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कहीं आपकी शादी भी बोझ न बन जाये

शादी की कहानी कोई नई थोड़ी है। ना ही कोई नया रास्ता है। चाहे-अनचाहे सभी इस रास्ते से गुजरते हैं। कुछ चाहकर और कुछ न चाहकर भी।….कुछ कम उम्र में तो कुछ चढ़ी उम्र में।…किंतु कमाल का सच ये है कि इस रास्ते में आई बाधाओं के किस्से चुटकलों के जरिए तो सुनने/पढ़ने को खूब मिलते हैं किंतु इन चुटकलों के सच को कोई भी पति अथवा पत्नी व्यक्तिश: स्वीकार नहीं करता। क्यों……? लोक-लज्जा का डर, पुरूष को पुरुषत्व का डर, पत्नी को स्त्रीत्व का डर…… डर दोनों के दिमाग में ही बना रहता है… इसलिए पति व पत्नी दोनों आपस में तो तमाम जिन्दगी झगड़ते रहते हैं किंतु इस सच को सार्वजनिक करने से हमेशा कतराते हैं।किंतु यह भावना कष्टकारी है। व्यापक तौर पर देखा जाए कि हमारे समाज में किसी भी सच को कोई भी उजागर करना का मन नहीं बना पाता।

दोस्तों! एक समय था कि जब शादी के मामले में लड़के और लड़की की इसके अलावा कोई भूमिका नहीं होती थी कि वो दोनों आँख और नाक ही नहीं अपितु साँस बन्द करके माँ-बाप अथवा दूसरे सगे-संबन्धियों की इच्छा के अनुसार शादी के लिए तैयार हो जाएं। इसके पीछे समाज का अशिक्षित होना भी माना जा सकता है।  किंतु जैसे-जैसे समाज में शिक्षा का व्यापक प्रचार और प्रसार हुआ तो नूतन समाज के विचार पुरातन विचारों से टकराने लगे, अब शादी के मामले में लड़के  और लड़की की इच्छाएं भी पुरातन संस्कृति के आड़े आने लगी हैं। फलत: पिछले कुछ दशकों से यह देखने को मिल रहा है कि शादी के परम्परागत पहलुओं के इतर शादी से पहले लड़के और लड़की को देखने का प्रचलन जोरों पर है। पहले यह उपक्रम केवल शहरों-नगरों तक ही सीमित था किंतु आजकल तो यह उपक्रम दूरस्थ गाँवों तक पहुँच गया है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है।

यहाँ एक सवाल का उठना बड़ा ही जायज लगता है कि शादी के उद्देश्य से लड़के और लड़की की पंद्रह-बीस मिनट की मुलाकात में लड़का लड़की और लड़की लड़के के विषय में क्या और कितना जान पाते होंगे, कहना कठिन है। सिवाय इसके कि एक दूसरा, एक दूसरे की चमड़ी भर को ही देख-भर ले। दोनों एक दूसरे की नकली हंसी को किसी न किसी हिचकिचाहट के साथ दबे मन से स्वीकार कर लें। इस सबका कोई साक्षी तो होता नहीं है। अगर हो भी तो उनका इस प्रक्रिया में कुछ भी कहने का कोई अधिकार यदि होता है तो वह केवल लड़के और लड़की को केवल शादी के लिए तैयार करना होता है। इसके अलावा और कुछ नहीं। कहना अतिशयोक्ति न होगा कि दो अनजान चेहरों के बीच पहली बैठक में बात शुरु करने में कुछ न कुछ तो हिचकिचाहट होती ही है। अमूनन देखा गया है कि शादी के बन्धन में बन्धने जा रहे जोड़े को दूसरी मुलाकात का मौका प्राय: दिया ही नहीं जाता।

धार्मिक बाधाएं इस सबके सामने खड़ी कर दी जाती हैं। हमको इस धार्मिक उपक्रम ने इस हद तक कमजोर और कायल बना दिया है कि हम सारा समय लड़के और लड़की की कुंडलियाँ मिलाने में गवां देते हैं। फिर ये कैसे मान लिया जाए कि शादी की पुरातन रीति आज की रीति से भिन्न है? हाँ!
शादी जीवन का एक अकेला ऐसा सौदा है जो एक-दो दिन की मुलाकात में ही तय मान लिया जाता है जबकि एक टी.वी. या फ्रिज जैसी दैनिक उपयोग की चीजें खरीदने की कवायद में सप्ताह, हफ्ता ही नहीं, यहाँ तक की कई-कई महीने तक लग जाते हैं…. कौन सी कम्पनी का लें? इसकी क्या और कितने दिनों की गारंटी है?……. इसका लुक औरों के मुकाबले कैसा है?… न जाने क्या-क्या…..। न जाने कितने मित्रों से इसकी जानकारी हासिल की जाती हैं….. इतना ही नहीं, सब्जी तक दस दुकानों की खाक छानने के बाद  भाव-मोल करने के बाद ही खरीदी जाती हैं।…किंतु लड़का-लड़की के बीच जीवन-भर का रिश्ता बनाने में जान-पहचान के बजाय बच्चों की शिक्षा के स्तर और उनकी आमदनी के विषय में ही ज्यादा सोचा जाता है।…………..और कुछ नहीं।

लगता  है कि यही प्रक्रिया आजकल के रिश्तों में टूटन का खास कारण है।…….. बच्चों की कमाई भी इसका एक कारण हैं, एक दूसरा एक दूसरे की कमाई पर हक जताने की जिद में हमेशा उलझे रहता हैं। ……लड़का और लड़की के घर वाले भी इस कवायद में कम भूमिका नहीं निभाते……. लड़का और लड़के के घर वाले लड़की की कमाई को हर-हाल हथियाने की कोशिश में लग रहते हैं, और लड़की  अपनी कमाई को लड़के के नाम क्यूँ करदे, इसी उलझन में फंसी रहती है।……. पड़े भी क्यूँ न?  जो लड़की अपने माँ-बाप के घर को छोड़कर लड़के के साथ उसके घर में रहने के लिए बाध्य होती है तो क्या वह अपनी कमाई से ससुराल वालों को पालने के लिए भी बाध्य है? यदि ऐसा होता है तो लड़की के लिए शादी के क्या माने रह जाते है?

हाँ! मान-सम्मान अता करने की बात अलग है। इस जद्दो-जहद के चलते लड़का और लड़की के बीच मतभेद हो न हो, घर वाले दोनों के बीच में दीवार खड़ा करने में अहम भूमिका निभाते हैं।  केवल माँ-बाप ही लड़का और लड़की के बीच की दीवार नहीं बनते, अपितु अनेक बार लड़का और लड़की भी अपने बीच दीवार खड़ा करने में पीछे नहीं रहते। इसी कश-म-कश के चलते, यह देखा गया है कि शादी हो जाने के बाद पति-पत्नि एक दूसरे को निभाने, या यूँ कहूँ कि पति-पत्नि के सामने इस  रिश्ते को ढोने के अलावा कोई और रास्ता शेष नहीं रह जाता।

जहाँ तक कुंडलियों के मिलान का सवाल है तो  यह सवाल उठता है कि  क्या कुंडली-मिलान रिश्तों के अमरत्व की कोई गारंटी देता है। क्या कुंडली-मिलान वाले जोड़ों के बीच कभी कोई दरार नहीं पड़ती? क्या उनका जीवन-भर मधुर साथ बना रहता है? क्या उनके जीवन में कोई प्राक्टतिक बाधा नहीं आती?  जैसी कि  कुंडली मिलाते समय आशा की जाती है।…..व्यापक रूप से ये भामक मानसिकता है, ऐसा करने से कभी भी किसी दम्पति को आशातित शांति शायद कभी नही और कतई नहीं मिलती। यह उपक्रम अपने को स्वय धोखा देने के बराबार है। मुझे लगता है कि इसके इतर यह अच्छा होगा कि लड़के और लड़की की जन्मकंडली के बदले उनकी चिकित्सीय कुंडलियों  का मिलान किया जाना चाहिए। मैं जानता हूँ कि मेरे इस प्रस्ताव को एक मानसिक रोगी की विचारधारा समझ नकार ही दिया जाएगा किंतु मेरी इस बात के महत्व को खुशवंत सिंह की पुस्तक ‘दिल्ली’ में उद्धृत  महात्मा शेख सादी के इस बयान से जाना जा सकता है – “यदि औरत बिस्तर से बेमजा उठेगी तो बिना किसी वजह के ही मर्द से बार-बार झग़ड़ेगी|”  किंतु ये एक ऐसा सत्य है जिसे कोई भी पुरुष अथवा औरत मानने वाली नहीं है …… किंतु ऐसा होता है। रिश्तों की खटास में यह भी एक और सबसे बड़ा कारण है। इस कारण के बाद आता है…….दौलत का सवाल…. श्रंगारिक संसाधनों की उपलब्धता……. गहनों की अधिकाधिक रमक……..आदि…. आदि। पुरुषों के मामले में दहेज का लालच….और न जाने क्या-क्या। क्या लड़के और लड़के के माता-पिता द्वारा इस ओर कुंडलियाँ मिलाते समय ध्यान दिया जाता है?

नवभारत टाइम्स – 06.02.2015 में छपे एक सर्वे के जरिए यह तथ्य सामने आया है कि ज्यादातर दम्पत्तियों के बीच शादी वाला प्यार शादी होने के पहले दो सालों में ही फुर्र हो जाता है …. कुछ का तीन सालों बाद …… और जिनका बचा रहता है ……. इनके सामने किसी न किसी प्रकार की सामाजिक मजबूरी ही होती है। …. ये पहले कभी होता होगा कि पति-पत्नी बुढ़ापे में एक दूसरे के मददगार बने रहते थे….. आज समय इतना बदल गया है कि बुढ़ापा आने से पहले ही सारा खेल बिगड़ जाता है…… पहला बच्चा पैदा होने के साथ ही पत्नी का प्रेम पति के प्रति इतना कम हो जाता है कि पति उसके लिए उधार की चीज बन जाता है……. ऐसा उधार कि जिसे वो उतार तो नहीं सकती ………बस! ढोने भर के लिए बाध्य होती है…….पति की हालत भी कमोवेश यही होती है।  यहाँ भी लोक-लाज ही ऐसे रिश्तों को निभाने के लिए आड़े आती है।…….

इन सबसे इतर, नवभारत टाइम्स दिनांक 23.05.2015 के माध्यम से अनीता मिश्रा कहती हैं कि शादी सिर्फ आर्थिक और शारीरिक जरूरतों को पूरा करने भारत का माध्यम नहीं है। लड़कियों को ऐसे जीवन साथी की तलाश रहती है जो उन्हें समझे। उनकी भावनात्मक जरूरतें भी उनके साथी के महत्तवपूर्ण हों।  वे  फिल्म ‘पीकू’ में एक संवाद का हवाला देती हैं…….   “ शादी बिना मकसद के नहीं होनी चाहिए। फिल्म की नायिका का पिता भी पारम्परिक पिताओं से हटकर है। वह कहता है, ‘ मेरी बेटी इकनामिकली, इमोशनली और सेक्सुअली इंडिपेंडेंट है, उसे शादी करने की क्या जरूरत?’ मैं समझता हूँ कि यह तर्क अपने आप में इमोशनल जरूर है। फिर भी यह आम-जन का ध्यान तो आकर्षित करता ही है।


अनीता जी आगे लिखती है कि  यहाँ एक सवाल यह भी है कि विवाह संस्था को नकारने का कदम स्त्रियां ही क्यों उठाना चाहती है। शायद इसके लिए हमारा पितृसत्तात्मक समाज दोषी है। वर्तमान ढांचे में विवाह के बाद स्त्री की हैसियत एक शोषित और उपयोग की वस्तु की हो जाती है। आत्मनिर्भर स्त्री के भी सारे निर्णय पति के परिवार वाले ही करते हैं। शादी होने के बाद (कुछ अपवादों को छोड़कर) उसका पति मालिक और निरंकुश शासक की तरह ही व्यवहार करता है। ऐसे में स्त्री के लिए दफ्तर की जिन्दगी और घरेलू जिन्दगी में तालमेल बिठाना मुश्किल हो जाता है। कहा जा सकता है कि ज्यादातर स्त्रियों को दफ्तर में काम करने के बाद भी घर में एक पारम्परिक स्त्री की तरह खुद को साबित करना होता है। किसी भी स्त्री को जब सफलता मिलती है तो यह भी जोड़ दिया जाता है कि उसने करियर के साथ सारे पारवारिक दायित्व कितनी खूबी से निभाए। जबकि पुरुषों की सफलता में सिर्फ उनकी उपलब्धियां गिनी जाती हैं। कामकाजी लड़कियों के लिए शादी के बाद इतनी सारी चीजों के बीच तालमेल बिठाना मुश्किल हो जाता है। नतीजतन संबंधों में खटास आ जाती है…. यहाँ तक की तलाक की स्थिति  भी उत्पन्न हो जाती है। ऐसी मिसालें देखकर आज कई लड़कियां शादी नहीं करने का निर्णय ले रही हैं। वे अपनी आजादी को पूरी तरह जीना चाहती हैं और अपने व्यक्तित्व और संपति की मालिक खुद होना चाहती हैं।



यहाँ यह सवाल उठना भी लाजिमी है कि शादी समाज की एक जरूरी व्यवस्था रही है किंतु आजादी चाहने वाली लड़कियां शादी को एक बन्धन की तरह देखती हैं। फिर मानव समाज की दृष्टि से एक सामाजिक व्यवस्था के तौर पर विवाह का विकल्प क्या है? क्या यह बेहतर नहीं होगा कि बदलते परिवेश में स्त्री शादी का विकल्प खुद खोजे? जाहिर तौर पर अब तक पुरुषों की आर्थिक स्वनिर्भरता और सक्षमता ने केवल उन्हें ही निर्णय लेने का अधिकार दे रखा था। अब अगर महिलाएं भी इसी हैसियत में पहुँचने के बाद अपनी जिन्दगी की दिशा तय करने वाला फैसला खुद लेने लगी हैं तो इसमें गलत क्या है? फिर क्यों न आत्मनिर्भर, जागरूक और सक्षम महिला को शादी करने, न करने का फैसला खुद लेने दिया जाए?

 उपर्युक्त के आलोक में महिलाओं और पुरुषों के बीच बराबरी के प्रश्न का हल एक लम्बी प्रक्रिया से होकर गुजरेगा। आनन-फानन में कुछ भी नहीं होने वाला है। किंतु इस प्रकार की बहसों का जन्म लेना सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को गति तो प्रदान करता ही है।

 लेखक परिचय:  तेजपाल सिंह तेज (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की दर्जन-भर किताबें प्रकाशित हैं- दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से आदि ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि, पुश्तैनी पीड़ा आदि (कविता संग्रह), रुन-झुन, खेल-खेल में आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), दो निबन्ध संग्रह  और अन्य। तेजपाल सिंह ‘तेज’  साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक, आजीवक विजन के प्रधान सम्पादक तथा अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर इन दिनों आप स्वतंत्र लेखन के रत हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं।


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पुलिस ज्यादती: कठपुतली कलाकारों पर दिल्ली में बरसीं लाठियां: हजारो गरीब जबरन बेघर किये गये

एक वह दिन था, अभी तीन महीने पहले, जब कठपुतली कलाकार सरबती भट्ट ने  स्त्रीकाल से बात करते हुए आक्रोश और जोश के साथ कहा था कि “हम जान दे देंगे लेकिन अपनी जगह नहीं छोड़ेंगे’. तब  गुस्से से भरी सरबती भट्ट ने  देश की राजधानी के के शादीपुर में, अपने और अपने लोगों के साथ हो रही  ज्यादतियां बयान की थीं और आज पुलिस की लाठियों से घायल और अपने दो बेटों के  पुलिस द्वारा उठा लिये जाने के बाद विलाप कर रही थीं. वे अपने लिए और पुलिस की लाठियों से घायल एनएफआईडवल्यू की महासचिव एनी राजा के लिए विलाप कर रही थीं. सरबती के पति भगवानदास भट्ट अपनी कला के लिए राष्ट्रपति से सम्मानित किये जा चुके हैं, बेटे भी देश-विदेश में अपनी कला का प्रदर्शन करते रहे हैं.”

ध्वस्त घर दिखाते कठपुतली कलाकार

जब हम कुछ पत्रकार मित्र 30 अक्टूबर को  पुलिस के बर्बर लाठी चार्ज के बाद लुटे-पिटी कठपुतली कॉलोनी पहुंचे तो पूरा इलाका पुलिस छावनी में तबदील दिखा और कॉलोनी के लोग विलाप करते, अस्त-व्यस्त, पस्त. कुछ लोग अपने समान ढो-ढोकर जा रहे थे. श्वेता यादव की विस्तृत रपट:

विलाप करती कलाकार सरबती खान

कहते हैं आशियाने बनाने में सालों लग जाते हैं और उजड़ने में वक्त नहीं लगता। शायद यही कहानी शादीपुर के पास बसे कठपुतली कॉलोनी के साथ घट रही है। एक समय था जब इन गलियों में घुसते ही ढोल-नगाड़े, कठपुतलियां और न जाने क्या-क्या करतब सुनाई और दिखाई पड़ते थे, आज वही गलियां मलबे में तब्दील थी और कुछ सुनाई दे रहा था तो वह था लोगों का रोना- चिल्लाना।

लगभग चार हज़ार परिवार सत्रह राज्यों के लोग और लगभग सत्रह भाषाएँ आज विस्थापित हो गईं। साठ साल से एक ही जगह रहने वाले लोग आज बेघर हो गए, जिन्हें आशियाना बनाने में सदियाँ लगी होंगी वे आज इस उम्मीद से बाहर से आने वाले हर व्यक्ति को देख रहे थे और सवाल कर रहे थे कि अब क्या होगा हमारा, कहाँ जायेंगे हम? बिखरे हुए लोग टूटे हुए मकान जाए तो जाएं कहाँ?

पुलिस की ज्यादती बयान करते लोगों की व्यथा सुनें वीडियो में :

30  अक्टूबर को राजधानी दिल्ली में पुलिस ने डीडीए की मदद से कठपुतली कॉलोनी की झुग्गियों को बिना किसी पूर्व नोटिस के तोड़ डाला। वहां के लोगों ने हमसे बात करते वक्त कहा कि हम लोगों को  इस बात की कोई पूर्व सूचना नहीं दी गई थी कि आज हमारे घर तोड़े जाएंगे ना ही हमें यह बताया गया कि इसके बाद हमें रहना कहाँ हैं? वहां के बाशिंदों ने हमसे बातचीत में कहा कि हमें अपने सामान तक को निकालने का समय नहीं दिया गया और सामान  के साथ ही हमारे घरों को तोड़ दिया गया।

मामले का विरोध कर रही एनएफआई डबल्यू की महासचिव एनी राजा को पुलिस और डीडीए के लोगों ने बुरी तरह से पीटा, वे राम मनोहर लोहिया ट्रॉमा सेंटर में भर्ती हैं। मीडिया के तमाम साथियों के साथ भी पुलिस के बर्बर रवैये की खबर है। गौरतलब बात यह भी है कि एनी राजा को छोड़कर कोई भी राजनैतिक व्यक्ति या पार्टी कठपुतली कालोनी के सपोर्ट में नहीं है कायदे से आंकलन  पर आपको यह स्पष्ट हो जाएगा कि बिना किसी राजनैतिक सपोर्ट के इस मामले का कठपुतली कॉलोनी के लोगों के पक्ष में जाना संभव नहीं जान पड़ता है।

जब हम वहां पहुंचे तो हमें लोगों ने बताया कि बिना सूचना बुलडोजर चलने के कारण एक बच्चे की मलबे में दब कर मौत हो गई तथा एक महिला की सदमें से मृत्यु हो गई। हालांकि अपनी तमाम कोशिश के बावजूद इस खबर की सत्यता की पुष्टि में हम असमर्थ रहे। इसके इतर हमें यह सूचना भी दी गई और इसकी पुष्टि करने में हम सफल रहे कि कठपुतली कालोनी के प्रधान की पत्नी ने आत्महत्या की भी कोशिश की जिन्हें सामूहिक प्रयास से बचा लिया गया और अभी वह ठीक हैं।

मोदी, केजरी को महिला कलाकार की ललकार: जान देंगे लेकिन जगह नहीं छोड़ेंगे !

घायल एनी राजा

चारो तरफ की चीख-पुकार लोगों और लोगों के सवालों से घिरे हम दो पत्रकार, मैं और स्त्रीकाल के सम्पादक संजीव चंदन -जब भी आँखें एक दूसरे से मिली शांत भाव से बस एक ही सवाल कौंधा की सच ही तो पूछ रहे हैं लोग कहाँ जाएंगे? क्या करेंगे? एक तरफ पुलिस का घेरा और दूसरी तरफ लोगों का गुस्सा सब झेलते हुए हम उनसे सवाल करते जा रहे थे कि क्या आप लोगों को पता नहीं था कि आपके मकान आज टूटने वाले थे? क्या आप लोगों को कोई नोटिस दी गई थी आज के लिए? अगर मामला कोर्ट में था तो क्या कोर्ट का कोई फैसला आ चुका है इस सम्बन्ध में हमारे सभी सवालों का सामूहिक स्वर में एक ही जवाब आ रहा था और वह था “नहीं”

मुझे आज तक सरकारों का रुख समझ में नहीं आया उन्हें जब भी कभी किसी को विस्थापित करना होता है तो वह जाड़े का समय ही क्यों चुनते हैं? इसके अलावा जिन ट्रांजिट कैम्पों में उनके रहने की व्यवस्था की गई है क्या वहां जीवन यापन के समुचित प्रबंध हैं? सामजिक कार्यकर्ता स्नेहलता शुक्ल जो की इस लड़ाई में लगातार कठपुतली कॉलोनी के साथ बनी रहीं हैं का कहना है कि जितने परिवार यहाँ से विस्थापित किए जा रहे हैं उतने परिवारों के रहने की व्यवस्था सरकार ट्रांजिट कैम्पों में नहीं कर पाई है। परियोजना के मुताबिक बस्ती के लोग दो साल के लिए आनंद पर्वत (दिल्ली में पश्चिम उत्तर का एक इलाका) में बने ट्रांजिट कैम्प जाएंगे। और वापस अपनी जमीन पर आने के लिए इन्हें पैसे भी देने पड़ेंगे।

तीन महीने पहले प्रतिरोध के लिए इकट्ठे होते थे लोग

क्या है पूरा मामला?

रेहजा बिल्डर्स को यह जमीन अपने एक प्रोजेक्ट के
लिए चाहिए। रहेजा का कहना है कि 190 मीटर ऊंची  54 मंजिला यह इमारत दिल्ली की सबसे ऊंची इमारत होगी। इसमें 170 लग्जरी फ्लैट, एक स्काई क्लब और हेलीपेड बनाए जा रहे हैं। छह अक्टूबर 2009 में रहेजा और डीडीए के बीच हुए करार के मुताबिक प्रोजेक्ट में दो कमरे के 2641 फ्लैट, पार्क, ओपन एयर थियेटर, दो स्कूल जैसी सुविधाओं का वादा किया गया है। इसके बदले में रहेजा बिल्डर्स ने 6.11 करोड़ का भुगतान डीडीए को किया। रहेजा बिल्डर्स के हिसाब से इस पूरे प्रोजेक्ट में 254.27 करोड़ का खर्च आने वाला है। कुल 5.22 हैक्टेयर जमीन में से 3.4 हैक्टेयर जमीन कॉलोनी के पुनर्वास में इस्तेमाल होगी। रहेजा बिल्डर्स को शेष 1।7 हैक्टेयर जमीन पर निर्माण करवाने का हक़ हासिल होगा। माने कुल जमीन का 60 फीसदी हिस्सा ही पुनर्वास के काम लिया जाएगा।

तीन महीने पहले स्त्रीकाल से बात करती सरबती भट्ट: वीडियो

डीडीए के 2010 के सर्वे को भी सही माना जाए तो बनाए जा रहे फ्लैट और मौजूद झुग्गियों की संख्या में बड़ा अंतर है। क्योंकि यह सर्वे 6 साल पुराना है तो फिलहाल कुल परिवारों की संख्या में अंतर के और बढ़ने से इनकार नहीं किया जा सकता। इस लिहाज से देखा जाए तो इस प्रोजेक्ट के जरिए कुछ लोगों का बेघर होना तय है।

आने वाले समय में सरकार और रहेजा मिलकर इन विस्थापित परिवारों का क्या भला करेंगे यह तो वक्त तय करेगा लेकिन इंसानियत के नाते इतना तो तय माना जा ही सकता है कि बिना किसी की मर्जी के उसे उसके घर से जबरन मार-पीट कर निकालना क़ानून अपराध है। लेकिन तब यह किस अपराध की श्रेणी में आएगा जब क़ानून के रखवाले ही किसी बिल्डर के साथ मिल कर घर गिराने लगें।

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दस द्वारे का पिंजरा: स्त्री मुक्ति की संघर्ष गाथा

अनामिका कृत ‘दस द्वारे का पिंजरा’ उपन्यास सन् 2008 को प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में नये प्रयोगों के कारण अनामिका जी को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। अनामिका जी हिन्दी की बहुचर्चित कथाकार, कवियत्री तथा आलोचक के रुप में जानी जाती हैं। एक स्त्री की नजर से पूरे समाज को परखने और समझने की उनकी अपनी तड़प है। उपन्यास ‘दस द्वारे का पिंजरा’ स्त्री मुक्ति के अनकहे मुद्दों के साथ जोड़कर नई व्याख्या की मांग करता है। उपन्यास दो खंडो में विभाजित है। प्रथम खंड पंडिता रमाबाई और दूसरा ढेलाबाई के जीवन संघर्ष की कथा है जो स्त्री विमर्श की परत-दर-परत खोलते हुए एक कोलाॅज बनाता है.

लेखिका ने नारकीय जीवन जीने वाली चकलाघरों में स्त्री की व्यथा का वर्णन ‘दस द्वारे का पिंजरा’ उपन्यास में किया है।‘दस द्वारे का पिंजरा’ लेखिका की सहपाठिनी वेश्या मासूमा नाज बहुत सुंदर थी और वह हमेशा एक रहस्यमयी चुप्पी ओढ़े रहती थी। एक दिन लेखिका अपनी मौसी के ससुराल जा रही थी। रास्ते में वेश्याओं का मुहल्ला पड़ता था। लेखिका ने अपनी सहपाठिन मासूमा नाज को वेश्याओं के मोहल्ले में पाँव में घुंघरु बांधे सज-धज कर खड़ी देख लिया। दोनों सहेलियों की नजरें आपस में टकराती हैं और उसके बाद वह कभी स्कूल नहीं आई। अनामिका सोचती है कि ‘‘आज इतने बरस बाद भी उन आँखों की दहशत मुझे ऊपर से नीचे तक दहला जाती है पूरी रफ्तार में नाचते पंखे से टकराकर गौरेय जैसे कट कर गिरती है, कुछ उसकी आँखों में फड़फड़ाया और एक एकदम से कट गिरा। अगर मेरी आँखें उस दिन मासूम रजा से नहीं मिलती, तो यह स्वाभिमानी लड़की स्कूल नहीं छोड़ती।’’1 इस घटना के लिये लेखिका स्वंय को जिम्मेदार मानती है। मासूम का दर्द लेखिका के लिए नासूर बनता है।

स्त्री मुक्ति के बारे में अनामिका ने स्पष्ट लिखा है। इस दुनिया में स्त्री की मुक्ति खोजना आकाश और धरती के सांस्कृतिक पुल बनाने से कम मुश्किल नहीं है। लेकिन यह कठिन काम अंजाम दिए बिना दस द्वारे के इस पिंजरे में रहने वाले सुंदर पंछी खुले गगन में उड़ने के लिए तैयार नहीं हो सकते।

उपन्यास में 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षों का लेखा-जोखा दो नायिकाएं रमाबाई और ढेलाबाई के माध्यम से सनातनी कुलीनता की चौखट को तोड़कर अपनी जगह बनाने की कोशिश करती है। पीर जी घसियोर और अफसानाबाई की बेटी मेहरुबाई, मेहरुबाई ढेल को जन्म देने के तीसरे दिन बाद स्वंय चल बसी ढेल की बेटी ठुमरी और ठुमरी की बेटी कानन। पंडित रमाबाई और ढेलबाई स्त्री मुक्ति आन्दोलन के साथ क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़कर अपना जीवन सार्थक बनाती है। लोहासिंह का ऐतिहासिक चरित्र है जो कथावाचक और सूत्रधार का किरदार निभाते हुए उपन्यास के सभी चरित्रों का परिचय करके देता है।

 महेन्द्र मिश्र भोजपुरी भाषा के विद्वान गीतकार, संगीतकार थे। वह अक्सर ढेलाबाई के कोठे पर गीत गाते थे।
उन्होंने ऐलान किया कि वह ढेलाबाई से विवाह कर उसे अपनी पत्नी का दर्जा देकर अपने परिवार में रखेंगे। ढेलाबाई महेन्द्र मिश्र को चाहती थी। ढेलाबाई ने संगीत कला-नृत्य की शिक्षा घर में ही ग्रहण की थी। बाबू हलवंत सहाय को ढेलाबाई उच्छी लगती थी लेकिन दोस्ती की वजह से सहाय ने अपने प्यार का गला घोंट दिया। महेन्द्र मिश्र मेले से ढेलाबाई को अगवा कर हलवंत सहाय को सौंप देता है। ढेलाबाई न चाहते हुए भी हलवंत सहाय के साथ रहने के लिए मजबूर हो जाती है। घर की चारदीवारी में उसे नारकीय जीवन जीना पड़ता है। पति सहाय उसे अपने अतीत से निकलने नहीं देता है। रात-दिन अंग्रेज अफसरों के सामने नाच-गाना करना पड़ता था। पति के सामने ही अंग्रेज अफसर ढेलाबाई के साथ अश्लील हरकतें करते हैं तो पति सहाय खुश होते थे। यह बाते ढेलाबाई को मन ही मन दुःखी करती थी। महेन्द्र मिश्र को लगता था अब सब कुछ ठीक हुआ होगा।



ढेलाबाई की जिंदगी को किनारा मिल गया। एक बार ढेलाबाई अपना दर्द ब्यान करती है -‘‘मिश्रा जी, मेरी स्थिति जरा भी नहीं बदली। जो मैं पहले थी अब भी हूँ। रण्डी के बेटी जिसे कोई कुछ भी कह सकता है, जिसके साथ कभी भी, किसी भी समय दरवाजा धकिया कर घुस सकता है भीतर। सामने पान की दुकान है। कोई खण्डर की दिवार से पूछकर तो पीक नहीं फेंकता उस पर। मैं हूं वह दीवार। हर रण्डी वही दीवार है कोठे पर हो चाहे कोठी में।’’2 स्त्री मुक्ति की छटपटाहट हर स्थान पर दिखाई देती है। ढेलाबाई कहती है -‘‘मैं जो पहले थी अभी भी वो ही हूँ। पहले भी मुजरा करती थी, अब भी करती हूँ। फर्क सिर्फ इतना है कि रुपया मेरे हाथ में आता था, अब मुख्तार साहब के हाथ में आता है। पहले पाँव में बस घुंघरु  थे, अब मोटी जंजीरें भी हैं, पाबन्दियों की। यहां मत जाओ, वहां मत जाओ, इससे बोलो, उससे मत बोलो। ये करो, वो मत करो, सुनते-सुनते मेरे दिमाग  की नसें तड़कने लगी हैं।’’3 पिंजरे में कैद ढेलाबाई हलवन्त सहाय के साथ रहने के लिए अभिशप्त है इसलिए स्वंय को एक जिंदा लाश समझती है। ‘‘खाना इनका दिया खाती हूँ, इसलिए सांस रोककर बगल में लेट जाती हूँ। हर रोज उबकाई आती है तो मन को यही दिलासा देती हूँ कि कर्जा चुका रही हूँ या किराया खाने-पीने का रहने-सहने का।’’4 लेखिका स्त्री मुक्ति के लिए समाज में परिवर्तन चाहती है।

महिला सुधारकों में पंडिता रमाबाई एक विदूषी स्त्री है। ब्राह्मण अनंत शास्त्री डांगे ने पत्नी और पुत्रियों को शास्त्र पढ़ाते और समान अधिकार दिए हैं जिसके कारण उन्हें जाति से बहिष्कृत किया गया। अनंत शास्त्री परिवार समेत गाँव छोड़कर निकल गए। लक्ष्मीबाई अपनी पुत्री रमा की प्रतिभा पर दामाद पोनप्पा को कहती हैं -‘‘जिन पर प्रकृति ज्यादा कृपा करती उनको वह पेरती भी बहुत है। जीवन के सामान्य सुख उनके लिए नहीं होते। अमृत की एक बूँद प्यास की पराकाष्ठा पर टपकाती है।’’5 रमाबाई अपने पिता की तरह साहसी, प्रगतिशील और निर्भीक थी। अकाल पड़ने से पिता अनंत शास्त्री और माता लक्ष्मीबाई की मृत्यु हो जाती है। रमाबाई अपने भाई को लेकर कलकत्ता पहुंच जाती है और वहां नवजागरण आंदोलन से जुड़ जाती है। बिहार की नीची जाति का युवक सदाव्रत रमाबाई के बचपन का साथी था। सदाव्रत इंग्लैंड से वकालत करता है। रमाबाई की नन्हीं बेटी का नाम मनोरमा है। सदाव्रत की हत्या होती है। परिवार में रमाबाई और मनोरमा के अलावा कोई भी नहीं बचता। रमाबाई हार न मानते हुए अपने जीवन साथ सपूर्ण स्त्री जीवन को ऊँचाई तक ले जाने की निरंतर कोशिश करती रही। सामन्तवादी पुरुषों के सामने चुनौती बनकर खड़ी हो जाती है। रमाबाई कहती है -‘‘कब तक पुरुष स्त्री को सिर्फ एक मादा मानते रहेंगे।’’6 लोगों के मिथ्या भाषण सुनने के बाद रमाबाई की आँखों के सामने बनारस, वृंदावन और मथुरा की लाखों विधवाओं की स्थिति अजागर हो जाती है। ‘‘ऐन भगवान की आँखों के आगे जो लगातार सेठों और पंडों का यौन शोषण/गाली-गलौच और रोटी के लाले झेलती, आधी जिबह मुर्गियों का जीवन जीने को अभिशप्त थी।’’7 रमाबाई का जीवन संघर्षमयी रहा है। उन्होंने विधवाओं को सहारा दिया और उन्हें शिक्षित करके आत्मनिर्भर बनने की शक्ति दी।

‘दस द्वारे का पिंजरा’ में लेखिका स्त्री मुक्ति की मांग करती है। स्त्री मुक्ति से ही समाज में परिवर्तन लाना चाहती है। ‘‘मुक्ति भी स्त्रीलिंग ही तो है। कभी अकेली नहीं मिलती। हरदम वह झुण्ड में ही हंसती-बोलती चलती है। थेरियों का झुण्ड हो या जैन साध्वियों, चिड़ियों और स्त्रियों के यह बृहत्तर सखा भाव रमाबाई को हमेशा ही आकर्षित करता है।’’8 द पब्लिक एजेंडा में नामवर सिंह ने कहा है, ‘‘दस द्वारे का पिंजरा’ इस उपन्यास के नाम में गहरा संदेश है। दस द्वारे का पिंजरा कबीर से लिया गया है। पाँच ज्ञान्द्रियाँ और पाँच कर्म इन्द्रियाँ मिलकर शरीर के दस द्वार बनते हैं, जिसमें आत्मा बसती है। इस तरह स्त्री की मुक्ति केवल बुद्धि की मुक्ति नहीं होती, केवल हृदय की मुक्ति नहीं होती, बल्कि तमाम इन्द्रियों की मुक्ति भी होती है। देह भी बंधन है और उससे मुक्ति ही पूर्ण मुक्ति है।’’9


‘दस द्वारे का पिंजरा’ स्त्री-मुक्ति, दलित-मुक्ति, देश-मुक्ति, वेश्या-मुक्ति की संघर्ष गथा है। रमाबाई विदुषी स्त्री थी और ढेलाबाई वेश्या पुत्री अनपढ़ थी। दोनों का संघर्ष स्त्री -मुक्ति का ही है। उपन्यास के अंत में दोनों पात्र एक ही कार्य के लिए जुट जाते हैं। इस उपन्यास की सफलता का कारण है कि दानों का स्त्री मुक्ति आन्दोलन से जुड़ जाना।

सन्दर्भ सूचि
1.अनामिका, दस द्वारे का पिंजरा, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2008, पृ. 6
2.वहीं, पृ. 206
3.वहीं, पृ. 206
4.वहीं, पृ. 207
5.वहीं, पृ. 22
6.वहीं, पृ. 58
7.वहीं, पृ. 111
8.वहीं, पृ. 93
9.वहीं, पृ. 62


लेखक :डाॅ. भारत भूषण
एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग,गुरु नानक कालेज, किल्लियांवाली,श्री मुक्तसर साहिब (पंजाब)-151211

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पितृसत्तात्मक हादसों से मुठभेड़ करती लेखिका की आत्मकथा: ‘हादसे’



स्त्री को सदा से पुरुष की अनुगामिनी बनकर जीवन जीने की शिक्षा दी जाती है। स्त्री  का लक्षमण रेखा लाँघना समाज के तथाकथित पहरेदारों की बर्दाश्त से बाहर होता है।औरत अगर खुदसर हो तो उसकी मुख़ालफ़त लाज़िमी होती है और अगर कहीं राजनीति में हो और वह भी लता बनकर नहीं बल्कि पेड़ या खूँटा बनकर तो उसे हिला देने की तरकीबें, झकझोर देने के ढंग, उखाड़ देने के प्रयास इन्तहा पर पहुँच जाते हैं। अगर वह ट्रेड यूनियन में हो, वह भी सफ़ेदपोशों की यूनियन में नहीं बल्कि स्वयं वर्गहीन होकर खाँटी खटनेवाले ब्लू कॉलर कोयला मज़दूरों के बीच रहकर उन्हें संगठित कर आन्दोलित करने का दम रखती हो, तब तो ’युद्ध और प्रेम में हर चीज़ जायज़ है’ का फ़ॉर्मूला लागू करने में सहयोगी, सहभागी- यहाँ तक कि प्रशंसक भी देर नहीं लगाते- दुश्मनों का तो कहना ही क्या ! हाँ, दुश्मनों का ! ऐसी औरत के दुश्मन खड़े हो जाते हैं। दुश्मनी इसलिए नहीं होती कि उससे कुछ नुकसान पहुँचेगा, वह समान कारण तो स्त्री-पुरुष दोनों पर ही लागू होता है- दुश्मनी इसलिए कि एक औरत ने इतने लोगों का विश्वास कैसे प्राप्त कर लिया- बिना उनकी मदद के यह कैसे संभव हुआ ! ज़रूर दाल में कुछ काला है ! यह डाह ही दुश्मन खड़ा कर देती है। तब ऐसी औरत के खिलाफ़ बहुत सी ’कनफुसकियाँ’, अफ़वाहें, चटपटी प्रणय कथाएँ, झूठे-सच्चे किस्से हवा में तैरने लगते हैं।1



पुरुष औरत को उसी हालत में बर्दाश्त करता है, जब उसे यह यकीन हो जाए कि वह पूरी तरह उसी पर आश्रित है और ख़ुद कोई निर्णय नहीं ले सकती या फिर वह स्वयं उस औरत से डरने लगे, तो वह उसे सहता है। पुरुष के मुकाबले में कोई पुरुष हो तो उन्हें अपनी क्षमता का फ़र्क उन्नीस या बीस ही नज़र आता है लेकिन अगर औरत खुदमुख्तार होकर सामने खड़ी हो जाए, वह भी निर्णय ले सकनेवाली औरत, तो चाहे बिन चाहे वह हीन-भावना से दब जाता है और उसे अपनी तुलना में वह औरत बाईस लगने लगती है।ईर्ष्यावश शत्रुता का अंकुर मन में जन्म लेता है। वह समझता है कि औरत के पास उसके समान गुणों के अतिरिक्त आकर्षित और प्रभावित करने की क्षमता अधिक होती है और इसे ही वह अपने पौरुष के लिए चुनौती मान बैठता है। अत्यंत प्रेम और समर्पण के क्षणों में भी पुरुष अपने निर्णय को अन्तिम साबित करने की ज़िद करता है।

रमणिका गुप्ता बचपन से ही राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन की धारणा से जुड़ी रहीं। जब पाँचवी-छठी कक्षा में पढ़ती थीं, तब ’सत्यार्थ प्रकाशन’ के समर्थन में तथा मूर्ति-पूजा के विरोध में घंटों बहस करती थीं। इन्हीं बहसों के कारण उन्होंने विक्टोरिया स्कूल की अपनी प्रधानाचार्या से बहुत डाँट खाई थी। वे अपने निर्णय स्वयं लेती थीं तथा उनका अच्छा-बुरा फल भोगने को सदैव तैयार रहती थीं।

आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा -पहली किस्त


पटियाला रियासत में उन दिनों वेश्याओं का प्रचलन था। उनके स्कूल में सईदा नाम की की एक वेश्या की लड़की पढ़ती थी। यदि कोई उसे चिढ़ाता था तो रमणिका उससे झगड़ा करती थी और मारपीट तक पर उतर आती थी। उनकी नज़र में सईदा का वेश्या की लड़की होना या उसकी माँ का वेश्या होना समाज का दोष था। वेश्या होने न होने से ही किसी स्त्री को पतित या सती करार देने को भी वे गलत मानती थीं।वे औरत के संबंध में पतित शब्द की परिभाषा से सहमत नहीं हैं कि यह शब्द औरत के चरित्र से जोड़ा जाता है और चरित्र का अर्थ केवल औरत के यौन-संबंधों को लेकर ही समझा जाता है। औरत के संदर्भ में चरित्र के अन्य गुण या लक्षण जैसे नैतिकता, शालीनता, ईमानदारी, परस्पर सद्‍भाव, संवेदनशीलता, बहादुरी और निडरता आदि को नज़रअन्दाज़ कर दिया जाता है।

उनकी मान्यता है कि औरतों को खुद का सहारा या सहयोगी बनना चाहिए, सहारा खोजना नहीं चाहिए। उन्हें ’थेथर’ बनना ज़रूरी है। ’छुई-मुई’ बनने से समाज में काम चलनेवाला नहीं है। आग पर चलने की हिम्मत जुटाना आवश्यक है। हवा के विपरीत चलने का इरादा अपेक्षित है।

रमणिका गुप्ता ने अनेक निर्णायक हठ किए और अप्रिय लगनेवाले कदम उठाए। उन्होंने अपने मानदंड खुद गढ़े। कहते हैं- “समरथ को नहिं दोष गुसाईं।“ वे स्वयं को समर्थ बनाकर अपनी शर्तों पर चलीं। उन्होंने समाज के पीछे चलने की बजाय समाज को अपने पीछे चलाया। उनका पहला हमला प्रचलित नियमों, प्रथाओं, प्रतिबन्धों, यहाँ तक कि यौन-संबंधों पर होता था। उन्हें रूढ़ियाँ तोड़ने में बड़ा मज़ा आता था और प्रतिक्रिया में रूढ़िवादियों का तिलमिलाना या झल्लाना अच्छा लगता था।2

आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा : दूसरी किस्त

परम्परा तोड़ने का हठ- इनका परिवार सामन्ती परिवार था। घर में परदा-प्रथा लागू थी तथा परिवार में लड़कियों का सिर ढकना लाज़िमी माना जाता था। पारिवारिक परम्परा तोड़ने के लिए सबसे पहले रमणिका गुप्ता ने ताँगे में आगे की सीट पर अपने पिता की बगल में बैठने की ज़िद शुरू की। कार या ताँगे में परदा लगाने पर भी वे मुँह बाहर निकालकर बैठती थीं। साइकिल लेकर सड़क पर निकल जाती तो घर में हंगामा मच जाता था। जब वे न मानीं तो उनकी माँ ने अल्टीमेटम दे दिया कि यदि सिर नहीं ढकना तो या तो बीस कदम आगे चलो या पीछे ताकि लोग न जानें कि वे साथ-साथ हैं। उन्होंने बीस कदम आगे चलना शुरू कर दिया। उस दिन से उन्हें घर में विद्रोही का-सा रुतबा मिल गया और हर समय टोका जाने लगा। पर वे ज़िद पर अड़ी रहीं।3

जाति तोड़कर प्रेम विवाह करने के फ़ैसले को परिवार ने एक चुनौती के रूप में देखा और इस निर्णय को बदलने के लिए बहुत दबाव डाला गया। मामा ने उनका घर से निकलना बंद कर दिया, रोज़ पिटाई होती थी और उन्हें पटियाला भेज दिया गया। एक दिन तंग आकर पापा जी ने कहा कि- “ये फ़ैसला तो बदलना ही होगा नहीं तो तुम दोनों में से किसी एक को ज़हर खाना होगा-तुम्हारी माँ को या तुम्हें।“ रमणिका ने तुरंत जवाब दिया- “मेरी माँ और आप ज़िंदगी का सुख देख चुके हैं, भोग चुके हैं। मुझे अभी ज़िन्दगी देखनी बाकी है इसलिए ज़हर मैं नहीं खाऊँगी, बीबी जी खाएँ।“ उनकी ये बातें परम्परावादी, औचित्यवादी, त्यागवादी और आचरणप्रिय लोगों को अखरती थीं परन्तु उनके लिए यह निर्णायक घड़ी थी। तभी वे जो करना चाहती थीं, कर पाईं। परम्पराओं को तोड़ना और रूढ़ियों के विपरीत चलना ही मानों उनका लक्ष्य बन गया था, इसके लिए अपनों के खिलाफ़ विद्रोह आवश्यक था-जिसके लिए उन्होंने स्वयं को तैयार कर रखा था।एक बार पिता ने तंग आकर उन्हें घर से भाग जाने की सलाह दी किन्तु उन्होंने साफ़ इनकार करते हुए कहा- “ शादी तो आप ही को करवानी होगी मेरी। मैं भागूँगी नहीं। इन्तज़ार करूँगी।“ उन्होंने खुद अपने माता-पिता को शादी की चिट्ठी लिखी और वे विवाह में सम्मिलित भी हुए। उनके ब्याह में न मँगनी हुई, न छेका, न दान और न दहेज, भाई सत्यव्रत बेदी से घर से प्रकाश उन्हें विदा करा लाए। उनके परिवार में किसी लड़की द्वारा परम्परा के विरुद्ध किया गया यह पहला विद्रोह था।4

वैवाहिक जीवन की कठिनाइयों की शिकायत उन्होंने कभी किसी ने नहीं की। उन्होंने न अपने घर में परदा किया और न ही छुआछूत चलने दी। छुआछूत का विरोध जताने की नीयत से उन्होंने एक मेहतरानी के ईसाई पुत्र को अपना रसोइया नियुक्त कर लिया। उन दिनों मुसलमानों और ईसाइयों को ’मलेच्छ’ माना जाता था और उनका हिन्दू घरों में आना-जाना, खान-पान वर्जित था।4

1960 में उन्होंने सक्रिय राजनीति में भाग लेने का निर्णय लिया और अपने विश्वास के मुताबिक औरतों के निर्णय लेने की आज़ादी को बरकरार रखने के लिए निर्णय के बाद ही इसकी सूचना प्रकाश को दी।उनकी नज़र मे औरत को किसी निर्णय के लिए पति की इजाज़त माँगना औरतों के अधिकार का हनन है। आपने इस परम्परा अपने जीवन में सदा नकारा। वे किसी समारोह इत्यादि में श्रीमती वी.पी.गुप्ता बनकर जाना पसंद नहीं करती थीं। उनके मन में यह भावना अति तीव्र हो गई थी कि- “मुझे लोग मेरे कारण पहचानें, प्रकाश की पत्नी होने के कारण नहीं।“5

धनबाद में रमणिका ने कई संस्थाएँ शुरू की थीं जिनमें लगभग डेढ़ सौ महिलाएँ जीविका अर्जित करती थीं। स्थानान्तरण के पश्चात उन्होंने पति के साथ कानपुर न जाने का निर्णय लिया ताकि उनका स्वयंसिद्धा होने का संकल्प पूरा हो सके। उन्होंने इसे अपना कर्त्तव्य माना जबकि लोगों ने इस फ़ैसले को निर्ममता, क्रूरता और निर्दयता से युक्त बताया क्योंकि दोनों बच्चियाँ पिता के साथ गई थीं और उन्हें हॉस्टल भेजना पड़ा था।6

राजनीति में वे पहले कांग्रेस में थीं जहाँ नेता स्त्री कार्यकर्ताओं को अपना कलेवा मानते थे जिसे भूख लगने पर खाने का एक स्वर्जित जन्मसिद्ध अधिकार उन्होंने प्राप्त कर रखा था। इन नेताओं का मानना था कि किसी पुरुष नेता-वृक्ष का सहारा लिए महिला नेता-लता पनप और बढ़ नहीं सकती थी परन्तु रमणिका जी लता बनने को तैयार नहीं थीं अत: उन्होंने अपनी सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया और कांग्रेस अध्यक्ष को यह लिखा कि- “मैं कांग्रेस से त्यागपत्र दे रही हूँ। मैं अपना रास्ता खुद बनाने में सक्षम हूँ, इसलिए अपना रास्ता खोज लूँगी, नहीं तो रास्ता ही मुझे खोज लेगा।“6


आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा : आख़िरी किस्त

 रमणिका गुप्ता कहती हैं कि- “बहुत पहले मैं अग्नि-दीक्षा ले चुकी थी, इसलिए अग्नि परीक्षाओं को हमेशा नकारा, ग़ैरज़रूरी समझा और उनसे गुज़रने की ज़हमत भी नहीं उठाई। मैंने अपने आचरण का स्पष्टीकरण कभी नहीं दिया। मैं जो हूँ, खुली किताब के रूप में सामने हूँ।” उन्होंने अपने यौन शोषण का आरोप किसी पर नहीं लगाया क्योंकि या तो वे स्वयं इसमें शामिल थीं या विरोध में डटी रही थीं और यदि कुछ हुआ भी तो खुद को कभी हतोत्साहित नहीं होने दिया।राजनीति में रणनीति के तहत उन्होंने कई बार कुछ परिस्थितिजन्य समझौते भी किए किन्तु स्वयं को कभी बेबस या असहाय नहीं माना।अन्याय का विरोध करना उनकी आदत का अभिन्न अंग रहा भले ही इसके चलते उन्हें व्यक्तिगत रूप से बहुत नुकसान भी उठाना पड़ा। उनका मानना है कि राजनीति और समाज-सेवा में आत्मविश्वास, हौसला, निडरता और हठ ज़रूरी चीज़ें हैं। एक औरत को आगे बढ़ने के लिए ’थेथर’ होना आवश्यक है। थेथर का अर्थ संवेदनारहित होना नहीं बल्कि पूर्णतया संवेदनशील होते हुए विपरीत परिस्थितियों में डटे रहना है- आरोपों, कलंकों और घटनाओं-दुर्घटनाओं तथा ज़्यादतियों को झेलते हुए, अपने रास्ते पर चलते रहना और संकल्प-शक्ति तथा इच्छा-शक्ति का बल बनाए रखना ही है। इसका मतलब है खुद को अपनों की बेरुखी सहने को भी तैयार रखना, हँसते-हँसते कुत्सित व्यंग्य, कुटिल मुस्कानें, द्विअर्थी वाक्य पचाने की आदत डालना और कभी-कभी दूसरों के वाक्यों को उन्हीं के खिलाफ़ मुहिम छेड़ने के लिए उछालना।पीठ थपथपाकर बहादुरी का वास्ता देने वाले राजनीति में बहुत मिलते हैं। उनकी नीयत को पहचानकर सोच-समझकर अपने फ़ैसलों पर अडिग रहना ही ’थेथरपन’ है जो राजनीति में स्त्रियों के लिए लाज़िमी है। ’सुनो जग की, करो मन की’ सूक्ति का पालन करना वे आवश्यक मानती हैं।7

सन् 1968 में उन्होंने मज़दूरों के बच्चों के लिए स्कूल बनाने के मुद्दे को लेकर टाटा कम्पनी से लड़ाई की और इसमें कामयाब भी हुईं। सरकार द्वारा पानी की योजना बनवाकर घर-घर में पानी पहुँचाया तो वे ’पानी की रानी’ के नाम से मशहूर हो गईं। आदिवासियों के साथ मिलकर जंगल के सिपाहियों के खिलाफ़ उन्होंने नारा दिया- “घूस नहीं, अब घूसा देंगे।“ मज़दूरों के अधिकारों को सुरक्षित रखने की खातिर यूनियन बनाने के लिए उन्होंने आमरण अनशन किया और अपनी माँगों को मनवाया। खदानों में खटने वाले अनाम मज़दूरों को परिचयपत्र दिलवाने के लिए जॉर्ज फ़र्नाडिस से बात की जिन्होंने आन्दोलन के लिए नारे दिए- “हम कौन हैं लिख कर दो- हमारा नाम क्या है लिख कर दो- हम क्या काम करते हैं लिखकर दो-हमारा वेतन क्या है लिखकर दो- हम कहाँ खटते हैं लिखकर दो !” इसके परिणामस्वरूप सभी मज़दूरों के परिचय-पत्र मिला जो राष्ट्रीयकरण के बाद खदानों में उनकी नौकरी का प्रमाणपत्र माना गया।8



इन आन्दोलनों के दौरान उन पर कई बार जानलेवा हमले हुए। कई दफ़ा लाठियाँ बरसाई गई जिनसे उनकी हड्डियाँ भी टूटीं परन्तु उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी और न ही हार मानी। वे जानती थीं और मानती थीं कि ऐसे अवसरों पर जोखिम उठाना ज़रूरी होता है। उनका कहना है कि यदि एक औरत आन पर आ जाए तो वह मरदों से अधिक जोखिम उठा सकने की कुव्वत रखती है। एक बार आन्दोलन के समय उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। वहाँ के सभी अधिकारी उन्हें महिला कैदी नहीं बल्कि एक नेता कैदी के रूप में देखते थे। वे अपना सुख-दुख मज़दूरों के सुख-दुख में महसूस करती थीं इसलिए उनकी तकलीफ़ देखकर उनका गुस्सा बढ़ता था। वे गुस्से में रोने लगतीं और पुन: कड़े संघर्ष के लिए तैयार हो जाती थीं। खदानों के राष्ट्रीयकरण के बाद उन्होंने मज़दूरों की बहाली को सुनिश्चित करने को लेकर एक लम्बी लड़ाई लड़ी। उन्होंने कभी सस्ती वाहवाही लूटने के लिए भारी पलड़े का साथ नहीं दिया।

उन्हें ऐसे हंगामे खड़े करने में बहुत मज़ा आता था जिनसे निजी स्वार्थ पर चोट पहुँचे। कई लोगों को लगता था कि वे खामख्वाह ही दुश्मन बना लेती हैं, कुछ मामलों में चुप भी रहा जा सकता है। परन्तु वे चुप रहना सीखी ही नहीं थीं। ज़रा-सा अन्याय देखते ही तीव्र प्रतिक्रिया करने की आदत ने उन्हें कई बार खतरनाक मोड़ों पर खड़ा कर दिया था। उनके साथ ऐसी कई घटनाएँ घटीं जब पार्टी प्रतिबद्धता और मानवीयता के बीच एक को चुनना था, उन्होंने हमेशा मानवीय संवेदना को ही प्राथमिकता दी और मज़दूरों के हित का साथ दिया भले पार्टी या उसका ओहदा उन्हें छोड़ना पड़ा।9

‘आपहुदरी’: ‘अपने शर्तों पर जीने की आत्मकथा’

1970 में एक चुनाव के दौरान उन्हें गाँव वालों से पता चला कि भुईनी औरतों का शोषण किया जाता है और इन घरों की नवब्याहताओं का डोला पहली रात बाबू साहब के यहाँ उतारा जाता था। कुछ दिन पहले एक भुईनी महिला का झोंपड़ा जला दिए जाने की खबर भी उन्हें मिली तो रमणिका जी ने आई.जी. को बुलाकर कहा- “उस भुईनी का घर वहाँ बन जाना चाहिए, नहीं तो मुझे स्वयं जाकर खुद खड़े होकर घर बनवाना होगा और अगर मेरे साथ कुछ दुर्घटना घट गई तो उसकी जिम्मेवारी आपकी होगी।“ आपके प्रयासों से भुईनी का घर भी बन गया और दोषियों की गिरफ़्तारी भी हुई।10

उनकी मान्यता थी कि –“अश्लीलता को सदन में कोई स्थान नहीं दिया जा सकता। उन्होंने कभी किसी लड़ाई को हल्के ढंग से नहीं लिया और न ही कभी अधूरा छोड़ा। उसको तार्किक निष्कर्ष तक पहुँचाया- चाहे जीत हो या हार। बचाव में हताश होकर भागी नहीं क्योंकि वे हार सहने की क्षमता भी रखती थीं। वैसे हर औरत हार सहने और स्वीकारने की आदी होती और हथियार डाल देती है किन्तु उन्होंने ’हथियार डालना’ तो सीखा ही नहीं था और न ही उनका इसमें विश्वास था।11


इस प्रकार उनकी आत्मकथा ’हादसे’ से पूर्णतया स्पष्ट होता है कि उन्होंने अपना जीवन अपनी शर्तों पर जीया और आज भी अपने जीवन के मानदण्ड स्वयं निर्धारित करती हैं। बँधी-बँधाई रूढ़ियों पर वे न विश्वास करती हैं और न ही पारम्परिक लीक पर चलने को उचित मानती हैं। वे ’स्वयंसिद्धा’ हैं और अन्य औरतों के लिए भी प्रेरणा का स्त्रोत हैं।

संदर्भ सूची
1.रमणिका गुप्ता, हादसे, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2010, पृ-15-16
2.वही, पृ- 17
3.वही, पृ- 18
4.वही, पृ- 24-25
5.वही, पृ- 26
6.वही, पृ- 27
7.वही, पृ- 52-54
8.वही, पृ- 74-78
9.वही, पृ- 186-190
10.वही, पृ- 192
11.वही, पृ- 250
लेखिका:-डॉ.राजेश्वरी, माल्या अदिति इंटरनेस्कूल, बंगलूरु, कर्नाटक
संपर्क:dr.rajeshwarig gmail.com


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सिंदूर बना विमर्श : पक्ष-विपक्ष में रचनाकार, मैत्रेयी पुष्पा हुईं ट्रॉल

यह सप्ताह स्त्रीवादी विमर्श के खाते में रहा. जहां अमेरिका स्थित भारतीय वकील सारा राय ने विद्यार्थियों के यौन उत्पीड़क प्रोफेसरों की सूची जारी की और उसपर कुछ स्त्रीवादियों ने प्रतिवाद किया वहीं हिन्दी अकादमी,दिल्ली की उपाध्यक्ष और चर्चित साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा ने ‘बिहारी महिलाओं’ के सिंदूर पोतने पर सवाल खड़ा कर छठ के अवसर को सोशल मीडिया पर विमर्श का अवसर बना दिया. रचनाकारों और अन्य लोगों से ट्रॉल  होकर उन्होंने पोस्ट हटा ली. हालांकि स्क्रीन शॉट घूम रहा है. पढ़ें पक्ष-विपक्ष की कुछ टिप्पणियाँ.


बिहारी औरतों की मांग में सिंदूर देखकर भडकिए मत.यह सिंदूर स्वाभाविक है,नकली नहीं है।इसी तरह जानकर रखें कि दुर्गा पूजा के समय बंगाली औरतें देवी के पंडाल में सिंदूर खेला,खेलती हैं.सिंदूर औरत के आनंद की निशानी है.पति की नहीं।
जगदीश्वर चतुर्वेदी 

मेरा सिंदूर : सांस्कृतिक प्रतीक
तेरा बुर्का : धार्मिक प्रतीक
हे हिन्दू नारी तुम भी क्या कमाल करती हो …धार्मिक कर्म कांड को तथाकथित संस्कृति से रिप्लेस कर धमाल करती हो …
#जय_हमारा_नारीवाद
नूतन यादव 

जिन्हें बिहार की महिलाओं के नाक से सिंदूर लगाने से,पूरी मांग सिंदूर लगाने से ऐतराज़ है तो वे ये बताएं कि उन्होंने खुद का विवाह हिन्दू रीति से क्यो किया? क्यो किया सिंदूर दान,क्यो पहना मंगलसूत्र? क्यो सर पर आँचल रखती है? नाक से सिंदूर लगाना छठ पूजा पर हमारे बिहार की संस्कृति है,जिन्हें हम पसंद से करते हैं। जिसमे कोई दास प्रथा नाम की चीज ही नहीं। हम किसी की बंदिनी नही,जीवनसंगिनी बनकर रहते है,ताउम्र।?
विभा रानी 


आपत्तिजनक टिप्पणी के सन्दर्भ में, उनसे एक बेबाक सम्वाद………..

.पुष्पा दीदी, हैरान हूँ आपके द्वारा किसी की आस्था पे किए गए उपहास जनक प्रहार से ! वैसे आप उम्रदराज़ होने के कारण अनुभव सम्पन्न है, साथ ही, लेखन से जुडी होने के कारण संवेदनशील और विचारशील भी है, सो जानती ही होगी कि किसी की भी आस्था पर चोट करना ‘संस्कारहीनता और संवेदनहीनता’ कहलाती है ! सिन्दूर लगाने की बात हो या व्रत-उपवास रखने की बात; ये सब भारतीय संस्कृति जुडी हुई सदियों से प्रेम और निष्ठा के तहत चली आ रही प्यारी आस्थाएं हैं ! उसमें किसी को किसी की आलोचना करने या मखौल सा उड़ाते हुए सवाल करने का हक नही ! आप व अन्य कोई सुहागन सिन्दूर नही लगाती, तो कोई बात नही क्योंकि ऐसा करने में आपकी और उनकी आस्था नही है ! इसी तरह जिन बहिनों की आस्था है, यदि उन्हें ऐसा करना पसंद है, उन्हे इससे सुख-सुकून मिलता है, तो उस पर आपके द्वारा ‘पोतना’ शब्द का प्रयोग करते हुए सवाल करना उचित नही ! आपने लिखा ‘क्यों पोत रच लेती है’….यदि कोई आपसे पूछने लगे कि आप विवाहित है पर आप माँग सूनी क्यों रखती है, सिन्दूर से क्यों नही भरती, बिछुए क्यों नही पहनती…वगैरा, वगैरा, तो दूसरे का ऐसा सोचना और पूछना भी गलत है ! यदि आपकी सोच, आपकी धारणा, दूसरों की तरह नही है, तो इसका मतलब यह नही कि सदियों से चली आ रही आस्थाओं के साथ जीने वाली स्त्रियों को, आप अपनी सोच, अपनी पसंद का हवाला देते हुए, पाठ पढाने लगे – ‘’ मैंने नहीं किया विवाह सिन्दूर की ख़ातिर , नहीं सहेजी कभी सिंदूर की डिबिया , नही सजाई माँग सिन्दूरी रंग से ।उसको नहीं माना वर , सुहाग और पति परमेश्वर । वह मेरे सुख दुख का साथी है ,सहचर है ।प्रेम मोहब्बत और विश्वास के साथ हम एक संग हैं’’

.Who cares………कि आपने विवाह क्यों किया ? आपसे कौन पूछ रहा है कि आप को पति वर, सुहाग मानती है या चौकीदार, बौडीगार्ड या पहरेदार ? किसी को रूचि नही है आपके वैवाहिक जीवन से जुडी बातो, या आपके करम-धरम और आपकी सोच को जानने की ! न आपके जीवन में झाँकने की और कमेन्ट पास करने की ! फिर आपका क्या अधिकार बनता है कि आप अन्य स्त्रियों की आस्था और धारणा पर चोट करे और पौराणिक उदाहरण देकर सिन्दूर की छीछालेदर करे ! सिन्दूर आपके लिए महज एक लाल रंग की ‘कुनाई’ हो सकता है, ‘चूरा’ हो सकता है, लेकिन दूसरी स्त्री के लिए वह प्रेम का पवित्र ‘भाव’ हो सकता है, उसे प्राणों से प्यारा हो सकता है ! भारत की हर शिक्षित-अशिक्षित आम स्त्री, निस्वार्थ भाव से वैवाहिक जीवन को लेकर, जो मूल्य-संस्कार मन में संजोये होती है, याद रखिये कि वे पुरुष द्वारा उसकी कद्र या उपेक्षा ‘से परे होते हैं ‘! पुरुष उसे प्यार करे या दुत्कारे – इसकी परवाह किए बिना, स्त्री अपनी आस्था पे कायम रहती है और उसकी यह दृढ़ता और विश्वास, स्त्री स्वभाव की ‘उदात्तता’ का परिचायक है !
.आपकी तरह, अन्य स्त्रियों को भी तो अपनी मान्यताओं,आस्था और विश्वास को संजोने का हक है ? अगर पौराणिक पात्रों की ही आप बात करती है तो, आपको सीता तो यद रही पर आप सावित्री को क्यों भूल गई, जो यम से पति को छुड़ा लाई थी ! आप पार्वती का हवाला भी दीजिए जिसने सिन्दूर और ‘करवाचौथ’ के व्रत के बल पर, शिव जैसे ‘महादेव’ को पाया था। द्रौपदी को मत भूलिए, जिसने कृष्ण के बताये अनुसार, जब सिन्दूर धारण करके करवाचौथ का व्रत रखा तो , उसके प्रताप और बल से पांडवो की महाभारत के युद्ध में विजय हुई थी ! निश्चित ही पांडवो का पुरुषार्थ तो था ही लेकिन स्त्री की प्रार्थना की शक्ति से वह चौगुना हो गया ! इसी तरह आप इस पौराणिक तथ्य को भी जानिये कि श्रीराम बालि को मारने ही वाले थे तो उनकी नजर अचानक बालि की पत्नी तारा की मांग पर पड़ी, जो कि सिंदूर से भरी हुई थी। इसलिए उन्होंने सिंदूर का सम्मान करते हुए बालि को नहीं मारा।

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.तो दीदी किसी की आस्था पर प्रश्नचिन्ह मत लगाईये और उनकी आस्थाओं को निरर्थक सिद्ध मत कीजिए ! याद रखिये कि आस्थाएँ, तर्कों से अधिक ताकतवर होती है और उनसे निकली प्रार्थनाएँ अद्भुतं परिणाम भि देती आई है ! इसलिए ही अनेक डॉक्टर ईश्वर पर अपनी आस्था के तहत, क्लीनिक में सम्मान से इस उक्ति को मुख्य स्थान पर लगाते देखे गए हैं :
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. I treat, ‘He’ cures
सो आस्थाओं को तोडना किसी के वश में नही ! उनकी नीव बड़ी गहरी होती है और उन पर टिका विश्वास सघन होता है ! इसलिए सबकी भावनाओ का सम्मान करना सीखिए !
दीप्ति गुप्ता 


सिंदूर लगाना या ना लगाना किसी महिला का व्यक्तिगत मामला हो सकता है, लेकिन छठ पूजा के दौरान सिंदूर नाक से लगाने की परंपरा पर सवाल उठाने पर दिग्गज साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा जी का जिस तरह से अपमान हुआ. उसे क्या कहा जाये? एक महिला पर इतनी आपत्तिजनक टिप्पणी? आखिर एक सवाल ही तो किया है उन्होंने, क्या एक सवाल मात्र से छठ पूजा की महत्ता कम हो जायेगी? या जो सवाल मैत्रेयी जी कर रही हैं, उसमें वही बात छुपी है जो एक स्त्री अधिकारों की पैरोकार होने के नाते वो कह रही हैं. सवाल उठाना तो एक लेखक एक्टिविस्ट का धर्म है, समाज जवाब दे, लेकिन सवाल की तो भ्रूण हत्या ना करे? जैसे बेटियों की कोख में करते हैं?

रजनीश आनंद 




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बनारस घराने की अंतिम ठसक का विदा-लेख

अभिषेक श्रीवास्तंव 


बुधवार की शाम बनारस बेचैन था और कलकत्ता मौन। काल के निरंतर प्रवाह में सदियों से ठिठके हुए ये दो शहर जो हमेशा ही जुड़वां नज़र आते रहे, आज इनका दिल जुड़ा गया था। विदुषी गिरिजा देवी- बहुतों के लिए अप्पाजी- जा चुकी थीं। ”बाबा विश्व नाथ, गंगा और गिरिजा” की तिकड़ी टूट चुकी थी। बिस्मिल्लाह खां जि़ंदा होते तो उनके लिए बनारस में जीने की एक वजह आज कम हो गयी रहती।

बीते दिनों कई फ़नकार हमारे बीच से गये। जगह खाली होती रही। गिरिजा देवी का जाना एक बड़े-से खोखल का अचानक पैदा हो जाना है। उस खोखल में कुछ चीज़ें रह-रह कर चमकती हैं। गूंजती हैं। मसलन, उनके करीने से संवारे हुए झक सफेद केश। बिलकुल एमएस सुब्बु लक्ष्मी के जैसे। उनकी अलग से दमकती लौंग। बिलकुल बेग़म अख़्ंतर के जैसी। गाते वक्त उनकी मुख-मुद्रा की दृढ़ता और स्वर के माधुर्य के बीच जो विपर्यय पैदा होता, ऐसा लगता कि यह तो उस्तााद बड़े गुलाम अली खां का हूबहू संस्करण है। वे जब बीच में गायन रोक कर समझाती थीं, तो ऐसा लगता था गोया पूरी दुनिया उनकी शागिर्द है और वे प्राइमरी की मास्टर।

यह कला में आस्था से उपजा ‘कनविक्शन’ था। इसी ने उन्हें गढ़ा था। इसी कनविक्शन ने बेग़म अख़्तर को भी गढ़ा। शादी के बाद दोनों का निजी जीवन बहुत त्रासद रहा था। उस दौर में जबकि औरतों का सार्वजनिक रूप से गाना ठीक नहीं समझा जाता था, गिरिजा देवी ने एक परंपरागत हिंदू परिवार की बेडि़यों से कैसे मोलभाव किया होगा, यह केवल सोचा ही जा सकता है।

आम तौर से हम लोग जब किसी कलाकार के बारे में बात करते हैं तो उसकी कला तक खुद को सीमित कर लेते हैं। अमूमन श्रद्धांजलि देना कलाकार की उपलब्धियों को गिनवाने का पर्याय बन जाता है। कम ही देखा जाता है कि उसकी कला के अलावा पूरी की पूरी जिंदगी ही अपने आप में एक उपलब्धि हो सकती है। कलाकार की पृष्ठभूमि पर बात करना तो लगभग वर्जित ही हो चला है।

ऐसे में यह बताया जाना ज़रूरी है कि गिरिजा देवी के पिता भले रसिक रहे हों, लेकिन वे बनारस के जिस परिवार और बिरादरी से आती थीं वह बनारस घराने की ब्राह्मणवादी परंपरा का प्रतिनिधि नहीं था। वह याचक नहीं था। वह शासक था। कहने को तो पूरब अंग के प्रतिनिधि छन्नूलाल मिश्र भी हैं, लेकिन उन्हें  आज तक शास्त्रीय परंपरा में रामकथा वाचक से आगे की शोहरत नहीं मिल पाई तो इसकी वजह जातीयता की जड़ों में है।

संगीत समाजशास्त्रीय विवेचन के बगैर अधूरा है। ये बातें स्मृतिशेष में वर्जित मानी जाती हैं, लेकिन गिरिजा देवी के गायन में मुख-मुद्रा की ठसक और कालांतर में पति के निधन के बाद कृष्ण पक्ष की ओर उनका रुझान समझने के लिए ज़रूरी हैं। उन्हें ऐसे ही ‘क्वीन ऑफ ठुमरी’ नहीं कहते। जिस खूबसूरती से वे झूले में बंदिश और ठुमरी की मुर्कियों को निभाती थीं, कोई सहज ही प्रश्न कर सकता है कि उन्होंरने आरंभिक जीवन में खयाल गायकी को क्यों नहीं अपनाया। वास्तरव में बार-बार उनसे यह सवाल पूछा गया है। इसका जवाब बनारस घराने की ब्राह्मणवादी परंपरा से विक्षेप में है। इस पर आगे भी बातें होती रहेंगी।

वे कलकत्ता में रहकर बनारस में एक अदद संगीत अकादमी खोलने के प्रयास में जुटी रहीं। सरकार ने बरसों जमीन नहीं दी। आज भी कोशिश चल रही है। बनारस से उनका प्रेम भाव कभी रत्ती भर कम नहीं हुआ। हां, इस बार कुल 22 साल बाद वे संकटमोचन संगीत समारोह में हिस्सा लेने आई थीं। यह अपने आप में दर्ज की जाने वाली बात है। कुल दो दशक से ज्यादा वक्त तक वे इस पारंपरिक आयोजन से दूर रहीं। यह केवल छह महीने पहले की बात है। रह-रह कर सवाल उठता है कि क्यां उन्हें अपनी रुख़सती का इल्म  हो गया था?

वे अपनी पीढ़ी की आखिरी फ़नकारा थीं जो रसूलन बाई, सिद्धेश्वरी देवी और बेग़म अख्तर की विरासत को अपने भीतर संजोए हुए थीं। जिनके भीतर एमएस सुब्बु लक्ष्मी के भी दर्शन होते थे। जिनके स्वर में राम नहीं, कृष्ण पक्ष हावी था। जहां बनारस घराने के ब्राह्मणवाद की याचना नहीं थी, ठसक थी। वह ठसक, वह टनकार, एक अफ़सोस की तरह अब रसिकों के दिलों में पैबस्त, है। वे कलकत्ता, से आखिरी बार बनारस आ रही हैं। कभी न लौटने के लिए। इस ढहते हुए प्राचीन शहर में एक संगीत अकादमी का खुल जाना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

अभिषेक श्रीवास्तव अपनी पत्रकारिता और अपनी सरोकारी प्रतिबद्धता के लिए जाने जाते हैं. सम्पर्क: 8800114126

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बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए…

‘ठुमरी की रानी’ के रूप में आदर प्राप्त शास्त्रीय संगीत गायिका गिरिजा देवी का मंगलवार रात करीब 9 बजे कोलकाता में दिल का दौरा पड़ने से 88 साल की उम्र में निधन हो गया। पिछले कई दिनों से उनका इलाज बीएम बिड़ला नर्सिंग होम में  चल रहा था।

पद्मविभूषण गिरिजा देवी का जन्म 8 मई, 1929 को वाराणसी में हुआ था। गायकी के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें वर्ष 1972 में पद्मश्री, वर्ष 1989 में पद्मभूषण और वर्ष 2016 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। उन्हें संगीत नाटक अकादमी द्वारा भी सम्मानित किया गया था।

बनारस घराने की परंपरा को अपनी गायिकी से समृद्ध करने वाली गिरिजा देवी को लोग प्यार से अप्पा कहकर बुलाया करते थे। शास्त्रीय संगीत,  खासकर ठुमरी गायन को परिष्कृत करने और इसे लोकप्रिय बनाने में अप्पा ने  बहुत बड़ी भूमिका निभाई।



नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर उनके निधन पर शोक जताया. पूरा देश उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दे रहा है.
बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए, रस के भरे तोरे नैन आदि के उल्लेखनीय गीत हैं.

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विवाह नाबालिग लड़की से बलात्कार का लाइसेंस नहीं है

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प्रमोद मीणा


एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, मानविकी एवं भाषा संकाय, महात्मा  गाँधी केंद्रीय विश्वाविद्यालय, मोतिहारी. सम्पर्क: –7320920958, pramod.pu.raj@gmail.com,

जनता के द्वारा लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकारें भीड़ के दबाव में या वोट बैंक की राजनीति के चलते अथवा अपनी पुंसवादी धार्मिक तुष्टिकरण की नीति के चलते बहुधा कानून बनाते समय उसमें कुछ ऐसे छिद्र रख देती हैं जिनसे होकर आगे चलकर अपराधी तत्व  कानून की पेचीदगियों और अंतर्विरोधों का फायदा उठाकर कानून के शिकंजे से साफ बच निकलते हैं। इस प्रकार सरकारें प्रगतिशीलता का दिखावा करते हुए भी यथास्थितिवादी बनी रहती हैं। बलात्कार से संबंधित भारतीय दंड संहिता के अनुच्छेद 375 में दी गई छूट संख्या् 2 इसी प्रकार का एक कानूनी अंतर्विरोध रहा है जिसके चलते 15 से 18 साल के बीच की नाबालिग लड़की के पति को अपनी पत्नी की बिना सहमति के भी उसके साथ यौन संसर्ग करने की व्यापक छूट और अधिकार प्राप्त था जबकि अनुच्छेद 375 स्वयं यह कहता है कि 18 से कम साल की लड़की के साथ दैहिक संबंध बनाना संविधिक रूप से बलात्कारर की श्रेणी में परिगणित किया जाएगा, चाहे इसप्रकार के संबंध में लड़की की सहमति हो या न हो। बाल अधिकारों और किशोरियों के यौन उत्पीाड़न के खिलाफ सक्रिय मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के द्वारा बार-बार कानून की इस विसंगति को उठाने के बाद भी केंद्र में बैठी सरकारें बाल विवाह के नाम पर किशोर वधुओं की देह के साथ होने वाले खिलवाड़ पर रोक लगाने के लिए कानून की इस कमी को दूर करने को तैयार न हो पाती थीं। किंतु 11 अक्टूबर को आए सर्वोच्च न्यायलय के दो न्यायधीशों मदन बी. लोकुर और दीपक गुप्ता की पीठ के एक निर्णय ने अंतत: दशकों पुरानी इस कानूनी विसंगति को दूर करके नाबालिग लड़कियों के साथ होने वाले दैहिक उत्पीड़न और बलात्कार पर रोकथाम लगाने वाले विभिन्न कानूनों के बीच एकसूत्रता भी ला दी है जिसके लिए लंबे समय से मानवाधिकार कार्यकर्ता संघर्षरत थे।कुल 127 पृष्ठों के अपने पृथक-पृथक निर्णयों में दोनों न्यायधीशों ने स्वेयंसेवी संगठन इंडिपेंडेंट थॉट द्वारा अनुच्छेद 375 में दी गई छूट को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए अपने निर्णय में स्पष्ट  किया है कि एक आदमी के द्वारा 18 वर्ष से कम आयु की अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाना बलात्कार है। अदालत ने अपने निर्णय में रेखांकित किया है कि किसी बालिका के मानवाधिकारों की उपेक्षा नहीं की जा सकती चाहे वह विवाहिता हो या अविवाहिता हो। उसके मानवाधिकारों को हमें स्वीकारना ही होगा। अदालत ने अपने निर्णय में कहा है कि अनुच्छेद 375 में प्रदत्त छूट संख्या 2 का अर्थ अब यही लगाना चाहिए कि किसी पुरुष के द्वारा 18 साल से ज्यादा उम्र की अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाना या यौन कृत्‍य करना बलात्कार नहीं है।

15 साल की उम्र से ऊपर की पत्नी के साथ अनुच्छेद 375 में पति को यौन संसर्ग की जो छूट मिली हुई थी, उस 15 साल वाली जादुई संख्या के रहस्य का खुलासा करते हुए अपने निर्णय में न्यायधीश दीपक गुप्ता ने कहा है कि इसका कारण कानून के इतिहास में 1940 तक पीछे निहित है। 1940 में यौन संसर्ग में लड़की द्वारा सह‍मति व्यक्त‍ करने की न्यूनतम उम्र 16 साल और विवाह की न्यूनतम उम्र 15 साल हुआ करती थी अत: उस समय छूट विषयक धारा में विवाह अंतर्गत पत्नी  के साथ यौन संबंध बनाने की न्यूनतम उम्र भी 15 साल थी। 1975 में यौन संसर्ग पर सहमति देने की न्यूनतम उम्र 16 साल और विवाह की न्यूनतम उम्र 18 साल कर दी गई किंतु छूट विषयक उम्र 15 साल ही रह गई। आज जब सहमति और विवाह की न्यूनतम उम्र, दोनों 18 साल हैं तब भी छूट विषयक उम्र की सूई 15 साल पर ही अटकी हुई है। स्पष्ट है कि छूट की इस उम्र सीमा को भी विवाह की न्यू नतम उम्र के तुल्य करना आवश्यक था।

18 साल से कम उम्र की लड़की को भारतीय कानून में नाबालिग माना गया है अत: विवाह होने से उसकी नाबालिगीयत की संविधिक स्थिति में कोई अंतर नहीं आ जाता और इसीलिए यौन संबंधों में उसकी इच्छा और सहमति का बहाना किसी पुरुष को बलात्कार के अपराध से मुक्त नहीं कर सकता चाहे वह पुरुष उसका पति ही क्यों न हो। किंतु सर्वोच्च अदालत के इस निर्णय से पहले पति नाम के इस प्राणी को 15 साल से ज्यादा और 18 साल से कम उम्र की अपनी नाबालिग पत्नी के साथ दैहिक संसर्ग करने पर भी बलात्कार के अभियोग से बाहर रखा गया था। स्पष्ट है कि बलात्कार को अपराध ठहराने वाली भारतीय दंड संहिता के अनुच्छेद 375 में दी गई छूट संख्या  2 के कारण 15 से 18 साल के बीच की किशोर पत्नियाँ एक व्यक्ति के रूप में वैवाहिक जीवन में अपना कोई अस्तित्व नहीं रखती थीं। पति को अपनी इस नाबालिग पत्नी को वस्तु मान अपनी काम वासना संतुष्ट करने की पूर्ण अनुमति बलात्कार विषयक कानून में प्रदत्त यह छूट दे रही थी। अत: सर्वोच्च  अदालत ने अपने निर्णय में बिल्कुल ठीक कहा है कि 18 साल से कम उम्र की बालिकाएँ उपभोक्ता वस्तुएँ नहीं हैं जिन्हें अपनी ही देह को लेकर ना कहने का अधिकार न हो। उन्हें भी यौन संसर्ग को ना कहने का अधिकार है।



 न्यायधीश लोकुर ने अनुच्छेद 375 द्वारा प्रदत्त छूट संख्या 2 की विसंगति को अन्यायपूर्ण घोषित करते हुए लिखा है कि एक अविवाहित लड़की अपने साथ बलात्कार करने वाले पुरुष के खिलाफ अदालत में बलात्कार के अपराध का अभियोग लगा सकती है जबकि 15 से 18 साल तक की विवाहिता लड़की अपने पति द्वारा किये जाने वाले बलात्कार के खिलाफ इसप्रकार का अभियोग तक नहीं लगा सकती। शेक्सपीयर की प्रसिद्ध दार्शनिक उक्ति –‘एक गुलाब को किसी भी नाम से पुकारा जाए, वह सदैव सुगंध ही देता है’ में व्यंजित शाश्वत सत्य‘ को उद्धृत करते हुए न्यायधीश लोकुर निर्णय में कहते हैं कि एक बच्चा सदैव बच्चा ही रहता है चाहे वह बच्चा गली का बच्चा हो या एक परित्यक्त‘ बच्‍चा हो या दत्तक बच्‍चा हो।इसीप्रकार एक बालिका, बालिका ही रहती है चाहे वह एक विवाहिता बालिका हो या अविवाहिता बालिका हो,चाहे तलाकशुदा बालिका हो या पति द्वारा परित्य क्त बालिका हो या विधवा बालिका हो। मतलब यह हुआ कि किसी भी प्रकार का उपसर्ग कानून की नज़र में बालक या बालिका को नाबालिग से बालिग नहीं बना सकता। स्प्ष्ट है कि भारतीय दंड संहिता के अनुच्छेद 375 में विवाहित नाबालिग लड़की और अविवाहित नाबालिग लड़की के बीच जो विभेद किया गया था, वह गैर तार्किक था। अदालत ने भी अपने निर्णय में विवाहित लड़की और अविवाहित लड़की के इस भेद को अनावश्यक और कृत्रिम बताया है। इस अनुच्छेद में बलात्कार के मामले में नाबालिग पत्नी के पति को दी गई छूट अपनी देह पर नाबालिग विवाहिता लड़की के अधिकार को मान्येता नहीं देती थी और न ही पुनरुत्पादन के निर्णय को लेकर ऐसी अवयस्क विवाहिता लड़की की इच्छा  या अनिच्छा का कोई सम्मान करती थी। वास्तन में अनुच्छेद 375 अंतर्गत प्रदत्त छूट संख्या 2 के समर्थक विवाह के नाम पर होने वाली छोटी-छोटी बच्चियों के बलात्कार और मानव तस्करी के यथार्थ के प्रति जाने-अनजाने आँखें मूँद लेते हैं.


सर्वोच्च अदालत के वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने एक स्वर से इसे एक प्रगतिशील कदम बताया है। सर्वोच्च अदालत द्वारा भारतीय दंड संहिता में विद्यमान बलात्कार के इस कानून की दूर की गई विसंगति के परिणाम कानूनी क्षेत्र में दूर तक जाएँगे। इस निर्णय से अब बलात्कार को लेकर बनाये गये दंड संहिता के अनुच्छेद 375 के अंतर्गत भी बालक-बालिका होने को परिभाषित करने वाली उम्र बाल संरक्षण विषय अन्य कानूनों में निर्धारित उम्र के सममुल्य  हो गई है। बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 ; यौन अपराधों से बच्चों की सुरक्षा अधिनियम, 2012 और किशोर न्याय अधिनियम, 2011 जैसे तमाम बाल संरक्षण के नियमों में 18 साल से कम उम्र के हर शख़्स को बालक-बालिका की परिभाषा में रखा गया है। इस निर्णय ने बाल विवाह के स्वत: ही अमान्य हो जाने और उसके पूर्णत: निषेध का रास्ता खोल दिया है।इस निर्णय का एक त्वरित परिणाम यह निकलेगा कि जो युग्म् पहले से बाल विवाह की परिधि में हैं, उन्हें  पत्नी  के 18 साल की उम्र प्राप्त करने तक पृथक-पृथक रहना होगा ताकि वे कानूनी झमेले से स्वयं को बचा सके। भविष्य् में यह निर्णय बाल विवाह पर रोक लगाने की दिशा में महत्पूर्ण अवरोधक साबित होगा क्योंकि यह निर्णय सीधे-सीधे पति को बलात्कार का दोषी बना देता है।

बाल विवाह निषेध अधिनियम में बाल विवाह प्रतिबंधित अवश्य  है किंतु इस कानून के अंतर्गत इसप्रकार का विवाह स्वत: अमान्य नहीं हो जाता। वर्तमान कानून में विवाह को अदालत से अमान्य साबित कराने का आधार है – बच्चे को संरक्षकों के परिक्षण से दूर करके धोखे से विवाह बंधन में बांधना अथवा मानव व्या्पार  के उद्देश्य से विवाह के नाम पर बच्चे को बेचा जाना।  इसप्रकार के विवाह को अमान्य घोषित करवाने के लिए पति-पत्नी, दोनों में से किसी एक पक्ष को अदालत में अपील करनी होती है किंतु व्यवहार्य में बालिका वधू को ही अदालत का दरवाजा खटखटाना होता है। इसके लिए उसे वयस्कसता की उम्र प्राप्ति के दो साल के अंदर इसप्रकार के विवाह की मान्यता को रद्द करवाने के लिए अदालत की शरण लेनी होती है। बाल विवाह को स्वत: अमान्य न करार दिये जाने को लेकर सर्वोच्च अदालत की पीठ ने अपने इस निर्णय में बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006की आलोचना भी की है।

बाल विवाह की विकरालता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य  सर्वेक्षण-Ⅲ के आंकड़ों के अनुसार 18-29 आयु वर्ग की 46 प्रतिशत महिलाओं की हमारे देश में शादी 18 साल की उम्र से पहले हो चुकी थी। इसीप्रकार 2011 की जनगणना के मुताबिक उस साल लगभग 49.5 लाख भारतीय लड़कियाँ 18 साल से कम उम्र की थीं और उनका विवाह हो चुका था। नाबालिग लड़कियों की कुल संख्या में से विवाहिता नाबालिग लड़कियों के अनुपात की दृष्टि राजस्थान का पहला स्थान था जबकि मिजोरम में यह अनुपात सबसे कम था। लड़कियों की साक्षरता और शिक्षा की दृष्टि से फिसड्डी राज्यों  में शुमार होते रहे राजस्थान में बाल विवाह का इतना ज्यादा प्रचलन अशिक्षा और बाल विवाह के बीच सीधा-सीधा संबंध व्यंजित कर देता है। इस संदर्भ में किसी धर्म विशेष को बाल विवाह के लिए जबावदेह नहीं ठहराया जा सकता। मुसलिमों से पूर्वाग्रह रखने वाली कुछ हिंदुत्ववादी ताकतें मुसलिम धर्म के ऊपर बाल विवाह की इजाजत देने के आरोप लगाती हैं किंतु यथार्थ यह है कि भारत के सभी धर्मालंबियों में एक समान रूप से बाल विवाह का प्रचलन मिलता है। श्रीनिवासन रमानी और विग्नेश राधाकृष्णन द्वारा संकलित आंकड़ों से पता चलता है कि हमारे यहाँ सभी धर्मालंबियों के यहाँ लगभग 2 प्रतिशत लड़कियों का विवाह बालिग होने की उम्र से पहले ही कर दिया जाता है।गामीण क्षेत्र में चार में से एक लड़की और शहरी इलाकों में पाँच में से एक लड़की 18 साल की होने से पहले ही बियाह दी जाती है। बालिग होने से पूर्व ही लड़कियों का विवाह कर दिया जाना बाल मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन का हेतु साबित होता है। बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराई के कारण लड़कियों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य   पर बड़ा घातक प्रभाव पड़ता है। कम उम्र में विवाह हो जाने से शिक्षा प्राप्त् करने और अपने व्यक्तित्व का विकास करने के अवसर लड़कियों के हाथ से छिन जाते हैं।अपनी ही देह पर उनका नियंत्रण नहीं रहता और जीवन के तमाम पहलुओं में वे पति और पति के घरवालों के अधीन हो जाती हैं।


अत: अदालत द्वारा अपने निर्णय में इस बात पर चिंता जाहिर करना वाजिब है कि बाल विवाह निषेध अधिनियम अंतर्गत विवाह विलोपन को लेकर अभियोगों की संख्याा बहुत ही कम हैं।अपने निर्णय में न्या यधीश गुप्ताय लिखते हैं कि वे इस भयावह यथार्थ से अनभिज्ञ नहीं हैं कि अधिकांश बाल वधुओं की उम्र 15 साल से भी कम हैं। उन्होंने देश के विभिन्नं हिस्सों में वय:संधि की उम्र से भी पहले छोटे बच्चों के विवाह पर खेद प्रकट किया है। ऐसे मासूम बच्चे तो विवाह का मतलब तक नहीं जानते। अस्तुि, परंपरा के नाम पर प्रचलित बाल विवाह पर लगाम लगाने में यह निर्णय निश्चय ही दूरगामी साबित होगा। इस संदर्भ में विभिन्न धर्मों के निजी कानून भी कोई अड़ंगा नहीं लगा पाएँगे क्यों कि अपराधिक दंड संहिता विषयक कानून धर्म और जाति विशेष की परंपराओं के नाम पर सीमित नहीं किये जा सकते। इसीप्रकार विशेषज्ञों के अनुसार वैवाहिक संबंधों में होने वाले बलात्कार को आपराधिक कृत्या ठहराने और उस पर निषेधात्मक कानून बनाने की नारीवादी मुहिम को भी अब ज्यादा बल मिलेगा।


किंतु भारत सरकार सर्वोच्च अदालत द्वारा अनुच्छेद 375 में प्रदत्त छूट संख्या 2 की विसंगति को दूर किये जाने के पक्ष में नहीं रही है। और इस मामले को लेकर पिछली यूपीए और वर्तमान एनडीए सरकार में अद्भुत मतैक्य  दिखाई देता है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के हर निर्णयको पलटने की जिद पर अड़ी वर्तमान मोदी सरकार ने इस मामले में मनमोहन सिंह सरकार द्वारा फरबरी, 2014 में अदालत में प्रस्तु्त पुराने शपथपत्र को ही एक बार फिर ज्यों का त्यों  प्रस्तुकत करते हुए बाल विवाह की परंपरा का हवाला देते हुए अनुच्छेद 375 में प्रदत्त छूट को न हटाने का अनुरोध किया था। सरकार का कहना था कि नाबालिग बच्चों  के विवाह की परंपरा भारत के सभी सामाजिक समूहों में प्रचलित है अत: नाबालिग पत्नी के साथ पति द्वारा बनाये दैहिक संबंध को बलात्कार पर की संज्ञा देना और इसप्रकार बाल विवाहों को पूर्णत: अमान्य   ठहराना अनुचित है। कुछ साल पहले नोबेल पुरस्कार प्राप्त कैलाश सत्यार्थी के स्वसयंसेवी संगठन ‘बचपन बचाओ’ ने जब अनुच्छेद 375 में प्रदत्त  छूट संख्या 2 की वैधानिकता पर पुनर्विचार के लिए अदालत से गुजारिश की थी तब इस मुद्दे को लेकर सरकार के दो मंत्रालय तक आमने-सामने खड़े दिखे थे। वैसे केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने अनुच्छेकद 375 में प्रदत्तर छूट का परंपरा के नाम पर समर्थन करते हुए भी महिला और बाल विकास मंत्रालय को दिये अपने जबाव में अदालत के निर्देशों का सम्मान करने की बात कही थी। अदालत में केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुंत शपथपत्र में अनुच्छेद 375 में प्रदत्त् छूट को जैसे तैसे वैधानिकता देने के यथास्थितिवादी प्रयास की निंदा करते हुए न्या्यधीश लोकुर ने कहा है कि केंद्र सरकार को 15 से 18 साल की उम्र के बीच में बियाह दी जाने वाली लड़कियों की यंत्रणा को नहीं भुलाना चाहिए। अदालत के समक्ष प्रस्तु्त अपने शपथ पत्र में अनुच्छेद 375 में प्रदत्त छूट के पक्ष में केंद्र सरकार का तर्क था कि विधायिका ने बाल विवाह के व्यापक प्रचलन के मद्देनज़र बाल विवाह की पूर्णता के द्योतक यौन संसर्ग को अपराध घोषित किये जाने को युक्तियुक्ते नहीं पाया था। किंतु अदालत इस तर्क से संतुष्ट नहीं हुई और उसने अपने निर्णय में कहा कि अपने पति के साथ यौन संसर्ग से इनकार करने के नाबालिग पत्नीे के अधिकार को अनुच्छेद 375 में प्रदत्त् छूटसंविधिक रूप से अस्वीधकृत कर देती है। स्पष्ट है कि यह छूट नाबालिग पत्नी  के मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन साबित हो रही थी। और यही कारण था कि अदालत अपने निर्णय में इस निष्कर्ष पर पहुँची कि अपनी नाबालिग पत्नी के साथ यौन संसर्ग करने का अपराधी साबित होने पर पति को बलात्कार के लिए दंडित किया जाएगा। अस्तु, सर्वोच्च‍ अदालत के इस निर्णय ने गेंद केंद्र सरकार के पाले में डाल दी है और अब यह सरकार के ऊपर है कि वह इस निर्णय को एक स्वर्णिम अवसर के रूप में ले और बाल विवाह के कलंक और लज्जा  से देश को मुक्त करे।

बच्चों और महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष कार्यकर्ताओं ने अदालत के इस निर्णय की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है किंतु इसके क्रियान्वयन को लेकर अपनी चिंताएँ भी मीडिया के साथ साझा की हैं। और इन चिंताओं को खारिज भी नहीं किया जा सकता विशेषत: तब जब स्वयं केंद्र सरकार बाल विवाह के व्यापक यथार्थ का तर्क देकर बाल विवाह अंतर्गत दैहिक संसर्ग को वैध ठहराने और उसे बलात्का्र के दायरे से बाहर रखने का अनुरोध अदालत के समक्ष प्रस्तुत अपने हलफनामे में करती हो। बाल विवाह निषेध अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन से पीछे हटती रही केंद्र और राज्ये सरकारों से कोई ज्याुदा उम्मीद भी हम नहीं कर सकते।

लड़कियों की साक्षरता और स्त्री  सशक्तिकरण के माध्यम से ही अदालत के इस निर्णय के क्रियान्वंयन की सफलता सुनिश्चत की जा सकती। स्वयं लड़कियों और स्त्रियों की पहल ही अदालत के इस निर्णय की रोशनी में बाल विवाह और नाबालिग पत्नियों पर होने वाले बलात्कारों पर अंकुश लगा सकती है।अदालत के इस निर्णय की किंचित नकारात्मक परिणतियों का समाहार भी किया जाना अपेक्षित है। भारतीय दंडसंहिता के मुताबिक किसी भी अपराध की सूचना देना अनिवार्य है और अब अदालत के निर्णय के बाद 15 से 18 साल की नाबालिग पत्नीे के साथ यौन संबंध बलात्कारर की श्रेणी में आएगा अत: सुरक्षित प्रजनन और अन्यण स्वास्थ्य  सेवाओं की जरूरत पड़ने पर भी परिवार के टूटने के डर से नाबालिग पत्नी् को समुचित चिकित्सा सेवाएँ नहीं मिल पाएँगी। पति को बलात्कार के आरोप से बचाने के लिए स्वयं नाबालिग पत्नी ही वैकल्पिक चिकित्सा  पर निर्भर होने को मजबूर हो जाएगी। इसप्रकार परोक्ष रूप से अदालत का यह निर्णय नाबालिग पत्नियों के स्वास्थ्य   के साथ समझौते को बढ़ावा देने वाला साबित हो सकता है। इस समस्या  के निराकरण के लिए और नाबालिग पत्नी और उसके पति को होने वाली अनावश्यक कानूनी समस्याओं के समाधान हेतु यह प्रावधान किया जा सकता है कि पति द्वारा 15 से 18 साल की अपनी पत्नी केसाथ स्थाापित किये जाने वाले यौन संबंधों की शिकायत करने का अधिकार तृतीय पक्ष को न दिया जाए। सिर्फ पीड़ि‍त पक्ष को अर्थात नाबालिग पत्नी  को ही पति के खिलाफ अनुच्छे।द 375 के तहत बलात्कार की शिकायत का अधिकार दिया जाना चाहिए। वैसे पत्नी के नाबालिग होने के कारण तृतीय पक्ष को इसप्रकार के बलात्कार की सूचना पुलिस को दिये जाने की छूट दी जा सकती है। और हमें यह भी याद रखना चाहिए कि 15 से 18 साल की आयु वाली लड़कियों से विवाह करने वाले समस्ती पुरुषों विशेषत: नाबालिग लड़कों को बलात्कार का आरोपी ठहराकर अदालत में उन पर आपराधिक अभियोग चलाना न तो संभव है और न वांक्षित। अत: अदालत द्वारा अनुच्छेद 375 में प्रदत्त छूट रद्द कर दिए जाने के बाद भी 15 से 18 साल की विवाहित लड़कियों के पतियों के खिलाफ दायर बलात्कार के अभियोगों की सुनवाई में अदालतों को अपने विवेक से काम लेना होगा। बाल विवाह एक सामाजिक बुराई है और मात्र कानून बनाकर उसे खत्म नहीं किया जा सकता। इसके लिए तो जन जागरण और सामाजिक आंदोलन अपेक्षित है। बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतिश कुमार द्वारा की गई पहल इस संदर्भ में प्रशंसनीय है। आज समय बदल चुका है अत: समय के साथ कदमताल मिलाते हुए बाल विवाह जैसी पिछड़ी परंपराओं का खात्मा भी जरूरी हो चुका है। मात्र कानून बनाने से कुछ नहीं होगा, कानून के समुचित क्रियान्व़न हेतु प्रशासन को अपनी मानसिकता भी बदलनी होगी। अदालत ने एक रास्ता दिखा दिया है, अब इस पर चलना तो हम सभी को है।

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यौन उत्पीड़क प्रोफेसरों की जारी सूची पर छिड़ा विवाद: जेएनयू, डीयू सहित 33 बड़े संस्थानों के 61 प्रोफेसर सूची में

अमेरिका स्थित एक स्त्रीवादी भारतीय वकील राया  सरकार ने उन शिक्षाविदों के नामों की सूची  अपने  फेसबुक पेज पर डाली है, जिनपर उनकी विद्यार्थियों ने यौन उत्पीडन का आरोप लगाया है. यह सूची राया सरकार ने सोशल मीडिया में #MeToo कैम्पेन के बाद जारी की है. राया ने यह सूची पीड़िताओं द्वारा उन्हें बताये गये नामों के आधार पर बनायी है, पीड़िताओं ने उन्हें अपने उत्पीड़क के नाम मेसेज किये थे, विवरण के साथ .

हालांकि इस सूची के जारी होने के बाद कई भारतीय स्त्रीवादियों ने लोगों के नामों की सूची जारी करने की निंदा करते हुए काफिला पर एक वक्तव्य जारी किया. आयशा किदवई, जानकी नायर, कविता कृष्णनन, नंदिनी राव, निवेदिता मेनन ,वृंदा ग्रोवर सहित कई अकादमिक जगत से जुड़ी और उसके बाहर की अन्य स्त्रीअधिकार की कार्यकर्ताओं ने इस सूची की निंदा करते हुए कहा कि हमने जो एक लम्बे दौर से  कार्य स्थलों पर  यौन उत्पीडन  की शिकायत के लिए एक  व्यवस्था बनायी है, उसे ऐसे प्रयासों से नुकसान होगा. यह न्याय के ‘प्राकृतिक सिद्धांत’ के भी खिलाफ जाता है.

हालांकि इस निंदा के विपक्ष में भी लोगों ने तर्क दिये हैं कि ‘यह एक कुलीन बचाव और एकता है.’ उनका सवाल है कि यदि ऐसे ही नाम यदि ‘उबर ड्राइवर या अन्य गैरकुलीन पेशों के आते तो क्या निंदा जारी करने वाली स्त्रीवादियों के तर्क यही होते.

वे प्रोफेसर जिनके नाम राया सरकार ने जारी किये
1). दीपेश चक्रवर्ती, जादवपुर , 2)  कनक सरकार, जादवपुर , 3) प्रसन्ना चक्रवर्ती, दिल्ली विश्वविद्यालय, अंग्रेजी विभाग, 4) पार्थ चटर्जी, राजनीतिक सिद्धांतवादी और इतिहासकार, 5) नेड बर्टज़, हवाई विश्वविद्यालय / अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली, इतिहास विभाग, 6) मानस रे, सीएसएसएस कलकत्ता,7) प्रदोष  भट्टाचार्य, जादवपुर विश्वविद्यालय, जूडई, 8) बिद्युत  चक्रवर्ती, डीयू राजनीतिक विज्ञान विभाग, 9) राजर्षि दासगुप्ता, सीपीएस, जेएनयू, 10) कौशिक रॉय, जादवपुर विश्वविद्यालय, जुदेपिस, 11) सुमित कुमार बरुआ, जादवपुर विश्वविद्यालय, जेयूसीएल, 12) निलानंजन दत्ता, फिल्म और टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई) एडिटिंग विभाग, 13) संदीप चटर्जी, निर्देशन विभाग एफटीआईआई, 14) मितुल बरुआ, अशोक विश्वविद्यालय, 15) आर.सी. नटराजन, पूर्व निदेशक, ग्रामीण विकास आनंद संस्थान (आईआईआरएएमए), गुजरात, 16) अली अहमद इद्रसी, दिल्ली यूनिरेविटी, 17) पार्थ मुखर्जी, सेंट जेवियर्स कॉलेज, कोलकाता, 18) श्यामल कर्मकार, एचओडी ऑफ एडिटिंग , सत्यजीत रे फिल्म और टेलीविज़न इंस्टीट्यूट (एसआरएफटीआई), 1 9) श्यामल सेनगुप्ता, पूर्व एचओडी उत्पादन, एसआरएफटीआई, 20) शुभराध चौधरी, एसआरएफटीआई, डायरेक्शन डिप्टी
21) अर्ल नंबी, शिक्षक, परमाणु ऊर्जा उच्च माध्यमिक केंद्रीय विद्यालय, कुडनकुलम, टीएन। (तमिल कवि और लेखक), 22) सोम बोस, टेरी विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, अर्थशास्त्र विभाग, 23) अभिजीत गुप्ता, जादवपुर विश्वविद्यालय, 24) मृदुल बोस, जादवपुर विश्वविद्यालय, 25) अमित अब्राहम, प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक, स्कॉटलैंड चर्च कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल कोलकाता।, 26) गोपाल बालकृष्णन, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के सांताक्रूज और न्यू बाएं रिव्यू, 27) अंकुर बरुआ, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, 28) अनुप धर, अम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली (एयूडी)
2 9) अशोक नागपाल, एयूडी, 30) विक्र मित्रा, एयूडी, 31) बेंजामिन  जचिर्या, प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी, कलकत्ता / ट्राएर विश्वविद्यालय, जर्मनी, 32) विश्वजीत चटर्जी, जादवपुर विश्वविद्यालय, अर्थशास्त्र विभाग, 33) रवीन्द्र सेन, जादवपुर विश्वविद्यालय, अंतर्राष्ट्रीय संबंध विभाग, 34) भास्कर मोइत्रा, जादवपुर विश्वविद्यालय, अर्थशास्त्र विभाग
35) सागर नाइक, डी वाई पाटिल यूनिवर्सिटी, आतिथ्य और पर्यटन [भावनात्मक रूप से और शारीरिक रूप से लड़ रहे पुरुष छात्र, 36) खालिद वासिम, तिस तुलजापुर, 37) स्वर्गीय एमएसएस पांडियन, 38) सुरिंदर एस जोधका, जेएनयू, 39) कानव गुप्ता, दिल्ली विश्वविद्यालय, 40) परशुरा सिंह, यूसी रिवरसाइड, 41) लॉरेंस लिआंग, एयूडी, 42) अर्घ्य बसु, पूर्व संकाय एफटीआईआई, दस्तावेजी फिल्म निर्माता, 43) जयंत धूपकर, ईएफएलयू, हैदराबाद, 44) बी एन रे, पूर्व उपराष्ट्रपति, रामजास कॉलेज, डीयू, 45) जॉयदेव चोटापाध्याय, आईएसआई कोलकाता, 46) बिलाल आबिद, निफ्ट दिल्ली, 47) गौतम चक्रवर्ती, दिल्ली विश्वविद्यालय, अंग्रेजी विभाग. 48) पप्पू वेणुगोपाल राव, संगीत अकादमी मद्रास. 49) ईश मिश्रा, हिंदू कॉलेज, डीयू, 50) कौशिक बसु, एनएलएसआईयू बैंगलोर, 51) देवमालिया चटर्जी, ज्यू प्रोडक्शन इंजीनियरिंग विभाग, 52) सरोज गिरि, दिल्ली विश्वविद्यालय, 53) दारा एस अमर, सेंट जॉन्स मेडिकल कॉलेज बैंगलोर, 54) पिता वर्गीज, मसीह विश्वविद्यालय
55) मिहिर भट्टाचार्य, फिल्म विभाग के संस्थापक और पूर्व एचओडी, जादवपुर विश्वविद्यालय [शिकायतकर्ता, एक पूर्व संकाय ने सार्वजनिक रूप से इस बारे में बात की, लेकिन मुझे धमकाने के बाद अपना नाम बंद करना चाहता था), 56) शिभाशिश बोस, ज्यू, आर्किटेक्चर विभाग, 57) अहमर अनवर, श्री वेंकटेश्वर कॉलेज, डीयू, 58) देबायुध चटर्जी, जूड, डीयू रिसर्च विद्वान, 59) शॉनवाज़ अली रेहान, ऑक्सफोर्ड के छात्र और प्रोफेसर नहीं बल्कि यौन उत्पीड़न, 60) एशले टेलिस, 61) प्रवीण, दुसाने एमईएस अबासाहेब गरवारे कॉलेज, पुणे

सोशल मीडिया में जारी यहां उन कॉलेजों की सूची दी गई है जहां कथित यौन उत्पीड़कों ने काम किया या काम करना जारी रखा है

1) जादवपुर विश्वविद्यालय, कोलकाता
2) दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
3) हवाई विश्वविद्यालय, होनोलूलू, हवाई (यूएस)
4) अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली (एयूडी)
5) सेंटर फॉर स्टडीज इन सोशल साइंसेज (सीएसएसएस), कोलकाता
6) जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), नई दिल्ली)
7) फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट (एफटीआईआई), पुणे
8) अशोक विश्वविद्यालय, सोनिपत, हरियाणा
9) ग्रामीण प्रबंधन आनंद संस्थान (आईआईआरएमए), गुजरात
10) सेंट जेवियर्स कॉलेज, कोलकाता
11) सत्यजीत रे फिल्म और टेलीविजन संस्थान (एसआरएफटीआई), कोलकाता
12) परमाणु ऊर्जा उच्च माध्यमिक केंद्रीय विद्यालय, कुडनकुलम, तमिलनाडु
13) टेरी विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
14) स्कॉटिश चर्च कॉलेज, कोलकाता
15) कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सांता क्रूज़
16) यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज
17) प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी, कलकत्ता
18) यूनिवर्सिटी ऑफ ट्राएर, जर्मनी
19) डी वाई पाटिल विश्वविद्यालय, मुंबई
20) टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस, ऑफ-कैंपस, तुलजापुर, उस्मानाबाद जिला, महाराष्ट्र
21) मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज, चेन्नई
22) कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, रिवरसाइड, कैलिफ़ोर्निया, संयुक्त राज्य अमेरिका
23) अंग्रेजी और विदेशी भाषाएं विश्वविद्यालय (ईएफएलयू), हैदराबाद
24) रामजास कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय
25) भारतीय सांख्यिकी संस्थान (आईएसआई), कोलकाता

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संसद के दोनो सदनों में महिला आरक्षण पर हुई बहस के साथ-साथ निशा शेंडे,शम्भु गुप्त, अस्मिता राजुरकर, अरविन्द जैन, सौम्या गुलिया, संजीव चंदन, एल, जे रुस्सुम, डा. अनुपमा गुप्ता, डा.पूरन सिंह, विपिन चौधरी, प्रतिमा, पूजा खिल्लन, संध्या नवोदिता आदि के लेख, रचनायें लतिका रेणु (फणीश्वरनाथ रेणु की पत्नी) से अनंत का साक्षात्कार, तथा महिला आरक्षण पर स्त्रीकाल द्वारा आयोजित राउंडटेबल की पूरी बातचीत शामिल है. अंक में अनुवाद डा. अनुपमा गुप्ता, पूजा सिंह और श्रीप्रकाश ने किये हैं।

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