क्या भारत की बेटी है सिंगापुर की पहली महिला राष्ट्रपति (!)


सिंगापुर में बिना मतदान ही हलीमा याकूब को देश की पहली महिला राष्ट्रपति चुन लिया गया है। हालांकि, अब इस निर्वाचन को अलोकतांत्रिक बताकर लोग इसकी आलोचना कर रहे हैं। दरअसल, हलीमा को राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव का सामना इसलिए नहीं करना पड़ा क्योंकि प्रशासन ने इस पद पर खड़े होने के लिए उने विरोधियों को अयोग्य करार दिया था।




मुस्लिम मलय अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाली हलीमा याकूब संसद की पूर्व अध्यक्ष हैं। हालांकि, सिंगापुर में पहली बार ऐसा नहीं हो रहा है कि सरकार ने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों को आयोग्य करार दिया है जिसके बाद चुनाव अनावश्यक हो गया है। यहां दशकों से एक ही पार्टी सत्ता में है। देश में पहले से ही चुनाव की प्रक्रिया को लेकर अशांति थी क्योंकि ऐसा पहली बार हो रहा था जब खास जातीय समूह मलय समुदाय के लिए राष्ट्रपति पद आरक्षित कर दिया गया था लेकिन बिना वोट के ही हलीमा के हाथ में सत्ता सौंपने के फैसले ने लोगों को गुस्सा और बढ़ा दिया।

औपचारिक रूप से राष्ट्रपति बनने की घोषणा होने के बाद 63 साल की हलीमा की आलोचना सोशल मीडिया पर हो रही है। एक फेसबुक यूजर पेट इंग ने लिखा, बिना चुनाव के निर्वाचित, क्या मजाक है। राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने से पहले हलीमा सत्तारूढ़ ऐक्शन पार्टी से पिछले दो दशक से संसद सदस्य थी। हलीमा ने कहा, मैं सभी लोगों की राष्ट्रपति हूं। हालांकि चुनाव नहीं हुआ लेकिन आपकी सेवा करने की मेरी प्रतिबद्धा पहले जैसी ही है।



सिंगापुर की पहली महिला राष्ट्रपति  हलीमा एक मायने में ‘भारत की बेटी’हैं।  उनके अब्बा हिंदुस्तानी थे।  मुसलमान. चौकीदार थे. सरकारी मुलाजिम थे. हलीमा जब 8 साल की थीं, तब उनके अब्बा का  इंतकाल हो गया. पिता की मौत के बाद उनके परिवार को सरकारी क्वॉर्टर से जबरन बाहर निकाल दिया गया।  अम्मी पर परिवार की जिम्मेदारी आ गई।  अम्मी ने ठेली लगाकर परिवार का गुजारा चलाया।  मीडिया से बात करते हुए हलीमा ने खुद अपनी दास्तां सुनाई थी. उनकी अम्मी मलय समुदाय से हैं।  हलीमा के अलावा उनके चार और बच्चे भी थे. इनमें सबसे छोटी हैं हलीमा। मलय एक खास सांस्कृतिक समूह है। ये लोग ज्यादातर मलयेशिया, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, ब्रूनेई, सिंगापुर और दक्षिणी थाइलैंड के इलाकों में रहते हैं।

बहुत गरीबी में गुजरा बचपन

छोटी सी हलीमा भी मां की मदद करती थीं। सुबह 5 बजे जगकर मां के साथ लग जातीं।  बाजार जाकर सामान खरीदतीं. फिर स्कूल जातीं. क्लास में पिछली बेंच पर बैठतीं। नींद पूरी तो होती नहीं थी।  तो एक बार क्लास में ही सो गईं. उन्हें क्लास की खिड़की से बाहर झांकना बहुत पसंद था।  खुली आंखों से सपना देखना बहुत भाता था उनको।

नवभारत टाइम्स और लल्लन टॉप से साभार 


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