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रूममेट्स

सीत मिश्रा

पेशे से पत्रकार. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन. पहला उपन्यास रूममेट्स प्रकाशित
संपर्कseet.mishra04@gmail.com

घर छोड़ने के बाद दोबारा घर वापसी उस रूप में तो कभी नहीं हो पाती। कभी कुछ कम होता है कभी कुछ ज्यादा होता है। लेकिन जस का तस कोई भी नहीं लौटता। इसका एहसास इस बार घर पहुंचकर बार-बार हो रहा था। मेरे पहुंचने से पहले अफवाह घर पहुंच चुकी थी, सोचा था घर पर इन बातों से मुक्ति मिलेगी, मैं आराम से रह सकूंगी। अफवाह से दूर, सुकून के साथ, अपनो के साथ। लेकिन मैं गलत सोच रही थी यहां भी अफवाह फैली हुई थी।


चाची ने पहुंचते ही कहा, ‘का बिटिया नाम कमाए गयी रहूँ, बहुत नाम कई दिहलू।’ बुआ डांट देती चाची को और मुझे समझाती ‘कीड़ा पड़ी बिटिया ओन लोगन के। तू चिंता जिन किहू, ऊपर बाला कुल देखत बा।’
दादी, माँ को सम्बोधित करती हुई कहती, ‘इही बिना लड़कियन के कभौ बहरे न भेजे के चाही। तब न समझूं बजन्ती अब कुल समझ में आवत होई’।

पड़ोसी भी तंज कसते, ‘अरे बहिन, हमार लड़की रहल होत त काट के फेंक देइत। इही बिना बाहर जाए जाला। आपन इज्जत अपने हाथ में होथ।
‘कुछ त भएल रहा होई ऐस ही कोनों बात नाही बढ़त’।
‘कहीं सुने बाटू कि बिना आग के भी धुआँ उड़े ला’।
‘बहरे जाए पर लड़कियन के पर लग जाला, मन बढ़ जाला, बडन के सम्मान भूल जालिन।
‘संस्कार में कमी रह गईल। ई कुल परिवार वाले सिखाव थेन’।

मन बहुत करता था पूछू, किसका परिवार सिखाता है। बाहर भेजने को तैयार नहीं होते और ज्ञान बांट रहे हो। किसी ने बताया था कि कैसे तैयार करो खुद को? बाहर भाई, बाप, ताया, ताई नहीं मिलेंगे, सिर्फ पुरुष मिलेंगे जो हर मौके पर तुम्हें नोच खाने को तैयार बैठे होंगे। खाकर डकार भी नहीं लेंगे और आगे बढ़ जाएंगे दूसरी की तलाश में। तब तो यही संस्कार भरे जा रहे थे बड़ों की इज्जत करो, किसी को जवाब मत दो, पुरुषों से दूर रहो, जुबान मत लड़ाओ यह सब न सिखाते तो भी एहसान करते। वहीं उन सबको लपाट लगाकर आती । लेकिन नहीं इज्जत कर रही थी योगेश की, रागश्री की।

जन्म से हम लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार किया गया और हमारे ऊपर आँखें तरेरी गयीं। नैसर्गिक रूप से स्वीकारने के बजाय हर पल की रोक-टोक मेरी नजर में दुर्व्यवहार के दायरे में ही आती है।

इन सबके बीच माँ कुछ नहीं बोलतीं चुपचाप रहती हैं। कई बार देखती हूँ वह अपने आंचल के कोरों से अपने आंसूओं को पोछ रही होतीं हैं। मन करता है आगे बढ़कर उनके आँसू पोछ दूँ और उन्हें अपनी बाहों में थाम लूँ। समझा दूँ- कुछ नहीं हुआ है माँ, सब ठीक है। लेकिन कुछ नहीं करती। जानती हूँ अगर माँ ने मेरी आँखों में ठहरे हुए आँसू देख लिए तो बहुत बड़ा सैलाब बह निकलेगा और उसे मैं नहीं रोक सकूंगी।

दादी, चाची, पड़ोसी सबका कहा सबकुछ सुनती हैं माँ पर कुछ नहीं कहतीं, बस चुप्प रहती हैं। माँ की आँखें पहले की अपेक्षा ज्यादा सूनी हो गयी है, जाने वह मुझे सही समझती हैं या गलत।


माँ क्यों सुनती हैं? क्यों बर्दाश्त करती हैं इतना? क्या उन्हें लगता है कि उनकी बेटी गलत है? बेटी गलत है इसलिए वापस लौट आई है?

माँ हमेशा कहती थीं- ‘भीतर रहे गुन करे, बाहर जाए खून करे।’ शायद इसलिए उन्होंने मुझे कभी नहीं कुरेदा। कभी नहीं पूछती कि क्या हुआ? या तुम क्या करोगी? या छोड़ दो यह लड़ाई। लड़ने में कुछ नहीं रखा है।
अब माँ यह भी नहीं पूछती- ‘बिटिया तू कहिया टीबी में देखाबू।’


क्या मैंने अपने घरवालों से सिर उठाकर जीने का हक छीन लिया है। क्या मेरे ख्वाहिशों के आसमान ने उनकी प्रतिष्ठा धूमिल कर दी है। मैं इन्हें कभी इस दर्द से उबार नहीं सकूंगी। इन्हें कोई खुशी नहीं दे सकती तो गम नहीं होता, लेकिन इतना बड़ा दर्द मैंने कैसे दे दिया। इसलिए तो माँ ने मुझे बाहर नहीं भेजा था, भाभी ने भईया को इसलिए तो नहीं मनाया था।

जब से घर आई हूँ सबकुछ यथावत चल रहा है, जैसे मशीन से सबकुछ संचालित हो रहा है। माँ दिन भर पूछती हैं बिटिया-‘कुछ खाऊ, कुछ खाई ल, ले आई कुछ।’ चाय अभी भी अपने हाथों से बनाकर ही पिलाती हैं। खाना भी अपने हाथों से ही परोसती हैं, बस अब खाने में स्वाद नहीं आता। मैं उस बेस्वाद खाने को खा नहीं पाती और वह मुझे इस हाल में देख नहीं पाती और मुझे अकेला छोड़कर कमरे से बाहर चली जाती हैं.


हमेशा की तरह माँ अब भी मेरा बिस्तर अपने हाथों से बदल देती है। कुछ नहीं कहती वो। संकट मुझपर आया लेकिन लगता है कि वह इस तकलीफ से खुद गुजर रही हैं, अब वह रातों में कराहतीं। मैं बार-बार उठकर बैठ जाती हूँ, पूछती हूँ मां क्या हुआ- कहती हैं ‘कुछ नाही बिटिया तू सोई जा’। जाने वह उनके घुटनो के दर्द से ज्यादा परेशान हो गयीं हैं या इस उम्र में मैंने जो अपने उपर धब्बा लगवा लिया है उसका दर्द ज्यादा बड़ा है। वह कराहती हुई वॉशरूम तक जाती हैं फिर अपने दर्द को दबाए हुए लौटकर आती हैं और अपने बिस्तर में लेटने से हमेशा की तरह वह मुझे निहारती होंगी शायद। मैं चादर मुँह से पैर तक ओढ़कर सोती हूँ कहीं वह समझ न जाएँ कि मैं सिसक रही हूँ। वह चादर के उपर से ही हाथ फेरती हैं और बगल में लेट जाती हैं। मैं उनके बगल में दूसरी तरफ मुंह किए सिसक रही हूँ, शायद वह भी यही कर रही हों। लेकिन हम में से कोई भी एक-दूसरे से कुछ नहीं पूछता।


माँ से अब मैं क्यों नहीं चिपट पा रही? सीने पर ऐसा क्या बोझ रखा है, जिसका भार अगर मुझ पर से उतरा तो मेरे अपनों पर चढ़ जाने का भय मुझे सालता है। मैं घरवालों से कौन सी बात से छिपाना चाहती हूँ, कि मैंने रब को खो दिया है या मैं अफवाहों में हूं। सबकुछ जानते हुए क्यों अंजान बनी हूँ मैं। क्यों नहीं अफवाह के झूठ को झूठला पा रही, कोई सवाल ही नहीं उठाता सब अपनी अपनी कहकर खाली हो जाते हैं।

अनुभव बोल रहा है कि जिसकी आशंका हो, जिससे बचने की चिन्ता हो वह बात जरूर होकर रहती है। मन में डर घर कर गया है कि कुछ-न-कुछ बहुत बुरा जरूर होगा। अजीब सी बातें हो रही हैं, आसार अच्छे नजर नहीं रहे हैं। शाम के समय घर के भीतर से बातचीत के स्वर सुनाई दे रहे हैं-जैसे कोई बहस हो रही हो। थोड़ी देर बाद ताऊ गरजते हुए बोले- कुलच्छिनी तो है ही यही सब करेगी।



क्या यह शब्द मेरे लिए थे। उफ्फ…. सबको क्या हो गया है अपनी ही बेटी समझ नहीं आ रही है। मुझे जाने क्या हो गया है? मैं कुछ ही महीनों में कितनी बदल गयी। मेरा सारा उत्साह, जोश जाने कहां खो गया था। दुनिया से लड़ लेने ही हिम्मत ही नहीं होती, खुद के जीत जाने का यकीन ही नहीं है। मेरी आँखें अंदर धंस गईं। महसूस होता कि शरीर की सारी शक्ति ही कहीं गुम हो गयी है। मेरे मस्तिष्क में अजीब सा डर समा गया था। अंधेरे से बहुत डर लगता, हर आहट डरा देती, हर बात पर चिहुंक उठती। छोटी-छोटी बातों पर कांपने लगती। कोई भी बात याद नहीं रहती। एक बात करती दूसरी भूल जाती। चावल गैस पर चढ़ाकर बंद करना भूल जाती, लड्डू को पढ़ाते-पढ़ाते चुप्प हो जाती हूं।


दिल बात-बात पर बैठ क्यों जाता है, हर बात पर मैं क्यों घबरा जाती हूँ, क्यों लगता है सबकुछ ठीक नहीं होगा? यह क्या हो गया है मुझे? मैं खुद को समझा नहीं पा रही तो परिवारवालों को क्या समझाऊँ?

उपन्यास रूममेट्स का एक अंश

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प्रभा खेतान के साहित्य में स्त्री जीवन का संघर्ष

पंकज कुमार

जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में शोधरत है. संपर्क:ssatyarthi39@gmail.com

स्त्री विमर्श अपने आप में पुरुष द्वारा थोपी गई जाति के लैंगीकरण  की अमानवीय व्यवस्था के विरूद्ध स्त्रीत्व का  जीवंत संघर्ष है. पितृसत्ता तथा पुरुषवाद स्त्री जाति का जन्म से ही बनावटी भेदमूलक कसौटियों पर स्त्रीलिंगी जैविकता में कैद कर उनकी यौनिकता, प्रजनन क्षमता, उत्पादन क्षमता को मनमाने सता आधारित अर्थों व उद्देश्यों के लिए मालिकाना हक से निचोड लेते हैं। स्त्री-विमर्श स्त्री के जीवन देह, श्रम, सौन्दर्य, छवि को दोहने वाली मादाभक्षी पितृसत्ता के सार्वभौमिक लिंगवादी वर्चस्व विरोधी, स्त्रीजाति का अस्मितामूलक विमर्श और सामाजिक-राजनीतिक उन्नयन के लिए चौतरफा संघर्ष है। यह संघर्ष साहित्य के जरिये जिन लेखिकाओं ने किया है उनमें प्रभा खेतान प्रमुख हैं. प्रभा खेतान कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी और उषा प्रियंवदा के बाद की पीढी की महत्वपूर्ण उपन्यासकार हैं।


प्रभा खेतान ने लेखन-विचार तथा व्यवसाय दोनों को सफलतापूर्वक साध कर चौतरफा मोर्चों पर अपने आप को साबित किया है। स्त्रियों द्वारा इस तरह खुद को साबित करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि पुरुष समाज स्त्रियों को कमतर इन्सान और कम काबिल लैंगिक ईकाई के रूप में जानता पहचानता और मानता है। प्रभा खेतान की व्यवसायिक सफलता सिर्फ विरासत नहीं है। अपनी मेहनत से पाया गया मुकाम भी है। प्रभा खेतान लिखती है ‘‘….व्यापार के वे शुरू के दिन थे बिल्कुल ताजा, हर अनुभव के लिए उत्सुक मन। आज जैसा मन उन दिनों नहीं था। आज तो कितनी चीजों को देखकर अनदेखा करती हूँ। चुनौतियों से बचकर निकलती हूँ। उनकी कीमत भी चुकायी है। औरतपने का हीन भाव, पुरुषों की दुनिया में बार-बार अपना औचित्य स्थापित करना चाहता रहा है। क्या मैं औरत हूँ इसलिए यह काम नहीं करूँगी? करके दिखा दूँगी। दिखाया पर देखा भी कम नहीं?’’  प्रभा खेतान अपनी अधिकांश रचनाओं में उसी तरह मौजूद रहती है, जैसी अपनी कहानियों में लेखक खुद दर्शक भी, सूत्रधार भी और चरित्र भी ।


प्रभा खेतान अपनी रचनाओं में जहाँ एक ओर स्त्री जीवन की विविध समस्याओं को उठा रही हैं, वही दूसरी ओर उन्होंने इन समस्याओं से स्त्री को रोज दो-चार कराने वाली सामाजिक व्यवस्था की सच्चाई से रु-ब-रू भी कराया है. उन्होंने अपने उपन्यासों में पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था के बीच स्वतन्त्रता तथा समानता के अधिकार के लिए संघर्षरत विविध चरित्रों को गढ़ा है। ये स्त्री-पात्र जहाँ एक ओर पितृसतात्मक समाज व्यवस्था की सड़ी-गली मान्यताओं को मानने से इन्कार कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर अपने लिए अलग राह बनाने की ओर अग्रसर हैं। चिंतन सम्बन्धी पुस्तकों में उन्होंने उदारीकरण के बाद बदलते आर्थिक और सामाजिक पदिदृश्य का स्त्री-जीवन पर पड़ने वाला प्रभाव पूंजीवादी अर्थतंत्र में स्त्री-श्रमिक के समक्ष उपस्थित चुनौतियों तथा उसके शोषण के विविध रूपों को रेखांकित किया है।

स्त्री आत्मकथा : आत्माभिव्यक्ति और मुक्ति प्रश्न


पूंजीवादी बाजार व्यवस्था में यौनकर्मी के रूप में स्त्री स्वयं एक वस्तु बनती जा रही है। इस संबंध में अभय कुमार दूबे लिखते हैं कि- ‘‘भूमण्डलीकरण, समाचार माध्यम –छपे हुए शब्द से लेकर दृश्य श्रव्य माध्यम,  एक औरत की जो छवि पेश कर रहे हैं उसमें वह एक सुन्दर देह के सिवा कुछ नहीं हैं।’’  राष्ट्र अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए इसे एक संसाधन के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। प्रभा खेतान लिखती हैं कि- ‘‘फिलहाल स्त्री-श्रम को भूमण्डलीकरण के विधेयक प्रभाव से कहीं अधिक प्रौद्योगिकी  का निषेधक प्रभाव झेलना पड़ रहा हैं।’’



अशिक्षित तथा प्रौद्योगिकी ज्ञान से रहित स्त्रियों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए उन्हें इस ज्ञान से लैस करने की आवश्यकता है। ‘‘स्त्री श्रम को अत्यन्त निचले पायदान पर रखा जाता है। वह मात्र सहायिका/ हेल्पर है, मगर मास्टर नहीं।’अब तक स्त्रियों को वस्त्र, इलेक्ट्रानिक्स, संचार,चमड़े का सामान बनाने वाले उद्योगों में निचले दर्जे का काम मिलता रहा है।ज्यादातर कुशलता वाला और प्रबंधन वाला काम पुरुषों को ही दिया जाता है।
स्त्री के प्रेम की अभिव्यक्ति – ‘अन्या से अनन्या’


समलैंगिक स्त्रियों का दावा यह रहता है कि चूँकि वह पुरुष से प्यार नहीं करती इसलिए वह पितृसतात्मक व्यवस्था को बाहरी व्यक्ति होने के कारण चुनौती देने में ज्यादा सक्षम है। चूँकि इतरलिंगी व्यवस्था को स्वीकारने वाली स्त्री संसर्ग के दौरान पुरुष का आधिपत्य स्वीकरती है इसलिए वह बाह्य जगत में भी पुरुष के आधिपत्य को चुनौती नहीं दे सकती। प्रभा खेतान समलैंगिक स्त्रियों के इस दावे के प्रति शंका जाहिर करते हुए कहती है। ‘‘क्या लेस्बियन स्त्री सच में पितृसतात्मक संरचना से मुक्त है? क्या, अपने स्वयं के यौन चुनाव में वह उतनी ही स्पष्ट है अपने साथी को उतने ही समान स्तर पर रखती है, जितना की वह दावा करती है। कहीं पर रखती है, जितना की वह दावा करती है। कहीं वह स्वयं भी इतर वैयक्तिक यौन-संबंधों में पितृसतात्मक संरचना को अनजाने ही स्वीकार तो नहीं कर रही।’’


प्रभा खेतान ने साहित्य तथा अलोचना में स्त्री साहित्य की क्या स्थिति है, इसे भी अपने चिंतन का विषय बनाया। ‘‘स्त्रीकरण एक अमानवीय व्यवस्था है, जिसके तहत पुरुष ने अपने विचारों व अवधारणा के अनुसार स्त्री का निर्माण किया है। ऐसे निर्माण में स्वाभाविक है कि स्त्री की सहमति नहीं रही होगी। साहित्य जगत में भी लेखक ने अपनी कल्पना के अनुसार स्त्री स्वरूप का निर्धारण किया है।’’

अपने अधिकांश उपन्यासों में स्त्री जीवन की विविध समस्याओं को प्रभा खेतान ने चित्रित किया है। चाहे पूरब हो या पश्चिम, स्त्रियाँ इस पुरुषवादी व्यवस्था के बीच शोषित होने के लिए अभिशप्त रही हैं. अपनी बात को वो ‘अपने-अपने चेहरे’ उपन्यास में स्पष्ट कहती है कि ‘‘आप नहीं जानती बहन जी! औरत की सारी स्वतन्त्रता उसके पर्स में निहित है।’’   औरत को सही रूप में आजाद देखने के लिए उसे आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनना पडेगा। स्त्रियाँ आज आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो चुकी है फिर भी वह बार-बार पुरुष से छली जा रही है। इस छल के कारण वह कुंठित हो गई है। ‘‘केवल आर्थिक ढाँचा बदलने से स्त्री को पुरुष के दिमाग में जो स्त्री की पुरुष-हित में छवियों गढ़ता है सम्पूर्ण बदलाव नहीं लाया जाता है।’’

जेंडर की अवधारणा और अन्या से अनन्या


प्रभा खेतान पूँजीवाद की सबसे घिनौनी देन देह व्यापार को मानती हैं, जो उनके ‘अग्निसम्भवा’ उपन्यास में मुखरता से स्पष्ट होता है ‘‘शरीर बेचना भी धंधा कहलाता है। पूँजीवादी समाज की सबसे घिनौनी देन बादशाहों की रखैल से लेकर गली बार में बैठी हुई औरत तक मुझे सबसे नफरत है। आज के युग में कोई मजबूरी का हवाला दे बिल्कुल बकवास है ।’’   प्रभा खेतान ने अपने चिंतन में भी यौन कर्म का सभ्य समाज के लिए कलंक बताया है। लेकिन वे इसके लिए समाज की उस मानसिकता को बदलना चाहती हैं जिसमें वेश्या को तो लांछित और कलंकित किया जाता है जबकि पुरुष ग्राहक को समाज बहिष्कृत नहीं करता। वही उनके उपन्यास ‘अपने-अपने चेहरे’ में पितृसतात्मक समाज स्त्री के मानस का निर्माण इस प्रकार करता है कि वह पुरुष के अत्याचार को नियति समझकर स्वीकार करती चली जाती है। वह स्त्री के लिए संस्थानिक विवाह को महत्व देती है, चाहे उसे पुरुष प्रताडित ही क्यों न करे? पारम्परिक संस्कारों से ग्रस्त सरला के मानस में स्त्री जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता दो चुटकी सिंदूर ही है। ‘‘मन्नो तुम ठीक कह रही हो। अरे कितना भी बिजनेस कर ले, पढ़ाई कर ले, लेकिन एक चुटकी सिन्दुर का आत्मबल ही अलग होता है।’’

पितृसत्तात्मक क समाज द्वारा स्त्री को बच्चा बनाने वाली मशीन समझे जाने पर व्यंग्य करते हुए कहती है, ‘‘मुझे क्यों लाए थे आपके भाई बच्चा पैदा करने ही ना? तो जनकर पटक दिया। बच्चे क्या मेरे कहलाए।’’  पत्नी पति की सुख-सुविधा के लिए है यह एक ऐसी मानसिकता है जहाँ पुरुष प्रधानता हमेशा गौण स्त्रित्व पर हावी रहती है। ‘छिन्नमस्ता’ इसका एक पुख्ता उदाहरण है। इसी के समरूप  ‘‘अरस्तु ने स्त्रियों को गुलाम के बराबर ला खडा किया और कहा कि ‘‘उनके अस्तित्व की सार्थकता इसी में है कि वे slaves, artisans and traders  की तरह highest  happiness of the few के लिए प्रस्तुत रहें- राहों में बिछी हुई सी।’’



इस प्रकार स्पष्ट है कि वैदिक काल से प्रारम्भ होकर भूमण्डलीकरण के इस दौर में महिलाएँ अपनी सामाजिक प्रस्थिती (स्टेटस) और सम्मानजनक अस्तित्व के लिए संघर्षशील हैं किन्तु जैविक- नैसर्गिक भावना के वशीभूत सदैव वंचना की शिकार होती रही है। क्या स्त्री अपनी सर्वाभौमिक पहचान बनाने में समर्थ नहीं होगी? क्या पितृसतात्मक समाज उसे अपने समतुल्य नहीं देख पाएगा? क्या स्त्री अपने अस्तित्व के लिए इसी प्रकार लालापित रहेगी? ऐसे ही कुछ यक्ष प्रश्न है जो प्रभा खेतान के सृजनात्मक साहित्यक कृतियों की केन्द्रिकता का निर्धारण करते है। लेखिका के साहित्यिक सृजन की अन्तर्वस्तु महज अतीत और वर्तमान की अपेक्षा ही नहीं अपितु भविष्य के पुरुष वर्चस्ववाही समाज से भी यही यक्ष प्रश्न करता ही रहेगा।

सन्दर्भ सूची


   1 .खेतान प्रभा- बाजार के बीचः बाजार के खिलाफ, पृष्ठ सं. 77-78 
   2 .दूबे, अभयकुमार- हंस – स्त्री भूमंडलीकरण पितृसत्ता के नए रूप- पृष्ठ 40 
  3 .खेतान प्रभा- उपनिवेश में स्त्री, पृष्ठ सं. 151 
  4. खेतान प्रभा- उपनिवेश में  स्त्री, पृष्ठ सं. 36
  5. खेतान प्रभा- आओ पेपे घर चले, हंस अंक, अप्रैल, 1989, पृष्ठ सं. 73
  6. सिंह, प्रेम – वसुधा अंक विशेषांक, 59-30, पृष्ठ सं. 191
  7. प्रभा खेतान- अग्निसंभवा, हंस अंक मार्च 1992, पृष्ठ सं. 68
  8. प्रभा खेतान- अपने-अपने चेहरे, पृष्ठ सं. 20-21
  9. प्रभा खेतान- छिन्नमस्ता, पृष्ठ 29
  10.अनामिका – स्त्रीत्व का मानचित्र, पृष्ठ 19-20




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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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लिखने बैठा अभिजीत भट्टाचार्य की कुंठा लिख बैठा सहारनपुर का जोश

संपादकीय 


यह पहली बार नहीं है कि अभिजीत भट्टाचार्य ने अश्लील और आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की है, और न ही यह पहली बार है कि बॉलीवुड के किसी कलाकार ने किसी महिला या महिलाओं के खिलाफ अभद्र टिप्पणी की है. दरअसल स्क्रीन बौद्धिकता का आतंक यह है कि उधर से कोई भी शख्स किसी भी विषय पर मुंह खोले वह विमर्श का विषय बन जाता है.दक्षिण-वाम,सत्ता-विपक्ष सबके के पास अपने-अपने स्क्रीन बौद्धिक हैं. कहीं शबाना आजमी,जावेद अख्तर का राज है तो कहीं परेश रावल,अनुपम खेर और अभिजित भट्टाचार्य जैसे शख्स का.



अभी परेश रावल का लेखिका अरुंधती राय के खिलाफ बयान अपने अंतिम समर्थन या विरोध तक पहुंचा भी नहीं था कि गायक अभिजीत भट्टाचार्य ने जेएनयू की शोध छात्रा और छात्र संगठन आइसा की नेता शह्ला रासीद के खिलाफ अश्लील और सेक्सिस्ट ट्वीट किया. सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग और उन्मादी बयानवाजों की ऐसी भीड़ है कि इन दोनों को खूब समर्थन भी मिलने लगे, इसके बावजूद कि एक बड़े समूह ने इनकी निंदा की. समर्थन करने वाले लोगों में वे भी हैं, जिन्हें या तो भारत के प्रधानमंत्री फॉलो करते हैं या जो भारत के प्रधानमंत्री को न सिर्फ फॉलो करते हैं, उनके लिए सोशल मीडिया में बाकायदा कैम्पेन करते हैं. अभिजीत भट्टाचार्य अपने महिला और गरीब विरोधी बयानों से पहले भी सुर्खियाँ बटोरते रहे हैं- वही समर्थन और विरोध वाली सुर्खियाँ, लेकिन इस बार ट्वीटर ने उनपर कार्रवाई करते हुए उनका अकाउंट बंद कर दिया. वैसे अभिजीत अपने ट्वीट के लिए इससे अधिक सजा के काबिल हैं. अभिजीत के बयान के बाद बॉलीवुड की शख्सियतों को भी आगे आना चाहिए था और उसका बायकाट सुनिश्चित करना चाहिए था.

इन बयानवीरों ने जिन महिलाओं के खिलाफ बयान दिया है वे समाज में यथास्थितिवाद के खिलाफ सक्रिय शख्सियतें हैं. अरुंधती राय न सिर्फ एक सम्मानित लेखिका हैं बल्कि समाज में अलग-अलग रूपों में कायम वर्चस्ववाद के खिलाफ सक्रिय भी रहती हैं. शाहला इन दिनों छात्र आंदोलनों में एक जाना-पहचाना नाम है और स्त्री अधिकारों को लेकर सक्रिय रहती हैं. नागरी समाज में सक्रिय इन महिलाओं की जीवटता और वर्चस्ववादी व्यवस्था के खिलाफ उनकी प्रतिबद्धता को एक दो रावल या भट्टाचार्य जैसे लोग प्रभावित नहीं कर सकते, चाहिए मीडिया उनकी स्क्रीन लोकप्रियता को बौद्धिकता का जामा पहनाने की कितनी भी कोशिश करे.



लेकिन आज इन प्रतिबद्ध और निरंतर सक्रिय नागरी महिलाओं की छवि से ज्यादा मुझे उन ग्रामीण महिलाओं की छवि आकर्षित कर रही है, जो सहरानपुर के इलाकों में क्रूर जातिवादी और स्त्रीविरोधी लम्पटों के खिलाफ डटी हुई हैं-इन महिलाओं के संघर्ष और मुद्दों को जाति और जेंडर के अंतर्संबंध की समझ के लिए भी समझा जाना चाहिए और ब्राह्मणवादी पितृसत्ता और उसके खिलाफ संघर्ष को समझने के लिए भी. ये ग्रामीण महिलायें देश में एक विचार के लिए, समता के एक सिद्धांत के लिए और उसके एक प्रतीक के लिए मर मिटने को तैयार हैं, जूझ रही हैं, तलवार के हमले सह रही हैं तो तलवारों को चुनौती भी दे रही हैं. ये शहरों में जाति और जेंडर के मुद्दों पर संघर्ष कर रही महिलाओं की जमीनी प्रतिरूप हैं.


हाँ, मैं सहारनपुर के घडकौली गाँव की बात कर रहा हूँ. वही घडकौली जहां लगाया गया ‘द ग्रेट चमार’ लिखा हुआ बोर्ड इन दिनों सुर्ख़ियों में है. इस बोर्ड को अपनी अस्मिता से जोड़कर ये महिलायें पहरा दे रही हैं ताकि कोई उसका नुकसान नहीं पहुंचाए. इस बोर्ड को गाँव के सवर्णों ने और पुलिस ने एक बार नुकसान पहुंचाया भी था, जिसे लेकर गांव के पुरुषों के साथ इन महिलाओं ने भी लाठियां खाई. महिलाओं के स्पष्ट समझदारी भी है वे ‘चमार’ कहे जाने को लेकर सवाल किये जाने पर जवाब देती हैं कि ‘पहले वे जब हमें चमार कहते थे, उसमें हीनताबोध का भाव था. आज हम अपनी इस जाति में ‘चमार’ कहे जाने में गर्व महसूस कर रहे हैं, तो उन्हें परेशानी हो रही है.’ वे इस सवाल पर कि क्या बहन जी यानी उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री मायावती में अपनी ताकत महसूस करती हैं या भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर से. बहन जी का मुख्यमंत्री होना उन्हें अच्छा लगता है, सशक्ति के अनुभव के लिए लेकिन चन्द्रशेखर इस अनुभव को एक लक्ष्य भी दे रहे हैं ‘बच्चों को पढ़ाने, संगठित करने और बाबा साहेब की राह पर प्रेरित करने का.’ उनके शब्दों में’ चंद्रशेखर उनके संघर्षों में शामिल हैं, इसलिए वे उनके नेता हैं.’



मैं बात शब्बीरपुर की भी कर रहा हूँ. जहां राजपूत जाति के लोगों ने दलितों का घर जला दिया है, उनपर तलवारों से हमला किया है. उसमें कुछ महिलायें घायल भी हुई हैं. जब हमसब शब्बीरपुर गाँव गये तो हमसे सबसे ज्यादा संवाद बनाने वाली महिलायें ही थीं. वे इस जाति-हिंसा के खिलाफ हैं और उससे जूझने के लिए तैयार हैं. उन्हें यह अहसास है कि दलितों के हालात अब वैसे नहीं रहे जो आज से कुछ दशक पहले थे. उन्होंने कहा कि ‘हमारे यहाँ लड़के, लडकियां सब पढ़ रहे हैं, नौकरियाँ ले रहे हैं. राजपूतों के यहाँ लोग नहीं पढ़ते, इसलिए नौकरी भी नहीं मिलती उन्हें. यही कारण है कि वे आक्रोश में हैं कि कल तक हम जिन्हें दबा कर रखते थे, वे आज तरक्की कर रहे हैं.’ ये महिलायें दलित- असर्शन को समझती हैं. इन महिलाओं से मिलना सुखद अनुभूति वाला रहा, वे हारने को तैयार नहीं हैं. बाबा साहेब उनके आदर्श हैं, घरों में मायावती की तस्वीरें हैं. हमसे बात करते हुए वे स्पष्ट करती हैं कि क्यों संत रविदास का मंदिर या बाबा साहेब की मूर्ति सवर्णों को परेशान करते हैं. अस्मिता और अधिकार के बोध से भरी इन महिलाओं का जोश और उनकी समझदारी आकर्षित करती है किसी अभिजीत भट्टाचार्य या परेश रावल की बौद्धिकता न अरुंधती राय को समझ सकती है, न शाहला मसूद को और न गांवों में जोश, जज्बे और बोध से भरी इन महिलाओं को.

संजीव चंदन

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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
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दलित पत्रकारिता का जूनून: कठिन डगर की राह पर डॉली कुमार

स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत हमने नेतृत्व के कई नामों के बारे में या तो स्वयं उनसे  स्वयं या किसी लेखक द्वारा प्रस्तुत आलेख पढ़े. बहुत कम समय में वैकल्पिक मीडिया में अपनी शानदार उपस्थिति बनाने में कामयाब हुई नेशनल दस्तक की मुखिया डॉली कुमार के बारे में जानते हैं उनकी ही ज़ुबानी- प्रेम से लेकर कारोबार तक की पहलकदमी को: 



मैं मध्यवर्गीय परिवार में अपने मां-पिता की पांचवीं संतान हूँ. पिता, विजेंद्र पाल, पोस्टल विभाग में कर्मचारी थे, अब रिटायर्ड हैं, मां, भारती, गृहिणी रही हैं. दादा जिले सिंह किसान थे. मेरी प्राथमिक पढाई अपने आस-पास में जो स्कूल था उसमे हुई है. हिंदी मीडियम स्कूल था यूपी बोर्ड का उसमे हुई. मैं पढ़ाई में अच्छी थी. पापा चाहते थे कि बेटियां पढ़ें-लिखें तो सभी को पढ़ाया. मेरा कुछ ज्यादा इंटरेस्ट था पढ़ने-लिखने में तो फिर पापा ने मुझे यहां, दिल्ली में सीबीएसई स्कूल में दाखिला दिलवाया. अर्वाची भारतीय स्कूल में मैंने एडमिशन लिया, इंग्लिश मीडियम स्कूल था सीबीएसई बोर्ड. फिर मेरी सारी दिल्ली में ही होती रही. ग्रेजुएशन भी फिर दिल्ली विश्वविद्यालय  से हुआ, उसके बाद मास्टर्स मैंने इग्नू से किया और उसके बाद पीएचडी.



घर चूकी मध्यवर्गीय था, इसलिए सामान्य सोच थी कि लड़कियां हैं, इनकी पढ़ाई-लिखाई करानी है और शादी तय करानी है. लेकिन पापा को बहुत उम्मीदें थी कि मेरी बेटियाँ जितनी भी हैं पढ़ लिख कर किसी अच्छी जगह पर जायें. सब के लिए उन्होंने कोशिश की. हालांकि कुछ-कुछ असर होता है लड़कियों पर भी, जब वे अपने आस-पास का समाज देखती हैं. वे देखती हैं कि लड़कियां शादी करके घर छोड़कर जा रही हैं, तो मेरी बहनों का भी इसी तरीके से एक अप्रोच बन गया कि उनको ज्यादा कुछ नहीं करना है. मैं कुछ अलग सोचती थी. पापा ने प्रोत्साहित भी किया पढ़ने के लिए, उन्होंने कभी मेरे ऊपर दवाब नहीं बनाया कि तुम्हें शादी करनी है या यह कि तुम पढ़ो. वे चाहते थे कि मैं जितना पढ़ना चाहती हूं पढूं. मुझे आगे जो करना है करूं.

बुलंद इरादे और युवा सोच के साथ

हां, पापा के ऊपर दादा जी की तरफ से भी दवाब रहता था कि बेटियों की जल्दी-जल्दी शादी करो. हालांकि मेंरे दादा जी ने भी मुझे नहीं कहा कभी. जब तक वे ज़िंदा रहे मेरा हर स्तर पर समर्थन करते रहे. जो मेरी बड़ी बहनें थीं उनकी शादी जल्दी कि गई. मैं आखिरी बेटी थी तो सबको ये था कि नहीं ठीक है, चार की शादी हो चुकी है, एक बची है तो उसको अवसर दिया जा सकता है.

जाट परिवार से हूँ. सारे समाजों की तरह यह भी एक पितृसत्तात्मक समाज है. जितना मैनें देखा है, औरतें घर में काम करती हैं. मतलब कि आप वही चीजें आप कर रही हैं, जो चीजें आपके लिए तय हैं, वह तय समाज कर रहा है. बचपन से अपने घर चूल्हा-चुका, शादी के बाद में दूसरे का घर जा कर संभालना है.

:दलित महिला उद्यमिता को संगठित कर रही हैं सागरिका

मां तो दसवीं पास थीं. लेकिन मेरे नजरिये से उन्होंने बहुत दवाब का जीवन जिया. वही दवाब जो मध्यवर्गीय पितृसत्तात्मक समाज में गृहस्थ स्त्रियों पर होता है. मैंने उन्हें वही देखा है. हर वक्त काम करते हुए ,चाहे घर का हो चाहे घेर का हो. हमारे यहां घेर मतलब है, जहाँ भैंस वगैरह होती हैं. ज्यादातर बैठकें होती हैं वहाँ. आदमी लोग वहीँ पर बैठते हैं. घेर में यदि औरतें बैठती हैं तो अलग बैठती हैं-एक डिविजन होता था कि जब आदमी बैठ के बात कर रहे हैं बैठक में, तो औरतें वहां पर नहीं होती हैं.


मेरे पापा प्रेमचन्द आदि के साहित्य पढ़ते थे. हालांकि तब प्रेमचंद से या किसी भी साहित्य से मेरा बिलकुल भी जुड़ाव नहीं था. साहित्य मैंने पढ़ा ही नहीं था. बचपन में मैंने प्रेमचंद का उपन्यास निर्मला पढ़ा, लेकिन उस वक्त मंँ बिलकुल भी नहीं समझ पाई कि निर्मला क्या है, क्यों लिखी गई है. मैंने एक कहानी के तौर पे उसे पढ़ लिया. भीमराव अम्बेडकर कॉलेज, दिल्ली यूनिवर्सिटी से मैंने बीए किया. ज्योग्रफी, हिस्ट्री मेरा विषय था.

पूर्ण शराबबंदी के लिए प्रतिबद्ध वड़ार समाज की बेटी संगीता पवार

वहीं कॉलेज में मेरी मुलाक़ात सुमित (अब पति) से हुई. हम क्लासमेट थे. फिर दोस्ती हो गई. एक दूसरे को जानना शुरू किया, उस वक्त तक भी ऐसी कोई चेतना नहीं थी. बस ठीक है चल रहा था. पढ़ रहे थे. ये था कि नौकरी करनी है, आगे कुछ कमाना है. जब हम मिले थे तो सुमित की जाति हमें मालूम नहीं थी और तब मेरे लिए उनकी जाति इशू भी नहीं थी. अब मैं यह नहीं बता सकती कि प्रेम कब शुरू हुआ, क्यूंकि आपको नहीं पता होता है कि आप कब आकर्षित होते हैं, एक-दूसरे की तरफ लेकिन जब हम दोनो ने एक दूसरे को कहा कि हां हम आगे बढ़ना चाहते हैं, जीवन साथी बनना चाहते हैं, जब मैंने कहा कि ‘मैं तुमसे प्यार करती हूं’ उससे पहले मुझे पता था कि सुमित किस जाति से आते हैं, और मुझे यह भी पता था कि मुझे आगे किन चीजों का सामना करना है- सुमित जाटव थे और मैं जाट.


जाति, एक सामाजिक सच्चाई के रूप में बचपन से ही पता हो गई थी, तब जब मुझे बताया जाता था कि मैं जाट जाति से हूं, मुझे बताया जाता था कि ये पंडित हैं, मुझे ये बताया जाता था कि ये पंडित घर आते हैं तो उनको खाना खिलाया जाता है, उनको सम्मान दिया जाता है, मुझे बताया जाता था कि वे चमार हैं, उनके साथ में बैठा उठा नहीं जाता है, उनके साथ खाना नहीं खाया जाता है. मैं तब अम्बेडकर को भी जानती थी, लेकिन सिर्फ नील कोट वाले आदमी के रूप में. अम्बेडकर का नाम जरुर पढ़ा था कि वे संविधान निर्माता हैं, बस इतना ही पढ़ा था किताबों में. कौन हैं, क्या हैं, बहुत नहीं पता था. जिस तरीके से हम कुछ और क्रांतिकारियों का नाम पढ़ लेते हैं, जब हम स्वतंत्रता संग्राम के बारे में पढ़ रहे होते हैं. मेरी कुछ सहेलियां थीं, जो चमार जाति से थीं. मैं उनके घर जाती थी तो वहां वह तस्वीर देखती थी, उनके घर में लगी हुई होती थी. लेकिन कभी उससे आगे जानने की कोशिश नहीं की, गंभीर नहीं हुई. बहुत सारे लोग, जो जाति से चमार थे, हमारे खेत-वगैरह में काम करते थे, उनके घर में शादियाँ वगैराह होती थी तो ठीक है कि मद्द कर दी, कपड़े वगैरह दे दिये, खासकर उनकी बेटी की शादी है तो सब चीजें दे दी.  लेकिन जब उनके घर से जब कोई सामान आता था मिठाई वगैर ,तो मुझे याद है हमें वो चीजें खाने के लिए मम्मी या फिर घर की अन्य औरतें मना करती थीं कि ‘नहीं चमार के घर से आया है मत खाओ’, नहीं खाना चाहिए. एक बार के रसगुल्ले मुझे याद हैं. एक बार रसगुल्ले आये थे, तो हमें खाने के लिए मना किया गया था. हालांकि ज्यादातर ऐसी मनाही मैंने मेरी मम्मी से या बाकी लोगों से सुनी थी. पापा ने हमें ऐसा कभी नहीं कहा.


दलित महिलाओं के संघर्ष की मशाल: मंजुला प्रदीप

शादी के वक्त मुझे अहसास था कि मैं जिस कम्युनिटी से आती हूं, वहाँ उनका मानना होता है कि लड़की घर की इज्जत होती है. मैंने ऐसे भी मामले सुने थे, जिसमें जब लड़की ने किसी और जाति में किसी लड़के से शादी करने की हिम्मत दिखाई, या प्यार करने कि हिम्मत दिखाई तो उसको मार दिया गया. मुझे अपने अपने माँ बाप पर ये विश्वास था कि वे ऐसे नहीं हैं, लेकिन आपको अपने रिश्तेदारों पर भरोसा नहीं होता है.

घर को जब हमारे रिश्ते की भनक लगी तो घर से फोन आया कि घर आओ, उस वक्त मुझे सुमित ने तुरत छोड़ा था, मुझे सर्टिफिकेट वगैरह निकलवाना था. फोन के अंदाज से मुझे शक हुआ कि शायद कुछ ठीक नहीं है. फिर घर गई तो घर में पहले से कुछ लोग बैठे हुए थे. दीदी वगैरह, मम्मी, घर के लोग थे. ऐसा नहीं था कि घर के लोगों को हमारी दोस्ती का पता नहीं था. मां की सुमित से बात होती थी, फोन पर. कॉलेज में एक बार पापा मिल चुके थे.

मैं तब आशंकाओं से भरी थी, कैद कर दिये जाने की आशंका, जल्दी से शादी कर देने की आशंका या और भी बहुत कुछ. लेकिन मैंने कुछ नहीं बोला, हां भी नहीं बोला और ना भी नहीं बोला. मैंने रात में सुमित को बताया कि मेरे घर को पता चल चुका है. सुमित ने कहा कि ‘तुम्हें कोई भी प्रॉब्लम हो तो मुझे तुरत बताना. मैं वहीं पर तुम्हारे गाँव के बाहर रहूँगा वहीं पर. पुलिस को भी इन्फॉर्म कर देता हूं.’ मैंने कहा, ‘नहीं ऐसा नहीं ,है लेकिन मुझे डर लग रहा है, मतलब मुझे नहीं पता इनका अगला रिएक्शन क्या होगा!’ पापा ने अगले दिन मुझसे पूछा, ‘मैंने हां नहीं कहा, लेकिन मैं रोने लगी. फिर पापा समझ गये कि इसका मतलब है तुम मना नहीं कर रही हो, तो इसका मतलब तुम चाहती हो. उसके बाद पूरा एक इमोशनल दौर शुरू हुआ. पापा ने ज्यादा नहीं बोला लेकिन चाचा-चाची आदि ने आकर बहुत समझाया. उन्होंने समझाया, ‘कुछ तो हमारी इज्जत का सोचा होता. मतलब चमार तुम ले आयी, चमार जाति का उठा के ले आयी लड़का. इस तरीके से नहीं चलता है समाज और ये सब चीज| शुरुआत में मैं बहुत डरी हुई थी. ये प्रक्रिया पूरे दो महीने तक चलती रही.

बहुजन आंदोलन की समर्पित शख्सियत: मनीषा बांगर

उस दौरान डायट में ट्रेनिंग ले रही थी. टीचिंग प्रोफेशन के लिए. ट्रेनिंग के लिए मैं हर बार घर से बाहर जाती थी. उसके लिए मुझे बंदिश नहीं थी. धीरे-धीरे जब इतनी सारी चीजें होती गईं थीं. मैंने समझाने की कोशिश भी की. फिर मैं भी खुलने लगी. मैंने सोचा मैं बोलूंगी. हां मैं बोलने लगी. विद्रोही भी कह सकते हैं इन अर्थो में कि मैं उनकी बात पे मानने वाली नहीं थी. मैं डायरी लिखने लगी. अपनी सारी बातें उसमें लिखने लगी, जो मैं उनसे नहीं बोल पाती थी. मैंने बोलना भी शुरू किया कि ‘आप मेरी शादी कहीं और करा देंगे तो मैं उस लड़के को बता दूंगी. मैं आपको ऑप्शन दे रही हूं कि जिंदगी भर शादी नहीं करूंगी. शादी करुँगी, तो उससे करुँगी. आप नहीं करना चाहते उससे शादी, तो आप मुझे शादी के लिए जिंदगी में कभी फोर्स मत कीजिये. यदि आपको जाति के आलावा लड़के में कोई और समस्या दिखती है कि वह कामयाब नहीं है, अच्छा इन्सान नहीं है, एजुकेशन अच्छा नहीं है, फैमिली अच्छी नहीं है तो आप मुझे बताइए. कुछ तो मुझे ऐसा लॉजिक दीजिये, जाति से अलग इस शादी के खिलाफ.’

सुमित ने अपना काम शुरू किया हुआ था, बहुत ज्यादा कामयाब नहीं थे, लेकिन काम शुरू किया था. हमने शुरू में बात की थी कि हम दोनो नौकरी करने लगेंगे तो हम अपने घर में बतायेंगे. अचानक हमारे सामने परिस्थिति भिन्न थी. सुमित भी बहुत परेशान रहते थे. रात में मुझे कॉल करते रहते थे. उनको डर लगता था कि कहीं मुझे कोई कुछ कर ना दे. पापा को सुझाव भी आते थे कि ‘मार दो लड़की है.’ लोगों ने कहा कि अरे ये तो लड़की है नाक कटवा देगी चमार से शादी करके. पापा ने उन सबको चुप करा दिया. एक बार घर पर मेरा फोन छीन लिया गया था, पापा ने फोन कर के कहा था कि उसका फोन उसे वापस करो और उसका फोन उससे कोई नहीं लेगा. क्योंकि सुमित ने पापा को फोन कर दिया था कि मेरी उससे बात नहीं हो पा रही है.उसने कहा था कि उसे बहुत डर लग रहा है, कि उसको किसी ने कुछ किया न हो. पापा से बात कर लेते थे सुमित. फिर पापा ने मुझसे ये कहा कि तुम्हें कुछ होने नहीं दूंगा. मेरे लिए सबसे लड़ना मुश्किल है, क्योंकि किसी को भी समझाना संभव नहीं है.’ हमारी जॉइंट फैमिली थी, बीस-पच्चीस लोग थे. आस-पास का समाज वैसा ही होता है. पापा का जब ये सपोर्ट आया, मेरे लिए इतना काफी था. वे मेरे पक्ष में खुल के नहीं आ पा रहे थे. क्योंकि चार बेटियां और भी थीं, जो शादीशुदा थीं. मेरी चाची ने जब मेरा फोन छीन लिया तो सुमित ने उन्हें धमका दिया था कि ‘अभी उसका फोन वापस करिये नहीं किया तो मैं पुलिस ले के आ रहा हूं.’ इसी वजह से शायद मैं और मजबूत हो पायी.  उधर सुमित के परिवार के तरफ से कोई मुद्दा नहीं था यह. सुमित के पापा ने मेरे पापा से बात की कि ‘बच्चे जब एक दूसरे को पसंद करते हैं तो हमें कोई समस्या नहीं होनी चाहिए. ये दोनों एक साथ पढ़ते हैं, दोनों क्वालीफाईड हैं तो इस तरह की कोई प्रॉब्लम नहीं होनी चाहिए.’ एक दिन सुमित ने पापा से बात की. सुमित ने कहा कि आप उसको छोड़ने के सिवा जो भी कुछ कहेंगे, वो मैं कर लूँगा, लेकिन मैं उसे छोड़ नहीं सकता.’ पापा ने कहा कि थोड़े दिन रुक जाओ. सुमित कहते थे कि हम कोर्ट मैरेज कर लेते हैं. तुम आ जाओ, मैं सारी चीजें तैयार रखूँगा. मैं ऐसे नहीं आना चाहती थी| मैं यह चाहती थी कि मैं परिवार को मना लूं. अंततः पापा ने कोर्ट में शादी कर लेने की अनुमति दी और 23 नवंबर 2007 हम लोगों ने गाजियाबाद कोर्ट में शादी कर ली.

बाहर और घर, दोनो मोर्चों पर जिसने स्त्रीवादी संघर्ष किया

सुमित की वजह से मेरी सामाजिक गतिविधियों में मेरी रुचि बढ़ी. उन्हें लगता था कि हमें कुछ करना चाहिए. उनके जरिये ही मैंने चीजों को जानना समझना शुरू किया. जब उनका झुकाव मैंने देखा तो मैं भी फिर जानने लगी. मैं भी बातें करने लगी, समझने लगी चीजों को. यहां इस परिवार का माहौल भी ऐसा था कि मैंने यहां अंबेडकर को जाना. इन लोगों ने जब चौदह अप्रैल को एक कार्यक्रम कराया. वहाँ बाबा साहेब के ऊपर बनी फिल्म दिखाई गई. मैंने उस सिनेमा को देखकर बाबा साहेब डा. अंबेडकर को जानना शुरू किया. एक बार  सुमित के साथ मैं उनके गाँव  गई . हमारे घर की और औरतें भी गई थीं. वह मेरे लाइफ का टर्निंग पॉइंट था. वह साल था 2012 का| मैं उस वक्त दूसरे गाँवों  में भी गई, लोगों से मिली. वहां मैंने कुछ चीजें देखीं, जो मेरे लिए बहुत अलग थीं. मैंने मम्मी (सुमित की मां) से तब पूछा कि यहां इतने छोटे -छोटे गाँव हैं, इतनी जल्दी हम  घूम ले रहे हैं. मम्मी ने मुझे बताया कि ये गाँव नहीं है, पूरा गाँव वह है, जो तुम्हें उधर दिखाई दे रहा है- उनका इशारा सामने था. उन्होंने कहा कि ये तो दलितों कि बस्ती है, जहाँ तुम घूम रहे हो. मुझे आश्चर्य हुआ. जिस गाँव से मैं थी, वहां ऐसा नहीं था- दलितों के अलग मोहल्ले थे, लेकिन बस्ती अलग नहीं थी. दलितों की बस्ती यहाँ तो टापू कि तरह लग रही थी. मैंने ये चीजें नहीं देखी थी. जाति भेद-भाव देखा था मैंने. लेकिन ये मेरे लिए सीमा के परे चीज थी कि आपने आशियाना पूरा अलग बसाया हुआ है. यहाँ से मेरी समझ बढ़ी, झुकाव बदला. मैंने देखा कि इन बस्तियों, इनलोगों की खबरें अखबार में पढ़ने के लिए नहीं मिलती थीं. किसी टीवी चैनल पर देखने के लिए नहीं मिलती थीं. उसी समय दलित दस्तक पत्रिका के अशोक दास से भी संपर्क हुआ. तब ये लगा कि इन बस्तियों की खबरें, यहाँ के उत्पीडन की खबरें आयें, बेहतर तरीके से आये तो नेशनल दस्तक का उस समय प्लान दिमाग में आया.

सतपुड़ा की वादियों में सक्रिय आदिवासियों की ताई: प्रतिभाताई शिंदे

नेशनल दस्तक की शुरुआत दिसंबर 2015 में हुई. हालांकि इसकी प्लानिंग और इसे लांच करने में मैं शामिल थी, लेकिन मई 2016 से मैंने  इसका काम पूरी तरह अपने हाथ में लिया.  मुझे लगता है कि जिन बस्तियों, जिन लोगों की मैं बात कर रही हूँ उनके लिए ही जरुरी है ‘दलित-पत्रकारिता.’ नेशनल दस्तक का लोगों ने स्वागत किया है और हम भी लोगों की उम्मीदों पर खरे उतरने के लिए प्रतिबद्ध हैं.  नेशनल दस्तक से  लोगों की उम्मीद आज मेरी जिम्मेवारी है.

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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बाहर और घर, दोनो मोर्चों पर जिसने स्त्रीवादी संघर्ष किया

राजनीतिलक 
स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत राष्ट्रीय दलित महिला आंदोलन की नेता, दलित लेखक संघ की संस्थापक सदस्य, सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय राजनीतिलक बाहर और घर के मोर्चे पर अपने स्त्रीवादी संघर्षों की कहानी खुद कह रही हैं. 

बचपन की उबड़-खाबड़ पगडंडी पर चलते हुए मै किशोर अवस्था पार कर गयी थी. घर में उस समय संसाधनो का आभाव था. हमारी माँ मानसिक रूप से बीमार थी पिताजी ने उनके ईलाज में कोई कसर तो नहीं छोड़ी थी फिर भी उनकी हालत दिन प्रति दिन गिरती ही जा रही थी. माँ के अस्वस्थ होने के कारण पूरे परिवार पर उसका दुष्प्रभाव हुआ. हमारे पिताजी भरी जवानी में पत्नी के सुख से विमुख हुए तो हम माँ की देख-रेख और प्यार से. उनके बीमार हो जाने से घर के काम का बोझ हम बच्चों पर ही पड़ा मै बहनों में बड़ी थी और मनोहर हम सबसे बड़ा. बेवक्त उसकी पढाई में बाधा आ गई, मेरी पढाई भी को भी मुशिलें आईं. घर के छोटे बहन भाइयों की देख-रेख, माँ की देख-रेख और छोटी उम्र में घर के काम के बढ़ते बोझ से मै खिन्न ही रहती थी. अपने बन-ठन कर रहने और खुद को संवारने के प्रति एकदम बेरुखी अपनाई हुई थी. मैंने अपने लिए किसी भी चीज के लिए कभी जिद्द नहीं की. बचपन से ही ख़ुशी नाम का भाव लुप्त सा हो गया था.



बड़े भाई एक वामपंथी छात्र संगठन में जुड़ गये थे. उनके दोस्तों में रमेश भोसले, हबीब अख्तर, आनंद कुमार, हरीश, अंजलि देशपांडे, तारा नेगी, तेजिंदर सिंह आहूजा, भारती, जलिस, रंगीला, रईश, अशोक पानीपत, अक्सर घर आने लगे थे. उनकी विचारधारा के अनुसार गरीबों और अमीरों में गहरी खायी थी, स्त्री-पुरुष के बीच असमानता थी. अमरीकी सम्राज्यवाद और देश के अर्ध-सामंतवाद के विरुद्ध उनका छात्र -संघर्ष देश में समता लाने के लिए, क्रांति के सपने संजोता हुआ, पढाई के साथ-साथ समाज में बदलाव हेतु अपने सीमित  अनुभवों के साथ, सीनियर साथियों के दिशा निर्देश पर चल रहा था. बड़े भाई की विचारधारा में  बदलाव से घर में भी उनके व्यवहार में बदलाव आ रहा था. उन्होंने मुझे प्रेरित किया और छोटा भाई अशोक भी प्रेरित हुआ. उसने स्कूल में छात्रों की यूनियन बनाई उसके साथ में उसके दोस्त राम गोपाल शर्मा, प्रवीन चौधरी भी थे. छोटे बहन-भाई अभी छोटे थे अतः वे हम पर निर्भर ही थे. मेरे से छोटी बहन पुष्पा भारती पढने में होशियार थी, परन्तु बचपन से जिद्दी थी. पिताजी उसकी सब मांगें पूरी कर देते थे. पुष्पा पिताजी की लाडली भी थी, अनिता अभी छोटी थी तो वो हमेशा मेरे साथ ही चिपक कर रहती थी. छोटे भाई दोनों बहुत शैतान थे, कहना कम ही मानते थे
हम तीन बहन भाई सामाजिक कामो में सक्रिय हो गये. पिताजी की इच्छा के विरुद्ध मैं भी अपने जीवन में कुछ बनना चाहती थी. पिताजी बहुत ही सीधे सादे इंसान थे. समाज के नियमो के अनुसार हर पारंपरिक बाप यही चाहता है कि उनके बच्चों की शादी वक्त पर हो जाए. शादी को ही जीवन की परिणति मान लिया जाता है. मेरे सामाजिक कामो में सक्रिय होने से मैं घर के बहार निकलने लगी, कभी पीएसओ की बैठको में, कभी रविदास जयंती के जुलूस में, तो कभी आंबेडकर भवन के कार्यक्रमों में. वहीं से से मेरे सम्पर्को का विस्तार होने लगा, मेरी मित्र मण्डली बढने लगी. यह मित्र मण्डली उन युवक युवतियों की थी, जो डा आंबेडकर के प्रभाव से समाज में कुछ बदलाव लाना चाहते थे. स्त्री-पुरुष असमानता की समझ मेरी बढ़ तो रही थी परन्तु मैं उस पर अपनी राय नहीं देती थी. एकबार जब मैं आई टी आई में हिंदी आशुलिपि का कोर्स कर रही थी तो एक ममता गोयल नाम की लड़की को उसके क्लास टीचर ने इसलिए क्लास से बहार कर दिया कि उसने जींस और कुरता पहना हुआ था, उनकी नजर में में उसे सलवार कमीज ही पहन कर आना चाहिए था. पहली बार मैंने इस भेदभाव के विरुद्ध एक दैनिक अख़बार में सम्पादक के नाम चिठ्ठी लिखी. उसके तुरत छप जाने के कारण मुझसे माफी मांगने को विवश किया जाने लगा उस पर मैंने कह दिया कि अब मै इस घटना की भी दूसरी चिट्ठी लिख दूंगी.

इन दिनों मैं बामसेफ की ओर आकर्षित हुई, चूँकि हमारी शुरुआत वामपंथी साथियों में हुई थी अतः हमारे विचार केवल आंबेडकरवादियों से थोड़े भिन्न थे. बामसेफ का दफ्तर करोलबाग में था. मैं सरकारी नौकरी के लिए रामजस रोड पर सरकारी कोचिंग ले रही थी वहीं जयपाल , आनन्द, सुशीला, सुनीता, सुजाता, द्रौपदी से मुलाकात हुई. इन साथियों के बीच रह कर मैंने आंबेडकरवाद और गौतम बुद्ध के जीवन और उनके कामो के बारे में जाना. दलितों पर होने वाले अत्याचारों, दमन, अपमानो की खबरों से अस्मिताबोध जागने लगा. पिताजी मेरी सक्रियता से बहुत चिंतित हो जाते मुझे तरह-तरह से समझाते कि मुझे घर में रहना चाहिए, घर में रह कर बहन-भाइयों की देखभाल करनी चाहिए, कि माँ की देखभाल करनी चाहिए, कि तुम्हारे इस तरह घूमने से तुम्हारी शादी नहीं हो पाएगी … आदि. घर के काम में छोटी बहन पुष्पा हाथ बटाने  लगी, लेकिन शाम को पिताजी के आने पर मेरी शिकायत भी करती कि आज मैं कब बाहर गयी, कब बाहर से आई या कौन  लड़का या लड़की मुझसे मिलने आया.



एक बार की बात है हमारे वामपंथी साथियों में डॉ विमल मुझे मार्क्सवाद पढ़ाने घर पर आता था . एक ही बिस्तर में सब बहन भाई बैठे हुए होते थे और मुझे पूंजी क्या है, साम्राज्यवाद क्या है, सामंतवाद आदि-आदि पर समझाता रहता. परन्तु मेरा ध्यान उसकी ओर न हो कर पिताजी काम से लौटने वाले है की और ही होता. ये देख कर उनका गुस्सा सातवे आसमान में हो जाता. परन्तु मै उसे मना भी न कर पाती. मनोहर ने उससे कहा यार तुम रात को मत आया करो, इस समय मैं और पिताजी काम से लौटते हैं. परन्तु उस पर उसका असर नहीं हुआ. तब एक दिन तेजिंदर भाई ने उसको साफ कहा कि अब वो आना बंद करे, सब उल्टा होने लगा है. तब तजिंदर भाई ने मुझे सव्यसाची की सीरिज पढने की सलाह दी, मैंने वो सीरिज जो मुझे तेजिंदर भाई ने ला कर दी थी पढनी शुरू की. अपने अम्बेडकरवादी मित्रो को भी पढने के लिए देती.

मैंने आईटीआई कटिंग टेलरिंग में की, साथ में नान कालेजिएट से बी.ए पास की, नम्बर मात्र  39 प्रतिशत ही थे. मुझे नर्स बनने  का बहुत शौंक था, फिर एलएलबी करने की चाह हुई, किन्तु परिस्थितियां हमेशा पढाई के प्रतिकूल ही रही. एक बार टीचर ट्रेनिग का फार्म भरा, नम्बर आया, परन्तु फीस न भर पाने की वजह से वह अवसर भी छोड़ना पड़ा .जिन्दगी कठोर राहो पर बड़े बहन-भाई चलते हैं. वो कटीली राहों पर चले वे जरुर अपने लिए, परन्तु लहुलुहान वे ही हुए, पीछे आने वालो के लिए रास्ता साफ करते चले, बाद में उस राह पर चलने वालों को कैसे  पता होगा कि इस राह पर कांटे बिखरे पड़े थे, काँटों को कुचल कर निकलने पर ही रस्ते बनते है. संघर्षो का इतिहास घर से समाज और समाज से देशों की सीमाओं के पार की लड़ाइया अलग नहीं हैं , न ही दमन, दबाने और सताने के रंग अलग- अलग है. घर और समाज सत्ता का एक अभिन्न हिस्सा है. परिवारों के ढांचे, राजसत्ता को परिपूर्ण करने के माध्यम है, जाति-जेंडर,वर्ण-वर्ग  ढांचागत है.

सामाजिक कार्यो से जुडती गयी. अपनी अभिव्यक्ति कविताओं में करने लगी, फुटकर लघु कथाओं और छोटे-छोटे लेखो से, विचारो में आये बदलावों को अभिव्यक्त करने लगी. तब तक उत्तर भारत में दलित साहित्य की सुगबुगाहट भी नहीं हुई थी. निर्णायक भीम-कानपूर सम्पादक आर.कमल, बिहार से निकलने वाली यूथ पत्रिका में, नाम याद नहीं आ रहा, जिसमे मैंने “राजो “ एक लघु कहानी भेजी वह छप गयी. बाल्मीकि समुदाय की बेटियों को पुस्तैनी धंधे के कारण यौन उत्पीडन से गुजरते हुए घर की कुंठा, अपमान और पितृसत्ता के विकृत चरित्र को झेलना कैसे अनिवार्य हो जाता है इस कथावस्तु पर लिखी कहानी हमारे समाज में व्याप्त पितृसत्ता की झलक की गवाही दे रही थी.

स्त्रीमुक्ति के सवालो के साथ निरंतर जुड़ रही थी. महिलाओ के श्रम के मुद्दों पर यूनियनों की बेरुखी कहें या उन मुद्दों को वो (जाति की ही तरह ही) सेकेंडरी मानते हैं, की बहसों से भारत में स्त्रीवाद के स्वर गूंजने लगे. वामपंथ से बाहर निकल कर स्वायत स्त्री मुक्ति आन्दोलन ने स्त्रियों के सवालों और घरेलू जीवन में उनकी छुपी पहचान को उजागर करने शुरू किये. दहेज़ हत्या, बलात्कार, महंगाई,छेड़छाड़,लडकियों पर घरेलू पहरा, शाम ढलते ही सडकों पर लडकियों का घर से बाहर न निकलना-कैसे दमघोटू माहौल में हम जी रहे थे. मै अपनी मर्जी से शाम को भी घर से बाहर आना-जाना करती थी. हालांकि यह भी सत्य है कि शाम के वक्त राह चलती लडकियों को हर कोई छेड़ने के लिए तैयार दीख पड़ता. बसों में, पैदल चलते शोहदों के अभद्र इशारेबाजी, गंदे कमेंट्स सुनने पड़ते थे. बसों में लडकियों के पीछे किसी भी उम्र के मर्द चिपक कर खड़े हो जाते. आप कंही जा रहे हैं, किसी से रास्ता पूछ लिया तो वो खुद ही साथ साथ चलने लगता. शायद इस दमघोटू माहौल को बदलने की सख्त जरूरत के मद्देनजर खड़े हुए स्त्री मुक्ति आन्दोलन के विरुद्ध एक तरफ चर्चा हुई तो दूसरी तरफ उसका स्वागत भी हुआ. पहली बार दहेज़ पीडितों के समर्थन में महिलायें सड़क पर विरोध करने के लिए उतर आई. उत्पीड़िकों के घरों, मोहल्लो में जा कर उनके खिलाफ नारेबाजी, मुंह काला करने जैसे कृत्यों ने लडकियों और उनके माँ-बाप को हौसला दिया. ऐसे बहुत से प्रदर्शनों में मै स्वयं भी शामिल होती थी. मधु किश्वर की पत्रिका “मानुषी”, सहेली  संगठन ने स्त्रियों के श्रम को घर से बहार निकल कर समाज के धरातल पर ला कर खड़ा कर दिया. स्त्रीवादी विचारधारा शुरू हुई.


मैं अनेक आंदोलनों में भाग ले रही थी. बेलछी काण्ड , अरवल हत्या काण्ड , बिहार में दलितों के विरुद्ध होने वाले नरसंहारो पर देश की राजधानी दिल्ली में वामपंथियों, समाजवादियों और दलितों ने विरोध प्रदर्शन किये. सांझे फ्रंट में लीडिंग भूमिका और पहल, पीपल राईट आर्गनाइजेशन, संतोष राणा ग्रुप,  लोकायन, तथ्यात्मक रिपोर्ट लिखी . कौशल राणा जो उस समय लोकायन में काम करते थे, उन्होंने मनीषा के हवाले जनसत्ता में अरवल काण्ड पर पूरी रिपोर्ट छपवाई. हरियाणा में टिकरी खुर्द गाव में जाटों और दलितों के बीच रास्ते को ले कर सामूहिक संघर्ष हुआ , दलित बस्ती पर पत्थरों की बौछारें की गयी, हम लोग जब फैक्ट फाइंडिंग के लिए गये तब हमें लगा जैसे पत्थरों की दरी बिछी हुई है. इस  में प्रो. ओंकार यादव , अरविंदो घोष और हम मुक्ति से कुछ छात्र भी गये थे. दलितों के दमन की दास्तानें बहुत ही लम्बी है , हर दिन अखबारों में कही न कही मार पिटाई, कहीं उनके रास्तो को रोकने की खबरे, कहीं उनकी औरतो के साथ छेड़खानी की वारदातें, कहीं उनके मवेशियों पर प्रतिबंध, जैसी घटनायें आये दिन होती रहती थी. दिल्ली के पास के एक गांव कंझावला में जमीं के मुद्दे को ले कर दलित और जाटो में झगडा हुआ, जाटो ने दलितों की जमीन पर कब्ज़ा कर लिए उस पर भी बहुत लम्बा संघर्ष चला. वोटक्लब पर धरना और पब्लिक मीटिंग हुई, और सरकार को मांग पत्र भेजा गया. वर्ग संघर्ष पर यकीन करने वालों के जाति संघर्ष ने आँखे खोल दी, वे जाति दमन, उत्पीडन, दबाब को महसूस कर रहे थे. जाति-दमन के साथ- साथ पितृसत्ता के खिलाफ उठ कड़ी हुई महिलाओं ने स्त्रियों के सवालों पर आन्दोलन शुरू किये. आदिवासी युवती मथुरा का दो पुलिस जवानों द्वारा बलात्कार का मुद्दा हो या दहेज़ हत्या के खिलाफ या फिर शाहबानो के भरण-पोषण का केस, इन सब मुद्दों से समाज में लम्बी बहस ने हमारे जैसी युवतियों का मनोबल तो बढाया ही आत्मविश्वास भी बढ़ा.


महिला आन्दोलन अपने शैशव अवस्था पर था, परन्तु बहुत ही आक्रमक रूप में उभर रहा था. बेशक इस इस आन्सोलन ने जेंडर के सवालों ने हम लडकियों में उर्जा फूक दी. अपनी इस चेतना के साथ आगे बड़ते हुए मेरी अपने दोस्तों से लम्बी बहस होती, वे अक्सर कहते, माना कि लडकियों का दमन होता है परन्तु इसका मतलब ये तो नहीं कि तुम हम पर रौब मारो. राम भूल मोर्य, दिवाकर, मास्टर मक्करवाल वैसे तो कम्युनिस्ट थे लेकिन अगर हम उन्हें इतना ही कह दें कि पानी खुद पी लो और हमें भी पिला दो तो इसी बात पर बिना पानी पीये दो तीन घंटे बहस होती. आंदोलनों ने हमें वह नजरिया दिया, जिससे हम लोगो की कथनी और करनी को पहचानना सीखे, और हमने अपने आपको को एक व्यक्ति के रूप में पहचानना सीखा. स्त्री मुक्ति आन्दोलन में बहनापे को ले कर हम बहुत कन्फ्यूज हुए. सब बहुत विनम्रता से अंग्रेजी में बोलती, मीटिंग खत्म होते ही झट से निकल जाती. कल्पना मेहता पहली एसी नारीवादी नेता थी, जो हर उम्र, हर वर्ग की औरत के साथ बराबरी से बहनापा स्थापित करती, उनके व्यवहार से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला और मैंने अपनी नेता के साथ-साथ उन्हें अपनी बड़ी बहन भी  माना , स्त्रीमुक्ति से सम्बन्धित अपने संशयो को मैं उनके समक्ष ही रखती. इन आंदोलनो के आंच मे तप कर निकली हूँ तो तो ये समझ पाई हूँ की संघर्षो को बाहर से रोपा नहीं जा सकता.उन्हें उभारने के लिए अनुकूल वातावरण दे कर भीतर से वातावरण को चीर कर बाहर आने का मार्ग बनने देना चाहिए.

अपने घर के तनावों से तंग आ कर मै मुंबई सरकारी नौकरी में चली गयी. वंहा जा कर मास कम्युनिकेशन में दाखिला ले लिया, और साथ ही एल.एल.बी. में. नौकरी, पढाई और रविवार को सामाजिक कार्य समानांतर चलते रहे. दिल्ली में जैसे सहेली काम कर रही थी, वैसे मुम्बई में वीमेन फोरम काम कर रही थी. मैं उनकी बैठको में जाने लगी, दलित पैंथर के नेताओ से मिली, नामदेव ढसाल, अरुण काम्बले, भाई संघारे, अरुण गोहिल, गंगा बहन, मनोहर अंकुश और रामदास आठवले, बाद में  राजा ढाले से भी मिली. वहीं से मुझे दलित साहित्य की जानकारी हुई. मल्लिका की आत्मकथा “मला उध्वस्त व्हाईचे”  की मराठी आत्मकथा मल्लिकाजी ने दी मैंने दिल्ली आकर वह आत्मकथा कौशल्या बैसंत्री आंटी को दी, उन्होंने पढ़ कर विमल थोरात को दी, और वह किताब मुझ तक वापस नहीं आई. ढसाल के जीवन से मिलती-जुलती कहानी पर एक नाटक “कन्यादान” विजय तेंदुलकर जी ने मंच पर प्रस्तुत किया, मुझे वह नाटक देखने का भी अवसर प्राप्त हुआ. इस नाटक में स्त्री-पुरुष संबंध विशेषतः एक एक्टिविस्ट की जिन्दगी की कथनी और करनी के चित्रण को उभार कर लाया गया है. यह नाटक एक मूल्यबोध की ओर इशारा करता है.

मुंबई से मुझे जल्दी ही ट्रान्सफर मिल गया और मै दिल्ली वापस आ गयी. घर वापस आते ही घरेलू तनाव मेरे साथ प्रवेश कर गये. इन तनावों से मुक्ति पाने के लिए एक वामपंथी साथी से अरेंज शादी कर ली. यंहा से जिन्दगी ने एक नया मोड़ ले लिया. हम दोनों एक दूसरे को दो तीन साल से जानते थे. दो दोस्त-जो शादी से पहले एक समान थे, शादी के  बाद पति पत्नी के रूप में आते ही तराजू के दो पलडो की तरह एक ऊपर और दूसरा नीचे हो गया. घर के काम से लेकर नौकरी सब जिम्मेवारी तो पत्नी की होती है, वो भी एक ऐसी  लड़की की, जिसके घर में गैस नहीं थी, जिसका घर मिडिल क्लास जैसा नहीं था,जहां  गरीबी ने अपने पांव पसारे हुए थे, जिसके पिता को अस्थमा था, माँ मानसिक बीमार थी. इस नए घर में दो कमरों का फ्लैट, किचन, बाथरूम, टायलेट सब था वह स्वयं आयल कम्पनी में स्टेनो था, वामपंथी राजनीति के हिसाब से कंपनी में वर्कर यूनियन का लीडर था. वह बात अलग थी कि कामरेड ज्यादातर बीच-बीच में बिना वेतन के हो जाते, अब घर में कमाने वाली बीबी और घर के काम के लिए नौकरानी भी आराम से सुलभ जो हो गयी थी. कामरेड अपनी बुद्धिमता पर इतने ज्यादा आत्मविश्वासी थे कि दूसरे सब उनके सामने मूर्ख  ही थे. इस व्यवहार के कारण माँ-बाप तो पहले से ही नाराज थे, छोटे बहन-भाई भी नाराज थे. मेरा उनके साथ सम्बन्ध सामान्य था, मैं उनके समर्थन में कुछ कहती तो उन्हें मेरे विरुद्ध भड़काया जाता कि मै स्त्रीवादी हूँ, भ्रष्ट व लम्पट औरतों में रहती हूँ और वे औरतें शराब पीती हैं, एक से ज्यादा पुरुषो से सेक्स करती हैं.


ये कैसा मार्क्सवाद था ? जिसकी समझ एक आम आदमी की तरह थी. आम आदमी कम से कम अपनी पत्नी को माँ- बाप, बहन-भाइयो के साथ मिल-जुल कर रहते देख खुश तो होता है. मार्क्स और लेनिन की विचारधारा माना  वर्ग संघर्षो की बात करती थी, इसका तात्पर्य ये तो नहीं कि घर की चार दीवारी के श्रम को श्रम न माना जाये. ये महाशय परंपरा विरोधी थे, परन्तु घरेलू श्रम भी सामाजिक परम्परा का ही हिस्सा है. समाज में जातीय उत्पीडन और लैंगिक उत्पीडन का खात्मा क्रांति से ही होगा, तब तक चुप चाप जातीय हिंसा सहो और स्त्रियां घरेलू चक्की में पिसती रहें, पति के नियंत्रण में रहें और लैंगिक उत्पीडन सहती रहें. मेरी इस बात पर कभी उससे सहमति नहीं बनी. क्योंकि शोषण, शोषण है- चाहे वो घर में हो या फैक्ट्री में, घरेलू श्रम को लेकर मार्क्सवादी और स्त्रीवादियो में अलग मत थे, मार्क्सवादी पति के आरोप के अनुसार, स्वायत्त स्त्रीवादी आन्दोलन पश्चिम की तर्ज पर इलिट महिलाओ के नेतृत्व में चल रहा है, वे अंग्रेजी कल्चर, बाजारवाद और मर्दों को छोटा करने के सब हथियारों को इस्तमाल करती है. ये बात सही थी कि ज्यादातर औरतें बेहद पढ़ी-लिखी थी, वे पश्चिमी की आज़ादी से प्रभावित भी थीं- उनका रहना सहना और अपने जीवन के फैसलों पर किसी पर निर्भर न हो, वे अपने आप अपने फैसले लेती थीं तो क्या गलत था? इस देश में औरत को पांव की जूती  समझने के कल्चर में जरुर यह एक सांस्कृतिक सदमा  था. यह एक शुरुआत थी और इस शुरुआत ने सभ्य समाज के समक्ष, पुलिस प्रशासन, मिडिया, कोर्ट-कचहरी में स्त्री पक्ष के पक्ष में अपनी बात रखनी शुरू की. अपने ही घर में मैं  न केवल विचारो की कैदी महसूस करने लगी बल्कि मानसिक और शारीरिक बंदिशे भी महसूस करने लगी-इस साथी के साथ, जो मुझे हमेशा कहता था कि साथ रहने आओ, दोनों मिल कर क्रांति के काम में लगेंगे. तब मुझे नहीं पता था कि क्रांति का मतलब किसी एक्टिविस्ट का रोल क्रन्तिकारी पति के लिए जरुरत की चीजें उपलब्ध करना और उसके लिए हमेशा तत्पर रहना था.

राजस्थान में छोटी उम्र की युवती रूप कंवर को सती किया गया. पूरे देश में महिलाओ और प्रगतिशील लोगो ने उसके विरोध में प्रदर्शन किये. अपनी इच्छा के विरुद्ध मैं उसमे नहीं जा पायी, अपने पिता के घर में जो संघर्ष करके मैंने आज़ादी पायी थी, वोह आज़ादी मैंने करांतिकारी पति के घर में आ कर गवा दी, मै फिर से बैक फुट पर पहुँच गयी. शादी मेरे लिए घर की चाहरदिवारी बन गयी उस चाहरदिवारी में कोई सुख नहीं था- न तन का, न मन का, न धन का. अगर कुछ था तो वह थी गहरी उदासी, निराशा, खुद को परतंत्र करने का अपराधबोध और आज़ादी सुख शांति की चाह ने मेरी खुद्दारी को और कुचल दिया. मेरी कवितायें  निराशा और कुंठा अभिव्यक्त करती, मेरी डायरी जिन्दगी से शिकायत करती प्रतीत होती. मैंने आत्मघाती निर्णय ले लिया था-मै कोई साहित्य नहीं पढूंगी, न लिखूंगी. दलित साहित्य की हवा चल रही थी, मैंने उससे खुद को दूर ही रखा. पति महोदय मार्क्सवादी विचारधारा की  पत्रिका “आंच” अपने पिता के नाम पर निकलते थे, मुझे विवश करके अम्बेडकरवादी सर्कल में बेचने भेजते. मै स्वयं उनके विचारों से सहमत नहीं थी, हमारे बीच विचारो के साथ-साथ कल्चर को ले कर भी भारी मतभेद थे. लड़ते-झगड़ते एक बेटी ने जन्म ले लिया था, मैंने अपना सारा ध्यान उधर ही समेट लिया. नौकरी, बेटी को क्रेच से लाना, घर का काम और बेटी का लालन-पालन. बेटी  होने के बाद मतभेदों मेंऔर बढोतरी हो गयी थी. अब उसकी परवरिश पर मुझे नियन्त्रित किया जाता. तुम्हारी जैसी नहीं बनाना है इसे.. आदि आदि.  इस आदि का कोई अंत नहीं था. सुबह शाम, रात-दिन करके शादी के सात वर्ष मेरे लिए मेरे मित्रों और रिश्तेदारों से अलगावों के वर्ष थे. जिनसे न मै मिल सकती थी न अपने मन मुताबिक जी सकती थी.

समाज सेवा– राजनैतिक गतिविधियों से मुंह फेर कर जीना, उन मुद्दों पर बात किये बिना एक जागरूक कार्यकर्ता के लिए लम्बी अँधेरी रात है, जिसका सूरज कब निकलेगा बस यही सोचते-सोचते पूरी अँधेरी रात में आँखे गड़ाये देखते रहना भी एक सजा से कम नहीं.

संक्षिप्त परिचय:
जन्म: 27 मई 1958
दलित स्त्रीवादी –चिन्तक, दलित लेखक संघ की संस्थापक सदस्य, राष्ट्रीय महिला आयोग में दो बार दलित स्त्री विषयक विशेषज्ञ के रूप आमंत्रित. आयोग द्वारा आउट स्टैंडिंग वीमेन अचीवर अवार्ड  से सम्मानित. तीस वर्षो से स्त्रीमुक्ति आन्दोलन में दलित महिलओं के सवाल और दलित आन्दोलन में जेंडर के सवालों को समावेश हेतु सक्रिय.
सम्पादन: भारत की पहली शिक्षिका– सावित्रीबाई फुले, समकालीन भारतीय दलित महिला लेखनखंड 1 -2, “गोलपीठा” (नामदेव ढसाल की कविताएँ) मराठी से अनुदित हिंदी मे,    आरपीआई की एकमात्र महिला नेता शांता बाई दाणी की आत्मकथा “धूप छांव”, शांता कृष्णाजी काम्बले की आत्मकथा “मेरे जीवन की की चित्रकथा- नाजा” प्रेमचंद की सम्पूर्ण स्त्री परक कहानियां,
मुक्तिकमी नायिकाए, डॉ आंबेडकर और महिलाए, बुद्ध ने घर क्यों छोड़ा, दलित विमर्श और पत्रकारिता, अपनी जमीं अपना आसमान (आत्मकथा खंड -1 ),कविता संग्रह : पदचाप एवं  हवा सी बेचैन युवतियाँ

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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प्रेम, विवाह और स्त्री

रेणु चौधरी

जे.एन.यु.में शोधरत है
renu.jnu14@gmail.com

‘प्रेम व्यक्ति के भीतर एक सक्रिय शक्ति का नाम है। यह वह शक्ति है जो व्यक्ति और दुनिया के बीच की दीवारों को तोड़ डालती है। उसे दूसरों से जोड़ देती है। प्रेम उसके अकेलेपन और विलगाव की भावना को दूर कर देता है, पर इसके बावजूद उसकी वैयक्तिकता बची रहती है। प्रेम एक ऐसी क्रिया है जिसमें दो व्यक्ति एक होकर भी दो बने रहते हैं।’’1 एरिक फ्राँम के इन पंक्तियों से यह स्पष्ट होता है कि प्रेम जहाँ मनुष्य को विश्व से जोड़ता है वहीं दूसरी तरफ प्रेम मनुष्य की वैयक्तिकता को भी बचाए रखता है। प्रेम शब्द ही अपने आप में एक जादू की तरह है। एक जादुई अहसास के साथ व्यक्ति इसमें डूब जाता है चाहे वह पुरुष हो या स्त्री। लेकिन यह जादू जल्द ही यथार्थ के धरातल पर आ जाता है और तब हमें पता चलता है कि स्त्री और पुरुष के प्रेम में अंतर होता है। स्त्री जब किसी से प्रेम करती है तो वह अपना सर्वस्व अर्पण करती है। अर्थात अपने अस्तित्व को दाँव पर लगा कर अपने प्रेम को पाना चाहती है। वह ‘मैं’ से ‘हम’ की तरफ बढ़ती है। लेकिन जब एक पुरुष प्रेम करता है तो वो सिर्फ लेना चाहता है। सिर्फ पाना चाहता है। देना उसके यहाँ नहीं है। वह स्त्री के अस्तित्व तक का हरण कर लेता है। वास्तव में इस सामाजिक ढाँचे में स्त्री और पुरुषों को बनाने वाली मानसिकता ही इस ढंग से उन्हें तैयार करती है कि वे इसी तरह से सोचने लगते हैं।

 प्रेम का शाब्दिक अर्थ तो एक ही है लेकिन स्त्री और पुरुष के लिए उसकी अर्थ छवियाँ अन्य-अन्य हैं। सीमोन द बोउवार ने सही लिखा है ‘‘स्त्री और पुरुष के लिए ‘‘प्रेम’’ शब्द का अर्थ अलग-अलग होता है। प्रेम से स्त्री क्या समझती है? स्पष्ट हीयह केवल अनुराग न होकर शरीर और आत्मा का ऐसा वरदान है जो न तो बंधन मानता है, न किसी की परवाह करता है। चूँकि स्त्री का प्यार शर्तहीन होता है- इसलिए उसके लिए यह एक विश्वास है। स्त्री केवल एक को ही अपनाती है। पुरुष यदि किसी से प्यार करता है तो प्रतिदान में वह उससे भी प्रेम पाना चाहता है।’’2अर्थात जहाँ स्त्रियों का प्रेम शर्तहीन होता है, वही पुरुषों का प्रेम प्रतिदान पाने के लिए लालायित होता है। स्त्रियों और पुरुषों के मानसिक बनावट और बुनावट में अंतर होता है। बचपन से ही लड़कियों को त्याग करना, शोषण को हंसते हुए सहना और लड़की होने की नियति को बिना किसी प्रतिरोध के चुपचाप झेलते रहना सिखाया जाता है। इसका यही कारण है कि पुरुष वर्ग आक्रामक होता है और आक्रामकता को अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझता है। वह प्रेम में भी आक्रामकता को पसंद करता है। स्त्रियों को आक्रामक प्रेमी को पसंद करना सिखाया जाता है। उन्हें बचपन से ही हारना और प्रेमी अर्थात् पुरुष को जितना सिखाया जाता है। वास्तव में पुरुष ने सुंदर स्त्रियों को बहुमूल्य संपत्ति में तब्दील कर दिया और हारने का नाटक करके, उस पर वे विजय पाते रहे, उन्हें अपनी संपत्ति में तब्दील करते रहे।


 स्त्रियों और पुरूषों का अपने बारे में एवं प्रेम के बारे में बहुत ही अलग-अलग राय होती है। वास्तव में उनके अंदर बचपन से ही एक मालिक और एक गुलाम की विचारधारा भरी जाती है। एक अपने को  शिकार में परिणत कर लेता है और दूसरा अपने को शिकारी में। इससे भी आगे बढ़कर कहे तो एक अपने को उच्च जीव के रूप में देखने लगता है तो दूसरा अपने को निकृष्ठ जीव में। शायद इसलिए ‘‘मनुष्यता के प्रति अपना दावा न त्यागने वाली स्त्री भी उच्च अस्तित्व के साथ मिल जाना चाहती है। उसके पास उपनी आत्मा और देह पुरुष को सौंप देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रहता। पुरुष मुख्य होता है। वह सर्वोत्तम का प्रतिनिधित्व करता है। चूँकि स्त्री के भाग्य में आश्रित होकर रहना लिखा है इसलिए वह किसी अत्याचारी, माता-पिता और संरक्षक की आज्ञा शिरोधार्य करने की अपेक्षा एक देव की सेवा करना अधिक पसंद करती है। वह दासत्व स्वीकार करने के लिए इस प्रकार बेचैन हो जाती है मानो वह उसकी स्वतंत्रता को व्यक्त करता है। वह अपनी गौण अवस्था को स्वीकार करने के बावजूद उससे ऊपर उठने की चेष्टा करती है। अपने शरीर, भावनाओं और व्यवहार द्वारा वह अपने प्रेमी को महान् हस्ती के रूप में सिंहासनासीन करती है। उसके सम्मुख वह अपना अस्तित्व मिटा देती है। प्रेम उसके लिए धर्म का रूप ले लेता है।’’3 वैश्विक परिदृश्य के साथ-साथ भारतीय परिदृश्य में भी यह बात ध्यान देने योग्य है। आज भी भारत में प्रेमिकाएँ या स्त्रियाँ अपना सर्वस्व अर्पण करके अपने प्रेमी को संतुष्ट करना चाहती है। वे अपने प्रेमी के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाती हैं।

आज मनुष्य के बदलते जीवन मूल्यों व बदलते सामाजिक परिवेश ने प्रेम के स्वरूप को बदल दिया है। आज व्यक्ति बहुत ही ज्यादा महत्वाकांक्षी होता जा रहा है। वह सब कुछ पलक झपकते ही पा लेना चाहता है जिसके कारण आज प्रेम का स्वरूप प्रभावित हो रहा है। आज का प्रेम अशरीरी नहीं रह गया है बल्कि साहचर्यजनित है और बदलते समय के साथ बदल भी जाता है। अब प्रेम की शाश्वत भावना नहीं रही बल्कि मनुष्य एक प्रेम के टूटने के साथ ही दूसरे प्रेम से जुड़ जाता है। कई बार तो ऐसा होता है कि प्रेम सिर्फ मनुष्य के जीवन के खालीपन को दूर करने या ऊब मिटाने का एक साधन बन जाता है। आज प्रेम की परिभाषा ही बदल चुकी है। एक समय होता था जहाँ प्रेम की परिभाषा अपने को समर्पित कर देने में होती थी। जहाँ प्रेम की शुरुआत ही आँखों से होकर दिल में उतरती थी जहाँ शरीर के बदले आत्मा को प्यार किया जाता था, लेकिन आज का प्रेम शारीरिक रूप से ही शुरु होता है। एक तरह से हम देख सकते हैं कि 21वीं सदी में इसकी परिभाषा ही मनुष्य ने बदल डाली है। भारतीय समाज में आज स्त्री-पुरुष के संबंध बहुत ही तेजी से बदल रहे हैं, यह बदलाव सिर्फ महानगरों में ही नहीं हुआ बल्कि शहरों और कस्बों में भी दिखाई पड़ रहा है। आज मनुष्य के पास पाप-पुण्य नाम की कोई चीज नहीं है, बल्कि आज के समय में पाप-पुण्य की अवधारणा की परिभाषा ही बदल चुकी है। जो एक के लिए पाप है, वह दूसरे के लिए पुण्य है।


वास्तव में मनुष्य इतना तार्किक हो गया है कि वह तर्क द्वारा किसी भी वस्तु या भावना को सही गलत ठहरा सकता है। वह प्रेम और ऊब को एक ही सिक्के के दो पहलू सिद्ध कर सकता है। जैसे चित्रलेखा में भगवतीचरण वर्मा पाप और पुण्य को अपने ‘अनुभव के सागर में उतरने के बाद’ भी ठीक-ठीक परिभाषित नहीं कर पाते हैं, क्योंकि वे जानते हैं ‘‘मनुष्य में ममत्व प्रधान है। प्रत्येक मनुष्य सुख चाहता है। केवल व्यक्तियों के सुख के केन्द्र भिन्न होते हैं। कुछ सुख को व्यभिचार में देखते हैं, कुछ त्याग में देखते हैं-पर सुख प्रत्येक व्यक्ति चाहता है, कोई भी व्यक्ति संसार में अपनी इच्छानुसार वह काम न करेगा, जिसमें दुख मिले-यही मनुष्य की मनःप्रवृत्ति है और यही उसके दृष्टिकोण की विषमता है।’’4

प्रेम के स्टीरियोटाइप से मुक्ति ही प्रेम है


आज एकनिष्ठ प्रेम और शारीरिक पवित्रता के प्रश्न नकली सिद्ध हो रहे हैं। आज के समय में हमारे आस-पास के समाज में स्त्री-पुरुष संबंधों में दो चरम- स्थिति देखने को मिल रही है। आज भी ऐसी लड़कियों की कमी नहीं है जो अच्छा पति पाने के लिए गौरी-पूजन करती हैं और सोमवार का व्रत रखती हैं। इसी समाज में आज कुछ ऐसे भी लोग हैं जो प्रेम के लिए शादी को अनिवार्य शर्त नहीं मानते हुए साथ रह रहे हैं। आज इस तरह के रिश्तों को ‘लिव-इन-रिलेशनशिप’ कहा जा रहा है। सुधा अरोड़ा लिव-इन-रिलेशनशिप  के बारे में कहती हैं ‘‘लिव-इन-रिलेशनशिप एक बेहद संश्लिष्ट और जटिल स्वतंत्रता है। एक तरह से यह विवाह की प्रतिबद्धता, सन्नद्धता और दायित्वबोध का विलोम है। आज की पीढ़ी ने विवाह को स्त्री के लिए बंधन और गुलामी का दर्जा दिया, इसलिए बंधन से आजाद रहने के ख्याल से लिव-इन-रिलेशनशिप का चुनाव किया गया जहाँ वह एक साथी के साथ एक ही छत के नीचे रहते हुए भी अपने को बंधन मुक्त समझे लेकिन क्या ऐसा हो पाता है? साथ रहना शुरु करते ही पुरुष शासन और नियंत्रण करने वाले पति के रोल में आ जाता है। लड़कियाँ यहाँ भी भावनात्मक रूप से जुड़ाव महसूस करती है और संबंध टूटने पर अवसाद और निराशा के गर्त में चली जाती हैं।’’5


 सुधा जी की बातों से यह स्पष्ट होता है कि स्त्री चाहे किसी भी रिश्ते में रहे, हर जगह वे ही मानसिक और शारीरिक शोषण का शिकार होती हैं। वह रिश्ता चाहे पति-पत्नी का हो या लिव-इन-रिलेशनशिप का, वह कही भी खुश नहीं है या यू कहें कही भी मुक्त नहीं है, क्योंकि इस पितृसत्तात्मक समाज में सदियों से स्त्री गुलामी में जकड़ी रही है। इस पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष की मानसिकता इतनी जल्दी समाप्त नहीं होगी।



वर्तमान समय में मनुष्य अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त रहना चाह रहा है इसलिए आज इस तरह के रिश्ते पनप रहे हैं। वास्व में जीवन में व्यक्ति इतना महत्वकांक्षी हो गया है कि महत्वकांक्षाओं की पूर्ति में ही उसका सारा समय निकला चला जा रहा है। महत्वकांक्षाओं के पीछे पड़कर प्रेम- संबंध, पारिवारिक-रिश्तों व अपनी जिम्मेदारियों से वह अपना पीछा छुड़ाना चाहता है, बल्कि यूँ कहें कि छुड़ाता भी है। जीवन में पैसा, रुतबा, गाड़ी और बाड़ी(घर-बंगला) ही उसके लिए सर्वोपरि हो गये हैं। इसलिए जब तक ये चीजें उसके पास नहीं रहतीं, वह इन्हें पाने के लिए तेज गति से भागता रहता है। इनके आने के बाद, उसे एक सुंदर सी पत्नी चाहिए, क्योंकि पत्नी को भी वह एक संपति के रूप में चित्रित करने लगता है। इसलिए प्रेम के स्वरूप में परिवर्तन हो रहा है। परिवर्तन समाज का नियम है। आज समाज में इतना परिवर्तन आ गया है कि इस तरह की घटनाएँ चाहे वह ‘लिव-इन-रिलेशनशिप’ हो या कैरियर के लिए शादी या प्रेम का टालेजाना लगातार मनुष्य के लिए आम बात हो गया है।

तुम मेरे साथ रहो मेंरे कातिल मेरे दिलदार

आज भूमंडलीकरण का दौर चल रहा है। इस भूमंडलीकरण ने पूरे देश, समाज को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। आज मनुष्य वही सोचने के लिए बाध्य है, जो बाजार उसे दिखाता है। इस भूमंडलीकरण ने सभी रिश्तों को प्रभावित किया है फिर यह रिश्ता चाहे प्रेम का हो पति-पत्नी का हो या कोई और। सभी रिश्तों में आज बिखराव की स्थिति आ गई है। गीता श्री लिखती हैं ‘‘प्रेम का स्वरूप शाश्वत है लेकिन उसकी मौजूदगी नश्वर। इस समय में कमजोर भूमियों पर खड़ा प्रेम सवालों के घेरे में है। हैरानी होती है कि कैसे इतनी जल्दी-जल्दी वह आता जाता है। कितना गतिमान है। प्रेम की शिफ्टिंग भी चौंकाने वाली होती है। आज यहाँ कल वहाँ…आज इनसे तो कल उनसे…। किसी की चौखट पर माथा रगड़ता है तो किसी के दर पर थूक आता है। कोई आहत मन अपने उजाड़ में बिलबिलाता है तो प्रेम कहीं अट्टाहास करता है। किसी शाख पर कामना का फूल खिलता है तो किसी को गहरे दलदल में धंसने के लिए छोड़ जाता है। कितना अविश्वसनीय हो चला है प्रेम।’’6 इससे स्पष्ट होता है कि आज प्रेम की परिभाषा के साथ ही साथ रिश्ते भी बदल गये। स्त्री-पुरुष संबंध एक परिवार से जुड़ा होता है, आज यहाँ भी भूमण्डलीकरण ने अपना घर कर लिया है।


संयुक्त परिवार की अवधारणा आज खंडित हो रही है। संयुक्त परिवार के टूटने की तरफ इशारा मुक्तिबोध ने 1960 के आस-पास ही अपने ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में कर दिया था एक समाज वैज्ञानिक की तरह। जबकि दुनिया जानती है कि मुक्तिबोध कवि हैं। वे समाज, परिवार और रिश्तों के बिखराव की तरफ स्पष्टता से इशारा करते हैं। वे कहते हैं ‘‘समाज में वर्ग है, श्रेणियाँ हैं। श्रेणियों में परिवार हैं। समाज की एक बुनियादी इकाई परिवार भी है। समाज की अच्छाई-बुराई परिवार के माध्यम से व्यक्त होती है। मनुष्य के चरित्र का विकास परिवार में होता है। बच्चे पलते हैं, उन्हें सांस्कृतिक शिक्षा मिलती है। वे अपनी सारी अच्छाइयाँ-बुराइयाँ वहाँ से लेते हैं।’’7अब वहाँ भूमंडलीकरण ने अच्छाइयों के लिए कम से कम जगह बचा के रखी है। इसलिए बुराइयाँ ही अधिक तेजी से फैल रही हैं।


यही कारण है कि आज लोगों में एकान्त की भावना आ गई है। आज स्त्री भी अपने अच्छे-बुरे के बारे में सोच रही है जिसके कारण आज रिश्ते और ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं, आज की स्थिति वह नहीं रही कि स्त्री अपने पति या प्रेमी की प्रताड़ना सिर्फ सहती रहे और उसका विरोध न करे, बल्कि वह आज अपने हक को समझती है, और गलत का विरोध करती है। वास्तव में प्रतिरोध की भावना स्वंतत्रता की भावना मं  सन्निहित होती है। यदि आप अपनी स्वतंत्रता के प्रति आग्रहशील हैं तो कहीं न कहीं आप दूसरों के प्रतिरोध में खड़े हैं। आज की स्त्रियों के साथ कुछ-कुछ ऐसा ही हो रहा है।

स्त्री के प्रेम की अभिव्यक्ति – ‘अन्या से अनन्या’

वर्तमान समय में स्त्री न केवल शिक्षित हुई है बल्कि आर्थिक रूप में स्वावलंबी भी बनी है। स्त्रियों को स्वालंबी बनाने में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। शिक्षा से स्त्रियाँ अपने अधिकारों के प्रति ज्यादा सचेत हुई हैं। वर्जिनियाँ बुल्फ ने अपनी पुस्तक ‘अपनारा कमरा’ में स्पष्टतः लिखा है कि ‘‘जब तक स्त्रियों के पास अपना कमरा न होगा तब तक स्त्रियाँ स्वतंत्र नहीं हो सकती और यह कमरा आता है अर्थ से और अर्थ आता है शिक्षा के माध्यम से।’’8 जब स्त्रियाँ शिक्षित हो जाती है तो उनके रहन-सहन एवं आचार-विचार में आमूल-चूल परिवर्तन आ जाता है। आज स्त्री पुरुष के समान अधिकार की मांग करती है। यह शिक्षा का कमाल है। मांग चाहे आर्थिक स्वतंत्रता की हो या प्रेम और विवाह से संबंधित हो। इन सभी को वह आज प्रश्नात्मकता की दृष्टि से देखने के साथ-साथ तर्क की कसौटी पर कसने लगी है।



आज सिर्फ पुरुष ही नहीं, बल्कि स्त्रियाँ भी प्रेम एवं विवाह संबंधी नैतिक प्रतिमानों का उल्लंघन करती नजर आ रही हैं। प्रेम का स्वरूप आज जन्म-जन्मांतरों का बंधन नहीं रहा बल्कि आज उसका स्वरूप बदल चुका है। आज प्रेम अपनी सुविधानुसार तोड़ा-मरोड़ा जा सकने वाला संबंध बन गया है। आज प्रेम का स्वरूप उदात्त का साधन नहीं रह गया, बल्कि शारीरिक एवं मानसिक तुष्टि का साधन बन गया है।


वर्तमान समय में परिवर्तित समाज के यथार्थ ने प्रेम की परिभाषा को ही बदल दिया है। डाँ लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय लिखते है ‘‘आज प्रेम में एकनिष्ठता, भावुकता, रुमानियत व आदर्श के स्थान पर स्वार्थ, वासना, उद्देश्य तथा अपने-अपने व्यक्तित्वों के परस्पर उन्मीलन की सफलता या असफलता लक्षित होती है।’’9 इससे यह स्पष्ट होता कि आज प्रेम में एकनिष्ठता की भावना खत्म हो रही है, या यूँ कहें कि प्रेम एक अविश्वसनीय वस्तु बन कर रह गया है। यह वस्तु पितृसत्ता के लिए काम करता है, पितृसतात्मक समाज में पुरुष स्वयं को श्रेष्ठ मानने के लिए बाध्य है।
ऊर्वशी बुटालिया के अनुसार ‘‘इस विचार में पितृसत्ता को या पुरुष-प्रधान समाज व्यवस्था को भुला दिया जाता है, जिसमें स्त्री और पुरुष के कर्तव्य तथा अधिकार कभी समान नहीं होते, जिसमें स्त्री के लिए तो पवित्रता का या एकनिष्ठ प्रेम करने वाली स्त्री का आदर्श होता है, जबकि पुरुष के लिए एकनिष्ठ प्रेम जरुरी नहीं माना जाता।’’10 एक तरह से हम देखें तो आज के संदर्भ में प्रेम एक वैयक्तिक अनुभव बन कर रह गया है, जिसमें परंपरागत नैतिक मूल्यों का कोई महत्व नहीं रह गया। यह भी देखा जा रहा है कि आज का प्रेम सिर्फ भावना में नहीं बहता, बल्कि उसमें बौद्धिकता का भी समावेश हो गया है। बौद्धिकता की वजह से आज प्रेम का स्वरूप बदल गया है और आनेवाले दिनों में वह और बदलता चला जाएगा। वास्तव में प्रेम में जब बुद्धि तत्व का प्रवेश हो जायेगा तो स्थितियाँ स्वयं बदलने लगेंगी। आज से पाँच सौ साल पहले कबीर कह गये हैं-
‘‘कबिरा इह घर प्रेम का खाला का घर नाँहीं
सीस उतारे भुईं धरे तब घर पैठे माँही’’।11

अर्थात प्रेम के घर में प्रेम और बुद्धि एक साथ नहीं रह सकते। दोनों एक दूसरे के शत्रु हैं। यदि दो शत्रुओं में मित्रता हो जाये तो आप परिकल्पना कीजिए कि वे कैसे दोस्त बने रहेंगे। यह भी एक कारण है इस समाज का, कि आज तेजी से प्रेम संबंध बन रहे हैं और टूट रहे हैं।


 प्रेम के अतिरिक्त आज विवाह संबंधित दृष्टिकोण में भी परिर्वतन आया है। स्वतंत्रता के पश्चात सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक परिवर्तनों ने मानवीय संबंधों को गहरे रूप से प्रभावित किया है। विवाह की अवधारणा जो परंपरा से चली आ रही थी उसका स्वरूप आज बदल चुका है। विवाह जो एक पवित्र बंधन हुआ करता था, वर्तमान समय में उसका स्वरूप बदल गया। आज स्त्री आर्थिक रूप से सुदृढ़ हुई हैं। सिमोन द बोउवार लिखती हैं कि ‘‘आर्थिक विकास के कारण औरत की समकालीन स्थिति में आये भारी परिवर्तन ने विवाह संस्था को भी हिला दिया है। विवाह अब दो स्वतंत्र व्यक्तियों के बीच एक पारस्परिक समझौते से उत्पन्न बंधन है, जो व्यक्तिगत तथा पारस्परिक होता है। किसी प्रकार का व्यभिचार विवाह के अनुबंधों और इकरारनामों का उल्लघंन ही माना जायेगा। इसी आधार पर दोनों पक्षों को विवाह तोड़ने का भी अधिकार मिलता है। बच्चे पैदा करना अब स्त्री की इच्छा पर निर्भर करता है और गर्भकाल में उसको सवेतन छुट्टी का हक राज्य देता है। आज स्त्री के लिए पुरुष द्वारा संरक्षित होने की अनिवार्यता समाप्त होती जा रही है। आज के संक्रमण के दौड़ में भी बहुत थोड़ी ही स्त्रियाँ उत्पादन में विनियोजित हैं।’’1221वीं सदी में स्त्रियाँ अपने विवाह संबध को अपने अनुसार जीना पसंद कर रही हैं। आज के इस संक्रमण दौर में कोई भी रिश्ता ज्यादा प्रभावित रूप में नहीं। आज मनुष्य कोई भी रिश्ता अपनी सुविधानुसार बनाते हैं और तोड़ते हैं। आज इंसान का जीवन बहुत ज्यादा व्यस्त हो चुका है। इस टूटन में सबसे ज्यादा नुकसान स्त्रियों का ही होता है, क्योंकि स्त्रियाँ किसी पुरुष से जुड़ती है तो अपने आप को पूर्णरूप से समर्पित कर देती है, लेकिन पुरुष नहीं। इसलिए वे (स्त्रियाँ) अपने टूटने पर अपने को खाली हाथ या छला हुआ महसूस करती हैं।


वास्तव में विवाह को स्त्रियाँ अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष या समय मानती हैं।  पुरुष विवाह को एक सामाजिक कर्तव्य और अपने एवं परिवार की सुविधा के लिए उठाया गया नैतिक कदम मानते हैं। जबकि होना यह चाहिए कि ‘‘स्त्री-पुरुष के बीच का संबंध विशुद्ध रूप से निजी मामला हो। (यानी संबंधित व्यक्तियों के अतिरिक्त इनमें धर्म एवं सामाजिकता का कोई हस्तक्षेप न हो), यह चयन की पूरी आजादी दोनों को हो और यह संबंध पूरी तरह समानता पर आधारित हो।’’13 जबकि ऐसा नहीं होता, क्योंकि पुरुषों को समानता से ज्यादा अपने अधीन कार्य करने वाले लोग पसंद आते हैं। विवाह के बाद स्त्रियाँ अपने को अपने पति और भारत में तो परमेश्वर या ईश्वर की तरह उन्हें खुश रखने के लिए तन, मन और जरुरत पड़ने पर अपने मायके के धन द्वारा भी संतुष्ट करने की जुगत में लगी रहती है। वे एकनिष्ठ भाव से अपने पति की अधीनता स्वीकार कर लेती है। ‘‘लेकिन मालिक उनसे वास्तविक सेवा के अतिरिक्त कुछ और चाहते हैं। पुरुष केवल महिलाओं की पूरी-पूरी आज्ञाकारिता नहीं चाहते, वे उनकी भावनाएँ चाहते हैं। सबसे क्रूर व निर्दयी पुरुष को छोड़कर, सभी पुरुष अपनी निकटतम सम्बंधी महिला में एक जबरन बनाये गये दास की नहीं बल्कि स्वेच्छा से बने दास की इच्छा रखते हैं- सिर्फ एक दास नहीं बल्कि अपना प्रिय, अपना चहेता व्यक्ति चाहते हैं। अतः उन्होंने महिलाओं के मस्तिष्क को दास बनाने के लिए हर चीज का इस्तेमाल किया है। अन्य दासों के मालिक आज्ञाकारिता को बनाये रखने के लिए भय का प्रयोग करते हैं- उनका खुद का भय या फिर धार्मिक भय। स्त्रियों के मालिक साधारण आज्ञाकारिता से कुछ अधिक चाहते थे और उन्होंने शिक्षा के पूरे बल का इस उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया। बहुत बचपन से सभी स्त्रियों को यह सिखाया जाता है कि उनका आदर्श चरित्र पुरुष के चरित्र से ठीक विपरीत होना चाहिये। इच्छाशक्ति और आत्मनियंत्रण नहीं बल्कि समर्पण, और दूसरे के नियंत्रण के समक्ष झुक जाना उनका गुण होना चाहिए। सारी नैतिकता उन्हें बताती है कि यह महिलाओं का कर्तव्य है और सभी मौजूदा भावनाओं के अनुसार यह उनका स्वभाव है कि वे दूसरों के लिए जियें, पूर्ण आत्मत्याग करें और अपने स्नेह संबंधों के अतिरिक्त उनका अपना कोई जीवन न हो। स्नेह संबंधों से तात्पर्य सिर्फ उन संबंधों से है जिनकी उन्हें इजाजत है- वे पुरुष जिनसे स्त्री संबंधित हो या वे बच्चे जो पुरुष व उनमें एक अटूट व अतिरिक्त बंधन होते हैं।’’14 इतना ही नहीं शिक्षा और सामाजिक रूप से उन्हें बार-बार बतलाया गया है कि स्त्रियाँ तभी तक सुरक्षित है जब तक वे पुरुषों के अधीन हैं।
आजादी के बाद और भारत में भूमंडलीकरण के बाद स्थितियाँ तेजी से बदली हैं। ‘‘पिछले कुछ दशकों के शहरी समाज में, विशेषकर महानगरों और बड़े नगरों में लोगों के अंतर्वैयक्तिक संबंधों में आमूल-चूल परिवर्तन आये हैं। लोगों के पास पड़ोसियों, रिश्तेदारों और यहाँ तक कि अपने बच्चों और माता-पिता के लिए भी वक्त नहीं है। जीवन के हर क्षेत्र में एक अजीब-सी कमरतोड़ प्रतिस्पर्धा और आपाधापी हावी हो गयी है। आपसी समझ और संवेदनशीलता धीरे-धीरे हमारे स्वभाव से कटते रहे हैं। जीवन-मूल्यों के इस संक्रमण काल में जो संबंध सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं- वह है पति-पत्नी के बीच के रिश्ते।’’15 शिक्षा ने स्त्री को आत्मनिर्भर बना दिया है। वह आर्थिक रूप से मजबूत बनी है तथा अपनी अस्मिता को पहचानने लगी है। वह पुरुष की सभी बातों को यूँ ही नहीं मानती, बल्कि तर्क की कसौटियों पर कसती है तथा सही और गलत का फैसला करती है।  यहाँ प्रश्न उठता है कि क्या स्त्री की स्थिति में पूरी तरह से सुधार हुआ है? सिमोन दा बोउवार लिखती है ‘‘आज पारंपरिक वैवाहिक जीवन के नियमों के अवशेषों के बावजूद समाज में स्त्री की स्थिति प्राचीन समाज की अपेक्षा बुरी है क्योंकि उस पर कर्तव्य-भार तो वही है पर उसे अधिकार, सम्मान और सुविधाओं से वंचित रखा जाता है। आज पुरुष संसार में खुद सहारा पाने के लिए विवाह करता है किन्तु वह सांसारिक बंधन में फंसना नहीं चाहता। वह घर-बार चाहता है पर स्वतंत्र रह कर उससे भागता भी है। वह जीवन में स्थापित हो जाता है, घर बसा लेता है, पर दिल से आवारा ही बना रहता है। पारिवारिक सुख और आनन्द से उसे घृणा नहीं है, पर उसे ही जीवन का एक मात्र ध्येय नहीं मानता।’’16 यही है पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता। यही कारण है कि आज किसी भी रिश्ते में ठहराव की भावना नहीं रही और कोई भी रिश्ता इस भूमंडलीकरण की चपेट से नहीं बचा। इसलिए आज विवाह सिर्फ और सिर्फ एक पवित्र बंधन नहीं रह गया है। जॉन स्टुअर्ट लिखते हैं कि ‘‘समाज की नजरों में विवाह स्त्री का निर्धारित लक्ष्य है, एक ऐसा संबंध है जिसके लिए उन्हें बचपन से ही तैयार करना शुरु कर दिया जाता है, और कुछ बहुत अनावर्षक स्त्रियों को छोड़ कर सभी स्त्रियों से इसके निर्वाह की अपेक्षा की जाती है, तो क्या इस विवाह को हर स्त्री के लिए सचमुच इतना आकर्षक और गौरवपूर्ण बना दिया गया है, कि स्त्री किसी और विकल्प की कमी महसूस न करे?’’17जबकि ऐसा नहीं है। स्त्रियों को दूसरे विक्लप के बारे में सोचना ही पड़ेगा, क्योंकि यह पितृसत्तात्मक समाज  सदियों से स्त्रियों को अपने अधीन रखने की कोशिश करता आया है। आज स्त्रियों में चेतना आ गयी है और वह पुरुष के षड़यंत्र को समझ रही है। बालजाक का प्रसिद्ध कथन है कि ‘‘उससे नौकरानी जैसा व्यवहार करो पर उसको समझा कर रखों कि वह महारानी है।’’18 इतना ज्यादा धूर्तता भरा कथन किसी पुरुष का ही हो सकता है। बालजाक के लेखन के बहाने एक पुरुष यह वाक्य कहता है। भारतीय समाज में स्त्रियों के साथ यह धूर्तता की भी जाती है। यहाँ शक्ति की देवी दुर्गा, धन की लक्ष्मी, विद्या की देवी सरस्वती है, लेकिन यह केवल मूर्तियों तक सीमित है। व्यावहारिक रूप से स्त्री अबला शक्तिहीन और अशिक्षित है। पुरुषों ने तो उसकी प्राप्ति पर ही रोक लगा दी थी।  भारत ही नहीं विश्व के किसी भी साहित्य में स्त्रियों ने पुरुषों के बारे में ऐसा कुछ नहीं कहा है। इससे यह पता चलता है कि पुरुष वर्ग स्त्रियों को महामूर्ख समझता है। स्त्रियाँ चाहे किसी भी देश या समाज की क्यों न हो वे इस तरह सदियों से शोषण का शिकार होती रही हैं। लेकिन आज इसकी अवाधारणा टूट रही है। स्त्री पुरुष के रचे हुए हर कुचक्र को अब समझ रही है कि किस प्रकार पुरुष उनका शोषण करते हैं और उनके साथ गुलामों जैसा व्यवहार करते हैं। उन्हें गुलाम बनाने रखने के लिए हर हथकंडे का इस्तेमाल करते हैं। अब स्त्रियाँ ये सब समझते हुए विरोध करने लगी हैं। हम जानते हैं कि किसी भी एक व्यक्ति के सामने दूसरा यदि जान-बूझ कर बिना किसी उद्देश्य के बल्कि आदर्शानुसार समर्पण कर दे, तो वह पहला व्यक्ति (पुरुष) दूसरे व्यक्ति (स्त्री) के समपर्ण को अपना अधिकार समझ लेता है। वह उस पर हावी होने लगता है और तब तक हावी होता रहता है, जब तक कि पहला व्यक्ति (पुरुष) विरोध करने के लिए बाध्य न हो जाय। आज स्त्री के नैसर्गिक समर्पण को पुरुष अपना अधिकार समझ कर उस पर हावी होने की चेष्टा करता है और तब तक करता है जब तक स्त्रियाँ बाध्य होकर विरोध नहीं करती हैं।



 एक तरह से देखे तो आधुनिक स्त्री कानूनी तौर पर आज सुरक्षित एवं आर्थिक रूप से मजबूत है जिसके कारण वह पुरुष के आधिपत्य को मानने के लिए तैयार नहीं है। विवाह-संबंधित परंपरागत मूल्य आज बहुत तेजी से टूट रहे हैं। एक तरह से देखा जाए तो आज के समय में विवाह पवित्र-धार्मिक संबंध नहीं रह गया। जिसे लोग तोड़ न सके बल्कि वह स्त्री –पुरुष की अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति का निमित्त मात्र बन कर रह गया है। यह परंपरा से चला आ रहा है कि विवाह करना स्त्री के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है या यूँ कहें कि उसके जीवन की नियति है, अब इसका स्वरूप बहुत तेजी टूट रहा है। अब विवाह को सामाजिक संस्था न मानकर ‘निहायत निजी’ मसला माना जाने लगा है। जिसके चलते सदियों से चली आ रही रीति-रिवाज तथा जिन्दगी भर साथ निभाने के कसमें टूट रही हैं।


आज 21वीं सदी में लोग विवाह के पवित्र बंधन में बंध कर नहीं रहना चाह रहे। लोगों में विवाह के प्रति भावात्मक लगाव और ललक भरी दृष्टि धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। आज ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है जो विवाह को प्रेम का आधार न मानकर जीवन के लिए बेड़ी मानने लगे हैं। बिना विवाह किये रहना लोग ज्यादा ठीक समझ रहे हैं। आज के विवाहित जीवन पर कुमुद शर्मा कहती हैं ‘‘उनकी दृष्टि में विवाह का मतलब है स्वयं को मार डालना, अपने अस्तित्व की हत्या कर देना। परंपराओं को ताक पर रख कर विवाह-संस्था को निरर्थक ठहरा दिया गया है। महानगरों में ही नहीं, छोटे-छोटे शहरों में भी लोगों ने बिना विवाह किये साथ रहना शुरु कर दिया है। इसे आधुनिक भावबोध पर टिके स्त्री-पुरुष के नए समीकरण के रूप में देखा जा रहा है और यह माना जाता है कि इस नए रिश्तों में, जिसमें स्त्री-पुरुष बिना विवाह किये साथ रहते हैं, स्त्री-पुरुष का दरजा बराबरी के रिश्ते पर आधारित है। इन नए संबंधों के दायरे में स्त्री उतनी ही सक्षम और जरुरी हिस्सा होती है, जितना कि परंपरागत परिवारों में स्त्री के मुकाबले में पुरुष होता है। इन रिश्तों के समर्थन में यह भी कहा जाता है कि इस तरह के संबंधों में स्त्री जबरन आरोपित जिन्दगी जीने के लिए विवश नहीं होती, बल्कि उसके और साथी पुरुष के बीच एक सक्रिय संवाद चलता रहता है- यह एक नई प्रोग्रेसिव एप्रोच है।’’19 इस रिश्ते की अहमियत को स्त्री-पुरुष अपनी इच्छानुसार अपनाते भी हैं। इस बदली हुई हवा का रुख पहचानते हुए हम अंदाजा लगा सकते हैं कि 21वीं सदी में प्रवेश कर गई पीढ़ी में अधिकतर लोग पुरुष और स्त्री दोनों पर थोपी गई पारंपरिक परिस्थितयों और नैतिक मान्यता के कायल नहीं है। राजेन्द्र यादव का कहना है ‘‘विवाह परिवार का एक बंधनकारी गठन है। यहाँ पत्नी और पति के बीच का कर्तव्य, धर्म और निष्ठाएँ पहले से तय हैं। चूँकि परिवार एक सामंतवादी गठन है इसलिए वहाँ पुरुष वर्चस्वशाली है यानि पुरुष ही सबका मालिक है। उसी से वंश चलता है। जिन लोगों ने इस सामंतवादी बंधन को स्वीकार नहीं किया और यह माना कि स्त्री-पुरुष का प्रेम बराबरी का अनुबंध है और दोनों में बराबरी का संबंध होना चाहिए, उन्होंने विवाह के स्वरूप को नकार दिया और साथ रहना शुरु कर दिया। जब तक मन करे रहने की स्वतंत्रता है। प्रेम यहाँ ज्यादा सृजनशील और औदात्य स्वरूप दिखाई देता है। इसलिए इस तरह के नये परिवारों का चलन हो गया।’’20 राजेन्द्र जी की टिपप्णी से स्पष्ट होता है कि यह आज के समय की माँग है कि इस तरह के परिवार का गठन हो, क्योंकि जीवन गतिशील होता है और परिवर्तन समाज का नियम। हालांकि यहाँ स्त्रियाँ पूरी तरह से स्वतंत्र तो हैं लेकिन हम यह नहीं कह सकते कि ऐसे रिश्तों में स्त्री मानसिक और शारीरिक रूप से शोषित नहीं होती। एक तरह से देखा जाए तो कुछ स्त्रियों के लिए यहाँ ज्यादा शोषण है, क्योंकि ऐसे रिश्तों पर सामाजिक और पारिवारिक बंधन नहीं होता। पुरुष जब चाहे ऐसे रिश्ते से बंधन मुक्त हो सकता है।

संदर्भ सूची
1. एरिक फ्रॉम- प्रेम का वास्तविक अर्थ और सिद्धांत, (द आर्ट ऑफ लविंग) अनुवाद युगांक धीर, पृष्ठ              संख्या-  28
2. एरिक फ्रॉम- प्रेम का वास्तविक अर्थ और सिद्धांत, (द आर्ट ऑफ लविंग) अनुवाद युगांक धीर, पृष्ठ               संख्या-  
3. वही, पृष्ठ संख्या- 298-299
4. भगवतीचरण वर्मा- चित्रलेखा, पृष्ठ संख्या- 199-200
5. संपादक- शैलेन्द्र सागर, कथाक्रम, प्रेम विशेषांक, जनवरी-मार्च पृष्ठ संख्या- 15
6. वही, पृष्ठ संख्या- 18
7. गजानन माधव मुक्तिबोध- एक साहित्यिक की डायरी, पृष्ठ संख्या- 68
8. र्जीनिया वुल्फ- अपना कमरा, पृष्ठ संख्या- 15
9. लम्क्षीसागर वार्ष्णेयद्वितीय महायुद्धोत्तर, हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ संख्या- 65
10. संपादित- रमेश उपाध्याय एवं संध्या उपाध्याय, आज के समय में प्रेम, पृष्ठ संख्या-37
11. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी- कबीर, 129
12. सीमोन द बोउवार- स्त्रीः उपेक्षिता, अनुवाद- डॉ प्रभा खेतान, पृष्ठ संख्या-177
13. सीमोन द बोउवार- स्त्रीः उपेक्षिता, अनुवाद- डॉ प्रभा खेतान, पृष्ठ संख्या-177
14. सं- राजकिशोर, स्त्री, परंपरा और आधुनिकता, पृष्ठ संख्या- 113
15. सीमोन द बोउवार- स्त्रीः उपेक्षिता, अनुवाद- डॉ प्रभा खेतान, पृष्ठ संख्या- 197
16. जॉन स्टुअर्ट मिल- स्त्री और पराधीनता, पृष्ठ संख्या- 40
17. सीमोन द बोउवार- स्त्रीः उपेक्षिता, अनुवाद- डॉ प्रभा खेतान, पृष्ठ संख्या- 339
18. कुमुद शर्मा- आधी दुनिया का सच, पृष्ठ संख्या- 53
19. संपादक- शैलेन्द्र सागर, कथाक्रम, प्रेम विशेषांक, जनवरी-मार्च पृष्ठ संख्या-6
20. राजकिशोर, स्त्री-पुरुश कुछ पुनर्विचार, पृष्ठ संख्या- 145

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फूलन देवी की ह्त्या के लिए सजायफ्ता है सहारनपुर की घटना का मास्टरमाइंड

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सहारनपुर के शब्बीरपुर की घटना की कडि़यों को जोडने पर आभास होता है कि यह राजपूतों की तात्कालिक प्रतिक्रिया भर नहीं थी, बल्कि इसके पीछे एक सुनियोजित अभियान काम कर रहा था। इस अभियान को चलाने में आरएसएस के अनुषांगिक संगठनों से जुडे कुछ छुटभैये राजनीतिकर्मियों के अतिरिक्त जो सबसे चर्चित नाम सामने आता है, वह शेर सिंह राणा का है। 37 वर्षीय राणा फूलन देवी के हत्या के सजायाफ्ता आरोपी है तथा एक दशक से अधिक समय जेल में बिताकर सात महीने पहले बेल पर बाहर आया है। जेल से बाहर आने के बाद राणा कथित राजपूत गौरव के लिए काम कर रहा है तथा पर्दे के पीछे रहकर राजपूत रेजिमेंट जैसे अतिवादी संगठनों को सक्रिय कर रहा है।

महारणा प्रताप जयंती का खेल


17 मई को जब हम सहारनपुर पहुंचे उसके एक दिन पहले शब्बीरपुर गाँव में 5 मई, 2017 को दलित घरों पर हमला करने के दौरान दम घुटने से (पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार) मारे गये राजपूत युवक की तेरहवीं मनाई जा चुकी थी। उसकी तेरहवीं पर उपस्थित कुछ राजपूतों ने राजपूत रेजिमेंट के बैनर तले बैठक की। राजपूत रेजीमेंट को राजपूत समुदाय के लोग इलाके में दलित स्वाभिमान के लिए बनाई गई ‘भीम आर्मी’ का जवाब बताते हैं। तेरहवीं के दिन एक चर्चित नाम मृतक युवक के घर पहुंचा, वह था शेरसिंह राणा। शेर सिंह राणा शिमलाना गाँव में मनाये जा रहे महाराणा प्रताप जयंती में भी मुख्य अतिथि था, जहां से चलकर ही राजपूत युवकों का एक समूह पास के शब्बीरपुर गाँव में आगजनी के लिए इकट्ठा हुआ था। शिमलाना से ही गाँव पर हमले के लिए आये युवकों ने शब्बीरपुर में दो-तीन राजपूत युवकों की दलितों द्वारा ह्त्या की अफवाह फ़ैलाई थी, जबकि हकीकत थी कि गाँव पर हमला करने आया एक युवक हमले के दौरान घायल हुआ था और अस्पताल पहुँचने पर दम घुटने से मर गया। इस बीच शब्बीरपुर, जहां कुछ दिनों पहले ही बाबासाहेब आंबेडकर की मूर्ति लगाने को लेकर तनाव हो चुका था, के पास शिमलाना गाँव में महाराणा प्रताप जयंती पर इलाके के राजपूतों का जुटान और वहाँ होने का क्या अर्थ है इसे समझना बहुत कठिन नहीं है।

शब्बीरपुर के कर्मवीर के अनुसार 5 मई को गाँव में राजपूत लड़कों के उत्पात शुरू होने के पहले और शिमलाना जाने के पूर्व राणा नानौता प्रखंड में एक मीटिंग में उपस्थित था। 8 बजे से मीटिंग थी, जहां से ब्लाक प्रमुख चांदनी राणा, उनके पति सुरेन्द्र राणा और शेरसिंह राणा इकट्ठे महाराणा प्रताप की जयंती के लिए शिमलाना रवाना हुए थे।

शब्बीरपुर की घटना के दौरान महाराणा प्रताप जयंती में राणा की उपस्थिति तो दर्ज है लेकिन घटना स्थल पर वह स्वयं नहीं था, जिसे वह खुद बताता है कि राजपूत युवकों ने अंजाम दिया। जिले के कलक्टर भी कहते हैं कि वह गाँव में घंटना के दौरान नहीं था। और एक बार फिर राजपूत रेजिमेंट की मीटिंग के दिन तो वह मारे गये युवक के गाँव में था, लेकिन वह इस घोषणा की जानकारी से भी इनकार करता है। हालांकि वह स्वीकार करता है कि राजपूतों की करणी सेना ने भी उसे अध्यक्ष बनाने की बात की थी, लेकिन उसने इनकार कर दिया। उसके अनुसार वह ऐसे किसी संगठन के निर्माण की योजना में नहीं है।

सहारनपुर के घडकौली गाँव में साल भर पहले ‘आंबेडकर नगर और द ग्रेट चमार’ लिखे बोर्ड को हटाने की कोशिश करते राजपूतों, पुलिस और दलितों के बीच हिंसक टकराव हुआ था। उस गाँव में बाबासाहेब अंबेडकर की मूर्ति को भी पेंट कर दिया गया था। पिछले 16 मई को राजपूत रेजिमेंट की बैठक के बाद घोषणा की गई है कि या तो वह बोर्ड स्वयं हटा लिया जाये या राजपूत उसे हटा देंगे। घडकौली के लोग बताते हैं कि उस वक्त शेर सिंह राणा वहाँ उपस्थित था। लेकिन ऐसी किसी घोषणा की जानकारी से वह इनकार करता है और यह भी जोड़ता है कि वह राजपूत रेजीमेंट की बैठक में शामिल नहीं था। जिले के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट नागेन्द्र प्रसाद सिंह स्पष्ट करते हैं कि राजपूत रेजिमेंट के गठन और बोर्ड हटाने की धमकी की खबर उन्हें है। वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि उनकी और जिला मशीनरीज की नजर शेर सिंह पर लगातार है।

अब तक का इतिहास  


आइए पहले जानें कि शेर सिंह राणा की गतिविधियां क्या-क्या रही हैं।  शेर सिंह राणा का जन्म सहारनपुर से लगभग 40 किलोमीटर दूर उत्तराखंड के रूडकी शहर में 17 मई, 1979 में हुआ। वह अपने तीन भाइयों में सबसे बडा है। स्वयं उसके अनुसार, उसके दादा किशन  सिंह के पास 7 हजार बीघे जमीन थी, लेकिन पिता सुरेंद्र  सिंह राणा तक आते-आते संपत्ति छीजती गई और अमीरी की कब्र पर पनप रही गरीब की घास उसे बहुत जहरीली लगने लगी। हलांकि समय ने फिर पलटी मारी और बची हुई जमीनों की कीमतें बढीं। आज उसके पास रूडकी के सबसे भीड-भाड वाली जगह में उच्च मध्यवर्ग की हैसियत का घर है और यही उसकी आमदनी का एकमात्र जरिया भी है। इस घर के अधिकांश हिस्से में “शेर सिंह राणा मार्केट है”, जिसमें विभिन्न प्रकार की लगभग 60 दुकानें हैं। राणा कहता है कि उसे इन दुकानदारों से 4-5 लाख रूपए मासिक आमदनी होती है,  इस कारण वह चाहे तो “समाज और धर्म की सेवा” को छोडकर अपनी बाकी बची जिंदगी रइसों की तरह बसर कर सकता है।

2001 के बरसात के दिनों में, जब संसद का मानसून सत्र चल रहा था तब (25 जुलाई को) सांसद फूलन देवी की उनके घर पर हत्या कर देने वाला राणा 2004 में तिहाड़ जेल से फरार होने के बाद 2006 में कोलकाता से फिर गिरफ्तार हुआ था। इस गिरफ्तारी के बाद उसने दावा किया कि वह दो सालों की अपनी फरारी के दौरान ‘अंतिम अखिल भारतीय राजपूत शासक (12वीं सदी)’ पृथ्वीराज चौहान का अवशेष अफगानिस्तान से लाने में सफल हुआ था. अफगानिस्तान में मुहम्मद गोरी के मकबरे से लगकर पृथ्वीराज चौहान को दफनाया गया था, जिसे खोदकर उनके अवशेष लाने का दावा करते हुए शेर सिंह राजपूत गौरव के रूप में खुद को प्रजेक्ट करने लगा। उसके बाद लगभग 10 सालों तक तिहाड़ में सजा काट चुका राणा आजकल जमानत पर है, जिसे 24 अक्टूबर 2016 को दिल्ली हाई कोर्ट ने जमानत दी है।

चंबल में डकैत गिरोह को नेतृत्व देकर दलितों-पिछड़ों के रोबिनहुड की तरह चर्चा में आई फूलन देवी आत्मसमर्पण के बाद दो बार सांसद रहीं।अपनी ह्त्या के दौरान भी वह मिर्जापुर से समाजवादी पार्टी की सांसद थीं। अपने ऊपर हुए बलात्कार और राजपूतों द्वारा दलित-पिछड़ी जातियों के दमन का कथित बदला लेने के लिए फूलन देवी ने उत्तरप्रदेश के बह्मई गाँव में 22 राजपूतों की ह्त्या कर दी थी। इस घटना को राजपूतों ने बर्दाश्त नहीं किया, तब दवाब के कारण उत्तरप्रदेश के तत्कालीन राजपूत मुख्यमंत्री वीपी सिंह ने इस्तीफा दे दिया। शेर सिंह राणा ने फूलन देवी की ह्त्या के बाद देहरादून में आत्मसमर्पण के वक्त पुलिस के सामने इस ह्त्या की जिम्मेवारी अपने ऊपर ली थी। फूलन देवी की ह्त्या को राजपूतों ने बहमई काण्ड का बदला माना।
फूलन देवी की ह्त्या और पृथ्वीराज चौहान के कथित अवशेष को भारत लाने के कारण शेर सिंह राणा को राजपूतों ने हाथो-हाथ लिया है। यही कारण है कि जेल से जमानत पर छूटने के बाद राणा देश भर की राजपूत सभाओं में बुलाया जाता रहा है। शब्बीरपुर की घटना के दिन कुछ युवाओं द्वारा पास के गाँव शिमलाना में आयोजित महाराणा प्रताप जयंती में शेर सिंह राणा की मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थिति  छीजते हुए सामंती परिवेश में पल रहे ग्रमीण ईलाकों के राजपूत युवाओं के बीच उसके रोल मॉडल होने की कहानी कहती है। गत 27 जनवरी 2017 को पद्मावत फिल्म की शूटिंग के दौरान फिल्म निर्देशक संजय लीला भंसाली पर हमले का पटकथा लेखक भी यही शख्स दिखता है। 24 दिसंबर 2016 को शेर सिंह करणी सेना के द्वारा आयोजित ‘जौहर सम्मान समारोह’ में भी मुख्य अतिथि था, जहां उसने मंच से कहा कि ‘यदि संजयलीला भंसाली शूटिंग बंद नहीं करता है तो वह थप्पड़ खायेगा।’

चेहरे से सौम्य और व्यवहारकुशल शेर सिंह के काम करने का एक ख़ास पैटर्न रहा है। घटना-स्वीकारोक्ति-घोषणा- काम को अंजाम और उसका प्रचार-प्रसार- यह एक ख़ास मोड्यूल है शेर सिंह के काम का फूलन देवी की ह्त्या के पूर्व राणा ने पूर्व सांसद के संगठन एकलव्य सेना की रुड़की-अध्यक्ष उमा कश्यप के साथ जान-पहचान और प्रगाढ़ता बढ़ाई, जिसके सहारे वह फूलन देवी के सांसद-आवास पर आने जाने लगा, उनके पति उम्मेद सिंह से ताल्लुकात बढाये। 25 जुलाई को ह्त्या के  दो दिन बाद उसने देहरादून में प्रेस कांफ्रेंस कर ह्त्या की जिम्मेदारी ली और आत्मसर्पण किया। हालांकि बाद में हत्या में शामिल न होने का तर्क न्यायालय में देता रहा है. आत्मसर्पण के बाद तिहाड़ जेल जाते हुए उसने घोषणा की कि बहुत दिनों तक तिहाड़ जेल उसे रोक नहीं सकेगा। और सच में दो-ढाई साल के भीतर 17 जनवरी 2004 को वह तिहाड़ से फरार हो गया। पुलिस उसे हरिद्वार, रूडकी, देहरादून में खोजती रही, वह रांची, गया, पटना में घूमता रहा, मीडिया को इंटरव्यू तक देता रहा। कोलकाता, बंगलादेश होते हुए बाकायदा पासपोर्ट और वीजा लेकर अफगानिस्तान में काबूल, गजनी तक पहुँच गया और वहाँ से 12वीं सदी के राजपूत शासक पृथ्वीराज चौहान का कथित अवशेष लेकर आया। मुहम्मद गोरी के मकबरे के पास से पृथ्वी राज चौहान का कथित अवशेष लाते हुए उसने वीडियो फिल्माया और बाद में जारी भी कर दिया। फिर 2006 में उसे पुलिस ने कोलकाता से गिरफ्तार किया, जिसे शेर सिंह ने अपनी मर्जी से आत्मसमर्पण बताया। पिछले दिनों रानी पद्मावती फिल्म के निदेशक संजय लीला भंसाली के थप्पड़ खाने की बात राजपूतों की “करणी सेना” के आयोजन में कही और कुछ ही सप्ताह के भीतर  सेना ने इस काम को अंजाम भी दे दिया।

क्या कहता है राणा अपनी सक्रियता के संबंध में

राणा का इंटरव्यू उसके घर पर किया गया.  एक घंटे से अधिक समय तक चले इस ऑन कैमरा इंटरव्यू में वह हर सवाल के इतने लंबे और लुभावन उत्तर देता रहा है कि हम हैरान थे। वह हमारी किसी प्रश्न का न तो सीधा उत्तर देता था, न ही उत्तर देने से इंकार करता था। अपनी छवि के निर्माण में माहिर यह सख्श एक सवाल करता है अपने हर इंटरव्यू में, यह सवाल उसने हमसे भी किया कि ‘आतंकवादियों को सामान्य जीवन जीने का हक़ है तो मुझे क्यों नहीं?’ वह कहता है कि ‘मैं कोई अपराधी नहीं हूँ, एक, दो क्राइम के मुकदमे मेरे ऊपर हैं तो उसमे बेगुनाही की लड़ाई मैं लड़ रहा हूँ।’ अपनी अति सक्रियता के सवाल पर राणा का कहना है कि ‘मैं जमानत पर छूट कर आने के बाद हर महीने देश के कई हिस्सों में 10-15 राजपूत सभाओं में बुलाया जाता हूँ। शब्बीरपुर की घटना के दिन भी मैं शिमलाना में महाराणा प्रताप जयंती के दौरान मंच पर था। वहाँ एक युवक के मरने की खबर अफवाह की तरह आई. किसी ने कहा कि उसे गोली मारी गई है। मैं मंच पर बैठे लोगों को कहता रहा कि हमलोग लड़के को देखने अस्पताल चलें। सभा स्थल पर सैकडों की संख्या में लोग थे. कुछ युवक धीरे-धीरे, 10-20 की संख्या में एक-एक कर निकलने लगे। मैं जल्द ही घायल युवक से मिलने अस्पताल पहुंचा तो वहाँ तब तक वह मर चुका था।’

शेर सिंह के लगभग हर विषय पर अपने विचार हैं, राष्ट्रवाद, राजपूत गौरव, दलितों के उत्पीडन, आरक्षण और उसके बेजा इस्तेमाल से लेकर नक्सलवाद और आतंकवाद पर। लोकप्रिय सवर्ण हिन्दू मान्यताओं के अनुरूप वह राष्ट्रवाद की बात करता है। आरक्षण को लेकर उसका मानना है कि एक पीढी तक ही मिले। मुसलमानों के लेकर राय है कि पूरी दुनिया में मुसलमान ही क्यों तनाव के कारण हैं? राजपूतों को लेकर उसका मत है कि उन्हें पढ़ना चाहिए और अधिकतम नौकरियाँ लेनी चाहिए। उसके अनुसार ‘दलितों से आरक्षण यदि छीन भी लिया जाए तो राजपूतों का क्या फायदा? सरकारी नौकरियों पर ब्राह्मण, बनिया, कायस्थ आदि जातियों का कब्जा है और उनका ही बढेगा यदि राजपूत नहीं पढेंगे-लिखेंगे तो।’


शेर सिंह की किताब ‘जेल डायरी : तिहाड़ से काबुल कंधार तक’ पर आधारित बायोपिक (जीवनी पर आधारित फिल्म) भी बनाने की तैयारी हो रही है। खुद शेर सिंह के अनुसार इस फिल्म के डायरेक्टर होंगे अनुराग कश्यप। फिल्म के कास्ट साइन होने अभी बाकी हैं।

सहारनपुर में बढ़ते जातीय तनाव, भीम आर्मी सेना के जवाब में गठित राजपूत रेजीमेंट के अस्तित्व आदि के बीच शेर सिंह की सक्रियता को देखते हुए एक सवाल सहज उठता है कि शेर सिंह बिहार में जातीय नरसंहारों का जिम्मेवार दलितों का कत्लेआम करने वाली रणवीर सेना के सुप्रीमो बमेसर मुखिया और शेर सिंह में कोई समानता है? क्या पश्चिम यूपी का वह इलाका बिहार की तरह जाति-हिंसा के लिए पक रहा है और शेर सिंह के राजपूती गौरव का अभियान उसे नेतृत्व देगा? मीडिया, संचार माध्यमों के कुशल उपयोग के साथ कदम-दर-कदम अपनी छवि निर्माण और अपनी राजनीतिक/सामाजिक योजनाओं को अंजाम देने में लगे शेर सिंह से जुड़े इन प्रश्नों के उत्तर समय के गर्भ में हैं। फिलहाल उसकी सक्रियता संदेह पैदा करती है. और वह संदेह राज्य की मशीनरी को भी है, तभी जिले के कलक्टर कहते हैं कि ‘वे उसपर पूरी नजर बनाये हुए हैं। वह अवांछित गतिवधियों में संलिप्त होगा तो नपेगा।’

स्त्रीसत्ता, लोकायत दर्शन और क्रान्ति की गति

आशिष साहेबराव पडवळ

स्त्री-वर्ग-जाति के मुद्दों पर काम करनेवाली मानव मुक्ति मिशन नामक संगठन के सोशल मीडिया का महाराष्ट्र प्रभारी. संपर्क: aanvikshiki.edit@gmail.com मो.8888577071

दर्शन काल का इतिहास आदिम समाज से शुरू कर के आगे बढ़ना चाहिए. जब किसी भी संस्था का इतिहास देखना हो तो उसके बेस को भी देखना चाहिए तभी हम उसके आखरी सिरे तक जा सकते हैं. यह समझना होगा कि बुध्द पूर्व भी यहाँ कोई जनजीवन था.


आदिम समाज में परिवार नही था,१ उसमें कुल व्यवस्था थी. परिवार न होने के कारण स्वैरसंभोग था. उस समाज में सिर्फ ‘मां’ का ही पता होता था, न कि बाप का. खेती तंत्र स्त्री द्वारा ढूंढने की वजह से समाज में स्त्री का वर्चस्व था .


ऋचा 10.71.9  साफ तौर पर यह साबित करती है आर्य पूर्व समाज कृषक था:
इमे ये न अर्वाक् न पर: चरन्ति न ब्राम्हणास: न सुतेकरास :.
ते एते वाचं अभिपद्य पापया सिरी: तन्त्र तन्वते अप्रजज्ञय न : ..२
ये पापी अब्राहमण लोग,जो हवन करते नहीं, जो लोकभाषा बोलते हैं, और खेती  करते है.

आदिम समाज अगर कृषक है तो वह स्त्री सत्ताक और आदिम समाज अगर पशुपालक है तो वो पितृसत्ताक व्यवस्था है.३ इस से साबित भी होता है कि तब स्त्री सत्ताक काल था. स्त्री सत्ताक काल में स्त्री राज करती थी.


समतावादी दर्शन से पहले समता और दर्शन दोनों के कालसापेक्ष क्या मायने थे, वह देखेंगे:


समता : समता अर्थात सभी लोगो को समान अधिकार, समतावादी दार्शनिक अर्थात समता के आग्रही लोग या संस्था. इस समता का शुरुआती दौर हम स्त्रीसत्ताक,मातृवंशक काल में देख सकते हैं, लोकायत का जन्म निम्न शेती विकास अवस्था में हुआ है. निऋति आद्य स्त्री सत्ताक गणों, देवी गणों में भूमि और धन का समान बटवारा करती थी.४ गण व्यवस्था की तेरणा मांजरा खोरे की राणी तुळजाभावनी अपने गणों में धान्य का समन्यायी बटवारा अपने परडी से करती थी.५ चार्वाक अपने ही हिस्से के उत्पादन का भोग लेने का निर्देश करते हैं. उसमें वे उच्च-नीच का भेद नही करते. असुरराज बलिराजा न्याय और समता के लिए सुपरिचित हैं.

दर्शन : दर्शनशास्त्र ज्ञान है जो परम् सत्य और प्रकृति के सिद्धांतों और उनके कारणों की विवेंचना करता है. दर्शन यथार्थ परख के लिए एक दृष्टिकोण है. ‘दृश्यतेह्यनेनेति दर्शनम् ‘अर्थात् असत् एवं सत् पदार्थों का ज्ञान ही दर्शन है.विविध प्रमाणों के सिद्धांत-समूह को ‘दर्शन’ कहा गया है .६ दर्शन अर्थात दृष्टि,तो इस ‘दर्शन’ से ऐसा प्रतीत होता है, उन्हें अंतिम सच के प्रत्यय पर ही विश्वास था . इसीलिये दर्शन (तत्त्वज्ञान) कहा गया ह . भारतीय दर्शनों में अवैदिक और वैदिक दो विभाग बताये जाते हैं. जबकि हम दर्शन को अंतिम सच का प्रत्यय कहते हैं तो , वैदिक आध्यात्मिक ज्ञान(वेद) को दर्शन कैसा कहा जा सकता है ? ये भी सोचने वाली बात है . भारत में हर एक चीज की खोज वेदों में होती है. सच ये है कि अध्यात्म को अंग्रेजी में Metaphysics कहा जाता है , Meta यानी के बाद ( beyond ) और Physics यानी भौतिक जगत. भौतिकजगत के बाद की पढ़ाई (study) करते समय तर्क शास्त्र के साथ मानसशास्त्र (psychology)का आधार लेना पड़ता है . ये भी वेदान्त समर्थकों  को ध्यान देना लेना चाहिए .

इस भारतीय समाज में “भारतीय दर्शनों को मोटे तौर से दो कोटियों में वर्गीकृत किया जा सकता है-आस्तिक और नास्तिक में. सामान्य शब्दावली में प्रथम से तात्पर्य है ईश्वरवादी और दूसरे से निरीश्वरवादी.७ इसमें से जोनिरीश्वरवादी असुर , अब्राम्हण, लोकायत, अवैदिक है . जिन्हें वेदों के निंदक, नास्तिक कहा गया ह . नास्तिक जिन्हें कहा गया है मनुस्मृति के अनुसार
वो लोग मूलतः आर्येत्तर थ असुर थे.
स साधू भिर्वहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दक: ..११.. ८
जो नास्तिक दर्शन है उनके विचार परलोक नही मानते, भारतीय दर्शन का इतिहास भौतिकवादी बनाम कल्पनावाद का देख सकते है. Materialistic को जड़तावाद कहा गया है, लेकिन जो चीज मूलतः जड़ नही है, उसे जड़तावादी कैसे कह सकते है? विचार जो जड़ नहीं, तो उन्हें जड़तावाद में कैसे तोल सकते है? इसलिए materialistic को भौतिकवादी ही कहना ठीक होगा.



लोकायत चार्वाक का कोई भी एक ग्रंथ आज उपलब्ध नहीं या लिपिबद्ध भी नहीं है , इसलिए हमें लोकायत संस्था विरोधियों की टिका-टिपण्णी पर निर्भर रहना पड़ता है. लोकायत का लोगो में विस्तुतः होता गया शास्त्र (लोक +आयत ) ऐसा भी उल्लेख पाया जाता है. भारतीय दर्शन का इतिहास हम पूर्वपक्ष पर कड़ी कर के अपना उत्तर पक्ष खड़ा कर सकते है. दर्शन- दिग्दर्शन में राहुल सांकृत्यायन कहते हैं कि ,सिंधु सभ्यता असुर सभ्यता की भगिनी कही जा सकती है .९ इससे हम दावे के साथ कह सकते हैं, वेदों के पहले भी यहाँ एक संस्कृति वास करती थी. भारतीय दर्शन के इतिहास को मान्य करना होगा कि भारतीय आस्तिक दर्शनों का उदय नास्तिक दर्शनों के बाद हुआ है,१०मतलब उन्हें परास्त करने के उद्देश्य से यहा अपनी बस्तियां बसाने वालो वैदिकों ने अपने वेदों को जन्म दिया.

मातृवंशक काल में तंत्र का विकास हुआ तभी लोकायत का उगम देखा जाता है. लोकायत, किसी व्यक्ति का नाम था या लोगों के समूह का यह बता पाना मुश्किल है. लोकयत  नाम चार्वाक से प्राचीन है, लोकायत का उल्लेख पाणिनी ने (अष्ठयाध्यायी ४.२.६०) में किया है. तो कौटिल्य उसे ‘शास्त्र’ कहते है .
स्थापना क्षेप सिद्धान्त परमार्थज्ञना गतै: .
लोकायतिकमुख्यैश्च सामन्तादनुनादिनम् .. आदिपर्व (६४.३७)

एक लोकायत शास्त्र के आश्रम का उल्लेख महाभारत के आदि पर्व में है और उसमे यह दिखता है कि – खंडन, सिद्धान्त, आदि में जो श्रेष्ठ है, जो जाननेवाले लोकयत शास्रो के प्रमुखों की वजह से वो आश्रम परिचित हो गया है. इसी से मालूम होता है कि लोकयत एक शास्त्र है जो उच्चतम शास्त्र समझा जाता था. लोकायत चार्वाक राजा-महाराजा के दरबार में भी पाये जाते हैं . राजा जनक के दरबार का याज्ञवल्क्य एवं दुर्योधन का चार्वाक दोस्त. द्रौपदी भी लोकायत शास्त्र की जानकार थी. बृहस्पति लोकयत शास्त्र के आद्य प्रवर्तक, अर्थात प्रथम पुरुष थे. बृहस्पति आर्यो के रचित वेदों में वैदिक देवता, अर्थात सुरों के भी गुरु पाये जाते हैं. अगर बृहस्पति गुरु हैं तो वह निःसंकोच नीतिवान ही रहे होंगे, इसलिये वे सुरों का पक्ष छोड़कर असुरों के पक्ष में गए होंगे. इंद्र, ब्रह्मा, विष्णु की भोगलीला तो पुराणों में यत्र-तत्र दिखाई देती है. इसलिये बृहस्पति का लोकायत शास्त्र का विद्यार्थी प्रहलाद पाया जाता है. इससे लोकायत चार्वाकों का असुर होने का पुख्ता सबूत है. क्योंकि प्रहलाद असुरों के राजा थे. प्रल्हाद के आगे की पीढ़ी के सभी ‘असुरराज’- विरोचन, बलिराजा, बाणासुर को इतिहास ने नीतिमान और समताप्रिय कहकर उनका गौरव किया है. तो दूसरी ओर बृहस्पति के बारे में यह भी सोच है कि जैसे प्रजापति और गणपति अनेक हुए हैं, उसी तरह से बृहस्पति भी हो सकते हैं. सभी असुरों- अवैदिकों ने वैदिक यज्ञयाग को नकारा थाबिनाडरे ने उसका विनाश भी किया था. इसकी एक लोकप्रिय कहानी भी है – दक्ष ने अपने यज्ञ में रूद्र को न्योता नही दिया तो रूद्र के गणों ने यज्ञ का नाश किया. मतलब अवैदिकों के मन में यज्ञ प्रति कोई आदर भाव नही था. ‘बृहस्पतिमतानुसार नास्तिकशिरोमणिना चार्वाकेण’११ बृहस्पति मत के अनुसार चलने वाला नास्तिक शिरोमणि चार्वाक हैं. उन्होंने वेद पुराण अर्थात ‘शब्द’ प्रमाण को नाकारा है. जिसने- जिसने वेदों को नकारा, समता का पक्ष लिया, वेदों ने उन्हें नास्तिक कहा. उनको नास्तिक कहना सिर्फ वेदों का विरोध नही था, तो उनकी समानता का राज्य उनका नीतिवान रहना भी कारण रहा है. तो इससे यह भी प्रतीत होता है कि मातृवंशक समाज के राजा ने लोकायत शास्त्र को ऊँचाईयो पे लाकर रखा था. तो दूसरी ओर वैदिक आर्य, आर्य का दासप्रथा- समाज में मतलब स्वामी था. क्योंकि आर्यो ने यहा कि उन्होंने असुर राज्यो की जीतकर अपना राज्य प्रस्थापित किया. पशुपालक आर्यों ने यहाँ आकर खेती का नया तंत्र विकसित किया. उसका बेस उनको यहा के अनार्यो से ही लेना पड़ा. जबकि आर्य के पितृवंशक होने की वजह से उन्हें ‘क्षत्र’ और ‘ब्रम्हन्’ आदि मालूम नही था, इसी के वजह से उनके ही गण बांधव से नया वर्ण का उदय हुआ, जो कि  ‘वैश्य’ नाम से परिचित है. उन्होंने दूसरे गणों को जीतकर यहाँ ‘शूद्र’ वर्ण प्रस्थापित किया  इस प्रकार आर्यो ने चातुर्वर्ण की नींव रखी. यहाँ के प्रजा को लुभाने के लिये और लोकायत तंत्र को पराजित करने के लिए वेदों की रचना की. वेदों में विश्व की निर्मिति भगवान की शक्तियों से हुई, ऐसा दिखाया गया. आत्मा का देह के बाद भी प्रवास रहता है. परलोक की कल्पना ,पुनर्जन्म की कल्पना, ऐसा ही बहुत सारा कूड़ा वेदों में भर दिया. सुप्रसिद्ध वेद निरुक्तकार यास्क, जिनका जन्म ईसापूर्व 500 का है, के निरुक्त में वेद एक तो अर्थशून्य है या आत्मव्याघातपूर्ण है, ऐसा बोलने वाला कौत्स का उल्लेख है, वेदविरोधी उसके मतों का सविस्तर खंडन किया है .१२ वेद मानना यानी शब्द को प्रमाण मानकर चलना, वहाँ अपनी स्वतंत्रता को बेचने समान ही है. और जो ऐसा शब्द प्रमाण मानकर चलते हैं उन्हें वेद आस्तिक कहते हैं. नास्तिक असुरो की वेदों ने निंदा की है.



आत्मा और परलोक 


वेद और वेदों के समर्थक आत्मा का देह से भी अलग अस्तित्व बताते हैं. उनकी मान्यता से देह का निर्माता और आत्मा का नियंत्रक भगवान है. जो परलोक से सभी को नियंत्रित रखते हैं. इंसान मरने के बाद आत्मा देह छोड़कर परलोक की राह चलता है.वेद आत्मा को नित्य मानते है . इसके उलटा चार्वाक का उपदेश है:
न स्वर्गो , न अपवर्गो वा न एव आत्मा पारलौकिक:.१३ ना तो स्वर्ग है, ना मोक्ष है, न अलग अस्तित्व रखने वाली आत्मा  न ही परलोक है. जब चार्वाकों ने इस कभी न दिखने वाले परलोक पर हल्ला किया तो आगे चलकर वेदों ने पुनर्जन्म को ही जन्म दिया. इस जन्म का पुण्य अगले जन्म में मिलेगा, इस तरह से पुनर्जन्म का ढोंग रचा. इसके उपर हमला करते चार्वाक अगर आत्मा ही नित्य नहीं,  तो वो कैसे जन्म लेगा यह भी पूछते हैं. और किसने भी अपने पुनर्जन्म का दावा नही किया. ‘देहस्य नाशो मुक्तिस्तु न ज्ञानान्मुक्तिरिष्यते’१४ शरीर का मृत्यु के बाद होई प्रवास नही है ; वेदों को ज्ञान कहा गया है. तो बृहस्पति कहते है – ज्ञान(वेदों) से कोई मोक्ष मिलने वाला नहीं , न तो आशा रखनी चाहिए. मनु – नास्तिक्यं वेदनिन्दा च देवतानांच कुत्सनम् .द्वेष दंभ्भ च मान च क्रोधं तैक्ष्, यंच वर्जयेतु ..१५ वेद, स्वर्ग  ईश्वर आदि को न मानने वालो को द्वेष छोड़ने को कहकर वेदों को प्रमाण मानने का सलाह वेद समर्थक देते हैं . चार्वाकों ने वेदों के भीतर लिखी सारी चीजें नकारी और वेदों से कुछ भी ज्ञान नही मिलेगा, ऐसी उसकी निंदा की है . ‘भूतान निधनं निष्ठा स्रोतसामिव सागर’ :.१६ मृत्यु ही देह का अंत है . यही देहात्मवाद असुर राज विरोचन के भीतर भी देखा सकते है .


महाभूत 


जो वेदों के निन्दक है वह आकाश की नित्यता सिद्ध करने का प्रयास करते दिखाई देते हैं. इसीलिये उन्हें नास्तिक कहा गया है. वेद एकमात्र ईश्वर को अनित्य बताते हैं. आकाश को जो नित्य मानता है, उसे वदो की भाषा में नास्तिक खा गया है. इससे यह प्रतीत होता है कि वेदों के सिद्धांत दृढ़ करने के लिये अनुमान आदि की सहायता को भी मना किया है. वेद विरोधी जो सिद्धांत है वह वेदों की दृष्टि में नास्तिक दर्शन है  विश्व की सभी चीजों को अनित्य मानना और एकमात्र आत्मा को ही नित्य मानना ये वेदों के प्रताप है. लेकिन आत्मा अनित्य है यह दर्शन का निर्देष चार्वाक करते हैं. इसीलिये आत्मा का शरीर से अलग भी अस्तित्व नकारने वालो को वेदों ने नास्तिक कहा. लोकायत चार्वाक चार महाभूत स्वीकार करते हैं, उन्हें ही सर्वस्व मानते है. ‘तत्र पृथ्विव्यादीनि भूतानि चत्वारि तत्वानि’ .१७ इन्हीं चारो भूतों के मिलन से शरीर बनता है. वह स्वयं प्रेरित है न कि उसका कोई उपरवाला नियंत्रक है. जिन्हें वेद परमेश्वर कहते हैं. लोकायत-मतानुसार मोक्ष को पाना है तो इसी जन्म में. मतलब मोक्ष यानी दुःख का निवारण और वो भी इसी जन्म में, क्योंकि दूसरा जन्म दूसरा नहीं है.मरने  के बाद इन्ही चार महाभूतों से बनी आत्मा देह बिना कुछ भी नहीं है. ‘ननु पारलौकिकसुखभावे’१८ उसका प्रवास समाप्त हो जाता है, आत्मा का आगे का होई परलोक का प्रवास नही होता है. परलोक, स्वर्ग ,नरक ये सभी वेदों के शब्द-छल हैं,  जिनकी बुनियाद महात्मा फुले कहते है कि ब्राम्हण वर्चस्व लिए खड़ी की गयी है .
अत्र चत्वारि भूतानि भूमिवार्यनलोअनिलाः .
चतुर्भ्यः खलु भूतेभ्यः चैतन्यमुपजायते ॥१९
१.भूमि – शब्द, स्पर्श, रस, रुप, गंध
महाभारत वनपर्व में दिखता है कि ‘भूमि:पन्न्चगुणा’
२.जल – शब्द , स्पर्श , रूप , रस
वनपर्व ‘ब्रम्हन्नु दकन्न्च चतुगृणम्’ २१०. ४-८
३.तेज – शब्द, स्पर्श, रूप
४.वायु – शब्द , स्पर्श
आदि पर्व में एक जगह वायु के गुणों का उल्लेख पाया जाता है .
‘शब्दलक्षणमाकाश वायुस्त स्पर्शलक्षण’
आकाश- का एकमात्र गुण शब्द है, इसलिये उसको चार्वाक परंपरा ने नाकारा है कि वो प्रत्यक्ष प्रमाण की कसोटी पर खरा नही उतरता ना ही लोकप्रिय अनुमान कसोटी पर. लोकप्रिय अनुमान यानी लोगो के प्रत्यक्ष मतो पर विचार विमर्श करना.


आन्वीक्षिकी और प्रत्यक्ष प्रमाण


लोकायत चार्वाक के शास्त्र को आन्वीक्षिकी कहा गया है. आन्वीक्षिकी या तर्कशास्त्र (logic) का उल्लेख बहुत जगह पाया जाता है. शास्त्र मीमांसा में आन्वीक्षिकी विद्या का उपयोग किया जाता था. आन्वीक्षिकी अर्थात प्रत्यक्ष देखने के बाद अनुमान करना. लोकयत सिर्फ प्रत्यक्ष प्रमाण मानते हैं. जो ज्ञान तर्कशास्त्र और लोकप्रिय अनुमान की कसौटी पर खरा नही उतरता वह ज्ञान उन्होंने साफ नकारा है .
महत्तम अर्थशास्त्रकार कौटिल्य बताते है कि चार विद्या है-
आन्वीक्षिकी, त्रयी , वार्ता , दंडनीतिश् च इति विद्या :..
आन्वीक्षिकी अर्थात सांख्य , योग और लोकयत दर्शन , त्रयी याने वर्णजातिधर्म , वार्ता मतलब अर्थशास्त्र, और दंडनीति का मतलब राजकारण .२०
अहमासं पंडित को हेतुको वेदनिन्दक:.
आन्वीक्षिकी तर्कविद्यामनुरक्तो निरर्थिकाम् .. (शांतिपर्व १८०.४७-४९)

वेदों को नकार देने वाले शास्त्रो की निंदा की गई है. इंद्र -काश्यप संवाद में भी एक जगह आन्वीक्षिकी को निरर्थक कहा है. अर्थात अन्वीक्षा करके लोकायत चार्वाकों ने वेदों को नकारा था . महाभारत के शांति पर्व में राजा जनक ओर याज्ञवल्क्य का संवाद ऐसा पाया जाता है:  हे राजन यह आन्वीक्षिकी विद्या मोक्ष पाने के लिये, त्रयी वार्ता व दण्डनीति से भी बहुत उपयोगी है .
चतुर्थी राजशार्दूल विद्यैषा साम्परायिकी .
उदीरिता मयातुभ्यं पंचविंशादधिप्ठिता .. शांतिपर्व ३१८.३४
आयोध्याकांड में राम ने कहा है कि बहुत से अभिमानी पंडित मुख्य धर्म छोड़कर आन्वीक्षिकी ज्ञान के बल पर निरर्थक वाद-विवाद करते रहते हैं. यहां आन्वीक्षिकी शब्द का अर्थ ‘नास्तिक लोकायत’ विद्या है .

धर्मशास्त्रेषु मुख्येषु विद्यामानेषु दुर्बुधा:.
बुद्धिमान्वीक्षिकीं प्राप्य निरर्थ प्रवदन्ति ते .. अयोध्याकांड १०७.८

आन्वीक्षिकी विद्या का जानकार याज्ञवल्क्य वाद-विवाद में सभी को पराजित करके जनक से सोना और गाय इनाम में लेता है. तो यह समझ सकते हैं कि अन्वीक्षा करने का जबरदस्त हथियार चार्वाकों के हाथ में था, जिसकी आखिर तक वेदों की परास्त करने के लिये निंदा करनी पड़ी. वैदिक स्वतंत्र विचार करने के खिलाफ थे, उन्हें शब्द प्रमाण मान्य था तो चार्वाक स्वतंत्र-विचार धारा के लोग थे, जो शब्द प्रमाण बताने वाले वेदों की निंदा करते थे. प्रत्यक्ष अनुमान को महत्व देते थे . इसके द्वारा किसी भी चीज के बारे में निर्णय लेना यह तत्व स्वीकार किया गया है. जहां प्रत्यक्ष द्वारा वस्तु का निर्णय लेना कठिन हो, वहां अनुमान स्वीकार गया है लेकिन वह भी लोकप्रिय अनुमान, यानि जो अनुमान बहुत सारे लोगो ने अनुभव किया है . उसका कोई तो पुख्ता सबूत उनके हाथों में हो ऐसा लोकप्रिय अनुमान उन्हें स्वीकार है .


प्रत्येक्षणानुमानेन तथौपम्यागमैरपि . शांतिपर्व ५६.४


‘मानंत्वक्षजमेव हि’ लोकायत प्रत्यक्ष प्रमाण को ज्यादा महत्व देते थे. तो अनुभव जन्यज्ञान को अविद्या नास्तिकता का लक्षण कहा गया है जो कि शंकराचार्य का वेदांतभाष्य में शामिल है . बाष्काली बाध्व से ब्रह्मस्वरूप के बारे में पूछता है तो बाध्व उसे मौन से जवाब देते हैं . बाष्काली ने बाध्व से प्रार्थना की : ‘भगवन मुझे ज्ञान दो. बाध्व शांत रहा. तो बाष्काली ने दूसरी बार फिर से कहा: ‘भगवन मुझे ज्ञान दो. बाब्ध शांत रहा. तो बाष्काली ने तीसरी बार फिर से कहा: भगवन मुझे ज्ञान दो. बाब्ध बोला, मैं तो ज्ञान दे रहा हूँ लेकिन तुम ग्रहण करने में असमर्थ हो. आत्मा निःशब्द है. ‘उपशान्तोयमात्मा’ अनुसार प्रत्यक्ष प्रमाण अविद्या है. प्रत्यक्ष प्रमाण कुछ काम का नहीं है .

वर्णाश्रम की चीरफाड़


न स्वर्गो, नापवर्गो वा नैवात्मा पारलौकिक:.
नैव वर्ण-आश्रम-आदीनां क्रियाश् फलदायिका:..२१ ना स्वर्ग, ना मोक्ष, ना देह से दूसरा अस्तित्व रखने वाला आत्मा है. चार्वाक कहते हैं,, वर्ण आश्रम की सभी क्रिया निष्फल है .

तो वेदों के समर्थक आत्मा वर्णाश्रम इन सभी को उचित मानते है. ‘धर्म-अपेतम’ अर्थात ‘धर्मविहीन’२२ यह उपदेश जाबाली नामक चार्वाक वनवासी राम को देता है, तो वासिष्ठ राम को उसका आचरण धर्म के अनुसार योग्य है, कहते हैं और आगे यह भी कहते है कि जाबाली का कहना कुछ भी वेद और वर्णाश्रम धर्म विरोधी नहीं है. तो इससे यह भी समझ में आता है कि ब्राम्हण लोकायत का भी उगम पाया जाता है.
अग्निहोत्र और पाखंडी वेद ब्राम्हण –
“द्वया वै देवो:. देवा अहैव देवा:. अथ ये ब्राम्हणा:..
श्रुश्रुवांसो नुचा नास्ते मनुष्यदेवा:..शतपत २-२-६..
इन वेदों के निर्माता ब्राम्हणों ने सिर्फ आकाश में ही देव बताये तो वो खुद को इहलोक के अर्थात भूदेव कहते है .
अग्निहोत्र त्रयो वेदास्त्रि दण्डं भस्मगुण्ठ नम्. बुध्दिपौरुषहीनानां जीविकेत बृहस्पति: ..२३

बृहस्पति के यह मतानुसार वेद केवल धूर्त लोगो के प्रताप हैं. अग्निहोत्र क्रिया आदि का उद्देश्य केवल पेट भरना है. अग्निहोत्र, तीनो वे , संन्यासी होना, और पूरे शरीर पर भस्म लगाकर साधु बनना, ये सारी चीजें-  उनके भीतर बुद्धिहीनता का परिचायक है. यह उनके अंदर का पौरुष्य नही है, यह तो केवल उनकी उपजीविका का साधन है.
कृषि,व्यापर,दंडनीति का उपदेश –
मनु कहता है
एकमेव तू शुद्रस्य प्रभु कर्म समादिश् त .
एतेषामेव वर्णानाम् शुश्रूषामनसूयया ..२४

अर्थात शूद्रों ने भोग करके अपने फल से अलिप्त रहने का बंधन डालना पसंद किया दिखाई देता है. व्यापार, व्याज लेना एकमात्र वैश्य का ही अधिकार माना जाता था जो कि ब्राम्हणों की उपज है. शूद्रों को सिर्फ ब्राम्हण क्षत्रिय और वैश्य इनकी सेवा करने का उपदेश दिया है. तो इस विषमता के बराबर उलटा समतावादी उपदेश चार्वाक देते हैं –
कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यदण्ड नित्यादिभिर्बुढ: .
दृष्टैरेव सदुपायैर्भोगाननुभवेद भुवि ..२५

अर्थोत्पादन करने के लिए खेती करो, गोरक्षा करो, व्यापार करो और सामाजिक नीति बरकरार रखने के लिए दण्ड़ नीति का भी प्रयोग करो ऐसा भी सुझाव देते हैं. और आपने ही हिस्से का लाभ उठाओ, यह भीसंदेश भी देते है. इस से यही प्रतीत होता है कि चार्वाक नीतिमान थे. इसलिये तो महाभारत में प्रहलाद को नीतिवान ‘तत्वनिष्ठ’ कहा है (समसे रतम्) और उनके आगे की पीढ़ियों के बारे में भी इतिहास ने उनकी नीति और तत्वों की प्रशंसा ही की है.
फिर से अब हमे सोचना होगा
यावत् जीवेत् सुखं जीवेद् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् .
भस्मिभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः?२६



जब तक जीवन है तबतक सुख से जीओ, कर्जा लेकर घी पीओ. एक बार शरीर खत्म होने के बाद फिर से थोड़ी ही आने वाला है  इसमें लोकायत चार्वाक  खाओ, पीओ और मौज करो ऐसे संदेश देते दिखाई देते हैं. लेकिन एक चीज हमे भी ध्यान देना चाहिए कि जो चार्वाक हमने देखे इतने नीतिवान हैं, बुद्धिवादी हैं, अपने ही हिस्से का भोग लेने का सलाह देते हैं, वह चार्वाक ऐसा ऋण डुबोने वाला उपदेश कैसे कर सकते है? उनके उपदेश भोगवादी कैसे हो सकते है ? यह सोचना होगा. ऋण (कर्जा) डुबोने का धार्मिक आधिकार ब्राह्मण वर्ग को है  तो दूसरी ओर कर्जा डुबोने वाला वैश्य या व्यापारी वर्ग वो भी इसी ब्राह्मण नीति की ही उपज है. तो अब हमें सोचना होगा कि सही क्या गलत क्या?


भारतीय दर्शन का इतिहास स्त्री सत्ताक से आज तक का लंबा सफर है. उसमें हमेशा दो समूह  एक-दूसरे की आलोचना करते दिखाई देते हैं. एक वैदिक, दूसरा अवैदिक.  वैदिक आर्य परम्परा में वेद, ब्राह्मण,वेदान्त ,पुराण से आज के आरएसएस  को देख सकते हैं और अवैदिक परम्परा में  निऋति , तुळजाभवानी ,लोकायति बृहस्पति से प्रल्हाद, विरोचन, बलिराजा, महावीर, बुद्ध ,तुकाराम महाराज, शिवाजी महाराज, फुले, आंबेडकर से आज कॉ. शरद पाटील तक देख सकते हैं . लोग ये भी बोल सकते हैं कि, शरद पाटील दर्शन में कैसे ? जब हम अब्राम्हण-इतिहास के पन्ने देखेंगे तो उसमें कॉ. शरद पाटील एक व्यक्तित्व है, जिन्होंने यहां की प्रस्थापित व्यवस्था के विरोध में अब्राह्मण सौंदर्यशास्र, स्त्री सत्ताक कुल व्यवस्था से आगे बढ़कर सौत्रांन्तिक मार्क्सवाद(सौ.मा ) जैसे मजबूत हथियार यहाँ यहा क्रांति के लिए दिए हैं. इसीलिए जब आगे चलकर भारतीय दर्शन का इतिहास अपडेटे हो जायेगा तब  कॉ. शरद पाटील का नाम भी उस लिस्ट में हम पाएंगे. कॉ.शरद पाटील तक लिस्ट बढाने का यह प्रयोजन है कि घटककुल (clan) व्यवस्था के निम्न विकास अवस्था से शुरू हुई क्रांति प्रतिक्रांति की लड़ाई आज तक चल रही है. आगे भी चलती रहेगी. लेकिन हम उसमें हार नही मानेंगे.
ज्ञान ऐ बाती दिप जलाएंगे.
अंधेरे को चिरते सूरज बन जायेंगे.

संदर्भ सूचि :


१. भारतीय विवाह संस्थेचा इतिहास- वि.का.राजवाड़े पृ.२
२. मार्क्सवाद फुले-आंबेडकरवाद- कॉ.शरद पाटील पृ.२३३
३. जातिव्यवस्थाक सामंती सेवकत्व- कॉ.शरद पाटील पृ.१७०
४. जातिव्यवस्थाक सामंती सेवकत्व- कॉ. शरद पाटील पृ.१७२
५. तुळजापूरवासी भारतीबूवा के मठ की चौपट देखो
६. Outlines of indian philosophy by Prof.Hiriyanna मराठी अनुवाद भारतीय तत्वज्ञानाची रूपरेषा-                  भा.ग.केतकर पृ.१८३
७.   प्राचीन भारतमें भौतिकवाद ,पृ.१३१-१३२
८.  मनुस्मृति हिंदी अनुवाद-पंडित गिरिराज प्रसाद द्विवेदी प्रथम आवृत्ती अध्याय २ श्लो ११ पृ.२५
९.  दर्शन दिग्दर्शन –राहुल सांकृत्यायन पृ.३७६
१०..चार्वाक इतिहास आणि तत्वज्ञान-प्रा.सदाशिव आठवले लक्ष्मणशास्त्री जोशी प्रस्तावना पृ.3
११. सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.५४
१२. Outlines of indian philosophy by prof.Hiriyanna मराठी अनुवाद भारतीय तत्वज्ञानाची रूपरेषा –                भा.ग.केतकर पृ.९४
१३. सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.६३
१४ .सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.५७
१५. मनुस्मृति हिंदी अनुवाद-पंडित गिरिराज प्रसाद द्विवेदी प्रथम आवृत्ती अध्याय ३ श्लो.१६३ पृ.१४२
१६. Outlines of indian philosophy by prof.Hiriyanna मराठी अनुवाद भारतीय तत्वज्ञानाची रूपरेषा                     अनुवादक-भा.ग.केतकर पृ.९८
१७. सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.५४
१८. सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.५६
१९. सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.५७
२०. मार्क्सवाद फुले-आंबेडकरवाद – कॉ.शरद पाटील पृ.३३
२१. सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.६३
२२. जातिव्यवस्थाक सामंती सेवकत्व .कॉ.शरद पाटील पृ.१२२
२३. सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.५६
२४. मनुस्मृति हिंदी अनुवाद-पंडित गिरिराज प्रसाद द्विवेदी प्रथम आवृत्ती अध्याय १ श्लो ६१ पृ.१७
२५. सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.६३
२६. .सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.६३      

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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साधु का लिंग महिला ने काटा: पितृसत्ता लहू-लुहान

केरल में एक महिला ने अपने बलात्कारी श्रीहरि उर्फ़ गणेशानंद तीर्थपदा का लिंग काट दिया. इसके बाद महिला ने पुलिस को बताया कि श्रीहरि उर्फ़ गणेशानंद परिवार का धर्मगुरु था और वह तब से उसका यौन उत्पीड़न कर रह था  जब वह 16 साल की थी. महिला ने कहा कि शनिवार की सुबह जब श्रीहरि ने उसका बलात्कार करने की कोशिश की तो महिला ने चाकू से उसका लिंग काट दिया.

केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन ने महिला की तारीफ़ करते हुए इसे ‘साहसिक कार्य’ बताया. सोशल मीडिया में भी महिला के इस साहसिक कार्य की तारीफ हो रही है.

तिरुवनंतपुरम की पुलिस के अनुसार  “परिवार को श्रीहरि पर पूरा विश्वास था. 16 साल की उम्र से उसकी हवश का शिकार पीडिता इस बात से डरी हुई थी कि अगर वह बलात्कार का आरोप लगाएगी तो उसका परिवार यकीन नहीं करेगा. इसलिए, जब उसके साथ बलात्कार की कोशिश हुई तो उसने उसका लिंग काट दिया और यह सोचकर अपने घर से भाग गई कि श्रीहरि उसे मार डालेगा.” पुलिस ने उस पर यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण कानून (पोक्सो) और भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार के लिए दंड) के विभिन्न प्रावधानों के तहत व्यक्ति के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया है.

श्रीहरि उर्फ़ गणेशानंद

डाक्टरों द्वारा यह स्पष्ट कर दिया गया है कि “लिंग को वापस जोड़ने का कोई तरीका नहीं है.”  रैडिकल स्त्रीवादियों का एक समूह मानता है कि  बलात्कारियों का लिंग काट दिया जाना चाहिए. यह घटना उसका एक प्रैक्टिकल रूप है.

श्रीहरि पनमना आश्रम का एक सदस्य रहा है, जिससे इस घटना के बाद आश्रम ने पल्ला झाड लिया है.

सेक्स और स्त्री देह के प्रति सहजता और कुंठा के बीच महीन रेखा

संपादकीय

कभी आपने अपनी नानियों, दादियों, मां, मौसी, चाची या आस-पास की औरतों को सेक्स के बारे में बात करते सुना है ! यकीनन आपका बचपन यदि गांवों में बीता हो, ड्योढ़ी, जो घर के आँगन से लगी स्त्रियों की बैठक होती रही है, यदि उसे आप जानते-समझते हों, तो वहाँ के संवादों को याद करते हुए आप इस सवाल का जवाब ढूंढ सकते हैं. हालांकि यह कभी-कभी ही अनायास का संयोग हो सकता है कि आप उनसे ऐसा कुछ सुनें, क्योंकि बच्चों/किशोरों  के सामने वे सीधे इस पर बात करने में बचती होंगी, फिर भी कूट संकेतों, अचानक की हंसी और गोपनीयता मिश्रित खिखिलाहटें शायद आपको याद हों या अनायास के सुने शब्द भी. मैंने तो अपनी बड़ी नानी को सीधे मुझे संबोधित ऐसे मजाक सुने हैं, अक्सर ये पुरधाइनें (बूढ़ी और अनुभवी स्त्रियाँ) आपके निर्धारित मजाक के रिश्तों के साथ जोड़कर आपको सेक्स से सम्बंधित टिप्पणियाँ दे जाती होंगी.

यहाँ सेक्स बिकता है, सेक्स क़त्ल करता है: बदनाम नहीं, ये मर्दों की गलियाँ हैं

फिर ऐसा क्या होता जाता है कि सेक्स से सम्बंधित बातों के लिए हम दुरग्रह से ग्रस्त होते गये. सेक्स की गोपनीयता अतिरेक में तब्दील होती गई, सेक्स स्त्रियों की इज्जत से जुड़ता गया और इस कदर की यौन अंगों से जुड़े रोग भी छिपाये जाने लगे-यानी आनंद और पीड़ा दोनो ही अतिगोपनीय खाते में डाल दिये गये. शायद ऐसा सभ्यता के प्रभाव में होता जाता है. जानकार इस अतिआरोपित गोपनीयता को विक्टोरियन प्रभाव मानते हैं. अंजता-खजुराहों, कोणार्क, कामसूत्र और के इस देश में सेक्स से सम्बंधित बातचीत अश्लीलता और फुहड़पन में शुमार होने लगीं.  ड्योढ़ी-संस्कृति के जिस अवशेष की बात मैं कर रहा हूँ वह प्रायः बीसवीं सदी के अंत तक का है, लेकिन इसका पूरा शवाब 19वीं सदी तक तबतक रहा होगा, जब विक्टोरियन प्रभाव में हम कथित संस्कार की और न बढ़े. बंगाल में 19वीं सदी में भद्र (कुलीन) महिलाओं के बीच इस कथित अश्लील या फूहड़ माहौल का जिम्मेवार भदेस ( अकुलीन, खासकर यजमानी से जुड़ी ) महिलाओं को माना गया था,अंग्रेज महाप्रभुओं का अनुकरण करते भद्र बंगाली पुरुषों ने जाति और वर्ग की सीमा से परे इस महिला-साख्य को नियंत्रित करने की कोशिश की थी, नियंत्रित किया था.

सेक्स से जुड़ी खबरों, फीचरों को मिलते हिट्स 

ऑनलाइन मीडिया के जमाने में सेक्स से जुड़ी खबरों/ फीचर को हिट्स काफी मिलते हैं. यानी लोग उसे पढ़ते हैं, इन खबरों को क्लिक करने के पीछे उनकी मानसिकता चाहे जो भी होती हो, अलग -अलग, कभी उत्सुकता, कभी जानकारी और कभी कुंठा के लिहाज से लेकिन ऐसी खबरें/फीचर अनुकूलता पर प्रहार करते हैं-लोगों को सहज करते हैं. मैं ऐसा उन खबरों के बारे में नहीं कह रहा हूँ जो क्लिक के नंबर के लिए महिला विरोधी अश्लील हिंसा को प्रोत्साहित करते हैं-कभी ऊप्स मूमेंट की तस्वीरें जारी कर तो कभी ऐसे शीर्षकों से खबरें प्रस्तुत कर जो सॉफ्ट पोर्न का इशारा देते हों. हद तो तब होती है जब रील के बलात्कार को रियल बलात्कार की तरह पेश करते हुए शीर्षक दिये जाते हैं, और वैसी ही तस्वीरें लगाई जाती हैं, मसलन मध्यप्रदेश में पत्रिका ने अपनी एक फीचरनुमा खबर का शीर्षक लगाया: ‘ बड़ी खबर: एक बार फिर दहला बॉलीवुड, ऐक्ट्रेस पंखुरी अवस्थी का हुआ दिन दहाड़े रेप, सभी आरोपी फरार.’ जबकि यह फीचर/ खबर एक सीरियल में फिल्माये गये बलात्कार से सम्बंधित थी. जनसत्ता,अमर, उजाला जैसी अखबारों ने इसी हिट्स की दौड़ में शीर्षक दिया ‘सात लोगों से संबंध बनाते पकड़ी गई कतर की राजकुमारी’ और पूरी फर्जी खबर एक फर्जी तस्वीर के साथ चला दी थी. इस तरह के खबर और भ्रामक फीचर सेक्स की कुंठाओं के दोहन से हिट्स पाने की ललक और व्यापार के हिस्सा होते हैं.



बीबीसी और अन्य पोर्टल के सेक्स फीचर/ खबरें 

जिस दिन मैं यह संपादकीय (अग्रिम तौर पर) लिख रहा हूँ उसी दिन बीबीसी हिन्दी के टॉप 10 पोस्ट में तीन खबरें सेक्स से या महिला देह से सम्बंधित हैं. मसलन: 1. महिला हस्त मैथुन: मिथक और सच्चाई 2. सेक्स सेल से चलता है कुदरत का कारोबार, 3. मैं नग्न होती रहूँगी ताकि फॉलो करना छोड़ दो: पेरिस जैक्सन. यहीं बीबीसी हिन्दी में फरवरी में लगी एक खबर ‘वायरल सेक्स वीडियो ने तबाह की उसकी जिन्दगी’ अप्रैल मई तक उसके वेबसाईट के टॉप 10 ख़बरों/ फीचर में बनी रही. बीबीसी हिन्दी के वेबसाईट पर सेक्स से जुड़ी ऐसी  ख़बरें/ फीचर बारंबारता में आते रहते हैं. मसलन: हस्तमैथुन के ये हैं पांच फायदे, कहीं आप वर्चुअल सेक्स के आदि तो नहीं, जिस योनि से जन्मे उसी पर चुप्पी क्यों, कामसूत्र महिलावादी या कामवासना की किताब, चरमसुख की कुंजी क्या है, रेप को भुलाकर शरीर दोबारा सहज हो सकता है आदि. सैनिटरी पैड को लेकर बीबीसी ने एक सीरीज ही चलाया.

कामसूत्र से अब तक

अमर उजाला ने एक पोस्ट लगाया ‘हस्त मैथुन के बारे में ये बातें जानते हैं आप?’ या सेक्स के दौरान इन बातों का ख्याल रखें मर्द या सेक्स टॉय नहीं मशीन देगी सेक्स का सुख. इस तरह की खबरें और फीचर अन्य समाचार पोर्टल पर भी पोस्ट किये जाते हैं.


ऐसी खबरें और फीचर सेक्स को दैनंदिन में शामिल रूटीन के तौर पर पेश करते हैं और सहजबोध से भी भरते  हैं. इन खबरों/ फीचर का सहज प्रभाव है कि महिलाओं के शरीर पर आरोपित गुप्तता और इज्जत दोनो को चुनौती मिलती है. देह को, सेक्स को स्त्री और पुरुष पाठक सहजता में लेने लगते हैं, कुछ पीढ़ियों का अनुकूलन ख़त्म होता जाता है, यह अनुकूलन आधुनिकता के नाम पर डेढ़-दो सदियों में हमने खुद ही ओढ़ लिया है.

धार्मिक ग्रंथों, क्लासिक्स  और लोकसाहित्य में सेक्स

आधुनिकता, विक्टोरियन आधुनिकता के प्रभाव में आरोपित अनुकूलन से अलग इसी देश की सच्चाई है कि देह और सेक्स के प्रति सामाजिक सहजता के प्रतीक स्वरुप लोकसाहित्य, क्लासिक्स और धार्मिक ग्रन्थ भी खूब मिलते हैं. ये सामाजिक दैनंदिन के हिस्सा हैं, खजुराहो, अजन्ता या कोणार्क के भित्तिचित्रों को छोड़ दें तो भी. लोकगीतों, कथाओं में स्त्री देह और स्त्री-पुरुष संसर्ग के प्रसंग खूब होते रहे हैं. बच्चे के जन्म से लेकर शादी-विवाह के गीतों, फसल के दौरान के गीतों में शारीरिक संसर्ग के संकेत होते ही होते हैं, धर्म ग्रंथों में देवियों की जंघाओं, नितंब और स्तन के वर्णन से ही उनके सौन्दर्य का बिम्ब खीचा जाता रहा है, ऐसा ही क्लासिक्स में भी होता रहा है. देह-संबंध इनके कथा-प्रसंगों में किसी भी कुंठा से परे होते हैं.

  वे लाइव पोर्न में प्रदर्शन के पूर्व ईश्वर को प्रणाम करती हैं !

इस लिहाज से विभिन्न समाचार पत्रों, चैनलों के वेब पोर्टल में सेक्स और देह की खबरें और फीचर न सिर्फ हिट्स का प्रबंध करते हैं बल्कि संपादकों की अपनी समझ, प्रतिबद्धता और एजेंडे के अनुरूप इनमें एक महीन रेखा भी होती है, जिसके इस पार देह और सेक्स के प्रति सहजता होती है तो उस पार कुंठा. इस पार जानकारियाँ देते पोस्ट होते हैं, उस पार स्त्री देह के प्रति पुरुष-दृष्टि से हिंसक भाव पैदा करते पोस्ट.

संजीव चंदन 

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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