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निलंबित हुईं नक्सलियों के शहरी नेटवर्क के शक के साथ संविधानवादी जेलर वर्षा डोंगरे

स्त्रीकाल डेस्क 
 
फेसबुक पर अपने पोस्ट से छतीसगढ़ के प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मचा देने वाली रायपुर सेंट्रल जेल की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे को सरकार ने निलंबित कर दिया है. हालांकि उनके निलंबन की वजह फेसबुक पोस्ट नहीं है, बल्कि उनकी छुट्टी बताई जा रही है.  वर्षा डोंगरे को ईमेल के जरिए छुट्टी खारिज किए जाने की सूचना भेजी गई थी, लेकिन 6 मई तक ड्यूटी से नदारद होने की दलील के साथ जेल मुख्यालय ने उन्हें निलंबित कर दिया. वर्षा पर जेल मैन्युअल की धारा 207 का उल्लंघन करने का आरोप है. 
 
इससे पहले वर्षा डोंगरे के फेसबुक पोस्ट के मामले को सरकार ने गंभीरता से लिया था, जिसके बाद जेल प्रभारी आर आर राय की अध्यक्षता में जांच कमेटी का गठन किया गया था. इस मामले की जांच जारी है.  उनकी पोस्ट को लेकर उन्हें नोटिस जारी करके जवाब तलब किया है. सूत्रों के अनुसार सरकार को शक है कि कहीं वर्षा डोंगरे शहरी नक्सल कनेक्शन तो नहीं !
कुछ दिन पहले रायपुर की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे ने छतीसगढ़ पुलिस के बीच यह कह कर हडकंप मचा दिया है कि पुलिस आदिवासी लड़कियों को नग्न करती है और उसके हाथों और स्तनों पर करेंट लगाया जाता है. यह सब उन्होंने अपने फेसबुक के एक स्टेट्स में लिखा था. हालांकि वह स्टेट्स अब उनके एफबी वाल पर नहीं है, उन्हें इसी बीच शो-काज नोटिस थमा दिया गया था.  इसके पहले भी छत्तीसगढ़ की  पीएससी के परीक्षाफल को लेकर वर्षा डोंगरे की  याचिका पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को पहले ही फटकार लगाई थी और वर्षा डोंगरे के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला दिया है.
वर्षा डोंगरे का फेसबुक पोस्ट: 
 
मुझे लगता है कि एक बार हम सबको अपना गिरेबान झांकना चाहिए. सच्चाई खुद-ब-खुद सामने आ जाएगी. घटना में दोनों तरफ से मरने वाले अपने देशवासी है. भारतीय हैं, इसलिए कोई भी मरे तकलीफ हम सबको होती है. पूंजीवादी व्यवस्था को आदिवासी क्षेत्रों में लागू करवाना. उनके जल-जंगल-जमीन को बेदखल करने के लिए गांव का गांव जला देना, आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार, आदिवासी महिला नक्सली हैं या नहीं इसका प्रमाण पत्र देने के लिए उनका स्तन निचोड़कर दूध निकालकर देखा जाता है. टाइगर प्रोजेक्ट के नाम पर आदिवासियों को आदिवासियों को जल-जंगल-जमीन से बेदखल करने की रणनीति बनती है, जबकि संविधान पांचवीं अनुसूची के अनुसार सैनिक सरकार को कोई हक नहीं बनता आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन को हड़पने का.आखिर ये सब कुछ क्यों हो रहा है? नक्सलवाद का खात्मा करने के लिए. लगता नहीं.
 “सच तो यह है कि सारे प्राकृतिक संसाधन इन्हीं जंगलों में हैं जिसे उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को बेचने के लिए खाली करवाना है. आदिवासी जल-जंगल-जमीन खाली नहीं करेंगे क्योंकि यह उनकी मातृभूमि है. वे नक्सलवाद का अंत तो चाहते हैं, लेकिन जिस तरह से देश के रक्षक ही उनकी बहू-बेटियों की इज्जत उतार रहे हैं, उनके घर जला रहे हैं. उन्हें फर्जी केसों में चारदीवारी में सड़ने के लिए भेजा जा रहा है, आखिर वो न्याय प्राप्ति के लिए कहां जाए? ये सब मैं नहीं कह रही बल्कि सीबीआई रिपोर्ट कहती है. सुप्रीम कोर्ट कहती है. जमीनी हकीकत कहती है. जो भी आदिवासियों की समस्या का समाधान का प्रयत्न करने की कोशिश करते हैं, चाहे वह मानवाधिकार कार्यकर्ता हों, चाहे पत्रकार…उन्हें फर्जी नक्सली केसों में जेल में ठूंस दिया जाता है. अगर आदिवासी क्षेत्रों में सब कुछ ठीक हो रहा है तो सरकार इतना डरती क्यों है? ऐसा क्या कारण कि वहां किसी को भी सच्चाई जानने के लिए जाने नहीं दिया जाता है.”
“मैंने स्वयं बस्तर में 14 से 16 साल की माड़िया- मुड़िया आदिवासी बच्चियों को देखा था, जिन्हें थाने में महिला पुलिस को बाहर कर नग्न कर प्रताड़ित किया गया था. उनके दोनों हाथों की कलाइयों और स्तनों पर करंट लगाया गया था. जिसके निशान मैंने स्वयं देखे. मैं भीतर तक सिहर उठी थी कि इन छोटी-छोटी आदिवासी बच्चियों पर थर्ड डिग्री टॉर्चर किए गए. मैंने डॉक्टर से उचित उपचार और आवश्यक कार्रवाई के लिए कहा.”
उन्होंने लिखा है, “हमारे देश का संविधान और कानून किसी को यह कतई हक नहीं देता कि किसी के साथ अत्याचार करें. इसलिए सभी को जागना होगा. राज्य में पांचवीं अनुसूची लागू होनी चाहिए. आदिवासियों का विकास आदिवासियों के हिसाब से होना चाहिए. उन पर जबरदस्ती विकास न थोपा जाए. जवान हो किसान सब भाई-भाई है. अत: एक-दूसरे को मारकर न ही शांति स्थापित होगी और न ही विकास होगा. संविधान में न्याय सबके लिए है.”
“हम भी सिस्टम के शिकार हुए, लेकिन अन्याय के खिलाफ जंग लड़े. षडयंत्र रचकर तोड़ने की कोशिश की गई. प्रलोभन और रिश्वत का ऑफर भी दिया गया. हमने सारे इरादे नाकाम कर दिए और सत्य की विजय हुई, आगे भी होगी.”
सोनी सोरी का समर्थन 
पुलिस दमन की शिकार रही सोनी  सोरी ने स्त्रीकाल को बताया कि “वर्षा उनकी भी जेलर रही हैं. शायद अपनी जिम्मेवारी के दवाब में वे काफी सख्त भी थीं. मैं जेल में उनसे भी नफरत करती थी, लेकिन जब मैं जेल से बाहर आने लगी तो उन्होंने मुझसे माफी मांगी और तब मुझे लगा कि वे अलग हैं और अधिकारियों से वे जेल में सिर्फ अपनी ड्यूटी निभा रही थीं . आज उन्होंने जो भी कहा है, ‘ सौ फीसदी सच कहा है, मैं उनके साहस को सलाम करती हूँ.

सोनी सोरी की जेलर रही वर्षा डोंगरे ने कहा पुलिस करती है महिलाओं का अश्लील टॉर्चर

स्त्रीकाल डेस्क 


दो दिन पहले रायपुर की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे ने छतीसगढ़ पुलिस के बीच यह कह कर हडकंप मचा दिया है कि पुलिस आदिवासी लड़कियों को नग्न करती है और उसके हाथों और स्तनों पर करेंट लगाया जाता है. यह सब उन्होंने अपने फेसबुक के एक स्टेट्स में लिखा था. हालांकि वह स्टेट्स अब उनके एफबी वाल पर नहीं है, उन्हें इसी बीच शो-काज नोटिस थमा दिया गया है.  इसके पहले भी छत्तीसगढ़ की  पीएससी के परीक्षाफल को लेकर वर्षा डोंगरे की  याचिका पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को पहले ही फटकार लगाई थी और वर्षा डोंगरे के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला दिया है. देखें उनका पूरा पोस्ट और जानें उनके जेल में बंद रही सोनी सोरी क्या कहती हैं उनके बारे में: 


रायपुर की डिप्टी जेलर का नक्सल समस्या पर फेसबुक स्टेट्स: 

मुझे लगता है कि एक बार हम सभी को अपना गिरेबान झांकना चाहिए, सच्चाई खुदबखुद सामने आ जाऐगी… घटना में दोनों तरफ मरने वाले अपने देशवासी हैं…भारतीय हैं । इसलिए कोई भी मरे तकलिफ हम सबको होत है । लेकिन पूँजीवादी व्यवस्था को आदिवासी क्षेत्रों में जबरदस्ती लागू करवाना… उनकी जल जंगल जमीन से बेदखल करने के लिए गांव का गांव जलवा देना, आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार, आदिवासी महिलाऐं नक्सली है या नहीं इसका प्रमाण पत्र देने के लिए उनका स्तन निचोड़कर दुध निकालकर देखा जाता है । टाईगर प्रोजेक्ट के नाम पर आदिवासियों के जल जंगल जमीन से बेदखल करने की रणनीति बनती है जबकि संविधान अनुसार 5 वी अनुसूची में शामिल होने के कारण सैनिक सरकार को कोई हक नहीं बनता आदिवासियों के जल जंगल और जमींन को हड़पने का…. 

सोनी सोरी



आखिर ये सबकुछ क्यों हो रहा है । नक्सलवाद खत्म करने के लिए… लगता नहीं । सच तो यह है कि सारे प्राकृतिक खनिज संसाधन इन्ही जंगलों में है जिसे उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को बेचने के लिए खाली करवाना है । आदिवासी जल जंगल जमींन खाली नहीं करेंगे क्योंकि यह उनकी मातृभूमि है । वो नक्सलवाद का अंत तो चाहते हैं लेकिन जिस तरह से देश के रक्षक ही उनकी बहू बेटियों की इज्जत उतार रहे हैं, उनके घर जला रहे हैं, उन्हे फर्जी केशों में चार दिवारी में सड़ने भेजा जा रहा है । तो आखिर वो न्याय प्राप्ति के लिए कहां जाऐ… ये सब मैं नहीं कह रही CBI रिपोर्ट कहता है, सुप्रीम कोर्ट कहता है, जमीनी हकीकत कहता है । जो भी आदिवासियों की समस्या समाधान का प्रयत्न करने की कोशिश करते हैं चाहे वह मानव अधिकार कार्यकर्ता हो चाहे पत्रकार… उन्हे फर्जी नक्सली केशों में जेल में ठूस दिया जाता है । अगर आदिवासी क्षेत्रों में सबकुछ ठीक हो रहा है तो सरकार इतना डरती क्यों है । ऐसा क्या कारण है कि वहां किसी को भी सच्चाई जानने के लिए जाने नहीं दिया जाता ।





मैनें स्वयं बस्तर में 14 से 16 वर्ष की मुड़िया माड़िया आदिवासी बच्चियों को देखा था जिनको थाने में महिला पुलिस को बाहर कर पूरा नग्न कर प्रताड़ित किया गया था । उनके दोनों हाथों की कलाईयों और स्तनों पर करेंट लगाया गया था जिसके निशान मैने स्वयं देखे । मैं भीतर तक सिहर उठी थी…कि इन छोटी छोटी आदिवासी बच्चियों पर थर्ड डिग्री टार्चर किस लिए…मैनें डाक्टर से उचित उपचार व आवश्यक कार्यवाही के लिए कहा ।
हमारे देश का संविधान और कानून यह कतई हक नहीं देता कि किसी के साथ अत्याचार करें…।
इसलिए सभी को जागना होगा… राज्य में 5 वी अनुसूची लागू होनी चाहिए । आदिवासियों का विकास आदिवासियों के हिसाब से होना चाहिए । उन पर जबरदस्ती विकास ना थोपा जावे । आदिवासी प्रकृति के संरक्षक हैं । हमें भी प्रकृति का संरक्षक बनना चाहिए ना कि संहारक… पूँजीपतियों के दलालों की दोगली नीति को समझे …किसान जवान सब भाई भाई है । अतः एक दुसरे को मारकर न ही शांति स्थापित होगी और ना ही विकास होगा…। संविधान में न्याय सबके लिए है… इसलिए न्याय सबके साथ हो… 


हम भी इसी सिस्टम के शिकार हुए… लेकिन अन्याय के खिलाफ जंग लड़े, षडयंत्र रचकर तोड़ने की कोशिश की गई प्रलोभन रिश्वत का आफर भी दिया गया वह भी माननीय मुख्य न्यायाधीश बिलासपुर छ.ग. के समक्ष निर्णय दिनांक 26.08.2016 का para no. 69 स्वयं देख सकते हैं । लेकिन हमने इनके सारे ईरादे नाकाम कर दिए और सत्य की विजय हुई… आगे भी होगी ।अब भी समय है…सच्चाई को समझे नहीं तो शतरंज की मोहरों की भांति इस्तेमाल कर पूंजीपतियों के दलाल इस देश से इन्सानियत ही खत्म कर देंगे ।
ना हम अन्याय करेंगे और ना सहेंगे….
जय संविधान जय भारत





क्या कहती हैं पुलिस कस्टडी और जेल में पुलिस अत्याचार की शिकार रही सोनी सोरी अपने इस पूर्व जेलर के बारे में: 
सोनी  सोरी ने स्त्रीकाल को बताया कि “वर्षा उनकी भी जेलर रही हैं. शायद अपनी जिम्मेवारी के दवाब में वे काफी सख्त भी थीं. मैं जेल में उनसे भी नफरत करती थी, लेकिन जब मैं जेल से बाहर आने लगी तो उन्होंने मुझसे माफी मांगी और तब मुझे लगा कि वे अलग हैं और अधिकारियों से वे जेल में सिर्फ अपनी ड्यूटी निभा रही थीं . आज उन्होंने जो भी कहा है, ‘ सौ फीसदी सच कहा है, मैं उनके साहस को सलाम करती हूँ.’

नोटिस की पुष्टि के लिए जब वर्षा से सम्पर्क किया गया तो उनसे सम्पर्क नहीं हो सका 

हमारे समय के अंधेरे में



स्त्रीकाल डेस्क


 जनवादी लेखक संघ और राजेंद्र प्रसाद अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में शनिवार दिनांक 29 अप्रैल, 2017 को आइटीओ के निकट राजेंद्र प्रसाद भवन, नई दिल्ली में मुक्तिबोध के जन्म शताब्दी वर्ष के अवसर पर एक परिसंवाद का आयोजन किया गया. परिसंवाद की अध्यक्षता वरिष्ठ लेखक दूधनाथ सिंह ने की. स्वागत वक्तव्य राजेंद्र प्रसाद अकादमी के निदेशक अनिल मिश्र ने दिया. कार्यक्रम का संचालन आलोचक-कथाकार संजीव कुमार ने किया. स्वागत वक्तव्य में अनिल मिश्र ने कहा कि यह बड़ा संकटपूर्ण समय है. ऐसे कठिन दौर में समाजवादी और साम्यवादी धाराओं में एकता होनी चाहिए. अगर यह एकता संभव नहीं तो उनमें आपस में संवाद तो होना ही चाहिए. 1973 में स्थापित राजेंद्र प्रसाद अकादमी के बारे में उन्होंने कहा कि राजेंद्र भवन में अकादमिक गतिविधियों को फिर से तेज किया जा रहा है. संचालक संजीव कुमार का कहना था कि परिसंवाद का शीर्षक बांधता नहीं बल्कि यह खुलकर बातचीत करने का अवसर देता है. उन्होंने बताया कि मुक्तिबोध पर दो दिनों का एक उत्सवधर्मी कार्यक्रम इस वर्ष नवंबर महीने में किया जाएगा जिसमें मंचन, रचनापाठ और परिचर्चा आदि का समावेश रहेगा. आलोचक आशुतोष के एक लेख के हवाले से उन्होंने कहा कि ज्यों-ज्यों समय बीत रहा है त्यों-त्यों मुक्तिबोध समकालीन होते जा रहे हैं. बिना ग्राम्शी को पढ़े मुक्तिबोध आर्गेनिक बुद्धिजीवी की बात कर रहे थे. क्या हमारा बुद्धिजीवी समाज से कटा हुआ ‘ब्रह्मराक्षस’ होगा? आज फासीवाद हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बाधित कर रहा है. संविधानेतर शक्तियों को सरकार प्रश्रय दे रही है. पुलिस गुंडों की हिफाजत कर रही है. रामजस प्रकरण इसका ताजातरीन उदाहरण है. उत्तर प्रदेश की पुलिस किस दायित्व के निर्वहन में लगा दी गई है?

 परिसंवाद का आरंभ करते हुए कवि-चिंतक मनमोहन ने कहा कि बिना क्रांतिकारी चुनौती के प्रतिक्रांति का बड़ा अभियान चला हुआ है. मुक्तिबोध का जन्म शताब्दी वर्ष इस तरह का होगा, सोचने की बात है यह. मुक्तिबोध के समय में जनवादी संस्थाएं बन रहीं थीं. नई कविता के दौर में उन्हें पहचान मिली. ’70 के दशक की अकविता के ‘निह्लिज्म’ (सर्व नकार) के लिए मुक्तिबोध जरूरी थे. रचनात्मक अंतर्दृष्टि देने वाले रचनाकार के रूप में मुक्तिबोध हमारे साथ रहे हैं. वे प्रगतिवाद की मुख्यधारा में नहीं रहे. उन्होंने अपनी अलग राह बनाई. मुक्तिबोध से जैसा रिश्ता बनना चाहिए था, नहीं बना. उनकी आइकॉनिक छवि उनसे संवाद करने में बाधा रही है. उनकी छवि से तरह-तरह के काम लिए गए. कला की रहस्यात्मकता उनके साथ जुड़ी रही है. आजादी के बाद जो जनतांत्रिक खाका बना उसकी कृत्रिमता को, उसके सतहीपन को उन्होंने समझ लिया था. उन्होंने आजादी के बाद की परिस्थिति को तस्लीम किया. शीतयुद्ध के सवालों को, परिमल के प्रश्नों को मुक्तिबोध ने झूठा नहीं कहा. बदले परिवेश में प्रगतिशील आंदोलन को अभिव्यक्ति के प्रश्न की गहराई से जोड़ा. सामाजिक जनतंत्र के बगैर राजनीतिक जनतंत्र नहीं चल सकता- आंबेडकर के इस निष्कर्ष की ताईद मुक्तिबोध के यहाँ है. जो जनवाद की जगह है वही फासीवाद का कार्यस्थल भी है. ‘कामायनी’ के मनु का उनका विश्लेषण देखिए. वैयक्तिकता का उभार का कारण स्पष्ट होगा. राजनीति ने समाज सुधार का काम छोड़ दिया. इस किनाराकशी से विच्छिन्न ‘व्यक्ति’ का जन्म हुआ. ऊपर जो फासीज्म दिख रहा है वह नीचे से ताकत ले रहा है. इसने राज्य पर कब्ज़ा कर लिया है. राजनीतिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने की तैयारी की जा रही है. कांग्रेसमुक्त भारत के नारे को मुक्तिबोध के लंबे दु:स्वप्न के संदर्भ में पढ़िए. मुक्तिबोध की कैनोनिकल उपस्थिति सदा-सर्वदा के लिए नहीं है. उन्हें निशाने पर लेना बहुत आसान है. कल कहा जा सकता है कि वे बेकार हैं, कठिन हैं, टी.एस. इलियट की नक़ल हैं. हिंदी पाठ्यक्रमों का मुक्तिबोध से नफरत का रिश्ता है. मुक्तिबोध आज के और आगे के कवि हैं. जो साहित्य में, विचार-जगत में नए-नए आ रहे हैं, उन तक मुक्तिबोध को पहुँचाना पड़ेगा. मुक्तिबोध का ‘सेलिब्रेशन’ भी खतरा है.

अधिग्रहण और कुपाठ से मुक्तिबोध को बचाए जाने की जरूरत रेखांकित करते हुए वरिष्ठ आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा कि जिस आसन्न फासीवाद से मुक्तिबोध रूबरू थे वह आज हमारे सामने है. रूलिंग विचारधारा के रूप में. इतिहास पर मुक्तिबोध की पुस्तक प्रतिबंधित की गई थी. चीन के हमले ने बहुसंख्यकवाद की विचारधारा को साम्यवाद पर हमले का अवसर दिया था. तभी से कम्युनिस्टों को देशद्रोही कहे जाने की शुरुआत हुई थी. नेहरू और नेहरूवियन मॉडल की कई चीजों की आलोचना करने वाले मुक्तिबोध ने नेहरू की मृत्यु पर कहा था कि अब फासीवाद का खतरा बढ़ गया है. मुक्तिबोध ने वर्ग की बात करते-करते जाति-वर्ण के प्रश्नों को पीछे कर देने की वामपंथी पद्धति की आलोचना की थी. उनके भक्तिकाल पर लिखे निबंध को याद किया जा सकता है जहाँ कबीर और तुलसी आमने-सामने हैं. मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मलेन पर उनकी टिप्पणी को याद कीजिए और आज स्वच्छता, पर्यावरण आदि पर कार्यक्रम कराने वाली साहित्य अकादमी से उसकी तुलना कीजिए, मुक्तिबोध की दूरदर्शिता स्पष्ट हो जाएगी. वीरेन्द्र यादव ने कहा कि मुक्तिबोध के वैचारिक पक्ष को नज़रअंदाज़ करके हम उनके साथ अन्याय करेंगे.

 यह हो सकता है कि हमें यूपी पुलिस को बचाने की आवाज उठानी पड़े- इस बिडंबना की ओर इशारा करते हुए आलोचक गोपालजी प्रधान ने कहा कि मुक्तिबोध ऐसे मुद्दों को छूते हैं जिसे पढ़ते हुए हम शर्मिंदा होते हैं. हममें आत्मालोचन के साहस की कमी आई है. मुक्तिबोध अपने वर्ग के प्रति निर्मम थे. वे आत्मालोचन को कसौटी की तरह इस्तेमाल करते थे. गोपालजी ने कहा कि मार्क्सवादी वैचारिकी में सामाजिक और राजनीतिक श्रेणियों के मध्य दरार नहीं थी. यह दरार बाद में आई है. इसे पाटने की जरूरत है. मुक्तिबोध ने अपने समय से जूझते हुए अपने लिए सम्पूर्ण वैचारिकी बनाई थी. अपने लिए विचार आयत्त किया था. भक्त कवियों के बारे में जैसे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा था कि उनकी कविता उनके दार्शनिक चिंतन का सह-उत्पाद है उसी तरह कहा जा सकता है कि मुक्तिबोध का रचनाकर्म उनकी वैचारिकी का हिस्सा है, सह-उत्पाद है. गोपालजी ने जोर देकर कहा कि भारतीय मार्क्सवादियों ने सोवियत रूस के समक्ष कभी आत्मसमर्पण नहीं किया. वे हंगरी, चेकोस्लोवाकिया आदि के संबंध में भी संवेदनशील, खुले हुए रहे हैं.

हिंदी कविता की महत्वपूर्ण हस्ताक्षर शुभा ने मुक्तिबोध की रचना ‘नए की जन्मकुंडली’ के संदर्भ में कहा कि मुक्तिबोध इसकी तरफ ध्यान दिलाते हैं कि स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी परिघटना संयुक्त परिवार का टूटना और एकल परिवार का बनना है. पतिव्रता धर्म, वर्णव्यवस्था ये सब समाज की स्वचालित मशीनें हैं. जब धर्म का अनुशासन टूट रहा था तब हमने उसका विश्लेषण नहीं किया. अब जैसे पूरा समाज और परिवार अंतःप्रवृत्तियों को सौंप दिया गया है. यह आत्मग्रस्तता कन्जूमरिज्म के आगे की चीज है. मुक्तिबोध के संदर्भ से शुभा ने कहा कि बाहर परिवर्तन की बात करना और घर के अंदर उसे बनाए रखना सबसे बड़ा पाखण्ड है. परिवार में फासिज्म की मौजूदगी को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि जेंडर, दलित और परिवार पर चुप्पी ने वर्ग संघर्ष की संकीर्ण अवधारणा को जन्म दिया. डेमोक्रेसी एक सुविधा बन गई. सामाजिक रूपांतरण का मुद्दा स्थगित हो गया. रूपांतरण का बीज शब्द आत्मसंघर्ष है. गाँव किले की तरह अभेद्य रहे. दुलीना में पाँच दलितों को गाय के नाम पर मार दिया गया. गाँव का रूपांतरण हमारे अजेंडे में कभी न आया. रिस्क न लेकर, परिवर्तन को जगह न देकर भी साहित्यकार बने रहना पाखंडी होना है. आज दलित और स्त्री विमर्श में भी दक्षिणपंथ आ बैठा है. मध्यवर्ग का बनना कभी रुका नहीं. अभी नया मध्यवर्ग सामने आ रहा है. साहित्यकार प्रतिपक्ष बन सकते हैं, वे प्रतिपक्ष की भूमिका निभाने को तैयार रहें. वे न अपने को विशिष्ट मानें और न विशिष्ट बनें.



 वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी ने कहा कि वे मुक्तिबोध से तब मिले जब 17 वर्ष के रहे. जब वे 24 वर्ष के हुए तब मुक्तिबोध की मृत्यु हो गई. परिचय के ये सात साल न पर्याप्त हैं और न उल्लेखनीय. मुक्तिबोध ने गढ़े गए लालित्य के स्थापत्य को ध्वस्त किया. जब साम्यवादी व्यवस्थाएं नृशंसता पर उतर आई थीं तब उन्होंने अंतःकरण का प्रश्न उठाया. पिछले 50 वर्ष की कविता ने मुक्तिबोध से बहुत कम सीखा है. कवि लालित्य में ही उलझे रहे हैं. मुक्तिबोध के बीज शब्द हैं- आत्मसंघर्ष, अंतःकरण और आत्माभियोग. मुक्तिबोध अपनी जिम्मेदारी को केंद्रीय मानते हैं. वे सबसे बड़े आत्माभियोगी कवि हैं. उन्होंने 1964 में जिस फैंटेसी को प्रस्तुत किया था वह 2014-15 में साकार हो गई. ऐसा दुनिया के साहित्य में बहुत कम हुआ है कि फैंटेसी साकार हो जाए. ‘अंधेरे में’ कुल चार चरित्र हैं- टालस्टाय, तिलक, गाँधी और अनाम पागल. इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण गाँधी का चरित्र है. मुक्तिबोध गाँधीवादी से मार्क्सवादी बने थे. उनमें गाँधी वाला तत्व कभी समाप्त न हुआ. अभी हमने युवाओं का एक सम्मेलन किया था. 56 युवा आए थे. किसी ने न मुक्तिबोध का जिक्र किया और न राजनीतिक परिस्थिति का. अशोक जी ने कहा कि मुक्तिबोध की इतिहास वाली किताब के विरोध में जो मार्च निकला था उसमें वामपंथी भी शामिल थे. इसने मुक्तिबोध को तोड़ दिया. वे कभी इस आघात से उबर न सके.


 लेखक-विचारक चंचल चौहान ने कहा कि उन्होंने एम.ए. का लघु शोधप्रबंध मुक्तिबोध पर लिखा था. मार्क्सवाद को समझे बगैर मुक्तिबोध की कविताएं दुरूह लगेंगी. उनकी कविताओं की बड़ी ख़राब व्याख्या राम विलास शर्मा ने की थी. नामवर सिंह की आलोचना ने भी न्याय नहीं किया. मुक्तिबोध ने जोर देकर कहा था कि मुक्ति के रास्ते अकेले में नहीं मिलते. परिवर्तन सर्वहारा ही करेगा. चिंतकों, साहित्यकारों को सर्वहारा से जुड़ना होगा. चंचल चौहान ने कहा कि मध्यवर्ग के प्रति प्रगतिशीलों का रवैया ठीक नहीं है. मुक्तिबोध इसे ठीक करना चाहते थे. फासीवाद के दौर में आप एक बड़े वर्ग को छोड़कर मुकाबला नहीं कर सकते.


 कवि-विचारक अच्युतानंद मिश्र ने कहा कि लेखकों की जन्मशताब्दी मनाने के कारणों पर गंभीरतापूर्वक विचार किया जाना चाहिए. पिछली शताब्दी के छठे-सातवें दशक में मुक्तिबोध को लेकर जो बहसें हुई हैं वे दिक्कततलब हैं. हमें कविताओं को स्थिर कर देने से बचना चाहिए. मुक्तिबोध द्वंद्व से आगे बढ़कर त्रिकोण बनाते हैं. इस त्रिकोण की पहचान करनी होगी. अच्युतानंद ने प्रश्न किया कि मुक्तिबोध के यहाँ प्रकृति इतनी भीषण रूप में क्यों आती है? सूखी बावड़ी, घुग्घू उनकी कविताओं में बार-बार आए हैं. असल में, मुक्तिबोध औद्योगिक क्रांति के कारण मनुष्य और प्रकृति के बीच बिगड़े संतुलन को देख रहे थे. ये खतरे बाद के दिनों में बढ़े हैं. अभी कॉल सेंटरों में, एप्प-जगत में कैसी सामाजिकता विकसित हो रही है? आज के टकरावों को समझने के लिए ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञान मुख्य टूल हो सकते हैं. टकराव से बने अंतरालों को बचाने की बात मुक्तिबोध के यहाँ है. हम जिस कौम की चर्चा करते थे उसमें बदलाव आ चुका है. अब यह कहना कि जिंदा कौमें 5 वर्ष तक इंतजार नहीं करतीं, कोई अर्थ नहीं देता. अब तो कौमें 10 वर्षों तक इंतजार करने को तैयार दिखती हैं. कौमों के चरित्र में आए बदलाव को समझना होगा.

 वरिष्ठ कवि इब्बार रब्बी ने कहा कि नई पीढ़ी ने मुक्तिबोध को समझे बिना ही उनका स्वागत किया. गाँधी की हत्या समाज में फासिज्म की मौजूदगी का उद्घोष था. मुक्तिबोध आगे की इत्तिला देते हैं. उन्होंने इस हत्या को, पंजाब और बंगाल परिघटनाओं को देखा था. मुक्तिबोध की शैली पुराणकारों की शैली लगती है- भविष्य की सूचना देने वाली. कबीर और मुक्तिबोध ऐसे रचनाकार हैं जो हमेशा प्रासंगिक रहेंगे.

आलोचक वैभव सिंह ने कहा कि ‘अंधेरे में’ चेतावनी देने वाली रचना है. वह ‘डिस्टोपिया पोएट्री’ है. अमेरिका में इस समय डिस्टोपिया उपन्यास खूब पढ़े जा रहे हैं. प्रेमचंद ने साहित्यकार को स्वभावतः प्रगतिशील बताया था. मुक्तिबोध ने इस अवधारणा को तोड़ा. प्रेमचंद कवच की तरह इस्तेमाल किए जा रहे थे. वैभव सिंह ने कहा कि बहुत से लेखक इस समय चुप्पी के मोड में चले गए हैं. चुप हो जाना कई बार तंत्र की मदद करना होता है. तीसरी दुनिया के देशों की वैचारिक हलचलों के स्रोत के रूप में मार्क्सवाद रहा है. मुक्तिबोध की समझ के निर्माण में मार्क्सवाद की मुख्य भूमिका रही है लेकिन रेणु के साथ मुक्तिबोध ऐसे लेखक हैं जिन्होंने खुद मूल्यों को अन्वेषित किया था. मुक्तिबोध कंटेंट की कमी की बात नहीं करते, वे शिल्प की कमी की बात करते हैं. ‘अंधेरे में’ कविता में सबसे ज्यादा प्रकाश के बिंब हैं. ‘परम अभिव्यक्ति की खोज’ मध्यवर्ग की बनावट के भीतर है. यह मध्यवर्ग किसी लाभ के लिए कैसा भी समझौता करने को तैयार है. मुक्तिबोध देख रहे थे कि लोकतंत्र के अंदर फासीवाद की प्रवृत्तियाँ मौजूद रहती हैं. खतरा हमेशा बना रहता है. वैभव सिंह ने कहा कि मुक्तिबोध के यहाँ विचारधारा और निजी बौद्धिक ईमानदारी का सुमेल है.


 संपादक-कवि मदन कश्यप ने इस जिज्ञासा से अपनी बात शुरू की कि ‘अंधेरे में’ कविता में आखिर वह कौन-सी बात है कि यह सारे आंदोलनों से जुड़ जाती है! सभी आंदोलनों ने अपने को इस कविता से जोड़ा, नक्सलवाड़ी ने भी. यह वर्ष अक्टूबर क्रांति का वर्ष भी है. महिमामंडन के दौर में हम क्रांति की विफलताओं पर भी बात करें. साहित्यकार समय की जटिलता के हिसाब से विचारधारा का विस्तार करते हैं. राजनेता उसका सरलीकरण करते हैं. मदन जी ने अति लोकप्रियता को लोकतांत्रिक नहीं माना. अति लोकप्रियता डर से पैदा होती है. आज के शासक की लोकप्रियता नेहरू वाली लोकप्रियता नहीं है. इसकी व्याख्या की जानी चाहिए; विरोध करने से काम नहीं चलेगा. आज की क्रूरताओं के विकास में हमारी क्या भूमिका है- मुक्तिबोध और नागार्जुन से हम इसकी पहचान करना सीख सकते हैं. हम धर्म को, नैतिकता को उनके खाते में डाल आए; उन्होंने जो चाहा, किया. मुक्तिबोध ने इन प्रश्नों को छोड़ा नही था. हम अपनी अक्षमता को स्वीकार करते हुए संघर्ष की तरफ जाएं.

कथाकार रजनी दिसोदिया ने कबीर की साखियों के हवाले से मुक्तिबोध को समझने का उद्यम किया. उन्होंने कहा कि ‘अंधेरे में’ कविता आपको अंदर तक देख लेती है. आज का मध्यवर्ग जगा हुआ है मगर वह रिस्क नहीं ले सकता. हमारी भूल गलती आज जिरहबख्तर पहन कर बैठी हुई है. हमने पूरे संवैधानिक तरीके से उसे चुना है. जो पोस्ट-ट्रुथ है उससे कैसे लड़ें? यह जटिल स्थिति है. भारत बहु सत्यों वाला देश है. हम थोड़ा-थोड़ा सबसे उलझ सकते हैं मगर किसी को बर्खास्त नहीं कर सकते. अभी जो भी मारे जा रहे हैं, सामान्य लोग हैं. चाहे वे सेना के सिपाही हों, आदिवासी हों या किसान. रजनी दिसोदिया ने मिथकों से टकराने का भी सुझाव दिया.


 कवि-अनुवादक संजीव कौशल ने कविता के लिए ज्ञान और संवेदना दोनों को अनिवार्य माना. उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध इस संबंध में कवि से प्रतिबद्धता की मांग करते हैं. वे कवि को एक्टिविस्ट के रूप में भी देखना चाहते हैं. आज तक कविता की कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं दी जा सकी है. यह विधा निरंतर वर्धनशील है, किसी खांचे में बंधने से इनकार करती हुई. संजीव कौशल ने कहा कि जब बहुत आवश्यक है तब लेखकों के बीच संवाद ठप पड़ा है. आज हम जो देख रहे हैं वह अभी पाँच-सात साल और चलेगा. इसके बाद अपने-आप ढह जाएगा. जनता खुद ढहा देगी.


 कवि-कार्यकर्ता-आलोचक बली सिंह ने मुक्तिबोध को आधुनिकता का बहुत बड़ा क्रिटीक माना. मनुष्य-केंद्रित आधुनिकता को भयंकर समस्याग्रस्त बताते हुए बली सिंह ने मनुष्येतर जगत के प्रति संवेदना पैदा करने की जरूरत बताई. मुक्तिबोध को उन्होंने दबी-कुचली अस्मिताओं से तादात्म्य स्थापित करने वाला कवि बताया. जिस ‘श्यामल समूह’ का जिक्र मुक्तिबोध की कविता में आता है वह यही अस्मिता है. मुक्तिबोध ने अपने को क्रांतियुग का कवि माना था, उत्पीड़ित समुदायों के उभार वाले युग का कवि. सत्-चित्-आनंद की त्रयी को सत्-चित्-वेदना में बदलने वाले मुक्तिबोध ने पूँजीवाद को जिन्न कहा था. सुनहरी दुनिया बसा देने वाला जिन्न आज मध्यवर्ग को सम्मोहित किए हुए है.

आलोचक कवितेन्द्र इंदु ने कहा कि जैसे हिंदू जनता पर्व-त्यौहार के अनुसार देवताओं को याद करती है वैसे ही हम लोग भी जन्म शताब्दियों के अवसर पर लेखकों को याद करते हैं. जिस भाव से कुछ वर्ष पहले राम विलास शर्मा को याद किया था गया था वैसे आज मुक्तिबोध को याद किया जा रहा है. हमने मुक्तिबोध को मौलिक आलोचक की तरह देखने की कोशिश नहीं की है. मुक्तिबोध ने आलोचना की शब्दावली विकसित की. उनकी प्रासंगिकता इससे जांची जाए कि उनका लिखा हुआ आज घटित हो रहा है. वामपंथी समीक्षकों ने जाति और जेंडर पर मुक्तिबोध के विचारों की समीक्षा नहीं की. ऐसा लगता है कि इसे उन्होंने किसी ‘दलित’ या ‘स्त्री’ विमर्शकार के लिए छोड़ रखा है. भक्ति आंदोलन पर मुक्तिबोध का निबंध ऐतिहासिक महत्व का है. जब इतिहास के पुनर्लेखन का काम होना चाहिए था, संक्षिप्त इतिहास लिखने का चलन है. जिस अकादमिया पर वामपंथियों का वर्चस्व रहा है उसका उन्होंने क्या किया है… हमने कैसी यूनिवर्सिटी बनाई है? लेखक संगठनों में व्यापक एकता की जरूरत बताते हुए कवितेन्द्र ने पूछा कि कई संगठन मिलकर काम क्यों नहीं कर सकते?

 वरिष्ठ लेखिका रेखा अवस्थी ने कहा कि मुक्तिबोध संस्कृति और आत्मा के संकट की पहचान करने वाले रचनाकार हैं. आजादी के बाद जो विचलन आया उसे संभालने में हम विफल रहे. हमने आत्मसंघर्ष की कसौटी भुला दी. मुक्तिबोध का संगठन पर विश्वास था तभी उन्होंने ‘ब्रह्मराक्षस का शिष्य’ जैसी कहानी लिखी. लेखक-प्राध्यापक रोहिताश्व ने अन्य भाषाओँ के समानधर्मा लेखकों से जुड़ने की बात की. सचेत हुए बिना किसी दूसरे कलबुर्गी की हत्या रोकी नहीं जा सकेगी. जलेस के महासचिव मुरलीबाबू ने कहा कि मुक्तिबोध का साहित्य फासीवादी निरंकुशता के दौर को परिभाषित करता है. उन्होंने कहा कि संगठनों का मजाक उड़ाने वाले व्यक्तिवादी हैं.


परिसंवाद की अध्यक्षता कर रहे दूधनाथ सिंह ने कहा कि मुक्तिबोध की सबसे अच्छी कविता ‘चंबल की घाटियाँ’ है. डकैत चंबल की घाटियों में ही नहीं रहते, अन्यत्र भी होते हैं. चर्चित कविता ‘भूल-गलती’ का विश्लेषण करते हुए उन्होंने कहा कि अगर इस कविता में ‘आलमगीर’ शब्द न आया होता तो हम शिवाजी-औरंगजेब के संदर्भ को पकड़ न पाते और मुक्तिबोध की मराठा पक्षधरता को देखने में चूकते जाते. हमें मुक्तिबोध की सीमाओं पर भी बात करनी चाहिए. सिर्फ वाह-वाह करके हम किसी का भला नहीं करेंगे. मुक्तिबोध की भाषा में जो तात्समिकता है वह उनके मराठीभाषी होने के कारण है. वे उस तात्समिकता से बड़ा काम निकालते हैं मगर वही उनकी सीमा भी है. वे कभी उससे मुक्त नहीं हो पाए. साहित्यिक संगठन को जरूरी बताते हुए उन्होंने कहा कि जनता की चेतना का स्तर उठाने का काम जारी रहना चाहिए. इससे सत्ता परेशान होती है और ध्यान देती है. बड़े कवि की पहचान कराते हुए उन्होंने कहा कि कविता में संस्कृतियों का सम्मिश्रण काम्य स्थिति है. जायसी को उद्धृत करके हुए सत्राध्यक्ष ने परिसंवाद का समापन किया-  ‘केहि न जगत जस बेचा, केहि न लीन्ह जस मोल. जो यह पढ़ै कहानी, हम संवरै दुइ बोल ..’

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क्या ‘महिलायें’ सिर्फ़ ‘पुरुषों’ की जरुरत की वस्तु हैं ??

हिमांशु यादव

जर्मन अध्ययन केंद्र ,गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोधरत है. संपर्क :9998780243, 9104676458

Email : yadavhimanshu2642@gmail.com

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। हमारे देश में यह प्रसिद्ध श्लोक बड़े ही गर्व के साथ हमें सुनाया जाता है . हमें सिखाया जाता है कि महिलाओं की इज्जत करनी चाहिए. बचपन से ही ‘रानी लक्ष्मी बाई’ जैसी वीरांगनाओं की वीरता के किस्से भी सुनाये जाते हैं . भारतीय समाज में तो स्त्री को देवी तक का रूप दे दिया गया है . धन की देवी, विद्या की देवी, शक्ति की देवी और भी तमाम तरह की देवियाँ हमारे यहाँ मौजूद हैं .

बहुत ही सराहनीय भी है कि हमारे ही समाज की, हमारे ही देश की कुछ महिलाओं ने सफलता के उस शिखर को भी छुआ है जहाँ तक पहुँच पाना अत्यंत ही मुश्किल है . उन महिलाओं के जज्बे को भी सलाम है जिन्होंने अपनी कामयाबी के बलबूते पर हमारे देश के परचम को सम्पूर्ण विश्व में लहराया है . भूतकाल से लेकर वर्तमान तक अनेक महिलाओं ने किसी न किसी क्षेत्र में यह कर दिखाया है कि वे पुरुषों से किसी भी मायने में कम नहीं हैं .


हम इन्हीं सभी बातों, नामों तथा कहानियों में उलझकर रह जाते हैं . हम केवल इतना ही सोच पाते हैं कि महिलाओं को भी बराबरी का अधिकार दिया गया है . हम आंकड़ों में यह देखकर गौरवान्वित महसूस करते हैं कि महिलाओं की साक्षरता दर बढ़ रही है . कुछ कामयाब महिलाओं का उदाहरण देकर, हम यह कह भी देते हैं कि महिलाएं किसी से कम नहीं हैं . परन्तु सच इसके ठीक विपरीत है . सच इतना डरावना है कि हम सच के पास जाने से भी डरते हैं .


हमारे ही समाज में हमें दोयम दर्जे का आचरण देखने को मिलता है . हमारे ही समाज में जहाँ महिलाओं को देवी का दर्जा दिया जाता है, वहीँ उसी समाज में, महिलाओं को डायन भी कहा जाता है .


हमारे ही समाज में,एक तरफ महिलाओं की आज़ादी की भी बातें की जाती हैं तथा वहीँ दूसरी तरफ,उन्हें पर्दे में रहने को मजबूर किया जाता है . हमारे ही समाज में महिलाओं को पूजा जाता है तथा हमारे ही समाज में महिला को दहेज़ के लिए जला दिया जाता है .


मैं स्त्रीवादी नहीं हूँ, तथा ना ही स्त्रीवादियों के विपक्ष में हूँ . परन्तु कुछ सवाल हमेशामेरे दिमाग में कौंध जाते हैं:

1. आखिर हमारे समाज में लड़कियों को युवा अवस्था में आ जाने के बाद घर से बाहर निकलने के लिए अपने चेहरे पर नकाब बांधकर क्यों चलना पड़ता है ?

2.आखिर हमारे समाज में महिलाएं अपने पिता, पति या भाई के नाम से ही क्यों जानी जाती हैं ?

3.आखिर मेरी  पत्नी को मिसेज हिमांशु यादव के नाम से क्यों जाना जाये ? अगर मुझे Mr.ABC(जो भी मेरी पत्नी       का नाम हो) के नाम से जाना जाता है तो क्या बुराई है?

4.आखिर बार-बार हम पिताजी से ही क्यों पूछते रहते हैं कि आप सेवानिवृत कब होंगे ? क्या हमारे घर में हम           कभी अपनी माताजी से पूछते हैं कि वो सेवानिवृतकब होंगी ?

5.क्यों हमारे घर में हमारे माता-पिता हमारी बहनों को ही यह कहते हैं कि आप जीन्स-टीशर्ट पहनकर बाहर मत     जाया करो . क्या कभी हमारे पिताजी या किसी और ने हमें या हमारे भाई को यह कहा है कि जीन्स मत पहना     करो .

यह सब बातें बेशक हमें बहुत ही मामूली प्रतीत होती हैं परन्तु यही सच है . हम कभी भी यह उदाहरण देने से नहीं चूकते हैं कि लड़कियां हमारे रीति-रिवाजों को तोड़कर समाज का नाम बदनाम कर रही हैं . आपके नज़रिये से यह ठीक हो सकता है, पर हम यह क्यों भूल जाते हैं कि ऐसा करने के लिए भी हमने ही उन्हें मजबूर किया हैं . बचपन से ही हम उन्हें एक निश्चित दायरे में बांधना शुरु कर देते हैं . हमारे ही घरों में उन्हें यह सिखाया जाता है कि यह करना है, वह करना है . यह नहीं करना है, वह नहीं करना है . झाड़ू-पोंछा और रसोई से आगे वो सोच ही नहीं पाती हैं .

आप किसी भी एक साधारण सी गाली का उदाहरण ही ले लीजिये . बहन…. से लेकर तमाम तरह की गालियाँ भी महिलाओं को संबोधित कर के ही बनायीं गयी हैं . हमारे ही समाज में संतान उत्पति नहीं होने पर महिला को बांझ कहकर गाली दी जाती है तथा उसी समाज में मासिक धर्म (जो की संतान उतप्ति के लिए जरूरी है) के समय में महिला को अपवित्र समझा जाता है उसके साथ अपने ही घर में अपने ही लोगों द्वारा दोहरा बर्ताव किया जाता है .

‘आदमी की निगाह में औरत’ पुस्तक में लेखक राजेंद्र यादव लिखते हैं कि औरत को हमने केवल सम्भोग करने तथा स्वयं की शारीरिक जरूरत की वस्तु ही समझा है .



मेरा व्यक्तिगत अनुभव भी रहा है, जो मैं आप लोगों से साझा करना चाहता हूँ . मेरी एक महिला मित्र हैं, या यूँ कह लीजिये कि हुआ करती थी. चूँकि अब वो शादी-शुदा हैं तो संपर्क में नहीं हैं . जब उनकी शादी तय हुयी थी,किसी अनजान लडके के साथ पारिवारिक संबंधों के कारण तो उन्होंने विरोध किया परन्तु असफल रहीं . शादी के बाद तथाकथित सुहागरात की रात को उनके पति महोदय उनके कमरे में आये . पास बैठे, बातें की . धीरे-धीरे उन्होंने अपनी पत्नी के उन अंगों पर छुआ जहाँ पर छूना उनकी पत्नी को नहीं भाया . उन्होंने विरोध किया और कहा कि मैं सहज महसूस नहीं कर रही हूँ, आप मेरे लिए अनजान हैं और मैं किसी अनजान व्यक्ति के साथ शारीरिक संबंध नही बना सकती हूँ . पति महोदय को बुरा लगा और उन्होंने कहा कि “अगर मेरे साथ यह सब नहीं करना चाहती हो तो फिर मुझसे शादी ही क्यों की ? मैं बाहर जा रहा हूँ, बाजार में पैसे के लिए औरतें यह सब करती हैं .”

इस घटनाकर्म ने आज मुझे लिखने पर मजबूर कर दिया . इस छोटी सी दर्द भरी कहानी को सुनने के बाद मैं राजेंद्र यादव जी की लिखी हुयी बातों को को नकारने का साहस नहीं कर सकता हूँ . इस छोटे से घटनाकर्म में हमें दो बातें देखने को मिलती हैं . पहली तो यह जब उनके पति महोदय कहते हैं कि ‘अगर मेरे साथ यह सब नहीं करना चाहती हो तो फिर मुझसे शादी ही क्यों की ?’


यह वाक्य हमें यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि “शादी”जो की भारतीय समाज में एक पवित्र बंधन माना जाता है, क्या यह इसलिये ही पवित्र है की शादी के बाद पुरुष किसी अनजान महिला (उसकी पत्नी जिसे वो शादी से पूर्व नहीं जानता है) के साथ संभोग कर सकता है, चाहे उसकी मर्जी हो या ना हो ?



दूसरी बात हमारे सामने यह आती है कि आखिर ऐसी क्या वजह है, जो बहुत सी महिलाएं आज भी, आज़ादी के 70 साल बाद भी, पैसा कमाने के लिए अपना जिस्म बेचने पर मजबूर हैं ?

बचपन से ही हमारी मातायें अपने बच्चों को दो अलग अलग तरह का नजरिया देती हैं . बच्चे को वो ही बताती हैं कि यह खिलौना लड़की का है, यह खिलौना लडके का है . यह कपडा लड़की का है यह कपडा लड़के का है . लड़कियां जब युवावस्था में प्रवेश करती हैं तो शरीर में हो रहे अवांछित बदलावों के बारे में वह सबसे पहले अपनी माता या बड़ी बहन से ही निसंकोच बताती हैं . उस समय उसके दिमाग में इतना कचरा भर दिया जाता है कि यह नहीं करना है, वहां नहीं जाना है . एक युवा अवस्था में प्रवेश कर रही लड़की को दूसरी महिला या लड़की द्वारा ही यह बताया जाता है कि लड़कों से दूर रहना है . किसी हमउम्र लडके से ज्यादा खुलकर कोई बात नहीं करनी है . किसी भी हमउम्र लडके के साथ अकेले में कहीं जाना नही है . रात में किसी लडके के साथ रुकना नही है . और भी तमाम तरह की बातें उनके दिमाग में भर दी जाती हैं . उनके दिमाग में इतनी बातें बहर दी जाती हैं की वो हर एक लडके में एक गन्दा तथा हवस से भरा मर्द देखने लगती हैं .


वह उसी लडके के साथ खुलकर बातें करने में संकोच करने लगती है जिसके साथ उसने अपना पूरा बचपन बिताया है . मैंने मेरे निजी अनुभव में आज तक कभी ऐसा नही देखा है जब किसी युवा लडके ने अपनी हमउम्र लड़की को यह कहा हो कि अब तुम जवान हो गयी हो अब तुम मुझसे बातें करना बंद कर दो . या फिर, अब तुम बड़ी हो गयी हो अब तुम मेरे साथ अपनी भावनाएं नहीं साझा कर सकती हो . या फिर, कभी किसी लडके ने कहा हो कि अब तुम जवान हो गयी हो अब तुम मुझे वेसे नही छू सकती हो जैसे पहले छुआ करती थी . शायद ही किसी लडके ने कहा हो कि अब तुम १६-१७ साल की हो गयी हो अब हम गले नहीं मिल सकते हैं .


अगर हम सही मायनों में बदलाव चाहते हैं तो हमें जरुरत है शुरुआत अपने आप से करने की, अपने ही घर से करने की . हमारे माता-पिता को यह सोचना बंद करना होगा कि यह लड़की है इसलिए जीन्स नहीं पहन सकती है . हमें यह सोचना होगा कि जब हम किसी लड़की को बाइक पर बैठाकर घुमा सकते हैं तो हमारी बहन को भी किसी के साथ बाइक पर बैठकर घुमने का अधिकार है . लड़कियों को भी यह सोचना होगा कि जब कोई लड़का आपको पटाने की या फंसाने की बात कर सकता है तो लड़कियां भी किसी लडके को पटा सकती हैं तथा फंसा सकती हैं .



सवाल बहुत से हैं… और हमारी दिन-प्रति दिन बीतती जिंदगी में भी हर पल हर जगह कुछ सवाल हमारा रास्ता रोकते रहते हैं, परन्तु हम अनदेखा कर आगे बढ़ जाते हैं . हम आगे तो बढ़ जाते हैं परन्तु आगे बढ़कर, मुड़कर देखते हैं तो हम पाते हैं की हम बहुत कुच्छ पीछे छोड़ आये हैं . मैं चाहता हूँ आने वाला वक़्त इन सवालों का जवाब दे .

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पढ़ें जगरनॉट एप पर हिन्दी की बेहतरीन किताबें

 पूजा मेहरोत्रा

जगरनॉट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड अपने हिंदी पाठकों के और करीब पहुंच गया है। उसने अपने पाठकों को जगरनॉट हिंदी एप की सौगात दी है। यह एप आसानी से स्मार्टफोन पर डाउनलोड हो रहा है। एप एनड्रॉयड और आईओएस प्लैटफ़ॉर्म के साथ-साथ www.juggernaut.in पर भी मौजूद है।

एप लांच के पहले महीने में पूरे एकमाह बेहतरीन लेखकों की 200 से अधिक किताबें आप मुफ्त में पढ़ सकते हैं।


एप पर कई जानी मानी हस्तियों की लिखी कहानियां, उपन्यास और आत्मकथा के साथ बदलते परिवेश की कई मजेदार किस्से कहानियां पढने को मिल रही हैं। जिसमें अभिनेत्री सनी लियोनी की कहानियाँ, इंडिया के सुपरफूड्स पर लिखनेवाली रुजुता दिवेकर की किताब, ज़िंदगी गुलज़ार है जैसे पाकिस्तानी टीवी शो की मशहूर लेखिका उमेरा अहमद के उपन्यास, विलियम डेलरिंपल और अनिता आनंद की लिखी किताब कोहिनूर के साथ साथ सेलीब्रिटी लेखकों अरुंधति रॉय, एपीजे अब्दुल कलाम, सुधा मूर्ति, कन्हैया कुमार, स्वदेश दीपक, नासिरा शर्मा, रोहित वेमुला, देवी प्रसाद मिश्रा और काशीनाथ सिंह की महत्वपूर्ण किताबें पहले महीने में मुफ्त में पढी जा सकती हैं। जून माह में जेब पर ज्यादा भार न डालते हुए बहुत कम दामों पर किताबें मौजूद होंगी, जबकि कुछ क्लासिक किताबें तब भी पाठक मुफ्त में ही पढ़ सकेंगे।

 2016 में लॉंच हुआ इंग्लिश एप पाठकों की खास पसंद बना हुआ है। इसपर मौजूदा एक्टिव यूजर्स की संख्या 770 हजार के आंकड़े को पार कर चुकी है। जबकि एप पर 5000 से अधिक अंग्रेज़ी इ बुक्स पढ़ी जा सकती हैं।

जगरनॉट बुक्स के एप पर पाठक किताबों को उसके कवर, प्रिव्यू और कैटेगरी के माध्यम से खोज, देख और पढ़ सकेंगे। आपको अगर दोस्तों को किताब उपहार में देनी है तो आप एप के माध्यम से आसानी से ऐसा कर सकेंगे। इसके साथ ही एप का खास फीचर पाठक और लेखक की दूरी को कम करते हुए पाठकों को सुविधा देता है कि वह अपने फेवरेट लेखक से सवाल करें और किताब पर अपनी प्रतिक्रिया दें, लेखक पाठकों की प्रतिक्रिया और सवालों के जवाब भी देंगे।

जरुर पढ़े ये किताबें

एप पर आई अपनी किताब का इज़हार करते हुए जिंदगी लाइव के लेखक प्रियदर्शन कहते हैं-मेरी खुशकिस्मती है कि मैं  हिंदी के उन पहले लेखकों में हूं जिनकी किताब जगरनॅाट के ऐप पर आ रही है। बड़ी तेजी से बदलती और डिज़िटल होती दुनिया में ऐप आपको बहुत बड़े और अंतरराष्ट्रीय पाठक समुदाय से जोड़ सकते हैं। इत्तिफाक से मेरे उपन्यास ‘ज़िंदगी लाइव’ की प्रकृति भी इस तेज़ रफ़्तार माध्यम के अनुरूप है। हिंदी प्रकाशन के इस ऐतिहासिक प्रस्थान बिंदु का हिस्सा होना सुखद है।

जगरनॉट बुक्स की प्रकाशक चिकी सरकार कहती हैं, ‘मैं हिंदी के पाठकों के लिए जगरनॉट एप लांच करते हुए काफी उत्साहित हूं। मेरा मानना है कि हिंदी पाठकों का बाज़ार शायद इंग्लिश से भी बड़ा हो।’


‘कल मिलना मुझे’ की लेखिका प्रत्यक्षा- उत्साहित हूँ कि जगरनॉट पर किताब आ रही है. नये समय में नये माध्यम का इस्तेमाल बढ़िया है. कहानी, मोबाईल ही नया कागज़ है. उम्मीद है उपन्यास एक जादुई मोहब्बत की दुनिया की नशीली फंतासी में लीन कर दे पाठक को ।

जगरनॉट बुक्स की कार्यकारी संपादक हिंदी, रेणु आगाल कहती हैं, ‘हमें उम्मीद है कि ये लोगों के पढ़ने के तरीके को बदलेगा क्योंकि पहली बार हम ऐसा बुकशेल्फ तैयार कर रहे हैं, जिसमें सबकी पसंद का कुछ न कुछ है- रोमांस से लेकर क्लासिक तक, साहित्य और उपन्यास से लेकर राजनीतिज्ञों की जीवनी तक। और ये सब ऐसी कीमतों पर उपलब्ध होगा, जिनका जेब पर भी ज़्यादा भार नहीं पड़ेगा। अगर आप हिंदी की किताबें खोज रहे हैं तो आप को दूर जाने की, दुकान खोजने की ज़रुरत नहीं, ये आपके अपने स्मार्टफोन पर मिल जाएंगी।’

अपनी खुद की सामग्री के अलावा कई प्रमुख हिंदी प्रकाशकों जैसे प्रभात प्रकाशन और डायमंड बुक्स की किताबों के साथ साथ प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका तद्भव की चुनी हुई रचनाएँ किताबें  भी एप पर मिलेंगी।

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अपना कमरा : सार्थकता का एहसास





वर्जीनिया वूल्फ की किताब  ‘ A Room of One’s Own’ का प्रकाशन 1929 में हुआ था, उसका केन्द्रीय स्वर है कि एक स्त्री का अपने लेखन के लिए अपना कमरा होना चाहिए, अपने निजी को सुरक्षित रखने के लिए भी अपना कमरा, इसके लिए उसकी आर्थिक स्वतंत्रता जरूरी है. 


अनिता भारती 

मैं और मेरे साथ गली के अन्य बच्चे खिड़की पर टकटकी लगाये अंदर देख रहे थे. मैं लगभग सवा चार साल की थी . अंदर कमरे में मेरा छोटा भाई पैदा हो चुका था . उसे दाई पानी भरे तसले में नहला रही थी . गली-मोहल्ले कि औरतें माँ के पास खड़ी थीं. कमरे के नाम पर सबसे पहले यही याद बाकी है .



किराये के कमरे में रहते हुए मैंने कितनी ही बार माँ को स्वयं के मकान के लिए रोते और पिता से झगड़ते देखा, क्योंकि  किराये के मकान में रहते हुए कोई चीज अपनी नहीं होती. बस एक एहसास होता है कि जैसे कोई यायावर किसी सराय में रुके और सोचे रात भर के लिए यह मेरी जगह है. जब मैं पाँचवीं कक्षा में थी, हमारा अगला पड़ाव था गोविन्दपुरी. पिता ने टिन की  छत डालकर दो कच्चे कमरे बनाये. यहां मानसिक रूप से बीमार माँ का अधिकतर समय अपने आप से बातें करने, रोने, चिल्लाने में ही बीत जाता था, इसलिए उस घर को बेच कर फिर पिताजी के रिश्ते की एक बहन के यहाँ आना पड़ा. बुआ का व्यवहार शुरू में अच्छा था, पर मेरी माँ कि बीमारी से तंग आकर उन्होंने अल्टीमेटम दे दिया जितनी जल्दी हो सके, घर खली कर दो. पिता ने इधर-उधर से उधार लिए पैसों से एक सूखे जोहड़ पर पचपन गज का टुकड़ा लिया . वहां न बिजली थी और न ही सड़क और न पानी की कोई सुविधा. जब घर बनना शुरू हुआ, तभी बारिश से हमरे बनाते घर की पूरी छत बह गयी . दोबारा से छत बनी . माँ और पिता विवशता से कभी छत से टपकते पानी को रोकने के लिए रखी कटोरी, गिलास, परात आदि को देखते तो कभी कोने में सिकुड़ कर बैठे अपने छोटे-छोटे बच्चों को.

अपने लिए एक अदद कमरे की आदत हमें नहीं पड़ सकी, क्योंकि कमरे हमारे लिए नहीं, हम कमरों के लिए बने थे . हमें साहित्य का चस्का लग चुका था. पढ़ने के लिए नितांत अकेलेपन की आवश्यकता होती है पर मुझे शोर-शराबे में पढ़ने कि आदत पड़ चुकी थी.हमारा बिस्तर ही हमारा कमरा था. उसी पर लेटे-लेटे न जाने उपन्यास और कहानियाँ पढ़ डालीं.

यहाँ झील और ज्यादा गहरी और शांत हो गयी

1990 के अंत में अमेरिका ने इराक पर जबरदस्ती हमला कर दिया. अमेरिका की  साम्राज्यवादी नीतियों और युद्ध का विरोध करने के लिए दुनिया के अन्य देशों के साथ-साथ भारत में भी ‘खाड़ी शांति दल’ बनाया गया . इस दल का नायकत्व बेला भाटिया और ज्यांद्रेज कर रहे थे. बेला भाटिया से मेरी मित्रता थी . उन्होंने मुझे ‘खाड़ी शांति दल’ में शामिल होने को कहा . हमारा पहला पड़ाव अम्मान का होटल था . यहाँ मैं पहली बार अकेले एक कमरे में रही और वहाँ मैंने कई कविताएँ लिखीं. इराक में उन दिनों कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. पीस कैंप में हम फर्श पर दरियाँ बिछा कर सोते थे. सारे ऊनी कपड़े पहनने और रजाई ओढ़ने के बाद भी ठंड नहीं जाती थी. ऐसे ही पन्द्रह-सोलह दिन बीतने पर आधी रात को अचानक पता चला कि अमेरिका पीस टीम को मिसाइल से उड़ाने वाला है. इस सूचना से आनन-फानन में कैंप पूरा खली हो गया. मैं आराम से अपने बिस्तर पर सो रही थी, मुझे पता नहीं चला. हमारे साथी राजीव सिंह ने अपनी जान जोखिम में डालकर मुझे जगाया, ‘सारे लोग जा चुके हैं .
कैंप किसी भी समय उड़ाया जा सकता है और तुम यहाँ सो रही हो!’ हमें पीस कैंप से निकल कर इराक के फाइव स्टार होटल अलराशिद में ले जाया गया . वहाँ सबने अपने-अपने पार्टनर ढूंड लिए. मैं फिर अकेली खड़ी थी. अब केवल डबल बेडरूम वाले कमरे बचे रह गये थे. संकट यह था कि मैं किसके साथ रहती. तभी मैंने देखा कि जो मुझे जगाकर कैंप से बहार लाये थे, वह भी अकेले खड़े थे. अब हम दोनों ही बचे थे, इसलिए हमें एक ही कमरे में रहना पड़ा. मुझे उस समय नहीं पता था कि होटल का वह कमरा मेरे जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन ले आयेगा.

कोने से कमरे तक: चार पीढ़ियों की अन्तर्यात्रा

अगले दिन हमें पता चला कि हमारा पीस कैंप तबाह किया जा चुका है. उसी रात हमरे होटल को निशाना बनाकर मिसाइल दागी गयी . होटल की दीवारें बड़ी जोर से हिलीं, जैसे कि भूकंप आया हो . मैं लुढ़कती हुई कमरे के दरवाजे से जा टकरायी. समझ में नहीं आया कि अचानक क्या हुआ . हमें तत्काल होटल के बंकर में पहुँचाया गया.

विवाह के बाद मेरे सामने कमरे का झंझट नये रूप में खड़ा था . मुझे और मेरे पति को कमरे के नाम पर स्टोर रूम मिला, जो मुश्किल से दस बाई छह का होग. उसमें एक तरफ कबाड़ भरा हुआ था. मैंने कबाड़ को सलीके से सजाते हुए उस कमरे को शयनकक्ष बनाया. हमारे दो साल इसी कमरे में बीते. कितनी ही रातें मुझे और मेरे पति को एक ही करवट सोकर बितानी पड़ीं  उस छोटे से स्टोर रूम ने मेरे अंदर कि चेतना को न केवल मरने से बचाकर रखा बल्कि उसे और धार दी  ज़िंदगी ने मुझे अपने कमरे के होने कि सार्थकता और निरर्थकता के अंतर को बखूबी समझा दिया.

अनिता भारती साहित्य की विविध विधाओं में जितना लिखती हैं , उतना ही या उससे अधिक सामाजिक मोर्चों पर डंटी रहती हैं  खासकर दलित और स्त्री मुद्दों पर. सम्पर्क : मोबाईल 09899700767.


यह लेख द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन से प्रकाशित मजिद अहमद द्वारा संपादित किताब ‘मेरा कमरा’ में संकलित है. किताब ऑनलाइन खरीदें. लिंक पर क्लिक करें : 
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दलित स्त्रीवाद 


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कर्मानन्द आर्य की कवितायें: अगली पीढ़ी की लड़की और अन्य

कर्मानन्द आर्य

कर्मानन्द आर्य मह्त्वपूर्ण युवा कवि हैं. बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हिन्दी पढाते हैं. संपर्क : 8092330929

काठमांडू का दिल

लड़कियां जो सस्ता सामान बेचकर
लोगों को लुभाती हैं
लड़कियां जो जहाजी बेड़े पर चढ़ने से पहले
लड़कपन का शिकार हो जाती हैं
उन्हीं को कहते हैं काठमांडू का दिल
पहाड़ तो एक बहाना है
उससे भी कई गुना शक्त है वहां की देह
उससे भी कहीं अधिक सुन्दर हैं
देहों के पठार
और अबकी बार जब भी जाना नेपाल
उसका बचपन जरुर देख आना
होटल में बर्तन धोते किसी बच्चे से ज्यादा चमकदार हैं उनकी आँखें
नेपाल में आँखे देखना
थाईलैंड नहीं
जो आवश्यकता से अधिक गहरी और बेचैन हैं
फिर दिल्ली के एक ऐसे इलाके में घूमने जाना
जिसे गौतम बुद्ध रोड कहते हैं
जो कई हजार लोगों को मुक्त करता है
उनके तनाव और बेचैनी से
वहां ढूँढना वह लड़की जो सस्ता सामान बेचकर
जहाज ले जाती है अपने गाँव

पढ़ें : सुनो चारुशीला और अन्य कवितायें

मिलन

पैरों की धूल चढ़कर बैठ जाती है माथे पर
उसे उतारता नहीं हूँ
तुमसे प्यार है तो तुम्हारी धूल भी पसंद है मुझे
यानी प्यार में सुखी होने के लिए
वह सब करता हूँ जो पसंद भी नहीं
पुरुष का अहंकार नहीं
यह प्यार है
जिसमें बन जाना होता है छोटा
झुक जाना होता है जमीन तक
चलना होता है लंगड़ाकर
गिरकर, और गिरना होता है
यह प्यार ही है
झुकता हूँ, चलता हूँ, दौड़ता, हांफता हूँ
फिर गिर पड़ता हूँ
गिरकर होता हूँ सुखी
इसी क्रम में चढ़ती है धूल, थकती हैं साँसें
कोई पड़ाव नहीं आता
प्यार के लिए

जाने कितने बरस, जाने कितनी सदियाँ
बीत चुकी हैं
दौड़ रहा हूँ, भाग रहा हूँ
मिलन की चाह है
अभी तक आधा अधूरा है मिलन

पढ़ें मैं अपनी पीढ़ियों में कायम हूँ, मैं इरोम हूँ

प्रतिमान

कविता की कचहरी में
हमारे लिखने से कई लोग
संदेह से भर गए हैं कि तुम लिखने कैसे लगे हो
कमजोर है तुम्हारी भाषा
मटमैले हैं तुम्हारे शब्द
अभी तो अक्षर ज्ञान लिया है तुमने
कैसे लिख सकते हो, तुम
सुनहरी सुबह, दशरथ मांझी के हौसले सी होती है
मौसम,
मेरी कॉम जैसा होता है
और मिज़ाज
फूलनदेवी सा
कैसे लिख सकते हो तुम कि तराई की औरतें
अपना देह बेचकर जहाज लाती हैं
भूख ईलाज है धनपशुओं के लिए
कैसे लिख सकते हो तुम

कैसे लिख सकते हो
सताए हुए लोग क्रांति का बीज बोते हैं
भूख से बिलखकर
कविता नहीं लिखी ग्वाले ने
जब बाजार में सजी कविता
वह नहीं था दूधिये का पैरोकार
कैसे लिख सकते हो तुम
परिंदे की उड़ान से बनी
लड़ते आदमी की देहें
बहुत घायल हैं
कैसे लिख सकते हो तुम
कविता हमारी पहचान है
इस इलाके में तुम कैसे ?
अनगढ़ है भाषा
टूटे हुए हैं शब्द
काँप रही है इनकी भंगिमा

माई बाप !
लिखने दीजिये हमें
अभी तो लिखनी है हमें अगली सदी की कविता
हम तैयार कर रहे हैं
संगीत की सुन्दरतम धुन
कला के मोहक रंग
कविता में चाहतों का इच्छित इतिहास
आदमी के आदमखोर होते जाने की पीड़ा
नगर से गाँवों की तरफ
लगातर बढ़ रही धुंध
हमें लिखने दीजिये पोथी
हमारी यही अनगढ़ता प्रतिमान बनेगी एक दिन
हमारी कविता में

पढ़ें : कर्मानन्द आर्य की कवितायें

साथ

पेड़ चाहता है ऊँचा उठे
धरती चाहती है फैले
सूरज चाहता है किसी भी तारे से
अधिक चमकदार और गहरा दिखाई दे उसका चेहरा
हवा चाहती है निर्झर
नदी चाहती है समुद्र से सुन्दर हो उसकी काया
सड़क चाहती है सभ्यतायें उसकी हमसफ़र हों
मैं मनुष्य होकर

कुछ नहीं चाहता था
सिवाय इसके कि दुनिया बच्चेदार और खूबसूरत बनी रहे
हवा चले तो गीत बजें
हाथ सलामत रहें तो रोटी का जुगाड़ रहे
सच बोलें तो दोस्त खड़े हों साथ
तरक्की हो
कसरत करें तो मोहतरमा की सेहत बढ़े

मैंने वह सब किया है जो मनुष्य होने के नाते करते हैं लोग
पर आज मुआफ़ी मांग रहा हूँ दोस्त
मैंने अगली सदी के लिए कुछ नहीं किया
नदियों को पंगु किया
पेड़ोंके तोड़ दिए पाँव
खोद डाला चट्टानों का दिल
और तो और
ड्रग्स तक बेचा है मेरी सदी के लोगों ने

प्रकृति के सहारे जीने वाले मेरे दोस्त
न्याय के कटघरे में खड़े अपने इस दोस्त को बताओ
अगली सदी का मनुष्य किसके पापों की सजा पायेगा

पढ़ें कर्मानंद आर्य की कवितायें : वसंत सेना और अन्य

अगली पीढ़ी की लड़की

हमारी कोई ब्रांच नहीं है
हमारी कोई सीरीज नहीं है
हमारी कोई श्रृंखला नहीं है
हम इस दुनिया में बिलकुल अकेली हैं
हमसे मिलना तुम
हम लड़ती हैं तो समूह नहीं बनाती
हम दौड़ती हैं तो समूह नहीं बनाती
हम काम करती हैं तो समूह नहीं बनाती
हम असंगठित मजदूर हैं
सभाभवन की
जहाँ दहाड़ती हैं राजा की आवाजें

मुखविर हैं काली मूछें
हम चुहियायें हैं व्यवस्था की
हम अठारह से चौबीस हैं
हमारी किताब की गिनती ख़त्म हो जाती है चालीस बाद
लोगों को पसंद नहीं आते हमारे सूखे स्तन
जैसे चंद्रमा उतरता है
काली अँधेरी नदी में वैसे ही उतर जाती हैं हम
वैसे उतरती है हमारी उम्र
हम सेब नहीं रह जातीं
हम अनार नहीं रह जातीं
हम कटहल हो जाती हैं भाषा में
हमें खाती जाती है हमारी चिंता

सुनो बाबू !
ये जो तुम रात भर खेलते हो हमारे साथ लुकाछिपी
करते हो मर्यादा तार-तार
बनाते हो पतनशील
पत्नी और वेश्या को एक साथ मिला लेने का करते हो स्वांग
प्रेमिकाओं के तलछट पर रगड़ते हो माथा
यही वे करने लगें
तब बताओ क्या कहोगे तुम
क्या करोगे तुम जब बगावत की वेदी पर डाल दें वे
गंदी सोच का कूड़ा
जो पतनशील हैं
वे ज्वलनशीलहो गई हैं इन दिनों
वहीव्यवस्थाकी जंजीर तोड़कर
जी रहीं हैं काठ का जीवन

हम वही हैं हमारी कोई ब्रांच नहीं है
नहीं है हमारा संघ
नहीं है हमारी शाखा !!

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

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मुस्लिम स्त्रियों के मसले पर अतिसक्रिय संघ-भाजपा की स्त्रीविरोधी विरासत



मुकेश कुमार 


आज जहां मुस्लिम स्त्रियों के बुर्के और तीन तलाक संघियों का प्रिय मुद्दा बना हुआ है, वहीं हिन्दू स्त्रियों के जिंस-पैंट अथवा अन्य फैशनेबल ड्रेस भी इनके निशाने पर रहते हैं. स्त्रियों के बदन पर ज्यादा और कम कपड़े-दोनों संघियों को परेशान करते हैं. कौन क्या खाये-क्या पहने, यह तय करते हुए पितृसत्तात्मक हिंदुत्ववादी मूल्यों की ये पताका फहरा देना चाहते हैं. कुल मिलाकर स्त्रियों को लेकर इनके ख्यालात परस्पर अंतर्विरोधी ही कहे जाएंगे. सच्चाई तो यह है कि बुर्का -हिजाब और तीन तलाक का मुद्दा ये इसलिए उठाते हैं क्योंकि इस बहाने इन्हें मुसलमानों और इस्लाम पर हमला करने का अवसर मिल जाता है. इनकी वास्तविक चिंता में स्त्रियों की मुक्ति का एजेंडा न तो पहले कभी रहा है और न ही इस बार भी है. उनका मकसद स्त्रियों को औजार के रूप में इस्तेमाल करने का ही रहा है.

स्त्रियां कैसे ज्यादा से ज्यादा शिक्षित हों, इसकी चिंता इन्हें नहीं रहती है. इसके बजाय शिक्षा का निजीकरण व भगवाकरण करने को लेकर ही ये चिंतित रहते हैं और उसी दिशा में इनके कदम बढ़ते हैं. स्त्रियों के नौकरी व अन्य रोजगार में जाने और आर्थिक तौर पर स्वावलंबी बनने को ये हमेशा हिकारत की नजर से देखते हैं. इस मामले में ये आज भी मनुस्मृति को ही अपना प्रेरणा स्रोत मानते हैं. इनके लिए स्त्री के दो रूप हैं- स्त्री या तो देवी है या फिर चाहरदीवारी में कैद मध्ययुगीन भोग की वस्तु. बच्चे पैदा करने की मशीन. इसलिए ये बीच-बीच मे मुसलमानों का खतरा बताकर हिंदुओं से 4 और दस बच्चे पैदा करने की भी अपील करते ही रहते हैं. स्त्रियों को लेकर इनका यह दो अतिवादी नजरिया है. यानी स्त्रियां इनकी नजर में ‘मनुष्य’ कभी नहीं हैं.


मेरा शबाब भी लौटा दो मेरे मेहर के साथ

यही वजह है कि संघ में आज भी स्त्रियों का प्रवेश वर्जित है. अंतिम निष्कर्ष में ये स्त्रियों को पुरुषों के बराबर मानने के बजाय पुरुषों के मातहत ही रखना चाहते हैं. अपना गणवेश तय करने में ये एकदम आधुनिक हो उठते हैं और ‘हाफ’ से लेकर ‘फुल’ पैंट तक पहुंच जाते हैं. उस वक्त इन्हें अपनी परंपरा-संस्कृति का वस्त्र धोती-कुर्ता और भगवा वस्त्र याद नहीं आता है, किन्तु स्त्रियों को ये साड़ी-ब्लाउज में ही देखना पसंद करते हैं. स्त्रियों के स्वतंत्र निर्णयों को ये गुंडा वाहिनी और खाप पंचायत बनाकर भी कुचल देने पर आमादा रहते हैं. लव जिहाद के नाम पर ये साम्प्रदायिक नफरत फैलाने के साथ-साथ स्त्रियों को अपने काबू में ही रखने की ही कोशिश करते हैं.
दरअसल संघ-बीजेपी आज भी राष्ट्रीय आंदोलन की उसी समाजसुधार विरोधी-स्त्रीविरोधी धारा का प्रतिनिधित्व करता है, जिसके आक्रामक अगुआ तिलक और थोड़े लिबरल अगुआ मालवीय थे. यह अकारण नहीं है कि सत्ता में आते ही मोदी सरकार ने मालवीय को भारत रत्न के सम्मान से नवाजा. तिलक ने अपने दौर में बालिका विवाह पर रोक लगाने का तीखा विरोध किया था और कांग्रेस अधिवेशन के मंच से सामाजिक सम्मेलन की चली आ रही परम्परा पर उग्र विरोध के जरिये समाप्त कराया था.

प्रधानमंत्री को मुस्लिम महिला आंदोलन का पत्र/ तीन तलाक से निजात की मांग

सूक्ष्मता से संघ-बीजेपी के चाल-चरित्र को देखें तो स्त्रियों को लेकर इनका अप्रोच खुलकर सामने आ जाता है. स्त्रियों की मुक्ति से इनका दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है. हिन्दू स्त्रियों की हजारों वर्षों की पितृसत्तात्मक गुलामी के खात्मे के लिए इनके पास न तो कोई सकारात्मक एजेंडा है और न ही कोई कार्यक्रम. मुस्लिम स्त्रियों का बुर्का अगर उनके विकास में बाधक और गुलामी का प्रतीक है तो हिन्दू स्त्रियों का घूंघट, सिंदूर, चूड़ी और अन्य आभूषण कौन सा हिन्दू स्त्रियों की मुक्ति में सहायक है! लेकिन हिन्दू स्त्रियों को इससे मुक्ति मिले- इसपर ये कभी कुछ नहीं बोलेंगे, उलटे वे इन चीजों की तरफदारी ही करते दिख जाएंगे. विधवा प्रथा, सती प्रथा से लेकर बाल विवाह तक के पक्ष में आज भी ये कुतर्क करते और उसे महिमामंडित करते हुए आसानी से देखे जा सकते हैं. भारत में चिंताजनक ढंग से बढ़ती बालिका भ्रूण हत्या और स्त्री-पुरुष लिंगानुपात में गिरावट इनके चिंता का विषय बनते कभी किसी ने नहीं देखा होगा. बलात्कार की घटनाओं पर इनके नेताओं की स्त्रीविरोधी शर्मनाक पितृसत्तात्मक प्रतिक्रिया तो जगजाहिर ही है. बलात्कारी के बजाय बलत्कृत स्त्री में ही सारा दोष ढूंढते हुए ये बलात्कारी का बचाव करते हुए देखे जा सकते हैं. इसलिए स्त्रीविरोधी आचरण करने वाले तथा बलात्कार के आरोपी को अपनी पार्टी में शामिल करने में इन्हें कभी कोई नैतिक परेशानी नहीं होती. संघ-बीजेपी के इस मंसूबे को समझना जरूरी है. और स्त्री प्रश्न को पितृसत्तात्मक व धार्मिक दायरे में हल करने के बजाय स्त्री-पुरुष बराबरी की दिशा में निरंतर बहस व संघर्ष को आगे बढ़ाने की जरूरत है. स्त्री के बहाने एक धर्म विशेष को टारगेट करने के इस षड्यंत्र के खिलाफ सही पोजीशन सामने लाना होगा, अन्यथा आरएसएस-बीजेपी इस मुद्दे के आधार पर हमेशा नफरत की राजनीति करता रहेगा. जब बाबासाहेब डा. आंबेडकर हिन्दू कोड बिल के लिए संघर्ष कर रहे थे, जिसके तहत हिन्दू सवर्ण महिलाओं की जिन्दगी बेहतर बनाने की दूर-दृष्टि काम कर रही थी, तब संघ और उसकी विचारधारा के लोग उसका विरोध कर रहे थे. आज मुस्लिम स्त्रियों के मसले पर वे अतिसक्रिय हैं

मेल:drmukeshkumar.bgp@gmail.com 
मो.9911886215

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वृत्तचित्र ‘तेरी जमीं तेरा आसमां’ का प्रीमियर 29 अप्रैल को अमेरिका में

‘तेरी जमीं तेरा आसमां’ नामक 45 मिनट के वृत्तचित्र की थीम है ‘भारतीय नारी! तू आजाद कहां।’ इस फिल्म में विभिन्न क्षेत्रों की भारतीय महिलाएं चाहे वे सामान्य घरेलू महिलाएं हों या असाधारण काम करने वाली कोई स्त्री, शिक्षिकाएं हों या श्रमिक, छात्राएं हों या अधिवक्ता, आधी आबादी का आधा आकाश छेंकने वाली ये महिलाएं आपसे बात करती हैं। दर्शकों के साथ अपने अतीत और वर्तमान की यात्रा को साझा करते हुए वे बताती हैं कि उनके लिए अब और भविष्य में आजादी के मायने क्या हैं? वे बताती हैं कि कैसे पीडि़त अथवा संरक्षित की छवि से परे वे अपने आसपास होने वाले बेहतर और सकारात्मक बदलाव की कारक बनना चाहती हैं। यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की औरतों की ज़ुबानी कही गई कहानी है, जहां पैदा होने वाली पूर्णा मालावत, कल्पना चावला और टीना डाबी अपने सपनों को न केवल पूरा कर सकीं बल्कि उन्होंने  पूरा आकाश छू लिया।

शनिवार , 29 अप्रैल 2017, को यूनाइटेड स्टेटस में ‘ब्रैंडिज युनिवर्सिटी, बोस्टन’  के द हेलर स्कूल के एंफी थिएटर में इस फिल्म का पहला शो 12.15 मिनट पर होगा.  जीवन गावंडे द्वारा निर्देशित, मनीषा बांगड़ की  पटकथा और कांसेप्ट पर बनी  बेहद कम बजट वाली इस फिल्म का निर्माण बामसेफ और एएएनए के कार्यकर्ताओं द्वारा दिए गए चंदे से किया गया है। पहले शो के अवसर पर मनीषा बांगड़ वहाँ उपस्थित होंगी. वे 30 अप्रैल को ‘ब्रैंडिज युनिवर्सिटी, बोस्टन’ में ‘पितृसत्ता और भारतीय स्त्रीवाद’ पर आयोजित सेमिनार में भी हिस्सा लेंगी.

देखें एक टीजर :

डॉ. मनीषा बांगड़ बामसेफ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। वह देश में मूलनिवासी बहुजन की प्रमुख आयोजक हैं। वह पेशे से हेपटोलॉजिस्ट चिकित्सक हैं जो लीवर, गॉल ब्लैडर और पैंक्रियाज आदि से संबंधित शाखा है। डॉ. बांगड़ हैदराबाद स्थिति डेक्कन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल सांइसेज में गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी और हेप्टोलॉजी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर भी हैं।  वह विभिन्न मीडिया पोर्टलों पर लिखती और बोलती रही हैं। बीते एक दशक के दौरान उनको कई प्रमुख राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों, शासकीय उद्यमों, मानवाधिकार और फुले-अंबेडकर की वैचारिकी वाले संस्थानों में बतौर वक्ता आमंत्रित किया गया है। इनमें संयुक्त राष्ट्र, इसरो, ओएनजीसी, नाल्को, जेएनयू, एचसीयू आदि प्रमुख हैं। इस दौरान उन्होंने लैंगिक समानता, स्वास्थ्य, विज्ञान और शिक्षा से लेकर जाति और फुले, पेरियार तथा आंबेडकर, राष्ट्र, राष्ट्रीयता  और लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद तक पर अपनी बात रखी।

जीवन गावंडे मूलनिवासी पब्लिकेशन ट्रस्ट के बोर्ड के सदस्य हैं। वह आवाज इंडिया टीवी के एक्ज्क्यूटिव प्रोड्यूसर और सब एडिटर भी हैं। उन्हें विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत से जुड़े मुद्दों और ख्यात व्यक्तित्त्वों के जीवन पर 90 वृत्तचित्र बनाने का श्रेय हासिल है। उनकी फिल्मों शिक्षा में षडयंत्र और संत रविदास को व्यापक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सराहना मिली। फिलहाल वह केरल और आंध्र प्रदेश में बौद्घ विरासत की खोज विषय से संबंधित एक वृत्त चित्र की योजना पर काम कर रहे हैं।

विकल सिंह की कवितायें

विकल सिंह


गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय में शोधरत है. . संपर्क: vikalpatel786@gmail.com मो: 07897551642

आदिवासी स्त्री

“वह सभ्य समाज की जड़ता को
सिंचित करती नक्कासी में,
न धर्म-भेद का ज्ञान उसे
न जाती मथुरा काशी में !
रहती सदैव वह कर्मरत
नक्कासी, शिल्प में हस्तरत,
मुख पे मनुष्यत्व का तेज लिए
रहती सदैव संघर्षरत !”



हिंदी साहित्य में आदिवासी स्त्री का सवाल


आदिवासी विकास का अद्वैत प्लम्बन

ऐसा क्यों है कि
हमारी बस्तियाँ
तुम्हारी आँख की किरकिरी
बनती जा रही हैं ?
हर ज़ानिब1
हमारे ही घर क्यों
दीखते हैं तुम्हें ?
तुमने जो विकास का
खाका तैयार किया है,
उसमें हमारा विकास
तो नदारद है ।
गर कुछ है तो
हमारे बीवी, बच्चों
की चीखें और
हमारी उम्मीदों का
टूटना है ।
तुम जानते हो
कि इन उम्मीदों और सपनों के
सिवा कुछ भी तो नहीं है
हमारे पास खोने को !
ये पहाड़, ये झरने
ये प्रकृति ही हमारी
धरोहर है !
क्या तुम इसे भी
छीन लेना चाहते हो ?
नहीं ! नहीं ! साहब !
यदि विकास हमारी

बस्तियों का उजड़ना है
तो नहीं चाहिए
हमें ये विकास !
क्योंकि इन बस्तियों
का उजड़ना
हमारी अस्मिता,
सभ्यता और
संस्कृति का उजड़ना है हम प्रकृति की
गोद में रहते आये हैं,

ये झरने ये पहाड़
हमें अत्यधिक प्यारे हैं ।
हमें अपने हाल
पे छोंड दीजिए साहब !
जाइए पहले विकास का
अद्वैत2 प्लम्बन3 तैयार कीजिए,
जिसमें विकास मुख्य धारा के
लोगों का नहीं, बल्कि हमारा हो
हमारी संस्कृति मरे नहीं,
हमारे बच्चे चीखें नहीं,
और हम
प्रकृति की गोद में मुस्कराएँ !”
1. दिशा  2. भेद रहित  3. तरीका

नगाड़े की तरह बजते है शब्द

मैं स्त्री हूँ, जरा गौर से देखना मुझे

“मैं स्त्री हूँ,
जरा गौर से देखना मुझे…
देखना तुम
मेरे माथे की बिन्दिया को
जो मेरी है पर चमकती
किसी और के लिए !
मैं स्त्री हूँ,
जरा गौर से देखना मुझे…
देखना तुम
मेरे सिन्दूर को
जो मेरा है पर नाम उस पर किसी
और का है !
मैं स्त्री हूँ,
जरा गौर से देखना मुझे…
देखना तुम
मेरे नाम को
जिस पर अधिकार
किसी और का है !
मैं स्त्री हूँ,

जरा गौर से देखना मुझे…
मेरा सब कुछ किसी
और का है,
बताओ मुझे, मुझ में
मेरा क्या है ?”

एक स्त्री की व्यथा


“मैं एक ऐसी वस्तु बना दी गई
जिसे जैसा चाहा इस्तेमाल किया जाता रहा ।
वस्तु, जिसका कोई मूल्य नहीं
कोई नाम नहीं
कोई जाति नहीं
कोई धर्म नहीं
जब जिसे जैसी जरूरत हुई,
इस्तेमाल किया मुझे !
लगातार मुझे हाशिए की ओर
ढ़केले जाते हुए भी
मैं कभी टूटी नहीं, हमेशा
हाशिए को ही हथियार बनाने की
कोशिश में जुटी रहती हूँ ।
कभी मेरे शरीर को आंटे की
लोथी सा मसला गया,
तो कभी देह पर पड़े निशान
कई दिनों तक
याद दिलाते रहे मुझे, उस
निरीह अवस्था को !
क्या मैं इतनी कमज़ोर हूँ कि
इसका प्रतिकार तक न कर सकी,
या निर्मित किया गया है मुझे
कुछ ऐसा ही !
क्यों बचपन से मुझे
कम बोलने, कम खाने, तेज न दौड़ने जैसे
संस्कारों में ढ़ाला गया ?
शायद इसलिए कि मैं
इसका प्रतिकार ना कर सकूँ !”

खुदमुख्तार स्त्रियों का कथा -वितान: अन्हियारे तलछट में चमका

आधुनिकता का आइना


“शहर से गर्मियों की छुट्टियों में
आना होता था जब गाँव
गाँव आते ही सुखिया चाचा
दौड़कर आते
और
पूछते मेरी राजी ख़ुशी !
बातों ही बातों में
पूरे गाँव का हाल बता देते वो
यूँ उम्र में वो पचास के पार होंगे
पर चेहरे में बुढ़ापे की एक झलक भी न थी
कोसों  दूर पैदल चले जाते
पर वो तो सुखिया चाचा थे
जो बुढ़ापे में भी जवानी का दम रखते थे
अब तो रामू, शिवबरन और माधव
जवानी में भी बूढ़े नज़र आते हैं
सुना है रामू बहुत तेज कार चलाता है
वक़्त की रफ़्तार से भी आगे
निकलना चाहता है शायद !”

टूटते सपने 

“आम जन में एक आह है,
एक टीस है
उन सपनों के न पूरे होने की,
जिन्हें वह पालता है,
पोषता  है,
अपनी खुशियों के लिए,
अपने विकास  के लिए
पर वही सपने एक दिन बिखर जाते हैं
मुट्ठी में आई हुई रेत की तरह !
क्यों उनके सपने संवरने से
पहले बिखर जाते हैं ?
क्यों आर्थिक तंगी उन्हें,
दिनों-दिन
खोखला कर रही है ?
क्या यह सारी सुख-सुविधाएँ
बस चन्द लोगों के लिए हैं ?
जो संसद पर बैठे हैं और
सारे ऐशो-आराम भोगते हैं ।
तब क्या धूमिल का कहना
न्याय संगत है,
कि क्या आज़ादी सिर्फ़
तीन थके हुए रंगों का नाम है,
जिसे एक पहिया ढ़ोता है ?
यह पहिया है मध्यवर्ग,
जो आज़ादी के पूर्व से अब तक
गतिशील है,
उसका लगातार घूमना
उसके संघर्ष का प्रतीक है ।

कभी तो उसका संघर्ष ख़त्म होगा,
कभी तो उसके सपने पूरे होंगे,
कभी तो वह सही मायने में
स्वतंत्र होगा,
बस इसी उम्मीद के साथ
आज आम जन जिन्दा है ।”

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