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‘संघियों तुम बलात्कार से पैदा हुए हो’ : क्यों कहा था गौरी लंकेश ने



संघियों, यदि आपकी माँ ने ‘फ्री सेक्स’ यानी ‘अपनी स्वतंत्र इच्छा से सेक्स’ नहीं किया है तो उसके दो मायने हैं. 
1. आप बलात्कार से पैदा हुए हो
2. या फिर तुम एक सेक्स वर्कर से पैदा हुए हो, जिसने सेक्स पैसे लेकर किये, अपनी इच्छा से और निःशुल्क नहीं. 
संघियों अब यह तुम पर निर्भर करता है कि तुम दो में से एक चुन लो या तो कहो कि तुम्हारी माँ ने ‘फ्री सेक्स किया’ या मेरे द्वारा ऊपर बताये गए दो ऑप्शन मान लो. मैं कविता कृष्णन और उसकी बहादुर माँ के साथ हूँ. 
यह अच्छा है कि मेरी माँ ने मेरे पिता के साथ ‘फ्री सेक्स’ किया है. और मुझे उनकी बेटी होने पर गर्व है. 


‘गौरी लंकेश पत्रिके’ की सम्पादक गौरी लंकेश की हत्या के बाद दक्षिणपंथी उपद्रवियों ने हत्या की जिम्मेवारी तो नहीं ली लेकिन उन्होंने ह्त्या का खूब जश्न मनाया. गौरी लंकेश को गालियाँ दी. उनके संघ विरोधी फेसबुक ट्वीटर पोस्ट खोजकर उनके खिलाफ राय बनाने की कोशिश की जा रही है. इसी क्रम में उपरोक्त फेसबुक पोस्ट भी वायरल किया गया है.

इस जमात को ऐसे मुद्दों को मोड़ने में महारत हासिल है. पहले यह कोशिश की गयी कि गौरी लंकेश की ह्त्या को माओवादियों द्वारा की गयी हत्या कहकर प्रचारित की जाये, लेकिन यह जमात ऐसा इसलिए नहीं कर पाया कि एक ओर तो वह यह कोशिश करते रहे दूसरी ओर ह्त्या का जश्न मनाते रहे. इस तरह यह पहली माओवादी हत्या होती जिसकी खुशी में हिंदुत्व के उपद्रवी समर्थक पटाखे फोड़ रहे हैं. जब उनकी खुशी उनके प्रोपगंडा पर भारी पडी तो अब यह कवायद है.

कवायद की तीर इतनी मारक है कि कल तक जो कुछ संवेदनशील लोग गौरी लंकेश की ह्त्या पर उपद्रवियों के खिलाफ मुखर थे वे इस पोस्ट के साथ आहत हैं. हालांकि इस पोस्ट में आपत्तिजनक कुछ भी नहीं है. इस पोस्ट की पृष्ठभूमि है 2016 में कविता कृष्णन द्वारा लिया गया स्टैंड. जेएनयू में फ्री सेक्स के  हिंदुत्ववादियों, भाजपाइयों और संघियों के आरोप में कविता ने ‘फ्री सेक्स’ को कुछ इसी अंदाज में व्याख्यायित किया था, जिसके बंद उपद्रवी ट्रॉल्स उन्हें और उनकी माँ को गालिया दे रहे थे. तब कविता की माँ लक्ष्मी कृष्णन ने भी विस्तृत लेख लिखकर कहा ‘फ्री सेक्स’ को इसी मायने में व्याख्यायित किया था जिस मायने में गौरी लिख रही हैं, बल्कि उन्होंने यह भी कहा था कि वे ‘फ्री सेक्स’ करती हैं.

गौरी लंकेश ने कविता के ट्रॉल्स के जवाब में यह पोस्ट लिखा था.

विचारों के पक्ष में तर्क और कटु तर्कों का सिलसिला न ह्त्या को जायज ठहरा सकता है और न मारे गये व्यक्ति को नरेंद मोदी के समर्थकों द्वारा कुतिया कहा जाना जायज सिद्ध होता है.

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
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विज्ञान पर हावी जातिवाद: ब्राहमण न होने पर नौकरानी के खिलाफ ब्राहमण वैज्ञानिक ने कराया मुकदमा

जातिवाद हमारे खून में किस तरह घुस गया है इसका ताजा उदाहरण है एक बड़े वैज्ञानिक की शिकायत। मेघा खोले भारतीय मौसम विभाग में बड़े पद पर हैं। पुलिस से की गई शिकायत में मेघा ने कहा है कि उसकी नौकरानी ने काम मांगने के दौरान अपनी जाति की पहचान छुपाई।

इससे उसकी भावना को ठेस पहुंची है।  पुणे स्थित आई.एम.डी. में डिप्टी डायरैक्टर (वैदर फॉरकासिंटिंग) मेघा ने पुलिस थाने में दर्ज करवाई एफ.आई.आर. में कहा कि काम मांगते वक्त उसकी नौकरानी ने झूठ बोला कि वह ब्राह्मण है।

यह झूठ बोलकर करीब एक साल तक वह उसके घर में काम करती रही।  गणेशोत्सव और श्राद्ध के दौरान घर में खाना बनाने के लिए मेघा ब्राह्मण नौकरानी चाहती थी। एक औरत ने उसे निर्मला से यह कर मिलवाया कि वह ब्राह्मण है। मेघा ने इसके लिए निर्मला का वैरीफिकेशन भी करवाया। इसके बाद निर्मला कई धार्मिक कार्यक्रम में मेघा के घर काम करने आई। करीब एक साल बाद मेघा की पुजारी ने उसे बताया कि निर्मला ब्राह्मण नहीं है।

साभार:नवोदय टाइम्स
 
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औरत का दिल

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ममता 

 विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं सहित आकाशवाणी में रचनाएं प्रकाशित और प्रसारित संपर्कmailtomamta.s@gmail.com

वह औरत का दिल तलाश रही थी। दरअसल एक दिन सुबह सवेरे उसने अखबार में एक खबर पढ़ ली थी जिसके मुताबिक एक जानी-मानी पाक कला मर्मज्ञ ने अपनी पाक कला की एक पुस्तक के लोकार्पण के मौके पर यह कहा कि उन्हीं के शब्दों में ‘‘पुरूषों के दिल का रास्ता पेट से होकर जाता है।’’ और तभी से वह औरत के दिल की तलाश में थी। इस बयानबाजी में वह जाना नहीं चाहती थी कि यह बात इस किस्म के पुरूषों पर खरी बैठती है और उस किस्म के पुरूषों पर नहीं बैठती है। यह बात उसने पहली बार नहीं सुनी थी और उसे यह भी मालूम था कि यह बात वह आखिरी बार  नहीं सुन रही है। उसने कई औरतों के मुँह से यह कहावत सुन रखी थी, वे कई औरतें हर उम्र हर क्लास की थीं, वे औरतें उसके घर की थीं और बाहिर की थी, वे औरतें पढ़ी लिखी थी और बेपढ़ी लिखी थी, वे औरतें घरेलू थीं लेकिन खास बात ये थी कि उन सब औरतों के स्वर एक जैसे थे।अक्सर उसे ताजुब्ब होता औरतें अलग अलग फिर स्वर एक से कैसे!!!! वैसे उसकी तलाश अपनी उम्र के शुरूआती काल में भी जारी थी। फर्क फकत इतना था कि उन दिनों उसके पास शब्दों की ऐसी बाज़ीगरी नहीं थी कि इसे वह कोई नाम दे सके। उन दिनों वह बस कुछ कन्फ्यूज रहने लग गई थी। उन दिनों उसने आलमारियों, रसोइयों, बर्तन, भांडों, चादरों, चूड़ियों और न जाने किस किस जगह औरत का दिल तलाश किया था। उसने मां की ऊँची आवाज़ सुनी तो उसे लगा यूरेका यूरेका, उन दिनों जब मां सुबह सवेरे नहाकर साढ़ी लपेटते हुए गीता के अठारहवें अध्याय का महात्म्य पढ़ती तो उसे लगता शायद यहीं है औरत का दिल। मां फिर आदमकद शीशे के सामने खड़ी होकर बिंदी लगाती तो उसे फिर लगता औरत का दिल तो यहीं है। मां मुंडेर पर बैठे कागे से ऐसे बातें करती जैसे वह घर का कोई मेम्बर हो और उसे उलाहने देती और कभी-कभी तो उसे उसकी शक्ल के बारे में कुछ ऐसा कहती  जो शायद उसे भी महसूस हो जाता और तभी  वह और जोर से कांव कांव करने लग जाता; इन सबके दौरान वह एक बार फिर सोच लिया करती कि यही तो है औरत का दिल। मां  आदमकद शीशे के सामने खड़ी होकर बिंदी लगाते हुए और बाल संवारते हुए और चेहरे को कभी दायें और बाएं करते हुए अपने जूड़े को देखने की कोशिश करती उन दिनों मां के बाल काले थे और उसके काले जूड़े पर सफेद घुंघरूओं के पिन उसे मां की पहचान लगते और उसे लगता यही सब ही तो है औरत का दिल और वह भी कुछ देर के लिए औरत बन जाती; मां की तरह बालों को कंघी से समेटने की विकल कोशिश करती और इन सबके दौरान उसे कई बार बल्कि बार-बार लगता कि यहीं है औरत का दिल………….।


वह तब छोटी ही थी और एक ऐसे स्कूल में पढ़ती थी जहाँ लड़के लड़कियाँ एक साथ पढ़ते थे लेकिन थोड़ी बड़ी होने पर उसका दाखिला लड़कियों के स्कूल में हुआ। दोनों स्कूलों में एक किस्म अंतर था जिसे वह बयान नहीं कर सकती थी पर जिसे वह बड़े ही साफ तौर पर महसूस जरूर कर सकती थी। जहाँ सिर्फ लड़कियां पढ़ती थी वहाँ खुलकर हंसने की आवाज़ आती और उसे लगता कि औरत का दिल यहीं है। जहाँ सिर्फ लड़कियां पढ़ती वहाँ वे गोशे भी करती जो दूर-दूर तक सुनाई तो नहीं पड़ते मगर जिनकी तफसील जानने के लिए कोई बहुत ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं होती और जिनका लब्बोलुआब आसानी से समझा और महसूस किया जा सकता था। गोशे हमेशा कुछ ऐसी बातों को लेकर किए जाते जिन्हें खुलकर करना लड़कियां मुनासिब नहीं समझती थी और बात यह थी कि वक्त बदल रहा था और जिसे हम सोसाइटी कहते हैं उसमें बहुत से लोग लड़कियों से खुलकर बात करने के पक्ष में थे मगर लड़कियां थी कि कन्विंस ही नहीं होती थी और गोशे करने से बाज़ नहीं आती थी और इसीलिए उसे लगने लगता था कि शायद लड़कियों का यानि कि औरत का दिल………..

कभी कभी लड़कियां स्कूल की उस खिड़की के पास खड़ी होकर गुफ्तगू करती जो बाहर सड़क की तरफ खुलती थी; उस गुफ्तगू के कईं विषय थे जिनमें से एक था कि पांचाली का बाॅयफ्रेंड तय समय पर उस सड़क से गुज़रा करता।  अक्सर लड़कियां ये सब करते हुए पकड़ ली जाती और सिस्टर प्रिंसिपल से 21वीं या 22वीं बार शिकायत करती कि स्कूल की चहारदीवारी को इस समर वैकेशन या उस बड़े दिन की छुट्टियों में ऊँची करना बेहद जरूरी है। हालांकि खिड़कियों पर महीन जालियाँ थी और उन जालियों पर मजबूत ग्रिल  थी जिसके आर-पार देखने वाले को चेहरे छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटे हुए ही नज़र आते थ,े चेहरों को आपस में जोडना और फिर एक मुकम्मल तस्वीर बनाना काफी मुश्किल हुआ करता और वह सोच लिया करती कि औरत का दिल शायद …
लड़कियां हमेशा उलझन में रहती कि सिस्टर रोजलीन संत क्यों हो गई। लड़कियां अलग-अलग और रंगीन कपड़ों में सिस्टर रोजलीन की कल्पना करती। सिस्टर रोजलीन को कान्वेंट में सब सिस्टर रोज कहकर पुकारते और दरअसल उनकी खूबसूरती किसी गुलाब की तरह ही थी। वैसे ही कोमल और उतनी ही खूबसूरत और उतनी ही गुलाबी। फिर एक दिन खबर आई कि सिस्टर रोज ने फाइनल वाउ से पहले अपना फैसला बदल लिया और वे नन नहीं बनी। लड़कियां उस दिन बहुत खुश थी। क्यों लड़कियां उन्हें संत नहीं होने देना चाहती थी क्या यहीं बसता है औरत का दिल… वह उस दिन सोचने लग गई थी। हर साल स्कूल में एक एनवल फंक्शन हुआ करता जिसमें लड़कियां रंग बिरंगी चुनरियां पहनती जिनपर सुनहरे बूंदे लगे होते; लड़कियां चुनरियां पहनती और पैरों में घुंघरू बांध कर इधर उधर तेजी से आती जाती तो उनके घुंघरूओं की आवाज़ में एक लय और ताल होते जो दिल में उतर जाते और लड़कियां उस दिन बड़ी खुश नजर आती तो वह सोच में पड़ जाती कि औरत का दिल..

एक दिन लड़कियां फिर गोशे करने लग गई कि नौवीं क्लास में पढ़नेवाली पूर्णिमा का व्याह हो गया। लड़कियां उस दिन बहुत व्यस्त नज़र आई। लंच ब्रेक में सारी लड़कियां अपने-अपने तरीके से व्यस्त नज़र आई, कुछ उसे खास दूरी से और खास कोणों से देखता चाहती थी; कुछ उससे खास बातें करना चाहती थीं; कुछ चाहती तो बहुत कुछ थी लेकिन अपनी चाहना को वर्जित समझ कर दूर-दूर रहने को मजबूर थीं; कुछ व्यथित थी क्योंकि वे बचपन में ही जीना और रहना चाहती थीं । सिस्टर मारिया ग्रेस की पैनी नज़र लड़कियों के बीच जो नहीं होता उसे भी सुनने और महसूस करने में माहिर थी और उनकी नज़र कान्वेंट के अंदर होने वाली हर हरकत पर रहती थी। उस दिन वह थोड़ी कन्फ्यूज़ हो गई थी और उसे लगा कि लड़कियों के हर मूव में तो औरत का दिल तलाश किया ही जा सकता है और साथ ही सिस्टर मारिया ग्रेस के बिहेवियर में भी तो एक औरत का ही दिल है…
कुछ ऐसी भी लड़कियां थी इर्द गिर्द जो फिजिक्स, गणित और इतिहास, भूगोल पढ़ती और झांसी की रानी या फिर पुष्प की अभिलाषा और कदम्ब का पेड़ जैसी कविताएं कंठस्थ करती। ऐसा करते हुए वे लड़कियां हेड सिस्टर की नज़रों में थोड़ी ऊपर उठ जाती। लड़कियों को हेड सिस्टर ने ‘ये लड़कियां’ और ‘वे लड़कियां’ जैसे खांचों में डाल दिया था और एक किस्म की लड़कियों को दूसरे किस्म की लड़कियों के सामने एक्ज़ाम्पल बनाकर पेश करना शुरु कर दिया था। उसे समझ नहीं आता था कि हेड सिस्टर ने लड़कियों को अलग-अलग खांचों में विभक्त क्यों कर दिया था और उसे हमेशा यह लगता था कि औरत का दिल तो कहीं भी हो सकता है, पहले किस्म की लड़कियों में या फिर दूसरे किस्म की लड़कियों में और इसमें ऐसी या वैसी बात कहां है ???
स्कूल के दिन जब खत्म हो गए तो सामने काॅलेज के दिन आ गए जहां हेड सिस्टर की बंदिशें नहीं थी। लड़कियां यहां लाइब्रेरी के बाहर बने सीमेंट के चबूतरे पर फील्ड के किनारे लगे बेंचों पर कैंटीन में, आॅडीटोरियम की सीढ़ियों पर या फिर खाली क्लास रूम की लास्ट बेंच पर नज़र आती थीं। लड़कियां वहां रंग बिरंगे कपड़े पहनती थी। तरह-तरह के हेयर स्टाइल अपनाती थी, कक्षा में आजादी की खुशबू सी तारी थी और तब उसे लगने लग गया था कि बस तलाश अब खत्म समझो औरत का दिल..

उसने महसूस किया था कि काॅलेज में आकर अब लड़कियों की बदमाशियों में कुछ इजाफा हो गया था; वे अब चुहलबाजियां करती थीं और उन्होंने सीटियां बजाना भी सीख लिया था। उनकी वोकैबलरी अब थोड़ी बोल्ड हो गई थी, मसलन अब वे कहा करती ‘बड़ी सेक्सी लग रही हो…’ लेकिन कुछ लड़कियां सहमी हुई रहा करती; वे कम बोलती और उनकी नज़रें हमेशा सामने की तरफ रहा करती मानो इधर उधर देखना उनकी आचार संहिता के खिलाफ हो; उनके कपड़े चुस्त नहीं होते और उनके बालों में रूखाई भी नहीं होती। यहां लड़कियों को अलग अलग खांचों में डालने वाला कोई नहीं था। उसे लगता था कि यह सही है और इन दोनों तरह की लड़कियों में कोई ऐसी  या वैसी बात नहीं है और उसे यह भी लगता था कि औरत का दिल तो कहीं भी हो सकता है, इसलिए इस कदर खांचे तैयार करना सही नहीं है। लेकिन एक दिन अंग्रेजी की क्लास में ऐसा कुछ हुआ कि दरअसल उस दिन गुणवंती अरोड़ा ने कुछ लड़कियों को इसलिए क्लास से निकाल दिया क्योंकि बकौल गुणवंती अरोड़ा लड़कियां उनका लेक्चर ध्यान से नहीं सुन रही थी, उनका ध्यान न जाने कहाँ था और वे हौले-हौले मुस्कुरा भी रही थी। गुणवंती अरोड़ा ने यह भी कहा कि इन कुछ लड़कियों के ऐसा करने से बाकी लड़कियों का भी ध्यान भंग होगा। इसलिए उन लड़कियों को बचाने के लिए उसने इन लड़कियों को बाहर निकाल दिया था। उसे लगता था कि लड़कियों को इस कदर ‘इन लड़कियों’ और ‘उन लड़कियों’ में बांटना वाजिब नहीं था और फिर वही बात कि  औरत का दिल तो कहीं भी हो सकता है.

फिर एक कुछ अलग किस्म का हुआ। सेकेंड ईयर की गीता इस्सर के लिए लड़कियां आहें भरने लग गईं। गीता इस्सर के घरवालों को उसके लिए लड़का मिल गया था और उन्हें डर था जब वह डिग्री लेकर निकलेगी तो इतनी बडी और काबिल हो जाएगी कि  लड़का मिलने में दिक्कतें पेश आएंगी। यह सब वैसे लड़कियों की समझ से बाहर था लेकिन लड़कियां इतनी नासमझ भी नहीं थी और वे जोर जोर से आहें भर रही थीं। अनकी आहें काॅलेज के गलियारों में सुनाई दे रही थी; उनकी आहें गलियारों की ऊँची-ऊँची छतों से टकरा-टकरा कर बिखर रही थी और उनकी आहें लाइब्रेरी के बुकशेल्फों के बीच की खाली जगहों में भर जाया करती थीं। गीता इस्सर के चेहरे पर कुछ ही दिनों  में काले काले धब्बे जमा हो गए और लोग कहते थे कि उसे खून की कमी हो गई है। इस सबके दौरान वह बार-बार औरत का दिल तलाश करती रही थी।

इतने दिनों में एक और बात जो उसे खास लगती थी वह ये थी कि औरत का दिल ढूंढ़ने के लिए हमेशा ऊपर की तरफ देखने की जरूरत नहीं थी जैसे कि हमेशा किसी इंदिरा नूई और चंदा कोचर या फिर इन जैसी ही ऊँचाई पर पहुँची हुई औरतों को देखने की जरूरत नहीं थी। और उसे लगता था कि औरत का दिल कहीं भी किसी क ख ग और घ में क्यों नहीं तलाश किया जा सकता है।

मसलन क का केस देखें …
क छह बेटियों को जन्म देने के बाद घर से बेदखल होने की लड़ाई में जीत हासिल कर चुकी थी। क की तुलना किसी सफल उद्यमी से की जा सकती है क्योंकि यह लडाई किसी  जोखिम भरे उद्यम से कम न थी और एक समय तो ऐसा भी आया जब जान जाने का पूरा खतरा था। क ने अपने घर में ऐसा समय देखा था जब छह बेटियां होने की वजह से उसके घरवाले पति की दूसरी शादी की तैयारी कर चुके थे। फिर एक दिन उसने अपना घुंघट हटा कर आसपास की दुनिया को देखा और अपनी आवाज़ में जरा दम भरा। क की घटना को सुनकर उसे थोड़ी राहत मिली थी कि चलो कहीं तो है उसने मजाज का शेर एक कागज पर लिखा कि ‘तेरे माथे पे ये आंचल बहुत ही खूब है लेकिन तू इस आंचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था’उसने उस कागज को अपनी मेज के कांच के नीचे डाल दिया था । क ने अपनी बेटियों को अपनी ताकत बना लिया था। अम्मां हमेशा कहा करती थी कि गुंथे हुए सर पर हर कोई हाथ फेरना चाहता है। तो क ने जब से बेटियों को अपनी ताकत बना लिया था उसके हालात अच्छे हुए थे उसके घरवालों की शिकायतें थी अब तारीफों में बदल  गई थी। लेकिन हर केस क की तरह सफल नहीं हो सकता।

 ख का केस कुछ अलग ऐसे था कि  उसके घर के हालात अच्छे थे वह खुद पुलिस की नौकरी में थी और उसकी दो बड़ी प्यारी बेटियां थीं लेकिन घर के बड़े बुजुर्गों ने एक दिन ख के पति का रिश्ता तय कर दिर्या दरअसल उन्हें एक वारिस की जरूरत थी और इन सब बातों में उनकी कतई दिलचस्पी नहीं थी कि दो प्यारी बेटियां भी तो वारिस ही हैं बहरहाल कुछ लोगों ने उसे साइड से यह सलाह भी दी थी कि ऐसे बेशर्म लोगों के लिए ही तो दरअसल कानून के दरवाजे खोलकर रखे गए हैं लेकिन ख के दिल में कोई भी जरूरत भर हिम्मत नहीं जगा पाया था। ख ने भांडे बर्तन पटके और दरवाजों पर अपना सर  पटका  ख खुले बालों में घर से बाहर सडकों पर बदहवास सी दौडी; ख अपने दफतर के अफसरों से मिली लेकिन ख के ससुर ने उसे साफ हिदायत दे दी कि यह शादी तो होकर रहेगी और अगर ख को यह पसंद नहीं है तो वह जा सकती है। यह एक अजीब सी कहानी थी ख के पास वह सब कुछ था जो एक औरत को ताकतवर बनाता है लेकिन उसके पास बहुत कुछ नहीं था और वह अपनी लड़ाई हार गई। उसे लगता है कि औरत का दिल यहां क्यूं उलझा हुआ है; उसे लगता है कि ख जिसे लड़ाई समझ कर खुद को हारा हुआ महसूस कर रही है क्या वाकई वह कोई लड़ाई है… लेकिन ख को समझाना इतना आसान नहीं है। अब वह वहीं एक तरफ दो कमरों के घर में रहती है अपनी लड़कियों  के बालों को कसकर बांधती है उन्हें सवेरे स्कूल भेजती है और ख़ुद ड्यूटी पर जाती है। मगर ख खुश नहीं रहती है। वह ख के बारे में सोचती है और उसे लगता है कि औरत का दिल किसी सूखे हुए पेड की ऊँची टहनी पर अटका हुआ है जिसे देखा तो जा सकता है लेकिन उतारा नहीं जा सकता।

 ग की कहानी इन दोनों से अलग है उसके पास स्टेटस है, कार है बंगला है एक सफेद पामेरेनियन कुत्ता है और रहने का सलीका है…मोटे तौर पर कह सकते हैं ग के पास भी वह सब कुछ है जो किसी औरत को ताकतवर बना सकता है पैसा, शोहरत एक मजबूत परिवार और अक्ल भी। ग कुछ चीजों के बारे में बड़ी पर्टीकुलर हैं मसलन अगर उसके सफेद छोटे से प्यारे कुत्ते को कोई ‘कुत्ता’  कहता  तो वह उसे गोद में उठाकर पुचकारने लगती है।

ग को देखकर वह वाकई बहुत खुश हुई थी और उसे लगा था थोड़ा सा ही सही मगर कहीं तो मिला… औरत का दिल… उसे खुश हुए थोड़ा ही अरसा हुआ था जब उसने एक दिन देखा ग कुछ छुपाने की कोशिश में लगी है उसके कान खड़े हो गए। उसने ग को बहुत कुरेदा बहुत फुसलाया बहुत बहलाया लेकिन ग खुशी का  इज़हार ही करती रही। दरअसल उसने गौर किया एक दिन कि अपने बाएं कंधे से थोड़ा ऊपर गर्दन जहां शुरू होती है वहां ग अपने दुपट्टे को कसकर लपेट लेती है ग का पूरा ध्यान जैसे दुपट्टे को कसकर लपेटने में लगा हुआ है। उसे लगा  अगर आज कोई उसके कुत्ते को कुत्ता कह देगा तो वह उसे गोद में लेकर पुचकारेगी भी नहीं। ग की दुपट्टा लपेटने की इस जद्दोजहद में कोई राज है क्या? वह ग से इशारे में पूछ ही डालती है ऊँगली के इशारे से वह पूछती है… ‘वहां क्या’… जवाब में ग दो तीन बार पलके  झपकाती है मानो कुछ साफ दिखाई न दे रहा हो… उसे लगता है ग की इस भावना का सम्मान किया जाना भी तो जरूरी है कुछ पल के लिए उसे यह भी लगता है कि शायद औरत का दिल…

 उसे फिर भी शक नहीं होता अगर ग के उस निशान का रंग नीला नहीं होता। ग के पास सब कुछ ऐसा था जिसे देखकर ईष्र्या हो सकती है मतलब कि कुछ ऐसा लग सकता है कि  जिंदगी हो तो ऐसी ही… इस बार उसे लगा था कि कितना अच्छा होता अगर औरत का दिल इस बार उसे मिल पाता  और यह भी कि कितना सुकून है ग की जिंदगी में …आजकल इसे डोमेस्टिक वायलेंस का नाम दिया गया है। एक दिन ग ने खुद ही बात की शुरूआत की थी।हाँ तो क्या आपको इसके खिलाफ कुछ कहना  नहीं चाहिए ? उसनेे  कहा था। शायद कुछ बातें किताबों में ज्यादा आसान लगती हैं… ग ने उत्तर दिया था । कुछ दिनों बाद उसने दुपट्टे को कसकर लपेटना छोड़ दिया था। उसने देखा अब वहाँ कोई निशान नहीं था।

 ‘घ’ का किस्सा तो बिल्कुल ही अलग था और पहली बार उसे लगता था कि ऐसी ही किसी जगह औरत के दिल को होना चाहिए।  ‘घ’ की जिंदगी बड़े कामों के लिए थी।  वह बड़ी-बड़ी बहसों में भागीदार बनने की कोशिश करती थी वह सरोकार वाली फिल्में देखती और उनसे असहज भी हो जाती थी। वह खाली जगहों को पेड़ों से भरना चाहती थी और सर्दियों में गरीबों में कम्बल बांटना चाहती थी। वह कुछ दूसरी औरतों के लिए दिल में जगह रखती थी। वह जैसे चाहे वैसे चलने और रुकने की ताकत रखती थी वह जैसे चाहे बोलने और चुप हो जाने की ताकत भी रखती थी तो यहाँ है औरत का दिल। पूरी तरह दिखाई देने वाला मजबूती से धड़कता हुआ… उसे लगा था बिल्कुल साफ दिख रहा है कि औरत का दिल है और अपनी पूरी ताकत के साथ अपना वजूद लिए हुए दिखाई दे रहा है। फिर उसने माॅरल आॅफ द स्टोरी निकालने की कोशिश की थी और इस नतीजे पर पहुँची थी कि औरत का दिल तो इन सभी के पास था। मतलब क ख ग घ और सिस्टर रोज ; मारिया ग्रेस और खिड़कियों के करीब गोशे करती लड़कियों और कैंपस में यहां वहां घूमती और बैठती लड़कियों के पास और गीता इस्सर के व्याह की सुन आहें भरती लड़कियों के पास… अगर दिखाई नहीं देता या शायद इसकी वजह यही थी कि उन सबके दिल की धड़कन थोड़ी फ्रेजाइल हो गई थी या फिर उन्होंने अपने वजूद को यही खड़ा नहीं होने दिया था शायद या फिर वे चाहती ही नहीं थी कि दिल जैसी किसी चीज का पता लोगों को लगे या फिर उन्हें पता ही नहीं था कि देह के अंदर दिल जैसी कोई चीज भी होती है…

कई दिनों से आपसे एक बात पूछना चाह रही थी अम्माँ उसे मन हुआ था एक दिन अम्मां से सवाल करने का और उसने पूछा था अम्मां से।
‘ मां मुझे एक चीज की तलाश है बड़े दिनों से और वह मिल नहीं रही ।
. कौन सी चीज।
‘औरत का दिल’
उसने मां कोे हमेशा पल्लू में ही देखा या जब कभी मां के सर से पल्लू गिरता तो उनके हाथ बड़े ही स्वाभाविक तरीके से पल्लू की तरफ चले जाते और वह पल्लू को वापस सर पर खींच लेती। उनके सर पर पल्लू होना उतनी ही स्वाभाविक सी बात थी जितनी गिरे हुए पल्लू को तुरंत वापस अपनी जगह पर कर देना… पल्लू कभी उनके लिए परेशानी का सबब रहा हो- ऐसा उन्हें देखकर कभी नहीं लगा।



जिस समय उसने सवाल किया  उस वक्त अम्मां दहलीज़ से बाहर निकल कर चारदीवारी के पास लगे तुलसी के बूटे में पानी देने जा रही थी और उसके हाथ में एक लोटा था; उसका सवाल सुनकर मां ने इस तेजी से पीछे मुड़कर देख कि उनका पल्लू बेतरतीब होकर सर से हट गया और अपने होशोहवास में पहली दफे उसने देखा कि मां ने हटे हुए पल्लू को वापिस अपनी जगह पर लाने की कोई कोशिश नहीं की। वह अपने सवाल से कम और मां की इस बात से ज्यादा भयभीत हो गई थी।
‘औरत का दिल … हूँह … अब तो मुझे लगता है वो है भी या नहीं उसके अंदर…. मुझे तो एनाटाॅमि ही बदल गई लगती है…

उस दिन मां बिना पल्लू ही बाहर निकल ली थी! तो क्या वह सब झूठ था? मां का नहाकर साड़ी लपेटते हुए गीता के अठारहवे अध्याय का महात्मय बांचना और आईने के सामने खड़े होकर मत्थे पर बिंदी लगाना… और फिर तुलसी को भर लोटा पानी डालना और जोत जलाना जो देर तक जलती रहे… और भी वह सब कुछ करना जो वह पिछले 25-30, 31 या 35 बरसों से करती थी….

-तू एक्जीबिशन में जाती रहती है न ... कहीं तुलसी के लिए सुंदर सा पाॅट दिखे  तो मेरे वास्ते एक लेती आना… आजकल’ सुना है बड़े सुंदर-सुंदर निकले हैं वो सृष्टि की मां है न  वह बता रही थी……………………..’
.मां बिल्कुल नार्मल थी बिल्कुल ही नार्मल!!!

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सलवार-कमीज़ में पहलवानी ! भारत की पहली महिला रेसलर

हरियाणा की कविता दलाल डब्ल्यूडब्ल्यूई के रेसलिंग रिंग में जब सलवार कमीज पहनकर उतरीं तो उन्होंने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा.


न्यूजीलैंड की रेसलर डकोटा काई के ख़िलाफ़ उनकी पहली लड़ाई का वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो रहा है.
कविता भारत की पहली महिला रेसलर हैं जो डब्ल्यूडब्ल्यूई में पहुंची हैं.

यूट्यूब पर अपलोड किए गए उनके वीडियो को पांच दिनों के भीतर 35 लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं.
अपनी ताकत का लोहा मनवाने वालीं कविता कभी इतनी कमज़ोर पड़ गई थीं कि उन्होंने आत्महत्या की भी कोशिश की थी.


बीबीसी से बात करते हुए कविता ने बताया, “यह वक्त तब आया था जब मेरा बच्चा आठ या नौ महीने का था. परिवार की तरफ़ से भी सपोर्ट नहीं मिल रहा था. एक समय आया जब मैंने खेल छोड़ने का फ़ैसला किया. मुझे जिंदगी भारी लगने लगी थी. मैं सांस नहीं ले पा रही थी.”

वो बताती हैं, “मैंने बचपन से जो सपने पाले थे उसे एक क्षण में ख़त्म होते नहीं देखना चाहती थी. साल 2013 में मैंने आत्महत्या करने की कोशिश की. हालांकि मैं इसमें असफल रही. मैं इतनी परेशान थी कि बच्चे का भी ख्याल नहीं आया.”

कविता बताती हैं कि उनकी आत्महत्या की सोच ग़लत थी. वो परिवार, बच्चे और खेल के बीच समन्वय नहीं बिठा पा रही थी. उनके ससुराल से भी उन्हें सपोर्ट नहीं मिल रहा था.

वह कहती हैं, “मैं खेलना चाहती थी. पर मेरे पति तैयार नहीं थे. शायद उन पर पारिवारिक जिम्मेदारियां ज्यादा थी. आज मेरे पति मुझपर गर्व करते हैं और मेरा साथ देते हैं.”

सूट सलवार पहनकर क्यों लड़ा?


डब्ल्यूडब्ल्यूई के रिंग में सूट सलवार पहनकर लड़ने के पीछे क्या मकसद था, इस सवाल पर कविता कहती हैं, “मैं अपने देश की संस्कृति को बढ़ावा देना चाहती थी. दूसरी सोच यह थी कि मैं ये बताना चाहती थी कि पहनावा रेसलिंग के आड़े नहीं आता.”

वे कहती हैं, “आप सूट सलवार में भी रेसलिंग कर सकते हैं. ऐसी धारणा है कि डब्ल्यूडब्ल्यूई में एक ख़ास तरह के कपड़े पहनकर लड़ा जा सकता है. मैं इसे बदलना चाहती थी.”

कविता वेट लिफ्टिंग में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई मेडल जीत चुकी हैं. वो डब्ल्यूडब्ल्यूई के पूर्व चैंपियन द ग्रेट खली से ट्रेनिंग लेती हैं.

ऐसे आईं रेसलिंग में


वेट लिफ्टिंग से रेसलिंग में आने का उनका सफर भी काफ़ी रोचक रहा है. उन्होंने बताया, “रेसलिंग में आने की योजना नहीं थी. एक बार मैं द ग्रेट खली के कोचिंग सेंटर में फ़ाइट देखने गई थी. एक पुरुष रेसलर ने फ़ाइट जीतने के बाद पूरी भीड़ को ललकारा.”

कविता आगे कहती हैं, “उसकी आवाज़ में घमंड था. उस समय मैं सूट सलवार में थी. मैं अपने परिवार के साथ थी. मैंने अपना हाथ उठा दिया. मैं रेसलिंग रिंग में गई और जोश में उसे पटकनी दे दी. खली सर को यह बात अच्छी लगी और उन्होंने मुझे ट्रेनिंग लेने को कहा. वहीं से मैं रेसलिंग करने लगी.”

कविता अपनी सफलता का श्रेय अपने बड़े भाई संजय दलाल को देते हुए कहती हैं, “मेरी करियर की शुरुआत साल 2002 में फरीदाबाद से हुई. मेरे बड़े भाई संजय दलाल मुझे कई जगहों पर ट्रेनिंग दिलाई. फरीदाबाद के बाद बरेली, लखनऊ तक गई. वहां वेट लिफ्टिंग की ट्रेनिंग ली. साल 2007 में पहली बार नेशनल चैंपियनशिप ओडिशा में जीती. वो हमेशा मेरे साथ रहे.”

अब विदेशी ट्रेनर कविता को रेसलिंग के दाव-पेंच सिखा रहे हैं. वह हर रोज़ ढाई घंटे प्रैक्टिस करती हैं. एक महिला के तौर पर वे अपने सफर को चुनौतियों से भरा बताती हैं.

वह कहती हैं, “एक लड़की के लिए सफर आसान नहीं होता है. हमारे समाज में लड़कियों का घर से निकलना बहुत मुश्किल होता था. यहां तक कि घर में तेज़ आवाज़ में बात करने की भी इजाज़त नहीं होती थी.”

वो कहती हैं, “ऐसे माहौल में मैं साल 2002 में घर से बाहर पढ़ने के लिए निकली थी. घर, परिवार, समाज, हर तरह से तकलीफें आईं. घरवालों को जितनी चिंता नहीं होती है, उससे ज्यादा आस-पड़ोस, परिवार और रिश्तेदारों को होती है. वो ज्यादा सवाल खड़ा करते हैं. “आने वाले दिनों में कविता देश के लिए डब्ल्यूडब्ल्यूई चैंपियनशिप जीतना चाहती हैं.

साभार: बी.बी.सी.
 
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वे कहती थी :’आवेग पूर्वक कथन सबसे ईमानदार प्रतिक्रिया है’



चैतन्य  के.एम


“सोशल मीडिया पर आप जो पोस्ट करती हैं उसमें सावधानी बरतें. हम खतरनाक समय में जी रहे हैं” मैंने पिछले सप्ताह गौरी लंकेश से कहा था. उसने जवाब में कहा, “हम इतने भी मृत नहीं हो सकते. व्यक्त करना और प्रतिक्रिया देना मानवीय कृत्य है.हम जो आवेगपूर्वक महसूस करते हैं वह प्राय: हमारी सबसे ईमानदार प्रतिक्रिया होती है।”

हत्या के विरुद्ध में जुटे पत्रकार (दिल्ली)

मंगलवार की रात को, निर्दयता से उनको गोली मारकर हत्या कर दी गई. यह हत्या आवेग/आवेश में आकर नही की गई थी. यह सुविचारित और योजनाबद्ध थी. जैसे कि महाराष्ट्र और कर्नाटक में तर्कवादी और विचारक नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे और एम.एम. कलबुर्गी की हत्याएं थी जिनकी ख़ुद लंकेश ने निंदा की और विरोध किया था.


मैं लेखकों के एक परिवार में बड़ा हुआ हूँ. मेरे पिता के. मारुलाससिद्धप्पा और गौरी के पिता पी लंकेस, सहकर्मी और करीबी मित्र थे। लंकेश  अंग्रेजी के एक व्याख्याता थे और मेरे पिता ने कन्नड़ पढ़ाई.

हम एक ही पड़ोस में रहते थे. मेरी मां अक्सर मुझे  लंकेश परिवार की देखभाल में छोड़ दिया करती थीं। जब कभी मैं गौरी के साथ तर्क करता था, वह मजाक करते हुए कहती थीं, “मगन(बेटा )जब तुमको बोलना भी नहीं आता था तब से मैं तुमको गोद में खिला रही हूँ.”

बेंगलूर में विरोध प्रदर्शन

लेकिन गौरी में सबसे अच्छी ख़ूबी यह थी कि कोई उसके साथ कभी भी बहस कर सकता था, विचार-विमर्श कर सकता था तथा बता सकता था कि वह ग़लत हैं. और हमारे तर्क कितने भी उग्र क्यों न हो, हमने जो भी कहा हो, उन्होंने हमारे बोलने के अधिकार का हमेशा सम्मान किया. हम करीबी मित्र थे क्योंकि हम एक-दूसरे से असहमत हो सकते थे. यह एक ऐसा गुण था जो कि उन्हें अपने पिता से विरासत में मिला था.

गौरी के पिता एक तेजतर्रार लेखक और विचारक थे। 1980 में उन्होंने काले और सफेद रंगों में लंकेश पत्रिके , एक लघु समाचार-पत्र प्रारंभ किया था. यह विज्ञापन-रहित समाचार-पत्र था.  लंकेश का मानना था कि प्रकाशन समृद्ध घरानों या शक्तिशाली सरकारी अधिकारियों और राजनेताओं का पक्ष करने के अधीन हो चुके हैं क्योंकि ये विज्ञापनों को प्रायोजित करते  हैं जो कि एक अख़बार के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए ज़रूरी है. लंकेश का मानना था कि यह पत्रकारिता की प्रमाणिकता और सत्यनिष्ठा को ख़तम कर देगा. उन्होंने फैसला किया कि लंकेश पत्रिके पुर्णता: प्रसार और वितरण  पर चलेगी।

वह भारत के मीडिया के लिए एक अलग युग था। प्रिंट माध्यम शक्तिशाली था। दूरदर्शन टेलीविजन और आकाशवाणी पर राज्य का स्वामित्व था और  नीर्जिवाणुक सरकार के समाचारों संस्करणों को प्रसारित करते थे. प्रिंट ही एकमात्र स्वतंत्र अन्तराल था.

एक समाजवादी और तर्कसंगत विचारक, लंकेश उदार विचारों की एक पथप्रदर्शक बने। जहां भी उन्होंने जातिवाद और सांप्रदायिकता को देखा, उसको उन्होंने उजागर किया। उन्होंने विद्रोही और मुखर युवा विचारकों को ढूँढा और उन्हें संरक्षित किया जेसे विद्वान डी.आर. नागराज और कवि सिद्दलिंगेह जो आगे चलकर कन्नड़ संस्कृति और राजनीतिक विचारों में महत्वपूर्ण आवाज बने। लेकिन उन्होंने कभी अपने बच्चों को उनकी कार्यों का संचालन करने के लिए तैयार नहीं किया.

गौरी लंकेश ने एक बार कहा था कि वह डॉक्टर बनना चाहती हैं। जब ऐसा नहीं हुआ, तब वह पत्रकारिता की ओर मुड़ गईं। उन्होंने अंग्रेजी प्रेस में अपना करियर शुरूआत की और टाइम्स ऑफ इंडिया, सन्डे और इंडिया टुडे जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशनों के साथ काम करने के बाद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में ईनाडू टीवी के साथ उन्होंने धावा बोल दिया.

उनके भाई-बहन इंद्रजीत और कविता ने सिनेमा में कदम रखा। 24 जनवरी 2000 को, पी. लंकेश ने उस सप्ताह के लंकेश पत्रिक के लिए अपना स्तंभ लिखा और उस संस्करण को पूर्ण कर दिया। अगली सुबह, उनकी म्रत्यु हो गयी थी. यह आकस्मिक और अकल्पित था. वे हमारे बीच नहीं थे परन्तु उन्होंने पत्रकारिता में सम्मानित और श्रद्धेय छाप अपने पीछे छोड़ी थी।

भाई-बहन मणि के पास गए, संज वाणी और दिना सुदर्श के प्रकाशक, जो कि लंकेश पत्रिके  भी प्रकाशित करते थे, और उनसे कहा कि वे अपने पिता के लघु समाचार-पत्र को बंद करना चाहते हैं. गौरी ने महसूस किया कि उनके पिता ने अपने बच्चों को कभी भी अख़बार का कार्यभार संभालने के लिए तैयार नहीं किया।  उन्होंने यह नहीं सोचा था कि वे इसके “स्वाभाविक” उत्तराधिकारी  थे. वे लोग जो उनके क़रीबी थे, उन्होंने कहा, “हम उनकी जगह कभी नहीं ले सकते”.

माना जाता है कि मणि ने उन्हें डांट लगा दी थी। उन्होंने उनसे कहा कि उन्हें अख़बार को एक ओर जुझारू मौका देना चाहिए। उसके भाई इंद्रजीत ने यह फैसला किया कि वे अपने पिता के नाम पर अख़बार को जारी रखेंगे। गौरी ने अपना स्वयं का अख़बार शुरू किया, और इसका नाम था गौरी लंकेश पत्रिके। जब तक उसने इसे शुरू किया, तब तक वे 16 साल की पत्रकारिता भी कर चुकी थीं. मीडिया का इलेक्ट्रॉनिक पक्ष तेजी से बढ़ रहा था. ज्यादातर कन्नड़ लघु समाचार-पत्रों का संचलन घट रहा था। वह एक ऐसे उद्यम पर काम कर रही थी, जो दिन-प्रतिदिन आर्थिक रूप से कमजोर होता चला जा रहा था।

गौरी अपने पिता के आदर्शों के प्रति सजग थी  उनका अखबार धर्मनिरपेक्षता, दलितों के अधिकार, पीड़ितों और महिलाओं के मुद्दों पर मुखर था. और उसने अपने पिता की तेजतर्रार प्रकृति को अपने लेखन में जीवित रखा। जबकि दक्षिणपंथी और जाति आधारित राजनीति की आलोचना करते हुए लंकेश ने कभी शब्दों को नहीं भरा.

उन्होंने फेसबुक और ट्विटर पर विभिन्न राजनैतिक मुद्दों पर अपने निडर और स्पष्ट विचारों को प्रदर्शित किया है। वह लोगों या विचारों के बारे में भावुक होने पर शर्मिन्दा नहीं होती थीं। पिछले साल, कन्हैया कुमार के भाषण सुनने के बाद, उन्होंने उसे बेंगलुरु में आमंत्रित किया था। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा और उसे अपना बेटा कहा।

लंकेश को कई दफा ट्रोल किया गया और कई नामों से बुलाया जाता था. ये वही लोग थे जो उनको उनको छोटा दिखाना चाहते थे और वह सिर्फ अपने पिता की प्रतिष्ठता का आनंद उठा रही थी। उन्हें नक्सल सहानुभूति, राष्ट्र विरोधी, हिंदू-विरोधी और अन्य नामों के ना से बुलाया गया है। लेकिन इनमें से किसी भी बात ने उन्हें विक्षुब्ध नहीं कर पाया.

पिछले हफ्ते मैंने उनसे मजाक में कहा था कि “वह सोशल मीडिया और टेक्नोलॉजी नहीं समझती है”। उन्होंने कहा, “जो लोग टेक्नोलॉजी को समझते हैं वे चुप हैं। मैं जो कर सकती हूं मैं करूँगी और मैं कहूंगी जो कि मुझे कहना चाहिए। असहिष्णु आवाजें हमारी चुप्पी में कारण ताकतवर होती हैं. उनको तर्क करने में धमकियों के बजाय शब्दों का उपयोग करना सीखें। ”

साभार:द वायर 
अनुवाद: कादम्बरी जैन

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दीप्ति शर्मा कविताएँ

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 दीप्ति शर्मा


युवा कवियत्री,विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित संपर्क: deepti09sharma@gmail.com 


1.
काले तिल वाली लड़की

कल तुम जिससे मिलीं
फोन आया था वहाँ से
तुम तिल भूल आयी हो
सुनो लडकियों ये तिल बहुत आवारा होते हैं
चन्द्र ग्रहण की तरह
काला तिल आनाज नही होता
ये पूरी दुनिया होता है
जिससे मिलो सँभल कर मिलो
ये मिलना भी ज्वार भाटा है जिसमें तुम डूब जाती हो
और भूल आती हो तिल
ये तिल अभिशाप नहीं
देखो!
मेरे हाथ में भी एक तिल है
अम्मा ने कहा खूब पैसा होगा
मुट्ठी तो बाँधों जरा
पर मुट्ठी कहाँ बँधी रही है
जो अब रहेगी
खुल ही जाती है
और दिख जाता है तिल
ये छुप नहीं सकता
और दुनिया ढूँढ लेती है
ऐसे ही
धूप नहीं पड़ती
देखो पर्दा लगा है
पर्दे के भीतर भी
लड़की बदचलन हो जाती है
और तिल आवारा
और तुम हो कि नदी में
छलांग लगाती हो

2.


पर्वत पिघल रहे हैं
घास,फूल, पत्तीयाँ
बहकर जमा हो गयीं हैं
एक जगह
हाँ रेगिस्तान जम गया है
मेरे पीछे ऊँट काँप रहा है
बहुत से पक्षी आकर दुबक गये हैं
हुआ क्या ये अचानक
सब बदल रहा
प्रसवकाल में स्त्री

दर्द से कराह रही है,
शिशु भी प्रतिक्षारत !
माँ की गोद में आने को
तभी एक बहस शुरू हुई
गतिविधियों को संभालने की,
वार्तालाप के मध्य ही शुरू हुआ
शिशु का पिघलना
पर्वत की भाँति
फिर जम गया वहाँ मंजर
रूक गयी साँसें
माँ विक्षिप्त
मृत शिशु गोद में लिए
विलाप करती
आखिर ठंड में पसीना आना
आखिर कौन समझे
फिर फोन भी नहीं लगते
टावर काम नहीं करते
सीडियों से चढ़ नहीं पा रहे
उतरना सीख लिया है
कहा ना सब बदल रहा है
सच इस अदला बदली में
हम छूट रहे हैं
और ये खुदा है कि
नोट गिनने में व्यस्त है।

3.
आहट 

घने कोहरे में बादलों की आहट
तैरती यादों को बरसा रही है
देखो महसूस करो
किसी अपने के होने को
तो आहटें संवाद करेंगी
फिर ये मौन टूटेगा ही
जब धरती भीग जायेगी
तब ये बारिश नहीं कहलायेगी
तब मुझे ये तुम्हारी आहटों की संरचना सी प्रतीत होगी
और मेरा मौन आहटों में
मुखरित हो जायेगा।

4. 
मुट्ठिया… 

बंद मुट्ठी के बीचों – बीच
एकत्र किये स्मृतियों के चिन्ह
कितने सुन्दर जान पड़ रहे हैं
रात के चादर की स्याह
रंग में डूबा हर एक अक्षर
उन स्मृतियों का
निकल रहा है मुट्ठी की ढीली पकड़ से
मैं मुट्ठीयों को बंद करती
खुले बालों के साथ
उन स्मृतियों को समेट रही हूँ
वहीं दूर से आती फीकी चाँदनी
धीरे – धीरे तेज होकर
स्मृतियों को देदीप्यमान कर
आज्ञा दे रही हैं
खुले वातावरण में विचरो ,
मुट्ठीयों की कैद से बाहर
और ऐलान कर दो
तुम दीप्ति हो, प्रकाशमय हो
बस यूँ ही धीरे – धीरे
मेरी मुट्ठीयाँ खुल गयीं
और आजाद हो गयीं स्मृतियाँ
सदा के लिये

5
उस बारिश का रंग दिखा नहीं
पर धरती भींग गयी
बहुत रोई !
डूब गयी फसलें
नयी कली ,
टहनी टूट लटक गयीं
आकाश में बादल नहीं
फिर भी बरसात हुई
रंग दिखा नहीं कोई

पर धरती
कुछ सफेद ,कुछ लाल हुई
लाल ज्यादा दिखायी दी
खून सी लाल
मेरा खून धरती से मिल गया है
और सफेद रंग
गर्भ में ठहर गया है,
शोषण के गर्भ में
उभार आते
मैं धँसती जा रही हूँ
भींगी जमीन में,
और याद आ रही है
माँ की बातें
हर रिश्ता विश्वास का नहीं
जड़ काट देता है
अब सूख गयी है जड़
लाल हुयी धरती के साथ
लाल हुयी हूँ मैं भी।

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गौरी लंकेश का आख़िरी संपादकीय



कल देर शाम हिंदुत्व विरोधी पत्रकार  गौरी लंकेश की गोली मार कर हत्या कर दी गई. गौरी लंकेश एक साप्ताहिक पत्रिका ‘गौरी लंकेश पत्रिके’ का संपादन करती थी.उनका आखिरी संपादकीय


“इस हफ्ते के इश्यू में मेरे दोस्त डॉ वासु ने गोएबल्स की तरह इंडिया में फेक न्यूज़ बनाने की फैक्ट्री के बारे में लिखा है। झूठ की ऐसी फैक्ट्रियां ज़्यादातर मोदी भक्त ही चलाते हैं। झूठ की फैक्ट्री से जो नुकसान हो रहा है मैं उसके बारे में अपने संपादकीय में बताने का प्रयास करूंगी। अभी परसों ही गणेश चतुर्थी थी। उस दिन सोशल मीडिया में एक झूठ फैलाया गया। फैलाने वाले संघ के लोग थे। ये झूठ क्या है? झूठ ये है कि कर्नाटक सरकार जहां बोलेगी वहीं गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करनी है, उसके पहले दस लाख का डिपाज़िट करना होगा, मूर्ति की ऊंचाई कितनी होगी, इसके लिए सरकार से अनुमति लेनी होगी, दूसरे धर्म के लोग जहां रहते हैं उन रास्तों से विसर्जन के लिए नहीं ले जा सकते हैं। पटाखे वगैरह नहीं छोड़ सकते हैं। संघ के लोगों ने इस झूठ को खूब फैलाया। ये झूठ इतना ज़ोर से फैल गया कि अंत में कर्नाटक के पुलिस प्रमुख आर के दत्ता को प्रेस बुलानी पड़ी और सफाई देनी पड़ी कि सरकार ने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया है। ये सब झूठ है।

इस झूठ का सोर्स जब हमने पता करने की कोशिश की तो वो जाकर पहुंचा POSTCARD.IN नाम की वेबसाइट पर। यह वेबसाइट पक्के हिन्दुत्ववादियों की है। इसका काम हर दिन फ़ेक न्यूज़ बनाकर बनाकर सोशल मीडिया में फैलाना है। 11 अगस्त को POSTCARD.IN में एक हेडिंग लगाई गई। कर्नाटक में तालिबान सरकार। इस हेडिंग के सहारे राज्य भर में झूठ फैलाने की कोशिश हुई। संघ के लोग इसमें कामयाब भी हुए। जो लोग किसी न किसी वजह से सिद्धारमैया सरकार से नाराज़ रहते हैं उन लोगों ने इस फ़ेक न्यूज़ को अपना हथियार बना लिया। सबसे आश्चर्य और खेद की बात है कि लोगों ने भी बग़ैर सोचे समझे इसे सही मान लिया। अपने कान, नाक और भेजे का इस्तमाल नहीं किया।

हिंदुत्व की आलोचक वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की गोली मारकर हत्या

पिछले सप्ताह जब कोर्ट ने राम रहीम नाम के एक ढोंगी बाबा को बलात्कार के मामले में सज़ा सुनाई तब उसके साथ बीजेपी के नेताओं की कई तस्वीरें सोशल मीडिया में वायरल होने लगी। इस ढोंगी बाबा के साथ मोदी के साथ साथ हरियाणा के बीजेपी विधायकों की फोटो और वीडियो वायरल होने लगा। इससे बीजेपी और संघ परिवार परेशान हो गए। इसे काउंटर करने के लिए गुरमीत बाबा के बाज़ू में केरल के सीपीएम के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के बैठे होने की तस्वीर वायरल करा दी गई। यह तस्वीर फोटोशाप थी। असली तस्वीर में कांग्रेस के नेता ओमन चांडी बैठे हैं लेकिन उनके धड़ पर विजयन का सर लगा दिया गया और संघ के लोगों ने इसे सोशल मीडिया में फैला दिया। शुक्र है संघ का यह तरीका कामयाब नहीं हुआ क्योंकि कुछ लोग तुरंत ही इसका ओरिजनल फोटो निकाल लाए और सोशल मीडिया में सच्चाई सामने रख दी।

एक्चुअली, पिछले साल तक राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के फ़ेक न्यूज़ प्रोपेगैंडा को रोकने या सामने लाने वाला कोई नहीं था। अब बहुत से लोग इस तरह के काम में जुट गए हैं, जो कि अच्छी बात है। पहले इस तरह के फ़ेक न्यूज़ ही चलती रहती थी लेकिन अब फ़ेक न्यूज़ के साथ साथ असली न्यूज़ भी आनी शुरू हो गए हैं और लोग पढ़ भी रहे हैं।


उदाहरण के लिए 15 अगस्त के दिन जब लाल क़िले से प्रधानमंत्री मोदी ने भाषण दिया तो उसका एक विश्लेषण 17 अगस्त को ख़ूब वायरल हुआ। ध्रुव राठी ने उसका विश्लेषण किया था। ध्रुव राठी देखने में तो कालेज के लड़के जैसा है लेकिन वो पिछले कई महीनों से मोदी के झूठ की पोल सोशल मीडिया में खोल देता है। पहले ये वीडियो हम जैसे लोगों को ही दिख रहा था,आम आदमी तक नहीं पहुंच रहा था लेकिन 17 अगस्ता के वीडियो एक दिन में एक लाख से ज़्यादा लोगों तक पहुंच गया। ( गौरी लंकेश अक्सर मोदी को बूसी बसिया लिखा करती थीं जिसका मतलब है जब भी मुंह खोलेंगे झूठ ही बोलेंगे)। ध्रुव राठी ने बताया कि राज्य सभा में ‘बूसी बसिया’ की सरकार ने राज्य सभा में महीना भर पहले कहा कि 33 लाख नए करदाता आए हैं। उससे भी पहले वित्त मंत्री जेटली ने 91 लाख नए करदाताओं के जुड़ने की बात कही थी। अंत में आर्थिक सर्वे में कहा गया कि सिर्फ 5 लाख 40 हज़ार नए करदाता जुड़े हैं। तो इसमें कौन सा सच है, यही सवाल ध्रुव राठी ने अपने वीडियो में उठाया है।


आज की मेनस्ट्रीम मीडिया केंद्र सरकार और बीजेपी के दिए आंकड़ों को जस का तस वेद वाक्य की तरह फैलाती रहती है। मेन स्ट्रीम मीडिया के लिए सरकार का बोला हुआ वेद वाक्य हो गया है। उसमें भी जो टीवी न्यूज चैनल हैं, वो इस काम में दस कदम आगे हैं। उदाहरण के लिए, जब रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति पद की शपथ ली तो उस दिन बहुत सारे अंग्रज़ी टीवी चैनलों ने ख़बर चलाई कि सिर्फ एक घंटे में ट्वीटर पर राष्ट्रपति कोविंद के फोलोअर की संख्या 30 लाख हो गई है। वो चिल्लाते रहे कि 30 लाख बढ़ गया, 30 लाख बढ़ गया। उनका मकसद यह बताना था कि कितने लोग कोविंद को सपोर्ट कर रहे हैं। बहुत से टीवी चैनल आज राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की टीम की तरह हो गए हैं। संघ का ही काम करते हैं। जबकि सच ये था कि उस दिन पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का सरकारी अकाउंट नए राष्ट्रपति के नाम हो गया। जब ये बदलाव हुआ तब राष्ट्रपति भवन के फोलोअर अब कोविंद के फोलोअर हो गए। इसमें एक बात और भी गौर करने वाली ये है कि प्रणब मुखर्जी को भी तीस लाख से भी ज्यादा लोग ट्वीटर पर फोलो करते थे।

आज राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के इस तरह के फैलाए गए फ़ेक न्यूज़ की सच्चाई लाने के लिए बहुत से लोग सामने आ चुके हैं। ध्रुव राठी वीडियो के माध्यम से ये काम कर रहे हैं। प्रतीक सिन्हा altnews.in नाम की वेबसाइट से ये काम कर रहे हैं। होक्स स्लेयर, बूम और फैक्ट चेक नाम की वेबसाइट भी यही काम कर रही है। साथ ही साथ THEWIERE.IN, SCROLL.IN, NEWSLAUNDRY.COM, THEQUINT.COM जैसी वेबसाइट भी सक्रिय हैं। मैंने जिन लोगों ने नाम बताए हैं, उन सभी ने हाल ही में कई फ़ेक न्यूज़ की सच्चाई को उजागर किया है। इनके काम से संघ के लोग काफी परेशान हो गए हैं। इसमें और भी महत्व की बात यह है कि ये लोग पैसे के लिए काम नहीं कर रहे हैं। इनका एक ही मकसद है कि फासिस्ट लोगों के झूठ की फैक्ट्री को लोगों के सामने लाना।

कुछ हफ्ते पहले बंगलुरू में ज़ोरदार बारिश हुई। उस टाइम पर संघ के लोगों ने एक फोटो वायरल कराया। कैप्शन में लिखा था कि नासा ने मंगल ग्रह पर लोगों के चलने का फोटो जारी किया है। बंगलुरू नगरपालिका बीबीएमसी ने बयान दिया कि ये मंगल ग्रह का फोटो नहीं है। संघ का मकसद था, मंगल ग्रह का बताकर बंगलुरू का मज़ाक उड़ाना। जिससे लोग यह समझें कि बंगलुरू में सिद्धारमैया की सरकार ने कोई काम नही किया, यहां के रास्ते खराब हो गए हैं, इस तरह के प्रोपेगैंडा करके झूठी खबर फैलाना संघ का मकसद था। लेकिन ये उनको भारी पड़ गया था क्योंकि ये फोटो बंगलुरू का नहीं, महाराष्ट्र का था, जहां बीजेपी की सरकार है।

हाल ही में पश्चिम बंगाल में जब दंगे हुए तो आर एस एस के लोगों ने दो पोस्टर जारी किए। एक पोस्टर का कैप्शन था, बंगाल जल रहा है, उसमें प्रोपर्टी के जलने की तस्वीर थी। दूसरे फोटो में एक महीला की साड़ी खींची जा रही है और कैप्शन है बंगाल में हिन्दु महिलाओं के साथ अत्याचार हो रहा है। बहुत जल्दी ही इस फोटो का सच सामने आ गया। पहली तस्वीर 2002 के गुजरात दंगों की थी जब मुख्यमंत्री मोदी ही सरकार में थे। दूसरी तस्वीर में भोजपुरी सिनेमा के एक सीन की थी। सिर्फ आर एस एस ही नहीं बीजेपी के केंद्रीय मंत्री भी ऐसे फ़ेक न्यूज़ फैलाने में माहिर हैं। उदाहरण के लिए, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने फोटो शेयर किया कि जिसमें कुछ लोग तिरंगे में आग लगा रहे थे। फोटो के कैप्शन पर लिखा था गणतंत्र के दिवस हैदराबाद में तिरंगे को आग लगाया जा रहा है। अभी गूगल इमेज सर्च एक नया अप्लिकेशन आया है, उसमें आप किसी भी तस्वीर को डालकर जान सकते हैं कि ये कहां और कब की है। प्रतीक सिन्हा ने यही काम किया और उस अप्लिकेशन के ज़रिये गडकरी के शेयर किए गए फोटो की सच्चाई उजागर कर दी। पता चला कि ये फोटो हैदराबाद का नहीं है। पाकिस्तान का है जहां एक प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन भारत के विरोध में तिरंगे को जला रहा है।

इसी तरह एक टीवी पैनल के डिस्कशन में बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि सरहद पर सैनिकों को तिरंगा लहराने में कितनी मुश्किलें आती हैं, फिर जे एन यू जैसे विश्वविद्यालयों में तिरंगा लहराने में क्या समस्या है। यह सवाप पूछकर संबित ने एक तस्वीर दिखाई। बाद में पता चला कि यह एक मशहूर तस्वीर है मगर इसमें भारतीय नहीं, अमरीकी सैनिक हैं। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमरीकी सैनिकों ने जब जापान के एक द्वीप पर क़ब्ज़ा किया तब उन्होंने अपना झंडा लहराया था। मगर फोटोशाप के ज़रिये संबित पात्रा लोगों को चकमा दे रहे थे। लेकिन ये उन्हें काफी भारी पड़ गया। ट्वीटर पर संबित पात्रा का लोगों ने काफी मज़ाक उड़ाया।
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने हाल ही में एक तस्वीर साझा की। लिखा कि भारत 50,000 किलोमीटर रास्तों पर सरकार ने तीस लाख एल ई डी बल्ब लगा दिए हैं। मगर जो तस्वीर उन्होंने लगाई वो फेक निकली। भारत की नहीं, 2009 में जापान की तस्वीर की थी। इसी गोयल ने पहले भी एक ट्वीट किया था कि कोयले की आपूर्ति में सरकार ने 25,900 करोड़ की बचत की है। उस ट्वीट की तस्वीर भी झूठी निकली।


छत्तीसगढ़ के पी डब्ल्यू डी मंत्री राजेश मूणत ने एक ब्रिज का फोटो शेयर किया। अपनी सरकार की कामयाबी बताई। उस ट्वीट को 2000 लाइक मिले। बाद में पता चला कि वो तस्वीर छत्तीसगढ़ की नहीं, वियतनाम की है।

ऐसे फ़ेक न्यूज़ फैलाने में हमारे कर्नाटक के आर एस एस और बीजेपी लीडर भी कुछ कम नहीं हैं। कर्नाटक के सांसद प्रताप सिम्हा ने एक रिपोर्ट शेयर किया, कहा कि ये टाइम्स आफ इंडिय मे आया है। उसकी हेडलाइन ये थी कि हिन्दू लड़की को मुसलमान ने चाकू मारकर हत्या कर दी। दुनिया भर को नैतिकता का ज्ञान देने वाले प्रताप सिम्हा ने सच्चाई जानने की ज़रा भी कोशिश नहीं की। किसी भी अखबार ने इस न्यूज को नहीं छापा था बल्कि फोटोशाप के ज़रिए किसी दूसरे न्यूज़ में हेडलाइन लगा दिया गया था और हिन्दू मुस्लिम रंग दिया गया। इसके लिए टाइम्स आफ इंडिया का नाम इस्तमाल किया गया। जब हंगामा हुआ कि ये तो फ़ेक न्यूज़ है तो सांसद ने डिलिट कर दिया मगर माफी नहीं मांगी। सांप्रादायिक झूठ फैलाने पर कोई पछतावा ज़ाहिर नहीं किया।

जैसा कि मेरे दोस्त वासु ने इस बार के कॉलम में लिखा है, मैंने भी एक बिना समझे एक फ़ेक न्यूज़ शेयर कर दिया। पिछले रविवार पटना की अपनी रैली की तस्वीर लालू यादव ने फोटोशाप करके साझा कर दी। थोड़ी देर में दोस्त शशिधर ने बताया कि ये फोटो फर्ज़ी है। नकली है। मैंने तुरंत हटाया और ग़लती भी मानी। यही नहीं फेक और असली तस्वीर दोनों को एक साथ ट्वीट किया। इस गलती के पीछे सांप्रदियाक रूप से भड़काने या प्रोपेगैंडा करने की मंशा नहीं थी। फासिस्टों के ख़िलाफ़ लोग जमा हो रहे थे, इसका संदेश देना ही मेरा मकसद था। फाइनली, जो भी फ़ेक न्यूज़ को एक्सपोज़ करते हैं, उनको सलाम । मेरी ख़्वाहिश है कि उनकी संख्या और भी ज़्यादा हो।”

साभार: एन डी टीवी इंडिया


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गौरी लंकेश की अन्त्येष्टि पूरे राजकीय सम्मान के साथ

 वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की  अन्त्येष्टि बुधवार को पूरे राजकीय सम्मान के साथ शहर के चामराज पेट कब्रिस्तान में किया गया. पुलिस ने गौरी लंकेश को बंदूकों से सलामी दी तो वहीं इस दौरान हजारों लोगों ने अश्रुपूरित अंतिम विदाई दी. गौरी लंकेश लिंगायत समुदाय से आती हैं, जिसमें मृतक का दाह संस्कार नहीं किया जाता है उसे दफनाया जाता है.

उनके भाई  इंद्रजीत ने कहा, “उनका पार्थिव शरीर लोगों के दर्शन के लिए समसा बायालु रंगमंदिरा (ओपन एयर थिएटर) में रखा जाएगा.” उन्होंने बताया कि गौरी की इच्छानुसार उनकी आंखें दान कर दी गई हैं.

इस दौरान कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया, गृहमंत्री रामलिंगा रेड्डी व अन्य नेता लंकेश को अंतिम श्रद्धांजलि देने के लिए चामराज पेट पहुंचे. इससे पहले सीएम सिद्धारमैया ने जांच के लिए एसआईटी से कराने का आदेश दे चुके हैं. वहीं इस घटना के बाद पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों, विचारकों, महिला संगठनों व दूसरे लोगों ने देश भर में जमा होकर निंदा की.



बता दें कि गौरी लंकेश की मंगलवार रात को बेंगलुरु में उनके आवास पर गोली मारकर हत्या कर दी गई. गौरी लंकेश को निशाना बनाकर 7 गोलियां मारी गई थीं. उनके शरीर पर 3 गोलियों के चोट के निशान मिले हैं. गौरी लंकेश को बदमाशों ने तब निशाना बनाया जब वह अपनी कार से उतरकर अपने घर का दरवाजा खोल रही थीं. इस घटना के बाद धरना प्रदर्शन और सियासत शुरू हो गई.



जहां एक तरफ बीजेपी ने इसे लेकर कांग्रेस सरकार और सीएम सिद्दारमैया को निशाने पर लिया है और कानून व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराया है. बीजेपी नेता सदानंद गौड़ा ने सीबीआई जांच की मांग की है. तो वहीं दूसरी तरफ राहुल गांधी ने कहा जो कोई भी बीजेपी-आरएसएस की विचारधारा के खिलाफ बोलता है उसे दबाया जाता है यहां तक कि मार डाला जाता है.

साभार: india.com

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तीन तलाक के विषदंत उखाड़ती स्त्रियां

गुलज़ार हुसैन


गुलज़ार हुसैन जितने संवेदनशील और बेहतरीन कवि हैं उतने ही अच्छे रेखा -चित्रकार. मुम्बई में पत्रकारिता करते हैं . संपर्क: मोबाईल न. 9321031379

समस्या औरत ने नहीं खड़ी की। यह पुरुष की समस्या है कि वह स्त्री को सामानाधिकार से वंचित रखना चाहता है।- ‘द सेकेंड सेक्स’ में सिमोन द बोउवार

तीन तलाक का विषदंत भारतीय मुस्लिम महिलाओं के लिए एक समस्या भर ही पैदा नहीं करता है, बल्कि यह महिलाओं को एक ऐसे अथाह असीम दलदल में धकेल देता है, जहां से उसके भविष्य की सारी राहें बंद हो जाती हैं। यह सब कुछ किसी का कत्ल किए बिना सांस छीन लेने की तरह खतरनाक है। इस खतरनाक स्थिति में पड़ी महिलाओं को इससे उबारने और नई पीढ़ी की लड़कियों को इस ‘मर्द दंश’ से बचाने की लड़ाई बहुत संघर्षपूर्ण रही है। अभी हाल ही में (अगस्त, 2016) सुप्रीम कोर्ट ने एक साथ (इंस्टैंट) तीन तलाक कह कर विवाह संबंध खत्म करने की प्रथा को असंवैधानिक करार दिया है। यह फैसला भारतीय मुस्लिम स्त्रियों की राह के कांटे हटाने वाला कहा जा सकता है, क्योंकि भारतीय मुस्लिम स्त्रियों ने इसका खुले दिल से स्वागत किया है।

‘तीन तलाक’ के खिलाफ लड़ाई लड़ने में डॉ. नूरजहां सफिया नियाज और जकिया सोमन का नाम उल्लेखनीय है। इन दोनों ने मिलकर भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (बीएमएममए) को तब खड़ा किया जब पर्दे के अंदर दबी-छिपी महिलाएं अपने चेहरे पर मुस्कान ओढ़े भीतर ही भीतर खोखली बनी हुर्इं थीं। डॉ. नूरजहां कहती हैं कि उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती मुस्लिम समाज में अपने काम को लेकर स्वीकृति पाने की थी। यह भी साफ नहीं था कि मुस्लिम महिलाएं हमारे साथ आएंगी, लेकिन हमें उम्मीद थी कि वे हमारे साथ आएंगी। वे हमारे साथ आर्इं और बड़ी संख्या में आर्इं। सुप्रीम कोर्ट के तीन तलाक पर आए सकारात्मक फैसले को नूरजहां ऐतिहासिक मानती हैं। वे कहती हैं कि पांच पीड़ित महिलाएं सुप्रीम कोर्ट में पहुंची और उनकी आवाज सुनी गई, यह उल्लेखनीय। यह अप्रत्याशित है।

गौरतलब है कि शायरा बानो, आफरीन रहमान, इशरत जहां, आतिया साबरी और गुलशन परवीन नामक महिलाएं तीन तलाक के दंश से पीड़ित थीं। सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय इन्हीं पांच मुस्लिम महिलाओं की याचिकाओं पर सुनाया है। इन महिलाओं की जिंदगी में तीन तलाक के कारण दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। किसी को तीन तलाक कहकर घर और संपत्ति से बेदखल कर दिया गया था, तो किसी को स्पीड पोस्ट और फोन के माध्यम से तीन तलाक देकर मरने के लिए छोड़ दिया गया था।

नूरजहां मानती हैं कि भारतीय मुस्लिम महिलाओं की राह में सबसे बड़ा रोड़ा धार्मिक संगठन हैं। वे कहती हैं कि मुस्लिम धार्मिक संगठन हमेशा हमारे आंदोलन का विरोध करते रहे हैं और आज भी करते हैं, लेकिन उनसे समर्थन और मान्यता हमें उम्मीद भी नहीं है। हम जब कुरआन के आधार पर इस्लाम में स्त्री के हक की व्याख्या करते हैं, तो मुस्लिम धर्मगुरु तिलमिला जाते हैं। कुरआन के आधार पर स्त्रियों के हक की बात सुनते ही मुस्लिम धर्म गुरु पर्सनल अटैक पर उतर आते हैं। नूरजहां कहती हैं कि मुस्लिम महिलाओं के साथ बड़ी संख्या में मर्दों का सपोर्ट भी हमें मिला है। बीएमएममए की ओर से तैयार ड्राफ्ट ‘द मुस्लिम फैमिली एक्ट’ को पार्लियामेंट में पहुंचाना हमारा लक्ष्य है। वे कहती हैं कि हमलोग आंदोलन के तहत स्त्रियों की शिक्षा, सेहत और कैरियर से जुड़े कई कार्य करते हैं।



मुस्लिम महिलाओं की दयनीय स्थिति से अपनी कष्टप्रद जिंदगी के तार जोड़कर अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने वाली जकिया सोमन के संघर्ष की कहानी  किसी से छुपी नहीं है। वह गुजरात में प्रोफेसर के पद पर कार्य करते हुए भी 16 सालों तक पुरुषवादी जुल्म को झेलती रहीं। उनका मानना है कि हर औरत के अंदर ताकत होती है, इसलिए उसका उभारा जाना जरूरी है। इसी ताकत के बल पर जेंडर जस्टिस और इक्वलिटी की बात हम उठा पा रहे हैं। जकिया गुजरात से हैं, इसलिए 2002 में हुए सांप्रदायिक नरसंहार और उससे उपजी भीषण त्रासदी का उनके जीवन में बहुत प्रभाव पड़ा वे गुजरात नरसंहार से पीड़ित महिलाओं -बच्चों को दुख से बिलखता देखती तो तड़प उठतीं थी। राहत कैंप में दंगा पीड़ित मुस्लिम स्त्रियों के लिए सेवा कार्य करते हुए उन्हें अपनी जिंदगी जीने की राह भी मिल गई।

जकिया ने जब दंगा पीड़ित गरीब और बेघर मुस्लिम महिलाओं को न्याय पाने के लिए व्याकुल देखा तो उनके अंदर आशा की किरण फूट पड़ी। उन्होंने देखा कि पति, बेटे और अपने परिवार को गुजरात दंगों में खो चुकी मुस्लिम स्त्रियां चुप नहीं बैठी हैं। किसी का पति मारा गया है, तो किसी का घर जल गया है, लेकिन वे न्याय के लिए आवाज उठा रही हैं। वे पुलिस से लेकर कोर्ट तक अपनी आवाज बुलंद कर रहीं हैं। दंगा पीड़ित महिलाओं के इस साहस ने टूटी हुई जकिया को संबल दिया। उन्हें लगा कि बेघर और अपना परिवार खो चुकी स्त्रियां जब इतनी हिम्मत से आगे बढ़ सकती हैं, तो वे क्यों नहीं महिलाओ के हक के लिए लड़ाई लड़ सकती हैं। यही आत्मबल उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट बना था।

जकिया बताती हैं कि शादी के बाद उन्हें अपने मन से हंसने या रोने तक का भी अधिकार नहीं था। मन की बात कहने पर उन्हें पीटा जाता था। वे कहती हैं कि इस पुरुषवादी दुष्चक्र में उन्होंने अपनी जिंदगी के 16 साल गुजार दिए थे, लेकिन गुजरात दंगे से पीड़ित महिलाओं से मिलकर उन्हें लगा कि इतनी दबी-कुचली महिलाएं जब इंसाफ के लिए लड़ सकती हैं, तो वे पढ़ी-लिखीं होकर क्यों नही लड़ सकती हैं। इसके बाद भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन के तहत वे आगे ही बढ़ती गईं। कई स्त्रियां उनसे इस संघर्ष के साथ जुड़ती गईं। जकिया कहती हैं कि न केवल मुस्लिम औरतें, बल्कि अधिकांश मर्द हमारे साथ आए हैं।


इंस्टैंट तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से पहले मुंबई के हाजी अली दरगाह में औरतों के प्रवेश को लेकर भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की ओर से उल्लेखनीय लड़ाई लड़ी गई और जीती भी गई। इस दौरान जितनी भी महिलाएं उनके साथ थी, वे दरगाह के अंदर प्रवेश को लेकर अपने निर्णय से टस से मस नहीं हुईं और अंततः उन्हें सफलता मिली। एक टीवी साक्षात्कार में जकिया ने इस मुद्दे पर कहा था यदि हम लड़ेंगे तो अल्लाह हमारे साथ है और कानून हमारे साथ है।

इंस्टेंट तीन तलाक पर आए सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से इस्लामिक फेमिनिज्म को एक नया आधार मिला है। इस्लामिक फेमिनिज्म का यह स्वरूप भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (बीएमएमए) के तहत 2007 में गढ़ा गया था। बीएमएमए की तरफ से डॉ.नूरजहां और जकिया सोमन लिखित (2015 में प्रकाशित) पुस्तक ‘सीकिंग जस्टिस विदिन फैमिली’ (Seeking Justice Within Family: A National Study on Muslim Women’s views on reforms in muslim personal law) में मुस्लिम महिलाओं की आर्थिक-शैक्षिक स्थिति के अलावा शादी, तलाक, और संपत्ति सहित कई मुद्दों पर विस्तार से अध्ययन (study) प्रस्तुत किया गया है। इस स्टडी से कई चौंकाने वाली बात सामने आई हैं। इसके तहत हुए सर्वे के अनुसार भारत में 55. 3℅ लड़कियों की शादी 18 साल की उम्र से पहले हो जाती है। 53.2 ℅ मुस्लिम महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं। इसके अलावा सर्वे के अंतर्गत 95.5℅ महिलाएं मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बारे में नहीं जानतीं। इसके अलावा भी स्टडी में कई चौंकाने वाली जानकारी सामने आईं हैं।



बहरहाल, जकिया और डॉ. नूरजहां की यह गैर राजनीतिक लड़ाई अभी लंबी है और रास्ते में कई कांटें बिखरे हैं। निस्संदेह यह आंदोलन मुस्लिम समाज के अंदर से उभरा है, लेकिन इसी समाज के अंदर इसका जोरदार विरोध भी हो रहा है। कई बुद्धिजीवियों का मानना है कि ट्रिपल तलाक (इंस्टैंट) के मामले भारतीय मुस्लिम समाज में बहुत कम हैं। तो अब सवाल यह है कि जब ट्रिपल तलाक के मामले न के बराबर हैं भी, तो इस अमानवीय प्रथा के अस्तिव में रहने की क्या जरूरत है। इसे हटा क्यों न दिया जाए। ट्रिपल तलाक यदि अस्तित्व में रहेगा, तो मर्द भले इसका इस्तेमाल नहीं करे, लेकिन इसको लेकर वह घमंड से भरा हुआ तो हो ही सकता है। मौखिक ट्रिपल तलाक घर में अवैध रूप से रखी उस बंदूक की तरह है, जिसका इस्तेमाल करके ही नहीं, बल्कि उसका भय दिखा कर भी स्त्रियों का जीना मुश्किल किया जा सकता है, इसलिए जकिया सोमन, डॉ. नूरजहां और उन जैसी हर मुस्लिम महिलाओं की यह लड़ाई जारी रहनी चाहिए।

(कुछ जरूरी जानकारी डॉ. नूरजहां सफिया नियाज से फोन पर बातचीत और जाकिया सोमन के कई साक्षात्कारों पर आधारित)

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
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पतनशील पूर्वप्रेमिका कंगना हाज़िर हो !

नीलिमा चौहान


पेशे से प्राध्यापक नीलिमा ‘आँख की किरकिरी ब्लॉग का संचालन करती हैं. प्रकाशित पुस्तकें: पतनशील पत्नियों के नोट्स, ‘बेदाद ए इश्क’ (संपादित) संपर्क : neelimasayshi@gmail.com.

कंगना का हालिया अदालती बयान मुल्क के क्यूट सिली एक्स लवरों  के हाइस्पीड मर्दाना गुरूर पर ज़बरदस्त ब्रेक हैं । दानिशमंद जमात के लिए प्रेम , परम्परा और विद्रोह जैसे उलझाऊ विषय पर बौद्धिक व्यायाम करने का एक और बहाना है । प्रेमरत प्रेमिकाओं के लिए अपने  प्रेम और प्रेम में अपनी वलनरेबिलिटी को पहचानने का मौका है । इश्क के दाग़ , पीड़ा और अपराध बोध के रेडीमिक्स सायनाइड को चखने के लिए प्रोग्राम्ड हिंदुस्तानी पूर्वप्रेमिकाओं के लिए फिल्म जगत का एक गैरफिल्मी उदाहरण है । रामादि के प्रेम आदर्श से पतित  होकर सीधे तेजाबादि से प्रेमिकाओं का अभिषेक करने रीत की पर हश हश करने वाले मुल्क का 440 वोल्ट के करंट से गुज़रना है ।


ओहो कंगना डियर ! तुमको मालूम होना चाहिए कि जिसे तुम प्रेमी का जुर्म कहने पर आमादा हो वह तो हमारे मुल्क के ‘ मर्दाना लव कंडक्ट मैनूअल’  में उल्लिखित टोटके वाली टिप्स भर है । एक मान्य और मामूली से सबक का प्रेमिका प्रताड़ित अनाड़ी प्रेमी द्वारा बरतना भर है । इस मुक्ल की प्रेम करने वालियाँ ये बात बखूबी जानती होती हैं कि इस विरासती ज्ञान को अमल में लाकर आदर्श भारतीय  प्रेमी अपने घाव ,हार , हताशा  से फौरी निजात पाता होता है । अपने जलते हुए अहम की आतश को बुझाना उसका इंतिखाब नहीं उसकी मजबूरी हुआ करती है । सारा मुल्क जानता है कि चोटिल मर्दाना अहम अगरचे तुरंत एसे इलाज न पाए तो नासूर बनकर बनकर जमात तक के लिए खतरा बन सकता है । तुम्हारे पास एक अच्छा मौका था सो तुम सज़ायाफ्ता पूर्वप्रेमिका की तरह हाथ बाँधे खड़ी रहतीं और  ट्रेजिडी क्वीन कहलातीं । सहानुभूति के सिक्के बटोरतीं और निजी को निजी रहने देकर इस ज़लज़ले की आमद को रोक लेतीं । तुमने जमात को खेमों में बँटने का असबाब दिया और घरबारी रसूखदार  लोगों को अपनी बेवजह की ज़िद के चलते लामबद्ध होने को मजबूर किया ।   मुल्क के  ध्यान और ताकत को एक ज़नाना मसले की ओर लगाने का फसाद किया ।

तुमने कोई आम प्रेमी चुना होता तो जानतीं  कि इश्क में हुई ज़नाना खता की जमात द्वारा मुकर्रर सज़ाएं कितनी खूंख्वार भी हुआ करती हैं । इश्क के फेर में पड़कर एक आम माशूका की तरह तुमने भी अपने प्रेमी के नाम खतो किताबत , शेरो शायरी की। अपने निजी लम्हों को  कैमरे में कैद कर लिए जाने की बेपरवाही दिखाई। औरतों के सबसे बड़े  जासूस वर्चुअल जगत पर अपने यार से इश्क के सबूत छूट जाने दिए । इस सबसे यही साबित होता है कि तुम पेशतर ही अगले बंदे के नाज़ुक ईमान पर अपनी उम्मीदों का भारी  बोझ लादने की बेशर्मी से भरी हुईं थीं । कँगना डियर आज तुम्हारे द्वारा खेले जा रहे पूर्वप्रेमिका वाले पैंतरे यही साबित करते हैं कि तुम बतौर  प्रेमिका भी कैसी हिसाबफहम रही होंगी । खालिस प्यार न करके तुम बुनियादी रिश्ते बनाने  की फिराक में रहने वाली दूरंदेशी दिखाकर अपने प्रेमी को  उलझन में डालती रही होंगी । जिस मुल्के में हर गली के नुक्कड पर बेज़ुबान प्रेमिका बनने को  बेकरार लड़कियाँ  पाई जाती हैं उस मुल्क के सबसे एलिजिबल प्रेमी के सामने ज़ुबान ही नहीं दिमाग मौजूद होने के सबूत देने से भी तुम बाज़ न आई होंगी । प्रेमी से अपने रिश्ते को अपनी नज़रों से देखने तौलने ,परखने , सँवारने का लालच दबाकर रखना भी तुमको आया न होगा । प्यार को वफा- जफा , कानून- वानून , नैतिकता- वैतिकता  के तराज़ू  पर तोलने वोलने की फिराक  में कूद – कूदकर , अपनी औरताना राय जता- जताकर प्रेम के रस में रेत घोलने का करम किया होगा । क्या हमें कैसे मालूम ? अरे भई हर मूर्ख प्रेमिका यही खता तो किया करती है । यह नहीं कि प्रेम के वक्त  पर बस प्रेम करे और दिल की बातों में दिमाग को आने से रोके रहे । तुमने भी हर हिंदुस्तानी  प्रेमिका  की तरह प्रेम से ज़्यादा प्रेम के भविष्य के बारे में सोचा होगा । मिलते हुए तात्कालिक प्रेम की बजाय संभावित सार्वकालिक प्रेम की आस बाँधी होगी । एक पत्नी और एक प्रेमिका की उम्मीदों के उँचे पहाड़ से बँधी रस्सी पर चलते आशिक को अपने बजाय अपने मज़बूत प्रेम से सम्बल देने के तुमने  उंगलबाज़ी की होगी ।



हे कंगना रनौत ! तुम्हारे हौसले के पीछे छिपी तुम्हारी जुगाड़बाज़ी की कारस्तानी पर तुम खुद भी कुछ बोलोगी या पहले से अतिव्यस्त जनता के ज़ेहन पर एक्स्ट्रा लोड डालकर तमाशाबीनी करोगी ? जनता जानना चाहती कि एक शादीशुदा , रसूखदार , अमीरज़ादे से तुम्हारा इश्क भावनाओं का लोचा भर है या किसी और बेहतर ऊँचाई पर पहुँचने के लिए सीढ़ी  का इंतज़ाम करना था। बतौर एक हारी हुई प्रेमिका के लगाए हुए इल्ज़ाम तुम्हारे उसी सिरफिरेपन का नतीज़ा तो नहीं जिसका पता तुम्हारे  प्रेमी ने मुल्क को पेशतर ही दे दिया था । ए लडकी ! तुम नहीं जानती क्या कि हमारे यहाँ की तमाम  प्रेमिकाएँ प्रेम में  हारते ही जज़्बाती हो जाती हैं और जो इंतकामी हो जाती हैं वो आखिरकार पागल करार दे दी जाती हैं । इंतकाम की आग में जलने वाली तुम्हारी जैसी होशोगुल प्रेमिकाएँ प्रेमी समेत उसके पूरे खानदान को सूली पर लटकवाने की हर नामुमकिन कोशिश करती हैं । इस जुनून के  लिए ये पूर्वप्रेमिकाएँ खुद का  अमन- चैन- इज़्ज़्त सब कुछ दाव पर लगाकर मोटा  हर्ज़ाना पाने की बड़ी  जंग लड़ने में जुट जाती हैं । कितना समझा लो , डरा लो धमका लो । बुढ़ा भले जाएँ पर हार नहीं मानती होतीं । बिचारा चोट खाया प्रेमी सीधे रास्ते पर चलकर नयी गृहस्थी बसाना चाहे |  बूढ़े  पिता के जवान रसूख के दम पर अपना डूबता हुआ नाम बचाना चाहे | पुरानी पत्नी के नये बयानात से खुद को पाक दिल का कहलवाना चाहे | पर्दे के पीछे बुलवाकर कुछ हर्ज़ाना देकर मामला रफा दफा करना चाहे |  आस पास के नेकदिल परोपकारी  सामाजिकों से कहलवाकर  गुस्ताख़ प्रेमिका  को  ‘ कर भला हो भला’  का पाठ पढ़वाना चाहे । पर न जी । तुमारे जैसी अड़ियल प्रेमिका अपने नेक इरादा पूर्व प्रेमी को डुबोने की ज़िद पर टिकी ही रहती है । प्रेमी को स्वरक्षा में खुलासे दर खुलासे करने पर मजबूर किया करती हैं । बात से बात निकलवाकर अपना आगा- पीछा सबका बेड़ा  गर्क किए डालती है । एक बेचारा प्रेमी बस सुधरना ही चाहता है बस पर उसकी इतनी सी आस को  दुत्कारकर माफी , न्याय ,बदला जैसे जाने क्या- क्या हिंसक सपने पाले चलती है ।


ऐ लड़की ! तुम सिरफिरी- बददिमाग प्रेमिका न होतीं तो एक आदर्श भारतीय पूर्वप्रेमिका दिखने की कोशिशों को अंजाम देना जानती होती । तुम थकी और हारी दिखतीं धोखे और सदमे की शिकार दिखतीं । चार लोगों के बीच आठ आसूँ बहाकर अपनी बेगुनाही , बदनसीबी, बदहाली के हवाले पेश करतीं । इश्क करने में लगी न रहकर तुमने भी अपने तम- मन- धन आशिक को सुपुर्द कर देने की लाचारी के सुबूत जुटाकर रखे होते । इस तरह से  तुम लोक की क्षणिक सहानुभूति सहेजकर एक कुर्बान प्रेमिका के शाश्वत खोल में जा रहतीं । ताउम्र इस वहम के सहारे सब्र कर रहतीं कि चंद पलों को ही सही एक हीरो को दुनिया के दिल ने ज़ीरो की तरह कोसा होगा । हाँ जनाब आपने ठीक फरमाया कि दौलत शोहरत का ठीकठाक मकाम हासिल कर चुकी लड़की से एक आम हिंदुस्तानी ज़नानी जैसे व्यवहार की आपको कतई उम्मीद न थी । ‘ प्यार जज़्बात वादे शादी’  के फॉर्मूले पर जीकर सफल हो गई लड़कियों पर यह इल्ज़ाम नहीं बनता । पर जनाब इस फार्मूले पर चलकर मुँह की खाने वाली लड़की को जवाब देना बनता है कि समर्थ पुरुष को प्रेमी बनाने का जाल फैलाने का दुष्कर्म करने की जुर्रत की तो की कैसे तुमने ? बोलो कंगना ?

ओह ! तुम तो अपनी फिल्मों के किरदारों की सीखी सिखाई बदलगाम हंगामाखानम निकलीं । बदहाल बदहवास छोड़ी  हुई प्रेमिकाओं के स्यापे का स्वाद लेने के ख्वाहिश्मंदों को कैसा निराश किया तुमने पगली !  अपने नाकाम रिश्ते को छिपाने के बजाय उसके होने की अकुंठ हामी भरने वाली |  अपने पर आती हुई तोहमतों के तूफान में भी भरे पर्दे पर विचलित हुए बिना टिक जाने वाली । बेधड़क । बेबाक । उन्मुक्त और सहज । अतीत से नाशर्मिंदा । आगत के लिए बेखौफ । दूसरे पाले में तमाम ताकत को पाकर भी अपने पाले में भीड़ की परवाह से आज़ाद । सही कहा किसी भी औरत का ऎसा सिरफिरापन लोहे की दीवार पर अपना सर खुद मारने दौड़ना नहीं  तो और क्या है ? अपनी शोहरत और सुखमय जिंदगी को खुद दीवार में चिनवाने के माफिक है । जनाब आपको वहशत इसलिए बढ़ी  हुई है क्योंकि आप जानते होते हैं कि अपना सब कुछ दाव पर लगा देने वाली औरत से खतरनाक और कुछ नहीं होता । इश्क गँवाकर और इज़्ज़्त के फलसफे को पैरों तले कुचलकर चलने वाली औरत के बेपरवाह कदमों तले और क्या- क्या कुचला जा सकता है इसका अंदाज़ा आपको बखूबी है । आप जानते हैं कि ज़बान की तमाम लगामों को खारिज कर चुकने वाली औरत जब बोलती है तो बहुत मुमकिन है कि ऊंचे शिखरों की जड़ में पलीता लगाने की गुस्ताख़ी करने में भी मज़ा लेने लग सकती है । प्रेम, ईनाम,  जुगाड़,  छवि, भविष्य , सपनों वगैरह को अपनी देह से गर्द की माफिक झाड़कर उठती प्रेमिका । उफ गश खा रहे हैं आप तो ? अजी आप उसकी तमाम तकरीरों का तोड़ पेश कर सकते हैं । आप इस प्रेमिका की हर दलील में  कोई झूठ , कोई पैंतरा तलाश सकते हैं । पर आप डर से पार जा चुकी पूर्व प्रेमिका के औरा से सपने में भी निजात पा नहीं सकते ।


पसोपेश में आप इसलिए हैं क्योंकि आपने पूर्व प्रेमिकाओं के लिए एक घरों के तहखानों में एक अंधेरा कोना एलॉट किया हुआ था । जहाँ प्रेम में छोड़ी हुई लड़कियाँ जीभर रो तड़प सकती थीं या अपनी कलाई काटकर मरण का वरण कर सकती थीं । ऊपर  के माले पर दीवान ए खास में अपनी आराम कुर्सी में जमकर बैठी , ठठाकर हँसती और सपने बुनती हुई पूर्वप्रेमिका देखकर मायूस ही नहीं जड़वत हैं आप । सिरफिरे साहस के मर्ज़ बनने ,  महामारी की तरह फैल जाने और फिर प्रेम में हारी हुई  औरतों  के इम्यून हो जाने से अपनी आधी मर्दाना ताकत खो देने वाले हैं आप ।


ऎसी खरपतवार की मानिंद यहाँ- वहाँ मत पूछो कहाँ- कहाँ उगती हुई पूर्वप्रेमिकाओं को आप नया नाम न देना चाहेंगे ?
हा हा ! हुज़ूर !  बजा फरमाया आपने ये हैं पतनशील पूर्वप्रेमिकाएँ ।

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