सतपुड़ा की वादियों में सक्रिय आदिवासियों की ताई: प्रतिभाताई शिंदे

नीलेश  झाल्टे 

 महाराष्ट्र में आदिवासियों के बीच उनकी लड़ाई में शामिल प्रतिभाताई शिंदे से महिला-नेतृत्व सीरीज के तहत  परिचित करा रहे हैं  नीलेश  झाल्टे : 


आदिवासी समाज  मूलभूत सुविधाओं से हमेशा से ही वंचित रहा है. गैर-आदिवासी लोगों ने जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में आर्थिक संसाधनों का दोहन करने के लिए घुसना शुरू कर दिया, जिसके कारण आदिवासी लोगों की पारंपरिक अर्थव्यवस्था और समाज को भारी क्षति हुई है. यही आलम महाराष्ट्र में भी है. खासकर विदर्भ और खानदेश में आदिवासियों की संस्कृति और समाज की क्षति बड़े पैमाने में हुई है. खानदेश में सतपुड़ा की गोद में आदिवासियों का निवास बड़े पैमाने में है. वहां पर भी समस्याओं और अन्याय-अत्याचारों की घटनाओं की कमी नहीं है.


आदिवासी समूह में सामूहिक खेती का प्रचलन था, लेकिन जमींदारों, सूदखोरों और ठेकेदारों ने सामूहिक खेती की परंपरा पर हमला किया है. उनके जीने में संघर्ष भरा पड़ा है. ऐसी स्थिति में आदिवासियों के लिए सतपुड़ा की वादियों में रचनात्मक संघर्ष की एक 'प्रतिभा' उभर आई, जिन्होंने आदिवासियों के आन्दोलन को रचनात्मक रूप से लड़कर उन्हें अपने हक और अधिकारों के प्रति सजग किया है. इतना ही नहीं उनकी सुविधाओं और हजारो एकड़ जमीन आदिवासियों को देकर उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए प्रयासरत है.

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आज इन वादियों में प्रतिभाताई शिंदे का नाम लोकसंघर्ष का चेहरा बन चुका है. किसी भी प्रकार की राजनीतिक, आर्थिक स्वार्थ न रखते हुए आदिवासी, श्रमिक समूह के जीने के संघर्ष में शामिल होकर उन्हें मुख्यधारा में लाने का प्रयास प्रतिभाताई ने लगन के साथ किया है. यही कारण है कि 'लोकसंघर्ष मोर्चा' का नाम आज सतपुडा की वादियों में तूफ़ान की तरह फैला है.

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प्रतिभाताई लोकसंघर्ष मोर्चा के बैनर तले आदिवासी, दलित, ग्रामीण, मजदूर वर्ग के लिए रचनात्मक संघर्ष किया है. महाराष्ट्र के नंदुरबार, जळगाव, धुलिया के साथ-साथ गुजरात के सूरत, भरूच, नर्मदा आदि जिलों में भी प्रतिभा ताई ने आदिवासी पिछड़े समूह के लिए संघर्ष किया है. पारिवारिक ऐशो आराम की जिन्दगी छोड़कर प्रतिभाताई ने लोकसंघर्ष मोर्चा के बैनर तले नर्मदा घाटी के सरदार सरोवर प्रकल्प पीडितो के अन्यायपूर्ण विस्थापन के विरोध में पुनर्वास संघर्ष समिति के रूप में 1997 से लडाई आरंभ की. इस समय इन प्रकल्पपीडितो के लिए न्याय व संपूर्ण पुनर्वास की माग केंद्र में जरुर थी, लेकिन संगठन के काम का मुख्य लक्ष्य पिछड़े इलाकों के आदिवासी समूह को उनकी संस्कृति, परम्परा और उनकी अस्मिता की रक्षा कर विकास के राष्ट्रीय प्रवाह में शामिल होने के लिए संगठित करना था. यहाँ और मूल मुद्दा विकास का भले ही था लेकिन विकास की कल्पना पर ही प्रश्नचिन्ह था. क्योंकि, विकास का जो मुख्य प्रवाह था वह समाज के सभी घटकों को समान अवसर देनेवाला, सबको साथ में लेकर चलनेवाला नहीं था. बल्कि मुठ्ठीभर तथाकथित विकास के लिए समाज के बहुजन, शोषित समूह का शोषण और विषमता के लक्षण इस प्रवाह में निरंतर दिखाई देते है. इसलिए यहाँ पर इस तबके के विकास का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रथम मानवी विकास और मानवी अधिकारों का आग्रह करना आवश्यक था. यहीं बात ध्यान में लेकर प्रतिभा ताई लोकसंघर्ष मोर्चा को अपने आंदोलन का मुख्य हाथियार बनाकर आदिवासियों के लिए रचनात्मक संघर्ष की भूमिका लेकर अपना काम शुरू किया.


सरदार सरोवर परियोजना में नंदुरबार जिले के 33 आदिवासी गाँव डूब रहे थे. उनके अन्यायपूर्वक विस्थापन के खिलाफ परियोजना से पीडितो की लड़ाई आरंभ हुई. इन 33 गाँवों के पुनर्वास के लिए महाराष्ट्र सरकार ने 4200 हेक्टेयर जंगल की जमीन पर 5 बसाहटों का निर्माण किया. कभी झांसा देकर तो कभी डरा-धमकाकर इन पांच बसाहटो में पुनर्वास के नाम पर पटक दिया गया. नये पुनर्वास के बदले आदिवासियों को पूरी तरह से फंसाया गया था. जिन बसाहटो में 200 परिवारों का पुनर्वास हो सकता है, वहां पर 400 से 500 परिवारों को रखा गया. यहाँ तक की, एक ही खेत पर या भूखंडपर दो प्रकल्पपीडितो के नाम डाले गए थे. तो कईयों को केवल कागज़ पर ही जमीन दी गयी थी. ऐसी कई विपरीत स्थितियों का सामना परियोजना पीडितो को करना पड़ा.

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 इन सभी पीडितो के अधिकार के लिए 'पुनर्वसन संघर्ष समिति'  बैनर के तले उनकी मांगों के लिए और विकसित पुनर्वास के लिए सरकार के विरोध में आन्दोलन खडा किया. लोकसंघर्ष मोर्चा के बैनर तले प्रतिभा ताई के प्रयासों से सरदार सरोवर प्रकल्प के विस्थापितों का तलोदा और अक्कलकुआ तहसील में 9 वसाहटों में नया पुनर्वसन हुआ है. अंबाबारी तहया देहली प्रकल्पपीड़ितों का अन्यायपूर्ण विस्थापन पर रोक लगाकर उनके पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू है.

पीढ़ी दर पीढ़ी जंगल की जमीन पर खेती करनेवाले आदिवासियों को उनकी जमीन का हक मिलने के लिए तथा गाँव के सामूहिक प्राकृतिक संसाधनों का हिस्सा उन्हें मिले , इस उद्देश्य से वनों का अधिकार कानून 2005 लागू किया. इसके लिए प्रतिभाताई ने 4 हजार आदिवासियों की पदयात्रा जलगाँव से मुंबई निकाली थी. तब जाकर यह कानून मंजूर हुआ. इस कानून का उचित अमल करने के लिए वे प्रयासरत हैं. वे पेशा क़ानून बनाने के लिए क़ानून मंजूर कर उसके अमल के लिए भी प्रयासरत हैं. वे वनविभाग के समन्वय से आदिवासी क्षेत्र में आरक्षित वनक्षेत्र तथा जंगल का सुचारु विकास प्रकल्प बने इसकी भी कोशिश कर रही हैं.

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जल-जंगल-जमीन आदि प्राकृतिक संसाधनों के अधिकार मिले इसलिए आदिवासी स्वशासन कानून को नए सिरे से त्रुटीरहित बनाने और आदिवासियों में रोजगार के लिए होनेवाले मायग्रेशन को रोक लगाने के लिए स्थानीय स्तर पर प्रतिभाताई काम कर रही हैं. साथ ही कुपोषण सहित आदिवासियों की अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए भी लोकसंघर्ष मोर्चा परिसर में कार्यरत है.

लोकसंघर्ष मोर्चा की इस लडाई में आदिवासी महिलाओं का नेतृत्व और सहभागिता भी महत्वपूर्ण है. झिलाबाई, भांगीबाई, सिताबाई, यमुनाबाई, सुगरीबाई जैसे कई नाम हैं, जो संगठन की नींव है. जो मुद्दे आदिवासियों के प्रतिरोध के केंद्र में रहे, उनका संबंध मुख्यत: उनकी परम्परागत जीवन पद्धति पर होने वाले हमलों से है,  तथा  जंगलों पर राज्य के एकाधिकार और उनके व्यापारिक दोहन व उनके प्रयोग पर कर लगाने से.

बुलंद इरादे और युवा सोच के साथ 

आदिवासी क्षेत्रों में बाहरी लोगों के आगमन तथा उनके द्वारा आदिवासी किसानों के शोषण ने भी आदिवासी विद्रोहों को उत्पन्न किया. इस विद्रोह को आन्दोलन की आग में परिवर्तित कर प्रतिभाताई ने 'लोकसंघर्ष' को व्यापक बनाया है.

दलित स्त्रीवाद मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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नीलेश झाल्टे  जलगाँव  स्थित  पत्रकार हैं  और  दैनिक  लोकमत  समाचार  से  जुड़े  हैं  . संपर्क: 9822721292

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