मिला। उनके नाम पर एक रोड का नाम ‘शेफ़ाअमर’ रखा गया है।
सहन नहीं होगा मुझे {अनुदित}
ऐ मेरे वतन! ऐ मेरी जन्मभूमि !
मेरे ऐतिहासिक गौरव के लुटे खज़ाने !
जहाँ दफ़न हैं मेरे बाबा और बाबा के बाबा
उस विरासत को मैं कैसे भुला सकता हूँ
मुझे मत रोको,
मैं यह सब सहन नहीं कर पाऊँगा
चाहे मेरे हाथों और पैरों में बेड़ियाँ डाल दो।
यहाँ कभी हमारी उपजाऊ जमीन और गाँव था
जो बदल गया शोकाकुल राख और मलबे के ढेर में
जहाँ पर कुछ बहादुर आत्माएँ
अपने दाँतों और नाखूनों से संघर्ष में व्यस्त रहे
जिनके जिस्म को गोश्त के टुकड़ों में बदलकर पी गये ख़ून
उनका यह दरिन्दे नहीं,
अब आगे कुछ न कहो ! उन्होंने मक़बरे गिरा दिये मक़बरे…!
विजय पराजय से बदतर है {अनुदित}
कल की तरह आज हम
चुल्लू भर पानी में तैरे नहीं हैं
और न ही हम चुल्लू भर पानी में डूबे हैं।
उन्होंने रास्ता लिया था पूर्व की ओर का काले बादल बच्चों,
फूलों, फ़सलों और शबनम के क़तरों को क़त्ल करते हुए
नफ़रत के बीज छिटकाते हुए एक दिन इसी रास्ते से वापस लौट जाएँगे जिस रास्ते से आए थे।
अहम बात यह नहीं है कि वह कब तक यहाँ ठहरेंगे?
उनकी विजय/पराजय से बदतर है
यह फ़क़त! एक ठहराव है
मैदाने जंग में दो क़दम पीछे हटना,
दरअसल दस क़दम बढ़ने का संकेत है
बहुत जल्द हमें आगे बढ़ना होगा
कहो…कहो! विजय पराजय से बदतर है।
