Home Blog Page 92

‘ग्लोबल बहुजन एवार्ड’से सम्मानित हुईं मनीषा बांगर

स्त्रीकाल डेस्क 


बामसेफ की उपाध्यक्ष मनीषा बांगर न सिर्फ देश में बल्कि दुनिया भर के बहुजनों के बीच बहुजन-क्रान्ति का बिगुल बजा रही हैं.  पिछले दिनों वे यूनाइटेड स्टेटस की एक माह की यात्रा पर थीं. बताती हैं कि वे कई सालों से अमेरिका, यूरोप के देशों में  बहुजन सन्देश के लिए यात्रा करती रही हैं. पेशे से गेस्ट्रोएंटेरोलाजिस्ट और डेक्कन इंस्टीट्यूट ऑफ़  मेडिकल साईसिंस, हैदराबाद में एसोसिएट प्रोफेसर मनीषा ने इस नीवनतम  यात्रा के दौरान केलीफोर्निया विश्वविद्यालय, ब्रांडिएस विश्वविद्यालय, डेविस व ओहलान कालेज आदि जगहों पर विभिन्न विषयों पर व्याख्यान दिए. इस दौरान उन्होंने  यह स्पष्ट किया कि  ‘हिन्दू जाति व्यवस्था और भारत  में व्याप्त गरीबी के बीच सीधा संबंध है’. उन्होंने धार्मिक अल्पसंख्यकों , जैसे मुस्लिम, इसाई, बौद्ध, सिक्ख सहित भारत के मूलनिवासियों के हालात के लिए न सिर्फ हिन्दू व्यवस्था को जिम्मेवार ठहराया, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय जनता पार्टी के शासन में आने से इन सभी समुदायों के खिलाफ हिंसा बढ़ी हैं.

बहुजन आंदोलन को समर्पित शख्सियत

हिन्दू गौरव के लिए यात्रा करने वाले विवेकानंद आदि अतीत हो गये, अब मनीषा बांगर जैसी विदुषियाँ पशिचिमी देशों को यहाँ की बदहाली और हिन्दू धर्म के संबंध पर जरूरी सन्देश दे रही हैं. यह सन्देश कई अर्थों में जरूरी और प्रासंगिक है. विवेकांनंद फाउंडेशन के करीबी प्रधानमंत्री के समय में भगवा-उत्साह के अतिरेक को देश-दुनिया देख रही है . ऐसे में यथार्थ से परिचित कराती मनीषा का उचित सम्मान मेंटेका, केलीफोर्निया के मेयर गैरी सिंह द्वारा किया गया और ‘ग्लोबल बहुजन अवार्ड’ प्रदान किया गया. इस अवसर पर उन्हें प्रदत्त  अभिनंदन पत्र के अनुसार, ‘ पददलितों के उत्थान और दमितों की रक्षा के लिए इनके द्वारा किए गए प्रशंसनीय कार्य और भारत में स्वतंत्रता के कारवां को आगे ले जाने के लिए’ उन्हें यह सम्मान दिया गया.

क महीने की अपनी अमेरिका यात्रा में उन्होंने   जनसमूहों को विभिन्न कार्यक्रमों में संबोधित किया.  मनीषा ने अपने संबोधन में  कहा कि ‘अवसरों की समानता के बगैर, प्रजातंत्र का कोई अर्थ नहीं है. परंतु भारत में स्वशासन के सत्तर वर्ष बाद भी जाति प्रथा के कारण, मूलनिवासियों को उनका यह मूलाधिकार नहीं मिल सका है.’  उनकी इस यात्रा का प्रायोजन भीमराव अम्बेडकर सिक्ख फाउन्डेशन ने किया था.  फाउंडेशन के संस्थापक भजन सिंह ने कहा, ‘हम भारत के लोगों की समृद्धि के प्रति डाॅ बांगर की अटूट प्रतिबद्धता के कायल हैं. उन्होंने न्याय, समानता और बंधुत्व की स्थापना के लिए वैश्विक स्तर पर जो कार्य किया है, वह प्रशंसनीय  और प्रेरक है.’

नाम जोती था मगर 

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

स्त्री विमर्श और ‘कठगुलाब’

सतीश कुमार 

सहायक प्रोफेसर (गेस्ट फैकल्टी) हिंदी विभाग चौधरी बंसी लाल विश्वविद्यालय भिवानी (हरियाणा) संपर्क : 9813293269

स्त्री-विमर्श रूढ़िवादी मान्यताओं, परंपराओं के प्रति अंसतोष, आक्रोश व उससे मुक्ति का स्वर है। यह पितृसत्तात्मक समाज के दोहरे नैतिक मानदंडों, मूल्यों व अंतर्विरोधों को समझने व पहचानने की गहरी अंतदृष्टि है। स्त्री-विमर्श का प्रमुख लक्ष्य है- स्त्री को भी मनुष्य रूप में देखा जाए। उसको भी पुरूष की भाँति राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक समानता का अधिकार मिले। इसे ‘नारीवाद’ भी कहा जाता है। ‘‘अंग्रेजी में इसके लिए Feminism’ शब्द प्रचलित है।’’1 मनुष्य होने के नाते पुरूष और स्त्री समाज में समान अधिकारों के हकदार हैं। लेकिन पितृसत्तात्मक समाज लैंगिक आधार पर स्त्री को उसके अधिकारों से वंचित रखता है। इसका परिणाम यह हुआ कि स्त्री समाज में  हाशिए पर चली गई। इन असमानताओं के विरूध और अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए स्त्री ने जो आवाज उठानी शुरू की है, जो संघर्ष आरम्भ किया है; यही स्त्री-विमर्श है।

प्रोफेसर रोहिणी अग्रवाल ‘स्त्री-विमर्श’ का अर्थ समझाते हुए लिखती हैं- ‘‘स्त्री को केंद्र में रख कर समाज, संस्कृति, परम्पराएँ एवं इतिहास का पुनरीक्षण करते हुए स्त्री की स्थिति पर मानवीय दृष्टि से विचार करने की अनवरत प्रक्रिया। . . . स्त्री विमर्श के अंतर्गत अतीत या समकालीनता प्रमुख नहीं रहती वरन् भूत, वर्तमान एवं भविष्य तीनों कालखण्डों पर एक-दूसरे की अन्वति एवं संगति में विश्लेषण करने का भाव प्रधान रहता है। स्त्री विमर्श चेतना के प्रसार का आख्यान है।’’2 स्त्री-विमर्श अपनी ‘अस्मिता’ की पहचान, अपने अस्तित्व बोध और अधिकार को बताने और जताने का एक वैचारिक चिंतन है। ‘मनुष्य’ होने की न्यूनतम गरिमा से विहिन स्त्री को उसकी स्वतन्त्र जीवन्त अस्मिता से परिचित करके प्रदीप्त करना ही स्त्री विमर्श का मूल लक्ष्य है। स्त्री विमर्श का प्रथम कार्य पुरूष सत्ता को शक के घेरे में लेना है क्योंकि स्त्री पर चिंतन और उसके नियमों का सारा प्रावधान पुरूष ही करते आए हैं। इसी कारण ‘सीमोन द बउवार’ अपनी कृति ‘द सैकिंड सैक्स’ में लिखती हैं कि ‘‘अब तक औरत के बारे में पुरूष ने जो कुछ लिखा, उस पर शक किया जाना चाहिए क्योंकि  लिखनेवाला न्यायाधीश और अपराधी दोनों है।’’3 यही सही है कि स्त्री जीवन हिंदी के शुरूआती साहित्य से ही रहा है। लेकिन यह देखने वाली बात है कि इनमें स्त्री की या तो जीवनगाथा केन्द्र में रही है या उसकी व्यथा की कथा। अपनी अस्मिता व अपनी आत्मचेतना के प्रति स्त्री की सजगता विशेष रूप से स्वातंत्र्योत्तर कालीन साहित्य में ही अधिक उभर कर सामने आती है। स्त्री-विमर्श समकालीन वैचारिक चिंतन है। सारांशतः कहा जा सकता है कि ‘‘स्त्री-विमर्श एक दृष्टि है, जो परंपरा के दबाव, संस्कार एवं पूर्वाग्रह से मुक्त होकर व्यक्ति की पहचान लिंग में नहीं, ‘मनुष्य’ में प्रस्थापित करने की ऊध्र्वमुखी चेतना देती है।’’4

आधुनिक हिन्दी साहित्य, विशेषकर कथा साहित्य में पुरूष रचनाकारों की मान्यताओं के आगे लेखिकाओं ने स्त्री-विमर्श को आगे ले जाने की बागडोर अपने हाथों में ले ली। इस संवर्ग की पहली लेखिका के रूप में कृष्णा सोबती का नाम लिया जा सकता है।  ‘डार से बिछुड़ी’, ‘मित्रो मरजानी’ जैसे इनके कई उपन्यास स्त्री विमर्श के प्रारम्भिक आधार माने जा सकते हैं। इस श्रृंखला में उपन्यास लेखिकाओं की एक सूची है, जिनमें प्रमुख हैंः- उषा प्रियंवदा, मंजुल भगत, मृदुला गर्ग, चित्रा मुद्गल, नासिरा शर्मा, प्रभा खेतान, अलका सरावगी, राजी सेठ, मैत्रेयी पुष्पा, मृणाल पाण्डेय आदि। इन्होंने स्त्री विमर्श के उन विविध पक्षों को सामने रखा है- जहाँ स्त्री  शक्ति की सामाजिक समानान्तरता की संघर्ष भरी भूमिका दृष्टिगत होती है। मृदुला गर्ग का उपन्यास ‘कठगुलाब’ इसी श्रृंखला का एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास है।

‘‘कठगुलाब’, पुरूष-प्रधान समाज में  स्त्री  के दोहन-शोषण और मुक्ति-संघर्षकी कथा है।’’5 इसमें लेखिका ने स्त्री चेतना को विभिन्न पहलुओं से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। प्रस्तुत उपन्यास में  स्त्री की विविध समस्याओं व उससे संबंधित अनेक प्रश्न दिखाई पड़ते हैं; यथाः- पुरूष सत्ता से मुक्ति, देह और काम विमर्श का स्वनिर्णय (फ्रीडम और सेक्स), जीवन में स्त्री को स्वयं निर्णय लेने का अधिकार, स्वयं से जुड़ी अस्मिता के प्रति पूर्ण प्रतिबद्धता और उसका प्रयोग-व्यवहार इत्यादि।‘‘कठगुलाब’ सही मायनों में एक विस्तृत फलक का उपन्यास है, स्त्री विमर्श को उसकी समग्रता में प्रस्तुत करता हुआ; उसके करूण वर्तमान की परम्परा की अनवरतता से जोड़कर उस भयावह भविष्य की ओर संकेत करता हुआ जो यदि संवेदनहीन बौद्धिक पेचीदगियांे और प्रतिशोधात्मक प्रतिक्रियाओं में उलझ गया तो सिर्फ टूटकर बिखर जाएगा।’’6

‘कठगुलाब में पांच कथावाचक हैं, जिनमें से चार महिलाएँ हैं और एक पुरूष। ये सभी अपनी-अपनी कहानी बताते हैं। इनके नाम हैंः- स्मिता, मारियन, नर्मदा, असीमा और विपिन। ये सभी स्वभाव व प्रकृति से एक-दूसरे से अलग हैं। महिलाओं में नर्मदा को छोड़कर शेष सभी पढ़ी-लिखी हैं। ये सभी अपने-अपने अनुभव के आधार पर स्त्री-जीवन के विभिन्न पहलुओं पर हमारे समक्ष रखती हैं। इन स्त्रियों के संदर्भ में ‘कठगुलाब’ उपन्यास की आलोचना करती हुई प्रोफेसर रोहिणी अग्रवाल लिखती हैं कि ‘‘उपन्यास की औरतें निखालिस औरतें हैं। उसी एक आदिम हूक के साथ आज भी वे सृष्टि की पहली आदिम औरत की तरह मां बनकर अपने को अंकुआने, हरियाने और खुलकर झूम उठने के उन्माद से सराबोर कर लेना चाहती हैं। वह चाहे परम्परा की बैसाखियों पर टिकी पितृसत्तात्मक व्यवस्था की प्रतिनिधि नर्मदा हो या जमीन के बहिश्त अमरीका की सुशिक्षिता, स्वतंत्रचेत्ता मारियन या उग्र फेमिनिस्ट असीमा। फिर स्मिता की क्या बिसात! . . . यानी सारी समस्या अभिधात्मक नहीं, प्रतीकात्मक है। बेशक वे मां बनने के लिए ललक रही हैं, गर्भ धारण कर रही हैं, लेकिन मां नहीं बन पा रही हैं। हर बार गर्भपात!एबार्शन ! कहीं पति की मार(स्मिता के सन्दर्भ में); कहीं प्रेमी पति की मनुहार (मारियन के सन्दर्भ में) और कहीं क्रूर विधाता की मार (मारियन, नर्मदा, नीरजा के सन्दर्भ में)। ठीक ‘कठगुलाब’ की तरह, पुष्पित होने की सारी सम्भावनाआंे को अपने भीतर निगलकर काठ-सी सख्त बेजान होने की यंत्रणा। सैंकड़ों कलियां खिली हैं जिस पर, लेकिन फूल बन कर खिलने का दम एक में भी नहीं। उसी अविकसित-अगतिशील अवस्था में अडोल सी कठगुलाब की झाड़ियों पर लदी हैं- सारी महक, रंग, सुन्दरता  यकायक पानी की बौछार पाते ही ठीक जादुई कहानियों की तरह झनन हुम करके खिल गईं, खिलती गईं, काठ में उकेरे सदाबहार फूलों की तरह। ये स्त्रियां भी हरिया कर सदाबहार हो जातीं यदि इन्हें भी इनके सहचर पुरूषों की संवेदना का तरल स्पर्श मिलता; यदि विश्वास, सद्भाव, आत्मीयता की तरल बौछार ने इनकी हृदयगत कोमलता को निरन्तर सींचा होता। वे गुलाब नहीं जो उग आने पर अपने आप खिल भी जाते हैं, कठगुलाब हैं जिन्हें  थोड़ी सी देखभाल से खिलाना पड़ता है।’’7

‘कठगुलाब’ उपन्यास के मूल में स्त्री की पीड़ा है, संघर्ष है। समाज में विभिन्न स्त्रियों की सामाजिक व आर्थिक परिस्थितियाँ अलग-अलग हैं, अतः उनके संघर्ष भी एक-दूसरे से भिन्न हैं। परन्तु संघर्ष व पीड़ा सभी स्त्रियों के जीवन में है। उपन्यास की कथावाचक स्त्रियाँ इसी संघर्ष व पीड़ा को अपने-अपने अनुभव के आधार पर व्यक्त करती हैं। शुरूआत करते हैं- स्मिता से। स्मिता, अपने माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् अपनी बहन-बहनोई के घर में रहती है। वह पढ़-लिखकर कुछ बनना चाहती है लेकिन उसका जीजा जल्दी ही उसकी शादी करवाकर उससे निजात पाना चाहता है। स्मिता उसे अपने घर में  बोझ लगती है। लेकिन साथ-साथ वह यह भी चाहता है कि जब तक स्मिता उसके घर में है, तब तक वह उसका उपभोग करे। उसकी नजर हमेशा उस पर टिकी रहती थी। प्रतिदिन वह उस पर कसीदे कसता रहता था। एक दिन वह शाम को शराब पीकर कहता है- ‘‘यह मेरी साली है स्मिता। क्या चीज है यार। घर में रहती है तो समझो . . . लार टपकती रहती है अपनी . . . साली आधी घरवाली . . . हा-हा-हा . . .।’’8 वैसे भी समाज में ‘‘हक माना जाता है जीजा का साली पर, अश्लील मजाक करने का।’’9 इतना ही नहीं, एक दिन वह मौका पाकर स्मिता का बलात्कार करता है। ऐसे समय में उसकी बहन भी उसे नहीं बचाती है। बल्कि उसके जीजा की गलतियों पर ही पर्दा डालती है। उसका साथ देने की बजाय उसे ही नसीहत देती है। जब स्मिता अपने जीजा की शिकायत पुलिस में करने जाती है तो वह उसे ही चुप रहने को कहती है- ‘‘नहीं। पुलिस के पास गयी तो बदनामी के सिवा कुछ हासिल नहीं होगा। अकेली जान, वे भी तेरा फायदा उठाने की कोशिश करेंगे। नहीं, यह रास्ता ठीक नहीं है।’’10 मायूस होकर स्मिता वहाँ से पढ़ाई के लिए कानपुर चली जाती है। वह परिस्थितियों से हार मानने वालों में से नहीं है। वह जीवन पर्यंत संघर्ष करती है। अपनी मेहनत, प्रतिभा व लगन से वह अपने लिए निरन्तर नए रास्ते तलाश करती है। अपनी मेहनत के बल पर ही वह बाॅस्टन यूनिवर्सिटी में दाखिला पाती है और अमेरिका चली जाती है। अमेरिका में वह जिम जारविस से विवाह करती है किन्तु वहाँ भी उसे दुःख ही मिलता है। ‘‘फिर एक बलात्कार। पहले अस्मिता पर अब शिशु पर। मेरी चीख ने अस्पताल के दरो-दरवाजे हिला दिए। बचपन के बँधे-रूँधे बलात्कार के क्षण से, आँतों में घुटी जो पड़ी थी।’’11

जिम के साथ रहते हुए उसे ऐसा अनुभव होता है कि जिम के लिए वह पत्नी या प्रेमिका नहीं अपितु अध्ययन का विषय है। प्रेम के नाम पर मनोविश्लेषण का माध्यम बनना हास्यास्पद लगता है। फलस्वरूप उनका संबंध टूट जाता है। इस दौरान लेखिका स्मिता का दबंग रूप भी उपन्यास में प्रस्तुत करती है। एक बार जब वह अपने पति जिम जारविस द्वारा पीटी जाती है तो वह चुप नहीं बैठती बल्कि वह भी उसकी पिटाई करती है। ‘‘उसने जिम को पटकनी देकर जमीन पर गिरा दिया। उसकी बेल्ट छीन ली और अच्छी तरह उसकी धुलाई करके रख दी।’’12 वह अपनी विपरीत परिस्थितियों में भी राह निकाल लेती है। वह अपनी शिक्षा, अपने कैरियर व जीवन के प्रति सजग है। इसी कारण वह निरन्तर सक्रिय बनी रहती है। परिस्थितियों की मार को भाग्य या किस्मत मानकर उन्हें झेलते जाना, उसकी दृष्टि में गलत है। वह न सिर्फ स्वयं के जीवन की समस्याआंे के प्रति सजग है बल्कि अन्य स्त्रियांे के जीवन की समस्याओं को भी सुनना, जानना, समझना और उन्हें दूर करना चाहती है। इसीलिए वह अमेरिका में रिलिफ फाॅर एब्यूज्ड वूमन ‘राॅ’ नामक संस्था से जुड़ती है, जो पीड़ित स्त्रियों के कल्याण के लिए बनाई गई है।

‘कठगुलाब’ में दूसरी कथावाचक हैं- मारियन। वह भी अत्यन्त मेहनती व सजग स्त्री है। उसे शादी में धोखा मिलता है। लेकिन वह उम्मीद नहीं तोड़ती। वह इस उम्मीद पर कि इस बार उसकी भावनाओं का सम्मान हो पाएगा, दूसरी शादी करती है। लेकिन ऐसा नहीं होता। फिर भी वह हिम्मत नहीं हारती। भले ही मारियन और स्मिता की कहानी अलग-अलग हों, लेकिन दोनो ही अपने दुःख से ऊपर उठने के लिए प्रयत्नशील हैं। साथ-साथ अन्य दुःखी स्त्रियों के साथ अपना दुःख बाँटने के प्रति सजग हैं। मारियन का अन्तद्र्वन्द्व, अपनी माँ द्वारा की गई उपेक्षा, समर्पित व ईमानदार होते हुए भी सच्चा जीवन साथी नहीं मिल पाने का दुःख, बार-बार मिले धोखे तथा चाहकर भी माँ नहीं बन पाने की पीड़ा को लेकर है। ‘‘स्मिता समेत राॅ की सब औरतें जानती थी कि भरपूर चाहने के बावजूद, मेरा बच्चा नहीं हुआ था। पर इस न होने के पीछे कितना विषाद और अपमान छिपा था, उसके बारे में मैंने कभी किसी से कुछ नहीं कहा था।’’13 राॅ की सभी स्त्रियों के पुरूषों के बारे में एक ही राय थी कि ‘‘मर्द नाम का प्राणी खुदगर्ज और जालिम होता-ही-होता है।’’14 यह राय ऐसे ही नहीं बनी है बल्कि इसके पीछे राॅ संस्था की महिलाओं के अपने-अपने अनुभव हैं। मारियन अपना अनुभव साझा करती हुई बताती है कि जब वह उपन्यास लिखती है तो उसे यहाँ भी अपने पति इर्विन से धोखा ही मिलता है। मारियन उपन्यास लिखने के लिए स्रोत इकट्ठा करती है, उसका पति इर्विन उससे वादा करता है कि वह उन दोनों का सम्मिलित उपन्यास होगा। लेकिन जब उपन्यास प्रकाशित होता है तो उस पर मारियन का नाम कहीं भी नहीं होता है। ‘‘पूरी किताब में, आगे-पीछे कहीं मेरे योगदान के लिए आभार प्रकट नहीं किया गया था। समर्पण तक मेरे नाम नहीं था। था, हर औरत के नाम। याद आया, मैंने ही एक दिन कहा था, हम अपने उपन्यास को हर औरत के नाम सपर्पित करेंगे। पर . . . तब,  मैं यही जानती थी कि वह हमारा, हम दोनों का साँझा उपन्यास है।’’15 मारियन के इस उपन्यास में स्पेन की रूथ, इटली की एलेना, स्काॅटलैंड की सूजन तथा पाॅलैंड की राॅकजान की दर्दभरी कथा को प्रस्तुत किया है।

नर्मदा, स्मिता की बहन नमिता के घर काम करती है। नर्मदा का बहनोई उससे जबरदस्ती शादी भी कर लेता है। जीवन में अनेक दुःखों और शोषण की शिकार नर्मदा के हृदय में ढे़र सारी उलझने हैं। लेकिन उसके हृदय में अपने प्रेमी के लिए भी उथल-पुथल मची रहती है। यथाः- ‘‘उसके मारे तो मैंने अपने जालिम जीजा से भी लड़ाई मोल ले ली थी, बहोत समझो चाकू न घोंप दिया सीने में।’’16 अन्य उलझनों से तो वह फिर भी समझौता कर लेती है।

‘कठगुलाब’ में स्त्री कथावाचकों में असीमा का चरित्र सबसे अलग है। उसका तो नाम ही उसके दबंग व्यक्तित्व का परिचायक है। उसने अपना नाम सीमा से असीमा कर लिया है, क्योंकि उसे सीमा में बंधकर घुट-घुट कर जीना पसन्द नहीं है। वह स्त्री के शोषण को सहन नहीं करती है।उसके पिता ने दो बच्चों के होते हुए भी उसकी माँ को छोड़कर दूसरा विवाह कर लिया था। पहले उसे अपने पिता से नफरत हुई और फिर पिता के साथ जाने वाले भाई से। धीरे-धीरे उसे पूरी पुरूष जाति से नफरत हो जाती है। वह स्त्रियों का शोषण करने वाले प्रत्येक पुरूष से प्रतिशोध लेना चाहती है। ऐसे पुरूषों से वह घृणा करती है, उन्हें हरामी कहती है, उसकी दृष्टि में पुरूष की गलतियों पर पर्दा डालना तथा उन्हें हर बात के लिए क्षमा कर देना बिल्कुल गलत है। उसका मानना है कि औरतों का शोषण इसलिए होता है कि वह स्वयं अपना महत्त्व नहीं समझती है। वह कहती है कि ‘‘जब तक औरत यह समझती रहेगी कि मर्द ही असल कमाऊ होता है, उसकी कमाई को अनदेखा किया जाता रहेगा।’’17 वह पुरूषों का विरोध करती है लेकिन अन्दर ही अन्दर अनेक प्रश्न उसके हृदय और मस्तिष्क में सदैव द्वन्द्व पैदा करते हैं कि क्या सभी पुरूष एक जैसे होते हैं या सभी स्त्रियाँ एक जैसी होती हैं ? क्या स्त्री-पुरूष संबंध को एक सामान्यीकृत रूप दिया जा सकता है ? असीमा के दिमाग में ऐसे अनेक प्रश्न जन्म लेते हैं कि ‘‘स्त्री-पुरूष के बीच के रिश्ते का क्या स्वरूप होना चाहिए ? सामान्यीकरण असंभव है, इसलिए होना चाहिए कि बात करना फिजूल था। असीमा जानती थी, उसे सिर्फ यह पूछने का अधिकार था कि उसके और किसी एक पुरूष के बीच के रिश्ते का क्या स्वरूप हो सकता था।’’18

असीमा का चरित्र साहस से भरा हुआ है। वह आम लड़कियों की भाँति दब्बू प्रवृत्ति की नहीं है और न ही उसका जीवन स्वयं तक ही सीमित है। वह अनपढ़, गरीब महिलाओं व उनके बच्चों के हितों के प्रति भी सजग है। बाल-मजदूरी हटाने तथा प्राथमिक शिक्षा के प्रचार-प्रसार को वह आवश्यक मानती है। इसी प्रकार के प्रश्न उसे परेशान करते रहते हैं कि ‘‘क्या हिन्दुस्तान में बाल-मजदूरी खत्म की जा सकती है?क्या मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा उसका कारगर हल बन सकती है ?’’19

‘कठगुलाब’ उपन्यास की सभी स्त्री-पात्रों में अस्मिता बोध अत्यन्त गहरा है। स्मिता, मारियन, असीमा की माँ नर्मदा, नीरजा इत्यादि स्त्रियाँ इस उपन्यास की कड़ियाँ प्रतीत होती हैं। इन सभी स्त्रियों के जीवन की कथा भले ही अलग-अलग है, लेकिन इन सभी कथाओं से ही उपन्यास की सम्पूर्णता है। परिस्थितियाँ अलग-अलग होते हुए भी इन सभी स्त्रियों में अस्मिता बोध का भाव स्पष्ट दिखाई देता है। इनके अन्दर स्वाभिमान कूट-कूट कर भरा हुआ है। ये कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी हार नहीं मानती है अपितु संघर्ष करती है। ये सभी अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए निरन्तर संघर्ष करती हैं। उदाहरणस्वरूप, स्मिता के जीवन का लक्ष्य था कि वह अपने बलात्कारी से प्रतिशोध ले और उसे सजा दिलवाए। ‘‘कोई दिन ऐसा न जाता, जब मैं अपने इरादे को पूरा करने की योजना न बनाती। क्या-क्या ख्याल आते थे मन में . . . मैं रणचण्डी बनी उसका संहार कर रही हूँ। कभी गदा, कभी तलवार, कभी बरछी, कभी खड्ग; बचपन में सुनी पौराणिक कहानियों का हर दैवी हथियार, मेरे हाथों, उसका नाश करा चुका था।’’20

मृदुला गर्ग

अतः निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि ‘कठगुलाब’ मृदुला गर्ग की स्त्री-विमर्श के दृष्टिकोण से एक सफलतम कृति है। इस उपन्यास में केवल भारतीय ही नहीं अपितु यूरोपीय स्त्रियों की पीड़ा की कहानी भी है। इसमें स्त्री-विमर्श की अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर समीक्षा की गई है, जिसमें यह बात उभरकर सामने आती है कि स्त्री चाहे किसी भी देश की क्यों न हो, वह प्रताड़ित होती है। इन सब के बावजूद भी स्त्री ने पूरी दुनिया के सामने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। उसने दुनिया को यह दिखा दिया है कि वह किसी भी क्षेत्र में पुरूषों से कम नहीं है। समाज-सुधार, शिक्षा, चिकित्सा, राजनीति, प्रशासन, तकनीक, विज्ञान आदि सभी क्षेत्रों में स्त्रियाँ सफलतापूर्वक काम कर रही हैं। जिस तीव्रता से स्त्री ने समाज में गति पकड़ी है, उसी तीव्रता से साहित्य में भी उसका चित्रण होने लगा है। मृदुला गर्ग का उपन्यास ‘कठगुलाब’  इसी कड़ी का एक सफल उदाहरण है। यह उपन्यास जहाँ एक ओर स्त्रियों की पीड़ा और उनके संघर्ष का जीवंत दस्तावेज है, वहीं दूसरी ओर उनकी उपलब्धियों का भी ठोस प्रमाण है। स्त्री-विमर्श के लगभग सभी महत्त्वपूर्ण आयामों को इस उपन्यास में उठाया गया है- स्त्री सशक्तिकरण, स्त्री हिंसा व यौन उत्पीड़न का विरोध, स्त्री शिक्षा का समर्थन, अन्याय का विरोध, स्त्री की आर्थिक आत्मनिर्भरता, स्त्री की अस्मिता, अधिकारों और कत्र्तव्यों के प्रति जागरूकता इत्यादि ऐसे महत्त्वपूर्ण पहलू हैं।

अतः संक्षेप में कह सकते हैं कि ‘कठगुलाब’ उपन्यास स्त्री-विमर्श को उसकी समग्रता में प्रस्तुत करता है।


सन्दर्भ  सूची 

1. डाॅ॰ अमरनाथ, हिंदी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली, पृ॰ 385
2. उद्धृत, डाॅ॰ रोहिणी अग्रवाल, साहित्य की जमीन और स्त्री-मन के उच्छ्वास, पृ॰ 11
3. डाॅ॰ रोहिणी अग्रवाल, साहित्य का स्त्री-स्वर, पृ॰ 9
4. सं॰ डाॅ॰ लालचन्द गुप्त ‘मंगल’, हिन्दी साहित्य: वैचारिक पृष्ठभूमि, पृ॰ 243
5. डाॅ॰ रामचन्द्र तिवारी, हिंदी का गद्य-साहित्य, पृ॰ 266
6. डाॅ॰ रोहिणी अग्रवाल, इतिवृत्त की संरचना एवं संरूप, पृ॰ 65
7. वही, पृ॰ 65-66
8. मृदुला गर्ग, कठगुलाब, पृ॰ 15
9. वही, पृ॰ 23
10. वही, पृ॰ 23
11. वही, पृ॰ 59
12. वही, पृ॰ 55
13. वही, पृ॰ 104
14. वही, पृ॰ 65
15. वही, पृ॰ 96
16. वही, पृ॰ 155
17. वही, पृ॰ 141
18. वही, पृ॰ 196
19. वही, पृ॰ 194
20. वही, पृ॰ 25

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

केजरीवाल सर, हिन्दी अकादमी में आपकी उपाध्यक्ष साहित्यिक झूठ खड़ा कर रही हैं? (मन्नू-मीता-मैत्रेयी के सच की खोज)

स्त्रीकाल डेस्क 


प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका समालोचन में मैत्रेयी पुष्पा की किताब ‘वह सफ़र था कि मुकाम था’ का एक अंश छपा. यह अंश हंस के संपादक और हमसब के प्रिय लेखक राजेंद्र यादव से लेखिका की घनिष्ठता की बानगी है. पाठकों के लिए इसमें भावनात्मक खुराक भी है- अपने प्रिय लेखक संपादक की प्रेमिका के एक इमेज से जुड़ने की. विवाहेत्तर प्रेम की यह ‘मीता’ साहित्य जगत की राधा है. शीर्षक भी बड़ा भावुक और सनसनी पैदा करने वाला, ‘ हाँ, मैंने मीता को देखा है.’ मानो लेखिका ही एक मात्र ऐसी स्रोत हैं, जो इस महान प्रेम की साक्षी है. इस प्रेम का रोमांच पाठक तबतक अनुभव नहीं करेगा जबतक इसका एक विलेन न हो. विवाहेत्तर प्रेम की सबसे उचित विलेन तो स्वाभाविक है कि पत्नी ही होगी. पत्नी यानी मन्नू भंडारी, कालजयी कथाकार! लेखिका खुद को कृष्ण की द्रौपदी की तरह पेश करना चाह रही हैं इस प्रसंग में,  राजेंद्र जी और उनकी मीता के लिए खूब निष्ठा, स्नेह और समर्पण के साथ. वे इस महान प्रेम की एकमात्र साक्षी भी हैं और उनके बीच का विश्वासी माध्यम भी.
लेकिन इस पूरी कथा को रचते हुए, आत्मकथा में काल्पनिक कहानी की छौक देते हुए, वे शायद भूल गईं की राजेंद्र जी अभी उतने अतीत भी नहीं हुए हैं. उनसे जुड़े लोग आज भी हैं, खुद ‘कथित खलनायिका’ मन्नू जी भी हैं. वे अकेली नहीं हैं, जिन्होंने मीता को देखा है. हां मीता यानी नगीना जैन, आगरा की एक प्रतिष्ठित महिला को साहित्य जगत की राधा होते देखने वालों में कई लोग अभी जीवित और सक्रिय हैं. खुद राजेंद्र जी ने उनका नाम इतना गुप्त नहीं रहने दिया था. तद्भव में वे बता चुके थे, मीता यानी ‘नगीना जैन’. 

हिन्दी अकादमी के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष

इतिहास को सही दर्ज करने के लिए जरूरी है कि उनके समकालीन बोलें अन्यथा पता नहीं किस विवशता या उद्देश्य से मैत्रेयी जी एक झूठा साहित्य-इतिहास अपनी आत्मकथा में दर्ज करना चाह रही हैं. हो सकता है इस कहानी के और भी पात्र जल्द बोलें, लेकिन फिलहाल मैत्रेयी जी की आत्मकथा का झूठ- सच स्पष्ट होना चाहिए. राजेंद्र जी जब एम्स में भर्ती थे तो उनके आस-पास और भी लोग थे,  उनके हवाले का सच कुछ और भी है. हमें यहाँ उनके हवाले का सच जानना चाहिए , फिर इसके और पात्र जब बोलें या राजेंद्र जी और मीता के और हमराज बोलें तो यह स्पष्ट हो सकेगा कि एक बड़ी उपन्यासकार और आजकल हिन्दी अकादमी, दिल्ली, की उपाध्यक्ष, को साहित्यिक इतिहास का इतना बड़ा झूठ रचने की जरूरत क्यों आन पडी.

एक साहित्यिक रपट के तौर पर इस पूरे प्रसंग को लेते हुए स्त्रीकाल ने इसके किरदारों से संपर्क किया. जब राजेंद्र जी एम्स में भर्ती थे तो उनके साथ हमेशा रहने वाले और खासकर रात में रहने वाले कहानीकार और ‘किस्सा’ के संपादक शिव कुमार शिव से भी संपर्क किया गया. उन सबके हवाले से जो सच-झूठ बनता है उसे हम सिलसिलेवार समझते हैं.

मैत्रेयी  का दावा: पूछ ही सकती हूँ कि अगर उनके टेस्ट नार्मल थे तो डॉक्टर साहब (मेरे पति) उनको लेकर एम्स क्यों गए थे? जल्दी से जल्दी कैज्युअलिटी में दाखिल क्यों कराया था?

राजेंद्र यादव और मैत्रेयी

सच: शिवकुमार जी और अन्य स्रोत बताते हैं कि टेस्ट तक तो डाक्टर साहब के हस्तक्षेप से ही हुआ था भर्ती होने के पहले, लेकिन ऐसा नहीं था कि राजेन्द्र जी को टेस्ट के बाद डाक्टर साहब यानी (मैत्रेयी के पति) उन्हें अस्पताल ले गये थे. अस्पताल दाखिल करवाया गया था उनके घर से. जब दाखिल करवाया गया तो आलोचक और दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर सुधीश पचौरी राजेंद्र जी के घर पर थे और उन्हें भर्ती करवाने वाला शख्स था, ‘औरत होने की सजा’ का लेखक और तबतक उनके प्रिय लोगों में से एक एवं हंस के तत्कालीन कानूनी सलाहकार अरविंद जैन. डाक्टर साहब और मैत्रेयी दूर-दूर तक नहीं थे. वहीं अरविंद जैन बताते हैं कि ‘‘उन्हें दाखिल करते वक्त फॉर्म भरने की जब बारी आई तो मैंने उनका अपने से रिश्ता लिखा, ‘ पिता.’’

मैत्रेयी का दावा: खैर, मन्नू दी तैयार हुईं. हमारी जान में जान आई कि जिन्दगी भर साथ निभाने के वादे पर विवाहिता होनेवाली पत्नी ने हमारी अरज सुन ली, इन अलगाव भरे दिनों में कड़वे अनुभवों से गुजरते हुए. मुश्किल लम्हे उनके लिए भी और हमारे लिए भी. सद्भाव ने मुश्किल हल कर दी.

सच: मन्नू भंडारी उनके एडमिट होने के दूसरे दिन सुबह आईं. उन्होंने वहाँ राजेंद्र जी के इलाज में हो रहे खर्च के बारे में पूछा और अरविंद जैन को उन्हें भर्ती कराने में हुए खर्च के पैसे दिये.

मैत्रेयी का दावा: अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद मन्नू जी ने अपने अलगाव को सुरक्षित रखा. आने-जाने की औपचारिकता या लोक-लाज अस्पताल  तक ही थी जहाँ तमाम साहित्यकार आते-जाते. वे इस नाजुक मौके की नब्ज पहचानती थी कि राजेन्द्र जी के आसपास दिखने में उनके बड़प्पन और पति की बेजा हरकतों के ग्राफ की नाप-तौल होगी और वे उत्तम कोटि नारी की उपमा बनेंगी.

सच: राजेंद्र जी के अस्पताल में दाखिल होने के दूसरे दिन ही शिव कुमार शिव दिल्ली आ गये थे. उनका समय ज्यादातर अस्पताल में ही बीतता था. उन्होंने बताया कि मन्नू जी का उनदिनों न सिर्फ नियमित आना होता था, बल्कि फोन पर भी वे खबर लेती थीं. शिव जी के अनुसार, जो अक्सर दिल्ली आने पर राजेंद्र जी के यहाँ रहते थे, मन्नू जी राजेंद्र जी को सुबह छः बजे नियमित फोन किया करती थीं, .

मन्नू भंडारी और राजेंद्र यादव

मैत्रेयी का दावा: उन्होंने मुझ नाम बताया लेकिन मैं यहाँ लिखूँगी नहीं क्योंकि उन्होंने हमेशा उनका नाम छिपाया और उनको मीता नाम से लिखा.

सच: राजेंद्र जी ने खुद तद्भव पत्रिका में उनके नाम का खुलासा किया था- नगीना जैन
उद्धरण ‘‘शायद मेरी इस मानसिक छटपटाहट को मन्नू समझ रही है । वह बैठ कर बातें करना चाहती है, और मैं टाल देता हूं । एक बार तो उसने कहा था कि अगर आपको लगता है कि इस जड़ता और अवरोध से आप यहां से बाहर जाकर निकल सकते हैं तो नगीना के साथ कुछ दिन रह लीजिए … दया और करुणा ही हुई सुन कर … यह बात उसने किस यातना बिन्दु पर पहुँचकर  कही होगी … । लगता है  मुझे भी है कि शायद इस अंधे कुंए से वही साथ निकाल सकता है, मगर हिम्मत नहीं पड़ी । मैं नगीना के साथ रहने दस दिनों को जाऊंगा यह कह कर मैं निकल सकता हूं ? चुपचाप चोरी छिपे जाऊं और भला मानुस बन कर लौट आऊं , यह तो हो सकता है । यही शायद होता भी रहा है । मगर कह कर खुलेआम जाना कैसा लगता है जाने … चला भी गया तो शायद लौटने का मुंह नहीं रहेगा । यहां भी सब चीजें , रहना – व्यवहार नार्मल नहीं रह पायेंगे … । ’’                                                   – तद्भव: 11 , पृष्ठ  – 181
:
दरअसल मैत्रेयी कुशल कहानीकार की तरह पाठकों की संवेदना और निजी में तांक-झाँक की उनकी इच्छा को सहला रही हैं: 


मैत्रेयी का दावा : उन्होंने मेरी ओर कागज की एक बहुत छोटी चिट बढ़ाई. हाथ काँप रहा था.
‘‘इसमें एक नम्बर लिखा है, टेलीफोन कर दो.’’
‘‘कहाँ करना है ? अच्छा, मैं घर से मोबाइल फोन ले आऊँगी, आप ही कर देना बिस्तर पर लेटे-लेटे.’’
‘‘आगरा करना है, लेकिन मैं नहीं करूँगा.’’
‘‘क्यों, आप क्यों नहीं ?’’
‘‘अरे यार, तुम भी! सारी बात पूछकर मानोगी. उसकी भाभी मेरी आवाज पहचानती है, उसे फोन नहीं देगी.’’
‘‘उसको किसको ?’’
उन्होंने मुझ नाम बताया लेकिन मैं यहाँ लिखूँगी नहीं क्योंकि उन्होंने हमेशा उनका नाम छिपाया और उनको मीता नाम से लिखा.

सच: कहानीकार कविता ने सटीक सवाल किये हैं अपनी टिप्पणी में कि राजेंद्र जी ने फिर कथित भाभी को खुद फोन क्यों नहीं किया, जब उन्हें नाम ही छिपाना था तो. राजेंद्र जी से जुड़े सारे लोग जानते हैं और बताते हैं कि जब नगीना आई थीं उन्के फ़्लैट पर रहने तो वे हंस के दफ्तर भी आती थीं, साहित्य की दुनिया उनसे इतना अपिरिचित भी नहीं है. दरअसल इस कहानी के किरदारों के अनुसार नगीना दो बार आई थीं एक बार इस बीमारी के बाद और एक बार इसके पहले जब वे कवि केदारनाथ सिंह के यहाँ किराये पर रहते थे.
स्रोत : समालोचन 

राजेंद्र जी साहित्यकारों के साथ


शिव कुमार शिव का फेसबुक पोस्ट: 
एक दिन बाद जब मै दिल्ली पहुंचा उस समय वह जेनरल वाड मे कमरे मे आ गए ये। उस समय जब मै वहाँ पहुँचा तब वहां  मैने देखा कि मन्नू जी हैं, महेश दर्पण है और अरविंद जैन हैं। 2 रातो तक उनकी देखभाल महेश दर्पण ने की थी और फिर मै वहाँ स्थाई रूप से रहने लगा । मैत्रेयी  जी का कहीं नामो निशान नही था । लगभग 5 दिन बाद शाम को 4 बजे मैत्री जी गुप्त रूप से राजेंद्र जी से मिलने पहुंची । जब वह कमरे में थी, तब मै चौकीदारी कर रहा था। उन्हे याद हो तो आधे घंटे के बाद मैंने उन्हे गाड़ी मे बिठा दिया था । यह कहना लाज़िमी होगा कि  उनकी देखभाल और संभाल का पूरा जिम्मा मन्नू जी का था । मैत्रीय को तो उनकी बिमारी का पता बहुत दिन बाद चला । हालांकि इस बीमारी के दौरान के कई प्रसंग है जो अद्भुत भी हैं और रोचक भी.  लेकिन वे कहीं  नही हैं,  जो इतना झूठा शोर मचा रही है । उनके जिंदा रहते तो आपने उनका लेखकीय शोषण किया अब मुर्दे को तो बख्श दो यार !

सवाल यही है कि हिन्दी अकादमी की उपाधयक्ष और हमसब की प्रिय कहानीकार को झूठ बोलने, झूठी  कहानी लिखने की जरूरत क्यों आन पड़ी. हमारी कोशिश होगी कि इस कुछ सच्ची-कुछ झूठी कहानी के अन्य किरदारों से भी उनका पक्ष लेकर आयें. ताकि इतिहास में कुछ गलत दर्ज न हो. अभी तक हमारे पास यही तथ्य है, हो सकता है सारे किरदारों के बोलते-बोलते इसमें कुछ जुड़े या घटे. 

स्त्री कामुकता का उत्सव मानती फ़िल्म ‘मार्गरीटा विद अ स्ट्रॉ’

सौम्या गुलिया

सौम्या दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी की शोधार्थी हैं.नाटक के एक समूह ‘अनुकृति’ से जुड़ी हैं. संपर्क : ई मेल-worldpeace241993@gmail.com



“If sexuality is one dimension of our ability to live passionately then in cutting off our sexual feelings, we diminish our overall power to feel” By Judith Plaskow


जूडिथ प्लास्कों की कामुकता पर गई यह टिपण्णी मनुष्य के जीवन में कामुकता की ज़रूरत को स्पष्ट करती है। कामुकता मनुष्य को मानसिक एवं शारीरिक बल प्रदान करती है। ऐसे में जाहिर है कि लैंगिक आधार पर कामुकता का विभाजन नहीं किया जा सकता लेकिन फिर भी विश्व के लगभग सभी देशों में स्त्री की कामुकता का दमन किया गया है। यहाँ तक भी तर्क दिए गए कि स्त्री में कामेच्छा होती ही नहीं है। स्त्री की कामेच्छा को ‘हिस्टीरिया’  नाम देकर उसे मनोरोगों तक की श्रेणी में रख दिया गया। स्त्री की कामुकता को स्वीकार करना पितृसत्तात्मक समाज के ठेकेदारों को कभी भी स्वीकार्य नहीं रहा। स्त्री की कामुकता को पुरुषों ने अपने आनंद का एक माध्यम बना लिया। पुरुष ने कभी उसकी देह को अपनी यौन संतुष्टि के लिए नो चा तो कभी स्त्री की प्रजनन क्षमता का दोहन अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए किया। यदि कभी किसी स्त्री ने समाज की इन चिरपरिचित मान्यताओं को ठुकराकर अपनी कामुकता पर अपना अधिकार जाताना चाहा तो समाज ने उसे चरित्रहीनता का तमगा पहनाकर वेश्या की श्रेणी में रख दिया। यही कारण रहा कि जब-जब सिनेमा में स्त्री की कामुकता को स्वायत्तता प्रदान करने की कोशिश की गयी तो कभी सेंसर बोर्ड या कभी समाज ने उसका विरोध किया गया।

जिस हिंदी सिनेमा में हमेशा से बलात्कार और छेड़खानी के दृश्यों की भरमार रही है। कभी जमींदार तो कभी साहूकार तो कभी पिता, भाई या पति के दुश्मन सभी के निशाने पर हमेशा स्त्री की देह रही और स्त्री सुनहले कहे जाने वाले पर्दे पर बलात्कृत होती रही। समाज में छेड़खानी की जिन घटनाओं पर खूनखराबे हो जाते हैं। फिल्मों में अक्सर हीरो ने कभी हिरोइन का दुपट्टा खींचा तो कभी हाथ पकड़ा लेकिन छेड़खानी की इन हरकतों और बलात्कार के दृश्यों पर न तो कभी सेंसर बोर्ड ने प्रतिबंध लगाए और न ही मर्दानगी के इस ओछे प्रदर्शन पर तथाकथित भारतीय संस्कृति के संरक्षकों ने परदे पर दिखाए जाने का विरोध किया। इसी सिनेमा में स्त्री की कामुकता के स्वायत्त प्रदर्शन पर इतना बवाल होना स्त्री के प्रति समाज का दोहरे मापदंड नहीं तो और क्या है ? सोनाली बोस की सितम्बर 2014 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘मार्गरीटा विथ अ स्ट्रॉ’ कई कारणों से महत्वपूर्ण है। यह फिल्म एक विकलांग स्त्री की सेक्सुअलिटी को तो सेलिब्रेट करती ही है साथ ही लैंगिक अल्पसंख्यकों को लेकर हो रही बहसों और आन्दोलनों को सकारात्मक रूप में हमारे सामने रखती है।

बोस की फिल्म को हिंदी सिनेमा में स्त्री कामुकता के इतिहास में मील के पत्थर के रूप में देखा जा सकता है। जिसकी मुख्य नायिका लायला(कल्कि कोचीन) अपनी कामुकता के हर अँधेरे कोने में झाँकना चाहती है, अपनी कामुकता का आनंद उत्सव मनाना चाहती है और यह करने के लिए वह समाज की सारी मर्यादाओं को बेख़ौफ़ होकर लांघती है। वह जानती है कि उसकी कामुकता उसकी निजी संपत्ति है जिसमें वह अपनी माँ तक का दखल नहीं चाहती तभी तो जब उसकी माँ उसके पोर्न देखने पर सवाल उठाती हैं तो वह साफ़ शब्दों में कह देती है कि यह उसका निजी मसला है। लायला दिल्ली महानगर के एक एकल मध्यवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती है। घर में लायला की माँ (रेवती) पिता (कुलजीत) और एक छोटा भाई है। लायला के परिवार में उसकी माँ प्रधान भूमिका में है। इसीलिए कहा जा सकता है कि बोस ने परिवार का सेटअप मातृसत्तात्मक रखने की कोशिश की है। लायला मस्तिष्क पक्षाघात से ग्रस्त है जिसके कारण वह ठीक ढंग से बोल नहीं पाती, किसी भी चीज़ को अच्छे से पकड़ नहीं पाती और पूरा समय व्हील चेयर पर रहती है। लेकिन फिल्म का केन्द्रीय विषय लायला की इन मुश्किलों पर प्रकाश डालना नहीं लगता। कम से कम फिल्म के आरम्भ में तो कतई नहीं। लायला सत्रह-अठारह साल की है और अपनी उम्र के किसी भी लड़के-लड़की की तरह एकदम सामान्य है। वह देश के प्रतिष्ठित दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ती है। वह कुशाग्र बुद्धि की लड़की है और अपने कॉलेज के म्यूजिक बैण्ड के लिए गाने भी लिखती है। वहीं उसका दिल बैंड के मुख्य गायक नीमा पर आ जाता है। वह नीमा को अपने प्रति आकर्षित करना चाहती है। इसीलिए उसे प्रभावित करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ना चाहती। तभी तो वह घर आते ही फेसबुक पर नीमा को खोजती है और अपनी व्हीलचेयर वाली तस्वीर से व्हीलचेयर को काट-छाँट कर उसे अपनी प्रोफाइल पिक्चर बनाती है। फिल्म के इस दृश्य में स्त्री कामुकता के महत्वपूर्ण पक्ष देह छवि(बॉडी इमेज) का विश्लेषण किया जा सकता है। देह छवि मनुष्य की कामुकता का एक प्रमुख घटक है। एक कामुक मनुष्य के रूप में हमारा अस्तित्व बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपने शरीर को कैसे देखते हैं और हमारे शरीर की यौन इच्छाओं और यौन संतुष्टि आदि से जुड़े अनुभव कैसे हैं। कामुकता और देह छवि के सम्बन्ध को लेकर किये गए शोधों की एक लम्बी श्रृंखला मौजूद है। देह छवि स्त्री कामुकता के सन्दर्भ में और भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योकि हमेशा से ही पुरुषों की अपेक्षा स्त्री का आंकलन उनकी देह के आधार पर किया जाता है। इस विषय पर किये गए शोधों के परिणामों से यह बात सामने आई है कि नकारात्मक देह छवि वाली स्त्री अपनी कामुकता को भी प्राय: नकारात्मक रूप में ही देखती है। साथ ही नकारात्मक देह छवि के चलते यौन संतुष्टि का स्तर भी प्रभवित होता है। अपनी देह को लेकर स्त्री के मन में एक हीनता बोध घर कर लेता है जिसके चलते वह स्त्री कामुक क्रियाओं में खुलकर भाग नहीं ले पाती।

व्हीलचेयर लायला की देह छवि का ऐसा ही एक नकारात्मक पहलू है जिसे वह काट-छाँट कर स्वयं से अलग कर देती है। वह अपने शरीर के हर हिस्से को बेहतर बनाना चाहती है ताकि वह नीमा को आकर्षित कर सके। इसके लिए वह लिपस्टिक लगाकर खुद को आईने में निहारती है। वह अपनी आई(माँ) से उसके बालों को हर दिन धोने की जिद करती है। नीमा के आते ही लायला के बाह्य व्यक्तित्व में आने  वाले ये सारे बदलाव उसकी कामुकता का ही एक पहलू है।

लायला अपनी स्वाभाविक यौन इच्छाओं को संतुष्ट करने में झिझकती नहीं है। वह उसकी ही तरह व्हीलचेयर पर रहने वाले अपने दोस्त ध्रुव को कोने में ले जाकर किस करने की पहल करती है। उसका यह पहल करना उसे हिंदी सिनेमा की उन स्टीरियोटाइप अभिनेत्रियों की छवि से अलगाता है जो हमेशा अपनी यौन इच्छाओं को संतुष्ट करने के लिए अभिनेता के ग्रीन सिग्नल देने का इंतजार करती हैं। नीमा के प्रति आकर्षित होने पर अपने भीतर उठी कामेच्छाओं को शांत करने के लिए लायला पोर्न देखती है और हस्तमैथुन करती है। हिंदी सिनेमा के इतिहास में पहली बार परदे पर किसी स्त्री की यौनिकता को इतनी स्वाभाविकता और बहादुरी के साथ फिल्माया गया है। जिस समाज में पोर्न जैसी सामग्रियों को सिर्फ पुरुषों की कामुकता को संतुष्ट या उत्तेजित करने वाले माध्यम के रूप में देखा जाता है उसी समाज की किसी स्त्री को परदे पर पोर्न देखते दिखाया जाना वाकई स्त्रियों की कामुकता पर लगायी गयी पितृसत्तात्मक समाज की तमाम पाबंदियों को ध्वस्त करना ही है। ऐसा करने में बोस निसंदेह सफल रही हैं। हस्तमैथुन की क्रिया की यदि बात की जाए तो यौन संतुष्टि प्राप्त करने के लिए किये जाने वाली इस क्रिया को लगभग हर सभ्यता और समाज में हेय और घृणित कर्म के रूप में देखा जाता रहा है। कई समाजों में तो हस्तमैथुन को मनोरोग की श्रेणी में रखा जाता है बल्कि चिकित्सा विज्ञान और मनोविज्ञान इसके एक स्वाभाविक यौन क्रिया होने के प्रमाण तक दे चुके हैं। स्वयं स्त्रियाँ भी हस्तमैथुन को एक मानसिक विकार के रूप में देखती हैं और इसे अपनी काम-कुंठा का नतीजा मानती है। लगभग सभी स्त्रियाँ अपने जीवन में कभी न कभी हस्तमैथुन करती है लेकिन समाज के द्वारा इसे एक टैबू की श्रेणी में रखे जाने के कारण किसी के सामने यह स्वीकारने में शर्म महसूस करती है कि हाँ हमने अपनी यौन संतुष्टि के लिए हस्तमैथुन जैसी स्वाभाविक क्रिया की है। चूँकि फिल्म की मुख्य किरदार लायला विकलांग भी है तो यहाँ मुझे एक वाकया याद आ रहा है कि एक विकलांग लड़की की कामुकता को लेकर पढ़ी-लिखी स्त्रियाँ तक कितनी असंवेदनशील हो सकती हैं। यह घटना कुछ चार-पांच साल पहले की है जब मै अपनी बीए की पढाई के लिए देश के प्रतिष्ठित कॉलेज माने जाने वाले मिरांडा हाउस के हॉस्टल में रह रही थी। जहाँ कुछ दृष्टिबाधित छात्राएं भी रहती थीं। तभी हॉस्टल में एक विडियो की चर्चा सुनी, देखा तो पता चला कि यह विडियो एक सामान्य छात्रा ने अपनी दृष्टिबाधित रूम मेट का बनाया है जब वह अपने को कमरे में अकेला समझकर हस्तमैथुन कर रही थी। उस विकलांग छात्रा के अन्तरंग पलों के विडियो का मजाक यह कहकर उड़ाया जा रहा था कि अरे! ये लोग भी ऐसे काम करते हैं। विडियो बनाने वाली लड़कियां खुद को नारीवादी कहते नहीं थकती थी और अपने कामुक अनुभवों के किस्से दंभ भरकर सुनाती थीं। इन लड़कियों के द्वारा एक विकलांग लड़की के नितांत निजी पलों में की गई कामुक अभिव्यक्ति का मखौल उड़ाने की धृष्टता हमारे समाज के तथाकथित प्रगतिशील लोगों की संकीर्ण और असंवेदनशील सोच के सच को हमारे सामने खोल कर रखती है। लेकिन बोस की फिल्म का हस्तमैथुन की इस स्वाभाविक क्रिया के साथ किया गया ट्रीटमेंट बेहद स्वाभाविक है। फिल्म यह दृश्य रात के वक़्त का है। जब लायला के सभी घरवाले सो जाते है तो वह पोर्न देखती है और उसके पश्चात् की कामोत्तेजना को शांत करने के लिए कैमरे से पीठ फेरकर खिड़की की तरफ मुँह करके हस्तमैथुन करती है। बोस ने इतने चुनौतीपूर्ण दृश्य को भी बखूबी फिल्माया है और लायला की बॉडी लैंग्वेज ही है जो इस दृश्य में संवादों की भूमिका निभा रही है।

इसके बाद के एक दृश्य में लायला अपनी एक महिला मित्र के साथ होलसेल की एक दुकान पर वाईब्रेटर खरीदने जाती है। दुकान का मालिक पूजा-पाठ में लगा होता है जब लायला उसे कहती है कि उसे वाईब्रेटर चाहिए तो वह समझता है कि लायला को मोबाइल फ़ोन चाहिए जिनको वाईब्रेशन पर करने की सुविधा हो और कहता है कि आजकल तो सभी फ़ोन में होता है और हँसते हुए आगे कहता है कि “मैंने तो अपनी वाइफ को भी वाईब्रेटर पे डाल रखा है।” जिसपर लायला की विदग्ध हँसी ने पूरे दृश्य को और भी अर्थपूर्ण बना दिया है। दरअसल लायला सिर्फ दुकानदार पर ही नहीं हँसती बल्कि पूरे समाज की उस मानसिकता पर हँसती है जिसके लिए स्त्री के मुँह से कामुकता शब्द भी सुनना अप्रत्याशित है। इस दृश्य को बोस ने एक हास्य व्यग्य के अंदाज में फिल्माया है, व्यंग्य उस देश की स्थिति पर जिस देश में लड़कियों को सैनेट्री पैड्स तक खरीदने से पहले दस बार सोचना पड़ता है और कंडोम खरीदना हो तो हज़ार बार क्योकि उनके बेधड़क होकर पैड्स और कंडोम मांगने से आजू-बाजु खड़े लोग के द्वारा उनके चरित्र पर सवालिया निशान लगाये जाते हो ऐसे समाज में एक लड़की का सेक्स टॉय मांगना दुकानदार को अप्रत्याशित लगेगा ही।

लायला अपने कॉलेज के बैंड के लिए गीत लिखती और कंपोज़ करती है। एक  प्रतियोगिता में उसके कॉलेज के बैंड को पहला पुरस्कार मिलता है। प्रतियोगिता की होस्ट पुरस्कार की घोषणा करते हुए कहती है कि “जब हमें पता चला की इस गाने के लिरिक्स एक विकलांग लड़की ने लिखे है तो हमें ये अवार्ड इसी ग्रुप को देना पड़ा। लायला, आपकी प्रोब्लेम्स बाकि लोगों से अलग रही होगी। विल यू प्लीज़ शेयर योर एक्सपीरियंस विथ अस?’’ इसके जवाब में गुस्साई लायला उसे मिडिल फिंगर दिखाकर वहाँ से चली जाती है क्योकि लायला को सहानुभूति नहीं चाहिए। वह बाकि लोगों से अलग नहीं होना या दिखना चाहती और फिर लायला के व्यक्तित्व की जिंदादिली इस बात का सबूत भी है कि वह किसी भी लिहाज़ से किसी से कम नहीं है। इस वाकये के बाद लायला नीमा के गले लगकर रोती है लेकिन जैसे ही वह नीमा को कहती है कि मुझे सिर्फ तुम चाहिए तो एक आधी-अधूरी लड़की के इस प्रोपोज़ल को वह अस्वीकार कर देता है क्योकि लायला समाज के द्वारा द्वारा गढ़े गए सम्पूर्ण नारी के मानकों पर खरी नहीं उतरती और इसी कारण सामान्य लोगों से प्यार करने या प्यार पाने का अधिकार यह समाज उसे नहीं देता। इसीलिए नीमा, लायला के प्रति अगर कुछ रख सकता है तो सिर्फ सहानुभूति रख सकता है, प्रेम नहीं। पहले तो प्रेम निमंत्रण देने का हक़ हमारे समाज ने सिर्फ पुरुषों को दिया है। एक आदर्श नारी से सिर्फ गर्दन हिलाने और मुस्कुराने भर की अपेक्षा की जाती है ऐसे में एक लड़की, वह भी विकलांग लड़की के द्वारा अपने प्रेम का इज़हार करना तो पितृसत्तात्मक समाज के पुरुष को अटपटा लगेगा।

फिल्म की निर्देशक सोनाली बोस ने यह फिल्म अपनी चचेरी बहन मालिनी चिब जोकि खुद भी मस्तिष्क पक्षाघात से ग्रस्त है के जीवन से प्रेरित होकर बनाई है। जिस घटना ने उन्हें यह फिल्म बनाने के लिए प्रेरित किया उसका ज़िक्र करते हुए बोस कहती है कि एक बार मालिनी के चालीसवें जन्मदिन की पार्टी में उन्होंने मालिनी से पूछा कि उन्हें इस जन्मदिन पर क्या गिफ्ट चाहिए तो मालिनी के जवाब ने उन्हें चौका दिया। बोस याद करते हुए कहती है कि उसने बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा था कि ‘वह सेक्स करना चाहती है।’ इस जवाब पर बोस इसलिए नहीं चौकी कि अच्छी भारतीय लडकियां ऐसी बाते नहीं करती बल्कि इसलिए चौंकी कि मालिनी पूरी तरह मस्तिष्क पक्षाघात से ग्रस्त है और हमारा समाज कभी भी विकलांगता और कामुकता को एक साथ नहीं देखता, न ही हम इस बारे में बात करते हैं और न सोचते हैं क्योकि हमें ऐसा करना ज़रूरी नहीं लगता। मालिनी की तरह ही लायला भी इसी बीमारी से ग्रसित है। ऐसे में लायला के द्वारा अपनी कामुकता का ऐसा खुला प्रदर्शन समाज को अखरेगा ही।

जिस समाज में स्त्री की कामुकता पर बात करना ही एक टैबू हो उसमें एक विकलांग स्त्री की कामुकता पर समाज के विचारों का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है। हमारे समाज में विकलांग व्यक्ति को एसेक्सुअल  माना जाता है यानि कि समाज ऐसे व्यक्ति की सेक्स सम्बन्धी ज़रूरतों को ही ख़ारिज कर देता है। समाज की इसी सोच के कारण विकलांग व्यक्ति अपनी कामेच्छा को अपने भीतर ही दबाता रहता है जोकि एक समय के बाद मानसिक कुंठा का रूप धारण कर लेती है। विकलांग लोगों की कामुकता को नकारने वाले लोगों को अमेरिका के NCBI में प्रकशित एक शोध को पढ़ना चाहिए जिसके अनुसार “The period between 12 and 25 years of age is essential for human sexual development: physical changes, masturbation, dating, beginning intimate relationships and sexual experiences। This applies to people with and without physical disabilities or chronic illnesses।”  स्पष्ट है कि कामुकता हर मनुष्य के जीवन का एक अभिन्न अंग है और किसी भी आधार पर मनुष्य को इससे अलग नहीं किया जा सकता। मस्तिष्क पक्षाघात से ग्रस्त लोगों की कामुकता को लेकर उनसे की गयी चर्चा में यह तथ्य सामने आये हंक कि “Seventy-six percent of the participants had experience with masturbation। Most young adults with CP had reached one or more sexual milestones; 78% had experience with French kissing, 70% with caressing under clothing, 65% with cuddling nude and 54% with sexual intercourse। Twenty percent had no sexual experience with a partner।”  यह आंकड़े बताते हैं कि किसी भी सामान्य मनुष्य की तरह ज्यादा नहीं तो कम पर इन लोगों की भी अपनी सेक्स सम्बन्धी ज़रूरतें होती हैं।

एक विकलांग बच्चे को उसकी कामुकता से परिचित करवाने में माता-पिता या संरक्षकों की बहुत ही अहम भूमिका हो सकती है। इसका प्राय: समाज में अभाव देखा जाता है। माता-पिता अक्सर इस बात को नज़रंदाज़ कर देते हैं कि उनका बच्चा एक कामुक प्राणी भी है। प्राय: उनको यह अहसास नहीं होता कि एक सकारात्मक देह छवि (बॉडी इमेज) का विकास होना कितना ज़रूरी है और उनकों अपने बच्चे की कामुक भावनाओं का भी ख्याल रखना चाहिए। फिल्म में लायला की माँ लायला के साथ हमेशा हर परिस्थिति में उसकी हिम्मत बनकर उसके साथ खड़ी रहती है। वह अपनी बेटी की हर ज़रूरत, हर अहसास को समझती है लेकिन जब उसे यह पता चलता है कि लायला अपने लैपटॉप में पोर्न देखती है तो वह असहज हो जाती है। ऐसी है असहजता तब भी उसके चेहरे पर झलकती है जब लायला यह बताती है कि कॉलेज के एक लड़का उसे बहुत पसंद है। यह असहजता एक असुरक्षा और अज्ञानता के भाव से जन्मी है। वह समझती है कि लायला की विकलांगता के कारण ये सारी बातें व्यर्थ है और इसीलिए वह लायला की कामुकता को कभी समझने की कोशिश ही नहीं करती। समाज के अन्य लोगों की तरह वह भी यही सोचती है कि एक विकलांग स्त्री की कामेच्छायें नहीं होती।
लायला को न्यू यॉर्क यूनिवर्सिटी में दाखिला मिल जाने के बाद बोस ने भारत और अमेरिका का एक तुलनात्मक सेटअप हमारे सामने रखा है। बोस ने ऐसा सोच समझ कर किया है ताकि वह भारत और पश्चिम के विकलांगता और कामुकता के साथ किये जाने वाले ट्रीटमेंट का तुलनात्मक नज़ारा दर्शकों के सामने रख पाए। बोस के द्वारा दिखाई गई घटनाओं का मकसद यह दिखाना लगता है कि पश्चिम में विकलांग लोगो की जिंदगी बहुत ही ज्यादा आसान और सुविधाजनक है। हाँ, इस बात को मानने से कोई इंकार नहीं कर सकता कि भारत की अपेक्षा पश्चिम में विकलांग लोगों के लिए अधिक सुविधाएँ हैं। चाहे वह सडकों इमारतों और सार्वजनिक परिवहन में व्हील चेयर के लिए बने रैंप हो या फिर बस के संचालक से लेकर क्लास में अध्यापक का व्यवहार, वहीं इसके उलट भारत में विकलांग नागरिक बुनयादी सुविधाओं से भी वंचित है। हमारा इन्फ्रास्ट्रक्चर केवल सामान्य लोगों को ध्यान में रखकर बनाया जाता है उसमे विकलांग लोगों के लिए कोई सुविधा मुहैया नहीं कराई जाती। इसीलिए लायला के लिए न्यूयॉर्क में सब कुछ भारत से अधिक सामान्य और सहज है। लेकिन क्या विकलांग व्यक्ति की कामुकता के प्रति भी पश्चिम इतना सामान्य है जितना बोस दिखाना चाहती हैं। अपने जीवन का अधिकतर समय पश्चिम के देशों में बिताने वाली सोनाली बोस की बहन मालिनी चिब के एक कथन से इस सवाल का उत्तर मिल जाता है जिसमे वह कहती है कि “I am 45 year old female। Above average (double MA) attractive, witty। Yet I have never had a romantic relationship। I want to be touched। I want to be loved romantically। I want to experience my sexuality। But I can’t। Because I am disabled।” वह आगे कहती है कि “Even in the West, which is far more advanced in terms of access and facilities — sexuality is still a taboo।”
मालिनी की शिकायत से यह स्पष्ट है कि एक विकलांग व्यक्ति के लिए अपनी कामेच्छाओं को संतुष्ट करना जितना मुश्किल भारत में है उतना ही मुश्किल पश्चिम में भी क्योकि वहाँ लोग आपकी कामेच्छाओं को लेकर सहज हो सकते हैं उस पर बात कर सकते हैं लेकिन वहां भी लोग एक विकलांग व्यक्ति को अपना  साथी बनाना पसंद नहीं करते। इसी सम्बन्ध में मालिनी आगे कहती हैं कि “I have had a few close relationships with men where we discussed everything from my body, to disabled people having sex। But when it came to having sex with me, they quickly changed the topic by declaring, “You are not my type”। Of course, deep down I feel rejected।”

लेकिन फिर भी न्यू यॉर्क जाने के बाद लायला के पास अपनी यौनेच्छा को शांत करने के अनेकों मौके आते हैं। चाहे वह अपने सहायक सहपाठी को किस करना हो उसके साथ सेक्स करना हो या फिर खानुम के आने से अपनी कामुकता के एक नए पहलू से परिचित होना। वहाँ जाकर लायला को अपनी अधूरी कामेच्छाओं को पूरा करने, अपने शरीर को महसूस करने और अपनी अव्यक्त कामुकता और अस्मिता के एक नए पहलू को जीने का भरपूर मौका मिलता है। मार्गरीटा  पीने के बाद जोकि लायला की कामुकता के लिए उत्प्रेरक का काम करती है, लायला खानुम के स्पर्श को महसूस करती है और खानुम के प्रति आकर्षित होती है। खानुम के साथ अन्तरंग पल बिताने के बाद लायला को अपने समलिंगी होने का अहसास होता। दोनों एक विश्वास के बंधन में बंध तो जाते है। लेकिन फिर भी विश्वास, सच्चे प्यार या फिर केवल फायदे के लिए बनाये गए सम्बन्ध की यह कशमकश जारी रहती है। शायद इसीलिए खानुम के साथ सम्बन्ध में रहते हुए भी  लायला मौका पाते ही अपने सहपाठी टाइपिस्ट जार्ड(विललियन मोसेले) के साथ हमबिस्तर हो जाती है। लायला को तभी यह भी पता चलता है कि वह केवल लेस्बियन नहीं है। लायला समाज में इतरलिंगी संबंधो की वैधता को अपनी कामुकता के एक नए आयाम के बूते पर चुनौती देती है। लायला अपनी कामुकता का भरपूर आनंद लेती है। खानुम से मिलने के बाद लायला को अहसास होता है की उसे न केवल अपनी शारीरिक अवस्था से संघर्ष करना है बल्कि अपनी सेक्सुअल आइडेंटिटी के लिए भी खुद से और समाज से संघर्ष करना है, जैसे खानुम कर रही है। खानुम पाकिस्तानी-बंगलादेशी मूल की लड़की है और भिन्न यौनिक उन्मुखीकरण यानि की लेस्बियन होने के कारण वह अपने परिवार और समाज से निरंतर लड़ाई लड़ रही है। अपने लेस्बियन होने की बात को अपने परिवार वालों पर जाहिर होने की घटना को याद करते हुए खानुम लायला को बताती है कि ‘अम्मी मुझे डॉक्टर के पास ले गई जैसे तो मुझे कोई मर्ज़ है जिसका इलाज हकीम करते हैं।’ इस पर लायला का यह कहना कि ‘मेरी आई को तो हार्ट अटैक आ जाएगा।’ विभिन्न देशों और समाजों की समलैंगिकता के प्रति सोच को बताते हैं। आज भी इतरलिंगी लोगों से भिन्न उन्मुखीकरण वाले लोगों को समाज मनोरोग से ग्रस्त मानता है। इस दृश्य के बाद के दृश्य में लायला लाइब्रेरी की सेल्फ से ‘अ वीमेन लाइक दैट’ किताब पढ़ने के लिए उठाती है। जिसका इस्तेमाल बोस ने लायला को अपनी कामुकता के नए आयाम को समझने के लिए किया है। इसके बाद की फिल्म में लायला पर इस किताब का प्रभाव साफ़ नज़र आता है। जॉन लारकिन द्वारा सम्पादित इस किताब में विभिन्न लेस्बियन और बाईसेक्सुअल लेखकों ने अपने जीवन के अनुभवों को साझा किया है। इसी कारण लायला के लिए खानुम के साथ रहते हुए भी जेफ्फेरी के साथ सम्बन्ध बनाना कामुक प्रयोगों की दृष्टि से स्वाभाविक होता है।

सोनाली बोस ने खानुम और लायला के समलैंगिक सम्बन्ध का ट्रीटमेंट किसी भी सामान्य इतरलैंगिक सम्बन्ध की तरह ही किया है। जिसमे प्रेम में उन्मत्त दो प्रेमिकाएं है, आरोप-प्रत्यारोप है, आँसू है। हालाँकि फिल्म में समलैंगिक सम्बन्ध में रह रही दोनों औरते विकलांग हैं लेकिन फिर भी फिल्म इनके सम्बन्ध को असामान्य की श्रेणी में नहीं रखती बल्कि अन्य फिल्मों द्वारा फिल्माए गए प्रेम संबंधों की तरह ही इसे फिल्माती हैं।
ऐसे तो बोस की यह फिल्म समलैंगिक संबंधों को दर्शाने वाली हिंदी सिनेमा की पहली फिल्म नहीं है लेकिन फिर भी समलैंगिकता के साथ अपने ट्रीटमेंट की वज़ह से यह फिल्म महत्वपूर्ण ज़रूर है। वैश्वीकरण के प्रभाव और लैंगिक अल्पसंख्यकों के द्वारा लगातार अपने अधिकारों के लिए किये जा रहे संघर्ष के फलस्वरूप हिंदी सिनेमा में नब्बे के दशक में प्रत्यक्ष नैरेटिव के रूप में समलैंगिकता का चित्रण होना आरम्भ हुआ। समलैंगिकता को अपना विषय बनाने वाली फिल्मों में दीपा मेहता की ‘फायर’(1998), करन राजदान की ‘गर्लफ्रेंड’(2004), मधुर भंडारकर की ‘पेज थ्री’(2005), मधुर भंडारकर की ‘फैशन’(2008), अनुराग बसु की ‘लाइफ इन अ मेट्रो’(2007), श्याम बेनेगल की ‘वेलकम टू सज्जनपुर’(2008), रीमा कागती की ‘हनीमून ट्रेवल्स प्रा।लि।’(2007), पार्वती बाल गोपालन की  ’प्यार का सुपरहिट फार्मूला’(2003), दीपा मेहता की ‘वाटर’(2005), संजय शर्मा की ‘न जाने क्यूँ’(2010), जोया अख्तर की ‘लक बाय चांस(2009)’, अपर्णा सान्याल और अरुणिमा शंकर की ‘टेढ़ी लकीर’(2004), नागेस कुकुनूर की ‘तीन दीवारें’(2003), तरुण मनसुखानी की ‘दोस्ताना’(2008), ओनिर की ‘माय ब्रदर निखिल’(2005) और ‘आइ ऍम’(2010) आदि प्रमुख हैं। लेकिन इनमे से कुछेक फिल्मों को छोड़कर सिनेमा में समलैंगिकता की एक स्टीरियोटाइप छवि को ही दर्शकों के सामने परोसा गया। ‘दोस्ताना’ और ‘कल हो न हो’ जैसी फिल्मों में जहाँ कहानी में हास्य पैदा करने के लिए ऐसे संबंधों का प्रयोग किया गया तो वहीं ‘गर्लफ्रेंड’ जैसी फिल्मों में समलैंगिकों को हिंसक और मनोरोगियों के रूप में दिखाया गया। जबकि बोस की फिल्म समलैंगिकता और द्विलैंगिकता को एक सामान्य व्यवहार के रूप में हमारे सामने रखने के कारण महत्वपूर्ण हो जाती है। वह अपने कलाकारों को हिंसक नहीं बनाती, उनका मखौल नहीं उड़ाती और न ही उनके प्रेम को इतरलिंगीयों के प्यार से हेय बनाकर प्रस्तुत करती हैं। दीपा मेहता की ‘फायर’ में दिखाई गयी समलैंगिकता भी परिस्थितिजन्य है जोकि पतियों के द्वारा उपेक्षा करने पर पनपती है लेकिन बोस के यहाँ ऐसा नहीं है। लायला का लेस्बियन होने का चुनाव किसी परिस्थिति के दबाव में लिया गया चुनाव न होकर एक स्वतंत्र और सोचा समझा चुनाव है तो वही खानुम का यौनिक उन्मुखीकरण भी स्वाभाविक है। अक्सर समलैंगिक संबंधों को केवल शरीर की आवश्यकता से जोड़कर दिखाया जाता है लेकिन लायला और खानुम का सम्बन्ध किसी भी इतरलिंगी सम्बन्ध की तरह ही सामान्य है।

जैसे-जैसे समाज में विभिन्न सेक्सुअल पहचानों ने अपने अधिकारों को लेकर आवाज़ उठानी शुरू की वैसे ही सिनेमा आदि माध्यमों ने भी उन पर बात करनी शुरू कर दी है। अब भी देश में समलैंगिकता को अवैध माना जाता है। हमारा दंड संहिता समलैंगिक संबंधों को अप्राकृतिक कहकर स्वीकार नहीं करता है। ऐसे में सिनेमा आदि माध्यमों पर यह जिम्मेदारी आ जाती है कि उनके द्वारा इन सेक्सुअल पहचानों के चित्रण में लापरवाही न बरती जाए। फिल्म के निर्माता निर्देशकों को ओनिर और सोनाली बोस जैसे निर्देशकों से प्रेरणा लेनी चाहिए और सीखना चाहिए कि समलैंगिकता जैसे नाज़ुक मुद्दों पर किस तरह से काम किया जाये। लेकिन बोस का मुख्य लक्ष्य कोई समलैंगिक फिल्म बनाना न होकर एक स्त्री की कामुकता के विविध आयामों को आकार देना है। फिल्म की बनावट पर बात की जाये तो फिल्म के अन्तराल के पहले हिस्से का प्रयोग बोस ने अपने किरदारों और वातावरण को स्थापित करने के लिए किया है जिसे वह अन्तराल के बाद भी थोडा सा खींचती है ताकि फिल्म में तारतम्यता बनी रहे। जोकि कुछ हद तक उचित भी लगत्ता है लेकिन लायला की जिंदगी में और नयी घटनाएँ घटित करने के चक्कर में बोस ने कथानक में ज़रूरत से ज्यादा संघर्षों और युक्तियों का प्रयोग कर दिया है जोकि फिल्म को त्रासद बना रहा है। शायद यही कारण रहा कि फिल्म का दूसरा हिस्सा घटनाओं की अधिकता और संवादों में एक तरह की एकरेखीयता के कारण प्रशंसा पाने में असफल रहा।  जैसे लायला की माँ रेवती को कैंसर होना, उस पर लायला की खुद की विकलांगता और सेक्सुअल आइडेंटिटी के लिए निरंतर संघर्ष और फिर लायला को उसकी कामुकता के एक और आयाम से परिचित करवाने वाली उसकी समलैंगिक साथी खानुम का पाकिस्तानी-बंगलादेशी मूल का होने के बाद अँधा भी होना। दरअसल फिल्म के दूसरे हिस्से में एक के बाद एक ऐसी घटनाओं की धका-पेल से फिल्म अपने मुद्दे से भटकती सी लगती है और जाहिर है इससे फिल्म का वज़न भी कुछ कम ही हुआ है।

फिल्म के दूसरे हिस्से में एक के बाद एक त्रासद घटनाओं का यह सारा ताना-बाना कई बार ऐसा संकेत करता है जैसे कि फिल्म बनाने वाले दर्शकों से अपने किरदारों के लिए सांत्वना जुटाने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते जबकि फिल्म के आरम्भ में स्थिति इसके बिलकुल उलट थी। अच्छे से बोल और चल न सकने वाले मुख्य किरदार के बावजूद भी फिल्म में जीवन्तता थी जिसका फिल्म के आखिरी हिस्से में पूरा अभाव दीखता है। ऐसे में केवल कल्कि ने फिल्म को भटकने से बचाने की कोशिश की है जिसमे वह काफी हद तक सफल भी हुई है। इन त्रासद घटना चक्रों के बीच अपनी कामुकता के संबध में अडिग और निडरता के साथ विभिन्न आयामों को खोजने वाली लड़की के महत्वपूर्ण और संवेदनशील चित्रण के माध्यम से दर्शकों को फिल्म के साथ जोड़े रखा है। कल्कि ने लायला के किरदार को जिया है और यही कारण है कि दर्शक लायला की कहानी में यकीन कर पायें।

लायला को अपनी कामुकता को अभिव्यक्त करने पर अपनी माँ तक से नकार मिलती है। एक समेस्टर ख़त्म हो जाने के बाद जब लायला खानुम को लेकर अपने घर दिल्ली आती है जो वहां आकर परिवार का एक हिस्सा बन जाती है। लायला उसके हर फैसले में उसका साथ देने वाली माँ को अपने और खानुम के सम्बन्ध के बारे में बताने की कोशिश करती है जो लायला की बात को किसी और ही अर्थ में ले लेती हैं। वैसे फिल्म में लायला के साथ यह कई बार होता है क्योंकि लायला लोगों को उनकी कल्पना के परे की बातें कहकर अक्सर झटका देती रहती है। लायला माँ से हिंदी और अंग्रेजी के मिले-जुले लहज़े में कहती है कि ‘माँ आइ एम बाई’ तो माँ ‘बाई’ का अर्थ काम वाली बाई समझकर मध्यवर्गीय भारतीय परिवार में घरेलू कामों में फंसी स्त्री के शोषण के अर्थ में लेकर इसका जवाब देती है कि ‘मै क्या कम बाई हूँ।’ यद्यपि ऐसे अप्रत्याशित मौके पर ऐसा प्रतीकात्मक हास्य पैदा करने का बोस का अंदाज़ और कल्कि और रेवती की बेहतरीन अदाकारी वाकई काबिल-ए-तारीफ है।
लायला जब खानुम के समक्ष यह स्वीकारती है कि उसके साथ होते हुए भी उसने एक दूसरे लड़के के साथ सम्बन्ध बनाये और खानुम को धोखा दिया तो दोनों का सम्बन्ध हमेशा के लिए ख़त्म हो जाता है। लेकिन इस घटना से लायला को यह सीख मिलती है कि जीवन का सच्चा सार हमारे भीतर ज्ञान की रौशनी के होने में ही है। हमें ज़रूरत है तो बस इस रौशनी को अपने बाह्य जीवन और आसपास के लोगों में प्रसारित करने की। फिल्म लायला के कामुकता के विविध आयामों को खोजने के साथ-साथ आत्म अन्वेषण के बारे में भी है। फिल्म का आखिरी दृश्य इसलिए और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है जब वह अपनी माँ के देहांत और खानुम के द्वारा छोड़े जाने पर अकेले बाहर निकल जाती है मार्गरीटा पीने क्योकि अब उसे खुद को सम्पूर्ण बनाने के लिए किसी सहारे की आवश्यकता नहीं रहती। लायला का सेल्फ उसके लिए सबसे ज़रूरी हो जाता है। यह फिल्म का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दृश्य है लायला के लिए भी और दर्शकों के लिए भी। इससे बेहतर प्रतीकात्मक अंत शायद ही कुछ और होता।

लायला के किरदार पर उसके यौन उत्सुक मन एवं अति सक्रिय ‘लिबिडो’ के कारण यह भी आरोप लगाये गए कि लायला अपनी यौनिकता से आगे कुछ और क्यों नहीं सोच पाती? ऐसे लोगों को यह समझता होगा कि कामुकता एक मनुष्य के जीवन का अभिन्न अंग है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।  दरअसल कामुकता और कामुक प्रबोधन हमारी अस्मिता के अन्वेषण में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अपनी यौनिकता के विषय में जानने की उत्सुकता और शरीर से मिलने वाला कामुक आनंद हमारे विकास का एक महत्वपूर्ण पहलू है। इसलिए यदि लायला अपनी कामुकता को लेकर नित नए प्रयोग करती है तो किसी भी अन्य मनुष्य की तरह ऐसा करना सामान्य ही है। इसमें कुछ भी अटपटा नहीं है क्योकि आप विकलांग है तो इसका यह अर्थ तो कतई नहीं लिया जा सकता कि आपकी कामुकता भी विकलांग स्थिति में ही होगी। कई बार विकलांग लोगों को अपनी कामुकता को जानने समझने का मौका ऐसे नहीं मिल पाता जैसे एक सामान्य मनुष्य को मिलता है। वे लोग कामुक आनंद से वंचित रहते है इस कारण भी अक्सर इन लोगों में सेक्स को लेकर हताशा आ जाती है। ऐसा सामान्य लोगों के साथ भी संभव है। एक कहावत है कि ‘कला सुखद स्थिति को व्यथित कर देती है और व्यथित को शांतिप्रदान करती है।’ बोस की फिल्म इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। फिल्म उन सभी व्यथित विकलांगों को हौसला और हिम्मत देती है जिनकी कामुकता को समाज टैबू मानता आया है और शांतिप्रद जीवन जी रहे समाज के उन सभी लोगों को बैचैन करती है जिनके लिए स्त्री और विकलांगों के द्वारा अपनी कामुकता की अभिव्यक्त करना और उससे आनंद प्राप्त करना एक असामान्य घटना हैं। भारत में कामुकता के इर्द गिर्द बनी फ़िज़ूल की मर्यादाओं के कारण स्त्रियाँ अपनी कामुकता को नकारती रहती हैं। इस नकार का सीधा सा अर्थ है कि यदि कोई स्त्री अपनी यौन संतुष्टि को पूरा करने के लिए साथी की तलाश करती है तो हमारे समाज में उसे चरित्रहीन और भौंडा समझा जाता है।

एक मनुष्य होने के कारण हमारी कामुकता बहुत ही जटिल रूप में हमारे सम्पूर्ण व्यक्तित्व, स्वास्थ्य और ख़ुशी से जुड़ी है। यदि व्यक्ति के जीवन में यौन संतुष्टि है तो इस बात से काफी हद तक उस व्यक्ति के जीवन से संतुष्ट होने का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। इसी कारण मानव जीवन के इस पहलू को पूरी तरह नकारा जाना व्यक्ति के भीतर एक कभी न भरे जाने वाला खालीपन पैदा कर देता है।

सिनेमा में अन्य सभी ललित कलाओं से अधिक जन के साथ संवाद स्थापित करने की क्षमता है। यह विचारधाराओं को जन मस्तिष्क में गढ़ने का काम भी करता है, सामाजिक बदलाव की मुहिम में सक्रिय भागीदार भी होता है। इसका स्पष्ट कारण है कि प्राय: लोग फ़िल्मी सितारों की हर बात का अनुकरण करते हैं। कई बार जहाँ कंपनियाँ अपने उत्पाद की बिक्री बढ़ाने के लिए फ़िल्मी सितारों से अपना विज्ञापन करवाकर लाभ कमाती हैं तो वही सरकार जनहित में जारी विज्ञापनों से भी इन फ़िल्मी हस्तियों को जोड़ती है ताकि लोग दिखाई जा रही बात पर अतिररिक्त ध्यान दे। कुछ अभिनेता जैसे आमिर खान स्वयं भी सामाजिक बदलाव के लिए आगे आ रहे हैं। स्टार प्लस पर दिखाया जाने वाला ‘सत्यमेव जयते’ आमिर का एक ऐसा ही सराहनीय प्रयास है। ऐसे में स्पष्ट है कि फिल्मों के माध्यम से स्त्री कामुकता का जैसा चित्रण किया जायेगा समाज में इनकी स्थिति में उसी के अनुरूप परिवर्तन आयेंगे।

‘मार्गरीटा विथ अ स्ट्रॉ’ की लायला हिंदी सिनेमा के लिए एक उदहारण है जो हमारे सिनेमा को  यह सीखता है कि स्त्री की कामुकता को परदे पर कैसे फिल्माया जाए। साथ ही स्त्रियों को भी यह समझना होगा कि कहीं देह की स्वतंत्रता के नाम पर वह पुरुषवादी मानसिकता का शिकार तो नहीं हो रहीं हैं। मार्गरीता की तीनों मुख्य स्त्री पात्र लायला, लायला की माँ और खानुम, अपने व्यक्तित्व और कामुकता की खुद मालकिन हैं। यह फिल्म हमें एक स्त्री की कामुकता के हर संभव आयाम से परिचित करवाती है। स्त्री की कामुकता को सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक कारक प्रभावित करते है। सत्ता के केंद्र में बैठा पुरुष स्त्री की कामुकता को अपने नियंत्रण में रखना चाहता है ताकि वह सत्ता पर अपना अधिकार बनाये रख सके। फिल्म में लायला की कामुक अभिव्यक्ति और उसकी कामुक इच्छाओं के आड़े यह सारे तंत्र और ताकतें आती तो है लेकिन वह इन सबकों रौंदती हुई अपनी धुन में आगे बढ़ती चली जाती है। वह विभिन्न देशकालों में अपनी कामुकता के साथ बेख़ौफ़ होकर नए-नए प्रयोग करने से घबराती नहीं।

प्राय: ऐसी फ़िल्में व्यवसाय करने में उतनी सफल नहीं होती और उनकों बाकि मसाला फिल्मों जैसे दर्शक नहीं मिलते इसीलिए ऐसी फिल्मों पर बात करना और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक इस प्रकार के सकारात्मक सिनेमा को पहुँचाया जा सके और स्त्री देह को वस्तु मानकर व्यवसायीकरण के लिए इस्तेमाल करने वाले निर्माता निर्देशकों को स्त्री कामुकता को सही मायनों में परदे पर दर्शाए जाने की प्रेरणा मिले। एक विकलांग स्त्री की कामुकता को भी कैसे इतने जीवंत तरीके से फिल्माया जा सकता है यह हमारी फिल्मों को ‘मार्गरीटा विथ अ स्ट्रॉ’ से सीखना चाहिए।

केवल भारतीय समाज ही नहीं बल्कि सदियों से दुनिया के हर समाज में स्त्रियाँ अपनी देह पर अपना अधिकार पाने के लिए संघर्षरत है। इसीलिए ‘मार्गरीटा विथ अ स्ट्रॉ’ जैसे फिल्मों के माध्यम से सिनेमा को इस संघर्ष में स्त्रियों का साथ देना चाहिए। साथ ही हिंदी सिनेमा की ऐसी पहलों का विरोध करने वाले पितृसत्तात्मक समाज के ठेकेदारों एवं स्वयं को भारतीय संस्कृति और हिन्दू संस्कृति का संरक्षक कहने वाले समूह और लोगों को यह समझना होगा कि इसी भारतीय हिन्दू धर्म की प्राचीन संस्कृति ने हमें हमारी कामना का उत्सव मानना सिखाया है। ऐसे में स्त्री की कामना को कैद कर अपने हितों के लिए प्रयोग करना सरासर गलत है।

1. Hysteria was the first mental disorder attributed to women (and only women) — a catch-all for symptoms including, but by no means limited to: nervousness, hallucinations, emotional outbursts and various urges of the sexual variety

2. http://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC3093545/

3. http://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC3093545/
4. http://femina.in/editors-blog/intimacy-for-the-differently-abled-2677.html
5. I’m single because of my body by Malini Chib
Mumbai Mirror | Nov 3, 2011
6.  एक प्रकार का पेय पदार्थ ( लायला की पसंदीदा कॉकटेल ड्रिंक)

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

स्त्रीवाद और महादेवी की ‘श्रृंखला’ की कड़ियाँ’

साक्षी यादव   

 शोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय. तदर्थ प्राध्यापिका, लक्ष्मीबाई कॉलेज. संपर्क : sakshi060188@gmail.com

वर्तमान स्त्री विमर्श में कई आयाम  जुड़ चुके हैं  यथा उदारवादी ,मार्क्सवादी ,मनोविश्लेषणवादी ,उग्र नारीवादी. जब किसी भी विमर्श में और अधिक पड़ाव जुड़ते हैं तो वह उसकी प्रगति का निशान होता है .परन्तु कई बार यही स्थिति आपसी असहमति की द्योतक भी बन जाती है .स्त्री विमर्श में ये दोनों ही स्थितियां विद्यमान है .स्त्री विमर्श को इसके समग्र रूप में व्याख्यायित करने की आवश्यकता है न कि  खंडित करके .आज हम स्त्री की मूलभूत समस्याओं के लिए भी लड़ रहे है और कामकाजी आधुनिक स्त्री की समस्याओं के लिए भी.आवश्यकता है तो इनके आपसी समन्वय की .इनकी लड़ाई दो भिन्न छोरों पर होने के स्थान पर एक छोर हो जानी चाहिए . शहरी स्त्री जो साधन संपन्न  (अर्थ ,निर्णय ,समाज )है , उनका दायित्व है कि वो पिछड़ी स्त्रियों के लिए भी अपनी आवाज़ उठायें.   चूँकि हमारे समाज में स्त्री से सम्बंधित अनेक विकृत स्थितियां विद्यमान है ऐसे में सभी स्तरों पर कार्य की आवश्यकता दुरूह होने पर भी आवश्यक है .इनमे भी जातिगत जटिलतायें इस समस्या को बाधा देती है .इसके अलावा आदिवासी स्त्रियाँ, जिन तक विकास की लहर सही रूप में पहुँच नहीं पाती ,और अधिक विकट स्थिति उत्पन्न करते हैं .इस तरह से स्त्रीवादी विमर्श अपने ही अंदर दलित और हशिया के विमर्श के बीज समेटे हुए है .यह स्त्री के अर्थ तंत्र और समाजतंत्र में व्याप्त विकृतियों का आइना हैं .

स्त्री के सरोकारों की शुरुआत हमें नवजागरण काल में विशेष सुनने को मिली .यह वो समय था जब सभी समाज सुधारको ने करबद्ध होकर स्त्री की सामाजिक स्थिति में बदलाव के प्रयास किए .इसी समय परोक्ष  रूप से  की चाहनाओं को स्वर मिला .वो भी समाज का एक अभिन्न अंग है और वह भी समाज की कुरूप मुखौटे को उदघाटित कर सकती है , यह रूप भी हमें इसी दौर में दिखा .ताराबाई शिंदे ,पंडिता रमाबाई ,व अज्ञात हिन्दू औरत के रूप में हमे यह विद्रोह का स्वर दिखा .इससे पूर्व भी सत्यशोधक आंदोलन, ब्रहम समाज (राजा राममोहन राय , (प्रार्थना समाज (केशवचंद्र के प्रयासों ने इसकी पृष्ठभूमि निर्मित की .इसके बाद आर्य समाज (दयानंद सरस्वती ),थियोसोफिकल सोसाइटी(एनी बेसेंट )ने मूलभूत बदलाव के लिए सामाजिक कार्य किए .इनके कार्यों में पर्दा प्रथा निषेध ,सती प्रथा निषेध ,स्त्री शिक्षा जैसे कार्य शामिल थे .नवजागरण कालीन इन प्रयासों ने बदलाव की एक नींव तैयार कर दी थी .असल बदलाव तो स्त्री के राजनीति में जुड़ने से हुआ .उसकी लगातार बढती राजनितिक सक्रियता ,राजनितिक सहभागिता व विरोध के स्वर ने राजनीति में एक महत्वपूर्ण जगह बनाई.वह धीरे-धीरे समझ गयी कि बिना राजनितिक सहयोग के उसका आगे बढ़ पाना असंभव है .अतः स्वतंत्रता से पूर्व भी हमें अनेक स्त्रियाँ राजनितिक गतिविधियों में  सक्रिय दिखी .यथा –भगिनी निवेदिता ,सरोजनी नायडू ,कमला देवी चट्टोपाध्याय ,दुर्गाबाई देशमुख ,अरुणा आसफअली आदि .इसी दौरान हमें महादेवी वर्मा की ‘श्रंखला की कड़ियाँ ‘ भी मिलती है .

‘श्रंखला की कड़ियाँ’  1942 में प्रकाशित  महादेवी वर्मा की अलग -अलग निबंधों का संकलन है .महादेवी ने स्त्री की सामाजिक से लेकर आर्थिक परतंत्रता का विश्लेषण इसमें किया  है .महादेवी वर्मा के समय में स्त्री विमर्श जैसी कोई धारा न  थी .परन्तु यह महादेवी की दूरदृष्टि ही थी जो वर्तमान समय में भी हमें उनकी इस रचना से स्त्री विमर्श की अनुगूंज देखने को मिलती है.  वास्तव में महादेवी जिस परिवार में पली बढ़ी वह उन्ही नवजागरण कालीन स्थितियों को, समाज सुधार व स्त्री के स्तर में सुधार  पर विश्वास करने वाला था. महादेवी के पिता आर्यसमाजी थे, जिन्होंने महादेवी की शिक्षा और उनके हर निर्णय में उनका साथ दिया .महादेवी का तत्कालीन विपरीत स्थितियों में भी आत्मबल का कारण हम उनकी इस परवरिश में ढूंढ सकते हैं. यद्यपि उनका विवाह बचपन में ही हो गया था,  परन्तु उनको यह बंधन स्वीकार्य नहीं था .ऐसी ही परिस्थितियों ने उनके स्त्री लेखन को भी प्रभावित किया होगा .महादेवी ने 1935  में ‘चाँद’पत्रिका में सम्पादन का कार्यभार संभाला .जिसमे वे समय समय पर स्त्री केन्द्रित मुद्दे उठाती रहती थी  .’श्रंखला की कड़ियाँ’उनके इन्ही लेखों का संकलन है .

 महादेवी का विश्लेषण या आलोचना जब हुई भी तो एक भारतीय संस्कृति की प्रवक्ता के रूप में .उनको ‘आधुनिक कालीन मीरा’ कहा गया.  भारतीय संस्कृति व हिंदुत्व को लेकर लगाव दिखता तो है पर केवल  इन्हीं  सन्दर्भों के इर्द- गिर्द उनको समझना उनके साथ अन्याय होगा .महादेवी अपने विवेक के अनुसार परम्परा को तोडती भी हैं और अपनी मानवतावादी और स्त्री दृष्टि के कारण भविष्य उपयोगी भी हैं .

महादेवी वर्मा मानती थीं  कि स्त्रियों का कोई भी इतिहास नही मिलता .सत्य ही है क्योंकि  इतिहास तो शक्ति संपन्न सत्ता पक्ष का होता है, जिसके पास सारे संसाधन हैं- अर्थात पुरुष सत्ता, इसने ही समाज ,धर्म, संस्कृति ,अर्थ तंत्र को संचालित किया .अतः उसी का इतिहास भी लिखा गया . “समाज की दो आधार शिलाएं हैं ,अर्थ तंत्र का विभाजन और स्त्री पुरुष-सम्बन्ध .इनमे से यदि किसी एक की नभी स्थिति में विषमता उत्पन्न  होने लगती है ,तो समाज का सम्पूर्ण प्रासाद हिले बिना नही रह सकता”.1  यहाँ तो दोनों ही स्थितियों में असमानता देखने को मिलती है .यह सामाजिक असमानता स्त्री की आर्थिक आश्रयता के कारण है .इसी कारण उसके सभी निर्णय किसी और के होते हैं  और वह कठपुतली की तरह उनका अनुपालन करती है . “औरत का अपना कुछ भी नही होता .अपनी जो जिंदगी है ,वह भी औरत की नहीं .औरत पुरुष की संपत्ति होती  है.सिर्फ पुरुष नहीं, पुरुष शासित इस समाज की संपत्ति होती है .”2

महादेवी वर्मा का दृष्टिकोण उदारवादी नारीवाद से अधिक मेल खाता है .वे स्त्री की शिक्षा, स्वावलंबन के अतिरिक्त उन स्त्रीत्व  के गुणों को भी श्रेयस्कर समझती हैं, जिनसे दुनियावी कुरूपता को ढका जा सकता है. .वस्तुतः उनका दृष्टिकोण आशावादी ही अधिक था .इसीलिए वे  को उसके शोषण और परतंत्रता के बावजूद अक्षय वात्सल्यमयी पुकारती हैं .जो स्त्रीत्व का गुण है उसे छोड़ना नही चाहती . “जन्म से संतप्त और जीवन से अभिशप्त अक्षय वात्सल्यमयी  नारी” पुकारती है .स्त्री का यह गुण मानवता के विकास और उसको जीवित  रखने के लिए बेहद ज़रूरी है .यद्यपि  स्त्रीवाद इस वत्सल्यामयता को भी एक सीमा पर सामाजिक बंधन और शोषण का कारण समझता है और उसकी लिए विविध प्रकार के तर्क भी प्रस्तुत करता है .

महादेवी वर्मा समाज और धर्म में स्त्रियों की दोयम स्थिति पर भी सवाल खड़े करती हैं .महादेवी व्यंग्य करती हैं –“हमारी पूजा अर्चना की सफलता के लिए यह परम आवश्यक है कि हमारा देवता हमारी वस्तुओ पर हमारा अधिकार रहने दे और केवल वही स्वीकार करे जो हम देना चाहते हैं .”3 इसके अतिरिक्त पतित वेश्याओं पर भी महादेवी का ध्यान गया ,वे लिखती हैं –“जैसे दास प्रथा के युग में स्वामियों के निकट दास  व्यक्ति न होकर यन्त्र था ,वैसे ही समाज सदा से पतित स्त्रियों को भी समझता है .”4 वेश्यावृति इसी पुरुष सत्ता का परिणाम है,  जिसमें  परुष के भोग विलास की माध्यम बनती स्त्री को पुरुष की इच्छा का ग्रास बनना पड़ता है .आज इचित रूप से वेश्यावृति स्वीकारती स्त्रियों में भी कहीं न कहीं इसी विकृत सत्ता का हाथ है, जिसमें  अर्थ की आवश्यकता का और भोग विलास का एकात्म स्थापित हो गया है .

पुरुषसत्ता के एकाधिपत्य के साथ ही पुरुष ने जिस समाज ,धर्म ,शास्त्र ,नैतिकताओ का निर्माण किया उनमें स्वयं को श्रेष्ठ स्थान पर रख स्त्री को अपने अधीनस्थ बना लिया .इस अधीनस्थता के कारण में स्त्री की जैविक स्थिति व उससे उपजे अर्थ पारतंत्र्य को सामने रखा .समाज व्यवस्था की निर्मिति  इसी को ध्यान में रखकर की गयी .इस प्रकार यह पुरुष सत्तात्मक समाज स्त्री के शोषण का सर्वप्रमुख कारक बना .इसके साथ स्त्रियाँ पालतू जंतुओं के सामान पुरुष की संपत्ति मात्र बनकर रह गयीं .

महादेवी वर्मा ने श्रंखला की कड़ियाँ में स्त्री शिक्षा , स्वातंत्र्य ,स्वावलंबन ,वेश्यावृति ,ऐतिहासिक न्यूनता ,असमान सामाजिक स्थिति व साथ ही स्त्री की राजनितिक सहभागिता के प्रशन को भी अपने विश्लेषित मुद्दे के रूप में अपनी इस पुस्तक में  उठाया है .यद्यपि इसमें अधिक तर्कपूर्ण और गहन विवेचन नही मिलता है ,जो आज के स्त्री विमर्श के लिए अपेक्षित है .परन्तु महादेवी का इन विषयों पर चर्चा भी एक नई उपलब्धि थी.उनका यही प्रयास अग्रिम स्त्री विमर्श की वैचारिकी का अधार माना जा सकता  है .नही तो इसको एक शुरुआत के रूप में अवश्य देखा जा सकता है .इसका सम्बन्ध नवजागरण कालीन समाज सुधार की  प्रवृति से भी है .महादेवी वर्मा के पिता गोविंदप्रसाद आर्य समाजी थे .उन्होंने ही अपनी बेटी को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित किया .उनके पिता ने सामाजिक अवहेलना की चिंता किए बगैर उनकी ज़िदगी के लगभग सभी निर्णयों में उनका साथ दिया.निसंदेह महादेवी पर भी इस आचरण का बहुत प्रभाव पड़ा होगा .उनकी विचार दृष्टि भी आर्यसमाजी सुधर की पक्षधर थी बल्कि वे इससे भी आगे की सोच रखती थीं .महादेवी से पूर्व भी स्त्री क राजनितिक और कानूनी सुधार की एक धारा विद्यमान मिलती हैं –

1 – सती प्रथा निषेध अधिनयम (१८२९)

२- बाल विवाह निरोधक अधिनियम (१९२९)

3 – हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम (१८५६)

4 –हिन्दू स्त्रियों का संपत्ति का अधिकार अधिनियम (१९३७)

5 – विशेष विवाह अधिनियम (१८७२ ,१९२९ ,१९५४ )

महादेवी और निराला

इन कानूनी प्रावधानों का भी प्रभाव महादेवी वर्मा के दृष्टिकोण पर अवश्य ही पड़ा होगा . स्त्री जागरण के लिए स्त्री का तर्कपूर्ण लेखन व भावात्मक – यथार्थवादी लेखन स्त्री सरोकारों को अभिव्यक्त करने के लिए अत्यंत अवश्यक है .नवजागरण कालीन स्थितियों ने स्त्रियों को प्रेरित कर अपनी स्थिति पर सोचने की जगह बनाई. मैनेजर पाण्डेय लिखते हैं – “ श्रृंखला की कड़ियाँ’के माध्यम से महादेवी वर्मा एक स्त्रीवादी दार्शनिक के रूप में हमारे सामने आती हैं .हिंदी में स्त्री जीवन की वास्तिविकताओं और कामनाओ का कलात्मक चित्रण करने वाली लेखिकाएं और भी हैं तथा स्त्री स्वाधीनता का आन्दोलन चलने वाली कार्यकर्ताओं की भी कोई कमी नहीं है ,लेकिन भारतीय स्त्री की जटिल समस्याओं और उसकी दासता की दारुण स्थितियों और उनकी मुक्ति की दिशाओं का मूलगामी दृष्टि से जैसा विश्लेषण महादेवी वर्मा की पुस्तक ‘श्रंखला की कड़ियाँ”में है वैसा हिंदी में अन्यत्र कहीं नही है”.5

1 – ‘श्रंखला की कड़ियाँ’महादेवी वर्मा ,पृष्ठ 115

2 – औरत का कोई देश नहीं , तसलीमा नसरीन , पृष्ट 155

3 – श्रंखला की कड़ियाँ ,महादेवी वर्मा ,पृष्ट 91

4 – वही, पृष्ठ 81

5 –नवजागरण और महादेवी वर्मा का रचना कर्म :स्त्री विमर्श के स्वर , कृष्णदत्त पालीवाल ,पृष्ठ 281

6 –स्त्री संघर्ष का इतिहास ,राधा कुमार

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

भारतीय नवजागरण के स्त्री सरोकार की वैचारिकी

अभिषेक भारद्वाज  

 शोधार्थी गुजरात विश्वविद्यालय, संपर्क :abhidwaj86@gmail.com,7818067905

नवजागरण समूह विशेष में अपने सामूहिक रूप से अवनति के चिंतन से उपजता है. इस अर्थ में जो हार गए अथवा पीछे छूट गए हैं, और वह वापस पुनर्स्थापित होना चाहते हैं, उनका नवजागरण है. यह उस समूह विशेष की भूमिका, हिस्सेदारी और उनके अधिकार को सुनिश्चित करना है . यहाँ एक सवाल पैदा होता है कि यदि समाज के पीछे छूट गए अंश के हिस्सेदारों को हम पुनः स्थापित नहीं करते हैं तो क्यायह नवजागरण है? अपितु यह केवल वर्चस्वशील वर्ग का ही सतत विकास है. 19वीं सदी के नवजागरण पर बहुधा उसके अभिजात्य स्वरूप को लेकर सवाल उठने लगा है. इस अर्थ में यह एक उचित प्रश्न है. इस अर्थ के साथ हम धर्म के आधार पर (मुस्लिम नवजागरण), वर्ग के आधार पर (बौद्ध काल में पुरोहितवर्ग के विरुद्ध धार्मिक सुधार एवं जागरण), राष्ट्र के आधार पर (भारतीय राष्ट्रीय नवजागरण, इटली और फ़्रांस आदि विभिन्न देशों के नवजागरण) भाषा के आधार पर हिन्दी नवजागरण, बंगाली नवजागरण, आदि(यह विभाजन केवल भाषा का न होकरजातियता का भी है) इसी भांति लिंग, जाति (भारतीय वर्ण व्यवस्था) के बरक्स भी हम अध्ययन कर सकते हैं. बहुतेरे लिंग के आधार पर अध्ययन करते भी हैं.

मानव सभ्यता के प्रारंभ में जब सभी मनुष्य समान थे तो इसका अर्थ हुआ स्त्री भी पुरुष के बराबर रही होंगी. सभ्यता के विकास के साथ वह पीछे छूटते चली गई. कई विद्वानों ने यथा मॉर्गन, एंगेल्स, बोट्मोर आदि ने इस पर पर्याप्त तथ्यों को उद्घाटित किया है. संभवतः इस प्रकार देंखे तो जागृति की सर्वाधिक आवश्यकता उन्हीं में है. क्योंकि उनकी शोषण से मुक्ति तो दूर की बात है पहले इसका सम्पूर्ण बोध तो हो. इस प्रकार नवजागरण के काल में स्त्री के सरोकार के मायने बढ़ जाते हैं, क्योंकि यह स्त्री के अन्दर बोध निर्मित करने का दौर था. इसके साथ ही अगले स्तर के रूप में नवजागरण उनकी सामाजिक भूमिकाओं की पहचान सुनिश्चित करने का युग था . इसके उदाहरण के स्वरूप पंडिता रमाबाई को देखा जा सकता है, वैसे वे हिंदी क्षेत्र से बाहर की परिधि से हैं. लेकिन उनका प्रभाव निश्चित रूप से हिंदी पट्टी में रहा है इसे नाकारा नहीं जा सकता.

19वीं सदी में स्त्री

कोई भी नवजागरण बहुस्तरीय होता है . कई बार यह एक-दूसरे के विरोधी भी प्रतीत होते हैं, किन्तु वे वास्तव में  विरोधी होते नहीं बल्कि विभिन्न समूहों, जिनमें नवजागरण घटित हो रहा है उनके सकारात्मक मूल्यों की वृद्धि में सहायक होते हैं. क्योंकि नवजागरण अपने मूल में सार्वभौमिक मानवतावाद से अनुप्रेरित है. इस तरह स्त्रियाँ  भी , जो जन्म के समय एवं आदिम समाज में जब सभ्यताओं का आरंभ हुआ होगा तब पुरुषों के  समान ही रही होगी. किन्तु, जीवन और समाज के विकास के साथ-साथ प्राकृतिक रूप से मिले अधिकार को खो कर, वह पुरुषों के अधीनस्थ हो जाती हैं. यदि अपने समलिंगी के साथ समान चेतना बोध को ग्रहण कर प्रतिक्रिया करती हैं और अपने उत्थान के लिए सक्रिय होती है तो यह स्त्री नवजागरण है. अभी इस प्रकार के पदबंध का उपयोग नहीं होते हैं, किन्तु यदि हम चाहे तो विभिन्न अन्य समूहवाची पद के समान ही पीछे छूट गए लिंग आधारित वर्ग समूह के रूप में इसकी भूमिका स्वीकार कर सकते हैं. “जब-जब इतिहास में नवजागरण घटित हुए हैं, महिला रचनाकारों का पूरा समूह उभरकर सतह पर आया है.”  नवजागरण में स्त्रियों की भूमिका को स्पष्ट करते हुए सुमन राजे कहती हैं “नवजागरण सांस्कृतिक मंथन ही तो होते हैं, और इस मंथन में वे पैर जमाकर खड़ी हैं, कहीं-कहीं धारा के विपरीत भी, पूरी शक्ति और शब्द संरचना के साथ.”

इस प्रकार हिंदी नवजागरण में स्त्रियों को सशक्त बनाने वाली जो गतिविधियाँ है, वे सभी ‘स्त्री सरोकार’ के अंतर्गत आ सकती हैं. अब यहाँ एक प्रमुख बिंदु उभरता है स्त्रियों के इस उठान में केवल स्त्री ही आ सकती है या पुरुष भी. यदि पुरुष आता है तो उसकी भूमिका क्या होगी और उसकी भूमिका की व्याख्या किस प्रकार करनी होगी? क्योंकि बहुधा स्त्रीवादियों का मानना है कि समाज सुधार के नाम पर स्त्रियों का अनुकूलन (कंडिशनिंग) ही होता रहा है. “एक और ऐसे स्त्रीवादी मिल जायेंगे जो सामाजिक, न्यायिक, व्यवसायगत आर्थिक राजनैतिक और नैतिक समानता की अवधारणा पर खरे उतरते हैं जिनका शत्रु भेदभाव है, प्रतियोगिता और माँग जिनके साधन हैं, दूसरी ओर वे हैं जो बेहतर जीवन के आदर्श संजोएँ हैं, जो तब प्राप्त होगा जब सही राजनैतिक साधनों से सबके लिए एक बेहतर जीवन सुनिश्चित हो जाएगा. उन स्त्रियों को, जो संवैधानिक या सर्वाधिकारवादी या क्रान्तिकारी सभी रुढ़िवादी राजनैतिक उपायों से बददिल हो चुकी हैं, दोनों ही विकल्प नहीं भाते.”  जर्मेन ग्रीअर  जब इस प्रकार स्त्री संबंधी उपादेयता की व्याख्या करती है तो नवजागरण के काल में किए गए स्त्री संबंधी सुधार कार्य कहीं-न-कहीं हमें बेमानी लगने लगते है.

19वीं सदी की मुस्लिम महिलायें

तब क्या इसकी काल सापेक्ष व्याख्या हो सकती है? मतलब जिस युग में ये नवजागरण के पैरोकार हैं उस समय उनके किए गए सुधार कार्य तत्कालीन युग के अपेक्षा प्रगतिशील है या नहीं. वस्तुतः इसी प्रगतिशील तत्व को पहचानने का यह एक उचित तरीका होगा. इस आधार पर हम हिंदी नवजागरण के अध्ययन करने पर स्त्री-सुधार के दृष्टिकोण से किए गए कार्यों का अवलोकन करते है तो ये तत्कालीन सुधारकों की स्थिति हम एक प्रगतिशील विचारक के रूप में पाते है.लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इन सुधारकों में सब कुछ सकारात्मक ही है, कुछ इनकी सीमाएं भी है. जो कुछ हद तक तत्कालीन परिस्थितियों की एवं कुछ इनकी व्यक्तित्व कि सीमा थी. स्त्री की धार्मिक बंधनों से मुक्ति भारत में एक कठिन कार्य है. 19वीं सदी की स्त्रियों की स्थिति में सुधार के दृष्टिकोण से सती प्रथा के समापन से लेकर विधवा विवाह की शुरुआत, बालविवाह और बहुविवाह पर रोक, पर्दा प्रथा की समाप्ति के प्रयास, नाच-विरोधी आन्दोलन, स्त्री-शिक्षा और स्त्री-आत्मसम्मान जैसे मामले तत्कालीन धार्मिक संकीर्ण व्यक्ति को भड़काने वाले थे.  यही गतिविधियाँ वर्तमान में स्त्री-विमर्श के बीज रूप में देखी जा सकती हैं. वस्तुतः औपनिवेशिक दौर, “राष्ट्रीय जागरण के उन्मेष में स्त्री-जागृति की धारा भी शामिल थी और स्त्री-प्रश्न भी नये रूप में एजेण्डे पर उपस्थित था, लेकिन राष्ट्रीय आन्दोलन की विभिन्न संघटक धाराओं की वैचारिक निर्बलताओं-विचलनों से स्त्री-मुक्ति विमर्श भी मुक्त या अप्रभावित नहीं था.”

नवजागरण के स्त्री सरोकार की परम्परा एवं जुड़ाव 

कुछ व्याख्याओं के अनुसार  ‘मातृ शिक्षा’ कुशल धाय या कुशल कामगार को निर्मित करने की श्रेणी में आता है . जिसे यह कहकर व्याख्यायित किया  जाता  है कि यह एक प्रकार का अनुकूलन (कंडिशनिंग) है, पितृव्यवस्था के दोषों को दूर करते हुए स्त्री को अपनी  उपयोगिता के अनुसार ढालने की प्रक्रिया . किंतु, दूसरी ओर जब पितृव्यवस्था के स्थान पर ‘मानवता’ को केंद्र के रूप में स्वीकार करते हुए मनुष्यमात्र के लिए उद्धार या करूणा की आवश्यकता की अवधारणा को ग्रहण करते हुए इसका मूल्यांकन करते हैं  तो एक नवीन पक्ष का उदय होता है . यह पक्ष नवजागरण का है . भारतीय एवं यूरोपीय ज्ञान परम्परा के सम्मिलन से जो ‘मानवतावाद’ के बोध की नवीन निर्माण प्रक्रिया शुरू होती है, उसके अनुसार देंखे तो यह कुशल कामगार का निर्माण या कंडिशनिंग नहीं है, बल्कि वंचितों को दिया जानेवाला उनका अधिकार है . भारत में कई नवजागरण आ चुके हैं और उससे निर्मित एक सुदीर्घ ठोस आधार हमारे पास हैं . इसके सन्दर्भ में अमर्त्य सेन कहते हैं, “निस्संदेह, शास्त्रार्थीय महासंग्रामों में तो प्रायः पुरुषों का ही बोलबाला रहा है . फिर भी राजनीतिक नेतृत्व और बौद्धिक अनुष्ठानों में नारी की भागीदारी इतनी नगण्य भी नहीं रही है .”

सुदूर अतीत में महिलाएं मुखर नेतृत्व से अनभिज्ञ भी नहीं थी . यहीं नहीं, ‘अक्सर इन संवादों में अधिकांश तीखे चर्चित प्रश्न भी महिलाओं ने ही उठाए थे .’  गार्गी, मैत्रेयी और भारवि इसके प्रमाण हैं .  “भारत की संवाद-विवाद परम्परा को केवल पुरुष वर्ग का एकाधिकार मान लेना तो कदापि उचित नहीं होगा . ” इसी कड़ी में सुमन राजे के ‘हिंदी साहित्य का आधा इतिहास’ को लिया सकता है . इसमें सुमन राजे भारत में चार नवजागरण की बात करती है- प्रथम नवजागरण: थेरी गाथाएँ, द्वितीय नवजागरण : संस्कृत और प्राकृत की कवयित्रियाँ, तृतीय नवजागरण  : भक्ति आन्दोलन और चौथे नवजागरण के रूप में आधुनिक काल के ‘नवजागरण’ को .  इसमें वह आधुनिक काल के नवजागरण को विश्लेषित करते हुए कहती है- ‘ये सभी मूलतः धार्मिक सांस्कृतिक आन्दोलन थे. राष्ट्रवाद इनकी बुनावट में शामिल था. लगभग एक ही समय में इन महान विचारकों को केंद्र में रखे ये आन्दोलन जन्मे और विभिन्न अंचलों में फ़ैल गए. एक महत्वपूर्ण रेखांकित करने योग्य बात यह है कि इन सभी आन्दोलनों ने ‘स्त्री विमर्श’ को मुख्य मुद्दा बनाया. सती प्रथा निषेध हो, या विधवा विवाह प्रारंभ, सभी ने स्त्री-गरिमा और स्वतंत्रता की बात की. इसका परिणाम यह हुआ कि स्त्री ने स्वयं अपने और अपने परिदृश्य के बारे में सोचना शुरू किया.’  यहाँ पर सुमन राजे स्पष्ट रूप से स्त्री से जुड़े हुए चिंतन पक्ष को नवजागरण के मुख्य सरोकार के रूप में अंकित करती हैं. भारत के सभी हिस्से में यह स्त्री जागृति हमें दिखाई देती है. हिंदी नवजागरण भी इससे कोई अपवाद नहीं है. हाँ, हिंदी नवजागरण के शुरूआती समय में किसी स्त्री विचारक को हम नहीं पाते है, लेकिन 19 वीं सदी के अंत होते-होते इस प्रकार के उदाहरण मिलने शुरू हो जाते है. जो कि भारत के अन्य अंचलों के नवजागरण के समान ही है.

हिंदी नवजागरण की जब स्त्री भूमिकाओं का विश्लेषण करते हैं तो रामविलास शर्मा हिंदी नवजागरण की निर्मित वैचारिकी में 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम का व्यापक प्रभाव मानते हैं. रामविलास शर्मा के साथ सुमन राजे भी इस आन्दोलन में स्त्री की महती भूमिका को स्त्री के सकारात्मक पक्ष के रूप में निबंधित करती हैं. ‘1857 के विद्रोह ने राष्ट्रीय नवजागरण को नया आयाम दिया . इस क्रांति में महिलाओं की प्रमुख हिस्सेदारी थी जैसे- बेगम हजरत महल, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, मध्यप्रदेश में रामगढ़ की रानी, बदुरी की ठकुरानी और रानी दिगंबर कौर आदि.’  भारतीय इतिहास में इन वीरांगनाओं के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध है.नवजागरण के अग्रगण्य जिस आधुनिक वैचारिकी और सांस्कृतिक तत्वों के विकास हेतु प्रयत्नशील थे उसकी विभिन्न सीमाओं एवं अवरोधकों से अवगत थे . भारतेंदु युग के सभी लेखक इससे पार जाने का प्रयास करते रहे . कर्मेंदु शिशिर इस संबंध में कहते हैं- “सामंती उत्पीड़न में जातिगत रूढ़ी, संकीर्णता और नारी – शोषण पर वे चोट करते रहे . बालविवाह की भर्त्सना की . विधवा-विवाह का आन्दोलन किया . भारतेंदु- युग के लेखकों की देशभक्ति, दूरदर्शिता और तत्कालीन आधुनिकता का मैं लोहा मानता हूँ . वे विचारों के स्तर पर ही नहीं, कर्म के स्तर पर भी सकर्मक रहे . भारतेंदु युग के तमाम लेखकों ने अपने सांस्कृतिक संगठन बनाए . बिना संगठन का कोई रचनाकार न था .”  इस प्रकार इस युग के लेखक दोहरी भूमिका का निर्वाह करते है. एक स्तर पर वह साहित्यकार है तो दूसरी ओर वो समाज सुधारक की भूमिका को भी अदा कर रहे है.

स युग के विचारकों की अग्रगामी भूमिका को सुनिश्चित करने में शिक्षा कि महती भूमिका थी, उसमें भी पाश्चात्य शिक्षा पद्धति का विशेषतौर पर . ऐसा नहीं है कि यहाँ अंग्रेजों से पूर्व शिक्षा की परंपरा ही नहीं रही है, जो कि अक्सर कहा जाता है . वास्तव में भारतीय शिक्षा पद्धति की स्थिति इतनी बुरी भी नहीं थी .  कर्मेंदु शिशिर इस संबंध में कहते हैं, “शिक्षा को अंग्रेजों की देन मानने वाले इस तथ्य की अनदेखी करते हैं कि अंग्रेजों के पूर्व भारत में शिक्षा का सुव्यवस्थित, विकसित और सुदृढ़ आधार था. उच्च शिक्षा के जो केंद्र थे उनमें स्त्रियों के शिक्षा ग्रहण करने के दस्तावेज तक इतिहासकार धर्मपाल को मिले थे. अनेक दस्तावेज जला दिए गए और काफी कुछ बटोरकर अंग्रेज लन्दन की इम्पीरियल लाइब्रेरी में ले गए.”  इस सम्बन्ध में के.एन. पनिक्कर ने भी टिप्पणी किया है, जिसमें वह औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली के माध्यम से दिए गए सार्वजानिक शिक्षा पद्धति की सिमित भूमिकाओं को चिन्हित करते हैं. इसके साथ अंग्रेजों से इतर भारतीय शिक्षा के सामाजिक प्रसार को अंग्रेजी शिक्षा से कहीं अधिक बताते हैं.

भारतेंदु द्वारा प्रकाशित महिला-पत्रिका का संपादन

वर्तमान स्त्रीवादी विमर्श पर पाश्चात्य स्त्री वैचारिकी का अत्यधिक प्रभाव है. इस प्रभाव के फलस्वरूप भारतीय स्त्री विमर्श यूरोपीय स्त्री विमर्श की भारतीय शाखाएँ मात्र प्रतीत होने लगती है. इस प्रकार वर्तमान स्त्री विमर्श भारतीय जमीन पर विदेशी पौधे के समान लगता है, जो कि भारतीय वस्तुगत परिस्थिति की उपज न होकर एक आयातित विचारधारा के समान प्रतीत होता है. क्या वाकई भारतीय स्त्री विमर्श को देखने का यही एकमात्र नजरिया है? क्या भारत में स्त्री वैचारिकी की अपनी स्वाभाविक धारा को ढूँढा जा सकता है? पश्चिम में वोलस्टनक्राफ्ट, जॉन स्टुअर्ट मिल आदि स्त्रीवादी विचारक के रूप में मान्य हैं . जिस प्रकार ये पश्चिम के स्वाभाविक मानवतावादी चिन्तक हैं उसी प्रकार भारत में भी इस परंपरा की खोज किया जा सकता हैं . नवजागरणकाल के कई विचारकों को हम इस प्रकार चिन्हित कर सकते हैं . इसमें पुरुष और महिला समाज सुधारक दोनों को रख सकते हैं .कम से कम स्त्री समाज सुधारक पर एकमत से इसका उत्तर दिया जा सकता हैं . इसमें रमाबाई, आनंदी बाई जोशी या उनके समकालीन अन्य महिला लेखक हैं जिन्होंने स्त्रियों की स्थिति को लेकर चिंतन किया और सामाजिक रूप से भी सक्रिय रहीं .

रमाबाई के व्यक्तित्व विकास में उनके पिता अनंत शास्त्री एवं माता की मुख्य भूमिका थी . राजघराने की एक शिक्षित स्त्री से प्रभावित होकर उनके पिता ने अपनी पत्नी को शिक्षित किया . बाद में उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर अपनी संतानों एवं अन्य बच्चों को शिक्षित बनाने पर जोर दिया . रमाबाई इनकी छोटी बेटी थी . जिसकी शिक्षा में व्यवधान न हो, अतः उन्होंने इनका विवाह 16 वर्ष की उम्र में किया . अब अनंत शास्त्री के इस स्त्री शिक्षा संबंधी जागृति का कारण क्या माना जाए ? रमाबाई का जन्म 1860 ई. में हुआ . इस समय तक भारत में पाश्चात्य प्रभाववश नवजागरण का प्रभाव देखा जा सकता है . किन्तु रमाबाई के पिता इस पाश्चात्य प्रभाव से दूर थे . उनके अन्दर किसी अन्य परिवार की शिक्षित स्त्री को देखकर सहज ही अपने परिवार में भी इस संस्कार के विकास की आकांक्षा उत्पन्न हो गईं . अब इस प्रेरणा एवं उसके प्रभावस्वरूप रमाबाई की शिक्षा क्रम में पाश्चात्य स्त्रीवादी वैचारिकी की कहीं कोई महती भूमिका तो कम से कम नहीं हैं . यही रमाबाई प्रकारांतर में प्रख्यात विदुषी एवं स्त्रीवादी लेखिका हुईं . हाँ, कालांतर में रमाबाई पाश्चात्य ज्ञान परंपरा की ओर जबरदस्त रूप से उन्मुख होती हैं, वह इनसे यहाँ तक अभिप्रेरित होती हैं कि उन्होंने ईसाई धर्म को कबूल कर लिया था. रमाबाई की यह परंपरा ज्योतिबा फुले एवं उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले से जुड़ती है. इस प्रकार भारतीय नवजागरण के प्रभावस्वरूप उभरने वाली स्त्री वैचारिकी के स्वाभाविक धारा का पता चलता है.

पंडिता रमाबाई

हिंदी नवजागरण भारतीय नवजागरण के इसी विशाल कलेवर का एक प्रमुख हिस्सा है. इस शोध आलेख में हिंदी साहित्य के सन्दर्भ से स्त्री संबंधी तत्कालीन वैचारिकी उसके सरोकारों को समझने का प्रयास किया गया है.

पृष्ठ- नौ,प्रस्थान, हिंदी साहित्य का आधा इतिहास, सुमन राजे, चौथा संस्करण 2011, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली
, सम्पादकीय, स्त्री अधिकारों का औचित्य-साधन( मूल पुस्तक A Vindication of the Rights of Women का हिंदी अनुवाद): मेरी वोल्सटनक्राफ्ट, अनुवाद : मीनाक्षी, पहला संस्करण 2003, पहली आवृति 2009, राजकमल प्रकाशन
पृष्ठ-22, विचार-स्वातंत्र्य और संवाद,भारतीय अर्थतंत्र, इतिहास और संस्कृति (The argumentative indian) : अमर्त्य सेन, अनुवादक : भवानीशंकर बागला, हिंदी संस्करण पृष्ठ- नौ,प्रस्थान,  वही|
पृष्ठ- 16-17, बधिया स्त्री (The Female Eunch): जर्मेन ग्रीअर, अनुवाद – मधु बी. जोशी, पहला संस्करण 2001, दूसरा संस्करण 2005, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली|
पृष्ठ-22, सामाजिक क्रांति के दस्तावेज, शम्भुनाथ,प्रथम संस्करण 2004, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली|
पृष्ठ- vii, सम्पादकीय, स्त्री अधिकारों का औचित्य-साधन( मूल पुस्तक A Vindication of the Rights of Women का हिंदी अनुवाद): मेरी वोल्सटनक्राफ्ट, अनुवाद : मीनाक्षी, पहला संस्करण 2003, पहली आवृति 2009, राजकमल प्रकाशन
पृष्ठ-22, विचार-स्वातंत्र्य और संवाद,भारतीय अर्थतंत्र, इतिहास और संस्कृति (The argumentative indian) : अमर्त्य सेन, अनुवादक : भवानीशंकर बागला, हिंदी संस्करण 2011, राजपाल एंड संज, नई दिल्ली
पृष्ठ-22, वही|
पृष्ठ-22-25, वही|
पृष्ठ-25, वही|
हिंदी साहित्य का आधा इतिहास, सुमन राजे, चौथा संस्करण 2011, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली|
पृष्ठ- 227, हिंदी साहित्य का आधा इतिहास, सुमन राजे, चौथा संस्करण 2011, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली
पृष्ठ- 227, वही |
पृष्ठ-24, नवजागरण और संस्कृति, कर्मेंदु शिशिर, प्रथम संस्करण 2000, आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा|
पृष्ठ-24, वही|
पृष्ठ-67, औपनिवेशिक भारत में सांस्कृतिक और विचारधारात्मक संघर्ष, के.एन. पणिक्कर, अनुवाद: आदित्य नारायण सिंह|
के.एन. पणिक्कर, अनुवाद: आदित्य नारायण सिंह : औपनिवेशिक भारत में सांस्कृतिक और विचारधारात्मक संघर्ष

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

एक बम तो मैं भी फोङूँगी ही

चंद्रभान  

 शोधार्थी, जेएनयू.   इतिहास एवं साहित्य में रुचि के साथ-साथ थिएटर भी।संपर्क : saahir2000@gmail.com

एक बम तो, मैं भी फोङूँगी ही

उस दिन क्या हुआ था?

शंकर के लिंग
गोली में तब्दील होकर
फ़िज़ा में उड़ रहे थे…

हर घर में
लिंग ही लिंग

खिड़की, दरवाज़ा
यहाँ तक कि दीवार  तक
छेदकर, घुस आए थे…..

फिर योनि के रास्ते
दिल, दिमाग़
हर नस में

दाग दी गईं
गोलियाँ….

उस दिन से दिमाग़ में भी
एक योनि बन गई…..

जब भी साँस लो
गोली ठाँय सी लग जाती है
हर रोज़
वही मौत
फिर-फिर और फिर….

इन लिंगों को इकट्ठाकर
एक बार ही सही
एक बम तो
मैं भी फोङूँगी ही।

( कुंनन-पोशपोरा में आर्मी द्वारा किए गए समूह बलात्कार  की घटना के सन्दर्भ में)

आओ विदा लें


आओ विदा लें
कि शब्द बने रहें मधु
कि लम्स बचे रहें सुंदर

कि लमहात यादगार रहें
कि क्षणों को दाग़ न लगें

आओ आगे बढ़ें
आओ विदा लें

आओ सौदा करें 


आओ  सौदा करें

तुम मेरा ख़याल रखना
मैं तुम्हारा।

तुम मेरे साथ चलना
मैं तुम्हारे।

तुम मुझ पर चिल्लाना
मैं तुम पर

तुम मुझ पर झल्लाना
मैं तुम पर

तुम मुझको रुलाना
मैं तुमको…….

इस तरह तुम भी जी लोगे
और मैं भी

हमारा आसमाँ
और ये हवा
मुफ़ीद नहीं है

इसलिए आओ
सौदा करें

कि  जी सकें

स्वर्णयुग

स्वर्णयुग में
मेरा अक़ीदा है ही नहीं
मैं जानता हूँ
आग जैसे मानव को
वर्तमान में जलते हुए
आसमाँ और समंदर
बुनते हुए
हर रोज़
हर वक़्त

वायरल वीडियो और हिंसक-अश्लील ऐशट्रे के बहाने

पारुल अग्रवाल 

दो दिन के फेर में वायरल हुए दो पोस्ट अश्लीलता, भद्देपन और निजी-स्वतंत्रता के फर्क को इतनी बेहतरी से समझा पाएं, ये सोशल-मीडिया के बिना शायद संभव नहीं था.

कहानी बहुत छोटी सी है. बीते शुक्रवार की शाम मैं बंगलौर के पीवीआर सिनेमा हॉल में अपने कुछ मित्रों के साथ एक फिल्म देखने गई. इंतज़ार और बातचीत के दौरान हमारी नज़र दो लोगों के बीच हो रही कहासुनी पर पड़ती है. थियेटर के ठीक बाहर एक अधेड़ उम्र व्यक्ति एक नौजवान को फिल्म देखने से रोक देता है. फसाद का कारण है उसकी टी-शर्ट. ‘भारत के नागरिक’ के तौर पर इन अधेड़ उम्र सज्जन को नौजवान की टी-शर्ट पर लिखी पंक्तियां (स्टॉप जर्किंग, स्टार्ट फकिंग) अश्लील लगीं. उनके साथ एक पुलिसवाला भी मौजूद था, जिसके वहां खड़े होने के बावजूद ये सज्जन लगातार उस नौजवान पर चिल्लाते रहे, उसके कपड़े खींचे और उसे फौरन नई टी-शर्ट खरीद, कपड़े बदलने के लिए धमकाया. मॉरल पुलिसिंग के इस वाकये का मैंने एक वीडियो बनाया और उसके बाद मुझ समेत वहां मौजूद कई लोगों ने मिलकर उन सज्जन और पुलिसवाले से सवाल-जवाब किए. आखिरकार वह नौजवान सिनेमा-हॉल में दाखिल हुआ.

फेसबुक पर इस वीडियो को साझा करने के कुछ ही घंटो के भीतर ये वायरल हो गया. इसके साथ शुरु हुआ टिप्पणियों का सिलसिला, जिनमें लोगों ने एक टी-शर्ट को लेकर हुए बवाल पर हैरानी जताई, लेकिन बहुत से लोग ऐसे भी थे जिन्हें इस टी-शर्ट पर आपत्ति  थी और उन्होंने मॉरल पुलिसिंग को जायज़ ठहराया. कुछ ने कहा कि टी-शर्ट पहने व्यक्ति को भारतीय दंड संहिता की धारा- 292/293 के तहत फौरन गिरफ्तार किया जाना चाहिए.

अश्लीलता और फूहड़ता एक सामाजिक बहस है लेकिन ये भी सच है कि क्या अश्लील है और क्या फूहड़, ये एक व्यक्तिगत फैसला और निजी अनुभव भी है. कई लोग स्त्रियों के पहनावों को बलात्कार से जोड़ते हैं और लोग ऐसे भी हैं जिन्हें एम-एफ़ हुसैन की चित्रकला अश्लील और भद्दी लगी, जिसके चलते उन्होंने अपनी ज़िंदगी के आखिरी साल निर्वासन में बिताए.

अश्लीलता का विमर्श, समाज और स्त्री से जुड़ा है. इस पर बहस ज़रूरी है क्योंकि सेक्स और अश्लीलता के ज़रिए औरतों को उपभोग की वस्तु बनाए जाने का गवाह इतिहास है. लोकिन ये बहस कब, कहां और कैसे करनी है इसका फैसला भी भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

अब औरत के गुप्तांग में सिगरेट भी 

दो दिन पहले सोशल-मीडिया पर एक और पोस्ट वायरल हुई. मामला था अमेज़न  पर बिक रही एक ऐश-ट्रे का. क्रिएटिव प्रॉडक्ट्स की सूची में शामिल ये ऐश-ट्री एक नग्न महिला की योनि  में सिगरेट बुझाने का मौका देती है. औरतों के प्रति हिंसा और उनके शरीर को सेक्स का माध्यम-भर समझने के मामले आज भी हर दूसरे दिन सामने आते हैं. इस ऐश-ट्रे ने कुत्सित मानसिकता और यौन-हिंसा का एक नया आयाम गढ़ा. लोगों का गुस्सा और सोशल-मीडिया पर उठ रहे सवालों को देखते हुए, आखिरकार अमेज़न ने इस ऐश-ट्रे को वेबसाइट से हटा दिया.

अश्लीलता और बाज़ार एक दूसरे के पूरक रहे हैं और बाज़ार के आगे घुटने टेकने की प्रवृत्ति दुनियाभर की सरकारों में है. सरकार, कानून और खुद नागरिक समाज ने बाज़ार को लेकर दोहरी नीति अपनाई है. आंकड़े बताते हैं कि बाज़ार के बढ़ावे पर हमारी रोज़मर्रा ज़िंदगी में अश्लीलता का दख़ल दिन-रात बढ़ रहा है. टी-शर्ट और ऐश-ट्रे दोनों ही बाज़ार की उपज हैं.

वायरल हुआ वीडियो 

तो सवाल ये है कि अगर ऐश-ट्रे आपत्तिजनक है तो फिर टी-शर्ट कैसे जायज़ है. अगर ऐश-ट्रे भावनाओं को आहत करती है तो टी-शर्ट पर नाक-भौं सिकोड़ने वालों को किस आधार पर नकारा जा सकता है. मामला अगर अश्लीलता का है तो क्या अश्लील है और क्या पहनावे का अधिकार ये कौन तय करेगा?

इस सवाल का एक जवाब अग्रेंज़ी हुकूमत ने सन 1860 में दिया. अश्लीलता पर बने इस कानून के मुताबिक, अश्लीलता को प्रचारित करने के लिए 20 वर्ष या उससे कम आयु के व्यक्ति को अश्लील सामग्री, बेचना, किराए पर देना, वितरित करना या प्रदर्शित करना कानून जुर्म है, जिसके लिए जुर्माने से लेकर सज़ा तक का प्रावधान है. आज़ाद भारत ने इस कानून को ज़्यों का त्यों  अपनाया. अदालत तक पहुंचे अश्लीलता के सवालों को हम आज भी सौ साल पुराने इसी कानून के ज़रिए हल करते हैं. समय के साथ भारतीय कानून ने अश्लीलता और भद्दे के बीच फर्क करना सीखा है और अश्लीलता अगर ‘हिंसक-उत्तेजना’ पैदा करे तो वो दंडनीय है.

लेकिन अश्लीलता के सवाल का जवाब देना केवल अदालतों की ज़िम्मेदारी नहीं. हमारे और आपके ज़हन में उठा हर सवाल अगर अदालत जाकर हल हो, तो देश की चरमराई न्याय-व्यवस्था भरभराकर गिर पड़ेगी. ये उसी तरह है जैसे भारतीय कानून हमें जनहित याचिकाओं का हक़ देता है, लेकिन ये जनहित याचिकाएं जब सरदारों को लेकर सुनाए जाने वाले चुटकुलों और भारत को कोहिनूर हीरा लौटाए जाने का सवाल उठाती हैं तो सुप्रीम कोर्ट तिलमिला उठता है.

आंकड़े गवाह हैं कि अश्लीलता को लेकर आईपीसी– 292/293 के अंतर्गत दायर किए गए ज़्यादातर मामले अदालतों में खारिज हुए हैं. एम-एफ़ हुसैन सहित एआईबी रोस्ट जैसे विवादों में कोर्ट ने अभव्यक्ति की स्वतंत्रता का संज्ञान लिया है.

औरत के मुंह में पेशाब करने में क्या आनंद मिलता है 

यही वजह है कि अश्लीलता के सवाल का जवाब देने की ज़िम्मेदारी जितनी अदालतों की है उतनी ही बाज़ार और हमारी भी. टी-शर्ट पर लिखे- स्टार्ट फ़किंग और ऐश-ट्रे में मौजूद महिला की योनी में सिगरेट का फ़र्क अदालतों से ज़्यादा समाज को सीखना है.  एम-एफ़ हुसैन की चित्रकारी, न्यूड आर्ट की प्रदर्शनी, कंडोम के विज्ञापन और टी-शर्ट के स्लोगन, कला-सेक्स और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के ईर्द-गिर्द घूमते हैं. सेक्स अश्लील भी है और एक अभिव्यक्ति भी और इस अभिव्यक्ति के मायने और तरीके लगातार बदल रहे हैं.

टी-शर्ट पर लिखा हर ‘सेक्सी’ शब्द अश्लील नहीं और ज़रूरी नहीं कि हर बार सेक्स के निशाने पर स्त्री हो. आज के दौर में ‘फ़क’ शब्द  का इस्तेमाल, उसका मतलब, उसके परिप्रेक्ष्य बहुत बदल चुके हैं. ये उसी तरह है जैसे अंग्रेज़ी शब्द Shit का इस्तेमाल एक समय वर्जित था. S***t या S—t के साथ उसका प्रयोग किया जाता था. या फिर हम God Damn या it sucks नहीं कह सकते थे.

ये शब्द भद्दे हैं, फूहड़ हैं ये सच है लेकिन ये भी सच है कि शब्दों का अर्थ और उनकी ‘इमेजरी’ बहते पानी की तरह है. ये सच है कि यही वो शब्द हैं जिनका इस्तेमाल रेप-सॉंग्स और औरत को एक वस्तु की तरह गिनाने में किया जाता है, लेकिन ये भी सच है कि सेक्स का माध्यम अब केवल औरत नहीं है और सेक्स से जुड़ी हर चीज़ में वही निशाने पर हो, ये भी ज़रूरी नहीं है. सेक्स अब सेल्फ़ का लिबरेशन भी है. वो अब एक ऐटिट्यूड भी है, और विरोध का तरीका भी. वो अब केवल एक निजी यौन-क्रिया नहीं बल्कि एक बहस भी है. सेक्स से जुड़े शब्दों और इमेजरी का इस्तेमाल इस नए आयाम में भी हो रहा है.

ज्यादा अश्लील हैं मर्दों के पहनावे 

कुलमिलाकर अश्लीलता एक बहुत गंभीर मसला है लेकिन इन मसलों पर बहस समय और समाज से कटकर नहीं की जा सकती. ये मसले जटिल हैं और इनके हल उससे भी अधिक जटिल. ये लड़ाईयां समय लेती हैं और इन लड़ाईयों के निष्कर्ष   उससे भी अधिक देर से निकलते हैं. लेकिन ऐसे में ये और भी ज़रूरी है कि प्रक्रिया के दौरान हम भटकें नहीं. हमारी भावनाएं सही मुद्दों पर आहत हों और हमारा गुस्सा सही जगह चोट करे. अफ़सोस ये है कि इस सही-गलत की कोई आसान सूची उपलब्ध नहीं. ये सही और गलत अपने विवेक और अपनी समझ से हमें खुद तय करने हैं और वही बदलाव का पहला क़दम है.

(पारुल अग्रवाल पेशे से पत्रकार हैं और नागरिक समाज से जुड़े मुद्दों पर लिखती हैं)

जाज़िम

सोनी पांडेय

कवयित्री सोनी पांडेय साहित्यिक पत्रिका गाथांतर की संपादक हैं. संपर्क :pandeysoni.azh@gmail.com

अन्धेरा घिरने लगा तो कनिया ताड़ का झांडू लिए छत की ओर चलीं….कमर झुक गयी थी ….एक आँख का मोतियाबिन्द पक गया था ,किसी को सुध नहीं. झुकी कमर पर दाहिना हाथ धरे ,एक हाथ में झांडू उठाए कनिया  को जाते देख कलक्ते वाली ने ताली पीटा …इ लो  मुल्ला चला मस्ज़ीद की ओर.हा ..हा…हा…ए  इया !सुनिये तो ,यहाँ बैठिए, हल्दी वाली जगत बो ने हाथ पकड़ कर खटिया की ओर खींचते हुए कहा.हट….हट …हट ,कहते बुढ़िया पिनपिना उठी. जरा और बोलती ,झाडू उठ जाता….बुढ़ापा था कि घर भर की औरतों -बच्चों के मनोरंजन का साधन …दिन भर बेना की तरह ड़ोलती बुढ़िया पूरे कुटुंब को शीतल मन्द बयार बन जेठ की दोपहरी में सुख देना चाहती. चाहती बटोर लाए ज़माने भर  को ,कि देखो हमारी वंश बेली कैसे छितर कर फैली है देश भर में और कैसे लौटती है हर जेठ में अपनी जड़ों की ओर. पिछवाड़े दो पेड़ आम ,एक नीम,बेल,नींबू ,पपिते ,केले की सघन छाया में खटिया डाल घर की नयी बहूँऐं बैठी दम भर अपने -अपने शहरी वैभव का बखान करने में मगन. प्रौढ़ाऐं आँगन में …लड़कियाँ तितली की तरह घर से दुवार तक मंडराती ,मुस्कुराती …कुछ कथ -अकथ गाथाओं के सूत्र सहेजते अपनी दुनिया में रंग भरतीं. बच्चों का झुण्ड चिड़ियों की तरह चहचहाता -गाता जब घर,आँगन,दुवार चारों ओर दौड़ता -भागता गुजरता तो कनिया का कलेजा लहलहाती खेती देख झूम उठता.

कनिया  बिना वक्त गवाऐं छत बुहार देना चाहती थीं ... पुन -पुन सीढ़ियाँ चढ़ती जा रही थीं. नीचे आँगन में एक कोने में बुधिया की माई कढ़ाई में सब्जी छौंकने की तैयारी कर रही थी. ब्याह का घर,….घर भर की औरतों की चाँदी, इन दिनों खाना बनाने के लिए बुधिया की माई पच्छिम टोले से बुला ली जाती थी ….औरतें सब्जी काट भर देतीं ,बाकि का काम वह अपनी दोनों बेटियों संग करती ,बदले में रोज का पचास रुपये…एक बहू की झांपी की साड़ी ….एक- दो घर की औरतों की पुरानी साड़ी और नेग -जोग मिलता. बेवा औरत बेटियों संग पूरे लगन घर -घर घूम कर रसोई बना कर गुजारा करती.

मिर्चे की तेज झौंस से कलकतेवाली तुनक उठीं  ….इतना मिर्चा झोंकती है कि कलेजा झौंस जाए ….खों -खों करती वह भी छत की ओर चलीं. बुढ़िया अब तक आधा छत धीरे-धीरे झाड़ चुकी थी. लेहाज में कलकतेवाली ने झांडू हाथ से लेना चाहा तो जोर से कलाई पकड़ ठेलते हुए चुपचाप आगे बुहारने लगीं. एक कोने में तहा कर रखे जाज़िम के बड़े से बंडल पर कलकतेवाली बैठ गयी ….नीम की सघन छाया और मन्द हवा के झोंके ने राहत दी तो गुनगुनाने लगीं…..हेssरी काली री कोइलिया बताउssss ….कब मिलिहें सवरियाssssssssss
मधुर आवाज की तान का असर हो या मौसम की फितरत, आम पर कोयल कूं -कूं  कूहुकने लगी…अनायास दोनों औरतें मुस्कुरा उठीं. छत का कूड़ा किनारे लगा ,दौरी में उठा कनिया कलकतेवाली  के पास आईं….लम्बी साँस छोड़ते हुए…हाथ हिला कर गट्ठर पर से उठने का इशारा किया….वह अविलम्ब उठ गयीं. दोनों औरतें खोलकर बिस्से भर के छत पर जाज़िम बिछाने लगीं ….लगभग एक तिहाई छत ढ़क गया…कनिया बैठ कर माथे का पसीना पोंछने लगीं….काहें रउवां एतना परेशान होती हैं….अरे बिछाएगीं न कुल. आँगन की ओर हाथ लहराकर…देखिए सब मजलिस लगाए हैं नीचे एक्के खटिया पर अडस कर. अब्बे भागे आएगा ज़माना….जान गयीं कुल की बिछौना बिछ गया.कलकते वाली को सत्तर साल की कनिया का यह श्रमसाध्य कार्य बिल्कुल रास नहीं आता था,वह झनझना रहीं थीं ..जैसे झन से थरिया कोठे से आँगन में गिर झनकता हो. पर कनिया भी बेहया की जड़ …रोज चारों देवरानियों,तीनों ननदों से डांट -ड़पट सुनतीं  और फिर उसी क्रिया को रोज परिवार जुटने पर दुहरातीं. कलकतेवाली उनके बाद उतरी घर की दूसरी बहू थीं. उम्र कोई साठ से पैंसठ, लम्बी -गोरी -चिट्टी कलकतेवाली पर कनिया का विशेष स्नेह था. कलकतेवाली  नियम से जब तक गाँव ठहरतीं,जिठानी के पैर शाम को दबातीं और पूरे गाँव भर की कथा साल भर की सुनतीं. पैर जबरन खींच कर दबाने लगीं …..आज कनिया कुछ उदास थी …..नई बहू उतर चुकी थी, कल से धीरे- धीरे परिवार शहर की ओर लौटने लगेगा, सोच कर ,आँखें बन्द कर वह जो खोंईं अतीत में कि आँसू झर -झर लुढ़क कर कानों में समाने लगे. चित्त लेटी कनिया ने झक उजली साड़ी से मुँह ढ़क लिया. अन्धेरा सघन होने लगा था ….कुछ तारे रह -रह कर आसमान से झांकते और कहते कि धीर धरो अभी चन्द्रमा का लालटेन जलाते हैं. सोलहवें साल में कनिया ब्याह कर जो नगरा से दलछपरा आई कि नैहर का मुँह पलट कर नहीं देखा. ब्याह के कुल चार महीने गुजरे थे जब पति को बरखा में खेत के मेढ़ पर बैठी काली नागिन डस छीन ले गयी …….सास छाती पीट-पीट डेकरती……अरे रमवा हो रमवाsss उतरत मोर पूत खइलस रे रमवाsss. कनिया पर वज्र गिरा ……सामने पहाड़ जैसी जिन्दगी……बस एक रहम किया विधाता ने,गर्भ रह गया. सास ने चैन की साँस ली…..गीता ….पुराण….मानस पढ़वातीं. कठोर जप-तप करती कनिया रात-दिन एक ही प्रार्थना करतीं कि किसी की किरपा हो और बेटा हो जाए…. पर नियती को कुछ और मंजूर था …. सात महीने बीते और सौरी में बेटी का तीव्र रुदन सुन सास लहकने लगीं.जैसे बरसात में भींगी लकड़ी सुलग- सुलग लहकती है..मायके भेजने की जुगत भिड़ाने लगीं….. वह उनसे भी नौ जौ आगे निकले. संदेशा ले जाने वाले नाउ को मार -पीट कर भगा दिया. जानते थे सास दुबारा नहीं बुलाएगी. इधर क्रान्तिकारी देवर बनारस से लौटे और पूरा हाल जाना तो भावज से ब्याह को अड़ गये……सास को काटो तो खून नहीं. कनिया पर अत्याचार बढ़ गया…..सास माथा पीट- पीट आँगन में चिल्लाती…..हम रहतीं त माहूर घोर पी लेतीं…..इ राsढ़ ,घर दहनी,कुल बोरनी,गू खौकी हमार घर नसलस रे रमवाssssss

गोद में फूल सी सुकोमल पति की एक मात्र निशानी बच्ची का मुँह देख कनिया सब सह रही थीं.एक दिन देवर का पैर पकड़  रोने लगीं…..बबुआ जी sssss रंs उवा बेटा नियर बांडी…जिद छोड देईं. जइसन माई त इसन हमके बूझीं.  देवर की सारी जिद धरी रह गयी ….कोई चारा नहीं…..भावज ने बेटा मान लिया. सास ने सारे देवता -पित्तर की पूजा की, कि बला टली. झट-पट बिना दान -दहेज के बड़ी से सुन्दर बहू दूसरे नम्बर के बेटे के लिए उतारा और साले- साल कर दोनों छोटे बेटों को भी ब्याह दिया. कनिया चुकी घर की बडी बहू थीं ,सो जीवन भर सास के लिए कनिया ही रहीं. सफेद काली किनारी की मोटी खादी की धोती पर मोटा चद्दर डाल कर गंगा नहाने ले जातीं …घर से पैर केवल देवता पूजने को निकलता. घर आँगन में भटके पंक्षी की तरह फड़फडा कर सपनों के सारे सुनहरे पंख झड़ गये……जब शरीर की उष्मा भाप बन सिर पर मंडराने लगती ,आधी रात को उठ कर मन भर नहातीं …..सास तरह – तरह के साधना करातीं. कतकी नहाना…पचकोसी जाना,हर मास की निर्जला एकादसी की कठोर साधना सिर झुकाए करते- करते न केवल भरे यौवन में गर्दन झुकी ,कमर भी धनुषाकार मुड़ गयी. कनिया को थोड़ी राहत मिलती तो बड़ी देवरानी से…..बड़े देवर पढ़ -लिख कर कलक्ते में कालेज के मास्टर हुए तो देवरानी कलकतेवाली  हो गयी. देवर शिक्षा पर विशेष बल देते …..पत्नी को भी उच्च शिक्षा दिलाया,देखा देखी पूरा परिवार शिक्षा की ओर भागा. दोनों छोटे देवर भी क्रमश:चण्डीगढ़ और दिल्ली में कालेज के मास्टर बने ….सबसे छोटी देवरानी भी. गाँव समाज कहने लगा ….कनिया के पैर लक्ष्मी और विद्या साथ लाया पर अपना करम नास कर.

महानगरों की आबो हवा में नयी पीढ़ी पलने -बढ़ने लगी .…..जब तक ससुर जीते रहे सभी तीज त्योहार में नियम से गाँव आते रहे. बड़े देवर की पहल पर मिट्टी का घर गिरा कर भाईयों ने चौखण्ड गहरे आँगन वाला बीस कमरों का बड़ा सा मकान बनवाया. ….सबके दो – दो बेटे ,दो -दो बेटियों , कनिया की बेटी को मिलाकर कुल तेरह बच्चे … देवर -देवरानियों ,सास -ससुर को लेकर नौ.तीनों ननदों को जोड़ दें तो कुल पचास का कुटुंब. घर में सालों साल रंगोत्सव सा माहौल रहता. सास बहुओं को नियन्त्रण में रखना जानती थीं. मजाल नहीं कि दिन में बेटे आँगन में पैर रख दें. दुवार पर कुछ सालों बाद एक मर्दानी बखरी और बैठका अलग से बन गया. सब जानते थे ये पहरेदारी अकेले कनिया पर थी. बड़ी ननद पिछले सावन में काशी ले गयी थीं ….वहाँ आश्रम में कनिया ने विधवाओं को केश मुड़वाए देखा तो रेशम जैसे कमर तक घने बाल विश्वनाथ जी को सौंप आईं. बड़े देवर दरवाजे पर बैठे थे जब कार से कनिया उतरीं ….खूब कुहराम मचाया …..सास को छोड़ सबने कनिया के इस कृत्य का बहिष्कार किया, नतीजा दुबारा कनिया के सर पर उस्तरा नहीं चला …..त्योहारों में देवरानियाँ हरी चूड़ियाँ जबरन कलाईयों में ड़ाल देतीं. कलकतेवाली नाउन को डांट कर आलता पैर में लगवातीं. सास ने खासा विरोध किया….बेटे की माँ होती तो आधी सुहागन होती ….करमदलिद्दर..बेटी बिया के बैठ गयी …आदि -आदि चिल्लातीं. छोटे देवर से एक बार भावज का कूहुक कर रोना, माँ के ताने सुनाना देखा नहीं गया.अपना तीन महीने का छोटा बेटा भाभी की गोद में डाल भरे आँगन में घोषणा की ……आज से भाभी एक बेटे की भी माँ हुईं…..माँ को सख्ती से समझाया कि अब निपुती मत कहना कभी. और उस दिन से सिन्दूर -बिन्दी छोड़ कनिया के जीवन से सफेद रंग उतर गया. लोग तरह-तरह की कहानियाँ बनाते …..कनिया घर की चाहरदिवारी में कैद बेखबर बेटी का लालन- पालन और सास -ससुर की सेवा करतीं……बचे हुए समय में धार्मिक किताबें पढ़तीं. पाँचवीं पास कनिया को पढ़ने में गहरी रुचि थी ….पूरे दलछपरा का एक मात्र परिवार था कनिया का जहाँ उस ज़माने में अखबार आता था. दिन बीतते रहे …..बेटी इण्टर पास कर गयी ……आगे की पढ़ाई के लिए बड़े देवर कलकते ले गये. कनिया उदास रहने लगीं तो ससुर चरखा ले आए. चरखा कातने का ऐसा धुन चढ़ा कनिया को कि महीने में चार-पाँच किलो सूत कात ड़ालतीं. पूरा घर खादीमय हो गया…..बदले में गाँधी आश्रम से चद्दर,साल ….साड़ी ….धोती, अगरबत्ती आदि आने लगा. घर में पहला आघात तब गिरा जब ससुर हार्ट-अटैक से चल बसे.लगाम ढ़ीली पड़ गयी. गर्मी का दिन होने के कारण औरतों को आँगन में खटिया ड़ाल सोने में दिक्कत होने लगी. भुनभुनाहट बढ़ी तो कलकतेवाली बलिया से पति संग जाकर छत भर की ज़ाजिम ले आईं. रात को छत पर बिछी और सबकी बैठकी जम गयी ……कनिया की खोई हँसी परिवार को खुश देख लौटी. नियम से जब तक परिवार रहता,रोज छत बुहार कर अन्धेरा घिरते बिछा देंती …..जाने के बाद सहेज कर खाद की बोरी में भर भण्डारे की छत से लटकती हुण्डी में लटका देतीं की मूस -मुसड़ी से बचा रहे.

ससुर के मरते दोनों छोटे देवरों का त्योहारों पर आना बढ़ती मंहगाई के गान के साथ बन्द हो गया. अब केवल गर्मियों में आने लगे या ब्याह आदि पड़ने पर. हाँ बड़े देवर ने घर आना जरुर बढ़ा दिया ताकि माँ को खले  बेटों का न आना. कनिया का मन त्योहारों में बुझा रहता …..सास छिप कर रो लेतीं तो कलकतेवाली ने मोर्चा सम्हाला. ननदों को बुला लेतीं .कथा-वरत रख लेतीं कि रज-गज बना रहे. चालीसा में कनिया दामादवाली बनीं …..घर में इस पीढ़ी की पहली शादी ,तीनों देवरों ने मिलकर खूब धूम -धाम से शादी की. दामाद भी कालेज के मास्टर निकले कनिया के ….गनीमत इतना था कि अपने ही जिले में थे वरना कनिया बेटी की दूरी सोच-सोच मर जाती. बड़े देवर ने घर की औरतों के बदलते मिज़ाज देख आगे भी सारी शादियाँ लड़के -लड़कियों की अपने गाँव के आस-पास खोज- पीट कर की कि बच्चे जड़ों से चाहे-अनचाहे जुड़े रहे. कनिया की सास ने जीवन की लम्बी पारी खेली …..नब्बे की उम्र में छड़ी ले दरवाजे पर डंटी रहतीं. आँगन में मालिकाना कनिया का चलता. एक मार्सल गाड़ी घर के रुतबे के अनुसार परमानेण्ट दरवाजे पर खड़ी रहती,एक चौकीदार और खेती के देख -भाल के लिए अच्छे वेतन पर नौकर रख बड़े देवर कुल मर्यादा को बचाए रखने की पुरजोर कोशिश करते रहे. चण्डीगढ़ वाली कांख में चद्दर जांते ..हाथ में बेना लिए छत पर आ पहुँची….पीछे दिल्लीवाली भी. चारों शान्त पड़ी कनिया का मर्मभेदी मौन रुदन जानती थीं. चण्डीगढ़वाली ने उठा कर बिठा दिया, यह तीसरे नम्बर पर थीं …..बुधिया चार कप में चाय छत पर पहुँचा गयी. देखते -देखते  बहुएं भी हाथ में चाय की कप लिए आ पहुँचीं.

ज़ाजिम ना जाने कब खुद ब खुद चार हिस्सों में बंट गया जैसे चौखण्ड घर के पाँच- पाँच कमरे बंटे …..कलकतेवाली  बायीं तरफ अपने परिवार संग ….दायीं तरफ चण्डीगढ़वाली ….पूरब में दिल्लीवाली और नीचे पश्चिम की ओर कनिया के हिस्से में ननदें, बेटी और बुधिया की माई बेटियों संग घुसड़ -पुसड़ कर सो लेतीं. दुवार पर पुरुषों की सभा बैठी थी ….रह -रह कर ठहाकों की आवाज छत से टकराकर लौट जाती. चण्डीगढ़वाली की दोनों बहुऐं पूरी तरह गव ई,पर शहर जाते गाँव के अनुभवों को ऐसे त्याग चुकी थीं जैसे लोग बुरे अनुभव त्यागते हैं. उनकी बड़ी बहू तो पूरी अंग्रेजन हो चुकी थी ….बात बे बात थैंक्यू -सॉरी कहना नहीं भूलती…आई लाईक दिस तो उसका तकिया कलाम था. देवरानी के चार साल के बेटे की बहती नाक देख बड़ी अदा से कहा…बिट्टू बेटा!वेरी बैड मैनर ….जाओ नोजी वॉश करके आओ. दिल्लीवाली ने अपनी बड़ी बहू से कहा …..विमला !जरा लालटेन जलाकर रख आओ आँगन में , बिजली कभी भी कट सकती है. इनके नखरे और भारी ……मम्मी जी ….मेरे हाथ में कालिख लग जाएगी …..आप तो जानती ही हैं मुझे धूल मिट्टी से कितनी एलर्जी है. दिल्लीवाली जल -भून गयीं….उनके छोटे बेटे के ब्याह में ही सबका बटोर था. इनवर्टर कनेक्श मर्दाने बखरी और बैठका में हर कमरे में था किन्तु जनानी घर में एक आँगन में और न ई बहू के कमरे में भर….आज न ई बहू का कोहबर था.रात के आठ बजते बिजली कटती थी …इस हफ्ते दिन में लाईट का शिफ्ट था ,सो दिल्लीवाली चिन्तीत थीं कि न ई नवेली बहू को कोई असुविधा न हो …..इन्वर्टर बाहर जम कर इस्तेमाल होने से कभी भी बोल सकता था.भनभनाते हुए उठीं……”माई-बाप जिनगी भर सिवाल मठिया में गू -गोबर काछते रहे और इ दिल्ले जाते धूल -माटी से बेराम होने लगीं. ” बहू के लिए यह अपमान असह्य था …..किन्तु सबको देख चुप रही …..पी लिया हलाहल. शादी उसकी शिक्षा और सुन्दरता पर हुई थी.पति उसके गाँव बारात में गये थे….देखते जिद करके बैठ गये…..जब ब्याह करुँगा उसी लड़की से करुँगा जो पसन्द है. सब हार गये ….माँ रो -धो कर यजमानिक बाभन की बेटी न चाहते जमींदरिहा बाभन घर में ले आई पर वक्त -बे वक्त ताने देने से बाज नहीं आती थी. आठ बजते बिजली कटी तो कनिया की सास ने दुवार फर हल्ला मचाना शुरु किया …..खाए क बेरा हो ग इल बबुआ लोग.मर्द खटिया छोड़ ,हाथ पैर धो अन्दर चले. कनिया और कलकतेवाली  नीचे उतर आईं….कुछ लड़कियाँ भी लेहाज में आ गयीं. मर्दों -बच्चों की पंगत आँगन में चारों तरफ टांट पट्टी बिछा कर बैठ गयी …..लड़कियाँ बुधिया के साथ खाना परोसने लगीं. मर्दों के बाद औरतों की बारी आई ,बुधिया से कनिया ने व्यंग्य के लहजे में कहा …….जो रे बुचिया …सबके अइगा दे आव. बुधिया कह आई. औरतों ….लड़कियों का झुण्ड आकर बैठ गया ……हँसी – ठिठोली के बीच औरतें खाती रहीं. कनिया को औरतों का बतिया-बतिया के खाना तनिको पसन्द नहीं था ……..हे ! तनी फटा-फट खाइए लोग…..मुँह चमका कर कलकतेवाली  से…..औरत का खाए ,मर्द का नहाए,कोई देखे कोई देखबे न करे. आज ज़माना का बस चले तो पूरी रात मज़लिस इहें चलें. कनिया के शब्द कान में पड़ते बहुऐं सिर झुका कर खानें लगीं. दस मिनट में पंगत उठ गयी तो बुधिया टांट पट्टी लपेट कनिया से पूछी …..ए ssइया !भितरी ध देईं न? कनिया के कान में उसके शब्द उबलते अदहन की तरह पड़े ….वह दहल गयीं …..मौन कण्ठ में शब्द अटक गये. सिर पर हाथ धर कर एक टक उसे देखने लगीं. सोचने लगीं…..उफ्फ! तो बिहाने से घर खाली होने लगेगा. …..कनिया ने आँचल से मुँह ढ़क लिया …..चण्डीगढ़वाली ने धीरे से कहा …..ध दे रे बुचिया …..भोरे से जनता भागेगी.

अचानक बल्ब बुझ गये…..चारों तरफ घुप्प अन्धेरा छितर गया .….पिछली शादी में कलकतेवाली  ने जनानी घर में अलग इन्वर्टर लगाने की मांग की ,पर देवरानियाँ मुकर गयीं. उनको गाँव में रुपया खपाना गोंईठा में घी सोखाने जैसा लगता था. यहाँ जो था सब साझे का….जानतीं थीं आज नहीं कल बटना ही है,इस लिए वह पतियों पर लगाम कसे थीं …..चण्डीगढ़वाली ने साफ -साफ पति से कह दिया था…..”बड़के भ ईया विश्वविद्यालय में मास्टर …बेटे साहब -सुब्बा,रुपये से कोठरी भरी है. हमारे मास्टरी में घर चलाना मुश्किल ….अभी एक बेटी भी ब्याहनी है….यदि एक रुपया लगाया घर पर ,मैं गाँव में लात नहीं डालूँगी.” पति जानता था पत्नी की वृत्ती ….इस लिए चुप लगा गये….एक चुप हजार चुप. गनीमत था कि लालटेन जल रहा था ……चारों दयादिनें अन्त में खानें बैठीं….कनिया ने थाली में एक रोटी छोड़ सब निकाल दिया ……गले से निवाला निगलना मुश्किल हुआ जा रहा था. इधर न ई बहूँऐं गाँव के नाम से बिदकने लगीं थीं ….परोजन बितते अटैची उठ जाता.जैसे कैद से छूटीं हों ,शहर भागतीं. ऊपर छत पर फिरसे हँसी ठिठोली शुरु हो चुका था ….लड़कियों के बीच नातेदारों के युवा लड़के भी गुड़ की चाहत में माटा की तरह खींचे चले आए थे. बुधिया की माई ऊपर की ठिठोली सुन हँस कर कही …..जहाँ बुढ़ियन क संग उहां खरची क तंग,जहाँ ल ईकन क संग उहाँ बाजे मिरदंग.चारों औरतें बेमन से मुस्कुराईं.कलकतेवाली  की बड़ी बहू हल्दीवाली की आवाज सबसे बुलन्द आ रही थी …….उनके कान में उसके व्यंग्य बोल ज़हर की तरह घुलने लगे…..आते वक्त सास -बहू में जल्दी लौटने पर तगड़ी बहस हुई थी ….तर्क कमजोर पड़ने पर उसने भी दुनिया का सबसे सस्ता और मारक अस्त्र उठाया ….पता नहीं कैसे माँ आप अपनी छाती पर सौत सहतीं हैं …..देखिए सम्हल के कहीं बुढ़ापे में पापा की आसक्ति बढ़ गयी तो कहीं की नहीं रहेंगीं……… छोटी दो कदम और आगे बढ़ी …..इससे अच्छा तो कनिया अम्मा ब्याह ही कर ली होंतीं….गुड़ खाऐं ,गुलगुलों से परहेज….और दोनों बहूँऐं देर तक हँसतीं रहीं थीं. ऊपर किसी बात पर वैसी ही समवेत हँसी गूंजी और कलकतेवाली  चिंहुक कर कनिया की तरफ देखने लगीं. देखा था कनिया का कठोर तप ….कभी देवरों के सामने सिर से आँचल नहीं सरका ….बराबरी में नहीं बैठीं ….नज़र तो गलती से भी नहीं उठी पर लोग ……लोग तो उड़ती चिर ई की गांड़ी हरदी पोतने में माहीर …..बात उड़ी तो उड़ी ….लोग दो में दस जोड़ते रहे.अब तो घर की बहूँऐं भी कहने लगीं थीं.

रात के बारह बजे हल्दीवाली देवर को दरवाजे से बुलाकर कोहबर में ले गयी. अन्दर लालटेन की मद्धिम रोशनी में न ई दुल्हन पियरी में सजी -धजी सिकुड़ कर सास की पलंग पर बैठी थी. कोने में एक छोटे से टेबल पर दो गिलासों में दूध ,कटोरियों में मेवे और मिठाई रखा था. हल्दीवाली ने झांपी में से निकाल तेज गुलाब की खुशबूवाला इत्र भी छिड़क दिया था. कमरे में घूसते लड़के का सिर गर्मी और इत्र की गन्ध से चकराने लगा….हल्दीवाली आकर छत पर लेट गयी.बुधिया की माई भी बेटियों को लेकर एक कोने में दुबक गयी. बार -बार बेटियों को टो लेती ….इधर इस घर के किशोर लड़कों को रात में प्यास ज्यादा लगने लगी थी.अक्सर रात को सीधे छत पर आकर सिराहने खड़े हो जाते थे.विधवा औरत जवान हो रही बेटियों की प्रहरी बनी रात भर जागती.धीरे -धीरे सन्नाटा हो गया …..झिंगुरों की झन-झन की आवाज के बीच रह-रह कर नीम पर टिटीहरी टिटियाती तो रात डरावनी हो उठती.इधर बहूँओं को बड़के बाबूजी रात को सफेद धोती में दिखने लगे थें..आए दिन कहानियाँ बनातीं. कनिया अभी भी देवरानियों संग भण्डारे में परजा -पसारी का लेन देन धर -निकाल रही थीं. भोरे दोनों छोटी देवरानियों का मयपरिवार टिकट था. रात के एक बजे वह चारों भी छत पर काम निबटा कर आगयीं. हल्दीवाली कान लगाए ……… नीचे अचानक खट से दरवाजे की कुण्डी गिरी और लड़का कोहबर छोड़कर दुवार पर चला गया.हल्दीवाली को दाव मिला “लगता है बबुआ जी को लड़की पसन्द नहीं”. अगली सुबह फुसफुसाहट होने लगी. लड़का कोहबर छोड़ कर भाग गया. हो गया अर्थ का अनर्थ. दिल्लीवाली के प्रान सूख गये,क्यों कि लड़की अबकी उनके पसन्द की थी….जब्कि हुआ यह था कि अत्यधिक गर्मी के कारण लड़का पत्नी को समझा-बुझा बाहर निकल गया था. पूरब में शुक्र ग्रह उग गया और कनिया की बेचैनी औरत की प्रसव वेदना सी बढ़ने लगी. बाहर भी हलचल बढ़ने लगी….दोनों छोटे देवर आँगन में आकर पत्नियों को आवाज दे बुला रहे थे……..बाहर गाड़ियों के हार्न सुन छत पर सोई बहूँऐं उठ बैठीं….बुधिया की माई भी झट नीचे भाग चाय चढ़ा सफर के खाने की तैयारी में जुट गयी. कनिया को छोड़ हर चेहरे पर राहत के भाव थे…..वह एक टक आसमान में उगे दूज के पतले चन्द्रमा को निहार रही थी…..उस दिन भी दूज थी ,जब वह छोड़ कर गया …..आज भी दूज. सुनापन उसकी नियति थी या लोगों द्वारा मिला अभिशाप ,वह कभी खुल कर सोच नहीं पाई….पर अब खलने लगा था.एक छुअन भर का साथ भी कितना सन्तोष दे जाता है उसने गंगा नहान से लौटते बड़के बबुआ के बगल में बैठ कर पहली बार महसूसा था और जम कर मन को धिक्कारा था कि सोचना भी महापाप है. पाप -पुण्य की गठरी में कैद विधवा औरत की जिन्दगी की पीढ़ादायक यात्रा उसके आँखों के सामने चलचित्र की तरह चलने लगे.

बहुएं बच्चों को गरम दूध पिला जबरन लैट्रीन में बिठा रही थीं..…कोई नहा रहा था ….कोई कपड़े समेट रहा था. उजाला फैला तो कनिया बेमन से उठ कर बैठ गयी. बाहर चाय का दौर चल रहा था. देवरों के ससुराल से गाड़ियाँ स्टेशन छोड़ने के लिए आ गयी थीं. देखते -देखते ननदों के लड़के-पति भी तैयार होने लगे. वह मौन बैठी थी….बगल में लेटी बेटी भी उठ कर बैठ गयी. माँ से कहते उठी …..आठ बजे तक तैयार हो जाना अम्मा…..ये आऐंगे. वह बेटी को सजल आँखों से देखती रही…..क्या सोच रही हो अम्मा!…..यहाँ किसी को तुमसे मतलब नहीं…..आँख का मोतियाबिन्द फूट गया तो एक आँख से आन्हर हो जाओगी. माँ के सिर पर हाथ रख स्नेह और अपार धैर्य को सहेज कर…..जीवन सबको दिया तुमने,बुढ़ापा मेरे ही हिस्से आएगा लाख जतन कर लो. खाली छत देख कर…..किसको सुध है यहाँ तुम्हारी? कनिया की आँख से ढ़र से दो बूंद लोर ढ़रका…..आँचल से पोंछने लगी. बेटी सीढ़ियाँ उतरते चेताती गयी ….समय से तैयार हो जाना. नीचे लगभग सभी तैयार हो चुके थे….सबकी आगे -पीछे ट्रेन थी. अटैंची निकलने लगी. बुधिया सबका खाना बाँध -बाँध कर कमरे में पहुँचा रही थी. कनिया रोज की तरह उठ कर जाज़िम तहाने लगीं. तहा कर बंडल बना सूत की रस्सी से बाँध सीढ़ियों से लुढ़का दिया…..जानती थीं आज रात से इसकी जरुरत नहीं थी. आगे -आगे बंड़ल लुढ़क रहा था पीछे -पीछे कनिया सीढ़ी पकड़ कर उतर रही थीं. जाज़िम धम से आँगन में जाकर गिरा ,कलकतेवाली  पोते को चौकी पर बैठ तैयार कर रही थीं….हल्दीवाली ने कनिया को देख कर मुस्कुराते हुए देवरानी से कहा…..अगली बार से ब्याह के दिन आना और अगले दिन जाना होगा मेरा तो नैना….वैसे भी शहर छोड़ पापाजी ये सब जिसके लिए करते हैं करते रहें ….अब ढ़ोना हमारे बस का नहीं.वह बोल कम रही थी मुँह चार कोने का दिवरानियों को दिखा ज्यादा चमका रही थी. अक्सर चुप रहने वाली इन मामलों में दिल्लीवाली से बहू का यह परिहास सहा नहीं गया. हद करती हो बहू……औरत हो कर औरत की व्यथा तुम समझ नहीं सकती. बोलने से पहले सौ बार सोचा करो जरा कि कह क्या रही हो. तुम्हारा पढ़ना -लिखना सब व्यर्थ है. बड़ी घटिया सोच है तुम्हारी…..वह क्रोध से हाँफ रही थी…..कनिया आवाक वहीं सीढ़ी पर बैठी कभी बहू को कभी देवरानी को देख रही थी. कनिया की बेटी ब्रश करना छोड़ माँ को पकड़ जोर -जोर से रोने लगी.बहुत दिनों से सुनती आ रही थी,आज फट पड़ी. कलकतेवाली  भी आज धैर्य खो चित्कार उठीं…..दुनिया के ताने अकेले आज तक सहती आई थीं. दरवाजे से बड़े देवर भागे आए.पीछे -पीछे भाई- भतिजे. बहूँऐं सहम गयीं. क्या हुआ?….रुदन के कोलाहल के बीच एक विराट मौन…..कुछ नहीं चाचा….बस ऐसे ही कह कनिया की बेटी चाचा को देख मुस्कुराकर आँसू पोंछने लगी. वह नम आँखें पोछते बाहर लौट गये. औरतें यहाँ शिव की तरह हलाहल कण्ठ में रोकने में सिद्धहस्त होती हैं…..सबने मौन हलाहल पी लिया कि परिवार में शान्ति बनी रहे.

सब एक -एक कर बुधिया की माई और उसकी बेटियों को नेग के रुपये दे निकलने लगीं. लड़के सामान पहले ही गाड़ियों में रख चुके थे. बुधिया दुपट्टे के कोर में रुपया गठियाते कनिया से पूछी….इया जज़िमिया त अब धराई न?. उन्होने सहमति में सिर हिलाया. बुधिया भण्डारे से बोरा लाकर बहन संग मिलकर जाज़िम बोरे में रख मुँह बाँध लेकर चली…..पीछे-पीछे कनिया. बुधिया बड़ी फरहर थी….झट बन्दरिया की तरह पटनी पर चढ़ हुण्ड़ी में रस्सी बाँध बहन से बँधवा कर ऊपर खीचने लगी. कनिया चौखट पर बैठ देख रही थीं…..अचानक बिट्टू पीछे से गला पकड़ झूल गया…..दादी हम नहीं दाऐंगे आपको छोड़कर……कनिया की लुप्त हँसी लौट आई. कलेजे से लगा दुलारने लगीं. बाहर बिट्टू की खोजाई मची थी…..पैर पटकते हल्दीवाली दनदनाते आई और एक थप्पड़ मार खींच कर ले जाने लगी…..साथ -साथ बड़बडाती भी जा रही थी……अभी घर का मुखिया कम था जो अगली पीढ़ी भी फांसने पर उतारु है ….. बुढ़िया…..कनिया एक साथ सैकड़ों ज़हर बुझे तीरों से बीध गयीं. बुधिया ने आवाज दी…..हो ग ईल इया. कनिया ने मुड़ ठर देखा…हुण्ड़ी में बोरे में बँधी जाज़िम ऐसे लटक रही थी जैसे किसी ने फाँसी लगा लिया हो. घबड़ा कर आँख बन्द कर लिया……बाहर गाड़ियों के घरघरा कर जाने की आवाज आ रही थी. आज कुछ ने जाते पैर छुए ,कुछ ने नहीं कनिया के. जिस सच पर कलकतेवाली  परदा डालती आ रही थी ,एक झटके में आज उठ गया था. कनिया आहत थी आत्मा के अन्तिम कोर तक, समझ रही थी कि अब और वह जाज़िम को नहीं सहेज पाएगी. जाज़िम अभी तक रौशनदान से आ रही हवा का झोंका पा झूल रहा था…..समय की करवट यही थी कि आज वह शायद आखिरी बार बँधा था. शायद ही फिर उतरे. चण्डीगढ़वाली जाते सुना गयीं थीं बेटी की शादी उधर ही तय है…शादी भी वहीं से होगी. गाँव आने-जाने में बहुत खर्च हो जाता है. घर खाली हो गया……कनिया चौखट पर आँचल से मुँह ढ़ांप कर बैठी रो रही थीं कि कलकतेवाली  बाहर से आँगन में आईं……स्नेह से हाथ पकड़ कनिया को दुवार पर लेकर चलीं…..अन्दर गहन सन्नाटा पसर चुका था. बरामदे में चौकी पर बूढ़ी सास और बड़े देवर बैठे थे. दोनों औरतें भी कुर्सी खींच बैठ गयीं. सूने घर के दरवाजे को पर मातमी सन्नाटा फैल चुका था.  …..अन्दर अब भी जाज़िम बेतहाशा झूल रहा था. सबके कानों में जाते हुए परिवार का पदचाप धप्प -धप्प सुनाई  पड़ रहा था जैसे छाती पर पैर रख कर युद्ध भूमि में शत्रु जातें हैं लहूलुहान लाशों को रौंद कर…..सब चले गये,जबकि सब अपने थे.

औरत के मुंह में पेशाब करने और उसकी वजाइना में सिगरेट बुझाने में कौन सा आनंद मिलता है?

यह अश्लीलता नहीं हिंसा है, वह भी क्रूरतम प्रकृति की 

पूजा सिंह 


कई भारतीय फेसबुक यूजर सोमवार सुबह उस समय हक्के-बक्के रह गये जब एक के बाद एक कई लोगों ने ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट अमेज़न  पर बेचे जा रहे एक प्रॉडक्ट की तस्वीर शेयर कर उसकी आलोचना करनी शुरू की. यह आलोचना सही भी थी. यह प्रॉडक्ट दरअसल एक एशट्रे थी जिसे एक महिला की शक्ल में ढाला गया था. महिला की उस आकृति की योनि (वजाइना) में सिगरेट बुझाने का इंतजाम किया गया था.

देखते ही देखते फेसबुक पर यह तस्वीर वायरल हो गयी. तमाम लोगों ने इसकी जमकर लानत-मलामत की. यहां यह सवाल उठ सकता है कि प्रोग्रेसिव तबका आर्ट पीस के नाम पर कई तरह की न्यूड और दूसरों की दृष्टि में वल्गर चीजों को स्वीकार करता रहा है तो फिर इस एशट्रे में ऐसा क्या है जो इसका चौतरफा विरोध हो रहा है. यह ऐशट्रे न्यूडिटी और वल्गारिटी से ज्यादा वायलेंट यानी हिंसक है, हालांकि भारी विरोध के बाद अमेज़न ने वह ऐशट्रे अपनी वेबसाईट से हटा दिया है.

कम से कम मुझे तो यही लगा. एक लड़की की वजाइना में सिगरेट बुझाने की कोशिश! कितनी जघन्य और क्रूर सोच होगी इसे डिजाइन करने वाले की. मुझे कह लेने दीजिये कि इसे डिजाइन करने वाले कलाकार (?) के मन में भी एक पोटेंशियल रेपिस्ट छिपा होगा. निर्भया कांड के उन दोषियों की तरह जिन्होंने उसके शरीर में लोहे की रॉड डाल दी थी.

और अब औरत के गुप्तांग में सिगरेट भी 

कॉलिन थांपसन  द्वारा डिजाईन किया गया ऐशट्रे

मैंने इंटरनेट पर इस कलाकार को तलाशने की कोशिश की. मुझे यह कलाकार तो नहीं मिला लेकिन ऐसी ही एक और एशट्रे जरूर मिली जिसे एक महिला कलाकार कॉलिन थांपसन  ने डिजाइन किया था. उस एशट्रे के बारे में सुप्रसिद्घ नारीवादी नॉबोनिसो गासा ने कहा था कि तमाम कलाकृतियों में महिलाओं को ऐसे ही बेबस चित्रित किया जाता है. उन्होंने कहा कि वजाइना को एशट्रे के रूप में दिखाना महिलाओं के साथ क्रूर हिंसा है. दुनिया में पहले ही महिलाओं पर इतने अत्यचार हो रहे हैं, अब उन पर ऐसी क्रूरता मत कीजिये.

सुप्रसिद्घ मनोचिकित्सक डॉ. एस टंडन कहते हैं कि यह विज्ञापन महिलाओं के बारे में नहीं बल्कि इन्हें बनाने और खरीदने वाले पुरुषों के मानस के बारे में ज्यादा बताता है. यह एक बीमार मानसिकता का प्रतीक है. इसे बनाने वाले के बारे मैं कुछ नहीं कह सकता क्योंकि कई बार ऐसे आर्ट तैयार करने वालों के मन में उसकी कोई पॉजिटिव व्याख्या होती है लेकिन प्रथमदृष्टया तो यह एक डेरोगटरी और वायलेंट प्रॉडक्ट लगता है और इसे बनाने और खरीदने वाले लोगों के आसपास जो भी महिलाएं हैं उनके हिंसा की शिकार होने की आशंका ज्यादा है.

अमेज़न ने अब इस  ऐशट्रे को हटा दिया है

ऐसा नहीं है कि आर्ट और आर्टिस्ट न्यूडिटी के लिए कभी आलोचना के शिकार नहीं हुए. एम एफ हुसैन को सरस्वती और सीता- हनुमान की पेंटिंग्स के लिए अपना देश छोडऩा पड़ा तो पाब्लो पिकासो को बार्सिलोना के ब्रॉथेल (वेश्यालय) के चित्रण के लिए तगड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा. लेकिन वहां मामला कला और उसकी समझ का है जबकि यहां मामला स्त्री जाति के अपमान से जुड़ा हुआ है. इस एशट्रे प्रकरण से मुझे जर्मनी के रोलिंग स्टोन म्यूजियम में प्रस्तुत एक यूरिनल की याद आती है जिसे एक औरत के मुंह का आकार दिया गया था. उस यूरिनल के बारे में स्थानीय नारीवादी रोडा आर्मब्रस्टर ने एक खास बात कही थी कि उस मुंहनुमा यूरिनल में होंठ और दांत तो हैं लेकिन जुबान नहीं है. यानी उसके पास प्रतिरोध की ताकत नहीं है उसे केवल पुरुष की गंदगी अपने अंदर समेटनी है.  उसे लेकर छिड़े विवाद पर म्यूजियम के फाउंडर यूनी स्कॉर्डर ने पूरी बेशर्मी से कहा था कि वह बहुत महंगी कृति है और वह जहां है वहीं रहेगी चाहे जितना विरोध हो.

बहुत खूब कंगना राणावत, सलमान खान कुछ सीखो 

यह सच है कि पुरुषों की शेविंग क्रीम से लेकर उनकी बनियान तक महिलाओं को हथियार बनाकर बेचे जा रहे हैं. उनका शरीर और उनकी सेक्सुएलिटी बीती एक सदी से विज्ञापनों के केंद्र में है अब कम से कम कलाकृति के नाम पर बने प्रॉडक्ट्स में उनके साथ यह क्रूरता तो मत कीजिये. भला वह कौन सा आनंद है जो एक पुरुष किसी स्त्री के मुंह में पेशाब करके या उसकी वजाइना में सिगरेट बुझाकर लेना चाहता है. मैं सचमुच जानना चाहती हूं.

पूजा सिंह पत्रकार हैं और अपने स्त्रीवादी तेवर तथा हस्तक्षेप करती रपटों के लिए जानी जाती हैं