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नृत्यमय जगत और अन्य कविताएँ

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स्वरांगी साने

 साहित्यकार, पत्रकार और अनुवादक स्वरांगी की रचनाएं  विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. संपर्क : swaraangisane@gmail.com



सारंगी वादक उस्ताद मोइनुद्दीन खाँ  दुनिया से रुख्सत हो गये , उन्हें समर्पित  स्वरांगी साने की कविताएँ 

1.
कभी देखा है किसी को सौरंगी (सारंगी) बजाते हुए
लगता ही नहीं
सौरंगी बज रही है
देह से सटी होती है सौरंगी
और लगता है देह बज रही है ।

सौरंगों को एक साथ गूँथ लिया है उसने
पूछतेहैं –कोई अच्छा सौरंगी बजाने वाला है
नाम आता है उसका
जिसने मांझ लिया है गज को देह के साथ
सेतु बन गया है गज
जिससे
उसकी देह के पार की यात्रा शुरू हो गई है ।

2.
तबले पर थिरक रही हैं
अंगुलियाँ
चेहरे पर मुस्कान
यह ‘स्व’ का आनंद है
जो उसे बना रहा है ‘तबलची’ से ‘तबला नवाज़’
‘झपताल’ के
‘धीना धी धीना’
का लड़कपन है
तो ‘धमार’ का
‘क धि ट धि ट धाs’
का संयत भाव भी।
इस ‘धा’ पर सम आई है
गर्दन हिलाकर बता रहा है वह
और इस ‘तिरकिट’ पर
घूमी हैं अंगुलियाँ
उसकी गर्दन और चेहरे का स्मित हास्य भी

क्या है ऐसा
जो तबला बजाते हुए
उसे आनंदित कर रहा है
नाच रहा है उसका
ऊर्ध्व शरीर
ऊर्ध्व की ओर हो रही है उसकी गति
उसके लिए यह मोक्ष का सोपान है।

3.
मुखमोर-मोर मुस्कात जात’
गा रही है गायिका मालकौंस में
अर्र्धनिमीलित हैं उसकीआँखें
शब्दों से नहीं
तान के उतार-चढ़ाव से
बदल रही हैं उसके चेहरे की
भाव-भंगिमाएँ
यदि इसकी जगह वह गाती
‘ठुमक चलत रामचंद्र’
तब भी उसके चेहरे पर वही शांत भाव होता
जो
‘भोर भई अब आए हो, रैन कहाँ बिताई’
गाते हुए होता।

गायिका को न शब्दों का उपालंभ चाहिए
न उनके अर्थों की व्यंजना
उसके लिए शब्द से भी ज़्यादा ज़रूरी है
स्वर, आरोह-अवरोह
वह स्वरों में खो रही है
वही है उसका परमानंद, उसका मोक्ष।

अनचिन्हा कोलाज़….स्वरांगी साने की कविताएँ

4.
सितार के मिज़राब
अँगुलियों में अँगूठियों की तरह पहने हैं
खींच-खींच कर बजाई जाती है सितार
एक विशिष्ट आसन में बैठकर
और खुद ही मुँह से निकलता है ‘क्या बाsत’
यह उस तार के खींचने का उन्माद नहीं होता
न ही यह होता है उस तुंबे का स्पंदन
उस झाले पर भी नहीं कही गई होती है यह बात

यह उस क्षण को जी लेने का आनंद होता है
जिसे जिया होता है
उसने अभी
खुद को खोते हुए।

5.
… और
और देखा है मुरली बजाते हुए उसे
शरीर पर कितने वक्र पड़ते हैं
पर कितने प्यार से बजाता है वह बंसी
नीर वशांतिका रहस्य
क्या केवल कृष्ण जानता है ?
नहीं
वह भी जानता है
जो बैठकर बजाता है बाँसुरी
और खो जाता है निराकार में ।

6.
इन सबके साथ
तो कभी अकेले ही
नाचती है नर्तकी
उसकी आँखें बंद नहीं होतीं
हरक्षण की सजगता उसके साथ होती है।

आमद का ‘धातकथुंगाs’
करते हुए वह अभिनय करती है
साकार कर देती है शिव-पार्वती।
वह
हर शब्द के भाव को पकड़ती है ऐसे
जैसे कि उस शब्द का वही अर्थ हो
‘लाली मेरे लाल की’ कहते हुए वह अपने लाल-गोपाल को दिखाती है
तो सूर्य की और होठों की भी लालिमा दिखा देती है

उन छोटे-छोटे बोल-टुकड़ों को
वह इतने प्यार से बरतती है
जैसे पैरों से निकाल रही हो मक्खन
दूसरे ही क्षण किसी कवित्त में
वह राधा बन छीन ले जाती है बाँसुरी

एक ही बार में वह
क्या-क्या करती है
उलाहना देती है
तो कभी बिनती करने लगती है
‘मोहे छेड़ो न कन्हाई’

वह नृत्य करती है
देखती है तबले की ओर
होती है तबले और घुंघरुओं की जुगलबंदी
पखावज के नाद में रमण करती है
स्तब्ध हो जाता है वह क्षण
तभी वह देखती है सौरंगी को
और एक टीस सीधे
उसके दिल को चीर जाती है
तानपूरे से भरती है
वह पूरा व्योम
तानपूरे पर चलती चार अँगुलियों से
चारचरणोंकोपारकरजातीहै

बाँसुरी की तान में
वह करती है एकपल को आँखें बंद
शुरू होती है भैरवी
खोल देती है आँखें तुरंत।

अहीर भैरव के साथ
सुबह की उजास
उसके चेहरे पर होती है
दमकती है वह
दमकता है नृत्य
ताल-लय स्वर
और सारे साज़-साज़िंदे
वह पूर्ण परिक्रमा करती है
परिधि पर एक ओर
खड़ी हो जाती है पृथ्वी
पृथ्वी के कक्ष में घूमने लगती है नर्तकी
नर्तन हो जाता विश्व
कीर्तन हो जाता है संसार
जहाँ कुछ विषम नहीं होता
सब सम हो जाता है
‘सम’ पर विराम पाता है।

फुटनोट/ पादटिप्पणी
1- बो, जिससे सौरंगी को बजाया जाता है
2- प्रत्येक ताल की पहली मात्रा। इसी से प्रारंभ होता है, इसी पर अंत
3- रात्रि के अंतिम पहर का एकराग
4- जिसे पहन कर सितार बजाई जाती है
5- पीछे गोलाकार गुबंद
6- द्रुतगति सेब जाना, आमतौर पर इससे समापन किया जाता है
7- प्रारंभ
8- काव्यमय रचना जिसे ताल-लय में पिरोया गया हो
9- सर्वकालिक राग पर आमतौर पर अंत में गाया जाता है
10- दिन के प्रथम पहर का राग

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क्या भारत की बेटी है सिंगापुर की पहली महिला राष्ट्रपति (!)



सिंगापुर में बिना मतदान ही हलीमा याकूब को देश की पहली महिला राष्ट्रपति चुन लिया गया है। हालांकि, अब इस निर्वाचन को अलोकतांत्रिक बताकर लोग इसकी आलोचना कर रहे हैं। दरअसल, हलीमा को राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव का सामना इसलिए नहीं करना पड़ा क्योंकि प्रशासन ने इस पद पर खड़े होने के लिए उने विरोधियों को अयोग्य करार दिया था।

मुस्लिम मलय अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाली हलीमा याकूब संसद की पूर्व अध्यक्ष हैं। हालांकि, सिंगापुर में पहली बार ऐसा नहीं हो रहा है कि सरकार ने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों को आयोग्य करार दिया है जिसके बाद चुनाव अनावश्यक हो गया है। यहां दशकों से एक ही पार्टी सत्ता में है। देश में पहले से ही चुनाव की प्रक्रिया को लेकर अशांति थी क्योंकि ऐसा पहली बार हो रहा था जब खास जातीय समूह मलय समुदाय के लिए राष्ट्रपति पद आरक्षित कर दिया गया था लेकिन बिना वोट के ही हलीमा के हाथ में सत्ता सौंपने के फैसले ने लोगों को गुस्सा और बढ़ा दिया।

औपचारिक रूप से राष्ट्रपति बनने की घोषणा होने के बाद 63 साल की हलीमा की आलोचना सोशल मीडिया पर हो रही है। एक फेसबुक यूजर पेट इंग ने लिखा, बिना चुनाव के निर्वाचित, क्या मजाक है। राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने से पहले हलीमा सत्तारूढ़ ऐक्शन पार्टी से पिछले दो दशक से संसद सदस्य थी। हलीमा ने कहा, मैं सभी लोगों की राष्ट्रपति हूं। हालांकि चुनाव नहीं हुआ लेकिन आपकी सेवा करने की मेरी प्रतिबद्धा पहले जैसी ही है।

सिंगापुर की पहली महिला राष्ट्रपति  हलीमा एक मायने में ‘भारत की बेटी’हैं।  उनके अब्बा हिंदुस्तानी थे।  मुसलमान. चौकीदार थे. सरकारी मुलाजिम थे. हलीमा जब 8 साल की थीं, तब उनके अब्बा का  इंतकाल हो गया. पिता की मौत के बाद उनके परिवार को सरकारी क्वॉर्टर से जबरन बाहर निकाल दिया गया।  अम्मी पर परिवार की जिम्मेदारी आ गई।  अम्मी ने ठेली लगाकर परिवार का गुजारा चलाया।  मीडिया से बात करते हुए हलीमा ने खुद अपनी दास्तां सुनाई थी. उनकी अम्मी मलय समुदाय से हैं।  हलीमा के अलावा उनके चार और बच्चे भी थे. इनमें सबसे छोटी हैं हलीमा। मलय एक खास सांस्कृतिक समूह है। ये लोग ज्यादातर मलयेशिया, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, ब्रूनेई, सिंगापुर और दक्षिणी थाइलैंड के इलाकों में रहते हैं।

बहुत गरीबी में गुजरा बचपन


छोटी सी हलीमा भी मां की मदद करती थीं। सुबह 5 बजे जगकर मां के साथ लग जातीं।  बाजार जाकर सामान खरीदतीं. फिर स्कूल जातीं. क्लास में पिछली बेंच पर बैठतीं। नींद पूरी तो होती नहीं थी।  तो एक बार क्लास में ही सो गईं. उन्हें क्लास की खिड़की से बाहर झांकना बहुत पसंद था।  खुली आंखों से सपना देखना बहुत भाता था उनको।

नवभारत टाइम्स और लल्लन टॉप से साभार 




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अनचिन्हा कोलाज़….स्वरांगी साने की कविताएँ

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स्वरांगी साने

वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार और अनुवादक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित. संपर्क : swaraangisane@gmail.com



अनचिन्हा कोलाज़

(1)
वह आईना देखती है
घूरता है कोई और उसे
आईने में देखते हुए
तौलता है उसकी छवि को
उसके चेहरे के भावों  केसाथ।

वह हटा देती है दर्पण
भय छा जाता है उसके चेहरे पर।

(2)
हँसती है
और लगता है
कोई खड़ा है ठीक उसके पीछे लाठी लिए हुए
जिसकी मार से चीत्कार उठेगी वह।

और तुरंत वह
हँसना बंदकर देती है।

(3)
कहीं दूर बजती है कोई धुन
वह याद करती है उस गीत को
गुनगुनाने को ही होती है कि गुर्राता है कोई
गला रुँध जाता है उसका
वह होंठ सील लेती है।

(4)
वह लिखती है कविता
उसके लिखे शब्दों के
अन्वयार्थ लगाता है कोई
यह नए अर्थ
उसके लिखे को निरर्थक कर देते हैं
कतरनी चला देती है सारे कागज़ों पर।

(5)
नाचती है
और उसकी ठुमक को
बाज़ार के ठुमकों से जोड़ दिया जाता है
कुत्सित आँखें भेद देती हैं उसकी लय
बेताला न होजाए
इस डर से
उतार देती है घुँघरू
जैसे उतार देती है प्राणों को
देह से

(6)
वह आईना नहीं  देखती
वह हँसती नहीं, गाती नहीं
कुछ नहीं रचती, कभी नहीं नाचती
पड़ी रहती है
जैसे पड़े रहते हैं माटी के ढेले,
खुद ही किसी दिन लुढ़क जाने या बह जाने को

(7)
वह डस्टबिन हो जाती है
सब उसमें अपना कूड़ा डाल देते हैं
वह पीकदान हो जाती है
थूक कर चल देते हैं लोग आगे
ऐश ट्रे हो जाती है
झाड़ देते हैं उसमें राख हर आते-जाते
वह डोर मैट हो जाती है
पैरों तले आती है
झटक देते हैं लोग उस पर सारी धूल-मिट्टी

(8)



वह दमकना चाहती है
वह उड़ना चाहती है
वह देदीप्यमान होना चाहती है
वह बहना चाहती है
पर
सूर्य
पवन
अग्नि
सलिल
सब पुरुष वाची हैं
और इन सब में वह स्त्री है।

वह चुप्पी ओढ़ लेती है
मौन धर लेती है
उसका रुदन भीतर ही भीतर
नदी बन बहता है
प्रतीक्षा में
प्रलय की
जो कर देगा तहस-नहस
उसे भी और उसपर लगे सारे बंधनों को भी।

वह किसी
पुरुष की प्रतीक्षा में होती है
और
उसके भीतर का सृजन विध्वंस की बाट जोहता है।

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लापता लड़की

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अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने महत्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

कहानी तो बस इतनी ही है कि वह लड़की घर लौटने के बाद, सारी रात सपनों का सफेद स्वेटर बुनती और सारा दिन दफ्तर में ऊंघते-ऊंघते उधेड़ती रहती। इस उधेड़बुन में उसे यह पता ही नहीं चला कि उसने कब मेंहदी हाथों में रचाने की बजाए, बालों में लगानी शुरू कर दी थी।

कहानी के इस कंकाल में मुझे सिर्फ लड़की का ‘बायोडॉटा’ भरना है। मांस (गोरा या काला) और खून, (उच्च, मध्यम या निम्न) आवश्यकतानुसार भरा या बदला जा सकता है। अगर रंगभेद न करना चाहें तो मान लें कि वह एक सांवली लड़की थी मगर दिखने में आकर्षक नैन-नक्श वाली (बदसूरत नायिका का साहित्य में क्या काम)। जब तक वर्गविहीन समाज की स्थापना हो, तब तक इसे मध्यवर्गीय परिवार की लड़की समझ लेते हैं। धर्म (हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई) कुछ भी हो, शादी के बाद पतिधर्म में विलीन हो जाएगा। इसलिए लड़की के पिता हिन्दू और मां मुस्लिम थी। खुद न मंदिर जाती है न मस्जिद। जन्म जिस गांव में हुआ था वह न जाने कब ‘डूब’ गया? शिक्षा-दीक्षा कस्बे में हुई और फिर कस्बे की लड़की राजधानी पहुंच गई। (लिफ्ट लेते-लेते।)
लड़कियों (औरतों) के अपने घर भी कहां होते हैं? वह तो अक्सर पिता या पति (और उनके मर्द वारिसों) का ही होता है न। इस लड़की का घर तो न पिता का है और न पति का- किराए का है। सपने बुन-बुन उधेड़ती रहती है लड़की। सपने बुनेगी तो उधेड़ने भी पड़ेंगे। दफ्तर-सरकारी, गैर सरकारी, अखबार, एड एजेंसी, ट्रेवल एजेन्ट, प्रॉपर्टी डीलर या शेयर ब्रोकर कोई भी हो सकता है और दफ्तरों में ऊंघती ही हैं लड़कियां (लड़के भी)। ब्याही हों या अनब्याही-क्या फर्क पड़ता है?

ओह! लड़की का नामकरण संस्कार तो रह ही गया। कुछ भी रख लो फ़रहा शर्मा या सावित्री खान। पसंद नहीं तो आकांक्षा या मुक्ता या फिर सभी नामों के बीच उर्फ भी लगाया जा सकता है। वैसे भी लड़की बदलती रही है नाम, घर, धर्म, नौकरियां, संबंध, सपने, शहर, देश-हर बार घर की कैद से भागने की कहानी के बाद। जब-जब भागी है लड़की जिंदगी के घुन लगे फ्रेम और परंपरा की चौखट तोड़कर, तब-तब कुछ दिनों के हल्ले और भागदौड़ के बाद फिर से पकड़ी गयी है। (जिंदा या मुर्दा) दरअसल घर से भागी लड़कियां फौरन पहचान ली जाती हैं और नायक (खलनायक) अक्सर भाग खड़ा होता है।

नौकरी की तलाश में राजधानी पहुंची इस लड़की को हॉस्टल में कैसे जगह मिली, वह मैं ही जानता हूँ। यहां सभी लड़कियां (ज्यादातर) चिरकुंआरी, तलाकशुदा या विधवा। हर एक का तथ्य और सत्य मिलता-जुलता-सा। ऐसी ही लड़कियों के लिए बने हैं हॉस्टल और हॉस्टल में जीवन भी ऐसी ही लड़कियों से है। लड़कियों को लगता है जैसे हॉस्टल घर और घर हॉस्टल बन गया है।

वह सुबह निकलती नहा-धो और नाश्ता करके दफ्तर। कभी-कभी पैदल ही। सारे रास्ते सिगरेट फूंकते हुए और अपने आप से बात करते हुए। पीछे मुड़कर वह कभी देखती ही नहीं थी। शाम को पढ़ने या पढ़ाने जाती और रात देर गए लौटती तो कमरा नम्बर 69 में मेज पर ठंडा खाना रखा होता… कभी खुद खा लेती और कभी कुत्तों को खिला देती। बहुत दिनों तक तो उसे समझ ही नहीं आया कि लड़कियां उसे मिस सिक्स्टी नाइन क्यों कहती हैं। और जब पता लगा तो वह ऐसे बेहूदा आरोपों से परेशान हो उठी। कमरे का नम्बर तो कुछ समय बाद बदल गया लेकिन उसे अभी लगता था जैसे ‘सिक्स्टी नाइन’ का बिल्ला उसकी देह पर चिपक गया है। ठीक वैसे ही जैसे कॉलेज के दिनों में ‘टच-मी-नॉट’ का स्टीकर चिपक गया था।

स्लीपिंग पार्टनर

वहीं रहते हुए रात-रात भर जाग कर उसने ‘सैकेंड सेक्स’ से लेकर ‘सेक्स” और “मदर’ और “सूटेबल ब्यॉय” तक पर चिंतन किया (और चिंता भी)। फिल्म और नाटक देखने बहुत दूर नहीं जाना पड़ता था। हां। कभी-कभार किसी गोष्ठी, सेमिनार या चित्र प्रदर्शनी में चली जाती और इसी बहाने थोड़ा बहुत पी.आर. हो जाता। “डेंटिंग पेंटिंग” के लिए ‘ब्यूटी पार्लर’ जाना उसका साप्ताहिक कार्यक्रम था।

कभी-कभी उसे नींद आती ही नहीं थी, बिना नींद की गोलियां खाए और गोलियां वह तब खाती थी जब भीतर अंधेरा बाहर से ज्यादा गहरा और भयावह हो जाता था। नींद में वह भटकती थी यहां, वहां न जाने कहां-कहां? नहीं मालूम वह कब सोती और कब जागती थी। उसे लगने लगा था जैसे रात को बिल्लियां नहीं, सपने में रोती हैं लड़कियां या शायद वह स्वयं।

दफ्तर में उसका काम था बॉस की बीवी का शोध ग्रंथ टाइप करना, कागजों पर ठप्पा लगाना, टेलीफोन के नम्बर घुमाना, शाम को हर कागज पर बॉस की घुग्घी मरवाना और खाली समय लायब्रेरी में पत्र-पत्रिकाओं के पन्ने पलटना। जब कभी किसी बड़ी कम्पनी के विज्ञापन में  सूट-बूट और टाई पहने आदमी के धड़ पर भेडि़ए या रीछ का चेहरा देखती तो मुंह से निकलता, ‘‘ओह! माई बॉस।’’ और वह सामने दीवार पर लगे किसी एक घोड़े पर बैठ भाग खड़ी होती। सूरज डूबने से पहले घोड़ा उसे हॉस्टल पटकता और वापस दीवार पर आ चिपकता। सुबह होश आता तो अखबार बताता कि कल इसके साथ बलात्कार हुआ और उसका उपहरण, इसने आत्महत्या कर ली और उसने हत्या। पहले चाय कुछ कड़वी लगती और फिर सोचती, चलो, मैं तो बच गई खबर बनते-बनते।’

धीरे-धीरे उसे समझ आने लगी राजधानी। उसे लगता अब यहां इतने बड़े शहर में किसको किसकी परवाह है? न तालाब में डूबी लड़कियों की चिंता और न ‘स्टोव फटने से जलकर मरी बहुओं की। कुछ भी हो जाए आंखों के सामने घटना या दुर्घटना-हमने कुछ नहीं देखा जी (कौन करता फिरेगा कोर्ट-कचहरी?)। यहां किसी को नहीं आती महीनों बगल में बंद मकान के अंदर सड़ती लाशों की दुर्गन्ध। मगर किसी भी लड़की के व्यक्तिगत (प्रेम) संबंधों की खबर फौरन फैक्स हो जाती है।

फिर एक दिन अचानक लड़की ने सोचा और फैसला कर लिया कि वह अब और नहीं रहेगी हॉस्टल में।
लड़की नहीं रहना चाहती हॉस्टल में या हॉस्टल छोड़ किराए के मकान में एक सरदार (दंगों के बाद से क्लीन शेव्ड ) के साथ रहना चाहती है। शायद अब वह भी मां बनना चाहती है। मां।

क्या हुआ? आप नाक-भौं क्यों सिकोड़ रहे हैं? अच्छा। अच्छा। सरदार जी के साथ बिना सात फेरे लिए कैसे रह सकती है? यही ऐतराज है न आपको? पर इसका तर्क यह हो सकता है भाई दोनों एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, ‘दे वांट टु लिव टु गेदर।’ सरदार जी के पहले सात फेरों को अभी तलाक की डिक्री मिली नहीं है। अदालत में पांच साल से तारीख पड़ रही है और पता नहीं कब तक पड़ती रहेगी। अकेली लड़की को कोई तो ‘बहादुर’ सुरक्षा गार्ड चाहिए न। बाहर अकेली लड़की कैसे रह सकती है? क्यों बिलावजह पुलिस रिकार्ड में एक और ‘अवार्ड’ बढ़ाना चाहते हो?

नहीं…लगता है आपको लड़की का इस तरह (बिना सात फेरे) सरदार जो (या किसी और) के साथ रहना नैतिक नहीं लग रहा। आगे खतरा नजर आ रहा है कि ऐसे साथ रहेगी तो गर्भ, गर्भपात, बच्चा (हरामी)… नहीं, कहानी खतरे की सीमा रेखा से बाहर जा रही है और नायिका नारी फ्रेम में फिट नहीं हो रही। शहर में दंगा-फसाद पहले थोड़ा हो चुका है।

यस पापा

चलिए, मान लेते हैं, नहीं रहेगी लड़की सरदार जी के साथ। पर अब क्या करें? हॉस्टल में रहना नहीं चाहती और सरदार जी के साथ आप रहने नहीं देना चाहते। आपको ही सौंप देता हूँ।
‘ऐ लड़की। सुनो, अब से तुम इन पाठक (जी) के साथ रहोगी…ठीक।
पाठक (जी) के साथ भेज दी लड़की। एक बार तो मैंने भी राहत महसूस की। चलो ‘आफत’ टली। ऐसी शिक्षित और स्वावलंबी लड़की को संभालना जेब में हरदम टाइम बम लिए घूमने जैसा है।

मैंने सोचा भी नहीं था कि एक दिन लौटेगी लड़की। पर कुछ ही दिनों बाद लड़की सचमुच लौट आई। मुझे देखते ही सुबक-सुबक कर ऐसे रोने लगी जैसे ससुराल वालों ने और दहेज लाने के लिए मारपीट कर घर से निकाल दिया हो। पूछा तो कहने लगी, ‘‘कहां भेज दिया आपने मुझे? वो तो सारा दिन पूछता है, “इसके पीछे क्या है? और उसके पीछे क्या है?” “नीली फिल्में” देखता है और “गर्म पत्रिकाएं” पढ़ता है। हर वक्त मुझे ऐसे देखता है जैसे फाड़ खाएगा। वह तो सिर्फ मेरे प्रेम-प्रसंगों और सहवास वर्णनों को ही कंठस्थ करने में लगा रहता है। बाहर लोगों के सामने मुझे ‘बदचलन’, ‘चरित्रहीन’ और ‘कुलटा’ कह कर बदनाम करता है और आप पर अश्लीलता का इलजाम लगाता है। कहता है ‘सैकेंड हैंड हूँ, पहले आपने खुद… और अब मुझे परोस दिया।’’ नहीं, मैं नहीं रह सकती अब और उसके पास। आप मुझे वापस बुला लो प्लीज। मैं अभी और जीना चाहती हूँ।’’

सुनते-सुनते जी मैं आया कि नींद की गोलियां खाकर सो जाऊं या फिर सारे कागद (कारे) फाड़ कर रद्दी की टोकरी में फेंक दूँ। भाड़ में जाए लड़की और लड़की की कहानी। बाकी सारे पात्र भी भगा दिए। अब कहां से ढूढ़ कर लाऊंगा? नहीं, मुझे और बहुत से जरूरी काम करने हैं। मैंने अपना पीछा छुड़ाना चाहा। मगर वह जिद्दी लड़की मानने को तैयार ही न हो।
‘‘अच्छा, बाबा अच्छा। मैं अभी तुम्हारा इंतजाम करता हूँ’’ कहते हुए टेलीफोन के बटन दबाने लगा।
‘‘हैलो। प्रकाश मैं बोल रहा हूँ। क्या हो रहा है? यार, वो लड़की फिर वापस आ गई। क्या करूं। बड़ी मुसीबत में हूँ। मैंने तो पहले ही कहा था कि मेरे बस की नहीं है कहानी-वहानी।… नहीं यार। वह ‘अच्छी लड़की है’ बहुत अच्छी लड़की… नहीं…नहीं यार। उसे भी तुम्हीं ‘एडॉप्ट’ कर लो… अच्छा… जल्दी आना प्लीज।’’
फोन रखा तो लड़की का भाषण शुरू- ‘‘नहीं जाऊंगी, अब किसी के भी साथ, कहीं भी। आपने पैदा किया है तो भुगती भी आप ही। क्या समझते हो मुझे… जब चाहा पैदा किया, जैसा बनाना चाहा बना दिया। नहीं संभाल पाए तो  बेसहारा छोड़कर भाग गए या किसी और के हाथों मरवा दिया। नहीं, मैं आपको यूँ न भागने दूँगी और न किसी हादसे में मरवाने।’’
मैं झल्लाया मन ही मन- ‘मैंने भी क्या मुसीबत गले डाल ली।’’

जानें न्यायालय के निर्णय से कैसे महिलायें लटकीं अधर में, बढ़ेगी उनकी परेशानी

शाम को पार्टी में एक और दोस्त से सलाह ली तो बोले, ‘‘अरे, इसमें क्या मुसीबत है? समझा-बुझा कर भेज दो प्रकाश के साथ… कुछ दिन बाद खुद ही वापस आ जाएगी और कहेगी कि वो तो मुझे ‘मझधार किनारे’ या बीच सड़क पर छोड़ कर भाग गया। फिर कुछ दिन अपने साथ रहने दो। रह पाएगी तो रह लेगी, नहीं तो तुम्हारे यहां से भी अपने आप चली जाएगी। सबको देखने के बाद ही शायद वह स्वयं अपना रास्ता तलाश पाएगी। इससे अधिक भला तुम और कर भी क्या सकते हो?’’
मैंने कुछ कहना चाहा तो बोले, ‘अपने को एक्सपोज’ करने में डर लगता है? डरो मत… होने दो कहानी को पूरा… और कोई रास्ता भी नहीं है।’’
वापस लौटा तो नशे में बुरी हालत थी और लड़की प्रतीक्षा करते-करते सो गई थी। सारी रात यूँ लगा जैसे दोनों दौड़ रहे हैं। कभी वो आगे और कभी मैं। दौड़ते-दौड़ते में एकदम निढाल हो गिर पड़ता हूं और वो न जाने कितनी दूर तक दौड़ती रहती है। आंख खुली तो लड़की नहीं थी। शायद समझ गई होगी सारी कहानी

सामने नजर पड़ी तो दीवार पर लगे कैलेंडर में लड़की, वही लड़की घोड़े पर बैठी मुस्कुरा रही थी।






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पहली बार: दुनिया की सैर पर निकलीं छह महिला नेवी अफसर: टीम का नेतृत्व वर्तिका जोशी के हाथों में



रविवार को दुनिया की अपनी पहली यात्रा पर भारतीय  नौसेना  की 6 महिला अफसरों ने ‘नाविका सागर परिक्रमा’ की शुरुआत की. इस टीम का नेतृत्व लेफ्टिनेंट कमांडर वर्तिका जोशी कर रही हैं. उनके साथ लेफ्टिनेंट कमांडर प्रतिभा जामवाल, पी.स्वाति और लेफ्टिनेंट एस.विजया देवी, बी.ऐश्वर्या और पायल गुप्त हैं.महिला टीम ने अपनी यात्रा गोवा के तट से शुरू की है. इनकी यात्रा दुनिया के विभिन्न सागरों से होते हुए मार्च, 2018 में समाप्त होगी. यह पूरी यात्रा पांच चरणों में पूरी होगी. इस दौरान टीम अपने पोत के साथ राशन और मरम्मत के काम के लिए ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, फॉकलैंड और दक्षिण अफ्रीका के बंदरगाहों पर रुकेगी.

लेफ्टिनेंट कमांडर वर्तिका जोशी की स्कूली शिक्षा-दीक्षा श्रीनगर गढ़वाल और ऋषिकेश से हुई है। उनके पिता पीके जोशी गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर के शिक्षा विभाग के प्रोफ़ेसर हैं। जबकि उनकी माता अल्पना जोशी राजकीय महाविद्यालय ऋषिकेश में हिंदी विभाग की अध्यक्ष हैं। 2010 में वर्तिका नौसेना में अधिकारी बनी थी। उन्होंने ऐमिटी यूनिवर्सिटी से एरोस्पेस इंजिनियरिंग में बीटेक किया था। नौसेना में भर्ती होने के बाद वह ब्राजील के रियो डि जिनोरियो से दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन तक पांच हजार नॉटिकल मील का समुद्री अभियान तय कर चुकी हैं। टीम की सदस्य प्रतिभा जामवाल भी उत्तराखंड की हैं, वे कुल्लू शहर के मौहल क्षेत्र से संबंध रखती हैं.

वर्तिका जोशी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन महिला अफसरों को शुभकामनाएं दी हैं. उन्होंने टि्वटर पर लिखा, ‘आज विशेष दिन है. नौसेना की छह महिला अधिकारियों ने आईएनएसवी तरिणी से दुनिया का चक्कर लगाने की यात्रा शुरू की.’ उन्होंने लिखा, ‘पूरा देश एक साथ मिलकर नाविका सागर परिक्रमा की टीम को शुभकामनाएं दे रहा है और उनकी इस असाधारण यात्रा के लिए शुभेच्छा.’

क्या सच में गिरफ्तार होगा भाजपा समर्थक पिंटो परिवार: रायन स्कूल मर्डर केस

गुडगाँव के रायन स्कूल में 7 साल के बच्चे की ह्त्या के मामले में पूछताछ के लिए हरियाणा पुलिस मुम्बई पहुँच चुकी है. इतने गाजे-बाजे के साथ पुलिस रवाना हुई कि स्कूल के प्रबंधक रायन पिंटो और उनके परिवार ने अपनी अग्रिम जमानत की याचिका बॉम्बे हाई में आज ही डाल दिया. रायन इंटरनेशनल की मैनेजिंग डायरेक्टर ग्रेस पिंटो भाजपा के महिला मोर्चे की राष्ट्रीय सचिव हैं. सत्ता के गलियारे का पावरफुल कनेक्शन ही है कि इस मामले में पुलिस कर कुछ रही है, दिख कुछ रही है. 2015 में भी जब दिल्ली के रायन इंटरनेशनल में एक बच्चे की संदिग्ध मौत हुई थी, तब भी पिंटो परिवार पर आंच नहीं आई. जब उनपर 18 सौ करोड़ रूपये की कर चोरी का मामला आया तो उन्होंने खुद तथा अपने स्कूल के स्टाफ को भाजपा की सदस्यता दिलवा दी.

रायन पिंटो

स्कूल में बच्चे की हत्या के मामले में मृतक प्रद्युम्न के पिता वरुण ठाकुर की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार की सुबह सुनवाई की. वरुण ठाकुर ने अपनी याचिका में मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग की थी. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार, सीबीआई और केंद्र सरकार से सवाल पूछा कि क्यों न मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी जाए?

इस बीच पुलिस ने स्कूल मैनेजमेंट के दो पदाधिकारियों को गिरफ्तार किया है. दोनों पदाधिकारियों को दो दिन की पुलिस रिमांड पर भेजा गया. पुलिस ने तीन दिन की रिमांड मांगी थी. पेशी के दौरान कोर्ट ने कहा कि स्कूल की खामियों के कारण छात्र की जान गई.

प्रद्युम्न के पिता वरुण ठाकुर ने कहा, “सर्वोच्च  न्यायलय ने हमारी याचिका पर केंद्र सरकार, हरियाणा सरकार और सीबीआई को नोटिस जारी किया है और तीन हफ्ते के भीतर जवाब देने को कहा है. ये नोटिस केवल एक स्कूल तक सीमित नहीं है, देश के सभी स्कूल को लेकर है. जिम्मेदारी तय हो, सीबीआई जांच हो ये हमारी मांग थी.” उन्होंने कहा कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट और हरियाणा सरकार पर पूरा भरोसा है.

ग्रेस पिंटो

सवाल है कि प्रद्युम्न के पिता और सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता के कारण पुलिस पिंटो परिवार तक पहुँचने का अहसास मात्र दे रही है, या POSCO कानून के तहत उनकी गिरफ्तारी के प्रति गंभीर है. सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता अरविंद जैन कहते हैं कि बच्चे की ह्त्या और यौन शोषण के प्रयास के मामले में पिंटो परिवार की पूरी जवाबदेही है.

वाम गठबंधन की जीत, बापसा का शानदार प्रदर्शन, कन्हैया कुमार पर बरसे संगठन के ही लोग



स्त्रीकाल डेस्क 


पिछले कुछ सालों से जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के भगवाकरण की मुहीम को झटका लगा. विद्यार्थी समुदाय ने भारतीय जनता पार्टी के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को बुरी तरह नकार दिया, यहाँ तक कि मतदान के लिए भारी संख्या में डे स्कॉलर को लाना भी उनके काम न आया, जेएनयू विद्यार्थियों की मानें तो वे जितने डे स्कॉलर को गाड़ियों में भरकर लाये उतने भी वोट उन्हें नहीं मिले. इस चुनाव के और उसके परिणाम के कई और रंग  हैं .



 वाम   गठबंधन (अइसा, एसएफई और डी एस एफ) ने सेन्ट्रल पैनल की सभी सीटों, यानी अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव और संयुक्त सचिव, पर अपना कब्ज़ा जमा लिया. इन पदों पर वाम गठबंधन के उम्मीदवार गीता कुमारी, सीमओं जोया खान, दुग्गीराला श्रीकृष्णा और शुभांशु सिंह क्रमशः 464,848, 1107 और 835 मतों के मार्जिन से जीते.

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय का यह चुनाव कई मायने में अभूतपूर्व था. एक तो यह चुनाव भगवा ताकतों की जेएनयू प्रशासन के साथ मिलकर विश्वविद्यालय के भगवाकरण की कोशिशों के दौरान हुआ, तब जब जेएनयू में बड़े पैमाने पर सीट कट हुआ है. सभी संगठनों ने अध्यक्ष पद के लिए महिला उम्मीदवार खड़े किये, यह जेएनयू में पहली बार संभव हुआ.

छात्र संगठन बिरसा-फुले-अम्बेडकर स्टूडेंट्स असोसिएशन (बापसा) के लिए जेएनयू का यह दूसरा चुनाव था. पिछले चुनाव में बापसा ने अध्यक्ष पद के लिए वाम संगठनों को जबरदस्त टक्कर दी थी और दूसरे पोजीशन पर रहा था. हालांकि तब उसे सेन्ट्रल पैनल के अन्य सीटों पर अपेक्षाकृत कम वोट मिले थे. इस बार बापसा का पैनल वोट बेहतर रहा और हर पद के लिए  800 से अधिक वोट मिले. हालांकि इस बार सभी संगठनों को पैनल वोट बेहतर मिले.

चुनाव पर नजर रखने वाले जेएनयू के सीनियर विद्यार्थियों ने बताया कि इस बार नोटा और निर्दलीय उम्मीदवार को तुलनात्मक रूप से काफी वोट मिले. उन्होंने बताया कि निर्दलीय विद्यार्थी चुकी इस स्थिति में होते हैं कि वे बिना किसी जिम्मेवारी के सभी संगठनों पर हमला कर सकते हैं इसलिए अध्यक्षीय डिबेट में वे खूब तालियाँ बटोरते हैं, लेकिन पहली बार एक निर्दलीय उम्मीदवार को 400 से अधिक वोट मिले.

चुनाव की गिनती के दौरान कई अजीबोगरीब वाकये हुए. जेएनयू के पूर्व अध्यक्ष और देश भर में अपने भाषणों के लिए चर्चित कन्हैया कुमार को उनके  ही संगठन के लोगों ने सार्वजनिक तौर पर खूब भला-बुरा कहा. वे सार्वजनिक तौर पर आलोचना न करने की दुहाई देते रहे. विद्यार्थियों का आरोप था कि कन्हैया ने अपने संगठन के उम्मीदवारों के लिए प्रचार नहीं किया, बल्कि एंटी कैम्पेन करते हुए भी पाये गये.  जेएनयूएसयू की एक पूर्व  उपाध्यक्ष  को उसे यह कहते हुए सुना गया कि वह चाहता तो एसआईएस के काउंसिलर पद के लिए, यानी जो उसका अपना स्कूल है, उसके काउंसिलर पद के लिए उसके संगठन  की उम्मीदवार जीत जाती. फेसबुक पर एआईएसएफ के सदस्य उसपर व्यंग्य भरे पोस्ट लिखते रहे. एआईएसएफ के ही एक सदस्य ने कहा कि “इस बार संगठन में गैर सवर्ण सदस्य सक्रिय थे, पैनल में भी गैर सवर्ण सदस्यों की संख्या बड़ी थी, शायद इसीलिए कन्हैया कुमार न सिर्फ इनएक्टिव रहे बल्कि मौक़ा मिलने पर एंटी प्रचार भी किया. हमलोग सबूत इकट्ठा कर रहे हैं और इस मामले को संगठन में उठायेंगे.”

जेएनयू के पूर्व छात्र, जीतेन्द्र कुमार, जिनका दावा है कि उन्होंने एआईएसएफ के पूर्व में सफल रहे उम्मीदवार लेनिन कुमार और कन्हैया के लिए भी प्रचार किया था, ने कहा कि ‘यह संगठन यह विश्वास दिलाने में असफल रहा कि इनकी उम्मीदवार अपराजिता लेफ्ट गठबंधन  और एबीवीपी दोनो को हारने में सक्षम है. पहले वे तभी जीते हैं जब वे ऐसा विश्वास दिला पाये.” उन्होंने कन्हैया कुमार का बिना नाम लिये कहा कि ‘ऐसा संगठन के वरिष्ठ और लोकप्रिय विद्यार्थी भी ने नहीं किया, न करने का प्रयास किया.’

वाम गठबंधन की जीत को उसके विरोधी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की जीत का खौफ पैदा कर जीतने की रणनीति को श्रेय दे रहे हैं. जाहिर है कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को जेएनयू के खिलाफ जेएनयू में ही अपनी राजनीति पर पुनर्विचार करना होगा. बापसा के सामने भी चुनौती लगातार दो असफलताओं के बाद भी कैम्पस में अपनी धमक बनाये रखने की होगी.

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दो-दो बच्चों की ह्त्या फिर भी भाजपा की महिला नेता और स्कूल प्रबंधक को बचा रही मोदी-खट्टर सरकार

पिछले दिनों रायन पब्लिक स्कूल में 7 साल के बच्चे प्रदुम्न की हत्या हो गई.  हरियाणा के पुलिस तुरत ह्त्या की गुत्थी सुलझाने की दावा करते हुए हत्या के आरोप में स्कूल के एक बस कंडक्टर को गिरफ्तार कर उससे यह भी कबूल करवा लिया कि बाथरूम में बच्चे की ह्त्या यौन शोषण में नाकाम रहने के बाद उसीने किये हैं. लेकिन प्रदुम्न के माता-पिता उसे हत्यारा मानने से इनकार कर रहे हैं.

प्रधानमंत्री के साथ ग्रेस पिंटो

रायन पब्लिक स्कूल में बच्चे की ह्त्या के तुरत बाद मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावेडकर ने त्वरित कार्रवाई की घोषणा कर मामले के प्रति भाजपा सरकार की गंभीरता का भ्रम देने की कोशिश जरूर की, लेकिन उनके इन प्रयासों के बावजूद स्कूल की मैनेजिंग डायरेक्टर ग्रेस पिंटो के भारतीय जनता पार्टी के महिला मोर्चे की राष्ट्रीय सचिव होने की बात दब नहीं सकी और न ही उनके महाराष्ट्र कनेक्शन की बात. ग्रेस पिंटो मुम्बई रहती हैं और भाजपा के बड़े नेताओं के साथ उनका उठना-बैठना होता है. इसकी तस्वीरें सोशल मीडिया में जरूर तैर रही हैं लेकिन मुख्य मीडिया ने इसे दबा रखा है. गौरतलब है कि पिछले साल रेयान स्कूल के वसंत कुंज दिल्ली में एक छोटे बच्चे की लाश स्कूल की पानी की टंकी में मिली थी. तब भी आशंका थी कि गुड़गांव के प्रद्युम्न की तरह  उसका यौन शोषण हुआ था. स्पष्ट है कि तब भी अपने रसूख के कारण ग्रेस पिंतों स्कूल प्रबंधन को साफ़-साफ़ बचा ले गई थीं.

उनके रसूख को देखकर ही पुलिस और मंत्री हाइपर एक्टिव जरूर दिख रहे हैं लेकिन बच्चे के माँ-बाप के इनकार के बावजूद कंडक्टर को बलि का बकरा बना रखा है. सवाल यह भी उठ रहा है कि सच में यदि उसने ह्त्या की होती तो वह वहाँ से भाग जाता, न कि पुलिस के हत्थे चढने के लिए वहाँ मौजूद होता. सवाल कई और हैं. बच्चा जिसकी कस्टडी में है यानी स्कूल का प्रबंधन उसके यहाँ लगातार दो घटनायें घाट रही हैं, लेकिन प्रबंधन साफ़ बच कैसे रहा है? यहाँ कस्टडी में होने के कारण जिम्मेवारी उसकी भी है कानूनन. एक परिजन ने स्कूल पर यह भी आरोप लगाया है कि उसके बच्चे से खून के धब्बे साफ कराए गये थे. फिर स्कूल की भूमिका प्र सवाल क्यों नहीं. सवाल यह है कि स्कूल की मैनेजिंग डायरेक्टर और भाजपा नेता  ग्रेस पिंटो को कौन बचा आरहा है?

गृहमंत्री राजनाथ सिंह के साथ ग्रेस पिंटो

साहित्यकार पंकज चतुर्वेदी अपने फेसबुक पेज पर लिखते हैं:  “रायन  के माली, कंडक्टर से ले कर सभी टीचरों के लिए भाजपा का सदस्य बनना अनिवार्य है. सभी को, यहां तक कि भर्ती होने वाले बच्चों के पालकों को भी, सभी को दस दस सदस्य बनाना अनिवार्य है, जो कंडक्टर गिरफ्तार हुआ उसे भी । पिछले चुनाव में स्कूल ने भाजपा के पक्ष में फतवा भी जारी किया था. यह है रेयान स्कूल की अंतर्कथा लेकिन गोदी मीडिया इस पर चुप रहेगा. ये 1800 करोड़ के कर चोरी में भी चर्चित रहीं. हैं.

भारतीय महिला मोर्चा (भाजपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष विजया रहटकर से स्त्रीकाल के लिए  यह सवाल  पूछा गया कि रेयान की मैनेजिंग डायरेक्टर ग्रेस पिंटों भारतीय महिला मोर्चा की राष्ट्रीय सचिव हैं और उनके स्कूलों में बच्चों की ह्त्या का यह दूसरा मामला है, तो उनपर और स्कूल पर कार्रवाई को लेकर आपकी क्या राय है. फिलहाल उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया है.

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आसाम की भाजपा विधायक ने शुरू की विधानसभा में ब्रेस्ट फीडिंग रूम की मुहिम



विधायक को नवजात बेटी को दूध पिलाने हर घंटे जाना पड़ा घर, शुरू की विधानसभा में फीडिंग रूम की मुहिम
अंगूरलता ने कहा कि उन्हें हर एक घंटे में विधानसभा छोड़कर घर बेटी नमामी को दूध पिलाने जाना पड़ता है।
इस साल की शुरुआत में आस्ट्रेलियन सांसद लरिस्सा वॉटर्स देश की ऐसी पहली महिला राजनेता बन गई थीं जिन्होंने अपनी नवजात बच्ची को संसद में ही दूध पिलाया था। पिछले साल ऑस्ट्रेलिया में संसद में महिलाओं को संसद में दूध पिलाने की अनुमति दी गई थी। ऑस्ट्रेलिया के बाद भारत में भी इस प्रकार का कानून लाने की मांग उठने लगी है। असम की भाजपा  विधायक ने विधानसभा में बच्चों को दूध पिलाने के लिए एक कमरा बनाने की मांग उठाई है। विधायक अंगूरलता डेका का कहना है विधानसभा में फीडिंग रूम होना चाहिए ताकि घर में मौजूद उनकी एक माह की बेटी को भूखा न रहने पड़े।

आसाम से लेकर आस्ट्रेलिया तक एक मुद्दे पर बहनों का सखियापा



अंगूरलता ने कहा कि मैं ये नहीं कह रही हूं कि ऑस्ट्रलिया जैसा ही कानून यहां भी बनाया जाए लेकिन मैं चाहती हूं कि तनज़ानियन सांसद की तरह हमारे लिए के स्पेशल कमरा बनाया जाए जहां मेरी जैसी मां अपने बच्चों की देखभाल कर सकें। पहली बार विधायक बनीं अंगूरलता ने 3 अगस्त को एक बेटी को जन्म दिया था। संडे एक्सप्रेस से बातचीत के दौरान अंगूरलता ने असम विधानसभा में फीडिंग रूम बनाने की मांग की। असम फिल्मों की मशहूर 31 वर्षीय अदाकारा अंगूरलता ने कहा कि 4 सितंबर से शुरु हुए मानसून सेशन के दौरान उन्हें विधानसभा से अपने घर तक काफी चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।

एक राजधानी: जहाँ टॉयलेट ढूंढते रह जाओगे. महिलाओं ने बयान किया दर्द

अंगूरलता ने कहा कि उन्हें हर एक घंटे में विधानसभा छोड़कर घर बेटी नमामी को दूध पिलाने जाना पड़ता है। इस कारण मैं विधानसभा में होने वाली काफी बहस और चर्चाएं छोड़ चुकी हूं। विधानसभा और घर के बीच फंसी अंगूरलता ने पार्लियामेंटरी अफेयर्स मिनिस्टर चंद्र मोहन से मांग की है  कि विधानसभा में ब्रेस्ट फीडिंग के लिए स्पेशल कमरा बनवाया जाए। कानूनन  महिलाओं को 6 महीनों के मेटर्निटी लीव मिलती है लेकिन यह कानून विधायकों और सांसदों पर लागू नहीं होता है। इसके साथ ही अंगूरलता चाहती हैं कि सरकार सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों में भी महिलों के लिए स्पेशल रूम  बनाया जाए।

महिला सशक्तिकरण के लिए: ‘एक देश, एक कानून’
इन्डियन एक्सप्रेस/जनसत्ता से साभार 

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जातिवाद का दंश: दिल्ली विश्वविद्यालय की प्राध्यापक को राजधानी में नहीं मिल रहे फ़्लैट



रजनी अनुरागी 
पिछले लगभग 10 दिन से किराए पर दो शयनकक्ष वाला फ्लैट देख रही हूं। रोहिणी दिल्ली में डीडीए की और अन्य कई ग्रुप हाउसिंग सोसायटीज़ के आवासीय परिसर हैं। रोहिणी हर लिहाज से बढ़िया जगह है। मैं, जैसा कि सभी जानते हैं दिल्ली विश्वविद्यालय के जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज में पढ़ाती हूँ। मेरे पापा रूप नगर , नम्बर 1 के सीनियर सेकेंड्री बॉयज स्कूल से उपप्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए। पेशे की दृष्टि से मेरी जाति/ वर्ण क्या होना चाहिए?? जबकि मैं इस जाति व्यवस्था की घोर विरोधी हूँ।

अपने कॉलेज में रजनी अनुरागी

यह सब मैं क्यों लिख रही हूं?? इसका कारण यह है कि मकान मालिकों को मेरे पेशे की बजाय जाति जानने में दिलचस्पी का होना है। आपका सरनेम क्या है ? किस जाति से हैं? वैसे तो हम जाति वाति मानते नहीं , पर कौन कैसा आ जाए? (क्योंकि जाति विशेष के लोग ‘सत्धर्मी’ होते है!!!) मकान मालिक तो मकान मालिक प्रोपर्टी डीलर के पानी पिलाने वाले और मकान की तालियां लेकर मकान दिखाने का संयुक्त काम करने वाले सहायक तक(यहां मार्क्सवाद लाने की आवश्यकता नहीं) ने पहले सीधे कास्ट फिर मेरे ये कहने पर कि क्या मतलब… उसने सकपकाते हुए पूरा नाम जानने की कोशिश की।

रजनी अनुरागी की कवितायें

 प्रॉपर्टी डीलर परिचित था सो उसने तुरंत उसे मकान पता करने और दिखाने को कहा।डीलर ने बात सम्भालते हुए कहा,” जी क्या करें मकान मालिक पूछते हैं!! मैंने कहा ऐसे किसी जातिवादी का मकान हम बिल्कुल नहीं लेंगे और हम वहां से आ गए। जबकि दूसरा वाकया ये है कि दिल्ली के सरकारी स्कूल से प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त जातिवादी ने मुँह खोलकर जाति पूछी और हमने अपनी जाति उनके मुँह पर फेंक दी । जाति को हाथ में लिए वे बोले….जाति से क्या होता है!! हे हे हँसने लगे। जब कुछ होता नहीं तो पूछते क्यों हो ??

अभी तक फ्लैट नहीं मिला है जबकि 30 सितम्बर तक वर्तमान फ्लैट खाली करना है।


रजनी अनुरागी का फेसबुक पोस्ट 


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