महिला आरक्षण विधेयक पारित करना स्त्रीत्व का सम्मान है: मनमोहन सिंह

महिला आरक्षण को लेकर संसद के दोनो सदनों में कई बार प्रस्ताव लाये गये. 1996 से 2016 तक, 20 सालों में महिला आरक्षण बिल पास होना संभव नहीं हो पाया है. एक बार तो यह राज्यसभा में पास भी हो गया, लेकिन लोकसभा में नहीं हो सका. सदन के पटल पर बिल की प्रतियां फाड़ी गई, इस या उस प्रकार  से बिल रोका गया. संसद के दोनो सदनों में इस बिल को लेकर हुई बहसों को हम स्त्रीकाल के पाठकों के लिए क्रमशः प्रकाशित करेंगे. पहली क़िस्त  में  संयुक्त  मोर्चा सरकार  के  द्वारा  1996 में   पहली बार प्रस्तुत  विधेयक  के  दौरान  हुई  बहस . पहली ही  बहस  से  संसद  में  विधेयक  की  प्रतियां  छीने  जाने  , फाड़े  जाने  की  शुरुआत  हो  गई थी . इसके  तुरत  बाद  1997 में  शरद  यादव  ने  'कोटा  विद  इन  कोटा'  की   सबसे  खराब  पैरवी  की . उन्होंने  कहा  कि ' क्या  आपको  लगता  है  कि ये  पर -कटी , बाल -कटी  महिलायें  हमारी  महिलाओं  की  बात  कर  सकेंगी ! ' हालांकि  पहली   ही  बार  उमा भारती  ने  इस  स्टैंड  की  बेहतरीन  पैरवी  की  थी.  अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद पूजा सिंह और श्रीप्रकाश ने किया है. 
संपादक

आख़िरी क़िस्त

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की सौंवी वर्षगांठ ( 8 मार्च 2010) 

प्रधानमंत्री (डॉ. मनमोहन सिंह.): श्रीमान सभापति महोदय, सबसे पहले मैं पिछले दो दिनों में इस सदन में हुई कुछ असामान्य घटनाओं पर अपना गहरा खेद व्यक्त करता हूं. सभापति महोदय, अपनी सरकार की ओर से मैं आपके और पदाधिकारियों के प्रति दर्शाये गये अनादर पर गहराई से माफी मांगता हूं. ऐसी बातें कभी नहीं होना चाहिए. पर वे घटित हो चुकी हैं और हमें इस पर विचार करना है कि कैसे हम भविष्य में अपने कामकाज को कारगर बनायें कि ऐसी घटनाएं नहीं हों. सभापति महोदय, इन असामान्य घटनाक्रम के बावजूद इस ऐतिहासिक कानून पर विचार करते वक्त जो सर्व-सम्मति या लगभग सर्व-सम्मति बनी है वह भारतीय लोकतंत्र के स्वस्थ होने और सही जगह पर होने का जिंदा प्रमाण है.


मनमोहन सिंह (जारी): इसलिए मैं विपक्ष के माननीय नेता, अन्य सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को बधाई देता हूं , जिनके सहयोग से हमारे लिए वास्तव में एक ऐतिहासिक कानून को अधिनियमित करना संभव हो पाया है. हमारी महिलाओं को सशक्त बनाने की लंबी यात्रा में एक महत्वपूर्ण कदम है. श्रीमान सभापति महोदय, जब यह यात्रा शुरू हुई थी, उसी समय सभी व्यक्तियों 21 वर्ष के सभी पुरुषों और महिलाओं को मतदान का अधिकार देने की समझ हमारे नेताओं को रही है. इसके बाद श्री राजीव जी, मतदान की उम्र को घटाकर 18 वर्ष कर दिया. लेकिन, हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए स्वतंत्र भारत में किये गये विभिन्न प्रयासों के बावजूद, हमारी महिलाओं ने, सामाजिक और आर्थिक विकास की प्रक्रिया के लाभों के संदर्भ में बात करें तो भी, भारी कठिनाइयों का सामना किया है. हमारी महिलाएं घर पर भी भेदभाव का सामना करती हैं. वहाँ घरेलू हिंसा है. वे शिक्षा, स्वास्थ्य आदि तक अपनी असमान पहुंच में भेदभाव का सामना करती हैं. यदि भारत अपने सामाजिक और आर्थिक विकास की पूरी क्सभावना को साकार करना है तो इन सब बातों को समाप्त होना होगा. आज पारित होने जा रहा विधेयक आगे बढ़ता हुआ एक ऐतिहासिक कदम है, भारत के स्त्रीत्व की मुक्ति की प्रक्रिया को मजबूत बनाने में आगे बढ़ा हुआ एक बड़ा कदम है. यह हमारे स्त्रीत्व का उत्सव है. यह हमारी प्राचीन संस्कृति और सभ्यता में हमारी महिलाओं के लिए भारत के आदर और सम्मान का एक उत्सव है. यह उन सभी बहादुर महिलाओं का महान स्मरण है, जिन्होंने भारत की आजादी की लड़ाई लड़ी है. इस अवसर पर मेरे खयाल में कस्तूरबा माता, डॉ. एनी बेसेंट, श्रीमती कमला नेहरू, श्रीमती सरोजिनी नायडू, राजकुमारी अमृत कौर, श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित, श्रीमती इंदिरा गांधी शामिल हैं. भारत की इन सभी बहादुर बेटियों ने हमारे स्वतंत्रता संग्राम की सफलता के लिए लड़ाई लड़ी है और काफी योगदान दिया है. जो हम आज अधिनियमित करने के लिए जा रहे हैं वह राष्ट्र निर्माण, स्वतंत्रता संग्राम और अन्य सभी राष्ट्र निर्माण की गतिविधियों की प्रक्रियाओं में हमारी महिलाओं के बलिदान के प्रति हमारी श्रद्धांजलि का एक छोटा सा टोकन है. मैं दिवंगत श्रीमती गीता मुखर्जी के भी योगदान को याद कर रहा हूं. वह उस स्थायी समिति की अध्यक्ष रहीं जिसने संसद के समक्ष आये पहले विधेयक पर रिपोर्ट थी. इस महत्वपूर्ण विधेयक को प्रक्रिया में लाने वाली स्थायी समिति की अध्यक्ष श्रीमती जयंती नटराजन को भी धन्यवाद देता हूं.

 वृंदा करात: महोदय, श्री नचियप्पन के नाम का उल्लेख नहीं करें. वह एक अकेले थे जिन्होंने विधेयक का विरोध किया था.


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महिला आरक्षण को लेकर संसद में बहस :पहली   क़िस्त

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महिला आरक्षण को लेकर संसद में बहस :तीसरी   क़िस्त

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 वह इतिहास, जो बन न सका : राज्यसभा में महिला आरक्षण

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महिला संगठनों, आंदोलनों ने महिला आरक्षण बिल को ज़िंदा रखा है : वृंदा कारत: पांचवी  क़िस्त

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आरक्षण के भीतर आरक्षण : क्यों नहीं सुनी गई आवाजें : छठी क़िस्त 

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सारे दल साथ -साथ फिर भी महिला आरक्षण बिल औंधे मुंह : क़िस्त सात

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महिलाओं द्वारा हासिल प्रगति ही समुदाय की प्रगति: डा. आंबेडकर: महिला आरक्षण बिल, आठवी क़िस्त

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आरक्षण के भीतर आरक्षण के पक्ष में बसपा का वाक् आउट : नौवीं क़िस्त

डॉ. मनमोहन सिंह: लेकिन,  मुझे उनके भी नाम  का उल्लेख करना चाहिए ...

सीताराम येचुरी: पुरुषों ने भी योगदान दिया है

डॉ. मनमोहन सिंह: महोदय, कुछ माननीय सदस्यों ने कुछ आपत्तियां जताई हैं कि अगर अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्ग, और अनुसूचित जाति/जनजाति की अक्षमताओं को भी कुछ मान्यता दी जाती तो उन्हें अच्छा लगता. मुझे याद है और मैं स्वीकार भी करता हूं कि पहचानते हैं कि हमारे अल्पसंख्यकों कों हमारे विकास के फल का पर्याप्त हिस्सा नहीं मिला है.

डॉ. मनमोहन सिंह (जारी): हमारी सरकार हमारे अल्पसंख्यक समुदाय के सशक्तिकरण के लिए ईमानदारी से काम करने के लिए प्रतिबद्ध है. इसके कई अन्य तरीके हैं. प्रक्रिया पहले से ही शुरू हो चुकी है. हम सब पूरी ईमानदारी के साथ इस कार्य को करने में हिस्सेदारी करेंगे. यह विधेयक कोई अल्पसंख्यक विरोधी विधेयक नहीं है; यह एक अनुसूचित जाति विरोधी विधेयक नहीं है; यह एक अनुसूचित जनजाति विरोधी विधेयक नहीं है. यह एक ऐसा विधेयक है जो हमारी महिलाओं की मुक्ति की प्रक्रिया को आगे ले जाता है. यह एक प्रमुख और आगे बढ़ा हुआ  संयुक्त कदम है. यह एक ऐतिहासिक अवसर है जो उत्सव की मांग करता है. मैं इस सम्मानित सदन के हर सदस्य को धन्यवाद देता हूं. मैं श्रीमान सभापति महोदय, और श्रीमान उपसभापति महोदय को उनके भारी योगदान के लिए धन्यवाद देता हूं. उग्र घटनाओं के बाद, यह अंत ही है जो मायने रखता है. जैसा किसी ने कहा है, "आवाज को कोई पूछता नहीं, अंजाम अच्छा हो आदमी का." तो, इन शब्दों के साथ एक बार फिर से, मैं अपनी खुशी जाहिर करता हूं कि हम इस बहुत ही ऐतिहासिक पथप्रदर्शक कानून को अधिनियमित करने जा रहे हैं.

विधि एवं न्याय मंत्री (श्री एम. वीरप्पा मोइली): श्रीमान सभापति महोदय,  अरुण जेटली जी से शुरू होकर और अंत में,  हमारे प्रिय प्रधानमंत्री के समापन वक्तव्य तक 27 वक्ताओं सुनने के बाद, मैं ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहता हूं. लेकिन, आज एक ऐतिहासिक दिन है क्योंकि हम सभी अपनी मां का अपना कर्ज चुका रहे है. यह सबसे बड़ा दिन है. आज जब इस दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में महिलाओं का प्रतिशत 11.25 प्रतिशत से आगे नहीं बढ़ा है, इस तरह के एक कानून की आवश्यकता और अधिक है. वास्तव में, दुनिया का औसत ही 19 प्रतिशत है, यहां तक ​​कि एशियाई औसत 18.7 प्रतिशत है. यही कारण है कि आज निर्भीकता और एक दृष्टिकोण के साथ कार्य करने का समय आ गया है. महत्वपूर्ण दिन और कृत्य के एक सामान्य समय में उतनी आसानी से नहीं आते. जैसा कि कहा जाता है,  हिंसा एवं क्रोध के लिए समझ के रूप में उठाया गया एक कदम अंततः रचनात्मक विनाश की समझ होती है. कल और आज जो भी हुआ, मुझे, अंत में, अपने उदात्त सभापति की सहिष्णुता, लचीलेपन और अभूतपूर्व अशांति को संभालने के दौरान प्रदर्शित की गई उनकी सतर्क इच्छाशक्ति की सराहना करनी चाहिए. और, हाँ, आज वे विविधता में एकता वाले ऐसे मिलन के भी साक्षी बन रहे हैं.  मैं यह भी कहूंगा कि हमारी सभ्यता, हमारा इतिहास, हमारा दर्शन, हमारा धर्म लोगों को प्रेरणा देता रहेगा. अहिंसा के सिद्धांत के प्रति हमारी प्रतिबद्धता ने पूरी दुनिया के लिए अग्रदूत का काम किया है. आज, हमारे पास दुनिया को दिखाने के लिए एक अवसर है कि जब प्रगतिशील कदम उठाने की बात आती है तो हमारा देश पीछे नहीं हटता या देखता है, और आज उठाया गया कदम, एक महान कदम है.

 एम वीरप्पा मोइली (जारी): मैं उन सभी माननीय सदस्यों को, चाहे वे किसी भी पार्टी के हों, बधाई देना चाहूंगा जिन्होंने अपना हार्दिक समर्थन दिया है, जो एक यांत्रिक समर्थन नहीं है. कुछ गलतफहमियां है, जो दोनों सदन के अंदर और बाहर भी दोनों जगह व्यक्त की गई हैं. मैं कुछ को स्पष्ट करना चाहूंगा. इस संवैधानिक संशोधन को पारित करने के बाद,  एक कानून बनेगा  जो संसद द्वारा पारित किया जाएगा, जो सीटों के निर्धारण और कोटा से संबंधित निर्णय पर भी गौर करेगा, ताकि आज व्यक्त की गईं चिंताओं में से, निश्चित रूप से, कुछ को संबोधित किया जा सके. सीटों के निर्धारण और आरक्षण को भी सिर्फ परिसीमन अधिनियम की तरह एक अलग कानून के द्वारा संबोधित किया जाएगा. तो,  उसे संबोधित किया जाएगा. हमें उन मामलों पर गौर करने की जरूरत है और हम एक कानून लायेंगे.


 एस. एस. अहलूवालिया: महोदय, आपने कहा कि यह ' कोटा' है.

एम. वीरप्पा मोइली: वह गलती से कहा गया था…जुबान फिसल गई थी…वह गलती से कहा गया था.

रवि शंकर प्रसाद: उसे स्पष्ट किया जाना चाहिए.

एम. वीरप्पा मोइली: मुझे लगता है कि यह स्पष्ट है. अंतिम बात जो मैं स्पष्ट करना चाहता हूं, वह ओबीसी, अल्पसंख्यकों और बाकी के आरक्षण के बारे में है. आप सभी जानते हैं कि आज तक, हमने केवल अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण की व्यवस्था की है. हमारे पास पूरे देश के आंकड़े नहीं हैं, क्योंकि 1931 के बाद, कोई राष्ट्रीय जनगणना नहीं की गई है. एक राज्य में मौजूद कोई पिछड़ा वर्ग हो सकता है कि दूसरे राज्य में पिछड़े वर्ग नहीं हो. हम अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों के लिए वास्तविक आरक्षण चाहते हैं,  तो हमें कई अन्य मुद्दों का समाधान करने की जरूरत है. मैं इसे लम्बा नहीं करना चाहता. मैं इस सदन से विचार करने और पारित करने के लिए इस विधेयक की अनुशंसा करता हूं. धन्यवाद.
समाप्त
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