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प्रेम, विवाह और स्त्री

रेणु चौधरी

जे.एन.यु.में शोधरत है
renu.jnu14@gmail.com

‘प्रेम व्यक्ति के भीतर एक सक्रिय शक्ति का नाम है। यह वह शक्ति है जो व्यक्ति और दुनिया के बीच की दीवारों को तोड़ डालती है। उसे दूसरों से जोड़ देती है। प्रेम उसके अकेलेपन और विलगाव की भावना को दूर कर देता है, पर इसके बावजूद उसकी वैयक्तिकता बची रहती है। प्रेम एक ऐसी क्रिया है जिसमें दो व्यक्ति एक होकर भी दो बने रहते हैं।’’1 एरिक फ्राँम के इन पंक्तियों से यह स्पष्ट होता है कि प्रेम जहाँ मनुष्य को विश्व से जोड़ता है वहीं दूसरी तरफ प्रेम मनुष्य की वैयक्तिकता को भी बचाए रखता है। प्रेम शब्द ही अपने आप में एक जादू की तरह है। एक जादुई अहसास के साथ व्यक्ति इसमें डूब जाता है चाहे वह पुरुष हो या स्त्री। लेकिन यह जादू जल्द ही यथार्थ के धरातल पर आ जाता है और तब हमें पता चलता है कि स्त्री और पुरुष के प्रेम में अंतर होता है। स्त्री जब किसी से प्रेम करती है तो वह अपना सर्वस्व अर्पण करती है। अर्थात अपने अस्तित्व को दाँव पर लगा कर अपने प्रेम को पाना चाहती है। वह ‘मैं’ से ‘हम’ की तरफ बढ़ती है। लेकिन जब एक पुरुष प्रेम करता है तो वो सिर्फ लेना चाहता है। सिर्फ पाना चाहता है। देना उसके यहाँ नहीं है। वह स्त्री के अस्तित्व तक का हरण कर लेता है। वास्तव में इस सामाजिक ढाँचे में स्त्री और पुरुषों को बनाने वाली मानसिकता ही इस ढंग से उन्हें तैयार करती है कि वे इसी तरह से सोचने लगते हैं।

 प्रेम का शाब्दिक अर्थ तो एक ही है लेकिन स्त्री और पुरुष के लिए उसकी अर्थ छवियाँ अन्य-अन्य हैं। सीमोन द बोउवार ने सही लिखा है ‘‘स्त्री और पुरुष के लिए ‘‘प्रेम’’ शब्द का अर्थ अलग-अलग होता है। प्रेम से स्त्री क्या समझती है? स्पष्ट हीयह केवल अनुराग न होकर शरीर और आत्मा का ऐसा वरदान है जो न तो बंधन मानता है, न किसी की परवाह करता है। चूँकि स्त्री का प्यार शर्तहीन होता है- इसलिए उसके लिए यह एक विश्वास है। स्त्री केवल एक को ही अपनाती है। पुरुष यदि किसी से प्यार करता है तो प्रतिदान में वह उससे भी प्रेम पाना चाहता है।’’2अर्थात जहाँ स्त्रियों का प्रेम शर्तहीन होता है, वही पुरुषों का प्रेम प्रतिदान पाने के लिए लालायित होता है। स्त्रियों और पुरुषों के मानसिक बनावट और बुनावट में अंतर होता है। बचपन से ही लड़कियों को त्याग करना, शोषण को हंसते हुए सहना और लड़की होने की नियति को बिना किसी प्रतिरोध के चुपचाप झेलते रहना सिखाया जाता है। इसका यही कारण है कि पुरुष वर्ग आक्रामक होता है और आक्रामकता को अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझता है। वह प्रेम में भी आक्रामकता को पसंद करता है। स्त्रियों को आक्रामक प्रेमी को पसंद करना सिखाया जाता है। उन्हें बचपन से ही हारना और प्रेमी अर्थात् पुरुष को जितना सिखाया जाता है। वास्तव में पुरुष ने सुंदर स्त्रियों को बहुमूल्य संपत्ति में तब्दील कर दिया और हारने का नाटक करके, उस पर वे विजय पाते रहे, उन्हें अपनी संपत्ति में तब्दील करते रहे।


 स्त्रियों और पुरूषों का अपने बारे में एवं प्रेम के बारे में बहुत ही अलग-अलग राय होती है। वास्तव में उनके अंदर बचपन से ही एक मालिक और एक गुलाम की विचारधारा भरी जाती है। एक अपने को  शिकार में परिणत कर लेता है और दूसरा अपने को शिकारी में। इससे भी आगे बढ़कर कहे तो एक अपने को उच्च जीव के रूप में देखने लगता है तो दूसरा अपने को निकृष्ठ जीव में। शायद इसलिए ‘‘मनुष्यता के प्रति अपना दावा न त्यागने वाली स्त्री भी उच्च अस्तित्व के साथ मिल जाना चाहती है। उसके पास उपनी आत्मा और देह पुरुष को सौंप देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रहता। पुरुष मुख्य होता है। वह सर्वोत्तम का प्रतिनिधित्व करता है। चूँकि स्त्री के भाग्य में आश्रित होकर रहना लिखा है इसलिए वह किसी अत्याचारी, माता-पिता और संरक्षक की आज्ञा शिरोधार्य करने की अपेक्षा एक देव की सेवा करना अधिक पसंद करती है। वह दासत्व स्वीकार करने के लिए इस प्रकार बेचैन हो जाती है मानो वह उसकी स्वतंत्रता को व्यक्त करता है। वह अपनी गौण अवस्था को स्वीकार करने के बावजूद उससे ऊपर उठने की चेष्टा करती है। अपने शरीर, भावनाओं और व्यवहार द्वारा वह अपने प्रेमी को महान् हस्ती के रूप में सिंहासनासीन करती है। उसके सम्मुख वह अपना अस्तित्व मिटा देती है। प्रेम उसके लिए धर्म का रूप ले लेता है।’’3 वैश्विक परिदृश्य के साथ-साथ भारतीय परिदृश्य में भी यह बात ध्यान देने योग्य है। आज भी भारत में प्रेमिकाएँ या स्त्रियाँ अपना सर्वस्व अर्पण करके अपने प्रेमी को संतुष्ट करना चाहती है। वे अपने प्रेमी के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाती हैं।

आज मनुष्य के बदलते जीवन मूल्यों व बदलते सामाजिक परिवेश ने प्रेम के स्वरूप को बदल दिया है। आज व्यक्ति बहुत ही ज्यादा महत्वाकांक्षी होता जा रहा है। वह सब कुछ पलक झपकते ही पा लेना चाहता है जिसके कारण आज प्रेम का स्वरूप प्रभावित हो रहा है। आज का प्रेम अशरीरी नहीं रह गया है बल्कि साहचर्यजनित है और बदलते समय के साथ बदल भी जाता है। अब प्रेम की शाश्वत भावना नहीं रही बल्कि मनुष्य एक प्रेम के टूटने के साथ ही दूसरे प्रेम से जुड़ जाता है। कई बार तो ऐसा होता है कि प्रेम सिर्फ मनुष्य के जीवन के खालीपन को दूर करने या ऊब मिटाने का एक साधन बन जाता है। आज प्रेम की परिभाषा ही बदल चुकी है। एक समय होता था जहाँ प्रेम की परिभाषा अपने को समर्पित कर देने में होती थी। जहाँ प्रेम की शुरुआत ही आँखों से होकर दिल में उतरती थी जहाँ शरीर के बदले आत्मा को प्यार किया जाता था, लेकिन आज का प्रेम शारीरिक रूप से ही शुरु होता है। एक तरह से हम देख सकते हैं कि 21वीं सदी में इसकी परिभाषा ही मनुष्य ने बदल डाली है। भारतीय समाज में आज स्त्री-पुरुष के संबंध बहुत ही तेजी से बदल रहे हैं, यह बदलाव सिर्फ महानगरों में ही नहीं हुआ बल्कि शहरों और कस्बों में भी दिखाई पड़ रहा है। आज मनुष्य के पास पाप-पुण्य नाम की कोई चीज नहीं है, बल्कि आज के समय में पाप-पुण्य की अवधारणा की परिभाषा ही बदल चुकी है। जो एक के लिए पाप है, वह दूसरे के लिए पुण्य है।


वास्तव में मनुष्य इतना तार्किक हो गया है कि वह तर्क द्वारा किसी भी वस्तु या भावना को सही गलत ठहरा सकता है। वह प्रेम और ऊब को एक ही सिक्के के दो पहलू सिद्ध कर सकता है। जैसे चित्रलेखा में भगवतीचरण वर्मा पाप और पुण्य को अपने ‘अनुभव के सागर में उतरने के बाद’ भी ठीक-ठीक परिभाषित नहीं कर पाते हैं, क्योंकि वे जानते हैं ‘‘मनुष्य में ममत्व प्रधान है। प्रत्येक मनुष्य सुख चाहता है। केवल व्यक्तियों के सुख के केन्द्र भिन्न होते हैं। कुछ सुख को व्यभिचार में देखते हैं, कुछ त्याग में देखते हैं-पर सुख प्रत्येक व्यक्ति चाहता है, कोई भी व्यक्ति संसार में अपनी इच्छानुसार वह काम न करेगा, जिसमें दुख मिले-यही मनुष्य की मनःप्रवृत्ति है और यही उसके दृष्टिकोण की विषमता है।’’4

प्रेम के स्टीरियोटाइप से मुक्ति ही प्रेम है


आज एकनिष्ठ प्रेम और शारीरिक पवित्रता के प्रश्न नकली सिद्ध हो रहे हैं। आज के समय में हमारे आस-पास के समाज में स्त्री-पुरुष संबंधों में दो चरम- स्थिति देखने को मिल रही है। आज भी ऐसी लड़कियों की कमी नहीं है जो अच्छा पति पाने के लिए गौरी-पूजन करती हैं और सोमवार का व्रत रखती हैं। इसी समाज में आज कुछ ऐसे भी लोग हैं जो प्रेम के लिए शादी को अनिवार्य शर्त नहीं मानते हुए साथ रह रहे हैं। आज इस तरह के रिश्तों को ‘लिव-इन-रिलेशनशिप’ कहा जा रहा है। सुधा अरोड़ा लिव-इन-रिलेशनशिप  के बारे में कहती हैं ‘‘लिव-इन-रिलेशनशिप एक बेहद संश्लिष्ट और जटिल स्वतंत्रता है। एक तरह से यह विवाह की प्रतिबद्धता, सन्नद्धता और दायित्वबोध का विलोम है। आज की पीढ़ी ने विवाह को स्त्री के लिए बंधन और गुलामी का दर्जा दिया, इसलिए बंधन से आजाद रहने के ख्याल से लिव-इन-रिलेशनशिप का चुनाव किया गया जहाँ वह एक साथी के साथ एक ही छत के नीचे रहते हुए भी अपने को बंधन मुक्त समझे लेकिन क्या ऐसा हो पाता है? साथ रहना शुरु करते ही पुरुष शासन और नियंत्रण करने वाले पति के रोल में आ जाता है। लड़कियाँ यहाँ भी भावनात्मक रूप से जुड़ाव महसूस करती है और संबंध टूटने पर अवसाद और निराशा के गर्त में चली जाती हैं।’’5


 सुधा जी की बातों से यह स्पष्ट होता है कि स्त्री चाहे किसी भी रिश्ते में रहे, हर जगह वे ही मानसिक और शारीरिक शोषण का शिकार होती हैं। वह रिश्ता चाहे पति-पत्नी का हो या लिव-इन-रिलेशनशिप का, वह कही भी खुश नहीं है या यू कहें कही भी मुक्त नहीं है, क्योंकि इस पितृसत्तात्मक समाज में सदियों से स्त्री गुलामी में जकड़ी रही है। इस पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष की मानसिकता इतनी जल्दी समाप्त नहीं होगी।



वर्तमान समय में मनुष्य अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त रहना चाह रहा है इसलिए आज इस तरह के रिश्ते पनप रहे हैं। वास्व में जीवन में व्यक्ति इतना महत्वकांक्षी हो गया है कि महत्वकांक्षाओं की पूर्ति में ही उसका सारा समय निकला चला जा रहा है। महत्वकांक्षाओं के पीछे पड़कर प्रेम- संबंध, पारिवारिक-रिश्तों व अपनी जिम्मेदारियों से वह अपना पीछा छुड़ाना चाहता है, बल्कि यूँ कहें कि छुड़ाता भी है। जीवन में पैसा, रुतबा, गाड़ी और बाड़ी(घर-बंगला) ही उसके लिए सर्वोपरि हो गये हैं। इसलिए जब तक ये चीजें उसके पास नहीं रहतीं, वह इन्हें पाने के लिए तेज गति से भागता रहता है। इनके आने के बाद, उसे एक सुंदर सी पत्नी चाहिए, क्योंकि पत्नी को भी वह एक संपति के रूप में चित्रित करने लगता है। इसलिए प्रेम के स्वरूप में परिवर्तन हो रहा है। परिवर्तन समाज का नियम है। आज समाज में इतना परिवर्तन आ गया है कि इस तरह की घटनाएँ चाहे वह ‘लिव-इन-रिलेशनशिप’ हो या कैरियर के लिए शादी या प्रेम का टालेजाना लगातार मनुष्य के लिए आम बात हो गया है।

तुम मेरे साथ रहो मेंरे कातिल मेरे दिलदार

आज भूमंडलीकरण का दौर चल रहा है। इस भूमंडलीकरण ने पूरे देश, समाज को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। आज मनुष्य वही सोचने के लिए बाध्य है, जो बाजार उसे दिखाता है। इस भूमंडलीकरण ने सभी रिश्तों को प्रभावित किया है फिर यह रिश्ता चाहे प्रेम का हो पति-पत्नी का हो या कोई और। सभी रिश्तों में आज बिखराव की स्थिति आ गई है। गीता श्री लिखती हैं ‘‘प्रेम का स्वरूप शाश्वत है लेकिन उसकी मौजूदगी नश्वर। इस समय में कमजोर भूमियों पर खड़ा प्रेम सवालों के घेरे में है। हैरानी होती है कि कैसे इतनी जल्दी-जल्दी वह आता जाता है। कितना गतिमान है। प्रेम की शिफ्टिंग भी चौंकाने वाली होती है। आज यहाँ कल वहाँ…आज इनसे तो कल उनसे…। किसी की चौखट पर माथा रगड़ता है तो किसी के दर पर थूक आता है। कोई आहत मन अपने उजाड़ में बिलबिलाता है तो प्रेम कहीं अट्टाहास करता है। किसी शाख पर कामना का फूल खिलता है तो किसी को गहरे दलदल में धंसने के लिए छोड़ जाता है। कितना अविश्वसनीय हो चला है प्रेम।’’6 इससे स्पष्ट होता है कि आज प्रेम की परिभाषा के साथ ही साथ रिश्ते भी बदल गये। स्त्री-पुरुष संबंध एक परिवार से जुड़ा होता है, आज यहाँ भी भूमण्डलीकरण ने अपना घर कर लिया है।


संयुक्त परिवार की अवधारणा आज खंडित हो रही है। संयुक्त परिवार के टूटने की तरफ इशारा मुक्तिबोध ने 1960 के आस-पास ही अपने ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में कर दिया था एक समाज वैज्ञानिक की तरह। जबकि दुनिया जानती है कि मुक्तिबोध कवि हैं। वे समाज, परिवार और रिश्तों के बिखराव की तरफ स्पष्टता से इशारा करते हैं। वे कहते हैं ‘‘समाज में वर्ग है, श्रेणियाँ हैं। श्रेणियों में परिवार हैं। समाज की एक बुनियादी इकाई परिवार भी है। समाज की अच्छाई-बुराई परिवार के माध्यम से व्यक्त होती है। मनुष्य के चरित्र का विकास परिवार में होता है। बच्चे पलते हैं, उन्हें सांस्कृतिक शिक्षा मिलती है। वे अपनी सारी अच्छाइयाँ-बुराइयाँ वहाँ से लेते हैं।’’7अब वहाँ भूमंडलीकरण ने अच्छाइयों के लिए कम से कम जगह बचा के रखी है। इसलिए बुराइयाँ ही अधिक तेजी से फैल रही हैं।


यही कारण है कि आज लोगों में एकान्त की भावना आ गई है। आज स्त्री भी अपने अच्छे-बुरे के बारे में सोच रही है जिसके कारण आज रिश्ते और ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं, आज की स्थिति वह नहीं रही कि स्त्री अपने पति या प्रेमी की प्रताड़ना सिर्फ सहती रहे और उसका विरोध न करे, बल्कि वह आज अपने हक को समझती है, और गलत का विरोध करती है। वास्तव में प्रतिरोध की भावना स्वंतत्रता की भावना मं  सन्निहित होती है। यदि आप अपनी स्वतंत्रता के प्रति आग्रहशील हैं तो कहीं न कहीं आप दूसरों के प्रतिरोध में खड़े हैं। आज की स्त्रियों के साथ कुछ-कुछ ऐसा ही हो रहा है।

स्त्री के प्रेम की अभिव्यक्ति – ‘अन्या से अनन्या’

वर्तमान समय में स्त्री न केवल शिक्षित हुई है बल्कि आर्थिक रूप में स्वावलंबी भी बनी है। स्त्रियों को स्वालंबी बनाने में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। शिक्षा से स्त्रियाँ अपने अधिकारों के प्रति ज्यादा सचेत हुई हैं। वर्जिनियाँ बुल्फ ने अपनी पुस्तक ‘अपनारा कमरा’ में स्पष्टतः लिखा है कि ‘‘जब तक स्त्रियों के पास अपना कमरा न होगा तब तक स्त्रियाँ स्वतंत्र नहीं हो सकती और यह कमरा आता है अर्थ से और अर्थ आता है शिक्षा के माध्यम से।’’8 जब स्त्रियाँ शिक्षित हो जाती है तो उनके रहन-सहन एवं आचार-विचार में आमूल-चूल परिवर्तन आ जाता है। आज स्त्री पुरुष के समान अधिकार की मांग करती है। यह शिक्षा का कमाल है। मांग चाहे आर्थिक स्वतंत्रता की हो या प्रेम और विवाह से संबंधित हो। इन सभी को वह आज प्रश्नात्मकता की दृष्टि से देखने के साथ-साथ तर्क की कसौटी पर कसने लगी है।



आज सिर्फ पुरुष ही नहीं, बल्कि स्त्रियाँ भी प्रेम एवं विवाह संबंधी नैतिक प्रतिमानों का उल्लंघन करती नजर आ रही हैं। प्रेम का स्वरूप आज जन्म-जन्मांतरों का बंधन नहीं रहा बल्कि आज उसका स्वरूप बदल चुका है। आज प्रेम अपनी सुविधानुसार तोड़ा-मरोड़ा जा सकने वाला संबंध बन गया है। आज प्रेम का स्वरूप उदात्त का साधन नहीं रह गया, बल्कि शारीरिक एवं मानसिक तुष्टि का साधन बन गया है।


वर्तमान समय में परिवर्तित समाज के यथार्थ ने प्रेम की परिभाषा को ही बदल दिया है। डाँ लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय लिखते है ‘‘आज प्रेम में एकनिष्ठता, भावुकता, रुमानियत व आदर्श के स्थान पर स्वार्थ, वासना, उद्देश्य तथा अपने-अपने व्यक्तित्वों के परस्पर उन्मीलन की सफलता या असफलता लक्षित होती है।’’9 इससे यह स्पष्ट होता कि आज प्रेम में एकनिष्ठता की भावना खत्म हो रही है, या यूँ कहें कि प्रेम एक अविश्वसनीय वस्तु बन कर रह गया है। यह वस्तु पितृसत्ता के लिए काम करता है, पितृसतात्मक समाज में पुरुष स्वयं को श्रेष्ठ मानने के लिए बाध्य है।
ऊर्वशी बुटालिया के अनुसार ‘‘इस विचार में पितृसत्ता को या पुरुष-प्रधान समाज व्यवस्था को भुला दिया जाता है, जिसमें स्त्री और पुरुष के कर्तव्य तथा अधिकार कभी समान नहीं होते, जिसमें स्त्री के लिए तो पवित्रता का या एकनिष्ठ प्रेम करने वाली स्त्री का आदर्श होता है, जबकि पुरुष के लिए एकनिष्ठ प्रेम जरुरी नहीं माना जाता।’’10 एक तरह से हम देखें तो आज के संदर्भ में प्रेम एक वैयक्तिक अनुभव बन कर रह गया है, जिसमें परंपरागत नैतिक मूल्यों का कोई महत्व नहीं रह गया। यह भी देखा जा रहा है कि आज का प्रेम सिर्फ भावना में नहीं बहता, बल्कि उसमें बौद्धिकता का भी समावेश हो गया है। बौद्धिकता की वजह से आज प्रेम का स्वरूप बदल गया है और आनेवाले दिनों में वह और बदलता चला जाएगा। वास्तव में प्रेम में जब बुद्धि तत्व का प्रवेश हो जायेगा तो स्थितियाँ स्वयं बदलने लगेंगी। आज से पाँच सौ साल पहले कबीर कह गये हैं-
‘‘कबिरा इह घर प्रेम का खाला का घर नाँहीं
सीस उतारे भुईं धरे तब घर पैठे माँही’’।11

अर्थात प्रेम के घर में प्रेम और बुद्धि एक साथ नहीं रह सकते। दोनों एक दूसरे के शत्रु हैं। यदि दो शत्रुओं में मित्रता हो जाये तो आप परिकल्पना कीजिए कि वे कैसे दोस्त बने रहेंगे। यह भी एक कारण है इस समाज का, कि आज तेजी से प्रेम संबंध बन रहे हैं और टूट रहे हैं।


 प्रेम के अतिरिक्त आज विवाह संबंधित दृष्टिकोण में भी परिर्वतन आया है। स्वतंत्रता के पश्चात सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक परिवर्तनों ने मानवीय संबंधों को गहरे रूप से प्रभावित किया है। विवाह की अवधारणा जो परंपरा से चली आ रही थी उसका स्वरूप आज बदल चुका है। विवाह जो एक पवित्र बंधन हुआ करता था, वर्तमान समय में उसका स्वरूप बदल गया। आज स्त्री आर्थिक रूप से सुदृढ़ हुई हैं। सिमोन द बोउवार लिखती हैं कि ‘‘आर्थिक विकास के कारण औरत की समकालीन स्थिति में आये भारी परिवर्तन ने विवाह संस्था को भी हिला दिया है। विवाह अब दो स्वतंत्र व्यक्तियों के बीच एक पारस्परिक समझौते से उत्पन्न बंधन है, जो व्यक्तिगत तथा पारस्परिक होता है। किसी प्रकार का व्यभिचार विवाह के अनुबंधों और इकरारनामों का उल्लघंन ही माना जायेगा। इसी आधार पर दोनों पक्षों को विवाह तोड़ने का भी अधिकार मिलता है। बच्चे पैदा करना अब स्त्री की इच्छा पर निर्भर करता है और गर्भकाल में उसको सवेतन छुट्टी का हक राज्य देता है। आज स्त्री के लिए पुरुष द्वारा संरक्षित होने की अनिवार्यता समाप्त होती जा रही है। आज के संक्रमण के दौड़ में भी बहुत थोड़ी ही स्त्रियाँ उत्पादन में विनियोजित हैं।’’1221वीं सदी में स्त्रियाँ अपने विवाह संबध को अपने अनुसार जीना पसंद कर रही हैं। आज के इस संक्रमण दौर में कोई भी रिश्ता ज्यादा प्रभावित रूप में नहीं। आज मनुष्य कोई भी रिश्ता अपनी सुविधानुसार बनाते हैं और तोड़ते हैं। आज इंसान का जीवन बहुत ज्यादा व्यस्त हो चुका है। इस टूटन में सबसे ज्यादा नुकसान स्त्रियों का ही होता है, क्योंकि स्त्रियाँ किसी पुरुष से जुड़ती है तो अपने आप को पूर्णरूप से समर्पित कर देती है, लेकिन पुरुष नहीं। इसलिए वे (स्त्रियाँ) अपने टूटने पर अपने को खाली हाथ या छला हुआ महसूस करती हैं।


वास्तव में विवाह को स्त्रियाँ अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष या समय मानती हैं।  पुरुष विवाह को एक सामाजिक कर्तव्य और अपने एवं परिवार की सुविधा के लिए उठाया गया नैतिक कदम मानते हैं। जबकि होना यह चाहिए कि ‘‘स्त्री-पुरुष के बीच का संबंध विशुद्ध रूप से निजी मामला हो। (यानी संबंधित व्यक्तियों के अतिरिक्त इनमें धर्म एवं सामाजिकता का कोई हस्तक्षेप न हो), यह चयन की पूरी आजादी दोनों को हो और यह संबंध पूरी तरह समानता पर आधारित हो।’’13 जबकि ऐसा नहीं होता, क्योंकि पुरुषों को समानता से ज्यादा अपने अधीन कार्य करने वाले लोग पसंद आते हैं। विवाह के बाद स्त्रियाँ अपने को अपने पति और भारत में तो परमेश्वर या ईश्वर की तरह उन्हें खुश रखने के लिए तन, मन और जरुरत पड़ने पर अपने मायके के धन द्वारा भी संतुष्ट करने की जुगत में लगी रहती है। वे एकनिष्ठ भाव से अपने पति की अधीनता स्वीकार कर लेती है। ‘‘लेकिन मालिक उनसे वास्तविक सेवा के अतिरिक्त कुछ और चाहते हैं। पुरुष केवल महिलाओं की पूरी-पूरी आज्ञाकारिता नहीं चाहते, वे उनकी भावनाएँ चाहते हैं। सबसे क्रूर व निर्दयी पुरुष को छोड़कर, सभी पुरुष अपनी निकटतम सम्बंधी महिला में एक जबरन बनाये गये दास की नहीं बल्कि स्वेच्छा से बने दास की इच्छा रखते हैं- सिर्फ एक दास नहीं बल्कि अपना प्रिय, अपना चहेता व्यक्ति चाहते हैं। अतः उन्होंने महिलाओं के मस्तिष्क को दास बनाने के लिए हर चीज का इस्तेमाल किया है। अन्य दासों के मालिक आज्ञाकारिता को बनाये रखने के लिए भय का प्रयोग करते हैं- उनका खुद का भय या फिर धार्मिक भय। स्त्रियों के मालिक साधारण आज्ञाकारिता से कुछ अधिक चाहते थे और उन्होंने शिक्षा के पूरे बल का इस उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया। बहुत बचपन से सभी स्त्रियों को यह सिखाया जाता है कि उनका आदर्श चरित्र पुरुष के चरित्र से ठीक विपरीत होना चाहिये। इच्छाशक्ति और आत्मनियंत्रण नहीं बल्कि समर्पण, और दूसरे के नियंत्रण के समक्ष झुक जाना उनका गुण होना चाहिए। सारी नैतिकता उन्हें बताती है कि यह महिलाओं का कर्तव्य है और सभी मौजूदा भावनाओं के अनुसार यह उनका स्वभाव है कि वे दूसरों के लिए जियें, पूर्ण आत्मत्याग करें और अपने स्नेह संबंधों के अतिरिक्त उनका अपना कोई जीवन न हो। स्नेह संबंधों से तात्पर्य सिर्फ उन संबंधों से है जिनकी उन्हें इजाजत है- वे पुरुष जिनसे स्त्री संबंधित हो या वे बच्चे जो पुरुष व उनमें एक अटूट व अतिरिक्त बंधन होते हैं।’’14 इतना ही नहीं शिक्षा और सामाजिक रूप से उन्हें बार-बार बतलाया गया है कि स्त्रियाँ तभी तक सुरक्षित है जब तक वे पुरुषों के अधीन हैं।
आजादी के बाद और भारत में भूमंडलीकरण के बाद स्थितियाँ तेजी से बदली हैं। ‘‘पिछले कुछ दशकों के शहरी समाज में, विशेषकर महानगरों और बड़े नगरों में लोगों के अंतर्वैयक्तिक संबंधों में आमूल-चूल परिवर्तन आये हैं। लोगों के पास पड़ोसियों, रिश्तेदारों और यहाँ तक कि अपने बच्चों और माता-पिता के लिए भी वक्त नहीं है। जीवन के हर क्षेत्र में एक अजीब-सी कमरतोड़ प्रतिस्पर्धा और आपाधापी हावी हो गयी है। आपसी समझ और संवेदनशीलता धीरे-धीरे हमारे स्वभाव से कटते रहे हैं। जीवन-मूल्यों के इस संक्रमण काल में जो संबंध सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं- वह है पति-पत्नी के बीच के रिश्ते।’’15 शिक्षा ने स्त्री को आत्मनिर्भर बना दिया है। वह आर्थिक रूप से मजबूत बनी है तथा अपनी अस्मिता को पहचानने लगी है। वह पुरुष की सभी बातों को यूँ ही नहीं मानती, बल्कि तर्क की कसौटियों पर कसती है तथा सही और गलत का फैसला करती है।  यहाँ प्रश्न उठता है कि क्या स्त्री की स्थिति में पूरी तरह से सुधार हुआ है? सिमोन दा बोउवार लिखती है ‘‘आज पारंपरिक वैवाहिक जीवन के नियमों के अवशेषों के बावजूद समाज में स्त्री की स्थिति प्राचीन समाज की अपेक्षा बुरी है क्योंकि उस पर कर्तव्य-भार तो वही है पर उसे अधिकार, सम्मान और सुविधाओं से वंचित रखा जाता है। आज पुरुष संसार में खुद सहारा पाने के लिए विवाह करता है किन्तु वह सांसारिक बंधन में फंसना नहीं चाहता। वह घर-बार चाहता है पर स्वतंत्र रह कर उससे भागता भी है। वह जीवन में स्थापित हो जाता है, घर बसा लेता है, पर दिल से आवारा ही बना रहता है। पारिवारिक सुख और आनन्द से उसे घृणा नहीं है, पर उसे ही जीवन का एक मात्र ध्येय नहीं मानता।’’16 यही है पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता। यही कारण है कि आज किसी भी रिश्ते में ठहराव की भावना नहीं रही और कोई भी रिश्ता इस भूमंडलीकरण की चपेट से नहीं बचा। इसलिए आज विवाह सिर्फ और सिर्फ एक पवित्र बंधन नहीं रह गया है। जॉन स्टुअर्ट लिखते हैं कि ‘‘समाज की नजरों में विवाह स्त्री का निर्धारित लक्ष्य है, एक ऐसा संबंध है जिसके लिए उन्हें बचपन से ही तैयार करना शुरु कर दिया जाता है, और कुछ बहुत अनावर्षक स्त्रियों को छोड़ कर सभी स्त्रियों से इसके निर्वाह की अपेक्षा की जाती है, तो क्या इस विवाह को हर स्त्री के लिए सचमुच इतना आकर्षक और गौरवपूर्ण बना दिया गया है, कि स्त्री किसी और विकल्प की कमी महसूस न करे?’’17जबकि ऐसा नहीं है। स्त्रियों को दूसरे विक्लप के बारे में सोचना ही पड़ेगा, क्योंकि यह पितृसत्तात्मक समाज  सदियों से स्त्रियों को अपने अधीन रखने की कोशिश करता आया है। आज स्त्रियों में चेतना आ गयी है और वह पुरुष के षड़यंत्र को समझ रही है। बालजाक का प्रसिद्ध कथन है कि ‘‘उससे नौकरानी जैसा व्यवहार करो पर उसको समझा कर रखों कि वह महारानी है।’’18 इतना ज्यादा धूर्तता भरा कथन किसी पुरुष का ही हो सकता है। बालजाक के लेखन के बहाने एक पुरुष यह वाक्य कहता है। भारतीय समाज में स्त्रियों के साथ यह धूर्तता की भी जाती है। यहाँ शक्ति की देवी दुर्गा, धन की लक्ष्मी, विद्या की देवी सरस्वती है, लेकिन यह केवल मूर्तियों तक सीमित है। व्यावहारिक रूप से स्त्री अबला शक्तिहीन और अशिक्षित है। पुरुषों ने तो उसकी प्राप्ति पर ही रोक लगा दी थी।  भारत ही नहीं विश्व के किसी भी साहित्य में स्त्रियों ने पुरुषों के बारे में ऐसा कुछ नहीं कहा है। इससे यह पता चलता है कि पुरुष वर्ग स्त्रियों को महामूर्ख समझता है। स्त्रियाँ चाहे किसी भी देश या समाज की क्यों न हो वे इस तरह सदियों से शोषण का शिकार होती रही हैं। लेकिन आज इसकी अवाधारणा टूट रही है। स्त्री पुरुष के रचे हुए हर कुचक्र को अब समझ रही है कि किस प्रकार पुरुष उनका शोषण करते हैं और उनके साथ गुलामों जैसा व्यवहार करते हैं। उन्हें गुलाम बनाने रखने के लिए हर हथकंडे का इस्तेमाल करते हैं। अब स्त्रियाँ ये सब समझते हुए विरोध करने लगी हैं। हम जानते हैं कि किसी भी एक व्यक्ति के सामने दूसरा यदि जान-बूझ कर बिना किसी उद्देश्य के बल्कि आदर्शानुसार समर्पण कर दे, तो वह पहला व्यक्ति (पुरुष) दूसरे व्यक्ति (स्त्री) के समपर्ण को अपना अधिकार समझ लेता है। वह उस पर हावी होने लगता है और तब तक हावी होता रहता है, जब तक कि पहला व्यक्ति (पुरुष) विरोध करने के लिए बाध्य न हो जाय। आज स्त्री के नैसर्गिक समर्पण को पुरुष अपना अधिकार समझ कर उस पर हावी होने की चेष्टा करता है और तब तक करता है जब तक स्त्रियाँ बाध्य होकर विरोध नहीं करती हैं।



 एक तरह से देखे तो आधुनिक स्त्री कानूनी तौर पर आज सुरक्षित एवं आर्थिक रूप से मजबूत है जिसके कारण वह पुरुष के आधिपत्य को मानने के लिए तैयार नहीं है। विवाह-संबंधित परंपरागत मूल्य आज बहुत तेजी से टूट रहे हैं। एक तरह से देखा जाए तो आज के समय में विवाह पवित्र-धार्मिक संबंध नहीं रह गया। जिसे लोग तोड़ न सके बल्कि वह स्त्री –पुरुष की अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति का निमित्त मात्र बन कर रह गया है। यह परंपरा से चला आ रहा है कि विवाह करना स्त्री के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है या यूँ कहें कि उसके जीवन की नियति है, अब इसका स्वरूप बहुत तेजी टूट रहा है। अब विवाह को सामाजिक संस्था न मानकर ‘निहायत निजी’ मसला माना जाने लगा है। जिसके चलते सदियों से चली आ रही रीति-रिवाज तथा जिन्दगी भर साथ निभाने के कसमें टूट रही हैं।


आज 21वीं सदी में लोग विवाह के पवित्र बंधन में बंध कर नहीं रहना चाह रहे। लोगों में विवाह के प्रति भावात्मक लगाव और ललक भरी दृष्टि धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। आज ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है जो विवाह को प्रेम का आधार न मानकर जीवन के लिए बेड़ी मानने लगे हैं। बिना विवाह किये रहना लोग ज्यादा ठीक समझ रहे हैं। आज के विवाहित जीवन पर कुमुद शर्मा कहती हैं ‘‘उनकी दृष्टि में विवाह का मतलब है स्वयं को मार डालना, अपने अस्तित्व की हत्या कर देना। परंपराओं को ताक पर रख कर विवाह-संस्था को निरर्थक ठहरा दिया गया है। महानगरों में ही नहीं, छोटे-छोटे शहरों में भी लोगों ने बिना विवाह किये साथ रहना शुरु कर दिया है। इसे आधुनिक भावबोध पर टिके स्त्री-पुरुष के नए समीकरण के रूप में देखा जा रहा है और यह माना जाता है कि इस नए रिश्तों में, जिसमें स्त्री-पुरुष बिना विवाह किये साथ रहते हैं, स्त्री-पुरुष का दरजा बराबरी के रिश्ते पर आधारित है। इन नए संबंधों के दायरे में स्त्री उतनी ही सक्षम और जरुरी हिस्सा होती है, जितना कि परंपरागत परिवारों में स्त्री के मुकाबले में पुरुष होता है। इन रिश्तों के समर्थन में यह भी कहा जाता है कि इस तरह के संबंधों में स्त्री जबरन आरोपित जिन्दगी जीने के लिए विवश नहीं होती, बल्कि उसके और साथी पुरुष के बीच एक सक्रिय संवाद चलता रहता है- यह एक नई प्रोग्रेसिव एप्रोच है।’’19 इस रिश्ते की अहमियत को स्त्री-पुरुष अपनी इच्छानुसार अपनाते भी हैं। इस बदली हुई हवा का रुख पहचानते हुए हम अंदाजा लगा सकते हैं कि 21वीं सदी में प्रवेश कर गई पीढ़ी में अधिकतर लोग पुरुष और स्त्री दोनों पर थोपी गई पारंपरिक परिस्थितयों और नैतिक मान्यता के कायल नहीं है। राजेन्द्र यादव का कहना है ‘‘विवाह परिवार का एक बंधनकारी गठन है। यहाँ पत्नी और पति के बीच का कर्तव्य, धर्म और निष्ठाएँ पहले से तय हैं। चूँकि परिवार एक सामंतवादी गठन है इसलिए वहाँ पुरुष वर्चस्वशाली है यानि पुरुष ही सबका मालिक है। उसी से वंश चलता है। जिन लोगों ने इस सामंतवादी बंधन को स्वीकार नहीं किया और यह माना कि स्त्री-पुरुष का प्रेम बराबरी का अनुबंध है और दोनों में बराबरी का संबंध होना चाहिए, उन्होंने विवाह के स्वरूप को नकार दिया और साथ रहना शुरु कर दिया। जब तक मन करे रहने की स्वतंत्रता है। प्रेम यहाँ ज्यादा सृजनशील और औदात्य स्वरूप दिखाई देता है। इसलिए इस तरह के नये परिवारों का चलन हो गया।’’20 राजेन्द्र जी की टिपप्णी से स्पष्ट होता है कि यह आज के समय की माँग है कि इस तरह के परिवार का गठन हो, क्योंकि जीवन गतिशील होता है और परिवर्तन समाज का नियम। हालांकि यहाँ स्त्रियाँ पूरी तरह से स्वतंत्र तो हैं लेकिन हम यह नहीं कह सकते कि ऐसे रिश्तों में स्त्री मानसिक और शारीरिक रूप से शोषित नहीं होती। एक तरह से देखा जाए तो कुछ स्त्रियों के लिए यहाँ ज्यादा शोषण है, क्योंकि ऐसे रिश्तों पर सामाजिक और पारिवारिक बंधन नहीं होता। पुरुष जब चाहे ऐसे रिश्ते से बंधन मुक्त हो सकता है।

संदर्भ सूची
1. एरिक फ्रॉम- प्रेम का वास्तविक अर्थ और सिद्धांत, (द आर्ट ऑफ लविंग) अनुवाद युगांक धीर, पृष्ठ              संख्या-  28
2. एरिक फ्रॉम- प्रेम का वास्तविक अर्थ और सिद्धांत, (द आर्ट ऑफ लविंग) अनुवाद युगांक धीर, पृष्ठ               संख्या-  
3. वही, पृष्ठ संख्या- 298-299
4. भगवतीचरण वर्मा- चित्रलेखा, पृष्ठ संख्या- 199-200
5. संपादक- शैलेन्द्र सागर, कथाक्रम, प्रेम विशेषांक, जनवरी-मार्च पृष्ठ संख्या- 15
6. वही, पृष्ठ संख्या- 18
7. गजानन माधव मुक्तिबोध- एक साहित्यिक की डायरी, पृष्ठ संख्या- 68
8. र्जीनिया वुल्फ- अपना कमरा, पृष्ठ संख्या- 15
9. लम्क्षीसागर वार्ष्णेयद्वितीय महायुद्धोत्तर, हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ संख्या- 65
10. संपादित- रमेश उपाध्याय एवं संध्या उपाध्याय, आज के समय में प्रेम, पृष्ठ संख्या-37
11. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी- कबीर, 129
12. सीमोन द बोउवार- स्त्रीः उपेक्षिता, अनुवाद- डॉ प्रभा खेतान, पृष्ठ संख्या-177
13. सीमोन द बोउवार- स्त्रीः उपेक्षिता, अनुवाद- डॉ प्रभा खेतान, पृष्ठ संख्या-177
14. सं- राजकिशोर, स्त्री, परंपरा और आधुनिकता, पृष्ठ संख्या- 113
15. सीमोन द बोउवार- स्त्रीः उपेक्षिता, अनुवाद- डॉ प्रभा खेतान, पृष्ठ संख्या- 197
16. जॉन स्टुअर्ट मिल- स्त्री और पराधीनता, पृष्ठ संख्या- 40
17. सीमोन द बोउवार- स्त्रीः उपेक्षिता, अनुवाद- डॉ प्रभा खेतान, पृष्ठ संख्या- 339
18. कुमुद शर्मा- आधी दुनिया का सच, पृष्ठ संख्या- 53
19. संपादक- शैलेन्द्र सागर, कथाक्रम, प्रेम विशेषांक, जनवरी-मार्च पृष्ठ संख्या-6
20. राजकिशोर, स्त्री-पुरुश कुछ पुनर्विचार, पृष्ठ संख्या- 145

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फूलन देवी की ह्त्या के लिए सजायफ्ता है सहारनपुर की घटना का मास्टरमाइंड

संजीव चंदन 
सहारनपुर के शब्बीरपुर की घटना की कडि़यों को जोडने पर आभास होता है कि यह राजपूतों की तात्कालिक प्रतिक्रिया भर नहीं थी, बल्कि इसके पीछे एक सुनियोजित अभियान काम कर रहा था। इस अभियान को चलाने में आरएसएस के अनुषांगिक संगठनों से जुडे कुछ छुटभैये राजनीतिकर्मियों के अतिरिक्त जो सबसे चर्चित नाम सामने आता है, वह शेर सिंह राणा का है। 37 वर्षीय राणा फूलन देवी के हत्या के सजायाफ्ता आरोपी है तथा एक दशक से अधिक समय जेल में बिताकर सात महीने पहले बेल पर बाहर आया है। जेल से बाहर आने के बाद राणा कथित राजपूत गौरव के लिए काम कर रहा है तथा पर्दे के पीछे रहकर राजपूत रेजिमेंट जैसे अतिवादी संगठनों को सक्रिय कर रहा है।

महारणा प्रताप जयंती का खेल


17 मई को जब हम सहारनपुर पहुंचे उसके एक दिन पहले शब्बीरपुर गाँव में 5 मई, 2017 को दलित घरों पर हमला करने के दौरान दम घुटने से (पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार) मारे गये राजपूत युवक की तेरहवीं मनाई जा चुकी थी। उसकी तेरहवीं पर उपस्थित कुछ राजपूतों ने राजपूत रेजिमेंट के बैनर तले बैठक की। राजपूत रेजीमेंट को राजपूत समुदाय के लोग इलाके में दलित स्वाभिमान के लिए बनाई गई ‘भीम आर्मी’ का जवाब बताते हैं। तेरहवीं के दिन एक चर्चित नाम मृतक युवक के घर पहुंचा, वह था शेरसिंह राणा। शेर सिंह राणा शिमलाना गाँव में मनाये जा रहे महाराणा प्रताप जयंती में भी मुख्य अतिथि था, जहां से चलकर ही राजपूत युवकों का एक समूह पास के शब्बीरपुर गाँव में आगजनी के लिए इकट्ठा हुआ था। शिमलाना से ही गाँव पर हमले के लिए आये युवकों ने शब्बीरपुर में दो-तीन राजपूत युवकों की दलितों द्वारा ह्त्या की अफवाह फ़ैलाई थी, जबकि हकीकत थी कि गाँव पर हमला करने आया एक युवक हमले के दौरान घायल हुआ था और अस्पताल पहुँचने पर दम घुटने से मर गया। इस बीच शब्बीरपुर, जहां कुछ दिनों पहले ही बाबासाहेब आंबेडकर की मूर्ति लगाने को लेकर तनाव हो चुका था, के पास शिमलाना गाँव में महाराणा प्रताप जयंती पर इलाके के राजपूतों का जुटान और वहाँ होने का क्या अर्थ है इसे समझना बहुत कठिन नहीं है।

शब्बीरपुर के कर्मवीर के अनुसार 5 मई को गाँव में राजपूत लड़कों के उत्पात शुरू होने के पहले और शिमलाना जाने के पूर्व राणा नानौता प्रखंड में एक मीटिंग में उपस्थित था। 8 बजे से मीटिंग थी, जहां से ब्लाक प्रमुख चांदनी राणा, उनके पति सुरेन्द्र राणा और शेरसिंह राणा इकट्ठे महाराणा प्रताप की जयंती के लिए शिमलाना रवाना हुए थे।

शब्बीरपुर की घटना के दौरान महाराणा प्रताप जयंती में राणा की उपस्थिति तो दर्ज है लेकिन घटना स्थल पर वह स्वयं नहीं था, जिसे वह खुद बताता है कि राजपूत युवकों ने अंजाम दिया। जिले के कलक्टर भी कहते हैं कि वह गाँव में घंटना के दौरान नहीं था। और एक बार फिर राजपूत रेजिमेंट की मीटिंग के दिन तो वह मारे गये युवक के गाँव में था, लेकिन वह इस घोषणा की जानकारी से भी इनकार करता है। हालांकि वह स्वीकार करता है कि राजपूतों की करणी सेना ने भी उसे अध्यक्ष बनाने की बात की थी, लेकिन उसने इनकार कर दिया। उसके अनुसार वह ऐसे किसी संगठन के निर्माण की योजना में नहीं है।

सहारनपुर के घडकौली गाँव में साल भर पहले ‘आंबेडकर नगर और द ग्रेट चमार’ लिखे बोर्ड को हटाने की कोशिश करते राजपूतों, पुलिस और दलितों के बीच हिंसक टकराव हुआ था। उस गाँव में बाबासाहेब अंबेडकर की मूर्ति को भी पेंट कर दिया गया था। पिछले 16 मई को राजपूत रेजिमेंट की बैठक के बाद घोषणा की गई है कि या तो वह बोर्ड स्वयं हटा लिया जाये या राजपूत उसे हटा देंगे। घडकौली के लोग बताते हैं कि उस वक्त शेर सिंह राणा वहाँ उपस्थित था। लेकिन ऐसी किसी घोषणा की जानकारी से वह इनकार करता है और यह भी जोड़ता है कि वह राजपूत रेजीमेंट की बैठक में शामिल नहीं था। जिले के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट नागेन्द्र प्रसाद सिंह स्पष्ट करते हैं कि राजपूत रेजिमेंट के गठन और बोर्ड हटाने की धमकी की खबर उन्हें है। वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि उनकी और जिला मशीनरीज की नजर शेर सिंह पर लगातार है।

अब तक का इतिहास  


आइए पहले जानें कि शेर सिंह राणा की गतिविधियां क्या-क्या रही हैं।  शेर सिंह राणा का जन्म सहारनपुर से लगभग 40 किलोमीटर दूर उत्तराखंड के रूडकी शहर में 17 मई, 1979 में हुआ। वह अपने तीन भाइयों में सबसे बडा है। स्वयं उसके अनुसार, उसके दादा किशन  सिंह के पास 7 हजार बीघे जमीन थी, लेकिन पिता सुरेंद्र  सिंह राणा तक आते-आते संपत्ति छीजती गई और अमीरी की कब्र पर पनप रही गरीब की घास उसे बहुत जहरीली लगने लगी। हलांकि समय ने फिर पलटी मारी और बची हुई जमीनों की कीमतें बढीं। आज उसके पास रूडकी के सबसे भीड-भाड वाली जगह में उच्च मध्यवर्ग की हैसियत का घर है और यही उसकी आमदनी का एकमात्र जरिया भी है। इस घर के अधिकांश हिस्से में “शेर सिंह राणा मार्केट है”, जिसमें विभिन्न प्रकार की लगभग 60 दुकानें हैं। राणा कहता है कि उसे इन दुकानदारों से 4-5 लाख रूपए मासिक आमदनी होती है,  इस कारण वह चाहे तो “समाज और धर्म की सेवा” को छोडकर अपनी बाकी बची जिंदगी रइसों की तरह बसर कर सकता है।

2001 के बरसात के दिनों में, जब संसद का मानसून सत्र चल रहा था तब (25 जुलाई को) सांसद फूलन देवी की उनके घर पर हत्या कर देने वाला राणा 2004 में तिहाड़ जेल से फरार होने के बाद 2006 में कोलकाता से फिर गिरफ्तार हुआ था। इस गिरफ्तारी के बाद उसने दावा किया कि वह दो सालों की अपनी फरारी के दौरान ‘अंतिम अखिल भारतीय राजपूत शासक (12वीं सदी)’ पृथ्वीराज चौहान का अवशेष अफगानिस्तान से लाने में सफल हुआ था. अफगानिस्तान में मुहम्मद गोरी के मकबरे से लगकर पृथ्वीराज चौहान को दफनाया गया था, जिसे खोदकर उनके अवशेष लाने का दावा करते हुए शेर सिंह राजपूत गौरव के रूप में खुद को प्रजेक्ट करने लगा। उसके बाद लगभग 10 सालों तक तिहाड़ में सजा काट चुका राणा आजकल जमानत पर है, जिसे 24 अक्टूबर 2016 को दिल्ली हाई कोर्ट ने जमानत दी है।

चंबल में डकैत गिरोह को नेतृत्व देकर दलितों-पिछड़ों के रोबिनहुड की तरह चर्चा में आई फूलन देवी आत्मसमर्पण के बाद दो बार सांसद रहीं।अपनी ह्त्या के दौरान भी वह मिर्जापुर से समाजवादी पार्टी की सांसद थीं। अपने ऊपर हुए बलात्कार और राजपूतों द्वारा दलित-पिछड़ी जातियों के दमन का कथित बदला लेने के लिए फूलन देवी ने उत्तरप्रदेश के बह्मई गाँव में 22 राजपूतों की ह्त्या कर दी थी। इस घटना को राजपूतों ने बर्दाश्त नहीं किया, तब दवाब के कारण उत्तरप्रदेश के तत्कालीन राजपूत मुख्यमंत्री वीपी सिंह ने इस्तीफा दे दिया। शेर सिंह राणा ने फूलन देवी की ह्त्या के बाद देहरादून में आत्मसमर्पण के वक्त पुलिस के सामने इस ह्त्या की जिम्मेवारी अपने ऊपर ली थी। फूलन देवी की ह्त्या को राजपूतों ने बहमई काण्ड का बदला माना।
फूलन देवी की ह्त्या और पृथ्वीराज चौहान के कथित अवशेष को भारत लाने के कारण शेर सिंह राणा को राजपूतों ने हाथो-हाथ लिया है। यही कारण है कि जेल से जमानत पर छूटने के बाद राणा देश भर की राजपूत सभाओं में बुलाया जाता रहा है। शब्बीरपुर की घटना के दिन कुछ युवाओं द्वारा पास के गाँव शिमलाना में आयोजित महाराणा प्रताप जयंती में शेर सिंह राणा की मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थिति  छीजते हुए सामंती परिवेश में पल रहे ग्रमीण ईलाकों के राजपूत युवाओं के बीच उसके रोल मॉडल होने की कहानी कहती है। गत 27 जनवरी 2017 को पद्मावत फिल्म की शूटिंग के दौरान फिल्म निर्देशक संजय लीला भंसाली पर हमले का पटकथा लेखक भी यही शख्स दिखता है। 24 दिसंबर 2016 को शेर सिंह करणी सेना के द्वारा आयोजित ‘जौहर सम्मान समारोह’ में भी मुख्य अतिथि था, जहां उसने मंच से कहा कि ‘यदि संजयलीला भंसाली शूटिंग बंद नहीं करता है तो वह थप्पड़ खायेगा।’

चेहरे से सौम्य और व्यवहारकुशल शेर सिंह के काम करने का एक ख़ास पैटर्न रहा है। घटना-स्वीकारोक्ति-घोषणा- काम को अंजाम और उसका प्रचार-प्रसार- यह एक ख़ास मोड्यूल है शेर सिंह के काम का फूलन देवी की ह्त्या के पूर्व राणा ने पूर्व सांसद के संगठन एकलव्य सेना की रुड़की-अध्यक्ष उमा कश्यप के साथ जान-पहचान और प्रगाढ़ता बढ़ाई, जिसके सहारे वह फूलन देवी के सांसद-आवास पर आने जाने लगा, उनके पति उम्मेद सिंह से ताल्लुकात बढाये। 25 जुलाई को ह्त्या के  दो दिन बाद उसने देहरादून में प्रेस कांफ्रेंस कर ह्त्या की जिम्मेदारी ली और आत्मसर्पण किया। हालांकि बाद में हत्या में शामिल न होने का तर्क न्यायालय में देता रहा है. आत्मसर्पण के बाद तिहाड़ जेल जाते हुए उसने घोषणा की कि बहुत दिनों तक तिहाड़ जेल उसे रोक नहीं सकेगा। और सच में दो-ढाई साल के भीतर 17 जनवरी 2004 को वह तिहाड़ से फरार हो गया। पुलिस उसे हरिद्वार, रूडकी, देहरादून में खोजती रही, वह रांची, गया, पटना में घूमता रहा, मीडिया को इंटरव्यू तक देता रहा। कोलकाता, बंगलादेश होते हुए बाकायदा पासपोर्ट और वीजा लेकर अफगानिस्तान में काबूल, गजनी तक पहुँच गया और वहाँ से 12वीं सदी के राजपूत शासक पृथ्वीराज चौहान का कथित अवशेष लेकर आया। मुहम्मद गोरी के मकबरे के पास से पृथ्वी राज चौहान का कथित अवशेष लाते हुए उसने वीडियो फिल्माया और बाद में जारी भी कर दिया। फिर 2006 में उसे पुलिस ने कोलकाता से गिरफ्तार किया, जिसे शेर सिंह ने अपनी मर्जी से आत्मसमर्पण बताया। पिछले दिनों रानी पद्मावती फिल्म के निदेशक संजय लीला भंसाली के थप्पड़ खाने की बात राजपूतों की “करणी सेना” के आयोजन में कही और कुछ ही सप्ताह के भीतर  सेना ने इस काम को अंजाम भी दे दिया।

क्या कहता है राणा अपनी सक्रियता के संबंध में

राणा का इंटरव्यू उसके घर पर किया गया.  एक घंटे से अधिक समय तक चले इस ऑन कैमरा इंटरव्यू में वह हर सवाल के इतने लंबे और लुभावन उत्तर देता रहा है कि हम हैरान थे। वह हमारी किसी प्रश्न का न तो सीधा उत्तर देता था, न ही उत्तर देने से इंकार करता था। अपनी छवि के निर्माण में माहिर यह सख्श एक सवाल करता है अपने हर इंटरव्यू में, यह सवाल उसने हमसे भी किया कि ‘आतंकवादियों को सामान्य जीवन जीने का हक़ है तो मुझे क्यों नहीं?’ वह कहता है कि ‘मैं कोई अपराधी नहीं हूँ, एक, दो क्राइम के मुकदमे मेरे ऊपर हैं तो उसमे बेगुनाही की लड़ाई मैं लड़ रहा हूँ।’ अपनी अति सक्रियता के सवाल पर राणा का कहना है कि ‘मैं जमानत पर छूट कर आने के बाद हर महीने देश के कई हिस्सों में 10-15 राजपूत सभाओं में बुलाया जाता हूँ। शब्बीरपुर की घटना के दिन भी मैं शिमलाना में महाराणा प्रताप जयंती के दौरान मंच पर था। वहाँ एक युवक के मरने की खबर अफवाह की तरह आई. किसी ने कहा कि उसे गोली मारी गई है। मैं मंच पर बैठे लोगों को कहता रहा कि हमलोग लड़के को देखने अस्पताल चलें। सभा स्थल पर सैकडों की संख्या में लोग थे. कुछ युवक धीरे-धीरे, 10-20 की संख्या में एक-एक कर निकलने लगे। मैं जल्द ही घायल युवक से मिलने अस्पताल पहुंचा तो वहाँ तब तक वह मर चुका था।’

शेर सिंह के लगभग हर विषय पर अपने विचार हैं, राष्ट्रवाद, राजपूत गौरव, दलितों के उत्पीडन, आरक्षण और उसके बेजा इस्तेमाल से लेकर नक्सलवाद और आतंकवाद पर। लोकप्रिय सवर्ण हिन्दू मान्यताओं के अनुरूप वह राष्ट्रवाद की बात करता है। आरक्षण को लेकर उसका मानना है कि एक पीढी तक ही मिले। मुसलमानों के लेकर राय है कि पूरी दुनिया में मुसलमान ही क्यों तनाव के कारण हैं? राजपूतों को लेकर उसका मत है कि उन्हें पढ़ना चाहिए और अधिकतम नौकरियाँ लेनी चाहिए। उसके अनुसार ‘दलितों से आरक्षण यदि छीन भी लिया जाए तो राजपूतों का क्या फायदा? सरकारी नौकरियों पर ब्राह्मण, बनिया, कायस्थ आदि जातियों का कब्जा है और उनका ही बढेगा यदि राजपूत नहीं पढेंगे-लिखेंगे तो।’


शेर सिंह की किताब ‘जेल डायरी : तिहाड़ से काबुल कंधार तक’ पर आधारित बायोपिक (जीवनी पर आधारित फिल्म) भी बनाने की तैयारी हो रही है। खुद शेर सिंह के अनुसार इस फिल्म के डायरेक्टर होंगे अनुराग कश्यप। फिल्म के कास्ट साइन होने अभी बाकी हैं।

सहारनपुर में बढ़ते जातीय तनाव, भीम आर्मी सेना के जवाब में गठित राजपूत रेजीमेंट के अस्तित्व आदि के बीच शेर सिंह की सक्रियता को देखते हुए एक सवाल सहज उठता है कि शेर सिंह बिहार में जातीय नरसंहारों का जिम्मेवार दलितों का कत्लेआम करने वाली रणवीर सेना के सुप्रीमो बमेसर मुखिया और शेर सिंह में कोई समानता है? क्या पश्चिम यूपी का वह इलाका बिहार की तरह जाति-हिंसा के लिए पक रहा है और शेर सिंह के राजपूती गौरव का अभियान उसे नेतृत्व देगा? मीडिया, संचार माध्यमों के कुशल उपयोग के साथ कदम-दर-कदम अपनी छवि निर्माण और अपनी राजनीतिक/सामाजिक योजनाओं को अंजाम देने में लगे शेर सिंह से जुड़े इन प्रश्नों के उत्तर समय के गर्भ में हैं। फिलहाल उसकी सक्रियता संदेह पैदा करती है. और वह संदेह राज्य की मशीनरी को भी है, तभी जिले के कलक्टर कहते हैं कि ‘वे उसपर पूरी नजर बनाये हुए हैं। वह अवांछित गतिवधियों में संलिप्त होगा तो नपेगा।’

स्त्रीसत्ता, लोकायत दर्शन और क्रान्ति की गति

आशिष साहेबराव पडवळ

स्त्री-वर्ग-जाति के मुद्दों पर काम करनेवाली मानव मुक्ति मिशन नामक संगठन के सोशल मीडिया का महाराष्ट्र प्रभारी. संपर्क: aanvikshiki.edit@gmail.com मो.8888577071

दर्शन काल का इतिहास आदिम समाज से शुरू कर के आगे बढ़ना चाहिए. जब किसी भी संस्था का इतिहास देखना हो तो उसके बेस को भी देखना चाहिए तभी हम उसके आखरी सिरे तक जा सकते हैं. यह समझना होगा कि बुध्द पूर्व भी यहाँ कोई जनजीवन था.


आदिम समाज में परिवार नही था,१ उसमें कुल व्यवस्था थी. परिवार न होने के कारण स्वैरसंभोग था. उस समाज में सिर्फ ‘मां’ का ही पता होता था, न कि बाप का. खेती तंत्र स्त्री द्वारा ढूंढने की वजह से समाज में स्त्री का वर्चस्व था .


ऋचा 10.71.9  साफ तौर पर यह साबित करती है आर्य पूर्व समाज कृषक था:
इमे ये न अर्वाक् न पर: चरन्ति न ब्राम्हणास: न सुतेकरास :.
ते एते वाचं अभिपद्य पापया सिरी: तन्त्र तन्वते अप्रजज्ञय न : ..२
ये पापी अब्राहमण लोग,जो हवन करते नहीं, जो लोकभाषा बोलते हैं, और खेती  करते है.

आदिम समाज अगर कृषक है तो वह स्त्री सत्ताक और आदिम समाज अगर पशुपालक है तो वो पितृसत्ताक व्यवस्था है.३ इस से साबित भी होता है कि तब स्त्री सत्ताक काल था. स्त्री सत्ताक काल में स्त्री राज करती थी.


समतावादी दर्शन से पहले समता और दर्शन दोनों के कालसापेक्ष क्या मायने थे, वह देखेंगे:


समता : समता अर्थात सभी लोगो को समान अधिकार, समतावादी दार्शनिक अर्थात समता के आग्रही लोग या संस्था. इस समता का शुरुआती दौर हम स्त्रीसत्ताक,मातृवंशक काल में देख सकते हैं, लोकायत का जन्म निम्न शेती विकास अवस्था में हुआ है. निऋति आद्य स्त्री सत्ताक गणों, देवी गणों में भूमि और धन का समान बटवारा करती थी.४ गण व्यवस्था की तेरणा मांजरा खोरे की राणी तुळजाभावनी अपने गणों में धान्य का समन्यायी बटवारा अपने परडी से करती थी.५ चार्वाक अपने ही हिस्से के उत्पादन का भोग लेने का निर्देश करते हैं. उसमें वे उच्च-नीच का भेद नही करते. असुरराज बलिराजा न्याय और समता के लिए सुपरिचित हैं.

दर्शन : दर्शनशास्त्र ज्ञान है जो परम् सत्य और प्रकृति के सिद्धांतों और उनके कारणों की विवेंचना करता है. दर्शन यथार्थ परख के लिए एक दृष्टिकोण है. ‘दृश्यतेह्यनेनेति दर्शनम् ‘अर्थात् असत् एवं सत् पदार्थों का ज्ञान ही दर्शन है.विविध प्रमाणों के सिद्धांत-समूह को ‘दर्शन’ कहा गया है .६ दर्शन अर्थात दृष्टि,तो इस ‘दर्शन’ से ऐसा प्रतीत होता है, उन्हें अंतिम सच के प्रत्यय पर ही विश्वास था . इसीलिये दर्शन (तत्त्वज्ञान) कहा गया ह . भारतीय दर्शनों में अवैदिक और वैदिक दो विभाग बताये जाते हैं. जबकि हम दर्शन को अंतिम सच का प्रत्यय कहते हैं तो , वैदिक आध्यात्मिक ज्ञान(वेद) को दर्शन कैसा कहा जा सकता है ? ये भी सोचने वाली बात है . भारत में हर एक चीज की खोज वेदों में होती है. सच ये है कि अध्यात्म को अंग्रेजी में Metaphysics कहा जाता है , Meta यानी के बाद ( beyond ) और Physics यानी भौतिक जगत. भौतिकजगत के बाद की पढ़ाई (study) करते समय तर्क शास्त्र के साथ मानसशास्त्र (psychology)का आधार लेना पड़ता है . ये भी वेदान्त समर्थकों  को ध्यान देना लेना चाहिए .

इस भारतीय समाज में “भारतीय दर्शनों को मोटे तौर से दो कोटियों में वर्गीकृत किया जा सकता है-आस्तिक और नास्तिक में. सामान्य शब्दावली में प्रथम से तात्पर्य है ईश्वरवादी और दूसरे से निरीश्वरवादी.७ इसमें से जोनिरीश्वरवादी असुर , अब्राम्हण, लोकायत, अवैदिक है . जिन्हें वेदों के निंदक, नास्तिक कहा गया ह . नास्तिक जिन्हें कहा गया है मनुस्मृति के अनुसार
वो लोग मूलतः आर्येत्तर थ असुर थे.
स साधू भिर्वहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दक: ..११.. ८
जो नास्तिक दर्शन है उनके विचार परलोक नही मानते, भारतीय दर्शन का इतिहास भौतिकवादी बनाम कल्पनावाद का देख सकते है. Materialistic को जड़तावाद कहा गया है, लेकिन जो चीज मूलतः जड़ नही है, उसे जड़तावादी कैसे कह सकते है? विचार जो जड़ नहीं, तो उन्हें जड़तावाद में कैसे तोल सकते है? इसलिए materialistic को भौतिकवादी ही कहना ठीक होगा.



लोकायत चार्वाक का कोई भी एक ग्रंथ आज उपलब्ध नहीं या लिपिबद्ध भी नहीं है , इसलिए हमें लोकायत संस्था विरोधियों की टिका-टिपण्णी पर निर्भर रहना पड़ता है. लोकायत का लोगो में विस्तुतः होता गया शास्त्र (लोक +आयत ) ऐसा भी उल्लेख पाया जाता है. भारतीय दर्शन का इतिहास हम पूर्वपक्ष पर कड़ी कर के अपना उत्तर पक्ष खड़ा कर सकते है. दर्शन- दिग्दर्शन में राहुल सांकृत्यायन कहते हैं कि ,सिंधु सभ्यता असुर सभ्यता की भगिनी कही जा सकती है .९ इससे हम दावे के साथ कह सकते हैं, वेदों के पहले भी यहाँ एक संस्कृति वास करती थी. भारतीय दर्शन के इतिहास को मान्य करना होगा कि भारतीय आस्तिक दर्शनों का उदय नास्तिक दर्शनों के बाद हुआ है,१०मतलब उन्हें परास्त करने के उद्देश्य से यहा अपनी बस्तियां बसाने वालो वैदिकों ने अपने वेदों को जन्म दिया.

मातृवंशक काल में तंत्र का विकास हुआ तभी लोकायत का उगम देखा जाता है. लोकायत, किसी व्यक्ति का नाम था या लोगों के समूह का यह बता पाना मुश्किल है. लोकयत  नाम चार्वाक से प्राचीन है, लोकायत का उल्लेख पाणिनी ने (अष्ठयाध्यायी ४.२.६०) में किया है. तो कौटिल्य उसे ‘शास्त्र’ कहते है .
स्थापना क्षेप सिद्धान्त परमार्थज्ञना गतै: .
लोकायतिकमुख्यैश्च सामन्तादनुनादिनम् .. आदिपर्व (६४.३७)

एक लोकायत शास्त्र के आश्रम का उल्लेख महाभारत के आदि पर्व में है और उसमे यह दिखता है कि – खंडन, सिद्धान्त, आदि में जो श्रेष्ठ है, जो जाननेवाले लोकयत शास्रो के प्रमुखों की वजह से वो आश्रम परिचित हो गया है. इसी से मालूम होता है कि लोकयत एक शास्त्र है जो उच्चतम शास्त्र समझा जाता था. लोकायत चार्वाक राजा-महाराजा के दरबार में भी पाये जाते हैं . राजा जनक के दरबार का याज्ञवल्क्य एवं दुर्योधन का चार्वाक दोस्त. द्रौपदी भी लोकायत शास्त्र की जानकार थी. बृहस्पति लोकयत शास्त्र के आद्य प्रवर्तक, अर्थात प्रथम पुरुष थे. बृहस्पति आर्यो के रचित वेदों में वैदिक देवता, अर्थात सुरों के भी गुरु पाये जाते हैं. अगर बृहस्पति गुरु हैं तो वह निःसंकोच नीतिवान ही रहे होंगे, इसलिये वे सुरों का पक्ष छोड़कर असुरों के पक्ष में गए होंगे. इंद्र, ब्रह्मा, विष्णु की भोगलीला तो पुराणों में यत्र-तत्र दिखाई देती है. इसलिये बृहस्पति का लोकायत शास्त्र का विद्यार्थी प्रहलाद पाया जाता है. इससे लोकायत चार्वाकों का असुर होने का पुख्ता सबूत है. क्योंकि प्रहलाद असुरों के राजा थे. प्रल्हाद के आगे की पीढ़ी के सभी ‘असुरराज’- विरोचन, बलिराजा, बाणासुर को इतिहास ने नीतिमान और समताप्रिय कहकर उनका गौरव किया है. तो दूसरी ओर बृहस्पति के बारे में यह भी सोच है कि जैसे प्रजापति और गणपति अनेक हुए हैं, उसी तरह से बृहस्पति भी हो सकते हैं. सभी असुरों- अवैदिकों ने वैदिक यज्ञयाग को नकारा थाबिनाडरे ने उसका विनाश भी किया था. इसकी एक लोकप्रिय कहानी भी है – दक्ष ने अपने यज्ञ में रूद्र को न्योता नही दिया तो रूद्र के गणों ने यज्ञ का नाश किया. मतलब अवैदिकों के मन में यज्ञ प्रति कोई आदर भाव नही था. ‘बृहस्पतिमतानुसार नास्तिकशिरोमणिना चार्वाकेण’११ बृहस्पति मत के अनुसार चलने वाला नास्तिक शिरोमणि चार्वाक हैं. उन्होंने वेद पुराण अर्थात ‘शब्द’ प्रमाण को नाकारा है. जिसने- जिसने वेदों को नकारा, समता का पक्ष लिया, वेदों ने उन्हें नास्तिक कहा. उनको नास्तिक कहना सिर्फ वेदों का विरोध नही था, तो उनकी समानता का राज्य उनका नीतिवान रहना भी कारण रहा है. तो इससे यह भी प्रतीत होता है कि मातृवंशक समाज के राजा ने लोकायत शास्त्र को ऊँचाईयो पे लाकर रखा था. तो दूसरी ओर वैदिक आर्य, आर्य का दासप्रथा- समाज में मतलब स्वामी था. क्योंकि आर्यो ने यहा कि उन्होंने असुर राज्यो की जीतकर अपना राज्य प्रस्थापित किया. पशुपालक आर्यों ने यहाँ आकर खेती का नया तंत्र विकसित किया. उसका बेस उनको यहा के अनार्यो से ही लेना पड़ा. जबकि आर्य के पितृवंशक होने की वजह से उन्हें ‘क्षत्र’ और ‘ब्रम्हन्’ आदि मालूम नही था, इसी के वजह से उनके ही गण बांधव से नया वर्ण का उदय हुआ, जो कि  ‘वैश्य’ नाम से परिचित है. उन्होंने दूसरे गणों को जीतकर यहाँ ‘शूद्र’ वर्ण प्रस्थापित किया  इस प्रकार आर्यो ने चातुर्वर्ण की नींव रखी. यहाँ के प्रजा को लुभाने के लिये और लोकायत तंत्र को पराजित करने के लिए वेदों की रचना की. वेदों में विश्व की निर्मिति भगवान की शक्तियों से हुई, ऐसा दिखाया गया. आत्मा का देह के बाद भी प्रवास रहता है. परलोक की कल्पना ,पुनर्जन्म की कल्पना, ऐसा ही बहुत सारा कूड़ा वेदों में भर दिया. सुप्रसिद्ध वेद निरुक्तकार यास्क, जिनका जन्म ईसापूर्व 500 का है, के निरुक्त में वेद एक तो अर्थशून्य है या आत्मव्याघातपूर्ण है, ऐसा बोलने वाला कौत्स का उल्लेख है, वेदविरोधी उसके मतों का सविस्तर खंडन किया है .१२ वेद मानना यानी शब्द को प्रमाण मानकर चलना, वहाँ अपनी स्वतंत्रता को बेचने समान ही है. और जो ऐसा शब्द प्रमाण मानकर चलते हैं उन्हें वेद आस्तिक कहते हैं. नास्तिक असुरो की वेदों ने निंदा की है.



आत्मा और परलोक 


वेद और वेदों के समर्थक आत्मा का देह से भी अलग अस्तित्व बताते हैं. उनकी मान्यता से देह का निर्माता और आत्मा का नियंत्रक भगवान है. जो परलोक से सभी को नियंत्रित रखते हैं. इंसान मरने के बाद आत्मा देह छोड़कर परलोक की राह चलता है.वेद आत्मा को नित्य मानते है . इसके उलटा चार्वाक का उपदेश है:
न स्वर्गो , न अपवर्गो वा न एव आत्मा पारलौकिक:.१३ ना तो स्वर्ग है, ना मोक्ष है, न अलग अस्तित्व रखने वाली आत्मा  न ही परलोक है. जब चार्वाकों ने इस कभी न दिखने वाले परलोक पर हल्ला किया तो आगे चलकर वेदों ने पुनर्जन्म को ही जन्म दिया. इस जन्म का पुण्य अगले जन्म में मिलेगा, इस तरह से पुनर्जन्म का ढोंग रचा. इसके उपर हमला करते चार्वाक अगर आत्मा ही नित्य नहीं,  तो वो कैसे जन्म लेगा यह भी पूछते हैं. और किसने भी अपने पुनर्जन्म का दावा नही किया. ‘देहस्य नाशो मुक्तिस्तु न ज्ञानान्मुक्तिरिष्यते’१४ शरीर का मृत्यु के बाद होई प्रवास नही है ; वेदों को ज्ञान कहा गया है. तो बृहस्पति कहते है – ज्ञान(वेदों) से कोई मोक्ष मिलने वाला नहीं , न तो आशा रखनी चाहिए. मनु – नास्तिक्यं वेदनिन्दा च देवतानांच कुत्सनम् .द्वेष दंभ्भ च मान च क्रोधं तैक्ष्, यंच वर्जयेतु ..१५ वेद, स्वर्ग  ईश्वर आदि को न मानने वालो को द्वेष छोड़ने को कहकर वेदों को प्रमाण मानने का सलाह वेद समर्थक देते हैं . चार्वाकों ने वेदों के भीतर लिखी सारी चीजें नकारी और वेदों से कुछ भी ज्ञान नही मिलेगा, ऐसी उसकी निंदा की है . ‘भूतान निधनं निष्ठा स्रोतसामिव सागर’ :.१६ मृत्यु ही देह का अंत है . यही देहात्मवाद असुर राज विरोचन के भीतर भी देखा सकते है .


महाभूत 


जो वेदों के निन्दक है वह आकाश की नित्यता सिद्ध करने का प्रयास करते दिखाई देते हैं. इसीलिये उन्हें नास्तिक कहा गया है. वेद एकमात्र ईश्वर को अनित्य बताते हैं. आकाश को जो नित्य मानता है, उसे वदो की भाषा में नास्तिक खा गया है. इससे यह प्रतीत होता है कि वेदों के सिद्धांत दृढ़ करने के लिये अनुमान आदि की सहायता को भी मना किया है. वेद विरोधी जो सिद्धांत है वह वेदों की दृष्टि में नास्तिक दर्शन है  विश्व की सभी चीजों को अनित्य मानना और एकमात्र आत्मा को ही नित्य मानना ये वेदों के प्रताप है. लेकिन आत्मा अनित्य है यह दर्शन का निर्देष चार्वाक करते हैं. इसीलिये आत्मा का शरीर से अलग भी अस्तित्व नकारने वालो को वेदों ने नास्तिक कहा. लोकायत चार्वाक चार महाभूत स्वीकार करते हैं, उन्हें ही सर्वस्व मानते है. ‘तत्र पृथ्विव्यादीनि भूतानि चत्वारि तत्वानि’ .१७ इन्हीं चारो भूतों के मिलन से शरीर बनता है. वह स्वयं प्रेरित है न कि उसका कोई उपरवाला नियंत्रक है. जिन्हें वेद परमेश्वर कहते हैं. लोकायत-मतानुसार मोक्ष को पाना है तो इसी जन्म में. मतलब मोक्ष यानी दुःख का निवारण और वो भी इसी जन्म में, क्योंकि दूसरा जन्म दूसरा नहीं है.मरने  के बाद इन्ही चार महाभूतों से बनी आत्मा देह बिना कुछ भी नहीं है. ‘ननु पारलौकिकसुखभावे’१८ उसका प्रवास समाप्त हो जाता है, आत्मा का आगे का होई परलोक का प्रवास नही होता है. परलोक, स्वर्ग ,नरक ये सभी वेदों के शब्द-छल हैं,  जिनकी बुनियाद महात्मा फुले कहते है कि ब्राम्हण वर्चस्व लिए खड़ी की गयी है .
अत्र चत्वारि भूतानि भूमिवार्यनलोअनिलाः .
चतुर्भ्यः खलु भूतेभ्यः चैतन्यमुपजायते ॥१९
१.भूमि – शब्द, स्पर्श, रस, रुप, गंध
महाभारत वनपर्व में दिखता है कि ‘भूमि:पन्न्चगुणा’
२.जल – शब्द , स्पर्श , रूप , रस
वनपर्व ‘ब्रम्हन्नु दकन्न्च चतुगृणम्’ २१०. ४-८
३.तेज – शब्द, स्पर्श, रूप
४.वायु – शब्द , स्पर्श
आदि पर्व में एक जगह वायु के गुणों का उल्लेख पाया जाता है .
‘शब्दलक्षणमाकाश वायुस्त स्पर्शलक्षण’
आकाश- का एकमात्र गुण शब्द है, इसलिये उसको चार्वाक परंपरा ने नाकारा है कि वो प्रत्यक्ष प्रमाण की कसोटी पर खरा नही उतरता ना ही लोकप्रिय अनुमान कसोटी पर. लोकप्रिय अनुमान यानी लोगो के प्रत्यक्ष मतो पर विचार विमर्श करना.


आन्वीक्षिकी और प्रत्यक्ष प्रमाण


लोकायत चार्वाक के शास्त्र को आन्वीक्षिकी कहा गया है. आन्वीक्षिकी या तर्कशास्त्र (logic) का उल्लेख बहुत जगह पाया जाता है. शास्त्र मीमांसा में आन्वीक्षिकी विद्या का उपयोग किया जाता था. आन्वीक्षिकी अर्थात प्रत्यक्ष देखने के बाद अनुमान करना. लोकयत सिर्फ प्रत्यक्ष प्रमाण मानते हैं. जो ज्ञान तर्कशास्त्र और लोकप्रिय अनुमान की कसौटी पर खरा नही उतरता वह ज्ञान उन्होंने साफ नकारा है .
महत्तम अर्थशास्त्रकार कौटिल्य बताते है कि चार विद्या है-
आन्वीक्षिकी, त्रयी , वार्ता , दंडनीतिश् च इति विद्या :..
आन्वीक्षिकी अर्थात सांख्य , योग और लोकयत दर्शन , त्रयी याने वर्णजातिधर्म , वार्ता मतलब अर्थशास्त्र, और दंडनीति का मतलब राजकारण .२०
अहमासं पंडित को हेतुको वेदनिन्दक:.
आन्वीक्षिकी तर्कविद्यामनुरक्तो निरर्थिकाम् .. (शांतिपर्व १८०.४७-४९)

वेदों को नकार देने वाले शास्त्रो की निंदा की गई है. इंद्र -काश्यप संवाद में भी एक जगह आन्वीक्षिकी को निरर्थक कहा है. अर्थात अन्वीक्षा करके लोकायत चार्वाकों ने वेदों को नकारा था . महाभारत के शांति पर्व में राजा जनक ओर याज्ञवल्क्य का संवाद ऐसा पाया जाता है:  हे राजन यह आन्वीक्षिकी विद्या मोक्ष पाने के लिये, त्रयी वार्ता व दण्डनीति से भी बहुत उपयोगी है .
चतुर्थी राजशार्दूल विद्यैषा साम्परायिकी .
उदीरिता मयातुभ्यं पंचविंशादधिप्ठिता .. शांतिपर्व ३१८.३४
आयोध्याकांड में राम ने कहा है कि बहुत से अभिमानी पंडित मुख्य धर्म छोड़कर आन्वीक्षिकी ज्ञान के बल पर निरर्थक वाद-विवाद करते रहते हैं. यहां आन्वीक्षिकी शब्द का अर्थ ‘नास्तिक लोकायत’ विद्या है .

धर्मशास्त्रेषु मुख्येषु विद्यामानेषु दुर्बुधा:.
बुद्धिमान्वीक्षिकीं प्राप्य निरर्थ प्रवदन्ति ते .. अयोध्याकांड १०७.८

आन्वीक्षिकी विद्या का जानकार याज्ञवल्क्य वाद-विवाद में सभी को पराजित करके जनक से सोना और गाय इनाम में लेता है. तो यह समझ सकते हैं कि अन्वीक्षा करने का जबरदस्त हथियार चार्वाकों के हाथ में था, जिसकी आखिर तक वेदों की परास्त करने के लिये निंदा करनी पड़ी. वैदिक स्वतंत्र विचार करने के खिलाफ थे, उन्हें शब्द प्रमाण मान्य था तो चार्वाक स्वतंत्र-विचार धारा के लोग थे, जो शब्द प्रमाण बताने वाले वेदों की निंदा करते थे. प्रत्यक्ष अनुमान को महत्व देते थे . इसके द्वारा किसी भी चीज के बारे में निर्णय लेना यह तत्व स्वीकार किया गया है. जहां प्रत्यक्ष द्वारा वस्तु का निर्णय लेना कठिन हो, वहां अनुमान स्वीकार गया है लेकिन वह भी लोकप्रिय अनुमान, यानि जो अनुमान बहुत सारे लोगो ने अनुभव किया है . उसका कोई तो पुख्ता सबूत उनके हाथों में हो ऐसा लोकप्रिय अनुमान उन्हें स्वीकार है .


प्रत्येक्षणानुमानेन तथौपम्यागमैरपि . शांतिपर्व ५६.४


‘मानंत्वक्षजमेव हि’ लोकायत प्रत्यक्ष प्रमाण को ज्यादा महत्व देते थे. तो अनुभव जन्यज्ञान को अविद्या नास्तिकता का लक्षण कहा गया है जो कि शंकराचार्य का वेदांतभाष्य में शामिल है . बाष्काली बाध्व से ब्रह्मस्वरूप के बारे में पूछता है तो बाध्व उसे मौन से जवाब देते हैं . बाष्काली ने बाध्व से प्रार्थना की : ‘भगवन मुझे ज्ञान दो. बाध्व शांत रहा. तो बाष्काली ने दूसरी बार फिर से कहा: ‘भगवन मुझे ज्ञान दो. बाब्ध शांत रहा. तो बाष्काली ने तीसरी बार फिर से कहा: भगवन मुझे ज्ञान दो. बाब्ध बोला, मैं तो ज्ञान दे रहा हूँ लेकिन तुम ग्रहण करने में असमर्थ हो. आत्मा निःशब्द है. ‘उपशान्तोयमात्मा’ अनुसार प्रत्यक्ष प्रमाण अविद्या है. प्रत्यक्ष प्रमाण कुछ काम का नहीं है .

वर्णाश्रम की चीरफाड़


न स्वर्गो, नापवर्गो वा नैवात्मा पारलौकिक:.
नैव वर्ण-आश्रम-आदीनां क्रियाश् फलदायिका:..२१ ना स्वर्ग, ना मोक्ष, ना देह से दूसरा अस्तित्व रखने वाला आत्मा है. चार्वाक कहते हैं,, वर्ण आश्रम की सभी क्रिया निष्फल है .

तो वेदों के समर्थक आत्मा वर्णाश्रम इन सभी को उचित मानते है. ‘धर्म-अपेतम’ अर्थात ‘धर्मविहीन’२२ यह उपदेश जाबाली नामक चार्वाक वनवासी राम को देता है, तो वासिष्ठ राम को उसका आचरण धर्म के अनुसार योग्य है, कहते हैं और आगे यह भी कहते है कि जाबाली का कहना कुछ भी वेद और वर्णाश्रम धर्म विरोधी नहीं है. तो इससे यह भी समझ में आता है कि ब्राम्हण लोकायत का भी उगम पाया जाता है.
अग्निहोत्र और पाखंडी वेद ब्राम्हण –
“द्वया वै देवो:. देवा अहैव देवा:. अथ ये ब्राम्हणा:..
श्रुश्रुवांसो नुचा नास्ते मनुष्यदेवा:..शतपत २-२-६..
इन वेदों के निर्माता ब्राम्हणों ने सिर्फ आकाश में ही देव बताये तो वो खुद को इहलोक के अर्थात भूदेव कहते है .
अग्निहोत्र त्रयो वेदास्त्रि दण्डं भस्मगुण्ठ नम्. बुध्दिपौरुषहीनानां जीविकेत बृहस्पति: ..२३

बृहस्पति के यह मतानुसार वेद केवल धूर्त लोगो के प्रताप हैं. अग्निहोत्र क्रिया आदि का उद्देश्य केवल पेट भरना है. अग्निहोत्र, तीनो वे , संन्यासी होना, और पूरे शरीर पर भस्म लगाकर साधु बनना, ये सारी चीजें-  उनके भीतर बुद्धिहीनता का परिचायक है. यह उनके अंदर का पौरुष्य नही है, यह तो केवल उनकी उपजीविका का साधन है.
कृषि,व्यापर,दंडनीति का उपदेश –
मनु कहता है
एकमेव तू शुद्रस्य प्रभु कर्म समादिश् त .
एतेषामेव वर्णानाम् शुश्रूषामनसूयया ..२४

अर्थात शूद्रों ने भोग करके अपने फल से अलिप्त रहने का बंधन डालना पसंद किया दिखाई देता है. व्यापार, व्याज लेना एकमात्र वैश्य का ही अधिकार माना जाता था जो कि ब्राम्हणों की उपज है. शूद्रों को सिर्फ ब्राम्हण क्षत्रिय और वैश्य इनकी सेवा करने का उपदेश दिया है. तो इस विषमता के बराबर उलटा समतावादी उपदेश चार्वाक देते हैं –
कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यदण्ड नित्यादिभिर्बुढ: .
दृष्टैरेव सदुपायैर्भोगाननुभवेद भुवि ..२५

अर्थोत्पादन करने के लिए खेती करो, गोरक्षा करो, व्यापार करो और सामाजिक नीति बरकरार रखने के लिए दण्ड़ नीति का भी प्रयोग करो ऐसा भी सुझाव देते हैं. और आपने ही हिस्से का लाभ उठाओ, यह भीसंदेश भी देते है. इस से यही प्रतीत होता है कि चार्वाक नीतिमान थे. इसलिये तो महाभारत में प्रहलाद को नीतिवान ‘तत्वनिष्ठ’ कहा है (समसे रतम्) और उनके आगे की पीढ़ियों के बारे में भी इतिहास ने उनकी नीति और तत्वों की प्रशंसा ही की है.
फिर से अब हमे सोचना होगा
यावत् जीवेत् सुखं जीवेद् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् .
भस्मिभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः?२६



जब तक जीवन है तबतक सुख से जीओ, कर्जा लेकर घी पीओ. एक बार शरीर खत्म होने के बाद फिर से थोड़ी ही आने वाला है  इसमें लोकायत चार्वाक  खाओ, पीओ और मौज करो ऐसे संदेश देते दिखाई देते हैं. लेकिन एक चीज हमे भी ध्यान देना चाहिए कि जो चार्वाक हमने देखे इतने नीतिवान हैं, बुद्धिवादी हैं, अपने ही हिस्से का भोग लेने का सलाह देते हैं, वह चार्वाक ऐसा ऋण डुबोने वाला उपदेश कैसे कर सकते है? उनके उपदेश भोगवादी कैसे हो सकते है ? यह सोचना होगा. ऋण (कर्जा) डुबोने का धार्मिक आधिकार ब्राह्मण वर्ग को है  तो दूसरी ओर कर्जा डुबोने वाला वैश्य या व्यापारी वर्ग वो भी इसी ब्राह्मण नीति की ही उपज है. तो अब हमें सोचना होगा कि सही क्या गलत क्या?


भारतीय दर्शन का इतिहास स्त्री सत्ताक से आज तक का लंबा सफर है. उसमें हमेशा दो समूह  एक-दूसरे की आलोचना करते दिखाई देते हैं. एक वैदिक, दूसरा अवैदिक.  वैदिक आर्य परम्परा में वेद, ब्राह्मण,वेदान्त ,पुराण से आज के आरएसएस  को देख सकते हैं और अवैदिक परम्परा में  निऋति , तुळजाभवानी ,लोकायति बृहस्पति से प्रल्हाद, विरोचन, बलिराजा, महावीर, बुद्ध ,तुकाराम महाराज, शिवाजी महाराज, फुले, आंबेडकर से आज कॉ. शरद पाटील तक देख सकते हैं . लोग ये भी बोल सकते हैं कि, शरद पाटील दर्शन में कैसे ? जब हम अब्राम्हण-इतिहास के पन्ने देखेंगे तो उसमें कॉ. शरद पाटील एक व्यक्तित्व है, जिन्होंने यहां की प्रस्थापित व्यवस्था के विरोध में अब्राह्मण सौंदर्यशास्र, स्त्री सत्ताक कुल व्यवस्था से आगे बढ़कर सौत्रांन्तिक मार्क्सवाद(सौ.मा ) जैसे मजबूत हथियार यहाँ यहा क्रांति के लिए दिए हैं. इसीलिए जब आगे चलकर भारतीय दर्शन का इतिहास अपडेटे हो जायेगा तब  कॉ. शरद पाटील का नाम भी उस लिस्ट में हम पाएंगे. कॉ.शरद पाटील तक लिस्ट बढाने का यह प्रयोजन है कि घटककुल (clan) व्यवस्था के निम्न विकास अवस्था से शुरू हुई क्रांति प्रतिक्रांति की लड़ाई आज तक चल रही है. आगे भी चलती रहेगी. लेकिन हम उसमें हार नही मानेंगे.
ज्ञान ऐ बाती दिप जलाएंगे.
अंधेरे को चिरते सूरज बन जायेंगे.

संदर्भ सूचि :


१. भारतीय विवाह संस्थेचा इतिहास- वि.का.राजवाड़े पृ.२
२. मार्क्सवाद फुले-आंबेडकरवाद- कॉ.शरद पाटील पृ.२३३
३. जातिव्यवस्थाक सामंती सेवकत्व- कॉ.शरद पाटील पृ.१७०
४. जातिव्यवस्थाक सामंती सेवकत्व- कॉ. शरद पाटील पृ.१७२
५. तुळजापूरवासी भारतीबूवा के मठ की चौपट देखो
६. Outlines of indian philosophy by Prof.Hiriyanna मराठी अनुवाद भारतीय तत्वज्ञानाची रूपरेषा-                  भा.ग.केतकर पृ.१८३
७.   प्राचीन भारतमें भौतिकवाद ,पृ.१३१-१३२
८.  मनुस्मृति हिंदी अनुवाद-पंडित गिरिराज प्रसाद द्विवेदी प्रथम आवृत्ती अध्याय २ श्लो ११ पृ.२५
९.  दर्शन दिग्दर्शन –राहुल सांकृत्यायन पृ.३७६
१०..चार्वाक इतिहास आणि तत्वज्ञान-प्रा.सदाशिव आठवले लक्ष्मणशास्त्री जोशी प्रस्तावना पृ.3
११. सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.५४
१२. Outlines of indian philosophy by prof.Hiriyanna मराठी अनुवाद भारतीय तत्वज्ञानाची रूपरेषा –                भा.ग.केतकर पृ.९४
१३. सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.६३
१४ .सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.५७
१५. मनुस्मृति हिंदी अनुवाद-पंडित गिरिराज प्रसाद द्विवेदी प्रथम आवृत्ती अध्याय ३ श्लो.१६३ पृ.१४२
१६. Outlines of indian philosophy by prof.Hiriyanna मराठी अनुवाद भारतीय तत्वज्ञानाची रूपरेषा                     अनुवादक-भा.ग.केतकर पृ.९८
१७. सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.५४
१८. सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.५६
१९. सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.५७
२०. मार्क्सवाद फुले-आंबेडकरवाद – कॉ.शरद पाटील पृ.३३
२१. सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.६३
२२. जातिव्यवस्थाक सामंती सेवकत्व .कॉ.शरद पाटील पृ.१२२
२३. सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.५६
२४. मनुस्मृति हिंदी अनुवाद-पंडित गिरिराज प्रसाद द्विवेदी प्रथम आवृत्ती अध्याय १ श्लो ६१ पृ.१७
२५. सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.६३
२६. .सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.६३      

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दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

साधु का लिंग महिला ने काटा: पितृसत्ता लहू-लुहान

केरल में एक महिला ने अपने बलात्कारी श्रीहरि उर्फ़ गणेशानंद तीर्थपदा का लिंग काट दिया. इसके बाद महिला ने पुलिस को बताया कि श्रीहरि उर्फ़ गणेशानंद परिवार का धर्मगुरु था और वह तब से उसका यौन उत्पीड़न कर रह था  जब वह 16 साल की थी. महिला ने कहा कि शनिवार की सुबह जब श्रीहरि ने उसका बलात्कार करने की कोशिश की तो महिला ने चाकू से उसका लिंग काट दिया.

केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन ने महिला की तारीफ़ करते हुए इसे ‘साहसिक कार्य’ बताया. सोशल मीडिया में भी महिला के इस साहसिक कार्य की तारीफ हो रही है.

तिरुवनंतपुरम की पुलिस के अनुसार  “परिवार को श्रीहरि पर पूरा विश्वास था. 16 साल की उम्र से उसकी हवश का शिकार पीडिता इस बात से डरी हुई थी कि अगर वह बलात्कार का आरोप लगाएगी तो उसका परिवार यकीन नहीं करेगा. इसलिए, जब उसके साथ बलात्कार की कोशिश हुई तो उसने उसका लिंग काट दिया और यह सोचकर अपने घर से भाग गई कि श्रीहरि उसे मार डालेगा.” पुलिस ने उस पर यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण कानून (पोक्सो) और भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार के लिए दंड) के विभिन्न प्रावधानों के तहत व्यक्ति के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया है.

श्रीहरि उर्फ़ गणेशानंद

डाक्टरों द्वारा यह स्पष्ट कर दिया गया है कि “लिंग को वापस जोड़ने का कोई तरीका नहीं है.”  रैडिकल स्त्रीवादियों का एक समूह मानता है कि  बलात्कारियों का लिंग काट दिया जाना चाहिए. यह घटना उसका एक प्रैक्टिकल रूप है.

श्रीहरि पनमना आश्रम का एक सदस्य रहा है, जिससे इस घटना के बाद आश्रम ने पल्ला झाड लिया है.

सेक्स और स्त्री देह के प्रति सहजता और कुंठा के बीच महीन रेखा

संपादकीय

कभी आपने अपनी नानियों, दादियों, मां, मौसी, चाची या आस-पास की औरतों को सेक्स के बारे में बात करते सुना है ! यकीनन आपका बचपन यदि गांवों में बीता हो, ड्योढ़ी, जो घर के आँगन से लगी स्त्रियों की बैठक होती रही है, यदि उसे आप जानते-समझते हों, तो वहाँ के संवादों को याद करते हुए आप इस सवाल का जवाब ढूंढ सकते हैं. हालांकि यह कभी-कभी ही अनायास का संयोग हो सकता है कि आप उनसे ऐसा कुछ सुनें, क्योंकि बच्चों/किशोरों  के सामने वे सीधे इस पर बात करने में बचती होंगी, फिर भी कूट संकेतों, अचानक की हंसी और गोपनीयता मिश्रित खिखिलाहटें शायद आपको याद हों या अनायास के सुने शब्द भी. मैंने तो अपनी बड़ी नानी को सीधे मुझे संबोधित ऐसे मजाक सुने हैं, अक्सर ये पुरधाइनें (बूढ़ी और अनुभवी स्त्रियाँ) आपके निर्धारित मजाक के रिश्तों के साथ जोड़कर आपको सेक्स से सम्बंधित टिप्पणियाँ दे जाती होंगी.

यहाँ सेक्स बिकता है, सेक्स क़त्ल करता है: बदनाम नहीं, ये मर्दों की गलियाँ हैं

फिर ऐसा क्या होता जाता है कि सेक्स से सम्बंधित बातों के लिए हम दुरग्रह से ग्रस्त होते गये. सेक्स की गोपनीयता अतिरेक में तब्दील होती गई, सेक्स स्त्रियों की इज्जत से जुड़ता गया और इस कदर की यौन अंगों से जुड़े रोग भी छिपाये जाने लगे-यानी आनंद और पीड़ा दोनो ही अतिगोपनीय खाते में डाल दिये गये. शायद ऐसा सभ्यता के प्रभाव में होता जाता है. जानकार इस अतिआरोपित गोपनीयता को विक्टोरियन प्रभाव मानते हैं. अंजता-खजुराहों, कोणार्क, कामसूत्र और के इस देश में सेक्स से सम्बंधित बातचीत अश्लीलता और फुहड़पन में शुमार होने लगीं.  ड्योढ़ी-संस्कृति के जिस अवशेष की बात मैं कर रहा हूँ वह प्रायः बीसवीं सदी के अंत तक का है, लेकिन इसका पूरा शवाब 19वीं सदी तक तबतक रहा होगा, जब विक्टोरियन प्रभाव में हम कथित संस्कार की और न बढ़े. बंगाल में 19वीं सदी में भद्र (कुलीन) महिलाओं के बीच इस कथित अश्लील या फूहड़ माहौल का जिम्मेवार भदेस ( अकुलीन, खासकर यजमानी से जुड़ी ) महिलाओं को माना गया था,अंग्रेज महाप्रभुओं का अनुकरण करते भद्र बंगाली पुरुषों ने जाति और वर्ग की सीमा से परे इस महिला-साख्य को नियंत्रित करने की कोशिश की थी, नियंत्रित किया था.

सेक्स से जुड़ी खबरों, फीचरों को मिलते हिट्स 

ऑनलाइन मीडिया के जमाने में सेक्स से जुड़ी खबरों/ फीचर को हिट्स काफी मिलते हैं. यानी लोग उसे पढ़ते हैं, इन खबरों को क्लिक करने के पीछे उनकी मानसिकता चाहे जो भी होती हो, अलग -अलग, कभी उत्सुकता, कभी जानकारी और कभी कुंठा के लिहाज से लेकिन ऐसी खबरें/फीचर अनुकूलता पर प्रहार करते हैं-लोगों को सहज करते हैं. मैं ऐसा उन खबरों के बारे में नहीं कह रहा हूँ जो क्लिक के नंबर के लिए महिला विरोधी अश्लील हिंसा को प्रोत्साहित करते हैं-कभी ऊप्स मूमेंट की तस्वीरें जारी कर तो कभी ऐसे शीर्षकों से खबरें प्रस्तुत कर जो सॉफ्ट पोर्न का इशारा देते हों. हद तो तब होती है जब रील के बलात्कार को रियल बलात्कार की तरह पेश करते हुए शीर्षक दिये जाते हैं, और वैसी ही तस्वीरें लगाई जाती हैं, मसलन मध्यप्रदेश में पत्रिका ने अपनी एक फीचरनुमा खबर का शीर्षक लगाया: ‘ बड़ी खबर: एक बार फिर दहला बॉलीवुड, ऐक्ट्रेस पंखुरी अवस्थी का हुआ दिन दहाड़े रेप, सभी आरोपी फरार.’ जबकि यह फीचर/ खबर एक सीरियल में फिल्माये गये बलात्कार से सम्बंधित थी. जनसत्ता,अमर, उजाला जैसी अखबारों ने इसी हिट्स की दौड़ में शीर्षक दिया ‘सात लोगों से संबंध बनाते पकड़ी गई कतर की राजकुमारी’ और पूरी फर्जी खबर एक फर्जी तस्वीर के साथ चला दी थी. इस तरह के खबर और भ्रामक फीचर सेक्स की कुंठाओं के दोहन से हिट्स पाने की ललक और व्यापार के हिस्सा होते हैं.



बीबीसी और अन्य पोर्टल के सेक्स फीचर/ खबरें 

जिस दिन मैं यह संपादकीय (अग्रिम तौर पर) लिख रहा हूँ उसी दिन बीबीसी हिन्दी के टॉप 10 पोस्ट में तीन खबरें सेक्स से या महिला देह से सम्बंधित हैं. मसलन: 1. महिला हस्त मैथुन: मिथक और सच्चाई 2. सेक्स सेल से चलता है कुदरत का कारोबार, 3. मैं नग्न होती रहूँगी ताकि फॉलो करना छोड़ दो: पेरिस जैक्सन. यहीं बीबीसी हिन्दी में फरवरी में लगी एक खबर ‘वायरल सेक्स वीडियो ने तबाह की उसकी जिन्दगी’ अप्रैल मई तक उसके वेबसाईट के टॉप 10 ख़बरों/ फीचर में बनी रही. बीबीसी हिन्दी के वेबसाईट पर सेक्स से जुड़ी ऐसी  ख़बरें/ फीचर बारंबारता में आते रहते हैं. मसलन: हस्तमैथुन के ये हैं पांच फायदे, कहीं आप वर्चुअल सेक्स के आदि तो नहीं, जिस योनि से जन्मे उसी पर चुप्पी क्यों, कामसूत्र महिलावादी या कामवासना की किताब, चरमसुख की कुंजी क्या है, रेप को भुलाकर शरीर दोबारा सहज हो सकता है आदि. सैनिटरी पैड को लेकर बीबीसी ने एक सीरीज ही चलाया.

कामसूत्र से अब तक

अमर उजाला ने एक पोस्ट लगाया ‘हस्त मैथुन के बारे में ये बातें जानते हैं आप?’ या सेक्स के दौरान इन बातों का ख्याल रखें मर्द या सेक्स टॉय नहीं मशीन देगी सेक्स का सुख. इस तरह की खबरें और फीचर अन्य समाचार पोर्टल पर भी पोस्ट किये जाते हैं.


ऐसी खबरें और फीचर सेक्स को दैनंदिन में शामिल रूटीन के तौर पर पेश करते हैं और सहजबोध से भी भरते  हैं. इन खबरों/ फीचर का सहज प्रभाव है कि महिलाओं के शरीर पर आरोपित गुप्तता और इज्जत दोनो को चुनौती मिलती है. देह को, सेक्स को स्त्री और पुरुष पाठक सहजता में लेने लगते हैं, कुछ पीढ़ियों का अनुकूलन ख़त्म होता जाता है, यह अनुकूलन आधुनिकता के नाम पर डेढ़-दो सदियों में हमने खुद ही ओढ़ लिया है.

धार्मिक ग्रंथों, क्लासिक्स  और लोकसाहित्य में सेक्स

आधुनिकता, विक्टोरियन आधुनिकता के प्रभाव में आरोपित अनुकूलन से अलग इसी देश की सच्चाई है कि देह और सेक्स के प्रति सामाजिक सहजता के प्रतीक स्वरुप लोकसाहित्य, क्लासिक्स और धार्मिक ग्रन्थ भी खूब मिलते हैं. ये सामाजिक दैनंदिन के हिस्सा हैं, खजुराहो, अजन्ता या कोणार्क के भित्तिचित्रों को छोड़ दें तो भी. लोकगीतों, कथाओं में स्त्री देह और स्त्री-पुरुष संसर्ग के प्रसंग खूब होते रहे हैं. बच्चे के जन्म से लेकर शादी-विवाह के गीतों, फसल के दौरान के गीतों में शारीरिक संसर्ग के संकेत होते ही होते हैं, धर्म ग्रंथों में देवियों की जंघाओं, नितंब और स्तन के वर्णन से ही उनके सौन्दर्य का बिम्ब खीचा जाता रहा है, ऐसा ही क्लासिक्स में भी होता रहा है. देह-संबंध इनके कथा-प्रसंगों में किसी भी कुंठा से परे होते हैं.

  वे लाइव पोर्न में प्रदर्शन के पूर्व ईश्वर को प्रणाम करती हैं !

इस लिहाज से विभिन्न समाचार पत्रों, चैनलों के वेब पोर्टल में सेक्स और देह की खबरें और फीचर न सिर्फ हिट्स का प्रबंध करते हैं बल्कि संपादकों की अपनी समझ, प्रतिबद्धता और एजेंडे के अनुरूप इनमें एक महीन रेखा भी होती है, जिसके इस पार देह और सेक्स के प्रति सहजता होती है तो उस पार कुंठा. इस पार जानकारियाँ देते पोस्ट होते हैं, उस पार स्त्री देह के प्रति पुरुष-दृष्टि से हिंसक भाव पैदा करते पोस्ट.

संजीव चंदन 

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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’एक कहानी यह भी’: कटघरे में खड़े अहं

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com

चारो ओर से कीलती अपनी ही सीमाओं में घिर कर अवाक स्तब्ध खड़ा है व्यक्ति! वक्त का प्रवक्ता और सर्जक बनने का अकूत हौसला है उसके भीतर, लेकिन निजी जीवन-सत्यों और सम्बन्धों के संश्लिष्ट संजाल को देखने की निःसंग दृष्टि नहीं। क्या सचमुच बींधती अजनबी नजर से अपने को देखना इतना कष्टकर होता है? क्या इसलिए कि यह अपनी उन सब उपलब्धियों, निष्पत्तियों, निर्णयों और जीवन-दर्शन की क्रूर जांच की अनिवार्य प्रक्रिया है जहां आज तक स्वयं ’अपने को ’ केन्द्रीय एवं मानक इकाई मान कर वह व्यक्ति, सम्बन्ध, समाज – सब को अपने संदर्भ में बांचता आया है? या इसलिए कि जानने-पहचानने-स्वीकारने की इस प्रक्रिया में जिस अपेक्षित ईमानदारी और निर्भीकता की जरूरत होती है, वह आत्ममुग्धता के रेशों से सिरजी मानवीय फितरत में है ही नहीं? हैं तो लंगड़े पूर्वग्रह या उद्धत अहं जिनके तहत अपनी खूबियों और शहादत के बरक्स दूसरों की खामियां और टुच्चापन रख कर, काटती-छीलती नुकीली सच्चाइयों के बरक्स सहलाती-पुचकारती आत्मछलनाएं रख कर अपने और दूसरे को उतना भर देखा जाता है जिससे अपना ’देखना’ और ’निर्द्वंद्व जीना’ सुभीते से चल सके। आत्मछलनाओं का अनवरत सिलसिला जोे सच को बयान करने की छटपछाहट के सघन दबाव तले सच उगलता है तो कोई न कोई कलात्मक आड़ लेकर – चित्र, संगीत, कहानी कविता। समग्र दृष्टि अर्जित ही नहीं कर पाता आदमी! वह विडंबनाओं में जीने को अभिशप्त है और कतरा-कतरा छुपाने-उघाड़ने की आंखमिचैली में अपने को ’साबुत’ पाने को व्याकुल भी। लेखिकाओं से आत्मकथाएं लिख कर पुरुष तंत्र का पूरक पाठ प्रस्तुत करने का अनुरोध करने वाले राजेन्द्र यादव हों या अपने ही खोल में सिमटी मासूम मन्नू भंडारी – आत्मकथा लिखने के नाम पर दोनों चौककर न-न कर उठते है. राजेन्द्र यादव हिचकिचाती ईमानदारी के साथ कि ’’जिसे हम अपराध कहते हैं, वह कहीं जाने-अनजाने गलत हो जाने का दूसरा नाम है। वह हम सबके साथ है। जो चीजें मुझसे गलत हो गईं, या दूसरों के प्रति जो गलतियां मैंने की हैं, उन सबको स्वीकार करने की या स्वयं अपने सामने देख सकने की मानसिकता मेरी नहीं है। सामाजिक प्रतिष्ठा या तथाकथित मर्यादाएं ऐसी हैं जो मुझे रोकती हैं।’’ (हमारे युग का खलनायक: राजेन्द्र यादव, पृ0 620) और मन्नू बेहद पारदर्शी ढंग से कि ’’ आत्मकथा कथाकार को नहीं लिखनी चाहिए क्योंकि वह अपनी कथाओं में ही बहुत कुछ लिख चुका होता है। अपने ही जीवन का कोई न कोई अंश उसमें जरूर आता है। कहानी भले ही दूसरे की हो, लेकिन जब तक मैं उसे अपनी नहीं बना लेती हूं (मेरा भी कोई आयाम जुड़ ही जाता है) तब तक लिखूंगी कैसे!’’ (आजकल, सितंबर 2004) जाहिर है जब मन्नू भंडारी ’एक कहानी यह भी’ में इसे व्याकुल भाव से आत्मकथा न मानने का आग्रह करती हैं तब प्रश्न उठाने को मन नहीं करता कि फिर निजी जीवन के प्रसंगों, तनावों, विश्वासघातों, आरोपों और शिकायतों से भरपूर इस आत्मकथात्मक रचना को क्या कहा जाए? बस, भूमिका और प्रस्तावना में जहां-तहां टंकी आत्मस्वीकृतियों को आधार बना कर मान लिया जाता है कि यह उन पूरक प्रसंगों और सच्चाइयों को ’थ्री डाइमेंशनल इमेज’ देने का प्रयास भर है जिनकी निजता को अनायास ’मुड़ मुड़ के देखता हूं’ ने उघाड़ कर सार्वजनिक कर दिया है। तो क्या यह प्रतिवादी की ओर से दाखिल जवाबदावा है?

स्त्री का समाज और समाज में स्त्री‘अकेली’

लेकिन क्या साहित्य की देशकालातीत उदात्त सर्जनात्मकता को अदालत या अखाड़े के देशकालाबद्ध टुच्चे दांवपेंचों में रिड्यूस किया जा सकता है?

‘एक कहानी यह भी’ आत्मकथा न होकर आत्मस्मरण या सैल्फ जस्टीफिकेशन ही क्यों न हो, यह तय है कि एक साहित्यिक कृति के रूप में इसका पाठ लेखिका सहित तमाम नामी-गरामी लेखकों और जीवित व्यक्तियों को साहित्यिक पात्रों में तब्दील कर देता है जो एक-दूसरे की संगति और अन्विति में एक-दूसरे को काटते-संवारते अपनी निजता और संपूर्णता ग्रहण करते हैं। अनायास नहीं कि तब स्मृति में कौंध उठता है अमृतलाल नागर का उपन्यास ’सुहाग के नूपुर’ – कन्नगी, कोवलन, और माधवी के त्रिकोण के साथ! प्रेम की टीस, पछाड़ने और छीनने की जिद, पा कर भी ठगे रह जाने की प्रतीति, समर्पण-शहादत के साथ घुलमिल गया कुट्टनी धर्म, प्रेम की उद्दाम लहरों के वेग से रेत के घरौंदों की मानिंद बिखर-बिखर जाती मर्यादा, नैतिकता, पतिव्रत्य और शील की सुपरिचित परिभाषाएं। न, तीनों में गलत कोई भी नहीं और शायद सौ फीसदी सही भी कोई नहीं। न कन्नगी के लाचार आंसू, न माधवी का बेलगाम रोष और न कोवलन की निस्सहाय विवशता। अनुष्ठानमूलक पतिव्रत्य मे जकड़ी कन्नगी एकबारगी क्लीन चिट पा भी ले, लेकिन माधवी की निष्ठा और समर्पण, प्रेम और प्रिय के जरिए अपने भीतर की मनुष्यता और शास्त्र के कुत्सित सत्य को खंगालने का सामर्थ्य  क्या उसे वेश्या और वंचिता बनाए रखने का ही आग्रह करते हैं? कोवलन की उद्दाम वासना कब भीतरी राग से आपूरित हो सम्बन्धों के मकड़जाल से परे अपनी दैहिक-सामाजिक इयत्ता के बोध से परे हृदय पर कब्जा कर बैठी, वह स्वयं नहीं जान पाता। उसका कसूर है कि माधवी के साथ मिल कर उसने समाज का कानून तोड़ा है, और सामाजिक जकड़बंदियों के बीच जीवित-शोभित कन्नगी की त्रासदी यह कि इस फ्रेमवर्क के बाहर उसकी कोई निजी इयत्ता ही नहीं। त्रासदी कहर बन कर नहीं बरपेगी क्या? ’एक कहानी यह भी’ के मन्नू-राजेन्द्र यादव-मीता त्रिकोण चित्रण में बेशक कोवलन-कन्नगी-माधवी सरीखी संवेदना की गहराई, नैतिकता के सनातन सवाल पर बहस का आह्वान या निजी संदर्भों को वृहद् सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य देने की लेखकीय अकुलाहट नहीं है, फिर भी पुनर्परीक्षण की मांग लेकर विवाह-संस्था तो कटघरे में आ ही खड़ी हुई है और साथ ही विवाह संस्था द्वारा अनुमोदित पति-पत्नी के रोल माॅडल भी। शायद विवाह-संस्था का पुनरीक्षण मन्नू भंडारी को पसंद नहीं क्योंकि इस रचना सहित अपने समूचे कथा साहित्य में वे विवाह-संस्था की ’पवित्रता’ तोड़ने वाली बेहयाइयों से संत्रस्त रही हैं, विवाह-संस्था से बाहर निकल कर इसके स्वरूप केा विकृत और संकीर्ण करती ’नैतिकताओं’ और वर्चस्ववादी सामाजिक संरचनाओं के हस्तक्षेप पर विचार नहीं करतीं। इसलिए हथियार छोड़ कर ’आत्मकेन्द्रित आत्मलिप्त’ पति पर यही आरोप लगाती हैं कि ’’वैवाहिक सम्बन्ध की गरिमा का निर्वाह न कर पाने वाले व्यक्ति के लिए विवाह-संस्था के विरुद्ध झंडा उठाए फिरना वाजिब ही नहीं, अनिवार्य भी है। लेकिन फिर विवाह किया ही क्यों?’’ (पृ0 218) इस अभियोग के साथ अपने एकनिष्ठ पत्नी धर्म के प्रति क्षोभ भी है कि ’’क्यों मैं सबके सामने एक सुखी संतुष्ट गृहिणी का मुखौटा ओढ़ कर यह सब झेलती रही जिसे किसी भी स्त्री  के लिए झेल पाना बहुत दुष्कर है’’ और वह भी तब जब ’’न मैंने राजेन्द्र का दिया कभी खाया.. न पहना बल्कि घर और बच्ची की सारी जिम्मेदारियां भी मैं खुद ही ढोती रही।’’ (पृ0 213) बेशक वे दावा करती हैं कि यह रचना उनकी लेखकीय यात्रा पर ही केन्द्रित है किंतु इसका मूल स्वर और लक्ष्य खलनायक के तौर पर राजेन्द्र यादव की फजीहत करना है। गुनाह? एक नहीं, अनेक! पत्नी के प्रति एकनिष्ठ समर्पण का अभाव! दाम्पत्येतर प्रेम सम्बन्ध जीने की सीनाजोरी! पत्नी की अस्मिता को खंडित करता पुरुष अहं! लेकिन इसमें नया क्या है? अभियोगों को विशेषण का रूप देकर पुरुष आज तक अपने पतित्व केा वर्चस्व की निरंकुशता और क्रूरता तक हांकता आया ही है। तो क्या हाशिए से बाहर धकेली पत्नी अन्याय के खिलाफ गुहार न लगाए? मान ले कि अपनी जड़ता में जड़ीभूत स्त्री या तो अहिल्या की तरह शिला बन जाने को अभिशप्त है या भीत कातरता में मुक्ति द्वारों की सांकल खोलने में असमर्थ?

नहीं! मन्नू भंडारी अपना प्रतिरोध दर्ज करना चाहती हैं।
तो सबसे पहले कटघरे में पति यानी राजेन्द्र यादव!

राजेन्द्र यादव के ‘पेंचदार गुट्ठल’ व्यक्तित्व की एक-एक गांठ उघाड़ते हुए वे जिस तरह उन्हें प्रस्तुत करती हैं, तब वहां राजेन्द्र यादव नहीं, ’मेरे आका’ का मुस्तफा खार अपनी तमाम सामंती क्रूरता और सम्मोहन, निरंकुशता और नृशंसता के साथ आ विराजता है। बच्ची और परिवारियों के सुख-दुख से उपरत; अंतरंग मित्रता को गहरी संवादहीनता के कगारों तक ले आने वाला अहंवादी (’’किसी का भी वर्चस्व स्वीकार करना तो इनके अहं को गवारा ही न था’’, पृ0 82); सहजीवन के नाम पर पत्नी को ’समानांतर जिंदगी का आधुनिकतम पैटर्न’ थमाता हिपोक्रेट ताकि उसकी ऐयाशियों और विश्वासघातों का सिलसिला बदस्तूर चलता रहे (पृ0 48); पत्नी के संदर्भ में सामान्य सी इंसानियत को भी दरकिनार करता, अपनी शर्तों पर जीता पौरुषीय अहं जिसके लिए पत्नी का अर्थ है मूक समर्पिता नर्स (पृ0 88)। न, पत्नी के विशिष्ट आत्मनिर्भर व्यक्तित्व की अकुंठ स्वीकृति नहीं। बल्कि वही तो कलह-क्लेश की मूल जड़ क्योंकि मन में कहीं यह संस्कार जड़ें जमाए बैठा है कि ’’परिवार में वर्चस्व और प्रभुत्व केवल उसी का हो सकता है जो परिवार का भरण-पोषण करे।’’ (पृ0 208) इसलिए बच्ची की देखभाल को ’आयागिरी’ के साथ जोड़ने की मर्दवादी मानसिकता जो अपने आर्थिक निठल्लेपन के कारण मर्माहत हो पत्नी को बुरी तरह चींथ डालती है तो पत्नी द्वारा अलग रहने के निर्णय पर फूट-फूट पड़ती कातर रुलाई – ’’मन्नू, यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा ब्लैक स्पाॅट है… तुम्हीं मुझे इससे उबार सकती हो….देखो, तुम मुझे छोड़ कर मत जाना… तुम मुझे छोड़ कर नहीं जाओगी।’’ (पृ0 205) छल और झूठ की गंध से शून्य इस आग्रह पर कौन पत्नी न बलिहारी जाए? तहमीना हो या मन्नू – पत्नियों की जमात कमोबेश एक सी होती है – सुरक्षा के नाम पर ब्रीदिंग स्पेस देता बाड़ा और सम्बन्धों के नाम पर संवरी लता की तरह फैलने की स्वतंत्रता! बेड़ियों से बंध कर उड़ने की लालसा! पत्नी की परंपरागत रूढ़ छवि क्या आज भी इस द्विधा से मुक्त हो पाई है?

राजेन्द्र यादव की स्वीकरोक्ति और स्त्रीवादी प्रतिबद्धता के सवाल !

जाहिर है सारी सहानुभूति मन्नू भंडारी की झोली में। मन्नू जिसने पूरे पैंतीस साल रोते-झींकते ’बहुरूपिए’ के साथ जिंदगी काटी, मन्नू जिसने घर के भरण-पोषण के लिए अपने को नौकरी और व्यावसायिक लेखन में झोंका (पता नहीं क्यों अपनी ही किरचों से लहूलुहान मन्नू के बरक्स बार-बार ’आधे-अधूरे’ की सावित्री महेन्द्रनाथ की लाचारगी के साथ संपृक्त होकर याद आती रही?) ; मन्नू जिसने अकेले दम दोहरी-तिहरी व्यस्तताओं के बीच बेटी और नातेदारियों को सम्हाला; मन्नू जिसने हर टूटन को हथियार बना कर लेखन को धारदार किया। क्या इसी सहानुभूति, स्तुति और सतीत्व के लोभ में कोढ़ी पतियों को कंधे पर लाद वेश्यालयों तक ले जाती पत्नियों का मिथ आज भी जीवित नहीं समाज में? पत्नी की मानवीयता  को खंड-खंड कर उसे रूढ़ छवियों, दायित्वों, विसर्जन एवं स्थगन की अमूर्त प्रक्रिया में तब्दील करता हुआ! लेकिन किशोरावस्था से मन्नू जिस वक्त की उंगली पकड़ कर चली हैं, वह ’’मूल्यों के मंथन का युग था… पाप-पुण्य, नैतिक-अनैतिक, सही-गलत की बनी-बनाई धारणाओं के आगे प्रश्नचिन्ह ही नहीं लग रहे थे, उन्हें ध्वस्त भी किया जा रहा था।’’ ( पृ0 22) स्वाभाविक है कि ’सुनीता’, ’त्यागपत्रा’, ’शेखर: एक जीवनी’, ’चित्रलेखा’ आदि के जरिए उन्होंने जो संस्कार, दृष्टि और मूल्यबोध अर्जित किया, वह न परम्परावादी हो सकता है, न यथास्थितिवाद का पोषक। इसकी झलक उनके काॅलेज जीवन की कुछ घटनाओं में भी मिलती है जहां स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ने का निर्द्वंद्व  निर्भीक भाव एक ओर काॅलेज के प्रांगण में हक की लड़ाई के लिए हड़ताल, हुड़दंग और सार्थक नेतृत्व में लक्षित होता है तो दूसरी ओर प्रगतिशील पिता से चलने वाली लम्बी लड़ाई में भी। लेकिन विवाह के बाद मानो कायान्तरण ही। स्वयं चकित हैं मन्नू भी कि ’’किशोरावस्था में मेरी जिन रगों में लावा बहता था, उनमें क्या अब निरा पानी बहने लगा है?’’ (पृ0 213) कहां से आ जाती है पत्नी में मिमियाती-झींकती आत्मदयाग्रस्त स्त्री जो उसकी निरीहता में दादी-नानी की तरह पति को पालतू बना लेने का अटूट विश्वास नत्थी कर युद्ध-सन्नद्ध बनाती है कि ’’मेरा समर्पण एक न एक दिन राजेन्द्र को जरूर बदल देगा’’ (पृ0 52)। विश्वास दरकने का दंश पराजय बोध को गहराता है ’’एक स्वच्छंद और मनमाने ढंग से जीवन जीने की इनकी जिद जिसमें सारे प्रयत्नों के बावजूद मैं जरा सा भी परिवर्तन नहीं ला सकी थी’’ (पृ0 188) तो ’किसी का कंधा, किसी की गोद’ तलाश कर वहीं लिथड़े रहने की कातरता एक अवश आदत बन कर निष्कृति के सारे द्वार बंद कर देती है। ऐसा नहीं कि आत्मपड़ताल की प्रक्रिया में आत्मधिक्कार से भर कर मन्नू ने अपनी रीढ़विहीन कातरता पर क्षोभ प्रकट न किया हो, लेकिन अपने को कटघरे में खड़ा कर चीन्हने की बजाय वे बार-बार लक्ष्यभ्रष्ट सैल्फ जस्टीफिकेशन की लीपापोती में जुट जाती हैं। मसलन, पिता से विद्रोह के रूप में की गई शादी को सफल बनाने (या दिखाने) की चुनौती; घर को बनाए रखने का विशुद्ध स्त्रियोचित दायित्व जो भावना के उच्छ्ल आवेग में अहं और आत्माभिमान को भी बहा ले जाता है – ’’सोचने पर आज तो यह भी लगता है कि कौन जाने तीन दिन तक ऊपर से भले ही मैं अपने संकल्प पर दृढ़ता की परतें चढ़ाती रहीं, पर भीतर ही भीतर मैं भी तो ऐसे ही किसी बिंदु की, छोर की, संकेत की प्रतीक्षा में ही थी जिसे थाम कर मैं अपने संकल्प से डिग सकूं।’’ (पृ0 205) ; सामंत पति के लबादे के ठीक नीचे सहयोगी-प्रेरक साहित्यकार मित्र की निर्दोष मैत्री  को न खोने की दूरंदेशी – ’’कैसी विडम्बनापूर्ण सच्चाई है कि राजेन्द्र के व्यक्तित्व का एक पक्ष जहां मेरी हीनता ग्रंथि पर परत दर परत चढ़ा कर मेरे आत्मविश्वास को खंडित करता रहा है, वहीं दूसरा पक्ष आत्मविश्वास अर्जित करने में सहायक ही नहीं रहा बल्कि लिखने के लिए मुझे बराबर प्रेरित-प्रोत्साहित भी करता रहा है।  नई से नई पुस्तकों और पत्रिकाओं का आना, सभी तरह के साहित्यकारों के जमावड़े… उत्तेजक बहसें.. गप्प गोष्ठियां, मेरे जैसे लेखक के लिए बड़ा प्रेरक था यह वातावरण… मेरा मूल प्रेरणा स्रोत! इसीलिए जब तक मेरे व्यक्तित्व का लेखक पक्ष सजीव-सक्रिय रहा, चाह कर भी मैं राजेन्द्र से अलग नहीं हो पाई।’’ (पृ0 215) एकाएक यहां लेखिका की दो स्वीकारोक्तियों को उद्धृत करने का मन हो आता है। एक, ’’राजेन्द्र से विवाह करते ही लेखन के लिए तो जैसे राजमार्ग खुल जाएगा और उस समय यही मेरा एकमात्र काम्य था’’ (पृ0 10 ) और दूसरी, ’’ठेठ यथार्थ की भूमि पर खड़े होकर ही मैंने यह निर्णय लिया है क्योंकि अब मुझे जिंदगी से जो चाहिए, वह एक लेखक के साथ ही मिल सकता है।’’ (पृ0 201) साथ ही एक प्रश्न भी अंकुराता है कि यशस्वी लेखक को साबुत पा जाने की हड़बड़ी ने ही कहीं उन्हें राजेन्द्र यादव की विवाह करने की टालमटोलू अन्यमनस्कता को नजरअंदाज करने को मजबूर नहीं किया? आखिरकार एक अपंग, आर्थिक दृष्टि से आधारहीन व्यक्ति के साथ सहजीवन शुरु करने के पीछे मूल जज्बा क्या थ? प्रेम की प्रगाढ़ता? लेखक राजेन्द्र यादव के पेचदार गुट्ठल व्यक्तित्व की महीन परतों के नीचे छिपे व्यक्ति राजेन्द्र यादव से अभिन्नता? या एक-दूसरे को समृद्ध करने के प्रयास में स्वयं समृद्धतर होते चले जाने की सहज मानवीय अभिलाषा जिसके मूल में विश्वास और सौहार्द दोनों की समान उपस्थिति अनिवार्य है? लेकिन क्या किसी एक भी विकल्प पर निश्चयपूर्वक उंगली रखी जा सकती है? ’’अंतरंग परिचय से बिल्कुल अपरिचय की दुनिया में लौट जाने की तकलीफ’’, अपनी ’’दुखती रगों और खाली कोनों’’ को लेखन से पूरा करने की मुआवजी कोशिशें; जुबान पर ’छुरी-कांटे’’ उगा लेने की आवेश भरी प्रतिक्रियाएं या हर तालाबंद गोपनीयता को जान लेने की जासूसी हरकतें – सम्बन्धों को खोखला कर देने को काफी हैं। सम्बन्ध जो नकार का प्रत्युत्तर नकार में नहीं चाहते, नकार को निर्विकार तक लाने के लिए अपनी मनुष्यता के बरक्स दूसरे की मनुष्यता को छूते-उद्वेलित करते हैं।

यहीं चारों खने चित्त हो जाती हैं मन्नू! रिक्तियां और गैप्स..किंवदंतियों और विवादों से गर्माए राजधानी के प्रभावक्षेत्र से दूर कस्बे में बैठा आतुर पाठक तथ्य की तह में छिपे सत्य का साक्षात्कार कर अपनी निजी राय बनाना चाहता है, किंतु जगह-जगह तथ्यों के नाम पर बंद चुप्पियां! या ’’..फिर कुछ ऐसा घटा कि मुझे निर्णय लेना ही पड़ा कि बस, बहुत हुआ’’ (पृ0 163) जैसी छुपाती-भरमाती अ-पारदर्शिता! क्या सच्चाई को छुपाने का एक अर्थ किसी दूसरे को विकृत और विद्रूप करना नहीं?

हालांकि मन्नू भंडारी ने दावा किया है कि ’एक कहानी यह भी’ लिखते समय उन्होंने निःसंगतापूर्वक अपने अतीत को उधेड़ा है – ’’अपने को अपने से काट कर बिल्कुल अलग’’ कर देने की ’डाॅक्टरी’ कुशलता के साथ। लेकिन उनकी सबसे बड़ी दुर्बलता है कि शब्द दर शब्द वे हर प्रकरण में इन्वाॅल्व हैं। न, अनजाने नहीं, जानती-बूझती हैं, अपनी हरकत पर शर्मिंदा भी हैं और शिकायतों की लम्बी फेहरिस्त तहा कर अपने को संयमित भी करती हैं कि ’’आत्मदया में लिपटी यह गाथा अब बिल्कुल बंद क्योंकि मुझे खुद इससे बड़ी चिढ़ है। पर क्या करुं, लाख कोशिशों के बावजूद जब-तब इसके दौरे पड़ ही जाते हैं।’’ (पृ0 169) मन्नू की समस्या यह है कि पूरी पुस्तक में ’चुप्पी’ के बावजूद एक खास किस्म के बड़बोलेपन का शिकार वे होती रही हैं जिसका मूल कारण है आवेशभरी प्रतिक्रियात्मक मुद्रा में अपने को ’देखने’ की अनिवार्यता को निरंतर स्थगित करने रहने का जनून। इससे उनके व्यक्तित्व में एक ओर आत्मरक्षा और आत्मगौरव की मिश्रित सजगता आई है -’’स्वभव से ही मैं बहुत तनावग्रस्त हूं। लेकिन यदि अनुकूल परिस्थितियां मिलती… अपनत्व भरा साथ मिलता तो निश्चित रूप से मेरे ये सारे तनाव ढीले ही नहीं होते , बल्कि समाप्त हो जाते’’ (पृ0 169); तो दूसरी ओर औसत स्त्री की ’संतुष्ट’ नियति का सामान्यीकरण करते हुए अपने दुख का महिमामंडन – ’’यह मैं अच्छी तरह जानती हूं कि आज की हर स्त्री घर-परिवार के अतिरिक्त और भी न जाने कितनी जिम्मेदारियां निभाती है, उसमें अपनी ऊर्जा खर्च करती है लेकिन अपने साथी का सहयोग प्यार भरा लगाव निरंतर उस ऊर्जा की क्षतिपूर्ति भी करता रहता है… मेरे साथ क्या हुआ कि मैं सिर्फ खर्च ही करती रही और एक ऐसी स्थिति आई कि मैं बिल्कुल खाली-खोखली हो गई… रोगग्रस्त शरीर.. निष्क्रिय जीवन और खंडित आत्मविश्वास की किरचों में लिपटा व्यक्तित्व!’’ क्या एक संवेदनशील उद्बुद्ध लेखिका से ऐसे मोहाविष्ट एकांगी निष्कर्षों की अपेक्षा की जा सकती है जिनका सारा लेखन मध्यवर्गीय औसत स्त्री के परिवार और मन के कोने-अंतरे में झांक कर उसके कहर, क्लेश और सपनों को जीता रहा है? पत्नी, गृहिणी और व्यक्ति के रूप में क्या हर स्त्री कमोबेश टूटने-सहने की त्रासदी के बीच अखंड बनी रहने की जिजीविषा से प्रदीप्त नहीं होती रहती?


तो क्या दुख का अतिरेक व्यक्ति को संकुचित और आत्मकेन्द्रित बना देता है – पूरे फलक से काट कर एक निर्जन द्वीप में कैद करता? शायद! लेकिन मन्नू लेखिका हैं और कहानियों में उनके भीतर की सर्जनात्मकता पूरी ऊँचाई के साथ सारे विस्तार को बांहों में समेट लेना चाहती है। चूंकि कहानियों में जहां-तहां टुकड़ा-टुकड़ा आत्मकथा निबद्ध कर देने का दावा करके वे ’बंद दराजों का साथ’, ’एक बार और’, नायक खलनायक विदूषक, करतूते मरदां, स्त्री सुबोधिनी जैसी कहानियों का नामोल्लेख करती हैं तो यह कहना आसान हो जाता है कि भगिनीवाद विस्तार की नारीवादी अवधारणा ही उन्हें अंतःशक्ति प्रदान करती है। बेशक मीता पहले दिन से ही उनके दाम्पत्य सम्बन्धों में विघटन का अहम कारण बनी है और एक स्वाभाविक सौतिया डाह के कारण दाम्पत्य सम्बन्ध के विघटन की इस महागाथा में उन्होंने मीता के पक्ष और पीड़ा को उभारने की तिल भर कोशिश भी नहीं की है लेकिन कहानियों में पुरुष-प्रवंचिता प्रेयसियों का चित्र उकेरते हुए वे मानो मन्नू नहीं, मीता हो जाती हैं जहां पति-पत्नी के बीच ’वो’ बन जाने की अभिशप्त नियति हिंसक बना कर वस्तुतः उसकी लस्त-पस्त बेचारगी को ही उघाड़ती है। कुचला आत्मसम्मान सांप बन कर फन लहराता हुआ कुंज और मधु के बीच आता जरूर है लेकिन बार-बार डंसता उसे ही है। अंधी गली का रूप लेकर भावुकता कब तक मन्नू-मीताओं को भरमाती रहेगी – मन्नू नहीं जानतीं क्योंकि वे दोनों बैताल सी इन्हीं गलियों में भटक रही हैं – निरंतर! लेकिन पाठक जानता है कि विवाह के सुरक्षित दुर्ग में बैठी पत्नी की धाक, अधिकार और गरिमा को अंगूठा दिखा कर अधिकारविहीना अकिंचन प्रेयसी स्मृति पर हावी हो जाती है। वंचित-प्रवंचित, कमजोर-तिरस्कृत के प्रति सहानुभूति के कारण? या इसलिए कि निर्बंध प्रेम और अनुशासन में पुराना बैर है?

क्या पुरुष अपने समदुखी ‘मीत’ की व्यथा -कथा समानुभूति से लिखेंगे ?

आत्मकथाकार/निजी जीवन की आख्यानकार के रूप में मन्नू से अपेक्षा थी कि निजी जीवन की लव-हेट गुंजलक (जिसका उल्लेख वे इससे पूर्व 1964 में लिखे संस्मरणात्मक आलेख में भी कर चुकी हैं) से निकल कर वे दाम्पत्य सम्बन्धों के विश्लेषण के बहाने उन नई संकटापन्न स्थितियों का विश्लेषण करेंगी जो स्त्री को शिक्षित, स्वावलम्बी एवं आधुनिक बना कर उसे वक्त से आगे ले जाती हैं और वक्त की दौड़ में पिछड़े अहंनिष्ठ पुरुष को अपेक्षाकृत अनुदार और संकीर्ण बना कर सामंती मूल्यों की पुनप्रतिष्ठा में जुट जाती हैं। आखिरकार वे स्वयं स्वीकारती हैं कि उनका युग मूल्यों की मीमांसा का युग था, लेकिन सवाल यह है कि उन्होंने किन दिशाओं और मूल्यों को एक्सप्लोर करने के लिए स्त्री छवि गढ़ी? आत्मकथा शिकायतों-प्रत्यारोपों का पुलिंदा मात्रा नहीं होती, एक साहित्यिक कृति के रूप में वस्तुनिष्ठ चरित्र ग्रहण कर वह शब्दों और घटनाओं, मनःस्थितियों और मनोद्गारों के जरिए स्वयं लेखक के व्यक्तित्व की महीनतर एवं संश्लिष्ट परतें उघाड़ने लगती है। तब ऐसा क्यों लगता है कि उनके कथा साहित्य की नायिकाओं के व्यक्तित्व का पैटर्न – निरंतर द्वंद्वग्रस्तता, निरंतर निर्णय-दुर्बलता, स्वार्थपरक शाइस्तगी और यथास्थितिवाद में परित्राण पाती उदारता – ’एक कहानी यह भी’ में भी ज्यों का त्यों उभर कर आ रहा है? कहीं सर्जनात्मकता का अभाव तो नहीं? सर्जनात्मकता वह नहीं जो साहित्य रच कर ही हो। सृजन विचार और क्रिया के स्तर पर कुछ नया सोचने/करने में भी निहित है। संवेदना के साथ जुड़ कर सृजन जब मिशन का रूप लेता है तो सक्रियता और सकारात्मकता, प्रतिकूलताओं से टकराने का जज्बा और जिजीविषा व्यक्तित्व को अद्भुत ओज और ऊर्जा दोनों देते हैं। सृजन शांतिकाल का मनोविलास है ही नहीं, प्रसव पीड़ा के दौरान बीहड़ पगडंडियों पर दौड़ते-गिरते अपने को ’नया’ करते रहने की अनवरत प्रक्रिया का नाम है। इसलिए चाहे वे अपनी लंबी निष्क्रियता और न लिख पाने के कारणों को ’मन में रचे-बसे तनाव’ के मत्थे मढ़ दें, लेकिन सवाल तो उन्हें भी मथता रहा है कि उज्जैन में प्रेमचंद विद्यापीठ पर रह कर दो बरस उन्होंने किया क्या? क्या यह एक लेखक की भीतरी ऊर्जा, संवेदन और अंतर्दृष्टि के ’चुक’ जाने की पूर्वसूचना नहीं जो ’एक कहानी यह भी’ में घटनाओं का सपाट ब्यौरा बन कर आती है – साहित्यिक औदात्य से छूंछी? क्या वजह है कि इसी रचना में मन्नू के यशस्वी लेखकीय व्यक्तित्व की ऊँचाई को अंगूठा दिखा कर अपनी पोतियों के लिए मराठी रचनाओं का टूटा-फूटा हिंदी अनुवाद करती अ-लेखक वृद्धा सर्जनात्मक ऊँचाइयों का संस्पर्श करने लगती है? दरअसल अपने आवेश और भावाकुलता को थिरा कर अंतर्दृष्टि से संगुम्फित न कर पाने की दुर्बलता मन्नू को उन सिरों को एकान्विति में जांचने की नजर नहीं दे पाई जो हताशा और पराजय के बाद ही आशा और जिजीविषा के अदम्य आवेग से आपूरित होती है। तहमीना का विद्रोह, तसलीमा की उद्दंड निर्भीकता, भंवरीबाई की संकल्पदृढ़ता और मुख्तार माई की सिर पर कफन बांध कर मौत की आंख में धूल झोंकने की चतुराई – निजी दुखों की शिकायती पोटलियों को परे फेंक देने के बाद की ही उपलब्धियां हैं। हां, परे फेंकने की इस प्रक्रिया में संवेदनशून्य होने की प्रतिक्रियात्मकता नहीं, अपने जैसी प्रताड़िताओं के आंसू पोंछ कर सह-अस्तित्वपूर्ण साझी दुनिया रचने की स्वप्नशीलता है।

साहित्यिक कृति के रूप में ‘एक कहानी यह भी’ मन्नू भंडारी के समकालीन साहित्यिक परिदृश्य की भीतरी नग्न सच्चाइयों का भी पर्दाफाश करती है जहां इमरजेंसी के दौरान सरकारी भोंपू बन कर रघुवीर सहाय और धर्मवीर भारती जैसे दिग्गज अपनी भौतिक लोलुपताओं के साथ निर्वसन हो जाते हैं तो राकेश-राजेन्द्र-कमलेश्वर की तिकड़मी तिकड़ी साहित्य में माफिया के बीज बोती दीखती है। लेकिन इस रचना का तात्कालिक महत्व न मन्नू की लेखकीय यात्रा का हमसफर बनने की चाहत में है, न अन्य लेखकों के टुच्चेपन का रस लेने में। यह सिर्फ और सिर्फ राजेन्द्र यादव को घेर-घार कर दुरदुराने-मारने का महानुष्ठान है। फलतः साहित्यिक रचना से अधिक वैयक्तिक राग-द्वेष की अभिव्यक्ति! लेकिन जो परिदृश्य में अपनी ठोस उपस्थिति के बावजूद अनुपस्थित है, उसके खलनायकत्व को आंख मूंद कर क्यों स्वीकारा जाए? कटघरे में है तो बयान देने का अधिकार तो है इस लोकतंत्रा में उसे भी। इसलिए मैं नहीं समझती कि ’मुड़ मुड़के देखता हूं’ के बगैर ’एक कहानी यह भी’ के कोई मायने हैं। बकौल मन्नू घुन्ना व्यक्तित्व है राजेन्द्र यादव का, हर झूठ, हर जिद, हर नाजायज हरकत को ढांपने के लिए विश्वसनीय तर्क गढ़ने में माहिर आत्ममुग्ध-आत्मरतिग्रस्त व्यक्ति जो अपने से इतर अन्य किसी से प्यार कर ही नहीं सकता। यहां तक कि मीता सहित अनगिन प्रेम सम्बन्धों में अधिकार और समर्पण (जिसे मन्नू प्रेम का विस्तार मानती हैं) का भाव नहीं, ’वर्चस्व के बोध से छके हुए एक कुंठाहीन पूर्ण पुरुष’ का अनुभव जीने का दर्प है। बेशक अपनी इस ’लम्पटता’ का संज्ञान लेते हैं राजेन्द्र यादव लेकिन साथ ही कुछ इस तरह की जिज्ञासा भी करते हैं कि क्या कोई भी मनोविकार या मनोवृत्ति अपने परिवेश की उपज नहीं होती? मन्नू क्षुब्ध हैं कि ’या.. या.. या.. के विकल्प लगा कर यह बहुरूपिया ऐयार पाठकों को भरमा कर हर बार अपनी असली सूरत छुपा ले जाता है लेकिन क्या ऐसा नहीं कि प्रश्न के रूप में दिए गए सारे विकल्प राजेन्द्र यादव एवं पूरी पुरुष जाति के मनोविज्ञान को खंगालने की श्रृंखला बन जाते है? ’’यह अपनी रचनात्मक ऊर्जा और वैचारिक स्वाधीनता के लिए बार-बार किया जाने वाला नवीनीकरण है या अधूरे होने की हीनता-ग्रंथि से उत्पन्न दमित सेक्स की विकृत अभिव्यक्ति जो बार-बार दूसरे से अपनी पूर्णता का आश्वासन चाहती है? यह मेरी निजी कुंठा है या प्राक् ऐतिहासिक आदिम पुरुष-वृत्ति जहां वह अपने कक्षों में शत्रुओं और शिकारों के सिर सजा कर विजय के गर्व को बार-बार जीवित रखता है? या वह सामंत जिसे हरम में अनगिनत भोग सामग्री चाहिए?’’ या फिर इसलिए कि ’’हर नई स्त्राी के साथ सम्पर्क पुरुष-व्यक्तित्व के उन अनुद्घाटित आयामों को खोलता है जिन्हें उसने पहले कभी आविष्कृत नहीं किया था।’’ ठीक शरतचंद्र के नायकों की सी स्थिति जो राजलक्ष्मी, अभया, सावित्री, पारो, चंद्रमुखी के बिना अपनी अस्मिता को पा ही नहीं सका। राजेन्द्र यदि जीते-जागते व्यक्ति न होकर कथानायक होते तो मीता, दीदी, मन्नू के संदर्भ में उनके विकसित अहं और स्निग्ध अंतःप्रकृति के तीन अंतरंग खूबसूरत चित्रों के साथ-साथ व्यक्ति और लेखक के अंतर्सम्बन्धों की महीन पड़ताल की जा सकती थी। अब बेशक वे लाख कहते रहें कि उनकी जिंदगी में ’’मीता संगीत के निःशब्द अंतरे की तरह बनी रही तो जिस तार ने सुर संभाले रखा या लगभग संचालित करती रही, वह तो दीदी है। उधर मन्नू न होती तो जमीनी सच्चाइयों की यह अनुभव-सम्पन्नता कहां से आती – ठहराव और गहराई तो मन्नू ने ही दी’’ (मुड़-मुड़के देखता हूं’, पृ0 131) , मन्नू के नजरिए ने ढर्राबंद जिंदगी न जी पाने की उनकी असफलता को ’लम्पट’ की उपाधि तो दे ही दी है।

बहुपठित राजेन्द्र यादव के अर्जित ज्ञान और मौलिक उद्भावनाओं को लेकर कहीं दो राय नहीं। ऐसा व्यक्ति जो जीवन के हर लम्हे और स्थिति का विश्लेषण कर उसे कहानी का रूप देने को सन्नद्ध रहे, वह सामान्य तो है ही नहीं। विशिष्ट भी नहीं क्योंकि बोहेमियन के लिए सांसारिक मूल्यांकन कोई मायने नहीं रखते। वे क्रांतिदर्शी, स्वप्नजीवी, स्वतंत्रचेता ही नहीं हुआ करते, बेहद जिद्दी, महत्वाकांक्षी और उन्मादी भी होते हैं और कठोर आत्मालोचक भी। आंतरिक बुनावट में बेहद संश्लिष्ट और जटिल। स्वयं अपने को समग्रता में न पहचान पाएं, लेकिन यथार्थ के नाम पर चौहद्दियां बुनती जड़ता का अतिक्रमण करने को व्याकुल; देश-काल को नए सिरे से सिरजने को आतुर – मनुष्य की आदिम मनोवृत्तियों के साथ जहां पाप-पुण्य, मर्यादा-अश्लीलता की चोर निगाहों तले लहूलुहान होती मनुष्यता सिर धुनती कुंठाओं में तब्दील होने की त्रासदी न भोगती हो, वरन् अंतर-वैयक्तिक सम्बन्धों का संजाल रच कर एक एक सा ब्रीदिंग स्पेस जुटाने में संलिप्त हो; जहां निजता और पारस्परिकता दोनों की रक्षा होती रहे, सदा। यकीनन एक यूटोपिया! इसलिए सात्र-सीमोन की मित्रता से प्रभावित राजेन्द्र यादव जब दम घोंटती विवाह संस्था के विकल्प रूप में लिव इन रिलेशपशिप की वकालत अपने उपन्यास ’उखड़े हुए लोग’ में करते हैं तो हिंदुस्तानी वक्त से बहुत आगे निकल जाते हैं। दूर, दुर्बोध और मुजरिम! एक ऐसी स्थिति जिसे ’आते जाते यायावर’ में पूरी आंतरिकता से चित्रित कर देने के बावजूद मन्नू रोजमर्रा के व्यावहारिक जीवन में संभव मान ही नहीं पातीं। ’घर’ और ’निर्बंध उत्तरदायित्वहीनता’ दोनों को साथ-साथ पा लेने की औसत ललक उन्हें कहीं बौना भी बना देती है लेकिन ’आत्मसंतुष्टि की दुहराव भरी जिंदगी’ भीतर के बुद्धिजीवी को एकदम स्वीकार्य नहीं। फलस्वरूप विद्रोह और नकार – अपने को साबुत पाने के प्रयास में अपने को तोड़ना और गढ़ना। विश्व क्लासिक साहित्य के नायक के सनातन द्वंद्व का साक्षी हूक, कसक भरी अनवरत तोड़-फोड़ हांफते-जूझते नायक को एक खास किस्म का औदात्य और आह्लाद अवश्य देती है। निस्सीम को बांहों के घेरे में बांध लेने का आह्लाद! राजेन्द्र यादव का दुर्भाग्य कि वे क्लासिक रचना के पात्रा नहीं!

उल्लेखनीय है कि जहां ‘एक कहानी यह भी’ में मीता प्रसंग आतंक और अनैतिक भाव से आया है, वहीं मुड़-मुड़के देखता हूं’ में परिपूर्णता, श्रद्धा और अपराध बोध के मिले-जुले भाव में। ’तपस्वी सा जीवन बिता रही’ मीता के प्रति एक कोमल भाव (साॅफ्ट काॅर्नर) है जिसे वे छिपाते नहीं। हां, उसके साथ किए गए विश्वासघात के कारण आत्म-निर्मम जरूर हो गए हैं। लेकिन मोहन राकेश, मनमोहन ठाकुर के संस्मरण हों या ’देखा तो इसे भी देखते’ शीर्षक के अंतर्गत मन्नू का जबाव – मन्नू से विवाह के संदर्भ में मीता को लेकर एक खास किस्म की दुविधा उनमें देखने को मिलती है, मित्रों से मन्नू तक अपनी कमजोरी को सम्प्रेषित करने का आग्रह और न-नुकर की भाषा में मन्नू को कहा गया यह वाक्य -’’सोचता हूं पहले मीता सैटल हो जाती तो…’’। न, छल और बेईमानी का सवाल ही नहीं। है तो दुविधा और निर्णय-दुर्बलता जो ’यही सच है’ की ढुलमुल दीपा को हिंदी साहित्य का यादगार पात्रा बना देती है। यानी जिंदगी से जीवनीशक्ति पाने के बावजूद साहित्य और जीवन के मूल्यांकन के मानदंड एक नहीं हैं? बेशक! साहित्य लार्जर दैन लाइफ है, जिंदगी के द्वंद्वों और क्षुद्रताओं का समाधान-उन्नयन करता एक प्रेरणा-पुंज; वर्तमान की कंटीली जकड़न से मुक्ति की स्वप्निल उड़ान; अंतःशक्ति और स्फूर्ति, ऊर्जा और ओज को संवेदना और दृष्टि के साथ निबद्ध कर ’कल’ को मनचाहे ढंग से जीने की हौंस को साकार करता स्वप्न! लेकिन जिंदगी के तलछट में सिर्फ घोंघे और कीचड़ नहीं, न ही विशाल टाइटैनिकों को डुबोते आइसबर्ग! बल्कि जिंदगी का आदिम स्रोत तो वही है जहां नौ बटे दस हिस्से पर कब्जा करते आइसबर्गाें के खौफ से मुक्त एक बटा दस हिस्से पर ही संवाद और सृजन की संभावनाएं जगाई जाएं। ’मुड़-मुड़के देखता हूं’ में ये संभावनाएं हैं और इसीलिए बकौल मन्नू भंडारी यह एक साहित्यिक कृति भी बन गई है जबकि ’एक कहानी यह भी’ घटनाओं और ब्यौरों की सपाटबयानी। दोनों में फर्क यह भी है कि सारे आरोपों और गलतियों को स्वीकारते हुए राजेन्द्र यादव जहां आत्मविश्लेषण करते हुए अपनी मानसिक संरचना में देश-काल, समाज-संस्कृति-इतिहास की वाजिब हिस्सेदारी को रेखांकित कर आम आदमी की संरचना को समझने का अहम फार्मूला अनायास उपलब्ध करा देते हैं, वहीं मन्नू भंडारी ’’एक-एक बात, एक-एक ब्यौरा, एक-एक पंक्ति सही’ होने के दावे के बावजूद ’एक कहानी यह भी’ के महत्व को रोजमर्रा की घरेलू लड़ाइयों से ज्यादा नहीं बढ़ा पातीं। अतः अपनी अंतिम परिणति में यह कांता भारती के उपन्यास ’रेत की मछली’ जैसी औसत रचना बन कर रह जाती है – चटखारेदार! अलबत्ता एक सवाल जरूर टंगा रहता है कि पुरुष के सामंती चरित्रा पर उंगली उठाने वाला सुधी समाज उसके सामंती व्यक्तित्व से शक्ति, अधिकार और प्रतिष्ठा लेकर सामंतवाद को जिलाए रखती स्त्रिायों की अनदेखी क्यों कर जाता है? क्या इस समूचे प्रकरण में कृष्णा सोबती की यह पंक्ति ज्यादा सटीक और मानीखेज नहीं हो जाती कि ऐसी स्त्राी ’’पहले अपनी दया से पुरुष की हिंसा पकाती है और फिर पुरुष की हिंसा से अपनी दयनीय स्थिति मजबूत करती है।’’

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युवाओं कों स्त्री-सच से रूबरू करता अनोखा पाठ्यक्रम

हेमलता यादव

युवा कवयित्री इंदिरा गांधी ओपन विश्वविद्यालय में शोध छात्रा हैं.   संपर्क :hemlatayadav2005@gmail.com

भारत ही नहीं संपूर्ण विश्व के इतिहास में महिलाऐं कभी शोषण के विरुद्ध तो कभी सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक स्वतंत्रता और सहभागिता के लिए अनवरत, संधर्ष करती आई है। यह संघर्ष आज भी जारी है क्योंकि आधुनिकता, भूमंडलीकरण और विज्ञान एवं प्रोधोगिकी के विकास ने महिलाओं के विरुद्ध शोषण कम नहीं किया अपितु शोषण के तरीको में परिवर्तन अवश्य किये हैं । पितृसत्ता की नीव पर लिंग विभेदीकरण, राजनितिक सहभागिता पर प्रश्नचिन्ह, घरेलू हिसां, यौन हिंसा, देह व्यापार  सभ्य समाज के गलीचे तले अपना जाल फैला रहे है। जहां कुछ समय पूर्व तक कन्या को जन्म लेने के पश्चात मारा जाता था वही अब उसे अल्ट्रा साउड जैसी आधुनिक तकनीक से भ्रूण  अवस्था में ही मार दिया जाता है आधुनीकरण ने तथाकथित सभ्य लोगो के अति अमानवीय चेहरे को नकाब पहना दिए।

कानूनों के निर्माण से भी धटनाओं की तीव्रता में कोई कमी नही आई है इन समस्याओं अथवा संघर्षो के हृदय विदारक वर्णन के गवाह पिछले दशकों के आंदोलन एंव समाचार पत्र हैं। सामाजिक परिवर्तन समाज के अस्तित्व में आने के साथ ही प्रारम्भ हो गया था पंरतु स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन की गति तीव्र नहीं रही; स्त्रियों के लिए आज भी समाज वही संकीर्ण विचारधारा रखता है | समाज में परिवर्तन शिक्षा में परिवर्तन का कारण बनता है उसी प्रकार शिक्षा में परिवर्तन सामाजिक परिवर्तनों का आधार बनता है; एक समय था जब औपनिवेशिक भारत में प्रथम महिला डाक्टर कादम्बिनी गांगुली को उस समय की रुढ़िवादी पत्रिका ने वेश्या करार दिया था; जिन्होने 1886 में फिलाडेल्फिया के वूमेंस मेंडिकल कालेज में स्नातक की उपाधि ग्रहण की थी । धीरे-धीरे शिक्षा ने ही स्त्री की सामाजिक स्थिति में परिवर्तन लाना आरंभ कर दिया पंरतु कन्या भूर्ण हत्या, शील भंग, धरेलू हिंसा, यौन शोषण के आंकडे प्रत्यक्षदर्शी है कि अपनी बहुआयामी भूमिका, श्रम बल, राजनीतिक, सामाजिक एंव आर्थिक सहभागिता के बावजूद भारतीय महिला एक असुरक्षित एंव शोषित वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है । ऐसे में शिक्षा व्यवस्था का कार्यभार दोहरा हो जाता है । लैंगिक समानता, स्त्री प्रखर विद्रोह, नारीवादी आंदोलनों, स्त्री उन्मुख साहित्य को शिक्षा प्रणाली में उपर्युक्त स्थान प्रदान कर युवा वर्ग के मानसिक पटल पर स्त्रियों के लिए सम्मान एंव समानता अंकित करने का साधन शिक्षा बन सकती है । इस संबध में सराहनीय कदम दिल्ली विश्वविधालय में प्रथम वर्षिय स्नातक शिक्षा के अंग्रेजी सहित्य के संकलन में दृष्टीगोचर होता है ।
   
 सलमान रुश्दी की कहानी  “हारुन एंड द सी आफ स्टोरीस” में परिवारिक अकेलेपन  और निर्जनता को महसूस करती स्त्री की विडम्बना को दर्शाया है। इस कहानी में सुरैया अपने पति रशीद की व्यस्तता से आहत होती गई। उसने गाना बंद कर दिया, उदास रहने लगी और अंत में मि. सेनगुप्ता  की व्यवहारिक बातों मे उलझकर अपने परिवार को छोड़कर चली गई। अपने पति रशीद के लिये उसके द्वारा छोड़े शब्द थे ” तुम आंनद के पीछे भागते हो, पर एक सही व्यक्ति को पता होता है कि जीवन एक गम्भीर काम है। तुम्हारे दिमाग में झूठी बनावटी बाते भरी है इस कारण उसमें तथ्यों के लिए कोई स्थान नही बचा है। मि. सेनगुप्ता के पास कोई कल्पना नहीं पर वह मेरे लिए हितकर है  हारुन को बता देना कि मुझे उससे प्यार है, पर मैं विवश हूँ, मुझे अब घर छोड़कर चले जाना ही जरुरी है.” सुरैया  का यह कदम सामाजिक रुप से स्वीकार्य न हो पंरतु परिवार में एंकात भोगती उपेक्षित पत्नी द्वारा उठाया गया यह कदम संभतः उसकी मजबूरी का घोतक है ।

 “गर्ल्स” कहानी में लेखिका मृणाल पांडेय न केवल बच्चियों बल्कि महिलाओे द्वारा झेले जाने वाले लिंग अन्याय का वर्णन एक आठ वर्षीय बालिका ‘मिली’ की दृष्ट्रि से करती है। कहानी की पक्तियाँ जैसे “तुम्हारा जन्म लड़की के रुप मे हुआ है तुम्हे सारी जिंदगी ऐसे ही झुककर प्रणाम करना है इसे अच्छे से सीख लो” एवम “कम से कम इस बेचारी को यहाँ तो थोड़ा आराम करने दो” ,”हम स्त्रियों को ऐसे ही पीड़ा सहनी पड़ती है‘‘ बालिका के मन में द्वन्द उत्पन्न करती हैं | ये सब कथन बालिका के मन में प्रश्न उत्पन्न करते है कि “क्या चिडिया माँ भी यही सोचती होगी कि उसकी चिरैया बेटी चिड्डे से कमतर है”। मिली का नरखट, चतुर, उत्सुक एंव विरोधी स्वभाव, उसके द्वारा पूछे गये स्वभाविक पंरतु तीक्ष्ण प्रश्न समाज में लेंगिक असमानता के प्रति रोष उत्पन्न करते है ।


सलीम पेरादीना की कविता “सीस्टर्स” पिता की दृष्टि से दो भिन्न आयु वर्ग की बहनो के बीच संबधो का वर्णन करती है । इस कविता में बड़ी बहन चीख कर अन्याय का प्रतिरोध करते हुए लड़कियों को सिखाये जाने वाली पारम्परिक सीख को नकार देती है कि उसे विनित तथा आत्म त्यागी होना चाहिए । वह पिता को पक्षपाती रुख के लिए दोषी ठहराती है यह कविता पिता की सत्ता, आयु के विरोधाभास और समाज में महिलाओं के स्वर को पक्षपात पूर्ण दबाने के उस गुण को दर्शाती है जो लड़की होने के नाते आदत स्वरुप विरासत में प्राप्त होती हैं। बड़ी बहन का क्रोध मे उबलता मौन पिता को खुशी भी देता है कि अब उसकी बेटी ने अनुचित व्यवहार को चुनौती देने की र्निभिकता हासिल कर ली है ।

हरिशंकर परसाई द्वारा लिखित “अ टेन डे फास्ट” लोकतंत्र एंव विरोध करने के लोकतांत्रिक उपायो पर एक व्यंग्य रचना है जहाँ कुछ लोग लोकतंत्र, जनमत के जाति, धर्म  बाहुबल दुरुपयोग के लिए विभिन्न स्ट्रेटीज अपनाते हैं,  साथ ही यह लेख महिलाओं की स्थिति एंव उनकी इच्छा के महत्व पर व्यंग भी है । इस कहानी का नायक बन्नू, रांधिका बाबू की पत्नी सावित्री पर 16 वर्षो से आसक्त है और किसी भी हाल में उसे पाना चाहता है । वह उसे बलात भगा ले जाने का भी प्रयास करता है पंरतु सावित्री उसके प्रयासों को विफल कर देती है। ऐसे में उसकी मुलाकात बाबा सनकीदास जैसे तिकड़मबाज राजनीतिज्ञ से होती है जो गाँधी जी के अहिसंक उपाय अमरण अनशन का उपयोग बन्नू की नाजायज मांग को पूरा करने के लिए करते है। कहानी के एक प्रसंग में सावित्री जब आग बबूला होकर बन्नू के तम्बू में जाती है और पूछती है कि इस प्रकार की अनुचित माँग करने से पहले उसकी सम्मति क्यो नहीं ली तब बाबा सनकीदास कहते है कि सावित्री तो मात्र विषय है । कोई भी व्यक्ति विषय से अनुमति नहीं लेता उदाहरण देते हुए वे कहते है कि “गौ-रक्षा अभियान से जुडे किसी भी साधु या नेता ने अपना अभियान आंरभ करने से पूर्व गाय से अनुमति नहीं ली थी” । यहाँ हम देखते हैं कि समाज में महिला को मात्र विषय अथवा निरिह पशु के समकक्ष रखा जाता है । बन्नू को प्रोत्साहित करते हुए बाबा सनकीदास कहते है कि इस उपवास में तुम्हारी सफलता अन्य अनेक व्यक्यिों के लिए सहायक होगी जो दूसरों की पत्नियों को हथियाना चाहते है । सावित्री को सामाजिक अपमान सहना पड़ता है वह बन्नू को राखी बांधने का प्रयास करती है तो कभी आत्महत्या की चेष्टा करती है पंरतु बाबा सनकीदास की रणनीति, अनुत्तरदायी मीडिया ( जिसे केवल सनसनीखेज मुददों की तलाश रहती है तथा अज्ञानी जनसाधारण विफल कर देते है) । सावित्री के घर पर पत्थर बरसाये जाते है और उसके पति को मारने की धमकी दी जाती है । परसाई जी ने दिखाया है कि किस प्रकार बन्नु की वासना से लिप्त अनुचित मांग लोकतंत्र के अनुचित उपयोग से सिद्धांत का रुप ले लेती है और एक कायर, गुण्डे लालसी व्यक्ति को जनता नायक बनाकर पूजती है । लोकतंत्र का किस प्रकार अनुचित  उपयोग किया जाता है इस कहानी में हास्य द्वारा परसाई जी विश्लेषित करते हैं.

सुब्रतो बागची की आत्मकथा से लिया गया अंश “गो किस द वलर्ड” में लेखक माँ के प्रेम, त्याग एंव शिक्षा को परिभाषित करता है | कहानी में बागची की माता उसे सौन्दर्य का निर्माण करना सिखाती है । वे स्वंय मेहनत से अपने सरकारी आवास का सौन्दर्य निर्माण करती है यह जानते हुए भी कि उस सौन्दर्य को देखने से पहले ही उनके स्थानान्तरण के आदेश आ जायेंगे । उनका कहना था कि “मुझे तो मरुस्थल में फूल खिलाना है और जब भी मुझे नया घर मिलेगा मे उसे पहले की अपेक्षा अधिक सुन्दर बना कर छोडूंगी”। अपने लिए सौन्दर्य का निर्माण सब करते है पंरतु बागची की माता जी ने सिखाया किस प्रकार दूसरो के लिए सौन्दर्य एंव खुशी छोड़ी जा सकती है । मोतियाबिंद के कारण नेत्रों की रोशनी गंवा देने के बावजूद उन्होने लेखक को बंद आखों से प्रकाश देखना सिखाया किस प्रकार एक छोटे से गाँव में रहते हुऐ उन्हें पूरी दुनिया की चिंता रहती थी । 80 वर्ष की आयु तक वे अपने सारे कार्य स्वंय करती थी। उन्होने लेखक को स्वावलम्बन की नई परिभाषा और अंधरे में प्रकाश को प्रज्जवलित करने की कला सीखाई । 82 वर्ष की आयु में जब माता को पक्षाधात हुआ तब भी उन्होने लेखक को काम पर वापिस जाने की सलाह दी लकवाग्रस्त स्थिति में अपने अस्पष्ट स्वर में उन्होने कहा “तुम मुझे क्यो चूम रहे हो, जाओं समस्त संसार को चूमो”। लेखक की माताजी ने उन्हे सिखाया कि किस प्रकार तात्कालिक कष्ट से ऊपर उठकर कल्पनाओं को उड़ान देना, प्रत्येक तबके के लोगो के प्रति आदर भाव, विशाल संसार के साथ संबंध और जीवन में लेने की अपेक्षा देने की भावना साधारण लोगो को आसाधरण सफलता दे सकती है ।

स्त्री पहलु से जुड़ा अगला अध्याय “हिटिंग डाउरी फोर ए सीक्स” कल्पना शर्मा द्वारा लिखित यह लेख 1 जून 2003 को प्रतिष्ठित अखबार ”द हिन्दू“ में छपा था । इस लेख में सत्यारानी चड्डा एंव निशा शर्मा के दहेज विरोधी अभियान के कुछ महत्वपूर्ण मसलों का वर्णन किया  गया है । सत्यारानी चड्डा ने 1970 के अतिंम दशक में दहेज के विरुद्व तब आवाज उठाई जब उनकी पुत्री को दहेज के कारण तमाम् यातनाएं देकर मार डाला गया । नोएडा की निशा शर्मा ने उस समय शादी से इन्कार कर दिया जब दहेज की मांग एक सीमा से ऊपर हो गई । लेखिका यहाँ यह प्रश्न उठाती है कि दहेज की न्यायोचित मांग की सीमा क्या है । निशा शर्मा ने विरोध उस समय जताया जब दहेज की मांग  उनके सामर्थ्य से बाहर हो गई | दहेज की कुरीति महिलाओं के शोषण के कई मुददों की जड़ है । दहेज के नासूर के खिलाफ लड़कियों को दो शस्त्र सशक्त करते है -शिक्षा और माता-पिता का समर्थन ।

हालांकि केरल जैसे शिक्षा से परिपूर्ण राज्य मे भी दहेज जैसी कुप्रथा अपने पैर पसारे हुए है। लेखिका कहती है कि हमारी संस्कृति में जहाँ पुत्र को अधिक महत्व दिया जाता है, समाज में पुरुष वर्चस्व है दहेज प्रथा का उन्मूलन अभी दूर है और यह तब-तक नही हो सकता जब तब लड़कियां स्वयं दहेज को “ना” कहना नहीं  सीख जाएं और लड़के यह विश्वास एंव गर्व करे कि लड़कियों की कम होती जनसंख्या में यदि पत्नी मिल रही है तो यह एक विशेषाधिकार है। यह लेख इस बात पर भी रोशनी डालता है कि महिला को बोझ समझना समाज की संकीर्ण मनोस्थिति की परिचायक है । शिक्षित युवक भी यह कहने में गर्व महसूस करते हैं  कि उनकी व्यवसायिक शिक्षित कार्यरत भावी पत्नी विवाह के बाद नौकरी से त्याग पत्र दे देगी | स्त्री के भाग्य को घर की उन जिम्मेदारियों तक सीमित रखा जाता है जहाँ वे आर्थिक रुप से सबल नही बन पाती । लड़की पति के परिवार पर बोझ नही बल्कि सम्पत्ति है वह घर के कार्यो में मदद करती है, परिवार के सदस्यों की सेवा करती है, अतः यह आवश्यक नही कि अपने साथ दहेज लेकर आए । दहेज की अवधारणा हमारी संस्कृति की नाकारात्मक प्रवृति एंव समाज की रुग्ण मनोवृति का परिणाम है इसके हल स्वयं लड़कियो के सशाक्तिकरण पर निर्भर है यदि लड़किया नौकरी के क्षेत्र में एंव शिक्षा के क्षेत्र में लड़को को पछाड़ सकती है तो दहेज को भी हिट करके सिक्स मार सकती है .

मंजू कपूर का ”चाकलेट“ तारा के वैवाहिक जीवन के उतार-चढाव की कहानी है । यह कहानी विवाह की गग्भीर परिस्थितियों में स्त्री के आस्तित्व की कहानी है, हांलाकि तारा द्वारा अपने वैवाहिक जीवन को सुदृढ रखने के लिए किए गये उपाय कहानी को व्यंग्यात्मक  बनाते हैं, पर शादी के रिश्ते को बचाने के लिए शायद उसके पास कोई अन्य रास्ता नही बचता इसलिए वह पहले स्वंय अपने मोटापे को दूर करती है फिर अभय को स्वादिस्ट खाना खिला-खिला कर मोटा कर देती है, जिसके कारण अभय को अपनी प्रेमिका से हाथ धोना पड़ता है। तारा का पहला बदला पूरा होता है क्योकि अभय उसे स्वादिष्ट चाकलेट खिलाता था फिर मोटापे के कारण अभय तारा में रुचि खो बैठा और उसके जीवन में दूसरी महिला आ गई। दूसरी समस्या उसके संतान रहित होने की थी.

चिकित्सक ने तारा को सामान्य पाया था पंरतु अभंय ने अपनी रिपोर्ट कभी तारा को नहीं दिखाई बल्कि तारा को अपमानित करता रहा । तारा ने अपना बदला पूरा करने के लिए अभय के मिंत्र से प्रेम -प्रंसग चलाया और गर्भवती हो गई, पंरतु मां बनने के बाद ही उसने अभय के मित्र से किनारा कर लिया अतः अभय को कभी भी उसके प्रेम प्रसंग के बारे में पता नही चल सका। अपनी बेटी को गोद में लेते हुए तारा ने प्रण किया कि वह अपनी बेटी को शिक्षित एंव आर्थिक रुप से स्वतंत्र बनाएगी ताकि वह उस आर्थिक भय से मुक्त रहे, जो उसे अभय द्वारा त्यागे जाने के डर से तारा को हुआ। भारतीय समाज मे बच्चे का जन्म ही विवाह का परिणाम माना जाता है।

संतानोत्पति में अक्षम हाने का श्रेय तारा को जाता है उसे धर्मिक स्थलो पर माथा टेकने, विभिन्न प्रकार के राशि पत्थर पहनने पड़ते हैं, जबकि कमी अभय में है तारा अभय पर निर्भर है इसलिए वह शुरुआत में अपने जिददी, अनुत्तरदायी व निष्ठाहीन पति के अनैतिक जीवन को चुपचाप सहती है फिर सोच समझ कर रणनीति बनाकर उसे दण्ड देती है जब चाकलेट की दीवानी तारा को अभय द्वारा लाई चाकलेट उसके धेाखे के जहर के कारण बेस्वाद बुरादे जैसी लगने लगती है ।

एस. उषा की कविता ‘टू मदर’ भारत के लगभग हर उस घर की लड़की की आवाज है जो अपनी यौवन की आयु आने पर मां की वर्जनाओं, चेतावनियों का सामना करती है ‘ऐसा करो‘, ‘ऐसा मत करो‘ के आदेश कविता में सत्रह वर्षीय पुत्री को विरोधी बना देते है । इस आयु मे पुत्री स्ंवतंत्र होना चाहती है वह नही चाहती कि उस पर पडती धूप को माँ अपने आंचल से रोके और वह सूर्य के प्रकाश और हवा के अभाव में वह माँ की तरह विछिन्न हो जाए। वह नही चाहती कि जिस पंरपरागत धुन पर उसकी, माँ, नानी ने अपने सिर हिलाए वह भी ऐसा ही करे। वह तो अपनी शक्ति अपना विष किसी व्यक्ति पर आजमाना चाहती है, न कि मछली की तरह युगो-युगो से चली आ रही, परपराओं के धुमावदार वकृ में चक्कर काटती रहे । लड़की की इच्छा है कि वह तेज बाढ़ भरी नदी की तरह वर्जनाओं के प्रत्येक बांध को तोड़कर बह निकले और अपना मार्ग स्वंय बनाए। विद्रोही पुत्री, मां के आदर्शो को चुनौती देती हुई स्वतंत्रतापूर्वक जीवन जीने का अनुगृह करती है। किशोर लड़की अपनी माँ को संबोधित करने हुए पितृसतात्मक गुलामी का विरोध करते हुए कहती है कि विनम्र और सुशील बने रहना, लड़कों जैसे उदृड़ता न करना, राहगीरों से प्रणय चेष्टाएँ न करना जैसी माँ की आचरण संहिता उसकी हर आशा, सपने और कामनाओं की हत्या कर देगी ।

“सोपनट लीवस” एक आठ वर्षीय दलित लड़की गाविरी के विद्रोह की धटना है । दो दिन की भूखी गाविरी चने के खेत मे धुसने ही हिम्मत इसीलिए नही जुटा पाती क्योकि वह गरीब मजदूर की बेटी है । हाथ में झाडू और टोकरी लिए जलावन की लकडिया एकत्र करती है। वर्ण अंतर, आर्थिक असमानता से उत्पन्न मजबूरीयां, बालिकाओं पर परिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ डाल देती हैं। भूखी गाविरी की विवशता के दृश्य इस अध्याय में  खुबसूरती से उकेरे है । अध्याय का सबसे झंझावत पहल गाविरी द्वारा अपनी सच्चाई और आत्मसम्मान के लिए उठाई गई आवाज है जब उच्च धनी वर्ग का प्रतिनिधि क्रूर जमींदार निर्दोषिता सिद्ध करने के उपरांत भी उस पर प्रहार करता रहता है तो वह रोना छोड़कर सारे गांव पर एकछत्र रौब जमाने वाले जमींदार पर गालियों की बौछार कर देती है । हालांकि इसका परिणाम जमीदार खड़ाऊँ से उसकी टांग पर चोट करके करता है पर छोटी बच्ची का अदम्य साहस विशेषाधिकार प्राप्त लोगो के विरुद्व नए प्रभात की रणभेरी का आगाज है।

 “लेम्बो टू द स्लोटर” रोल्ड दाही द्वारा लिखी गई एक जासूसी व्यंग्य रचना है कहानी की नायिका मेरी मेलोनी पूर्णतः अपने पति पैट्रिक मेलोनी के प्रति समर्पित थी । अपने पति से निकटता उसके लिए आंनद का सबसे बड़ा स्रोत्र थी । प्रैटिक द्वारा अपने जीवन में किसी दूसरी स्त्री के होने की संभावना दर्शाना और मेरी को तलाक देने का निर्णय सुनाने का आधात उसके मानसिक संतुलन को स्तब्ध कर देता हैं और इस सदमे के आवेश में उसके द्वारा पति की हत्या हो जाती है। सदमें से उबरने पर अपने अजन्मे बच्चे के भविष्य के बारे मे सोचती है और चालाकी एंव सूझबूझ से स्वंय को पुलिस से बचाती है । यह एक साधारण पत्नी द्वारा जासूस पति को धोखे का बदला एंव पुलिस से स्वयं एंव अपने अजन्में बच्चे को बचाने वाली छोटी किंतु प्रवाहपूर्ण कथा है ।

रीटा-एन-हिंगिस की कविता “सम पीपुल” एक गरीब स्त्री की उत्कंठा, विवशता और पीड़ा की दांस्तान है। एक प्रताड़ित माँ अपने बच्चों के सामनें गंदी गाली सहती है, कर्जदारों के आगे झुठ बुलवाती है, गरीब, अपमानित, सरकारी भत्तों पर अश्रित महिला सरकार द्वारा जारी कल्याणकारी योजनाओं के असफल क्रियान्वन की शिकार है। एक माँ द्वारा बच्चों के सामने शर्मीदगी, अपमान, लाचारी का सामना किया जाना समाज, सरकार और उच्च एंव धनाहय वर्ण की संवेदन हीनता का परिणाम है ।

इस पुस्तक के अतिम अध्याय “रुट एंड एस्केप रुट” की नारी पात्र हेमा एक उच्चजाति की महिला है, जो समाज के विरोध के बावजूद एक दलित प्रोफेसर सतीश गोडधाटे से विवाह करने का साहस करती है । वह जातीगत राजनीति का भी विरोध करती है एक सशक्त चरित्र के साथ वह गलत का समर्थन देने से इन्कार करती है; चाहे इसके लिए उसे अपने परिवार के बुजुर्ग काका से विरोध का सामना करना पड़ता है वह अपना मत अवश्य प्रकट करती है।

दिल्ली विश्वविधालय बी. ए. प्रथम वर्ष के अंग्रेजी पाठृक्रम का लगभग प्रत्येक अध्याय युवाओं के समक्ष स्त्री व्यवहार, समस्याओं, विद्रोह, दृढता, प्रेम, विवशता, सृजन आदि के विभिन्न सोपानो को गढ़ता है। पाठ्यक्रम में इस प्रकार का स्त्री उन्मुख साहित्य समाज में स्त्री के स्थान को युवाओं के समक्ष सुदृढ़ करने में सहायक है अन्य विश्वविधालयी पाठ्क्रमों में भी इस प्रकार की पहल की आवश्यकता है क्योंकि उच्च शिक्षा गृहण करने के साथ युवा वर्ग समाज में अपनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का वहन करने के लिहाज से भी परिपक्व होते हैं ।

संदर्भ


फ्लुएंसी इन इगंलिश, बी.ए. प्रोग्राम 1 ( दिल्ली युनिवर्सटी )

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
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महाराणा प्रताप भील थे,राजपूत नहीं: बताने वाली लेखिका असुरक्षित, मिल रही धमकियां

स्त्रीकाल डेस्क 

राष्ट्रीय महिला आयोग की पूर्व सदस्य और  दलित लेखिका डॉ. कुसुम मेघवाल द्वारा महाराणा प्रताप पर लिखी किताब पर विवाद बढ़ता जा रहा है, जिसमें उन्होंने महाराणा प्रताप को भील कहा है. किताब के अनुसार राजपूत या क्षत्रिय कोई जाति नहीं होती है, उसमें अलग-अलग जाति समूह के लोग होते हैं. किताब बताती है कि किस तरह राजस्थान में भीलों का शासन रहा है, उनके कई राजवंश रहे हैं और महाराणा प्रताप के इर्द-गिर्द, उन्हें मदद करने वालों में भी भील ही रहे हैं.

स्त्रीकाल से बातचीत करते हुए कुसुम मेघवाल ने बताया कि ‘मैंने यह किताब पिछले दो साल पहले लिखी है, जिसमें मैंने शोध के आधार पर लिखा है कि महाराणा प्रताप भील थे, न कि  राजपूत. इसी बात से बौखला कर करणी सेना के सदस्य बनकर लगातार फोन पर जान से मारने की धमकी दी जा रही है.’ उन्होंने बताया कि ‘ पुलिस को 21 अप्रैल को तथाकथित धमकी देने वालों के खिलाफ शिकायत की जा चुकी है, लेकिन अभी तक सुरक्षा की कोई पहल नहीं हुई है. वे राजस्थान की वसुंधरा सरकार पर आरोप लगाती हैं कि उन्होंने ही इन उपद्रवी ताकतों पर कार्रवाई न कर उन्हें शह दे रखा है.’ वे पूछती हैं, ‘ क्या पुलिस किसी घटना के अंदेशा का इंतजार कर रही, कि घटना घट जाए और उसके बाद कोई कार्रवाई की जाए?  यह देश किसी तथाकथित करणी सेना से चलेगा या संविधान से , जो हमें अभिव्यक्ति की आजादी देता है?’ वे स्पष्ट कहती हैं कि ‘आप को किसी बात पर आपत्ति है तो न्यायालय जाओ, या किताब के बदले किताब लिखों या फिर किताब पर प्रतिबंध लगवाओ।’

पढ़ें:  राजस्थान में दलित दमन 

इस बीच उन्हें मारने की धमकी वाली खबर मीडिया में आई तो लेखकों बुद्धिजीवियों में बेचैनी है. इसके पहले भी कलबुर्गी, पान्सारे जैसे लेखकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं की ह्त्या हो चुकी है. 14 मई को मुस्लिम महिलाओ के संगठन नेशनल वीमेन फ्रंट की प्रदेशाध्यक्ष वाफिया अन्सार ने उदयपुर में उनके निवास पर मुलाकात कर उनसे पूरे  मामले की जानकारी ली. प्रदेशाध्यक्ष वाफिया अन्सार ने डॉ.कुसुम को मिल रही धमकियों को लेकर कहा कि सरकार को जल्द से जल्द ऐसे लोगों पर कार्रवाई करनी चाहिए साथ ही उन्होंने मांग की है कि डॉ.मेघवाल को सुरक्षा मुहैया करवाई जाए. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर डॉ.कुसुम मेघवाल पर किसी भी तरह का प्रहार होता है तो हमारा संगठन चुप नहीं बैठेगा और इसकी जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी.
राष्ट्रीय दलित महिला आंदोलन की राष्ट्रीय अध्यक्ष रजनी तिलक ने कहा कि ‘जिन्हें आपत्ति है वे गुंडागर्दी की जगह शोधपूर्ण तरीके से लेखिका की बात काटें.’

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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

 

तुम्हारा माँ होना

अंकिता रासुरी


म.गां.अं.हिं.वि. में शोधरत हैं. संपर्क: ankitarasuri@gmail.com

स्टीरियो टाइप से अलग माँ, फिर भी उतनी ही माँ.  जब मदर्स डे पर  सोशल मीडिया में स्नेहिल, त्याग की मूर्ति, पीड़ा को पी जाने वाली नीलकंठ, हर  वक्त संतान के लिए उत्सर्ग को तैयार माँ की छवि तैर रही है तब अंकिता अपनी उस माँ को याद कर रही हैं, जो इस आरोपित छवि में फिट नहीं बैठती. एक जरूर पठनीय संस्मरण 
                                                                                                             संपादक

तुम सच में मां जैसी नहीं थीं, बल्कि तुमने मुझे ही मां बना लिया था.मैं अक्सर गुस्सा हो जाती कि तुमने अब तक खाना क्यों नहीं बनाया और फिर खुद ही घर के सारे काम करने लग जाती.इस तरह मुझे घर के सारे काम करने आ गए।

सारे घरों की तरह हमारे घर में सब कुछ सामान्य क्यों नहीं रहता, हमेशा यही सोचती.बच्चों के तौर पर हम भाई-बहनों को कभी गांव के बाकी घरों वाला एहसास नहीं मिल पाया.बचपन के अधिकांश हिस्से की यादें तुम्हारी बीमारी की यादें बनकर रह गईं, या मार खाई हुई चोट से रोती-झगड़ती मां के तौर पर।

मैं अक्सर खौफ में रहती कि तुम किसी दिन इसी तरह से मर जाओगी और फिर अकेले में बहुत रोती.मैं सपने देखती कि मैं बारहवीं के बाद की भी पढाई कर रही हूं और घर से बाहर किसी बड़े शहर में अकेली हूं.तब मुझे ये बहुत मुश्किल लगता कि मैं बारहवीं के बाद पढ पाऊंगी.मैं अपनी साथ की सहेलियों को अपनी इच्छाएं बताती तो कहतीं देख लेना 10वीं 12वीं के बाद तेरा बुबा( पिता) तुझे अपने घर में थोड़ी रखेगा, तेरा ब्यो कर देगा देख लेना.

तुम्हारी स्थिति को देखते हुए मैंने तब से ही फैसला कर लिया था मैं खूब पढूंगी मां, घर से बाहर निकलूंगी अपने हिस्से की जिंदगी अपने तरीके से जियूंगी.क्योंकि तुम्हारी जैसी जिंदगी मेरे लिए खौफ का सबब होती।
गुनिया की माई
एक बेटी को तौर पर मैं तुमसे जितनी अधिक जुड़ी हुई थी उतना ही तुमसे गुस्सा भी हो जाती.मैं अक्सर तुम्हें दोष देती औरों की मांएं ये करती हैं, वो करती हैं, तुमने वह सब क्यों नहीं किया.उस वक्त तुम मेरे लिए सिर्फ मां थीं और मां का मतलब ही होता है हमारे समाज में मर-खप जाना.लेकिन तुम उस तरह से नहीं हो पातीं थीं.तुम किसी भी अन्य मां से ज्यादा भावुक थीं, शायद क्योंकि तुम जानती थीं कि तुम अन्य मांओं की तरह उतनी ज्यादा कामकाजी नहीं थीं.

माना जाता है कि पहाड़ी समाज में औरतें मजबूत स्थिति में रहती हैं हालांकि यह बात कुछ हद तक सही भी है लेकिन पूरी तरह नहीं.हमारे पहाड़ी समाज में भी स्त्रियां भले ही कितनी भी कामकाजी हों फिर भी पुरुष के मुकाबले उसकी स्थिति दोयम दर्जे की ही है.उसे सारे काम करके भी पति की मार पड़ती ही है.लेकिन तुम्हें तो खेती और जंगल के काम आते भी नहीं थे, तुम तो पूरे गांव घर वालों की नजरों में दोषी थी- इसके बिना कोई बैठे-बेठे कैसे खा सकता है.
रवींद्र के दास की कवितायें : माँ ! पापा भी मर्द ही हैं न !
हमारे समाज में स्त्रियों से सिर्फ काम करते रहने की ख्वाइश की जाती रही है.बस वो बैल की तरह खुद को काम में झोंक दें और वे ऐसा करती भी हैं.एक गढवाली गाने को उदाहण के तौर पर लिया जा सकता है जिसे लोग गाते हैं:
जैका पल्यां गल्या बल्द रिड्वा जन्यानि
तैक होयूं ईं दुन्या में रोणु सदानी
इससका मतलब है जिसने इस दुनिया में आलसी बैल और फालतू घूमने वाली स्त्री को पाल कर रखा हो उसके लिए इस दुनिया में सिर्फ ही रोना ही लिखा है.

वास्तव में सभी समाजों की स्त्रियों की अपनी–अपनी दिक्कतें हैं।ठेठ पहाड़ी समाज में अगर कोई स्त्री ये सारे काम नहीं कर पाती है तो उसकी कीमत इस समाज में ठीक उतनी ही है जितनी किसी बेकार बैल की होती है.मैं तुमसे हमेशा से यही शिकायत रही कि तुम्हें खेती के काम क्यों नहीं आते, तुम्हें गोल-गोल रोटियां क्यों बनानी नहीं आतीं.मेहमानों के आने पर तुम काम में लगी रहने के बजाय उनसे बातें करने क्यों बैठ जाती हो.इन तमाम शिकायतों के साथ तुम्हें घर गांव भर में इंसान ही नहीं समझा गया कितनी जिलल्तें झेलनी पड़ीं.
माँ तुम्हारे कॉमरेड
कितना बुरा लगता था जब कोई पूछता तेरी मां लुल्ली (चीख-चीख कर रोना) क्यों मार रही थी, तू समझाती क्यों नहीं अपनी मां को.इन सब में गांव के औरद-मर्द सभी शामिल होते.मैं शर्म से पानी-पानी हो जाती, गुस्सा भी आता कभी तुम पर- कभी लोगों पर और सबसे ज्यादा पिता पर.लेकिन ये हमारी संस्कृति है जिसमें महिलाओं से हर हाल में चुप रहने की उम्मीद की जाती है पति पर हाथ उठाना पाप समझा जाता है.जबकि पति का तो धर्म होता है पीटना.घर-परिवार बच्चों के नजरिए सो चाहे जो मर्जी रहा हो तुम्हारा प्रतिरोध लेकिन बदले में तुम्हारा हाथ उठाना एक स्त्री के तौर पर बिल्कुल सही था मां.कितनी बार तुम कहतीं तुम्हारे लिए जी रही हूं वरना मर जाती.हम बच्चे कितना बांध देते हैं तुम्हें मुझे इस बात का अफसोस है.

मैं आज भी अलग तरीके से सोचने की कोशिश करती हूं लेकिन आखिरकर उसी ढर्रे पर आकर सोच अटक जाती है.खाना भले ही मैं बनाऊं लेकिन उम्मीद करती हूं तू भी खाली ना बैठी रहे क्योंकि तू एक मां है.लेकिन ये अजीब नहीं है कि जिस तरह मैं तुम्हें घरेलू काम करते हुए देखना चाहती हूं पिता से ये उम्मीद नहीं करती, उसी तरह तू भी सिर्फ मुझसे उम्मीद लगाकर रखती है, भाइयों को तो तू भी आराम देना चाहती है.हम बस आपस में ही उलझ कर रह जाती हैं.

हमारे समाज में हमेशा ये माना जाता है खाना बनाने का काम हमेशा मांओं का होता है।साथ ही ये भी माना जाता है कि हर लड़की को आखिरकर मां ही बनना है.

पर मां जो प्यार तुमने दिया है वो शायद आसपास के किसी बच्चे को नहीं मिल पाया.तुम्हें घर के काम बहुत पसंद नहीं थे उसमें तुम्हारा क्या कसूर था तुम खेत और जंगल के काम कर ही नहीं पातीं थीं तो भी ये इतना बड़ा मसला नहीं है, शहरी पष्ठभूमि से तुम्हारा होना तुम्हारे लिए तुम्हारे लिए सबसे बड़ा अभिशाप बना रहा था।
मैं आज भी हैरान होती हूं मां जिस उम्र में और बच्चे मां की गालियां खाया करते (हालांकि उसमें भी उन माओं का प्यार ही होता है), उस उम्र में तुम मुझे राखी, सोती सुंदरी, फ्यूंली, तीलू रौतेली, जैसी तमाम कहानियां सुनाती.सिर्फ कहानी के अन्त तक ही नहीं बल्कि उससे भी और आगे तुम कहानी को रच डालतीं तब तक जब मैं कहानी को और आगे बढाने की फरमाइश करती जाती.कविताएं सुनातीं हिलांस वाली घुघूती वाली.घिंडुड़ि कि मां घिंडुड़ि चा दूध पे ( गोरेया की मां और गौरेया ने चाय दूध पिया)  कहते हुए चाय और दूध पिलाने का तरीका कितना खुशनुमा होता था।
बोलिए न पापा कुछ तो बोलिए
घिंडुड़ी (गौरेया) वाली कहानी से तुम अपनी आकंक्षाओं को ही तो दर्शा रही होती.जिस तरह तुम बहुत ही सहजता से कहानियां और कविताएं मैखिक ही रच लेतींउसके लिए वाकई कल्पनाशीलता की जरूरत होती है.तमामउम्र दराज लेखिकाओं को देखते हुए तुम्हारा चेहरा याद आता है लेकिन तुमने तो अपनी सारी रचनाओं को सिर्फ अपने बच्चों के लिए रचतीं थीं.इससे ज्यादा तुम्हारी महत्वकांक्षा क्यों नहीं थी मां! एक बेटी को तौर पर आज मैं यही कहना चाहती हूं कि मांओं को सिर्फ बच्चों में नहीं खो जाना चाहिए.

जहां तुम्हारे ससुराल या मेरे घर-गांव में मुझे आज भी साहित्यिक पत्रिकाएं और किताबें नहीं मिल पाती हैं.तुम मुझ से एक पीढी पहले ही धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, और गुनाहों के देवता जैसे तमाम साहित्य से गुजर कर कुछ उसी तरह से हो गईं थी.उनका गहरा असर अभी भी जीवन के प्रति तुम्हारे नजरिए और कल्पनाशीलता में दिखता है.लेकिन मां जीवन काल्पनिक साहित्य नहीं होता.आज भी तो अगर तुम्हारे हाथ में अगर कोई किताब, पत्रिका या अखबार ही लग जाता है तो तू खाना बनाने से लेकर धारे से पानी लाने तक के सारे काम मुल्तवी करके तल्लीनता से पढने में लग जाती हो.
पेंटिंग में माँ को खोजते फ़िदा हुसेन
मेरे शहर में आ जाने के बाद तू खुश है कि मेरी जिंदगी तुमसे बेहतर और अलग होगी.लेकिन मां मुझे अफसोस है तू अब भी भीतरी तौर पर बहुत अकेली है और मैं अब भी तेरा साथ नहीं दे पा रही हूं.शहरी जीवन की अपनी दिक्कतें हैं.मैं तेरी उम्मीदों को तोड़ना नहीं चाहती, मैं जिंदगी में बहुत बेहतर करना चाहती हूं.मैं तुम्हारी बची हुई जिंदगी को भी बेहतर बनाना चाहती हूं.मैं आपकी वाली पीढी से आगे निकलना चाहती हूं.

मैं जानती हूं मां तेरे सपने अभी भी मरे नहीं है.तेरी मंगायी गयी चूडिंयों के साथ साथ मैं कविताओं की किताब भी लेती आऊंगी।कुछ बच्चों वाली किताबे भी जिनमें आज भी तेरा मन बसता है।हालांकि मुझे तेरा चूड़ी-बिंदी सिंदूर से सजना बिल्कुल भी पसंद नहीं है, लेकिन तुम अभी तक वहां नहीं पहुंची हो कि इन चीजों का भी प्रतिरोध करो.हांलांकि तू ही कहती है कि हम स्त्रियों को ये सब क्यों करना पड़ता है जबकि पुरुषों के लिए तो सुहाग की कोई निशानी नहीं होती.ये सब जानने -समझने के बावजूद तुम ऐसी नहीं हो पाई कि इन चीजों को छोड़ दो.

मुझे जितना याद हुर्रे का ठंडा पानी आता है, चांदनी रात में चमकता पार्य बण आते हैं उन सबसे से ज्यादा तेरी याद आती है.इसलिए नहीं कि मुझे तेरी जरूरत है बल्कि इसलिए कि गति जीवन की गति को बनाये रखाजा सके.मैं चाहती हूं कि तुझे मेरा कोई भी काम ना करना पड़े एक मां के तौर पर, ना हीं तुझे मेरी मेरी कोई चिंता ना करनी पड़े.एक स्त्री के तौर पर तुम मेरे साथ चलती रहो बस.

आज पाती हूं तुझमें और मुझमें बहुत ज्यादा अंतर नहीं है.तुम्हें भी तो कुल्टा जैसे कई संबोधन झेलने पड़ते थे.लेकिन तुम्हारा विरोध बहुत तीव्र होता था.मैं तुम्हारी ठीक अगली पीढ़ी, जो घर से बाहर निकलकर भी, क्या हूं? मुझे भी ठीक इस तरह के संबोधन सुनने को मिलते रहे.इसके बावजूद मैं ठीक से विरोध तक नहीं कर पाई, बस अपने प्रेम का यकीन दिलाती रही. तुम्हारे हाथ में एक घर है जहां तुम तथाकथित रूप से खुश हो.मैं उस घर से या उस तरह के तमाम घरों से आजादी की ख्वाइश रखते हुए गोल –गोल दुनिया में गोल–गोल घूम रही हूं.

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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
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दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
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उन क्षणों के बाद.. !

डा .कौशल पंवार

  युवा रचनाकार, सामाजिक कार्यकर्ता ,  मोती लाल नेहरू कॉलेज , दिल्ली विश्वविद्यालय, में संस्कृत  की  असिस्टेंट प्रोफ़ेसर संपर्क : 9999439709

और वह जान ही नहीं पाई थी कि वह कब उसके इतने करीब आ गया था,  जिसकी उसने कल्पना ही नहीं की थी. हालांकि वह उसके प्रति एक खिंचाव महसूस जरूर कर रही थी, उसके भाव उसके प्रति कुछ अलग आकार में थे जरूर परंतु वह यूं और इतनी दूर तक की सफ़र नहीं करना चाह रही थी. फ़िर ये सब क्यूं होने दिया था उसने… उसे रोका क्यूं नही. वहउस पल में ये महसूस ही नहीं कर सकी थी कि जो कुछ भी यह हो रहा है उसके लिए वह तैयार भी थी या नहीं.

दिन ही कितने हुए थे उसे मिले. बस यही कोई एक दो मुलाकात. पहली मुलाकात तब हुई थी जब वह पार्क में बेंच पर बैठे-बैठे अपनी ही दुनिया में खोई थी. अचानक उसने किसी की परछाई सी अपने पैरों के नीचे महसूस की. उसने अपनी पलकें उठाकर नम सी आंखों में सामने खड़े शख्स को निहारा भर था. हैलो, कैसी हैं आप. ठीक हूं, इतना ही कह पायी थी वह उसे. पर अन्दर से उसे अजीब सा अपनापन लगा था. वह पार्क से लौट आयी थी अपने घर. अपने रोजमर्रा के काम में लगी रही, पर वह परछाई वाला शख्स अभी भी उसकी आंखे के आगे आ जा रहा था. उसका उन्मुक्त व बेपरवाह सा अंदाज बार-बार उसकी आंखों के आगे तैर सा रहा था.

एक बार उसे वह पब्लिक लाइब्रेरी में मिली थी. किताबों को जब रैक में रख रही थी तो दूसरी ओर से किसी ने एक किताब उठाई, जैसे ही आमना- सामन हुआ तो देखा वही थी. वह उसे देखकर सकपका गयी थी.  जल्दी से किताब लेकर लाईब्रेरी में मेज के चारों ओर पड़ी कुर्सियों में से एक में धस गयी. किताब को हाथ में लेकर पलटने  लगी, मानोउसकी नजर उसे किताब के पन्ने पलटने में ही ढूंढ रही हों कि वह कहां पर बैठा है या उसने उसे देखा कि नहीं. जब जवाब नहीं मिला तो उसने अपनी नजरें चारों ओर घुमाई, वह उसे दिखाई नहीं दिया. सोचा चला गया होगा. और वह किताब पढने लगी थी. किताब पढने में मशगूल  हो गयी थी वह. किताब ही ऐसी थी,  जो पढकर झकझोरर दे. उसे अपनी जिन्दगी उस किताब में लिखे हर एक लब्ज जैसी दिख रही थी. कैसे ओमप्रकाश वाल्मीकि  की माता जूठन इकटठा कर लेकर आती थी और सारा परिवार उसे खाता था. ये परम्परा कहां से आयी होगी. वह पढते-पढते ही सोचने लगी थी. उनके परिवार में भी तो उसकी ताई जमीदारों के घरों से मिली रोटी मांगकर लाती थी और वे सब मिलकर खाते थे. पर एक दिन जब वह भी अपनी ताई के साथ कमाण गयी थी तो अपने हाथों से ताई को गंदगी उठाते देख उसे उबकाई आ गयी थी. उस दिन के बाद से तो उसने पीली दाल खाना बंद ही कर दिया था. जब भी घर में ये पीली दाल बनती, उसे उल्टियां शुरु हो जाती थी.  धीरे- धीरे घर में ये दाल बननी बंद हो गयी थी. आज तो वह मैट्रोपोलियन सिटी में है परंतु उस बीते बचपन को वह भी आज तक कहां भूला पायी थी. जूठन को पढते हुए उसे यही लग रहा था. वह पढने में इतनी डूब गयी थी कि वह शख्सकब उसके सामने वाली चेयर पर आकर बैठ गया, उसे तनिक भी भान नहीं हुआ. उसने किताब खत्म की और एक लम्बी सी सांस खीचकर अपनी गर्दन लाइब्रेरी की छतपर टिका दी. . थोड़ी देर बुत बनी रही मानो जूठन का एक-एक शब्द उसने ही लिखा होहो. सामान्य हुई और अपनी चेयर पर सीधे बैठने लगी कि सामने वह गहरी सी, चोर सी आंखों वाला उसके सामने वाली चेयर पर टकटकी लगाये बैठा था. वह चौकन्नी सी हो गयी मानो अपनी भावनाएं उसके सामने आने से छुपा रही हो. शख्स ने अपना हाथ उसकी तरफ़ हैलो कहने के लिए बढा दिया था. उसने भी हाथ मिलाकर उसका अभिवादन स्वीकार कर लिया था. जैसे वह अभी-अभी किताब की पढी बातों को चुनौती सा दे रही थी कि वह इतनी कमजोर नहीं रही अब. यहां तक पंहुचने का उसका अपना संघर्ष था, उसने तो हर हाल में जीतना ही सीखा था. पर अब वह किताब   नहीं पढ रही थी, बल्कि हकीकत में उस शख्स  से हाथ मिला चुकी थी, जिसे वह जानती ही नहीं थी. उसकी ये आदत औरों  की नजरों में बडी बोल्ड़ लगती थी और लोग तरह-तरह की व्याख्यायें अकसर इस पर किया भी करते थे पर वह कितनी सावधानी से हाथ मिलाती थी, वह ही इसे जानती थी. हाथ मिलाने के अंदाज से ही वह सामने वाले की उसको लेकर राय जान जाती थी. और उससे हाथ मिलाना तो दूर वह उसके देखना भी पसंद नहीं करती थी.  पर आज उसने अपने हाथ मिलने  से मिली उष्मा को सहेज सा लिया था. वह भी चेयर की ओर इशारा कर उसे बैठने के लिए कह रहा था. थोड़ी सी औपचारिकता के बाद उसने सीधा सवाल किया था, “आप तो वह है न जो टी.वी. में डिबेट में आयी थी इंट्रनेशनल वीमेन डे पर. मैने आपका इन्ट्रव्यू देखा था. जिस बेबाकी से आपने अपनी बात रखी, उसे सुनकर मैं तो सच पूछो,आपका कायल हो गया, आपका फ़ैन हो गया. मुझे नहीं पता था कि आप भी यही आती हैं पढने के लिए. जिस दिन से आपको टी.वी. पर देखा-सुना था, मैं तो आपको खोज ही रहा था, कई मित्रों से आपके बारे में पूछा भी मैने, पर किसी ने बताया नहीं कि आप यहां आती हैं. मैं भी यहीं आता हूं”.  एक सांस मे वह बहुत कुछ बोल गया था. वह सुनती रही थी. और वह बिना उसके जवाब सुने बोलता जा रहा था. सवाल पे सवाल. जब काफ़ी देर हो गयी तो उसे रोक कर जवाब देने की कोशिश की थी उसने. पर वह अपनी ही सुनाता जा रहा था जैसे बहुत दिनों से ढेर सारे प्रश्नों को लेकर उसे ही खोज रहा हो. उसे भी भला सा लगा था उसे यूबिना किसी की परवाह किये बोलते हुए. वैसे तो वह ही बहुत बोलती थी. वह अपनी ही दुनिया में खो सी गयी थी. “कहां खो गयी” उसने हाथ की चुटकी उसके चेहरे की ओर घुमाते हुए कहा. वह अपनी दुनिया से बाहर आ गयी थी. उस दिन बड़ी आत्मियता से उसने बात की थी. उसे भी अच्छा लगा था.

एक दिन फ़िर मुलाकात हुई और उसने उसे काफ़ी के लिए आमंत्रित  किया. वह ना न कह सकी. पास के ही रेस्तरां में जाकर उन्होंने काफ़ी पी. उसे भूख लगी थी तो उसने खाने का आफ़र किया. यह उसके साथ पहली दफ़ा था कि किसी अजनबी के साथ वह बाहर काफ़ी पीने के लिए बिना सोचे समझे आ गयी थी. एक अलग तरह का खिंचाव महसूस किया था उसने.. ढेर सारी बाते काफ़ी पीते- पीते हुई उनके बीच. समाज की और शिक्षा की भी. हालांकि वह खुद आस-पास घट रही घटनाओं के बारे में सोचती थी और यदा -कदा होने वाले आंदोलन में भी चली जाती थी. पर वह अपने परिवार तक ही सीमित रही थी. परिवार के साथ मिलकर ही वह आगे बढे, उसकी अपनी सोच थी समझ थी. वह सकीर्ण विचारों की भी नहीं ही थी. एक हद तक अपने आपको उसने मानवीय बनाकर रखा भी था. अपने आपको खफ़ाकर  बहुत अच्छी बेटी जैसी उपमाओं को ढोने वाली वह नहीं थी. नौकरी के दौरान भी उसकी अपनी सहकर्मियों के साथ अकसर घट रही सामाजिक-राजनैतिक विषयों पर ही वह बात करती थी, जिस कारण से उसकी मित्र मंड़ली में महिलाओं से ज्यादा पुरुषों से उसकी मित्रता हो जाती थी. महिलाओं की चर्चा में वह ज्यादा घुल-मिल भी नहीं पाती थी. जब उनकी चर्चा होती कि किसने कितने कैरट सोने की अंगुठी पहनी है, कपडे, सैंडिल किस ब्रांड के हैं या मेकअप कौन सी कंपनी का है आदि-आदि. असल में उसकी परवरिश भी बिल्कुल सामान्य परिवार में हुई थी जहां पर हर रोज कुंआ खोदो और पानी पीयो जैसे हालात थे,  ऐसे में कपड़ा उसके केवल तन ढकने वाला ही पसंद था,  ज्यादा से ज्यादा  उस पर जचने वाला हो, ब्रांड़-व्रांड का उसे पता भी नहीं था. पैसे से ही ज्ञान मिलता है, वह था नहीं इसलिए उसे पता भी नही था. जब पैसा हुआ था तो रुचि भी नहीं जागी थी. ऐसे में वह महिलाओं द्वारा की गयी ऐसी चर्चाओं में अपने आपको अनफ़िट महसूस करती . पुरुषों के बीच ऐसी चर्चाएं कम होती. ऐसा नहीं था कि उसे महिलाओं का साथ पसंद नहीं आता था. वह कुलीन वर्ग की महिलाओ के बारे में खूब सुनती थी. उनका दर्द भी था तो एक जैसा ही. बस फ़र्क उसमें और उनमें इतना होता था कि वह जिस परिवार से आती थी,  वह दलितों में भी दलित था और छुआछूतपन का व्यवहार बचपन से ही पा लिया था, जिसको पाकर वह ओर कठोर हो गयी थी. पुरुष मित्र मंडली में वह इन सब सवालों से बच जाती थी और एक कम्फ़र्ट जोन में आ जाती थी. वह चर्चा के दौरान देश-दुनिया, समाज-संस्कृति के प्रति उसकी जानकारियों और स्पष्टता से प्रभावित हुई. वह उसे सीनियर नजर आने लगा था. उसके प्रति अब उसके मन में आदर भाव आ गया था. वह अभी तक उसके नाम पर नहीं गयी थी. न ही पूछना ज्यादा ठीक लगा था उसे. कुछ- कुछ जो उसकी समझ आ पाया था तो वह कि वह उससे कहीं ज्यादा बड़ा था. पद और जाति दोनों से. उसके विचार ज्यादा मेल नहीं खा पाये थे पर अपने से इतर विचारों पर विचार करना उसकी खास आदत थी. उसने कभी अपनी समझ को कटटर नहीं बनाया था. विस्तार देने में वह यकीन करती थी. एक मायने में यह मिलन अलग तरह का अनुभव लेकर आया था उसकी जिन्दगी में.
स्पीड ब्रेकर / कहानी
शायद उसकी तीसरी मुलाकात तब हुई जब वह अपने आफ़िस से बाहर निकल रही थी. उसने अपना रोजमर्रा का सामान टेबल से उठाया, पानी की बोतल जो हमेशा साथ ही रहती थी, उठाकर पर्स में रखी और मोबाइल को हाथ में लेते हुए ही साडी का पल्लू सीधा किया. जैसे ही बाहर निकली, चिरपरिचत से अंदाज में उसने हैलो बोला. वह अचानक से उसके प्रकट होने से चौक गई, फिर सहज हुई ‘प्रत्युत्तर में उसने भी ‘हैलो’ कहा. हाल चाल पूछने के बाद उसने उसे नागपुर में होने वाली कान्फ़्रेंस में जाने के बारे में पूछा. वह भी एक दम से ना नहीं कह सकी थी. और बाद में बात करने को कहकर आटो में बैठकर चली गयी.



जैसे ही अगले दिन आफ़िस पहुँचीकि आवाज आयी..”क्या जाने का कन्फर्म हुआ है, टिकट बुक करवा रहा हूं. सारा अरेंजमैंट हो गया है, ऐयर्पोर्ट पर गाड़ी रिसीव करने पहुंच जायेगी. वह भागते से अंदाज में बोल गया था. और जब तक वह पीछे मुड़कर देखती वह जा चुका था. अगले दिन इमेल पर उसका टिकट और ठहरने का होटल बुक का कन्फ़र्मेशन आ गया था. वह चली गयी थी. घूमना उसे अच्छा लगता ही था. सुबह -सुबह वह नागपुर पंहुच गयी थी. गाड़ी अभी तक नहीं आयी थी. उसने उसके नम्बर पर फ़ोन मिलाया. उसने फोन काट दिया. थोडी देर में रिंग आ गयी थी. गाड़ी वाले का फोन था और रसीव करने के लिए लोकेशन पूछने लगा था. वह होटल आ चुकी थी तो गाडी वाले ने उसे आधा घंटा आराम करने के लिए कहा और यह भी बताया कि  वह आधे घंटे बाद उसे लेने आ जायेगा. उसने नाश्ता किया और रेस्ट किया कि गाड़ी वेन्यू पर ले जाने के लिए आ गयी थी. वह गाडी में बैठकर कांफ्रेंस हाल आ गयी. हाल खचाखच भरा था. ऐसा नहीं था कि इस तरह की सभा में वह पहली बार आयी हो. परन्तु ये भीड़ उसके लिए बिल्कुल अनजान की तरह थी, कुछ चेहरे दिखाई दिये भी तो वे इतने बड़े थे, जिनके साथ घुलना मिलना उसके लिए कठिन हो रहा था. इसलिए वहां लोगों की भीड़ मे वह उसे ही ढूंढ रही थी.  अचानक वह उसे एक झुंड़ से घिरे दिखाई दिया. सब उसी को ताक रहे थे. इसमे कोई दो राय नहीं थी कि वह इस पूरे आयोजन का सूत्रधार था. सब उसे ही देख  रहे थे. वह अब उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण हो गया था. उसके लिए यह एक कदम ओर उसकी तरफ़ जाने का प्रयास था, या वह उसका सम्मान करने लगी थी. वह अभी तक नहीं जान पायी थी या जानना भी नहीं चाहती थी. वह भीड़ में श्रोताओं के बीच में बैठी उसे ही देख रही थी. शायद उसने भी उसे देखा था लेकिन इग्नोर सा कर दिया था. उसको मंच पर बोलने जाना था सो उसने उसकी तरफ़ ज्यादा ध्यान देना उचित नहीं लगा था. वह बोलने लगा तो मंच पर विराजमान सभी लोग उसे ही ध्यान से सुन रहे थे. भीड़ शान्ति से उसकी बातों को गम्भीरता से सुन-समझ रही थी. उसे भी उसका व्याख्यान अच्छा लगा था और उसने उसका पूरा भाषण रिकार्ड कर लिया था. अब उसे घबराहट होने लगी थी कि वह कैसे बोल पायेगी और क्या बोलेगी. मंच पर जब उसका व्याख्यान खत्म हुआ तो हाल तालियो से गूंज उठा. कईयों ने तो खड़े होकर तालियां बजाई. उसने कई बार उसकी सीट की तरफ़ झांकने की कोशिश भी की पर वह खुद ही झेंप गयी थी. उसकी नजरों में उसका कद ओर बढ गया था. सुबह से शाम तक चले कार्यक्रम  में उसके साथ उसकी कोई बात नहीं हो पायी थी, और उसने भी उससे बात करना उचित नहीं लगा था. वह अकेला दिखा ही नहीं. ऐसे ही पहले दिन का कार्यक्रम खत्म हो गया.
मेरा कोना / मेरा कमरा
अगले दिन उसे बोलना था. वह नर्वस थी और थोडी बहुत नाराज भी कि उसने उसे आमंत्रित किया और एक बार भी पूछा तक नहीं. वह बहुत व्यस्त था और शायद उसकी जान-पहचान को किसी के सामने नहीं लाना चाहता था. वह भी अब अपने आपको उसके सामने साबित करना चाह रही थी और अच्छा बोलना चाह रही थी. थोड़ा सा नर्वस भी कि वह.  सुने तो ही अच्छा था. अजीब किस्म की कशमकश थी, एक तरफ़ वह यह भी चाहती थी कि वो भी उसे सुने लेकिन दूसरी तरफ़ नहीं भी कि वह उसे सामने बैठे देखकर बोल भी पायेगी या नहीं. अपने तय समयानुसार वह बोलने का मन बना चुकी थी. अपनी समझ के अनुसार उसने और पैनलिस्ट से ठीक-ठाक बोला था. लोगों ने उसकी बातों को ध्यान से सुना. इसकी खबर उसे भी लग चुकी थी.


देर शाम को उसका फोन आया था और उसने शुभकामनायें दी. ये भी जता दिया था कि उसने बात क्यों नहीं की थी. उसने उसे सुबह मिलने के लिए कहा. उसका फोन आया कि वह उससे मिलने के लिए आ रहा है. उसके लिए यह सामान्य ही थी लेकिन फ़िर भी कहीं न कहीं एक उत्सुकता भी थी. उसने डोरबेलबजाई. वह अब उसके सामने था. बात शुरु की और कहा कि संगठन वालों से झूठ बोलकर आया हूं कि जरुरी काम से बाहर जा रहा हूं. वरना तो मुझे ये लोग कभी अकेला ही नहीं छोड़ते. इधर-उधर की बातें हुई कार्यक्रम को लेकर और सामाजिक आन्दोलनों को लेकर भी. दलित और ओबीसी साहित्य पर भी बात हुई और वाम संगठनों पर भी. वह चुपचाप उसे सुन रही थी और वह बोले जा रहा था. फ़िर अचानक खामोश हो गया और उसकी ओर देखनेलगा. उसने उससे बस इतना ही कहा कि –“आप मुझे अच्छे लगते हो.”. उसने प्रत्युत्तर में कहा कि ‘जब दो बुद्धिजीवी  आपस में बात करते है तो अच्छे लगते ही हैं.’ यह उसके लिए मानो सारे सवालों का जवाब था. उसे सुनकर और  अच्छा लगा था. वह इन्हीं सब में खोई थी कि कब वह उसके नजदीक आया, उसे पता ही नहीं चला.
बाथरुम में आईने  के सामने खड़ी वह  सोचने लगी कि वह उसे क्यों नहीं रोक सकी थी, क्यों नहीं जान पायी थी? या उसका इतना सम्मान करने लगी थी कि उसे रोकने की वह हिम्मत ही नहीं जुटा पायी थी. या वह भी यही चाहती थी, ऐसा तो नहीं था. पर इस तरह से होगा यह  भी उसे मंजूर नहीं था.

“यह उसके लिए जैसे रोजमर्रा के काम जैसा हुआ होगा” पर……. उसके लिए नहीं था. जिस तरह के संस्कारों में वह पली-बढी थी उसके लिए इस तरह के रिश्ते बहुत मायने रखते थे. इसलिए उसने उससे बहुत बार इस पर बात करने की कोशिश की, पर उसके पास बात करने मिलने का समय ही नहीं था. कभी यहां व्यस्त तो कभी वहां, हर बार उसका यही जवाब होता. हालांकि वह जानती थी कि वह सचमुच में व्यस्त भी हो सकता है क्योंकि वह उसके काम को देख चुकी थी. फ़िर भी फोन पर बात न करे, यह उसे हजम नहीं हो पाया था. उसने एकाध बार फोन उठाकर बात भी की. पर वही पुराना राग, ‘ बहुत काम है, समय ही नहीं मिलता.’ वह उसे हर रोज याद करती,  . सारी कमियों के बावजूद वह उस पल को नहीं भूला पायी थी,  जो उसने उसके साथ बिताया था हालांकि इसमे उसकी कोई भी भागीदारी नहीं थी. फ़िर् भी एकाकार तो हुई ही थी,  जिसके कारण वह उसे अपने मन  में बसा बैठी थी. उसको उससे मोहब्बत  हो गयी थी पर वह उसे इग्नोर ही करता आ रहा था. शुरु शुरु में उसे लगा था कि वह व्यस्त होगा पर धीरे धीरे बहुत कुछ वह समझ गयी थी. जिस मोहब्बत पर वह अब इठलाने सी लगी थी वह एक छलावा भर था, केवल उसका   एकतरफ़ा प्यार. जिस्मानी संबंध  उस शख्स के लिए कोई मायने ही नहीं रखता था पर उसके लिए रखता था. धीरे धीरे उसने फोन उठाना भी बंद कर दिया. जब मन आया तो एक मैसेज का जवाब आता “काल यू लेटर” पर फोन या मसेज कभी नहीं करता था. ये रिश्ता उसके लिए उसे डिस्टरब करने जैसा बन गया था.  वह भी भूल जाना चाह रही थी, लेकिन नहीं ही भूल पायी. वह उस पल को अपनी यादों में समेटकर आगे बढना चाह रही थी पर उसके पास इतना समय ही नहीं था कि वह अब फ़िर से उसे ‘हैलो’ कह पाता या फ़िर किसी ओर की तलास में था.या…..। वह इसे जीना चाहती थी. पर वह तो हवा के झौंके की तरह आया था और तूफ़ान छोडकर निकल गया.
जूते
उसे याद आया कि राहुल भी तो ऐसे ही उससे एक तरफ़ा मोहब्बत करता था पर उसने कभी उसे देखा तक नहीं , बल्कि उसे देखते ही वह कट लेती थी. अगर बात करने की कोशिश करता तो दुत्कारते हुए साफ़- साफ़ जवाब देती कि जो वह सोच रहा है, ये उसकी अपनी भावनाये हैं पर उसकी नहीं. लेकिन उसने राहुल को कभी झांसे में भी तो नहीं रखा था, वह स्पष्ट थी. पर यहां तो वह यह तक नही तय कर पायी थी कि आखिर ये सब था क्या.
उसने बहुत कोशिश की कि वह भी भूला दे सब कुछ…. पर नहीं भूला पायी थी. दुखद यह भी था कि अब उसने ठान लिया था कि वह किसी पर भरोसा नहीं करेगी. उसे इसे कायम करने की पूरजोर कोशिश की. उसने अपनी बितायी जिन्दगी  के पन्नों को पलट-पलट कर देखा जिस कोरे कागज पर किसी का नाम गुदा नहीं था. हैरानी की बात थी कि उम्र के इस पड़ाव पर आकर वह इस जातीय दंभ को क्यों नहीं समझ पायी थी. जिस व्यवस्था से लड़ते-लड़ते समझते हुए उसने अपने आपकी घेराबंदी की थी, उसने अपने ही हाथों से कैसे उस किले को ढह जाने दिया था. वह तो आज तक किसी के झांसे में नहीं आयी थी, जब भटकाव के कारण सबसे ज्यादा रहे थे. पर आज……. क्या प्रगतिशीलता का मुखौटा पहनकर आये इस ब्राह्मणवाद के झांसे में वह भी आ गयी थी.

वह उसे अपने दिल से ही नहीं बल्कि दिमाग से भी नहीं निकाल पायी थी. उसने बहुत कोशिश की पर……..। उसने अपने आपको वक्त दिया. झोक दिया कामों में उसे भूलाने के लिए.  समय बड़ी से बडी याद को बिसरा देता है. वह भी ठोकर खाकर, सम्भलकर आगे बढ गयी थी.
जिसने उससे मोहब्बत  की, उसने उसकी कद्र नहीं की.
जिसने कद्र की, उसने उससे मोहब्बत ही नहीं की.

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