बहुजन आंदोलन की समर्पित शख्सियत: मनीषा बांगर

स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत आज मिलते हैं बामसेफ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मनीषा बांगर से. उनके जीवन और विचार उत्पल कान्त अनीस के शब्दों में. 

उत्पलकान्त अनीस

बामसेफ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मनीषा बांगर अपनी सामाजिक सक्रियता और राजनीतिक चेतना के लिए बहुजन आंदोलन में एक समादृत नाम हैं. ऐसी बहुत कम महिलायें हुई हैं, जो अपने मेडिकल प्रोफेशनल कैरियर के साथ-साथ सामजिक क्षेत्र में भी बहुत सक्रिय हों. लेकिन मनीषा ने मेडिकल प्रोफेशनल के साथ-साथ समाज में व्याप्त रोगों की पहचान की और वे उनके निदान के लिए लगातार प्रयत्नशील भी हैं.पेशे से डॉक्टर मनीषा अभी डिपार्टमेंट ऑफ़ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी, डेक्कन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज हैदराबाद में एसोसिएट प्रोफेसर हैं और हैदराबाद के कॉरपरेट हॉस्पिटल में लीवर ट्रांसप्लांट की विशेषज्ञ हैं. नागपुर में जनमी, पली-बढी मनीषा ने और वहीं से एम.बी.बी.एस. तथा एमडी तक की शिक्षा गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज से प्राप्त की, उसके बाद उन्होंने गैस्ट्रोलाजी में सुपर स्पेश्लाइजेशन पीजीआई चंडीगढ़ और जी बी पन्त इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली से हासिल की. वे लगभग 18 सालों से बामसेफ से जुड़ी हैं और अभी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेवारी के साथ-साथ केन्द्रीय कार्यकारी परिषद की सदस्य के रूप में भी बामसेफ के आन्दोलन की महत्वपूर्ण जिम्मेवारी से जुडी हैं. बामसेफ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनने से पहले वे मूलनिवासी महिला संघ की राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुकी हैं.


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नागपुर में एक मध्यम वर्गीय परिवार में इनका जन्म हुआ. इनके माता का नाम प्रमिला रंगारी और पिता का नाम भागवत रंगारी है. इनका परिवार आंबेडकरी विचारधारा से जुड़ा हुआ है. वैसे इनकी माँ का पंजाबी महाराष्ट्रीयन परिवार से ताल्लुक रहा, जबकि इनके पापा का महाराष्ट्रीयन परिवार से. इनकी परिवारिक पृष्ठभूमि में दलित और पिछड़ी दोनों जातियों का अंतरजातीय वैवाहिक सबंध रहा है. यही कारण है कि मनीषा अपनेआप को जन्मना/जन्मजा बहुजन कहती हैं. इनके नाना-नानी ने 1956 में नागपुर में बाबासाहेब के साथ बौद्ध धर्म अंगीकार कर लिया था. इनकी मामी सुलोचनाताई डोंगरे थीं, जिन्होंने 1942 में ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेस वीमेंस कॉन्फ्रेंस (20जुलाई 1942) में  की अध्यक्षता की थी. वे बाबा साहेब के साथ मिलकर सी पी बेरार और  मराठबाड़ा प्रदेश में फेडरेशन का काम करती थीं.

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इनका परिवार दादा-दादी के समय से ही सामाजिक रूप से काफी उन्मुख रहा. इनके परिवार में फुले और आंबेडकरी विचार का बहुत गहरा प्रभाव रहा है. यही कारण रहा कि घर में शुरू से पढाई का माहौल था. इनके पापा (भागवत रंगारी) सरकारी अफसर थे और माँ (प्रमिला रंगारी) नागपुर विश्वविद्यालय के शिक्षण विभाग की विभागाध्यक्ष पद से रिटायर हुईं. इनके पिता चार भाई थे, जिनमें अन्य तीन भाई आइएएस., सिविल जज और आइआइटीयन रहे. उच्च शिक्षित परिवार में जन्म होने के कारण मनीषा को बचपन से एक उन्नत शैक्षणिक माहौल मिला. लेकिन इतने उच्च शिक्षित परिवार में जन्म होने के बावजूद भी इन्हें अपने छात्र जीवन में काफी भेदभाव का सामना करना पड़ा.

फुले और आंबेडकरी विचार से लैस परिवार में जन्म होने के कारण इनका बचपन से ही बाबा साहेब के विचारों से परिचय हुआ. यही कारण रहा कि मनीषा बचपन से ही सामाजिक चेतना से लैस रहीं और उन्होंने बचपन से ही जातिवाद और अन्याय का विरोध करना शुरू कर दिया. इसका परिणाम भी उन्हें भुगतना पड़ा.


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सेंट जोसफ कांन्वेंट स्कूल में पढाई होने के कारण स्कूली जीवन में इन्हें भेदभाव नहीं सहना पड़ा. लेकिन जब मनीषा भिडे जूनियर कॉलेज, जो ब्राह्मण शैक्षणिक संस्थान है, में गईं तो वहां इनका सामना जातिवाद से हुआ. लेकिन हमेशा प्रतिरोध करती रही. बारहवीं में कॉलेज टॉप करने के बाद भी जाति से गैरब्राहमण होने के कारण इनका नाम स्कूल वालों ने अखबार वालों को नहीं भेजा था. इनकी जगह पर दूसरा स्थान प्राप्त विद्यार्थी का नाम छपा. यहाँ तक कि प्रिंसिपल और शिक्षक किसी को बताने से भी हिचकिचाते रहे. मनीषा ने कॉलेज अथॉरिटी के सामने ये सवाल उठाया. अंततः पुरस्कार वितरण के समय कॉलेज को मनीषा के टॉप होने की घोषणा करनी ही पड़ी.

गवर्मेंट मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस के दौरान पढ़ने में टॉप होने के कारण भेदभाव नहीं सहना पड़ा, लेकिन एम डी करते हुए ब्राह्मण और अन्य उच्चवर्णीय फैकल्टी का भेदभाव सहना पड़ा. इंदिरा मेडिकल कॉलेज में एमडी गोल्ड मेडलिस्ट होने के बावजूद भी उस साल मनीषा को गोल्ड मैडल से वंचित कर दिया गया.


बुलंद इरादे और युवा सोच के साथ 

 ब्रहामणवादी शिक्षकों ने सुनियोजित तरीके से यूनिवर्सिटी प्रशासन से साजिश करके इन्हें गोल्ड मैडल से वंचित कर दिया और मनीषा को जवाब दिया गया कि राउंडवाइज गोल्ड मैडल इस बार दूसरे विभाग को दिया जाएगा. आगे चलकर मनीषा ने पीजीआई चंडीगढ़ बतौर सीनियर रेजीडेंट ज्वाइन किया.  इसके बाद सुपरस्पेशलाइजेशन और डॉक्टरेट इन मेडिसिन करने के लिए वे जी.बी.पंत इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, दिल्ली आई. यहाँ जातिवादी उच्चवर्णीय सहपाठियों ने उन्हें परेशान किया लेकिन अंततः वे वहां अपनी डिग्री पूरा कर पायीं. यहाँ मनीषा को लैंगिक और जातिगत भेदभाव काफी झेलना पड़ा. यहीं वे बामसेफ से 1998 में जुड़ी.

फिर शादी के बाद मुंबई गयीं. वहां मनीषा ने जे.जे. मेडिकल कॉलेज ज्वाइन किया. इस बीच बामसेफ में उन्होंने सांगठनिक स्तर पर काफी काम किया. पूरे देश में घूम-घूम कर संगठन को मजबूत किया. बामसेफ के अंदर महिला मुद्दे और नेतृत्व को लेकर जमीनी स्तर पर भी काफी काम किया. उन्होंने टीएनएमसी नायर हॉस्पिटल में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में ज्वाइन किया. यहाँ पर मनीषा ने पितृसत्ता और जातिवादियों के खिलाफ मोर्चा खोला और इन्हें जीत मिली. इसके बाद हैदराबाद आ गयीं.


दलित महिला कारोबारी का संघर्ष 

हैदराबाद आने के बाद उन्होंने मेडवीन हॉस्पिटल में गैस्ट्रोएंटरोलॉजी डिविजन में हेड के तौर पर ज्वाइन किया. अंतररार्ष्ट्रीय और राष्ट्रीय जर्नल में कई आलेख प्रकाशित हुये. वहाँ कई नामचीन कॉर्पोरेट अस्पतालों में लीवर स्पेशलिस्ट के तौर पर काम करती रहीं.

मनीषा दलित स्त्रीवाद के बदले बहुजन स्त्रीवाद पर जोर देती हैं. ‘दलित स्त्रीवाद’ शब्दावली को सवर्णों के साजिश के तौर पर देखती हैं. मनीषा का मानना है कि दलित स्त्रीवाद जिन मुद्दों को उठाता है या उसका जो धरातल है, वह सभी ओबीसी, आदिवासी, एससी और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए बराबर है. हरएक समूह का अपना एक विशेष शोषण होता है, लेकिन सभी शोषण की जड़ें ब्राह्मणवाद से उत्पन्न जातिवाद तथा पितृसत्ता की मान्यतायें ही हैं. उच्च वर्णीय महिलाओं के शोषण में जाति की भूमिका नहीं होती, पितृसत्ता उसके मूल में है. स्त्रीवाद शब्द ब्राह्मण, सवर्ण महिलाओं के लिए तो ठीक है लेकिन बहुजन महिलाओं के नहीं. भारत का स्त्रीवाद जातिगत प्रताड़ना के प्रश्न पर कई दशकों तक चुप रहा है और बहुजन महिलाओं पर वर्चस्व बनाता रहा, इसी प्रक्रम में जाति का अहम मसला भी दबाता रहा. इसी वजह से दलित स्त्रीवाद का जन्म हुआ. ब्राहमण सवर्ण महिलायें सिर्फ बहुजनों के शोषण तथा गरीबी पर एनजीओ के जरिये पैसा, ओहदा, पारितोषिक, किताबों में आलेख, किताबें लिखना आदि अनेक लाभ लेने में लगी थीं, मगर जाति सिस्टम, जो कि पितृसत्ता को जन्म देता है, को नेस्तनाबूद करने के लिए कुछ नहीं कर रही थी. स्त्रीवाद के नाम पर जाति के अहम मुद्दों को ब्राहमण/ सवर्ण महिलायें निगल जाती हैं, ऐसा मनीषा बांगर समझती हैं. वे कहती हैं कि ‘इस तरह ब्राह्मण/ सवर्ण महिला ब्राह्मणवाद को बढ़ावा ही नहीं, जानबूझकर बनाये रखने में सवर्ण पुरुषों का साथ देती है. इस तरह का छद्म स्त्रीवाद भारत में पनप रहा है.’ वे स्पष्ट करती हैं कि, ‘एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक महिलाओं की लड़ाई ब्राह्मणवाद के खिलाफ है, ज्यों ही ब्राह्मणवाद ख़त्म होगा, त्यो ही बहुजन महिलाओं का शोषण खत्म होगा. जिस मात्रा में जातिवाद का निर्मूलन होता रहेगा, उसी मात्रा में पितृसत्ता  का प्रश्न भी सुलझाता रहेगा, क्योंकि भारत में पितृसत्ता जातिवाद का अभिन्न अंग है, दोनो एक दूसरे को जीवित रखते हैं, जबतक दोनो जीवित रहते हैं, तभी तक ब्राह्मणवाद फलता-फूलता रहता है. दलित स्त्रीवाद पर सवाल खड़ा करते हुए कहती हैं कि जोतिबा  फूले, बाबा साहेब आम्बेडकर और पेरियार ने जितना महिलाओं के हक-हूकूक के लिए काम किया है, वह स्त्रीवाद के नाम से नहीं किया बल्कि जातिवाद और ब्राहमणवाद का विरोध करते हुए महिलाओं को इसका सबसे पीड़ित समुदाय बताते हुए न सिर्फ काम किया बल्कि विमर्श भी खड़ा किया. मनीषा सावित्रीबाई फूले को आदर्श मानती हैं .


मनीषा महिला आरक्षण को लेकर सिर्फ 33 फीसदी नहीं बल्कि 50 फीसदी आरक्षण के पक्ष में हैं क्योंकि उनके अनुसार महिला की जनसंख्या के अनुपात में ही उन्हें प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए. अगर बहुजन स्त्री का उसकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व का प्रावधान नहीं होता है तो सवर्ण/ ब्राह्मण महिलायें सम्पूर्ण बहुजन महिलाओं का प्रतिनिधित्व निगल जायेंगी. ब्राह्मण/ सवर्ण महिलायें आरक्षण के भीतर आरक्षण के हक़ में नहीं हैं. यही इस बात का सबूत है कि भारत में सभी महिलायें एक होमोजनियस (एकरूपीय) समूह नहीं हैं. इसलिए इन्हें आरक्षण भी होमोजनियस (एकरूपीय) समूह की तरह नहीं मिलना चाहिए.  बहुजन महिलाओं के सवालों से जिस तरह से मुख्यधारा का मीडिया मुंह मोड़ता है,  उसपर भी मनीषा सवाल खडी करती हैं.

बामसेफ में महिलाओं की नेतृत्व को लेकर भी मनीषा ने संगठन के अंदर काफी सुधार किया है. उनका कहना है कि बामसेफ भी चूकि इसी समाज का हिस्सा है, तो वहां भी तमाम खामियां है. लेकिन हमलोगों ने उसपर धयान देना शुरू किया हैं. भारत सरकार के गाइडलाइन के अनुसार ‘वीमेंस सेल’ शुरू करवाया है, जो कि शायद ही किसी पॉलिटिकल संस्था में अभी तक हो. मनीषा ने बामसेफ को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बढ़ाया है, जैसे यूके, यूएसए या मीडिल ईस्ट तक. उन्होंने 13 अप्रैल 2016 को यूनाइटेड नेशन में भी बहुजनों की समस्या पर अपनी बात रखी.

अभी पिछड़े आरक्षण के लिए विभिन्न आन्दोलनों के बारे में बताती हैं कि ये सारी जातियां और समाज ब्राहमणवाद के शिकार रहे हैं इसलिए ये पिछड़ते गये. इसलिए सबसे पहले जाति जनगणना करवाई जाये. वे कहती हैं पिछड़े और दलितों को बांटने में मार्क्सवादियों और ब्राहमणवादियों दोनों का हाथ है.

वे मायावती के काम की एक तरफ सराहना करती हैं तो उनकी राजनीति को भी लिमिटेड बताती हैं, क्योंकि उनके अनुसार वह प्रादेशिक पोलिटिकल पार्टी की नेता की तरह हो गई हैं और उन्होंने एक दलित पहचान के रूप में ब्राह्मण मीडिया और अन्य पोलिटिकल पार्टियों को सम्मति दी है, अघोषित ही सही. उन्होंने अपनी पार्टी सहित संगठन की शक्ति बढ़ाने की तरफ ध्यान नहीं दिया है, वैकल्पिक नेतृत्व पनपने नहीं दिया है, इसीलिए वह एक लिमिटेड अवधि तक सीमित हो जायेंगी. वे कहती हैं कि बीएसपी को संगठन की शक्ति बढ़ानी चाहिए और ओबीसी तथा पसमांदा तक विस्तार करना चाहिए.  मनीषा आह्वान करती हैं कि बहुजन महिलाओं को भी एक साथ आना चाहिए.


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