जेंडर की अवधारणा और अन्या से अनन्या

भावना मासीवाल
भावना मासीवाल महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में शोध छात्रा हैं संपर्क :bhawnasakura@gmail.com;
जब महिलाओं ने अपनी सामाजिक भूमिका को लेकर सोचना-विचारना आरंभ किया , वहीं  से स्त्री आंदोलन, स्त्री विमर्श और स्त्री अस्मिता जैसे संदर्भों पर बहस शुरु हुई । स्त्री आंदोलन में जहाँ एक ओर स्त्रियों की भूमिका को सामने लाने का प्रयास हुआ और उनकी सामाजिक, राजनैतिक भागीदारी को स्वीकार किया तो वहीं स्त्री विमर्श ने स्त्री को बहस के केंद्र में लाने का प्रयास किया । जिसमें एक ओर समाज में उसकी दोयम दर्जे की स्थिति को बताया तो दूसरी ओर उससे जुड़े मुद्दों को बहस के जरिए केंद्र में रखा गया । जिसमें स्वतंत्रता, समानता और अस्मिता जैसे प्रश्नों को उठाया गया । जेंडर का प्रश्न अस्मिता के प्रश्न के भीतर से ही उभरता है ,जो स्त्री को स्त्री के नजरिए से देखने की बात करता है । स्त्री और पुरुष की सामाजिक संरचना पर सवाल खड़ा कर समाज में बहस की मांग करता है । साहित्य में वहीं स्त्री दृष्टि से स्त्री के रचना क्रम की आलोचना की बात जेंडर के तहत की जाती है । जेंडर का संबंध एक ओर पहचान से है तो दूसरी ओर सामाजिक विकास की प्रक्रिया के तहत स्त्री-पुरुष की भूमिका से । जहाँ मनुष्य और मनुष्य के बीच अंतर किया गया और एक स्त्री और दूसरे को पुरुष कहा गया । जेंडर के संबंध मंु विस्तार से बात करने से पहले कुछ बातें विमर्श के संदर्भ में हो जाएं । सरल शब्दों में कहा जाए तो यह एक इनफार्मेशन है जो ज्ञान के रास्ते से होकर गुजरता है और हमें सोचने समझने का नजरिया देता है । हिंदी में विमर्श शब्द अंग्रेजी के ‘डिस्कोर्स’ का पर्याय है और ‘डिस्कोर्स’ लेटिन शब्द ‘Discursus (डिस्कर्सस) का, जिसका अर्थ है बहस, संवाद, वार्तालाप और विचारों का आदान-प्रदान । विमर्श को थोडा ओर जानने का प्रयास किया जाए तो ‘विकिपीडिया’ के अनुसार ‘The term Discourse describes a formal way of thinking that can be expressed thought language’. विचारों को सीधे व सरल रूप में भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त करना विमर्श हैं । ‘ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी’ में लिखित व मौखिक रूप में विचारों की अभिव्यक्ति को विमर्श माना तो अंग्रेजी विश्वकोश में मौखिक रूप में विचारों की अभिव्यक्ति व बातचीत को । बृहत प्रमाणिक शब्दकोश के अनुसार ‘विमर्श किसी स्थिति के सुधार या वर्ग आदि के अभ्युत्थान के लिए होने वाला वैचारिक मंथन है’। कोश से आगे देखें तो ‘फूको’ लिखते हैं विमर्श शब्दों व विचारों की प्रणाली है जो प्रकृतिस्थ (शांत) रूप से विचार, व्यवहार, विश्वास और अभ्यास के द्वारा व्यवस्थित ढंग से निर्मित होती है, जिसे बातचीत के दौरान हम इस्तेमाल करते हैं । (System of thoughts composed of ideas, attitude, courses of action, beliefs and practices that systematically construct the subject and worlds of which they speak.) फ्रांसिस हेनरी और कैरोल टाटर (Frances Henry and Carol Tator) विमर्श के संदर्भ में कहते हैं विमर्श ऐसी भाषा है जो सामाजिक आधार पर विषय के ऐतिहासिक अर्थ को खोलती है । यह सामाजिक पहचान की भाषा है । जो कभी ‘न्यूट्रल’ नहीं होती है क्योंकि यह व्यक्तिक व सामाजिक रूप से जुड़ी होती है । ‘Discourse is the way in which language is used socially to convey broad historical meaning. It is language identified by the social conditions of it use, by who is using it and under what condition. Language can never be ‘neural’ because it bridges our personal and social words.’ इस प्रकार विमर्श सामाजिक, ऐतिहासिक और आज के संदर्भों में सोचने, बहस करने व मौखिक संचार का एक तरीका है जो भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त होता है । जेंडर का प्रश्न भी विमर्श की इसी तकनीक को अपनाता है तथा जेंडर पर खुली बहस की मांग करता है ।

जेंडर शब्द का संबंध प्रारम्भ में भाषा में लिंग अर्थात स्त्रीलिंग व पुल्लिंग से रहा है । अन्य भाषाओं में जेंडर विभाजन की इस प्रक्रिया के तीन रूप स्त्रीलिंग (feminine), पुल्लिंग (masculine) और न्यूट्रल जेंडर का प्रयोग मिलता है तो हिंदी में स्त्रीलिंग व पुल्लिंग केवल दो रूपों का प्रयोग मिलता है वहीं वैदिक संस्कृत में देखते हैं तो एक तीसरा लिंग नपुंसकलिंग (उभयलिंगी) का प्रयोग भी भाषा में देखा जा सकता है । पश्चिम में तीसरे न्यूट्रल जेंडर विभाजन का आधार स्त्रीत्व व पुरुषत्व के समाज में निर्धारित गुणों से अलग स्वतंत्र पहचान का होना था तो वहीं संस्कृत में तीसरे लिंग से अभिप्राय स्त्रीत्व व पुरुषत्व के गुणों का साथ होना था । जो आज भी भाषाविज्ञान में देखा जा सकता है । स्त्रीत्व व पुरुषत्व शब्दों के प्रयोग के संदर्भ में अरस्तु ने कहा कि ‘ग्रीक विचारक ‘प्रोतागोरस’ (Protagoras) ने ही भाषा में स्त्रीत्व (feminine), पुरुषत्व (masculine) और न्यूट्रल शब्दों का प्रयोग संज्ञा के वर्गीकरण के संदर्भ में किया’। भाषा में जेंडर की यह विभाजन प्रक्रिया व्यवहार मूलक थी जैसा कि चार्ल्स होकेट (Charls Hockett) ने कहा ‘शब्दों के व्यवहार के आधार पर संज्ञा का वर्गीकृत विभाजन जेंडर (genders) है’। भाषा के संदर्भ में भले ही जेंडर का प्रयोग शब्दों के व्यवहारमूलक प्रयोग पर आधारित था लेकिन सामाजिक संदर्भों को भी भाषा से अलग करके नहीं देखा जा सकता जैसा कि ‘बारबरा जानसन का मानना था कि जेंडर (स्त्री) का सवाल भाषा का सवाल है क्योंकि भाषा भौतिक रूपों में हस्तक्षेप करती है’।

सामाजिक परिप्रेक्ष्य से पूर्व जेंडर का संबंध भाषा से था जो आज भी है । अब यदि सामाजिक संदर्भों में इसे देखने का प्रयास करें तो जेंडर का संबंध लिंग (सेक्स) से है या कहा जा सकता है कि आज भी जेंडर को लिंग ही माना जाता है । जिस तरह भाषा में शब्दों के वर्गीकरण के लिए उनके सामाजिक व्यवहार को आधार बनाया गया और उन्हें स्त्रीलिंग, पुल्लिंग व न्यूट्रल रूप में विभाजित किया गया उसी प्रकार सामाजिक संरचना में ‘सेक्स’ को सामाजिक प्रकिया के तहत स्त्री और पुरुष की निर्धारित भूमिकाओं में ढाला गया । स्त्री और पुरुष दोनों ही जैविक संरचना हैं यह सत्य है इन्हें बदला नहीं जा सकता । लेकिन इनकी पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक भूमिका का निर्धारण जब किया जाता है तो इनके अपने स्वतंत्र अस्तित्व पर प्रश्न अंकित हो जाता है, जिसका जवाब जेंडर देता है । ‘जेंडर अस्मिता के पहचान का सबसे मूक घटक है जो हमें स्त्री व पुरुष की निर्धारित सीमा को परिभाषित करने और दुनिया को देखने के नजरिए की नाटकीय भूमिका को बताता है’। यह केवल लिंगों के बीच के अंतर को नहीं बताता वरन सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक स्तर पर सत्ता से इसके संबंध को भी परिभाषित करता है, सत्ता से लिंग व जेंडर का संबंध केवल आज के संदर्भों में ही नहीं बताता बल्कि इतिहास में स्त्री की भूमिका से उसे जोड़कर देखता है ।

सामाजिक संदर्भों में जब हम जेंडर की बात करते हैं तो इसका पहला प्रयोग लिंग (Sex) और लिंग की भूमिका (Sex Role) के अंतर को स्पष्ट करने के दौरान सामने आता है ,जहाँ स्त्री और पुरुष का जैविक आधार पर विभाजन न होकर समाज द्वारा तय मानदंडो पर विभाजन है । जिसमें स्त्री की भूमिका शोषित की रही तो पुरुष की शोषक की । जिसका जिक्र 1845 में  मारगरेट फूलर की Women in the Nineteenth Century, 1851 में  हैरिस्ट टेलर मिल की ‘इन फ्रेनचीसमेन्ट ऑफ वुमेन’( Enfranchisement of Women (, 1865 में जॉन स्टुअर्ट मिल’ की ‘A Subjection of Women’, 1884 में फ्रेडरिक ऐगल्स की ‘परिवार निजी संपति और राज्य की उत्पति’ पुस्तकों में मिलता है । लेकिन लिंग और लिंग की भूमिका पर पहले पहल बातचीत 1935 में सांस्कृतिक नृविज्ञानी (cultural anthropologist) मार्गरेट मीड (Margaret Mead) अपने शोध ‘Sex and Temperament in Three Primitive Societies’ में करती हैं.  वह  Papua New Guinea के Mundugamor (chambri), Arapesh and Tchamouli आदिवासी समाज के सेक्स और व्यवहार को लेकर लिखती हैं । उनके अध्ययन का केंद्र भले ही आदवासी समाज रहा हो मगर इसके साथ ही वह समाज में प्राकृतिक सेक्स और प्रशिक्षित सेक्स के बीच के अंतर को महसूस करती हैं ‘किस तरह एक समाज ऐसा है ,जहाँ महिलाएं गुलाम की भूमिका में हैं तो दूसरी और छाम्बरी आदिवासी समाज है ,जहाँ महिलाएं सत्ता में हैं और पुरुष गुलाम और कमजोर की भूमिका में हैं ’। मार्गरेट का यह विश्लेषण सेक्स और सेक्स की सामाजिक भूमिका की बात सामने लाता है । मार्गरेट ‘सेक्स’ और 'सेक्स की भूमिका’ के जिस विचार को सामने लाती हैं उसमें वह लिंग अर्थात ‘सेक्स’ आधारित श्रम विभाजन को प्राकृतिक मानती हैं । जबकि 1955 में मनोवैज्ञानिक और सेक्सोलोजिस्ट जान विलियम मनी इसे ख़ारिज करते देखें जा सकते है । सेक्स और सेक्स की भूमिका (जेंडर) के संदर्भ में मनी कहते हैं कि ‘जेंडर केवल स्त्री और पुरुष की सामाजिक स्थिति भर नहीं है बल्कि व्यक्ति पहचान और उसका निर्धारण है । यह केवल जेनेटिला पर आधारित नहीं बल्कि संकेत वैज्ञानिक और व्यवहारमूलक दायरे के अंतर्गत देखा जा सकता है, जो प्राकृतिक भिन्नता से इत्तर है’ ।

1940 से 60 तक आते-आते सामाजिक विभाजन की प्रक्रिया का यह विचार वैचारिक विमर्श को जन्म देता है । सेक्स और सेक्स की भूमिका पर अब वैचारिक रूप से लेखन होने लगता है । जिसमें 1949 में सिमोन द बोउवार का ‘द सेकंड सेक्स’, 1963 में केट मिलेट की ‘द फेमिनिन मिस्टिक’, 1968 में सुलामिथ फायर स्टोन की ‘डायलेक्टिक ऑफ़ सेक्स’, 1971 में जूलियट मिशेल की ‘वुमेन स्टेट’ जैसी पुस्तकें मुख्य हैं । सेक्स और सेक्स की भूमिका जैसे शब्द अब समाज में परिभाषित होने लगे थे लेकिन जेंडर शब्द का प्रयोग अब भी सामाजिक प्रक्रिया में उस रूप में नहीं देखा जा रहा था । 1968 में मनोवैज्ञानिक रोबर्ट स्टोलर (Robert jesse stoller) ने अपने शोध परियोजना कार्य के दौरान 85 मरीजों का अध्ययन किया । इस अध्ययन का केंद्र बिंदु सेक्स और जेंडर के बीच के अंतर को जानना व जेंडर पहचान के स्वतंत्र प्रश्न पर बात करना था । स्टोलर Sex and Gender: The Development of Masculinity and Femininity पुस्तक में सेक्स और जेंडर के बीच के अंतर पर बात करते हैं । स्टोलर ने ‘जेंडर का अर्थ प्रकृति से न मानकर मनोवैज्ञानिक व सांस्कृतिक संदर्भों से जोड़ कर देखा और कहा कि सेक्स का संबंध स्त्री और पुरुष से है तो जेंडर का संबंध स्त्रीत्व व पुरुषत्व से । ये दोनों ही शब्द लिंग की प्राकृतिक संरचना से स्वतंत्र अर्थ ग्रहण करते हैं’ जेंडर और कामुकता के संबंध में वह लिखते हैं ‘Those aspects of sexuality that are called gender are primarily culturally determined; that is learn postnatal’. रोबर्ट स्टोलर का यह अब तक का पहला स्वतंत्र अध्ययन था जिसमें लिंग और जेंडर को अलग-अलग रूपों में सामने लाया गया । साथ ही उन्हें परिभाषित किया गया । इसके साथ ही जेंडर और सेक्स को लेकर एक गहन चिंतन 70 के पास शुरू होता है । 1972 में ब्रिटिश समाजशास्त्री व नारीवादी लेखिका ऐना ओक्ले (Ann Oakley) की पुस्तक sex, gender and Society इसी चिंतन का आग़ाज थी । ऐना के अनुसार जेंडर सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना है, जो स्त्रीत्व और पुरुषत्व के गुणों को गढ़ने के सामाजिक नियम व कानूनों का निर्धारण करता है । 1980 में ऐना के विचारों से समाजशास्त्री विचारक Raewyn Connell सहमत नजर आती हैं । ‘कोनेल’ ने समाजिक दृष्टिकोण से लिंग और जेंडर के सामाजिक संबंध पर लिखा । उनका मानना था की जेंडर सामाजिक निर्मिति है जिसमें व्यक्ति की पहचान गौण होती है और समाज की भूमिका मुख्य ।

‘फ्रेंच इतिहासकार व विचारक मिशेल फूको (Foucalt) 1980 में अपनी पुस्तक‘The History of Sexuality’ में ज्ञान और सत्ता के चरित्र की बात करते हैं और बताते हैं कि किस तरह ज्ञान और सत्ता स्त्री को अनुकूलित करते हैं । फूको कहते हैं कि ‘It is important to examine the different ways in which women experience their bodies. Bodies are given role as a site for political struggle and shaped and trained by the networks of social and political power in which they exist. For example, men tend to be thought to take up space larger than women, while women are socialized to take up as little space as possible.’ शरीर एक ‘ऑब्जेक्ट’ है जिसे समाज, राजनीति व सत्ता अपने अनुसार बनाती व प्रशिक्षित करती है । जैसे पुरुष हमेशा से समाज में अपने लिए अधिक ‘स्पेस’ चाहता है वहीं स्त्री थोड़े से ही में खुद को संतुष्ट पाती है क्योंकि उसे ऐसी सामाजिक निर्मिती दी जाती है की वह बड़ा न सोच सके ।

अमेरीकन उग्र नारीवादी लेखिका एंड्रिया रीटा डोर्किन (Andrea Rita Dworkin) 1981 में अपनी पुस्तक Pornography: Men Possessing Women में लिखती हैं कि- हमारी संस्कृति में स्त्री शरीर का कोई भाग ऐसा नहीं है जो स्पर्श न किया गया हो बल्कि उसके लिए एक आदर्श और सुंदर शरीर की छवि निर्मित की गई है, जिसके अनुरूप उसे बनाए रखने का प्रयास समाज करता है । प्रारंभिक दौर में चीन में लड़कियों के पैरों को बांधकर रखना तो ब्रिटिशकाल में महिलाओं का अपने हाथों व शरीर के हरेक भाग का ढक कर रखना सामाजिक पहचान माना गया । जिसका उद्देश्य पुरुष समाज द्वारा आदर्श व सुंदर महिला की निर्मिति था । जिसमें सिर से पैर तक उसके शरीर को एक ऑब्जेक्ट के रूप में देखा व कला के जरिए सुधारा गया । यह प्रक्रिया आज भी दोहराई जा रही है ,जो एक स्त्री होने की शारीरिक और मनोवैज्ञानिक वास्तविकता भी है’। 
मानवशास्त्री और नारीवादी लेखिका ‘Lynda birke’ 1986 में अपनी पुस्तक women, feminism and Biology: The Feminist Challenges में सेक्स और जेंडर पर बहस के दौरान जीवविज्ञान को भी साथ में रखकर देखने की बात करती हैं जो कि मनुष्य के प्राकृतिक संबंधों को समझने का एक वैज्ञानिक नजरिया है । ‘सेक्स और जेंडर दोनों में से कोई भी स्थिर नहीं है । जिस प्रकार मानव शरीर अपने आसपास के सामाजिक वातावरण के अनुकूल परिवर्तित होता रहता है उसी प्रकार सेक्स और जेंडर भी’ ।

अमेरीकन विचारक और जेंडर सिद्धांतकार जूडिथ बटलर (Judith Butler ) 1988 में ‘Perfomative acts and gender constitution’ निबंध में लिखते हैं कि जेंडर का संबंध समाज द्वारा स्वीकृत क्रियात्मक उपलब्धियों व निषेध से है या कहें कि यह एक शैली है जो समाज द्वारा निर्धारित सकेतों, आंदोलनों व अधिनियमों के गठन के तरीके के रूप में देखी जा सकती है, जो एक प्रकार से स्वयं को समझने का भ्रम उत्पन्न करता है व  प्राकृतिक लिंग से अलग सामाजिक गतिविधियों व क्रियाओं के रूप में सामने आता है । बटलर के अनुसार यह सामाजिक क्रियाएं, कार्यकलाप और गतिविधियाँ स्वयं भी जेंडर की निर्मिति करते हैं ।
नारीवादी विचारक एलिसन जैग्गर सेक्स और जेंडर के संदर्भ में लिखती हैं ‘इंसान का हाथ श्रम का औजार ही नहीं, श्रम की उपज भी है ।’अर्थात मानवीय हस्तक्षेप बाहरी वातावरण को परिवर्तित करता है और साथ ही बाहरी वातावरण में होने वाले परिवर्तनों से मानव शरीर में परिवर्तन और उसका स्वरूप निर्धारित होता है । इसका संदर्भ है कि सेक्स और जेंडर दोनों ही ‘न्यूट्रल’ नहीं हैं बल्कि एलिसन और lynda के मत के अनुसार कहा जाए तो ‘परिवर्तनीय’ हैं ।
Acc to Encyclopaedia of women autobiography: - Gender is supposedly ‘inscribed’ by culture onto this already determined body, and the cultural associations that come with ones masculine or feminine gender are figured as the source of one’s sexualised subjectivity...It is therefore unnecessary to restrict gender options to only two possibilities (masculine and feminine) as gender does not need to follow the sexual binary. If we assume two sexes, there is still space for many gender identifications, opening up a space for non heterosexual gender identities.जेंडर संस्कृति द्वारा पहले से निर्धारित स्त्री–पुरुष शारीरिक संरचना के आधार पर किया गया विभाजन है । जो स्त्रीत्व व पुरुषत्व के सामाजिक विचार को गढ़ता है ।....जेंडर के संबंध में हम केवल दो संभावनाओं स्त्री-पुरुष पर ही बात करते हैं जबकि उससे इत्तर एक तीसरा जेंडर भी है जो इत्तरलिंगी है । वह भी जेंडर पहचान के प्रश्न से जूझता देखा जा सकता है ।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार- Gender Refers to the socially constructed roles behavior actives, and attributes’ that given society considers appropriate for men and women’
जैविक बनावट और संस्कृति के अंतरसंबंधों की समझ को अगर हम जेंडर पर लागू करें तो निष्कर्ष यही निकलता है कि महिलाओं के शरीर की बनावट भी सामाजिक बंधनों और सौन्दर्य के मानकों द्वारा निर्धारित की गई है । शरीर का स्वरूप जितना ‘प्रकृति’ से निर्धारित हुआ है उतना ही ‘संस्कृति’ से भी । इस प्रकार महिलाओं की  मौजूदा अधीनता, जैविक असमानता से नहीं पैदा होती है बल्कि यह ऐसे सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यों और संस्थाओं की देन है जिसका उदाहरण ज्यां जांक रूसो हैं । रूसो क्रांतिकारी राजनैतिक सिद्धांतों के सबसे जटिल बौद्धिक विचारक माने जाते हैं, स्त्रियों के संबंध में इनका कहना है ‘स्त्री का निर्माण पुरुष को खुश करने के लिए विशेष तौर पर हुआ है । ..पुरुष की विशेषता उसकी शक्ति है, वह ख़ुशी देता है क्योंकि वह शक्तिशाली है । मैं स्वीकार करता हूँ कि यह प्रेम का नियम नया नहीं है, यह प्रकृति का नियम है, जो कि खुद प्रेम से भी पुराना है.. यदि स्त्री का निर्माण पुरुष को खुश करने के लिए तथा उसके नियंत्रण में रहने के लिए हुआ है तो उसे ख़ुद को पुरुष की नजरों में अधिक आनंददाई बनाने की कोशिश करनी चाहिए, न की उसे नाराज करने की’ । इस तरह रूसो स्त्री की चारित्रिक शुद्धता और पतितत्व की समझ को मजबूत करते हैं साथ ही परिवार में ‘पावर’ अर्थात सत्ता के चरित्र को दिखाते हैं जिसका जिक्र ‘फूको’ ने भी किया है । रूसो के अनुसार बच्चों के संरक्षण के लिए ‘पत्नी के लैंगिक स्वातंत्र्य पर पूर्ण नियंत्रण की जरुरत है’।

भारतीय संदर्भ में जेंडर पर अभी बहस चल रही है । जिसमें कमला भसीन, उमा चक्रवर्ती, मैत्रयी कृष्णराज , शर्मिला रेगे और निवेदिता मेनन का नाम प्रमुख रूप से सामने आता है । कमला भसीन के अनुसार ‘जेंडर सामाजिक-सांस्कृतिक रूप में स्त्री-पुरुष को दी गई परिभाषा है, जिसके माध्यम से समाज उन्हें स्त्री और पुरुष दोनों की सामाजिक भूमिका में विभाजित करता है । यह समाज की सच्चाई को मापने का एक विश्लेषणात्मक औजार है’। मैत्रयी कृष्णराज लिखती हैं समाज में जितनी भी आर्थिक और राजनैतिक समस्याएं हैं उनका संबंध जेंडर से है । ‘जेंडर लिंग आधारित श्रम का विभाजन हैं जिसे पितृसत्ता ने सामाजिक अनुशासनों के द्वारा तय किया गया । जिसकी संकल्पना को परिवार और आर्थिक आधार पर खोजना अनिवार्य है । इसके अतिरिक्त जेंडर एक विश्लेषणात्मक श्रेणी है जो सामाजिक संरचना व उसके जटिल व्यवहारमूलक संबंधों को स्त्री-पुरुष के बीच के संबंधों से जानने का प्रयास करता है’। शर्मिला रेगे जेंडर को विचार की प्रक्रिया मानती हैं साथ ही ऐसा वर्ग है जिसमें कुछ संबंधों को रखा जाए और उनसे निर्मित संबंधों को जाना जा सके । उमा चक्रवर्ती भी सामाजिक संरचना को स्त्री की निर्मिती का कारण मानती हैं–‘स्त्री का परिवेश उसकी पराधीनता की प्रकृति को तय करता रहा है’। निवेदिता मेनन भी जेंडर को सामाजिक निर्मिती का ही रूप मानती हैं साथ ही उनका मानना है की जेंडर की यह अवधारणा भारत में पहले से मौजूद रही है यह आधुनिक सभ्यता की देन नहीं है बल्कि ‘प्राक आधुनिक भारतीय संस्कृति में विभिन्न प्रकार की यौन पहचानों के लिए कहीं अधिक व्यापक स्थान उपलब्ध था मसलन उस काल में हिजड़ों के पास भी एक सामाजिक स्वीकार्यता मौजूद थी जो समकालीन समाज में नहीं है । सूफी और भक्ति परम्पराएँ उभयलैंगिकता पर आधारित थी जो अकसर द्विलिंगी मॉडल को खारिज करते थे । दो शताब्दी पहले शिवभक्त देवरा दासीमय्या ने लिखा था–यदि स्तन और लंबे बालों को देखते हैं / तो वह उसे स्त्री कहते हैं / अगर उन्हें दाढ़ी मूंछ दिखाई देते हैं/ तो वह उसे पुरुष कहते हैं / लेकिन भीतर देखो / इन दोनों के बीच जो आत्मा है/ वह न स्त्री है न पुरुष है ..’ ।  भारतीय भाषाओं में इस तरह के कई उदाहरण देखे जा सकते हैं जो यह बताते हैं कि भारत में ‘लिंग’ और ‘जेंडर’ के अंतर को स्पष्ट करता विचार पहले से मौजूद रहा है । सेक्स और जेंडर के बीच के अंतर और समाज में निर्धारित उनकी भूमिका पर यदि बात करें तो इसका अध्ययन जेंडर के अंतर्गत किया जाता है ।

प्रभा खेतान 
 जेंडर शब्द की उत्पति व उसके प्रयोग के संदर्भ में अलग-अलग मतों को अब तक जाना व समझा गया । विभिन्न भाषा वैज्ञानिक, समाजशास्त्री, इतिहासकार, मनोवैज्ञानिक, नृविज्ञानी, मानवशास्त्री, जीव वैज्ञानिक व नारीवादियों द्वारा जेंडर के संदर्भ में जो कहा गया उसे देखने और समझने का हमने प्रयास किया । जिसके आधार पर जेंडर को परिभाषित किया जा सकेगा । जेंडर की अपनी कोई मुकम्मल परिभाषा नहीं है कुछ ने इसे भाषा के संदर्भ में देखा तो कुछ ने सामाजिक संदर्भों में इसके अतिरिक्त जेंडर को इतिहास, संस्कृति, प्रकृति, सेक्स और सत्ता से जोड़कर भी देखनें व समझने का प्रयास किया गया । स्त्री के संदर्भ में हमेशा से माना गया कि वह एक ‘ऑब्जेक्ट’है फिर वह चाहे पाश्चात्य में किर्केगार्द हो ‘जिन्होंने नारी को जटिल रहस्मय सृष्टि माना’ या फिर नीत्शे ‘जिसने माना कि नारी पुरुष का सबसे पसंदीदा या कहें कि खतरनाक खेल है’, वहीं रूसो ने ‘स्त्री की निर्मिति पुरुष को खुश करना स्वीकारा’। भारतीय संदर्भों में भी स्त्री को ‘सेक्स ऑब्जेक्ट’ के रूप में देखा व स्वीकारा गया जहाँ उसकी उपयोगिता पुरुष को खुश करने तक ही सीमित थी । महादेवी वर्मा लिखती हैं ‘स्त्री न घर का अलंकार मात्र बनकर जीवित रहना चाहती है, न देवता की मूर्ति बनकर प्राण प्रतिष्ठा चाहती है । कारण वह जान गई है की एक का अर्थ अन्य की शोभा बढ़ाना है तथा उपयोग न रहने पर फेंक दिया जाता है तथा दूसरे का अभिप्राय दूर से उस पुजापे का देखते रहना है, जिसे उसे न देकर उसी के नाम पर लोग बाँट लेंगे’। सामाजिक विकास की प्रक्रिया में सक्रिय प्रागैतिहास कालीन, वैदिक कालीन, ब्राह्मण कालीन सामाजिक व्यवस्था से लेकर आज के समय तक जब भी हम स्त्री के परिप्रेक्ष्य में बात करते हैं तो उसे पराधीन व सेक्स आब्जेक्ट के रूप में व्याख्यित करते या देवत्व के बोझ तले खुद के अस्तित्व को दम तोड़ते हुए देखते हैं । इस तरह स्त्री अस्मिता का प्रश्न स्त्री होने के साथ ही कहीं गौण होता गया । अब सोचनीय विचार है की स्त्री होना क्या है ? जिसका जिक्र सिमोन भी करती हैं कि ‘स्त्री पैदा होती नहीं बल्कि बनाई जाती है’। सामाजिक नियमों व क्रियाओं के अनुरूप सामजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक आधार पर मनुष्य-मनुष्य में भेद करना और एक को स्त्री और दूसरे को पुरुष रूप में सामाजिक मान्यता देना जैसी सामाजिक प्रक्रिया के पीछे जो सामाजिक ‘कंडीशनिंग’ काम करती है और जिसका प्रभाव संकोची, कमजोर, शांत, लज्जाशील व अन्य स्त्रियोचित गुणों में ढालने की प्रक्रिया से है जो प्राकृतिक नहीं मानवीय प्रक्रिया के तहत होती है । सामाजिक आधार पर कंडीशनिंग के कारणों को जानना व उसका विश्लेषण जेंडर है ।

जेंडर एक तकनीक या कहें की विश्लेषण का ‘टूल’ है, जिससे टेक्स्ट के साथ-साथ उसके परिवेश व उसमें स्त्री की भूमिका को विभिन्न सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं सत्ता की नीतियों के आधार पर समझा जा सकता है । जो समाज में ‘स्त्री’ होने की नाटकीय भूमिका को निर्मित करता है जिसे ‘सोशल कंडीशनिंग’ भी कहा जाता है । कंडिशनिंग की इस प्रक्रिया को जेंडर के अंतर्गत समझाने का प्रयास किया जाता है । सार्वभौमिक रूप में देखा जाए तो जेंडर के संदर्भ में स्त्री कंडीशनिंग एक समान रूप से होती है भले ही तरीके अलग-अलग हो क्योंकि स्थान, परिवेश व भाषा का भी इसमें अहम् योगदान रहता है ।    सामाजिक रूप में जहाँ जेंडर समानता का प्रश्न प्रमुख रूप से उभरा तो वहीं लेखन में भी इसको लेकर एक बहस चली । 18 वी शताब्दी में जब आत्मकथा लेखन प्रारंभ हुआ, तब माना गया कि आत्मकथा किसी विराट व्यक्ति की हो सकती है । शायद ही तब किसी ने कल्पना की हो कि साधारण व्यक्ति और उसका जीवन भी आत्मकथा का केंद्र बन सकता है । स्त्री ने जब लिखना शुरू किया तो लिखने के साथ ही पहली प्रतिक्रिया उसे जेंडर विभेद की मिलती है । जहाँ उसके लेखन को धमाके के रूप में देखा जाता है । हिंदी में आत्मकथा लेखन अन्य भाषाओं की तुलना में देरी से होता है । बांग्ला में जहाँ 1865 में रसा सुंदरी देवी अपनी आत्मकथा ‘अमार जीवन’ लिखती हैं तो हिंदी में 62 साल बाद 1927 में स्फुरना देवी ‘अबलाओं का इंसाफ’। आज़ादी से पूर्व जहाँ हिंदी में केवल दो स्त्री आत्मकथाएं आती हैं तो आज़ादी के उपरांत बढ़कर तीन होती हैं, परंतु वहीं 1990 के बाद अस्मितामूलक चिंतन का प्रभाव कहा जाए या अस्मिता के पहचान का प्रश्न जिसने हमें इन 23 सालों में 30 से भी अधिक स्त्री आत्मकथाओं से परिचित कराया । जिनमें हिंदी की अपनी अठारह आत्मकथाएं हैं, जो साहित्यिक व गैर साहित्यिक दोनों रूपों में हमारे समक्ष आती हैं । हिंदी आत्मकथा विधा में प्रभा खेतान के द्वारा लिखी गई आत्मकथा अन्या से अनन्या का महतवपूर्ण स्थान है । हिंदी में स्त्रियों के द्वारा लिखी गई आत्मकथाओं में निजी और सार्वजनिक जीवन के बीच की दरारें कम ही उजागर होती हैं अन्या से अनन्या ऐसी आत्मकथा है जिसमें ये दरारे पूर्ण रूप से उभरी हैं । यह सिर्फ आत्मकथ्य ही न होकर राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक संदर्भों का स्त्री जीवन पर भिन्न-भिन्न तरीके से पड़ने वाले प्रभावों का दस्तावेज भी है । मेरे इस शोध आलेख का केन्द्रीय बिंदु भी यह आत्मकथा है । जेंडर विमर्श के विभिन्न आयामों के परिप्रेक्ष्य में अन्या से अनन्या आत्मकथा का मूल्यांकन करना इस शोध आलेख का ध्येय है । जेंडर के सामाजिक और राजनैतिक पहलू पर सुधा सिंह लिखती हैं–‘जेंडर विमर्श राजनैतिक विमर्श है यह देशकाल वातावरण से अलग नही हो सकता है । जेंडर व्यवहार मूलक सामाजिक निर्मिती है, इसमें केवल स्त्री ही शामिल नहीं है । पुरुष और स्त्री के समलैंगिक संबंध और उसकी जटिलताएँ भी शामिल हैं’। जेंडर विमर्श का यह स्वरूप आत्मकथाओं में भी देखा जा सकता है । आत्मकथा केवल व्यक्ति विशेष की जीवन गाथा ही नहीं बल्कि दूसरों के साथ जीवन प्रसंगों का साझा है । आत्मकथा का यदि विग्रह करते हैं तो, भी पाते हैं कि ‘आत्म’ अपना है ‘कथा’ सबकी जैसा की प्रेमचंद ने माना कि आत्मकथा का संबंध यथार्थ से है जिससे लेखक स्वयं तो आहत होता ही है उसका परिवेश भी उससे अछूता नहीं रहता ‘अभी तो यह यथार्थ का बड़ा-सा पत्थर, कवि के हृदय पर । इस पत्थर से कवि कभी खुद लहूलुहान होता है, तो कभी इसे बाहर फेंककर अपने परिवेश को घायल करता है’। इस प्रकार जेंडर का अध्ययन आत्मकथाओं के जरिए अधिक सटीक रूप में किया जा सकता है ।

प्रभा खेतान की आत्मकथा ‘अन्या से अनन्या’ का अध्ययन किया जाए तो जेंडर असमानता के इस मूल चरित्र को उसके पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक रूप में आत्मकथा दिखाती है । प्रभा खेतान स्वयं विमर्श की पैरोकार रही हैं- स्वतंत्र व्यक्तित्व व आजीवन अविवाहित रहकर विवाह संस्था को चुनौती, विवाहित पुरुष से प्रेम कर बहिष्कार को स्वीकारना, व्यवसाय में स्त्री होकर सफल रहना उनके संघर्ष को चित्रित करता है । आत्मकथा के शुरूआती पृष्ठों में वह भारतीय समाज में स्त्री अस्मिता का प्रश्न उठाती हैं । जहाँ पहचान की यह समस्या पुरुष के समक्ष नहीं आती उसकी पहचान स्थायी होती है । स्त्री की तो पहचान ही उसकी अपनी नहीं, पहले पिता, फिर पति अगर दोनों ही न हो, यह विचारणीय प्रश्न है । जेंडर के संदर्भ में समझा जाए तो स्त्री को सदा ही समाज ने कमजोर व आश्रित माना व बनाया जिसके लिए पहले पिता फिर पति के संरक्षण की व्यवस्था की गई। जेंडर विमर्श में स्त्री का स्त्री होना ही आज सबसे बड़ा प्रश्न बनकर उभरता है । उसका अपना व्यक्तित्व स्वतंत्र कहाँ  है ? जिस स्त्री की बात हमारा समाज करता है वह समाज निर्मित है जैसा की जर्मेन ग्रीयर लिखती हैं ‘खुद प्रकृति भी हमेशा ही स्पष्ट नहीं होती । कभी-कभी कन्या शिशु का भगशिशन ऐसा सुविकसित होता है कि उसे लड़का मान लिया जाता है इसी तरह, कई बालक अविकसित होते हैं, या उनके जननांग विरूप या छिपे होते हैं, और उन्हें लड़की मान लिया जाता है’। जब प्रकृति ही स्त्री-पुरुष की लैंगिक संरचना को उनके व्यक्तित्व का आधार नहीं बनाती तो समाज क्यों ? फिर यदि स्त्री पितृसत्ता द्वारा निर्मित छवि को पहचान जाती है और उससे अलग होकर जीने की चाह रखती है तो समाज उसे जीने नहीं देता । प्रभा खेतान पहचान के जिस प्रश्न को बीसवी सदी में उठाती है उनसे पहले यूरोप में इब्सन अपने नाटक ‘डॉल हाउस’ में नोरा के माध्यम से स्त्री पहचान की बात करते देखे जाते हैं ‘..मेरा अस्तित्व सिर्फ तुम्हारा जी बहलाने और तुम्हें खुश करने के लिए है और तुम भी मुझे अपनी ख़ुशी का खिलौना बनाए रखना चाहते हो ... जबकि मेरा भी अस्तित्व है ‘पत्नी और माँ की इस भूमिका से भी पहले मैं एक इंसान, ठीक वैसे ही, जैसे तुम हो’। समाज में व्यक्ति पहचान का संबंध एक और कर्तव्यों से रहा तो दूसरी और सेक्स आधारित भेद से । ऐसे में व्यक्ति की अपनी पहचान का प्रश्न तो बना रहा । प्रभा खेतान समाज के नियम व  कानूनों को अस्वीकारती हैं और अपनी पहचान की मांग करती है जो समाज उन्हें नहीं दे पाता । समाज की डायरी में स्वतंत्र और आत्मनिर्भर स्त्री के लिए कोई निर्धारित मानक नहीं हैं । ऐसे में प्रभा खेतान का समाज और उसके निर्माताओं से प्रश्न करना जायज है -‘मैं प्रभा खेतान, मैं कौन हूँ, मेरी कोई पहचान नहीं  है? मैं सधवा नहीं, क्योंकि मेरी शादी नहीं हुई, मैं विधवा नहीं...क्योंकि दिवंगत पति नहीं, मैं कोठे में बैठी रंडी भी नहीं ...क्योंकि मैं अपने देह का व्यापार भी नहीं करती स्वावलंबी हूँ अपना भरण-पोषण ख़ुद करती हूँ । स्वेच्छा से एक जीवन का वरण किया है ।

 परिवार ‘जेंडर इजेशन’ की पहली धूरी  है । ‘घर बैठों राई जीरा चुनों, सिलाई-कढ़ाई करो ..सुई में धागा ठीक से पीरों अरे तेरा हाथ क्यों कांपता है, सीधी बैठो कूबड़ मत निकालों’, इसी तरह शिक्षा में यह भेदभाव ‘..मुझे अपनी बेटियों की कोई नौकरी नहीं करानी है ? इन्हें कोई मेंम बनाना है; घर में रहे, घर का काम सीखे’। यह तमाम उदाहरण व क्रियाएं जेंडर निर्मिति में सहायक होते हैं । जुडिथ बटलर ने इसे परर्फोर्मिटी अर्थात नाटकीयता कहा । जिसे समाज में अलग-अलग रूपों में स्त्री निभाती है । जिसका निर्देशक सत्ता व समाज है जो शारीरिक व मानसिक रूप से उन्हें अपनी आवश्यकता अनुसार निर्देशित करता है । जिनमें उन तमाम गतिविधियों को शामिल किया जा सकता है जो केवल एक स्त्री के लिए समाज द्वारा निर्धारित किए जाते हैं । यह सोच हमें प्रभा खेतान के परिवेश पर निगाह डालने पर मजबूर करती है । प्रभा खेतान मारवाड़ी परिवार से थी । उनके लेखन में मारवाड़ी संस्कृति व समाज का प्रभाव दिखाई देता है । उनका लेखन भले ही उनके परिवेश की सीमाओं को लांघता दिखाई देता है परंतु उनका अपना अस्तित्व परिवार व समाज से संकुचित होता देखा जा सकता है । फिर चाहे वह माता-पिता का उनके प्रति व्यवहार हो या समाज में अविवाहित रहकर विवाहित पुरुष से स्थापित संबंध हो । वह समाज व स्वयं का विरोध सहती हैं । स्वयं के किए पर ग्लानि का भाव आना उनकी मानसिक और सामाजिक स्थिति को दिखाता है कि स्त्री का स्वयं के प्रति लिए गए निर्णयों को समाज स्वीकार नहीं करता वह उसे मानसिक रूप से अपने किए पर शर्मिदा महसूस कराने का प्रयास करता है ।  समाज में धर्म को जीवन सत्य के रूप में स्वीकारा गया है । जहाँ महिलाएं सदा से धर्म परायण रही हैं । आत्मकथा में प्रभा खेतान प्रश्न उठाती हैं कि स्त्री ही आखिर क्यों विवाह के पहले अपना नाम और धर्म बदलने को मजबूर होती है । क्यों समाज में यह जेंडर विभेद है । आत्मकथा की एक पात्र आइलिन का कहना था ‘मेरा तलाक हुआ । उतनी बार मैंने नया धर्म अपनाया । कोई ख़ुशी-ख़ुशी थोड़े ही धर्म बदलता है । देरिदा ने जिसे ‘डीकंस्ट्रक्शन’ कहा और भाषा के बाइनरी रूप में जाकर उसके अध्ययन की बात की । आइलन का वाक्य उसकी तह तक जाने की बात करता है । आखिर समाज की निर्मिती में स्त्री के लिए ही परिवर्तित होने के नियम क्यों बनाए गए हैं ?

स्त्री और पुरुष शरीर के केवल एक गुणसूत्र के अलग होने से हम स्त्री के व्यक्तित्व को पूर्णतः पुरुष से अलग कर देते हैं जबकि ऐसा नहीं है यह शारीरिक संरचना भर है । जिसका जिक्र जर्मेन ग्रीयर करती हैं –‘शैशव से ही जिन ‘सामान्य’ लैंगिक भूमिकाओं को निभाना हम सीखते हैं वे किसी विपरीत वेषधारी के करतबों जितनी ही सामान्य हैं । सामान्य और वांछनीय माने जाने वाले आकारों और आचार-व्यवहार के अरीब-करीब पहुँचने के लिए स्त्री और पुरुष खुद को विरूप बनाते हैं और इस क्रम को न्यायसंगत ठहराते हुए दोनों लिंगों के बीच के अनुवांशिक अंतर का तर्क देते हैं लेकिन अड़तालीस गुणसूत्रों में से एक ही गुण सूत्र अलग है और इस अतंर को हम स्त्री और पुरुष के पूरे अलगाव का आधार बनाते हैं जैसे कि अड़तालीस के अड़तालीस गुणसूत्र अलग अलग हों’। आत्मकथा में देखें तो इसी शरीरिक संरचना के आधार पर पहले तो उसे स्त्री माना गया फिर समाज द्वारा स्वीकृत और निर्धारित उन सभी मानदंडों को उस पर थोपा गया जो उसके लिए बनाए गए जैसे स्त्री का स्त्री के प्रति देखने का नजरिया व स्त्री का ही स्त्री शरीर के प्रति उपेक्षा व घृणा का भाव होना जिसे आत्मकथा में देखा जा सकता है । ‘अम्मा को मेरा चेहरा, मेरे लंबे-लंबे बाल मेरा बढ़ता हुआ कद, शरीर का उभार और दसवां लगते ही पीरियडस का शुरू हो जाना, कुछ भी तो नहीं सुहाता । ठीक से चलो कूबड़ क्यों निकाल लेती हो? क्या खो-खो लगा रखी है?... और यदि मैं खासी दबाने की कोशिश करती तो क्या गाय की तरह गरगरा रही हैं ?...?’ स्त्री की शारीरिक व जैविक क्रियाएँ जो प्राकृतिक हैं समाज ने उन्हें स्त्री-पुरुष विभेद का प्रमुख कारण माना साथ ही विशेष रूप से स्त्री से जोड़कर उसे देखा गया । जबकि जेंडर की अवधारणा इसे नहीं मानती । ‘बियाह के पहिले कवनों लड़की का ई महिना शुरू हो जाए ते माँ-बाप का सर का बोझ बढ़त है’। क्या स्त्री की जैविक क्रियाएं पाप हैं । समाज ने जिन्हें पाप-पुण्य के कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है । ‘पाप ? क्या हर लड़की हर महीने पाप का बोझ बढ़ाती है ?’    

समाज द्वारा तय मानदंडों में से प्रमुख है विवाह । जिसका उद्देश्य वैध वारिस व संपति का स्थान्तरण है । समाज में पहले-पहल विवाह नामक न कोई संस्था थी न व्यवस्था । निजी संपति के विचार ने ही इस संस्था को बनाया जिसमें स्त्री की भूमिका नगण्य रही । जिसका जिक्र एंगल्स भी करते हैं ‘आधुनिक परिवार पत्नी की स्पष्ट या प्रच्छन्न दासता पर टिका है .. परिवार के अंदर वह पुरुष बुर्जुआ है और उसकी पत्नी सर्वहारा का प्रतिनिधितव करती हैं’ । राज्य व सत्ता ने स्त्री पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए इसका निर्माण किया साथ ही इसे अनिवार्य माना । प्रभा खेतान सत्ता और समाज के निर्मित स्त्री मानदंडों को तोड़ती नज़र आती हैं भले ही उनकी इच्छा भी विवाह करने व परिवार की थी परंतु परिस्थितियों के कारण वह ऐसा नहीं कर पाती और आजीवन अविवाहित रहने का निर्णय लेती हैं । उनका समाज में अविवाहित रहकर पहचान बनाना व सफल होना समाज को स्वीकार नहीं होता तभी तो वह मानसिक रूप से आहत होती आत्मकथा में देखी जाती हैं । साथ ही भारतीय समाज में अविवाहित स्त्री को किस नजर से देखा जाता है उसका अहसास भी । आज स्थिति यह है कि विवाह का आश्रय भारतीय समाज में स्त्री को सम्मानपूर्ण जीवन व संरक्षण प्रदान करना है । जो समाज का एक छद्म आवरण है जिसके पीछे का यथार्थ इस संरक्षण के मनोविज्ञान में कहीं छिप जाता है । विवाह के नाम पर जिस संरक्षण की बात समाज करता है जर्मेन ग्रीयर के शब्दों में कहा जाए तो ‘जीवन का निषेध है’ एक उदाहरण के जरिए यह बात और स्पष्ट होगी -‘वाणिज्य तंत्र में पति को उसके खांचे में कसने की पत्नी की भूमिका की पहचान की गई । सुरक्षा का वायदा करके कल्याणकारी राज्य अपने अस्तित्व को न्याय संगत ठहराता है, और उसकी उजरत में से उसके बुढ़ापे और बीमारी के लिए हिस्सा वसूलकर कामगार को खुद की ही बैचैनी और किसी भी संभावित दुर्घटना के विरुद्ध बीमा करवाने पर मजबूर करता है’। राज्य अपनी सत्ता के बल पर तो समाज अपने नियम और कायदों के बल पर व्यक्ति का शोषण करता है और यदि वह संभावित व्यक्ति स्त्री हो तो स्थिति और भी दयनीय हो जाती है । प्रभा खेतान डॉ. सर्राफ से प्रेम करने व आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लेती है । उनका संकल्प उन्हें आदर्श नारी के खाँचे में नहीं लाता क्योंकि यहाँ वह संरक्षण मांगती नही बल्कि संरक्षण देती हैं डॉ सराफ और उनके परिवार को । जिस कारण समाज व डॉ. सरार्फ स्वयं उनके चरित्र पर आक्षेप करते नज़र आते हैं ‘तुम रंडी खाना खोल लो ।....मैं चीख रही थी... स्वतंत्र स्त्री का क्या यही अर्थ हुआ कि उसे वैश्या का दर्जा दे दिया जाए’ जबकि यदि पुरुष अविवाहित या अकेले रहने का निर्णय लेता है तो उसे संत व महात्मा माना जाता है । समाज का यह विभाजन एक पक्षीय क्यों है ? एक के पास सारे अधिकार दूसरा खाली हाथ । सोचनीय विषय है की आज भी  स्त्री की स्वतंत्रता से अभिप्राय उसके चरित्र की आदर्शवादिता से है । आज भी अकेली स्त्री तुरंत समाज की निगाहों में संदेह के रूप में देखी जाती है । जिसका जिक्र प्रभा खेतान भी करती हैं । स्त्री का अपनी अलग पहचान बनाने का संकल्प ही उसे समाज के कटघरे में ला खडा करता है ‘आप समझती क्यों नहीं कि आप एक अकेली औरत हैं और फ्लैट में लोग आपको शक की निगाहों से देखेंगे’ या ‘क्या बासु नाम के इस पुरुष से तुम्हारा रिश्ता पाक-साफ है ।.... तुम ऑफिस में रहा करो । और न हो तो साथ में बासंती को ले जाओ’। स्त्री के साथ पुरुष का यह व्यवहार उसे हर पल अहसास करता है कि वह कमजोर है उसे संरक्षण की आवश्यकता है । जिसकी खाद हमारा परिवार हमारे संस्कारों में डालता चला जाता है । जो स्त्री को मनोवैज्ञानिक रूप से कमजोर मानने को मजबूर करता है । ‘मुझमें साहस का अभाव था एक भयभीत बच्चे की तरह डैनी फैलाकर मैं उचक-उचक कर दीवारों के पार देखती तो कभी वापस अपने घोसले में सिमट जाती’। स्त्री की इस मानसिकता का निर्माण परिवार व समाज करता है । उसे पैदा होने के उपरांत से ही सुरक्षा व संरक्षण का पाठ सीखता है । स्त्री परवरिश ही उसकी भयभीत मानसिकता का मूल है फिर चाहे वह गृहणी हो या व्यापारिक महिला ।
समाज में श्रम विभाजन का आधार सेक्स है । जिसमें घर की जिम्मेदारी स्त्री की मानी गई तो बाहर पुरुष की । भले उसके पीछे के कारण उनकी शारीरिक व मानसिक स्थितियों को दिया गया । सच तो यही है की यह विभाजन जेंडर व सेक्स आधारित है । राजेन्द्र यादव के शब्दों में कहा जाए तो ‘पुरुष, श्रम के शोषण से गुलाम बना है और औरत, सेक्स शोषण से’। जिसके संदर्भ में कात्यायनी लिखती हैं कि ‘श्रम का शोषण तो समाप्त हो जाएगा, सेक्स के शोषण का क्या होगा । पूंजीवादी समाज में मौजूद श्रम का शोषण समाजवादी संक्रमण की लंबी प्रक्रिया में समाप्त हो जाएगा, पर यदि औरत के सेक्स को ही शोषण का मूल कारण मान लिया जाए, तब तो यह मानना होगा कि यह हमेशा से है और कभी भी समाप्त नही होगा’। जेंडर का प्रश्न इसी सेक्स आधारित भेद की बात करता है । वह स्त्री और पुरुष सेक्स के बीच के अंतर को विमर्श के केंद्र में लाता है । जिसने पहले तो स्त्री को ज्ञान के सभी अनुशासनों से दूर किया फिर घर में रहने के लिए गृहस्थी की ज़िम्मेदारी कर्तव्य का चोला पहना कर उसके जिम्मे कर दिया । प्रभा खेतान लिखती हैं ‘व्यापारिक बातचीत में हम लोग जब भी बैठते तब चाय बनाना मेरा काम रहता सिर्फ इसलिए कि मैं औरत थी । स्वाभविक था यह काम न मिस्टर बासु करते न नीरज और डॉक्टर साहब ?’। प्रभा खेतान समाज की ‘जीन’ में बसी इस सोच की और इशारा करती हैं कि महिला चाहे घरेलू हो या व्यापारिक घर की जिम्मेदारी उसी की है फिर चाहे हम कितने ही बड़े परिवर्तन की बात क्यों न करे परंतु श्रम का यह असमान विभाजन आज भी उसी रूप में है । जूलियट मिशेल लिखती हैं –‘पुरुष, इतिहास की वर्ग वर्चस्व युक्त संरचनाओं में समाहित होते हैं जबकि औरत (औरत के रूप में, वास्तविक उत्पादन में उसका काम चाहे कुछ भी हो), इकाई के रिश्ते नाते से ही परिभाषित होती रही । वर्ग, ऐतिहासिक काल, विशिष्ट सामाजिक स्थिति स्त्रीत्व की अभिव्यक्ति को रूपांतरित कर देते है, परंतु पिता के कानून के समक्ष महिलाओं की स्थिति सब कहीं एक जैसी है’ । समाज में इसे देखा जा सकता है जहाँ आजादी, विभाजन और परिवर्तन की तमाम नीतियों के उपरांत आज भी एक महिला की पहली जिम्मेदारी उसका परिवार है । परिवार से इत्तर कुछ नहीं ।

समाज में स्त्री को हमेशा उन्ही अपराधों के लिए सजा दी जाती है, जिसकी जिम्मेदार वह खुद नहीं होती है । उसका स्त्री होना उसका नही सत्ता, समाज और संस्कृति की परवरिश रही तो उस परवरिश से उभरे गुण उसकी सीमा रेखा। जिसने जाने-अनजाने में उसे स्वयं के प्रति ही अपराधी बना दिया । फिर वह अपराध उसका सौंदर्य, शीलभंग, अवैध गर्भधारण व गर्भ में पुत्री की माँ होना ही क्यों ना हो , जिसने समाज के समक्ष उसे उपेक्षित व हास्यास्पद बनाया । यह सत्ता और समाज ही है जिसने हमें सिखाया की काला रंग बुरा है और जो व्यक्ति काला होता है उसे समाज नही अपनाता और मानसिक रूप से हम सौंदर्य के इस तथाकथित पैमाने को अपनाने लगते है । प्रभा खेतान का व्यक्तित्व भी कहीं न कहीं इससे प्रभावित रहता है । वह लिखती हैं “मै उपेक्षिता थी आत्म-सम्मान की कमी ने मेरा जिंदगी भर पीछा किया ।..... क्योंकि मैं ठहरी काली । माँ की तरह गोरी नहीं । इसी तरह शरीर की विकास प्रक्रिया के दौरान घटित जैविक क्रियाएँ उन्हें स्वयं को अपराधी मानने पर मजबूर कर देती हैं ‘मरण जोगी ! आज ही तुझे यह सब होना था ...? कल तेरे बाबू जी की वर्षोदी (वार्षिकी है)’ इसी प्रकार बचपन से छोटी बच्ची प्रभा के साथ परिवार में दुर्व्यवहार की घटना का घटना तथा दायी माँ को बताने पर उनका कहना था “ केहु से कहिए मत ! आपन होने वाली पति देवता से भी नहीं” खामोश रहकर क्रूरता का वहन करना ही क्या स्त्री की नियति है । जिसका यदि विरोध करती है तो अश्लिल व चरित्रहीन कही जाती है । अविवाहित मातृत्व को ग्रहण करती है परंतु समाज व परिवार के डर से मुक्त हो जाती है वह लिखती है-‘अविवाहित मातृत्व की कल्पना मात्र से मेरा शरीर सिहर उठा था। बस किसी तरह इससे मुक्ति मिले, नहीं तो घर वाले मुझे फाँसी के तख्ते पर लटका देंगें’। समाज ने स्त्री से अधिक उसकी देह को महत्व दिया । इसी कारण समाज स्त्री को उसकी देह के माध्यम से कमजोर करता देखा जाता है ।

जेंडर व्यवहार मूलक सामाजिक निर्मिती है, इसमें केवल स्त्री ही शामिल नहीं है बल्कि वह भी शामिल है जो मान्य लिंगों से अलग है जिनमें पुरुष और स्त्री के समलैंगिक संबंध व उसमें आई जटिलताएँ भी शामिल हैं । आत्मकथा के भीतर मार्या का प्रभा खेतान के प्रति विशेष लगाव देखने को मिलता है । यह स्त्री का स्त्री के प्रति अपनत्व का भाव ही था कि प्रभा खेतान की जीवन की सच्चाईयों से वाकिफ होने पर वह स्वयं भावुक हो जाती है । ‘उसने मेरी उल्टी हथेलियों से अपनी आँखें पोछी फिर उंगुलियों को होठों से लगाया और कहा लगता है मैं तुम्हें जन्मों से जानती हूँ प्रभा तुम हमेशा मेरी दोस्त रहोगी न । .... तुम्हें देखते ही प्रभा ! मुझे लगा की तुम्हारा मेरे जीवन में विशेष स्थान होगा... हाँ बिल्कुल । उसने अपना हाथ मेरी जांघों पर रख दिया था । वह और करीब खिसक आई थी । ... मैंने इतनी बेरुखी से उसका हाथ क्यों झकझोर दिया... पुरुष का प्रेम निवेदन अच्छा लगता है स्त्री का नहीं, विचित्र है संस्कारों का ताना बाना । जिसका निर्माता वह स्वयं नहीं बल्कि समाज था । जहाँ स्त्री, स्त्री के प्रति प्रेम भाव को स्वीकार नहीं पाती ।  स्त्री का स्त्री के प्रति यह भाव आज के समय में ‘थर्ड जेंडर’ के अंतर्गत देखा व समझा जाता है  जहाँ गे, लेस्बियन, ट्रांसजेंडर के विषय पर गहन विचार विमर्श आरम्भ है ।
इस प्रकार‘अन्या से अनन्या’ आत्मकथा के माध्यम से मध्यवर्गीय परिवार में जेंडर की निर्मिती को देखा जा सकता है । जहाँ आज भी बेटी के पैदा होते ही विवाह का बोझ परिवार के कंधों पर आ बैठता है । स्त्री शिक्षा की अनिवार्यता पुरुष के हित को ध्यान में रखकर दी जाती है । ज्ञान को स्त्री से दूर रखने का प्रयास किया जाता है । विवाह इस वर्ग की चरम परिणति होती है । शिक्षित व अविवाहित स्त्री को यह समाज नहीं स्वीकारता है । यह समाज के सभी रीति-रिवाजों व बंधनों में गहराई से जुडा होता है । इनका अपना सम्मान इनका परिवार होता है यदि परिवार का कोई भी सदस्य विशेषतः स्त्री अपनी मर्यादा का उल्लंघन करती है तो दंड की अधिकारी होती है । उसका अस्तिव कठपुतली के समान चलता रहता है जिसकी डोर आज पिता के हाथ में तो कल पति के हाथ में होती है । अन्या से अनन्या आत्मकथा जेंडर विभेद के जिन मुद्दों की और हमारा ध्यान केन्द्रित करती है हिंदी की अन्य स्त्री आत्मकथाओं में भी उन मुद्दों को देखा जा सकता है । मैत्रेयी पुष्पा की ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ में ‘तीन बेटियों को जन्म देने के बाद खुद मैत्रेयी के गाँव के लोग बेटा पैदा करने के लिए उनके पति का दूसरा विवाह कराने के लिए मैत्रेयी पर जोर डालने लगते हैं । मैत्रेयी की तीसरी बेटी भी एक बार मैत्रेयी से पूछ ही लेती है कि ‘उसका जन्म बेटे की इच्छा के कारण हुआ था न ?’ इसी तरह ’पिंजरे की मैंना’ में देखते हैं कि भारतीय पति, पत्नी का अपने से बड़ा हो जाना बर्दास्त नहीं कर पाता । वह हर समय उस पर छींटा-कसी करता है जिस पर चंद्रकिरण सौनरेक्सा लिखती हैं-सम्पादक को रचना मिलने पर आया पत्र ‘ऐसे ही खुला उनके कमरे में रख देती थी । एक पत्र में कहानी की तारीफ पढ़कर क्रोध और ईर्ष्या से भरकर कहा था, “तुमने भी तो कहानी भेजते समय पत्र में कुछ तो लिखा ही होगा, उसके चूतड़ों में घी मला होगा’। विभाजन की त्रासदी में स्त्री के विभाजन पर पद्मा सचदेवा लिखती हैं ‘बंटवारा ..चाहे मुल्क का, चाहे सल्तनतों का, औरत हमेशा अपमानित होती है.औरत एक इस्तेमाल की चीज हो जाती है । जैसे कुम्हार के घर बर्तन इस्तेमाल के बाद फेंक दिया जाता है, वही स्थिति है औरत की’।, ‘शिकंजे का दर्द’ आत्मकथा में सुशीला टाकभौरे लिखती हैं-‘ पिताजी माँ को बुलाने के लिए नाम ना लेकर उन्हें कमल की माँ और कल्लू की माँ कहकर बुलाते थे । .... मैं अक्सर सोचती थी वे शीला की माँ और शीला के पप्पा क्यों नहीं  कहते’। सामाजिक संरचना ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का गठन करती है । जब समाज व उसकी नितियाँ ही भेदभाव पूर्ण हो तो स्त्री समानता कहाँ तक संभव है । इस प्रकार स्त्री आत्मकथाएं जेंडर के माध्यम से सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक परिदृश्य का उत्खनन करती है । जिसमें सदियों से नारी स्वतंत्रता, अस्मिता के मूल्य दबाए गए थे । ये आत्मकथाएं केवल एक लेखिका का जिंदगीनामा नहीं, बल्कि उन तमाम स्त्रियों के हर्ष-विषाद, संघर्षों, टकराहटों, बदलावों की कहानी है जिनका सम्पूर्ण जीवन नदी की धारा के समान बहता रहता है जो औरों को तो शीतलता प्रदान करती है परंतु स्वयं भीतर तपती है । जेंडर विमर्श इसी असमानता को सामने लाने का प्रयास है जिसे स्त्री आत्मकथाओं के माध्यम से समझा जा सकता है ।

    संदर्भ सूची :
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    गुड़िया भीतर गुड़िया, मैत्रेयी पुष्पा, राजकमल प्रकाशन, संस्करण-2012, नई दिल्ली
    गुड़िया घर, इब्सन, संवाद प्रकाशन, संस्करण-2002, नई दिल्ली
    जाति समाज में पितृसत्ता, उमा चक्रवर्ती (अनु.) विजय झा, ग्रंथ शिल्पी, संस्करण-2011,नई दिल्ली
    दुर्ग द्वार पर दस्तक, कात्यायनी, परिकल्पना प्रकाशन, तृतीय संस्करण-2004, लखनऊ
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    पिंजरे की मैना, चंद्रकिरण सौनरेक्सा, पूर्वोदय प्रकाशन, संस्करण- 2010, नई दिल्ली
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    Foucault’s Work for the Analysis of Gender Relations: Theoretical Reviews, Wijitbusaba Marome, Faculty of Architecture and Planning, Thammasat University
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    Gender Trouble: Feminisim and the Subversion of Identity Judith Butler,  Routledge   New York and London(1999)
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    Collins English Dictionary, complete & unabridged, William Collins sons &co.ltd, 10th edition 2009

      पत्रिकाएं
•    Maithreyi Krishnaraj (2006), Gender Easy to Study? Some Reflections, Economic and Political Weekly,vol.41, No-42, Oct 21-27
•    Cecillia Asberg (2010), Biology is a Feminist issue: Interview with Lynda Birke European Journal Of women’s Studies, vol.17(4)
•    Judith Butler(1988), Performative Acts and Gender Constitution: An Essay in  Phenomenology and Feminist Theory, Theatre Journal published by The Johns Hopkins University Press, Vol. 40, No. 4, Dec
•    आइरिस यंग, अप्रिय विवाह से इतर एक प्रस्ताव (लेख), संधान (कृति, संस्कृति और सिद्धांत का मंच) पत्रिका, (सं.) लाल बहादुर वर्मा और सुभाष गताड़े,  अंक-1, अप्रैल-जून (2001), दिल्ली

वेबसाइट्स
    http://en.wikipedia.org/wiki/Discourse
    http://www.oxforddictionaries.com/definition/english/discourse
    http://en.wikipedia.org/wiki/Discourse
    http://en.wikipedia.org/wiki/Gender
    http://en.wikipedia.org/wiki/Grammatical_gender
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    http://www.raewynconnell.net/p/gender-sexuality.html
    http://jantakapaksh.blogspot.in/2013/07/blog-post_22.html
    http://chaspa.blogspot.in/
    http://www.shabdankan.com/2014/04/feminist-literary-criticism-in-hindiLiterature-Initial-Effort-Savita-Singh.html#.U1oQE4aQbdA
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