मिथक और स्त्री आंदोलन का अगला चरण

संजीव चंदन

‘रिडल्स इन हिन्दुइज्म’ में डा. बाबा साहेब अंबेडकर इतिहास लिखने से ज्यादा इतिहास की व्याख्या को महत्वपूर्ण मानते हैं. भारतीय इतिहास के बहुत से सूत्र साहित्यिक ग्रंथों और मिथकीय कथाओं में फैले पड़े हैं- जरूरत है, उनकी व्याख्या की. इस व्याख्या में दलित –बहुजन दृष्टि से काम करने वाले विद्वानों की गहरी रुचि रही है. वहीं ‘रिडल्स इन हिन्दुइज्म’ में डा अंबेडकर मिथकों के विषय में कहते हैं कि ‘ मिथक इतिहास हैं, यद्यपि वे अतिशयोक्ति पूर्ण इतिहास हैं.’  इस लेख का उद्देश्य इतिहास की व्याख्या नहीं है और न ही मैं इतिहासकार हूँ, सिवाय इसके कि स्नातक तक मैंने ‘ प्राचीन इतिहास’ की पढाई की है. लेख धार्मिक –सांस्कृतिक मिथकों के द्वारा शोषण के प्रति शोषित के अनुकूलन को एक हद तक समझने की प्रस्तावना है, जो मुक्ति के लिए आवश्यक भी है.

यह देश मिथकों में जीता है, मिथक दैनंदिन में धार्मिक कर्मकांड के साथ शामिल हैं. साल भर चलने वाले त्योहारों के साथ कोई न कोई धार्मिक मिथक सम्बद्ध कर दिये गये हैं- कृषि समाज के सामान्य उत्सवों में भी मिथकों ने जगह बनाई और फिर वही प्रमुख होते चले गये. मसलन होली जैसे विशुद्ध कृषक –समाज के पर्व में भी होलिका –प्रहलाद की मिथकीय कथा हावी हो गई और हम हर वर्ष एक स्त्री प्रतीक को जलाने लगे. सलाना उत्सवों में शामिल ये मिथक पितृसत्ता और ब्राह्मणवाद के एजेंट हैं, जो अपने शोषितों (विक्टिम) को अनुकूलित करते रहते हैं. स्त्रियों को एक सांचे में ढालने का एक अनवरत सिलसिला इन मिथकों के माध्यम से चलता रहता है – पतिव्रता और सदैव पुरुष संरक्षित स्त्री के सांचे में. इनकी खासियत है पूरी व्यवस्था,समाज, संस्कृति , सोच आदि को द्वैध ( बायनरी) में बांटने की- अच्छाई और बुराई की बायनरी में. इससे एक तर्क भी पैदा होता है, अच्छाई के साथ जाने और बुराई के खिलाफ होने का, जो सामजिक –सांस्कृतिक अनुकूलन में अहम भूमिका निभाता है. अच्छाई की पावरफुल इमेजरी ( बिम्ब ) के साथ मिथकीय चरित्र बदलाव के आन्दोलनों को भी प्रभावित करते रहे हैं. यह अकारण नहीं है कि भारत का पहला स्त्रीवादी प्रकाशन माना जाने वाला समूह ‘ काली फॉर वीमेन’ ‘ काली’ नामक मिथकीय चरित्र से खुद को जोड़ता है, या फिर यह भी अकारण नहीं है कि ‘दुर्गा’ में दक्षिणपंथी समूह भी शक्ति का स्रोत देखता है और दक्षिणपंथ के खिलाफ खडा स्त्रीवाद भी.

मिथकीय कथाओं और चरित्रों के प्रभाव को महात्मा फुले बखूबी समझते थे. उन्होंने 1873 में प्रकाशित अपनी पुस्तक    ‘गुलामगिरी’ में इसीलिए मिथकीय चरित्रों को विषय बनाया. चूकी चार वर्णों की उत्पत्ति का सिद्धांत ब्रह्मा से जुड़ा था, इसलिए उन्होंने ब्रह्मा से जुडी मिथकीय कथाओं की व्याख्या करते हुए उसके देवत्व को खंडित किया. वर्णों की उत्पत्ति की व्याख्या करते हुए ब्राह्मण को ब्रह्मा के मुख से,क्षत्रिय को बाहु से, वैश्य को पेट से और शूद्र को पैर से पैदा हुआ बताया जाता रहा है. यह जाति व्यवस्था के प्रति शोषितों के मानसिक अनुकूलन पर फुले का प्रहार था. इसी किताब में उन्होंने हिरण्यकश्यप, विरोचन और बलिराजा से जुड़े मिथकों का पुनर्पाठ किया है, यह पुनर्पाठ ब्राह्मणवादी प्रभाव में इन पर आरोपित ‘खल- चरित्र’ से इन्हें मुक्त करता है. आज दलित–बहुजन आंदोलन फुले की इन व्याख्याओं के साथ अपने इतिहासबोध को जोड़ रहा है. इस प्रक्रम में एक ख़ास गुण है, किसी भी चरित्र पर आरोपित ‘देवत्व’ का ध्वस्त हो जाना. इन व्याख्याओं से विष्णु के अवतारों में ब्राह्मणवादी षड़यंत्र का गुंथा होना स्पष्ट होता है, और उसके अवतारों के साथ –साथ विष्णु का देवत्व भी खंडित होता है. महात्मा फुले के द्वारा मिथकीय इतिहास की व्याख्या से समाजिक –सांस्कृतिक तौर पर हाशिये पर धकेल दिये गये लोगों का अपना इतिहासबोध निर्मित हुआ और वे धार्मिक–सांस्कृतिक अनुकूलन से मुक्ति के तर्कों से संपन्न हो सके.

ब्राह्मणवादी मिथकों के प्रभाव से मुक्ति बहुत सहज भी नहीं है, ये आख्यान के रूप में जन- मानस पर हावी होते रहे हैं. इनसे मुक्ति का एक तरीका महात्मा फुले का था, तो दूसरा तरीका डा. अंबेडकर ने अपनाया- अपने अनुयाइयों को बौद्ध धर्म का रास्ता दिखाकर. इससे तत्काल असर यह हुआ कि उनके साथ बौद्ध होने वाली जनता ने हिन्दू देवी –देवताओं को देवता न मानने की शपथ ली और इसके साथ ही इनके देवत्व से मुक्ति के रास्ते पर चल निकली. इन ब्राह्मणवादी आख्यानों के बरक्स उनके पास अपना आख्यान था, जिसके सूत्र ज्ञात इतिहास में सीधे –सीधे फैले थे, बहुत हद तक मिथकीय इतिहास से मुक्त. आख्यान रहित जनसामान्य के लिए हिन्दू –धार्मिक मिथकों से मुक्त होना संभव नहीं था और न ही संभव था उनके द्वारा पुष्ट गुलामी के तर्कों से मुक्त होना- जिसे अनुकूलन कह सकते हैं.


डा. अंबेडकर के साथ बौद्ध धम्म में दीक्षित हुए लोग अपने अनुभवों से बताते हैं कि उस दौरान सबसे कठिन था महिलाओं के लिए अपनी आस्था, अपने विश्वास, अपने अनुकूलन से मुक्त होना. यद्यपि बड़ी संख्या में महिलायें डा. अंबेडकर के नेतृत्व में नागपुर में आयोजित दीक्षा में शामिल हुईं और रातो –रात बौद्ध हो गई, लेकिन कई लोगों के अनुभव इसके विपरीत भी थे, उन्हें अपनी माओं से देवी –देवताओं के अनिष्ट के लिए उन्हें गालियां खानी पड़ी थी. दरअसल कर्मकांड में शामिल ब्राह्मणवादी मिथकों का सबसे बड़ा वाहक है महिलाओं का समूह, जिसे अभी हाल में, 70 के दशक में भी 'संतोषी माँ' का आधुनिक सिनेमाई मिथक बहा ले गया था. आज भी दोपहर के सीरियल्स का सबसे बड़ा क्रेता -महिलाओं का वर्ग है, वहाँ संतोषी माँ से लेकर-करवाचौथ, वटसावित्री आदि धार्मिक मिथको का मायाजाल बन रहा है. स्त्रियों के लिए इन मिथकों से मुक्ति जरूरी है, तभी अपने शोषण के प्रति उनकी सहमति को वे समझ सकती हैं. कोई भी स्त्रीमुक्ति आन्दोलन अपनी सम्पूर्णता में समता, न्याय और भागिनीवाद तथा बंधुत्व के दर्शन को आत्मसात करने के साथ –साथ सांस्कृतिक गुलामी के इन प्रतीकों को अनिवार्य रूप से ध्वस्त करना चाहेगा. वह कैसे संभव है? सवाल यह भी है कि क्यों भारत में स्त्री-आन्दोलन ने राम आदि के मिथक पर चोट तो की, लेकिन दुर्गा-काली आदि देवियों से खुद को बहुत अलग नहीं कर सकी. दलित आन्दोलन ने शम्बूक, एकलव्य आदि उत्पीडित मिथकीय चरित्रों से खुद को जोड़ा और राम के देवत्व को खंडित किया. तो फिर सवाल यह भी है कि स्त्री आन्दोलन का अगला चरण ‘दलित स्त्रीवाद’ क्या इन मिथकीय चरित्रों को ध्वस्त करने में कोई दिलचस्पी रखता है?

दलित स्त्रीवाद अपनी विरासत को जिन सावित्रीबाई फुले और महात्मा फुले के साथ जोड़ता है, वे न सिर्फ ब्राह्मणवादी मिथकीय पात्रों के देवत्व को ध्वस्त करने में यकीन रखते हैं, बल्कि अपने मिथकीय पात्रों से रिश्ता भी बनाते हैं. इसीलिए फुले प्रेरित दलित –बहुजन आन्दोलन से जुड़े पुरुष और स्त्री ’इडा-पीड़ा टलो ( जाओ) बलि जे राज्य येओ( आये)’ की कामना करते हैं. सावित्री बाई फुले लिखती हैं :
 बलुतों* का बलीराज्य। दानव दैत्य पावन।
 दानशूर बली था। सुखी उसके प्रजाजन।।
 पूर्वज यही हमारे। गुरू उनके शुक्रानन।
 उन्हें पद-पद पर वंदन। वंशज उनके हम सब जन।।

डा. आंबेडकर महिलाओं सहित वंचित समुदायों को हिन्दू मिथकीय प्रभाव से पैदा अनुकूलन से मुक्ति के मार्ग ढूंढते रहे, और बौद्ध धम्म का विकल्प लेकर आये. दलित स्त्रीवाद डा. अंबेडकर के विचारों से भी खाद-पानी पाता है. पिछले कुछ सालों से देशभर में ‘ महिषासुर शहादत दिवस’ मनाया जा रहा है. इसके आयोजक कोई धार्मिक आयोजन नहीं करते हैं, बल्कि सामाजिक –सांस्कृतिक मुद्दों पर बातचीत करते हैं और सामाजिक –सांस्कृतिक –आर्थिक संसाधनों से अपने वंचन को कारणों की पड़ताल करते हैं. पिछले दिनों राष्ट्रपति से सम्मानित नवादा की सुमन सौरभ नवादा में बड़े पैमाने पर ‘महिषासुर शहादत दिवस’ मनाती हैं. क्या कोई स्त्री आन्दोलन इन आयोजनों में शामिल स्त्रियों को अलग कर अपने आन्दोलन का कोई चरित्र विकसित कर सकता है?



इन आयोजनों से दुर्गा आदि देवियों तथा विष्णु अवतारों से जुड़े पितृसत्तात्मक प्रतीकों के देवत्व को चुनौती मिलती है –जनता उनके देवत्व के महाख्यान से मुक्त होकर पराजितों के खिलाफ विजेताओं के षड़यंत्र के आख्यान की पहचान करती है, उससे जुडती है. मिथकों के पुनर्पाठ के साथ ऐसे आयोजन वस्तुतः उत्पीडित अस्मिताओं के उत्पीडन के विभिन्न प्रसंगों से जुड़ते हैं. मसलन शम्बूक की बात करते हुए दलित –बहुजन आन्दोलन धार्मिक- सांस्कृतिक संसाधनों से अपने वंचन को चिह्नित करता है और उसका प्रतीकार करता है, वैसे ही एकलव्य शैक्षणिक संसाधनों से वंचन का प्रतीक है, ठीक वैसे ही जैसे स्त्रीविमर्श में गार्गी और याज्ञवल्क्य के संवाद को प्रतीक बनाया गया है, स्त्रियों की शिक्षा का अधिकार छिनने का. दरअसल ब्राह्मणवादी मिथकों ने सालों –साल तक जन-मानस को प्रभावित किया है- इतिहास में घालमेल किया है. उदाहरण के लिए अच्छे –भले मानवजाति ‘नाग’ को किसी पाताललोक से जोड़कर सांपों के मिथक से गूंथ दिया गया. अब कोई भी पुनर्पाठ उन मिथकों को भारत के मध्य में शासक रहे नागवंशी राजाओं से जरूर जोड़ेगा, जोड़ता है. ऐसा होते ही एक समूह पर दूसरे समूह के सांस्कृतिक वर्चस्व के सूत्र खुलने लगते हैं.

भारत में स्त्री-आन्दोलनों का एक दौर बीत चुका है, राजनीतिक पार्टियों से अलग अस्तित्व के महिला-संगठनों ने इस आन्दोलन को नेतृत्व दिया - व्यापक कानूनी सुधार भी करवाये. लेकिन अब उनका संस्थानीकरण हो चुका है-भारत में स्त्री आन्दोलन दुनिया के दूसरे हिस्सों की तुलना में देर की परिघटना रहा है, यही कारण है कि यहाँ उस दौर में स्त्रीवाद के सारे घटक एक साथ सक्रिय थे –उदारवादी, मार्क्सवादी, समाजवादी, रैडिकल आदि.  एक दूसरा दौर शेष है, जो जाति और लिंग दोनो के सवालों के साथ आकार ले रहा है, लेकिन उसके खतरे भी सांस्थानिक हो जाने के या विमर्श तक सीमित रह जाने के हैं,  यदि वह व्यापक स्त्री समुदाय के लिए विकल्प ले कर नहीं आता है. सांस्कृतिक–धार्मिक मिथकों से निर्लिप्तता की कोई नीति, यदि ऐसी कोई नीति है तो, व्यक्तिगत तौर पर या किसी छोटे से समूह के लिए मुक्ति का मार्ग तो हो सकता है, लेकिन व्यापक स्त्री –समुदाय के लिए नहीं. आख्यानों के साथ जीने वाला यह समूह अपने शोषण के प्रति सहमति देने के लिए काफी उर्वर है. देवत्व, महिमामंडन और माहाख्यानों से संपृक्त मिथक उनकी सहमति हासिल करने के सबसे बड़े घटक हैं. प्रतिक्रान्ति का दौर बार –बार आता है, इस वक्त भी हम जूझ रहे हैं. नारद को प्रथम-पत्रकार बताया जा रहा है, (ऐसा करने में वामपंथी विद्वानों की देख-रेख में तैयार किताबें भी पीछे नहीं हैं), शहरों को गुरु द्रोणाचार्य के नाम से जोड़ा जा रहा, गणेश पहले सर्जक हुए जा रहे हैं, हाडा रानी का बलिदान और सतीत्व का मिथ पाठ्यपुस्तकों में शामिल हो रहा है, तो दलित स्त्रीवाद ( जो अभी शैशव अवस्था में है ) सहित किसी भी स्त्री आन्दोलन को इन मिथकों में निहित माहाख्यान की ताकत को समझना होगा और आमजन को प्रति-आख्यान से जोड़ना होगा.

लेखक स्त्रीकाल के संपादक हैं.
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