Home Blog Page 76

लगभग 25 करोड़ अनीमिया ग्रस्त महिलाओं को लेकर दौड़ेगी बुलेट ट्रेन (!)

स्त्रीकाल डेस्क 
ठीक उसी दिन जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत की जनता को बुलेट ट्रेन का सपना बेच रहे थे संयुक्त राष्ट्र ने अपनी एक प्रकाशित रिपोर्ट में कहा है भारत में प्रजनन की आयु में 51.4% महिलायें खून की कमी से जूझती हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ ने खाद्य सुरक्षा और पोषण की स्थिति के संदर्भ में 2017 की अपनी रिपोर्ट में कहा कि 2016 में दुनिया में कुपोषित लोगों की संख्या अनुमानित तौर पर 815 मिलियन थी, जो 2015 में 777 मिलियन से काफी अधिक है । रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि भारत इन कुपोषितों की जनसंख्या का 14.5% आबादी वाला देश है यानी  190.7 मिलियन लोग भारत में कुपोषित हैं ।



आंकड़ों के मुताबिक भारत में पांच साल से कम उम्र के 38.4% बच्चे अविकसित एवं कमजोर हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि बच्चों का शारीरिक रूप से अविकसित होना लम्बे समय तक कुपोषण का परिणाम है जो उनके मानसिक विकास, बौद्धिक क्षमता को प्रभावित कर सकता है।


दुखद है कि श्रीलंका में 14.7% और चीन में 9.4% की तुलना में भारत में  38.4% बच्चे शारीरिक कमजोरी और अल्पविकास के शिकार हैं. रिपोर्ट कहती है कि विश्व स्तर पर, उप-सहारा अफ्रीका में कुपोषण (आबादी के प्रतिशत के अनुसार) सबसे ज्यादा बनी हुई है और बड़ी आबादी के कारण एशिया में सबसे ज्यादा कुपोषित रहते हैं, उसके बाद अफ्रीका में 243 मिलियन और लैटिन अमेरिका में 42 मिलियन हैं लोग कुपोषित हैं।



रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि उप-सहारा अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और पश्चिमी एशिया के कुछ हिस्सों में खाद्य सुरक्षा की स्थिति काफी खराब है, खासकर तनाव और संघर्ष की स्थिति के कारण भी तथा सूखे और बाढ़ के कारण ।


सवाल है कि भारत में गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा और बीमारियों से मुक्कम्मल लड़ाई की जगह चमचमाती सड़कों और बुलेट ट्रेन के सपनों को विकास का दर्जा देना क्या महज सत्तावानों की चालाकियां हैं या भारत की जनता से धोखा और उनके खिलाफ स्टेट और पूंजीपतियों का अघोषित युद्ध है, उनके खात्मे की नियत से.

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

ये न थी हमारी किस्मत

कविता

 चर्चित साहित्यकार,कहानी संग्रह: मेरी नाप के कपड़े, उलटबाँसी, नदी जो अब भी बहती है.उपन्यास : मेरा पता कोई और है प्रकाशित. संपर्क : kavitasonsi@gmail.com

वर्जीनिया वूल्फ की किताब  ‘ A Room of One’s Own’ का प्रकाशन 1929 में हुआ था, उसका केन्द्रीय स्वर है कि एक स्त्री का अपने लेखन के लिए अपना कमरा होना चाहिए, अपने निजी को सुरक्षित रखने के लिए भी अपना कमरा, इसके लिए उसकी आर्थिक स्वतंत्रता जरूरी है.


कमरे से भी पहले कहें तो एक स्त्री के सपने में उसका एक घर होता है,  कुछ अपना बिलकुल अपना रचने का अहसास औरत के मन में सबसे पहले एक घर रचता है. घरएक सपना है, औरतों के नींद में बचपन से सुगबुगाता, डग भरता, ढहता,टूट जाता .

कोई घर कहीं नहीं होता एक स्त्री का, बस एक धुंधला सा अहसास होता है घर, जिसे अपने सीने से चिपकाए औरतें यहाँ से वहाँ डोलती हैं, इस घर से उस घर.सबको अपना बनाती हुई याकि फिर मानती हुई…रेगिस्तान में नखलिस्तान जैसा होता है स्त्री के लिए उसक  अपने कहे जा सकने वाले  घरका सपना .

कमरा तो बहुत बाद की परिकल्पना है, जो लेखन और अन्य क्षेत्र के कामकाजी स्त्रियों में अपने काम, अपनी स्वतंत्रता और अपने वजूद के लिए सजग होने के बाद जगा. किसी ऐसे कोने के तलाश के उपक्रम में वे वहां तक आई , जहाँ वे अपनी तरह रह सकें, डूबकर काम कर सकें और रच सकें, अपने साथ जी सकें कुछ पल को.
हालाँकि यह कल्पना अभी भी बहुत मुश्किल है . अपना कमरा आज भी सपना ही है. नौकरीशुदा और आत्म निर्भर होती स्त्रियों के बहुतायत वाली हमारी आबादी और  तथाकथित वाली आजादी  के बाबजूद… चंद अपवादों को अगर इस बहस के किनारे रखें तो..इसके मूल में स्त्री का अपना स्वभाव भी कम बाधक नहीं…अक्सरहां पति का कमरा उसका पनाहगाह होता है, बाद में बच्चों के साथ वह भी रह लेती है कि बच्चे बगैर उसके कैसे रह सकते हैं ,असंभव-असंभाव्य जैसा कुछ बहुत हद तक …जो सबसे बच जाए वही औरत का अपना हिस्सा है, या फिर ये कि जो सबका है, वही तो उसका है..यही तो उसे घुट्टी में पिलाये गए संस्कार ठहरे. हालाँकि ऐसी स्त्रियों के मन में भी चोर दरवाजे से अपना कोई कमरा और घर झांकता ही झांकता है, चाहे वो लाख ताले जड़े, चाहे लाख  दीवारें-कपाट  बंद करती फिरें …

खुद अपने अनुभवों से भी यह साफ़ साफ़ देख और कह सकती हूँ..लीव इन के उस संघर्षशीलदौर में कुल दो वर्ष एक माह में 13  बदले गए मकानों की कहानियाँ भी इससे कहीं से भी जुदा नहीं…

तब अपनी सीमित आय को देखते हुए हम मित्रों के साथ मिलकर एक साझा मकान लेते…वहां लड़की और कई बार एक मात्र लड़की होने के कारण बहुत कुछ स्वतः मेरे हिस्से आ जाता था, सफाई, खाना आदि आदि घरेलू काम, हालाँकि मित्र समझदार और संवेदनशील थे, हाथ भी बंटाते, फिर भी लम्बे समय तक फ्रीलांस तौर पर काम करने के कारण अधिक समय पर घर पर टिकने वाली अकेली मैं ही होती, स्वतः जिम्मेदारियां भी मेरे ही सर आनीथी .और भरे पूरे परिवार से निकल कर आने के कारण अभी घरेलूपन स्वभाव से निकला नहीं था.बात सिर्फ स्वभाव या मूल में कहें तो संस्कार की थी, वरन घर पर गिने चुने काम  को छोड़ अधिकतर में हाथ नहीं लगाती थी. घर की छोटी बेटी होने से यह छूट थी और शायद पढ़ने लिखने वाली लड़की के नाम पर भी, तो अकेले अपने कमरे के बारे में सोचना यहाँ भीदिवा स्वप्न जैसा ही कुच्छ होता. हालाँकि -वह कमरा अब आकार लेने लगा था, मेरे  मन में बतौर कहानीकार – पत्रकार, मुझे एकांत की हूक खूब खूब होने लगी थी, तोदिन में जब सब निकल जाते या फिर कोई एक दो बचा होता,मैं अपनी सुभीते से कोई एक कमरा बंद करती और लिखने की कोशिश में रम जाती….हालाँकि यह भी रोज संभव नहीं होने वाला था, दिन के नाम अखबारों के दफ्तरों तक लेख पहुँचाने का काम होता था, उर वक्त बचे तो घर के काम .पर सबसे ज्यादा लिखना इसी वक्त और इसी दौर में हुआ., छिटपुट कहानियाँखुदरा कविताएँ और थोक भाव में लेख इसी काल खंड में लिखे गए.

और तब वह घर जो पीछे रह गया था , या कि जिसे बहुत पीछे  छोड़ आई थी बहुत बहुत याद आता ,खासकर उस घर का वह कोनाजहाँ बैठकर घंटों अपने से बतियाती रहतीथी .उस कोने में एक बड़ी सी खिड़की थी.उससे लगा अमरुद का एक छतनार पेड़, जिस पर अल्लसुबह से परिंदों के कलरव की आवाज मुझे दिन को ख़ुशी ख़ुशी जीने का सन्देश देती- माँ हंसकर कहती –तेरा जन्म इसी कमरे में हुआ था, इसी जगह भी, तुझे इसीलिए पसंद है यह जगह इतना’

घर से बाहर निकलते ही सीढ़ियों का वह तीसरा पायदान भी, जहाँ मैं बैठकर डूबते सूरज को निहारा करती.
मेरी दुनिया तब बहुत छोटी हुआ करती थी.देश की राजधानी तो क्या प्रदेश की राजधानी तक को नहीं देखा था . आसपास  के शहर भी मेरे लिए तिलस्म थे.एक ऐसा तिलस्म जिसको जानने की इच्छा भी कहीं भीतर नहीं से नहीं होती थी.बहनें बुलवाती अपने अपने बसेरों याकि ससुराल से…और मैं नहीं जाती….पर उसे इस तरह याद  करते हुए मैं यह अक्सर भूल जाती कि अल्ल बचपन की बातें ठहरीये .  बड़े होने तक स्थितिया बदलने लगी थी, घर का रंग रूप भी बदलने लगा था, रहन्वारों की संख्या बढ़ने लगी थी रिश्ते बढ़ने लगे थे और होते होते वो कमरा जो तब भी केवल मेरा नहीं  था, मेरा बिलकुल नहीं रह गया था, कभी वह तुरत के हुए जमाई और बेटी का होता . कभी वह पैदा हुए नौनिहालों का सौरी गृह और अंततः घर में आई बड़ी बहू का निश्चित वाला  हो गया था.
फिर कुछ दिनों तक रसोई को जो अक्सर अब आँगन और बरामदे में खाना बनने के कारण मात्र सामानों के लिए रखे जाने के काम आकर आ रही थी, को हथियाया. किताबें, बिछावन , अपने सारे अल बल सहित उसमें दाखिला हुई.रसोई बड़ी थी , सो पढने रहने सोने सबकी स्वतंत्रता और आज़ादी मिल गई एकदम से. कि अचानक बहन के घर जाना हुआ, कई महीनों तक रही वहां..लौटी तो वह कमरा रसोई में पुनः तब्दील था, पर सबके नहीं सिर्फ भाभी के रसोई गृह में…कुछ क्षण आंसू बहाने और फिर अपने नए आसरे की तलाश में हम घर के छुटके से भण्डार गृह  तक पहुंचे थे, माँ से पूछा तो उन्हों ना नहीं कहा, बस इतना कहा उनका जांता (चक्की)  वहां से नहीं हटेगा , इसके आगे तुम जो चाहो…मय माँ के जांता मैं भी उस कमरे में स्थानांतरित हो गई थी. जांते के साथ  इतनी सी ही जगह बचती थी किउस घर में किघर का सबसे बड़ा टेबल किसी तरह अंट जाए.(जांते उसके अंदर और कुर्सी थोडा अन्दर घुसा कररखा जा सके वहां ) हाँ  राशन घर होने के कारन रैक ढेर सरे थे उस कमरे में .सो किताबें सारी ठौर ठिकाने लग गई थी, हाँ कपड़ों बिछावन, आदि की जगह नहीं बचती थी बिलकुल ..कोई खिड़की नहीं थी , की बाहर का आसमान या फिर हरियाली ही दिख जाए. पढने में जरा सा तल्लीन हुई नहीं कि पाँव खट से जांते से जा टकराते …फिर भी खुश थे कि कोई अपना कमरा तो था, क्या हुआ कि बंद और छोटा सा था..वह भी इस घर में कितनों के हिस्से था? पर बहुत जल्दी उससे बाहर आना पडा…किस्सा अलग ठहरा उसका …बाद में जब समझ आया कि क्यों हुआ था ऐसा, तो न रो सकी , न हंस सकी ….

उसके बाद कुछ महीने ही बीते होंगे कि आँगन के बीचो बीच एक निर्माणाधीन कमरे में  जिसमें न अभी प्लास्टर हुआ था सो बगैर रंगाई पुताई वाली. न ही खिड़कियाँ लगी थी, बस छत थी एस्बेस्टस की…और खिड़की और दरवाजे की जगह खुली सी बड़ी सी जगहें , मैं इस बार पूरी तैयारी से हूँ और मन से भी…कि इसमें भला कौन रहने आ सकता है मेरे अतिरिक्त ..और वह भी वजह नहीं बचती कि  यह कमरा उस तरह बंद भी नहीं ठहरा, कि मेरे लड़के मित्रों के उसमें जाने से किसी को कोई दिक्कत होकिवहाँ से निक अन्दर क्या चल रहा , कुछ भी बाहर से नहीं दीखता…यह तो इतना खुला था कि सब कहीं से किसी भी छोर से घर के साफ़ साफ़ समझ आ जाये. मैंने यहाँ अखबार बिछाकर अपनी किताबें सजा दी हैं. एक पुरानी साड़ी का पर्दा सिला है, कुर्सी का गद्दा और टेबल क्लाथ भी.. टूटी फूटी ही सही,चाहे पुराने स्टाईल की ही हो पर पापा के शौक से कुर्सी टेबिलों की घर में कमी नहीं रही कभी.मैं घंटों यहाँ बैठकर पढ़ती लिखती रहती हूँ,इस कमरे से निकलने का मेरा मन ही नहीं होता…चाहे गर्मी से कमरा तपने ही क्यूं न लगे , चाहे जाड़े की ठंढी हवा हाड़ही क्यों न कंपाने लगे…मजबूर रात को किसी कमरे में सोने जाती हूँ …

देखते- देखते धीरे-धीरे घर  की सब फालतू और टूटी फूटी चीजें उसी कमरे में डाली जाने लगी हैं.मैं यथा संभव उन्हें भी सहेजकर रखने की कोशिश करती हूँ…
जब बर्दाश्त से बाहर होता है चीख पड़ती हूँ-यह कमरा कूड़ेदान नहीं’
कूड़ेदान नहीं तो ? और क्या है?’
मैं मन ही मन बडबडाती हूँ-हां मैं जो रहती हूँ इस कमरे में…

दूसरी घोषणा और दिल जलाती है-घर के सभी बच्चे इसी कमरे में पढेंगे .मेरी बी.ए की परीक्षा सर पर है यह कोई क्यों नहीं समझ पा रहा?..खींचते खांचते एक दो वर्ष गुजर ही गए थे उस कमरे में …दिल्ली आने तक पना बसेरा वही रहा..

दिल्ली के अनुभव सिखाते रहे-रैनबसेरे घर नहीं होते.यहाँ अपना कमरा खोजने क तो स्वप्न भी न पालूँ. अलग अलग रुचियों, जगहों,वाले लोगों का जमावड़ा घर कैसे हो सकता भला? , आदतें, स्वभाव जब भी टकराते रैनबसेरे से अलग अलग दिशाओं में कई राहें फूटती..औरर मैं एकबारगी सन्न और हतप्रभ…शादी से एक राहत मिली थी, अब यह सबकुछ नहीं …अ यह घर मेरा होगा…और सचमुच मेहमानों से भरे घर में भी एक कमरे का अपने नाम सुरक्षित होना कम भला न लगा था..ससुराल में भी एक कमरा होता था अपने पास , जहाँ थक हारकर बैठ सो सकते थे…ये अनुभव खूबसूरत था पूरी जिन्दगी से गुजरते हुए किसी खूबसूरत दृश्य में आँखें अटक जाने की मानिंद…

बेटी हुई घर घर हुआ …दिन रात उस घर को बसाने रचने में भूल गई बिलकुल-घर हवाएं होती हैं , और हवाएं घर…और उन्हें मुठ्ठी में बाँधने की हमारी हर कोशिश नाकामयाब ….यह याद तब आया जब  एक दिन वह घरभी पीछे छूट गया,…फिर एक बार अकेलापन…और अकेले वाला घर ..वही जिसे हर सर्जन शील व्यक्ति ढूंढता और चाहता है.पर घर और अपना कमरा जैसे शब्द से उस वक्त तक मोह टूटता रहा था…अगर काम पर न जाऊं तो दीवारें काटने दौड़ती थी वहां की…बहुत मुश्किल से अकेले रहना सीखा …धीरे धीरे ये दीवारें बाँधने लगी थी फिर से मोह में…एक कमरे से एक घर में भी दाखिल हुई…और दाखिल होकर ही कहीं यह समझ पाई , कमरे और घर के लिए जद्दोजहद लिखने के लिए हो सकता है, पर लिखने के लिए यह और यही कत्तई जरुरी नहीं, कि सबसे ज्यादा तो उन्हीं दिनों में  लिखा, जब एक कमरे के लिए छतपटाती फिर रही थी.

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

महिला अधिकारः वैधानिक प्रावधान

साधना गुप्ता

 राजकीय स्नातकोतर महाविद्यालय, झालावाड़ मे कार्यरत. संपर्क : sadhanagupta0306.sg@gmail.com

स्त्री मातृत्व के बोझ तले दब कर धीरे.धीरे घर की चारदीवारी तक सीमित होती गई। परिणामतः आर्थिक उत्पादन के साधन एवं शिक्षा से भी वंचित होती गई। अंगों की कोमलता को उसकी शक्ति हीनता के रूप में आंका गया और सौन्दर्य एवं शील की रक्षार्थ उसे चारदीवारी तक सीमित कर दिया गया जिससे स्त्री की स्वतन्त्र विचारधारा एवं अधिकार बीते युग की बात हो गई।

हमारी पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था में यह स्थिति बद से बदतर होती चली गई। पतन का यह ग्राफ बढ़ता ही जा रहा था जिस पर राजाराम मोहन राय की दृष्टि गई। उन्होंने 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना कर महिलाओं की स्थिति में सुधार के प्रयास किए। एवं बाल-विवाह, बहु-विवाह, उत्तराधिकार में अधिकार प्राप्ति, विषयों को व्यावहारिक धरातल पर उठाते हुए ’’ वामा बोधनी ’’ नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया।’’ मैंअपनी झांसी नहीं दूंगी ’’ के दृढ़, निश्चय के साथ 1857 में रानी लक्ष्मी बाई द्वारा किया गया स्वतन्त्रता का प्रयास रंग लाया। स्वाधीनता के संघर्ष में अपने आधे अंग के जंग-जर्जरित रूप का एहसास प्रथम बार पुरूष प्रधान समाज को हुआ। परिणामतः सुधार के लिए प्रार्थना सभा, आर्य समाज इत्यादि की स्थापना हुई, कई वैधानिक प्रावधान किए गए।

1872 में ’ सिवल मैरिज एक्ट ’ पास किया गया जिसमें विवाह हेतु लड़की-लड़के की आयु क्रमश 14 एवं 18 वर्ष निर्धारित की गई। प्रार्थना सभा 1867 द्वारा 1869 में बाम्बे वीडोज रिमामर्स एसोशियसन की स्थापना की गई और इसी वर्ष प्रथम पुनर्विवाह करवाया गया। आर्य समाज द्वारा जाति प्रथा, स्त्री-पुरूष हेतु शिक्षा, कानून व बाल-विवाह निषेध इत्यादि पर बल दिया गया। 1916 में पूना एवं बम्बई में प्रथम महिला विश्वविद्यालय की स्थापना ’’ श्रीमती नथीबाई दामोदार ठाकरे विमन्स युनिवर्सिटी ’’ नाम से हुई। यह दक्षिणी पूर्वी एशिया का प्रथम महिला विश्वविद्यालय था।1916 में ही भोपाल की बेगम ’’ सैयद अहमद खा ’’ ने अपने कुछ साथियों के साथ अखिल भारतीय मुस्लिम महिला समझौते का सूत्रपात कर बहु विवाह उन्मुलन के प्रयास किए।

1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद 1889 में बम्बई अधिवेशन में दस महिलाओं द्वारा भागीदारी की गई थी, जो नाकाफी थी। स्वतन्त्रता संग्राम में महिलाओं की अहम् भूमिका के बिना गांधीजी को स्वतन्त्रता का सपना अधूरा लगा। आपके सतत प्रयास से 1918 के बाद स्वतन्त्रता संग्राम में महिलाओं की खुली भागीदारी दिखलाई दी। 1927 में  ’’आल इण्डिया वीमेन्स कांफ्रेस’’ नामक संस्था का गठन हुआ तथा इसी वर्ष ’डाॅ. मधुलक्ष्मी रेड्डी’मद्रास में पहली विधान मण्डल परिषद् सदस्य बनी।


सविनय अवज्ञा आन्दोलन एवं स्वेदशी आन्दोलन में विदेशी वस्तुओं का घेराव, शराब की दुकानों की तालाबन्दी एवं प्रभातफेरी में सक्रिय भागीदारी करते हुए महिलाएँ जेल गई।

महिला संगठनों के प्रयास से सातवें-आठवें दशक में अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस, अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष एवं महिलाओं सम्बधित सभा-गोष्ठियों का आयोजन किया गया। महिलाओं की स्थिति के आकलन हेतु भारत सरकार द्वारा 1971 में एक समिति का गठन किया गया जिसने अपनी रिपोर्ट 1974 में प्रस्तुत की। इसी कड़ी में ’’ कमेटी आॅन स्टेट्स आॅफ वीमेन इन इण्डिया 1974,’’ नेशनल कमीशन आॅन सेल्फ इम्प्लायड वीमेन 1988, नेशनल पर्शपेक्टिव प्लान फार वीमेन 1988 इत्यादि अस्तित्व में आए।

वैधानिक प्रावधान:-


भारतीय संविधान की निर्माण प्रक्रिया के दौरान ’’महिलओं की वैधानिक समानता’’ एवं ’’हिन्दू कोड’’, विचार के महत्वपूर्ण मुद्दे रहे। अतः महिला उत्थान के लिए किए गए वैधानिक प्रावधानों का विवरण निम्न हैं:-

1. बाल विवाह निषेध:-शारदा एक्ट 1929 में संशोधन कर 1954 में लड़की-लड़के की विवाह हेतु आयु क्रमशः 18        एवं 21 वर्ष की गई। परन्तु कानून के प्रभावी क्रियान्वयन को न देखकर 2006 में संसद में पारित ’’बाल             विवाह निवारण अधिनियम विधेयक 2004’’ में कानून मंत्रालय की निम्न सिफारिशों को स्वीकार किया           गया:-

1. बाल विवाह सम्पन्न होते ही अवैध माना जाएगा।
2. 2 वर्ष का कठोर कारावास एवं एक लाख रू. का जुर्माना।
3. बाल विवाह के शिकार बच्चों का सरकार द्वारा पुनर्वास आदि शामिल हैं।

परन्तु अभी भी हम सफल नहीं हुए हैं। यूनीसेफ की रिपोर्ट के अनुसार 2000 से 2012 के बाल-विवाह के              मामले में भारत दूसरे स्थान पर हैं। शीर्ष दर बांग्लादेश में हैं यहाँ तीन में से दो कन्याओं की शादी 18 वर्ष            की उम्र के पहले हो जाती हैं। (अन्तर्राष्ट्रीय क्राॅनोलोजी नवम्बर 2014, पृ.15)

2. महिलाओं के विरूद्ध अपराध:-

अ. सती प्रथा पर रोक:-सती निवारण
अधिनियम 1987 द्वारा न केवल सती हेतु दण्डकी व्यवस्था है वरन् सती     की प्रशंसा को भी अपराध की श्रेणी में रखा गया हैं। लेकिन आधुनिक भारत में भी सती प्रथा के मामले               समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहते हैं। केशरिया तथा कुटु बाई के सती मामले इसी के उदाहरण हैं। (महिला       सशक्तिकरण-वीरेन्द्रसिंह यादव पृ. 305)

आ. दहेज:- दहेज निषेध अधिनियम 1961 में पारित एवं 1984, 1986 में संशोधित किया गया। भारतीय साक्षी       अधिनियम में भी संशोधन किया ताकि गवाह जुटाने की परेशानी से बचा जा सके। विवाह के सात वर्ष के            अन्दर विवाहिता की मृत्यु को असामान्य परिस्थितियाँ देने के लिए उत्तरदायी माना गया। परन्तु इन              प्रावधानों का दुरूपयोग देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति चन्द्रमौलि कुमार प्रसाद की अध्यक्षता        वाली पीठ ने सभी राज्य सरकारों को अपने पुलिस अधिकारियों को यह निर्देश देने के लिए कहा –                      भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498 क के तहत मामला दर्ज होने पर स्वयं गिरफ्तारी न करें। गिरफ्तारी             की आवश्यकता के बारे में स्वयं को संतुष्ट करे क्योंकि उन्हें मजिस्ट्रेट के समक्ष कारण व सामग्री पेश               करनी होगी। (अन्तर्राष्ट्रीय क्राॅनोलोजी सितम्बर 2014 च.12) पर, दहेज की सुरसा का मुँह बड़ा ही होता जा         रहा हैं।

इ. घरेलू हिंसा:-महिलाओं के प्रति हिंसा को रोकने के लिए भारतीय संसद के अपराधी कानून अधिनियम 1963        के अनुसार कोई भी घरेलू अत्याचार जो पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा किया गया हो, कानूनन अपराध            होगा। इसी प्रकार घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 जो 26 अक्टूबर 2006 से कानून रूप में सम्पूर्ण भारत में           लागू हुआ, के अनुसार शारीरिक मारपीट ही नहीं, अपितु उत्पीड़न, यौनिक, मौखिक, भावनात्मक एवं                 आर्थिक पक्ष के साथ-साथ महिला को घर से निकालना या इसकी धमकी देना घरेलू हिंसा की श्रेणी में रखा         गया हैं। इसके तहत उसे अपने पैतृक या ससुराल के मकान के एक भाग में रहने का अधिकार भी दिया गया       हैं।

ई. भ्रूण हत्या निषेध:-भारतीय दण्ड संहिता 1860 में 312 से 314 के द्वारा ऐसे गर्भपात को दण्डनीय माना गया     है जो स्त्री के जीवन रक्षक रूप में या उसकी सहमति से न किया गया हो। मेडिकल टर्मिनेशन आॅफ                  प्रिंगनेंसी एक्ट 1971 में भी इस प्रकार की व्यवस्था हैं परन्तु असफल होने से सरकार ने प्रसव पूर्व निदान            तकनीक विनिमय दुरूपयोग निवारण अधिनियम का निर्माण किया जिसे 2002 में संशोधित किया गया।          पी.सी.पी. एन. डी. टी. कानून 2002 के अनुसार –

A.  लिंग चयन में पहली बार दोषी जाए जाने पर तीन वर्ष की सजा एवं पचास हजार जुर्माना।
B. दूसरी बार दोषी पाए जाने पर पाँच वर्ष की सजा, एक लाख जुर्माना।
C. सभी अल्ट्रा साउण्ड क्लिनिकों को अल्ट्रासाउण्ड मशीन का पंजीकरण एवं जांच का प्रमाण-पत्र आवश्यक            किया। साथ ही अपनी मासिक रिर्पोट स्वास्थ विभाग की लाइसेंसिंग शाखा को भेजना भी अनिवार्य कर              दिया।

अधिनियम का उल्लंघन करने पर मशीन जब्त करने का प्रावधान भी हैं। 14 फरवरी,2003 को लागू यह कानून देशभर में प्रभावी हैं। परन्तु पालना न होने पर 19 अगस्त 2008 को उच्चतम् न्यायालय के हस्तक्षेप से लिंग परीक्षण सम्बन्धी उत्पादों और सेवाओं संबन्धित विज्ञापन दिखाने वाली साइडो के विरूद्ध कानूनी कार्यवाही की चेतावानी के बाद गूगल और माइक्रोसाफ्ट ने अपने ऐसे विज्ञापन हटा लिए। परन्तु कटु सत्य यह है कि अभी भी यह कार्य अधिकांश अस्पतालों में छद्म रूप से किया जाता हैं। यहाँ वहाँ पड़े कन्या भ्रूणों के समाचार-पत्रों में प्रकाशित समाचार किसी से छिपे नहीं हैं। पुत्र मोह गया नहीं हैं। एक सामाजिक संस्था का संवेक्षण- राजस्थान में 2015 में 2100 एवं 2016 सितम्बर तक 1984 महिलाएँ 5 बेटियों के बाद भी गर्भवती हैं (राज.पत्रिका 18.10.16)

उ. बलात्कार, वेश्यावृत्ति एवं क्रय-विक्रय निषेधः– भारतीय दण्ड संहिता की धारा 375 के तहत बलात्कार को        दण्डनीय माना गया हैं। सह अपराधी के रूप में महिला को दण्डित न करने के साथ यह प्रावधान है कि              शिकायत कर्ता भा. द. स. 1860 की धारा 45 के तहत प्रक्रिया शुरू करने की चाहे या न चाहे परन्तु जिलाधिकार/   शिकायत समिति को कार्यवाही करनी ही होगी। 16 दिसम्बर 2012 को घटित निर्भया काण्ड एवं उसके बाद       दिन-प्रतिदिन बढ़ती बलात्कार की घटनाएँ इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि कानून की पालना नहीं हो रही हैं।   धारा 370 से 373 के तहत महिला को दास के रूप में या वेश्यावृत्ति हेतु क्रय-विक्रय पर भी रोक लगाई गई हैं।

3. तलाक:- पर्सनल लाॅ द्वारा पति-पत्नी दोनों को तलाक लेने का पूर्ण अधिकार दिया गया हैं। विशेष विवाह          अधिनियम 1959 के अनुसार प्रत्येक धर्म समुदाय के स्त्री-पुरूष पसन्द से विवाह कर सकते हैं। इसमें विवाह      एवं तलाक के समान प्रावधान हैं।

4. मातृत्व लाभ:-अधिनियम 1961 के अनुसार माॅ बननें पर बच्चे की देखभाल के लिए 24 सप्ताह के सवैतनिक अवकाश का प्रावधान है साथ ही बालक के 18 वर्ष का होने तक आवश्यकता होने पर समय-समय पर दो वर्ष के सवैतनिक अवकाश का भी प्रावधान हैं। मातृत्व लाभ (संशोधन) विधेयक 2016 के द्वारा 24 सप्ताह के अवकाश में वद्धि की गई हैं। अब यह अवकाश दो बच्चों के जन्म तक 26 सप्ताह का एवं इसके बाद 12 सप्ताह तक मिलेगी। (अन्तर्राष्ट्रीय क्राॅनोलोजी, अक्टूबर 2016 पृ.15)

5. बाल सुरक्षा:-ठेका मजदूर अधिनियम 1970 के अनुसार महिला मजदूर के बच्चों की देखभाल के लिए एक         बच्चा गृह भी होना चाहिए। यह प्रावधान अप्रवासी अधिनियम 1979 में भी हैं।

6. समान भुगतान:-समान भुगतान अधिनियम 1973 के अनुसार एक जैसे कार्य के लिए स्त्री-पुरूष दोनों को         समान वेतन दिया जाएगा।

7. अभद्र प्रदर्शन निषेध:-महिलाओं का अभद्र प्रदर्शन (निषेध)अधिनियम 1989 के द्वारा किसी भी रूप में             महिला के अभद्र प्रदर्शन पर रोक लगाई गई हैं।

8. सम्पत्ति एवं उत्तराधिकार:-17 जून 1956 को लागू हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम पिता की सम्पत्ति में        पुत्री को भी पुत्र के समान अधिकार देता हैं। पति की सम्पत्ति पर भी उसके जीवन काल में पत्नी को पूर्ण            अधिकार एवं पति की मृत्यु के बाद संतान के समान एक हिस्से का अधिकार देता हैं। समय-समय पर इसमें      संशोधन कर महिलाओं के अधिकार का विस्तार किया जा रहा हैं। अभी कुछ दिन पूर्व हुए संशोधन के अनुसार    पिता की मृत्यु पर विवाहित पुत्री को भी अनुकम्पा नौकरी पाने का अधिकार दिया गया हैं।

अस्तु, इन सभी कानूनी प्रावधानों के अतिरिक्त भी भारत सरकार ने न जाने  कितनी योजनाएँ महिलाओं के कल्याण के लिए बना रखी है जिनमें करोड़ों रू. खर्च होते हैं। 67 करोड़ रू. का तो अकेला राष्ट्रीय महिला कोष है जो मुसीबत में फंसी महिला की मदद करता हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ से भी करोड़ों रू. प्राप्त होते हैं परन्तु जानकारी के अभाव में इनका दुरूपयोग ही होता हैं।

अन्त में केवल इतना कि बालिका के जन्म से पूर्व ही उसके संरक्षण का प्रयास करता है भारतीय कानून। आज आवश्यकता इस बात की है कि जनसाधारण को इन प्रावधानों से परिचित करवाया जाए। पूर्ण दायित्वों के साथ प्रशासन द्वारा इनकी अनुपालना की जाए, सार्वजनिक स्थलों पर इनकी जानकारी लिखी हो ताकि अपराधी अपराध करने से पूर्व कई बार सोचे, न्याय प्रक्रिया सरल हो। महिलाओं को स्वयं भी अपने अधिकारों के प्रति सचेत होना होगा साथ ही भोग एवं वासना की विस्तार धारा को छोड़ पुरूष समाज को एक स्वस्थ विचारधारा अपनानी होगी, एक ऐसा सांस्कृतिक वातावरण विकसित करना होगा जिस में नारी भय मुक्त होकर शील की रक्षा करते हुए, पूर्ण क्षमताओं को उजागर कर सके। यदि हम ऐसा कर पाए तो फिर महिलाओं को संरक्षण हेतु किसी आरक्षण या कानून की आवश्यकता नहीं रहेगी। अर्द्धनारीश्वर की कल्पना साकार हो सकेगी। अस्तु वर्षो से खामोश पड़ी शिलाओं से हीे लावा निकलता है अतः हम आशावान हैं।

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

प्रेम कथा में हाड़ा रानी की पुनर्वापसी बनाम बैताल का अनुत्तरित प्रश्न

0


संजीव चंदन
इस कहानी का बीज उस दिन ही अंकुरित हो गया था, जिस दिन पिछली कहानी यानी रूमी की कहानी का यथार्थतः अंत हुआ था, जुहू बीच पर, जब कथावाचक, श्रोता, नायिका इकट्ठे हुए थे. तब श्रोता यानी नानू ने वहाँ से लौटते –लौटते कथावाचक की ओर एक मौन प्रश्न उछाल दिया था ‘कही मोहित तुम ही तो न थे?’ सवाल और भी थे मौन आँखों में …. मोहित और फर्नांडीज की पत्नी की पीड़ा के सवाल ….

घबड़ाइये नहीं, मैं पिछली कहानी को दुहरा कर आपको दुहराव की बोरियत से भरने नहीं जा रहा हूँ. हो सकता है कि इस कहानी के तार पिछली कहानी से जुड़ें, लेकिन यह कहानी होगी एकदम अलग –एकदम अलहदा. ऐसा नहीं है कि आपने मेरी ऐसी दो कहानियां पहले नहीं सुनी हैं, जिनके तार एक –दूसरे से जुड़े थे, पहले भी सुनी हैं, पढी हैं , आपने- तार जुड़े हुए, लेकिन दोनो स्वतंत्र कहानियां- दोनो के अलग आस्वाद. कहानियां सिक्वल हैं, सिक्वल नहीं भी. कहानी ही क्यों आप तो फ़िल्में भी सिक्वल में देखते रहे, आज भी गूँज रहा है सवाल ‘ कटप्पा को क्यों मारा?’ जवाब के लिए देखें बाहूबली पार्ट टू. मेरी यह कहानी जवाब नहीं है, किसी प्रश्न का, न नानू के प्रश्न का और न उन अन्य श्रोताओं या पाठकों के सवालों का, जिन्होंने कहानी सुनकर और हंस कथामासिक में पढ़कर पूछा था, ‘‘कही मोहित तुम ही तो न थे?’ और वैसे ही कई कई सवाल, जो नानू के भीतर अनुत्तरित उमड़ने –घुमड़ने लगे थे.

रंगमहल में प्रेम : पग घूँघरू बाँध मीरा नाची थी

सच इस कहानी का बीज उसी दिन जुहू
बीच पर अंकुरित हो गया था, जब नानू ने सवाल किया. लेकिन कहानी तब नहीं कही गई थी, जब हम ट्रेन में लौट रहे थे, मुम्बई से अपने घर वापस. आप सोच सकते हैं कि वह कहानी पिछली बार मुम्बई जाते हुए कही गई थी तो तभी अंकुरित हुई कहानी वापस लौटते हुए नानू को सुना दी गई होगी. लेकिन तबतक मुझे पता कहाँ था कि कहानी का बीज अंकुरित हो गया है. तब तक पता नहीं चला, जबतक इस नई कहानी की नायिका से मेरी मुलाक़ात नहीं हुई. इस बीच कितना कुछ घटित होता गया था. दक्षिण के एक विश्वविद्यालय में एक दलित छात्र को इसलिए आत्महत्या करनी पडी कि वह मेधावी था, वह प्रश्नाकुल था, वह सत्ता के तर्क और सत्ता द्वारा आरोपित विमर्शों को खारिज करता था, कि वह खान –पान की आजादी का पक्षधर था, कि वह राज्य प्रायोजित हत्याओं के खिलाफ था, कि वह मनुष्य की गरिमा को सर्वोपरि मानता था, कि वह समता, बंधुता और स्वतंत्रता में यकीन करता था, कि वह ‘शिक्षित बनो, संगठित हो, संघर्ष करो’ की प्रेरणा में यकीन करता था- उसने आत्महत्या की, लेकिन सच ही इस पर लोगों को यकीन नहीं हुआ – उसे सांस्थानिक ह्त्या माना गया.


इसी बीच देश की राजधानी में स्थित एक बड़े विश्वविद्यालय में खपत होने वाले कंडोमों, हड्डियों और शराब की बोतलों की गणना में देश के शीर्ष नेतृत्व की रुचि बन गई. हम सबको इसके आंकड़े बताये जाने लगे. उसी विश्वविद्यालय के कुछ ‘राष्ट्रभक्त- चरित्रवान’ शिक्षकों ने एक विस्तृत रपट जारी कर विश्वविद्यालय को सेक्स वर्क का अड्डा घोषित कर दिया. इस बीच और भी बहुत कुछ घटा, देश की संसद में शिक्षा मंत्री, जो कभी किसी सोप ओपेरा में बहू भी थीं और सास भी थीं, ने प्रभाशाली नाटकीयता से भरा भाषण दिया, भाषण देते –देते वे हुंकार – फटकार के आरोह –अवरोह से गुजरते हुए हांफने लगीं. वे आवेग में थीं, इतना कि एक बड़े राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री के चरणों में अपने शीश अर्पित करने की इच्छा जाहिर करने लगीं- बलि और बलिदान का नाटकीय मंच बन गयी थी संसद. इस बीच कोलकाता की गलियों से दुर्गा की मूर्तियाँ संसद के गलियारों में स्थापित हो गईं और संसद के कंगूरे से ‘या देवी सर्वभूतेषु’ की गूँज होने लगी. देश दुर्गा भक्तों और महिषासुर के अनुयायियों में विभाजित हो गया. देश का एक बड़ा उद्योगपति बैंको को करोडो का चपत लगाकर विदेश में जा बसा और उधर अपने ही देश का एक राज्य केरल अफ्रीका का सोमालिया बन गया– ऐसा मैं नहीं कह रहा देश के प्रधानमंत्री ने घोषित किया. कितना कुछ घटित हुआ, दिल्ली के बाद बिहार ‘वाटरलू’  हो गया.
इतना कुछ घटित होने के साथ-साथ एक घटना और घटी, कहानी की नायिका से मेरी मुलाक़ात. इसके साथ ही यह कहानी, जो मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ और नानू को हाल ही में नियमित कहानी सुनाने के प्रसंग में सुना चुका हूँ, मुझे उसी नायिका ने सुनाई थी.


यह कहानी भी प्रेम कहानी है. कहानी तब आधी से अधिक घटित हो गई थी, जब नायक यानी प्रतीप ने मंच से घोषणा की कि मैं पिछले छह महीने से प्रेम में हूँ. प्रतीप नाटककार था, युवा नाटयनिदेशकों में एक नाम था उसका. उस दिन वह एक अजनबी शहर में था, पह्ली बार आया था वहां, जब मंच से उसने घोषणा की. इस घोषणा का अर्थ वहां उपस्थित श्रोताओं में सबसे अधिक जिसने ग्रहण किया था, वह थी उससे 10 साल उम्र में बड़ी नीलिमा नीलकेशी. नीलिमा तब पुलकित थी, उसके साहस पर कि वह मंच से घोषणा कर रहा है, और डर रही थी कि कहीं वह नाम भी न ले ले- उसने बगल में बैठे अपने पति को देखा, कहीं वह मेरी ओर तो नहीं देख रहा है, उसके चेहरे का भाव न पढ़ ले. उधर प्रतीप ने ऐसा कहते हुए अपनी निगाहें नीलिमा पर टिका दी थी. सच में पिछले 6 महीने में ही तो पनपा था उनका प्यार – एक नाट्यनिदेशक और एक लेखिका का प्यार – पहली बार मिले थे वे दिल्ली में श्रीराम सेंटर के बाहर कुछ कॉमन मित्रों के साथ- सब एक दूसरे से परिचित हुए और नंबरों का आदान –प्रदान हुआ. जल्द ही प्रतीप और नीलिमा एक दूसरे से व्हाट्स ऐप पर मुखातिब हुए, एक दूसरे से खुले और अन्तरंग होते गये- नीलिमा ने प्रतीप को हमराज बना लिया और प्रतीप? प्रतीप ने भी बहुत कुछ जाहिर कर दिया उसपर अपना भूत –वर्तमान? वे व्हाट्स ऐप चैट से जल्द ही देर रात के फोन संवाद तक बढ़ते गए-जब अपने–अपने घरों में दोनो अकले होते – तब तक संवाद करते, जबतक सो न जाएँ, यह साथ-साथ होने का अहसास था.


यहाँ, दिल्ली से दूर एक छोटे शहर में, एक नाट्यमहोत्सव और नाटक पर परिचर्चा के सिलसिले में दूसरी बार मिले वे – नीलिमा का शहर था यह. यहाँ प्रतीप मंच से घोषणा कर रहा था कि उसे छः महीने से मुहब्बत है. उसकी घोषणा जितना वहाँ उपस्थित लोगों को संबोधित थी, उससे ज्यादा नीलिमा से एक सीधा और बोल्ड संवाद थी. नीलिमा रोमांचित थी, नीलिमा संशकित थी कि कहीं……. !  वह उसके बिंदासपन और बातों को रहस्य न रहने देने के अंदाज पर ही तो मुग्ध हुई थी. कितने तफसील से उसने बताया था उसे सबकुछ कि वह शादी –शुदा है, दो बच्चे हैं उसके. शादी कम उम्र में हुई थी, इसलिए बच्चे भी अब कॉलेज जाने लगे हैं. कि उसके ही शहर में उसे दिलोजान से चाहने वाली एक लडकी भी है, जो उसके प्रेम में अविवाहित है. वह दोनो जिंदगियां – पति और प्रेमी का एक साथ सफलता से जी रहा है- सफल प्रेमी, सफल पति और सफल पिता – जीवन के रंगमंच की सारी भूमिकाएं वह एक साथ सफलता से निभा रहा था. यह सब सच सुनते हुए कोई रसायन बना नीलिमा के भीतर- वह इस व्यक्तिव के प्रति मुग्ध होती गई- एक व्यक्तित्व, जिसे बिना विवाद के दो स्त्रियाँ प्यार कर रही थीं – कुछ –कुछ नीलिमा के भीतर भी उससे बात करते हुए आकार लेने लगा- जिसे आज मंच से प्रतीप एक नाम दे रहा था –मुहब्बत! हाँ, सच में पिछले छह महीने से उनकी बातचीत का अंतराल कम हुआ था, जिस दिन वे बात न करें उस दिन नीलिमा अपने भीतर कुछ खाली सा, कुछ बेचैन महसूस करती- व्हाट्स ऐप पर कई मेसेज छोड़ जाती- ‘साथी कहाँ हैं ? कुछ ख़ास तो नहीं, आज आप कहीं ज्यादा ही मशगूल हैं शायद?.’ नीलिमा जानती थी कि वह पिता, पति और प्रेमी की रूटीन भूमिकाओं को जीता हुआ एक सफल निदेशक है – नाटक मंडली की भी जिम्मेवारियां हैं. फिर भी उसका दिल नहीं मानता और व्हाट्स ऐप के लिए मोबाइल पर उंगलियाँ रेंग जातीं …… मतलब प्रतीप इन छः महीनों में ख़ास हो गया था और आज वह एक सीधा संवाद दे रहा है, सार्जनिक कि वह छः महीने से प्यार में है.



प्रतीप आश्वस्त था कि उसकी कहीं बातों के श्रोता सभा मंडप में ही बैठे हैं, या उसकी कही बातें एक सीधा संवाद है उसकी अपनी नई प्रेयसी से. लेकिन बातें हैं, बातों के अपने पंख  होते हैं – वे सभा मंडप तक ही कहाँ रुकने वाली थीं – वे उडीं और पहुँच गई उसके अपने शहर तक, जहां वह, जिम्मेदार पति –पिता और प्रेमी था. मंच से इस नये इजहार- ए मुहब्बत को उसकी प्रेमिका तबस्सुम ने सुना. तबस्सुम, यानी इस कथा की नायिका या नायिकाओं में से एक. प्रतीप और उसकी दोस्ती जनवादी नाट्य मंडली की दोस्ती थी.

तबस्सुम, प्रतीप के ही शहर में एक कॉलेज में पढ़ाती थी, नाटकों में रुचि थी, अभिनय करती थी. अत्यंत साधारण परिवार से आने वाली तबस्सुम ने अपने मुकाम खुद ही तय किये थे- सेल्फ मेड गर्ल ! परिवार राजस्थान  का एक पारम्परिक मुस्लिम परिवार था, इसलिए घर से, बुर्के से उसकी आजादी के पक्ष में नहीं था. अम्मी का समर्थन उसे हासिल हुआ, लेकिन एक शर्त पर कि वह पढाई से लेकर नौकरी तक बाहर करे- अपने शहर से बाहर. नाटकों में मर्दों के साथ काम – वह तो उसके अपने शहर में किसी सूरत में भी किसी को भी गंवारा न था. लेकिन तबस्सुम अपनी जिद्द पर अड़ी रही. उसे पता था कि घर की माली हालत कुछ ऐसी नहीं है कि वह शहर से बाहर जाकर पढ़ सके. इसलिए पढाई से नौकरी तक उसने शहर में ही की- उसे नौकरी उसके शहर के ही एक कॉलेज में मिल भी गई. कॉलेज के दिनों से ही वह नाटकों में काम करने लगी थी.

प्रतीप से दोस्ती इन्हीं दिनों हुई. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली से निदेशन में डिग्री लेकर वह अपने शहर में ही एक ग्रूप बनाकार एक कामयाब निदेशक के रूप में दर्ज हो गया. वह देश के विभिन्न नाट्य महोत्सवों में अपने नाटक लेकर जाता था. प्रतीप वाचाल था, हमेशा मजाहिया अंदाज में बात करने वाला. तबस्सुम खुद भी नहीं समझ पाती कि क्यों उसकी जैसी खुदमुख्तार लड़की प्रतीप के आगे बेवश होती गई थी. पहले नाटक के रिहर्सल से ही प्रतीप ने उसे कुछ ख़ास तबज्जो देनी शुरू की थी, लडकियां कई और थीं नाट्य मंडली में, लेकिन तबस्सुम के प्रति उसका अंदाज कुछ अलग था. एक दिन वह देर से आई रिहर्सल में. प्रतीप रिहर्सल वाले कमरे के बाहर सिगरेट फूंकता दिखा था उसे-उसने पूछा, ‘देर हो गई मोहतरमा!’ उसने कहा, ‘ दोपहर में थोड़ी आँख लग गई थी.’ प्रतीप ने छूटते ही चुटकी ली,’ और सपने में मुझे तो नहीं देख रही थीं न साथी !’

उस दिन तबस्सुम को रिहर्सल में मन नहीं लगा. उसे बार –बार यह वाक्य घेर रहा था, ‘और सपने में मुझे तो नहीं देख रही थीं न साथी!’ कहने का अंदाज, कहते हुए देखने का अंदाज और बाहर सिगरेट पीते हुए इन्तजार की मुद्रा. यह सब इस सवाल को सामान्य नहीं रहने दे रहा था. रिहर्सल से लौटते वक्त भी वह इस वाक्य के गिरफ्त में ही रही- इन दिनों उसे प्रतीप से मिलने वाले ख़ास तबज्जो का एक अर्थ बन गया था इस वाक्य के साथ. घर पहुँचकर एकांत मिलने पर उसने आइने में देखा खुद को. इसके पहले खुद को देखने, खुद पर विचार करने का समय ही कहाँ मिला था उसे- घर की माली हालत के बीच अपने परिवार के लिए कुछ करते हुए खुद का करियर बनाते वक्त !  परिवार के लिए वह ट्यूशन लेती थी, बच्चों का.  कुछ बेरुखापन भी उसके व्यक्तित्व में शामिल हो गया था.

आईने में उसका सांवला रंग उतर आया, इस ख़ास रंगत के साथ जो उसकी शख्सियत थी, वह सात तहखाने से बाहर आती दिखी. बेरुखापन का आवरण उतरने लगा धीरे –धीरे. उसने खुद को देखा, खुद पर गौर किया और कुछ क्षण के लिए पीछा कर रहे वाक्य से मुक्त हुई कि अगले ही क्षण एक सवाल ने घेर लिया उसे उस वाक्य के प्रभाव की पुनर्वापसी के साथ कि ‘क्या प्रतीप ने सिर्फ मजाक भर किया था उससे या….. !’ दूसरे दिन तबस्सुम कुछ अलग ही निखार के साथ रिहर्सल में पहुँची-प्रतीप ने गौर किया. प्रतीप का व्यक्तित्व कितना आकर्षक है- हमेशा खुशमिजाज और साथी कलाकारों के लिए मददगार- तबस्सुम ने मह्सूस  किया. इस तरह वे एक दूसरे के लिए ख़ास हो गये.

नाट्यमहोत्सव के लिए दूसरे शहर में पूरी नाटक मंडली पहुँची. वहां तबस्सुम और प्रतीप को और वक्त मिला एक –दूसरे से बात करने का. तबस्सुम ने पाया कि प्रतीप जितना हंसमुख और मजाहिया अंदाज में जीने वाला शख्स है, उतना ही संजीदा भी. वह शादीशुदा है, थोड़ी कम उम्र में शादी के कारण दो बड़े बच्चों का पिता भी है. बेटी अभी –अभी कॉलेज में पहुँची है और बेटा स्कूल के अंतिम दिनों में है- पत्नी घरेलू जिम्मेवारियां संभालती है. प्रतीप एक जिम्मेदार पिता है और जिम्मेदार पति. परिवार में उसके दादा के समय में जमींदारी थी, आज भी अच्छी –खासी जमीन है गाँव में – शहर से लगकर. प्रतीप इस खानदान का इकलौता लड़का है, जमीन –जायदाद की जिम्मेदारी, पत्नी और बच्चों का ख्याल और सांस्कृतिक सक्रियता – हर भूमिका के प्रति वह ईमानदार है. इन दिनों वह तबस्सुम के प्रति जितना बेतकल्लुफ होता गया था, उतनी ही संजीदगी से अपनी पत्नी कुसुम की चर्चा भी उससे करता. यह साफगोई तबस्सुम को और भी आकर्षित कर रही थी उसके प्रति.
महोत्सव में अपने नाटक के प्रदर्शन के बाद उनकी मंडली तो वापस लौट गई, लेकिन वे वहीं रुके रहे और नाटकों को देखने –समझने के लिए. एक शाम नाटक के बाद प्रतीप और वे काफी देर तक शहर में टहलते रहे. टहलते हुए प्रतीप ने उसके हाथ को अपने हाथ में ले लिया. पहले तो तबस्सुम थोड़ी असहज हुई, अपने हाथ को खींचना चाहा, लेकिन फिर उसने यूं ही ढीला छोड़ दिया. वे देर तक घूमकर, बाहर ही खाना खाकर वापस अपने होटल में आये. प्रतीप उसके साथ तबस्सुम के कमरे की ओर बढ़ने लगा तो वह शरारत के साथ मुसकुराई, ‘इधर नहीं जनाब, आपका कमरा उधर है.’ प्रतीप झेंप गया. फिर संभला, और अपने अंदाज में वापस आया. आंखों में शरारत भरकर उसने कहा, ‘एक टॉप सीक्रेट बताऊँ? ‘ तबस्सुम चुप रही. वह थोड़े और पास आकर बोला, ‘ मझे प्यार हो गया है, पिछले दो महीने से.’ ऐसा कहकर उसने ठहाका लगाया और अपने कमरे की ओर बढ़ गया.
तबस्सुम ने जल्दी से अपना कमरा खोला और बिस्तर पर बिछ गई. ‘यह दूसरा वाक्य था, जिसने उसे घेर लिया.’ पिछले एक महीने में यह दूसरा वाक्य, यह दूसरा बाण, जिससे वह बिंध गई – हाँ, दो ही तो महीने हुए थे उनकी मुलाक़ात के.’ उसने सोचा क्या वह फ्लर्ट कर रहा है ? एक शादीशुदा मर्द उसपर डोरे डाल रहा है ? दूसरे ही पल उसे ये सवाल निरर्थक लगे. प्रतीप एक अच्छा इंसान है, संजीदा- कोई भी उससे मुहब्बत करना चाहेगा. उसने खुद से सवाल किया ‘क्या इन दो महीनों में उसे भी इस इंसान से मुहब्बत हो गई है, एक शादीशुदा इंसान से मुहब्बत ?’ इस सवाल से वह डर गई. ख्यालों से निकलने के लिए टीवी ऑन किया. जो चैनल खुला,  उसपर फरीदा खानम का गीत आ रहा था  –आज जाने की जिद न करो, यूं ही पहलू में बैठे रहो.
गीत वह पूरा सुन नहीं सकी. थककर आई थी, नहाने चली गई.

थोड़ी देर बार दरवाजे पर दस्तक हुई. दरवाजा खोला तो प्रतीप सामने खड़ा था. उसने पूछा अन्दर आ जाऊं, और जवाब की प्रतीक्षा किये बिना अन्दर दाखिल हो गया, ‘ दिल नहीं लग रहा था, सोचा और गुफ्तगू हो जाये.’ तबस्सुम उसके इस तरह अचानक आ जाने से असहज हो गई. असहजता को छिपाते हुए उसने उसका स्वागत किया, ‘जरूर –जरूर.’ वे दोनो काफी देर तक बातें करते रहे. बातों का सिलसिला कब उनकी रूहानी –जिस्मानी नजदीकियों पर ख़त्म हुआ, तबस्सुम समझ नहीं पाई. वह आज भी सोचती है क्या, इसके लिए वह तैयार थी, वह यह भी सोचती है क्या इसके लिए वह तैयार नहीं थी? वह आज भी यह नहीं सोचना चाहती है कि पहल किसकी थी, पहल किसने ली.


वाइफ स्वैपिंग के जमाने में हाडा रानी का अमरत्व

जब तबस्सुम मुझसे यानी कथावाचक से
मिली उस समय तक केन्द्रीय सत्ता की दृश्य और अदृश्य शक्तियां भारतीय परम्परा की पुनर्वापसी के लिए हर संभव प्रयास कर रही थी. हालांकि चुनौतियां भी कम न थी. एक ऐसे समय में जब पत्नियों की अदला –बदली करने वाले लोग समाज के कुलीन वर्ग में शुमार थे, जब देश की अदालतों ने  सेना के व्हाईट कॉलर जॉब वाले लोगों के खिलाफ इस पत्नी-प्रयोग (पत्नियों की अदला- बदली, जिसे भद्र रूप देने के लिए वाइफ स्वैपिंग शब्दावली का आवरण दिया गया था) के लिए जांच के आदेश दे दिये थे, देश की राष्ट्रभक्त सरकारें बच्चों को हाड़ा रानी की कहानी सुना रही थीं. हाड़ा रानी, यानी राजपूताने की शान. रानी, जिसने युद्ध के लिए जाते अपने पति चुडावत को अपना सिर इसलिए काट कर स्मरण –चिह्न के रूप में दे दिया था कि वह राष्ट्र के प्रति काम करते वक्त पत्नी की याद –आसक्ति में कर्तव्यच्यूत न हो जाये. ऐसी सती रानियों की कई कहानियां राजस्थान के रेगिस्तान में दर्ज हैं. पत्नियों का अनुकूलन तब से अब तक यथावत है, राष्ट्र के लिए काम करते चुडावत से लेकर राष्ट्र की सीमाओं की रक्षा में लगे आधुनिक सैनिकों तक. फर्क हुआ है तब वे सिर देती थीं अब देह. सत्ता की दृश्य -अदृश्य शक्तियां पत्नियों के बलिदान को बस अपने पुराने स्वरुप में वापस लाना चाहती थीं – इसलिए बच्चों को हाडा रानी पढ़ाया जा रहा था. राजस्थान की सरकार हाडा रानी को राजस्थान की अक्षुण्ण सांस्कृतिक चेतना बनाना चाह रही थी, राजस्थान पर से मीरा का ‘बदनुमा दाग’ मिटा देना चाहती थी. हाड़ा रानी मतलब सती स्त्री – विवाह ही बेदी पर होम होने वाली, मीरा मतलब विवाह को चुनौती देने वाली आवारा स्त्री! तबस्सुम आई थी कथा मासिक हंस में मेरी कहानी ‘इनबॉक्स में रानी सारंगा’ पढ़कर, मुझसे लड़ने, मुझसे सवाल करने. उसे लगता था कि यह क्या किया मैंने उस कहानी में, रूमी को एक के बाद एक प्रेम करते हुए दिखाया, धोखा –फरेब करते हुए दिखाया फिर भी न कोई ग्लानि और न अंतर्द्वंद्व. और तो और आख़िरी तौर पर उसे सारे पिछले प्रेम से मुक्त निर्द्वंद्व नये प्रेम के लिए आजाद कर दिया. बेटी को भी उसके साथ खडा कर दिया. आखिर क्यों नहीं, क्यों नहीं दिखा मुझे मोहित की पत्नी का दर्द या, फर्नांडिस की पत्नी का दुःख. नहीं दिखी नानू के मौन प्रश्न के भीतर की विह्वल तड़प . वह सवाल करती है कि और तो और रूमी के पति शीतांशु से ख़ास सहानुभूति भी नहीं है लेखक की, न प्रेमी मोहित से ही. ये सारे सवाल उसने आक्रोश में पूछे और गहरी पीड़ा में भी.



हुआ यूं था कि जिन दिनों उसे प्रतीप की नई घोषणा की खबर मिली थी कि वह छः महीने से प्रेम में है, और उसकी घोषणा के साथ नीलिमा नीलकेशी के चेहरे के मिश्रित भाव का बिम्ब खीचा था किसी ने, और उसे बताया था कि प्रतीप ने कब –कब और कैसे एकांत तलाशा उस शहर में नीलिमा के साथ, यह भी कि कि विदा होते वक्त प्रतीप और नीलिमा के गले लगने के अंदाज पर उपस्थित कई लोगों की निगाह गई थी, सिर्फ नीलिमा के उद्योगपति पति को छोड़कर, उन्हीं दिनों उसने ‘इनबॉक्स में रानी सारंगा’ भी पढ़ा था. इस खबर और कहानी के मिश्रित प्रभाव के पूर्व तक तबस्सुम प्रतीप के प्रति खुद को समर्पित कर चुकी थी. राजस्थान के उस छोटे शहर में आधुनिक मीरा बनना आसान नहीं था, वह भी किसी जीवित कृष्ण के प्रेम में- लेकिन तबस्सुम तो बनी ही किसी और मिट्टी की थी.

 नाट्य महोत्सव के बाद जब वे शहर लौटे थे तब  तबस्सुम को लगा कि वह नाट्यमहोत्सव की एक रात की सारी जिम्मेवारी प्रतीप पर डाल दे. लेकिन यह विचार ज्यादा देर तक नहीं टिक सका. तबस्सुम ने खुद क्या प्रतीप के प्रति अपना लगाव महसूस नहीं किया था? क्या उसके पहले अप्रत्याशित सवाल ने कि ‘कहीं सपने में..’ ने उसके भीतर से एक नए तबस्सुम को ही बाहर लाकर नहीं खडा किया था, जो इस शख्स की संजीदगी, खुशमिजाजी और मददगार व्यक्तित्व के प्रति सहज स्नेह से बिंध गई थी? आखिर क्यों नहीं लौटी वह नाट्य मंडली के अन्य सदस्यों के साथ नाटक के बाद. क्या वह खुद भी नहीं चाह रही थी प्रतीप के साथ होना –जीना !
इश्क और मुश्क छुपाये नहीं छिपते. शहर छोटा था, प्रतीप के प्रेम की खबर रिहर्सल के छोटे से कमरे से बाहर तक फ़ैली और जल्द ही उसकी पत्नी कुसुम को दस्तक दे बैठी. खबर पर यकीन होना उसके लिए नामुमकिन था. प्रतीप ने कभी उसे अहसास होने ही नहीं दिया था कि वह उससे बाहर भी …. ! कुसुम को वह खूब समय देता था, भरपूर प्यार – वह एक जिम्मेदार पति था, जिम्मेदार पिता. वह कभी –कभी सोचती कि कितना फर्क है प्रतीप और उसके पिता और दादा में- कुनबे में ही सामंती ठस्स था, राजपूताने का आन –बान –शान. यह सब प्रतीप को छू तक नहीं गया था. उसकी दो –दो सास थी – प्रतीप दो माओं का एक लाडला बेटा. उसकी सास उससे कहती, ‘ प्रतीप के सात पुश्तों से चला आ रहा है दो –दो विवाह. इस घर में सौतनें बड़े प्रेम से रहती रही हैं. वे दो होने पर खुद को खुशनसीब मानती थीं, अन्यथा इसी राजपूताने में एक जमींदार की कई –कई पत्नियों की कहानियां भी हैं.’ सास कहती, ‘ लेकिन तू तो हमसे भी ज्यादा खुशनसीब है, मेरा प्रतीप तुम्हारे सिवा किसी और की ओर देखता तक नहीं है. अब तक नहीं लाया किसी को व्याह कर तो अब क्या ?’ दूसरी सास जवाब में कहती, ‘ क्योंकर लायेगा वो किसी और को, इतनी खूबसूरत बहू है, दो –दो बच्चे जाने हैं इसने,  लेकिन देख देखो तो एकदम कंचन सी काया- सांचे में कसी देह. मैं तो बिना बच्चा पैदा किये ही ढलक गई थी जगह –जगह से. ढीली पड़ गई थी,’ ऐसा कहते हुए वे खिलखिला उठतीं.

‘ लेकिन खबर सच निकली तो…! क्या मुंह दिखायेगी अपनी सास को… ! कैसे समझाएगी खुद को,’ खबर का सच होना उसके अभिमानी मन के टुकड़े कर देने वाला था. उसने खुद को समझाया, ‘ नहीं मेरा प्रतीप, ऐसा नहीं है..’ लेकिन सच तो सच था, छोटे शहर का सच. ऐसा भी नहीं था कि तबस्सुम के आ जाने से प्रतीप के उसके प्रति व्यवहार में कोई फर्क पडा था, किसी दूसरे की उपस्थिति छू तक नहीं रही थी उसे. संयुक्त परिवार में रहते हुए वे अलग –अलग कमरों में होते थे रात को, खासकर तबसे जबसे बच्चे बड़े हो गये थे. प्रतीप का शयनकक्ष ही उसकी स्टडी भी था, जहां उसके कंप्यूटर से लेकर किताबें तक थीं. उनके अपने जिस्मानी रिश्ते अब उस बारंबारता में नहीं थे, जो शादी के शुरुआती दिनों में हुआ करते थे- और भी गम हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा. जीवन में कोई बदलाव लेकर नहीं आई थी तबस्सुम, फिर भी सच किसी न किसी रूप में उसे डंके के चोट पर अहसास दे रहा था कि सच है, जिसका सच होना कुसुम के विश्वास का टूटना था.


एक दिन उसने पूछ ही लिया उससे, ‘ क्या आपको मुहब्बत है किसी से ?’
प्रतीप चौका, ‘ नहीं तो.’
‘ सच बताइये, मुझे अच्छा ही लगेगा सच सुनकर. आपके खानदान में कोई अकेली बीबी होने का सुख हासिल नहीं कर सकी है. मैं भी तैयार हूँ किसी सौतन के लिए.’
‘ जो बात मुझे भी नहीं पता है, उसे सच या झूठ मैं क्या कहूं!’
‘ पूरे शहर के दरो –दिवार तक इस मुहब्बत के दास्तान बता रहे हैं और आप कहते हैं, आपको ही नहीं पता.’
प्रतीप बिफर गया, ‘ तुम्हें ऐसा क्यों लगता है, क्या मेरा किसी के साथ उठना –बैठना भी अब तुम्हें गवारा नहीं. सार्जनिक जीवन में हूँ लडकियां ..’
‘ लडकियां नहीं तबस्सुम कहिये…’
प्रतीप का चेहरा लाल हो गया, वह बिना बोले झटके से उठा और बाहर निकल गया. कुसुम उसके ही कमरे में बेड पर निढाल गिर गई. फूट –फूट कर रोने लगी. वहाँ कोई नहीं था, जो उसके आंसुओं को पोछ सके. उसे खुद ही चुप होना था, आंसू पोछने थे. सासों के सामने ‘अकेली बीबी’ का मान था उसे- वे जान गइं तो जाता रहेगा. बच्चों पर भी जाहिर नहीं होने देना था सबकुछ – बेटी कॉलेज जाने लगी थी, क्या सोचेगी !

वह खुद ही गई तबस्सुम से मिलने उसके कॉलेज. औपचारिक बातचीत के बाद कॉलेज की कैंटिन में कुसुम ने बात शुरू की, ‘ चाहती तो मैं फोन कर, समय लेकर आ सकती थी. लेकिन सोचा चलूँ सीधे ही चलकर मिलते हैं, बड़े चर्चे हैं आपके शहर में’
तबस्सुम चुप रही, वह इशारा समझ रही थी.
‘अच्छा अभिनय करती हैं आप…’
‘ क्या हम और कहीं चलें बात करने, यहाँ कॉलेज कैंटीन में..’
कुसुम को ध्यान आया कि वह सब्र खो रही है, पत्नी का दर्प भी. उसने सोचा,  ‘एक वाहियात लडकी के लिए, जो किसी शादीशुदा मर्द से इश्क कर रही है.’ प्रत्यक्षतः उसने कहा, ‘हां, हाँ कहीं और चलते हैं.
कॉलेज में ही एक कमरे के एकांत में उन दोनो के बीच जो संवाद हुआ, उसका मूल भाव और स्वरुप यह रहा कि तबस्सुम ज्यादातर चुप रही और कुसुम ने अंततः एक निष्कर्ष दिया कि ‘ जमींदार परिवार की बहु के रूप में वह तबस्सुम का स्वागत करने के लिए तैयार है. आखिर खानदान का चलन है तो फिर प्रतीप ही क्यों पीछे रहे.’ और  यह भी कि उस खानदान में सौतनें, ‘ एक –दूसरे से मिलकर रहती हैं, तो वह भी वही चलन निभायेगी,’ ऐसा कहते हुए उसकी आँखें डबडबाई हुई थीं, लेकिन होठों से मुसकान जाने नहीं दिया था उसने.



उसके सामने तबस्सुम इस असह्य मंजर को झेल गई और जाते ही उसी कमरे में घुटनों पर सर टिकाकर सुबकती रही. उसने प्रतीप से न मिलने का निर्णय लिया. कई संवाद भिजवाये प्रतीप ने, वह नहीं गई. यह जरूर था कि वह खुद को समझा नहीं पा रही थी कि प्रतीप से पूरी तरह अलग भी हो सकती है. मां ने इन्हीं दिनों समझाया कि उम्र निकल रही है, शादी कर ले. वह सोचती, ‘ किससे !’ ‘ प्रतीप की तरह या प्रतीप से बेहतर नहीं मिला तो …!’

एक दिन खुद प्रतीप उसके कॉलेज आ धमका, ‘ साथी हम एक जरूरी नाटक कर रहे हैं. आपके बिना पूरा नहीं हो सकता. आखिर हो क्या गया है आपको.’ उसका मन हुआ वह कह दे कि अब उसे नाटक नहीं करना है. लेकिन चुप ही रही.
‘ क्या किसी ने कुछ कहा… क्या नाटक छोड़ रही हैं आप साथी.’
वह भर्रा उठी, ‘ क्या आपको कुछ भी नहीं पता ?’
प्रतीप ने बड़े इत्मीनान से कहा, ‘ मुझे सिर्फ इतना पता है कि आपका कोई भी निर्णय ज्यादा दिन नहीं टिकने वाला. आप मेरे बिना नहीं रह सकती हैं.’
‘ सच कहते हैं आप, एकदम सच,’ तबस्सुम उसके सीने से लगकर रोने लगी. प्रतीप ने उसके बालों में हाथ फिराते हुए कहा, ‘ साथी मैं जानता हूँ कि आपका अपराधी हूँ मैं, लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि आपसे बेपनाह मुहब्बत है मुझे. लेकिन …’
‘ लेकिन क्या ..’ तबस्सुम बिफर पड़ी
‘ लेकिन छोडिये, आप आज शाम के रिहर्सल में मिल रही हैं.’

और हुआ भी यही तबस्सुम शाम को रिहर्सल के लिए पहुँच ही गई. उसने निर्णय ले लिया था, प्रतीप के बिना वह रह नहीं सकती और वह एक मानिनी पत्नी का मान रखते हुए, अपना भी मान रखते हुए एक निर्णय पर पहुँची कि आजीवन क्वांरी रहेगी. कई बार प्रतीप ने भी समझया की शादी कर लो, फिर भी हम मिलते रहेंगे. तबस्सुम ने तय किया जीवन में और भी उलझाव नहीं- वह अकेली रहेगी, प्रतीप के लिए अकेली – जीवित कृष्ण की मीरा.
इस तरह राजस्थान के उस छोटे से शहर में एक कृष्ण – एक रुक्मिणी और एक मीरा का जीवन एक सरल रेखा पर चलने लगा, जबतक प्रतीप के नये प्रेम – छः महीने वाले प्रेम की खबर वहाँ नहीं पहुँची. खबर के साथ ही एक बड़ा बदलाव हुआ, तबस्सुम ने खुद के भीतर की प्रेमिका को पत्नी में बदलते पाया. उसके भीतर रासायनिक प्रतिक्रया तीव्र हुई, शायद वैसी ही जैसी कुछ दिनों ही पहले कुसुम के भीतर हुई थी. इसके पहले तक वह अपनी ‘ मीरा वाली स्थिति के प्रति आश्वस्त थी. शायद वह नहीं समझ पाई होगी कि विवाह न करने, प्रतीप के घर दूसरी बीबी के रूप में न जाने के बावजूद प्रतीप की अपने प्रति निष्ठा के प्रति वह वैसे ही आश्वस्त होती गई थी, जैसी इसके पहले कुसुम थी. लेकिन इस खबर ने तो ….

उसके सामने एक और धमाका हुआ. एक दिन बाजार में कुसुम मिल गई. तबस्सुम उससे बच कर निकलना चाहती थी, लेकिन आगे बढ़ कर कुसुम ने ही उसे रुका. अरे, तबस्सुम कहाँ भाग रही हैं मुझसे. चलिए कोल्ड कॉफ़ी पीते हैं. तबस्सुम आवाक उसे देखती रही. कॉफ़ी पीते हुए कुसुम ने उसे बड़े इत्मीनान से बताया,
‘ तबस्सुम तुम्हें, बुरा लगेगा. लेकिन सच्चाइयां होती हैं, जैसे देखो न मेरी ही जिन्दगी में. मैं अपनी उम्र के ४०वे साल तक सोचती थी कि प्रतीप अपने खानदान के पूर्वजों की तरह नहीं है, घर में सौतन नहीं लाएगा. हालांकि उसने मेरा इतना मान तो रखा कि सौतन घर में नहीं लाया, लेकिन मैं इस हकीकत के प्रति अभ्यस्त हो गई कि इसी शहर में मेरी एक सौतन रहती है.’
‘……’
‘ मेरी ही तरह भोली और मासूम ! वैसे भी हमारे ही खानदान में एक और चलन है – दो मासूम सौतनें आपस में बिगाड़ नहीं रखतीं’ वह खिलखिला उठी.
‘…..’
‘ तुम्हें लग रहा होगा कि मैं तुम्हें चिढाने आई हूँ. लेकिन नहीं मेरी सखि, तुम तो अचानक से मिल गई. मैं तुम्हारे पास एक दिन आना चाहती थी.’
तबस्सुम को लगा कि वह फट पड़ेगी .
‘ नहीं बहन तुम्हें दुखी करने का मेरा कोई इरादा नहीं है. लेकिन सच तुम्हें जानना चाहिए. जीवन भर कई मासूम भ्रम में रहते हैं. मुझे उस दिन ही लग गया था कि मर्द ने एक बार घर से खूंटा तुड़वाया है तो वह रुकेगा नहीं. मैंने उसके व्हाट्स अप और फेसबुक मेसेज देखे हैं. वह कई नायिकाओं की तलाश में है – कई –कई नाटकों  में भूमिका के लिए. और तो और वह किसी से भी मेरे होने या तुम्हारे होने को छुपाता नहीं है. बड़े इत्मीनान से बताता है कि हम दोनों ही एक ही शहर में रहती हैं – और उससे बहुत मुहब्बत करती हैं.’

तबस्सुम को काटो तो खून नहीं. उसे याद आया कि नीलिमा नीलकेशी ने इन्हीं दिनों उससे बातचीत शुरू कर दी थी. बड़ी बहन की तरह व्यवहार करतीं. उसे समझ में आया प्रतीप का पैटर्न. तो वह सहज बनाता है अपनी नई प्रेमिकाओं को अपनी पत्नी और प्रेमिका के प्रति .. ! ‘ या हो सकता है वह हम दोनो का एक उद्दीपक की तरह इस्तेमाल करता हो, एक ही शहर में दो महिलायें किसी पुरुष पर जान दें तो वह पुरुष कुछ ख़ास होने की छवि तो ले ही लेता है . तबस्सुम को लगा कि उसे चक्कर आयेगा.

‘ बहन, मैं तो अभयस्त हो गई हूँ , समझौता कर लिया है, सिर्फ इसलिए कि मेरे अलावा किसी को व्याह कर तो नहीं ला रहा है न. हम कम-पढी लिखी स्त्रियों के लिए इसके अलावा कोई चारा भी नहीं है. इन दिनों नीलिमा नाम की कोई मेरी बड़ी बहन फोन करती हैं,’ उसकी आंखें डबडबा गयीं.
और भी बहुत कुछ कहा कुसुम ने जाने के पहले तक. जाते- जाते उसने कहा था कि ‘ हम इतिहास की हाडा रानियाँ हैं सखि, पति के लिए समर्पित !  लेकिन हमें क्या पता कि मीराओं की भी कोई विवशता होती है?’
उसके जाते ही तबस्सुम ने सोचा क्या यह मुझे चिढ़ाने आई थी … क्या यह मुझे सचेत करने आई थी ..


लोग कहे मीरा भई बावरी…. मीरा का राधा और फिर रुक्मिणी हो जाना


जिस समय ये दोनो स्त्रियाँ राजस्थान के एक शहर में मिलीं, उस समय एक बड़े राजवंश की स्त्री राजस्थान पर शासन कर रही थी. वह न मीरा थी और न हाड़ा. विवाह के साल भर के भीतर अपने पति से अलग होने का साहस रखने वाली उस स्त्री ने राजस्थान की नई पीढी को ‘हाड़ा रानी का बलिदान’ पढ़ाने में रुचि जरूर ली थी. हालांकि हाड़ा रानी पढाये जाने के इस दौर में केन्द्रीय सत्ता के द्वारा उच्च स्तर की सुरक्षा से घेर दी गई एक पत्नी जानना चाह रही थी कि उसे उसे सुरक्षा क्यों और यह भी समझना चाह रही थी कि यदि सुरक्षा किसी शीर्ष सत्ताधीश की पत्नी होने के नाते है, तो उसके हक़ –अधिकार क्यों नहीं मिलते उसे – रायसीना उससे इतनी दूर क्यों है – उसे इस सवाल का जवाब न मिलना था, न मिला – क्योंकि जवाब देने वाली एजेंसियों पर अघोषित पहरा था. उसके पड़ोसी राज्य की सीमाओं में भटकने वाली हाड़ा रानी की रूह उसे समझाना चाह रही थी कि ‘ अरी पगली तुम्हारा पति जब निकल रहा था अध्यात्म, धर्म और राज्य की सत्ता के संधान में तुम्हें छोड़कर, तो तुमने अपना सर क्यों नहीं दिया- मुझसे सीख इसके दो फायदे होते तुम्हें एक तो तुम्हें भ्रम बना रहता कि तुम्हारा पति तुम्हें याद रखता होगा और दूसरा कि तुम अमर हो गई होती, मेरी तरह. सत्ता की शीर्ष पर बैठा तुम्हारा पति सार्वजनिक स्थलों पर रोता तुम्हारे लिए, करवा चौथ के दिन रखता उपवास तुम्हारे लिए.’ उन्हीं दिनों बॉलीवुड का एक चर्चित जोड़ा- पिछले कई वर्षों से आदर्श पति –पत्नी के रूम में ख्याति में बंधा जोड़ा,  अलग हो गया- पत्नी को प्यार हुआ एक सह अभिनेता से और बाद में पति को भी. यानी यह वह दौर था, जब विवाह टूटने और विवाह को किसी तरह बनाये रखने की जद्दोजहद समाज के सहजबोध में शामिल था.
इसी समय के टुकड़े पर इस कहानी की नायिका, या नायिकाओं में से तबस्सुम मुझसे मिलने आई थी- मेरी कहानी ‘इनबॉक्स में रानी सारंगा’ पढ़कर. मुझसे मिलने के कुछ दिन पहले ही बाजार में मिली थी कुसुम उससे.
वह मुझ पर बिफरी, ‘ क्यों ऐसी महिलाओं का कोई लगाम नहीं होता, क्यों रूमी को निर्द्वन्द्व बहने दिया आपने.. !

मैंने उसे सहज करते हुए कहा, ‘ रूमी प्यार करने के लिए ही बनी थी, उसने प्रेम विवाह किया था, सफल प्रेम जीवन जिया, लेकिन प्रेम तटबंधों को तोड़ता है, एक समय आकर वह टूटा और वह नदी की तरह बही –क्योंकि प्रेम करने में उसे कोई कुंठा महसूस नहीं होती थी.’
‘ यह ख्याली इमेज है उसका आपके मन में, कई बार मुझे भी लगा कि कहीं मोहित कथाकार ही तो नहीं है, जिसने एक इमेज बना रखा है रूमी का, अपनी इमेज में कैद रूमी का मनचाहा व्यक्तित्व गढ़ रहा है. अन्यथा यह बाताइये कि क्या प्रेम एक वक्त में ईमानदारी नहीं मांगता..’
‘ लेकिन ..’
‘आप बिलकुल न समझें कि मैं किसी एक प्रेम में बंधने की हिमायत लेकर आपसे मिलने आई हूँ, लेकिन मुझे लगता है कि कम से कम आप जिस वक्त जिस प्रेम में हैं उस वक्त उस प्रेम के प्रति ईमानदार हों.’
‘ क्या प्रेम शर्तों पर निर्धारित होता है…. हर प्रेम के अपने किस्से हैं, हर प्रेम की अपनी तासीर….’
‘ प्रेम की एक कहानी मेरे पास भी है,’ वह बेचैनी से टहलने लगी.
मैंने निरपेक्ष भाव में कहा, ‘ सुना डालिये… देखूं इस प्रेम की तासीर क्या है ?’
तबस्सुम की पूरी कहानी सुनकर मैंने सोचा कि इस मीरा के भीतर रुक्मिणी ने सिर उठाया है. वह इस कथा –प्रसंग के साथ कई बार भावुक हुई, कई बार आक्रोश में आई. मैंने उसे उसकी कहानी के प्रभाव से निकालना चाहा.

मैंने उसे फिर से अपनी कहानी की बहसों में लाना चाहा, ‘ अच्छा यह बताइये आप क्या चाहती थीं आप , मैं अपनी कहानी की नायिका रूमी को किसी ग्लानी से भर देता या सन्यास के लिए प्रेरित करता.’
‘ फर्नांडिस या मोहित तक तो ठहर सकती थी वह !’
‘ क्या प्रतीप ठहर जायेगा !.. यदि नहीं तो रूमी ही क्यों ठहरे भला.’
‘ लेकिन ..’
‘ कहीं नीलिमा में रूमी तो नहीं देख रही हैं आप,’ मैंने सवाल किया. फिर कहा, ‘ तबस्सुम आप अपने ही सवालों से घिर रही हैं, वही परेशान कर रहा है आपको … ! आप अनिर्णय की स्थिति में हैं.’
‘ कैसा अनिर्णय ? ‘
‘ आपकी कहानी की तबस्सुम क्या करने वाली हैं, सच जानकार.’
वह चुप रही
‘क्या आपकी तबस्सुम सती होगी अपने प्रिय के इमेज के साथ, जो उसने बनाई थी. या वह मुकदमा करेगी अपने यौन उत्पीडन का.’
‘…..’
‘ प्रतीप गतिमान है, तबस्सुम का क्या होगा, क्या चिर क्वांरी तबस्सुम …..’
‘ वह जाएगा कहाँ, लौटकर अपने ही शहर आयेगा, उसका आख़िरी ठौर अपना शहर, अपना घर और अपनी नाटक मंडली है’ वह बिदक गई थी.
‘ आप कोई आदर्श और आधुनिक बोध का बखान नहीं कर रही हैं. हमारी परम्परा राधाओं का है, 18 हजार पटरानियों वाले कृष्ण के लिए समर्पित राधा.’
‘ मैंने उसे समग्रता में प्यार किया है, उसकी अच्छाइयों-बुराइयों के साथ,’ जाने के लिए उठी वह.
‘ मैं अगली बार आपके शहर आ रहा हूँ, एक कथा गोष्ठी में.’ मैंने विदा दिया और सोचा मैं तबस्सुम को नहीं कुसुम को विदा कर रहा हूँ – मीरा को नहीं राधा को विदा कर रहा हूँ.
नानू ने आखिर में मुझसे पूछा, ‘ इतना निरीह क्यों है आपकी कुसुम और तबस्सुम. क्या कुसुम और तबस्सुम के लिए प्यार के और मौके और पात्र नहीं हैं..’
मैंने कहा, ‘ नानू, मैं यथार्थ की कहानी कह रहा हूँ, कोई कल्पना नहीं.’

इस बार कथा पूरी होने के बाद कथावाचक ने बैताल की तरह प्रश्न किया, ‘ तो हे मेरी मीठी नानू, इस कहानी में कौन किससे धोखा कर रहा है, प्रतीप कुसुम और तबस्सुम से, नीलिमा अपने पति, कुसुम और तबस्सुम से , तबस्सुम कुसुम से या कुसुम खुद से और तबस्सुम भी खुद से ! विक्रम की तरह नानू आदतन मजबूर नहीं थी मुंह खोलने को इसलिए उसने कुछ नहीं कहा. मैं जानता हूँ कि वह क्या सोच रही थी उस वक्त …. !

उस वक्त वह श्रोता नहीं कथावाचक होना चाह रही थी, वह चाह रही थी परकाया प्रवेश. वह चाह रही थी कि कथावाचक के पास से लौटकर तबस्सुम फूट –फूट कर रोये नहीं. वह चाह रही थी कि तबस्सुम उसी शहर में ऐसी स्थितियां पैदा करे कि कोई ‘ प्रतीप’ किसी ‘तब्बसुम’ को तब्बसुम न बना पाये अगली बार और यह भी कि वह ‘ कुसुम को खींच लाये अपनी सासों की परम्परा से. वह नहीं जानती नीलिमा का निर्णय, लेकिन वह चाहती है उसकी कहानी की नीलिमा को वह ग्लानि, क्षोभ और संताप से भर दे – दिल बहलाने को ‘ग़ालिब’ ख्याल ये अच्छा है. यथार्थ ऐसा था नहीं और नानू इस वक्त श्रोता थी, कथावाचक नहीं…! शायद फिर कभी, फिर कभी ऐसा हो कि नानू बैताल की तरह विक्रम के कंधे पर हो और सुना रही हो कथा, ‘वाल्मीकि’ , ‘वेदव्यास’ से लेकर लल्लू लाल मिश्र तक को और हाँ इस कथावाचक को भी.

संवेद के अंक 106 (भूमंडलीकरण के दौर में हिन्दी कहानी) में प्रकाशित 

संजीव चंदन (25 नवंबर 1977) : प्रकाशन संस्था व समाजकर्मी समूह ‘द मार्जनालाइज्ड’ के प्रमुख संजीव चंदन चर्चित पत्रिका ‘स्त्रीकाल’(अनियतकालीन व वेबपोर्टल) के संपादक भी हैं। श्री चंदन अपने स्त्रीवादी-आंबेडकरवादी लेखन के लिए जाने जाते हैं। स्त्री मुद्दों पर उनके द्वारा संपादित पुस्तक ‘चौखट पर स्त्री (2014) प्रकाशित है तथा उनका कहानी संग्रह ‘546वीं सीट की स्त्री’ प्रकाश्य है। 


संपर्क : themarginalised@gmail.com, 8130284314


स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें    :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें  उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

गुजरात दंगों में साहब कौन थे और क्या कर रहे थे बताने वाली किताब अब हिन्दी में/अग्रिम बुकिंग शुरू



राजीव सुमन 

राणा अयूब की यह किताब  गुजरात दंगे की भीतरी परत के पीछे के सच को नंगा करती है एकदम जासूसी उपन्यास के अंदाज़ में–रोमांच भय और अविश्वसनीय। लेकिन उतनी ही प्रमाणिक। एक अमरीकी फिल्मकार और संस्था से जुडी मैथिली  त्यागी के छद्म रूप में की गई खोजी पत्रकारिता की निर्भीक मिसाल  पेश करती राणा अयूब ने उस सच को जनता के सामने लाने का काम किया है जो लोकतंत्र के इतिहास में किये गए सबसे अमानवीय और घृणित कार्यों में था,  जो स्वयं सरकार और सरकारी मशीनरी की स्पष्ट संलिप्तता को हमारे सामने लाती है। मैं जब गुजरात फाइल्स पढ़ रहा था तो कई भाव एक साथ आपस में गुत्थमगुत्था थे, समझ में नहीं आ रहा था कि बेबसी क्या और किस हद तक हो सकती है और व्यक्ति कितना धीर गंभीर दिखने के बावजूद कितना अमानवीय  हो सकता है!

पुलिस थाने का वह दृश्य बार-बार जीवित हो रहा था जब किसी बड़े अधिकारी के पास फोन आया कि जिन दो लोगों(मुसलमानो) को पकडे हो, उड़ा दो। लेकिन उस अधिकारी को सैल्यूट करने का मन हो आया जिसने प्रतिवाद करते हुए कहा कि मैंने इन दोनो से पूछताछ की है और पाया कि ये दंगे शांत करा रहे थे। उधर से कहा गया कि ‘साहब’ का आदेश है। (फोन करनेवाला अब भी साहब का खास है।) इस आदेश के बावजूद भी उस पुलिस अधिकारी ने उन्हें छोड़ दिया।  पूरी किताब में इस इक्का दुक्का उदाहरण के विपरीत वृतांतों से भरे-पड़े हैं। कई बड़े अधिकारियो का पश्चाताप, आत्म स्वीकृतियां- भले ही कई सालों बाद आई, किसी के अपने  इकलौते बेटे की असामयिक मौत के बाद ही सही.  भारत के लोगों के सामने यह नंगा सच लाने के लिए राणा अयूब को सैल्यूट ! गुजरात फाइल्स किताब अब गुलमोहर प्रकाशन ने हिन्दी में प्रकाशित की है.

आमंत्रण
राना अय्यूब की मशहूर किताब
‘गुजरात फाइल्स’ अब हिंदी में
विमोचन और बातचीत
16 सितंबर, दोपहर- 3.30 बजे
प्रेस क्लब, रायसीना रोड, नई दिल्ली
आप सब सादर आमंत्रित हैं।
निवेदक- गुलमोहर किताब

प्रकाशक ‘गुलमोहर किताब’ ने  295 रुपये की ये किताब अग्रिम बुकिंग में 200 रुपये में देने की बात कही है। पैसा गुलमोहर किताब के बैंक खाते में जमा कराके उसकी सूचना ई-मेल, व्हाट्स-एप या एसएमएस द्वारा अवश्य दें। 
अग्रिम-बुकिंग के लिए
GULMOHAR KITAB
Bank: ANDHRA BANK
Branch: Pratap Nagar, Mayur Vihar, New Delhi
Account No: 158810100050844
IFS Code: ANDB0001588
ई-मेल- gulmohar.kitaab@gmail.com
फोन- 9818755922, 9958070171

नृत्यमय जगत और अन्य कविताएँ

0
स्वरांगी साने

 साहित्यकार, पत्रकार और अनुवादक स्वरांगी की रचनाएं  विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. संपर्क : swaraangisane@gmail.com



सारंगी वादक उस्ताद मोइनुद्दीन खाँ  दुनिया से रुख्सत हो गये , उन्हें समर्पित  स्वरांगी साने की कविताएँ 

1.
कभी देखा है किसी को सौरंगी (सारंगी) बजाते हुए
लगता ही नहीं
सौरंगी बज रही है
देह से सटी होती है सौरंगी
और लगता है देह बज रही है ।

सौरंगों को एक साथ गूँथ लिया है उसने
पूछतेहैं –कोई अच्छा सौरंगी बजाने वाला है
नाम आता है उसका
जिसने मांझ लिया है गज को देह के साथ
सेतु बन गया है गज
जिससे
उसकी देह के पार की यात्रा शुरू हो गई है ।

2.
तबले पर थिरक रही हैं
अंगुलियाँ
चेहरे पर मुस्कान
यह ‘स्व’ का आनंद है
जो उसे बना रहा है ‘तबलची’ से ‘तबला नवाज़’
‘झपताल’ के
‘धीना धी धीना’
का लड़कपन है
तो ‘धमार’ का
‘क धि ट धि ट धाs’
का संयत भाव भी।
इस ‘धा’ पर सम आई है
गर्दन हिलाकर बता रहा है वह
और इस ‘तिरकिट’ पर
घूमी हैं अंगुलियाँ
उसकी गर्दन और चेहरे का स्मित हास्य भी

क्या है ऐसा
जो तबला बजाते हुए
उसे आनंदित कर रहा है
नाच रहा है उसका
ऊर्ध्व शरीर
ऊर्ध्व की ओर हो रही है उसकी गति
उसके लिए यह मोक्ष का सोपान है।

3.
मुखमोर-मोर मुस्कात जात’
गा रही है गायिका मालकौंस में
अर्र्धनिमीलित हैं उसकीआँखें
शब्दों से नहीं
तान के उतार-चढ़ाव से
बदल रही हैं उसके चेहरे की
भाव-भंगिमाएँ
यदि इसकी जगह वह गाती
‘ठुमक चलत रामचंद्र’
तब भी उसके चेहरे पर वही शांत भाव होता
जो
‘भोर भई अब आए हो, रैन कहाँ बिताई’
गाते हुए होता।

गायिका को न शब्दों का उपालंभ चाहिए
न उनके अर्थों की व्यंजना
उसके लिए शब्द से भी ज़्यादा ज़रूरी है
स्वर, आरोह-अवरोह
वह स्वरों में खो रही है
वही है उसका परमानंद, उसका मोक्ष।

अनचिन्हा कोलाज़….स्वरांगी साने की कविताएँ

4.
सितार के मिज़राब
अँगुलियों में अँगूठियों की तरह पहने हैं
खींच-खींच कर बजाई जाती है सितार
एक विशिष्ट आसन में बैठकर
और खुद ही मुँह से निकलता है ‘क्या बाsत’
यह उस तार के खींचने का उन्माद नहीं होता
न ही यह होता है उस तुंबे का स्पंदन
उस झाले पर भी नहीं कही गई होती है यह बात

यह उस क्षण को जी लेने का आनंद होता है
जिसे जिया होता है
उसने अभी
खुद को खोते हुए।

5.
… और
और देखा है मुरली बजाते हुए उसे
शरीर पर कितने वक्र पड़ते हैं
पर कितने प्यार से बजाता है वह बंसी
नीर वशांतिका रहस्य
क्या केवल कृष्ण जानता है ?
नहीं
वह भी जानता है
जो बैठकर बजाता है बाँसुरी
और खो जाता है निराकार में ।

6.
इन सबके साथ
तो कभी अकेले ही
नाचती है नर्तकी
उसकी आँखें बंद नहीं होतीं
हरक्षण की सजगता उसके साथ होती है।

आमद का ‘धातकथुंगाs’
करते हुए वह अभिनय करती है
साकार कर देती है शिव-पार्वती।
वह
हर शब्द के भाव को पकड़ती है ऐसे
जैसे कि उस शब्द का वही अर्थ हो
‘लाली मेरे लाल की’ कहते हुए वह अपने लाल-गोपाल को दिखाती है
तो सूर्य की और होठों की भी लालिमा दिखा देती है

उन छोटे-छोटे बोल-टुकड़ों को
वह इतने प्यार से बरतती है
जैसे पैरों से निकाल रही हो मक्खन
दूसरे ही क्षण किसी कवित्त में
वह राधा बन छीन ले जाती है बाँसुरी

एक ही बार में वह
क्या-क्या करती है
उलाहना देती है
तो कभी बिनती करने लगती है
‘मोहे छेड़ो न कन्हाई’

वह नृत्य करती है
देखती है तबले की ओर
होती है तबले और घुंघरुओं की जुगलबंदी
पखावज के नाद में रमण करती है
स्तब्ध हो जाता है वह क्षण
तभी वह देखती है सौरंगी को
और एक टीस सीधे
उसके दिल को चीर जाती है
तानपूरे से भरती है
वह पूरा व्योम
तानपूरे पर चलती चार अँगुलियों से
चारचरणोंकोपारकरजातीहै

बाँसुरी की तान में
वह करती है एकपल को आँखें बंद
शुरू होती है भैरवी
खोल देती है आँखें तुरंत।

अहीर भैरव के साथ
सुबह की उजास
उसके चेहरे पर होती है
दमकती है वह
दमकता है नृत्य
ताल-लय स्वर
और सारे साज़-साज़िंदे
वह पूर्ण परिक्रमा करती है
परिधि पर एक ओर
खड़ी हो जाती है पृथ्वी
पृथ्वी के कक्ष में घूमने लगती है नर्तकी
नर्तन हो जाता विश्व
कीर्तन हो जाता है संसार
जहाँ कुछ विषम नहीं होता
सब सम हो जाता है
‘सम’ पर विराम पाता है।

फुटनोट/ पादटिप्पणी
1- बो, जिससे सौरंगी को बजाया जाता है
2- प्रत्येक ताल की पहली मात्रा। इसी से प्रारंभ होता है, इसी पर अंत
3- रात्रि के अंतिम पहर का एकराग
4- जिसे पहन कर सितार बजाई जाती है
5- पीछे गोलाकार गुबंद
6- द्रुतगति सेब जाना, आमतौर पर इससे समापन किया जाता है
7- प्रारंभ
8- काव्यमय रचना जिसे ताल-लय में पिरोया गया हो
9- सर्वकालिक राग पर आमतौर पर अंत में गाया जाता है
10- दिन के प्रथम पहर का राग

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें    :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें  उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

क्या भारत की बेटी है सिंगापुर की पहली महिला राष्ट्रपति (!)



सिंगापुर में बिना मतदान ही हलीमा याकूब को देश की पहली महिला राष्ट्रपति चुन लिया गया है। हालांकि, अब इस निर्वाचन को अलोकतांत्रिक बताकर लोग इसकी आलोचना कर रहे हैं। दरअसल, हलीमा को राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव का सामना इसलिए नहीं करना पड़ा क्योंकि प्रशासन ने इस पद पर खड़े होने के लिए उने विरोधियों को अयोग्य करार दिया था।

मुस्लिम मलय अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाली हलीमा याकूब संसद की पूर्व अध्यक्ष हैं। हालांकि, सिंगापुर में पहली बार ऐसा नहीं हो रहा है कि सरकार ने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों को आयोग्य करार दिया है जिसके बाद चुनाव अनावश्यक हो गया है। यहां दशकों से एक ही पार्टी सत्ता में है। देश में पहले से ही चुनाव की प्रक्रिया को लेकर अशांति थी क्योंकि ऐसा पहली बार हो रहा था जब खास जातीय समूह मलय समुदाय के लिए राष्ट्रपति पद आरक्षित कर दिया गया था लेकिन बिना वोट के ही हलीमा के हाथ में सत्ता सौंपने के फैसले ने लोगों को गुस्सा और बढ़ा दिया।

औपचारिक रूप से राष्ट्रपति बनने की घोषणा होने के बाद 63 साल की हलीमा की आलोचना सोशल मीडिया पर हो रही है। एक फेसबुक यूजर पेट इंग ने लिखा, बिना चुनाव के निर्वाचित, क्या मजाक है। राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने से पहले हलीमा सत्तारूढ़ ऐक्शन पार्टी से पिछले दो दशक से संसद सदस्य थी। हलीमा ने कहा, मैं सभी लोगों की राष्ट्रपति हूं। हालांकि चुनाव नहीं हुआ लेकिन आपकी सेवा करने की मेरी प्रतिबद्धा पहले जैसी ही है।

सिंगापुर की पहली महिला राष्ट्रपति  हलीमा एक मायने में ‘भारत की बेटी’हैं।  उनके अब्बा हिंदुस्तानी थे।  मुसलमान. चौकीदार थे. सरकारी मुलाजिम थे. हलीमा जब 8 साल की थीं, तब उनके अब्बा का  इंतकाल हो गया. पिता की मौत के बाद उनके परिवार को सरकारी क्वॉर्टर से जबरन बाहर निकाल दिया गया।  अम्मी पर परिवार की जिम्मेदारी आ गई।  अम्मी ने ठेली लगाकर परिवार का गुजारा चलाया।  मीडिया से बात करते हुए हलीमा ने खुद अपनी दास्तां सुनाई थी. उनकी अम्मी मलय समुदाय से हैं।  हलीमा के अलावा उनके चार और बच्चे भी थे. इनमें सबसे छोटी हैं हलीमा। मलय एक खास सांस्कृतिक समूह है। ये लोग ज्यादातर मलयेशिया, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, ब्रूनेई, सिंगापुर और दक्षिणी थाइलैंड के इलाकों में रहते हैं।

बहुत गरीबी में गुजरा बचपन


छोटी सी हलीमा भी मां की मदद करती थीं। सुबह 5 बजे जगकर मां के साथ लग जातीं।  बाजार जाकर सामान खरीदतीं. फिर स्कूल जातीं. क्लास में पिछली बेंच पर बैठतीं। नींद पूरी तो होती नहीं थी।  तो एक बार क्लास में ही सो गईं. उन्हें क्लास की खिड़की से बाहर झांकना बहुत पसंद था।  खुली आंखों से सपना देखना बहुत भाता था उनको।

नवभारत टाइम्स और लल्लन टॉप से साभार 




स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें    :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें  उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

अनचिन्हा कोलाज़….स्वरांगी साने की कविताएँ

0
स्वरांगी साने

वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार और अनुवादक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित. संपर्क : swaraangisane@gmail.com



अनचिन्हा कोलाज़

(1)
वह आईना देखती है
घूरता है कोई और उसे
आईने में देखते हुए
तौलता है उसकी छवि को
उसके चेहरे के भावों  केसाथ।

वह हटा देती है दर्पण
भय छा जाता है उसके चेहरे पर।

(2)
हँसती है
और लगता है
कोई खड़ा है ठीक उसके पीछे लाठी लिए हुए
जिसकी मार से चीत्कार उठेगी वह।

और तुरंत वह
हँसना बंदकर देती है।

(3)
कहीं दूर बजती है कोई धुन
वह याद करती है उस गीत को
गुनगुनाने को ही होती है कि गुर्राता है कोई
गला रुँध जाता है उसका
वह होंठ सील लेती है।

(4)
वह लिखती है कविता
उसके लिखे शब्दों के
अन्वयार्थ लगाता है कोई
यह नए अर्थ
उसके लिखे को निरर्थक कर देते हैं
कतरनी चला देती है सारे कागज़ों पर।

(5)
नाचती है
और उसकी ठुमक को
बाज़ार के ठुमकों से जोड़ दिया जाता है
कुत्सित आँखें भेद देती हैं उसकी लय
बेताला न होजाए
इस डर से
उतार देती है घुँघरू
जैसे उतार देती है प्राणों को
देह से

(6)
वह आईना नहीं  देखती
वह हँसती नहीं, गाती नहीं
कुछ नहीं रचती, कभी नहीं नाचती
पड़ी रहती है
जैसे पड़े रहते हैं माटी के ढेले,
खुद ही किसी दिन लुढ़क जाने या बह जाने को

(7)
वह डस्टबिन हो जाती है
सब उसमें अपना कूड़ा डाल देते हैं
वह पीकदान हो जाती है
थूक कर चल देते हैं लोग आगे
ऐश ट्रे हो जाती है
झाड़ देते हैं उसमें राख हर आते-जाते
वह डोर मैट हो जाती है
पैरों तले आती है
झटक देते हैं लोग उस पर सारी धूल-मिट्टी

(8)



वह दमकना चाहती है
वह उड़ना चाहती है
वह देदीप्यमान होना चाहती है
वह बहना चाहती है
पर
सूर्य
पवन
अग्नि
सलिल
सब पुरुष वाची हैं
और इन सब में वह स्त्री है।

वह चुप्पी ओढ़ लेती है
मौन धर लेती है
उसका रुदन भीतर ही भीतर
नदी बन बहता है
प्रतीक्षा में
प्रलय की
जो कर देगा तहस-नहस
उसे भी और उसपर लगे सारे बंधनों को भी।

वह किसी
पुरुष की प्रतीक्षा में होती है
और
उसके भीतर का सृजन विध्वंस की बाट जोहता है।

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें    :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें  उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

लापता लड़की

0
अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने महत्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

कहानी तो बस इतनी ही है कि वह लड़की घर लौटने के बाद, सारी रात सपनों का सफेद स्वेटर बुनती और सारा दिन दफ्तर में ऊंघते-ऊंघते उधेड़ती रहती। इस उधेड़बुन में उसे यह पता ही नहीं चला कि उसने कब मेंहदी हाथों में रचाने की बजाए, बालों में लगानी शुरू कर दी थी।

कहानी के इस कंकाल में मुझे सिर्फ लड़की का ‘बायोडॉटा’ भरना है। मांस (गोरा या काला) और खून, (उच्च, मध्यम या निम्न) आवश्यकतानुसार भरा या बदला जा सकता है। अगर रंगभेद न करना चाहें तो मान लें कि वह एक सांवली लड़की थी मगर दिखने में आकर्षक नैन-नक्श वाली (बदसूरत नायिका का साहित्य में क्या काम)। जब तक वर्गविहीन समाज की स्थापना हो, तब तक इसे मध्यवर्गीय परिवार की लड़की समझ लेते हैं। धर्म (हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई) कुछ भी हो, शादी के बाद पतिधर्म में विलीन हो जाएगा। इसलिए लड़की के पिता हिन्दू और मां मुस्लिम थी। खुद न मंदिर जाती है न मस्जिद। जन्म जिस गांव में हुआ था वह न जाने कब ‘डूब’ गया? शिक्षा-दीक्षा कस्बे में हुई और फिर कस्बे की लड़की राजधानी पहुंच गई। (लिफ्ट लेते-लेते।)
लड़कियों (औरतों) के अपने घर भी कहां होते हैं? वह तो अक्सर पिता या पति (और उनके मर्द वारिसों) का ही होता है न। इस लड़की का घर तो न पिता का है और न पति का- किराए का है। सपने बुन-बुन उधेड़ती रहती है लड़की। सपने बुनेगी तो उधेड़ने भी पड़ेंगे। दफ्तर-सरकारी, गैर सरकारी, अखबार, एड एजेंसी, ट्रेवल एजेन्ट, प्रॉपर्टी डीलर या शेयर ब्रोकर कोई भी हो सकता है और दफ्तरों में ऊंघती ही हैं लड़कियां (लड़के भी)। ब्याही हों या अनब्याही-क्या फर्क पड़ता है?

ओह! लड़की का नामकरण संस्कार तो रह ही गया। कुछ भी रख लो फ़रहा शर्मा या सावित्री खान। पसंद नहीं तो आकांक्षा या मुक्ता या फिर सभी नामों के बीच उर्फ भी लगाया जा सकता है। वैसे भी लड़की बदलती रही है नाम, घर, धर्म, नौकरियां, संबंध, सपने, शहर, देश-हर बार घर की कैद से भागने की कहानी के बाद। जब-जब भागी है लड़की जिंदगी के घुन लगे फ्रेम और परंपरा की चौखट तोड़कर, तब-तब कुछ दिनों के हल्ले और भागदौड़ के बाद फिर से पकड़ी गयी है। (जिंदा या मुर्दा) दरअसल घर से भागी लड़कियां फौरन पहचान ली जाती हैं और नायक (खलनायक) अक्सर भाग खड़ा होता है।

नौकरी की तलाश में राजधानी पहुंची इस लड़की को हॉस्टल में कैसे जगह मिली, वह मैं ही जानता हूँ। यहां सभी लड़कियां (ज्यादातर) चिरकुंआरी, तलाकशुदा या विधवा। हर एक का तथ्य और सत्य मिलता-जुलता-सा। ऐसी ही लड़कियों के लिए बने हैं हॉस्टल और हॉस्टल में जीवन भी ऐसी ही लड़कियों से है। लड़कियों को लगता है जैसे हॉस्टल घर और घर हॉस्टल बन गया है।

वह सुबह निकलती नहा-धो और नाश्ता करके दफ्तर। कभी-कभी पैदल ही। सारे रास्ते सिगरेट फूंकते हुए और अपने आप से बात करते हुए। पीछे मुड़कर वह कभी देखती ही नहीं थी। शाम को पढ़ने या पढ़ाने जाती और रात देर गए लौटती तो कमरा नम्बर 69 में मेज पर ठंडा खाना रखा होता… कभी खुद खा लेती और कभी कुत्तों को खिला देती। बहुत दिनों तक तो उसे समझ ही नहीं आया कि लड़कियां उसे मिस सिक्स्टी नाइन क्यों कहती हैं। और जब पता लगा तो वह ऐसे बेहूदा आरोपों से परेशान हो उठी। कमरे का नम्बर तो कुछ समय बाद बदल गया लेकिन उसे अभी लगता था जैसे ‘सिक्स्टी नाइन’ का बिल्ला उसकी देह पर चिपक गया है। ठीक वैसे ही जैसे कॉलेज के दिनों में ‘टच-मी-नॉट’ का स्टीकर चिपक गया था।

स्लीपिंग पार्टनर

वहीं रहते हुए रात-रात भर जाग कर उसने ‘सैकेंड सेक्स’ से लेकर ‘सेक्स” और “मदर’ और “सूटेबल ब्यॉय” तक पर चिंतन किया (और चिंता भी)। फिल्म और नाटक देखने बहुत दूर नहीं जाना पड़ता था। हां। कभी-कभार किसी गोष्ठी, सेमिनार या चित्र प्रदर्शनी में चली जाती और इसी बहाने थोड़ा बहुत पी.आर. हो जाता। “डेंटिंग पेंटिंग” के लिए ‘ब्यूटी पार्लर’ जाना उसका साप्ताहिक कार्यक्रम था।

कभी-कभी उसे नींद आती ही नहीं थी, बिना नींद की गोलियां खाए और गोलियां वह तब खाती थी जब भीतर अंधेरा बाहर से ज्यादा गहरा और भयावह हो जाता था। नींद में वह भटकती थी यहां, वहां न जाने कहां-कहां? नहीं मालूम वह कब सोती और कब जागती थी। उसे लगने लगा था जैसे रात को बिल्लियां नहीं, सपने में रोती हैं लड़कियां या शायद वह स्वयं।

दफ्तर में उसका काम था बॉस की बीवी का शोध ग्रंथ टाइप करना, कागजों पर ठप्पा लगाना, टेलीफोन के नम्बर घुमाना, शाम को हर कागज पर बॉस की घुग्घी मरवाना और खाली समय लायब्रेरी में पत्र-पत्रिकाओं के पन्ने पलटना। जब कभी किसी बड़ी कम्पनी के विज्ञापन में  सूट-बूट और टाई पहने आदमी के धड़ पर भेडि़ए या रीछ का चेहरा देखती तो मुंह से निकलता, ‘‘ओह! माई बॉस।’’ और वह सामने दीवार पर लगे किसी एक घोड़े पर बैठ भाग खड़ी होती। सूरज डूबने से पहले घोड़ा उसे हॉस्टल पटकता और वापस दीवार पर आ चिपकता। सुबह होश आता तो अखबार बताता कि कल इसके साथ बलात्कार हुआ और उसका उपहरण, इसने आत्महत्या कर ली और उसने हत्या। पहले चाय कुछ कड़वी लगती और फिर सोचती, चलो, मैं तो बच गई खबर बनते-बनते।’

धीरे-धीरे उसे समझ आने लगी राजधानी। उसे लगता अब यहां इतने बड़े शहर में किसको किसकी परवाह है? न तालाब में डूबी लड़कियों की चिंता और न ‘स्टोव फटने से जलकर मरी बहुओं की। कुछ भी हो जाए आंखों के सामने घटना या दुर्घटना-हमने कुछ नहीं देखा जी (कौन करता फिरेगा कोर्ट-कचहरी?)। यहां किसी को नहीं आती महीनों बगल में बंद मकान के अंदर सड़ती लाशों की दुर्गन्ध। मगर किसी भी लड़की के व्यक्तिगत (प्रेम) संबंधों की खबर फौरन फैक्स हो जाती है।

फिर एक दिन अचानक लड़की ने सोचा और फैसला कर लिया कि वह अब और नहीं रहेगी हॉस्टल में।
लड़की नहीं रहना चाहती हॉस्टल में या हॉस्टल छोड़ किराए के मकान में एक सरदार (दंगों के बाद से क्लीन शेव्ड ) के साथ रहना चाहती है। शायद अब वह भी मां बनना चाहती है। मां।

क्या हुआ? आप नाक-भौं क्यों सिकोड़ रहे हैं? अच्छा। अच्छा। सरदार जी के साथ बिना सात फेरे लिए कैसे रह सकती है? यही ऐतराज है न आपको? पर इसका तर्क यह हो सकता है भाई दोनों एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, ‘दे वांट टु लिव टु गेदर।’ सरदार जी के पहले सात फेरों को अभी तलाक की डिक्री मिली नहीं है। अदालत में पांच साल से तारीख पड़ रही है और पता नहीं कब तक पड़ती रहेगी। अकेली लड़की को कोई तो ‘बहादुर’ सुरक्षा गार्ड चाहिए न। बाहर अकेली लड़की कैसे रह सकती है? क्यों बिलावजह पुलिस रिकार्ड में एक और ‘अवार्ड’ बढ़ाना चाहते हो?

नहीं…लगता है आपको लड़की का इस तरह (बिना सात फेरे) सरदार जो (या किसी और) के साथ रहना नैतिक नहीं लग रहा। आगे खतरा नजर आ रहा है कि ऐसे साथ रहेगी तो गर्भ, गर्भपात, बच्चा (हरामी)… नहीं, कहानी खतरे की सीमा रेखा से बाहर जा रही है और नायिका नारी फ्रेम में फिट नहीं हो रही। शहर में दंगा-फसाद पहले थोड़ा हो चुका है।

यस पापा

चलिए, मान लेते हैं, नहीं रहेगी लड़की सरदार जी के साथ। पर अब क्या करें? हॉस्टल में रहना नहीं चाहती और सरदार जी के साथ आप रहने नहीं देना चाहते। आपको ही सौंप देता हूँ।
‘ऐ लड़की। सुनो, अब से तुम इन पाठक (जी) के साथ रहोगी…ठीक।
पाठक (जी) के साथ भेज दी लड़की। एक बार तो मैंने भी राहत महसूस की। चलो ‘आफत’ टली। ऐसी शिक्षित और स्वावलंबी लड़की को संभालना जेब में हरदम टाइम बम लिए घूमने जैसा है।

मैंने सोचा भी नहीं था कि एक दिन लौटेगी लड़की। पर कुछ ही दिनों बाद लड़की सचमुच लौट आई। मुझे देखते ही सुबक-सुबक कर ऐसे रोने लगी जैसे ससुराल वालों ने और दहेज लाने के लिए मारपीट कर घर से निकाल दिया हो। पूछा तो कहने लगी, ‘‘कहां भेज दिया आपने मुझे? वो तो सारा दिन पूछता है, “इसके पीछे क्या है? और उसके पीछे क्या है?” “नीली फिल्में” देखता है और “गर्म पत्रिकाएं” पढ़ता है। हर वक्त मुझे ऐसे देखता है जैसे फाड़ खाएगा। वह तो सिर्फ मेरे प्रेम-प्रसंगों और सहवास वर्णनों को ही कंठस्थ करने में लगा रहता है। बाहर लोगों के सामने मुझे ‘बदचलन’, ‘चरित्रहीन’ और ‘कुलटा’ कह कर बदनाम करता है और आप पर अश्लीलता का इलजाम लगाता है। कहता है ‘सैकेंड हैंड हूँ, पहले आपने खुद… और अब मुझे परोस दिया।’’ नहीं, मैं नहीं रह सकती अब और उसके पास। आप मुझे वापस बुला लो प्लीज। मैं अभी और जीना चाहती हूँ।’’

सुनते-सुनते जी मैं आया कि नींद की गोलियां खाकर सो जाऊं या फिर सारे कागद (कारे) फाड़ कर रद्दी की टोकरी में फेंक दूँ। भाड़ में जाए लड़की और लड़की की कहानी। बाकी सारे पात्र भी भगा दिए। अब कहां से ढूढ़ कर लाऊंगा? नहीं, मुझे और बहुत से जरूरी काम करने हैं। मैंने अपना पीछा छुड़ाना चाहा। मगर वह जिद्दी लड़की मानने को तैयार ही न हो।
‘‘अच्छा, बाबा अच्छा। मैं अभी तुम्हारा इंतजाम करता हूँ’’ कहते हुए टेलीफोन के बटन दबाने लगा।
‘‘हैलो। प्रकाश मैं बोल रहा हूँ। क्या हो रहा है? यार, वो लड़की फिर वापस आ गई। क्या करूं। बड़ी मुसीबत में हूँ। मैंने तो पहले ही कहा था कि मेरे बस की नहीं है कहानी-वहानी।… नहीं यार। वह ‘अच्छी लड़की है’ बहुत अच्छी लड़की… नहीं…नहीं यार। उसे भी तुम्हीं ‘एडॉप्ट’ कर लो… अच्छा… जल्दी आना प्लीज।’’
फोन रखा तो लड़की का भाषण शुरू- ‘‘नहीं जाऊंगी, अब किसी के भी साथ, कहीं भी। आपने पैदा किया है तो भुगती भी आप ही। क्या समझते हो मुझे… जब चाहा पैदा किया, जैसा बनाना चाहा बना दिया। नहीं संभाल पाए तो  बेसहारा छोड़कर भाग गए या किसी और के हाथों मरवा दिया। नहीं, मैं आपको यूँ न भागने दूँगी और न किसी हादसे में मरवाने।’’
मैं झल्लाया मन ही मन- ‘मैंने भी क्या मुसीबत गले डाल ली।’’

जानें न्यायालय के निर्णय से कैसे महिलायें लटकीं अधर में, बढ़ेगी उनकी परेशानी

शाम को पार्टी में एक और दोस्त से सलाह ली तो बोले, ‘‘अरे, इसमें क्या मुसीबत है? समझा-बुझा कर भेज दो प्रकाश के साथ… कुछ दिन बाद खुद ही वापस आ जाएगी और कहेगी कि वो तो मुझे ‘मझधार किनारे’ या बीच सड़क पर छोड़ कर भाग गया। फिर कुछ दिन अपने साथ रहने दो। रह पाएगी तो रह लेगी, नहीं तो तुम्हारे यहां से भी अपने आप चली जाएगी। सबको देखने के बाद ही शायद वह स्वयं अपना रास्ता तलाश पाएगी। इससे अधिक भला तुम और कर भी क्या सकते हो?’’
मैंने कुछ कहना चाहा तो बोले, ‘अपने को एक्सपोज’ करने में डर लगता है? डरो मत… होने दो कहानी को पूरा… और कोई रास्ता भी नहीं है।’’
वापस लौटा तो नशे में बुरी हालत थी और लड़की प्रतीक्षा करते-करते सो गई थी। सारी रात यूँ लगा जैसे दोनों दौड़ रहे हैं। कभी वो आगे और कभी मैं। दौड़ते-दौड़ते में एकदम निढाल हो गिर पड़ता हूं और वो न जाने कितनी दूर तक दौड़ती रहती है। आंख खुली तो लड़की नहीं थी। शायद समझ गई होगी सारी कहानी

सामने नजर पड़ी तो दीवार पर लगे कैलेंडर में लड़की, वही लड़की घोड़े पर बैठी मुस्कुरा रही थी।






स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें    :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें  उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

पहली बार: दुनिया की सैर पर निकलीं छह महिला नेवी अफसर: टीम का नेतृत्व वर्तिका जोशी के हाथों में



रविवार को दुनिया की अपनी पहली यात्रा पर भारतीय  नौसेना  की 6 महिला अफसरों ने ‘नाविका सागर परिक्रमा’ की शुरुआत की. इस टीम का नेतृत्व लेफ्टिनेंट कमांडर वर्तिका जोशी कर रही हैं. उनके साथ लेफ्टिनेंट कमांडर प्रतिभा जामवाल, पी.स्वाति और लेफ्टिनेंट एस.विजया देवी, बी.ऐश्वर्या और पायल गुप्त हैं.महिला टीम ने अपनी यात्रा गोवा के तट से शुरू की है. इनकी यात्रा दुनिया के विभिन्न सागरों से होते हुए मार्च, 2018 में समाप्त होगी. यह पूरी यात्रा पांच चरणों में पूरी होगी. इस दौरान टीम अपने पोत के साथ राशन और मरम्मत के काम के लिए ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, फॉकलैंड और दक्षिण अफ्रीका के बंदरगाहों पर रुकेगी.

लेफ्टिनेंट कमांडर वर्तिका जोशी की स्कूली शिक्षा-दीक्षा श्रीनगर गढ़वाल और ऋषिकेश से हुई है। उनके पिता पीके जोशी गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर के शिक्षा विभाग के प्रोफ़ेसर हैं। जबकि उनकी माता अल्पना जोशी राजकीय महाविद्यालय ऋषिकेश में हिंदी विभाग की अध्यक्ष हैं। 2010 में वर्तिका नौसेना में अधिकारी बनी थी। उन्होंने ऐमिटी यूनिवर्सिटी से एरोस्पेस इंजिनियरिंग में बीटेक किया था। नौसेना में भर्ती होने के बाद वह ब्राजील के रियो डि जिनोरियो से दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन तक पांच हजार नॉटिकल मील का समुद्री अभियान तय कर चुकी हैं। टीम की सदस्य प्रतिभा जामवाल भी उत्तराखंड की हैं, वे कुल्लू शहर के मौहल क्षेत्र से संबंध रखती हैं.

वर्तिका जोशी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन महिला अफसरों को शुभकामनाएं दी हैं. उन्होंने टि्वटर पर लिखा, ‘आज विशेष दिन है. नौसेना की छह महिला अधिकारियों ने आईएनएसवी तरिणी से दुनिया का चक्कर लगाने की यात्रा शुरू की.’ उन्होंने लिखा, ‘पूरा देश एक साथ मिलकर नाविका सागर परिक्रमा की टीम को शुभकामनाएं दे रहा है और उनकी इस असाधारण यात्रा के लिए शुभेच्छा.’