Home Blog Page 93

सेक्स और स्त्री देह के प्रति सहजता और कुंठा के बीच महीन रेखा

संपादकीय

कभी आपने अपनी नानियों, दादियों, मां, मौसी, चाची या आस-पास की औरतों को सेक्स के बारे में बात करते सुना है ! यकीनन आपका बचपन यदि गांवों में बीता हो, ड्योढ़ी, जो घर के आँगन से लगी स्त्रियों की बैठक होती रही है, यदि उसे आप जानते-समझते हों, तो वहाँ के संवादों को याद करते हुए आप इस सवाल का जवाब ढूंढ सकते हैं. हालांकि यह कभी-कभी ही अनायास का संयोग हो सकता है कि आप उनसे ऐसा कुछ सुनें, क्योंकि बच्चों/किशोरों  के सामने वे सीधे इस पर बात करने में बचती होंगी, फिर भी कूट संकेतों, अचानक की हंसी और गोपनीयता मिश्रित खिखिलाहटें शायद आपको याद हों या अनायास के सुने शब्द भी. मैंने तो अपनी बड़ी नानी को सीधे मुझे संबोधित ऐसे मजाक सुने हैं, अक्सर ये पुरधाइनें (बूढ़ी और अनुभवी स्त्रियाँ) आपके निर्धारित मजाक के रिश्तों के साथ जोड़कर आपको सेक्स से सम्बंधित टिप्पणियाँ दे जाती होंगी.

यहाँ सेक्स बिकता है, सेक्स क़त्ल करता है: बदनाम नहीं, ये मर्दों की गलियाँ हैं

फिर ऐसा क्या होता जाता है कि सेक्स से सम्बंधित बातों के लिए हम दुरग्रह से ग्रस्त होते गये. सेक्स की गोपनीयता अतिरेक में तब्दील होती गई, सेक्स स्त्रियों की इज्जत से जुड़ता गया और इस कदर की यौन अंगों से जुड़े रोग भी छिपाये जाने लगे-यानी आनंद और पीड़ा दोनो ही अतिगोपनीय खाते में डाल दिये गये. शायद ऐसा सभ्यता के प्रभाव में होता जाता है. जानकार इस अतिआरोपित गोपनीयता को विक्टोरियन प्रभाव मानते हैं. अंजता-खजुराहों, कोणार्क, कामसूत्र और के इस देश में सेक्स से सम्बंधित बातचीत अश्लीलता और फुहड़पन में शुमार होने लगीं.  ड्योढ़ी-संस्कृति के जिस अवशेष की बात मैं कर रहा हूँ वह प्रायः बीसवीं सदी के अंत तक का है, लेकिन इसका पूरा शवाब 19वीं सदी तक तबतक रहा होगा, जब विक्टोरियन प्रभाव में हम कथित संस्कार की और न बढ़े. बंगाल में 19वीं सदी में भद्र (कुलीन) महिलाओं के बीच इस कथित अश्लील या फूहड़ माहौल का जिम्मेवार भदेस ( अकुलीन, खासकर यजमानी से जुड़ी ) महिलाओं को माना गया था,अंग्रेज महाप्रभुओं का अनुकरण करते भद्र बंगाली पुरुषों ने जाति और वर्ग की सीमा से परे इस महिला-साख्य को नियंत्रित करने की कोशिश की थी, नियंत्रित किया था.

सेक्स से जुड़ी खबरों, फीचरों को मिलते हिट्स 

ऑनलाइन मीडिया के जमाने में सेक्स से जुड़ी खबरों/ फीचर को हिट्स काफी मिलते हैं. यानी लोग उसे पढ़ते हैं, इन खबरों को क्लिक करने के पीछे उनकी मानसिकता चाहे जो भी होती हो, अलग -अलग, कभी उत्सुकता, कभी जानकारी और कभी कुंठा के लिहाज से लेकिन ऐसी खबरें/फीचर अनुकूलता पर प्रहार करते हैं-लोगों को सहज करते हैं. मैं ऐसा उन खबरों के बारे में नहीं कह रहा हूँ जो क्लिक के नंबर के लिए महिला विरोधी अश्लील हिंसा को प्रोत्साहित करते हैं-कभी ऊप्स मूमेंट की तस्वीरें जारी कर तो कभी ऐसे शीर्षकों से खबरें प्रस्तुत कर जो सॉफ्ट पोर्न का इशारा देते हों. हद तो तब होती है जब रील के बलात्कार को रियल बलात्कार की तरह पेश करते हुए शीर्षक दिये जाते हैं, और वैसी ही तस्वीरें लगाई जाती हैं, मसलन मध्यप्रदेश में पत्रिका ने अपनी एक फीचरनुमा खबर का शीर्षक लगाया: ‘ बड़ी खबर: एक बार फिर दहला बॉलीवुड, ऐक्ट्रेस पंखुरी अवस्थी का हुआ दिन दहाड़े रेप, सभी आरोपी फरार.’ जबकि यह फीचर/ खबर एक सीरियल में फिल्माये गये बलात्कार से सम्बंधित थी. जनसत्ता,अमर, उजाला जैसी अखबारों ने इसी हिट्स की दौड़ में शीर्षक दिया ‘सात लोगों से संबंध बनाते पकड़ी गई कतर की राजकुमारी’ और पूरी फर्जी खबर एक फर्जी तस्वीर के साथ चला दी थी. इस तरह के खबर और भ्रामक फीचर सेक्स की कुंठाओं के दोहन से हिट्स पाने की ललक और व्यापार के हिस्सा होते हैं.



बीबीसी और अन्य पोर्टल के सेक्स फीचर/ खबरें 

जिस दिन मैं यह संपादकीय (अग्रिम तौर पर) लिख रहा हूँ उसी दिन बीबीसी हिन्दी के टॉप 10 पोस्ट में तीन खबरें सेक्स से या महिला देह से सम्बंधित हैं. मसलन: 1. महिला हस्त मैथुन: मिथक और सच्चाई 2. सेक्स सेल से चलता है कुदरत का कारोबार, 3. मैं नग्न होती रहूँगी ताकि फॉलो करना छोड़ दो: पेरिस जैक्सन. यहीं बीबीसी हिन्दी में फरवरी में लगी एक खबर ‘वायरल सेक्स वीडियो ने तबाह की उसकी जिन्दगी’ अप्रैल मई तक उसके वेबसाईट के टॉप 10 ख़बरों/ फीचर में बनी रही. बीबीसी हिन्दी के वेबसाईट पर सेक्स से जुड़ी ऐसी  ख़बरें/ फीचर बारंबारता में आते रहते हैं. मसलन: हस्तमैथुन के ये हैं पांच फायदे, कहीं आप वर्चुअल सेक्स के आदि तो नहीं, जिस योनि से जन्मे उसी पर चुप्पी क्यों, कामसूत्र महिलावादी या कामवासना की किताब, चरमसुख की कुंजी क्या है, रेप को भुलाकर शरीर दोबारा सहज हो सकता है आदि. सैनिटरी पैड को लेकर बीबीसी ने एक सीरीज ही चलाया.

कामसूत्र से अब तक

अमर उजाला ने एक पोस्ट लगाया ‘हस्त मैथुन के बारे में ये बातें जानते हैं आप?’ या सेक्स के दौरान इन बातों का ख्याल रखें मर्द या सेक्स टॉय नहीं मशीन देगी सेक्स का सुख. इस तरह की खबरें और फीचर अन्य समाचार पोर्टल पर भी पोस्ट किये जाते हैं.


ऐसी खबरें और फीचर सेक्स को दैनंदिन में शामिल रूटीन के तौर पर पेश करते हैं और सहजबोध से भी भरते  हैं. इन खबरों/ फीचर का सहज प्रभाव है कि महिलाओं के शरीर पर आरोपित गुप्तता और इज्जत दोनो को चुनौती मिलती है. देह को, सेक्स को स्त्री और पुरुष पाठक सहजता में लेने लगते हैं, कुछ पीढ़ियों का अनुकूलन ख़त्म होता जाता है, यह अनुकूलन आधुनिकता के नाम पर डेढ़-दो सदियों में हमने खुद ही ओढ़ लिया है.

धार्मिक ग्रंथों, क्लासिक्स  और लोकसाहित्य में सेक्स

आधुनिकता, विक्टोरियन आधुनिकता के प्रभाव में आरोपित अनुकूलन से अलग इसी देश की सच्चाई है कि देह और सेक्स के प्रति सामाजिक सहजता के प्रतीक स्वरुप लोकसाहित्य, क्लासिक्स और धार्मिक ग्रन्थ भी खूब मिलते हैं. ये सामाजिक दैनंदिन के हिस्सा हैं, खजुराहो, अजन्ता या कोणार्क के भित्तिचित्रों को छोड़ दें तो भी. लोकगीतों, कथाओं में स्त्री देह और स्त्री-पुरुष संसर्ग के प्रसंग खूब होते रहे हैं. बच्चे के जन्म से लेकर शादी-विवाह के गीतों, फसल के दौरान के गीतों में शारीरिक संसर्ग के संकेत होते ही होते हैं, धर्म ग्रंथों में देवियों की जंघाओं, नितंब और स्तन के वर्णन से ही उनके सौन्दर्य का बिम्ब खीचा जाता रहा है, ऐसा ही क्लासिक्स में भी होता रहा है. देह-संबंध इनके कथा-प्रसंगों में किसी भी कुंठा से परे होते हैं.

  वे लाइव पोर्न में प्रदर्शन के पूर्व ईश्वर को प्रणाम करती हैं !

इस लिहाज से विभिन्न समाचार पत्रों, चैनलों के वेब पोर्टल में सेक्स और देह की खबरें और फीचर न सिर्फ हिट्स का प्रबंध करते हैं बल्कि संपादकों की अपनी समझ, प्रतिबद्धता और एजेंडे के अनुरूप इनमें एक महीन रेखा भी होती है, जिसके इस पार देह और सेक्स के प्रति सहजता होती है तो उस पार कुंठा. इस पार जानकारियाँ देते पोस्ट होते हैं, उस पार स्त्री देह के प्रति पुरुष-दृष्टि से हिंसक भाव पैदा करते पोस्ट.

संजीव चंदन 

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

’एक कहानी यह भी’: कटघरे में खड़े अहं

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com

चारो ओर से कीलती अपनी ही सीमाओं में घिर कर अवाक स्तब्ध खड़ा है व्यक्ति! वक्त का प्रवक्ता और सर्जक बनने का अकूत हौसला है उसके भीतर, लेकिन निजी जीवन-सत्यों और सम्बन्धों के संश्लिष्ट संजाल को देखने की निःसंग दृष्टि नहीं। क्या सचमुच बींधती अजनबी नजर से अपने को देखना इतना कष्टकर होता है? क्या इसलिए कि यह अपनी उन सब उपलब्धियों, निष्पत्तियों, निर्णयों और जीवन-दर्शन की क्रूर जांच की अनिवार्य प्रक्रिया है जहां आज तक स्वयं ’अपने को ’ केन्द्रीय एवं मानक इकाई मान कर वह व्यक्ति, सम्बन्ध, समाज – सब को अपने संदर्भ में बांचता आया है? या इसलिए कि जानने-पहचानने-स्वीकारने की इस प्रक्रिया में जिस अपेक्षित ईमानदारी और निर्भीकता की जरूरत होती है, वह आत्ममुग्धता के रेशों से सिरजी मानवीय फितरत में है ही नहीं? हैं तो लंगड़े पूर्वग्रह या उद्धत अहं जिनके तहत अपनी खूबियों और शहादत के बरक्स दूसरों की खामियां और टुच्चापन रख कर, काटती-छीलती नुकीली सच्चाइयों के बरक्स सहलाती-पुचकारती आत्मछलनाएं रख कर अपने और दूसरे को उतना भर देखा जाता है जिससे अपना ’देखना’ और ’निर्द्वंद्व जीना’ सुभीते से चल सके। आत्मछलनाओं का अनवरत सिलसिला जोे सच को बयान करने की छटपछाहट के सघन दबाव तले सच उगलता है तो कोई न कोई कलात्मक आड़ लेकर – चित्र, संगीत, कहानी कविता। समग्र दृष्टि अर्जित ही नहीं कर पाता आदमी! वह विडंबनाओं में जीने को अभिशप्त है और कतरा-कतरा छुपाने-उघाड़ने की आंखमिचैली में अपने को ’साबुत’ पाने को व्याकुल भी। लेखिकाओं से आत्मकथाएं लिख कर पुरुष तंत्र का पूरक पाठ प्रस्तुत करने का अनुरोध करने वाले राजेन्द्र यादव हों या अपने ही खोल में सिमटी मासूम मन्नू भंडारी – आत्मकथा लिखने के नाम पर दोनों चौककर न-न कर उठते है. राजेन्द्र यादव हिचकिचाती ईमानदारी के साथ कि ’’जिसे हम अपराध कहते हैं, वह कहीं जाने-अनजाने गलत हो जाने का दूसरा नाम है। वह हम सबके साथ है। जो चीजें मुझसे गलत हो गईं, या दूसरों के प्रति जो गलतियां मैंने की हैं, उन सबको स्वीकार करने की या स्वयं अपने सामने देख सकने की मानसिकता मेरी नहीं है। सामाजिक प्रतिष्ठा या तथाकथित मर्यादाएं ऐसी हैं जो मुझे रोकती हैं।’’ (हमारे युग का खलनायक: राजेन्द्र यादव, पृ0 620) और मन्नू बेहद पारदर्शी ढंग से कि ’’ आत्मकथा कथाकार को नहीं लिखनी चाहिए क्योंकि वह अपनी कथाओं में ही बहुत कुछ लिख चुका होता है। अपने ही जीवन का कोई न कोई अंश उसमें जरूर आता है। कहानी भले ही दूसरे की हो, लेकिन जब तक मैं उसे अपनी नहीं बना लेती हूं (मेरा भी कोई आयाम जुड़ ही जाता है) तब तक लिखूंगी कैसे!’’ (आजकल, सितंबर 2004) जाहिर है जब मन्नू भंडारी ’एक कहानी यह भी’ में इसे व्याकुल भाव से आत्मकथा न मानने का आग्रह करती हैं तब प्रश्न उठाने को मन नहीं करता कि फिर निजी जीवन के प्रसंगों, तनावों, विश्वासघातों, आरोपों और शिकायतों से भरपूर इस आत्मकथात्मक रचना को क्या कहा जाए? बस, भूमिका और प्रस्तावना में जहां-तहां टंकी आत्मस्वीकृतियों को आधार बना कर मान लिया जाता है कि यह उन पूरक प्रसंगों और सच्चाइयों को ’थ्री डाइमेंशनल इमेज’ देने का प्रयास भर है जिनकी निजता को अनायास ’मुड़ मुड़ के देखता हूं’ ने उघाड़ कर सार्वजनिक कर दिया है। तो क्या यह प्रतिवादी की ओर से दाखिल जवाबदावा है?

स्त्री का समाज और समाज में स्त्री‘अकेली’

लेकिन क्या साहित्य की देशकालातीत उदात्त सर्जनात्मकता को अदालत या अखाड़े के देशकालाबद्ध टुच्चे दांवपेंचों में रिड्यूस किया जा सकता है?

‘एक कहानी यह भी’ आत्मकथा न होकर आत्मस्मरण या सैल्फ जस्टीफिकेशन ही क्यों न हो, यह तय है कि एक साहित्यिक कृति के रूप में इसका पाठ लेखिका सहित तमाम नामी-गरामी लेखकों और जीवित व्यक्तियों को साहित्यिक पात्रों में तब्दील कर देता है जो एक-दूसरे की संगति और अन्विति में एक-दूसरे को काटते-संवारते अपनी निजता और संपूर्णता ग्रहण करते हैं। अनायास नहीं कि तब स्मृति में कौंध उठता है अमृतलाल नागर का उपन्यास ’सुहाग के नूपुर’ – कन्नगी, कोवलन, और माधवी के त्रिकोण के साथ! प्रेम की टीस, पछाड़ने और छीनने की जिद, पा कर भी ठगे रह जाने की प्रतीति, समर्पण-शहादत के साथ घुलमिल गया कुट्टनी धर्म, प्रेम की उद्दाम लहरों के वेग से रेत के घरौंदों की मानिंद बिखर-बिखर जाती मर्यादा, नैतिकता, पतिव्रत्य और शील की सुपरिचित परिभाषाएं। न, तीनों में गलत कोई भी नहीं और शायद सौ फीसदी सही भी कोई नहीं। न कन्नगी के लाचार आंसू, न माधवी का बेलगाम रोष और न कोवलन की निस्सहाय विवशता। अनुष्ठानमूलक पतिव्रत्य मे जकड़ी कन्नगी एकबारगी क्लीन चिट पा भी ले, लेकिन माधवी की निष्ठा और समर्पण, प्रेम और प्रिय के जरिए अपने भीतर की मनुष्यता और शास्त्र के कुत्सित सत्य को खंगालने का सामर्थ्य  क्या उसे वेश्या और वंचिता बनाए रखने का ही आग्रह करते हैं? कोवलन की उद्दाम वासना कब भीतरी राग से आपूरित हो सम्बन्धों के मकड़जाल से परे अपनी दैहिक-सामाजिक इयत्ता के बोध से परे हृदय पर कब्जा कर बैठी, वह स्वयं नहीं जान पाता। उसका कसूर है कि माधवी के साथ मिल कर उसने समाज का कानून तोड़ा है, और सामाजिक जकड़बंदियों के बीच जीवित-शोभित कन्नगी की त्रासदी यह कि इस फ्रेमवर्क के बाहर उसकी कोई निजी इयत्ता ही नहीं। त्रासदी कहर बन कर नहीं बरपेगी क्या? ’एक कहानी यह भी’ के मन्नू-राजेन्द्र यादव-मीता त्रिकोण चित्रण में बेशक कोवलन-कन्नगी-माधवी सरीखी संवेदना की गहराई, नैतिकता के सनातन सवाल पर बहस का आह्वान या निजी संदर्भों को वृहद् सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य देने की लेखकीय अकुलाहट नहीं है, फिर भी पुनर्परीक्षण की मांग लेकर विवाह-संस्था तो कटघरे में आ ही खड़ी हुई है और साथ ही विवाह संस्था द्वारा अनुमोदित पति-पत्नी के रोल माॅडल भी। शायद विवाह-संस्था का पुनरीक्षण मन्नू भंडारी को पसंद नहीं क्योंकि इस रचना सहित अपने समूचे कथा साहित्य में वे विवाह-संस्था की ’पवित्रता’ तोड़ने वाली बेहयाइयों से संत्रस्त रही हैं, विवाह-संस्था से बाहर निकल कर इसके स्वरूप केा विकृत और संकीर्ण करती ’नैतिकताओं’ और वर्चस्ववादी सामाजिक संरचनाओं के हस्तक्षेप पर विचार नहीं करतीं। इसलिए हथियार छोड़ कर ’आत्मकेन्द्रित आत्मलिप्त’ पति पर यही आरोप लगाती हैं कि ’’वैवाहिक सम्बन्ध की गरिमा का निर्वाह न कर पाने वाले व्यक्ति के लिए विवाह-संस्था के विरुद्ध झंडा उठाए फिरना वाजिब ही नहीं, अनिवार्य भी है। लेकिन फिर विवाह किया ही क्यों?’’ (पृ0 218) इस अभियोग के साथ अपने एकनिष्ठ पत्नी धर्म के प्रति क्षोभ भी है कि ’’क्यों मैं सबके सामने एक सुखी संतुष्ट गृहिणी का मुखौटा ओढ़ कर यह सब झेलती रही जिसे किसी भी स्त्री  के लिए झेल पाना बहुत दुष्कर है’’ और वह भी तब जब ’’न मैंने राजेन्द्र का दिया कभी खाया.. न पहना बल्कि घर और बच्ची की सारी जिम्मेदारियां भी मैं खुद ही ढोती रही।’’ (पृ0 213) बेशक वे दावा करती हैं कि यह रचना उनकी लेखकीय यात्रा पर ही केन्द्रित है किंतु इसका मूल स्वर और लक्ष्य खलनायक के तौर पर राजेन्द्र यादव की फजीहत करना है। गुनाह? एक नहीं, अनेक! पत्नी के प्रति एकनिष्ठ समर्पण का अभाव! दाम्पत्येतर प्रेम सम्बन्ध जीने की सीनाजोरी! पत्नी की अस्मिता को खंडित करता पुरुष अहं! लेकिन इसमें नया क्या है? अभियोगों को विशेषण का रूप देकर पुरुष आज तक अपने पतित्व केा वर्चस्व की निरंकुशता और क्रूरता तक हांकता आया ही है। तो क्या हाशिए से बाहर धकेली पत्नी अन्याय के खिलाफ गुहार न लगाए? मान ले कि अपनी जड़ता में जड़ीभूत स्त्री या तो अहिल्या की तरह शिला बन जाने को अभिशप्त है या भीत कातरता में मुक्ति द्वारों की सांकल खोलने में असमर्थ?

नहीं! मन्नू भंडारी अपना प्रतिरोध दर्ज करना चाहती हैं।
तो सबसे पहले कटघरे में पति यानी राजेन्द्र यादव!

राजेन्द्र यादव के ‘पेंचदार गुट्ठल’ व्यक्तित्व की एक-एक गांठ उघाड़ते हुए वे जिस तरह उन्हें प्रस्तुत करती हैं, तब वहां राजेन्द्र यादव नहीं, ’मेरे आका’ का मुस्तफा खार अपनी तमाम सामंती क्रूरता और सम्मोहन, निरंकुशता और नृशंसता के साथ आ विराजता है। बच्ची और परिवारियों के सुख-दुख से उपरत; अंतरंग मित्रता को गहरी संवादहीनता के कगारों तक ले आने वाला अहंवादी (’’किसी का भी वर्चस्व स्वीकार करना तो इनके अहं को गवारा ही न था’’, पृ0 82); सहजीवन के नाम पर पत्नी को ’समानांतर जिंदगी का आधुनिकतम पैटर्न’ थमाता हिपोक्रेट ताकि उसकी ऐयाशियों और विश्वासघातों का सिलसिला बदस्तूर चलता रहे (पृ0 48); पत्नी के संदर्भ में सामान्य सी इंसानियत को भी दरकिनार करता, अपनी शर्तों पर जीता पौरुषीय अहं जिसके लिए पत्नी का अर्थ है मूक समर्पिता नर्स (पृ0 88)। न, पत्नी के विशिष्ट आत्मनिर्भर व्यक्तित्व की अकुंठ स्वीकृति नहीं। बल्कि वही तो कलह-क्लेश की मूल जड़ क्योंकि मन में कहीं यह संस्कार जड़ें जमाए बैठा है कि ’’परिवार में वर्चस्व और प्रभुत्व केवल उसी का हो सकता है जो परिवार का भरण-पोषण करे।’’ (पृ0 208) इसलिए बच्ची की देखभाल को ’आयागिरी’ के साथ जोड़ने की मर्दवादी मानसिकता जो अपने आर्थिक निठल्लेपन के कारण मर्माहत हो पत्नी को बुरी तरह चींथ डालती है तो पत्नी द्वारा अलग रहने के निर्णय पर फूट-फूट पड़ती कातर रुलाई – ’’मन्नू, यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा ब्लैक स्पाॅट है… तुम्हीं मुझे इससे उबार सकती हो….देखो, तुम मुझे छोड़ कर मत जाना… तुम मुझे छोड़ कर नहीं जाओगी।’’ (पृ0 205) छल और झूठ की गंध से शून्य इस आग्रह पर कौन पत्नी न बलिहारी जाए? तहमीना हो या मन्नू – पत्नियों की जमात कमोबेश एक सी होती है – सुरक्षा के नाम पर ब्रीदिंग स्पेस देता बाड़ा और सम्बन्धों के नाम पर संवरी लता की तरह फैलने की स्वतंत्रता! बेड़ियों से बंध कर उड़ने की लालसा! पत्नी की परंपरागत रूढ़ छवि क्या आज भी इस द्विधा से मुक्त हो पाई है?

राजेन्द्र यादव की स्वीकरोक्ति और स्त्रीवादी प्रतिबद्धता के सवाल !

जाहिर है सारी सहानुभूति मन्नू भंडारी की झोली में। मन्नू जिसने पूरे पैंतीस साल रोते-झींकते ’बहुरूपिए’ के साथ जिंदगी काटी, मन्नू जिसने घर के भरण-पोषण के लिए अपने को नौकरी और व्यावसायिक लेखन में झोंका (पता नहीं क्यों अपनी ही किरचों से लहूलुहान मन्नू के बरक्स बार-बार ’आधे-अधूरे’ की सावित्री महेन्द्रनाथ की लाचारगी के साथ संपृक्त होकर याद आती रही?) ; मन्नू जिसने अकेले दम दोहरी-तिहरी व्यस्तताओं के बीच बेटी और नातेदारियों को सम्हाला; मन्नू जिसने हर टूटन को हथियार बना कर लेखन को धारदार किया। क्या इसी सहानुभूति, स्तुति और सतीत्व के लोभ में कोढ़ी पतियों को कंधे पर लाद वेश्यालयों तक ले जाती पत्नियों का मिथ आज भी जीवित नहीं समाज में? पत्नी की मानवीयता  को खंड-खंड कर उसे रूढ़ छवियों, दायित्वों, विसर्जन एवं स्थगन की अमूर्त प्रक्रिया में तब्दील करता हुआ! लेकिन किशोरावस्था से मन्नू जिस वक्त की उंगली पकड़ कर चली हैं, वह ’’मूल्यों के मंथन का युग था… पाप-पुण्य, नैतिक-अनैतिक, सही-गलत की बनी-बनाई धारणाओं के आगे प्रश्नचिन्ह ही नहीं लग रहे थे, उन्हें ध्वस्त भी किया जा रहा था।’’ ( पृ0 22) स्वाभाविक है कि ’सुनीता’, ’त्यागपत्रा’, ’शेखर: एक जीवनी’, ’चित्रलेखा’ आदि के जरिए उन्होंने जो संस्कार, दृष्टि और मूल्यबोध अर्जित किया, वह न परम्परावादी हो सकता है, न यथास्थितिवाद का पोषक। इसकी झलक उनके काॅलेज जीवन की कुछ घटनाओं में भी मिलती है जहां स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ने का निर्द्वंद्व  निर्भीक भाव एक ओर काॅलेज के प्रांगण में हक की लड़ाई के लिए हड़ताल, हुड़दंग और सार्थक नेतृत्व में लक्षित होता है तो दूसरी ओर प्रगतिशील पिता से चलने वाली लम्बी लड़ाई में भी। लेकिन विवाह के बाद मानो कायान्तरण ही। स्वयं चकित हैं मन्नू भी कि ’’किशोरावस्था में मेरी जिन रगों में लावा बहता था, उनमें क्या अब निरा पानी बहने लगा है?’’ (पृ0 213) कहां से आ जाती है पत्नी में मिमियाती-झींकती आत्मदयाग्रस्त स्त्री जो उसकी निरीहता में दादी-नानी की तरह पति को पालतू बना लेने का अटूट विश्वास नत्थी कर युद्ध-सन्नद्ध बनाती है कि ’’मेरा समर्पण एक न एक दिन राजेन्द्र को जरूर बदल देगा’’ (पृ0 52)। विश्वास दरकने का दंश पराजय बोध को गहराता है ’’एक स्वच्छंद और मनमाने ढंग से जीवन जीने की इनकी जिद जिसमें सारे प्रयत्नों के बावजूद मैं जरा सा भी परिवर्तन नहीं ला सकी थी’’ (पृ0 188) तो ’किसी का कंधा, किसी की गोद’ तलाश कर वहीं लिथड़े रहने की कातरता एक अवश आदत बन कर निष्कृति के सारे द्वार बंद कर देती है। ऐसा नहीं कि आत्मपड़ताल की प्रक्रिया में आत्मधिक्कार से भर कर मन्नू ने अपनी रीढ़विहीन कातरता पर क्षोभ प्रकट न किया हो, लेकिन अपने को कटघरे में खड़ा कर चीन्हने की बजाय वे बार-बार लक्ष्यभ्रष्ट सैल्फ जस्टीफिकेशन की लीपापोती में जुट जाती हैं। मसलन, पिता से विद्रोह के रूप में की गई शादी को सफल बनाने (या दिखाने) की चुनौती; घर को बनाए रखने का विशुद्ध स्त्रियोचित दायित्व जो भावना के उच्छ्ल आवेग में अहं और आत्माभिमान को भी बहा ले जाता है – ’’सोचने पर आज तो यह भी लगता है कि कौन जाने तीन दिन तक ऊपर से भले ही मैं अपने संकल्प पर दृढ़ता की परतें चढ़ाती रहीं, पर भीतर ही भीतर मैं भी तो ऐसे ही किसी बिंदु की, छोर की, संकेत की प्रतीक्षा में ही थी जिसे थाम कर मैं अपने संकल्प से डिग सकूं।’’ (पृ0 205) ; सामंत पति के लबादे के ठीक नीचे सहयोगी-प्रेरक साहित्यकार मित्र की निर्दोष मैत्री  को न खोने की दूरंदेशी – ’’कैसी विडम्बनापूर्ण सच्चाई है कि राजेन्द्र के व्यक्तित्व का एक पक्ष जहां मेरी हीनता ग्रंथि पर परत दर परत चढ़ा कर मेरे आत्मविश्वास को खंडित करता रहा है, वहीं दूसरा पक्ष आत्मविश्वास अर्जित करने में सहायक ही नहीं रहा बल्कि लिखने के लिए मुझे बराबर प्रेरित-प्रोत्साहित भी करता रहा है।  नई से नई पुस्तकों और पत्रिकाओं का आना, सभी तरह के साहित्यकारों के जमावड़े… उत्तेजक बहसें.. गप्प गोष्ठियां, मेरे जैसे लेखक के लिए बड़ा प्रेरक था यह वातावरण… मेरा मूल प्रेरणा स्रोत! इसीलिए जब तक मेरे व्यक्तित्व का लेखक पक्ष सजीव-सक्रिय रहा, चाह कर भी मैं राजेन्द्र से अलग नहीं हो पाई।’’ (पृ0 215) एकाएक यहां लेखिका की दो स्वीकारोक्तियों को उद्धृत करने का मन हो आता है। एक, ’’राजेन्द्र से विवाह करते ही लेखन के लिए तो जैसे राजमार्ग खुल जाएगा और उस समय यही मेरा एकमात्र काम्य था’’ (पृ0 10 ) और दूसरी, ’’ठेठ यथार्थ की भूमि पर खड़े होकर ही मैंने यह निर्णय लिया है क्योंकि अब मुझे जिंदगी से जो चाहिए, वह एक लेखक के साथ ही मिल सकता है।’’ (पृ0 201) साथ ही एक प्रश्न भी अंकुराता है कि यशस्वी लेखक को साबुत पा जाने की हड़बड़ी ने ही कहीं उन्हें राजेन्द्र यादव की विवाह करने की टालमटोलू अन्यमनस्कता को नजरअंदाज करने को मजबूर नहीं किया? आखिरकार एक अपंग, आर्थिक दृष्टि से आधारहीन व्यक्ति के साथ सहजीवन शुरु करने के पीछे मूल जज्बा क्या थ? प्रेम की प्रगाढ़ता? लेखक राजेन्द्र यादव के पेचदार गुट्ठल व्यक्तित्व की महीन परतों के नीचे छिपे व्यक्ति राजेन्द्र यादव से अभिन्नता? या एक-दूसरे को समृद्ध करने के प्रयास में स्वयं समृद्धतर होते चले जाने की सहज मानवीय अभिलाषा जिसके मूल में विश्वास और सौहार्द दोनों की समान उपस्थिति अनिवार्य है? लेकिन क्या किसी एक भी विकल्प पर निश्चयपूर्वक उंगली रखी जा सकती है? ’’अंतरंग परिचय से बिल्कुल अपरिचय की दुनिया में लौट जाने की तकलीफ’’, अपनी ’’दुखती रगों और खाली कोनों’’ को लेखन से पूरा करने की मुआवजी कोशिशें; जुबान पर ’छुरी-कांटे’’ उगा लेने की आवेश भरी प्रतिक्रियाएं या हर तालाबंद गोपनीयता को जान लेने की जासूसी हरकतें – सम्बन्धों को खोखला कर देने को काफी हैं। सम्बन्ध जो नकार का प्रत्युत्तर नकार में नहीं चाहते, नकार को निर्विकार तक लाने के लिए अपनी मनुष्यता के बरक्स दूसरे की मनुष्यता को छूते-उद्वेलित करते हैं।

यहीं चारों खने चित्त हो जाती हैं मन्नू! रिक्तियां और गैप्स..किंवदंतियों और विवादों से गर्माए राजधानी के प्रभावक्षेत्र से दूर कस्बे में बैठा आतुर पाठक तथ्य की तह में छिपे सत्य का साक्षात्कार कर अपनी निजी राय बनाना चाहता है, किंतु जगह-जगह तथ्यों के नाम पर बंद चुप्पियां! या ’’..फिर कुछ ऐसा घटा कि मुझे निर्णय लेना ही पड़ा कि बस, बहुत हुआ’’ (पृ0 163) जैसी छुपाती-भरमाती अ-पारदर्शिता! क्या सच्चाई को छुपाने का एक अर्थ किसी दूसरे को विकृत और विद्रूप करना नहीं?

हालांकि मन्नू भंडारी ने दावा किया है कि ’एक कहानी यह भी’ लिखते समय उन्होंने निःसंगतापूर्वक अपने अतीत को उधेड़ा है – ’’अपने को अपने से काट कर बिल्कुल अलग’’ कर देने की ’डाॅक्टरी’ कुशलता के साथ। लेकिन उनकी सबसे बड़ी दुर्बलता है कि शब्द दर शब्द वे हर प्रकरण में इन्वाॅल्व हैं। न, अनजाने नहीं, जानती-बूझती हैं, अपनी हरकत पर शर्मिंदा भी हैं और शिकायतों की लम्बी फेहरिस्त तहा कर अपने को संयमित भी करती हैं कि ’’आत्मदया में लिपटी यह गाथा अब बिल्कुल बंद क्योंकि मुझे खुद इससे बड़ी चिढ़ है। पर क्या करुं, लाख कोशिशों के बावजूद जब-तब इसके दौरे पड़ ही जाते हैं।’’ (पृ0 169) मन्नू की समस्या यह है कि पूरी पुस्तक में ’चुप्पी’ के बावजूद एक खास किस्म के बड़बोलेपन का शिकार वे होती रही हैं जिसका मूल कारण है आवेशभरी प्रतिक्रियात्मक मुद्रा में अपने को ’देखने’ की अनिवार्यता को निरंतर स्थगित करने रहने का जनून। इससे उनके व्यक्तित्व में एक ओर आत्मरक्षा और आत्मगौरव की मिश्रित सजगता आई है -’’स्वभव से ही मैं बहुत तनावग्रस्त हूं। लेकिन यदि अनुकूल परिस्थितियां मिलती… अपनत्व भरा साथ मिलता तो निश्चित रूप से मेरे ये सारे तनाव ढीले ही नहीं होते , बल्कि समाप्त हो जाते’’ (पृ0 169); तो दूसरी ओर औसत स्त्री की ’संतुष्ट’ नियति का सामान्यीकरण करते हुए अपने दुख का महिमामंडन – ’’यह मैं अच्छी तरह जानती हूं कि आज की हर स्त्री घर-परिवार के अतिरिक्त और भी न जाने कितनी जिम्मेदारियां निभाती है, उसमें अपनी ऊर्जा खर्च करती है लेकिन अपने साथी का सहयोग प्यार भरा लगाव निरंतर उस ऊर्जा की क्षतिपूर्ति भी करता रहता है… मेरे साथ क्या हुआ कि मैं सिर्फ खर्च ही करती रही और एक ऐसी स्थिति आई कि मैं बिल्कुल खाली-खोखली हो गई… रोगग्रस्त शरीर.. निष्क्रिय जीवन और खंडित आत्मविश्वास की किरचों में लिपटा व्यक्तित्व!’’ क्या एक संवेदनशील उद्बुद्ध लेखिका से ऐसे मोहाविष्ट एकांगी निष्कर्षों की अपेक्षा की जा सकती है जिनका सारा लेखन मध्यवर्गीय औसत स्त्री के परिवार और मन के कोने-अंतरे में झांक कर उसके कहर, क्लेश और सपनों को जीता रहा है? पत्नी, गृहिणी और व्यक्ति के रूप में क्या हर स्त्री कमोबेश टूटने-सहने की त्रासदी के बीच अखंड बनी रहने की जिजीविषा से प्रदीप्त नहीं होती रहती?


तो क्या दुख का अतिरेक व्यक्ति को संकुचित और आत्मकेन्द्रित बना देता है – पूरे फलक से काट कर एक निर्जन द्वीप में कैद करता? शायद! लेकिन मन्नू लेखिका हैं और कहानियों में उनके भीतर की सर्जनात्मकता पूरी ऊँचाई के साथ सारे विस्तार को बांहों में समेट लेना चाहती है। चूंकि कहानियों में जहां-तहां टुकड़ा-टुकड़ा आत्मकथा निबद्ध कर देने का दावा करके वे ’बंद दराजों का साथ’, ’एक बार और’, नायक खलनायक विदूषक, करतूते मरदां, स्त्री सुबोधिनी जैसी कहानियों का नामोल्लेख करती हैं तो यह कहना आसान हो जाता है कि भगिनीवाद विस्तार की नारीवादी अवधारणा ही उन्हें अंतःशक्ति प्रदान करती है। बेशक मीता पहले दिन से ही उनके दाम्पत्य सम्बन्धों में विघटन का अहम कारण बनी है और एक स्वाभाविक सौतिया डाह के कारण दाम्पत्य सम्बन्ध के विघटन की इस महागाथा में उन्होंने मीता के पक्ष और पीड़ा को उभारने की तिल भर कोशिश भी नहीं की है लेकिन कहानियों में पुरुष-प्रवंचिता प्रेयसियों का चित्र उकेरते हुए वे मानो मन्नू नहीं, मीता हो जाती हैं जहां पति-पत्नी के बीच ’वो’ बन जाने की अभिशप्त नियति हिंसक बना कर वस्तुतः उसकी लस्त-पस्त बेचारगी को ही उघाड़ती है। कुचला आत्मसम्मान सांप बन कर फन लहराता हुआ कुंज और मधु के बीच आता जरूर है लेकिन बार-बार डंसता उसे ही है। अंधी गली का रूप लेकर भावुकता कब तक मन्नू-मीताओं को भरमाती रहेगी – मन्नू नहीं जानतीं क्योंकि वे दोनों बैताल सी इन्हीं गलियों में भटक रही हैं – निरंतर! लेकिन पाठक जानता है कि विवाह के सुरक्षित दुर्ग में बैठी पत्नी की धाक, अधिकार और गरिमा को अंगूठा दिखा कर अधिकारविहीना अकिंचन प्रेयसी स्मृति पर हावी हो जाती है। वंचित-प्रवंचित, कमजोर-तिरस्कृत के प्रति सहानुभूति के कारण? या इसलिए कि निर्बंध प्रेम और अनुशासन में पुराना बैर है?

क्या पुरुष अपने समदुखी ‘मीत’ की व्यथा -कथा समानुभूति से लिखेंगे ?

आत्मकथाकार/निजी जीवन की आख्यानकार के रूप में मन्नू से अपेक्षा थी कि निजी जीवन की लव-हेट गुंजलक (जिसका उल्लेख वे इससे पूर्व 1964 में लिखे संस्मरणात्मक आलेख में भी कर चुकी हैं) से निकल कर वे दाम्पत्य सम्बन्धों के विश्लेषण के बहाने उन नई संकटापन्न स्थितियों का विश्लेषण करेंगी जो स्त्री को शिक्षित, स्वावलम्बी एवं आधुनिक बना कर उसे वक्त से आगे ले जाती हैं और वक्त की दौड़ में पिछड़े अहंनिष्ठ पुरुष को अपेक्षाकृत अनुदार और संकीर्ण बना कर सामंती मूल्यों की पुनप्रतिष्ठा में जुट जाती हैं। आखिरकार वे स्वयं स्वीकारती हैं कि उनका युग मूल्यों की मीमांसा का युग था, लेकिन सवाल यह है कि उन्होंने किन दिशाओं और मूल्यों को एक्सप्लोर करने के लिए स्त्री छवि गढ़ी? आत्मकथा शिकायतों-प्रत्यारोपों का पुलिंदा मात्रा नहीं होती, एक साहित्यिक कृति के रूप में वस्तुनिष्ठ चरित्र ग्रहण कर वह शब्दों और घटनाओं, मनःस्थितियों और मनोद्गारों के जरिए स्वयं लेखक के व्यक्तित्व की महीनतर एवं संश्लिष्ट परतें उघाड़ने लगती है। तब ऐसा क्यों लगता है कि उनके कथा साहित्य की नायिकाओं के व्यक्तित्व का पैटर्न – निरंतर द्वंद्वग्रस्तता, निरंतर निर्णय-दुर्बलता, स्वार्थपरक शाइस्तगी और यथास्थितिवाद में परित्राण पाती उदारता – ’एक कहानी यह भी’ में भी ज्यों का त्यों उभर कर आ रहा है? कहीं सर्जनात्मकता का अभाव तो नहीं? सर्जनात्मकता वह नहीं जो साहित्य रच कर ही हो। सृजन विचार और क्रिया के स्तर पर कुछ नया सोचने/करने में भी निहित है। संवेदना के साथ जुड़ कर सृजन जब मिशन का रूप लेता है तो सक्रियता और सकारात्मकता, प्रतिकूलताओं से टकराने का जज्बा और जिजीविषा व्यक्तित्व को अद्भुत ओज और ऊर्जा दोनों देते हैं। सृजन शांतिकाल का मनोविलास है ही नहीं, प्रसव पीड़ा के दौरान बीहड़ पगडंडियों पर दौड़ते-गिरते अपने को ’नया’ करते रहने की अनवरत प्रक्रिया का नाम है। इसलिए चाहे वे अपनी लंबी निष्क्रियता और न लिख पाने के कारणों को ’मन में रचे-बसे तनाव’ के मत्थे मढ़ दें, लेकिन सवाल तो उन्हें भी मथता रहा है कि उज्जैन में प्रेमचंद विद्यापीठ पर रह कर दो बरस उन्होंने किया क्या? क्या यह एक लेखक की भीतरी ऊर्जा, संवेदन और अंतर्दृष्टि के ’चुक’ जाने की पूर्वसूचना नहीं जो ’एक कहानी यह भी’ में घटनाओं का सपाट ब्यौरा बन कर आती है – साहित्यिक औदात्य से छूंछी? क्या वजह है कि इसी रचना में मन्नू के यशस्वी लेखकीय व्यक्तित्व की ऊँचाई को अंगूठा दिखा कर अपनी पोतियों के लिए मराठी रचनाओं का टूटा-फूटा हिंदी अनुवाद करती अ-लेखक वृद्धा सर्जनात्मक ऊँचाइयों का संस्पर्श करने लगती है? दरअसल अपने आवेश और भावाकुलता को थिरा कर अंतर्दृष्टि से संगुम्फित न कर पाने की दुर्बलता मन्नू को उन सिरों को एकान्विति में जांचने की नजर नहीं दे पाई जो हताशा और पराजय के बाद ही आशा और जिजीविषा के अदम्य आवेग से आपूरित होती है। तहमीना का विद्रोह, तसलीमा की उद्दंड निर्भीकता, भंवरीबाई की संकल्पदृढ़ता और मुख्तार माई की सिर पर कफन बांध कर मौत की आंख में धूल झोंकने की चतुराई – निजी दुखों की शिकायती पोटलियों को परे फेंक देने के बाद की ही उपलब्धियां हैं। हां, परे फेंकने की इस प्रक्रिया में संवेदनशून्य होने की प्रतिक्रियात्मकता नहीं, अपने जैसी प्रताड़िताओं के आंसू पोंछ कर सह-अस्तित्वपूर्ण साझी दुनिया रचने की स्वप्नशीलता है।

साहित्यिक कृति के रूप में ‘एक कहानी यह भी’ मन्नू भंडारी के समकालीन साहित्यिक परिदृश्य की भीतरी नग्न सच्चाइयों का भी पर्दाफाश करती है जहां इमरजेंसी के दौरान सरकारी भोंपू बन कर रघुवीर सहाय और धर्मवीर भारती जैसे दिग्गज अपनी भौतिक लोलुपताओं के साथ निर्वसन हो जाते हैं तो राकेश-राजेन्द्र-कमलेश्वर की तिकड़मी तिकड़ी साहित्य में माफिया के बीज बोती दीखती है। लेकिन इस रचना का तात्कालिक महत्व न मन्नू की लेखकीय यात्रा का हमसफर बनने की चाहत में है, न अन्य लेखकों के टुच्चेपन का रस लेने में। यह सिर्फ और सिर्फ राजेन्द्र यादव को घेर-घार कर दुरदुराने-मारने का महानुष्ठान है। फलतः साहित्यिक रचना से अधिक वैयक्तिक राग-द्वेष की अभिव्यक्ति! लेकिन जो परिदृश्य में अपनी ठोस उपस्थिति के बावजूद अनुपस्थित है, उसके खलनायकत्व को आंख मूंद कर क्यों स्वीकारा जाए? कटघरे में है तो बयान देने का अधिकार तो है इस लोकतंत्रा में उसे भी। इसलिए मैं नहीं समझती कि ’मुड़ मुड़के देखता हूं’ के बगैर ’एक कहानी यह भी’ के कोई मायने हैं। बकौल मन्नू घुन्ना व्यक्तित्व है राजेन्द्र यादव का, हर झूठ, हर जिद, हर नाजायज हरकत को ढांपने के लिए विश्वसनीय तर्क गढ़ने में माहिर आत्ममुग्ध-आत्मरतिग्रस्त व्यक्ति जो अपने से इतर अन्य किसी से प्यार कर ही नहीं सकता। यहां तक कि मीता सहित अनगिन प्रेम सम्बन्धों में अधिकार और समर्पण (जिसे मन्नू प्रेम का विस्तार मानती हैं) का भाव नहीं, ’वर्चस्व के बोध से छके हुए एक कुंठाहीन पूर्ण पुरुष’ का अनुभव जीने का दर्प है। बेशक अपनी इस ’लम्पटता’ का संज्ञान लेते हैं राजेन्द्र यादव लेकिन साथ ही कुछ इस तरह की जिज्ञासा भी करते हैं कि क्या कोई भी मनोविकार या मनोवृत्ति अपने परिवेश की उपज नहीं होती? मन्नू क्षुब्ध हैं कि ’या.. या.. या.. के विकल्प लगा कर यह बहुरूपिया ऐयार पाठकों को भरमा कर हर बार अपनी असली सूरत छुपा ले जाता है लेकिन क्या ऐसा नहीं कि प्रश्न के रूप में दिए गए सारे विकल्प राजेन्द्र यादव एवं पूरी पुरुष जाति के मनोविज्ञान को खंगालने की श्रृंखला बन जाते है? ’’यह अपनी रचनात्मक ऊर्जा और वैचारिक स्वाधीनता के लिए बार-बार किया जाने वाला नवीनीकरण है या अधूरे होने की हीनता-ग्रंथि से उत्पन्न दमित सेक्स की विकृत अभिव्यक्ति जो बार-बार दूसरे से अपनी पूर्णता का आश्वासन चाहती है? यह मेरी निजी कुंठा है या प्राक् ऐतिहासिक आदिम पुरुष-वृत्ति जहां वह अपने कक्षों में शत्रुओं और शिकारों के सिर सजा कर विजय के गर्व को बार-बार जीवित रखता है? या वह सामंत जिसे हरम में अनगिनत भोग सामग्री चाहिए?’’ या फिर इसलिए कि ’’हर नई स्त्राी के साथ सम्पर्क पुरुष-व्यक्तित्व के उन अनुद्घाटित आयामों को खोलता है जिन्हें उसने पहले कभी आविष्कृत नहीं किया था।’’ ठीक शरतचंद्र के नायकों की सी स्थिति जो राजलक्ष्मी, अभया, सावित्री, पारो, चंद्रमुखी के बिना अपनी अस्मिता को पा ही नहीं सका। राजेन्द्र यदि जीते-जागते व्यक्ति न होकर कथानायक होते तो मीता, दीदी, मन्नू के संदर्भ में उनके विकसित अहं और स्निग्ध अंतःप्रकृति के तीन अंतरंग खूबसूरत चित्रों के साथ-साथ व्यक्ति और लेखक के अंतर्सम्बन्धों की महीन पड़ताल की जा सकती थी। अब बेशक वे लाख कहते रहें कि उनकी जिंदगी में ’’मीता संगीत के निःशब्द अंतरे की तरह बनी रही तो जिस तार ने सुर संभाले रखा या लगभग संचालित करती रही, वह तो दीदी है। उधर मन्नू न होती तो जमीनी सच्चाइयों की यह अनुभव-सम्पन्नता कहां से आती – ठहराव और गहराई तो मन्नू ने ही दी’’ (मुड़-मुड़के देखता हूं’, पृ0 131) , मन्नू के नजरिए ने ढर्राबंद जिंदगी न जी पाने की उनकी असफलता को ’लम्पट’ की उपाधि तो दे ही दी है।

बहुपठित राजेन्द्र यादव के अर्जित ज्ञान और मौलिक उद्भावनाओं को लेकर कहीं दो राय नहीं। ऐसा व्यक्ति जो जीवन के हर लम्हे और स्थिति का विश्लेषण कर उसे कहानी का रूप देने को सन्नद्ध रहे, वह सामान्य तो है ही नहीं। विशिष्ट भी नहीं क्योंकि बोहेमियन के लिए सांसारिक मूल्यांकन कोई मायने नहीं रखते। वे क्रांतिदर्शी, स्वप्नजीवी, स्वतंत्रचेता ही नहीं हुआ करते, बेहद जिद्दी, महत्वाकांक्षी और उन्मादी भी होते हैं और कठोर आत्मालोचक भी। आंतरिक बुनावट में बेहद संश्लिष्ट और जटिल। स्वयं अपने को समग्रता में न पहचान पाएं, लेकिन यथार्थ के नाम पर चौहद्दियां बुनती जड़ता का अतिक्रमण करने को व्याकुल; देश-काल को नए सिरे से सिरजने को आतुर – मनुष्य की आदिम मनोवृत्तियों के साथ जहां पाप-पुण्य, मर्यादा-अश्लीलता की चोर निगाहों तले लहूलुहान होती मनुष्यता सिर धुनती कुंठाओं में तब्दील होने की त्रासदी न भोगती हो, वरन् अंतर-वैयक्तिक सम्बन्धों का संजाल रच कर एक एक सा ब्रीदिंग स्पेस जुटाने में संलिप्त हो; जहां निजता और पारस्परिकता दोनों की रक्षा होती रहे, सदा। यकीनन एक यूटोपिया! इसलिए सात्र-सीमोन की मित्रता से प्रभावित राजेन्द्र यादव जब दम घोंटती विवाह संस्था के विकल्प रूप में लिव इन रिलेशपशिप की वकालत अपने उपन्यास ’उखड़े हुए लोग’ में करते हैं तो हिंदुस्तानी वक्त से बहुत आगे निकल जाते हैं। दूर, दुर्बोध और मुजरिम! एक ऐसी स्थिति जिसे ’आते जाते यायावर’ में पूरी आंतरिकता से चित्रित कर देने के बावजूद मन्नू रोजमर्रा के व्यावहारिक जीवन में संभव मान ही नहीं पातीं। ’घर’ और ’निर्बंध उत्तरदायित्वहीनता’ दोनों को साथ-साथ पा लेने की औसत ललक उन्हें कहीं बौना भी बना देती है लेकिन ’आत्मसंतुष्टि की दुहराव भरी जिंदगी’ भीतर के बुद्धिजीवी को एकदम स्वीकार्य नहीं। फलस्वरूप विद्रोह और नकार – अपने को साबुत पाने के प्रयास में अपने को तोड़ना और गढ़ना। विश्व क्लासिक साहित्य के नायक के सनातन द्वंद्व का साक्षी हूक, कसक भरी अनवरत तोड़-फोड़ हांफते-जूझते नायक को एक खास किस्म का औदात्य और आह्लाद अवश्य देती है। निस्सीम को बांहों के घेरे में बांध लेने का आह्लाद! राजेन्द्र यादव का दुर्भाग्य कि वे क्लासिक रचना के पात्रा नहीं!

उल्लेखनीय है कि जहां ‘एक कहानी यह भी’ में मीता प्रसंग आतंक और अनैतिक भाव से आया है, वहीं मुड़-मुड़के देखता हूं’ में परिपूर्णता, श्रद्धा और अपराध बोध के मिले-जुले भाव में। ’तपस्वी सा जीवन बिता रही’ मीता के प्रति एक कोमल भाव (साॅफ्ट काॅर्नर) है जिसे वे छिपाते नहीं। हां, उसके साथ किए गए विश्वासघात के कारण आत्म-निर्मम जरूर हो गए हैं। लेकिन मोहन राकेश, मनमोहन ठाकुर के संस्मरण हों या ’देखा तो इसे भी देखते’ शीर्षक के अंतर्गत मन्नू का जबाव – मन्नू से विवाह के संदर्भ में मीता को लेकर एक खास किस्म की दुविधा उनमें देखने को मिलती है, मित्रों से मन्नू तक अपनी कमजोरी को सम्प्रेषित करने का आग्रह और न-नुकर की भाषा में मन्नू को कहा गया यह वाक्य -’’सोचता हूं पहले मीता सैटल हो जाती तो…’’। न, छल और बेईमानी का सवाल ही नहीं। है तो दुविधा और निर्णय-दुर्बलता जो ’यही सच है’ की ढुलमुल दीपा को हिंदी साहित्य का यादगार पात्रा बना देती है। यानी जिंदगी से जीवनीशक्ति पाने के बावजूद साहित्य और जीवन के मूल्यांकन के मानदंड एक नहीं हैं? बेशक! साहित्य लार्जर दैन लाइफ है, जिंदगी के द्वंद्वों और क्षुद्रताओं का समाधान-उन्नयन करता एक प्रेरणा-पुंज; वर्तमान की कंटीली जकड़न से मुक्ति की स्वप्निल उड़ान; अंतःशक्ति और स्फूर्ति, ऊर्जा और ओज को संवेदना और दृष्टि के साथ निबद्ध कर ’कल’ को मनचाहे ढंग से जीने की हौंस को साकार करता स्वप्न! लेकिन जिंदगी के तलछट में सिर्फ घोंघे और कीचड़ नहीं, न ही विशाल टाइटैनिकों को डुबोते आइसबर्ग! बल्कि जिंदगी का आदिम स्रोत तो वही है जहां नौ बटे दस हिस्से पर कब्जा करते आइसबर्गाें के खौफ से मुक्त एक बटा दस हिस्से पर ही संवाद और सृजन की संभावनाएं जगाई जाएं। ’मुड़-मुड़के देखता हूं’ में ये संभावनाएं हैं और इसीलिए बकौल मन्नू भंडारी यह एक साहित्यिक कृति भी बन गई है जबकि ’एक कहानी यह भी’ घटनाओं और ब्यौरों की सपाटबयानी। दोनों में फर्क यह भी है कि सारे आरोपों और गलतियों को स्वीकारते हुए राजेन्द्र यादव जहां आत्मविश्लेषण करते हुए अपनी मानसिक संरचना में देश-काल, समाज-संस्कृति-इतिहास की वाजिब हिस्सेदारी को रेखांकित कर आम आदमी की संरचना को समझने का अहम फार्मूला अनायास उपलब्ध करा देते हैं, वहीं मन्नू भंडारी ’’एक-एक बात, एक-एक ब्यौरा, एक-एक पंक्ति सही’ होने के दावे के बावजूद ’एक कहानी यह भी’ के महत्व को रोजमर्रा की घरेलू लड़ाइयों से ज्यादा नहीं बढ़ा पातीं। अतः अपनी अंतिम परिणति में यह कांता भारती के उपन्यास ’रेत की मछली’ जैसी औसत रचना बन कर रह जाती है – चटखारेदार! अलबत्ता एक सवाल जरूर टंगा रहता है कि पुरुष के सामंती चरित्रा पर उंगली उठाने वाला सुधी समाज उसके सामंती व्यक्तित्व से शक्ति, अधिकार और प्रतिष्ठा लेकर सामंतवाद को जिलाए रखती स्त्रिायों की अनदेखी क्यों कर जाता है? क्या इस समूचे प्रकरण में कृष्णा सोबती की यह पंक्ति ज्यादा सटीक और मानीखेज नहीं हो जाती कि ऐसी स्त्राी ’’पहले अपनी दया से पुरुष की हिंसा पकाती है और फिर पुरुष की हिंसा से अपनी दयनीय स्थिति मजबूत करती है।’’

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

युवाओं कों स्त्री-सच से रूबरू करता अनोखा पाठ्यक्रम

हेमलता यादव

युवा कवयित्री इंदिरा गांधी ओपन विश्वविद्यालय में शोध छात्रा हैं.   संपर्क :hemlatayadav2005@gmail.com

भारत ही नहीं संपूर्ण विश्व के इतिहास में महिलाऐं कभी शोषण के विरुद्ध तो कभी सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक स्वतंत्रता और सहभागिता के लिए अनवरत, संधर्ष करती आई है। यह संघर्ष आज भी जारी है क्योंकि आधुनिकता, भूमंडलीकरण और विज्ञान एवं प्रोधोगिकी के विकास ने महिलाओं के विरुद्ध शोषण कम नहीं किया अपितु शोषण के तरीको में परिवर्तन अवश्य किये हैं । पितृसत्ता की नीव पर लिंग विभेदीकरण, राजनितिक सहभागिता पर प्रश्नचिन्ह, घरेलू हिसां, यौन हिंसा, देह व्यापार  सभ्य समाज के गलीचे तले अपना जाल फैला रहे है। जहां कुछ समय पूर्व तक कन्या को जन्म लेने के पश्चात मारा जाता था वही अब उसे अल्ट्रा साउड जैसी आधुनिक तकनीक से भ्रूण  अवस्था में ही मार दिया जाता है आधुनीकरण ने तथाकथित सभ्य लोगो के अति अमानवीय चेहरे को नकाब पहना दिए।

कानूनों के निर्माण से भी धटनाओं की तीव्रता में कोई कमी नही आई है इन समस्याओं अथवा संघर्षो के हृदय विदारक वर्णन के गवाह पिछले दशकों के आंदोलन एंव समाचार पत्र हैं। सामाजिक परिवर्तन समाज के अस्तित्व में आने के साथ ही प्रारम्भ हो गया था पंरतु स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन की गति तीव्र नहीं रही; स्त्रियों के लिए आज भी समाज वही संकीर्ण विचारधारा रखता है | समाज में परिवर्तन शिक्षा में परिवर्तन का कारण बनता है उसी प्रकार शिक्षा में परिवर्तन सामाजिक परिवर्तनों का आधार बनता है; एक समय था जब औपनिवेशिक भारत में प्रथम महिला डाक्टर कादम्बिनी गांगुली को उस समय की रुढ़िवादी पत्रिका ने वेश्या करार दिया था; जिन्होने 1886 में फिलाडेल्फिया के वूमेंस मेंडिकल कालेज में स्नातक की उपाधि ग्रहण की थी । धीरे-धीरे शिक्षा ने ही स्त्री की सामाजिक स्थिति में परिवर्तन लाना आरंभ कर दिया पंरतु कन्या भूर्ण हत्या, शील भंग, धरेलू हिंसा, यौन शोषण के आंकडे प्रत्यक्षदर्शी है कि अपनी बहुआयामी भूमिका, श्रम बल, राजनीतिक, सामाजिक एंव आर्थिक सहभागिता के बावजूद भारतीय महिला एक असुरक्षित एंव शोषित वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है । ऐसे में शिक्षा व्यवस्था का कार्यभार दोहरा हो जाता है । लैंगिक समानता, स्त्री प्रखर विद्रोह, नारीवादी आंदोलनों, स्त्री उन्मुख साहित्य को शिक्षा प्रणाली में उपर्युक्त स्थान प्रदान कर युवा वर्ग के मानसिक पटल पर स्त्रियों के लिए सम्मान एंव समानता अंकित करने का साधन शिक्षा बन सकती है । इस संबध में सराहनीय कदम दिल्ली विश्वविधालय में प्रथम वर्षिय स्नातक शिक्षा के अंग्रेजी सहित्य के संकलन में दृष्टीगोचर होता है ।
   
 सलमान रुश्दी की कहानी  “हारुन एंड द सी आफ स्टोरीस” में परिवारिक अकेलेपन  और निर्जनता को महसूस करती स्त्री की विडम्बना को दर्शाया है। इस कहानी में सुरैया अपने पति रशीद की व्यस्तता से आहत होती गई। उसने गाना बंद कर दिया, उदास रहने लगी और अंत में मि. सेनगुप्ता  की व्यवहारिक बातों मे उलझकर अपने परिवार को छोड़कर चली गई। अपने पति रशीद के लिये उसके द्वारा छोड़े शब्द थे ” तुम आंनद के पीछे भागते हो, पर एक सही व्यक्ति को पता होता है कि जीवन एक गम्भीर काम है। तुम्हारे दिमाग में झूठी बनावटी बाते भरी है इस कारण उसमें तथ्यों के लिए कोई स्थान नही बचा है। मि. सेनगुप्ता के पास कोई कल्पना नहीं पर वह मेरे लिए हितकर है  हारुन को बता देना कि मुझे उससे प्यार है, पर मैं विवश हूँ, मुझे अब घर छोड़कर चले जाना ही जरुरी है.” सुरैया  का यह कदम सामाजिक रुप से स्वीकार्य न हो पंरतु परिवार में एंकात भोगती उपेक्षित पत्नी द्वारा उठाया गया यह कदम संभतः उसकी मजबूरी का घोतक है ।

 “गर्ल्स” कहानी में लेखिका मृणाल पांडेय न केवल बच्चियों बल्कि महिलाओे द्वारा झेले जाने वाले लिंग अन्याय का वर्णन एक आठ वर्षीय बालिका ‘मिली’ की दृष्ट्रि से करती है। कहानी की पक्तियाँ जैसे “तुम्हारा जन्म लड़की के रुप मे हुआ है तुम्हे सारी जिंदगी ऐसे ही झुककर प्रणाम करना है इसे अच्छे से सीख लो” एवम “कम से कम इस बेचारी को यहाँ तो थोड़ा आराम करने दो” ,”हम स्त्रियों को ऐसे ही पीड़ा सहनी पड़ती है‘‘ बालिका के मन में द्वन्द उत्पन्न करती हैं | ये सब कथन बालिका के मन में प्रश्न उत्पन्न करते है कि “क्या चिडिया माँ भी यही सोचती होगी कि उसकी चिरैया बेटी चिड्डे से कमतर है”। मिली का नरखट, चतुर, उत्सुक एंव विरोधी स्वभाव, उसके द्वारा पूछे गये स्वभाविक पंरतु तीक्ष्ण प्रश्न समाज में लेंगिक असमानता के प्रति रोष उत्पन्न करते है ।


सलीम पेरादीना की कविता “सीस्टर्स” पिता की दृष्टि से दो भिन्न आयु वर्ग की बहनो के बीच संबधो का वर्णन करती है । इस कविता में बड़ी बहन चीख कर अन्याय का प्रतिरोध करते हुए लड़कियों को सिखाये जाने वाली पारम्परिक सीख को नकार देती है कि उसे विनित तथा आत्म त्यागी होना चाहिए । वह पिता को पक्षपाती रुख के लिए दोषी ठहराती है यह कविता पिता की सत्ता, आयु के विरोधाभास और समाज में महिलाओं के स्वर को पक्षपात पूर्ण दबाने के उस गुण को दर्शाती है जो लड़की होने के नाते आदत स्वरुप विरासत में प्राप्त होती हैं। बड़ी बहन का क्रोध मे उबलता मौन पिता को खुशी भी देता है कि अब उसकी बेटी ने अनुचित व्यवहार को चुनौती देने की र्निभिकता हासिल कर ली है ।

हरिशंकर परसाई द्वारा लिखित “अ टेन डे फास्ट” लोकतंत्र एंव विरोध करने के लोकतांत्रिक उपायो पर एक व्यंग्य रचना है जहाँ कुछ लोग लोकतंत्र, जनमत के जाति, धर्म  बाहुबल दुरुपयोग के लिए विभिन्न स्ट्रेटीज अपनाते हैं,  साथ ही यह लेख महिलाओं की स्थिति एंव उनकी इच्छा के महत्व पर व्यंग भी है । इस कहानी का नायक बन्नू, रांधिका बाबू की पत्नी सावित्री पर 16 वर्षो से आसक्त है और किसी भी हाल में उसे पाना चाहता है । वह उसे बलात भगा ले जाने का भी प्रयास करता है पंरतु सावित्री उसके प्रयासों को विफल कर देती है। ऐसे में उसकी मुलाकात बाबा सनकीदास जैसे तिकड़मबाज राजनीतिज्ञ से होती है जो गाँधी जी के अहिसंक उपाय अमरण अनशन का उपयोग बन्नू की नाजायज मांग को पूरा करने के लिए करते है। कहानी के एक प्रसंग में सावित्री जब आग बबूला होकर बन्नू के तम्बू में जाती है और पूछती है कि इस प्रकार की अनुचित माँग करने से पहले उसकी सम्मति क्यो नहीं ली तब बाबा सनकीदास कहते है कि सावित्री तो मात्र विषय है । कोई भी व्यक्ति विषय से अनुमति नहीं लेता उदाहरण देते हुए वे कहते है कि “गौ-रक्षा अभियान से जुडे किसी भी साधु या नेता ने अपना अभियान आंरभ करने से पूर्व गाय से अनुमति नहीं ली थी” । यहाँ हम देखते हैं कि समाज में महिला को मात्र विषय अथवा निरिह पशु के समकक्ष रखा जाता है । बन्नू को प्रोत्साहित करते हुए बाबा सनकीदास कहते है कि इस उपवास में तुम्हारी सफलता अन्य अनेक व्यक्यिों के लिए सहायक होगी जो दूसरों की पत्नियों को हथियाना चाहते है । सावित्री को सामाजिक अपमान सहना पड़ता है वह बन्नू को राखी बांधने का प्रयास करती है तो कभी आत्महत्या की चेष्टा करती है पंरतु बाबा सनकीदास की रणनीति, अनुत्तरदायी मीडिया ( जिसे केवल सनसनीखेज मुददों की तलाश रहती है तथा अज्ञानी जनसाधारण विफल कर देते है) । सावित्री के घर पर पत्थर बरसाये जाते है और उसके पति को मारने की धमकी दी जाती है । परसाई जी ने दिखाया है कि किस प्रकार बन्नु की वासना से लिप्त अनुचित मांग लोकतंत्र के अनुचित उपयोग से सिद्धांत का रुप ले लेती है और एक कायर, गुण्डे लालसी व्यक्ति को जनता नायक बनाकर पूजती है । लोकतंत्र का किस प्रकार अनुचित  उपयोग किया जाता है इस कहानी में हास्य द्वारा परसाई जी विश्लेषित करते हैं.

सुब्रतो बागची की आत्मकथा से लिया गया अंश “गो किस द वलर्ड” में लेखक माँ के प्रेम, त्याग एंव शिक्षा को परिभाषित करता है | कहानी में बागची की माता उसे सौन्दर्य का निर्माण करना सिखाती है । वे स्वंय मेहनत से अपने सरकारी आवास का सौन्दर्य निर्माण करती है यह जानते हुए भी कि उस सौन्दर्य को देखने से पहले ही उनके स्थानान्तरण के आदेश आ जायेंगे । उनका कहना था कि “मुझे तो मरुस्थल में फूल खिलाना है और जब भी मुझे नया घर मिलेगा मे उसे पहले की अपेक्षा अधिक सुन्दर बना कर छोडूंगी”। अपने लिए सौन्दर्य का निर्माण सब करते है पंरतु बागची की माता जी ने सिखाया किस प्रकार दूसरो के लिए सौन्दर्य एंव खुशी छोड़ी जा सकती है । मोतियाबिंद के कारण नेत्रों की रोशनी गंवा देने के बावजूद उन्होने लेखक को बंद आखों से प्रकाश देखना सिखाया किस प्रकार एक छोटे से गाँव में रहते हुऐ उन्हें पूरी दुनिया की चिंता रहती थी । 80 वर्ष की आयु तक वे अपने सारे कार्य स्वंय करती थी। उन्होने लेखक को स्वावलम्बन की नई परिभाषा और अंधरे में प्रकाश को प्रज्जवलित करने की कला सीखाई । 82 वर्ष की आयु में जब माता को पक्षाधात हुआ तब भी उन्होने लेखक को काम पर वापिस जाने की सलाह दी लकवाग्रस्त स्थिति में अपने अस्पष्ट स्वर में उन्होने कहा “तुम मुझे क्यो चूम रहे हो, जाओं समस्त संसार को चूमो”। लेखक की माताजी ने उन्हे सिखाया कि किस प्रकार तात्कालिक कष्ट से ऊपर उठकर कल्पनाओं को उड़ान देना, प्रत्येक तबके के लोगो के प्रति आदर भाव, विशाल संसार के साथ संबंध और जीवन में लेने की अपेक्षा देने की भावना साधारण लोगो को आसाधरण सफलता दे सकती है ।

स्त्री पहलु से जुड़ा अगला अध्याय “हिटिंग डाउरी फोर ए सीक्स” कल्पना शर्मा द्वारा लिखित यह लेख 1 जून 2003 को प्रतिष्ठित अखबार ”द हिन्दू“ में छपा था । इस लेख में सत्यारानी चड्डा एंव निशा शर्मा के दहेज विरोधी अभियान के कुछ महत्वपूर्ण मसलों का वर्णन किया  गया है । सत्यारानी चड्डा ने 1970 के अतिंम दशक में दहेज के विरुद्व तब आवाज उठाई जब उनकी पुत्री को दहेज के कारण तमाम् यातनाएं देकर मार डाला गया । नोएडा की निशा शर्मा ने उस समय शादी से इन्कार कर दिया जब दहेज की मांग एक सीमा से ऊपर हो गई । लेखिका यहाँ यह प्रश्न उठाती है कि दहेज की न्यायोचित मांग की सीमा क्या है । निशा शर्मा ने विरोध उस समय जताया जब दहेज की मांग  उनके सामर्थ्य से बाहर हो गई | दहेज की कुरीति महिलाओं के शोषण के कई मुददों की जड़ है । दहेज के नासूर के खिलाफ लड़कियों को दो शस्त्र सशक्त करते है -शिक्षा और माता-पिता का समर्थन ।

हालांकि केरल जैसे शिक्षा से परिपूर्ण राज्य मे भी दहेज जैसी कुप्रथा अपने पैर पसारे हुए है। लेखिका कहती है कि हमारी संस्कृति में जहाँ पुत्र को अधिक महत्व दिया जाता है, समाज में पुरुष वर्चस्व है दहेज प्रथा का उन्मूलन अभी दूर है और यह तब-तक नही हो सकता जब तब लड़कियां स्वयं दहेज को “ना” कहना नहीं  सीख जाएं और लड़के यह विश्वास एंव गर्व करे कि लड़कियों की कम होती जनसंख्या में यदि पत्नी मिल रही है तो यह एक विशेषाधिकार है। यह लेख इस बात पर भी रोशनी डालता है कि महिला को बोझ समझना समाज की संकीर्ण मनोस्थिति की परिचायक है । शिक्षित युवक भी यह कहने में गर्व महसूस करते हैं  कि उनकी व्यवसायिक शिक्षित कार्यरत भावी पत्नी विवाह के बाद नौकरी से त्याग पत्र दे देगी | स्त्री के भाग्य को घर की उन जिम्मेदारियों तक सीमित रखा जाता है जहाँ वे आर्थिक रुप से सबल नही बन पाती । लड़की पति के परिवार पर बोझ नही बल्कि सम्पत्ति है वह घर के कार्यो में मदद करती है, परिवार के सदस्यों की सेवा करती है, अतः यह आवश्यक नही कि अपने साथ दहेज लेकर आए । दहेज की अवधारणा हमारी संस्कृति की नाकारात्मक प्रवृति एंव समाज की रुग्ण मनोवृति का परिणाम है इसके हल स्वयं लड़कियो के सशाक्तिकरण पर निर्भर है यदि लड़किया नौकरी के क्षेत्र में एंव शिक्षा के क्षेत्र में लड़को को पछाड़ सकती है तो दहेज को भी हिट करके सिक्स मार सकती है .

मंजू कपूर का ”चाकलेट“ तारा के वैवाहिक जीवन के उतार-चढाव की कहानी है । यह कहानी विवाह की गग्भीर परिस्थितियों में स्त्री के आस्तित्व की कहानी है, हांलाकि तारा द्वारा अपने वैवाहिक जीवन को सुदृढ रखने के लिए किए गये उपाय कहानी को व्यंग्यात्मक  बनाते हैं, पर शादी के रिश्ते को बचाने के लिए शायद उसके पास कोई अन्य रास्ता नही बचता इसलिए वह पहले स्वंय अपने मोटापे को दूर करती है फिर अभय को स्वादिस्ट खाना खिला-खिला कर मोटा कर देती है, जिसके कारण अभय को अपनी प्रेमिका से हाथ धोना पड़ता है। तारा का पहला बदला पूरा होता है क्योकि अभय उसे स्वादिष्ट चाकलेट खिलाता था फिर मोटापे के कारण अभय तारा में रुचि खो बैठा और उसके जीवन में दूसरी महिला आ गई। दूसरी समस्या उसके संतान रहित होने की थी.

चिकित्सक ने तारा को सामान्य पाया था पंरतु अभंय ने अपनी रिपोर्ट कभी तारा को नहीं दिखाई बल्कि तारा को अपमानित करता रहा । तारा ने अपना बदला पूरा करने के लिए अभय के मिंत्र से प्रेम -प्रंसग चलाया और गर्भवती हो गई, पंरतु मां बनने के बाद ही उसने अभय के मित्र से किनारा कर लिया अतः अभय को कभी भी उसके प्रेम प्रसंग के बारे में पता नही चल सका। अपनी बेटी को गोद में लेते हुए तारा ने प्रण किया कि वह अपनी बेटी को शिक्षित एंव आर्थिक रुप से स्वतंत्र बनाएगी ताकि वह उस आर्थिक भय से मुक्त रहे, जो उसे अभय द्वारा त्यागे जाने के डर से तारा को हुआ। भारतीय समाज मे बच्चे का जन्म ही विवाह का परिणाम माना जाता है।

संतानोत्पति में अक्षम हाने का श्रेय तारा को जाता है उसे धर्मिक स्थलो पर माथा टेकने, विभिन्न प्रकार के राशि पत्थर पहनने पड़ते हैं, जबकि कमी अभय में है तारा अभय पर निर्भर है इसलिए वह शुरुआत में अपने जिददी, अनुत्तरदायी व निष्ठाहीन पति के अनैतिक जीवन को चुपचाप सहती है फिर सोच समझ कर रणनीति बनाकर उसे दण्ड देती है जब चाकलेट की दीवानी तारा को अभय द्वारा लाई चाकलेट उसके धेाखे के जहर के कारण बेस्वाद बुरादे जैसी लगने लगती है ।

एस. उषा की कविता ‘टू मदर’ भारत के लगभग हर उस घर की लड़की की आवाज है जो अपनी यौवन की आयु आने पर मां की वर्जनाओं, चेतावनियों का सामना करती है ‘ऐसा करो‘, ‘ऐसा मत करो‘ के आदेश कविता में सत्रह वर्षीय पुत्री को विरोधी बना देते है । इस आयु मे पुत्री स्ंवतंत्र होना चाहती है वह नही चाहती कि उस पर पडती धूप को माँ अपने आंचल से रोके और वह सूर्य के प्रकाश और हवा के अभाव में वह माँ की तरह विछिन्न हो जाए। वह नही चाहती कि जिस पंरपरागत धुन पर उसकी, माँ, नानी ने अपने सिर हिलाए वह भी ऐसा ही करे। वह तो अपनी शक्ति अपना विष किसी व्यक्ति पर आजमाना चाहती है, न कि मछली की तरह युगो-युगो से चली आ रही, परपराओं के धुमावदार वकृ में चक्कर काटती रहे । लड़की की इच्छा है कि वह तेज बाढ़ भरी नदी की तरह वर्जनाओं के प्रत्येक बांध को तोड़कर बह निकले और अपना मार्ग स्वंय बनाए। विद्रोही पुत्री, मां के आदर्शो को चुनौती देती हुई स्वतंत्रतापूर्वक जीवन जीने का अनुगृह करती है। किशोर लड़की अपनी माँ को संबोधित करने हुए पितृसतात्मक गुलामी का विरोध करते हुए कहती है कि विनम्र और सुशील बने रहना, लड़कों जैसे उदृड़ता न करना, राहगीरों से प्रणय चेष्टाएँ न करना जैसी माँ की आचरण संहिता उसकी हर आशा, सपने और कामनाओं की हत्या कर देगी ।

“सोपनट लीवस” एक आठ वर्षीय दलित लड़की गाविरी के विद्रोह की धटना है । दो दिन की भूखी गाविरी चने के खेत मे धुसने ही हिम्मत इसीलिए नही जुटा पाती क्योकि वह गरीब मजदूर की बेटी है । हाथ में झाडू और टोकरी लिए जलावन की लकडिया एकत्र करती है। वर्ण अंतर, आर्थिक असमानता से उत्पन्न मजबूरीयां, बालिकाओं पर परिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ डाल देती हैं। भूखी गाविरी की विवशता के दृश्य इस अध्याय में  खुबसूरती से उकेरे है । अध्याय का सबसे झंझावत पहल गाविरी द्वारा अपनी सच्चाई और आत्मसम्मान के लिए उठाई गई आवाज है जब उच्च धनी वर्ग का प्रतिनिधि क्रूर जमींदार निर्दोषिता सिद्ध करने के उपरांत भी उस पर प्रहार करता रहता है तो वह रोना छोड़कर सारे गांव पर एकछत्र रौब जमाने वाले जमींदार पर गालियों की बौछार कर देती है । हालांकि इसका परिणाम जमीदार खड़ाऊँ से उसकी टांग पर चोट करके करता है पर छोटी बच्ची का अदम्य साहस विशेषाधिकार प्राप्त लोगो के विरुद्व नए प्रभात की रणभेरी का आगाज है।

 “लेम्बो टू द स्लोटर” रोल्ड दाही द्वारा लिखी गई एक जासूसी व्यंग्य रचना है कहानी की नायिका मेरी मेलोनी पूर्णतः अपने पति पैट्रिक मेलोनी के प्रति समर्पित थी । अपने पति से निकटता उसके लिए आंनद का सबसे बड़ा स्रोत्र थी । प्रैटिक द्वारा अपने जीवन में किसी दूसरी स्त्री के होने की संभावना दर्शाना और मेरी को तलाक देने का निर्णय सुनाने का आधात उसके मानसिक संतुलन को स्तब्ध कर देता हैं और इस सदमे के आवेश में उसके द्वारा पति की हत्या हो जाती है। सदमें से उबरने पर अपने अजन्मे बच्चे के भविष्य के बारे मे सोचती है और चालाकी एंव सूझबूझ से स्वंय को पुलिस से बचाती है । यह एक साधारण पत्नी द्वारा जासूस पति को धोखे का बदला एंव पुलिस से स्वयं एंव अपने अजन्में बच्चे को बचाने वाली छोटी किंतु प्रवाहपूर्ण कथा है ।

रीटा-एन-हिंगिस की कविता “सम पीपुल” एक गरीब स्त्री की उत्कंठा, विवशता और पीड़ा की दांस्तान है। एक प्रताड़ित माँ अपने बच्चों के सामनें गंदी गाली सहती है, कर्जदारों के आगे झुठ बुलवाती है, गरीब, अपमानित, सरकारी भत्तों पर अश्रित महिला सरकार द्वारा जारी कल्याणकारी योजनाओं के असफल क्रियान्वन की शिकार है। एक माँ द्वारा बच्चों के सामने शर्मीदगी, अपमान, लाचारी का सामना किया जाना समाज, सरकार और उच्च एंव धनाहय वर्ण की संवेदन हीनता का परिणाम है ।

इस पुस्तक के अतिम अध्याय “रुट एंड एस्केप रुट” की नारी पात्र हेमा एक उच्चजाति की महिला है, जो समाज के विरोध के बावजूद एक दलित प्रोफेसर सतीश गोडधाटे से विवाह करने का साहस करती है । वह जातीगत राजनीति का भी विरोध करती है एक सशक्त चरित्र के साथ वह गलत का समर्थन देने से इन्कार करती है; चाहे इसके लिए उसे अपने परिवार के बुजुर्ग काका से विरोध का सामना करना पड़ता है वह अपना मत अवश्य प्रकट करती है।

दिल्ली विश्वविधालय बी. ए. प्रथम वर्ष के अंग्रेजी पाठृक्रम का लगभग प्रत्येक अध्याय युवाओं के समक्ष स्त्री व्यवहार, समस्याओं, विद्रोह, दृढता, प्रेम, विवशता, सृजन आदि के विभिन्न सोपानो को गढ़ता है। पाठ्यक्रम में इस प्रकार का स्त्री उन्मुख साहित्य समाज में स्त्री के स्थान को युवाओं के समक्ष सुदृढ़ करने में सहायक है अन्य विश्वविधालयी पाठ्क्रमों में भी इस प्रकार की पहल की आवश्यकता है क्योंकि उच्च शिक्षा गृहण करने के साथ युवा वर्ग समाज में अपनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का वहन करने के लिहाज से भी परिपक्व होते हैं ।

संदर्भ


फ्लुएंसी इन इगंलिश, बी.ए. प्रोग्राम 1 ( दिल्ली युनिवर्सटी )

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

महाराणा प्रताप भील थे,राजपूत नहीं: बताने वाली लेखिका असुरक्षित, मिल रही धमकियां

स्त्रीकाल डेस्क 

राष्ट्रीय महिला आयोग की पूर्व सदस्य और  दलित लेखिका डॉ. कुसुम मेघवाल द्वारा महाराणा प्रताप पर लिखी किताब पर विवाद बढ़ता जा रहा है, जिसमें उन्होंने महाराणा प्रताप को भील कहा है. किताब के अनुसार राजपूत या क्षत्रिय कोई जाति नहीं होती है, उसमें अलग-अलग जाति समूह के लोग होते हैं. किताब बताती है कि किस तरह राजस्थान में भीलों का शासन रहा है, उनके कई राजवंश रहे हैं और महाराणा प्रताप के इर्द-गिर्द, उन्हें मदद करने वालों में भी भील ही रहे हैं.

स्त्रीकाल से बातचीत करते हुए कुसुम मेघवाल ने बताया कि ‘मैंने यह किताब पिछले दो साल पहले लिखी है, जिसमें मैंने शोध के आधार पर लिखा है कि महाराणा प्रताप भील थे, न कि  राजपूत. इसी बात से बौखला कर करणी सेना के सदस्य बनकर लगातार फोन पर जान से मारने की धमकी दी जा रही है.’ उन्होंने बताया कि ‘ पुलिस को 21 अप्रैल को तथाकथित धमकी देने वालों के खिलाफ शिकायत की जा चुकी है, लेकिन अभी तक सुरक्षा की कोई पहल नहीं हुई है. वे राजस्थान की वसुंधरा सरकार पर आरोप लगाती हैं कि उन्होंने ही इन उपद्रवी ताकतों पर कार्रवाई न कर उन्हें शह दे रखा है.’ वे पूछती हैं, ‘ क्या पुलिस किसी घटना के अंदेशा का इंतजार कर रही, कि घटना घट जाए और उसके बाद कोई कार्रवाई की जाए?  यह देश किसी तथाकथित करणी सेना से चलेगा या संविधान से , जो हमें अभिव्यक्ति की आजादी देता है?’ वे स्पष्ट कहती हैं कि ‘आप को किसी बात पर आपत्ति है तो न्यायालय जाओ, या किताब के बदले किताब लिखों या फिर किताब पर प्रतिबंध लगवाओ।’

पढ़ें:  राजस्थान में दलित दमन 

इस बीच उन्हें मारने की धमकी वाली खबर मीडिया में आई तो लेखकों बुद्धिजीवियों में बेचैनी है. इसके पहले भी कलबुर्गी, पान्सारे जैसे लेखकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं की ह्त्या हो चुकी है. 14 मई को मुस्लिम महिलाओ के संगठन नेशनल वीमेन फ्रंट की प्रदेशाध्यक्ष वाफिया अन्सार ने उदयपुर में उनके निवास पर मुलाकात कर उनसे पूरे  मामले की जानकारी ली. प्रदेशाध्यक्ष वाफिया अन्सार ने डॉ.कुसुम को मिल रही धमकियों को लेकर कहा कि सरकार को जल्द से जल्द ऐसे लोगों पर कार्रवाई करनी चाहिए साथ ही उन्होंने मांग की है कि डॉ.मेघवाल को सुरक्षा मुहैया करवाई जाए. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर डॉ.कुसुम मेघवाल पर किसी भी तरह का प्रहार होता है तो हमारा संगठन चुप नहीं बैठेगा और इसकी जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी.
राष्ट्रीय दलित महिला आंदोलन की राष्ट्रीय अध्यक्ष रजनी तिलक ने कहा कि ‘जिन्हें आपत्ति है वे गुंडागर्दी की जगह शोधपूर्ण तरीके से लेखिका की बात काटें.’

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

 

तुम्हारा माँ होना

अंकिता रासुरी


म.गां.अं.हिं.वि. में शोधरत हैं. संपर्क: ankitarasuri@gmail.com

स्टीरियो टाइप से अलग माँ, फिर भी उतनी ही माँ.  जब मदर्स डे पर  सोशल मीडिया में स्नेहिल, त्याग की मूर्ति, पीड़ा को पी जाने वाली नीलकंठ, हर  वक्त संतान के लिए उत्सर्ग को तैयार माँ की छवि तैर रही है तब अंकिता अपनी उस माँ को याद कर रही हैं, जो इस आरोपित छवि में फिट नहीं बैठती. एक जरूर पठनीय संस्मरण 
                                                                                                             संपादक

तुम सच में मां जैसी नहीं थीं, बल्कि तुमने मुझे ही मां बना लिया था.मैं अक्सर गुस्सा हो जाती कि तुमने अब तक खाना क्यों नहीं बनाया और फिर खुद ही घर के सारे काम करने लग जाती.इस तरह मुझे घर के सारे काम करने आ गए।

सारे घरों की तरह हमारे घर में सब कुछ सामान्य क्यों नहीं रहता, हमेशा यही सोचती.बच्चों के तौर पर हम भाई-बहनों को कभी गांव के बाकी घरों वाला एहसास नहीं मिल पाया.बचपन के अधिकांश हिस्से की यादें तुम्हारी बीमारी की यादें बनकर रह गईं, या मार खाई हुई चोट से रोती-झगड़ती मां के तौर पर।

मैं अक्सर खौफ में रहती कि तुम किसी दिन इसी तरह से मर जाओगी और फिर अकेले में बहुत रोती.मैं सपने देखती कि मैं बारहवीं के बाद की भी पढाई कर रही हूं और घर से बाहर किसी बड़े शहर में अकेली हूं.तब मुझे ये बहुत मुश्किल लगता कि मैं बारहवीं के बाद पढ पाऊंगी.मैं अपनी साथ की सहेलियों को अपनी इच्छाएं बताती तो कहतीं देख लेना 10वीं 12वीं के बाद तेरा बुबा( पिता) तुझे अपने घर में थोड़ी रखेगा, तेरा ब्यो कर देगा देख लेना.

तुम्हारी स्थिति को देखते हुए मैंने तब से ही फैसला कर लिया था मैं खूब पढूंगी मां, घर से बाहर निकलूंगी अपने हिस्से की जिंदगी अपने तरीके से जियूंगी.क्योंकि तुम्हारी जैसी जिंदगी मेरे लिए खौफ का सबब होती।
गुनिया की माई
एक बेटी को तौर पर मैं तुमसे जितनी अधिक जुड़ी हुई थी उतना ही तुमसे गुस्सा भी हो जाती.मैं अक्सर तुम्हें दोष देती औरों की मांएं ये करती हैं, वो करती हैं, तुमने वह सब क्यों नहीं किया.उस वक्त तुम मेरे लिए सिर्फ मां थीं और मां का मतलब ही होता है हमारे समाज में मर-खप जाना.लेकिन तुम उस तरह से नहीं हो पातीं थीं.तुम किसी भी अन्य मां से ज्यादा भावुक थीं, शायद क्योंकि तुम जानती थीं कि तुम अन्य मांओं की तरह उतनी ज्यादा कामकाजी नहीं थीं.

माना जाता है कि पहाड़ी समाज में औरतें मजबूत स्थिति में रहती हैं हालांकि यह बात कुछ हद तक सही भी है लेकिन पूरी तरह नहीं.हमारे पहाड़ी समाज में भी स्त्रियां भले ही कितनी भी कामकाजी हों फिर भी पुरुष के मुकाबले उसकी स्थिति दोयम दर्जे की ही है.उसे सारे काम करके भी पति की मार पड़ती ही है.लेकिन तुम्हें तो खेती और जंगल के काम आते भी नहीं थे, तुम तो पूरे गांव घर वालों की नजरों में दोषी थी- इसके बिना कोई बैठे-बेठे कैसे खा सकता है.
रवींद्र के दास की कवितायें : माँ ! पापा भी मर्द ही हैं न !
हमारे समाज में स्त्रियों से सिर्फ काम करते रहने की ख्वाइश की जाती रही है.बस वो बैल की तरह खुद को काम में झोंक दें और वे ऐसा करती भी हैं.एक गढवाली गाने को उदाहण के तौर पर लिया जा सकता है जिसे लोग गाते हैं:
जैका पल्यां गल्या बल्द रिड्वा जन्यानि
तैक होयूं ईं दुन्या में रोणु सदानी
इससका मतलब है जिसने इस दुनिया में आलसी बैल और फालतू घूमने वाली स्त्री को पाल कर रखा हो उसके लिए इस दुनिया में सिर्फ ही रोना ही लिखा है.

वास्तव में सभी समाजों की स्त्रियों की अपनी–अपनी दिक्कतें हैं।ठेठ पहाड़ी समाज में अगर कोई स्त्री ये सारे काम नहीं कर पाती है तो उसकी कीमत इस समाज में ठीक उतनी ही है जितनी किसी बेकार बैल की होती है.मैं तुमसे हमेशा से यही शिकायत रही कि तुम्हें खेती के काम क्यों नहीं आते, तुम्हें गोल-गोल रोटियां क्यों बनानी नहीं आतीं.मेहमानों के आने पर तुम काम में लगी रहने के बजाय उनसे बातें करने क्यों बैठ जाती हो.इन तमाम शिकायतों के साथ तुम्हें घर गांव भर में इंसान ही नहीं समझा गया कितनी जिलल्तें झेलनी पड़ीं.
माँ तुम्हारे कॉमरेड
कितना बुरा लगता था जब कोई पूछता तेरी मां लुल्ली (चीख-चीख कर रोना) क्यों मार रही थी, तू समझाती क्यों नहीं अपनी मां को.इन सब में गांव के औरद-मर्द सभी शामिल होते.मैं शर्म से पानी-पानी हो जाती, गुस्सा भी आता कभी तुम पर- कभी लोगों पर और सबसे ज्यादा पिता पर.लेकिन ये हमारी संस्कृति है जिसमें महिलाओं से हर हाल में चुप रहने की उम्मीद की जाती है पति पर हाथ उठाना पाप समझा जाता है.जबकि पति का तो धर्म होता है पीटना.घर-परिवार बच्चों के नजरिए सो चाहे जो मर्जी रहा हो तुम्हारा प्रतिरोध लेकिन बदले में तुम्हारा हाथ उठाना एक स्त्री के तौर पर बिल्कुल सही था मां.कितनी बार तुम कहतीं तुम्हारे लिए जी रही हूं वरना मर जाती.हम बच्चे कितना बांध देते हैं तुम्हें मुझे इस बात का अफसोस है.

मैं आज भी अलग तरीके से सोचने की कोशिश करती हूं लेकिन आखिरकर उसी ढर्रे पर आकर सोच अटक जाती है.खाना भले ही मैं बनाऊं लेकिन उम्मीद करती हूं तू भी खाली ना बैठी रहे क्योंकि तू एक मां है.लेकिन ये अजीब नहीं है कि जिस तरह मैं तुम्हें घरेलू काम करते हुए देखना चाहती हूं पिता से ये उम्मीद नहीं करती, उसी तरह तू भी सिर्फ मुझसे उम्मीद लगाकर रखती है, भाइयों को तो तू भी आराम देना चाहती है.हम बस आपस में ही उलझ कर रह जाती हैं.

हमारे समाज में हमेशा ये माना जाता है खाना बनाने का काम हमेशा मांओं का होता है।साथ ही ये भी माना जाता है कि हर लड़की को आखिरकर मां ही बनना है.

पर मां जो प्यार तुमने दिया है वो शायद आसपास के किसी बच्चे को नहीं मिल पाया.तुम्हें घर के काम बहुत पसंद नहीं थे उसमें तुम्हारा क्या कसूर था तुम खेत और जंगल के काम कर ही नहीं पातीं थीं तो भी ये इतना बड़ा मसला नहीं है, शहरी पष्ठभूमि से तुम्हारा होना तुम्हारे लिए तुम्हारे लिए सबसे बड़ा अभिशाप बना रहा था।
मैं आज भी हैरान होती हूं मां जिस उम्र में और बच्चे मां की गालियां खाया करते (हालांकि उसमें भी उन माओं का प्यार ही होता है), उस उम्र में तुम मुझे राखी, सोती सुंदरी, फ्यूंली, तीलू रौतेली, जैसी तमाम कहानियां सुनाती.सिर्फ कहानी के अन्त तक ही नहीं बल्कि उससे भी और आगे तुम कहानी को रच डालतीं तब तक जब मैं कहानी को और आगे बढाने की फरमाइश करती जाती.कविताएं सुनातीं हिलांस वाली घुघूती वाली.घिंडुड़ि कि मां घिंडुड़ि चा दूध पे ( गोरेया की मां और गौरेया ने चाय दूध पिया)  कहते हुए चाय और दूध पिलाने का तरीका कितना खुशनुमा होता था।
बोलिए न पापा कुछ तो बोलिए
घिंडुड़ी (गौरेया) वाली कहानी से तुम अपनी आकंक्षाओं को ही तो दर्शा रही होती.जिस तरह तुम बहुत ही सहजता से कहानियां और कविताएं मैखिक ही रच लेतींउसके लिए वाकई कल्पनाशीलता की जरूरत होती है.तमामउम्र दराज लेखिकाओं को देखते हुए तुम्हारा चेहरा याद आता है लेकिन तुमने तो अपनी सारी रचनाओं को सिर्फ अपने बच्चों के लिए रचतीं थीं.इससे ज्यादा तुम्हारी महत्वकांक्षा क्यों नहीं थी मां! एक बेटी को तौर पर आज मैं यही कहना चाहती हूं कि मांओं को सिर्फ बच्चों में नहीं खो जाना चाहिए.

जहां तुम्हारे ससुराल या मेरे घर-गांव में मुझे आज भी साहित्यिक पत्रिकाएं और किताबें नहीं मिल पाती हैं.तुम मुझ से एक पीढी पहले ही धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, और गुनाहों के देवता जैसे तमाम साहित्य से गुजर कर कुछ उसी तरह से हो गईं थी.उनका गहरा असर अभी भी जीवन के प्रति तुम्हारे नजरिए और कल्पनाशीलता में दिखता है.लेकिन मां जीवन काल्पनिक साहित्य नहीं होता.आज भी तो अगर तुम्हारे हाथ में अगर कोई किताब, पत्रिका या अखबार ही लग जाता है तो तू खाना बनाने से लेकर धारे से पानी लाने तक के सारे काम मुल्तवी करके तल्लीनता से पढने में लग जाती हो.
पेंटिंग में माँ को खोजते फ़िदा हुसेन
मेरे शहर में आ जाने के बाद तू खुश है कि मेरी जिंदगी तुमसे बेहतर और अलग होगी.लेकिन मां मुझे अफसोस है तू अब भी भीतरी तौर पर बहुत अकेली है और मैं अब भी तेरा साथ नहीं दे पा रही हूं.शहरी जीवन की अपनी दिक्कतें हैं.मैं तेरी उम्मीदों को तोड़ना नहीं चाहती, मैं जिंदगी में बहुत बेहतर करना चाहती हूं.मैं तुम्हारी बची हुई जिंदगी को भी बेहतर बनाना चाहती हूं.मैं आपकी वाली पीढी से आगे निकलना चाहती हूं.

मैं जानती हूं मां तेरे सपने अभी भी मरे नहीं है.तेरी मंगायी गयी चूडिंयों के साथ साथ मैं कविताओं की किताब भी लेती आऊंगी।कुछ बच्चों वाली किताबे भी जिनमें आज भी तेरा मन बसता है।हालांकि मुझे तेरा चूड़ी-बिंदी सिंदूर से सजना बिल्कुल भी पसंद नहीं है, लेकिन तुम अभी तक वहां नहीं पहुंची हो कि इन चीजों का भी प्रतिरोध करो.हांलांकि तू ही कहती है कि हम स्त्रियों को ये सब क्यों करना पड़ता है जबकि पुरुषों के लिए तो सुहाग की कोई निशानी नहीं होती.ये सब जानने -समझने के बावजूद तुम ऐसी नहीं हो पाई कि इन चीजों को छोड़ दो.

मुझे जितना याद हुर्रे का ठंडा पानी आता है, चांदनी रात में चमकता पार्य बण आते हैं उन सबसे से ज्यादा तेरी याद आती है.इसलिए नहीं कि मुझे तेरी जरूरत है बल्कि इसलिए कि गति जीवन की गति को बनाये रखाजा सके.मैं चाहती हूं कि तुझे मेरा कोई भी काम ना करना पड़े एक मां के तौर पर, ना हीं तुझे मेरी मेरी कोई चिंता ना करनी पड़े.एक स्त्री के तौर पर तुम मेरे साथ चलती रहो बस.

आज पाती हूं तुझमें और मुझमें बहुत ज्यादा अंतर नहीं है.तुम्हें भी तो कुल्टा जैसे कई संबोधन झेलने पड़ते थे.लेकिन तुम्हारा विरोध बहुत तीव्र होता था.मैं तुम्हारी ठीक अगली पीढ़ी, जो घर से बाहर निकलकर भी, क्या हूं? मुझे भी ठीक इस तरह के संबोधन सुनने को मिलते रहे.इसके बावजूद मैं ठीक से विरोध तक नहीं कर पाई, बस अपने प्रेम का यकीन दिलाती रही. तुम्हारे हाथ में एक घर है जहां तुम तथाकथित रूप से खुश हो.मैं उस घर से या उस तरह के तमाम घरों से आजादी की ख्वाइश रखते हुए गोल –गोल दुनिया में गोल–गोल घूम रही हूं.

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

उन क्षणों के बाद.. !

डा .कौशल पंवार

  युवा रचनाकार, सामाजिक कार्यकर्ता ,  मोती लाल नेहरू कॉलेज , दिल्ली विश्वविद्यालय, में संस्कृत  की  असिस्टेंट प्रोफ़ेसर संपर्क : 9999439709

और वह जान ही नहीं पाई थी कि वह कब उसके इतने करीब आ गया था,  जिसकी उसने कल्पना ही नहीं की थी. हालांकि वह उसके प्रति एक खिंचाव महसूस जरूर कर रही थी, उसके भाव उसके प्रति कुछ अलग आकार में थे जरूर परंतु वह यूं और इतनी दूर तक की सफ़र नहीं करना चाह रही थी. फ़िर ये सब क्यूं होने दिया था उसने… उसे रोका क्यूं नही. वहउस पल में ये महसूस ही नहीं कर सकी थी कि जो कुछ भी यह हो रहा है उसके लिए वह तैयार भी थी या नहीं.

दिन ही कितने हुए थे उसे मिले. बस यही कोई एक दो मुलाकात. पहली मुलाकात तब हुई थी जब वह पार्क में बेंच पर बैठे-बैठे अपनी ही दुनिया में खोई थी. अचानक उसने किसी की परछाई सी अपने पैरों के नीचे महसूस की. उसने अपनी पलकें उठाकर नम सी आंखों में सामने खड़े शख्स को निहारा भर था. हैलो, कैसी हैं आप. ठीक हूं, इतना ही कह पायी थी वह उसे. पर अन्दर से उसे अजीब सा अपनापन लगा था. वह पार्क से लौट आयी थी अपने घर. अपने रोजमर्रा के काम में लगी रही, पर वह परछाई वाला शख्स अभी भी उसकी आंखे के आगे आ जा रहा था. उसका उन्मुक्त व बेपरवाह सा अंदाज बार-बार उसकी आंखों के आगे तैर सा रहा था.

एक बार उसे वह पब्लिक लाइब्रेरी में मिली थी. किताबों को जब रैक में रख रही थी तो दूसरी ओर से किसी ने एक किताब उठाई, जैसे ही आमना- सामन हुआ तो देखा वही थी. वह उसे देखकर सकपका गयी थी.  जल्दी से किताब लेकर लाईब्रेरी में मेज के चारों ओर पड़ी कुर्सियों में से एक में धस गयी. किताब को हाथ में लेकर पलटने  लगी, मानोउसकी नजर उसे किताब के पन्ने पलटने में ही ढूंढ रही हों कि वह कहां पर बैठा है या उसने उसे देखा कि नहीं. जब जवाब नहीं मिला तो उसने अपनी नजरें चारों ओर घुमाई, वह उसे दिखाई नहीं दिया. सोचा चला गया होगा. और वह किताब पढने लगी थी. किताब पढने में मशगूल  हो गयी थी वह. किताब ही ऐसी थी,  जो पढकर झकझोरर दे. उसे अपनी जिन्दगी उस किताब में लिखे हर एक लब्ज जैसी दिख रही थी. कैसे ओमप्रकाश वाल्मीकि  की माता जूठन इकटठा कर लेकर आती थी और सारा परिवार उसे खाता था. ये परम्परा कहां से आयी होगी. वह पढते-पढते ही सोचने लगी थी. उनके परिवार में भी तो उसकी ताई जमीदारों के घरों से मिली रोटी मांगकर लाती थी और वे सब मिलकर खाते थे. पर एक दिन जब वह भी अपनी ताई के साथ कमाण गयी थी तो अपने हाथों से ताई को गंदगी उठाते देख उसे उबकाई आ गयी थी. उस दिन के बाद से तो उसने पीली दाल खाना बंद ही कर दिया था. जब भी घर में ये पीली दाल बनती, उसे उल्टियां शुरु हो जाती थी.  धीरे- धीरे घर में ये दाल बननी बंद हो गयी थी. आज तो वह मैट्रोपोलियन सिटी में है परंतु उस बीते बचपन को वह भी आज तक कहां भूला पायी थी. जूठन को पढते हुए उसे यही लग रहा था. वह पढने में इतनी डूब गयी थी कि वह शख्सकब उसके सामने वाली चेयर पर आकर बैठ गया, उसे तनिक भी भान नहीं हुआ. उसने किताब खत्म की और एक लम्बी सी सांस खीचकर अपनी गर्दन लाइब्रेरी की छतपर टिका दी. . थोड़ी देर बुत बनी रही मानो जूठन का एक-एक शब्द उसने ही लिखा होहो. सामान्य हुई और अपनी चेयर पर सीधे बैठने लगी कि सामने वह गहरी सी, चोर सी आंखों वाला उसके सामने वाली चेयर पर टकटकी लगाये बैठा था. वह चौकन्नी सी हो गयी मानो अपनी भावनाएं उसके सामने आने से छुपा रही हो. शख्स ने अपना हाथ उसकी तरफ़ हैलो कहने के लिए बढा दिया था. उसने भी हाथ मिलाकर उसका अभिवादन स्वीकार कर लिया था. जैसे वह अभी-अभी किताब की पढी बातों को चुनौती सा दे रही थी कि वह इतनी कमजोर नहीं रही अब. यहां तक पंहुचने का उसका अपना संघर्ष था, उसने तो हर हाल में जीतना ही सीखा था. पर अब वह किताब   नहीं पढ रही थी, बल्कि हकीकत में उस शख्स  से हाथ मिला चुकी थी, जिसे वह जानती ही नहीं थी. उसकी ये आदत औरों  की नजरों में बडी बोल्ड़ लगती थी और लोग तरह-तरह की व्याख्यायें अकसर इस पर किया भी करते थे पर वह कितनी सावधानी से हाथ मिलाती थी, वह ही इसे जानती थी. हाथ मिलाने के अंदाज से ही वह सामने वाले की उसको लेकर राय जान जाती थी. और उससे हाथ मिलाना तो दूर वह उसके देखना भी पसंद नहीं करती थी.  पर आज उसने अपने हाथ मिलने  से मिली उष्मा को सहेज सा लिया था. वह भी चेयर की ओर इशारा कर उसे बैठने के लिए कह रहा था. थोड़ी सी औपचारिकता के बाद उसने सीधा सवाल किया था, “आप तो वह है न जो टी.वी. में डिबेट में आयी थी इंट्रनेशनल वीमेन डे पर. मैने आपका इन्ट्रव्यू देखा था. जिस बेबाकी से आपने अपनी बात रखी, उसे सुनकर मैं तो सच पूछो,आपका कायल हो गया, आपका फ़ैन हो गया. मुझे नहीं पता था कि आप भी यही आती हैं पढने के लिए. जिस दिन से आपको टी.वी. पर देखा-सुना था, मैं तो आपको खोज ही रहा था, कई मित्रों से आपके बारे में पूछा भी मैने, पर किसी ने बताया नहीं कि आप यहां आती हैं. मैं भी यहीं आता हूं”.  एक सांस मे वह बहुत कुछ बोल गया था. वह सुनती रही थी. और वह बिना उसके जवाब सुने बोलता जा रहा था. सवाल पे सवाल. जब काफ़ी देर हो गयी तो उसे रोक कर जवाब देने की कोशिश की थी उसने. पर वह अपनी ही सुनाता जा रहा था जैसे बहुत दिनों से ढेर सारे प्रश्नों को लेकर उसे ही खोज रहा हो. उसे भी भला सा लगा था उसे यूबिना किसी की परवाह किये बोलते हुए. वैसे तो वह ही बहुत बोलती थी. वह अपनी ही दुनिया में खो सी गयी थी. “कहां खो गयी” उसने हाथ की चुटकी उसके चेहरे की ओर घुमाते हुए कहा. वह अपनी दुनिया से बाहर आ गयी थी. उस दिन बड़ी आत्मियता से उसने बात की थी. उसे भी अच्छा लगा था.

एक दिन फ़िर मुलाकात हुई और उसने उसे काफ़ी के लिए आमंत्रित  किया. वह ना न कह सकी. पास के ही रेस्तरां में जाकर उन्होंने काफ़ी पी. उसे भूख लगी थी तो उसने खाने का आफ़र किया. यह उसके साथ पहली दफ़ा था कि किसी अजनबी के साथ वह बाहर काफ़ी पीने के लिए बिना सोचे समझे आ गयी थी. एक अलग तरह का खिंचाव महसूस किया था उसने.. ढेर सारी बाते काफ़ी पीते- पीते हुई उनके बीच. समाज की और शिक्षा की भी. हालांकि वह खुद आस-पास घट रही घटनाओं के बारे में सोचती थी और यदा -कदा होने वाले आंदोलन में भी चली जाती थी. पर वह अपने परिवार तक ही सीमित रही थी. परिवार के साथ मिलकर ही वह आगे बढे, उसकी अपनी सोच थी समझ थी. वह सकीर्ण विचारों की भी नहीं ही थी. एक हद तक अपने आपको उसने मानवीय बनाकर रखा भी था. अपने आपको खफ़ाकर  बहुत अच्छी बेटी जैसी उपमाओं को ढोने वाली वह नहीं थी. नौकरी के दौरान भी उसकी अपनी सहकर्मियों के साथ अकसर घट रही सामाजिक-राजनैतिक विषयों पर ही वह बात करती थी, जिस कारण से उसकी मित्र मंड़ली में महिलाओं से ज्यादा पुरुषों से उसकी मित्रता हो जाती थी. महिलाओं की चर्चा में वह ज्यादा घुल-मिल भी नहीं पाती थी. जब उनकी चर्चा होती कि किसने कितने कैरट सोने की अंगुठी पहनी है, कपडे, सैंडिल किस ब्रांड के हैं या मेकअप कौन सी कंपनी का है आदि-आदि. असल में उसकी परवरिश भी बिल्कुल सामान्य परिवार में हुई थी जहां पर हर रोज कुंआ खोदो और पानी पीयो जैसे हालात थे,  ऐसे में कपड़ा उसके केवल तन ढकने वाला ही पसंद था,  ज्यादा से ज्यादा  उस पर जचने वाला हो, ब्रांड़-व्रांड का उसे पता भी नहीं था. पैसे से ही ज्ञान मिलता है, वह था नहीं इसलिए उसे पता भी नही था. जब पैसा हुआ था तो रुचि भी नहीं जागी थी. ऐसे में वह महिलाओं द्वारा की गयी ऐसी चर्चाओं में अपने आपको अनफ़िट महसूस करती . पुरुषों के बीच ऐसी चर्चाएं कम होती. ऐसा नहीं था कि उसे महिलाओं का साथ पसंद नहीं आता था. वह कुलीन वर्ग की महिलाओ के बारे में खूब सुनती थी. उनका दर्द भी था तो एक जैसा ही. बस फ़र्क उसमें और उनमें इतना होता था कि वह जिस परिवार से आती थी,  वह दलितों में भी दलित था और छुआछूतपन का व्यवहार बचपन से ही पा लिया था, जिसको पाकर वह ओर कठोर हो गयी थी. पुरुष मित्र मंडली में वह इन सब सवालों से बच जाती थी और एक कम्फ़र्ट जोन में आ जाती थी. वह चर्चा के दौरान देश-दुनिया, समाज-संस्कृति के प्रति उसकी जानकारियों और स्पष्टता से प्रभावित हुई. वह उसे सीनियर नजर आने लगा था. उसके प्रति अब उसके मन में आदर भाव आ गया था. वह अभी तक उसके नाम पर नहीं गयी थी. न ही पूछना ज्यादा ठीक लगा था उसे. कुछ- कुछ जो उसकी समझ आ पाया था तो वह कि वह उससे कहीं ज्यादा बड़ा था. पद और जाति दोनों से. उसके विचार ज्यादा मेल नहीं खा पाये थे पर अपने से इतर विचारों पर विचार करना उसकी खास आदत थी. उसने कभी अपनी समझ को कटटर नहीं बनाया था. विस्तार देने में वह यकीन करती थी. एक मायने में यह मिलन अलग तरह का अनुभव लेकर आया था उसकी जिन्दगी में.
स्पीड ब्रेकर / कहानी
शायद उसकी तीसरी मुलाकात तब हुई जब वह अपने आफ़िस से बाहर निकल रही थी. उसने अपना रोजमर्रा का सामान टेबल से उठाया, पानी की बोतल जो हमेशा साथ ही रहती थी, उठाकर पर्स में रखी और मोबाइल को हाथ में लेते हुए ही साडी का पल्लू सीधा किया. जैसे ही बाहर निकली, चिरपरिचत से अंदाज में उसने हैलो बोला. वह अचानक से उसके प्रकट होने से चौक गई, फिर सहज हुई ‘प्रत्युत्तर में उसने भी ‘हैलो’ कहा. हाल चाल पूछने के बाद उसने उसे नागपुर में होने वाली कान्फ़्रेंस में जाने के बारे में पूछा. वह भी एक दम से ना नहीं कह सकी थी. और बाद में बात करने को कहकर आटो में बैठकर चली गयी.



जैसे ही अगले दिन आफ़िस पहुँचीकि आवाज आयी..”क्या जाने का कन्फर्म हुआ है, टिकट बुक करवा रहा हूं. सारा अरेंजमैंट हो गया है, ऐयर्पोर्ट पर गाड़ी रिसीव करने पहुंच जायेगी. वह भागते से अंदाज में बोल गया था. और जब तक वह पीछे मुड़कर देखती वह जा चुका था. अगले दिन इमेल पर उसका टिकट और ठहरने का होटल बुक का कन्फ़र्मेशन आ गया था. वह चली गयी थी. घूमना उसे अच्छा लगता ही था. सुबह -सुबह वह नागपुर पंहुच गयी थी. गाड़ी अभी तक नहीं आयी थी. उसने उसके नम्बर पर फ़ोन मिलाया. उसने फोन काट दिया. थोडी देर में रिंग आ गयी थी. गाड़ी वाले का फोन था और रसीव करने के लिए लोकेशन पूछने लगा था. वह होटल आ चुकी थी तो गाडी वाले ने उसे आधा घंटा आराम करने के लिए कहा और यह भी बताया कि  वह आधे घंटे बाद उसे लेने आ जायेगा. उसने नाश्ता किया और रेस्ट किया कि गाड़ी वेन्यू पर ले जाने के लिए आ गयी थी. वह गाडी में बैठकर कांफ्रेंस हाल आ गयी. हाल खचाखच भरा था. ऐसा नहीं था कि इस तरह की सभा में वह पहली बार आयी हो. परन्तु ये भीड़ उसके लिए बिल्कुल अनजान की तरह थी, कुछ चेहरे दिखाई दिये भी तो वे इतने बड़े थे, जिनके साथ घुलना मिलना उसके लिए कठिन हो रहा था. इसलिए वहां लोगों की भीड़ मे वह उसे ही ढूंढ रही थी.  अचानक वह उसे एक झुंड़ से घिरे दिखाई दिया. सब उसी को ताक रहे थे. इसमे कोई दो राय नहीं थी कि वह इस पूरे आयोजन का सूत्रधार था. सब उसे ही देख  रहे थे. वह अब उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण हो गया था. उसके लिए यह एक कदम ओर उसकी तरफ़ जाने का प्रयास था, या वह उसका सम्मान करने लगी थी. वह अभी तक नहीं जान पायी थी या जानना भी नहीं चाहती थी. वह भीड़ में श्रोताओं के बीच में बैठी उसे ही देख रही थी. शायद उसने भी उसे देखा था लेकिन इग्नोर सा कर दिया था. उसको मंच पर बोलने जाना था सो उसने उसकी तरफ़ ज्यादा ध्यान देना उचित नहीं लगा था. वह बोलने लगा तो मंच पर विराजमान सभी लोग उसे ही ध्यान से सुन रहे थे. भीड़ शान्ति से उसकी बातों को गम्भीरता से सुन-समझ रही थी. उसे भी उसका व्याख्यान अच्छा लगा था और उसने उसका पूरा भाषण रिकार्ड कर लिया था. अब उसे घबराहट होने लगी थी कि वह कैसे बोल पायेगी और क्या बोलेगी. मंच पर जब उसका व्याख्यान खत्म हुआ तो हाल तालियो से गूंज उठा. कईयों ने तो खड़े होकर तालियां बजाई. उसने कई बार उसकी सीट की तरफ़ झांकने की कोशिश भी की पर वह खुद ही झेंप गयी थी. उसकी नजरों में उसका कद ओर बढ गया था. सुबह से शाम तक चले कार्यक्रम  में उसके साथ उसकी कोई बात नहीं हो पायी थी, और उसने भी उससे बात करना उचित नहीं लगा था. वह अकेला दिखा ही नहीं. ऐसे ही पहले दिन का कार्यक्रम खत्म हो गया.
मेरा कोना / मेरा कमरा
अगले दिन उसे बोलना था. वह नर्वस थी और थोडी बहुत नाराज भी कि उसने उसे आमंत्रित किया और एक बार भी पूछा तक नहीं. वह बहुत व्यस्त था और शायद उसकी जान-पहचान को किसी के सामने नहीं लाना चाहता था. वह भी अब अपने आपको उसके सामने साबित करना चाह रही थी और अच्छा बोलना चाह रही थी. थोड़ा सा नर्वस भी कि वह.  सुने तो ही अच्छा था. अजीब किस्म की कशमकश थी, एक तरफ़ वह यह भी चाहती थी कि वो भी उसे सुने लेकिन दूसरी तरफ़ नहीं भी कि वह उसे सामने बैठे देखकर बोल भी पायेगी या नहीं. अपने तय समयानुसार वह बोलने का मन बना चुकी थी. अपनी समझ के अनुसार उसने और पैनलिस्ट से ठीक-ठाक बोला था. लोगों ने उसकी बातों को ध्यान से सुना. इसकी खबर उसे भी लग चुकी थी.


देर शाम को उसका फोन आया था और उसने शुभकामनायें दी. ये भी जता दिया था कि उसने बात क्यों नहीं की थी. उसने उसे सुबह मिलने के लिए कहा. उसका फोन आया कि वह उससे मिलने के लिए आ रहा है. उसके लिए यह सामान्य ही थी लेकिन फ़िर भी कहीं न कहीं एक उत्सुकता भी थी. उसने डोरबेलबजाई. वह अब उसके सामने था. बात शुरु की और कहा कि संगठन वालों से झूठ बोलकर आया हूं कि जरुरी काम से बाहर जा रहा हूं. वरना तो मुझे ये लोग कभी अकेला ही नहीं छोड़ते. इधर-उधर की बातें हुई कार्यक्रम को लेकर और सामाजिक आन्दोलनों को लेकर भी. दलित और ओबीसी साहित्य पर भी बात हुई और वाम संगठनों पर भी. वह चुपचाप उसे सुन रही थी और वह बोले जा रहा था. फ़िर अचानक खामोश हो गया और उसकी ओर देखनेलगा. उसने उससे बस इतना ही कहा कि –“आप मुझे अच्छे लगते हो.”. उसने प्रत्युत्तर में कहा कि ‘जब दो बुद्धिजीवी  आपस में बात करते है तो अच्छे लगते ही हैं.’ यह उसके लिए मानो सारे सवालों का जवाब था. उसे सुनकर और  अच्छा लगा था. वह इन्हीं सब में खोई थी कि कब वह उसके नजदीक आया, उसे पता ही नहीं चला.
बाथरुम में आईने  के सामने खड़ी वह  सोचने लगी कि वह उसे क्यों नहीं रोक सकी थी, क्यों नहीं जान पायी थी? या उसका इतना सम्मान करने लगी थी कि उसे रोकने की वह हिम्मत ही नहीं जुटा पायी थी. या वह भी यही चाहती थी, ऐसा तो नहीं था. पर इस तरह से होगा यह  भी उसे मंजूर नहीं था.

“यह उसके लिए जैसे रोजमर्रा के काम जैसा हुआ होगा” पर……. उसके लिए नहीं था. जिस तरह के संस्कारों में वह पली-बढी थी उसके लिए इस तरह के रिश्ते बहुत मायने रखते थे. इसलिए उसने उससे बहुत बार इस पर बात करने की कोशिश की, पर उसके पास बात करने मिलने का समय ही नहीं था. कभी यहां व्यस्त तो कभी वहां, हर बार उसका यही जवाब होता. हालांकि वह जानती थी कि वह सचमुच में व्यस्त भी हो सकता है क्योंकि वह उसके काम को देख चुकी थी. फ़िर भी फोन पर बात न करे, यह उसे हजम नहीं हो पाया था. उसने एकाध बार फोन उठाकर बात भी की. पर वही पुराना राग, ‘ बहुत काम है, समय ही नहीं मिलता.’ वह उसे हर रोज याद करती,  . सारी कमियों के बावजूद वह उस पल को नहीं भूला पायी थी,  जो उसने उसके साथ बिताया था हालांकि इसमे उसकी कोई भी भागीदारी नहीं थी. फ़िर् भी एकाकार तो हुई ही थी,  जिसके कारण वह उसे अपने मन  में बसा बैठी थी. उसको उससे मोहब्बत  हो गयी थी पर वह उसे इग्नोर ही करता आ रहा था. शुरु शुरु में उसे लगा था कि वह व्यस्त होगा पर धीरे धीरे बहुत कुछ वह समझ गयी थी. जिस मोहब्बत पर वह अब इठलाने सी लगी थी वह एक छलावा भर था, केवल उसका   एकतरफ़ा प्यार. जिस्मानी संबंध  उस शख्स के लिए कोई मायने ही नहीं रखता था पर उसके लिए रखता था. धीरे धीरे उसने फोन उठाना भी बंद कर दिया. जब मन आया तो एक मैसेज का जवाब आता “काल यू लेटर” पर फोन या मसेज कभी नहीं करता था. ये रिश्ता उसके लिए उसे डिस्टरब करने जैसा बन गया था.  वह भी भूल जाना चाह रही थी, लेकिन नहीं ही भूल पायी. वह उस पल को अपनी यादों में समेटकर आगे बढना चाह रही थी पर उसके पास इतना समय ही नहीं था कि वह अब फ़िर से उसे ‘हैलो’ कह पाता या फ़िर किसी ओर की तलास में था.या…..। वह इसे जीना चाहती थी. पर वह तो हवा के झौंके की तरह आया था और तूफ़ान छोडकर निकल गया.
जूते
उसे याद आया कि राहुल भी तो ऐसे ही उससे एक तरफ़ा मोहब्बत करता था पर उसने कभी उसे देखा तक नहीं , बल्कि उसे देखते ही वह कट लेती थी. अगर बात करने की कोशिश करता तो दुत्कारते हुए साफ़- साफ़ जवाब देती कि जो वह सोच रहा है, ये उसकी अपनी भावनाये हैं पर उसकी नहीं. लेकिन उसने राहुल को कभी झांसे में भी तो नहीं रखा था, वह स्पष्ट थी. पर यहां तो वह यह तक नही तय कर पायी थी कि आखिर ये सब था क्या.
उसने बहुत कोशिश की कि वह भी भूला दे सब कुछ…. पर नहीं भूला पायी थी. दुखद यह भी था कि अब उसने ठान लिया था कि वह किसी पर भरोसा नहीं करेगी. उसे इसे कायम करने की पूरजोर कोशिश की. उसने अपनी बितायी जिन्दगी  के पन्नों को पलट-पलट कर देखा जिस कोरे कागज पर किसी का नाम गुदा नहीं था. हैरानी की बात थी कि उम्र के इस पड़ाव पर आकर वह इस जातीय दंभ को क्यों नहीं समझ पायी थी. जिस व्यवस्था से लड़ते-लड़ते समझते हुए उसने अपने आपकी घेराबंदी की थी, उसने अपने ही हाथों से कैसे उस किले को ढह जाने दिया था. वह तो आज तक किसी के झांसे में नहीं आयी थी, जब भटकाव के कारण सबसे ज्यादा रहे थे. पर आज……. क्या प्रगतिशीलता का मुखौटा पहनकर आये इस ब्राह्मणवाद के झांसे में वह भी आ गयी थी.

वह उसे अपने दिल से ही नहीं बल्कि दिमाग से भी नहीं निकाल पायी थी. उसने बहुत कोशिश की पर……..। उसने अपने आपको वक्त दिया. झोक दिया कामों में उसे भूलाने के लिए.  समय बड़ी से बडी याद को बिसरा देता है. वह भी ठोकर खाकर, सम्भलकर आगे बढ गयी थी.
जिसने उससे मोहब्बत  की, उसने उसकी कद्र नहीं की.
जिसने कद्र की, उसने उससे मोहब्बत ही नहीं की.

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

जजिया कर से भी ज्यादा बड़ी तानाशाही है लहू पर लगान



संपादकीय 

सोचता हूँ कि सैनिटरी पैड पर लगाया जाने वाला टैक्स क्या पुरुष लिंग के अहम से उपजा निर्णय नहीं है? क्या निर्णय लेने वाली संस्थाओं पर महिलाओं का नेतृत्व होता तो यह टैक्स लगना या उसे बढ़ाना संभव था? ऐसा इस परिवेश में सोच रहा हूँ जहाँ बमुश्किल 12% स्त्रियाँ ही सैनिटरी पैड का इस्तेमाल करती हैं और शेष, यानी देश की महिलाओं की बहुसंख्य आबादी, पारम्परिक तौर पर इस्तेमाल किये जाने वाले कपड़ों का ही इस्तेमाल करती हैं. कल्पना कीजिए कि इस देश में व्यवस्था पर महिलायें काबिज होतीं तो क्या वे इस तरह के टैक्स के बारे में सोच भी सकती थीं, नहीं. इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि एक महिला सांसद सुष्मिता देव के द्वारा इस तरह के टैक्स के खिलाफ जब ऑनलाइन पेटीशन शुरू किया गया तो महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने अपने कैबिनेट के साथ वित्तमंत्री से आग्रह किया कि सैनिटरी पैड को टैक्स मुक्त करने की दिशा में सरकार आगे बढे.

इस देश में 20% से अधिक लडकियां माहवारी शुरू होने के बाद स्कूल छोड़ देती हैं और जो जाती भी हैं, उनमें से एक बड़ी संख्या माहवारी के दिनों में स्कूल नहीं जाती हैं. माहवारी के दिनों में गंदे कपड़ों के इस्तेमाल से खराब स्वास्थ्य की चिंता करने की जगह व्यवस्था सैनिटरी पैड पर टैक्स बढाने में लगी है.

यूं शुरू हुई हैप्पी टू ब्लीड मुहीम

कंडोम और कंट्रासेप्टिव पर नहीं लगाये जाते टैक्स


सैनिटरी पैड महिलाओं के स्वास्थ्य से सीधे जुड़ा मामला है, और उसपर सरकार टैक्स लगाती है, जबकि कंडोम और कंट्रासेप्टिव पर नहीं. हालांकि कंडोम और कंट्रासेप्टिव भी महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ा है-खासकर प्रजनन पर आंशिक अधिकार और अनचाहे गर्भ से मुक्ति के प्रसंग में. इन दोनो अनिवार्य उत्पादों का संबंध दरअसल महिलाओं के प्रजनन और सेक्स से जुड़ा मामला है, जिससे पुरुष का अपना वंश जुड़ा है और राज्य की जनसंख्या संबंधी नीति भी, इसके माध्यम से राज्य और परिवार एक हद तक जनसंख्या पर कंट्रोल रखना चाहता है.  लेकिन सैनिटरी पैड  सीधे महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ा है, जो असंवेदनशील और पुरुषवादी राज्य के लिए एक गैरजरूरी प्रसंग है. इससे स्वास्थ्य के प्रति राज्य का रवैया भी स्पष्ट होता है, जिसके तहत अपने स्वास्थ्य की रखवाली नागरिक का निजी मुद्दा है.

माहवारी पर बात की झिझक हुई ख़त्म


माहवारी के प्रति रवैया और कुंठा 


पिछले दिनों एक शिक्षिका ने बताया कि उसके स्कूल में जब लड़कियों को सैनिटरी पैड बांटने की बारी आती है तो एक अजीब सा माहौल होता है. शिक्षिकाएं इसे बांटने से बचना चाहती हैं. वह स्कूल सह-शिक्षा का स्कूल है. साथी लड़के और किशोर छात्र तथा पुरुष सहकर्मी क्रमशः लड़कियों और शिक्षिकाओं के लिए भी कथित असहज माहौल बनाते हैं. माहवारी के दिन घरों में भी सहज माहौल वाले नहीं होते. आज जब महिलाओं का एक हिस्सा इस पर खुलकर बात करना शुरू कर रही हैं तो उन्होंने कई प्लेटफ़ॉर्म पर बताया है कि कैसे घरों में पुरुष सदस्यों से इसे छुपाया जाता है या कपड़े इस्तेमाल करना, उन्हें धोना-सुखाना कितना गुप्त मिशन सा होता है. ऐसी स्थिति में गंदे कपड़ों का या गीले कपड़ों का इस्तेमाल उनके लिए बीमारियाँ लेकर आता रहा है. माहवारी को अपवित्र भी माना जाता है. एक ओर प्रजनन को पवित्र मानने वाला समाज, देवियों की योनि की पूजा करने वाला और पत्त्थर की मूर्तियों की कथित माहवारी में निकले कथित खून को प्रसाद स्वरुप लेने वाला समाज इन अनिवार्य दिनों से गुजर रही स्त्रियों को अपवित्र मानता है. महिलाओं ने पीढी-दर-पीढी इस मानने को आत्मसात भी कर लिया है. परिणाम स्वरुप माहवारी उनके लिए एक कुंठा लेकर आता है. इस कुंठा के खिलाफ भी मुखर स्त्रियों के एक समूह ने जंग छेड़ रखा है. अपनी बात कह रही हैं, कविताओं में दर्ज कर रही हैं.

महावारी से क्यों होती है परेशानी


सरकार को क्या करना था क्या करने लगी 


स्वास्थ्य सरकारों की जिम्मेवारी है. उसे माहवारी के प्रति अपवित्रता और गुप्तता के भाव के खिलाफ अभियान चलाना चाहिए था. और साथ ही महिलाओं के लिए सैनिटरी पैड की अबाध और मुफ्त उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए थी. लेकिन इसके विपरीत वह कर लगाती है, कर बढाते जाती है- जिसका परिणाम होगा इस सुविधा से महिलाओं का और वंचन. ऐसा इसलिए होता है कि व्यवस्था पुरुषों के द्वारा पुरुषों के लिए संचालन के अधोषित दर्शन से संचालित होती है. स्त्री उसके लिए एक अलग-‘अदर’ पहचान है. न सिर्फ सैनिटरी पैड के सन्दर्भ में बल्कि में अन्य मामलों में भी ‘अलग पहचान’ का यह भाव सामने आता रहता है. अभी नीट की परीक्षा में लड़कियों के अन्तःवस्त्र निकलवाने का प्रसंग भी प्रायः इसी भाव से प्रेरित है, जिसमें लम्बी अभ्यस्तता के कारण महिलायें भी शामिल हो जाती हैं- यानी महिलाओं के खिलाफ महिला एजेंट हो जाती है. जब व्यवस्था एक ख़ास समूह के प्रति उत्तरदायी हो जाती है, तो इस तरह की घटनाएँ होती हैं. कभी तीर्थ यात्रा के लिए हिन्दू यात्रियों पर लगने वाला जजिया कर, जिसे अकबर ने हटाया था, की तरह ही है हिन्दू-हित की बात करने वाली सरकार के द्वारा महिलओं के लिए अनिवार्य सैनिटरी पैड पर कर लगना या बढाना. यह स्वागत योग्य कदम है कि महिलाओं ने इसपर मुखर विरोध किया है. महिला सांसदों से लेकर सरकार की मंत्री मेनका गांधी तक ने. कई स्त्रियों ने, जिनमें सेलिब्रेटी भी शामिल हैं, सोशल मीडिया में ‘लहू पर लगान’ शीर्षक से इसका विरोध किया है.

संजीव चंदन 

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

छन्ने की लौंडिया गुनगुनाती है

राकेश तिवारी


‘चर्चित कथाकार. उसने भी देखा’ और ‘मुकुटधारी चूहा’ कहानी संग्रह.  एक उपन्यास ‘फसक’. पत्रकारिता पर एक पुस्तक ‘पत्रकारिता की खुरदरी ज़मीन’. संपर्क: 9811807279

छन्ने की लड़की के कल्ले फूटते ही गली बड़ी बेसब्र हो गई।
कुछ-कुछ बेसुरी।
बिना तिराहे-चौराहे वाली इस गली में, जहां वह रहती है, लोग आजकल भटक जाते हैं।  वह सड़क पर आहिस्ता और घर में खुल कर गाती है।
छन्ने की लड़की इन दिनों कतार में खड़ी गुनगुनाती है।
उसी कतार में लगे एक उजले, मुलायम और लचकदार युवक ने उसे ‘अमृता शेरगिल की पेंटिंग से निकल भागी लड़की’ का ख़िताब दिया है।
मुहल्ले की बेडौल और झाईंदार स्त्रियां उसे ईश्वर की बेहतरीन कलाकृति मानती हैं।
 लाइन मारने की उम्र पार कर गए अधेड़ उसे चोर निगाहों से देखते हैं।
गली के लड़कों को यह सोच कर घबराहट होती है कि किसी दिन लड़की के घर के नीचे भी कतार न लग जाए।
अठारह की उम्र में उसके छत्तीस दीवाने हैं और बहत्तर फ़साने।
वह ऐसी ही है।
पर कहते हैं, ‘वैसी’ नहीं है।
पता नहीं।

स्कूटर-बाइक के मैकेनिक आस-पास की गलियों से निकल कर ब्रेक जांचने इसी तरफ़ आते हैं। कालिख लगे कपड़ों में दुपहियों की कान फोड़ हूं-हूं के साथ गली में फर्रांटे भरते हैं और बीच-बीच में ब्रेक की चिंघाड़ गुंजाते हैं। कॉलेज के लड़के आते-जाते इसी गली से होकर गुज़रते हैं। नए-नए मूंछें निकाल रहे स्कूली बच्चे झुंड बना कर एकाध चक्कर गली का लगा जाते हैं। इन दिनों पुलिस भी गुंडे-मवालियों की धर-पकड़ के लिए इसी गली में दबिश दे रही है। कुछ पुलिसिये यूं ही सूंघते-मंडराते हैं। किसी ठेले के हत्थे पर डंडा बजा दिया। किसी की दुआ-सलाम क़बूल की और किसी को बेवजह डपट दिया। नज़र उनकी दुमंज़िले पर रहती है। मंडराने वालों में शादीशुदा फ़रेबी भी हैं। लकदक वर्ग के इज़्ज़दार लोग भी आजकल यहां पाए जा रहे हैं, जो आम तौर पर ऐसी गलियों में नहीं घुसते। जिनके टहलने और पाये जाने के इलाक़े अलग होते हैं। जहां चौड़ी-चिकनी सड़कों के किनारे म्यूनिसिपल्टी के माली फूल-पौधे लगाते हैं।

 गली कौड़ियों वाली एक संकरी गली है। जिसमें दोनों तरफ़ मकान हैं। कुछ मकान बिना पलस्तर के हैं। कुछ जर्जर हैं। कुछ पैंतीस फुट के प्लाट में कुतुबमीनार की तरह खड़े हैं। दुमंज़िले, तिमंज़िले मकानों के नीचे दुकानें हैं। कहीं हुक में बकरे लटके हैं, कहीं पंक्चर लग रहे हैं। कहीं से मूंगफली भुनने की गंध आती है, तो कहीं से तंदूरी रोटी की। यहां सब्जी, फल, छोले-कुलछे और चने-मुरमुरे से लेकर ब्रा तक ठेलों में बिकती हैं। ठेले वाले दुकानों के आगे खड़े रहते हैं और गली को ज़्यादा संकरी बना देते हैं। कई घरों की खटिया और लद्दड़-गूदड़ भी सड़क पर फैला रहता है। औरतें सर्दियों की दुपहरी में धूप की ओर पीठ किये बैठी रहती हैं और बच्चों को कूटती-गरियाती हैं। गर्मियों की रातों में वे आंचल गिराये हाथ-पंखा झलती हैं। हवाओं को लगातार एक ही सूचना देती हैं कि बड़ी उमस है। बच्चे सुबह-शाम नालियों में शौच करते मिल जाते हैं। कभी-कभी उनके शौच में केंचुए (राउंड वर्म) निकलते हैं.  छन्ने कबाड़ी की लड़की इसी गली में रहती है। इन दिनों इसे ‘छन्ने कबाड़ी की लौंडिया वाली गली’ कहा जाने लगा है।

 गली में हर वक़्त किसी न किसी घर से लड़ने-झगड़ने की आवाज़ें आती रहती हैं। अन्यथा ठोक-पीट का शोर और बरतनों की खटर-पटर लगातार चलती है। सुबह से शुरू हुई ये आवाज़ें रात को दस-ग्यारह बजे के बाद थकने लगती हैं। लेकिन सुबह चार बजे से आवाज़ों का जागरण फिर शुरू हो जाता है। इन आवाज़ों को आराम नहीं है।

इसी गली में एक दुकान छन्ने कबाड़ी की है। जिसके सामने सलीम भाई मुर्ग़े वाला क़ाबिज़ है। जहां बीमार लगने वाले पंख नुचे मुर्ग़े और मुर्ग़ियां छोटे-छोटे खानों वाली जालियों में बंद रहते हैं। उसके दाईं तरफ़ तीन दुकान छोड़ कर मितरां दा ढाबा है। यहां से, साठ डिग्री के कोण से, छन्ने का दुमंज़िला साफ़ दिखाई देता है। कुछ हरामी लौंडों का अड्डा यहां भी है। असल में, सलीम भाई की दुकान से आंखों की ‘ कसरत ’ में गर्दन को तकलीफ़ उठानी पड़ती है। उस पर सामने बैठा छन्ने और अंदर बैठे सलीम भाई, दोनों ताड़ लेते हैं। इसीलिए सलीम भाई के ‘कसरती’ लौंडे दिन में दो-चार बार मितरां दा ढाबा की ओर चले आते हैं।



छन्ने की दुकान घर के नीचे है। या यूं कहिए कि दुकान के ऊपर छन्ने का घर है। कभी छन्ने का बाप इस जगह झुग्गी डाल कर रहता था। वह फेरी लगा कर रद्दी ख़रीदा करता था। छन्ने की दुकान के सामने एक बड़ा-सा तराजू लटका रहता है और तराजू के एक पलड़े में हमेशा बड़े-बड़े बाट रखे होते हैं। छन्ने पुराने अख़बार, शराब की खाली बोतलें, प्लास्टिक, लोहा, पीतल  और अल्यूमीनियम ख़रीदता है। पर आपको कोई भी पुरानी चीज़ बेचनी हो और उसके पास जाएं तो वह दाम ज़रूर लगाता है। जैसे कुछ साल पहले एक महिला अपने लकवा पड़े ससुर का हारमोनियम बेचने आ गई थी। हारमोनियम में न लोहा, न पीतल। छन्ने ने दो सौ से बोली लगाई। उस औरत ने तीन सौ पर छोड़ दी। सोचा— चल छोड़ परे, बेकार में जगह घेर रही है। पर छन्ने हारमोनियम का क्या करता ?  घरवाली के आगे पटक कर बोला, “ये ले, इसे बजाया कर।  दिल बहलेगा।”

क़सम खुदा की, इन दिनों गली कौड़ियों वाली में रौनक-मेला लगा है। जिसे देखो वही गली का रुख़   किए हुए है। कुछ लोग जिज्ञासावश आते हैं। एक बार आते हैं तो दुबारा आते हैं। तिबारा आते हैं। कुछ बार-बार आते हैं। गली के लोग सब समझते हैं।  उन्हें पता है कि इतनी तरह के नमूने आख़िर क्यों दिखाई दे रहे हैं।

पर, माफ़ी चाहते हुए, पहले मैं छन्ने की लुगाई का ज़िक्र करना चाहूंगा। एक ज़माने में उसकी खूबसूरती के बड़े चर्चे थे। इसके बावजूद कि लोगों ने उसे उतनी ही बार देखा था जितनी बार गिनती करने में भ्रम नहीं होता। एक बार जब छन्ने सरेआम उसका हाथ दबोचे फिल्म दिखाने ले गया था। उन दिनों गली में दुकानें कम थीं और ऐसी खुल्मखुल्ला दीवानगी भी कोई नहीं दिखाता था। कुछ लोग गश खा गए थे। तीन-चार बार उसे तब देखा गया जब वह पेट से थी और छन्ने उसे अस्पताल ले गया था। पहली ज़चगी तो घर पर ही कर ली थी। एक बार लोगों ने उसे तब देखा था जब वह छन्ने से लड़ कर गली में दौड़ती हुई सरपट निकल गई थी और उसके गालों पर डेढ़ आंसू थे। रोती हुई औरत गली के लोगों को बेहद खूबसूरत लगी थी। जब गली के लोगों को पता चला कि वह छन्ने से अनबन के बाद भागी है तो उनकी निगाह में वह और खूबसरत हो गई थी। कइयों ने उसे पलकों पर बिठा कर रोज़ सुबह रबड़ी-जलेबी और शाम को लाल-हरी चटनी के साथ समोसे खिलाने की कल्पना कर ली थी।
छन्ने की घरवाली जैसे सरपट गई, घंटे भर में वैसे ही सरपट लौट आई। लोगों के दिल में फिर छुरी चली। हाये ! ये क्या हो गया। इतनी जल्दी सुलह-सफाई  ?   कुछ दिन तो सब्र करती। पर खड़ूस तो असल में मायके वाले निकले। बैरंग लौटा दिया— अरे, मार-कूट लिया तो क्या हो गया ?  सब मारते हैं। सबर से काम लो। थोड़ा बर्दाश्त करना सीखो। आहिस्ता-आहिस्ता मुट्ठी में करो और पुचकार कर गले में पट्टा डाल दो।

लकड़बग्घे पट्टा नहीं पहनते। छन्ने ने भी नहीं पहना। उल्टा घरवाली नज़रबंद हो गई। हर दो-ढाई साल में एक बच्चा जनती और महीने-डेढ़ महीने आराम के बाद फिर वही चूल्हा, वही चौका। सुंदरता के पुरस्कार में उसे दीवारें मिली थीं। जिनसे छन कर कभी-कभार सिसकियां और कराहें बाहर जा आतीं। मानो, दीवार सिसकती हो। पड़ोसी अनुमान लगाते कि कबाड़ी अपनी उजली और मूक दीवार पर लात-घूंसे बरसाता होगा । आश्चर्य, खासकर, उन्हें होता जिन्हें अपनी दीवारें कुछ कम उजली या बदरंग लगती थीं। या जिनकी दीवारों के आंख, कान, नाक और मुंह निकले हुए थे।

  खैर, यहां बात कबाड़ी की औरत की नहीं हो रही। वैसे भी, वह अब धुआंई-पीली दीवार बन चुकी थी।
घिसी हुई पीली दीवार।
पिटी हुई पीली दीवार।
बात कबाड़ी की लड़की की हो रही है, जो हर सुबह सूरज की तरह गली में उगती है। धूप से  वायटामिन-डी लेती है और हवा से खनिज पदार्थ। इसीलिए इतनी सुर्ख़ है। इतनी कि अगर अगले साल उसका सपना सच हो गया तो खाते-पीते घर की लड़कियों पर कहर बरपेगा। वह बारहवीं का इम्तिहान देने वाली है। उसने तय कर रखा है कि बारहवीं करते ही कॉलेज जाएगी। कॉलेज जाएगी तो तय था कि वहां औसत रूप-रंग की नख़रीली, ग़ुस्सैल और घमंडी लड़कियों की छुट्टी हो जानी है।

छुट्टी इसलिए हो जानी है, क्योंकि छन्ने की लड़की खूबसूरत है। हरदम मुस्कराती है। बात-बेबात गुनगुनाती है।
लड़की हर सुबह ज़्यादा खिली और स्वस्थ लगती है। उसका निखार दिन पर दिन बढ़ता जाता है। बढ़ते निखार के साथ उसके दीवानों की संख्या बढ़ रही है। इससे छन्ने की दिक़्क़तें बढ़ रही हैं। वह डरा हुआ रहता है। अपनी पत्नी से कहता है, “लौंडिया सयानी हो गई।”
“अभी अठारा की भी ना हुई।”
छन्ने चुप। कुछ सोच कर फिर कहता है, “लौंडिया के पर लिकड़ रहे हैं।”
औरत भुनभुनाती है, “थोड़ा तो उड़ लेन दो। फिर तो…।”
कबाड़ी के दांत बजते हैं। आंखें बाहर निकल आती हैं। भुजाएं फड़कने लगती हैं।

आजकल कई जगह लंबी कतारें लगती हैं। लगती क्या हैं, लोग कतार लगाने को बावले हुए पड़े हैं। एक कतार गली के बाहर, आधा किलोमीटर की दूरी पर लगी है। छन्ने की लड़की रोज़ इस कतार में खड़ी होती है। कतार में खड़ी बुदबुदाती है। शायद प्रार्थना करती है। वह कसमसाती है। कसमसाहट काम नहीं आती। वह गुनगुनाती है। गुनगुनाहट बेअसर हो गई है। वह थोड़ी-थोड़ी देर में पीछे मुड़ कर देखती है। कतार लगातार लंबी होती जाती है। वह पंजों के बल उचक कर आगे देखती है। लोग बातें करते हैं। खूब बातें करते हैं। ज़्यादातर अच्छी-अच्छी और भविष्य को लेकर आश्वस्त करने वाली बातें। कुछ लोग उनसे असहमत होते हैं। पर उनके तेवर देख कर निराश हो जाते हैं। बाकी लोग सहम जाते हैं और छन्ने की लड़की को देखने लगते हैं। कुछेक की निगाहें हटती नहीं। मानो, सुंदरता देश-दुनिया और रोटी-पानी से बड़ी चीज़ हो। छन्ने की लड़की तड़प कर गेट के अंदर देखती है। कुछ नहीं दिखाई देता। वह बेबसी के कतार को देखती है। लेकिन आगे से कतार छोटी होने का नाम नहीं लेती, जबकि पीछे से लंबी होती चली जाती है। लोग खिसक क्यों नहीं रहे ? आगे क्या हो रहा है?  वह सोचती है।

लड़की रोज़ कतार में खड़ी होती है और बुदबुदाती है। मानो, किसी के पसीजने की प्रार्थना करती हो। वह आकाश की ओर देखती है। इधर-उधर देखती है। अपने पैर के नाखूनों को देखती है। चुपचाप। फिर अपनी ही चुप्पी से परेशान हो जाती है और गुनगुनाती है। वह अब भी गुनगुना रही है। पर अचानक कतार में भगदड़-सी मच गई है। मायूस लोग कतार से हटने लगे हैं। आगे से एक कातर-सी आवाज़ आती है। बड़ी ही मायूस और निराशा में डूबी। यह आवाज़ पीछे की तरफ़ आती चली जाती है। कतार की पूंछ तक पहुंच जाती है। सब निराशा में डूब जाते हैं। कुछ लोग भुनभुनाते हुए कतार से हट जाते हैं। कुछ निराशा के बावजूद आवाज़ पर भरोसा नहीं करते और खड़े रहते हैं। क्या पता, सच न हो। ‘विसSSर्जन’ की आवाज़ धोखा हो। वे एक हाथ पेट पर रखते हैं और दूसरे से कंधों को सांत्वना देते हैं। उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए।

कबाड़ी की लड़की कतार में लगने के लिए अगले दिन फिर निकलती है। स्कूटर मिस्त्री नसीर अपना खटारा स्कूटर लेकर उसके पीछे लग गया  है। गली से बाहर निकलते ही वह मुख्य सड़क पर पहुंच जाती है। नसीर बड़ी अदा से उसका रास्ता काट कर दाएं से बाईं तरफ़ निकलता है और कुछ आगे चल कर स्कूटर खड़ा कर देता है। वह बिना हैलमेट के है और स्कूटर पर बैठे-बैठे कंघा निकाल कर बाल संवारता है। उसके क़रीब आने से पहले पान का पीक थूकता है। वह पीछे मुड़ कर नहीं देखता, सिर्फ़ कनखियों से देखता रहता है। अपने सेल फोन के साथ खुचर-पुचर करता है। दुबारा कनखियों से देखता है। वह आ रही है। नसीर इधर-उधर देखता है। कहीं कोई है तो नहीं। कोई नहीं है। सिवाय एक झटियल-से आदमी के, जो कंधे पर कोई थैला-सा लिए दूर से चला आ रहा है। वह गली में जाएगा। नसीर अनुमान लगाता है। लड़की के क़रीब आते ही वह ज़ोर से कहता है, “आई लभ्यू।”

तुरंत स्कूटर पर किक मारता है और सर्र-से आगे निकल जाता है। कुछ आगे चल कर पलटता है। लड़की मुस्कराती है। नसीर रुक जाता है। वह क़रीब आती है। नसीर ग़ौर करता है। वह खुश-खुश लगती है। गुनगुनाती हुई उसके बगल से निकल जाती है। वह दाएं हाथ को बाईं तरफ़ लेजा कर सीने पर रखता है और ‘हायेSSS, क्या बात है’ कहता हुआ उसी तरफ़ निकल जाता है जहां, उसे पता है, लौंडिया कतार में लगेगी।

अगले दिन राजू ‘सिक्स पैक’ से मुलाक़ात के दौरान नसीर बताता है, “कल मज़ा आ गया उस्ताद, ‘आइ लभ्यू’ बोल दिया।”
“उसने क्या जवाब दिया ?”
“मुस्करा दी।”
“वह तो हमेशा मुस्कराती है।”
“गुनगुनाने लगी।”
“उससे क्या होता है ? वह हमेशा गुनगुनाती है।… मैंने तो फिलाइंग किस दी थी।” उसने अपना हाथ चूमते हुए हवा में लहराया, “ऐसे।
“तो फिर उसने क्या किया ?”— नसीर ने पूछा।
“मुस्करा दी … और गुनगुनाने लगी।…पर लपेटे में नहीं आती। बड़ी बेरहम लौंडिया है।”
“बेमुरव्वत।” कहते हुए नसीर का उत्साह ठंडा पड़ गया।
    
कोई नहीं जानता कि वह मुस्कराती-गुनगुनाती क्यों है। कोई नहीं जानता कि वह किसी भी फ़ब्ती का जवाब क्यों नहीं देती। कोई कुछ भी बोल दे वह चुपचाप सुनती ही नहीं, बल्कि मुस्करा देती है। उसके मुस्कराने और गुनगुनाने के चर्चे हैं। लोग रीझे हुए हैं। पर सच तो यह है कि वह गली कौड़ियों वाली के लड़कों की परवाह नहीं करती। किसी की नहीं करती। असल में, वह जिन दो सपनों को पोस रही है, उन्हीं में खोई रहती है। एक तो बारहवीं के बाद कॉलेज में एडमिशन लेना है। दूसरा, टीवी पर चलने वाले किसी रियलिटी शो में गाने का एक मौक़ा हासिल करना है।

इसके सिवा, उसे कुछ नहीं दिखाई देता। कुछ सुनाई नहीं देता। सच पूछें तो छन्ने की लड़की को पता ही नहीं कि वह मुस्कराहट बांट रही है। कि लोग उससे उम्मीदें लगा बैठे हैं। अभी तो वह खुद बड़ी उम्मीदों के साथ कतार में खड़ी बुदबुदाती है। पर बुदबुदाहट काम नहीं आती। वह निराश हो जाती है और गुनगुनाती है। गुनगुनाहट में बड़ी ताकत है। यह निराशा से उबारती है। गुनगुनाहट ठंडे आदमी को भी गुनगुना बनाए रखती है।

 वह हरदम संगीत में रमी हुई सुरीली लड़की है। संगीत उसकी मुस्कराहट है और संगीत ही गुनगुनाहट।वह इतनी सुंदर है कि पेंटिंग तो क्या, तस्वीर में मौजूद लड़कियां भी झेंप जाएं। इतना ही सुरीला उसका गला है। वह फ़िल्मी गानों को हू-बहू गा लेती है। उतने ही दर्द के साथ, उतने ही आनंद के साथ। वैसे ही उतार-चढ़ाव के साथ। वैसी ही मुरकियां लेकर। लेकिन उसने संगीत सीखा नहीं है। मां को हारमोनियम बजाने का शौक बचपन से था। कभी वह भी गाती थी। कुछ साल पहले छन्ने ने तीन सौ की हारमोनियम क्या निछावर की, उसे जीने का मक़सद मिल गया। उसने यह मक़सद अपनी लौंडिया को सौंप दिया।

तब से दोनों मां-बेटी साथ बैठ कर हारमोनियम पर गाने-बजाने का रियाज़ करने लगीं। अब मां बजाती है, बेटी गाती है। जब वह गाती है, उसकी गोरी गर्दन पर फूली हुई नीली नसें साफ़ दिखाई देती हैं। जब मां बजाती है, बैठे-बैठे उसकी कमर टेढ़ी हो जाती है। उनकी जुगलबंदी देख कर कई बार ऐसा लगता है, जैसे दोनों गाने-बजाने के लिए ही बनी हैं। गाते-गाते बेटी के दिमाग़ में रियलिटी शो में जाने की धुन सवार हो गई— वहां गाना है जहां सितारे गाते हैं। वहां गाना है, जहां सितारे बनते हैं। नीले आकाश में टंगे पीले सितारे।

 नीले आकाश में टंगने के लिए क्या किया जाए ? उसने कई लोगों से सलाह-मशविरा किया। मां ने भी किया। मां उसे आकाश के भी ऊपर टांगना चाहती है। अलग नज़र आने वाला चमकदार सितारा बना कर। मां-बेटी को ज़्यादातर ने यही बताया कि किसी अच्छे गुरु से संगीत की बारीक़ियां सीखनी होंगी। फ़िल्मी गीत गा लेने से काम नहीं चलेगा। तब उन्होंने गुरु की तलाश शुरू की। कई गुरु-मर्द मिले। लेकिन संगीत में अनाड़ी बाप ने भेजने से इनकार कर दिया। ना। क़तई नहीं। गला पकड़ कर कहेगा, गले से आवाज़ निकालो। फिर पेट पकड़ कर कहेगा पेट से निकालो। और अगर छाती से आवाज़ निकालनी हो तो…। ना। ना बाबा, ना।


 आख़िर लड़की की मुलाक़ात एक गुरुवाइन से हो गई। बिल्लौरी आंखों और कटे बालों वाली गुरुवाइन। जो बिना कत्थे का पान खाती थी। चूना लगा हुआ। गाते हुए उसके मटमैले दांत मुंह से बाहर छलक आते हैं। गदराई औरत और गदराई हुई आवाज़। जब वह गाती है, अपने गदराए हुए पैर हिलाती है। लेकिन बड़ी ही बदमिज़ाज़। अक्खड़ और लठमार भाषा में बात करने वाली। बात-बात में अपमानित करती है। लौंडिया का मन तो नहीं था उससे सीखने का, लेकिन धुन के आगे मन हार गया।

पर गुरुवाइन का एक दूसरा चेहरा भी है। उसे लौंडिया की मां ने देखा है। उसने एक दिन लौंडिया की मां को समझाया था कि लड़की होनहार है। सातवें सुर की तरह चढ़ेगी।

मां ने पूछा कि आसमान पर टंगेगी ?  गुरुवाइन ने कहा— हां, पर दिमाग़ सातवें आसमान में न चढ़े। उससे मत कहना कि मैं उसके बारे में क्या सोचती हूं। कभी मत कहना। सितारे प्रशंसा से नहीं, अपमान और आलोचना से बनते हैं।



जिस वक़्त छन्ने कबाड़ी के ज़ीने में भगदड़ मची, राजू ‘मितरां दा ढाबा’ में चाय पी रहा था। कौड़ियों वाली गली का यह ढाबा अंधेरी सुरंग जैसा लगता है। दोपहर हो या रात, वहां चौदह वॉट का इकलौता सी.एफ.एल. जलता रहता है, जो धुएं से पीला पड़ गया है और ढाबे के अंधेरेपन में जिसका काफ़ी योगदान लगता है। कुछ लोग भागते हुए ज़ीना चढ़ रहे थे। कुछ उतर रहे थे। बच्चों के रोने की आवाज़ें तेज़ होने लगीं। तभी छन्ने एक रोते हुए बच्चे के पीछे-पीछे गोली की तरह सीढ़ियां फलांग गया। अगले ही पल वह अपनी घरवाली को गोद में उठाए ज़ीने से सड़क पर उतर आया। दुकान के बाहर से, दाईं तरफ़ की, नौ खड़ी सीढ़ियां दुमंजिले में पहुंचाती हैं। दो-तीन लोग उसकी ऐंठती-छटपटाती घरवाली का सिर और पैर पकड़े छन्ने की मदद कर रहे थे। छन्ने की दुकान के ठीक सामने एक ऑटो खड़ा हो गया था। उसने तेज़ी से घरवाली को ऑटो में डाला और पीछे खड़ी एक महिला को उसके अंदर लगभग ठेल दिया। दो-तीन बच्चे चीखते हुए ऑटो की तरफ़ लपके लेकिन छन्ने ने उन्हें बाहों से झिंझोड़ कर वापस ज़ीने की ओर धकेल दिया।

ढाबे वाला ऑटो की रवानगी देख कर बोला, “लो, छन्ने ने एक और मॉडल तैयार कर दिया।”  छन्ने ने दूसरे ऑटो को हाथ दिया और बिना कुछ बोले उसमें घुस गया। ऑटो चल पड़ा। एक लड़का दौड़ता हुआ उस ऑटो के अंदर बैठ गया और उसने रफ़्तार पकड़ ली।

 “नहीं, यह ज़चगी का मामला नहीं है।” बगल वाला अधेड़ पनवाड़ी, जो अपनी छोटी-सी दुकान के अंदर पालथी मार कर बैठता है, मुंह बाहर निकाल कर ढाबे वाले को बताने लगा, “वह परास्त होकर कभी नहीं गई।”
पनवाड़ी के मुंह में कोई आधा कप पीक होगा। उसने पीक थूक कर बताया कि छन्ने की घरवाली ज़चगी के लिए हमेशा मुस्कराती हुई गई है। वह योद्धाओं की तरह जाती है। पहले ज़ीना उतर कर पति की दुकान के सामने खड़ी होती है। फिर छज्जों की तरफ़ देखती है और पेट आगे निकाल कर स्कूटर की ओर ऐसे बढ़ती है जैसे कोई बच्चा या शराबी मूतने जा रहा हो। फिर वह स्कूटर पर बैठते-बैठते बच्चों को हाथ हिलाती है। मानो, जंग जीतने की शुभकामनाएं मांग रही हो।


  “नहीं ज़चगी का मामला नहीं है। बात कुछ और है।”—उसने पूरे विश्वास के साथ कहा और अपने खोखे से उतर कर छन्ने की दुकान की ओर बढ़ गया, जहां कुछ लोग अब भी खड़े थे। कुछ लुगाइयां भी थीं। मर्द और औरतें, सभी फुसफुसा रहे थे। छन्ने ने किसी को कुछ नहीं बताया। पर बच्चे बता रहे थे कि मां को कोई फोन आया था। वह चीखी। बिलबिलाती हुई पूरे घर का चक्कर काटने लगी।  ग़ुसलख़ाने की तरफ़ भी भागी थी। फिर धड़ाम् की आवाज़ आई। बच्चों ने देखा, मां फर्श पर गिरी है। उसे क्या हुआ यह पक्के तौर पर कोई नहीं जानता था। बच्चों ने छन्ने को बुलाया। छन्ने ने अपनी पत्नी के मुंह पर पानी के छींटे मारे। मां ने बाप से आधे-अधूरे-से कुछ वाक्य कहे— मेरी लौंडिया।… मेरी सुरीली लौंडिया का आसमान।…पता नहीं क्या हुआ…कोई देखो।

असल में आज लौंडिया फिर कतार में खड़ी थी। नसीर ने आज उसका पीछा नहीं किया। वह अब भी उदास था। राजू ‘सिक्स पैक’ ने दुबारा फ्लाइंग किस दी। वह उसी तरह मुस्कुराई और कतार में समा गई। बाप नहीं चाहता था कि वह कतार में खड़ी हो। लेकिन मज़बूरी। एक तो वह अंगूठा छाप। दूसरा, दुकान छोड़ नहीं सकता। तीसरा, सारी जिंदगी नक़द का धंधा करता रहा। जेब में लिया और जेब से दिया। पर अचानक ही, जेब धोखा दे गई। जो था, सब मिट्टी हो गया। लौंडिया वही मिट्टी लेकर कतार में लगती है। किसी तरह बदली हो जाए।

 कतार में खड़े होते छठा दिन है। केवल कतार का मुंह गेट में घुस पाता है। न पूंछ, न पेट। वह कभी पूंछ में होती है, कभी पेट में। सारा दिन खड़ी रह जाती है। राजू ‘सिक्स पैक’ जैसे धैर्यवान लड़के तक घंटे- दो घंटे में लौट जाते हैं। आख़िर कितनी देर लड़की को देखता रहेगा। पर लड़की के धैर्य ने अब तक जवाब नहीं दिया है। गुनगुनाहट उसका सबसे बड़ा सहारा है।

छन्ने को पता था कि आज लड़की तड़के निकल पड़ी थी। किसी ने लड़की को बताया था कि लोग तो खा-पीकर रात से ही कतार में लग जाते हैं। जिस वक़्त वह पहुंची, कतार उतनी बड़ी तो नहीं थी, लेकिन कई लोग पहले से खड़े थे। उसने अनुमान लगाया और पीछे खड़ी महिला से, जो नाक से बोलती थी, अपनी खुशी साझा की— आज बारी आ सकती है। महिला की नाक ने भी खुशी में मामूली मिनमिन-सी की। मानो, वह पूरी तरह आश्वस्त न हो। गेट खुलने तक कतार इतनी बड़ी हो गई कि घुमा कर लगाई जाने लगी। दोपहर बारह बजे तक कतार धीरे-धीरे खिसकते हुए आगे बढ़ने लगी। वह गेट चढ़ने वाली सीढ़ियों तक पहुंच गई थी। उसे उम्मीद होने लगी कि आज बारी आ जाएगी। उसने पीछे वाली महिला से फिर कहा। महिला की नाक से उम्मीद निकली— हां, लगता तो है।
लौंडिया को बड़ा अच्छा लग रहा था। वह गुनगुनाने लगी। आगे-पीछे खड़े लोग ग़ौर से उसे देख रहे थे। घंटों कतार में खड़ी होने के बावजूद लड़की गुनगुना रही है। ग़ज़ब का धैर्य है। लोगों को आश्चर्य हो रहा था। पीछे खड़ी औरत को नहीं हुआ। वह जानती थी कि यह उम्मीद की गुनगुनाहट है।

 पर उसी वक़्त अचानक भगदड़ मच गई। कुछ लोग घूम कर आ रही कतार की पूंछ से निकल कर मुंह में घुसने लगे। कुछ लोगों ने हल्ला मचा दिया। लड़की भी चिल्लाई। देखते-देखते धक्का-मुक्की होने लगी। लड़की आख़िरी सीढ़ी पर पहुंच चुकी थी। उसे पांच-दस मिनट बाद गेट के अंदर होना था। लेकिन धक्का-मुक्की में वह सीढ़ियों से गिर गई। कहते हैं, ठोढ़ी पर लगने से उसकी जीभ कट गई। कुछ लोगों का कहना था आगे के दो दांत टूटे। लड़की का फोन छिटक कर दूर जा गिरा था। उसके मुंह से एक बार ‘सा-सा, रे-रे, गा-गा’ निकला और फिर खून बहने लगा। लोग घबरा गए। किसी ने लड़की के फोन से की गई आख़िरी कॉल देखी। नंबर मिलाया। उधर से उसकी मां बोल रही थी। फोन करने वाले ने घटना बयान कर दी— लड़की की ठोढ़ी फूट गई। शायद जीभ कट गई हो। या फिर दांत टूट गए। लड़की के मुंह से सरगम के साथ बहुत खून निकल रहा है।

यह सुनते ही मां घर के अंदर भागने लगी। फिर छटपटा कर गिर पड़ी। घर पहुंचा एक पुलिस वाला लगातार एक ही सवाल पूछ रहा था, “बाथरूम की तरफ़ क्यों भागी ?  वहां फिनाइल रखा था ?”
दूसरे नंबर की लड़की ने कहा, “नहीं।”
“उसके मुंह से फिनाइल की बदबू आ रही थी ?”
“जब फिनाइल था ही नहीं तो बदबू कैसे आएगी ?”
“जवाब ‘हां’ या ‘ना’ में दे लौंडिया। ज़्यादा होशियार बनने की ज़रूरत नहीं।” पुलिस वाला खिसिया गया था, इसलिए भुनभुनाने लगा, “किसने क्या पिया और क्या खाया, ये तय करना हमारा काम है।”

घबराए हुए बच्चे पुलिस वाले का चेहरा देखने लगे। अब इस मुसीबत की घड़ी में यह फिनाइल कहां से आ गया ?
छन्ने के घर और दुकान पर भीड़ उमड़ पड़ी। सब बुझे हुए थे। लड़कों की आंखें टपकने को थीं। वे एक-एक कर अस्पताल की ओर भाग रहे थे। कौन जाने खून देना पड़ जाए। किसी ने कहा कि खून देने से भाई-बहन का रिश्ता हो जाता है। नसीर तैश में आ गया, “मुझे परवाह नहीं है। लौंडिया की जान बचनी चाहिए।”

राजू ‘सिक्स पैक’ लगभग रो पड़ा, “मैं तो खून दिए बिना भी उसे बहिन बना सकता हूं। बस, उस सुरीली आवाज़ को बचना चाहिए।”
दीवानों की पलकें सगे भाइयों की तरह भीग गईं।
छन्ने जब मौक़े पर पहुंचा तो कतार फिर से लग रही थी। लोग तेज़ या मद्धम स्वर में बातें कर रहे थे। उसने घृणा से कतार की ओर देखा। कतार के बाहर भी चार-चार, छह-छह लोगों के झुंड दिखाई दे रहे थे। रुई के फाहे जैसा उजला और नाज़ुक लड़का भीगी पलकों वाला दीवाना लग रहा था। वह रुआंसे स्वर में कह रहा था— काश ! लड़की पेंटिंग से निकल कर कतार में खड़ी न हुई होती। काश !… किसी ने उसे टोका, “वह पेंटिंग से नहीं, बांसुरी से निकल कर आई होगी। या फिर सितार से या हारमोनियम से।”

 छन्ने ने सुना और तड़प कर रह गया। वह ऑटो घुमा कर अस्पताल की ओर भागा, जहां लौंडिया को ले जाया गया था। जहां अब तक उसकी मां भी भर्ती हो चुकी होगी। जहां, हो सकता है, दोनों को अगल-बगल लिटाया गया हो। जहां, हो सकता है, अब तक दोनों आपस में बातें करने लगी हों। जहां, हो सकता है, दोनों गुनगुनाने लगी हों। जहां, हो सकता है, दोनों रो रही हों। हो सकता है दोनों ही सो रही हों।

छन्ने भागा चला जा रहा था। उसके दिमाग़ पर लगातार हथौड़ा बज रहा था। क्या हुआ होगा ? लौंडिया की  जीभ तो नहीं कटी होगी। दांत भी नहीं टूटे होंगे। लेकिन ठोढ़ी कितनी फूटी होगी ? उसका सुर तो निकल रहा होगा ? और  उसकी मां ? वो  पागल हारमोनियम ? उसकी धौंकनी को क्या हुआ ? सोचा भी नहीं कि बिना जुगलबंदी के, बिना सरगम के, घर क्या सचमुच घर रह जाएगा ? क्या अब हम दीवारों के बीच के सन्नाटे को सुनेंगे ? वैसे, अगर सन्नाटे का कोई संगीत होता होगा, तो वह ज़रूर पागल कर देता होगा।
अस्पताल पहुंचने में अभी और कितना समय लगेगा ?
कथादेश से साभार

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

हिन्दी नवजागरण और स्त्री

अंजली पटेल

,गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोधरत

है. Email : anjalipatelbindki@gmail.com

नवजागरणएक कालवाची शब्द है, जहाँ इसकी पृष्ठभूमि विभिन्न आन्दोलनों से जुड़ती है तो वहीं स्त्री उत्थान की दृष्टि से भी यह कालखण्ड अपना विशेष महत्त्व रखता है।नवजागरण शब्द के अर्थ पर यदि विचार किया जाये तो हमें ‘नवीन चेतना’ का बोध होता है।यह चेतना किस प्रकार उस समय और समाज को प्रभावित कर रही थी? इस चेतना को विकसित रूप प्रदान करने में किन-किन साहित्यकारों एवं समाजसुधारकों का योगदान रहा है?उस समय ही इस चेतना के जागृत या विकसित होने की आवश्यकता क्यों हुई?क्या नवजागरण को स्त्री उत्थान के प्रस्थान बिन्दु के रूप में देखा जा सकता है?यहाँ नवजागरण को लेकर इन सब पक्षों पर विचार करना आवश्यक हो जाता है। उस समय समाज में साहित्य, संस्कृति और कला के क्षेत्र में स्त्रियों का भी योगदान कम महत्वपूर्ण न था। स्त्रियों ने उस समय हो रहे आन्दोलनों में बढ़चढ़ कर भाग लिया।यह वह दौर था जब स्त्रियोंपर वर्षों से हो रहे अत्याचार पर समाज सुधारकों का ध्यान गया और उन्होंने उनके अधिकारों को महत्त्व दिया। इसके लिए उन्होंने कई आन्दोलन किए, जिसमें न सिर्फ पुरुष, बल्कि खुद स्त्रियाँ भी खुलकर सामने आईं। इन स्त्री समाज सुधारकों के रूप में पण्डिता रमाबाई, ताराबाई शिंदे एवं रख्माबाईअग्रणीय हैं।


नवजागरण का आरम्भ 1857 ई. के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से माना जाता है। इस समय ही स्त्रियों द्वारा अपने अधिकार के लिए पूरे विश्व में एकजुट होकर आन्दोलन किया गया था। यही कारण है कि स्त्रियों द्वारा अपने हक़ के लिए सामूहिक रूप से किए गये इस प्रथम प्रयास को ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ के रूप मं  मनाया जाने लगा।भारत में नवजागरण का उदय सबसे पहले बंगाल और महाराष्ट्र राज्य में हुआ। बंगाल और महाराष्ट्र के समाज सुधारकों ने ही सबसे पहले समाज में फैली बुराइयों पर आव़ाज उठाना शुरू किया। इन समाज सुधारकों में राजाराममोहन राय, महादेव गोविन्द रानाडे, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद और केशवचन्द्र सेन आदि को देखा जा सकता है।नवजागरण शब्द का हिन्दी में पहली बार प्रयोग करने का श्रेय मार्क्सवादी आलोचक ‘रामविलास शर्मा’ को जाता है, जिन्होंने 1977 ई. में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और नवजागरण’ में नवजागरण शब्द की संकल्पना प्रस्तुत की है, यह शब्द उन्होंने अंग्रेजी शब्द ‘रेनेसां’ के पर्याय में प्रयुक्त किया है।भारत में नवजागरण का जनक ‘राजाराम मोहन राय’ को माना जाता है,जिन्होंने सती प्रथा,बाल विवाह,पर्दा प्रथा आदि घातक और अनिष्टकारी कुरीतियों का विरोध किया। हिन्दी नवजागरण काल से स्वामी दयानन्द सरस्वती जी का संबंधभी महत्वपूर्ण है। हिन्दी के विकास में उनका योगदान बहुत अधिक है एवं अन्धविश्वासों और रूढ़ियोंसम्बन्धी मतों का उन्होंने विरोध किया है। इस प्रकार हिन्दी नवजागरणमें स्वदेशीयता की भावना को उजागर करना,धार्मिक अन्धविश्वासों का विरोध करनाएवंसमाज सुधारआदि सभी बातें दिखाई पड़ती हैं।


नवजागरण में समाज में स्वतंत्र अस्तित्व की धारणा परिलक्षित होती है, जिसमें व्यक्ति विकास की ओर उन्मुख होता है।इस समय न केवल पुरुष, बल्कि स्त्रियों में भीअपने अधिकारों के प्रति जागृत भाव पैदा होता है। यही भावना विकसित होकर एक चेतना का रूप ले लेती है, जो नवजागरण में स्त्री उत्थान का प्रमुख कारण बनती है।चाहे वह 1829 ई. में सती प्रथा पर प्रतिबंध लगना हो या 1856 ई. का विधवा पुनर्विवाह कानून का पारित होना हो या फिर चाहे 1857 ई. की क्रान्ति, सब इसी चेतना का परिणाम हैं। नवजागरण में उपजी यह नई चेतना समाज में हर स्तर पर धीरे-धीरे अपना प्रसार कर रही थी। सामाजिक राजनीतिक, सांस्कृतिक व आर्थिक पहलू इससे प्रभावित हो रहे थे।पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान से प्रभावित एक नया बुद्धिजीवी वर्ग तैयार हो रहा था। इस बुद्धिजीवी वर्ग की आकांक्षाएँ पहले से काफ़ी भिन्न थी, जो कि ख़ुद हर तरफ़ बदलाव चाह रहा था। इस नये वर्ग को स्त्रियों की स्थिति में भी कुछ बदलाव की ज़रूरत महसूस हुई। इस नये वर्ग की आकांक्षाओं के अनुरूप स्त्रियों को ढ़ालने के लिए उनकी स्थिति में परिवर्तन करना आवश्यक था।यह परिवर्तन कुछ विशिष्ट गुणों, स्वभाव और विशेषताओं से युक्त स्त्री के रूप में परिलक्षित हो रहा था।लेकिन यहाँ पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि उन्हें उस समय ही स्त्रियों की स्थिति में सुधार लाने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?इससे पहले ऐसा प्रयास क्यों नहीं किया गया?इसको जानने के लिए राधा कुमार का यह कथन देख सकते हैं- “स्त्रियों की शिक्षा के आन्दोलनों का उल्लेख आम तौर से उभरते मध्यवर्ग द्वारा अपनी स्त्रियों को पाश्चात्य तौर-तरीकों में ढ़ालने की आवश्कता के रूप में किया जाता है।ब्रिटिश शिक्षा के प्रसार और पुरुषों को रोजगार के नए अवसरों के मद्देनज़र सार्वजनिक तथा निजी का विचार पैदा हुआ तथा दोनों के समन्वय स्थापित करने के बजाय, घर और संसार के बीच विरोध के स्वर उभरे। स्पष्ट शब्दों में कहा जाये तो घर एक पुण्य स्थान होने के बजाय परम्पराओं का मुर्दा बोझ ढ़ोता नज़र आया, जिसे फूहड़ और आदिम कहकर धिक्कारा गया।अतः इसे सुधारकर बाहरी दुनिया के साथ सौहार्द स्थापित करने की आवश्यकता दिखाई पड़ी।”1 इससे एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि पुरुष अपने स्वार्थसिद्ध हेतु स्त्रियों की स्थिति में सुधार व शिक्षापर बल देते हैं।इससे पहले समाज में फैली कुरीतियों को ख़त्म करने की ज़रूरत महसूस नहीं होती है।पुरुष वर्ग अपने हित के लिए ही इन स्थितियों में सुधार करने की कोशिश करता है।बहरहाल जो भी हो नवजागरण में स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन हेतु बात तो उठती है। वह किसी भी रूप में क्यों न हो।परिवर्तन की इस दिशा में स्त्री और उसका जीवन बहस का केन्द्रीय मुद्दा बनकर सामने आया। इस सन्दर्भ में राधा कुमार कहती हैं- “उन्नीसवीं सदी को स्त्रियों की शताब्दी कहना बेहतर होगा क्योंकि इस सदी में सारी दुनिया में उनकी अच्छाई, बुराई,प्रकृति, क्षमताएँ एवं उर्वरा गर्मा-गर्म बहस का विषय थे।”2 इस प्रकार नवजागरण को स्त्री आत्मचेतना का प्रारम्भिक चरण कहा जा सकता है।


नवजागरण काल स्त्री हित के दृष्टिकोण से इसलिए भी महत्वपूर्ण है,क्योंकि वर्षों से लगभग अभिशाप सी बनी ‘सती प्रथा’ को समाप्त करने की पहल ‘राजा राममोहन राय’द्वारा इसी समय की गई।वह पहले भारतीय थे जिन्होंने सती प्रथा के विरुद्ध आन्दोलन चलाया।1818 ई. में बंगाल के गवर्नर ‘विलियम बैंटिक’ ने प्रान्त में ‘सती प्रथा’ पर रोक लगाई थी और 1829 ई. में इस पर कानून बना दिया गया।बावजूद इसके हिन्दी नवजागरण में‘भारतेन्दु’ विधवा स्त्री के सती होने को प्रोत्साहित करते नज़र आते हैं।स्त्री के लिए भारतेन्दु का आदर्श क्या है, यह उनके ‘नील देवी’ नाटक के अंतिम वाक्य से समझा जा सकता है-“अब मैं सुखपूर्वक सती हुंगी।”3 यह है उनका आदर्श जहाँ स्त्री अपने पति के मृत्यु के बाद उसके हत्यारे से बदला लेकर सती हो जाती है, इससे अधिक भारतेन्दु की नज़रों में स्त्रियों केजीने की कोई उपयोगिता नहीं है। स्पष्ट है कि ‘सती प्रथा’ पर प्रतिबंध लग जाने पर भी उस समय के हिन्दी साहित्यकारों में स्त्री के प्रति सिर्फ सहानुभूति ही थी, उनके अधिकारों और मुक्ति की बात वह स्वीकार नहीं पाए थे।


नवजागरण काल में ही स्त्रियों को शिक्षित करने की पहल सबसे पहले ‘राजा राममोहन राय’ द्वारा स्थापित ‘आत्मीय सभा’ में की गई,क्योंकि किसी भी समाज का आधार-स्तम्भ वहाँ की स्त्रियाँ होती हैं।यदि समाज में सुधार लाना है तो आवश्यक हो जाता है कि पहले स्त्रियों की स्थिति में सुधार लाया जाये और इसके लिए स्त्री का शिक्षित होना जरूरी है।लेकिन नवजागरण में स्त्रियों कोशिक्षा देने की जो बात उभरकर सामने आती है उसका एक मात्र उद्देश्य था समाज में उदित हुए इस नये बुद्धिजीवी वर्ग के अनुरूप स्त्रियों को ढ़ालना। इन स्त्रियों को शिक्षित करने का उद्देश्य इन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना या आत्मनिर्भर बनाना नहीं था, बल्कि उन्हें उनके पतियों की अनुगामिनी बनाना था।इस बात का साफ़-साफ़ उल्लेख हमें नवजागरण के अग्रदूत कहे जाने वाले ‘भारतेन्दु’ के इस कथन से हो जाएगा- “लड़कियों को भी पढ़ाइए किन्तु उस चाल से नहीं जैसे आज-कल पढ़ाई जाती हैं जिससे उपकार के बदले बुराई होती है।ऐसी चाल से उनको शिक्षा दीजिए कि वह अपना देश और कुल धर्म सीखें।पति की भक्ति करें और लड़कों को सहज में शिक्षा दें।”4 भारतेन्दु के इस कथन से हमें उस समय की स्त्री शिक्षा की दशा समझ में आती है।तत्कालीन समाज में ‘स्त्री शिक्षा’को उतना महत्व नहीं मिल पाया था।उस समय लोगों की धारणा थी कि स्त्री को पढ़ाने से वह पथभ्रष्ट हो जायेगी, अतः उसे घर की चार-दीवारी में कैद करके रखा जाता था।उस समय समाज में जो स्त्री शिक्षा दी जा रही थी वह केवल उन्हें एक निपुण गृहिणी बनाने तक सीमित थी।प्रायः उनको रसोई में खाना बनाने व खर्च में मितव्ययता बरतने की शिक्षा दी जाती थी।इस प्रकार शिक्षा के नाम पर स्त्रियों को जो भी सिखाया जाता था वह सिर्फ पति और बच्चों की देखभाल करने और उन्हें खुश रखने तक ही सीमित था।



हिन्दी नवजागरण के आरंभिक दौर के उपन्यासों के केन्द्र में स्त्री शिक्षा ही रही है। जैसे- ‘देवरानी जेठानी की कहानी’, ‘भाग्यवती’, ‘वामा शिक्षक’ एक सीमा तक ‘परीक्षा गुरु’ आदि उपन्यासों में स्त्रियाँ ऐसे चरित्र के रूप में सामने आई हैं, जिनके माध्यम से तत्कालीन समाज व्यवस्था में सुधार की सम्भावना दिखाई पड़ती है।शिक्षा के प्रारूप एवं पाठ्यक्रम को लेकर सबकी एक ही राय थी। आदर्श शिक्षा वही जो लड़की को सुघड़, गृहिणी,समर्पिता पत्नी और कर्तव्य परायण माँ बनाये। उस समय के पाठ्यक्रम में हिन्दी के तत्कालीन दो उपन्यासों (‘देवरानी जेठानी की कहानी’-1870 व ‘भाग्यवती’-1879)को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया था। इन दोनों उपन्यासों के केन्द्र में स्त्री शिक्षा है। यह दोनों उपन्यास एक कुशल गृहिणी बनने के सभी गुणों को आधार बना कर लिखे गये हैं।श्रृद्धाराम फुल्लौरी अपने उपन्यास ‘भाग्यवती’ की भूमिका में लिखते हैं- “बहुत दिनों से इच्छा थी कि कोई ऐसी पोथी हिन्दी भाषा में लिखूँ कि जिसके पढ़ने से भारतखंड की स्त्रियों को गृहस्थ धर्म की शिक्षा प्राप्त हो, क्योंकि यद्यपि कई स्त्रियाँ कुछ पढ़ी लिखी तो होती हैं, परन्तु सदा अपने ही घर में बैठे रहने के कारण उनको देश-विदेश की बोल-चाल और अन्य लोगों से बात-व्यवहार की पूरी बुद्धि नहीं होती…और कई विद्या से हीन होने के कारण सारी आयु चक्की और चरखा घुमाने में समाप्त कर लेती हैं।”5 इसके अतिरिक्त ‘देवरानी जेठानी की कहानी’ में एक पढ़ी लिखी स्त्री और एक अनपढ़ स्त्री में क्या अन्तर होता है? इसको ध्यान में रखते हुए पण्डित गौरी दत्त ने इस पुस्तक की रचना की है। इस सन्दर्भ में उपन्यास की भूमिका में वे लिखते हैं- “पढ़ी और बेपढ़ी स्त्रियों में क्या-क्या अन्तर है, बालकों का पालन और पोषण किस प्रकार होता है, और किस प्रकार होना चाहिए, स्त्रियों का समय किस-किस काम में व्यतीत होता है।बेपढ़ी स्त्री जब एक काम को करती है, उसमें क्या-क्या हानि होती है। पढ़ी हुई जब उसी काम को करती है, उससे क्या-क्या लाभ होता है। स्त्रियों की वह बातें जो आज तक नहीं लिखी गई हैं, मैंने खोज कर सब लिख दी हैं।”6 उपर्युक्त कथनों से स्पष्ट होता है कि इन दोनों उपन्यासों में स्त्री को गृहस्थ कामों में दक्ष होने व अपने कुल की मर्यादा की रक्षा करने वाली शिक्षा दी गई।इस बात का समर्थन करते हुए इन दोनों उपन्यासों के संबंध में ‘रोहिणी अग्रवाल’ का कहना है- “दोनों उपन्यासों का सुर सत्यनारायण व्रत-कथा जैसा विशुद्ध उपदेशात्मक-लड़कियों को पढ़ाओगे तो कुल की मर्यादा, प्रतिष्ठा और समृद्धि बढ़ेगी, नहीं पढ़ाओगे तो आपसी कलह, द्वेष और मूर्खता के कारण स्त्री परिवार और संतान, वर्तमान और भविष्य सब को डुबो देगी। नाक कटेगी सो अलग।”7 स्पष्टहै कि हिन्दी नवजागरण में स्त्री शिक्षा को लेकर उस समय साहित्यकारों द्वारा जो लिखा जा रहा था, वह स्त्री उत्थान या उसके स्वतंत्र अस्तित्व के पक्ष में नहीं था।यहाँ यह विचारणीय है कि उस समय स्त्री शिक्षा को महत्व तो मिला, लेकिन वह शिक्षागृहस्थ धर्म, बच्चों का पालन-पोषण एवं कुल की मर्यादातक ही सीमित थी।


हिन्दी नवजागरण में ही ‘भाग्यवती’ उपन्यास में श्रृद्धाराम फुल्लौरी ने भारतीय स्त्रियों की दशा और उसके अधिकारों को लेकर क्रान्तिकारी विचार प्रस्तुत किए हैं।श्रृद्धाराम फुल्लौरी ने भाग्यवती के पिता पण्डित उमादत्त के माध्यम से बाल विवाह का विरोध कराया है।उपन्यास में उमादत्त जी पूरे तर्क के साथ बाल विवाह का विरोध करते हैं। उमादत्त अपने बेटे लालमणि का विवाह 18 वर्ष होने के पश्चात् करने की बात कहते हैंऔर अपनी बेटी भाग्यवती की 11 वर्ष की हो जाने पर, लेकिन उनकी पत्नी राजी नहीं होती है।वह भाग्यवती की शादी 7 वर्ष में ही करा देना चाहती थी। इस पर उमादत्त कहते हैं पहले विवाह बड़ी आयु में ही हुआ करते थे मगर जब से हमारे यहाँ मुस्लिमों का शासन हुआ। मुस्लिम शासक कुँवारी हिन्दू लड़कियों का अपहरण कर लिया करते थे, इस्लाम में विवाहित लड़कियों का अपहरण करना वर्जित था। इसलिए सात-आठ वर्ष में ही लड़कियों का विवाह कर दिया जाता था। पत्नी को समझाते हुए उमादत्त जी कहते हैं-“सो अब तो ईश्वर ने हमको उस महाराज अंग्रेज की प्रजा बनाया है कि जो कभी अन्याय नहीं करना चाहता फिर अब छोटी अवस्था में लड़की-लड़कों के विवाह करने में क्या प्रयोजन है?”8 इसमें लेखक ने उस समय समाज में हो रहे बाल विवाह को स्पष्ट तर्क के माध्यम से खत्म करने की बात की है। उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए बाल विवाह किए गए।लेकिन अब परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं, तो हमें भी बदलना चाहिए न कि रूढ़िवादिता को अपना लेना चाहिए।इस उपन्यास में चारदीवारी के अन्दर स्त्री के शिक्षित-अशिक्षित होने के प्रभाव का विश्लेषण नहीं किया गया, बल्कि घर से बाहर की स्थितियों को विवेक-बुद्धि के माध्यम से सुलझाते हुए चित्रित किया गया है।यद्यपि भाग्यवती की माँ रूढ़िवादी व संकीर्ण सोच की स्त्री के रूप में चित्रित की गई है, लेकिन वह स्वयं पढ़ी लिखी है।इससे वह भाग्यवती को घर पर ही कई विषयों का अध्ययन कराती है। उमादत्त समय-समय पर भाग्यवती की प्रगति रिपोर्ट की सूचना उसकी माँ से लेते रहते हैं।भाग्यवती की माँ पति उमादत्त को बेटी की शिक्षा की प्रगति-सूचना देते हुए बताती है-“सहस्त्रनाम गीता तो आप उससे सुन ही चुके हैं पर उसे पीछे मैंने उसको भाषा व्याकरण,ऋजुपाठ, हितोपदेश और शिक्षा-मंजरी पढ़ाई और अब वह भूगोल-खगोल नाम का ग्रन्थ पढ़ रही है और फिर मेरी इच्छा है कि थोड़ी गणित विद्या पढ़ा के पीछे से आत्मचिकित्सा आरम्भ करा दूंगी, क्योंकि उसके पढ़ने से प्राणी को लोक-परलोक दोनों भाँति के व्यवहार प्रतीत हो जाते हैं गृहस्थ धर्म और मनुष्य धर्म को सर्व प्रकार से जान लेता है…सच पूछो तो हमारी भाग्यवती के समान सीने-पिरोने में इस गली में की कोई लड़की भी चतुर नहीं।”9 इस प्रकार स्पष्ट है कि उस समय स्त्री को दी जाने वाली शिक्षा उसे एक कुशल गृहिणी बनाने पर बल देती थी।

भाग्यवती पढ़ी-लिखी व अपनी समझ-बूझ के कारण अपने ससुराल में बहुत ही सम्मान पाती है।घर का हर सदस्य उससे पूछ कर ही कार्य करता है।घर का कुशल प्रबंधन देख भाग्यवती की सास बहुत खुश होती है और उसे घर की सारी ज़िम्मेदारी सौंप देती है,भाग्यवती उसे बखूबी निभाती भी है।एक बार भाग्यवती के घर भ्रष्ट पुलिस वाले चोरी की तहकीकात के सिलसिले में रिश्वत लेने के उद्देश्य सेउसके घरवालों को धमकाते हैंतो भाग्यवती क़ानूनी भाषा का प्रयोग करते हुए कहती है- “क्यों जमादार जी! आपने हमारे घर की बदनामी या बदमाशी किस मिसल में लिख देखी है या आपको खुद ही हमारे घर पर कुछ शक हुआ है कि जिसके सबब हमारी तलाशी लोगे? अच्छा, हमको सरकारी हुक्म से कुछ उज्र और इनकार नहीं, पर आप हमको इतनी बात एक कागज पर लिख दें कि हम अपने आप इस घर की तलाशी लेते हैं और यह भी बता दें कि यदि हमारे घर से चोरी का कुछ माल बरामद न हुआ तो हम हत्तक की नालिश किस पर करें?”10 स्पष्ट है कि भाग्यवती के पढ़े लिखे होने के कारण ही वह अपने बुद्धि-चातुर्य के बल पर भ्रष्ट पुलिस वालों को अच्छा सबक सिखाकर उनको उन्हीं की भाषा में करारा जवाब देती है। यहाँ भाग्यवती का व्यक्तित्व इस बात को और पुष्ट कर देता है कि उस समय स्त्रियों को इसलिए ही शिक्षित बनाया जा रहा था कि वह अच्छी गृहस्थी चलाएँ और अपनी कुल-मर्यादा को बढ़ाएँ।



नवजागरण काल में सामाजिक स्तर पर स्त्री-मुद्दों को लेकर हो रहे आंदोलनों में स्त्री को एक ‘आदर्श हिन्दू स्त्री’ की रूढ़ि छवि में बांध दिया जाता है।ब्याह के बाद उस शिक्षित, सुयोग्य कुलवधू के लिए पितृ-पक्ष के पास बस एक ही उपदेश होता है, जिसमें उसे सिखाया जाता है कि पति और ससुराल पक्ष की सेवा करना और नितांत अभावों में रहकर भी कुल की मर्यादा को बनाए रखना।हिन्दी नवजागरण में स्त्री को केन्द्र में रखकर लिखे गए प्रमुख उपन्यास ‘देवरानी जेठानी की कहानी’ में भी यही बात सामने आती है।इस उपन्यास में छोटेलाल की पत्नी (जो कि पढ़ी-लिखी थी)के पिता का पत्र आता है उस पत्र में लिखा होता है-“मैं तुमसे उसी दिन प्रसन्न हूँगा जब मैं यह सुनूंगा कि तम्हारी ससुराल वाले तुमसे प्रसन्न हैं। तुम्हारा पढ़ना-लिखना उसी दिन काम आवेगा जब तुम अपनी सास की आज्ञा में रहोगी। अपने धर्म-कर्म पर चलना, ईश्वर को याद रखना। आए-गए का आदर-सम्मान करना, यह अच्छे कुल की बेटियों के धर्म हैं।”11 क्या एक स्त्री को इसलिए ही शिक्षित किया जाता है कि वह अपने ससुराल वालों की सेवा कर सके? पति धर्म व अतिथि धर्म निभा सके।क्या इसके अतिरिक्त उसके जीवन में शिक्षा का कोई महत्व नहीं है? यह सब पक्ष हिन्दी नवजागरण में स्त्री अस्तित्व और अस्मिता पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं, जो यह स्पष्ट करते हैं कि स्त्री सशक्तिकरण की जड़ें बुनियादी तौर पर इतनी खोखली क्यों हैं? समाज में यह रूढ़िवादिता आज इतनी हावी हो चुकी है कि न केवल पुरुष, बल्कि खुद स्त्रियाँ भी पति धर्म और ससुराल पक्ष में कुल की मर्यादा के लिए खुद को मिटा देने में गर्व का अनुभव करती हैं।

हिन्दी नवजागरण में ही स्त्री हित की बात करने वालों में ‘पण्डिता रमाबाई’ का नाम आता है। उनके लिए स्त्री-शिक्षा केवल कुशल गृहिणी बनने तक सीमित नहीं थी और न ही अक्षर-ज्ञान व हिसाब-किताब तक। वह ऐसी शिक्षा चाहती थीं, जो स्त्रियों को आत्मनिर्भर बनाए और सामाजिक कुरीतियों से लड़ने का बल प्रदान करे। इसी प्रकार ‘ताराबाई शिंदे’ और ‘रख्माबाई’ ने भी अपने-अपने विचारों से ‘बाल विधवा’ व ‘अनमेल विवाह’ को लेकर आन्दोलन किया।उनके इस तरह के उठाये गये कदमों का भारतीय नवजागरण के नेताओं ने साथ नहीं दिया और उसे एक तरह का अपवाद मानकर चुप रहे। साथ ही साथ हिन्दी पट्टी के समाज सुधारक व राजनेता उनकी विद्रोही प्रवृति को कुचलकर एक आदर्श हिन्दू पत्नी बनाने को दृढ़ रहे। इस सन्दर्भ में ‘दयानंद सरस्वती’ की इस टिप्पणी को देख सकते हैं- “लड़कियों की शिक्षा का चरित्र लड़कों की शिक्षा से भिन्न होना चाहिए…हिन्दू लड़की को हिन्दू लड़कों से भिन्न प्रकृति के कार्य करने होते हैं अतः मैं उस व्यवस्था को प्रोत्साहित नहीं करूँगा जो उन्हें उनके राष्ट्रीय चारित्रिक गुणों से वंचित कर दे। हम अपनी लड़कियों को ऐसी शिक्षा नहीं देंगे जो उनकी सोच को बदल दे।”12 विचारणीय है कि यहाँ भी बेटा-बेटी में भेद-भाव देखने को मिलता है जो आज तक नहीं बदल पाया है।महान समाज सुधारक ‘दयानंद सरस्वती’ का स्त्री-शिक्षा के प्रति यह दृष्टिकोण स्त्री हित के लिए कहीं से भी न्यायोचित नहीं जान पड़ता है।उस समय स्त्री-उत्थान के लिए सबसे जरूरी था स्त्री की सोच में बदलाव लाना और यह बदलाव स्त्री को शिक्षित करके ही लाया जा सकता था। परिणाम स्वरूप पुरुष वर्चस्व के चलते इन महिला समाजसुधारकों का विरोध किया गया और स्त्री-शिक्षा और उस समय के हिन्दी साहित्य में ऐसी विषयवस्तु को केन्द्र में रखा गया, जिससे स्त्रियाँ अपनी सोच को बदल न पाएँ और पति की दासता और गृहस्थ धर्म को ही सर्वोपरि मानती रहें।

यह विडम्बना ही है कि हिन्दी में नवजागरण युग की लेखिकाएँ एक ‘अज्ञात हिन्दू महिला’ (जिनकी 1882 में रचित पुस्तक ‘सीमंतनी उपदेश’ को डॉ धर्मवीर ने 1984 में खोज निकला) और ‘दुखिनीबाला’ (जिनकी 1915 से 1916 तक ‘स्त्री दर्पण’ में धारावाहिक के रूप में प्रकाशित पुस्तक ‘सरला:एक विधवा की आत्मजीवनी’ को प्रज्ञा पाठक ने 2005 में ‘कथादेश’ में प्रकाशित कराया)को साहित्यक परिदृश्य से गायब कर दिया जाता है। उनके लेखन को पुरुष के समकक्ष नहीं माना जाता है।स्त्रियों द्वारा अपने अधिकारों की मांग किए जाने पर उसे कठोरता से उपेछित कर दिया जाता था।उनका मानना था कि स्त्रियों को स्वतंत्र होकर निर्णय लेने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए। परिवार के दायरे के भीतर रहते हुए पुरुषों के हाथों से ही उद्धार होना चाहिए।‘सीमंतनी उपदेश’ की लेखिका पतिव्रता धर्म की आलोचना करते हुए कहती हैं-“ऐ नेक गरीब भोली हिन्दनियों, इस खुदमतलबियों के कहने को हरगिज न मानो। तुमको पतिव्रता महात्म्य सनाते हैं और तुम्हारे खाविंदों को कोकशास्त्र और नायिकाभेद और बहार ऐश और लज्ज्तुल निसा की पोथियाँ सुनाकर कहते हैं- इस दुनिया में जिसने दो चार दस बीस कन्याओं का संग नहीं उसका पैदा होना ही निष्फल है।”13 इससे स्पष्ट है कि हिन्दी नवजागरण में स्त्रियों को पतिव्रता रहने का पाठ पढ़ाया जाता था और पुरुष को एक नहीं कई स्त्रियों के साथ संबंध बनाने की बात कही जाती रही है।इस प्रकार उस समय स्त्रियों को घर के अन्दर व शिक्षा में पुरुष के समकक्ष रहनेके अधिकार नहीं थे।समाज में यही मानसिकता आज भी कार्य कर रही हैऔर यही मानसिकता स्त्री हित के लिए सबसे बड़ी मुसीबत है, जिसे दूर किए जाने की जरूरत है।


हिन्दी नवजागरण में स्त्री हित के लिए लड़ने वाली ‘अज्ञात हिन्दू महिला’ ने तमाम विरोधों के बावजूद हार नहीं मानी। वह समाज में पुरुषों का हित साधने के लिए महिलाओं को शिक्षा दिये जाने के तर्क को स्वीकार नहीं करती हैं। उन्हें स्त्री के लिए ऐसी शिक्षा चाहिए थी, जिससे वह अपना जीवन खुद सवाँर सके।स्त्री का किसी और पर आश्रित होना उन्हें स्वीकार्य नहीं था। यद्यपि वह पुरुषों की प्रगति का विरोध नहीं करती हैं। वह तो बस स्त्री-प्रगति के लिए चिंतित हैं।इस सन्दर्भ में अपने एक कथन में वह कहती हैं-“अगर कहो कि हिन्दुस्तानियों ने विद्या में बहुत तरक्की की है और इल्म हासिल किया है, बेशक माना। फिर हमें क्या, एक के खाना खाने से दूसरे का पेट नहीं भरता है।”14यहाँ लेखिका ने सिर्फ पुरुषों को ही बढ़ावा दिए जाने को गलत बताया है।उनकी नज़र में स्त्री को भी पुरुषों के समान प्रगति के सारे अवसर मिलने चाहिए।स्त्रियों के प्रति यही उपेक्षित भाव उसके पिछड़ेपन का प्रमुख कारण रहा है।

नवजागरण काल में स्त्रियों को एक वस्तु के रूप में देखा जाता रहा है, जिसे पुरुष जिस रूप में चाहे उसमें ढ़ाल सकता है। स्त्रियों की अपनी कोई इच्छा-आकांक्षा नहीं होती है, उनसे एक आदर्श पत्नी की तरह व्यवहार करने की कामना की जाती है।स्त्रियाँ ऐसा करती भी हैं, जिसे नवजागरण के समय के प्रमुख हिन्दी उपन्यास ‘परीक्षा गुरु’ में मदनमोहन की पत्नी में शत प्रतिशत घटित होते दिखाया गया है।वह अपने पति की सच्ची शुभचिंतक, सुख-दुःख की सच्ची संगिनी व हमेशा आज्ञा का पालन करने वाली पत्नी के रूप में दिखायी गई है।उसका अपना कोई नाम नहीं होता है वह ‘मदनमोहन की पत्नी’ के नाम से ही जानी जाती है। शुभचिंतक स्त्री जब अपने पति को कोई नेक सलाह देना चाहती है, तो उसे बड़ों की तरह दबाकर नहीं, बराबर वालों की तरह झगड़ कर नहीं, अपितु किस तरह विचार कर देती है, इसे इस कथन में देख सकते हैं- “छोटों की तरह अपने पति की पदवी का बिचार करके उनके चित दुःखित होनें का बिचार करके, अपनी अज्ञानता प्रकट करके, स्त्रियों को ओछी समझ जता कर धीरज से अपना भाव प्रकट करती है, परन्तु कभी लौटकर जवाब नहीं देती, बिबाद नहीं करती।”15 इसमें एक आदर्श स्त्री की छवि गढ़ने की कोशिश की गई है, जिससे वह कभी समानता व मुक्ति की बात न सोच सके।

स्त्री को हमेशा ही ऐसी शिक्षा दी जाती रही है कि पुरुष उससे श्रेष्ठ है।समाज में स्त्री की अपेक्षा पुरुष को ही अधिक सम्मान मिलता है। इसका कारण यह है कि समाज में पुरुष का ही वर्चस्व है, वह धन का उपार्जन करता है और उसकी एक छवि हम सब के मन में अंकित हो गई है।हिन्दी नवजागरण में भी यही भाव देखने को मिलता है। लाला श्री निवास दास कृत 1882 ई. में प्रकाशित उपन्यास ‘परीक्षा गुरु’में भी पतिव्रता धर्म चित्रित हुआ है।इस सन्दर्भ में उपन्यास की प्रमुख स्त्री पात्र मदनमोहन की पत्नी के कथन को देखा जा सकता है- “प्यारे प्राणनाथ! मैं आपकी हूँ और अपनी चीज पर उसके स्वामी को सब तरह का अधिकार होता है।”16 इससे यह स्पष्ट होता है कि वह अपने को चीज ( दासी ) समझने का अधिकार खुद पुरुष को दे रही है। पुरुष वर्ग तो ऐसा चाहता ही है।यहाँ विचारणीय बात यह है कि समाज में पुरुषों को सबसे ज्यादा सम्मान खुद स्त्रियों द्वारा ही दिया जाता है।तमाम व्रत-उपवास और जी हुजूरी स्त्रियाँ ही वर्षों से पुरुषों के लिए करती आई हैं। अतः जब तक स्त्रियाँ खुद पुरुषों की जी हुजूरी का विरोध नहीं करेंगी तब तक स्त्री-मुक्ति का सपना साकार नहीं हो सकता है।

नवजागरण काल में विधवा पुनर्विवाह के मुद्दे को उठाया जाता है, इससे पहले ऐसा कोई प्रयास नहीं किया गया था।लेकिन प्राचीन काल में विधवाओं के विवाह की प्रथा थी मगर वह विवाह मृत पति के छोटे भाई देवर से ही हो सकती थी।नवजागरण के समय में कई पुरुष सुधारकों ने विधवाओं के प्रति उदारता और करुणा का भाव दिखाया और विधवा पुनर्विवाह को उचित ठहराया है। सर्वप्रथम ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने 1856 ई. में विधवा पुनर्विवाह पर लगे प्रतिबंध को हटाने का अभियान चलाया, जिसमें वे काफ़ी हद तक सफल भी होते हैं। लेकिन समाज इसको पूरी तरह से स्वीकार नहीं कर पा रहा था।इस सन्दर्भ में भारतेन्दु के इस कथन को देख सकते हैं- “जो विधवा विवाह नहीं करती है, उसको पाप तो नहीं होता, पर जो नहीं करती, उसको पुण्य अवश्यक होता हैं।”17 स्पष्ट है कि समाज में यह धारणा थी कि जब एक विधवा स्त्री दूसरा विवाह करती है तो वह पाप की भागीदार बनती है।यहाँ विचारणीय यह है कि ऐसी मान्यताओं के चलते यदि कोई विधवा स्त्री अपना पुनर्विवाह कर भी ले तो क्या वह शोषित होने से बच जाएगी? उसके सामने वही परिस्थिति पुनः भी आ सकती है। इस सन्दर्भ में अज्ञात हिन्दू महिला का कहना है कि- “पुनर्विवाह करने की इच्छा करने वालियों को याद रखना चाहिए कि हमें भी शादी करने के पीछे इन्हीं के मानिंद रोना पड़ेगा। जहाँ हजार-लाख-करोड़ को ठोकर खाते देखा, हमको चाहिए कि हम भी अंधों के माफिक अपने तई गिरवें नहीं बल्कि देख के कदम रख उसको जीत लेवें।…हे प्यारी बहनों, वही काम करों जिससे तुम्हें इस दुनिया में सुख मिले। बड़े भारी दुखों की जड़ काम है। पहले काम को रोको। इसको रोकने की यह तजवीह है की जब इसका ख्याल पैदा हो तक इसके दुखों का ख्याल करो।”18 लेखिका के इस कथन पर यदि विचार करें तोस्पष्ट हो जाता है कि एक विधवा स्त्री को पुनर्विवाह करने से पहले अपने वैवाहिक-जीवन की समस्याओं पर विचार कर लेना चाहिए।

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि हिन्दी नवजागरण में स्त्री-उत्थान के लिए अनेक प्रयास किए गए। उस समय वर्षों से रूढ़ि बनी कुरीतियों को समाप्त करने के लिए अनेक आन्दोलन चलाये गये जो स्त्री हित की दृष्टि से कारगर साबित हुए।साथ ही स्त्रियों की सोच में बदलाव व उन्हें जागरूक करने के लिए स्त्री शिक्षा को महत्व दिया गया। वर्षों से चली आ रही सती प्रथा, बाल विवाह, परदा प्रथा आदि कुरीतियों को बंद कराया गया।इस प्रकार हिन्दी नवजागरण को स्त्री-उत्थान के प्रस्थान बिंदु के रूप में देखा जा सकता है।नवजागरण में एक तरफ जहाँ स्त्रियाँ अपने शोषण के प्रति आवाज उठा रही थीं, तो दूसरी ओर उस समय के पुरुष समाज सुधारक एवंसाहित्यकार स्त्री की ऐसी छवि गढ़ रहे थे जिसके सूत्र उनके शोषण से जुड़ रहे थे।उस समय के हिन्दी साहित्य में स्त्री को आदर्श पत्नी व कुलीन बहू जैसे चरित्रों से जोड़कर प्रस्तुत किया जा रहा था।इसका प्रभाव यह हुआ कि स्त्री के खुद के मन में भी उसकी यह छवि अंकित हो गई।परिणामस्वरूप स्त्री ने खुद ही आदर्श पत्नी व कुलीन बहू के संस्कारों को अपना लिया।आज स्त्री अगर शोषित या उत्पीड़ित है तो उसका एक कारण यह है कि स्त्री खुद अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों को चुपचाप सहन कर लेती है।जब तक स्त्री खुद अपने उत्पीड़न का प्रबल विरोध नहीं करेगी तब तक स्त्री, आदर्श पत्नी व कुलीन बहू जैसे तमगों के कारण उत्पीड़ित होती रहेगी।हिन्दी नवजागरण में रख्माबाई, पण्डिता रमाबाई एवं ताराबाई शिंदे जैसी स्त्री समाज सुधारकों ने ही स्त्री हक़ के लिए सर्वप्रथम प्रयास किए थे।जिसके परिणामस्वरूप उस समय स्त्री अपने अधिकारों के प्रति जागरुक हुई।जबकि उस समय के पुरुष समाज सुधारकों द्वारा स्त्री हित के लिए जो भी प्रयास किए गए वह कहीं न कहीं उनके खुद के स्वार्थ हेतु थे।

सन्दर्भ-सूची

1. कुमार,राधा, स्त्री संघर्ष का इतिहास, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण-2011, पृष्ठ संख्या- 39
2. वही, पृष्ठ संख्या-23
3. http://hindisamay.com/title= नील देवी/भारतेन्दु हरिश्चंद्र
4. सं.-ओमप्रकाश सिंह, भारतेन्दु हरिश्चंद्र ग्रंथावली- 6, प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, संस्करण- 2010, पृष्ठ                     संख्या-70
5. सं.- मधुरेश,  भाग्यवती, यश पब्लिकेशन्स, दिल्ली, संस्करण- 2012, पृष्ठ संख्या- भूमिका
6. http://hindisamay.com/title= देवरानी जेठानी की कहानी/पण्डित गौरी दत्त
7. अग्रवाल,रोहिणी, स्त्री लेखन:स्वप्न और संकल्प,राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण- 2012,            पृष्ठ सं-43
8. सं.- मधुरेश,  भाग्यवती, यश पब्लिकेशन्स, दिल्ली, संस्करण- 2012, पृष्ठ संख्या- 25
9. वही, पृष्ठ संख्या-  28-29
10. वही, पृष्ठ संख्या-101
11. http://hindisamay.com/title= देवरानी जेठानी की कहानी/पण्डित गौरी दत्त
12. कुमार, राधा, स्त्री संघर्ष का इतिहास, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण-2011, पृष्ठ संख्या- 72
13. सं.- डॉ. धर्मवीर, सीमन्तनी उपदेश, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण- 2006, पृष्ठ संख्या-112
14. वही, पृष्ठ संख्या- 44
15. दास, श्रीनिवास, परीक्षा-गुरु, नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली, संस्करण- 2012, पृष्ठ संख्या- 89
16. वही, पृष्ठ संख्या- 163
17. http://hindisamay.com/title= वैदिक हिंसा हिंसा न भवति/भारतेन्दु हरिश्चंद्र
18. सं.- डॉ. धर्मवीर, सीमन्तनी उपदेश, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण- 2006, पृष्ठ संख्या-88

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

अरे वे माँ नहीं, भारत की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश (हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ) थीं !

स्त्रीकाल डेस्क 
भारत की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश (हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट) लीला सेठ का कल निधन हो गया. वह 86 साल थीं और कल रात दिल का दौरा पड़ने से नोएडा स्थित निवास पर उनका निधन हो गया. उनके बेटे शांतुम के अनुसार ‘‘कल रात करीब दस बजकर 28 मिनट पर दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया.”
लखनऊ में वर्ष 1930 में जन्मी लीला सेठ भारत की पहली महिला थीं, जिन्होंने 1958 में लंदन बार की परीक्षा पास की थी. 1959 में उन्होंने कोलकाता  और पटना में कानूनी प्रक्टिस शुरू की और 19 साल बाद 1978 में दिल्ली हाई कोर्ट में पहली महिला न्यायाधीश बनीं. इसके 13 साल बाद हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनीं. 1995 मे उन्होने पुलिस हिरासत मे हुई राजन पिलाई की मौत की जांच के लिये बनाई एक सदस्यीय आयोग की ज़िम्मेदारी संभाली. 1998 से 2000 तक वे भारतीय विधि आयोग की सदस्य रही और हिन्दू उतराधिकार कानून में संशोधन कराया जिसके तहत संयुक्त परिवार मे बेटियों को बराबर का अधिकार प्रदान किया गया.2012 में निर्भया काण्ड के बाद बनी जस्टिस वर्मा कमिटी की वे सदस्य थीं.
लीला सेठ की आत्मकथा ‘आॅन बैलेंस’, हिन्दी अनुवाद ‘घर और अदालत’ बहुचर्चित आत्मकथाएं रही हैं. उन्होंने 2014 में प्रकाशित हुई किताब ‘टॉकिंग आॅफ जस्टिस: पीपुल्स राइट्स इन मॉडर्न इंडिया’ भी लिखी, जिसमें उन्होंने 50 साल से ज्यादा लंबे अपने कानूनी करियर में अपने सामने आए महत्वपूर्ण मुद्दों की बात की.2010 में उन्होंने एक किताब ‘वी द चिल्ड्रेन ऑफ़ इंडिया’ लिखी.
और हाँ, वे प्रसिद्द लेखक विक्रम सेठ की माँ थीं.