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क्यों कर रही हैं लडकियां पीएम मोदी का विरोध (!)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बनारस दौरे के पूर्व बनारस के प्रशासनिक हलके में हड़कम्प मच गया जब बीएचयू की छात्राओं ने बीएचयू गेट के सामने छेड़खानी के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन किया. यहां तक कि विरोध में एक छात्रा ने अपना सिर तक मुंडवा लिया.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज से वाराणसी के दो दिन के दौरे पर होंगे और उनके पहुंचने से पहले यह विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया. पीएम के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में पढ़ने वाली छात्राएं ही खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहीं हैं.

जिस तरह से इन छात्राओं ने प्रदर्शन किया उससे ज़िला प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए  और धरना स्थल पर भारी फोर्स को तैनात कर दिया गया. इन छात्राओं का आरोप है इनके साथ कैंपस में लगातार छेड़खानी होती है. लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होती. इन छात्राओं का आरोप है कि छेड़खानी  प्राक्टोरियल बोर्ड के लोग भी शामिल हैं जिसकी वजह से कोई कार्रवाई नहीं होती.



छात्राओं ने बताया कि उनके साथ हॉस्टल के गेट या क्लास में हर जगह आए दिन छेड़खानी होती है. गुरुवार शाम को भी त्रिवेणी हॉस्टल के बाहर कुछ छात्राओं के साथ छेड़खानी हुई तो छात्राओं ने चीफ प्रॉक्टर प्रो.ओएन सिंह को फोन पर बताया तो कार्रवाई के बजाय उल्टा छात्राओं को ही वे भला बुरा कहने लगे और कहा कि 6 बजे के बाद हॉस्टल के बाहर क्यों घूम रही थीं. फिलहाल छात्राएं कार्रवाई की मांग को लेकर धरने पर बैठी गयीं.

सोनिया गांधी का मास्टर स्ट्रोक: महिला आरक्षण के लिए लिखा पीएम मोदी को खत

छात्राओं के अनुसार भारत कला भवन के पास छात्रा के साथ बाइक सवारों ने की छेड़खानी की. छात्रा के चिल्लाने के बाद भी चंद कदम की दूरी पर मौजूद बीएचयू के सुरक्षाकर्मियों ने कोई मदद नहीं की. जिससे घबराई छात्रा हॉस्टल वापस आई. उसने छात्राओं को पूरी बात बताई. जिसके बाद छात्राएं आक्रोशित हो गईं. छात्राएं हॉस्टल से निकलकर नारेबाजी करती हुई बीएचयू की ओर बढ़ी. छात्राओं के आक्रोशित झुंड को आता देखकर बीएचयू का गेट बंद कर दिया. छात्राओं में इतना गुस्सा था कि बैलर ऑफ फाइन आर्ट्स की एक छात्रा ने उसका सिर मुंडा लिया.
क्या भारत की बेटी है सिंगापुर की पहली महिला राष्ट्रपति (!)

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी के दो दिनों के दौरे पर रहेंगे. इस दौरान वह कई इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स का उद्घाटन करेंगे. साथ ही पीएम कई सभाएं भी करेंगे. प्रधानमंत्री जुलाहों और हथकरघा उद्योग में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए ट्रेड सेंटर के दूसरे चरण की शुरुआत करेंगे. साथ ही प्रधानमंत्री वाराणसी से वडोदरा जाने वाली तीसरी महामाना एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाएंगे.

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जेंडर-स्वतन्त्रता के नाम एक “कवितामय” शाम

स्त्रीकाल और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के हिंदी विभाग द्वारा जेंडर-स्वतंत्रता को संबोधित कविता  पाठ का आयोजन किया गया. जेंडर से मुक्त समाज का उद्देश्य लिए 19 हज़ार किलोमीटर की साइकिल यात्रा पूरी कर चुके राकेश कुमार सिंह इस कार्यक्रम में विशिष्ट तौर पर उपस्थित हुए. कार्यक्रम में मुख्य अतिथि प्रख्यात कथाकार एवं कवि उदयप्रकाश शामिल थे. इस आयोजन में लगभग 35 रचनाकारों ने अपनी कवितायेँ पढ़ीं. जामिया के विद्यार्थियों ने स्त्रीवादी समाज के सपनों को संबोधित कविताओं का पाठ किया.

वरिष्ठ साहित्यकार उदय प्रकाश ने इन नये कवियों में से कई को हिन्दी कविता के भविष्य के रूप में उभरने की आशा व्यक्त की. दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू के कुछ शोधार्थियों ने भी अपनी कवितायेँ पढीं. ‘जी लेने दो’, ‘तेजाब से जलती औरत’ आदि शीर्षक से पढी गई कवितायेँ स्त्रियों के खिलाफ क्रूर हिंसा के प्रति स्वाभाविक आक्रोश की अभिव्यक्ति थीं. नीतिशा खालको ने तो ‘क्या सवाल और कलम कभी होंगे चुप’ शीर्षक कविता का पाठ कर उपस्थितों को कौटुम्बिक यौन-उत्पीड़न के खिलाफ आक्रोश से भर दिया, वह स्वयं भी भावुक हुईं और उपस्थित लोग भी. श्रोताओं ने खड़े होकर खालको का सम्मान किया. भारती संस्कृति ने अंग्रेजी में ‘द वुमन’ शीर्षक से स्त्री देह से आगे स्त्री के अस्तित्व के पक्ष में अपनी कविता पढ़ी.



कार्यक्रम की शुरुआत में उदय प्रकाश की कविता पर आधारित लघु फिल्म ‘औरतें’ दिखायी गयी. कविता स्त्रियों के दुःख, उनके उत्पीडन और समाज तथा परिवार ले लिए उनके अहर्निश समर्पण की मजबूरियों की तस्वीर पेश करती है, माइम विधा के माध्यम से इसे फिल्म के फॉर्म में व्यक्त किया गया है. इस लघु फिल्म के प्रोडूसर विकास डोगरा हैं तथा जानेमाने अभिनेता इरफ़ान खान ने इसे अपनी आवाज़ दी है. कार्यक्रम के अंत में उदय प्रकाश ने अपने संक्षिप्त संबोधन में कहा कि खड़ी-बोली कविता के पहले कवि अमीर खुसरो की कविता से ही जेंडर से मुक्ति के स्वर हिन्दी कविता की एक खासियत बन गये हैं. उन्होंने अपनी एक छोटी सी कविता भी पढी. “आदमी मरने के बाद कुछ नहीं बोलता, आदमी मरने के बाद कुछ नहीं सोचता, कुछ नहीं सोचने ओर कुछ नहीं बोलने पर आदमी मर जाता है”



जेंडर-फ्रीडम के स्वपन और एजेंडे के साथ देश भर में सायकल से घूम रहे राकेश कुमार सिंह ने बताया कि वे 42 महीने से लोगों से मिल रहे हैं और अपनी बात कह रहे हैं. वे अब तक 12 राज्यों की यात्रा कर चुके हैं, दिल्ली उनका 13वाँ राज्य है. इस यात्रा का समापन 2018 में बिहार में राकेश के अपने गाँव तरियानी छपरा में तीन दिवसीय जन-जुटान के साथ होगा.



जामिया मिल्लिया इस्लामिया के हिन्दी विभाग की विभागाध्यक्ष  प्रो. हेमलता महिश्वर ने भी प्रतिभागियों कि प्रशंसा की और ‘विद्रोही’ शीर्षक से एक कविता भी सुनाई| कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन करते हुए स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने कहा कि यहाँ पर हुई कविता पाठ का एक संकलन जल्द ही प्रकाशित किया जायेगा| उन्होंने कहा कि लगभग 35 कवियोँ को सुनने के बाद, जिनमें 20 से अधिक कवयित्रियां हैं मैं इस निष्कर्ष पर हूँ कि यद्यपि पुरुषों की कविताएं स्त्री के प्रति संवेदना से पूरित हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश की कविताओं में स्त्री विक्टिम है। लेकिन स्त्रियों की अधिकांश कविताओं में स्त्री कर्ता है, आक्रोश और पितृसत्ता का सम्पूर्ण नकार उनका मुख्य स्वर है। स्त्री अनिवार्य पीड़ित नहीं है।

इस कविता शाम में राजनी अनुरागी, मेधा पुष्कर, मधुमिता भट्टाचार्जी नैय्यर, कमला सिंह जीनत, विपिन चौधरी, शालिनी श्रीनेट, रचना त्यागी, अनुपम सिंह, नीतिशा खाल्खो,ईश्वर शून्य, हेमलता यादव, आरती प्रजापति, पूजा प्रजापति, भारती संस्कृति आदि आमंत्रित रचनाकारों के साथ-साथ जामिया में अध्ययनरत, राय बहादुर, सुशील, द्विवेदी, अदनान कफीर, तहसीन मजहर, आजम शेख, जीनत, इरम सैफी, शिवम राय सहित कई विर्यार्थियों ने अपनी कवितायेँ पढीं. मंच संचालन किया अरूण कुमार ने. पढ़ी गई कवितायेँ कविता के क्षेत्र में नये भाव, विषय, स्वर और मुद्दों के साथ कविता की आलोचना के लिए नये विमर्श उपलब्ध कराती हैं.

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जीवित पत्नी का मृत्यु प्रमाणपत्र बनाकर केंद्रीय रिजर्ब पुलिस बल के जवान ने की दूसरी शादी: पुलिस गिरफ्तार करने से बच रही है

जी आप नवरात्र मनायें, नारी शक्ति की पूजा करें और एक स्त्री अपनी पीड़ा के साथ पटना की गलियों में भटक रही है यह कहती हुई कि ‘देखो मैं ज़िंदा हूँ.’ मेरे पति और तुम्हारे देशभक्त जवान ने मेरे जीते जी मृत्यु प्रमाण पत्र बनाकर दूसरी शादी कर ली है.  तुम्हारी पुलिस हाँ, नीतीश जी की पुलिस, राष्ट्रभक्तों और देवीभक्तों की पुलिस उसे गिरफ्तार करने से हिचक रही है.

यह कहानी अभी और इन्हीं नवरात्रों में घट रही है.जब आप अपने घर में स्त्रीपूजा के लिए कलश बैठा रहे हैं तब नीलम कुमारी अपने ज़िंदा होने के सबूत के साथ महिला थाने का चक्कर लगा रही है हाथ में पति द्वारा बनवाया गया मृत्यु प्रमाणपत्र (कोलकाता महानगरपालिका से जारी) लेकर यह गुहार लगाते हुए कि मुझे  और मेरे दो बच्चों को न्याय दिलवाओ.

नीलम ने स्त्रीकाल से बातचीत करते हुए बताया कि ‘ मेरे पति मनोज कुमार सिंह, जो सीआरपीएफ 173 बटालियन, मणिपुर में हेड कांस्टेबल हैं, मेरे साथ मार -पीट करते रहे और जबरदस्ती तलाक पेपर पर साइन लेकर बिना मेंटेनेंस दिये मेरे दो बच्चों के साथ मुझे छोड़कर चले गये. मैं इस जबरदस्ती के खिलाफ मुकदमा लड़ ही रही थी, अपने बच्चों के और अपने हक़ के लिए कि मुझे सूचना मिली कि मेरा मृत्यू प्रमाणपत्र बनाकर मनोज कुमार सिंह ने दूसरी शादी भी कर ली है. मैंने सीआरपीएफ के कार्यालय से सूचना अधिकार के तहत प्रमाणपत्र की कॉपी मंगवाई और पटना के गांधी मैदान महिला थाना में प्रमाण सहित शिकायत की. पुलिस पहले तो शिकायत ले नहीं रही थी फिर एसपी के कहने पर उन्होंने एक और एफआईआर दर्ज कर लिया. हालांकि पुलिस कार्रवाई में सुस्त दिख रही है.’

लड़की पर तेज़ाब फेकने की धमकी दे रहा है सेना का अफसर
स्त्रीकाल से बातचीत करते हुए महिला थाने की इंचार्ज विभा कुमारी ने बताया कि ‘ सीआरपीएफ के संबंधित बटालियन को लिखा गया है कि आरोपी को गिरफ्तार कर भेजें.’ हालांकि विभा कुमारी यह नहीं बता पायीं कि दो महीने गुजर जाने के बाद भी उसे गिरफ्तार करने की कोई पहल महिला थाने ने क्यों नहीं ली!

सोनिया गांधी का मास्टर स्ट्रोक: महिला आरक्षण के लिए लिखा पीएम मोदी को खत



कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने महिला आरक्षण को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खत लिखा है. सोनिया ने महिला आरक्षण के विषय में पहल लेकर मास्टर स्ट्रोक दागा है साथ ही उन्होंने बहुत दिनों से ठंढे बस्ते में डाल    दिये गये महिला आरक्षण का मुद्दा फिर से गर्म कर दिया है. उन्होंने इसे लेकर सरकार को समर्थन का वादा भी किया है. जहां एक और राहुल गांधी अमेरिका दौरे पर लगातार मोदी सरकार पर निशाना साध रहे हैं वहीं सोनिया गांधी का यह खत राजनीति में एक नयी बहस को जन्म देगा.

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से कहा है कि उन्हें लोकसभा में अपनी पार्टी के बहुमत का लाभ उठाते हुए महिला आरक्षण विधेयक को पारित करवाना चाहिए.
महिला आरक्षण: मार्ग और मुश्किलें 

यह विधेयक 9 मार्च 2010 में कांग्रेस नीत संप्रग सरकार के शासनकाल में राज्यसभा में पारित हो चुका है, किन्तु अभी इसको लोकसभा की मंजूरी मिलनी शेष है. उन्होंने इसे महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है.

महिला आरक्षण के लिए संवाद 
कांग्रेस अध्यक्ष ने पीएम मोदी को भेजे पत्र में कहा, “मैं आपको यह अनुरोध करने के लिए लिख रही हूं कि लोकसभा में आपके बहुमत का लाभ उठाते हुए अब महिला आरक्षण विधेयक को निचले सदन में भी पारित करवाइए.” यह पत्र 20 सितंबर को लिखा गया है.उन्होंने यह भी स्मरण करवाया है कि कांग्रेस और उनके दिवंगत नेता राजीव गांधी ने संविधान संशोधन विधेयकों के जरिये पंचायतों एवं स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण के लिए पहली बार प्रावधान कर महिला सशक्तीकरण की दिशा में कदम उठाया था. सोनिया ने कहा कि उन विधेयकों को 1989 में विपक्ष ने पारित नहीं होने दिया. किन्तु बाद में 1993 में ये दोनों सदनों में पारित हुए. हालांकि भाजपा सरकार प्रचंड बहुमत के बावजूद महिला आरक्षण को लेकर गंभीर नहीं दिख रही है. 



माहिला आरक्षण विधेयक पारित करना स्त्रीत्व का सम्मान है 
स्त्रीकाल महिला आरक्षण के लिए प्रतिबद्ध कोशिशें करता रहा है. यह एक स्वागतयोग्य पहल है.

आदिवासी लेखिकाओं ने की आदिवासी महिलाओं के खिलाफ लेखन की निंदा लेकिन लेखन पर प्रतिबंध के पक्ष में नहीं

देश की वरिष्ठ और युवा आदिवासी महिलाओं ने एक स्वर से हांसदा सौभेन्द्र शेखर के लेखन की भर्त्सना की है जिसमें उसने आदिवासी स्त्रियों की गरिमा का नकारात्मक चित्रण और गरिमा का हनन किया है. रांची में 7-8 सितंबर को आयोजित ‘अखिल भारतीय आदिवासी लेखिका सम्मिलन’ के अवसर पर जुटी उत्तर से लेकर कई राज्यों से आई आदिवासी महिला साहित्यकारों ने संयुक्त रूप से यह प्रस्ताव लिया था. प्रस्ताव में कहा गया है कि हम झारखंड की भाजपा सरकार द्वारा हांसदा सौभेन्द्र शेखर की किताब पर लगाए गए प्रतिबंध का विरोध करती हैं परंतु इसी के साथ कड़े शब्दों में लेखक की भी भर्त्सना करती हैं जिसने श्रमशील आदिवासी महिलाओं की बहुत ही आपत्तिजनक तस्वीर अपने लेखन में खींची है.

आदिवासी लेखिकाओं ने अपने प्रस्ताव में कहा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जरूरी है. लेकिन यह भी सच है कि स्वतंत्रता के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी अनिवार्य रूप से जुड़ी होती है. खासकर जब लेखन का विषय भारतीय समाज के कमजोर वर्ग हो. चिंता की बात यह भी है कि लेखक का समर्थन कर रहे लोग भारत के आदिवासी महिलाओं की गरिमा पर उसके लेखन के प्रभाव की अनदेखी कर रहे हैं. जबकि इस गंभीर मुद्दे पर कोई आदिवासी लेखक चुप नहीं रह सकता है. इसलिए, अखिल भारतीय लेखिका सम्मलेन, रांची में जुटी हम सभी आदिवासी लेखिकाएं कड़े शब्दों में हांसदा सौभेन्द्र शेखर के लेखन की निंदा करती हैं।

निंदा प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने वाली प्रमुख आदिवासी लेखिकाएं हैं-
1. डॉ. रोज केरकेट्टा, खड़िया-हिंदी की वरिष्ठ साहित्यकार, रांची (झारखंड)
2. प्रो. स्ट्रीमलेट डखार, वरिष्ठ खासी साहित्यकार और विभागाध्यक्ष, खासी विभाग, नॉर्थ-हिल युनिवर्सिटी,           शिलांग (मेघालय)
3. डॉ. दमयंती बेसरा, वरिष्ठ संताली साहित्यकार और आलोचक, बारीपदा (उड़ीसा)
4. निर्मला पुतुल, चर्चित संताली कवयित्री, दुमका (झारखंड)
5. इंदुमती लमाणी, वरिष्ठ बंजारा लेखिका, बिजानगर (कर्नाटक)
6. क्रैरीमोग चौधरी, वरिष्ठ मोग साहित्यकार, (त्रिपुरा)
7. एस. रत्नम्मा, वरिष्ठ आदिवासी साहित्यकार, (कर्नाटक)
8. जोराम यालाम नाबाम, चर्चित आदिवासी कथाकार व एसोसिएट प्रोफेसर, राजीव गांधी विश्वविद्यालय,           ईटानगर (अरुणाचल प्रदेश)
9. सरोज केरकेट्टा, वरिष्ठ खड़िया कवियत्री, सिमडेगा (झारखंड)
10. डॉ. दमयंती सिंकु, वरिष्ठ हो आदिवासी लेखिका, रांची (झारखंड)
11. सोनलबेन राठवा, सोशल एक्टिविस्ट व आदिवासी लेखिका, (गुजरात)
12. प्यारी टूटी, वरिष्ठ मुंडारी लेखिका, खूंटी (झारखंड)
13. डॉ. शांति खलखो, वरिष्ठ कुड़ुख लेखिका, रांची (झारखंड)
14. डॉ. शोभा लिम्बू, वरिष्ठ आदिवासी लेखिका व प्राध्यापिका, हिंदी विभाग, कलिम्पोंग कॉलेज (प. बंगाल)
15. डॉ. हीरा मीणा, आदिवासी लेखिका व प्राध्यापक, दिल्ली विश्वविद्यालय (दिल्ली)
16. उज्ज्वला ज्योति तिग्गा, चर्चित आदिवासी कवयित्री (दिल्ली)
17. ज्योति लकड़ा, आदिवासी लेखिका, रांची (झारखंड)
18. विश्वासी एक्का, चर्चित आदिवासी कवियत्री (छत्तीसगढ़)
19. सुषमा असुर, चर्चित आदिवासी कवियत्री, नेतरहाट (झारखंड)
20. ग्लोरिया सोरेंग, वरिष्ठ खड़िया लेखिका, सिमडेगा (झारखंड)
21. डॉ. आइवी हांसदा, संताली लेखिका व प्राध्यापक, अंग्रेजी विभाग, जामिया मिलिया विश्वविद्यालय                  (दिल्ली)
22. के. वासमल्ली, वरिष्ठ टोडा साहित्यकार, निलगीरी (केरल)
23. डॉ. मिलन रानी जमातिया, आदिवासी लेखिका व प्राध्यापक, त्रिपुरा विश्वविद्यालय (त्रिपुरा)
24. वंदना टेटे, चर्चित आदिवासी लेखिका, रांची (झारखंड)
25. अलमा ग्रेस बारला, युवा आदिवासी लेखिका, बैंगलुरू (कर्नाटक)
26. कुसुम माधुरी टोप्पो, आदिवासी लेखिका (छत्तीसगढ़)
27. दीपा मिंज, सोशल एक्टिविस्ट और आदिवासी लेखिका, रांची (झारखंड)
28. सुषमा केरकेट्टा, आदिवासी कवियत्री, रांची (झारखंड)
29. प्रीति रंजना डुंगडुंग, नवोदित आदिवासी लेखिका, रांची (झारखंड)
30. सरोज तेलरा, आदिवासी कवियत्री, महुवाडांड़, (झारखंड)
साथ में और 35 आदिवासी लेखिकाएं और लेखक।

अखिल भारतीय आदिवासी लेखिका सम्मेलन की ओर से
वंदना टेटे

संलग्न: प्रस्ताव और हस्ताक्षर

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जिंदगी की ओर लौटते हुए…

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जयश्री रॉय

जयश्री रॉय कथा साहित्य में एक मह्त्वपूर्ण नाम हैं. चार  कहानी संग्रह , तीन उपन्यास और एक कविता संग्रह प्रकाशित हैं . गोवा में रहती हैं. संपर्क: jaishreeroy@ymail.com

दर्द की एक नीली नदी मेरी शिराओं-उपशिराओं के संजाल में फैली हुई है… बूँद-बूँद रिसते हुए  विष की तरह, देह के प्रत्येक-रंध्र में मर्मांतक कष्ट की गहरी जड़ें  रोपते हुए… सारी रात इसकी जद में रही हूँ- बहुत कातर और असहाय…अब बस, इसके उतार के इंतजार में हूँ, क्योंकि इसके सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं है मेरे पास… विकल्प का न होना- विवशता का चरम है ! इसी चरम से गुजरने के लिए प्रतिपल अभिशप्त हूँ- मुझे कैंसर हुआ है !

उसदिन खिडकी के बाहर आकाश के फीके नील में भोर का वह तारा कितना उजला था… मैं उसे न जाने कितनी देर तक देखती रही थी . पूरी रात न सो पाने से अंदर गहरी थकान और तनाव था, कनपटी पर कोर्ई नस रह-रहकर धडक उठती थी . दर्द… अब वह सारी सीमाओं के पार चला गया था, एक शून्य, अवश हो जाने की-सी स्थिति ! इस दर्द का स्वाद भी कितना अद्भुत है, अबतक के सारे दर्दों से अलग, इसमें डर का नील भी घुला हुआ है !

कल देर शाम मेरा ऑपरेशन हुआ है, सारे लींप नोड्स बगल से निकाल दिए गये हैं . शायद इक्कीस..अब उन्हें परीक्षण के लिए मुम्बई कैंसर फैला है या नहीं देखने के लिए.उसी के आधार पर मेरा आगे का ईलाज निर्धारित किया जायेगा. दस दिन के भीतर मेरा यह दूसरा ऑपरेशन है.लेपकटॉमी . मुझे स्तन का कैंसर हुआ है.दायीं तरफ .पता नहीं क्यों,ऑपरेशन के ऐन वक्त मेरा रक्तचाप सांघातिक रूप से बढ गया था. हालांकि मैं भीतर से बिल्कुल शांत थी.ओ. टी. में जाने से पहले तक सबसे हँसी-मजाक करती रही थी.गहरे नशे की-सी अवस्था में ऑपरेशन टेबल पर मैं अपने चारों तरफ मची हडबडी को महसूस कर सकती थी . मेरी इस हालत के लिए ओ. टी.में मौजूद स्टाफ एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे थे.

होश में आने के बाद मेरी हालत पानी से निकली हुई किसी मछली की तरह हो रही थी . एक-एक साँस के लिए तडपती हुई… ओह , कैसा  गहरा आतंक से भरा अनुभव था वह- जीभ, गला सूखकर काठ, श्वासनली में गहरी पीडा… मैं जानती थी, मुझे एनेसथेसिया गलत ढंग से दिया गया है, या जरूरत से ज्यादा की मात्रा में . पहले भी एकबार ऐसा मेरे साथ हो चुका था . तब मैं कोलकाता में अपनी पहली बांगला फिल्म की शूटिंग में व्यस्त थी और अचानक से दायें सीने में निकल आये एक गाँठ का ऑपरेशन मुझे करवाना पड गया था . गलत एनेसथेसिया की वजह से मेरा गला जख्मी हो गया था . कई दिनों तक साँस लेने में भी तकलीफ होती रही थी . यह १९८७ की बात है .

न जाने इस तरह से हर साल कितने मरीज ऑपरेशन थियेटर में अपनी जान गँवा देते हैं . मेरे परिवार के लोग ओ. टी. के बाहर अधीर प्रतीक्षा में खडे थे . उन्हें मेरी इस स्थिति के विषय में कोई खबर नहीं दी गयी थी . मुझे लगा था, अंततः मैं भी डॉक्टर की लापरवाही की शिकार हो गयी .

हव्वा की बेटी: उपन्यास अंश 


इसके बाद सारी रात मैं सो नहीं पायी थी . मुझे प्रतीत हो रहा था,  किसी ने मुझे जिंदा काटकर छोड दिया है . दर्द के लिए बहुत अच्छी दवाइयाँ उपलब्ध होती हैं, मगर पता नहीं क्यों डॉक्टर मुझे कोई राहत पहुँचा नहीं पाये थे . मेरे बार-बार अनुरोध करने के बावजूद . मेरी स्थिति किसी जिबह किये हुए जानवर की-सी थी, रातभर दर्द से छटपटाते हुए, हर करवट… कुछ अनुभव शब्दातीत होते हैं .

उस रात की सुबह बहुत फिकी और उदास उतरी थी . रोशनी तो थी, मगर कहीं उजाला नहीं था… शायद यह मेरे अंदर का अंधकार था… सुबह की बैंजनी उजास में अपने अस्पताल की खिडकी से बाहर सोये पडे शहर को देखते हुए उसदिन अनायास लगा था, मैं जिंदगी से बहुत दूर, एक बहुत बडे शून्य में किसी नक्षत्र की तरह भटक गयी हूँ… अस्पताल के बिस्तर से उस दिन सबकुछ अपनी पहुँच से परे और कितना सुंदर लग रहा था- जिंदगी… नींद, स्वप्न और खुमार में डूबी हुई… क्या यह सब फिर कभी मेरा हो सकेगा ? अपनी मुट्ठी  में एक बहुत बडा शून्य बाँधे उसदिन मैं पडी रही थी, अंदर कुछ क्षरता रहा था निःशब्द, नीरव… पतझर के उलंग, उदास पेड की तरह . चुकने की, खत्म होने की वह  शुरूआत थी . आगे एक लबा सफर पडा था, सामान के साथ ढेर सारा हौसला भी बाँध लेना था . हर कदम पर जरूरत पडेगी इसकी .

अपने पीछे एक पूरी दुनिया छोड आयी हूँ-प्रांजल, स्नेहिल और एकदम टटकी, सब्ज ! कितनी बाँहें मुझे घेरी हुई हैं, कितनी विकल है आँखों की चावनी… प्रार्थना, मान-मनुहार, उपालंभ… कुछ भी तो मुझे रोक नहीं पाया !  नियति का इशारा ऐसा ही होता है- दुर्वार, सांघातिक… चल देना पडता है, सबकुछ छोडकर, एकदम से…

घर से आते वक्त मेरी नौ साल की बेटी का प्रश्न- माँ, तुम चली जाओगी तो स्कूल के लिए मेरी चोटी कौन गूँथेगा ! मेरे पास उसके सवालों का कोई जबाव नहीं . कलतक मेरे बिना मेरा घर एक पल के लिए भी नहीं चलता था, आज सबकुछ जस का तस छोड आयी हूँ ! विवशता किसे कहते हैं, बहुत शिद्दत से महसूस कर रही हूँ, मगर रोना नहीं चाहती, मेरे रोते ही सबका धैर्य तिनके की तरह आकुल वन्या में बह जायेगा . मुझे बाढ नहीं, तटबंध बनना है- अपने लिए, अपनों के लिए…

एक छोटा-सा क्षण पूरे जीवन की दिशा बदल देता है . एक पल सबकुछ है, दूसरे ही पल कुछ भी नहीं !   मुझे याद है, कितनी खूबसूरत थी वह शाम जब मुझे अपनी बीमारी का पता चला था . सुनहरी धूप में दुनिया नहायी हुई थी, रेशम की तरह मसृन थी हल्की बहती हवा . उसमें जाडे की खुनक अभी बाकी थी . बसंत की हल्की आहट भी . नहाते हुए मेरा हाथ सीने के उस सख्त गाँठ पर अनायास पड गया था . मैं तत्काल समझ गयी थी . मेरी माँ को भी स्तन कैंसर हुआ था .

इसके बाद अस्पताल और लैब्स  के अन्तहीन चक्कर… हाथ में फाईल लिए मैं यहाँ-वहाँ अपनी जिंदगी की मियाद पूछती फिर रही थी . कहीं कोई सटीक जबाव नहीं था . बहुत कठीन और दुरूह था सबकुछ . पहले मेरे पास एक साधारण रूटीन चेकअप के लिए भी समय नहीं हुआ करता था . बच्चों का स्कूल, यह काम, वह काम… अब समय ठहर गया था हमारे लिए . सबकुछ छोडकर अस्पताल में पडे थे . पीछे एक पूरी दुनिया तहस-नहस हो रही थी- बच्चे बिना टीफिन के स्कूल चले जाते, होम वर्क पूरा न होने की वजह से उन्हें डाँट पडती, उनके युनीफार्म पर प्रेस नहीं होता . संजय (मेरे पति) के हाथ खाना बनाते हुए कई बार जल चुके थे . उसदिन माही (बेटी) के लंबे बाल काटकर कंधे तक कर देने पडे . उससे चोटी बनायी नहीं जाती थी . कितने खूबसूरत लंबे बाल थे उसके… मैंने उसे समझाया था, जब मैं घर वापस आ जाऊंगी, वह फिर से अपने बाल बढा सकेगी . उसदिन मैंने बडी मुश्किल से अपने आँसू रोके थे . आखिर किस-किस बात का दुख मनाती !

हव्वा की बेटी : उपन्यास अंश, भाग 2

मेरा कैंसर दूसरे स्टेज पर था . गनीमत थी कि काँख के लींप नोड्स में नहीं फैला था . रिपोर्ट ने कैंसर की पुष्टि की थी- डक्टल इनवेसिव कारसीनोमा… पढकर अंदर कोई प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं हुई थी . मेडिकल एनसाइक्लोपेडिया पढते रहने के कारण मैं अधिकतर बीमारियों के विषय में जानती- समझती हूँ . न जाने क्यों मैं शुरू से अस्वाभाविक रूप से शांत और सयंत थी . बहुत निरपेक्ष भाव से सबकुछ देख-सुन रही थी . जैसे यह सब मेरे साथ न होकर किसी और के साथ घट रहा हो . अंदर विश्वास था, मुझे कुछ नहीं होगा . ईश्वर के प्रति गहरी आस्था ने ही मुझे यह बल  दिया था . जीवन समर में गीता मेरा संबल थी, कृष्ण मेरे सारथी… विजयी मुझे होना ही था . अपनों का साथ तो था ही .

ऑपरेशन के करीब एक महीने बाद से मुझे केमो थेरापी करवानी पडी . छह चक्र- २१,२२   दिन के अंतराल से . इसके लिए मुझे पूने जाना पडा . वहाँ ईलाज की बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध हैं . मेरी छोटी बहन भी थी वहाँ .

वहाँ कितने बडे-बडे अस्पताल, लोगों की भीड… आदमी अचानक स्वयं को ऐसी जगह पहँचकर खोया हुआ महसूस करता है . कैंसर डिपार्टमेंट का दृश्य ही अद्भुत होता है . सभी यहाँ सहमे और आतंकित दिखते हैं . नरक के बाहर का दृश्य यहाँ से मिलता-जुलता होगा . आतंक- कुछ भीषण के घट जाने का, अपनों से बिछड जाने का, मौत का… अज्ञात का डर- न जाने क्या होनेवाला है उनके साथ !  और इसी में दुनियादारी, लेनदेन से जुझना…

आजकल के अस्पताल एक व्यवसायिक केंद्र ही होते हैं . बस, पैसे कमाने का जरिया . आपके सामने तरह-तरह के पैकेज रखे जाते हैं . आप जितना पैसा खर्च करेंगे आपको उतनी ही सुविधाएँ दी जायेगी . साथ में आपके प्रति उनका रवैया भी इसी पैसे से निर्धारित होता है . अमीर मरीजों को ईलाज के साथ डॉक्टर, नर्स तथा दूसरे मेडिकल स्टाफ से अच्छा सौहाद्रपूर्ण व्यवहार मिलता है . उनके लिए डॉक्टरों की मुलायम आवाज तथा नर्सों की स्पेशल हँसी होती है . साथ में ए. सी. कमरा, टी. वी. अवेन, फ्रिज, अच्छी रूम सर्विस तो है ही . मतलब की जितनी चीनी, उतना मीठा . हमारे देश में हेल्थ इंशोरेस का अभी उतना चलन नहीं है . ऐसे में जब कोई गंभीर बीमारी होती हैं, लोग रास्ते में बैठ जाते हैं . ईलाज बहुत महंगा हो गया है . वहाँ ख्याल आया था, गरीबों के लिए तो जीवन से भी अधिक मृत्यु महंगी हो गयी है . अब उसके पास मरने का विकल्प भी नहीं .

कितने सारे टेस्ट, कितने मशविरे और राय . मेरा जीवन अब डॉक्टरों के हाथों में है . वह तय करेंगे, मेरा क्या करना है . कोई कहता है, मेरे बीमार अंग को शरीर से काटकर फेंक दिया जाय, कोई कहता है, इसकी जरूरत नहीं . मैं सुनती हूँ, ठीक जैसे कोई अपराधी अपनी मौत की सजा सुनता है . बाहर सडकों पर लोग चल रहे हैं, हंस रहे हैं, बातें कर रहे हैं… उन्हें पता नहीं, आज कौन उनसे छुट कर जिंदगी में पीछे रह गया है… ऐसा तो शायद हमेशा से होता आया है, खबर मुझे आज हो रही है . मैंने भी भला कब पीछे मुडकर देखा था कि कौन चलते-चलते रूक गया है, कौन गुमनामी के अंधकार में धीरे-धीरे खो रहा है… आज मैं पीछे रह गयी हूँ तो मुझे लग रहा है, यह दुनिया कितनी स्वार्थी है, ऐसा ही होता है…


मेरी दुनिया बदल गयी है- सिरे से ! पहले सबकुछ टेकेन फॉर ग्रॉटेड हुआ करता था, अब कुछ भी निश्चित नहीं . एक कदम उठाते हुए नहीं जानती, दूसरे कदम पर क्या घटनेवाला है . अचानक लोभी हो गयी हूँ- मुझे सबकुछ चाहिए… आषाढ की नीली संध्या, बसंत की अबीरी धूप, चाँद रात, सोनिया सांझ… यह भी, वह भी…इतना मोह ! पूरी दुनिया को अपनी बाँहों में बाँध लेना चाहती हूँ . गालों में चूम लेना चाहती हूँ… छोटी-छोटी बातें लुभा रही है, अपने पास बुला रही है… शरत् की निझुम दुपहरी में खिडकी से झरते हुए नीले आकाश के नीचे टैगोर की स्वप्निल कविताओं की मायावी दुनिया, देवदास की रोमानी उदासी, खुले वातायन में बूँद-बूँद रिसता अगस्ती रातों का शबनम भीगा चाँद, नवम्बर का चटक सुर्ख गुलाब…गुलाबी जाडे की  पशमिने-सी नर्म हरारतभरी धूप… सबकुछ कितना दुलर्भ, कितना लोभनीय हो गया है !

केमो लेने के लिए 10-12 घंटे बिस्तर में बिना हिले-डुले पडे रहना पडता है . एक गहरे पीले या नारंगी रंग का जहरीला कॉकटेल धीरे-धीरे जिस्म में उतार दिया जाता है . जितनी ज्यादा तकलीफ, दवाई उतनी ही कारगर.. मेरा हैंडसम डॉक्टर मुझे समझाता है . उसकी देह से महंगी आफ्टर सेव की गंध उठ रही है . सुबह-सुबह एकदम ताजा- स्वास्थ्य और आत्मविश्वास से चमकता हुआ चेहरा, डिजाइनर कपडों में किसी फिल्म अभिनेता की तरह… देखकर रश्क होता है, अच्छा भी लगता है .मेरे हाथों में अब कोई नस नहीं मिलती . आई. वी. लगाने में मुश्किल . नर्से कोशिस करके हार गयी हैं,  मेरे दोनों हाथ सुजकर काले पड गये हैं, फर्श पर खून ही खून… बचपन में टीका लगवाने से इतना डरती थी, अब तो पूरा जिस्म ही जैसे छलनी हो गया है . खासकर एनेसथेसिस्ट को बुलाया गया है, मेरे हाथों में कोई नस नहीं, वे स्ट्रा की तरह कडे हो गये हैं . अब वे मेरे पाँवों में नस ढूँढ रहे हैं . मैं सोचती हूँ, जो हो रहा है, मेरे भले के लिए हो रहा है . यह सोच मुझे तसल्ली देती है.



केमो का असर दो, तीन दिन बाद शुरू होता है . मुझे प्रतीत हो रहा है, किसी ने मुझे जहर देकर मरने के लिए छोड दिया है . उस भीषण अनुभूति को शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता ! दर्द, घबराहट और तकलीफ… रातदिन कहाँ से गुजर रहे हैं, नहीं जानती . बस, एक अंधेरे कमरे में पडी हूँ . कुछ खाया-पीया नहीं जाता, भोजन की गंध से उल्टी आती है .कुछ सोच, समझ नहीं पाती, दिमाग में एक कुहरीला अंधकार है और भीतर लहरों की तरह उठता हुआ एक बीमार अनुभूति .

परहेज करना जरूरी है . साफ-सफाई, ताजा भोजन, यह नहीं, वह नहीं… डॉक्टर की कडी हिदायतें… साथ में इतनी सारी दवाइयाँ… निगली नहीं जाती, उल्टी हो जाती है . साथ में हजार दिक्कतें- ब्लड काउंट गिर गया है, खून आना शुरू हो गया है, आँखों में इनफेक्शन, सीने में दर्द… डायबिटीज है, उच्च रक्तचाप भी . इन्हें संभालना बहुत जरूरी . केमो थेरापी रोककर अब मेरा हजार तरह का परीक्षण करवाया जा रहा है- सीटी स्कैन, सोनोग्राफी, आँखों का परीक्षण, कारडियोग्राम, हेमोग्राम… बैठकर एक साथ कई लीटर पानी पीना पड रहा है, कभी-कभी उल्टी आ जाती है . सोचती हूँ, अब भले प्यास से मर जाऊँ, पानी कभी नहीं पियूंगी .  हिरो डॉक्टर तसल्ली देता है- यह दवाई जहर है, तुम्हें जिंदा रहने के लिए जहर पीना है- इट्स अ नाइस पॉयजन, गीवस् यु लााईफ…

लोग मुझे मेरी आँखों और बालों से ही पहचानते थे- बंगाली बाला- बड़ो-बड़ो शोख- एक माथा चुल… जिंदगी के कुछेक नियामतों मे से एक मेरे बाल थे- खूब लंबे, घने, बकौल सबके रेशम से… केमो के पहले चक्र में ही झर गये ! सुबह उठकर आईने में देखा, बाल जटा बनकर पीछे लटक रहे हैं, सामने का पूरा हिस्सा साफ ! गंजे माथे पर बिंदी कितनी भद्दी लग रही थी !

संजय-मेरे पति-कभी उन्हें  केस  को हाथ भी लगाने नहीं देता था, आज उसी को हाथ में कैंची लेकर मेरा सर मुंडाना पडा…! गर्मी हो रही थी, बालों के उतरते ही माथे की त्वचा में हवा लगी, ठंडा हो गया . सोचा सबके कुछ न कुछ फायदे होते हैं . बी पासीटिव ! जयश्री बी पासीटिव!
दो दिन सर पर रूमाल लपेटकर घूमी, फिर छोर दिया- मुझे नहीं छुपना है, कोई अपराध नहीं किया है मैंने . बस, परिचित देखते तो पहचान नहीं पाते . बेटे ने कहा, माँ नाउ यु लुक लाईक ए बुद्धीस्ट मंक… चलो, बौद्ध भिक्षुणी बनने की इच्छा भी पूरी हो गयी .

अस्पताल के बिस्तर में पडे-पडे बस मैंने सपने देखे और इंतजार किया- न जाने किन-किन चीजों का- अपने घर लौटने का, एकबार फिर छत में बैठकर बारिश देखने का, अपनों के बीच होने का- जिनसे हम छुट गये, अब वो जहाँ कैसे हैं, शाखे-गुल कैसी हैं, खुशबू के मकां कैसे हैं… सारे सवाल अनुत्तरित पडे रहे, समय के पास उनका जवाब था, और कहीं नहीं… छह महीने इसी तरह कटे तो नहीं, मगर बीत ही गये .
!
इस बीच मेरे लेखन ने मेरा साथ दिया– हर जगह, लंबे इंतजारों के बीच- हस्पताल के बिस्तर पर, डॉकटरों की क्लीनिक में, लैब में- लिखती रही… मेरे अंदर कोई चिंता, डर नहीं था, कुछ थी तो बस गहरी चाह और उम्मीद, बहुत भरोसा और खूबसूरत संवेदनाएँ- कहानी, कविताओं में  में ढलती हुई…बचपन में थोडा बहुत लिखती थी, फिर लिखना छुट  गया था . बीमार पडी तो ख्याल आया- अंदर कितना कुछ रह गया है कहने के लिए, शेयर करने के लिए… कलम उठायी तो लगा किसी नदी का बाँध टूट गया !! उफन आयी संवेदनाएँ, कूल-किनारा डूब गया… एक प्लावन जो न जाने कब से अंदर बंधा पडा था .

पहले लिखकर अपनी रचनाएँ बिस्तर के नीचे छिपाकर रख  देती थी, मेरे बिस्तर के नीचे न जाने कितनी कविता, कहानियाँ आज भी दबी पडी हैं . पहली बार इच्छा हुई कि मेरी बात लोगों तक पहुँचे, गोवा में हिन्दी पत्रिकाएँ मिलती नहीं . कहीं से कुछ पते मिले तो बिना सोचे-समझे उन पत्रिकाओं में मेरी रचनाएँ भेज दीं . पहली कहानी हंस में मुबारक पहला कदम के लिए स्वीकृत हुई, इसके साथ ही छपने का सिलसिला चल निकला- कथादेश, वागार्थ, पाखी, परीकथा, नया ज्ञानोदय, वसुधा, कथाक्रम आदि-आदि… शायद कुछ बुरा होता है कुछ बहुत अच्छा होने के लिए ही .

केमो थेरापी के बाद मुझे रेडियेशन लेना था – पूरे ३१ सायकलस्! दो महीने तक पूने में रहना था . हफ्ते में पाँच दिन लगातार- ५ मिनट तक . फिर वही लंबे इंतजार- घंटों वेटिंग रूम में बैठे रहना . चारों तरफ मुंडे हुए सर, झुकी हुई नजरें, उनमें ठहरा हुआ सन्नाटा . एक डर जिसकी अब आदत हो गयी है . पेट में कुछ धडकता है, नसों में बेआवाज सडता है, सब थक गये हैं- अपनी ही चौंक और बेतरतीव धडकनों से . अपने दर्द से निजात के लिए दूसरों के जख्म में झाँकते हुए पूछते हैं वह सवाल जो खुद से नहीं पूछे जाते- क्या कहते हैं डॉक्टर, क्या चांसेस हैं ? एक-दूसरे को तसल्ली देकर स्वयं को बहलाते हैं, एक झूठ जो जीने के लिए बहुत जरूरी हो गया है… सच तो बस आतंक है !

एक बच्ची की तरल आँखें, उसकी पारे-सी चमकती हुई चावनी… वहाँ अब भी जीवन, उसका पूरा सपना है . अपने दर्द से बेखबर हँसती है, अपनी दादी की गोद में सिमटकर सोती है, शायद सपने भी देखती है . उसके गालों के खूबसूरत गड्डों में एक गुलाबी मुस्कान नींद में कुनमुनाती है . उसे देखकर अक्सर सोचने लगती हूँ, हम इतने बडे क्यों हो गये, रोना-गाना सब भूल गये…


अस्पताल के बाहर कांक्रीट के जंगल में एक कोयल तपती दुपहरी में गाती रहती है- बिना रूके, निरंतर… मैं किसी अमराई की घनी, सब्ज छाँव में पहुँच जाती हूँ, ए. सी. से पानी की बूँदें टपकती है, मुझे लगता है, रसभीना महुआ टपक रहा है- बेघर मन कहाँ-कहाँ टप, टप…टरेडियोलॉजिस्ट ने कहा था नो साइड अफेक्ट, बहुत विश्वास के साथ मान ली थी उनकी बात . मगर रेडियेशन के साथ ही त्वचा लाल पडने लगी थी . पहले हल्की गुलाबी, फिर लाल, फिर गहरा लाल ! साथ में जलन, बेचैनी . और फिर पूरी चमडी जले हुए बैगन की तरह काला पडकर यहाँ-वहाँ से फटने लगी, अंदर का लाल मांस बाहर झाँकता, खून और पानी रिसता . हिलना-डूलना तक मुश्किल हो गया . कपडों में रहना कठिन था, एक ही तरह से रातभर लेटने से त्वचा थोडा दुरूस्त होने लगती, मगर जरा सा  हिलते ही चमडी में खिंचाव पडता और तेज दर्द से मैं दुहरी हो जाती .

इसी हाल में शाम के समय मैं अपनी बहन और जीजाजी के साथ पूने के मशहूर रेस्तराँ और क्लबों में जाती, लोगों से हँसती-बोलती . जब लोगों को पता चलता, मैं वहाँ घूमने नहीं, बल्कि कैंसर के ईलाज के लिए आयी हूँ, सब आश्चर्य से मुझे देखते रह जाते . एकबार किसी के मेरे बालों की तारीफ करने पर मैंने अपने बालों का विग खोलकर उसके हाथों में रख दिया था . इस आक्समिक् घटना से आसपास के लोग स्तब्ध रह गये थे . पूरी पार्टी में सन्नाटा छा गया था .

जिस दिन मेरा रेडियेशन खत्म हुआ था, मैं उसी दिन घर वापस आ गयी थी . घर लौटकर मैंने महसूस किया था, मैंने अपने परिवार को इन कई महीनों में कितना मिस किया था . जो बात, जो दुख मैं खुद से भी छिपाती थी, वह इस कैंसर से भी ज्यादा तकलीफदेह थी, इससे भी ज्यादा कठिन… जीवन छुट जाय, मगर मेरे अपने नहीं… अपनी माही से लिपटकर मैं उसदिन बहुत रोयी थी . खुशी में रोने का यह मौका मुझे बहुत दिन बाद मिला था .

घर लौटकर मैंने एक नये सिरे से जीवन को जीना शुरू किया है, छोटे-छोटे निबालों में- अपने घर के टेरास में बैठकर एक कप चाय पीना, सुबह का अखबार पढना, बच्चों को उनके स्कूल के लिए तैयार करना-इनमें  जीवन का भरपूर स्वाद है और मैं इन्हें पूरी तरह एनज्वाय करना चाहती हूँ .  आगे भी बार-बार चेकअप करवाना है, सावधान रहना है, कैंसर के लौट आने की भी संभावना है, मगर मुझे इन बातों की बिल्कुल चिंता नहीं . जानती हूँ, मरने से पहले नहीं मरूंगी और फिर मौत भी कौन- सी बडी मौत है. हम जीवन में सबकुछ करते हैं , और इस भागदौड में बस जीना ही भूल जाते हैं . अब मैं पहले यही करना चाहती हूँ, जीना चाहती हूँ  ! मौत से पहले मरना नहीं चाहती . बाकी चीजें होती रहेंगी . आराम से- जिंदगी रही तो !  और वह तो है मेरे पास- इत्ता सारा…

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तुम और अन्य कविताएँ

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मीनाक्षी भालेराव

 राष्ट्रीय मानवाधिकार सुरक्षा संघ , पुणे में महिला अध्यक्ष पद पर कार्यरत.प्रकाशित पुस्तकें : हम नन्हें मुन्ने,पथ का राही ,आओ तुम्हें जगा दूँ. संपर्क:meenakshibhalerao24 gmail.com

तुम


बुनते रहे स्वप्न
मैं जागती रही
रात भर
तुम निकल पड़े
जब मंजिल की ओर
मैं राहे तुम्हारी
बुहारती रही
पहर दर पहर
तुम्हारी सफलता
की सीढ़ीयों पर
जितने भी कांटे थे
अपने ह्रदय के
सूनेपन मैं चूभोती रही
कोई पत्थर तुम्हें
जख्मी ना कर दे
अपने सिने पर
धैर्य  के  पत्थर
रखती रही
सावन को पतझड
बना लिया था
ताकि तुम्हारी
सफलता को
बून्दें भिगोकर
साही सा बहा ना दे
तुम्हारे मन का सारा
बोझ हर रात तुम
जब मेरे मन पर
ड़ाल कर चैन की
नींद  सो जाते थे

तब मेरा होना
मुझे सार्थक लगता
तुम्हारे सपनों को
साफ जमीन देने के लिए
कई बार
मैंने
अपनी आत्मा को
मैला किया
तब जाकर
तूम ,तूम बने
और मैं , मैं ही
नहीं रही ।

मैं

मिली नहीं खुद से
बरसों हो गए ।
पहचान लेती हूँ
दरवाजे से
दाखिल होने
वाली हवाओं के
चेहरों की
मंशा  को भी
मैं जानती हूँ घर
की हर दीवार के
मन की बातें
भी
सहला लेती हूँ
उन्हें भी
बतिया लेती हूँ पास
बैठ कर
उनकी सुंदरता को
जब संवार देती हूँ
तब वो मूझे
अपने आगोश में
लेकर मेरा मन
सन्तुष्ट कर देती है
बाहरी ही नहीं
घर के अंदर भी
सराही जाती हूँ
तब खुद से
बरसों तक
नहीं मिल पाने का

दुख
नहीं होता ।
पहचान गुम
होने का दुख
नहीं होता ।

कितनी


पिसती है
हर रोज
चकला ,बेलन
के मध्य स्त्री
हाँ स्त्री रोटी सी स्त्री
कभी कभी यूँ ही
सोचकर मन
भारी हो जाता है
मां बाप के घर में
आटे सा
तैयार किया जाता है
बारीक
ताकि कोई
कमी नहीं रह जाये
ब्याही
जाने पर
ससुराल जाकर
उसका मंथन
किया जाता ताकि
नर्म नर्म
रोटी सी
बन कर पूरे
परिवार को संतुष्ट
कर सके
पिसती रहे
रोटी सी
चकला , बेलन के

बीच
अपने
अस्तित्व को दबाए
चूप
हाँ बिलकुल
चूप
स्त्री हाँ रोटी सी स्त्री ।


लकड़ी

काट कर अपनी
जड़ो से
गीली लकड़ी को
गठ्ठर बाना
बांध कर
रस्सी से
ला कर
घर के किसी कोने में
ड़ाल कर
छोड दिया जाता है
सूखने के वास्ते
ताकि
जब चूल्हे में
ड़ाली जाये तो
जलकर आसानी से
राख हो जाए ।
धुआँ धुआँ हो जाये
वो
पर
किसी और की
आंखें में पानी नहीं
आने दे
जलती हुई
सुखी लकड़ी  ।

देह

उसकी देह आज
चुपचाप पड़ी थी
म्रत
बिना कम्पन के
मारकर
अपने
मन को
जब मुर्दा सी
पड़ी रहती थी

तब कोई नहीं
आया
रोने को
देह निष्क्रीय
देह
सब कोई धहाड़े
मार मार कर
दुखी होने का स्वांग ।
क्यो ?

औरत

ठोकर लगी तो पत्थर
औरत बन गया
यहीं से सिलसिला
शुरू हुआ
औरत को ठोकर
में रखने का
फिर सभी ने
मान लिया
शापित है स्त्री

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मैंने अमित शाह को गुंडा (इसलिए) कहा…..राना अय्यूब



मुकुल सरल 


 “ये किताब एंटी मोदी या एंटी अमित शाह नहीं है, ये किताब उन लोगों के लिए जस्टिस की किताब है। हम आपको सिर्फ ये याद दिलाना चाहते हैं कि जो 2002 में हुआ जो 1984 में हुआ इसका मतलब ये नहीं कि वो हुआ नहीं हम भूल चुके हैं, हमारा जमीर मर चुका है, इसलिए इसको हम भूल चुके हैं, ये किताब या ऐसे इवेंट हम इसलिए करते हैं कि आप अपने जमीर को याद दिलाते रहें कि ऐसी ज़्यादतियां हुई हैं और जिन लोगों ने ये ज़्यादतियां की हैं वो आज हमारे हुक्मरान हैं और आप और हमें इस चीज की शर्मिंदगी होनी चाहिए, मुझे इस बारे में बोलने में कोई शर्म नहीं आती कि हम शायद मुर्दा हो चुके हैं कि हमें शर्मिंदगी नहीं होती कि ऐसे लोग हमारे प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष हैं।”

ये कहना है पत्रकार राना अय्यूब का जो शनिवार को दिल्ली के प्रेस क्लब में अपनी किताब ‘गुजरात फाइल्स’ के हिंदी संस्करण के विमोचन के अवसर पर बोल रही थीं।


इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार और टीवी एंकर रवीश कुमार ने कहा कि उस समय अविश्वास के माहौल में जो खूनी खेल खेला जा रहा था मुझे लगता है कि उसका ये दस्तावेज़ है। जब तक यह किताब है वो ये याद दिलाती रहेगी कि आप कुछ कहने से डर रहे हैं। और जब तक आपको याद है कि आप कुछ कहने से डर रहे हैं तो इस किताब का मकसद कामयाब है मेरी नजर में।

कार्यक्रम की शुरुआत पिछले दिनों अतिवादियों की गोली का शिकार हुईं पत्रकार और एक्टिविस्ट गौरी लंकेश की याद में दो मिनट के मौन के साथ हुई। ‘गुजरात फाइल्स’ की लेखक राना अय्यूब ने अपने सफर को याद करते हुए बताया कि “मुझे बहुत खुशी हुई क्योंकि हिंदी में इस किताब का आना बहुत ज्यादा जरूरी था। अंग्रेजी समेत 12 और ज़बानों में यह किताब आ चुकी है। इस मुल्क की जो हिंदी बेल्ट है हिंदी पापुलेशन है उसके लिए यह किताब बहुत जरूरी थी। हमारी मातृभाषा है हिंदी। मुझे अंदर से एक कुढ़न हो रही थी कि यह किताब हिंदी में नहीं आई है।”



शुक्रिया के बहाने…

राना ने थोड़े दुख और थोड़े व्यंग्य के साथ बताया कि “मई 2016 में इसका लांच हुआ और आज 1 साल तीन महीने हो चुके हैं। इस किताब की सच्चाई यही है इस सरकार ने अब तक न मेरे ऊपर डेफमेशन (मानहानि) का केस किया, न मेरी इस किताब को बैन किया। उनका शुक्रिया। अफसरों ने जिनकी स्टिंग आपरेशन हुआ है उनमें से किसी ने आज तक यह इल्ज़ाम नहीं लगाया कि इस किताब में जो कुछ लिखा है गलत लिखा है। उनका भी शुक्रिया। सवा साल हो गया है एसआईटी ने भी हमें एप्रोच नहीं किया है। उसका भी शुक्रिया।”

उनका यह शुक्रिया कई सवालों को जन्म दे रहा था। उन्होंने कहा कि “ये एक किताब थी ही नहीं, न मुझे किताब लिखने का कभी शौक था, यह एक जर्नलिस्टिक एफर्ट (पत्रकारीय प्रयास) था, 2010 में मेरी इन्वेस्टिगेशन (जांच-पड़ताल) के बाद अमित शाह जो जेल गए हैं उसके बाद मुझे इस बात की ज़रूरत लगी कि मैं अंडर कवर जाऊं और कुछ सच्चाई है, कुछ चीजें हैं जो बाहर नहीं आई थी, उन्हें बाहर लाऊं।

उन्होंने इस किताब के लिए मैथिली त्यागी के किरदार का सफर बताया। और छुपे कैमरे और माइक्रोफोन से की गई इस पूरी पड़ताल की कहानी जिसमें तमाम मुश्किलें और जोखिम रहे, उन्हें संक्षेप में बताया।

“सबने स्टिंग छापने से मना किया”


राना ने कहा कि “8 महीने तक मैंने मैथिली त्यागी बनकर उन्हीं के समाज का हिस्सा बनकर यह स्टिंग ऑपरेशन किया। ‘तहलका’ ने छापने से मना कर दिया, फिर मैं इसे हिंदुस्तान में जितने भी एडिटर दोस्त हैं मेरे, उनके पास लेकर गई, उन सबका मेरे लिए एक सजेशन (सुझाव) था कि अब 2014 में मोदी पावर में आ रहे हैं, इसे करने की जरूरत नहीं है। जब किताब आई तो हिन्दुस्तान के सब एडिटर जो मेरे दोस्त हैं सबने मुझे बधाई दी कि बहुत साहस का काम किया लेकिन किसी ने भी अपने पब्लिकेशन में इसके बारे में कुछ मेंशन नहीं किया, जैसे यह किताब एग्ज़िस्ट (वजूद) ही नही करती।”

“बड़े जर्नलिस्ट, कन्सलटेंट बन गए हैं”


राना ने कहा कि “आजकल हिंदुस्तान में जितने भी बड़े अच्छे जर्नलिस्ट हैं वे सब कन्सलटेंट बन गए हैं। या सबने अपनी-अपनी पर्सनल वेबसाइट खोल ली है, बहुत कम लोग हैं जो इस पावर में रहकर इस पोजिशन में रहकर सच्चाई बोल पा रहे हैं। रवीश यहां पर हैं लेकिन  कभी कभी मुझे लगता है कि हम रवीश पर बहुत ज्यादा बोझ डाल देते हैं।”

“हां, मैंने अमित शाह को गुंडा कहा”


राना ने भावुक अंदाज में कहा कि मैं जो इस किताब को पिछले एक साल से पागलों की तरह हर जगह लेकर ढो रही हूं, अपने साथ लेकर घूम रही हूं, इसकी बात कर रही हूं ताकि मैं शायद आपके जमीर तक इस बात को पहुंचा पाऊं कि जिन लोगों को आपने आज पावर में बैठाया है, उन लोगों से हमारी कोई पर्सनल दुश्मनी नहीं है, किसी की कोई पर्सनल दुश्मनी नहीं है, हम सिर्फ एक सहाफी (पत्रकार) के तौर पर काम कर रहे हैं। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि जिस तरह मुझे बना दिया गया है कि मैं एंटी मोदी हूं, एंटी अमित शाह हूं, नहीं, मैंने अमित शाह को गुंडा इसलिए कहा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह वो एक इंसान है, सुप्रीम कोर्ट ने एक्सटॉर्शनिस्ट (Extortionist) कहा। एक्सटॉर्शनिस्ट का सीधा सीधा हिंदी शब्द होता है गुंडा, तो इसलिए मैंने उन्हें गुंडा कहा जिसे कहने में मुझे कोई शर्म  नहीं आती। न  मुझे कोई नौकरी बचाने का डर है न किसी एडिटर का डर है तो मैं कुछ चीजें तो कह सकती हूं जो मेरे कलीग नहीं कह सकते हैं। कई कलीग मुझसे कहते हैं कि तुम्हें कई चीजों का फायदा मिलता है, तुम्हे कोई नौकरी नहीं बचानी है, तुम्हारे बच्चे नहीं है, तुम्हारे कोई लोन नहीं है देने के लिए, मेरा उनसे एक ही सवाल है कि अगर लोन  के लिए आए थे या नौकरी बचाने के लिए आए थे या पैसे कमाने के लिए आए थे तो फिर जर्निलिज़्म में क्यों आए, फिर कुछ और कर लेते। कुछ लोग हमें सनकी भी कहते हैं। लेकिन यह सफर जो है इस किताब का मैं आपको यकीन दिला सकती हूं कि ये यहीं पर नहीं खत्म होगा, ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने हमारा साथ दिया है, ऐसे कई लोग हैं जिनको मैं रोज़ देखती हूं, जिनके बारे में जानती हूं। रवीश के मेरे पास बड़े सारे वीडियो आते रहते हैं कि देखो एक बहादुर जनर्लिस्ट। कभी कभी चिढ़ भी हो जाती है कि आप लोग (मीडिया के लोग) जो हमें बहादुर कहते हैं हमारे कंधे पर बंदूक रखके चलाते हैं तो आप यह बहादुर कहना बंद कर दीजिए, पहले खुद बहादुर बनिये हम आपकी लड़ाई नहीं लड़ने वाले हम अपने जमीर को जवाब देने के लिए ये काम कर रहे हैं। आगे अपने जमीर को जवाब देने की लड़ाई आपको खुद लड़नी होगी।”

84 का जिक्र


दूसरे दौर की बातचीत में राना ने 84 और गुजरात दंगों की तुलना भी की। उन्होंने वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह की बात का उल्लेख किया कि अगर हम 84 को नरसंहार कहते तो 1993 नहीं होता, 1993 नहीं होता तो 2002 नहीं होता।

मीडिया पर सवाल


उन्होंने मीडिया पर भी खुलकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि आज जो कुछ हो रहा है या आज मोदी और अमित शाह जहां पर बैठे हैं उसकी जिम्मदारी या जवाबदेही हम पत्रकारों को भी लेनी होगी, क्योंकि आज भी हम मोदी और अमित शाह के बारे मे बड़ा खुसर-पुसर कर बात करते हैं, जोर से बात नहीं करते।
गौरी लंकेश को याद करते हुए उन्होंने कहा कि सारी पत्रकार बिरादरी के लिए कहा कि ये हमारे घर में घुसकर हमें मारने की इजाजत हमने खुद दी है क्योंकि हम कभी साझा थे ही नहीं।

इस किताब से डरिये मत : रवीश


वरिष्ठ पत्रकार और टीवी एंकर रवीश कुमार ने कहा कि हिंदी पट्टी में ऐसी किताबें आती हैं तो मुझे व्यक्तिगत रूप पर बहुत खुशी होती है। क्योंकि खुद भी इन सब चीजों को जानने के लिए संघर्ष  कर पहुंचना पड़ता है खासकर गुजरात की रिपोर्टिंग हो रही थी जब उस वक्त ज्यादातर लोग खासकर पत्रिकाएं जो एक हद से आगे जाकर जानने की कोशिश कर रही थीं वो अंग्रेजी की ही थीं। उन्हीं के जरिये चीजें पहुंच रही थीं तो हिंदी के प्रदेशों में इसके बारे में कम सूचनाएं हैं, धारणाएं बहुत हैं, तरह तरह की धारणाएं हैं चाहे वो झूठ हों चाहे वो सही हों, यह किताब उनको एक तरह से एंपावर (सशक्त) करेगी, उनको ताकत देगी, चीजों को फिर से लौटकर समझने की।

“हमें भूल जाने की आदत”


उन्होंने कहा कि भूल जाने की हमको आदत होती है, हर दंगे को हम भूल गए, हम बड़े बड़े दंगों को भूल गए, हम जब बिहार में होते थे तो लगता था कि भागलपुर का दंगा कोई नहीं भूलेगा लेकिन हम वो भूल गए, दिल्ली आए तो पता ही नहीं था कि इतना बड़ा नरसंहार इस शहर में हुआ है लेकिन उसको भी भूल गए, लेकिन कुछ लोग हैं जो उसकी याद को लेकर कहीं प्रदर्शन कर रहे होते हैं, इतनी ही संख्या में छोटी संख्या में लोग जमा हो रहे होते हैं और नारे लगा रहे होते हैं उसे याद दिलाने के लिए कि किसी नतीजे पर हम नहीं पहुंच सके।

रवीश ने कहा कि कई बार सोचता हूं कि हम क्यों भूल जाते हैं इन सब अपराध को। लगता है कभी कभी कि हम नेताओं के अपराध को जनता के तौर पर अपना अपराधबोध बना लेते हैं और उस अपराधबोध से भागने के लिए हम नेता के अपराध पर परदा डालने लगते हैं। उसे हर साल दर साल बड़ा करते चले जाते हैं। और नतीजा यह होता है कि वो पर्दा इतना बड़ा हो जाता है कि किसी किताब को फिर कहीं से लौटकर आना पड़ता है, किसी न्यायाधीश को जिस तरह अभी राम रहीम के मामले में जस्टिस जगदीप सिंह ने फैसला दिया कोई अकेला आता है और वो अपनी कलम चला देता है तो ये वो किताब है जिसपर कोई बात नहीं करना चाहता है। मैंने जब यह किताब पढ़ी थी तो मुझे लगा था कि इस किताब पर बात करने से लोग डरेंगे। उनके डर को मैं समझता हूं, यही इस किताब का मकसद है कि जब तक यह किताब है वो ये याद दिलाती रहेगी कि आप कुछ कहने से डर रहे हैं। और जब तक आपको याद है कि आप कुछ कहने से डर रहे हैं तो इस किताब का मकसद कामयाब है मेरी नजर से।

रूपक के जरिये साज़िश का परदाफ़ाश


रवीश ने मुख्य पृष्ठ (आवरण) के रूपक के माध्यम से राजनैतिक साजिशों की तरफ इशारा किया। उन्होंने कहा कि “मुझे लगता है कि एक छिपकली एक अंधेरी सुरंग के पास पहुंची है और अंदर कुछ साजिशों की आवाज आ रही है जिससे वह ठिठक  गई है और गर्दन उठाकर देखना चाहती है कि कोई यहां पर है या नहीं मेरे अलावा कोई जानता है या नहीं। तो मैं इसे इस रूप में देखता रहता हूं तो उसी छिपकली के रूप में यह किताब है। तो तकलीफ होगी। अगर लोगों को इमरजेंसी पर फिल्में बनाने से फुर्सत हो गई हो मेरी राय में वो गुजरात फाइल्स पर भी फिल्में बना सकते हैं।”

“गुजरात दंगों का दस्तावेज़”


रवीश ने कहा कि “उस समय अविश्वास के माहौल में जो खूनी खेल खेला जा रहा था मुझे लगता है कि उसका ये दस्तावेज़ है। इसके प्रथम पाठक कौन होने चाहिए इसके पाठक वो होने चाहिए जिन्होंने गुजरात दंगों में सज़ा पाई है चाहे वो हिंदू परिवार हों या चाहे मुस्लिम परिवार हों, मेरे लिए बेहतर स्थिति यही है कि मैं उनको पढ़कर सुनाऊं और देखना चाहता हूं कि उनकी अपनी प्रतिक्रिया क्या है। यह अधूरी किताब है क्योंकि इसे किसी और को पूरा करना है, वो अभी विपक्ष को निपटाने में लगी है सीबीआई, वो एक राष्ट्रीय जिम्मेदारी का काम कर रही है आजकल, उसने अभी तक लोअर कोर्ट के जो फैसले हैं उनको शायद चुनौती नहीं दी है, कौसर बी का पता नहीं है, नजीब का भी पता नहीं है, तो बहुत सारे सवाल हैं और अक्सर जब भी वंजारा साहब को तलवार लेकर नाचते देखता हूं घबराहट होती है। मुझे डर लगता है कि वो शायद हमारी हैवानियत का एक ऐसा प्रतीक है जो हमे ललकार रहा है कि लो हमारी तलवारें खून से सनी हुई हैं भले ही अदालतों ने हमें बरी किया है। लेकिन उनके नाचने का अंदाज बहुत डरावना है।


“मैं चाहूंगा जो हिंदी के पत्रकार हैं इस किताब पर प्रोजेक्ट रिपोर्ट करें और कोई न भी दे तो प्रोजेक्ट रिपोर्ट करके अपने प्रोफेसर साहब को दे दें कि ठीक लिखा है या नहीं लिखा है। और उम्मीद करता हूं कि इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन के जितने भी जनर्लिजम के कोर्स हैं वहां पर यह किताब होगी।


मेरा यही कहना है कि इस किताब से डरिये मत। मुझे यकीन है कि राना ने स्टिंग के दौरान तहलका और हिंदू की कापी जिस कमरे में देखी थी उनके कमरे में यह किताब होगी।”


विपक्षी दलों से भी सवाल


रवीश ने कहा कि आज भी बिहार में भी उसी तरह से है, यूपी में भी उसी तरह से है और गुजरात में भी ऐसा नहीं कि उसी वक्त था आज भी वही काम हो रहा  होगा, उसी तरह साजिशें रची जा रही होगी तो यह ज्यादा याद दिलाने की जरूरत है कि लीगल स्टेटस इस केस का क्या है, क्यों नहीं विरोधी राजनीतिक दल हैं वो मांग करते कि इस मामले की अभी तक क्यों नहीं बड़ी अदालत में अपील की गई है। कुछ आता है फिर सब गायब हो जाता है कुछ भी कानूनी चीज आगे नहीं बढ़ती है, हमें एक अच्छे पाठक होने के नाते यही जिम्मेदारी निभा देने की जरूरत है कि कि हम उन पहलुओं को जाने और कम से कम दस लोगों को बता दें।

किसी केस में अपील नहीं : वृंदा ग्रोवर


इस मौके पर वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर ने कहा कि सीबीआई किसी मामले में अपील नहीं डाल रही, कौन सवाल पूछेगा उससे, जाहिर है देश के गृहमंत्री ही पूछ सकते हैं हमें नहीं मालूम की क्या बातचीत चल रही है उनके बीच में लेकिन अपील किसी केस में नहीं डाली जा रही है।

84 और 2002 के दंगे अलग : पंकज बिष्ट


कार्यक्रम में वरिष्ठ लेखक-पत्रकार पंकज बिष्ट ने कहा कि “मैं जिस भाषा से आता हूं और एक लेखक के नाते भी मैं मानता हूं कि किसी किताब का महत्व या कोई समाज या उसकी विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि उस समाज या भाषा का मीडिया उसे किस तरह लेता है, किस तरह से वो बताता है अपने पाठकों को, अपने समाज को कि यह किताब क्या है और इसका क्या महत्व उनके लिए हो सकता है। जैसी हालत आज के हिंदी मीडिया की है, हालांकि अंग्रेजी मीडिया की भी बहुत अच्छी हालत नहीं है लेकिन उसकी तुलना में हिंदी मीडिया की जो हालत है तो बड़ा शक होता है। इसके बावजूद मैं मानता हूं कि एक हिन्दी में भी एक बड़ा समाज है जो बेचैन है, जो चीजों को जानना चाहता है, समझना चाहता है। अपनी बातचीत में उन्होंने 1984 और 2002 के दंगों के अंतर को भी स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि वो (1984) दंगा एक हद तक अचानक स्वत शुरू हुआ था, वो करवाया नहीं गया था, बाद में उसको भड़काया गया, इसमें कहीं कोई शक नहीं है, मैं उसका विरोध आजीवन करता रहा हूं, लेकिन गुजरात का जो दंगा हुआ उसका आज तक यह फैसला नहीं हो सका कि गोधरा में उस गाड़ी में आग कैसे लगी, इसके बारे में आज तक कोई अंतिम निर्णय नहीं है कोई फैसला नहीं है, ये बताता है कि यह पूरी की पूरी घटना संदेह के दायरे में है। इसलिए मैंने कहा कि आजाद भारत के इतिहास में इससे बड़ा ऑर्गनाइज़ क्राइम (संगठित अपराध) जिसमें राजनीति है, ब्यूरोक्रेसी है, जिसमें मीडिया इनवाल्व है और बाद में ज्युडेशरी (न्यायपालिका) इनवाल्व है। ऐसा लग रहा है कि इस लोकतंत्र की सारी संस्थाए एक साथ अपनी विश्वसनीयता खो रही हैं। ये सब तभी बचेगी जब लोग उठेंगे। ऐसे छोटे छोटे प्रयास और होंगे।

ताकि बनी रहे लहूलुहान याददाश्त : अजय सिंह


प्रकाशक गुलमोहर किताब की ओर से वरिष्ठ कवि और पत्रकार अजय सिंह ने इस किताब की हिंदी में जरूरत को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि गुलमोहर किताब की ओर से इस किताब का हिंदी अनुवाद इसलिए लाया जा रहा है ताकि हम गुजरात-2002, को हरगिज़ न भूलें और उसे अपनी लहूलुहान याददाश्त का हिस्सा बराबर बनाए रखें। मानवता के खिलाफ अपराध करने वाले असली गुनाहगारों को सज़ा मिलनी अभी बाक़ी है।


कार्यक्रम का संचालन पत्रकार भाषा सिंह ने किया। इस मौके सवाल-जवाब का भी छोटा सा दौर हुआ। कार्यक्रम में यह उपलब्धि रही कि इसमें वरिष्ठ लेखक, पत्रकारों के साथ बड़ी संख्या में युवा खासकर पत्रकारिता के छात्र भी मौजूद रहे।
साभार: जनचौक 

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जन्मदिन पर जनता को दिया जल समाधि का तोहफा

आज भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जन्मदिन पर सरदार सरोवर बांध के 30 दरवाज़े खोल कर इस परियोजना का उदघाटन किया. हालांकि इसका एक परिणाम जहां कुछ राज्यों को मिलने वाली ऊर्जा की सुविधायें हैं तो दूसरा परिणाम है, कई गांवों का जलमग्न हो जाना. इस कहानी का सच यह भी है कि इन डूब रहे गांवों के विस्थापितों का समुचित पुनर्वास नहीं हुआ है. इसीलिए  सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर अपने सहयोगियों के साथ मध्य प्रदेश के छोटा बड़दा गांव के घाट पर जल सत्याग्रह कर रही हैं. नर्मदा बचाओ आंदोलन की संस्थापक मेधा पाटकर सहित 30 से ज्यादा महिलाएं जल सत्याग्रह कर रही हैं. उनका आरोप है कि बेहतर पुनर्वास किए बिना सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाने से बड़ी संख्या में लोग विस्थापित होंगे. मेधा पाटकर ने कहा है कि जल समाधि ले लेंगे लेकिन इस जगह को खाली नहीं करेंगे.
मेधा का आंदोलन अभी भी जारी है, सरकार ने उन्हें नजरबंद कर रखा है

मेधा पाटकर का सरकारी उत्पीड़न जारी
सरदार सरोवर का जलस्तर बढ़ाने से मध्य प्रदेश के 192 गांव पूरी तरह डूब जाएंगे. वहीं रविवार को अपने जन्मदिन पर प्रधानमंत्री नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध के 30 दरवाज़े खोले. ज्ञात हो कि सरदार सरोवर का जलस्तर बढ़ाने से मध्य प्रदेश की नर्मदा घाटी स्थित धार, बड़वानी, सहित अन्य इलाकों के 192 गांव और एक नगर का डूब में आना तय माना जा रहा है. धीरे-धीरे जल स्तर बढ़ रहा है और कई गांवों में पानी भी भरने लगा है. इसके बावजूद प्रभावित गांव के लोगों ने अब तक घर नहीं छोड़े हैं.




समाज, संसाधन और संविधान बचाने के लिए एकजुट हों – मेधा पाटकर
बेहतर पुनर्वास और मुआवजा दिए बिना सरदार सरोवर की ऊंचाई बढ़ाए जाने का लोग विरोध कर रहे हैं. इसी के तहत मेधा पाटकर ने शुक्रवार से सत्याग्रह शुरू किया, वे नर्मदा नदी के छोटा बड़दा गांव के घाट पर बैठी हैं, जहां पानी लगातार बढ़ रहा है, स्थिति यह है कि उनका सत्याग्रह जल सत्याग्रह में बदल गया है. मेधा ने उद्घाटन से पूर्व कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन को धूमधाम से मनाने के लिए हजारों परिवारों की जलहत्या की तैयारी हो रही है. यह कैसा जश्न है कि एक तरफ लोग मरने की कगार पर होंगे और गुजरात में 17 सितंबर रविवार को जश्न मनाया गया. यह दिन देश के सबसे बुरे दिनों में से एक होगा.

मुल्‍क में बड़े जन आंदोलन की जमीन तैयार हो रही है: मेधा पाटेकर
सवाल है कि क्या लोकतंत्र में राज्यों का यही आचरण होगा कि विकास के नाम पर हजारो लोग जल-समाधि के लिए मजबूर किये जायेंगे? क्या प्रभावितों के बिना समुचित पुनर्वास के ऐसी योजनाओं के लिए राजहठ जनता के खिलाफ राज्य का निर्णायक युद्ध और अधिनायकवाद नहीं है.

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जन्मदिन पर झूठ, फर्जी जश्न और निर्दोषों का घर-बदर: क्या खूब मोदी जी!

1. सरदार सरोवर बाँध की ऊँचाई 138.68 मीटर है और वह 1979 में नर्मदा ट्रिब्यूनल में दिए गए फैसले के              अनुसार तय हुई। 1961 में पंडित नेहरु ने जो शिलान्यास किया था वो मात्र 162 फीट उचाई बाँध का था              जिसमें मध्यप्रदेश का कोई डूब क्षेत्र नहीं होना था, इसलिए आज सरदार सरोवर को 56 साल पुराना नहीं कह      सकते, 38 साल पुराना कह सकते हैं।

2. इस बाँध को बुनियादी अभ्यास और नियोजन के अधूरा होते हुए तमाम शर्तों के साथ 1987 में पर्यावरणीय        मंजूरी दी गयी लेकिन आज तक उन शर्तों की पूर्ति भी नहीं हुई है। सन 2000 तथा 2005 के सर्वोच्च अदालत      के फैसले से भी यह बात साबित होती है क्योंकि पुनर्वास और अन्य मुद्दों पर भी बाँध का कार्य आगे बढाने की     मंजूरी सशर्त ही दी गई है।



3. सरदार सरोवर से 214 किलोमीटर तक फैले 40 हज़ार हेक्टेयर क्षेत्र के जलाशय से मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र             और गुजरात राज्यों के 244 गाँव और एक नगर धरमपुरी प्रभावित हैं जिसकी बात सालों से चलती आई है।         इसमें मध्यप्रदेश के 192 गाँव और एक नगर है। कुल प्रभावित परिवारों की संख्या बार-बार बदली गयी है           जिसे गेम ऑफ़ नंबर (संख्या का खेल) उच्चतम न्यायालय ने भी (2005) उजागर किया है।


4. 2008-2010 के दौरान अवैज्ञानिक रूप से एक तकनीकी समिति द्वारा न ही केन्द्रीय जल आयोग द्वारा बैक     वाटर लेवल कम करने के सम्बन्ध में जो निर्णय लिया गया उसे केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ             कमेटी ने नकारा, फिर भी मध्यप्रदेश और केंद्र शासन ने मिलकर 15,946 परिवारों को उनके मकानों का             भूअर्जन हो कर नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के नाम नामांतरण होने के बावजूद डूब के बाहर घोषित किया    और उन्हें आधे-अधूरे पुनर्वास का लाभ देकर छोड़ दिया। आज भी इनका भविष्य अनिश्चित है जबकि कई के     द्वार से 129 मीटर पानी आ चुका है।


5. आज भी डूब क्षेत्र में करीबन 40 हज़ार परिवार निवासरत हैं जबकि 2008 से मध्यप्रदेश एवं केंद्र के                     प्राधिकरणों ने सभी का पुनर्वास पूरा हुआ यानि जीरो बैलेंस का झूठा दावा उच्चतम न्यायालय तक अपने            शपथ पत्रों में एवं वार्षिक रिपोर्ट में किया गया।


6. आज के रोज़ उच्चतम न्यायालय के 1992, 2000, 2005 के फैसले और ट्रिब्यूनल के भी फैसले का पुनर्वास  पालन आज तक नहीं हुआ है। गुजरात और महाराष्ट्र में ज़मीन के साथ करीबन 15 हज़ार परिवारों का पुनर्वास  किया जिसमे भी त्रुटियाँ हैं और सैकड़ों परिवारों का पुनर्वास बाकी है इसलिए संघर्ष जरी है। गुजरात के सैकड़ों  विस्थापित आज भी केवड़िया कॉलोनी में बाँध के पास 1 साल तक क्रमिक अनशन करने के बाद धरना  कार्यक्रम चला रहे हैं।

7.मध्यप्रदेश में उच्चतम न्यायालय ने ज़मीन की पात्रता के अनुसार 2 हेक्टेयर खरीदने के लिए 60 लाख और     15 लाख रूपए के जो पैकेज फरवरी 2017 में आदेशित किये उसका लाभ आधा लाभार्थियों को नहीं मिला है        तथा 88 पुनर्वास स्थलों पर बुनियादी सुविधाएं भी तैयार नहीं हैं| सैलून से भ्रष्टाचार हुआ है और शुरू हुआ कार्य  भी अधिकांश अस्थायी पुनर्वास का है, स्थायी का नहीं| जैसे टिन शेड, चारा भोजन इत्यादि देने की बात है।  करोड़ों रूपए के कार्य अभी-अभी नियोजित हो रहे हैं और होने वाले हैं।


8. गाँव भरे पूरे हैं, उपजाऊ खेती, हजारों घर, हजारों पेड़, दसों धार्मिक स्थल, हजारों मवेशी, तमाम सुविधाएं       होते  हुए कम से कम निमाड़ मध्यप्रदेश के 192 गाँव और धरमपुरी नगर जीवित हैं जिसे उखाड़ने की बात 139   मीटर पानी भरने से होगी इसलिए संघर्ष जारी है। आज के रोज़ कई महीनो से सशक्त संघर्ष, दमन, जेल             इत्यादि भुगतने के बावजूद हजारों महिला-पुरुषों के संघर्ष करने पर 900 करोड़ का पैकेज घोषित हो चुका है     लेकिन उसमें भी भ्रष्टाचार है और अमल नहीं के बराबर।

पर्यावरणीय


1.1987 में दी गयी पर्यावरणीय मंजूरी में अमल बाकी है जिसमे बाँध के निचले वास पर असर, घाटी में स्वा.स्य्ं   पर असर, बाँध में गाद न भरने के लिए जलग्रहण क्षेत्र का उपचार, भूकंप का खतरा व पुनर्वास योजना आदि  शामिल हैं।

2.पर्यावरणीय कार्यपूर्ति के दावे झूठे साबित हो चुके हैं लेकिन सरकार ने झूठी रिपोर्ट के आधार पर बाँध की           ऊँचाई हर बार बढ़ाई है। उदाहरणत:, मध्यप्रदेश के डूब क्षेत्र में कुछ हज़ार मंदिर, धार्मिक स्थल होते हुए      सरकार ने सिर्फ तीन ही मंदिर के स्थानांतरण होने का झूठा आधार लिया गया है। कुछ दस लाख पेड़ों की कटाई   नहीं हुई न ही वैकल्पिक वनीकरण।

3. दुनिया की सबसे पुरानी घाटी होते हुए नर्मदा घाटी के डूब क्षेत्र में सभी युगों के अवशेष उत्खनन करना बाकी      होते हुए मानवीय इतिहास डुबाया जायेगा।


सरदार सरोवर के लाभों में विकृति


1. मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र राज्य पानी के लाभ बिलकुल न पाते हुए मात्र 56% और 27% (अनुक्रमिक) बिजली          का हिस्सा उन्हें मिलना है लेकिन महाराष्ट्र ने भी 1800 करोड़ की नुकसान भरपाई मांगी है।

2.गुजरात में पानी के लिए कोका-कोला, कार फैक्ट्री इत्यादि अडानी-अम्बानी उद्योग व औद्योगिक गलियारों     के क्षेत्रो को प्राथमिकता दी जा रही है, गाँवो को व सूखाग्रस्तों को नहीं। कच्छ और सौराष्ट्र के तालाब इस साल   लबालब भरे हुए हैं तो पानी की तत्काल ज़रूरत अभी नहीं है। मध्यप्रदेश में बिजली के प्लांट बने हुए हैं क्यों कि  ज़रूरत से अधिक बिजली का निर्माण हो रखा है इसलिए राज्य को बिजली की ज़रूरत इस वक्त नहीं है फिर   भी गुजरात के चुनाव के मद्देनज़र बाँध परियोजना को पूरा घोषित करते हुए उसका उद्घाटन कर दिया जायेगा।

आर्थिक लाभ-हानि


1. 1983 में 4200 करोड़ की लागत बता कर जिसकी लाभ हानि का अभ्यास किया गया था तथा 1988 में 6400      करोड़ रूपए की लागत को योजना आयोग ने मंजूरी दी थी उसके बाद आज की बढती लागत 99000 करोड़ तक    पहुच चुकी है। खबर है कि करीबन हज़ार करोड़ रूपए का घाटा हुआ है। आज की लाभ-हानि का निश्चित            ब्यौरा भी सामने नहीं है।


2.गुजरात में 41,000 किलोमीटर की नहर का निर्माण बाकी है इसलिए सिंचाई का लाभ 20-30 प्रतिशत ही मिल    पाया है और पानी उद्योगों को देने के लिए वो पाइपलाइन योजना भी आगे धकेली जा रही है।

अपने जन्मदिन पर  सरदार सरोवर बांध का फर्जी  लोकार्पण कर ही दिया मोदी जी आपने !

मेधा पाटकर, कमला यादव, दयाराम यादव, पवन यादव, आनंद तोमर, विनोद भाई, सपना कनहेरा, कमेंद्र मंडलोई, सुमित यादव
(एनएपीएम की प्रेस विज्ञप्ति)
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