बाहर और घर, दोनो मोर्चों पर जिसने स्त्रीवादी संघर्ष किया


राजनीतिलक 
स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत राष्ट्रीय दलित महिला आंदोलन की नेता, दलित लेखक संघ की संस्थापक सदस्य, सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय राजनीतिलक बाहर और घर के मोर्चे पर अपने स्त्रीवादी संघर्षों की कहानी खुद कह रही हैं. 

बचपन की उबड़-खाबड़ पगडंडी पर चलते हुए मै किशोर अवस्था पार कर गयी थी. घर में उस समय संसाधनो का आभाव था. हमारी माँ मानसिक रूप से बीमार थी पिताजी ने उनके ईलाज में कोई कसर तो नहीं छोड़ी थी फिर भी उनकी हालत दिन प्रति दिन गिरती ही जा रही थी. माँ के अस्वस्थ होने के कारण पूरे परिवार पर उसका दुष्प्रभाव हुआ. हमारे पिताजी भरी जवानी में पत्नी के सुख से विमुख हुए तो हम माँ की देख-रेख और प्यार से. उनके बीमार हो जाने से घर के काम का बोझ हम बच्चों पर ही पड़ा मै बहनों में बड़ी थी और मनोहर हम सबसे बड़ा. बेवक्त उसकी पढाई में बाधा आ गई, मेरी पढाई भी को भी मुशिलें आईं. घर के छोटे बहन भाइयों की देख-रेख, माँ की देख-रेख और छोटी उम्र में घर के काम के बढ़ते बोझ से मै खिन्न ही रहती थी. अपने बन-ठन कर रहने और खुद को संवारने के प्रति एकदम बेरुखी अपनाई हुई थी. मैंने अपने लिए किसी भी चीज के लिए कभी जिद्द नहीं की. बचपन से ही ख़ुशी नाम का भाव लुप्त सा हो गया था.


बड़े भाई एक वामपंथी छात्र संगठन में जुड़ गये थे. उनके दोस्तों में रमेश भोसले, हबीब अख्तर, आनंद कुमार, हरीश, अंजलि देशपांडे, तारा नेगी, तेजिंदर सिंह आहूजा, भारती, जलिस, रंगीला, रईश, अशोक पानीपत, अक्सर घर आने लगे थे. उनकी विचारधारा के अनुसार गरीबों और अमीरों में गहरी खायी थी, स्त्री-पुरुष के बीच असमानता थी. अमरीकी सम्राज्यवाद और देश के अर्ध-सामंतवाद के विरुद्ध उनका छात्र -संघर्ष देश में समता लाने के लिए, क्रांति के सपने संजोता हुआ, पढाई के साथ-साथ समाज में बदलाव हेतु अपने सीमित  अनुभवों के साथ, सीनियर साथियों के दिशा निर्देश पर चल रहा था. बड़े भाई की विचारधारा में  बदलाव से घर में भी उनके व्यवहार में बदलाव आ रहा था. उन्होंने मुझे प्रेरित किया और छोटा भाई अशोक भी प्रेरित हुआ. उसने स्कूल में छात्रों की यूनियन बनाई उसके साथ में उसके दोस्त राम गोपाल शर्मा, प्रवीन चौधरी भी थे. छोटे बहन-भाई अभी छोटे थे अतः वे हम पर निर्भर ही थे. मेरे से छोटी बहन पुष्पा भारती पढने में होशियार थी, परन्तु बचपन से जिद्दी थी. पिताजी उसकी सब मांगें पूरी कर देते थे. पुष्पा पिताजी की लाडली भी थी, अनिता अभी छोटी थी तो वो हमेशा मेरे साथ ही चिपक कर रहती थी. छोटे भाई दोनों बहुत शैतान थे, कहना कम ही मानते थे
हम तीन बहन भाई सामाजिक कामो में सक्रिय हो गये. पिताजी की इच्छा के विरुद्ध मैं भी अपने जीवन में कुछ बनना चाहती थी. पिताजी बहुत ही सीधे सादे इंसान थे. समाज के नियमो के अनुसार हर पारंपरिक बाप यही चाहता है कि उनके बच्चों की शादी वक्त पर हो जाए. शादी को ही जीवन की परिणति मान लिया जाता है. मेरे सामाजिक कामो में सक्रिय होने से मैं घर के बहार निकलने लगी, कभी पीएसओ की बैठको में, कभी रविदास जयंती के जुलूस में, तो कभी आंबेडकर भवन के कार्यक्रमों में. वहीं से से मेरे सम्पर्को का विस्तार होने लगा, मेरी मित्र मण्डली बढने लगी. यह मित्र मण्डली उन युवक युवतियों की थी, जो डा आंबेडकर के प्रभाव से समाज में कुछ बदलाव लाना चाहते थे. स्त्री-पुरुष असमानता की समझ मेरी बढ़ तो रही थी परन्तु मैं उस पर अपनी राय नहीं देती थी. एकबार जब मैं आई टी आई में हिंदी आशुलिपि का कोर्स कर रही थी तो एक ममता गोयल नाम की लड़की को उसके क्लास टीचर ने इसलिए क्लास से बहार कर दिया कि उसने जींस और कुरता पहना हुआ था, उनकी नजर में में उसे सलवार कमीज ही पहन कर आना चाहिए था. पहली बार मैंने इस भेदभाव के विरुद्ध एक दैनिक अख़बार में सम्पादक के नाम चिठ्ठी लिखी. उसके तुरत छप जाने के कारण मुझसे माफी मांगने को विवश किया जाने लगा उस पर मैंने कह दिया कि अब मै इस घटना की भी दूसरी चिट्ठी लिख दूंगी.

इन दिनों मैं बामसेफ की ओर आकर्षित हुई, चूँकि हमारी शुरुआत वामपंथी साथियों में हुई थी अतः हमारे विचार केवल आंबेडकरवादियों से थोड़े भिन्न थे. बामसेफ का दफ्तर करोलबाग में था. मैं सरकारी नौकरी के लिए रामजस रोड पर सरकारी कोचिंग ले रही थी वहीं जयपाल , आनन्द, सुशीला, सुनीता, सुजाता, द्रौपदी से मुलाकात हुई. इन साथियों के बीच रह कर मैंने आंबेडकरवाद और गौतम बुद्ध के जीवन और उनके कामो के बारे में जाना. दलितों पर होने वाले अत्याचारों, दमन, अपमानो की खबरों से अस्मिताबोध जागने लगा. पिताजी मेरी सक्रियता से बहुत चिंतित हो जाते मुझे तरह-तरह से समझाते कि मुझे घर में रहना चाहिए, घर में रह कर बहन-भाइयों की देखभाल करनी चाहिए, कि माँ की देखभाल करनी चाहिए, कि तुम्हारे इस तरह घूमने से तुम्हारी शादी नहीं हो पाएगी ... आदि. घर के काम में छोटी बहन पुष्पा हाथ बटाने  लगी, लेकिन शाम को पिताजी के आने पर मेरी शिकायत भी करती कि आज मैं कब बाहर गयी, कब बाहर से आई या कौन  लड़का या लड़की मुझसे मिलने आया.


एक बार की बात है हमारे वामपंथी साथियों में डॉ विमल मुझे मार्क्सवाद पढ़ाने घर पर आता था . एक ही बिस्तर में सब बहन भाई बैठे हुए होते थे और मुझे पूंजी क्या है, साम्राज्यवाद क्या है, सामंतवाद आदि-आदि पर समझाता रहता. परन्तु मेरा ध्यान उसकी ओर न हो कर पिताजी काम से लौटने वाले है की और ही होता. ये देख कर उनका गुस्सा सातवे आसमान में हो जाता. परन्तु मै उसे मना भी न कर पाती. मनोहर ने उससे कहा यार तुम रात को मत आया करो, इस समय मैं और पिताजी काम से लौटते हैं. परन्तु उस पर उसका असर नहीं हुआ. तब एक दिन तेजिंदर भाई ने उसको साफ कहा कि अब वो आना बंद करे, सब उल्टा होने लगा है. तब तजिंदर भाई ने मुझे सव्यसाची की सीरिज पढने की सलाह दी, मैंने वो सीरिज जो मुझे तेजिंदर भाई ने ला कर दी थी पढनी शुरू की. अपने अम्बेडकरवादी मित्रो को भी पढने के लिए देती.

मैंने आईटीआई कटिंग टेलरिंग में की, साथ में नान कालेजिएट से बी.ए पास की, नम्बर मात्र  39 प्रतिशत ही थे. मुझे नर्स बनने  का बहुत शौंक था, फिर एलएलबी करने की चाह हुई, किन्तु परिस्थितियां हमेशा पढाई के प्रतिकूल ही रही. एक बार टीचर ट्रेनिग का फार्म भरा, नम्बर आया, परन्तु फीस न भर पाने की वजह से वह अवसर भी छोड़ना पड़ा .जिन्दगी कठोर राहो पर बड़े बहन-भाई चलते हैं. वो कटीली राहों पर चले वे जरुर अपने लिए, परन्तु लहुलुहान वे ही हुए, पीछे आने वालो के लिए रास्ता साफ करते चले, बाद में उस राह पर चलने वालों को कैसे  पता होगा कि इस राह पर कांटे बिखरे पड़े थे, काँटों को कुचल कर निकलने पर ही रस्ते बनते है. संघर्षो का इतिहास घर से समाज और समाज से देशों की सीमाओं के पार की लड़ाइया अलग नहीं हैं , न ही दमन, दबाने और सताने के रंग अलग- अलग है. घर और समाज सत्ता का एक अभिन्न हिस्सा है. परिवारों के ढांचे, राजसत्ता को परिपूर्ण करने के माध्यम है, जाति-जेंडर,वर्ण-वर्ग  ढांचागत है.

सामाजिक कार्यो से जुडती गयी. अपनी अभिव्यक्ति कविताओं में करने लगी, फुटकर लघु कथाओं और छोटे-छोटे लेखो से, विचारो में आये बदलावों को अभिव्यक्त करने लगी. तब तक उत्तर भारत में दलित साहित्य की सुगबुगाहट भी नहीं हुई थी. निर्णायक भीम-कानपूर सम्पादक आर.कमल, बिहार से निकलने वाली यूथ पत्रिका में, नाम याद नहीं आ रहा, जिसमे मैंने “राजो “ एक लघु कहानी भेजी वह छप गयी. बाल्मीकि समुदाय की बेटियों को पुस्तैनी धंधे के कारण यौन उत्पीडन से गुजरते हुए घर की कुंठा, अपमान और पितृसत्ता के विकृत चरित्र को झेलना कैसे अनिवार्य हो जाता है इस कथावस्तु पर लिखी कहानी हमारे समाज में व्याप्त पितृसत्ता की झलक की गवाही दे रही थी.


स्त्रीमुक्ति के सवालो के साथ निरंतर जुड़ रही थी. महिलाओ के श्रम के मुद्दों पर यूनियनों की बेरुखी कहें या उन मुद्दों को वो (जाति की ही तरह ही) सेकेंडरी मानते हैं, की बहसों से भारत में स्त्रीवाद के स्वर गूंजने लगे. वामपंथ से बाहर निकल कर स्वायत स्त्री मुक्ति आन्दोलन ने स्त्रियों के सवालों और घरेलू जीवन में उनकी छुपी पहचान को उजागर करने शुरू किये. दहेज़ हत्या, बलात्कार, महंगाई,छेड़छाड़,लडकियों पर घरेलू पहरा, शाम ढलते ही सडकों पर लडकियों का घर से बाहर न निकलना-कैसे दमघोटू माहौल में हम जी रहे थे. मै अपनी मर्जी से शाम को भी घर से बाहर आना-जाना करती थी. हालांकि यह भी सत्य है कि शाम के वक्त राह चलती लडकियों को हर कोई छेड़ने के लिए तैयार दीख पड़ता. बसों में, पैदल चलते शोहदों के अभद्र इशारेबाजी, गंदे कमेंट्स सुनने पड़ते थे. बसों में लडकियों के पीछे किसी भी उम्र के मर्द चिपक कर खड़े हो जाते. आप कंही जा रहे हैं, किसी से रास्ता पूछ लिया तो वो खुद ही साथ साथ चलने लगता. शायद इस दमघोटू माहौल को बदलने की सख्त जरूरत के मद्देनजर खड़े हुए स्त्री मुक्ति आन्दोलन के विरुद्ध एक तरफ चर्चा हुई तो दूसरी तरफ उसका स्वागत भी हुआ. पहली बार दहेज़ पीडितों के समर्थन में महिलायें सड़क पर विरोध करने के लिए उतर आई. उत्पीड़िकों के घरों, मोहल्लो में जा कर उनके खिलाफ नारेबाजी, मुंह काला करने जैसे कृत्यों ने लडकियों और उनके माँ-बाप को हौसला दिया. ऐसे बहुत से प्रदर्शनों में मै स्वयं भी शामिल होती थी. मधु किश्वर की पत्रिका “मानुषी”, सहेली  संगठन ने स्त्रियों के श्रम को घर से बहार निकल कर समाज के धरातल पर ला कर खड़ा कर दिया. स्त्रीवादी विचारधारा शुरू हुई.

मैं अनेक आंदोलनों में भाग ले रही थी. बेलछी काण्ड , अरवल हत्या काण्ड , बिहार में दलितों के विरुद्ध होने वाले नरसंहारो पर देश की राजधानी दिल्ली में वामपंथियों, समाजवादियों और दलितों ने विरोध प्रदर्शन किये. सांझे फ्रंट में लीडिंग भूमिका और पहल, पीपल राईट आर्गनाइजेशन, संतोष राणा ग्रुप,  लोकायन, तथ्यात्मक रिपोर्ट लिखी . कौशल राणा जो उस समय लोकायन में काम करते थे, उन्होंने मनीषा के हवाले जनसत्ता में अरवल काण्ड पर पूरी रिपोर्ट छपवाई. हरियाणा में टिकरी खुर्द गाव में जाटों और दलितों के बीच रास्ते को ले कर सामूहिक संघर्ष हुआ , दलित बस्ती पर पत्थरों की बौछारें की गयी, हम लोग जब फैक्ट फाइंडिंग के लिए गये तब हमें लगा जैसे पत्थरों की दरी बिछी हुई है. इस  में प्रो. ओंकार यादव , अरविंदो घोष और हम मुक्ति से कुछ छात्र भी गये थे. दलितों के दमन की दास्तानें बहुत ही लम्बी है , हर दिन अखबारों में कही न कही मार पिटाई, कहीं उनके रास्तो को रोकने की खबरे, कहीं उनकी औरतो के साथ छेड़खानी की वारदातें, कहीं उनके मवेशियों पर प्रतिबंध, जैसी घटनायें आये दिन होती रहती थी. दिल्ली के पास के एक गांव कंझावला में जमीं के मुद्दे को ले कर दलित और जाटो में झगडा हुआ, जाटो ने दलितों की जमीन पर कब्ज़ा कर लिए उस पर भी बहुत लम्बा संघर्ष चला. वोटक्लब पर धरना और पब्लिक मीटिंग हुई, और सरकार को मांग पत्र भेजा गया. वर्ग संघर्ष पर यकीन करने वालों के जाति संघर्ष ने आँखे खोल दी, वे जाति दमन, उत्पीडन, दबाब को महसूस कर रहे थे. जाति-दमन के साथ- साथ पितृसत्ता के खिलाफ उठ कड़ी हुई महिलाओं ने स्त्रियों के सवालों पर आन्दोलन शुरू किये. आदिवासी युवती मथुरा का दो पुलिस जवानों द्वारा बलात्कार का मुद्दा हो या दहेज़ हत्या के खिलाफ या फिर शाहबानो के भरण-पोषण का केस, इन सब मुद्दों से समाज में लम्बी बहस ने हमारे जैसी युवतियों का मनोबल तो बढाया ही आत्मविश्वास भी बढ़ा.

महिला आन्दोलन अपने शैशव अवस्था पर था, परन्तु बहुत ही आक्रमक रूप में उभर रहा था. बेशक इस इस आन्सोलन ने जेंडर के सवालों ने हम लडकियों में उर्जा फूक दी. अपनी इस चेतना के साथ आगे बड़ते हुए मेरी अपने दोस्तों से लम्बी बहस होती, वे अक्सर कहते, माना कि लडकियों का दमन होता है परन्तु इसका मतलब ये तो नहीं कि तुम हम पर रौब मारो. राम भूल मोर्य, दिवाकर, मास्टर मक्करवाल वैसे तो कम्युनिस्ट थे लेकिन अगर हम उन्हें इतना ही कह दें कि पानी खुद पी लो और हमें भी पिला दो तो इसी बात पर बिना पानी पीये दो तीन घंटे बहस होती. आंदोलनों ने हमें वह नजरिया दिया, जिससे हम लोगो की कथनी और करनी को पहचानना सीखे, और हमने अपने आपको को एक व्यक्ति के रूप में पहचानना सीखा. स्त्री मुक्ति आन्दोलन में बहनापे को ले कर हम बहुत कन्फ्यूज हुए. सब बहुत विनम्रता से अंग्रेजी में बोलती, मीटिंग खत्म होते ही झट से निकल जाती. कल्पना मेहता पहली एसी नारीवादी नेता थी, जो हर उम्र, हर वर्ग की औरत के साथ बराबरी से बहनापा स्थापित करती, उनके व्यवहार से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला और मैंने अपनी नेता के साथ-साथ उन्हें अपनी बड़ी बहन भी  माना , स्त्रीमुक्ति से सम्बन्धित अपने संशयो को मैं उनके समक्ष ही रखती. इन आंदोलनो के आंच मे तप कर निकली हूँ तो तो ये समझ पाई हूँ की संघर्षो को बाहर से रोपा नहीं जा सकता.उन्हें उभारने के लिए अनुकूल वातावरण दे कर भीतर से वातावरण को चीर कर बाहर आने का मार्ग बनने देना चाहिए.


अपने घर के तनावों से तंग आ कर मै मुंबई सरकारी नौकरी में चली गयी. वंहा जा कर मास कम्युनिकेशन में दाखिला ले लिया, और साथ ही एल.एल.बी. में. नौकरी, पढाई और रविवार को सामाजिक कार्य समानांतर चलते रहे. दिल्ली में जैसे सहेली काम कर रही थी, वैसे मुम्बई में वीमेन फोरम काम कर रही थी. मैं उनकी बैठको में जाने लगी, दलित पैंथर के नेताओ से मिली, नामदेव ढसाल, अरुण काम्बले, भाई संघारे, अरुण गोहिल, गंगा बहन, मनोहर अंकुश और रामदास आठवले, बाद में  राजा ढाले से भी मिली. वहीं से मुझे दलित साहित्य की जानकारी हुई. मल्लिका की आत्मकथा “मला उध्वस्त व्हाईचे”  की मराठी आत्मकथा मल्लिकाजी ने दी मैंने दिल्ली आकर वह आत्मकथा कौशल्या बैसंत्री आंटी को दी, उन्होंने पढ़ कर विमल थोरात को दी, और वह किताब मुझ तक वापस नहीं आई. ढसाल के जीवन से मिलती-जुलती कहानी पर एक नाटक “कन्यादान” विजय तेंदुलकर जी ने मंच पर प्रस्तुत किया, मुझे वह नाटक देखने का भी अवसर प्राप्त हुआ. इस नाटक में स्त्री-पुरुष संबंध विशेषतः एक एक्टिविस्ट की जिन्दगी की कथनी और करनी के चित्रण को उभार कर लाया गया है. यह नाटक एक मूल्यबोध की ओर इशारा करता है.

मुंबई से मुझे जल्दी ही ट्रान्सफर मिल गया और मै दिल्ली वापस आ गयी. घर वापस आते ही घरेलू तनाव मेरे साथ प्रवेश कर गये. इन तनावों से मुक्ति पाने के लिए एक वामपंथी साथी से अरेंज शादी कर ली. यंहा से जिन्दगी ने एक नया मोड़ ले लिया. हम दोनों एक दूसरे को दो तीन साल से जानते थे. दो दोस्त-जो शादी से पहले एक समान थे, शादी के  बाद पति पत्नी के रूप में आते ही तराजू के दो पलडो की तरह एक ऊपर और दूसरा नीचे हो गया. घर के काम से लेकर नौकरी सब जिम्मेवारी तो पत्नी की होती है, वो भी एक ऐसी  लड़की की, जिसके घर में गैस नहीं थी, जिसका घर मिडिल क्लास जैसा नहीं था,जहां  गरीबी ने अपने पांव पसारे हुए थे, जिसके पिता को अस्थमा था, माँ मानसिक बीमार थी. इस नए घर में दो कमरों का फ्लैट, किचन, बाथरूम, टायलेट सब था वह स्वयं आयल कम्पनी में स्टेनो था, वामपंथी राजनीति के हिसाब से कंपनी में वर्कर यूनियन का लीडर था. वह बात अलग थी कि कामरेड ज्यादातर बीच-बीच में बिना वेतन के हो जाते, अब घर में कमाने वाली बीबी और घर के काम के लिए नौकरानी भी आराम से सुलभ जो हो गयी थी. कामरेड अपनी बुद्धिमता पर इतने ज्यादा आत्मविश्वासी थे कि दूसरे सब उनके सामने मूर्ख  ही थे. इस व्यवहार के कारण माँ-बाप तो पहले से ही नाराज थे, छोटे बहन-भाई भी नाराज थे. मेरा उनके साथ सम्बन्ध सामान्य था, मैं उनके समर्थन में कुछ कहती तो उन्हें मेरे विरुद्ध भड़काया जाता कि मै स्त्रीवादी हूँ, भ्रष्ट व लम्पट औरतों में रहती हूँ और वे औरतें शराब पीती हैं, एक से ज्यादा पुरुषो से सेक्स करती हैं.

ये कैसा मार्क्सवाद था ? जिसकी समझ एक आम आदमी की तरह थी. आम आदमी कम से कम अपनी पत्नी को माँ- बाप, बहन-भाइयो के साथ मिल-जुल कर रहते देख खुश तो होता है. मार्क्स और लेनिन की विचारधारा माना  वर्ग संघर्षो की बात करती थी, इसका तात्पर्य ये तो नहीं कि घर की चार दीवारी के श्रम को श्रम न माना जाये. ये महाशय परंपरा विरोधी थे, परन्तु घरेलू श्रम भी सामाजिक परम्परा का ही हिस्सा है. समाज में जातीय उत्पीडन और लैंगिक उत्पीडन का खात्मा क्रांति से ही होगा, तब तक चुप चाप जातीय हिंसा सहो और स्त्रियां घरेलू चक्की में पिसती रहें, पति के नियंत्रण में रहें और लैंगिक उत्पीडन सहती रहें. मेरी इस बात पर कभी उससे सहमति नहीं बनी. क्योंकि शोषण, शोषण है- चाहे वो घर में हो या फैक्ट्री में, घरेलू श्रम को लेकर मार्क्सवादी और स्त्रीवादियो में अलग मत थे, मार्क्सवादी पति के आरोप के अनुसार, स्वायत्त स्त्रीवादी आन्दोलन पश्चिम की तर्ज पर इलिट महिलाओ के नेतृत्व में चल रहा है, वे अंग्रेजी कल्चर, बाजारवाद और मर्दों को छोटा करने के सब हथियारों को इस्तमाल करती है. ये बात सही थी कि ज्यादातर औरतें बेहद पढ़ी-लिखी थी, वे पश्चिमी की आज़ादी से प्रभावित भी थीं- उनका रहना सहना और अपने जीवन के फैसलों पर किसी पर निर्भर न हो, वे अपने आप अपने फैसले लेती थीं तो क्या गलत था? इस देश में औरत को पांव की जूती  समझने के कल्चर में जरुर यह एक सांस्कृतिक सदमा  था. यह एक शुरुआत थी और इस शुरुआत ने सभ्य समाज के समक्ष, पुलिस प्रशासन, मिडिया, कोर्ट-कचहरी में स्त्री पक्ष के पक्ष में अपनी बात रखनी शुरू की. अपने ही घर में मैं  न केवल विचारो की कैदी महसूस करने लगी बल्कि मानसिक और शारीरिक बंदिशे भी महसूस करने लगी-इस साथी के साथ, जो मुझे हमेशा कहता था कि साथ रहने आओ, दोनों मिल कर क्रांति के काम में लगेंगे. तब मुझे नहीं पता था कि क्रांति का मतलब किसी एक्टिविस्ट का रोल क्रन्तिकारी पति के लिए जरुरत की चीजें उपलब्ध करना और उसके लिए हमेशा तत्पर रहना था.


राजस्थान में छोटी उम्र की युवती रूप कंवर को सती किया गया. पूरे देश में महिलाओ और प्रगतिशील लोगो ने उसके विरोध में प्रदर्शन किये. अपनी इच्छा के विरुद्ध मैं उसमे नहीं जा पायी, अपने पिता के घर में जो संघर्ष करके मैंने आज़ादी पायी थी, वोह आज़ादी मैंने करांतिकारी पति के घर में आ कर गवा दी, मै फिर से बैक फुट पर पहुँच गयी. शादी मेरे लिए घर की चाहरदिवारी बन गयी उस चाहरदिवारी में कोई सुख नहीं था- न तन का, न मन का, न धन का. अगर कुछ था तो वह थी गहरी उदासी, निराशा, खुद को परतंत्र करने का अपराधबोध और आज़ादी सुख शांति की चाह ने मेरी खुद्दारी को और कुचल दिया. मेरी कवितायें  निराशा और कुंठा अभिव्यक्त करती, मेरी डायरी जिन्दगी से शिकायत करती प्रतीत होती. मैंने आत्मघाती निर्णय ले लिया था-मै कोई साहित्य नहीं पढूंगी, न लिखूंगी. दलित साहित्य की हवा चल रही थी, मैंने उससे खुद को दूर ही रखा. पति महोदय मार्क्सवादी विचारधारा की  पत्रिका “आंच” अपने पिता के नाम पर निकलते थे, मुझे विवश करके अम्बेडकरवादी सर्कल में बेचने भेजते. मै स्वयं उनके विचारों से सहमत नहीं थी, हमारे बीच विचारो के साथ-साथ कल्चर को ले कर भी भारी मतभेद थे. लड़ते-झगड़ते एक बेटी ने जन्म ले लिया था, मैंने अपना सारा ध्यान उधर ही समेट लिया. नौकरी, बेटी को क्रेच से लाना, घर का काम और बेटी का लालन-पालन. बेटी  होने के बाद मतभेदों मेंऔर बढोतरी हो गयी थी. अब उसकी परवरिश पर मुझे नियन्त्रित किया जाता. तुम्हारी जैसी नहीं बनाना है इसे.. आदि आदि.  इस आदि का कोई अंत नहीं था. सुबह शाम, रात-दिन करके शादी के सात वर्ष मेरे लिए मेरे मित्रों और रिश्तेदारों से अलगावों के वर्ष थे. जिनसे न मै मिल सकती थी न अपने मन मुताबिक जी सकती थी.

समाज सेवा– राजनैतिक गतिविधियों से मुंह फेर कर जीना, उन मुद्दों पर बात किये बिना एक जागरूक कार्यकर्ता के लिए लम्बी अँधेरी रात है, जिसका सूरज कब निकलेगा बस यही सोचते-सोचते पूरी अँधेरी रात में आँखे गड़ाये देखते रहना भी एक सजा से कम नहीं.

संक्षिप्त परिचय:
जन्म: 27 मई 1958
दलित स्त्रीवादी –चिन्तक, दलित लेखक संघ की संस्थापक सदस्य, राष्ट्रीय महिला आयोग में दो बार दलित स्त्री विषयक विशेषज्ञ के रूप आमंत्रित. आयोग द्वारा आउट स्टैंडिंग वीमेन अचीवर अवार्ड  से सम्मानित. तीस वर्षो से स्त्रीमुक्ति आन्दोलन में दलित महिलओं के सवाल और दलित आन्दोलन में जेंडर के सवालों को समावेश हेतु सक्रिय.
सम्पादन: भारत की पहली शिक्षिका– सावित्रीबाई फुले, समकालीन भारतीय दलित महिला लेखनखंड 1 -2, “गोलपीठा” (नामदेव ढसाल की कविताएँ) मराठी से अनुदित हिंदी मे,    आरपीआई की एकमात्र महिला नेता शांता बाई दाणी की आत्मकथा “धूप छांव”, शांता कृष्णाजी काम्बले की आत्मकथा “मेरे जीवन की की चित्रकथा- नाजा” प्रेमचंद की सम्पूर्ण स्त्री परक कहानियां,
मुक्तिकमी नायिकाए, डॉ आंबेडकर और महिलाए, बुद्ध ने घर क्यों छोड़ा, दलित विमर्श और पत्रकारिता, अपनी जमीं अपना आसमान (आत्मकथा खंड -1 ),कविता संग्रह : पदचाप एवं  हवा सी बेचैन युवतियाँ

स्त्रीकाल का संचालन 'द मार्जिनलाइज्ड' , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

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