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अभी तक रॉड, तेज़ाब, मोमबत्ती और अब औरत के गुप्तांग में सिगरेट भी: सोशल मीडिया में आक्रोश

स्त्रीकाल डेस्क 


इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक सोशल मीडिया में अपने विरोध के बावजूद अमेज़न इंडिया ने  महिलाओं  के यौन अंग को टार्गेट कर बनाई गई ऐश ट्रे को अपनी साईट से हटाया नहीं था. ‘ट्राईपोलर क्रिएटिव टेबलटॉप ऐश-ट्रे’.  नाम से अपने प्रोडक्ट को बेचने वाली कंपनी ने अमेज़न पर इसे सजावट के लिए एक क्रिएटिव प्रोडक्ट बताया है.

ऐशट्रे का इमेज एक टब में लेटी महिला का है, जिसके खिलाफ  सोशल इंडिया पर महिलाओं ने अपना गुस्सा जाहिर किया. कई ने अमेज़न के साईट पर जाकर उसकी भर्त्सना की और ऐशट्रे को अपने सेल प्रोडक्ट से हटाने की मांग की. अभी तक अमेज़न में इसे अपने यहाँ बिक्री के लिए बनाये रखा है, इसके बावजूद कि प्रीति कुसुम की शिकायत के जवाब में अमेज़न ने त्वरित कार्रवाई का आश्वासन भरा मेल भेजा.

अपनी प्रतिक्रया में श्वेता यादव ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा: 


तस्वीर आपको वाहियात लग सकती है और इसके लिए आप मुझे सलाह से लेकर गालियों तक से नवाज़ सकते हैं … लेकिन रुकिए ये तस्वीर मेरी खींची हुई नहीं है और ना ही यह सिर्फ तस्वीर है। जी हाँ यह ऐश ट्रे है जिसे आपका प्यारा Amazon.in बेच रहा है पूरे बेशर्मी से… यह तस्वीर मुझे शिल्पी शिल्पी की वाल से मिली। एक बार मन हिचका थोड़ी शर्म भी आई सोचा देखकर अनदेखा कर दूँ लेकिन कर नहीं सकी तो नतीजन लिख रही हूँ। अब सोचिये कितनी घटिया मानसिकता होगी उस आदमी की जिसने स्त्री की योनी में सिगरेट बुझाने की सोची? उसकी कुंठा का अंदाजा लगाइये। क्या वह उस बलात्कारी की सोच से जरा भी अलग है जो रेप करने के बाद रॉड किसी महिला की योनि में घुसेड़ देता है? उसकी सोच कितनी उस आदमी से या सड़क चलते मनचले से अलग है जो सड़क चलती लड़कियों को कपड़े के ऊपर से भी चीर- फाड़ कर रख देते हैं और लड़की को बराबर यह अहसास दिला जाते हैं कि आखिर वह घर से बाहर निकली ही क्यों? अब अमेजन से अगर कोई डेटा मिले तो वह भी निकलवाइए, यकीन मानिए अब तक का सबसे ज्यादा बिकने वाला ऐश ट्रे निकले तो मुझे बहुत आश्चर्य नहीं होगा। अब इतना कह दिया तो लगे हाथ एक बात और भी बता दूँ। ट्रे का दाम देख लीजिये आपको अंदाजा हो जाएगा की इसे खरीदने वाले कौन होंगे? कोफ़्त होती जा रही है इस दुनिया से… यह समाज औरतों के प्रति मानसिक बीमारों का हैं …. आप माने या नहीं पर हकीकत यही है सबसे महत्वपूर्ण बात अमेजन पूरे शान से इसे खुलेआम बेच रहा है। एक अपील है आप सब दोस्तों से हो सके तो इस पोस्ट को शेयर करिये ताकि अमेजन पर दबाव बने और वह इस प्रोडक्ट को बेचना बन्द करे,

ऊप्स मूमेंट: स्त्री को देह बनाते कैमरे 


शिल्पी सिंह ने तल्ख़ प्रतिक्रया देते हुए लिखा: 

“लो भई! अब औरत के गुप्तांग में सिगरेट भी बुझाई जा सकती है. अभी तक रॉड, तेज़ाब, मोमबत्ती और न जाने क्या-क्या डाला गया. लेकिन यह नई सुविधा उपलब्ध करवाई है अमेज़न ने.”

फ़ेसबुक पर रीवा सिंह ने अमेज़न के नाम एक ‘खुला खत’ लिखा है. रीवा लिखती हैं, “डियर अमेज़न, मुझे उम्मीद है कि आपकी टीम इस उत्पाद को एक मॉडल के तौर और आपके वरिष्ठ अफ़सर इसे अपनी साइट पर उतारते वक़्त होश में रहे होंगे. लेकिन आपकी रचनात्मकता ने हमारे पास कोई विकल्प नहीं छोड़ा है.”

विज्ञापन के नाम पर स्त्रियों के खिलाफ यौन हिंसा को उकसाती तथाकथित रचनात्मकता पहले भी देखी गयी है, एक सरिया के विज्ञापन में सलमान खान ने भी इस उकसावे को अभिनीत किया है:

बहुत खूब कंगना राणावत, सलमान खान कुछ सीखो 

नैन्सी तुम मारी नहीं गई तुम तो यूपीएससी टॉप कर रही हो, सीबीएसई टॉप कर रही हो

संपादकीय


नैन्सी,


मैं कई दिनों से तुम्हारे मारे जाने की खबर पढ़ रहा था, सोशल मीडिया में तुम्हारे मृत शरीर पर की गई हैवानियत की तस्वीरों पर नजर पडीं-वीभत्स! नैन्सी तुम उन कई लड़कियों में से एक हो जो पितृसत्ता से मुठभेड़ करती हुई मारी गईं, तुम उस अनवरत लड़ाई की सिपाही हो, जो जाति और जेंडर के क्रूर तालमेल से से बनी पितृसत्ता के खिलाफ लड रही हैं. हाँ, 12 साल की प्यारी बच्ची तुम पढ़-लिखकर डीएम बनना चाहती थी! देखो साल-दर साल कितनी नैन्सियाँ डीएम बनने की राह पर हैं! अभी पिछले ही साल टीना डाबी ने टॉप किया था यूपीएससी. नैन्सी तुम बड़ी होती तो तुम्हें समझ में आता कि टीना जाति और जेंडर दोनो मोर्चों पर छिड़ी लड़ाई से आगे आई थी, पीढियां लग जाती हैं, इस लड़ाई में छोटी जीत दर्ज करने में भी. और हाँ, इस बार भी नंदिनी केआर के जरिये तुम्हारा सपना पूरा हुआ. वह भी इस बार यूपीएससी टॉप कर गई है. यह कहानी, लड़ाई का यह मोर्चा तबसे ही शुरू हो जाता है, जब तुम जैसी नन्हीं नैन्सियाँ भ्रूण के रूप में आती हैं, और उनमें से कई गर्भ में ही मार दी जाती हैं. लेकिन सफलता की अहर्निश गाथायें भी तुम जैसी नैन्सियाँ ही साल-दर-साल लिख रही हैं. इस वर्ष भी लड़कियों ने लड़कों से बेहतर प्रतिशत में सफलता हासिल की है. हर बार रिजल्ट आता है और लड़कियों के लहराते परचम की खबरें आती हैं. सीबीएसई 12 वीं की टॉपर रक्षा गोपाल की मुस्कानों में भी नैन्सी तुम्हारी ही मुस्कुराहटें हैं.



मैंने तुम्हें पितृसत्ता से लड़ाई के मोर्चे पर शहीद कहा है, यह अकारण नहीं है. बड़ी मुश्किल से आज लड़कियों का साक्षरता दर बढ़ा है, उन घरों से लडकियां शिक्षा के लिए आगे आ रही हैं, जहां शिक्षा के अवसर अभी पहुंचे हैं. लड़कियों का साक्षर होना शिक्षित होना एक युगांतकारी घटना है. स्त्रियों की शिक्षा के खिलाफ ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का षड्यंत्र इस कदर रहा है कि प्राचीन कालीन स्त्रियों के विदुषी होने के उदाहरण तो खूब दिये जाते रहे, लेकिन उनकी लिखी रचनाओं के इक्के-दुक्के अंश ही शेष रह पाये. या तो उनकी रचनाएं जला दी गईं या कैननाइजेशन की प्रक्रिया में भुला दी गईं. मनुस्मृति तक आते-आते तो और भी कठोर विधान बना दिये गये. मनु के स्त्रीविरोधी संहिताओं में स्त्री के शैक्षणिक, धार्मिक और दार्शनिक अधिकार छीन लिये जाने के स्पष्ट विधान हैं. तुम्हारी पूर्ण स्वतंत्रता और तुम्हारे अधिकारों के लिए प्रतिबद्ध डा. बाबा साहेब अम्बेडकर ने तुम्हारे विरुद्ध मनु के षड्यंत्रों को अपने लेख ‘हिन्दू नारी का उत्थान और पतन’ में स्पष्ट किया है:



अमन्त्रिका तू कार्येयं स्त्रीणां भावृदशेषत:
संस्कारार्थ शरीरस्य यथाकालं यथा क्रमम्


अर्थात :-निर्धारित कालक्रम के अनुसार स्त्रियों के जो संस्कार किये जायें, उनमे वेद-मन्त्रों का पाठ न किया जाये . ब्राह्मण संस्कृति में यज्ञ –कर्म धर्म ही आत्मा माना गया है,परन्तु मनु ने स्त्रियों को इस धर्म-कार्य से भी वंचित रखा है . इस संबन्ध  में उनका आदेश निन्मलिखित है:

न वै कन्या न युवतिर्नाल्प विद्धो बा बालिश:
 होता स्यादग्निहोत्रस्य नर्तोनासंस्कृतस्तथा!
नरके हि पतन्त्येते जुह्वतः  स च यस्य तत
तस्माद्वैता  न कुशलो होता स्याद्वेदपरागः 


अर्थात:– कन्याएँ युवतियां ,थोड़ा पढ़े -लिखे लोग,कुपढ,बीमार अथवा संस्कार-रहित व्यक्ति यज्ञ के होता न बनाये जायें, वरना होता और यजमान दोनों नरकगामी होंगे . धर्म लाभ से स्त्रियों को वंचित रखने के लिए उनको स्वयं तो यज्ञ करने के लिए अयोग्य ठहराया है,मनु ने ब्राह्मणों पर भी बंधन लगा दिया कि वे भी स्त्रियों के लिए यज्ञ न करे. इस प्रकार  न स्वयं  यज्ञ कर सकती है, न ब्राह्मणों के द्वारा करा सकती है.

नैन्सी शिक्षा से वंचन के खिलाफ तुम जैसी हजारो नैन्सियाँ बाधाएं पार कर रही हैं. पीढ़ियों से संघर्ष किया है तुमने. तुम्हारे घर से बाहर निकलने, आत्मनिर्भर होने और आर्थिक-सांस्कृतिक अधिकारों से पीढी-दर-पीढी बड़े-बड़े लोग डरते रहे हैं! स्त्रियों में अपना और अपने परिवार की इज्जत आरोपित करने वाले बड़े-बड़े महानुभाव हंटर कमीशन के सामने स्त्री-शिक्षा के नाम पर सिलाई-बिनाई-कढाई की वकालत करते रहे हैं. लेकिन तब भी तुम जैसी नैन्सियों ने इन षड्यंत्रों से आगे इतिहास में कदम बढ़ाये, तुम्हारे लिए फुले दंपति ने रौशनी के नये मशाल दिखाये. नैन्सी तुम जब बड़ी होती तो सावित्रीबाई फुले, ताराबाई शिंदे, फ़ातिमा शेख या रुकमाबाई के बारे में जानती, तुम्हें अच्छा लगता कि तुम्हारी तरह पितृसत्ता से जंग छेड़ने वाली स्त्रियों को आखिरकार इतिहास ने उन्हें उनका वाजिब स्थान देना शुरू कर दिया है.

सच में तुम जैसी लड़कियों की भ्रूण से लेकर आगे तक की जाने वाली हत्याओं, उनपर हवश के वीभत्स हमलों से हर संवेदनशील नागरिक विचलित होता होगा, होता है. तुम पर या तुम जैसी अन्य लड़कियों पर होने वाले ये हमले तुम्हारे पढ़ने से, तुम्हारे स्कूल-कॉलेज जाने से, तुम्हारे काम करने से, तुम्हारे बड़े पदों पर होने से खौफ खाते वर्चस्ववादियों के आख़िरी और लगातार धारविहीन होते हथियार हैं. हाँ नैन्सी, उम्मीद की किरणें तब-तब दिखाई देती हैं, जब तुम्हारी जैसी ही नैन्सियाँ शिक्षा की हर चुनौती पर खरे उतरती हैं, सीबीएसई, यूपीएससी या ऐसी ही अनेक सफलता की मंजिलों पर अपने परचम लहराती हैं. सच, नैन्सी इन सफलताओं से पितृसत्ता बहुत खौफ खाती है, पुरुष वर्चस्व दरकता है और निरंतर जारी जंग में खूंखार ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के पंजे लहू-लूहान होते हैं. नैन्सी तुम मरी नहीं हो, तुम्हारे सपने तुम जैसी ही इन नैन्सियों में अंगडाई लेते रहेंगे, साकार होते रहेंगे !

संजीव चंदन, 2 जून 2017

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
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मेरा कमरा/अपने कमरे की बात

सुशीला टाकभौरे  

चर्चित लेखिका. दो उपन्यास. तीन कहानी संग्रह , तीन कविता संग्रह सहित व्यंग्य,नाटक, आलोचना की किताबें प्रकाशित. संपर्क :9422548822

वर्जीनिया वूल्फ की किताब  ‘ A Room of One’s Own’ का प्रकाशन 1929 में हुआ था, उसका केन्द्रीय स्वर है कि एक स्त्री का अपने लेखन के लिए अपना कमरा होना चाहिए, अपने निजी को सुरक्षित रखने के लिए भी अपना कमरा, इसके लिए उसकी आर्थिक स्वतंत्रता जरूरी है.


वर्जीनिया वूल्फ की पुस्तक ‘^A Room of one’s own*में शिद्दत के साथ यह बताया गया है कि एक स्त्री का अपने लेखन के लिए अपना कमरा होना चाहिए। अपने लेखन, अध्ययन जैसे कार्य कलापों के लिए अपना एक कमरा होना ही चाहिए, यह प्रत्येक प्रबुद्ध साहित्यकार स्त्री चाहती है, मगर इसके साथ यह प्रश्न भी है – क्या स्त्री की अपनी इतनी आर्थिक स्थिति सामर्थ्य या स्वतंत्रता है कि वह अपना एक अलग कमरा अपने लिए सुरक्षित रख सके ? अथवा घर में या परिवार में उसकी वह जगह है कि वह घर के एक कोने पर या एक कमरे पर अपना अधिकार या स्वामित्व जता सके ?

वर्जीनिया वूल्फ ने पश्चिमी देशों की सभ्यता और संस्कृति के आधार पर, पश्चिमी घर – परिवार में उन स्त्रियों की जगह को ध्यान में रखकर यह लिखा है। मगर हमारे देश की संस्कृति और सामाजिक रीति परम्पराओं को देखते हुए, क्या लेखिका की यह बात भारतीय स्त्रियों के लिए है ? सामन्ती और धनाढ्य परिवारों की बात अलग है। सम्पन्न प्रगतिशील शिक्षित और पश्चिमी सभ्यता के अनुयायी परिवारों की बात भी अलग है, यहाँ परिवार के छोटे बच्चे के लिए भी उनके अलग कमरे होते हैं। मगर इन परिवारों की संख्या कितने प्रतिशत है ? बहुत कम है। मैं उन 80 प्रतिशत परिवारों की बात जानती हूँ, जहां घर भले ही बड़े हों, मगर स्त्रियों के लिए अलग से उनका कमरा होने की बात आश्चर्यपूर्ण मानी जाती है।

एक पत्नी का कमरा पत्नी का नहीं पति का कमरा होता है। माँ का कमरा बेटा बेटी नाती पोतों के साथ होता है। बेटी का कमरा भी अलग न होकर, बहनों या नानी दादी के साथ होता है। तब वे अपने निजत्व को सुरक्षित कैसे रखें ? यदि घर पुरानी पद्धति के हो। और संयुक्त परिवार हो, तब तो स्त्री को अपना कोई अलग कमरा नहीं मिल सकता। बड़ा किचन, बड़ा बरामदा, बड़े कमरे का बेडरूम – वहाँ स्त्री हर जगह होती है मगर अकेली नहीं होतीं। वह सबके लिए होती है और सबके साथ होती है। ये बातें भी बड़े घरों के सम्पन्न सवर्णों, बड़े लोगों की हैं। मैं अपने लिए क्या कहूं ?

कहने के लिए बहुत कुछ है। अनुभवों अनुभूतियों, ख्वाहिशों और हताश उदास टूटे सपनों का अम्बार हमारे दिलों में भी है। ये कब शुरू हुए और कब मैंने इन पर विचार करना शुरू किया, इसका अपना एक इतिहास है। यह बात सच है, जब तक हम किसी बात पर गंभीरता के साथ विचार नहीं करते, तब तक वह हमारे लिए कोई महत्व नहीं रखती है। हम उन स्थितियों में बरसों से रह रहे थे। वह हमारी आदत में इस तरह शामिल थे कि कभी उससे अलग विचार भी मन में नहीं आया। यह बात शुरू में मेरे साथ भी रही है।

जहां घर होगा, वहीं तो कमरे की बात सोची जाएगी। इसके लिए मैं अपने उन सभी घरों के विषय में जरूर बताना चाहूंगी जहां जहां मैं रही हूँ। गरीबी और अभाव हमारे जीवन के विशेष अंग रहे हैं। बचपन से ही मैंने देखा, हम 7 बहन भाई, माँ पिताजी और नानी के साथ एक घर में रहते थे। घर क्या था एक कमरा और छोटा सा बरामदा। कमरे में ही रसोई के चूल्हा चक्की थे। वहीं बर्तन, वहीं बिस्तर की मचान। पिताजी और बड़े दो भाई बरामदे में सोते थे। माँ नानी हम तीन बहने और छोटे दो भाई कमरे के अन्दर जमीन पर बिस्तर बिछाकर एक लाईन से सोते थे। यह घर भी हमारा नहीं नानी का घर था। एकांत न मिल पाने के कारण कभी पिताजी माँ और नानी से झगड़ते, कभी नानी माँ और पिताजी को आश्रय देने का एहसान जताते हुए झगड़ा करती। तब किसी तरह जोड़ जुगाड़ करके पिताजी और माँ ने नानी के घर की बगल में अपना अलग छोटासा घर बना लिया। तब भी हम बहन भाई नानी के साथ ही रहते थे। वहीं रहना, वहीं खाना। बानापुरा गांव में, गांव से दूर हमारे दो घर थे, जहां न बिजली की सुविधा थी न ही पानी की। बानापुरा में गांव का विस्तार होने और स्कूल के पास अनाज गोदाम के ऑफिस का विस्तार होने पर हमारे घर वहां से हटाए गए। हमें डॉक बंगले के पीछे जंगल के पास की जगह में, नगर पालिका ने मकान बनाकर दिए। यह बात सन 1965 की है। यहां भी नानी और हमारे दो ही घर थे। एक कमरा किचन और बरामदा, बस। मैं कक्षा 6-7 तक नानी के साथ ही सोती थी। रात में कुत्तों के भौंकने पर डर कर  नानी से लिपटकर सोती थी।



तो यह था हमारा घर और घर की सुविधा व्यवस्था। ऐसी स्थिति में अपने लिए अलग कमरे की कल्पना तो क्या, सपना भी नहीं देख सकते थे। ऐसे माहौल में मेरे बड़े भाई कल्लू भैया, शंकर भैया और मेरी पढ़ाई कैसे हो सकी ? बडे़ भाई पढ़ाई करने के लिए अधिकतर अपने दोस्तों के घर चले जाते थे अथवा घर के पास की अमराई में किसी झाड़ के नीचे या निचली डाल पर बैठकर पढ़ाई करते। कभी वे रेल्वे लाईन के उस पार नदी के किनारे जाकर पढ़ते थे। मैं कहां जाती ? या कहां जा सकती थी ? स्कूल से लौटने के बाद पढ़ाई की चिन्ता से बेचैन रहती। इन दिनों मैं छोटी छोटी कविताएं भी लिखने लगी थी। घर के काम भी करती रहती, शाम के खाना बनाने में सहयोग करती, साथ ही अपनी पुस्तक के पन्ने भी पलटती रहती। ऐसे समय मन में कभी कोई कविता ही मचलने लगती, तब दाल बघारते समय, या रोटी बनाते समय मैं उठकर अपनी कॉपी पेन निकालकर वे लाईने लिख लेती थी।
सबका खाना हो जाने के बाद बिस्तर लगाया जाता। सबके सोने के बाद मैं लालटेन की धीमी रोशनी में देर रात तक पढ़ाई करती रहती। तब मैं कविता की तुकबन्दी भी करती थी। दरी पर बैठकर पढ़ाई करते हुए कभी झपकी लग जाती। माँ देखती तब डांटकर कहती – बेटी बहुत रात हो गई, अब बिस्तर पर सो जा। कल पढ़ लेना।’’ पिताजी की नींद खुलने पर वे डांटते थे – ‘‘लड़की, सोई नहीं अब तक ?’’ मां बप्पा के डर से मैं थोड़ी देर के लिए लालटेन धीमी करके बिस्तर पर लेट जाती। उनके सोने पर फिर से पढ़ने लगती। अपनी रचनाएं भी लिखती। परिक्षा के दिनों में अक्सर भय लगता, पिताजी शाम को घर आकर लड़ाई झगड़ा न करें। ऐसे में पढ़ाई करना मुश्किल हो जाता था। मैट्रिक की पढ़ाई, बी. ए. की पढ़ाई मैंने इसी तरह की थी। परिक्षा के दिनों में ऐसे समय रात में माँ मुझे चाय बनाकर देती और अच्छी पढ़ाई करने का हौसला जगाती थी।


घर के पीछे ईंधन जलावन लकड़ी कंडे रखने की छोटी टापरी, घर के पीछे की दीवार से लगी हुई थी। दिन के समय कभी कभी मैं वहां एकान्त में बैठकर भी पढ़ती थी। कभी कोर्स की किताबे पढ़ती थी, कभी कहानी उपन्यास पढ़ती, कभी कविताएं लिखती। मैं अधिकतर अपने विचारों में खोई रहती। कभी कागज के फूल बनाती कभी पेन से कॉपी में ड्राईंग करती रहती। इन दिनों सिर्फ चार हफ्ते तक मैंने पेंटिंग और चित्रकला भी सीखी थी। एक बार बरसात के समय, लकड़ियों के बीच से निकलकर एक सांप मेरे बहुत नजदीक से निकला। अपने विचारों में तल्लीन मैं उसे चुपचाप देखती रही। देखते देखते सांप टापरी से बाहर निकल गया। बाद में मुझे समझ में आया कि वह जहरीला संाप था, काट भी सकता था। यह सोचकर मैं वहां बैठने से डरने लगी थी। माँ ने भी मुझे वहां बैठने से शख्त मना कर दिया था। तब मैं दिन में दोपहर या शाम के समय नानी के घर के बरामदे में एक खाट खड़ी रखकर, उसपर एक चादर डालकर अपने लिए ओट बनाकर कृत्रिम कमरा बना लेती थी। दीवार से लगी खाट से बना वी  आकार का मेरा छोटा सा कमरा मुझे एकान्त का एहसास देता और मैं ध्यान लगाकर पढ़ाई करती रहती। कभी काम करने के लिए पुकार होती – ‘‘शीला मसाले पीस दे, रोटी बना ले, खाना परोस दे।’’ तब मैं अपने ये काम तुरन्त पूरे करके, पुनः अपने कमरे में बैठ जाती। ऐसे समय मैं भाई द्वारा लाई गई ‘फिल्मी दुनिया’ ‘सत्य कथाएं’ पत्रिका या गुलशन नन्दा के उपन्यास और जासूसी उपन्यास भी पढ़ती थी। घर के लोग खाट के ऊपर से अक्सर झांकते कि मैं क्या पढ़ रही हूँ। तब मैं तुरन्त उन किताबों को छिपाकर, अपने स्कूल कॉलेज की किताब खोलकर पढ़ने लगती थी। इस चोरी में भी बड़ा अच्छा लगता था। बड़ी बहन गुस्सा करते हुए माँ, नानी से कहती कि मैं कामचोरी करती हूँ। काम के डर से किताब पकड़कर बैठी रहती हूँ, कोर्स की किताबें नहीं पढ़ती हूँ। बड़ी बहन की पढ़ाई चैथी पांचवीं कक्षा से ही छूट गई थी। घर के काम और छोटे बहन भाईयों को संभालने के कारण वह पढ़ नहीं सकी थी।

1965 में बड़े भाई की शादी होने पर जबलपुर वाली भाभी भी हमारे घर में आ गई। 1969 में शंकर भैया की शादी होने पर जलगांव वाली भाभी भी आ गई थी, उस समय मैं कक्षा नौवीं में पढ़ रही थी। इतने लोग उस छोटे से घर में रहते थे। बड़े भैया भाभी कमरे में सोते, दूसरे भैया भाभी किचन में सोते। बाकी हम सब बरामदे में एक लाईन से नीचे सोते। तब पिताजी ने छोटे बरामदे के सामने छप्पर बढ़ाकर दूसरा लम्बा बरामदा और बना लिया था। इससे बरसात के दिनों में भी हमें सूखी सुरक्षित जगह मिल जाती थी। गरमी के दिनों में उसी नए बरामदे के एक कोने में चूल्हा जलाकर खाना बनाया जाता। वहीं सामने पानी के घड़े गुण्डी रखने की मचान थी। घर आए मेहमान बरामदे में ही बैठते, बरामदे में ही सोते। शंकर भैया होशंगाबाद में नौकरी करने लगे। वे पेपर मिल के क्वार्ट़र में रहने लगे तब भाभी को भी अपने साथ ले गए थे। बाकी हम सब एक साथ रहते रहे। दो बड़ी बहनों की शादी हो गई थी। बड़ी भाभी को संजय अजय बेटे हो गए, तब मां पिताजी ने घर के पास की नजूल की जमीन को खरीद कर, एक अलग घर और बनाया। वहां बड़ी भाभी और भैया रहने लगे थे।



1975 में मेरी शादी हुई। मैं नागपुर अपनी ससुराल आई तब यहां भी एक कमरा और छोटे किचन का छोटा सा घर था। सास, ननद, नन्दोई भी हमारे साथ रहते थे। इस समय की बहुत सी बातें मैंने अपनी आत्मकथा में लिखी हैं। घर के कमरे के सामने खुली जगह थी। छोटे बरामदे जैसी जगह को लकड़ी के पट्टों से घेरकर एक छोटा कमरा बनाया गया, तब जवाई इस बरामदे में सोते थे और अन्दर कमरे में हम पति पत्नी और सास ननद साथ में सोते थे। इस बीच ननद को एक बेटा भी हो गया था, दूसरा बच्चा होने वाला था। हर दिन लडाई झगड़ा होता। ननद घंटों बड़बड़ाती रहती। नन्दोई भी अपने नाज नखरे बताते हुए, शिकायतों के साथ झगड़ा करता। शादी के समय मैंने बी. ए. फायनल की परीक्षा दी थी। नागपुर आने के बाद रिजल्ट आया था। उसी वर्ष बी. एड. में मेरा एडमीशन हो गया था। मैं मेडीकल सर्वेन्ट क्वार्टर से रविनगर वानखेडे़ बी. एड. कॉलेज बस से जाती थी। कॉलेज जाने के पहले और कॉलेज से आने के बाद घर के काम झाडू पोछा, बर्तन कपड़े धोना, खाना बनाना भी करती थी। सुबह से रात हो जाती पढ़ने का समय ही नहीं मिलता था। तब मैं यहां भी सबके सोने के बाद, किचन में चूल्हे के पास अकेली बैठकर बी. एड. की मोटी मोटी पुस्तकों से पढ़ाई करती। कभी अपने जीवन की व्यथा कथा को कविता और कहानी के रूप में लिखती रहती। इन दिनों लिखी ऐसी कई कविता और कहानियों को मैंने बाद में व्यक्तिगत जीवन से ऊपर उठकर, अपने से अलग नाम देकर, समाजगत रूप दिया है।

मैं रात के दो तीन बजे तक लिखती पढ़ती। सुबह 6 बजे के पहले उठकर नहाती, घर आंगन झाड़ती, चाय नास्ता, खाना बनाती फिर कॉलेज जाती। परिक्षा के दिनों में मैं सीताबर्डी की हिन्दी मोरभवन लायब्रेरी के खुले बरामदे में अकेली बैठकर अपनी पढ़ाई करती थी। इस तरह मेरा बी. एड. हुआ। छै माह मातृसेवा संघ में नौकरी की, इसके बाद प्रकाश हायस्कूल में शिक्षिका की नौकरी करने लगी। तब भी मेरी दिनचर्या यही थी। घर में दिन में और रात में रहने सोने की व्यवस्था भी वही थी।


मेडीकल टी. वी. वार्ड का किराये का वह सर्वेन्ट क्वार्टर छोड़कर जब हम अजनी रेल्वे क्वार्टर में किराये से रहने गए, तब वहाँ दो कमरे, अलग किचन और बरामदा था। यहां भी सास और ननद नन्दोई साथ ही रहते थे। तब तक ननद को तीन बेटे हो गए थे। यहां हम पति पत्नी का एक कमरा जरूर था, मगर सिर्फ रात के लिए था। दिन में दरवाजा खुला रहता। सब लोग बैठते, बच्चे खेलते रहते। इन दिनों सितम्बर 1978 में मेरा बेटा भी आ गया था। इसके बाद की घर बदलने की लम्बी यात्रा का चित्रण मैंने आत्मकथा ‘शिकंजे का दर्द’ में किया है। अजनी रेलवे  क्वार्टर से हम शाम टाकीज के पास कामरेड के मकान में किराए से रहे। यहां भी एक कमरा किचन और छोटा बरामदा ही था जो सबके उपयोग के लिए था। यहां आने के बाद ननद नन्दोई अलग किराए का घर लेकर हमसे अलग रहे। यहां सासू माँ बीमार रहने लगी थी। वे कमरे में पलंग पर सोती थीं, हम पति-पत्नी छोटे बच्चे के साथ बरामदे में नीचे फर्श पर बिस्तर बिछाकर सोते थे। फिर हम तुकड़ोजी चौक के पास एलआयजी के एक कमरा एक किचन वाले घरों की तीन मंजिल चाल में रहने आये।


पहली बार इस छोटे से घर को हमने खरीद लिया था। तब हमारे तीन बच्चे भी साथ में थे। 10 बाई 10 का एक कमरा। वही हमारा ड्राईंग हॉल, वही बेडरूम, वही स्टडी, वही मेहमान खाना और वही डाइनिंग रूम था। बडा एक पलंग बिछाने पर आधा कमरा ही रहता था। हम दो और हमारे तीन हम सब एक ही पलंग पर सोते थे। बच्चों की देखभाल के लिए कभी भांजी या भतीजी 12-15 साल की लड़की हमारे साथ रहती। तब वह रात में किचन में सोती। वह रात में कई बार उठती, बाथरूम टायलेट जाने के पहले हमें देखती कि हम कैसे सोये हैं, या क्या कर रहे हैं।

उस समय में दिन में और रात में पेपर जांचने का काम हमारे पास बहुत रहता। कमरे में एक कोने में नीचे बैठकर मैं रात रात भर पेपर जांचती रहती, अपनी कक्षा के बच्चों के भी और पति की कक्षा के बच्चों के पेपर भी। इन्हीं दिनों याने 1985 – 86 में मैंने ‘हिन्दी साहित्य’ विषय लेकर एम. ए. की पढ़ाई भी की थी। लायब्रेरी से किताबे लेकर पढ़ना, पढ़ने के साथ नोट्स बनाना और किताबे वापस करके दूसरी किताबे लाना, पढ़ना। यह सिलसिला लगातार चलता रहा। 1986 में प्रकाश हायस्कूल की नौकरी छोड़कर सेठ केसरीमल पोरवाल कॉलेज में आ गई, तब भी हम उसी एक कमरे के घर में रहते रहे। इन्हीं दिनों मैंने कई कहानियां लिखी थीं, एकांकी नाटक लिखे थे। जब मन में भावनाओं की तरंगे उठतीं, मेरी लेखनी कविताएं लिखती। उस एक कमरे के घर में मैंने अपने लिए एक कोना चुन लिया था। वहां एकांत मुझे रात के 12.00 बजे के बाद ही मिल पाता था। पड़ोसी का दरवाजा हमारे घर के दरवाजे से लगा हुआ था। उनके घर बातचीत हल्ला कोलाहल चलता रहता। रेडियो ऊंची आवाज में बजता रहता। ऐसे समय बार बार मना करने के बाद भी वे वही करते। तब मैं उस समय का इन्तजार करती, जब सब अपनी मर्जी से सो जाते। तब मेरा दिन शुरू होता, मैं अपने स्वयं के पास होती, अपने आप से बतियाती, अपने मन की सुनती और अपने आप को ही मन ही मन अपनी बातें सुनाती। यह प्रक्रिया प्रतिदिन चलती रहती।  कभी इसमें व्यवधान भी आता। लगातार झगड़े लड़ाई से मन इतना तृस्त हो जाता कि फिर कुछ भी लिखने पढ़ने का मन नहीं होता। तब सामने की गैलरी में घंटों अकेली खड़ी रहती। 1976 में मैंने ‘मृगतृष्णा’ जैसी कविताएं लिखी थीं और 1986 में ‘विद्रोहिणी’ जैसी कविताएं लिखीं। तब तब मेरी जानकारी भी बढ़ी थी, साथ ही हिम्मत और विरोध की क्षमता भी बढ़ी थी। कॉलेज  में अध्यापन की नौकरी करने के साथ, मेरा व्यक्तित्व स्वतंत्र सबल रूप में विकसित होने लगा था।

1986 के पहले से ही मैं सामाजिक कार्यक्रमों में जाने लगी थी, साथ ही महिला जाग्रति के कार्यक्रमों से भी जुड़ गई थी।  अपने दलित शोषित समाज की शोषित पीड़ित स्थिति को देखकर मन दुखी हो जाता। कार्यक्रमों में कई महिलाओं की दुख भरी कथा को सुनकर, अपनी जीवन कथा भी असहनीय लगने लगती। ऐसे समय में रात के एकान्त में, कमरे के उसी कोने में कई कविताएं जन्म लेती रहीं, वैचारिक लेख मानसिक विस्फोट के साथ लावे की तरह कागज की सफेदी पर बिखरते रहे। मेरा लेखन दलित विमर्श और नारी विमर्श पर केन्द्रित रहा। वह इसलिए कि  वे मेरे जीवन से जुड़े रहे, मैं उनके लिए संघर्ष करती रही। कभी हम पति पत्नी कवि सम्मेलनों में जाते थे। कभी ‘कथा कथन’ कार्यक्रम, कभी विचार गोष्ठी में, कभी महिला आन्दोलन, कभी दलित आन्दोलन के कार्यक्रमों में। हर बार विचारों का उद्रेक मेरे मन में उठता और वह लेखन सृजन के रूप में स्थायी बन जाता। कभी ऐसा भी होता कि सृजन की उद्दाम तरंगे अपना सिर पटकती रहतीं और मैं समय या सुविधा के अभाव में कुछ नहीं लिख पाती। तब बहुत कुछ खो जाने का एहसास होता, जैसे विचारों  रूपी बादलों के उमड़ने के बाद भी, कुछ न पाने का एहसास, एक खालीपन की अनुभूति कराता। कभी अपने अहं की रक्षा करने के लिए की गई तकरार से, मेरा वह कीमती समय मैं खो देती। कभी बच्चों की चिन्ता, तबियत या घर में एकांत का अभाव, मन में आक्रोश भर देता था।

1989 में जब मोहिनी बेटी का जन्म हुआ, तब से हम दूसरा मकान खरीदने का प्रयत्न करने लगे थे। उन्हीं दिनों शकरदरा चैक के पास वैष्णव अपार्टमेन्ट का फ्लैट हमने खरीद लिया था।  यहां दो बेडरूम किचन और ड्राइंग रूम था। दोनों तरफ आगे पीछे गॅलरी थी। पहली बार हम अपने बड़े घर में रहने आए। मगर यहां सीढ़ियों की बड़ी तकलीफ थी। हमारा फ्लैट तीसरी मंजील पर था। यहां फ्लैट में इंजीनीयर डॉक्टर थे मगर उनके घर की महिलाएं जातिवादी थी। वे अपनी उच्चता और सम्पन्नता दिखाने का कोई अवसर नहीं छोड़तीं। उनके व्यवहार से हमें अपमान का एहसास होता रहता था। यहां भी जातिभेद और अकेलेपन से जूझना पड़ा।

अन्त में 1996 में हमने वह फ्लैट बेच दिया और गोपालनगर के एक पुराने मकान को खरीदकर यहां रहने लगे। यहां मकान में दो कमरे किचन हाल था। ऊपर भी दो कमरे एक हाल था। इतना सब रहने के बाद भी कभी वह दिन नहीं आया कि मैं एक कमरे को अपना बनाकर रखती या ‘यह मेरा कमरा है’ – यह कह पाती। कर्ज भरने की चिन्ता से हमने घर के दूसरी मंजिल के कमरों को ट्यूशन क्लास के लिए किराए पर दे दिया था। हम दो और हमारे चार हम छै लोग नीचे के दो कमरे और हाल में ही रहते थे। यहां के रूम भी 8 ग 9 जैसे छोटे छोटे हैं। बाद में यहीं रहने की आदत हो गई। पति पत्नी का अलग कमरा जैसी बात भी न यहां थी, न ही फ्लैट में। बेटा बेटियां बड़े हो रहे थे। हम सब साथ रहते, बच्चों के साथ ही सोते थे।

गोपालनगर के घर में आने के बाद पति ने ऊपर की मंजिल का एक कमरा अपने पढ़ने लिखने के लिए स्वयं ले लिया था, लेकिन मेरे लिए ऐसा कोई कमरा कभी नहीं रहा। यहां आने के बाद भी मैं अपने लिखने पढ़ने का काम रात में करती हूँ। घर में टी. व्ही आने के बाद, रात के 12 बजे तक टी. व्ही ही चलता रहता, तब टी. वी का समय खत्म होने की राह देखते हुए मैं थोड़ा आराम कर लेती। जैसे ही घर में शांति होती, मैं अपनी किताब कॉपी लेकर बैठ जाती। कॉलेज के पठन पाठन की तैयारी भी करती, स्वतंत्र अध्ययन भी करती और अपना लेखनकार्य  भी करती रहती। फ्लैट में रहते समय भी मैं अपने लिए इसी तरह समय निकाल पाती थी।



लेखन कार्य तो स्कूल में पढ़ने के समय से ही चल रहा था। उन अधकचरी रचनाओं में कभी सुधार करती, कभी एक ही रचना या कविता को बार बार लिखकर सुधारती रहती। इसी तरह लेख और कहानियों को भी बार बार पढ़कर ठीक करती। मैं अपने इन कार्यो में इस तरह मगन रहती कि घंटों बीत जाते और समय बीतने का एहसास ही नहीं होता। रात के 12.00 बजे से सुबह के पांच बजे जाते। चिड़ियां चहचहाने लगतीं, आकाश में उनीदां धुंधला उजाला फैलने लगता। तब लगता कि रात बीत गई है और दिन आ गया है। तब एक या आधा घंटा लेटकर आराम करने के बाद, मैं घर के सुबह के काम में लग जाती। रातभर जागने के बाद भी, कॉलेज जाने के लिए नागपुर से कामठी आने जाने की यात्रा करती। कक्षा में 100-120 छात्रों के शोर के बीच मैं उन्हें पढ़ाती और शाम को घर आकर पुनः घर में भोजन पकाने खिलाने का काम करती। कभी कभी इस तरह 2-3 दिन बीत जाते तब थोड़े चक्कर आने जैसा लगता, मतली जैसा लगता। फिर भी दिनचर्या इसी तरह चलती। तकलीफ होती मगर मन में खुशी रहती कि मैंने अपनी रचनाओं को सही रूप दे दिया है या नई रचनाओं का सृजन किया है। 1986 तक ‘अनुभूति के घेरे’ कहानी संग्रह की कहानियां पूरी तरह छपने के लिए तैयार थी, ‘स्वाति बूंद और खारे मोती’ काव्य संग्रह के लिए मेरे सभी कविताएं बार बार सुधारित होकर परिमार्जित रूप पा चुकी थीं। मैं चाहती थी कि मेरा कविता संग्रह और कहानी संग्रह छपे, प्रकाशित हो। मगर उस समय मैं उन्हें प्रकाशित करने के प्रयास में सफल नहीं हो पाई। कारण यही था – न प्रकाशकों की जानकारी थी, न ही प्रकाशन के लिए खर्च करने के अतिरिक्त रुपए।  पूछने पर सब यही कहते थे कि नागपुर में हिन्दी के कोई प्रकाशक ही नहीं। तब मैं मन मार कर चुप रह जाती थी।


1986 में एम. ए. के डेजरटेशन के लिए नागपुर यूनीवर्सिटी के डॉ. रामेश्वर शर्मा जी से कई मुलाकाते हुईं। इसी तरह नागपुर विश्वविद्यालय के डॉ. हरभजन सिंह हंसपाल जी से भी मिलते रहे। इसके बाद पी.एच. डी. के शोधकार्य के लिए एल. ए. डी कॉलेज की डॉ. योगेश्वरी शास्त्री मैडम से और उनके पति डॉ. अजय मित्र शास्त्री जी से लगातार मिलने रहे। 1990 तक यही चलता रहा। इस बीच इन्हीं लोगों से नागपुर के हिन्दी प्रकाशकों  की जानकारी मिली, तब 1993 में ऋचा प्रकाशन नागपुर से मेरा पहला काव्य संग्रह छपा। इस तरह नागपुर में स्वयं लागत खर्च उठाकर, मैं चार कविता संग्रह, तीन कहानी संग्रह, एक लेख संग्रह, दो नाटक की पुस्तकें और महिला सम्बन्धी दो विवरणात्मक पुस्तकें प्रकाशित कर सकी। इसके लिए मुझे अपने घर में ही और बाहर भी किस तरह संघर्षो का सामना करना पड़ा, यह अलग बात है।

इसके साथ मैं एक बात जरूर कहना चाहूंगी, घर में मुझे लिखने पढ़ने से प्रत्यक्ष रूप में कोई भी मना नहीं करता था, मगर यह सत्य था कि मेरे लगातार लेखन और प्रकाशन से, पति की थोड़ी खुशी के बाद लगातार नाराजी ही दिखाई देती। घर में हम दोनों और बच्चों के अलावा कोई नहीं रहते थे। बच्चों को मेरे लेखन से कोई विरोध नहीं था, फिर कौन मेरे लेखन में अवरोध खड़ा करता था ? मुझे मेरी रखी हुई किताबे पांडुलिपी मिलती नहीं थीं। मैं घंटों और कभी कभी महिनों उन्हें ढूंढ़ती रहती। फिर वे ऐसी जगह रखी मिलतीं, जहां कभी मैंने रखा ही नहीं था। छुट्टी के दिनों में मेरे लिखने के समय ही, घर में कुछ अलग या अच्छीं विशेष चीजे बनाने की फरमाईश होती। मुझे लिखना छोड़कर उठना पड़ता। कभी मुझे लिखने में व्यस्त देखकर ही घर में कचरा गंदगी नजर आने लगता। तब वे सारा सामान उथल पुथल कर, घर में साफ सफाई करने की बात कहते। मैं समझ जाती कि यह मेरे लेखन में जानबूझ कर व्यवधान खड़ा किया जा रहा है। अगर मैं मना करती तब तो दिन भर के लिए लड़ाई का मोर्चा बांध लिया जाता। इस स्थिति से बचने के लिए मैं अपना लेखन कार्य छोड़कर, घर के काम में अपना वह कीमती समय लगा देती। दो दो बातें भी हो जातीं, मगर मैं उस समय अपने विशेष लेखन से वंचित रह जाती। यह दुख मुझे कई दिनों तक सालता रहता। अक्सर यह भी होता रहा, मुझे लेखन में तल्लीन देख उसी समय बेमलब की हुज्जत शुरू की जाती। अकारण ही नाराजी बताकर मेरा ध्यान भंग किया जाता। और फिर यह सिलसिला इस तरह आगे बढ़ता कि कई दिनों तक चलता ही रहता। सुविधा के नाम पर कभी कुछ दिया नहीं, मगर मुझसे मेरा कीमती समय किस तरह छीना जाता रहा, वह भी तानाशाही अधिकारों के साथ ! अब इसके लिए क्या कहू ? यदि उन दिनों मेरे साथ ये जुल्म न किए जाते, तो शायद मेरे लेखन का भंडार कितना बड़ा और महत्वपूर्ण होता। यह मैं अच्छी तरह जानती हूँ, मगर दुखी होने के सिवा कुछ नहीं कर सकी, यह भी मैं जानती हूँ।
अपने लेखन को बचाने के लिए मेरे मन में हमेशा भय रहता था। मैं छिप छिप कर लिखती। मेरे लिखते समय पति आ जाते, या आकर सामने खड़े हो जाते, तब मैं स्वयं अपनी कापी किताब रखकर दूसरे काम में लग जाती। मुझे यह भय रहता कि कहीं मेरी रचनाएं कोई नष्ट न कर दे। तब मैं उन्हें हमेशा संभालकर छिपाकर रखती थी। मेरे लिखे हुए पन्ने सुरक्षित रहें, मेरे लिखे को भी मैं छिपाकर पढ़ती थी। शारीरिक, मानसिक मेरे कष्ट का सिलसिला शुरू न हो जाए, हमेशा सतर्क रहती थी। लायब्रेरी से लाई हुई किताबे भी संभालकर छिपाकर रखती थी कि कहीं वे अचानक नदारद न हो जाएं।

ये बातें कहने में अच्छी नहीं लगती, मगर मेरे साथ अधिकतर यही होता था। जानबूझकर ऐसा किया जाता और अपनी गलती कभी स्वीकार भी नहीं की जाती, जैसे यह खुला आतंकवाद था, जिससे मैं मन ही मन भयभीत रहती थी।  अपनी लिखी रचना इन्हें दिखाकर प्रसंशा पाने के बदले, मैं कई दिनों की आफत को अपने लिए आमंत्रित करती थी। वे मुझे कई तरह से जलील कर करके, यह साबित करते थे कि मुझे कुछ लिखना नहीं आता, वे इससे कई गुना अच्छा लिख सकते हैं। ऐसे समय हमारे बीच लड़ाई झगड़ा होता, मेरे साथ मारपीट भी होती। फिर वह साहित्य सृजन की लगन ऐसे रूठती कि कई दिनों – महीनों तक मेरा साथ ही नहीं देती। तब मैं निष्क्रिय सी अपने जीवन के रेगिस्थान में अकेली भटकती रहती। मेरा लेखन ही मेरे जीवन का उद्यान रहा है। मेरे लेखन के लिए मेरे घर में एक कमरा तो क्या, एक कोना भी सुरक्षित नहीं रहा।

फिर भी मैं लिखती रही, छपती रही। यह मेरी जिद भी, दृढ़ निश्चय था, यह मेरी आशा थी,अरमान था क्योंकि मेरा लेखन सिर्फ मेरे लिए नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए है, दलित पीड़ित शोषित जनों की जागृति और उत्थान के लिए हैं। इसके लिए मैंने कभी ‘अपने कमरे’ की कमी को महसूस नहीं किया। जीवन जिया संग्राम की तरह, और मेरा लेखन चलता रहा संघर्ष के साथ।जब लोग किसी के प्यार में डूबकर अपना घर अपनी हथेली पर बसा लेने की बात करते हैं,तब अपने लोगों के लिए क्या अपना कमरा या कोना न मिल पाना कोई बहाना बन सकेगा ?

मैं जानती हूँ गैरदलित स्थापित सवर्ण साहित्यकार अपने लेखन के लिए विदेश जाते हैं। कई लेखक पहाड़ों पर जाते रहे हैं, प्रकृति की गोद में बैठकर लिखते रहे हैं। वे और उनके समर्थक कभी यह भी देखें कि इसके बिना भी लिखा जा सकता हैं, वह भी तेज धारदार असरदार। फिर भी यदि हमें अपना कमरा मिल पाता, तो यह लेखन कितना महत्वपूर्ण और अधिक होता। झील और पहाड़ों के सपने नहीं चाहिए, मगर जीवन जीने की सुविधा चाहिए, अपनी अभिव्यक्ति का अधिकार चाहिए। यह एक कमरे से अधिक महत्वपूर्ण बात है।

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लड़की पर हमले का इंतजार कर रही है मुम्बई पुलिस : सेना के अफसर पर कार्यवाही से बचने की कवायद

शिलांग में  कार्यरत सेना के अफसर की धमकी , गालियों और पीछा किये जाने से डरी मुम्बई की लड़की प्रियंका पांडेय ने मुम्बई के काशी मीरा पुलिस स्टेशन में अपनी शिकायत दर्ज कराई है. इसके पहले प्रियंका ने डिफेन्स सचिव और महिला आयोग को भी पत्र लिखा . काशी मीरा पुलिस स्टेशन ने उनकी शिकायत को अदखल पात्र ( नॉन काग्निजेबल) मानते हुए मामला दर्ज किया है.

पीड़िता का एफबी पोस्ट

गौरतलब है कि शिलांग में  कार्यरत सेना का अफसर संदीप कु. चव्हाण  प्रियंका को पिछले तीन सालों से मेसेज और फोन के जरिये धमकियां और गालियाँ दे रहा है. इसने  प्रियंका के पिता को भी फोन पर गालियाँ और प्रियंका के संदर्भ में अश्लील बातें कहीं, जिसके बाद प्रियंका ने फेसबुक पोस्ट पर अपनी बात लिखी. इसकी धमकियों को दो सालों तक नजरअंदाज करने के बाद पेस्टिसाइड कंपनी में कार्यरत प्रियंका ने डिफेन्स सचिव संजय मित्रा को अपनी शिकायत भेजी है और 30 मई को देर शाम पुलिस में अपनी शिकायत भी दर्ज कराई, जिसे पुलिस ने दखल के लायक न मानते हुए इन्डियन पेनल कोड 507 के तहत अपने यहाँ रजिस्टर कर लिया.

थाने में शिकायत

क़ानून के जानकारों के अनुसार पुलिस ने ऐसा इस मामले को टालने के लिए किया है क्योंकि धारा 507 ऐसे मामलों में लगाया जाता है जब धमकी देने वाला अज्ञात हो. शिकायतकर्ता ने न सिर्फ आरोपी का नाम बताया है बल्कि नंबर भी जारी किया है, इसलिए पुलिस आई एक्ट , 66A के तहत मामला दर्ज कर तहकीकात करती तो महिला की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है.

लड़की पर तेज़ाब फेकने की धमकी दे रहा है सेना का अफसर

लड़की पर तेज़ाब फेकने की धमकी दे रहा है सेना का अफसर, डरी लड़की ने किया फेसबुक पोस्ट, की डिफेन्स सचिव से शिकायत

स्त्रीकाल डेस्क 


ये भारतीय सेना का  अफसर संदीप कु. चव्हाण है. (नीचे तस्वीर में)  जिसकी पोस्टिंग इस समय शिलांग में है. यह शख्स  मुंबई की एक लड़की प्रियंका पांडेय को पिछले 2 साल से फोन करके और मैसेज करके भद्दी-भद्दी गालियाँ दे रहा है. लड़की के पिता  को फोन करेक बहादुर फौजी ने कहा है कि तुम्हारी बेटी वेश्या है. धंधा करती है.  और ये यह भी कहता है कि मैं तुम्हारी बेटी से शादी करूँगा . इसने लड़की के पिता  के फोन पर ही कहा है कि मैं मई के अंत में शिलांग से मुंबई आ रहा हूँ. तुम्हारी  बेटी मेरा फोन नहीं उठाती है. मैं आर्मी अफसर हूँ. मुझसे पंगा लेना बहुत महंगा पड़ेगा. मई आता हूँ फिर देखता हूँ कौन तुम्हारी बेटी को बचाता है. मैं उसकी जिंदगी बर्बाद कर दूंगा. मैं उसके चेहरे पर तेजाब डाल दूंगा.

लडकी को तंग करने वाला आर्मी ऑफिसर

दो सालों से परेशान प्रियंका ने आज अपने फेसबुक पेज पर इस आशय का मेसेज डाला है. प्रियंका ने फेसबुक पर अपनी बात कहने के पहले डिफेन्स सचिव संजय मित्रा, और महिला आयोग  को अपनी शिकायत भी भेजी है और स्त्रीकाल से बात करते हुए उन्होंने कहा कि आज मुम्बई के एक थाने में  उसके खिलाफ शिकायत भी दर्ज करा रही हूँ .  एक  पेस्टीसाइड कंपनी में कार्यरत प्रियंका ने बताया कि ‘  मैं तंग आकर उसके खिलाफ फेसबुक पर सार्वजनिक तौर पर आई हूँ. प्रोफेशनल काम के सिलसिले में संदीप मुझे मिला था, तब वह लखनऊ में पोस्टेड था. वह सेना की ओर से पेस्टिसाइड के ऑर्डर के लिए आता था. शुरू में वह इस सिलसिले में मुझसे बातें करता था, तब उसका व्यवहार नॉर्मल था. उसके बाद वह पजेसिव होने लगा मेरे प्रति. मैंने मई 2016 से उससे प्रोफेशनल रिश्ते तोड़ लिए.’ वह इसके बाद अलग-अलग नंबरों से फोन कर प्रियंका को धमकियां देने लगा.  प्रियंका के अनुसार उसने इन नंबरों से फोन कर उसे धमकी दी है : 8691896111; 9999416159; 9971819732; 9077772481; 9096771066.

प्रियंका का फेसबुक पोस्ट

प्रियंका के फेसबुक पोस्ट के अनुसार संदीप ने न सिर्फ उसे धमकियां दी बल्कि इस आशय की धमकी उसने उसके पिता तक भिजवाई.  लिखित धमकी अपने फोन नम्बर के साथ उसने अपने एक दोस्त के माध्यम से मेरे सेक्युरिटी गार्ड के मार्फ़त दी. बंद लिफ़ाफ़े में  वेरी अर्जेंट लिखा हुआ था , जिसे देते हुए सेक्युरिटी गार्ड को कहा गया कि इसे  मिस्टर पाण्डेय को देना.

प्रियंका ने  फौजी अफसर का पूरा पता और फोन नंबर अपने फेसबुक पेज पर जारी किया है: 
S K Chavan,
Headquarters 101 Area (st branch),
PIN 79001, C/o 99 APO,
Near Railbong,
Shillong, Meghalaya.
Pin Code : 793001
Landmark: Army Pre Primary School
Mobile: 9628052953

रूममेट्स

सीत मिश्रा

पेशे से पत्रकार. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन. पहला उपन्यास रूममेट्स प्रकाशित
संपर्कseet.mishra04@gmail.com

घर छोड़ने के बाद दोबारा घर वापसी उस रूप में तो कभी नहीं हो पाती। कभी कुछ कम होता है कभी कुछ ज्यादा होता है। लेकिन जस का तस कोई भी नहीं लौटता। इसका एहसास इस बार घर पहुंचकर बार-बार हो रहा था। मेरे पहुंचने से पहले अफवाह घर पहुंच चुकी थी, सोचा था घर पर इन बातों से मुक्ति मिलेगी, मैं आराम से रह सकूंगी। अफवाह से दूर, सुकून के साथ, अपनो के साथ। लेकिन मैं गलत सोच रही थी यहां भी अफवाह फैली हुई थी।


चाची ने पहुंचते ही कहा, ‘का बिटिया नाम कमाए गयी रहूँ, बहुत नाम कई दिहलू।’ बुआ डांट देती चाची को और मुझे समझाती ‘कीड़ा पड़ी बिटिया ओन लोगन के। तू चिंता जिन किहू, ऊपर बाला कुल देखत बा।’
दादी, माँ को सम्बोधित करती हुई कहती, ‘इही बिना लड़कियन के कभौ बहरे न भेजे के चाही। तब न समझूं बजन्ती अब कुल समझ में आवत होई’।

पड़ोसी भी तंज कसते, ‘अरे बहिन, हमार लड़की रहल होत त काट के फेंक देइत। इही बिना बाहर जाए जाला। आपन इज्जत अपने हाथ में होथ।
‘कुछ त भएल रहा होई ऐस ही कोनों बात नाही बढ़त’।
‘कहीं सुने बाटू कि बिना आग के भी धुआँ उड़े ला’।
‘बहरे जाए पर लड़कियन के पर लग जाला, मन बढ़ जाला, बडन के सम्मान भूल जालिन।
‘संस्कार में कमी रह गईल। ई कुल परिवार वाले सिखाव थेन’।

मन बहुत करता था पूछू, किसका परिवार सिखाता है। बाहर भेजने को तैयार नहीं होते और ज्ञान बांट रहे हो। किसी ने बताया था कि कैसे तैयार करो खुद को? बाहर भाई, बाप, ताया, ताई नहीं मिलेंगे, सिर्फ पुरुष मिलेंगे जो हर मौके पर तुम्हें नोच खाने को तैयार बैठे होंगे। खाकर डकार भी नहीं लेंगे और आगे बढ़ जाएंगे दूसरी की तलाश में। तब तो यही संस्कार भरे जा रहे थे बड़ों की इज्जत करो, किसी को जवाब मत दो, पुरुषों से दूर रहो, जुबान मत लड़ाओ यह सब न सिखाते तो भी एहसान करते। वहीं उन सबको लपाट लगाकर आती । लेकिन नहीं इज्जत कर रही थी योगेश की, रागश्री की।

जन्म से हम लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार किया गया और हमारे ऊपर आँखें तरेरी गयीं। नैसर्गिक रूप से स्वीकारने के बजाय हर पल की रोक-टोक मेरी नजर में दुर्व्यवहार के दायरे में ही आती है।

इन सबके बीच माँ कुछ नहीं बोलतीं चुपचाप रहती हैं। कई बार देखती हूँ वह अपने आंचल के कोरों से अपने आंसूओं को पोछ रही होतीं हैं। मन करता है आगे बढ़कर उनके आँसू पोछ दूँ और उन्हें अपनी बाहों में थाम लूँ। समझा दूँ- कुछ नहीं हुआ है माँ, सब ठीक है। लेकिन कुछ नहीं करती। जानती हूँ अगर माँ ने मेरी आँखों में ठहरे हुए आँसू देख लिए तो बहुत बड़ा सैलाब बह निकलेगा और उसे मैं नहीं रोक सकूंगी।

दादी, चाची, पड़ोसी सबका कहा सबकुछ सुनती हैं माँ पर कुछ नहीं कहतीं, बस चुप्प रहती हैं। माँ की आँखें पहले की अपेक्षा ज्यादा सूनी हो गयी है, जाने वह मुझे सही समझती हैं या गलत।


माँ क्यों सुनती हैं? क्यों बर्दाश्त करती हैं इतना? क्या उन्हें लगता है कि उनकी बेटी गलत है? बेटी गलत है इसलिए वापस लौट आई है?

माँ हमेशा कहती थीं- ‘भीतर रहे गुन करे, बाहर जाए खून करे।’ शायद इसलिए उन्होंने मुझे कभी नहीं कुरेदा। कभी नहीं पूछती कि क्या हुआ? या तुम क्या करोगी? या छोड़ दो यह लड़ाई। लड़ने में कुछ नहीं रखा है।
अब माँ यह भी नहीं पूछती- ‘बिटिया तू कहिया टीबी में देखाबू।’


क्या मैंने अपने घरवालों से सिर उठाकर जीने का हक छीन लिया है। क्या मेरे ख्वाहिशों के आसमान ने उनकी प्रतिष्ठा धूमिल कर दी है। मैं इन्हें कभी इस दर्द से उबार नहीं सकूंगी। इन्हें कोई खुशी नहीं दे सकती तो गम नहीं होता, लेकिन इतना बड़ा दर्द मैंने कैसे दे दिया। इसलिए तो माँ ने मुझे बाहर नहीं भेजा था, भाभी ने भईया को इसलिए तो नहीं मनाया था।

जब से घर आई हूँ सबकुछ यथावत चल रहा है, जैसे मशीन से सबकुछ संचालित हो रहा है। माँ दिन भर पूछती हैं बिटिया-‘कुछ खाऊ, कुछ खाई ल, ले आई कुछ।’ चाय अभी भी अपने हाथों से बनाकर ही पिलाती हैं। खाना भी अपने हाथों से ही परोसती हैं, बस अब खाने में स्वाद नहीं आता। मैं उस बेस्वाद खाने को खा नहीं पाती और वह मुझे इस हाल में देख नहीं पाती और मुझे अकेला छोड़कर कमरे से बाहर चली जाती हैं.


हमेशा की तरह माँ अब भी मेरा बिस्तर अपने हाथों से बदल देती है। कुछ नहीं कहती वो। संकट मुझपर आया लेकिन लगता है कि वह इस तकलीफ से खुद गुजर रही हैं, अब वह रातों में कराहतीं। मैं बार-बार उठकर बैठ जाती हूँ, पूछती हूँ मां क्या हुआ- कहती हैं ‘कुछ नाही बिटिया तू सोई जा’। जाने वह उनके घुटनो के दर्द से ज्यादा परेशान हो गयीं हैं या इस उम्र में मैंने जो अपने उपर धब्बा लगवा लिया है उसका दर्द ज्यादा बड़ा है। वह कराहती हुई वॉशरूम तक जाती हैं फिर अपने दर्द को दबाए हुए लौटकर आती हैं और अपने बिस्तर में लेटने से हमेशा की तरह वह मुझे निहारती होंगी शायद। मैं चादर मुँह से पैर तक ओढ़कर सोती हूँ कहीं वह समझ न जाएँ कि मैं सिसक रही हूँ। वह चादर के उपर से ही हाथ फेरती हैं और बगल में लेट जाती हैं। मैं उनके बगल में दूसरी तरफ मुंह किए सिसक रही हूँ, शायद वह भी यही कर रही हों। लेकिन हम में से कोई भी एक-दूसरे से कुछ नहीं पूछता।


माँ से अब मैं क्यों नहीं चिपट पा रही? सीने पर ऐसा क्या बोझ रखा है, जिसका भार अगर मुझ पर से उतरा तो मेरे अपनों पर चढ़ जाने का भय मुझे सालता है। मैं घरवालों से कौन सी बात से छिपाना चाहती हूँ, कि मैंने रब को खो दिया है या मैं अफवाहों में हूं। सबकुछ जानते हुए क्यों अंजान बनी हूँ मैं। क्यों नहीं अफवाह के झूठ को झूठला पा रही, कोई सवाल ही नहीं उठाता सब अपनी अपनी कहकर खाली हो जाते हैं।

अनुभव बोल रहा है कि जिसकी आशंका हो, जिससे बचने की चिन्ता हो वह बात जरूर होकर रहती है। मन में डर घर कर गया है कि कुछ-न-कुछ बहुत बुरा जरूर होगा। अजीब सी बातें हो रही हैं, आसार अच्छे नजर नहीं रहे हैं। शाम के समय घर के भीतर से बातचीत के स्वर सुनाई दे रहे हैं-जैसे कोई बहस हो रही हो। थोड़ी देर बाद ताऊ गरजते हुए बोले- कुलच्छिनी तो है ही यही सब करेगी।



क्या यह शब्द मेरे लिए थे। उफ्फ…. सबको क्या हो गया है अपनी ही बेटी समझ नहीं आ रही है। मुझे जाने क्या हो गया है? मैं कुछ ही महीनों में कितनी बदल गयी। मेरा सारा उत्साह, जोश जाने कहां खो गया था। दुनिया से लड़ लेने ही हिम्मत ही नहीं होती, खुद के जीत जाने का यकीन ही नहीं है। मेरी आँखें अंदर धंस गईं। महसूस होता कि शरीर की सारी शक्ति ही कहीं गुम हो गयी है। मेरे मस्तिष्क में अजीब सा डर समा गया था। अंधेरे से बहुत डर लगता, हर आहट डरा देती, हर बात पर चिहुंक उठती। छोटी-छोटी बातों पर कांपने लगती। कोई भी बात याद नहीं रहती। एक बात करती दूसरी भूल जाती। चावल गैस पर चढ़ाकर बंद करना भूल जाती, लड्डू को पढ़ाते-पढ़ाते चुप्प हो जाती हूं।


दिल बात-बात पर बैठ क्यों जाता है, हर बात पर मैं क्यों घबरा जाती हूँ, क्यों लगता है सबकुछ ठीक नहीं होगा? यह क्या हो गया है मुझे? मैं खुद को समझा नहीं पा रही तो परिवारवालों को क्या समझाऊँ?

उपन्यास रूममेट्स का एक अंश

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

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प्रभा खेतान के साहित्य में स्त्री जीवन का संघर्ष

पंकज कुमार

जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में शोधरत है. संपर्क:ssatyarthi39@gmail.com

स्त्री विमर्श अपने आप में पुरुष द्वारा थोपी गई जाति के लैंगीकरण  की अमानवीय व्यवस्था के विरूद्ध स्त्रीत्व का  जीवंत संघर्ष है. पितृसत्ता तथा पुरुषवाद स्त्री जाति का जन्म से ही बनावटी भेदमूलक कसौटियों पर स्त्रीलिंगी जैविकता में कैद कर उनकी यौनिकता, प्रजनन क्षमता, उत्पादन क्षमता को मनमाने सता आधारित अर्थों व उद्देश्यों के लिए मालिकाना हक से निचोड लेते हैं। स्त्री-विमर्श स्त्री के जीवन देह, श्रम, सौन्दर्य, छवि को दोहने वाली मादाभक्षी पितृसत्ता के सार्वभौमिक लिंगवादी वर्चस्व विरोधी, स्त्रीजाति का अस्मितामूलक विमर्श और सामाजिक-राजनीतिक उन्नयन के लिए चौतरफा संघर्ष है। यह संघर्ष साहित्य के जरिये जिन लेखिकाओं ने किया है उनमें प्रभा खेतान प्रमुख हैं. प्रभा खेतान कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी और उषा प्रियंवदा के बाद की पीढी की महत्वपूर्ण उपन्यासकार हैं।


प्रभा खेतान ने लेखन-विचार तथा व्यवसाय दोनों को सफलतापूर्वक साध कर चौतरफा मोर्चों पर अपने आप को साबित किया है। स्त्रियों द्वारा इस तरह खुद को साबित करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि पुरुष समाज स्त्रियों को कमतर इन्सान और कम काबिल लैंगिक ईकाई के रूप में जानता पहचानता और मानता है। प्रभा खेतान की व्यवसायिक सफलता सिर्फ विरासत नहीं है। अपनी मेहनत से पाया गया मुकाम भी है। प्रभा खेतान लिखती है ‘‘….व्यापार के वे शुरू के दिन थे बिल्कुल ताजा, हर अनुभव के लिए उत्सुक मन। आज जैसा मन उन दिनों नहीं था। आज तो कितनी चीजों को देखकर अनदेखा करती हूँ। चुनौतियों से बचकर निकलती हूँ। उनकी कीमत भी चुकायी है। औरतपने का हीन भाव, पुरुषों की दुनिया में बार-बार अपना औचित्य स्थापित करना चाहता रहा है। क्या मैं औरत हूँ इसलिए यह काम नहीं करूँगी? करके दिखा दूँगी। दिखाया पर देखा भी कम नहीं?’’  प्रभा खेतान अपनी अधिकांश रचनाओं में उसी तरह मौजूद रहती है, जैसी अपनी कहानियों में लेखक खुद दर्शक भी, सूत्रधार भी और चरित्र भी ।


प्रभा खेतान अपनी रचनाओं में जहाँ एक ओर स्त्री जीवन की विविध समस्याओं को उठा रही हैं, वही दूसरी ओर उन्होंने इन समस्याओं से स्त्री को रोज दो-चार कराने वाली सामाजिक व्यवस्था की सच्चाई से रु-ब-रू भी कराया है. उन्होंने अपने उपन्यासों में पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था के बीच स्वतन्त्रता तथा समानता के अधिकार के लिए संघर्षरत विविध चरित्रों को गढ़ा है। ये स्त्री-पात्र जहाँ एक ओर पितृसतात्मक समाज व्यवस्था की सड़ी-गली मान्यताओं को मानने से इन्कार कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर अपने लिए अलग राह बनाने की ओर अग्रसर हैं। चिंतन सम्बन्धी पुस्तकों में उन्होंने उदारीकरण के बाद बदलते आर्थिक और सामाजिक पदिदृश्य का स्त्री-जीवन पर पड़ने वाला प्रभाव पूंजीवादी अर्थतंत्र में स्त्री-श्रमिक के समक्ष उपस्थित चुनौतियों तथा उसके शोषण के विविध रूपों को रेखांकित किया है।

स्त्री आत्मकथा : आत्माभिव्यक्ति और मुक्ति प्रश्न


पूंजीवादी बाजार व्यवस्था में यौनकर्मी के रूप में स्त्री स्वयं एक वस्तु बनती जा रही है। इस संबंध में अभय कुमार दूबे लिखते हैं कि- ‘‘भूमण्डलीकरण, समाचार माध्यम –छपे हुए शब्द से लेकर दृश्य श्रव्य माध्यम,  एक औरत की जो छवि पेश कर रहे हैं उसमें वह एक सुन्दर देह के सिवा कुछ नहीं हैं।’’  राष्ट्र अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए इसे एक संसाधन के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। प्रभा खेतान लिखती हैं कि- ‘‘फिलहाल स्त्री-श्रम को भूमण्डलीकरण के विधेयक प्रभाव से कहीं अधिक प्रौद्योगिकी  का निषेधक प्रभाव झेलना पड़ रहा हैं।’’



अशिक्षित तथा प्रौद्योगिकी ज्ञान से रहित स्त्रियों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए उन्हें इस ज्ञान से लैस करने की आवश्यकता है। ‘‘स्त्री श्रम को अत्यन्त निचले पायदान पर रखा जाता है। वह मात्र सहायिका/ हेल्पर है, मगर मास्टर नहीं।’अब तक स्त्रियों को वस्त्र, इलेक्ट्रानिक्स, संचार,चमड़े का सामान बनाने वाले उद्योगों में निचले दर्जे का काम मिलता रहा है।ज्यादातर कुशलता वाला और प्रबंधन वाला काम पुरुषों को ही दिया जाता है।
स्त्री के प्रेम की अभिव्यक्ति – ‘अन्या से अनन्या’


समलैंगिक स्त्रियों का दावा यह रहता है कि चूँकि वह पुरुष से प्यार नहीं करती इसलिए वह पितृसतात्मक व्यवस्था को बाहरी व्यक्ति होने के कारण चुनौती देने में ज्यादा सक्षम है। चूँकि इतरलिंगी व्यवस्था को स्वीकारने वाली स्त्री संसर्ग के दौरान पुरुष का आधिपत्य स्वीकरती है इसलिए वह बाह्य जगत में भी पुरुष के आधिपत्य को चुनौती नहीं दे सकती। प्रभा खेतान समलैंगिक स्त्रियों के इस दावे के प्रति शंका जाहिर करते हुए कहती है। ‘‘क्या लेस्बियन स्त्री सच में पितृसतात्मक संरचना से मुक्त है? क्या, अपने स्वयं के यौन चुनाव में वह उतनी ही स्पष्ट है अपने साथी को उतने ही समान स्तर पर रखती है, जितना की वह दावा करती है। कहीं पर रखती है, जितना की वह दावा करती है। कहीं वह स्वयं भी इतर वैयक्तिक यौन-संबंधों में पितृसतात्मक संरचना को अनजाने ही स्वीकार तो नहीं कर रही।’’


प्रभा खेतान ने साहित्य तथा अलोचना में स्त्री साहित्य की क्या स्थिति है, इसे भी अपने चिंतन का विषय बनाया। ‘‘स्त्रीकरण एक अमानवीय व्यवस्था है, जिसके तहत पुरुष ने अपने विचारों व अवधारणा के अनुसार स्त्री का निर्माण किया है। ऐसे निर्माण में स्वाभाविक है कि स्त्री की सहमति नहीं रही होगी। साहित्य जगत में भी लेखक ने अपनी कल्पना के अनुसार स्त्री स्वरूप का निर्धारण किया है।’’

अपने अधिकांश उपन्यासों में स्त्री जीवन की विविध समस्याओं को प्रभा खेतान ने चित्रित किया है। चाहे पूरब हो या पश्चिम, स्त्रियाँ इस पुरुषवादी व्यवस्था के बीच शोषित होने के लिए अभिशप्त रही हैं. अपनी बात को वो ‘अपने-अपने चेहरे’ उपन्यास में स्पष्ट कहती है कि ‘‘आप नहीं जानती बहन जी! औरत की सारी स्वतन्त्रता उसके पर्स में निहित है।’’   औरत को सही रूप में आजाद देखने के लिए उसे आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनना पडेगा। स्त्रियाँ आज आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो चुकी है फिर भी वह बार-बार पुरुष से छली जा रही है। इस छल के कारण वह कुंठित हो गई है। ‘‘केवल आर्थिक ढाँचा बदलने से स्त्री को पुरुष के दिमाग में जो स्त्री की पुरुष-हित में छवियों गढ़ता है सम्पूर्ण बदलाव नहीं लाया जाता है।’’

जेंडर की अवधारणा और अन्या से अनन्या


प्रभा खेतान पूँजीवाद की सबसे घिनौनी देन देह व्यापार को मानती हैं, जो उनके ‘अग्निसम्भवा’ उपन्यास में मुखरता से स्पष्ट होता है ‘‘शरीर बेचना भी धंधा कहलाता है। पूँजीवादी समाज की सबसे घिनौनी देन बादशाहों की रखैल से लेकर गली बार में बैठी हुई औरत तक मुझे सबसे नफरत है। आज के युग में कोई मजबूरी का हवाला दे बिल्कुल बकवास है ।’’   प्रभा खेतान ने अपने चिंतन में भी यौन कर्म का सभ्य समाज के लिए कलंक बताया है। लेकिन वे इसके लिए समाज की उस मानसिकता को बदलना चाहती हैं जिसमें वेश्या को तो लांछित और कलंकित किया जाता है जबकि पुरुष ग्राहक को समाज बहिष्कृत नहीं करता। वही उनके उपन्यास ‘अपने-अपने चेहरे’ में पितृसतात्मक समाज स्त्री के मानस का निर्माण इस प्रकार करता है कि वह पुरुष के अत्याचार को नियति समझकर स्वीकार करती चली जाती है। वह स्त्री के लिए संस्थानिक विवाह को महत्व देती है, चाहे उसे पुरुष प्रताडित ही क्यों न करे? पारम्परिक संस्कारों से ग्रस्त सरला के मानस में स्त्री जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता दो चुटकी सिंदूर ही है। ‘‘मन्नो तुम ठीक कह रही हो। अरे कितना भी बिजनेस कर ले, पढ़ाई कर ले, लेकिन एक चुटकी सिन्दुर का आत्मबल ही अलग होता है।’’

पितृसत्तात्मक क समाज द्वारा स्त्री को बच्चा बनाने वाली मशीन समझे जाने पर व्यंग्य करते हुए कहती है, ‘‘मुझे क्यों लाए थे आपके भाई बच्चा पैदा करने ही ना? तो जनकर पटक दिया। बच्चे क्या मेरे कहलाए।’’  पत्नी पति की सुख-सुविधा के लिए है यह एक ऐसी मानसिकता है जहाँ पुरुष प्रधानता हमेशा गौण स्त्रित्व पर हावी रहती है। ‘छिन्नमस्ता’ इसका एक पुख्ता उदाहरण है। इसी के समरूप  ‘‘अरस्तु ने स्त्रियों को गुलाम के बराबर ला खडा किया और कहा कि ‘‘उनके अस्तित्व की सार्थकता इसी में है कि वे slaves, artisans and traders  की तरह highest  happiness of the few के लिए प्रस्तुत रहें- राहों में बिछी हुई सी।’’



इस प्रकार स्पष्ट है कि वैदिक काल से प्रारम्भ होकर भूमण्डलीकरण के इस दौर में महिलाएँ अपनी सामाजिक प्रस्थिती (स्टेटस) और सम्मानजनक अस्तित्व के लिए संघर्षशील हैं किन्तु जैविक- नैसर्गिक भावना के वशीभूत सदैव वंचना की शिकार होती रही है। क्या स्त्री अपनी सर्वाभौमिक पहचान बनाने में समर्थ नहीं होगी? क्या पितृसतात्मक समाज उसे अपने समतुल्य नहीं देख पाएगा? क्या स्त्री अपने अस्तित्व के लिए इसी प्रकार लालापित रहेगी? ऐसे ही कुछ यक्ष प्रश्न है जो प्रभा खेतान के सृजनात्मक साहित्यक कृतियों की केन्द्रिकता का निर्धारण करते है। लेखिका के साहित्यिक सृजन की अन्तर्वस्तु महज अतीत और वर्तमान की अपेक्षा ही नहीं अपितु भविष्य के पुरुष वर्चस्ववाही समाज से भी यही यक्ष प्रश्न करता ही रहेगा।

सन्दर्भ सूची


   1 .खेतान प्रभा- बाजार के बीचः बाजार के खिलाफ, पृष्ठ सं. 77-78 
   2 .दूबे, अभयकुमार- हंस – स्त्री भूमंडलीकरण पितृसत्ता के नए रूप- पृष्ठ 40 
  3 .खेतान प्रभा- उपनिवेश में स्त्री, पृष्ठ सं. 151 
  4. खेतान प्रभा- उपनिवेश में  स्त्री, पृष्ठ सं. 36
  5. खेतान प्रभा- आओ पेपे घर चले, हंस अंक, अप्रैल, 1989, पृष्ठ सं. 73
  6. सिंह, प्रेम – वसुधा अंक विशेषांक, 59-30, पृष्ठ सं. 191
  7. प्रभा खेतान- अग्निसंभवा, हंस अंक मार्च 1992, पृष्ठ सं. 68
  8. प्रभा खेतान- अपने-अपने चेहरे, पृष्ठ सं. 20-21
  9. प्रभा खेतान- छिन्नमस्ता, पृष्ठ 29
  10.अनामिका – स्त्रीत्व का मानचित्र, पृष्ठ 19-20




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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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लिखने बैठा अभिजीत भट्टाचार्य की कुंठा लिख बैठा सहारनपुर का जोश

संपादकीय 


यह पहली बार नहीं है कि अभिजीत भट्टाचार्य ने अश्लील और आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की है, और न ही यह पहली बार है कि बॉलीवुड के किसी कलाकार ने किसी महिला या महिलाओं के खिलाफ अभद्र टिप्पणी की है. दरअसल स्क्रीन बौद्धिकता का आतंक यह है कि उधर से कोई भी शख्स किसी भी विषय पर मुंह खोले वह विमर्श का विषय बन जाता है.दक्षिण-वाम,सत्ता-विपक्ष सबके के पास अपने-अपने स्क्रीन बौद्धिक हैं. कहीं शबाना आजमी,जावेद अख्तर का राज है तो कहीं परेश रावल,अनुपम खेर और अभिजित भट्टाचार्य जैसे शख्स का.



अभी परेश रावल का लेखिका अरुंधती राय के खिलाफ बयान अपने अंतिम समर्थन या विरोध तक पहुंचा भी नहीं था कि गायक अभिजीत भट्टाचार्य ने जेएनयू की शोध छात्रा और छात्र संगठन आइसा की नेता शह्ला रासीद के खिलाफ अश्लील और सेक्सिस्ट ट्वीट किया. सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग और उन्मादी बयानवाजों की ऐसी भीड़ है कि इन दोनों को खूब समर्थन भी मिलने लगे, इसके बावजूद कि एक बड़े समूह ने इनकी निंदा की. समर्थन करने वाले लोगों में वे भी हैं, जिन्हें या तो भारत के प्रधानमंत्री फॉलो करते हैं या जो भारत के प्रधानमंत्री को न सिर्फ फॉलो करते हैं, उनके लिए सोशल मीडिया में बाकायदा कैम्पेन करते हैं. अभिजीत भट्टाचार्य अपने महिला और गरीब विरोधी बयानों से पहले भी सुर्खियाँ बटोरते रहे हैं- वही समर्थन और विरोध वाली सुर्खियाँ, लेकिन इस बार ट्वीटर ने उनपर कार्रवाई करते हुए उनका अकाउंट बंद कर दिया. वैसे अभिजीत अपने ट्वीट के लिए इससे अधिक सजा के काबिल हैं. अभिजीत के बयान के बाद बॉलीवुड की शख्सियतों को भी आगे आना चाहिए था और उसका बायकाट सुनिश्चित करना चाहिए था.

इन बयानवीरों ने जिन महिलाओं के खिलाफ बयान दिया है वे समाज में यथास्थितिवाद के खिलाफ सक्रिय शख्सियतें हैं. अरुंधती राय न सिर्फ एक सम्मानित लेखिका हैं बल्कि समाज में अलग-अलग रूपों में कायम वर्चस्ववाद के खिलाफ सक्रिय भी रहती हैं. शाहला इन दिनों छात्र आंदोलनों में एक जाना-पहचाना नाम है और स्त्री अधिकारों को लेकर सक्रिय रहती हैं. नागरी समाज में सक्रिय इन महिलाओं की जीवटता और वर्चस्ववादी व्यवस्था के खिलाफ उनकी प्रतिबद्धता को एक दो रावल या भट्टाचार्य जैसे लोग प्रभावित नहीं कर सकते, चाहिए मीडिया उनकी स्क्रीन लोकप्रियता को बौद्धिकता का जामा पहनाने की कितनी भी कोशिश करे.



लेकिन आज इन प्रतिबद्ध और निरंतर सक्रिय नागरी महिलाओं की छवि से ज्यादा मुझे उन ग्रामीण महिलाओं की छवि आकर्षित कर रही है, जो सहरानपुर के इलाकों में क्रूर जातिवादी और स्त्रीविरोधी लम्पटों के खिलाफ डटी हुई हैं-इन महिलाओं के संघर्ष और मुद्दों को जाति और जेंडर के अंतर्संबंध की समझ के लिए भी समझा जाना चाहिए और ब्राह्मणवादी पितृसत्ता और उसके खिलाफ संघर्ष को समझने के लिए भी. ये ग्रामीण महिलायें देश में एक विचार के लिए, समता के एक सिद्धांत के लिए और उसके एक प्रतीक के लिए मर मिटने को तैयार हैं, जूझ रही हैं, तलवार के हमले सह रही हैं तो तलवारों को चुनौती भी दे रही हैं. ये शहरों में जाति और जेंडर के मुद्दों पर संघर्ष कर रही महिलाओं की जमीनी प्रतिरूप हैं.


हाँ, मैं सहारनपुर के घडकौली गाँव की बात कर रहा हूँ. वही घडकौली जहां लगाया गया ‘द ग्रेट चमार’ लिखा हुआ बोर्ड इन दिनों सुर्ख़ियों में है. इस बोर्ड को अपनी अस्मिता से जोड़कर ये महिलायें पहरा दे रही हैं ताकि कोई उसका नुकसान नहीं पहुंचाए. इस बोर्ड को गाँव के सवर्णों ने और पुलिस ने एक बार नुकसान पहुंचाया भी था, जिसे लेकर गांव के पुरुषों के साथ इन महिलाओं ने भी लाठियां खाई. महिलाओं के स्पष्ट समझदारी भी है वे ‘चमार’ कहे जाने को लेकर सवाल किये जाने पर जवाब देती हैं कि ‘पहले वे जब हमें चमार कहते थे, उसमें हीनताबोध का भाव था. आज हम अपनी इस जाति में ‘चमार’ कहे जाने में गर्व महसूस कर रहे हैं, तो उन्हें परेशानी हो रही है.’ वे इस सवाल पर कि क्या बहन जी यानी उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री मायावती में अपनी ताकत महसूस करती हैं या भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर से. बहन जी का मुख्यमंत्री होना उन्हें अच्छा लगता है, सशक्ति के अनुभव के लिए लेकिन चन्द्रशेखर इस अनुभव को एक लक्ष्य भी दे रहे हैं ‘बच्चों को पढ़ाने, संगठित करने और बाबा साहेब की राह पर प्रेरित करने का.’ उनके शब्दों में’ चंद्रशेखर उनके संघर्षों में शामिल हैं, इसलिए वे उनके नेता हैं.’



मैं बात शब्बीरपुर की भी कर रहा हूँ. जहां राजपूत जाति के लोगों ने दलितों का घर जला दिया है, उनपर तलवारों से हमला किया है. उसमें कुछ महिलायें घायल भी हुई हैं. जब हमसब शब्बीरपुर गाँव गये तो हमसे सबसे ज्यादा संवाद बनाने वाली महिलायें ही थीं. वे इस जाति-हिंसा के खिलाफ हैं और उससे जूझने के लिए तैयार हैं. उन्हें यह अहसास है कि दलितों के हालात अब वैसे नहीं रहे जो आज से कुछ दशक पहले थे. उन्होंने कहा कि ‘हमारे यहाँ लड़के, लडकियां सब पढ़ रहे हैं, नौकरियाँ ले रहे हैं. राजपूतों के यहाँ लोग नहीं पढ़ते, इसलिए नौकरी भी नहीं मिलती उन्हें. यही कारण है कि वे आक्रोश में हैं कि कल तक हम जिन्हें दबा कर रखते थे, वे आज तरक्की कर रहे हैं.’ ये महिलायें दलित- असर्शन को समझती हैं. इन महिलाओं से मिलना सुखद अनुभूति वाला रहा, वे हारने को तैयार नहीं हैं. बाबा साहेब उनके आदर्श हैं, घरों में मायावती की तस्वीरें हैं. हमसे बात करते हुए वे स्पष्ट करती हैं कि क्यों संत रविदास का मंदिर या बाबा साहेब की मूर्ति सवर्णों को परेशान करते हैं. अस्मिता और अधिकार के बोध से भरी इन महिलाओं का जोश और उनकी समझदारी आकर्षित करती है किसी अभिजीत भट्टाचार्य या परेश रावल की बौद्धिकता न अरुंधती राय को समझ सकती है, न शाहला मसूद को और न गांवों में जोश, जज्बे और बोध से भरी इन महिलाओं को.

संजीव चंदन

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दलित पत्रकारिता का जूनून: कठिन डगर की राह पर डॉली कुमार

स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत हमने नेतृत्व के कई नामों के बारे में या तो स्वयं उनसे  स्वयं या किसी लेखक द्वारा प्रस्तुत आलेख पढ़े. बहुत कम समय में वैकल्पिक मीडिया में अपनी शानदार उपस्थिति बनाने में कामयाब हुई नेशनल दस्तक की मुखिया डॉली कुमार के बारे में जानते हैं उनकी ही ज़ुबानी- प्रेम से लेकर कारोबार तक की पहलकदमी को: 



मैं मध्यवर्गीय परिवार में अपने मां-पिता की पांचवीं संतान हूँ. पिता, विजेंद्र पाल, पोस्टल विभाग में कर्मचारी थे, अब रिटायर्ड हैं, मां, भारती, गृहिणी रही हैं. दादा जिले सिंह किसान थे. मेरी प्राथमिक पढाई अपने आस-पास में जो स्कूल था उसमे हुई है. हिंदी मीडियम स्कूल था यूपी बोर्ड का उसमे हुई. मैं पढ़ाई में अच्छी थी. पापा चाहते थे कि बेटियां पढ़ें-लिखें तो सभी को पढ़ाया. मेरा कुछ ज्यादा इंटरेस्ट था पढ़ने-लिखने में तो फिर पापा ने मुझे यहां, दिल्ली में सीबीएसई स्कूल में दाखिला दिलवाया. अर्वाची भारतीय स्कूल में मैंने एडमिशन लिया, इंग्लिश मीडियम स्कूल था सीबीएसई बोर्ड. फिर मेरी सारी दिल्ली में ही होती रही. ग्रेजुएशन भी फिर दिल्ली विश्वविद्यालय  से हुआ, उसके बाद मास्टर्स मैंने इग्नू से किया और उसके बाद पीएचडी.



घर चूकी मध्यवर्गीय था, इसलिए सामान्य सोच थी कि लड़कियां हैं, इनकी पढ़ाई-लिखाई करानी है और शादी तय करानी है. लेकिन पापा को बहुत उम्मीदें थी कि मेरी बेटियाँ जितनी भी हैं पढ़ लिख कर किसी अच्छी जगह पर जायें. सब के लिए उन्होंने कोशिश की. हालांकि कुछ-कुछ असर होता है लड़कियों पर भी, जब वे अपने आस-पास का समाज देखती हैं. वे देखती हैं कि लड़कियां शादी करके घर छोड़कर जा रही हैं, तो मेरी बहनों का भी इसी तरीके से एक अप्रोच बन गया कि उनको ज्यादा कुछ नहीं करना है. मैं कुछ अलग सोचती थी. पापा ने प्रोत्साहित भी किया पढ़ने के लिए, उन्होंने कभी मेरे ऊपर दवाब नहीं बनाया कि तुम्हें शादी करनी है या यह कि तुम पढ़ो. वे चाहते थे कि मैं जितना पढ़ना चाहती हूं पढूं. मुझे आगे जो करना है करूं.

बुलंद इरादे और युवा सोच के साथ

हां, पापा के ऊपर दादा जी की तरफ से भी दवाब रहता था कि बेटियों की जल्दी-जल्दी शादी करो. हालांकि मेंरे दादा जी ने भी मुझे नहीं कहा कभी. जब तक वे ज़िंदा रहे मेरा हर स्तर पर समर्थन करते रहे. जो मेरी बड़ी बहनें थीं उनकी शादी जल्दी कि गई. मैं आखिरी बेटी थी तो सबको ये था कि नहीं ठीक है, चार की शादी हो चुकी है, एक बची है तो उसको अवसर दिया जा सकता है.

जाट परिवार से हूँ. सारे समाजों की तरह यह भी एक पितृसत्तात्मक समाज है. जितना मैनें देखा है, औरतें घर में काम करती हैं. मतलब कि आप वही चीजें आप कर रही हैं, जो चीजें आपके लिए तय हैं, वह तय समाज कर रहा है. बचपन से अपने घर चूल्हा-चुका, शादी के बाद में दूसरे का घर जा कर संभालना है.

:दलित महिला उद्यमिता को संगठित कर रही हैं सागरिका

मां तो दसवीं पास थीं. लेकिन मेरे नजरिये से उन्होंने बहुत दवाब का जीवन जिया. वही दवाब जो मध्यवर्गीय पितृसत्तात्मक समाज में गृहस्थ स्त्रियों पर होता है. मैंने उन्हें वही देखा है. हर वक्त काम करते हुए ,चाहे घर का हो चाहे घेर का हो. हमारे यहां घेर मतलब है, जहाँ भैंस वगैरह होती हैं. ज्यादातर बैठकें होती हैं वहाँ. आदमी लोग वहीँ पर बैठते हैं. घेर में यदि औरतें बैठती हैं तो अलग बैठती हैं-एक डिविजन होता था कि जब आदमी बैठ के बात कर रहे हैं बैठक में, तो औरतें वहां पर नहीं होती हैं.


मेरे पापा प्रेमचन्द आदि के साहित्य पढ़ते थे. हालांकि तब प्रेमचंद से या किसी भी साहित्य से मेरा बिलकुल भी जुड़ाव नहीं था. साहित्य मैंने पढ़ा ही नहीं था. बचपन में मैंने प्रेमचंद का उपन्यास निर्मला पढ़ा, लेकिन उस वक्त मंँ बिलकुल भी नहीं समझ पाई कि निर्मला क्या है, क्यों लिखी गई है. मैंने एक कहानी के तौर पे उसे पढ़ लिया. भीमराव अम्बेडकर कॉलेज, दिल्ली यूनिवर्सिटी से मैंने बीए किया. ज्योग्रफी, हिस्ट्री मेरा विषय था.

पूर्ण शराबबंदी के लिए प्रतिबद्ध वड़ार समाज की बेटी संगीता पवार

वहीं कॉलेज में मेरी मुलाक़ात सुमित (अब पति) से हुई. हम क्लासमेट थे. फिर दोस्ती हो गई. एक दूसरे को जानना शुरू किया, उस वक्त तक भी ऐसी कोई चेतना नहीं थी. बस ठीक है चल रहा था. पढ़ रहे थे. ये था कि नौकरी करनी है, आगे कुछ कमाना है. जब हम मिले थे तो सुमित की जाति हमें मालूम नहीं थी और तब मेरे लिए उनकी जाति इशू भी नहीं थी. अब मैं यह नहीं बता सकती कि प्रेम कब शुरू हुआ, क्यूंकि आपको नहीं पता होता है कि आप कब आकर्षित होते हैं, एक-दूसरे की तरफ लेकिन जब हम दोनो ने एक दूसरे को कहा कि हां हम आगे बढ़ना चाहते हैं, जीवन साथी बनना चाहते हैं, जब मैंने कहा कि ‘मैं तुमसे प्यार करती हूं’ उससे पहले मुझे पता था कि सुमित किस जाति से आते हैं, और मुझे यह भी पता था कि मुझे आगे किन चीजों का सामना करना है- सुमित जाटव थे और मैं जाट.


जाति, एक सामाजिक सच्चाई के रूप में बचपन से ही पता हो गई थी, तब जब मुझे बताया जाता था कि मैं जाट जाति से हूं, मुझे बताया जाता था कि ये पंडित हैं, मुझे ये बताया जाता था कि ये पंडित घर आते हैं तो उनको खाना खिलाया जाता है, उनको सम्मान दिया जाता है, मुझे बताया जाता था कि वे चमार हैं, उनके साथ में बैठा उठा नहीं जाता है, उनके साथ खाना नहीं खाया जाता है. मैं तब अम्बेडकर को भी जानती थी, लेकिन सिर्फ नील कोट वाले आदमी के रूप में. अम्बेडकर का नाम जरुर पढ़ा था कि वे संविधान निर्माता हैं, बस इतना ही पढ़ा था किताबों में. कौन हैं, क्या हैं, बहुत नहीं पता था. जिस तरीके से हम कुछ और क्रांतिकारियों का नाम पढ़ लेते हैं, जब हम स्वतंत्रता संग्राम के बारे में पढ़ रहे होते हैं. मेरी कुछ सहेलियां थीं, जो चमार जाति से थीं. मैं उनके घर जाती थी तो वहां वह तस्वीर देखती थी, उनके घर में लगी हुई होती थी. लेकिन कभी उससे आगे जानने की कोशिश नहीं की, गंभीर नहीं हुई. बहुत सारे लोग, जो जाति से चमार थे, हमारे खेत-वगैरह में काम करते थे, उनके घर में शादियाँ वगैराह होती थी तो ठीक है कि मद्द कर दी, कपड़े वगैरह दे दिये, खासकर उनकी बेटी की शादी है तो सब चीजें दे दी.  लेकिन जब उनके घर से जब कोई सामान आता था मिठाई वगैर ,तो मुझे याद है हमें वो चीजें खाने के लिए मम्मी या फिर घर की अन्य औरतें मना करती थीं कि ‘नहीं चमार के घर से आया है मत खाओ’, नहीं खाना चाहिए. एक बार के रसगुल्ले मुझे याद हैं. एक बार रसगुल्ले आये थे, तो हमें खाने के लिए मना किया गया था. हालांकि ज्यादातर ऐसी मनाही मैंने मेरी मम्मी से या बाकी लोगों से सुनी थी. पापा ने हमें ऐसा कभी नहीं कहा.


दलित महिलाओं के संघर्ष की मशाल: मंजुला प्रदीप

शादी के वक्त मुझे अहसास था कि मैं जिस कम्युनिटी से आती हूं, वहाँ उनका मानना होता है कि लड़की घर की इज्जत होती है. मैंने ऐसे भी मामले सुने थे, जिसमें जब लड़की ने किसी और जाति में किसी लड़के से शादी करने की हिम्मत दिखाई, या प्यार करने कि हिम्मत दिखाई तो उसको मार दिया गया. मुझे अपने अपने माँ बाप पर ये विश्वास था कि वे ऐसे नहीं हैं, लेकिन आपको अपने रिश्तेदारों पर भरोसा नहीं होता है.

घर को जब हमारे रिश्ते की भनक लगी तो घर से फोन आया कि घर आओ, उस वक्त मुझे सुमित ने तुरत छोड़ा था, मुझे सर्टिफिकेट वगैरह निकलवाना था. फोन के अंदाज से मुझे शक हुआ कि शायद कुछ ठीक नहीं है. फिर घर गई तो घर में पहले से कुछ लोग बैठे हुए थे. दीदी वगैरह, मम्मी, घर के लोग थे. ऐसा नहीं था कि घर के लोगों को हमारी दोस्ती का पता नहीं था. मां की सुमित से बात होती थी, फोन पर. कॉलेज में एक बार पापा मिल चुके थे.

मैं तब आशंकाओं से भरी थी, कैद कर दिये जाने की आशंका, जल्दी से शादी कर देने की आशंका या और भी बहुत कुछ. लेकिन मैंने कुछ नहीं बोला, हां भी नहीं बोला और ना भी नहीं बोला. मैंने रात में सुमित को बताया कि मेरे घर को पता चल चुका है. सुमित ने कहा कि ‘तुम्हें कोई भी प्रॉब्लम हो तो मुझे तुरत बताना. मैं वहीं पर तुम्हारे गाँव के बाहर रहूँगा वहीं पर. पुलिस को भी इन्फॉर्म कर देता हूं.’ मैंने कहा, ‘नहीं ऐसा नहीं ,है लेकिन मुझे डर लग रहा है, मतलब मुझे नहीं पता इनका अगला रिएक्शन क्या होगा!’ पापा ने अगले दिन मुझसे पूछा, ‘मैंने हां नहीं कहा, लेकिन मैं रोने लगी. फिर पापा समझ गये कि इसका मतलब है तुम मना नहीं कर रही हो, तो इसका मतलब तुम चाहती हो. उसके बाद पूरा एक इमोशनल दौर शुरू हुआ. पापा ने ज्यादा नहीं बोला लेकिन चाचा-चाची आदि ने आकर बहुत समझाया. उन्होंने समझाया, ‘कुछ तो हमारी इज्जत का सोचा होता. मतलब चमार तुम ले आयी, चमार जाति का उठा के ले आयी लड़का. इस तरीके से नहीं चलता है समाज और ये सब चीज| शुरुआत में मैं बहुत डरी हुई थी. ये प्रक्रिया पूरे दो महीने तक चलती रही.

बहुजन आंदोलन की समर्पित शख्सियत: मनीषा बांगर

उस दौरान डायट में ट्रेनिंग ले रही थी. टीचिंग प्रोफेशन के लिए. ट्रेनिंग के लिए मैं हर बार घर से बाहर जाती थी. उसके लिए मुझे बंदिश नहीं थी. धीरे-धीरे जब इतनी सारी चीजें होती गईं थीं. मैंने समझाने की कोशिश भी की. फिर मैं भी खुलने लगी. मैंने सोचा मैं बोलूंगी. हां मैं बोलने लगी. विद्रोही भी कह सकते हैं इन अर्थो में कि मैं उनकी बात पे मानने वाली नहीं थी. मैं डायरी लिखने लगी. अपनी सारी बातें उसमें लिखने लगी, जो मैं उनसे नहीं बोल पाती थी. मैंने बोलना भी शुरू किया कि ‘आप मेरी शादी कहीं और करा देंगे तो मैं उस लड़के को बता दूंगी. मैं आपको ऑप्शन दे रही हूं कि जिंदगी भर शादी नहीं करूंगी. शादी करुँगी, तो उससे करुँगी. आप नहीं करना चाहते उससे शादी, तो आप मुझे शादी के लिए जिंदगी में कभी फोर्स मत कीजिये. यदि आपको जाति के आलावा लड़के में कोई और समस्या दिखती है कि वह कामयाब नहीं है, अच्छा इन्सान नहीं है, एजुकेशन अच्छा नहीं है, फैमिली अच्छी नहीं है तो आप मुझे बताइए. कुछ तो मुझे ऐसा लॉजिक दीजिये, जाति से अलग इस शादी के खिलाफ.’

सुमित ने अपना काम शुरू किया हुआ था, बहुत ज्यादा कामयाब नहीं थे, लेकिन काम शुरू किया था. हमने शुरू में बात की थी कि हम दोनो नौकरी करने लगेंगे तो हम अपने घर में बतायेंगे. अचानक हमारे सामने परिस्थिति भिन्न थी. सुमित भी बहुत परेशान रहते थे. रात में मुझे कॉल करते रहते थे. उनको डर लगता था कि कहीं मुझे कोई कुछ कर ना दे. पापा को सुझाव भी आते थे कि ‘मार दो लड़की है.’ लोगों ने कहा कि अरे ये तो लड़की है नाक कटवा देगी चमार से शादी करके. पापा ने उन सबको चुप करा दिया. एक बार घर पर मेरा फोन छीन लिया गया था, पापा ने फोन कर के कहा था कि उसका फोन उसे वापस करो और उसका फोन उससे कोई नहीं लेगा. क्योंकि सुमित ने पापा को फोन कर दिया था कि मेरी उससे बात नहीं हो पा रही है.उसने कहा था कि उसे बहुत डर लग रहा है, कि उसको किसी ने कुछ किया न हो. पापा से बात कर लेते थे सुमित. फिर पापा ने मुझसे ये कहा कि तुम्हें कुछ होने नहीं दूंगा. मेरे लिए सबसे लड़ना मुश्किल है, क्योंकि किसी को भी समझाना संभव नहीं है.’ हमारी जॉइंट फैमिली थी, बीस-पच्चीस लोग थे. आस-पास का समाज वैसा ही होता है. पापा का जब ये सपोर्ट आया, मेरे लिए इतना काफी था. वे मेरे पक्ष में खुल के नहीं आ पा रहे थे. क्योंकि चार बेटियां और भी थीं, जो शादीशुदा थीं. मेरी चाची ने जब मेरा फोन छीन लिया तो सुमित ने उन्हें धमका दिया था कि ‘अभी उसका फोन वापस करिये नहीं किया तो मैं पुलिस ले के आ रहा हूं.’ इसी वजह से शायद मैं और मजबूत हो पायी.  उधर सुमित के परिवार के तरफ से कोई मुद्दा नहीं था यह. सुमित के पापा ने मेरे पापा से बात की कि ‘बच्चे जब एक दूसरे को पसंद करते हैं तो हमें कोई समस्या नहीं होनी चाहिए. ये दोनों एक साथ पढ़ते हैं, दोनों क्वालीफाईड हैं तो इस तरह की कोई प्रॉब्लम नहीं होनी चाहिए.’ एक दिन सुमित ने पापा से बात की. सुमित ने कहा कि आप उसको छोड़ने के सिवा जो भी कुछ कहेंगे, वो मैं कर लूँगा, लेकिन मैं उसे छोड़ नहीं सकता.’ पापा ने कहा कि थोड़े दिन रुक जाओ. सुमित कहते थे कि हम कोर्ट मैरेज कर लेते हैं. तुम आ जाओ, मैं सारी चीजें तैयार रखूँगा. मैं ऐसे नहीं आना चाहती थी| मैं यह चाहती थी कि मैं परिवार को मना लूं. अंततः पापा ने कोर्ट में शादी कर लेने की अनुमति दी और 23 नवंबर 2007 हम लोगों ने गाजियाबाद कोर्ट में शादी कर ली.

बाहर और घर, दोनो मोर्चों पर जिसने स्त्रीवादी संघर्ष किया

सुमित की वजह से मेरी सामाजिक गतिविधियों में मेरी रुचि बढ़ी. उन्हें लगता था कि हमें कुछ करना चाहिए. उनके जरिये ही मैंने चीजों को जानना समझना शुरू किया. जब उनका झुकाव मैंने देखा तो मैं भी फिर जानने लगी. मैं भी बातें करने लगी, समझने लगी चीजों को. यहां इस परिवार का माहौल भी ऐसा था कि मैंने यहां अंबेडकर को जाना. इन लोगों ने जब चौदह अप्रैल को एक कार्यक्रम कराया. वहाँ बाबा साहेब के ऊपर बनी फिल्म दिखाई गई. मैंने उस सिनेमा को देखकर बाबा साहेब डा. अंबेडकर को जानना शुरू किया. एक बार  सुमित के साथ मैं उनके गाँव  गई . हमारे घर की और औरतें भी गई थीं. वह मेरे लाइफ का टर्निंग पॉइंट था. वह साल था 2012 का| मैं उस वक्त दूसरे गाँवों  में भी गई, लोगों से मिली. वहां मैंने कुछ चीजें देखीं, जो मेरे लिए बहुत अलग थीं. मैंने मम्मी (सुमित की मां) से तब पूछा कि यहां इतने छोटे -छोटे गाँव हैं, इतनी जल्दी हम  घूम ले रहे हैं. मम्मी ने मुझे बताया कि ये गाँव नहीं है, पूरा गाँव वह है, जो तुम्हें उधर दिखाई दे रहा है- उनका इशारा सामने था. उन्होंने कहा कि ये तो दलितों कि बस्ती है, जहाँ तुम घूम रहे हो. मुझे आश्चर्य हुआ. जिस गाँव से मैं थी, वहां ऐसा नहीं था- दलितों के अलग मोहल्ले थे, लेकिन बस्ती अलग नहीं थी. दलितों की बस्ती यहाँ तो टापू कि तरह लग रही थी. मैंने ये चीजें नहीं देखी थी. जाति भेद-भाव देखा था मैंने. लेकिन ये मेरे लिए सीमा के परे चीज थी कि आपने आशियाना पूरा अलग बसाया हुआ है. यहाँ से मेरी समझ बढ़ी, झुकाव बदला. मैंने देखा कि इन बस्तियों, इनलोगों की खबरें अखबार में पढ़ने के लिए नहीं मिलती थीं. किसी टीवी चैनल पर देखने के लिए नहीं मिलती थीं. उसी समय दलित दस्तक पत्रिका के अशोक दास से भी संपर्क हुआ. तब ये लगा कि इन बस्तियों की खबरें, यहाँ के उत्पीडन की खबरें आयें, बेहतर तरीके से आये तो नेशनल दस्तक का उस समय प्लान दिमाग में आया.

सतपुड़ा की वादियों में सक्रिय आदिवासियों की ताई: प्रतिभाताई शिंदे

नेशनल दस्तक की शुरुआत दिसंबर 2015 में हुई. हालांकि इसकी प्लानिंग और इसे लांच करने में मैं शामिल थी, लेकिन मई 2016 से मैंने  इसका काम पूरी तरह अपने हाथ में लिया.  मुझे लगता है कि जिन बस्तियों, जिन लोगों की मैं बात कर रही हूँ उनके लिए ही जरुरी है ‘दलित-पत्रकारिता.’ नेशनल दस्तक का लोगों ने स्वागत किया है और हम भी लोगों की उम्मीदों पर खरे उतरने के लिए प्रतिबद्ध हैं.  नेशनल दस्तक से  लोगों की उम्मीद आज मेरी जिम्मेवारी है.

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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बाहर और घर, दोनो मोर्चों पर जिसने स्त्रीवादी संघर्ष किया

राजनीतिलक 
स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत राष्ट्रीय दलित महिला आंदोलन की नेता, दलित लेखक संघ की संस्थापक सदस्य, सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय राजनीतिलक बाहर और घर के मोर्चे पर अपने स्त्रीवादी संघर्षों की कहानी खुद कह रही हैं. 

बचपन की उबड़-खाबड़ पगडंडी पर चलते हुए मै किशोर अवस्था पार कर गयी थी. घर में उस समय संसाधनो का आभाव था. हमारी माँ मानसिक रूप से बीमार थी पिताजी ने उनके ईलाज में कोई कसर तो नहीं छोड़ी थी फिर भी उनकी हालत दिन प्रति दिन गिरती ही जा रही थी. माँ के अस्वस्थ होने के कारण पूरे परिवार पर उसका दुष्प्रभाव हुआ. हमारे पिताजी भरी जवानी में पत्नी के सुख से विमुख हुए तो हम माँ की देख-रेख और प्यार से. उनके बीमार हो जाने से घर के काम का बोझ हम बच्चों पर ही पड़ा मै बहनों में बड़ी थी और मनोहर हम सबसे बड़ा. बेवक्त उसकी पढाई में बाधा आ गई, मेरी पढाई भी को भी मुशिलें आईं. घर के छोटे बहन भाइयों की देख-रेख, माँ की देख-रेख और छोटी उम्र में घर के काम के बढ़ते बोझ से मै खिन्न ही रहती थी. अपने बन-ठन कर रहने और खुद को संवारने के प्रति एकदम बेरुखी अपनाई हुई थी. मैंने अपने लिए किसी भी चीज के लिए कभी जिद्द नहीं की. बचपन से ही ख़ुशी नाम का भाव लुप्त सा हो गया था.



बड़े भाई एक वामपंथी छात्र संगठन में जुड़ गये थे. उनके दोस्तों में रमेश भोसले, हबीब अख्तर, आनंद कुमार, हरीश, अंजलि देशपांडे, तारा नेगी, तेजिंदर सिंह आहूजा, भारती, जलिस, रंगीला, रईश, अशोक पानीपत, अक्सर घर आने लगे थे. उनकी विचारधारा के अनुसार गरीबों और अमीरों में गहरी खायी थी, स्त्री-पुरुष के बीच असमानता थी. अमरीकी सम्राज्यवाद और देश के अर्ध-सामंतवाद के विरुद्ध उनका छात्र -संघर्ष देश में समता लाने के लिए, क्रांति के सपने संजोता हुआ, पढाई के साथ-साथ समाज में बदलाव हेतु अपने सीमित  अनुभवों के साथ, सीनियर साथियों के दिशा निर्देश पर चल रहा था. बड़े भाई की विचारधारा में  बदलाव से घर में भी उनके व्यवहार में बदलाव आ रहा था. उन्होंने मुझे प्रेरित किया और छोटा भाई अशोक भी प्रेरित हुआ. उसने स्कूल में छात्रों की यूनियन बनाई उसके साथ में उसके दोस्त राम गोपाल शर्मा, प्रवीन चौधरी भी थे. छोटे बहन-भाई अभी छोटे थे अतः वे हम पर निर्भर ही थे. मेरे से छोटी बहन पुष्पा भारती पढने में होशियार थी, परन्तु बचपन से जिद्दी थी. पिताजी उसकी सब मांगें पूरी कर देते थे. पुष्पा पिताजी की लाडली भी थी, अनिता अभी छोटी थी तो वो हमेशा मेरे साथ ही चिपक कर रहती थी. छोटे भाई दोनों बहुत शैतान थे, कहना कम ही मानते थे
हम तीन बहन भाई सामाजिक कामो में सक्रिय हो गये. पिताजी की इच्छा के विरुद्ध मैं भी अपने जीवन में कुछ बनना चाहती थी. पिताजी बहुत ही सीधे सादे इंसान थे. समाज के नियमो के अनुसार हर पारंपरिक बाप यही चाहता है कि उनके बच्चों की शादी वक्त पर हो जाए. शादी को ही जीवन की परिणति मान लिया जाता है. मेरे सामाजिक कामो में सक्रिय होने से मैं घर के बहार निकलने लगी, कभी पीएसओ की बैठको में, कभी रविदास जयंती के जुलूस में, तो कभी आंबेडकर भवन के कार्यक्रमों में. वहीं से से मेरे सम्पर्को का विस्तार होने लगा, मेरी मित्र मण्डली बढने लगी. यह मित्र मण्डली उन युवक युवतियों की थी, जो डा आंबेडकर के प्रभाव से समाज में कुछ बदलाव लाना चाहते थे. स्त्री-पुरुष असमानता की समझ मेरी बढ़ तो रही थी परन्तु मैं उस पर अपनी राय नहीं देती थी. एकबार जब मैं आई टी आई में हिंदी आशुलिपि का कोर्स कर रही थी तो एक ममता गोयल नाम की लड़की को उसके क्लास टीचर ने इसलिए क्लास से बहार कर दिया कि उसने जींस और कुरता पहना हुआ था, उनकी नजर में में उसे सलवार कमीज ही पहन कर आना चाहिए था. पहली बार मैंने इस भेदभाव के विरुद्ध एक दैनिक अख़बार में सम्पादक के नाम चिठ्ठी लिखी. उसके तुरत छप जाने के कारण मुझसे माफी मांगने को विवश किया जाने लगा उस पर मैंने कह दिया कि अब मै इस घटना की भी दूसरी चिट्ठी लिख दूंगी.

इन दिनों मैं बामसेफ की ओर आकर्षित हुई, चूँकि हमारी शुरुआत वामपंथी साथियों में हुई थी अतः हमारे विचार केवल आंबेडकरवादियों से थोड़े भिन्न थे. बामसेफ का दफ्तर करोलबाग में था. मैं सरकारी नौकरी के लिए रामजस रोड पर सरकारी कोचिंग ले रही थी वहीं जयपाल , आनन्द, सुशीला, सुनीता, सुजाता, द्रौपदी से मुलाकात हुई. इन साथियों के बीच रह कर मैंने आंबेडकरवाद और गौतम बुद्ध के जीवन और उनके कामो के बारे में जाना. दलितों पर होने वाले अत्याचारों, दमन, अपमानो की खबरों से अस्मिताबोध जागने लगा. पिताजी मेरी सक्रियता से बहुत चिंतित हो जाते मुझे तरह-तरह से समझाते कि मुझे घर में रहना चाहिए, घर में रह कर बहन-भाइयों की देखभाल करनी चाहिए, कि माँ की देखभाल करनी चाहिए, कि तुम्हारे इस तरह घूमने से तुम्हारी शादी नहीं हो पाएगी … आदि. घर के काम में छोटी बहन पुष्पा हाथ बटाने  लगी, लेकिन शाम को पिताजी के आने पर मेरी शिकायत भी करती कि आज मैं कब बाहर गयी, कब बाहर से आई या कौन  लड़का या लड़की मुझसे मिलने आया.



एक बार की बात है हमारे वामपंथी साथियों में डॉ विमल मुझे मार्क्सवाद पढ़ाने घर पर आता था . एक ही बिस्तर में सब बहन भाई बैठे हुए होते थे और मुझे पूंजी क्या है, साम्राज्यवाद क्या है, सामंतवाद आदि-आदि पर समझाता रहता. परन्तु मेरा ध्यान उसकी ओर न हो कर पिताजी काम से लौटने वाले है की और ही होता. ये देख कर उनका गुस्सा सातवे आसमान में हो जाता. परन्तु मै उसे मना भी न कर पाती. मनोहर ने उससे कहा यार तुम रात को मत आया करो, इस समय मैं और पिताजी काम से लौटते हैं. परन्तु उस पर उसका असर नहीं हुआ. तब एक दिन तेजिंदर भाई ने उसको साफ कहा कि अब वो आना बंद करे, सब उल्टा होने लगा है. तब तजिंदर भाई ने मुझे सव्यसाची की सीरिज पढने की सलाह दी, मैंने वो सीरिज जो मुझे तेजिंदर भाई ने ला कर दी थी पढनी शुरू की. अपने अम्बेडकरवादी मित्रो को भी पढने के लिए देती.

मैंने आईटीआई कटिंग टेलरिंग में की, साथ में नान कालेजिएट से बी.ए पास की, नम्बर मात्र  39 प्रतिशत ही थे. मुझे नर्स बनने  का बहुत शौंक था, फिर एलएलबी करने की चाह हुई, किन्तु परिस्थितियां हमेशा पढाई के प्रतिकूल ही रही. एक बार टीचर ट्रेनिग का फार्म भरा, नम्बर आया, परन्तु फीस न भर पाने की वजह से वह अवसर भी छोड़ना पड़ा .जिन्दगी कठोर राहो पर बड़े बहन-भाई चलते हैं. वो कटीली राहों पर चले वे जरुर अपने लिए, परन्तु लहुलुहान वे ही हुए, पीछे आने वालो के लिए रास्ता साफ करते चले, बाद में उस राह पर चलने वालों को कैसे  पता होगा कि इस राह पर कांटे बिखरे पड़े थे, काँटों को कुचल कर निकलने पर ही रस्ते बनते है. संघर्षो का इतिहास घर से समाज और समाज से देशों की सीमाओं के पार की लड़ाइया अलग नहीं हैं , न ही दमन, दबाने और सताने के रंग अलग- अलग है. घर और समाज सत्ता का एक अभिन्न हिस्सा है. परिवारों के ढांचे, राजसत्ता को परिपूर्ण करने के माध्यम है, जाति-जेंडर,वर्ण-वर्ग  ढांचागत है.

सामाजिक कार्यो से जुडती गयी. अपनी अभिव्यक्ति कविताओं में करने लगी, फुटकर लघु कथाओं और छोटे-छोटे लेखो से, विचारो में आये बदलावों को अभिव्यक्त करने लगी. तब तक उत्तर भारत में दलित साहित्य की सुगबुगाहट भी नहीं हुई थी. निर्णायक भीम-कानपूर सम्पादक आर.कमल, बिहार से निकलने वाली यूथ पत्रिका में, नाम याद नहीं आ रहा, जिसमे मैंने “राजो “ एक लघु कहानी भेजी वह छप गयी. बाल्मीकि समुदाय की बेटियों को पुस्तैनी धंधे के कारण यौन उत्पीडन से गुजरते हुए घर की कुंठा, अपमान और पितृसत्ता के विकृत चरित्र को झेलना कैसे अनिवार्य हो जाता है इस कथावस्तु पर लिखी कहानी हमारे समाज में व्याप्त पितृसत्ता की झलक की गवाही दे रही थी.

स्त्रीमुक्ति के सवालो के साथ निरंतर जुड़ रही थी. महिलाओ के श्रम के मुद्दों पर यूनियनों की बेरुखी कहें या उन मुद्दों को वो (जाति की ही तरह ही) सेकेंडरी मानते हैं, की बहसों से भारत में स्त्रीवाद के स्वर गूंजने लगे. वामपंथ से बाहर निकल कर स्वायत स्त्री मुक्ति आन्दोलन ने स्त्रियों के सवालों और घरेलू जीवन में उनकी छुपी पहचान को उजागर करने शुरू किये. दहेज़ हत्या, बलात्कार, महंगाई,छेड़छाड़,लडकियों पर घरेलू पहरा, शाम ढलते ही सडकों पर लडकियों का घर से बाहर न निकलना-कैसे दमघोटू माहौल में हम जी रहे थे. मै अपनी मर्जी से शाम को भी घर से बाहर आना-जाना करती थी. हालांकि यह भी सत्य है कि शाम के वक्त राह चलती लडकियों को हर कोई छेड़ने के लिए तैयार दीख पड़ता. बसों में, पैदल चलते शोहदों के अभद्र इशारेबाजी, गंदे कमेंट्स सुनने पड़ते थे. बसों में लडकियों के पीछे किसी भी उम्र के मर्द चिपक कर खड़े हो जाते. आप कंही जा रहे हैं, किसी से रास्ता पूछ लिया तो वो खुद ही साथ साथ चलने लगता. शायद इस दमघोटू माहौल को बदलने की सख्त जरूरत के मद्देनजर खड़े हुए स्त्री मुक्ति आन्दोलन के विरुद्ध एक तरफ चर्चा हुई तो दूसरी तरफ उसका स्वागत भी हुआ. पहली बार दहेज़ पीडितों के समर्थन में महिलायें सड़क पर विरोध करने के लिए उतर आई. उत्पीड़िकों के घरों, मोहल्लो में जा कर उनके खिलाफ नारेबाजी, मुंह काला करने जैसे कृत्यों ने लडकियों और उनके माँ-बाप को हौसला दिया. ऐसे बहुत से प्रदर्शनों में मै स्वयं भी शामिल होती थी. मधु किश्वर की पत्रिका “मानुषी”, सहेली  संगठन ने स्त्रियों के श्रम को घर से बहार निकल कर समाज के धरातल पर ला कर खड़ा कर दिया. स्त्रीवादी विचारधारा शुरू हुई.


मैं अनेक आंदोलनों में भाग ले रही थी. बेलछी काण्ड , अरवल हत्या काण्ड , बिहार में दलितों के विरुद्ध होने वाले नरसंहारो पर देश की राजधानी दिल्ली में वामपंथियों, समाजवादियों और दलितों ने विरोध प्रदर्शन किये. सांझे फ्रंट में लीडिंग भूमिका और पहल, पीपल राईट आर्गनाइजेशन, संतोष राणा ग्रुप,  लोकायन, तथ्यात्मक रिपोर्ट लिखी . कौशल राणा जो उस समय लोकायन में काम करते थे, उन्होंने मनीषा के हवाले जनसत्ता में अरवल काण्ड पर पूरी रिपोर्ट छपवाई. हरियाणा में टिकरी खुर्द गाव में जाटों और दलितों के बीच रास्ते को ले कर सामूहिक संघर्ष हुआ , दलित बस्ती पर पत्थरों की बौछारें की गयी, हम लोग जब फैक्ट फाइंडिंग के लिए गये तब हमें लगा जैसे पत्थरों की दरी बिछी हुई है. इस  में प्रो. ओंकार यादव , अरविंदो घोष और हम मुक्ति से कुछ छात्र भी गये थे. दलितों के दमन की दास्तानें बहुत ही लम्बी है , हर दिन अखबारों में कही न कही मार पिटाई, कहीं उनके रास्तो को रोकने की खबरे, कहीं उनकी औरतो के साथ छेड़खानी की वारदातें, कहीं उनके मवेशियों पर प्रतिबंध, जैसी घटनायें आये दिन होती रहती थी. दिल्ली के पास के एक गांव कंझावला में जमीं के मुद्दे को ले कर दलित और जाटो में झगडा हुआ, जाटो ने दलितों की जमीन पर कब्ज़ा कर लिए उस पर भी बहुत लम्बा संघर्ष चला. वोटक्लब पर धरना और पब्लिक मीटिंग हुई, और सरकार को मांग पत्र भेजा गया. वर्ग संघर्ष पर यकीन करने वालों के जाति संघर्ष ने आँखे खोल दी, वे जाति दमन, उत्पीडन, दबाब को महसूस कर रहे थे. जाति-दमन के साथ- साथ पितृसत्ता के खिलाफ उठ कड़ी हुई महिलाओं ने स्त्रियों के सवालों पर आन्दोलन शुरू किये. आदिवासी युवती मथुरा का दो पुलिस जवानों द्वारा बलात्कार का मुद्दा हो या दहेज़ हत्या के खिलाफ या फिर शाहबानो के भरण-पोषण का केस, इन सब मुद्दों से समाज में लम्बी बहस ने हमारे जैसी युवतियों का मनोबल तो बढाया ही आत्मविश्वास भी बढ़ा.


महिला आन्दोलन अपने शैशव अवस्था पर था, परन्तु बहुत ही आक्रमक रूप में उभर रहा था. बेशक इस इस आन्सोलन ने जेंडर के सवालों ने हम लडकियों में उर्जा फूक दी. अपनी इस चेतना के साथ आगे बड़ते हुए मेरी अपने दोस्तों से लम्बी बहस होती, वे अक्सर कहते, माना कि लडकियों का दमन होता है परन्तु इसका मतलब ये तो नहीं कि तुम हम पर रौब मारो. राम भूल मोर्य, दिवाकर, मास्टर मक्करवाल वैसे तो कम्युनिस्ट थे लेकिन अगर हम उन्हें इतना ही कह दें कि पानी खुद पी लो और हमें भी पिला दो तो इसी बात पर बिना पानी पीये दो तीन घंटे बहस होती. आंदोलनों ने हमें वह नजरिया दिया, जिससे हम लोगो की कथनी और करनी को पहचानना सीखे, और हमने अपने आपको को एक व्यक्ति के रूप में पहचानना सीखा. स्त्री मुक्ति आन्दोलन में बहनापे को ले कर हम बहुत कन्फ्यूज हुए. सब बहुत विनम्रता से अंग्रेजी में बोलती, मीटिंग खत्म होते ही झट से निकल जाती. कल्पना मेहता पहली एसी नारीवादी नेता थी, जो हर उम्र, हर वर्ग की औरत के साथ बराबरी से बहनापा स्थापित करती, उनके व्यवहार से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला और मैंने अपनी नेता के साथ-साथ उन्हें अपनी बड़ी बहन भी  माना , स्त्रीमुक्ति से सम्बन्धित अपने संशयो को मैं उनके समक्ष ही रखती. इन आंदोलनो के आंच मे तप कर निकली हूँ तो तो ये समझ पाई हूँ की संघर्षो को बाहर से रोपा नहीं जा सकता.उन्हें उभारने के लिए अनुकूल वातावरण दे कर भीतर से वातावरण को चीर कर बाहर आने का मार्ग बनने देना चाहिए.

अपने घर के तनावों से तंग आ कर मै मुंबई सरकारी नौकरी में चली गयी. वंहा जा कर मास कम्युनिकेशन में दाखिला ले लिया, और साथ ही एल.एल.बी. में. नौकरी, पढाई और रविवार को सामाजिक कार्य समानांतर चलते रहे. दिल्ली में जैसे सहेली काम कर रही थी, वैसे मुम्बई में वीमेन फोरम काम कर रही थी. मैं उनकी बैठको में जाने लगी, दलित पैंथर के नेताओ से मिली, नामदेव ढसाल, अरुण काम्बले, भाई संघारे, अरुण गोहिल, गंगा बहन, मनोहर अंकुश और रामदास आठवले, बाद में  राजा ढाले से भी मिली. वहीं से मुझे दलित साहित्य की जानकारी हुई. मल्लिका की आत्मकथा “मला उध्वस्त व्हाईचे”  की मराठी आत्मकथा मल्लिकाजी ने दी मैंने दिल्ली आकर वह आत्मकथा कौशल्या बैसंत्री आंटी को दी, उन्होंने पढ़ कर विमल थोरात को दी, और वह किताब मुझ तक वापस नहीं आई. ढसाल के जीवन से मिलती-जुलती कहानी पर एक नाटक “कन्यादान” विजय तेंदुलकर जी ने मंच पर प्रस्तुत किया, मुझे वह नाटक देखने का भी अवसर प्राप्त हुआ. इस नाटक में स्त्री-पुरुष संबंध विशेषतः एक एक्टिविस्ट की जिन्दगी की कथनी और करनी के चित्रण को उभार कर लाया गया है. यह नाटक एक मूल्यबोध की ओर इशारा करता है.

मुंबई से मुझे जल्दी ही ट्रान्सफर मिल गया और मै दिल्ली वापस आ गयी. घर वापस आते ही घरेलू तनाव मेरे साथ प्रवेश कर गये. इन तनावों से मुक्ति पाने के लिए एक वामपंथी साथी से अरेंज शादी कर ली. यंहा से जिन्दगी ने एक नया मोड़ ले लिया. हम दोनों एक दूसरे को दो तीन साल से जानते थे. दो दोस्त-जो शादी से पहले एक समान थे, शादी के  बाद पति पत्नी के रूप में आते ही तराजू के दो पलडो की तरह एक ऊपर और दूसरा नीचे हो गया. घर के काम से लेकर नौकरी सब जिम्मेवारी तो पत्नी की होती है, वो भी एक ऐसी  लड़की की, जिसके घर में गैस नहीं थी, जिसका घर मिडिल क्लास जैसा नहीं था,जहां  गरीबी ने अपने पांव पसारे हुए थे, जिसके पिता को अस्थमा था, माँ मानसिक बीमार थी. इस नए घर में दो कमरों का फ्लैट, किचन, बाथरूम, टायलेट सब था वह स्वयं आयल कम्पनी में स्टेनो था, वामपंथी राजनीति के हिसाब से कंपनी में वर्कर यूनियन का लीडर था. वह बात अलग थी कि कामरेड ज्यादातर बीच-बीच में बिना वेतन के हो जाते, अब घर में कमाने वाली बीबी और घर के काम के लिए नौकरानी भी आराम से सुलभ जो हो गयी थी. कामरेड अपनी बुद्धिमता पर इतने ज्यादा आत्मविश्वासी थे कि दूसरे सब उनके सामने मूर्ख  ही थे. इस व्यवहार के कारण माँ-बाप तो पहले से ही नाराज थे, छोटे बहन-भाई भी नाराज थे. मेरा उनके साथ सम्बन्ध सामान्य था, मैं उनके समर्थन में कुछ कहती तो उन्हें मेरे विरुद्ध भड़काया जाता कि मै स्त्रीवादी हूँ, भ्रष्ट व लम्पट औरतों में रहती हूँ और वे औरतें शराब पीती हैं, एक से ज्यादा पुरुषो से सेक्स करती हैं.


ये कैसा मार्क्सवाद था ? जिसकी समझ एक आम आदमी की तरह थी. आम आदमी कम से कम अपनी पत्नी को माँ- बाप, बहन-भाइयो के साथ मिल-जुल कर रहते देख खुश तो होता है. मार्क्स और लेनिन की विचारधारा माना  वर्ग संघर्षो की बात करती थी, इसका तात्पर्य ये तो नहीं कि घर की चार दीवारी के श्रम को श्रम न माना जाये. ये महाशय परंपरा विरोधी थे, परन्तु घरेलू श्रम भी सामाजिक परम्परा का ही हिस्सा है. समाज में जातीय उत्पीडन और लैंगिक उत्पीडन का खात्मा क्रांति से ही होगा, तब तक चुप चाप जातीय हिंसा सहो और स्त्रियां घरेलू चक्की में पिसती रहें, पति के नियंत्रण में रहें और लैंगिक उत्पीडन सहती रहें. मेरी इस बात पर कभी उससे सहमति नहीं बनी. क्योंकि शोषण, शोषण है- चाहे वो घर में हो या फैक्ट्री में, घरेलू श्रम को लेकर मार्क्सवादी और स्त्रीवादियो में अलग मत थे, मार्क्सवादी पति के आरोप के अनुसार, स्वायत्त स्त्रीवादी आन्दोलन पश्चिम की तर्ज पर इलिट महिलाओ के नेतृत्व में चल रहा है, वे अंग्रेजी कल्चर, बाजारवाद और मर्दों को छोटा करने के सब हथियारों को इस्तमाल करती है. ये बात सही थी कि ज्यादातर औरतें बेहद पढ़ी-लिखी थी, वे पश्चिमी की आज़ादी से प्रभावित भी थीं- उनका रहना सहना और अपने जीवन के फैसलों पर किसी पर निर्भर न हो, वे अपने आप अपने फैसले लेती थीं तो क्या गलत था? इस देश में औरत को पांव की जूती  समझने के कल्चर में जरुर यह एक सांस्कृतिक सदमा  था. यह एक शुरुआत थी और इस शुरुआत ने सभ्य समाज के समक्ष, पुलिस प्रशासन, मिडिया, कोर्ट-कचहरी में स्त्री पक्ष के पक्ष में अपनी बात रखनी शुरू की. अपने ही घर में मैं  न केवल विचारो की कैदी महसूस करने लगी बल्कि मानसिक और शारीरिक बंदिशे भी महसूस करने लगी-इस साथी के साथ, जो मुझे हमेशा कहता था कि साथ रहने आओ, दोनों मिल कर क्रांति के काम में लगेंगे. तब मुझे नहीं पता था कि क्रांति का मतलब किसी एक्टिविस्ट का रोल क्रन्तिकारी पति के लिए जरुरत की चीजें उपलब्ध करना और उसके लिए हमेशा तत्पर रहना था.

राजस्थान में छोटी उम्र की युवती रूप कंवर को सती किया गया. पूरे देश में महिलाओ और प्रगतिशील लोगो ने उसके विरोध में प्रदर्शन किये. अपनी इच्छा के विरुद्ध मैं उसमे नहीं जा पायी, अपने पिता के घर में जो संघर्ष करके मैंने आज़ादी पायी थी, वोह आज़ादी मैंने करांतिकारी पति के घर में आ कर गवा दी, मै फिर से बैक फुट पर पहुँच गयी. शादी मेरे लिए घर की चाहरदिवारी बन गयी उस चाहरदिवारी में कोई सुख नहीं था- न तन का, न मन का, न धन का. अगर कुछ था तो वह थी गहरी उदासी, निराशा, खुद को परतंत्र करने का अपराधबोध और आज़ादी सुख शांति की चाह ने मेरी खुद्दारी को और कुचल दिया. मेरी कवितायें  निराशा और कुंठा अभिव्यक्त करती, मेरी डायरी जिन्दगी से शिकायत करती प्रतीत होती. मैंने आत्मघाती निर्णय ले लिया था-मै कोई साहित्य नहीं पढूंगी, न लिखूंगी. दलित साहित्य की हवा चल रही थी, मैंने उससे खुद को दूर ही रखा. पति महोदय मार्क्सवादी विचारधारा की  पत्रिका “आंच” अपने पिता के नाम पर निकलते थे, मुझे विवश करके अम्बेडकरवादी सर्कल में बेचने भेजते. मै स्वयं उनके विचारों से सहमत नहीं थी, हमारे बीच विचारो के साथ-साथ कल्चर को ले कर भी भारी मतभेद थे. लड़ते-झगड़ते एक बेटी ने जन्म ले लिया था, मैंने अपना सारा ध्यान उधर ही समेट लिया. नौकरी, बेटी को क्रेच से लाना, घर का काम और बेटी का लालन-पालन. बेटी  होने के बाद मतभेदों मेंऔर बढोतरी हो गयी थी. अब उसकी परवरिश पर मुझे नियन्त्रित किया जाता. तुम्हारी जैसी नहीं बनाना है इसे.. आदि आदि.  इस आदि का कोई अंत नहीं था. सुबह शाम, रात-दिन करके शादी के सात वर्ष मेरे लिए मेरे मित्रों और रिश्तेदारों से अलगावों के वर्ष थे. जिनसे न मै मिल सकती थी न अपने मन मुताबिक जी सकती थी.

समाज सेवा– राजनैतिक गतिविधियों से मुंह फेर कर जीना, उन मुद्दों पर बात किये बिना एक जागरूक कार्यकर्ता के लिए लम्बी अँधेरी रात है, जिसका सूरज कब निकलेगा बस यही सोचते-सोचते पूरी अँधेरी रात में आँखे गड़ाये देखते रहना भी एक सजा से कम नहीं.

संक्षिप्त परिचय:
जन्म: 27 मई 1958
दलित स्त्रीवादी –चिन्तक, दलित लेखक संघ की संस्थापक सदस्य, राष्ट्रीय महिला आयोग में दो बार दलित स्त्री विषयक विशेषज्ञ के रूप आमंत्रित. आयोग द्वारा आउट स्टैंडिंग वीमेन अचीवर अवार्ड  से सम्मानित. तीस वर्षो से स्त्रीमुक्ति आन्दोलन में दलित महिलओं के सवाल और दलित आन्दोलन में जेंडर के सवालों को समावेश हेतु सक्रिय.
सम्पादन: भारत की पहली शिक्षिका– सावित्रीबाई फुले, समकालीन भारतीय दलित महिला लेखनखंड 1 -2, “गोलपीठा” (नामदेव ढसाल की कविताएँ) मराठी से अनुदित हिंदी मे,    आरपीआई की एकमात्र महिला नेता शांता बाई दाणी की आत्मकथा “धूप छांव”, शांता कृष्णाजी काम्बले की आत्मकथा “मेरे जीवन की की चित्रकथा- नाजा” प्रेमचंद की सम्पूर्ण स्त्री परक कहानियां,
मुक्तिकमी नायिकाए, डॉ आंबेडकर और महिलाए, बुद्ध ने घर क्यों छोड़ा, दलित विमर्श और पत्रकारिता, अपनी जमीं अपना आसमान (आत्मकथा खंड -1 ),कविता संग्रह : पदचाप एवं  हवा सी बेचैन युवतियाँ

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

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