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भगवान! ‘एक कटोरा भात खिला दो बस, भारत में भात नहीं मिला’

ज्योति प्रसाद

 शोधरत , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय. सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com

स्वर्ग और नरक के बीच भूखी बच्ची वहाँ भी फंस गयी, उम्र 11 साल. क्या पाप और क्या पुण्य उसी ने लिखा है आपके नाम एक खत. पुण्यआत्माओं, बहुत बोलने से थक गये हों तो पढ़ें इसे और हृदय हो तो रो लें.

मुझे नहीं पता कि मैं किस दरवाज़े पर खड़ी हूँ! धरती पर जब तक रही यही सुनने को मिला कि स्वर्ग और नरक दो जगहे हैं। मैं काफी थक गई हूँ। यहाँ दरवाज़े पर कोई नहीं है। मुझे यह भी नहीं मालूम कि जब यह दरवाजा खुलेगा तो नरक का होगा या स्वर्ग का। मेरी उम्र 11 बरस है। मेरा नाम संतोषी कुमारी है। पहले मैं धरती पर झारखंड में रहती थी। हाँ, वही जो भारतनाम के देश में है। वहाँ 100 स्मार्ट सिटी बनाने का काम ज़ोरों पर चल रहा है। लेकिन सच्ची बोलूँ, मुझे नहीं पता कि उस स्मार्ट सिटी में मेरी जगह थी भी या नहीं, यह मुझको नहीं मालूम। मुझे न बहुत सी बातें नहीं मालूम। लेकिन कुछ-कुछ मालूम है। अच्छा एक बात और बताऊँ, पिछले कुछ दिनों से माँ राशन लेने जब भी जाती थी खाली हाथ लौट आती थी। मुझे अच्छा नहीं लगता था। मुझे रोना आता था। मुझे बहुत भूख लगती थी। बहुत ज़्यादा। कोई कार्ड-वार्ड का चक्कर था। मुझे नहीं पता कि आधार क्या होता है। कुछ दिनों से स्कूल में भी दुर्गा पूजा की छुट्टियाँ पड़ गई थीं। मुझे अच्छा नहीं लगा था। छुट्टी पड़ जाने से स्कूल में भी खाना मिलना बंद हो गया था। न जाने ये दुर्गा पूजा क्यों आई थी?


अच्छा, ये दरवाजा खुल नहीं रहा। ज़रा और देर बैठ जाऊँ।… आप लोगों को बताऊँ कि मैं मरना नहीं चाहती थी। बचपन में भला कौन मरना चाहता है। 11 बरस की उम्र को लोग कहते हैं कि बच्चों की उम्र है। मुझे नहीं मालूम कि क्या सच है और क्या झूठ है। लेकिन मैं तो स्कूल से लौटकर माई के संग काम करवाती थी। माई अकेले थक जाती है न। वो भी क्या करे। उसे भी तो भात खाने को नहीं मिलता। वो कमजोर है। मैं भी तो कमजोर ही हूँ। सुबह स्कूल में प्रार्थना के समय खड़े होने पर मेरा सिर चकरा जाता था। आँखें बंद करने पर काले काले धब्बे दिखते थे। एक दिन मैं बेहोश होकर गिर भी गई थी। लेकिन तब भी मैं मरी नहीं। स्कूल के खाने में स्वाद नहीं होता था तब भी अच्छा लगता था। मुझसे भूख बर्दाश्त नहीं होती थी।

भूख लगने पर मानो जैसे पेट में बड़ी तेज़ आग लग जाती थी। छूने पर पेट गरम सा लगता था। बार-बार पानी पीने पर भी नहीं जाती थी। सिर के एक हिस्से में दर्द होता था। आँखों से दिखता भी नहीं था। कुछ भी अच्छा नहीं लगता था जब भूख लगती थी। हाथ पैर सुख रहे थे। और माई को यह चिंता होती थी कि मैं कमजोर हो रही थी। इसी बीच माई जब राशन लेने गई तब राशन वाले ने राशन देने से मना कर दिया। कहने लगा कि आधार कार्ड जुड़वा के लाओ। माई काम पर जाए या आधार कार्ड जुड़वाए। हमें तो पता भी नहीं था कि कैसे जुड़ेगा। पर राशन नहीं मिला।…ओह! भूख बहुत बुरी होती है। जब पेट में कुछ न हो तब कुछ अच्छा भी नहीं लगता। कुछ दिखता भी नहीं और सुनाई भी नहीं देता।



अच्छा मरने के बाद दिमाग बहुत बड़ा और किसी संत के दिमाग की तरह बन जाता है। देखो मैं बैठे बैठे क्या सोच रही हूँ। ऊपर होने पर सब कुछ दिखने लगता है। धरती की हर तरह की हलचल का पता चलता है। एक शांति सी है। फिलहल अभी भूख नहीं लग रही। पेट वाला हिस्सा गुब्बारे की तरह हल्का लग रहा है। हाँ, माई की याद आ रही है। लेकिन मैं तो अब मर गई हूँ, भूख से। एक रपट आई थी मेरे मरने के पहले। इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (IFPRI) वैश्विक भूख सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडेक्स) में भारत 100वें नंबर पर तरक्की कर गया है। पिछले साल यह 97वें था। कितनी गजब बात है कि नोट बंदी जैसे फैसले से आया हुआ काला धन होते हुए भी मैं मर गई। कहाँ गया वह अकूत पैसा? कितनी अजीब बात है कि 100 स्मार्ट सिटी बनाने वाले देश में भूख बच्चों की जान ले रही है। सबसे बड़ी विपदा खाना होते हुए भी खाना न मिलना है। दूध के तो मैंने कभी सपने भी नहीं देखे। मुझे तो भात के कटोरे से ही संतोष हो जाता था। शायद यही वजह होगी जो माई ने मेरा नाम ‘संतोषी कुमारी’ रखा होगा।


यह दरवाजा तो खुल ही नहीं रहा। न जाने कब खुलेगा? क्या भगवान भी भूख से मर गया है? या फिर कहीं वह भी आधार कार्ड बनवाने गया है। हो सकता है। वह भी दस्तावेज़ बनवाने गया हो। आज का समय बड़ा कठिन हो गया है। यहाँ पर कोई पक्की सड़क नहीं है। बिजली का बल्ब भी नहीं है। लगता है यहाँ का भी विकास नहीं हुआ है। …विकास…अरे विकास से याद आया कि यह लफ़्फ़ाज़ी बहुत ज़्यादा गली-गली और द्वारे-द्वारे घूम रही थी धरती पर। आते जाते हलवाई की दुकान पर सुना था कि अच्छे दिन आएंगे।…गाना कुछ ऐसा था …मोदी आया मोदी आया रे, झारखंड विकास करे मोदी आया रे…गाना तो अच्छा ही लगता था। मुझे लगा था कि अच्छे दिन आने पर हलुआ का एक कटोरा खाने को मिलेगा। मेरे लिए तो भरपेट खाना ही अच्छे दिन की तरह लगता है। लेकिन मेरा विकास नहीं हुआ। न मेरी माई का। न मेरे घर का। उल्टा मेरी तो भूख से जान चली गई। क्या फायदा ऐसे विकास का जो खाना भी न मिलने दे।

ऐसी प्रणाली का क्या फायदा जो डिजिटल बनने के बाद भी खाना खाने से रोक दे। मशीनों को कब भूख लगा करती है। हम क्या जाने डिजिटल और विजिटल क्या होता है? भारत को डिजिटल करने से पहले भूख और गरीबी को डिजिटल करने का सोचना चाहिए था। भूख तो भूख होती है। अमीर और गरीब दोनों को लगती है। आदमी और औरत को भी। नेता और आम जन को भी। पहले जो अभावग्रस्त हैं उनको डिजिटल कीजिये। जिनको इलाज़ नहीं मिल रहा उनको डिजिटल कीजिये। जो भीख मांग रहे हैं, उनको कैसे डिजिटल करेंगे? जो सिग्नल पर गुलाब के फूल बेचने की मशक्कत में लगे रहते हैं, उनको कैसे डिजिटल करेंगे? जो सड़कों पर सर्दियों और गर्मी की रात काट देते हैं, जिनके लिए बसेरे का मतलब कुछ भी नहीं होता उनको कैसे डिजिटल करेंगे? जो बच्चे भिखमंगे बना दिये जाते हैं, जो बलात्कार का शिकार हो जाते हैं, उनको कैसे डिजिटल करेंगे? जिनको बेच दिया जाता है, उनका कब डिजिटाइजेशन होगा?आखिर यह कौन सी बला है? अगर मेरी भूख तुम्हारे डिजिटाइजेशन के दायरे में नहीं आती तो रख लो इसे अपने पास। मुझे नहीं चाहिए तुम्हारा डिजिटाइजेशन-विजिटाइजेशन। तुम्हारे विकास से बंद नालियों के सड़ते हुए पानी की बू आती है।

दरवाजा खुले तो मैं यहा के देवता से कुछ अर्ज़ कर लूँगी। यही कि कहीं और जन्म दे। यहाँ तो अगस्त में बच्चे मर जाते हैं। वही आठवाँ महीना जिसमें आज़ादी का जश्न मनाया जाता है। देवता से पूछ लूँगी कि अगस्त में ऑक्सीज़न कम छोड़ते हो क्या? ये कैसी जगह है कि जब देश के प्रधानमंत्री नोटबंदी का हिसाब किताब और फायदा लाल क़िले से बता रहे थे तब ठीक उसी समय चंडीगढ़ में एक 12 साल की बच्ची से रेप हो गया। …मुझे भूख नहीं लग रही। कमाल है। …शायद मरने के बाद भूख नहीं लगती।


जब 2006 में पहली बार वैश्विक भूख सूचकांक बनाया गया था तब भी 119 विकासशील देशों में भारत का स्थान 97वें नंबर पर था। आज भी वही स्थिति है। इस सूचकांक को बनाने में कुल चार घटकों को सूचित किया जाता है- आबादी में कुपोषित लोगों की संख्या, बाल मृत्युदर, अविकसित बच्चों की संख्या, अपनी उम्र की तुलना में कम वजन और कद वाले बच्चों की संख्या। जिस देश के बच्चे कुपोषित, अविकसित, बीमार, कम कद और वजन के हों वह देश ख्वाबी तरक्की के सपने कभी देख नहीं सकता। मैं शायद इन चारों संकेतकों में शामिल थी। हाँ, अगर मौत तरक्की है तो मेरा विकास हो गया।

वास्तव में मैं जिस समाज का हिस्सा थी वह भी कब ज़िंदा था! मुर्दा समाज था। कई तो वास्तव में गरीबी के कारण ज़िंदा वाले मुर्दे थे। कई अमीरी और सत्ता के कारण ज़िंदा वाले बदबूदार मुर्दे थे। जिनको वोट दिया और जो जीत गए, वे सबसे बड़े मुर्दा थे। इन्हें ये भी ठीक से नहीं मालूम कि ये मरे हुए हैं और इनमें से भयानक सड़ांध आती थी। इतनी कि उबकाई आ जाती थी। जिस भारत माता के नाम पर अपने सीने चौड़े करते हैं और जिसे कलेंडरों में देवी देवता के शक्ल में पूजते हैं और ज़मीन पर मार देते हैं,वास्तव में वे पतनशील दिमाग के मालिक हैं। समाज का पतन यह भी माना जाय कि वह अपने भावी भविष्य को भूख से मार देता है। धोखेबाज़ प्रणाली जो छिनने के लिए बनाई गई है, भी जिम्मेदार है। बेटी को मारो, बेटो को ऊपर पहुंचाओ वाला नारा परिणित किया जा रहा। कितना घिनौना है यह सब।

…शायद भगवान ने अपने चौकीदार को दरवाजा खोलने भेजा है। किसी के कदमों की आहट मिल रही है। मेरे पाप और पुण्य कुछ भी नहीं है। हाँ, इच्छा पूछेंगे तब कहूँगी कि एक कटोरा भात खिला दो बस। भारत में भात नहीं मिला।

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‘दलित’ शब्द दलित पैंथर आंदोलन के इतिहास से जुड़ा है: रामदास आठवले



‘दलित’ शब्द पर प्रतिबंध के खिलाफ सरकार के मंत्री आठवले 

केरल सरकार ने दलित और हरिजन शब्दों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है. सरकार के पब्लिक रिलेशन विभाग ने दलित और हरिजन शब्दों के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए सर्कुलर जारी किया है। पीआर विभाग ने एसटी/एससी कमिशन की एक सिफारिश का हवाला देते हुए नोटिस जारी किया है। पीआर विभाग ने सर्कुलर के जरिए सभी सरकारी पब्लिकेशन और सरकार की प्रचार-प्रसार सामग्री में ‘दलित’, ‘हरिजन’ शब्दों के इस्तेमाल पर रोक लगाने की अपील की है।

पीआर विभाग का यह सर्कुलर सरकार और अन्य विभागों के बीच इन शब्दों पर बैन लगाने को लेकर चल रही चर्चा के बीच आया है। सर्कुलर में दलित/हरिजन शब्दों की जगह एससी/एसटी शब्द इस्तेमाल करने का सुझाव दिया गया है। एससी/एसटी कमिशन के सूत्रों का कहना है कि दलित और हरिजन शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगाने की सिफारिश उन सामाजिक भेदभाव को खत्म करने के लिए की गई थी जो आज भी कई जगहों पर हो रहे हैं।

इस बीच केंद्र सरकार में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री (राज्य) और दलित नेता रामदास आठवले इस दलित शब्द को प्रतिबंधित किये जाने के पक्ष में नहीं हैं. आठवले महाराष्ट्र के दलित पैंथर आन्दोलन से जुड़े रहे हैं. उन्होंने प्रतिबंध के खिलाफ यह विचार उनपर शीघ्र प्रकाश्य किताब ‘ भारत के राजनेता: रामदास आठवले’ में संकलित  एक बातचीत में रखा है.

दलित शब्द का जो राजा ढाले और दूसरे लोग  विरोध कर रहे हैं उसको आप कैसे देखते हैं 

राजा ढाले दलित का विरोध नहीं करते हैं. उनके दिमाग में था कि भाई हम बुद्धिष्ट हैं . राजा ढाले ‘दलित’ शब्द का विरोध नहीं करते थे, क्यूंकि दलित पैंथर उन्होंने ही स्थापित किया था. लेकिन राजा ढाले कम्युनिजम का ज्यादा विरोध करते थे और उनका कहना ये था कि वर्ग आधारित लड़ाई से अपने देश के अन्दर से जाति व्यवस्था नहीं जायेगी. जो कम्युनिस्ट लोग सोचते हैं कि भाई वर्ग की लड़ाई होनी चाहिए , लेकिन जब तक जातिवाद ख़त्म होता नहीं होता तब तक वर्ग एक वर्ग नहीं होता है. इसलिए राजा ढाले कम्युनिज् का विरोध करते थे. बाबा साहब अम्बेडकर  भी बोलते थे कि मैं जन्म से कम्युनिस्ट हूँ. माओवादी विचार, मारपीट करने का विरोध राजा ढाले करते थ. ढसाल भी अम्बेडकराइट ही थे ,लेकिन उनके संबंध थोड़े कम्युनिस्ट लोगों के साथ थे, इसलिए राजा ढाले इनलोगों पर कम्युनिस्ट हैं, ऐसा  आरोप करते थे. राजा ढाले का दलित शब्द से ऐसा कोई विरोध नहीं था, क्यूंकि राजा ढाले दलित पैंथर मूवमेंट के संस्थापकों में से एक हैं.

लेकिन वही आश्चर्य है कि अभी शायद एक मुकदमा भी है. नागपुर हाई कोर्ट में मुकदमा है, दलित शब्द को हटाने का एक जनहित याचिका है. वहां सरकार भी आई है कि हम शेड्यूल कास्ट कहेंगे? एक प्रोफ़ेसर हैं हमारे, प्रोफ़ेसर एल कारुण्यकारा वे इस मुकदमे में दलित शब्द के पक्ष में हस्तक्षेप कर रहे हैं.

नहीं दलित शब्द कैसे ख़त्म होगा. हरिजन शब्द ख़त्म हो गया ये ठीक बात है, सरकारी रिकॉर्ड से हरिजन निकल गया है.

लेकिन दलित शब्द नहीं होना चाहिए ऐसा आपका मानना है?

नहीं दलित शब्द तो होना ही चाहिए दलित का अर्थ तो लोग समझते हैं कि दलित का मतलब शेड्यूल कास्ट. लेकिन हम बोलते हैं दलित का मतलब सभी कष्ट करने वाले लोग, झुग्गी-झोपडी में रहने वाले लोग, गरीब लोग बेरोजगार लोग महिला, पिछड़े अल्पसंख्यक सब दलित हैं.

झुग्गी-झोपडी में कुछ ऊंची जाति के लोग भी रहते हैं तो आप उनको भी दलित कहेंगे? 


ऊंची जाति के लोग भी रहते हैं तो गरीब हैं, अभी ऐसा है.बाबा साहब को लीजिये कि बाबा साहब अम्बेडकर  ने संविधान लिखा और जो पहला इलेक्शन हुआ 1952 में तो बाबा साहब अम्बेडकर नार्थ बोम्बे लोकसभा क्षेत्र से लड़े और बाबा साहब अम्बेडकर वहां हार गये, आल इंडिया शेड्यूल कास्ट फेडेरेशन की टिकट पर. फिर 54 में भंडारा से बोरकर नाम के एक दलित आदमी ने बाबा साहब को हराया. पंडारा से बाबा साहब अम्बेडकर खड़े हुए और कांग्रेस के बोरकर नाम के आदमी ने बाबा साहब अम्बेडकर को हराया. बोरकर मांग समाज के थे. फिर बाबा साहब ने विचार किया दो बार हारने के बाद कि हमें अभी रिपब्लिकन नाम की पार्टी स्थापित करनी चाहिए और उन्होंने एक पत्र लिखा राममनोहर लोहिया को. बाबा साहब का कहना ये था कि जिस तरह अमरीका, इंग्लेंड, जर्मनी, फ्रांस मं् और बहुत सारे यूरोपीय देशों में ‘टू पार्टी सिस्टम’ है. अपने देश में भी दो पार्टियाँ होनी चाहिए- एक पार्टी कांग्रेस पार्टी और दूसरी रिपब्लिकन पार्टी और रिपब्लिकन पार्टी में सब लोगों को आना चाहिए. कांग्रेस के खिलाफ बना विचार था यह. बाबा साहब अम्बेडकर  54 के बाद थोडा नाराज हुए थे. उन्होंने थोड़ा धम्म के तरफ ध्यान दिया. बुद्ध धम्म पर किताब लिखी और 14 अक्टूबर 56 को बाबा साहब ने बौध धर्म की दीक्षा ले ली, फिर उसके बाद बाबा साहब अम्बेडकर की 6 दिसंबर 1956 को मृत्यु हो गयी.  अगर बाबा साहब अम्बेडकर  और दस साल अपने बीच होते तो उनकी उपस्थिति में रिपब्लिकन पार्टी स्थापित होती और यह पार्टी एक बार बाबा साहब के टाइम पर सत्ता में आती, जिस तरह जय प्रकाश नारायण के टाइम पर जनता पार्टी आई. बहुत आन्दोलन हुआ कांग्रेस के खिलाफ सब लोग इकठ्ठा आये और जनता पार्टी की सत्ता आ गई थी, वैसे ही बाबा साहब चाहते थे कि रिपब्लिकन पार्टी ऐसी होनी चाहिए. बाबा साहब अम्बेडकर गरीबों का सपोर्ट करते थे. बाबा साहब ने आल इंडिया शेड्यूल कास्ट फेडेरेशन इसलिए बर्खास्त करने का निर्णय लिया था कि खाली शेड्यूल कास्ट के वोट पर राजनीति में सफलता नहीं मिलेगी इसीलिए सब लोगों को साथ में लेना चाहिए.

अब ब्राह्मण लोगों का जहां तक सवाल है. बाब साहब के महार के चौहार तालाब का सत्याग्रह आंदोलन, काला राम मंदिर का सत्याग्रह, आदि उनके आंदोलनों में ब्राह्मण लोगों ने काफी सपोर्ट किया. केशव सीता राम ठाकरे, जो बाल ठाकरे के पिताजी थे, बाबा साहब का पूरा समर्थन करते थे. बाबा साहब के बड़े समर्थक चिटनिस, चित्रे, सहस्रबुद्धे   आदि थे. बाबा साहब का कहना था कि मैं ब्राह्मण जाति का विरोध नहीं करता हूँ मैं ब्राह्मणवाद का विरोध करता हूँ. जहाँ-जहाँ मुझे ब्राह्मणवाद नजर आता है, जातिवाद नजर आता है उनका मैं विरोध करता हूँ. मैं व्यक्तिगत समाज का विरोध नहीं करता हूँ. बाबा साहब सब जाति को लेकर ही राजनीति करना चाहते थे.

यह बातचीत सामाजिक न्याय मंत्री (राज्य) रामदास आठवले से लम्बी बातचीत का हिस्सा है. पूरी बातचीत ‘द मार्जिनलाइज्ड’ प्रकाशन से प्रकाशित किताब ‘भारत के राजनेता: रामदास आठवले’ में संकलित है.

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
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यौन उत्पीड़न के शिकार वे सब: वे कोई भी हैं, वे जिन्हें हम जानते हैं

अपने यौन उत्पीड़न के बारे में #MeToo हैश टैग के साथ बताने का सिलसिला ट्वीटर से शुरू होकर फेसबुक पर जारी है. सोशल मीडिया में स्त्रियाँ अपने बुरे अनुभव को शेयर कर रही हैं, उनमें महिलाओं पर यौन हिंसा के खिलाफ मुखर आवाज रही कविता कृष्णन से लेकर कई साहित्यकार, कलाकार, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं. कई नामचीन हस्तियों के साथ-साथ वे सब अपने अनुभव शेयर कर रही हैं, जो हमारे-आपके बीच हैं और जो साहसी हैं. शेयर करना ही, कहना ही पहली शुरुआत है हमले के विरुद्ध माहौल बनाने के लिए, हमलावरों पर कार्रवाई के लिए या उन्हें अपराधबोध से भरने के लिए.

अपराजिता शर्मा का रेखांकन

कविता कृष्णन ( महिला अधिकार कार्यकर्ता )


मुझे भी यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा – कई बार, अवांछित छूना और टेक्स्ट भेजना, ‘इनकार’ को तबज्जो न देना. मेरी शारीरिक निष्क्रियता, नियमित प्रश्नों का एक-आध शब्द में जवाब और उपेक्षा भाव को एकदम से तबज्जो नहीं दिया गया. जैसा ही उसने अपनी उत्पीड़न बढ़ाई, मैंने बिना देर किये ‘ना’ कहा, फिर भी यह जारी रखा गया. मेरी उम्मीद थी कि वह एक अनुभवी मेंटर के रूप में आदर प्राप्त व्यक्ति था, जिसे मैं वर्षों से जानती थीं, मेरे ‘ना’ का सम्मान करेगा लेकिन मुझे धोखा हुआ. सबसे खराब बात यह थी पचौरी शैली, वह ऐसा बर्ताव करता जैसे कि मैं जिस व्यवहार से घृणा कर रही थी, वह वास्तव में हमारे बीच एक गुप्त रोमांटिक समझौता था – मुझे लगता है कि उसके जैसे पुरुष यह स्वीकार नहीं करना चाहते हैं कि वे उत्पीड़न कर रहे हैं, वे इस तरह पेश आते हैं मानो अशिक हों. हाँ, मैं यहाँ इस बारे में बात नहीं करना चाहती कि मैं यह उत्पीड़न कैसे रोक सकी.

यदि हम सब, जिन्हें उनसे यौन उत्पीड़न या हमले का सामना करना पड़ा है जिन्हें हम जनाते रहे, अपनी बात कहें कहें #MeToo तो शायद समस्या की भयावहता हो हम स्पष्ट कर सकते हैं. लेकिन सर ‘मी टू’ कहना भर ही पर्याप्त नहीं है यदि हम उन यौन उत्पीडन की शिकार महिलाओं को यह अहसास देना चाहते हैं कि ‘यदि यह सचमुच में गंभीर होता तो मैंने तुम्हारे जैसा व्यवहार नहीं किया होता’, जैसा कि भारत में बलात्कार या यौन हिंसा का सामना करने वाली महिलाओं के बारे में कुछ लोगों को कहते सुना है. यौन हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए बहुत अधिक सहानुभूति, सम्मान होना चाहिए और उनके साथ खड़े होने की जरूरत है.

   अपने यौन शोषण की घटनायें बताने का हैश टैग #MeToo 

मीनाक्षी चंडीवाल (शिक्षिका, दिल्ली विश्वविद्यालय)
हम सब जुड़वा है,अपने अनुभवों में!!आवाजे!जिन्हें हमने अपने घर,गली-मोहल्लों में सुना है..हमारे कान जुड़वा है! हमारे अनुभवों में याद आने वाले वो लिजलिजे स्पर्श…हमारे शरीर जुड़वे है !हम भूले नही है! पर आज हमारी आवाजे भी जुड़वा है उन ‘आवाजो’ के खिलाफ,हम जुड़वा है,उन घूरती निगाहों के खिलाफ…आखिर ये जुड़वापन कब खिलखलायेगा एक आज़ाद ख्याल की रोशनी मे??हम अपने जुड़वे होने के शायद कुछ खुश रंग अहसास भी बाँट पाएंगी एक दिन…..#Metoo#

कविता (साहित्यकार)
#MeToo. जब कहानियों में कहा कई बार तो यहां भी कहने से गुरेज नहीं ..मैं कहती हूँ और इसलिये भी कहती हूँ कि कुछ और जुबान पर पडे चुप्पी के ताले शायद इस तरह टूटे …
(सोशल मीडिया पर सुबह से ही ये ट्रेंड चल रहा है। जिसमें हर वो लड़की जो कभी-ना-कभी यौन हमले का शिकार हुई हैं वो अपने वॉल पर #MeToo लिख रही हैं। अमेरिका से शुरू हुए इस ट्रेंड में दुनिया भर की महिलाएं हिस्सा ले रही हैं, जो साफ बताता है कि महिलाओं के साथ सेक्शुअल हरासमेंट की घटना कितनी भयावह है और हां ये कोई अपवाद नहीं।)

रंडी, या रंडी से कम और हाँ, बीबी से भी बलात्कार हक़ नहीं

सवा दीवान (लेखिका, फिल्मकार)
#MeToo एक बच्चे के रूप में, जब मैं बड़ी हो रही थी, एक वयस्क महिला के रूप में, उन पुरुषों द्वारा जिन्हें मैं जानती थी, या अजनबियों द्वारा भी.
अगर हम सब, जिन्होंने यौन उत्पीड़न या यौन हमले झेले हैं #MeTOO लिखते हैं तो हम इस समस्या की भयावहता को सामने ला सकते हैं. यदि यह आप पर भी लागू होता है तो कृपया इस स्टेट्स को कॉपी पेस्ट करें, और आप ऐसा करते हुए सुरक्षित महसूस करें.

जीतेंद्र कुमार ( शोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय)
#MeToo और कोई ऐसी भी है जो मेरे कारण लिख सकती है #MeTo

नागपुर में अखिल भारतीय महिला क्रांति परिषद (1942) का अमृत महोत्सव

डा. बाबा साहेब अम्बेडकर की उपस्थिति में नागपुर में 20 जुलाई 1942 को हुई अखिल भारतीय महिला परिषद का के 75वें  वर्ष में कई संगठनों की संयुक्त पहल से त्रिदिवसीय अखिल भारतीय महिला परिषद का आयोजन होने जा रहा है. इस त्रिदिवसीय महिला परिषद के उदघाटन सत्र की अध्यक्षता सामाजिक कार्यकर्ता और बामसेफ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मनीषा बांगर होंगी तथा फिल्म अभिनेत्री शबाना आजमी इसका उदघाटन करेंगी. इस ऐतिहासिक त्रिदिवसीय सम्मेलन में देश भर से महिला अधिकार के लिए संघर्ष करने वाली नामचीन हस्तियाँ शामिल हो रही हैं.

20 जुलाई 1942 को नागपुर में सुलोचनाबाई डोंगरे की अध्यक्षता में  अखिल भारतीय महिला परिषद परिषद संपन्न हुई थी. इस परिषद की विशेषता यह थी कि परिषद में डॉ. बाबासाहब आंबेडकर स्वयं उपस्थित थे. दलित महिलाओं का अलग संगठन हो, यह इच्छा स्वयं डॉ. बाबासाहब आंबेडकर की थी. लगभग पच्चीस हजार महिलायें इस परिषद में  रूप से सहभागी हुई थी. उनका उत्साह एक नई क्रांति का बिगुल बजा रहा था. यह एक क्रांतिकारी सम्मेलन था. दलित, शोषित, वंचित बहुजन  समाज की महिलाओं की आवाज संपूर्ण क्रांति की मांग करती नजर आ रही थी. यह परिषद अपने आप में दुनिया की ऐतिहासिक परिषद थी. इस परिषद में हुई घोषणा एवं मांगें महत्वपूर्ण थी.

सुलोचनाताई डोंगरे

22 से 24 तक होने वाले इस त्रिदिवसीय सम्मलेन में ‘भारतीय महिलाओं के उत्थान में बुद्ध, फुले और डा. बाबा साहेब अम्बेडकर का योगदान’, ‘अनुसूचित जाति-जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाएं और संविधान’, ‘शोषित पीड़ित महिलों के मुक्ति मार्ग’ जैसे विषयों पर बातचीत की जायेगी

इस कार्यक्रम की एक ख़ास ऐतिहासिकता यह भी है कि 1942 में तीन दिवसीय सम्मेलन की अध्यक्षता सुलोचना ताई डोंगरे ने की थी आज उनकी दूसरी पीढी, उनकी भांजी, मनीषा बांगर इस सम्मेलन के उदघाटन सत्र की अध्यक्षता कर रही हैं. इस ऐतिहासिक पुनः आवृत्ति के संबंध मनीषा बांगर कहती हैं कि आयोजकों ने पिछले कई वर्षों से बहुजन भारत के लिए मेरे काम को सम्मान दिया है.

स्त्री अध्ययन विभागों पर शामत, असोसिएशन भी सवालों के घेरे में

देश भर में विभिन्न विश्वविद्यालयों में लगभग दो सौ  के आस-पास स्त्री अध्ययंन विभाग/केंद्र आज नयी चुनौतियों से जूझ रहे हैं. अभी बमुश्किल चार दशक हुए हैं स्त्री अध्ययन का पहला सेंटर (1974) एसएनडीटी, मुम्बई में खुले हुए और इसे एक सुनियोजित हमला झेलना पड़ रहा है, अनिश्चितता के दौर से गुजरना पड़ रहा है. वैसे भी विश्वविद्यालयों के पुरुष-सत्ताक ढाँचे और प्रशासन में महिलाओं की न्यूनतम उपस्थिति के कारण इस विषय का बहुत स्वागत भी नहीं हुआ है, सेंटर पैसों की कमी से जूझ रहे हैं, धीरे-धीरे कई विश्वविद्यालयों में इसका मोड सेल्फ फायनांसिंग का होता गया है. विषय में डिग्री के बाद नौकरियों की गारंटी नहीं है, स्पष्ट है कि सेल्फ फायनांस मोड में विद्यार्थी मिलना मुश्किल है.

स्त्री-अधययन विभागों/केद्रों  ने भी अलग राह ले ली है 
इन केन्द्रों की भी विसंगतियां कम नहीं है. देश के कई स्त्री अधययन विभाग सिलाई-बुनाई के सेंटर की तरह दिखते हैं. विभागाध्यक्ष पितृसत्ता और पुरुष नियन्त्रण के प्रतीकों के पक्ष में तर्क देते सुहाग चिह्नों के लिए सेमिनारों में वकालत करती भी देखी जा सकती हैं या फिर भारतीय परिवार और परम्परा में स्त्री के लिए तय भूमिका की वकालत. स्त्री अध्ययन की एक प्राध्यापिका कहती हैं ‘देश भर में उँगलियों पर गिने जाने वाले स्त्री अध्ययन सेंटर और विभाग ही कमोवेश इस डिसिप्लीन की शुरुआत के उद्देश्यों के अनुरूप काम कर रहे हैं.’हालात यह है कि उदयपुर विश्वविद्यालय में स्त्री अध्ययन विभाग फैशन डिजायनिंग का कोर्स पढ़ा रहा है, मानो वह कोई स्किल डेवलपमेंट सेंटर हो.हालांकि स्त्री आन्दोलन के एक्टिविस्ट और विदुषियों-विद्वानों के बीच भी इसे एक समुचित डिसिप्लिन के रूप में विकसित करने को लेकर शुरू से ही मत-मतांतर रहा है.

सिर मुड़ाते ही पड़े ओले 
यूं तो महिला आन्दोलन और स्त्री अधययन विभाग पर पहले से ही जाति के दायरे से बाहर नहीं आने के आरोप लगते रहे हैं. इसके कारण भी हैं. हिन्दी में पहली दलित महिला आत्मकथा लेखिका कौशल्या बैसंत्री ने इस तरह के अनुभव व्यक्त किये हैं और यह दावा, विवाद तथा संवाद आज भी जारी है. आज भी उनपर सावित्रीबाई फुले, महात्मा फुले और डा. अम्बेडकर की उपेक्षा का आरोप है. हाल के दिनों में इन आरोपों से मुक्ति के प्रयास भी हो रहे हैं. अपने प्रशासनिक ढाँचे के वर्गीय और जाति-चरित्र के कारण भी इन आरोपों को झेलते महिला अध्ययन सेंटर-विभाग अभी दो चार कदम ही चले हैं कि परम्परावादी सोच का सीधा हमले भी उनपर शुरू हो गये  हैं. यह हमला उस सामाजिक-प्रशासनिक ढाँचे से हो रहा है, जिसका आदर्श मनुस्मृति आधारित शासन रहा है, जिसके प्रवक्ता संविधान लागू होते वक्त ही मनु स्मृति की पैरवी कर रहे थे. डा. अम्बेडकर हिन्दू स्त्री की गुलामी का सबसे बड़ा कारण इस ग्रन्थ के साथ-साथ स्मृतियों के नियमन को ही बताते हैं.

क्रमिक मौत की केन्द्रीय साजिश 
विश्वविद्यालयों की नियामक संस्था विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने कुछ महीने पहले सभी विश्वविद्यालयों को कुछ ख़ास चीजें पढ़ाने को कहा, तभी वे इन्हें फंड देते रहने की स्थिति में थे. वे ख़ास चीजें थीं विद्यार्थियों को आदर्श भारतीय नारी से रु-ब-रु कराने के सीमित लक्ष्य से निर्धारित, जो इस विषय के पढाये जाने के मूल लक्ष्य पर ही एक सुनियोजित हमला था. 29 मार्च, 2017 को यूजीसी ने एक नोटिफिकेशन के जरिये स्त्री अध्ययन के सभी केन्द्रों और विभागों को सूचित किया कि उन्हें प्लान हेड के तहत मिलने वाला बजट 30 सितम्बर के बाद यूजीसी की समीक्षा के बाद ही जारी किया जा सकेगा. जिसका अर्थ था यूजीसी के पाठ्यक्रम संबंधी निर्देशों का पालन एक शर्त होगी. कई केन्द्रों ने यूजीसी और सरकार के इरादे पर ऐतराज जताया तो यूजीसी से उन्हें कहा गया कि वे यह बताएं कि वे पढ़ाते क्या हैं? हालांकि कुछ केन्द्रों और विभागों ने यूजीसी के प्रति समर्पण कर दिया है. कुछ संस्थान हिंदूवादी संगठनों के साथ मिलकर कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं तो कुछ हिंदूवादी नेताओं की याद में कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं.

लगे हाथ यह भी स्पष्ट करते चलें कि इन दिनों केन्द्रीय सत्ता की रूचियां भारत की शिक्षा व्यवस्था को कथित राष्ट्रवादी बनाने की है. संघ प्रायोजित कुछ संगठन तो सीधे विश्वविद्यालयों को निर्देशित कर रहे हैं, पत्र लिख रहे हैं कि उन्हें क्या पढ़ाना है. और विश्वविद्यालय प्रशासन उन पत्रों का यथाशीघ्र अनुसरण का नोट विभागों को भेज रहे हैं. 12सितंबर को जागरुकता, देशभक्ति और राष्ट्रवाद के दृष्टिकोण से काम करने का दावा करने वाली संस्था  भारतीय शिक्षण मंडल ने ईमेल से कुछ विश्वविद्यालयों और संस्थानों को सुझाव भेजा है कि वे अपने पाठ्क्रमों को राष्ट्रवादी बनायें. एक विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार ने 22 सितम्बर को इस निर्देश के आलोक में यथाशीघ्र अपने विभागों को इसके सुझावों की दिशा में काम करने का निर्देश जारी किया है. संस्था ने लिखा कि “पाठ्यक्रम एवं शिक्षण पद्धति का निर्माण इस प्रकार से हो कि जिससे विद्यार्थी का समय व्यक्तित्व विकास एवं राष्ट्रीय एकता के साथ उसका भावनात्मक जुड़ाव सुनिश्चित किया जा सके। सत्व एवं रजस की उसके जीवन में प्रधानता रहे, निष्काम भाव से किये जाने वाले कर्म के महत्व को समझकर एक कर्मयोगी के रूप में अपने समसत कर्तव्यों का निर्वहन कर सके। 16 विद्याओं एवं 64 कलाओं में से कम से कम एक विद्या व एक कला पर उसका अधिपत्य हो, शास्त्रीय एवं मौलिक, विजिक्षु दृष्टिकोण हो, विश्वबंधुत्व के भाव से संपूर्ण विश्व को आच्छादित करने का जिसमें सामर्थ्य हो , अभय के साथ पूर्णता अथवा शून्य की ओर उन्मुख होकर आने वाले युग का पथ प्रदर्शक बन सके।”

स्त्री विमर्श की पठनीय किताबें 

हालांकि स्त्री अध्ययन विभागों और संस्थानों की प्रतिनिधि संस्था असोसिएशन फॉर वीमेन स्टडीज (स्थापित 1982) की अध्यक्ष इंद्राणी मजूमदार कहती हैं कि ‘इसके पहले भी केंद्र में जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार आयी थी और अटल बिहारी वाजपयी प्रधानमंत्री थे तो स्त्री अधययन केंद्र/ विभाग को ‘ स्त्री अध्ययन और परिवार कल्याण’ विभाग बनाने का नोटिफिकेशन किया गया था.’

वित्तीय अनिश्चितता की स्थिति और केन्द्रों की चिंता
देश के अधिकांश स्त्री अधययन केंद्र यूजीसी के प्लान हेड में प्राप्त वित्तीय सहयोग से चलते हैं. छठे प्लान की अवधि 30 सितम्बर को खत्म हो रही है. इसके लिए 29 मार्च के नोटिफिकेशन से यूजीसी ने सारे केन्द्रों और विभागों को बताया कि प्लान के तहत आगे अनुदान देना यूजीसी की समीक्षा के बाद ही संभव है. बहुत कम ही केंद्र और विभाग विश्वविद्यालयों के सीधे हिस्सा हैं, इसलिए अधिकाँश केन्द्रों पर आर्थिक संकट की स्थिति स्वाभाविक तौर पर बन गयी है.

यूजीसी के इस नोटिफिकेशन के बाद स्त्री अध्ययन केन्द्रों में खलबली मच गयी. असोसिएशन फॉर वीमेन स्टडीज के बुलावे पर 23 अगस्त को दिल्ली में स्त्री अधयन केन्द्रों से 200 प्रतिनिधि जुटे, एक दिन का कन्वेंशन हुआ और मानव संसाधन विकास मंत्रालय को ज्ञापन दिया गया. इसके बाद यूजीसी ने आश्वस्त किया कि यूजीसी का फंड रोकने का कोई इरादा नहीं है. स्त्री अध्ययन विभागों से पता करने पर पता चला कि इस आशय का कोई पत्र आजतक यूजीसी ने उन्हें नहीं भेजा है और 30 सितम्बर के बाद रिव्यू के आधार पर फंड का उनका नोटिफिकेशन यथावत है. यूजीसी की साईट पर हालांकि इस एक नोटिस देखी जा सकती है कि यूजीसी का इरादा फंड रोकने का नहीं है, लेकिन किसी स्पष्टता के अभाव में इरादे और घोषणा में तालमेल नहीं दिखता.

कुछ केंद्र कर रहे समर्पण जो अड़े उनका दमन 
स्त्री अधययन की एक प्राध्यापिका ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि ‘यूं तो देश के अधिकाँश विश्वविद्यालयों के स्त्री अधययन केंद्र यूं ही परम्परावादी नेतृत्व से संचालित है, लेकिन इधर जिन विश्वविद्यालयों ने स्त्रीवाद के क्षेत्र में अध्याय लिखे वहाँ हिंदुत्ववादी संगठनों के साथ तालमेल और सेमिनार की खबरें आ रही हैं. यूजीसी ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर वाद-विवाद प्रतियोगिता आयोजित करने या ऐसे ही कार्यक्रमों के लिए सुझाव और फंड दिया है. दुखद है कि स्त्री अधययन विभागों से जुड़े लोग भी ऐसे आयोजन संचालित कर रहे हैं. सवाल है कि दीनदयाल उपाध्याय का योगदान स्त्रीवाद के लिए क्या है?’

इस बीच जो केंद्र यूजीसी के सुझावों और रिव्यू के बाद प्लान फंड की योजना के खिलाफ आवाज बना सके उन्हें तरह-तरह से प्रताड़ित किया जा रहा है. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्त्री अधययन केंद्र के साथ प्रशासनिक विवाद अखबारों की सुर्खियाँ बन रही हैं. यद्यपि केंद्र विश्वविद्यालय का हिस्सा है लेकिन इसके बहुत से कार्यक्रम प्लान फंड से चलते हैं. फंड की कमी के कारण वहाँ होने वाली ‘रुकैया व्याख्यानमाला बाधित हो रही है. केंद्र द्वारा संचालित स्त्री अधययन रिफ्रेशर कोर्स की जिम्मेदारी उससे लेकर दो प्राध्यापकों को दे दी गयी है. केंद्र की विभागाध्यक्ष लता सिंह बताती हैं कि ‘ इस कारण रिफ्रेशर कोर्स में आने वाली बहुत सी एक्सपर्ट ने इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया है.

असोसिएशन फॉर वीमेन स्टडीज की भूमिका पर उठ रहे सवाल 

यद्यपि असोसिएशन फॉर वीमेन स्टडीज ने फंड के मामले में त्वरित कदम उठाये.  2016 में आयोजित चेन्नई कांफ्रेंस में ‘स्त्री अध्ययन’ पर आये संकट का मुद्दा उठा. असोसिएशन की अध्यक्ष इंद्राणी मजूमदार बताती हैं कि ‘ जलीकटू वाले हंगामे के कारण इस पर कोई ठोस प्रस्ताव पास नहीं हुआ. जल्दी-जल्दी में हमें कांफ्रेस समेटना पड़ा.’ एक साल के भीतर ही 23 अगस्त को असोसिएशन ने दुबारा कांफ्रेंस बुलाया और फंड रोके जाने के मुद्दे पर सरकार को ज्ञापन दिया. इंद्राणी बताती हैं कि ‘इसी दवाब में यूजीसी को स्पष्टीकरण देना पड़ा.’ हालांकि वे शायद यह भूल जाती हैं कि पिछले नोटिफिकेशन का अस्तित्व बना है और रिव्यू के साथ यूजीसी का एजेंडा भी.

स्त्रीकाल से बात करते हुए स्त्री अधययन के विद्यार्थियों ने कहा कि असोसिएशन की भूमिका दूसरे विषयों के असोसिएशन से भिन्न नहीं है. हमारी शिक्षिकाएं एक्टिविज्म और रिसर्च टार्गेट से लगाव का सिद्धांत बताती हैं लेकिन व्यवहार में विषय अधिक सांस्थानिक होता गया है. यह विषय अंतरअनुशासनिक (इंटरडिसिप्लीनरी) अध्ययन-अध्यापन के पक्ष में है, लेकिन इस दिशा में सारे विभागों में पहल हो इसपर इनकी कोई भूमिका नहीं है.  नियुक्तियों में अंतरअनुशासनिकता वन वे ट्रैफिक है, यानी इसके केन्द्रों विभागों में दूसरे विषय के शिक्षक नियुक्त किये जाते हैं लेकिन इस विषय के विद्यार्थियों को दूसरे विषय इंटरटेन नहीं करते.

 बहुजन परम्परा की ये किताबें पढ़ें 

असोसिएशन फॉर वीमेन स्टडीज की भूमिका तब भी संदेह के घेरे में आयी थी जब 2010 में अपने कांफ्रेंस में एक ऐसे कुलपति को जेंडर समानता सम्मान से सम्मानित किया गया था, जिसने सम्मलेन के तीन-चार पूर्व ही लेखिकाओं को गाली दी थी और उसके खिलाफ महिलाओं ने आवाज मुखर की थी. उन्हें सम्मान दिये जाने का दलित महिला आन्दोलनकारियों ने विरोध किया था और असोशिएशन का टीए-डीए के लिए कुलपति के समक्ष समर्पण का आरोप लगाया था.


जरूरत है आत्मनिरीक्षण की
शिक्षा में बदलाव की सरकारी तत्परता देखते हुए स्त्री अध्ययन विभागों/ केन्द्रों पर मंडरा रहा खतरा स्थायी है और एजेंडे के अनुरूप असर दिखाएगा भी. इस विषय की नेताओं ने कुछ विभागों और केन्द्रों  में इसके उद्देश्य को बनाये तो रखा लेकिन इसका विस्तार देश भर के केन्द्रों तक नहीं हुआ. यूजीसी और सरकार के लिए ऐसे केंद्र प्राणवायु हैं. यदि असोसिएशन और इस विषय के नेतृत्व ने आत्मनिरीक्षण नहीं किया तो वर्तमान और आसन्न संकट समीप है. उदहारण के तौर पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के केंद्र ने अपने कर्मचारियों और शिक्षकों की छटनी प्लान बजट के बारे में यूजीसी के नोटिफिकेशन के पहले ही कर दी थी.

और यह मजबूत आरोप 
स्त्री अध्ययन विभागों और इससे जुड़े प्राध्यापकों तथा आन्दोलन से सबसे उल्लेखनीय सवाल भारत के  पहले  मुकम्मल वामपंथी महिला संगठन एनएफआईडवल्यू की महासचिव एनी राजा करती हैं कि ‘इस विषय के भीतर एक ख़ास बेईमानी भारत में महिला आन्दोलन के इतिहास को लेकर है.  वे स्त्री आन्दोलन  को 74 के टुवर्ड्स इक्वलिटी रिपोर्ट और उसके बाद के आन्दोलनों तक ही सीमित कर देती हैं जबकि एनएफआई डव्ल्यू की स्थापना काफी पहले (1954) हो गयी थी. इन आन्दोलनों के काफी पहले इसकी स्थापना हो चुकी थी।  अरुणा आसफ अली को ये छोड़ देते हैं. ‘ यही आरोप दलित महिला आन्दोलन की तरफ से स्त्री अधययन और स्त्री आन्दोलन  पर लगाया जाता है. 1942 में डा. अम्बेडकर की उपस्थिति में नागपुर में हुआ दलित महिला सम्मलेन महिला मुक्ति का पहला घोषणापत्र पेश करता है, इसका नामोल्लेख तक नहीं होता।

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70 साल गौरव के, लोकतंत्र और समतामूलक सपनों के

स्त्रीकाल (प्रिंट )के अक्टूबर-दिसंबर अंक का संपादकीय 
संजीव चंदन


आजादी के 70 साल में कुछ नहीं हुआ. यह हालिया समय का सबसे बड़ा और बार-बार दुहराया जाने वाला एक ऐसा असत्य है, जिसका मुख्य लक्ष्य समाज और देश को पुनरुत्थानवादी  विचारों और व्यवस्था की ओर ले जाना है.  मेरे जैसे लोग 15  अगस्त 1947 को केन्द्रीय सत्ता के हस्तान्तरण, और इस सत्ता का देश के शासक वर्ग के हाथ में आने की तारीख के रूप में देखते हैं, जिसका बड़ा महत्व यह था कि तत्कालीन शासक वर्ग का केन्द्रीय नेतृत्व प्रगतिशील विचारों वाले लोगों के हाथ में था और इसीलिए 26 जनवरी 1950 को समता आधारित सपनों के साथ संविधान लागू हो सका, जो इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण तारीख है, जो एक मील के  पत्थर की तरह है और अब उसका भी लगभग 70 साल होने जा रहा है. इस 70 साल को नकार देना 1950 के उस महत्वपूर्ण घटना और उसके हस्तक्षेप तथा असर को नकार देना है.

हालांकि इन 70 सालों में संविधान पर आधारित शासन व्यवस्था के सकारात्मक असर के बीज अभी अंकुरित ही होने शुरू हुए है कि उसपर ‘कुश के ऊपर मट्ठे’ के प्रयोग जैसे हमले होने लगे हैं, वह डराने वाला जरूर है. देश में बढ़ती असहिष्णुता, भीड़तन्त्र की हिंसा, धर्म और राष्ट्रवाद के सम्मिश्रण से पैदा हुआ ‘राष्ट्रवादी आतंकवाद’ राज्य संरक्षित शिक्षण संस्थानों के लोकतंत्र पर हमले और जब पीछे छूट गये समाजों की लगभग पहली पीढ़ी वहाँ आ ही रही है तब उनके लिए दरवाजे बंद करना, या स्पेस को सीमित करना, महिलाओं पर बड़ी संख्या में हो रहे हमले आदि एक भयावह चित्र प्रस्तुत करते हैं. इन स्थितियों में यह जरूरी है कि विचार करें कि 70 सालों का आखिर हासिल क्या है, क्या यही जो दिख रहा है या यह पुनरुत्थानवादियों का प्रतिक्रियावाद है और इससे आने वाले समय में हम निपट सकने वाले प्रगतिशील राष्ट्र की तरह उभरेंगे!

इस समय और इन 70 सालों के हासिल को समझने के लिए बहुत सचेत और सावधान समझ की जरूरत है ताकि समझा जा सके कि उस सपने पर कोई संकट तो नहीं है, जो समतामूलक समाज के लिए 26 जनवरी 1950 को देखा गया था, या उसके पहले भी देखा गया था जब पहली बार महिलाओं, वंचितों के हित में पहली व्यवस्था की कोशिश हुई थी, जब सतीप्रथा के खिलाफ क़ानून बना था, जब एज ऑफ़ कंसेंट पर बहस हुई थी, जब बाल-विवाह के खिलाफ कानूनी हस्तक्षेप हुआ था, जब छुआछूत उन्मूलन की दिशा में पहला कदम लिया गया था, जब सबके लिए सुलभ शिक्षा की पहली पहल ली गई थी, जब देश में व्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके अधिकार की संरक्षा के उद्देश्य से पहली बार क़ानून और न्यायालय बना था, या ऐसे ही कई अन्य प्रगतिशील सामाजिक-राजनीतिक निर्णयों के वक्त!

विचित्र विरोधाभास की स्थिति है, जो एक तरह से शातिर शतरंजी चाल भी है, कि जो विचार परंपरा या ताकतें अपने युग की हर प्रगतिशील पहल के खिलाफ थीं और उन पहलों के बरक्स खुद दकियानूस, परंपरावादी और प्रतिक्रियावादी थीं, वह आज प्रगतिशीलों की शब्दावालियों में ही प्रगतिशील मूल्यों के खिलाफ माहौल बना रही हैं, क्रमिक युद्ध की स्थिति में हैं. बहुत पीछे जाने की जरूरत नहीं है, इसी 70 साल की अवधि के भीतर भी उनके व्यवहार, विचार, राजनीतिक एजेंडे और पहलों को देखें तो  समतामूलक मूल्यों के जो अवरोधक थे आज समतावादी समूहों की शब्दावली के साथ ही अपने लक्ष्य के प्रति निरंतर गतिशील हैं. उनका लक्ष्य उनके महान ‘यज्ञ’ का अंतिम फलाफल है, जिसमें वे कभी-कभी शातिर, चालाक और पैतरे बदलकर समिधा डाल रहे हैं. वे समाज में समानता के लिए पीछे छूट गये समाजों के अधिकार के लिए राज्य और समाज द्वारा किये जा रहे प्रयासों के खिलाफ थे, आंदोलनरत थे, लेकिन आज वे उन्हीं समाजों से मुट्ठी भर लोगों के अधिकार सम्पन्नता के खिलाफ उनसे भी पीछे छूट गये और असंतुष्ट समुदायों के साथ खड़े होने का भ्रम रच रहे हैं. हिन्दू महिलाओं के समान अधिकार के सिद्धांत की खिलाफत करने वाले लोग मुस्लिम महिलाओं के समान अधिकार के पक्ष में खड़े होने का छद्म रच रहे हैं. धन-अर्थ-काम-मोक्ष जैसे सारे तत्कालीन अधिकारों से एक बड़े समूह की वंचना की वकालत करने वाले लोग आज कश्मीर में वंचितों-दलितों के छिन गये अधिकार के पक्ष में खड़े होने का छद्म रच रहे हैं. 1984 में शाहबानो केस में, गुजारे भत्ते के सावाल पर वे काफी मुखर हुए और अब तीन तलाक के खिलाफ मुहीम के पक्ष में. विरोधाभास है कि भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम महिलाओं द्वारा दायर याचिका के समर्थन में अपनी दलीलें दीं, वहीं विवाह के भीतर 15-16 साल की लड़कियों का होने वाला जबरन बलात्कार के समर्थन में कोर्ट में हलफनामादाखिल किया. यानी वे मुसलमान महिलाओं के लिए फिक्रमंद हैं और हिन्दू महिलाओं के सांस्थानिक बलात्कार के पक्षधर!



उनके झांसे में आने से बचना होगा. सच यही है कि तीन तलाक के खिलाफ लड़ने वाली मुस्लिम महिलाओं को समर्थन देने वाला भी मुसलमान समाज ही है. मुस्लिम महिलाओं का संगठन, लड़ने वाली महिलाओं के मायके के लोग या उनके समर्थक, शाहबानो प्रकरण पर राजीव गांधी सरकार से इस्तीफा देने वाले आरिफ मोहम्मद खान जैसे लोग, क्योंकि राजीव गांधी शाहबानो के खिलाफ मुसलमान समाज के तबके के विरोध से डर कर झुक गये थे और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपनी सरकार के फैसले लिए.


आज तीन तलाक के खिलाफ अदालत और स्टेट की दखल का विरोध कर रहे वे वैसे ही लोग हैं जैसे हिन्दू कोड बिल, सती उन्मूलन, विधवा विवाह उन्मूलन आदि का विरोध करने वाले पुनरुत्थानवादी हिन्दू. वे लोग शरियत चाहते हैं तो पुनरुत्थानवादी हिन्दुओं के समविचारी पूर्वज मनुस्मृति के समर्थक थे. आज भी जब हिन्दू व्यवस्था में सुधार का प्रसंग आता है तो वे उसके खिलाफ होते हैं, लेकिन मुसलमान समाज को बुरा समाज सिद्ध करने के लिए उनके दकियानूस मुद्दों को जोर-शोर से उठा रहे हैं. यह खतरनाक है क्योंकि उनके मुद्दे गलत नहीं हैं इरादे गलत हैं, मुद्दे वही हैं जो प्रगतिशील जमातों के थे या उनके होने चाहिए थे.

इन 70 सालों में बहुत कुछ हासिल है वंचित जातियों और लिंग का, जिसे सुनिश्चित किया है संविधान ने. आज महिलायें ज्यादा स्वतंत्र हुई हैं, पितृसत्तात्मक जकड़न की गाठें कुछ हद तक ढीली हुई हैं, स्त्री-शिक्षा दर बढ़ा है, स्वास्थ्य का स्तर सुधरा है, विभिन्न संसाधनों में उनकी हिस्सेदारी बढ़ी है, स्पेस पर उनकी हिस्सेदारी और दावेदारी बढ़ी है, जिसकी प्रतिक्रिया में पितृसत्तात्मक वर्चस्व के एजेंट हमलावर हैं. यदि बलात्कार की घटनाओं की संख्या बढ़ी है तो उसका कारण है कि उसकी रिपोर्टिंग बढ़ी है. अब छेड़छाड़ खबरें बढ़ी हैं तो उसका कारण है कि महिलायें इनके खिलाफ सूचित कर रही हैं, मुंह खोल रही हैं. इसी हासिल के खिलाफ वर्चस्ववादी समूह आक्रामकता के साथ हमलावर भी है, इसलिए घटनाओं के कारण वे आक्रामक हमले भी है. वंचित जातियों के हासिल के संदर्भ में भी यही सच है तो इसी अनुपात का सच यह भी है कि उनपर भी आक्रामक हमला है और यह भी सच है कि वे भी आज संवैधानिक दायरे में अपने हक़ की आवाजें उठा रहे हैं, संघर्ष कर रहे हैं, इसलिए उनपर हमलों की घटनाएँ रिपोर्ट हो रही हैं. हाशिये के समाज का थोड़ा ही सही आगे आ जाना और लोकतंत्र तथा 70 साल पहले लागू हुआ संविधान अपना काम कर रहे हैं तो प्रतिक्रियावादी और पुनुरुत्थानवादी जमातें अपना.


वर्चस्वावादी, ब्राह्मणवादी ताकतों के हालिया हमलों और इरादों को निष्प्रभावी बनाने के लिए वंचित समूहों के नेतृत्व को इन 70 सालों के हासिल की चर्चा और उसका प्रसार करना चाहिए. बात करनी चाहिए इन प्रयास, समता के लिए जारी संघर्ष के सपनों की और उसे देखने तथा लागू कराने में संघर्ष करने वाले महान लोगों की, जनता को इसके लिए तैयार करना चाहिए कि शिक्षा, लोकतंत्र, न्यायालय, संविधान, संसद जैसे संस्थाओं की अक्षुण्णता सुनिश्चित हो अन्यथा वर्चस्वावादी ताकतों का पहला शिकार ये संस्थायें ही होंगी, जिनसे समाज के हाशिये के लोग ताकत पाते रहे हैं.

थोड़ा गौर करते हैं कि इन पुनरुत्थानवादियों के सपनों का समाज क्या है, वह ब्राह्मणवादी हिंदुत्व का राष्ट्रवाद कैसा समाज बनायेगा. इसे एक प्रसंग से समझते हैं. अभी विलियम डेलरिम्पल और अनिता आनंद की एक किताब खत्म की है:  ‘कोहिनूर, दुनिया के सबसे मशहूर हीरे की कहानी'(जगरनॉट). एक ऐतिहासिक उपन्यास सा लिखा गया यह कोहिनूर हीरे का प्रमाणिक इतिहास-लेखन है. किताब भरसक कोशिश करती है कि इसके ऐतिहासिक वजूद की विकास यात्रा को परत-दर-परत डॉक्यूमेंट किया जाये. वहीं इसके कालखंड की और हीरे की कहानी की अवांतर कहानियां, जो तब की मुख्यधारा का इतिहास हैं, इसे एक रचना के रूप में ऐतिहासिक उपन्यास का स्वरूप दे देती हैं. नायक कोहिनूर , रहस्यों, अफवाहों और अतिशक्योक्तियों की लिबास में लिपटा सर्वाधिक चर्चित नायकों में से एक है, जो बाद में हिन्दू राष्ट्रवादी भावना से जा जुड़ा. किताब का फलक विस्तृत है, जानकारियों और विभिन्न संवेदनाओं के लिए महत्वपूर्ण आश्रय और उद्दीपन हैं इसमें. लेकिन राष्ट्रवाद की कड़वी सच्चाइयों के भीतर आहों और अनसूनी कर दी गई कराहों के कब्र डरा देते हैं. राष्ट्रवादी अस्मिता, खासकर हिन्दू राष्ट्रवादी अस्मिता  की डरावनी तस्वीर है महाराणा रणजीत सिंह के साथ उनकी चंदन की चीता में उनकी 11 महारानियों का ज़िंदा जल जाना और साथ में अनेक दासियों का उपलों और कंडों की आग में-वीभत्स सती प्रथा का यह चित्र रूह तक हिला देता है. रणजीत सिंह के बाद भी अनेक राजाओं के साथ यह सिलसिला दुहराया जाता रहा, जलने वाली रानियों में 16 से लेकर 50 तक की उम्र की रानियाँ और इन्हीं उम्रों की दासियाँ लिजलिजाती, बूढ़ी वासना और महानता की उन्मत्त आकांक्षा  की आग में  पीढी-दर-पीढी जलती रही हैं, कितनी जीवित कराहती रही हैं. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का (दुः) स्वप्न इसी लिए डारता भी है, और इन 70 सालों पर, बल्कि पिछले दो सौ-ढाई सालों पर गर्व करने को जी चाहता है, जिसे वे सर्वाधिक बुरा समय मानते हैं- उनके शब्दों में कलियुग का चरम ! वे इसे ‘हंस चुगेगा दाना और कौआ मोती खायेगा वाली शब्दावाली में समझते, समझाते हैं.

स्त्रीकाल का यह अंक महिला आरक्षण को विशेष रूप से केन्द्रित है. आज आजादी के 70 सालों बाद भी संसद, विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिशत नगण्य है. पिछले दो दशक से महिला आरक्षण बिल संसद में पारित नहीं हो पा रहा है, कारण किसी भी राजनीतिक दल का इसके प्रति गंभीर नहीं होना है. स्त्रीकाल न सिर्फ समय-समय पर इस मुद्दे को उठाता रहा है, बल्कि सांस्थानिक रूप से इसके लिए सक्रिय है.

2012 में स्त्रीकाल के दलित स्त्रीवाद अंक के बाद हम इसे त्रैमासिक पत्रिका के रूप में पुनः एक शुरुआत दे रहे हैं. इसके पहले यह पत्रिका अनियतकालीन रही है. 2012 के बाद हालांकि इसका वेब वर्जन (www.streekal.com) 2014 से निरंतर और दैनिक प्रकाशन है. इसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने भी शोध-पत्रिका के रूप में मान्यता दी है. हम द्विमासिक ऑनलाइन शोध जर्नल भी प्रकाशित कर रहे हैं. आपका सहयोग अपेक्षित है.


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अपने यौन शोषण की घटनायें बताने का हैश टैग #MeToo

ट्वीटर पर पाने जीवन में कभी न कभी हुए यौन शोषण की घटना का विवरण देने का सिलसिला #MeToo हैश टैग के साथ ट्रेंड कर रहा है. 30,000 से अधिक महिलाएं, जिनमें अभिनेता एलिसा मिलानो और अन्ना पाकीन और एमपी स्टैला क्रैसी भी शामिल हैं, अभियान में शामिल हुई भारत की चर्चित हस्तियों ने भी अपनी आपबीती बतानी शुरू की है. यह ट्रेंड फेसबुक पर भी आकार ले रहा है.

हार्वे वेन्स्टीन के आरोपों के प्रकाश में, Me Too का इस्तेमाल यह दिखाने के लिए किया जा रहा है कि यौन उत्पीड़न और हमले कैसे व्यापक हैं.

रविवार को अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने एक टिप्पणी ट्वीट की थी कि “एक मित्र ने सुझाव दिया है: यदि सभी महिलायें, जो यौन उत्पीड़न या हमले की शिकार  वे ” Me Too ” शीर्षक से लिखें तो  हम लोगों को समस्या की भयावहता से अवगत करा सकते हैं.”

उन्होंने लिखा “अगर आपको यौन उत्पीड़न का शिकार होना पडा है, तो प्रत्युत्तर में ‘ Me Too’ लिखें. इस कैम्पेन में शामिल होते हुए प्रसिद्ध कॉमेडियन मल्लिका दुआ ने बचपन में अपने साथ हुई यौन शोषण की घटना के बारे में लिखा है. भारत से भे एप्रमुख हस्तियाँ लिख रही हैं वहीं फेसबुक पर भी यह ट्रेंड करने लगा है.


टच ही तो किया है न और कुछ तो नहीं किया न 

अब प्रसिद्ध कॉमेडियन मल्लिका दुआ ने बचपन में अपने साथ हुई यौन शोषण की घटना का खुलासा किया है.

कॉमेडियन मल्लिका दुआ ने अपने फेसबुक और सोशल मीडिया पर एक पोस्‍ट के तहत बताया कि वह 7 साल की उम्र में उनके साथ भी यौन शोषण की घटना हुई है. मल्लिका ने अपने पोस्‍ट में लिखा, ‘ मैं भी… अपनी खुद की कार में. मेरी मां कार चला रही थीं जबकि वह हमारे साथ पीछे बैठा था और पूरे समय उसका हाथ मेरी स्‍कर्ट में था. मैं सिर्फ 7 साल की थी और मेरी बहन 11 साल की. उसका हाथ मेरी स्‍कर्ट के अंदर था और मेरी सिस्‍टर की पीठ पर था. मेरे पिता ने, जो उस समय दूसरी कार में थे, उसका मुंह तोड़ दिया क्‍योंकि उसी रात उन्‍होंने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया था.’

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बाल विवाह के लिए अभिशप्त लड़कियाँ

उपासना बेहार

लेखिका  सामाजिक कार्यकर्ता हैं और महिला मुद्दों और बाल अधिकारों को लेकर मध्यप्रदेश में लम्बे समय से काम कर रही हैं संपर्क :’
upasana2006@gmail.com

‘‘मैं अभी बहुत पढ़ना चाहती हूँ लेकिन मेरे घर वाले मेरी शादी जबरदस्ती करवा रहे थे। शादी रुक जाने से बहुत खुश हूँ और अब मैं फिर से स्कूल जा पाऊँगी और अपने मां पिता को कुछ बन कर दिखाऊंगी।’’ ये कहना था 13 साल की तनु की जिसका बाल विवाह होने जा रहा था और प्रशासन की मुश्तेदी से यह विवाह रुक गया। मध्यप्रदेश के उज्जैन के जमुनिया खुर्द गाँव की 13 साल की सोनू और तनु के विवाह की तैयारियाँ चल रही थी। जिसे प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद रद्द किया गया। यह घटना उसी 24 जनवरी के चंद रोज पहले हुआ है जिस दिन को पूरा देश ‘नेशनल गर्ल चाइल्ड़ डे’ के रूप में मनाता है।

देश और प्रदेश में ऐसी हजारों तनु और सोनू जैसी बच्चियाँ हैं जो पढ़ना चाहती थी कुछ बनना चाहती थी लेकिन उन सब की आकांक्षाएँ और अरमान बाल विवाह की भेंट चढ़ गयी।


संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया का ऐसा छठा देश है, जहां बाल विवाह का प्रचलन सबसे ज्यादा है। भारत में 20 से 49 साल की उम्र की करीब 27 फीसदी महिलाएं ऐसी हैं जिनकी शादी 15 से 18 साल की उम्र के बीच हुई है। जुलाई 2014 में यूनिसेफ द्वारा ‘एंडिग चाइल्ड मैरिजः प्रोग्रेस एंड प्रास्पेक्ट्स’ शीर्षक से बाल-विवाह से संबंधित एक रिपोर्ट जारी की गई। इस रिपोर्ट के अनुसार विश्व में 720 मिलियन महिलाएं ऐसी हैं, जिनकी शादी 18 साल या इससे कम उम्र में हो गई है। विश्व की कुल बालिका वधु की एक तिहाई बालिका वधु भारत में पाई जाती है अर्थात् प्रत्येक 3 में से 1 बालिका वधु भारतीय है।

इसी प्रकार वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार मध्यप्रदेश में वर्ष 2012-13 में वर्ष 2011-12 की तुलना में अधिक बाल विवाह हुए हैं। प्रदेश में लड़कियों के बाल विवाह की दर पिछले वर्ष की अपेक्षा वर्ष 2012-13 में 20 जिलों में बढ़ी है जिसमें सबसे ज्यादा झाबुआ, दूसरे स्थान पर शाजापुर तथा तीसरे स्थान पर राजगढ़ है। वैसे प्रदेश में बाल विवाह लड़कियों में लड़कों की तुलना में कम रही है, लेकिन पिछले वर्ष 2011-12 की तुलना में बालिका विवाह 0.2 फीसदी की वृद्धि हुई है।

अगर लड़कों के बाल विवाह को देखें तो उनके बाल विवाह के जिलों में भी बहुत ज्यादा बढ़ोत्तरी हुई है। वर्ष 2012-13 में 21.3 फीसदी लड़कों के विवाह 21 वर्ष से कम उम्र में हुए है, जबकि पिछले वर्ष यह दर 18.3 फीसदी रही। वर्ष 2012-13 में 35 जिलों में लड़कों के बाल विवाह बढ़े हैं और इसमें 10 फीसदी वृद्धि की दर से झाबुआ प्रथम स्थान पर है, वहीं शाजापुर 9.6 फीसदी दर के साथ दूसरे और टीकमगढ़ 42.7 के साथ तीसरे पर है। इसी तरह इंदौर, भोपाल और जबलपुर जैसे शहर भी बाल विवाह वृद्धि दर से अछूते नहीं है।

बाल विवाह बाल अधिकारों का उल्लंघन है। लिंगभेद, अशिक्षा, अज्ञानता, असुरक्षा, धार्मिक-सामाजिक मान्यताएँ, रीति-रिवाज, परम्पराएं, लड़कियों को कमतर समझना, उन्हें आर्थिक बोझ मानना, इत्यादि प्रमुख कारण है। समाज की यह सोच भी कि लड़कीयों की कम उम्र में शादी कर देने से वे दूसरे घर में जल्दी सामंजस्य बिठा लेती हैं, यह भी बाल विवाह के अनेक कारणों में से एक है।

जिन बच्चियों का बाल विवाह होता है उनका शारीरिक, मानसिक, सामाजिक व शैक्षणिक विकास सही तरिके से नहीं हो पाता है। कम उम्र में शादी होने से उन्हें गरिमापूर्ण जीवन जीने के, स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा के अधिकार से महरुम होना पड़ता है और वे हिंसा, दुर्व्यवहार, शोषण, यौन शोषण की शिकार हो जाती हैं। बाल विवाह के कारण बच्चियाँ कम उम्र में गर्भवती हो जाती हैं जिससे उनमें स्वास्थ्य समस्याएं होने की सम्भावना बहुत बढ़ जाती है और इसके कारण उनकी मृत्यु, गर्भपात में वृद्धि, कुपोषित बच्चों का जन्म, माता में कुपोषण, खून की कमी होना, शिशु मृत्यु दर, माता में प्रजनन मार्ग संक्रमण यौन संचरित बीमारियाँ बढ़ती हैं। कच्ची उम्र में माँ बनने वाली ये बालिकाएं न तो परिवार नियोजन के प्रति सजग होती हैं और न ही नवजात शिशुओं के उचित पालन पोषण में दक्ष होती हैं इस कारण बच्चों की सही देखभाल नहीं हो पाती और बच्चे ताउम्र कमजोर रहते हैं। अध्ययनों से यह सिद्ध हो चुका है कि 15 वर्ष की उम्र में माँ बनने से मातृ मृत्यु की संभावना 20 वर्ष की उम्र में माँ बनने से पांच गुना अधिक होती है।

कम उम्र में शादी करने से लड़कियाँ शिक्षा से वंचित हो जाती हैं। उनका भविष्य अंधकारमय हो जाता है। अनपढ़ या कम पढ़ी-लिखी होने के कारण वे अपने घर में बहुत ज्यादा आर्थिक सहयोग नहीं कर पाती हैं और गरीबी निरंतर बनी रहती है। इसके अलावा वे अशिक्षित होने के कारण अपने बच्चों को भी शिक्षित नहीं कर पातीं। यदि विवाह के पश्चात् पति कि मौत हो जाए तो उसे छोटी उम्र से ही विधवा का जीवन जीना पड़ता है। इस प्रकार से बाल विवाह लड़की को लिंगभेद, बीमारी, अशिक्षा एवं गरीबी के भंवरजाल में फंसा देता है और एक बार बच्ची इस जाल में फंस जाये तो उससे निकलना मुश्किल हो जाता है। कुल मिलाकर बाल विवाह का दुष्परिणाम जीवन भर सबसे ज्यादा बालिका बधू को भोगना पड़ता है।


बाल विवाह की कुरीति को रोकने के लिए 1928 में शारदा एक्ट बनाया गया था। इस एक्ट के मुताबिक नाबालिग लड़के और लड़कियों का विवाह करने पर जुर्माना और कैद हो सकती थी। आजादी के बाद से लेकर आजतक इस एक्ट में कई संशोधन किए गए है। सन् 1978 में इसमें संशोधन कर लड़की की उम्र शादी के वक्त 15 से बढ़ाकर 18 साल और लड़के की उम्र 18 से बढ़ाकर 21 साल कर दी गई थी। बाल ‘विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006’ की धारा 9 एवं 10 के तहत बाल विवाह के आयोजन पर दो वर्ष तक का कठोर कारावास एवं एक लाख रूपए जुर्माना या दोनों से दंडित करने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा बाल विवाह कराने वाले अभिभावक, रिश्तेदार, विवाह कराने वाला पंडित, काजी को भी तीन महीने तक की कैद और जुर्माना हो सकता है। बाल विवाह की शिकायत कोई भी व्यक्ति निकटतम थाने में कर सकता है। अगर बाल विवाह हो जाता है तब किसी भी बालक या बालिका की अनिच्छा होने पर उसे न्यायालय द्वारा वयस्क होने के दो साल के अंदर अवैध घोषित करवाया जा सकता है।

देश में बाल विवाह के खिलाफ कानून बने हैं और समय के अनुसार उसमें लगातार संशोधन कर उसे ओर प्रभावशाली बनाया गया है फिर भी बाल विवाह लगातार हो रहे हैं। अगर सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद देश में बाल विवाह जैसी कुप्रथा का अंत नहीं हो पा रहा है, तो इस असफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि बालविवाह एक सामाजिक समस्या है और इसका निदान सामाजिक जागरुकता से ही सम्भव हो सकेगा। केवल कानून बनाने से यह कुरीति खत्म नहीं होने वाली है।

अगर इस कुप्रथा को जड़ से खत्म करना है तो इसके लिए समाज को ही आगे आना होगा तथा बालिकाओं के पोषण, स्वास्थ्य, सुरक्षा और शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करना होगा। समाज में शिक्षा को बढ़ावा देना होगा। अभिभावकों को बाल विवाह के दुष्परिणामों के प्रति जागरुक करना होगा साथ ही साथ सरकार को भी बाल विवाह के विरुद्व बने कानून का जोरदार ढंग से प्रचार-प्रसार करना होगा तथा कानून का कड़ाई से पालन करना होगा। बाल विवाह प्रथा के खिलाफ समाज में जोरदार अभियान चलाना होगा। साथ ही साथ सरकार को विभिन्न रोजगार के कार्यक्रम भी चलाना होगा ताकि गरीब परिवार गरीबी की जकड़ से मुक्त हो सकें और इन परिवारों की बच्चियाँ बाल विवाह का निशाना न बन पाएं।

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लघुकथाएं

संध्या तिवारी

हिन्दी की प्राध्यापिका, कवयित्री और कहानीकार.. संपर्क : 9810201120
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सांकल

पिछले दो सालो से साथ पढ़ती पायल और पूर्वी अब तक फास्ट फ्रैन्ड बन चुकी थी,  लेकिन पायल घर कम ही आती और आती तो बाहर बाले कमरे तक।

मम्मी ईशान कोण में बने पूजा गृह के समक्ष ऊन से बने धवल आसन पर बैठ चुकी थी। कितनी पवित्र लग रही थी खुले गीले बालो में। मानो केशो से पानी के मोती टपक रहे हो।

मम्मी आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ के लिये आचमन कर चुकी थी अब तो बह बोलेगी नहीं जब तक “ऊं अस्य श्री बाल्मीके  रामायणे आदित्य हृदय स्तोत्र ऊं तत्सत” नहीं कह लेती।

मन ही मन सोचती पूर्वी ने धीरे से कार्ड  मम्मी के पास रख दिया और खुद काम में लग गयी।

“किसका कार्ड है यह,  और  यहां किसने रखा ?? ”
कार्ड पर नजरे गडाये मम्मी गुस्से से उबल रहीं थी

मम्मी पायल के भाई की शादी है,  और बही कार्ड दे गयी। आप पूजा से उठते ही देख लो,  इसलिये मैने ही रख दिया। क्या कुछ गलत हुआ ?? पूर्वी ने सहमते हुये पूंछा।


हे भगवान!!! धरम भ्रष्ट कर दिया पूर्वी तूने। एक ब्राह्मण के यहां जन्म ले के एक वाल्मीकि से दोस्ती? तुझे कोई और सहेली नहीं मिली। देख कार्ड पर बाकायदा पायल के भाई के नाम के आगे वाल्मीकि लिखा है। ये लड़की न……….. आगे से तुम्हारी पायल से दोस्ती खत्म और हां कार्ड कूड़ेदान में डालकर नहाओ!… और मैने भी तो कार्ड छू लिया है मुझे भी अब दोबारा नहाना पड़ेगा।“
“ऊंहूं…………… लेकिन मम्मी  आप तो रोज ही वाल्मीकि  का लिखा स्तोत्र पढ़ कर पुण्यार्जन करती हो और पवित्र होती हो।” पूर्वी ने डरते डरते कहा

“चोऽऽऽप्प।“ मम्मी की धारदार आवाज रीढ़ की हड्डी चीर गयी।

 चिमटी

आत्मा पर बडा बोझ था,  जो रातों में सपना बन कर डराता था और दिन में सोच।

अब क्या करूं,  मैं तो था ही कायर,  लेकिन वह तो समझदार थी,  उसे अपनी जान देने की क्या जरूरत थी। वह मरकर मुक्त हो सकी भला क्या? और मै जीकर भी मुक्त हो पाया भला क्या उसकी यादों से। क्या करूं? कहां जाऊं ?कैसे इस अपराध बोध से मुक्ति होगी ?

न्हीं बातो की सोच में डूबता उतरता विपुल बान की खरखटी खटिया पर बैठा  कभी एक छेद मे हाथ डालता कभी अदबाइन के सहारे सहारे अंगुलियां किसी और छेद में जा ठहरती। जैसे सोच के कई खाने बने हो और उनमें से किस खाने में ग्लानि की भरपाई का मल्हम मिलेगा  अंगुलिया टोहकर ढूंढ़ना चाह रही हों।
“आऊच…” कहकर उसने हाथ खींच लिया बान की फांस अंगुली के मांस में धंस चुकी थी। वह नाखूनों की चिमटी बनाकर फांस निकालने का भरसक प्रयत्न कर रहा था लेकिन फांस थी कि अन्दर ही अन्दर टूटती जा रही थी। फांस मांस मे धंस चुकी थी  बहुत दर्द और चीसन बढ गयी थी। “अब तो इसके लिये बाजार से चिमटी ही लानी पडेगी तब  कहीं जाकर”… कहकर विपुल तर्पण के लिये जल,  काले तिल,  जौ,  फूल की थाली,  कुश की पैंती और सफेद फूल अंजुली में भर कर बैठा।


“आप पिछले कई सालो से किसका तर्पण कर रहे है? भगवान की कृपा से मां बाऊ जी सभी कुशल मंगल से है,  तो…?”

पत्नी जिज्ञासा और प्रश्न चिन्ह की प्रतिमूर्ति सी बनी खडी थी।

विपुल अपनी फांस लगी अंगुली की चीसन दबाते हुए बोला, “तर्पण कहां है यह,  यह तो मन की फांस की चिमटी है…”  और अंजुली भरे पानी में दो आंसु  टपक गये।

हूटर

मुझे  फैक्ट्री के सारे मुलाजिम हमेशा ही फैक्ट्री में बजने बाले हूटर के गुलाम सरीखे दिखते थे।   हालांकि ये सब नियम से नहाते-धोते, खाते-पीते थे,  लेकिन इनके  जीवन में स्फूर्ति न थी।
एक यन्त्रवत जीवन यापन था। एक अनकही यन्त्रणा थी।

सबेरे पांच बजे के हूटर पर मन हो या न हो बिस्तर छोड़ देना। सात बजे के हूटर पर टिफिन का झोला साइकिल में लगाये,  साढ़े सात के हूटर पर फैक्ट्री गेट के अन्दर आई कर्ड पंच करने से लेकर,  इस कैद खाने से छूटने की शाम सात बजे तक के हूटर की थका देने बाली अविराम प्रतीक्षा,  फैक्ट्री में काम करने बाले हर कर्मचारी के हिस्से की दिनचर्या थी।

नापसंदगी ही कभी-कभी जीवन का अभिन्न अंग बन जाती है।
शादी के बाद मेरा जीवन भी हूटराधीन था।
“हूटर के दास पति की दासी अर्थात् दासनुदासी।”


एक दिन हूटर की आवाज पर वह उठा,  उस दिन उसका चेहरा जल्दी में नहीं लग रहा था,  हां कुछ-कुछ चोर निगाहों से मुझे जरूर देख रहा था।

मैने टिफिन दिया। उसने टिफिन लेते हुये अपनी अंगुली मुझसे न छू जाये इसका भरसक प्रयत्न किया।

मैने नोटिस किया,  लेकिन किसी अशुभ विचार से कहीं “पल्ला न छू जाये इस डर से पल्ला झाड लिया।”

वह किसी स्वामिनी का हाथ पकड़े इस हूटर की परिधि से कहीं बाहर चला गया था।

और मैं,  दासानुदासी हूटर की गुलामी करती,  आज भी सुबह के पांच बजे के हूटर पर बिस्तर छोडकर शाम के सात बजे के हूटर पर दरबाजे की कुंडी खोल हर आहट पर ऐसे कान लगाये रहती हूं जैसे पूरे शरीर में कान ही कान उग आये हो।

लेकिन सुनाई पड़ती है तो, केवल सात,  सवा सात,  साढे सात के हूटर की आवाज। जो रोज मुझे हूट करती है,  और मैं इसका कुछ नहीं कर पाती।

उफ्फ!!!

किराये का ड्राम खाली कर के देना था दुकान मालिक को। उसमें रखे वर्फ के पानी को किसमें लौटा जाय इतना बड़ा कोई बर्तन न मिलने के कारण पानी नाली में बहाया जा रहा था।

वह झुलसा देने बाली गर्मी में खड़ा ये सब देख रहा था। उसे लगा उसका गला भी प्यास से चटक  जायेगा। क्यों न वह भी अपनी बोतल ठंडे पानी से भर ले? लेकिन कल जब वह भाभी से पानी मांगने गया था,  तो भाभी ने उसे कितनी गालियां दीं थीं, और बिना पानी के ही भगा दिया था। अगर मां जिन्दा होती तो क्या कोई उसे पानी के लिये मना कर सकता था।

कमरे में घुसते ही वह प्यास के मारे बेहोश हो गया था। आज अगर भाभी के घर गया तो क्या भाभी भतीजे फ्रिज का पानी लेने देंगें। कल तो डांटा ही था आज हो न हो मारने ही लगें।

लेकिन प्यास थी,  कि अपने को जोर मार रही है। जो होगा देखा जायेगा। सोचकर वह घर की तरफ बढ़ा।

खूब सारे लोग है आज घर में। भाई भाभी कैसे चुपचाप है। कोई मुझे गाली क्यों नहीं नहीं दे रहा। आज अचानक क्या बदल गया? कोई मुझसे कुछ कहता ही नहीं। सब मेरी माला चढ़ी फोटो को घेर कर कितने मेवा मिष्ठान लिये बैठे है।

लेकिन मुझे तो बिल्कुल भूख नहीं है। मुझे तो प्यास लगी है बहुत तेज प्यास।

 क्षेपक

रात्रि भोज के लिये खाने की मेज पर बैठे बैंक मैनेजर मिस्टर एस लाल पचास साल पीछे की सीढ़ियां उतर गये, जब वह सुखिया हुआ करते था। बस जब गाँव की पाठशाला में हाजिरी होती थी तब सुखलाल नाम सुनाई पड़ता था। नहीं तो ये सुख्खी, ये सुखिया ऐसे सम्बोधन ही अन्तरमन पर गुदे हुये थे।

उसे अच्छी तरह याद है गाँव का नाम,  सौंखिया था। लेकिन गांव में जाति के आधार पर टोले बंटे थे जैसे पसिया टोला,  कुम्हारनटोला और उसका वाला था चमारन टोला।

उफ्फ !! झुरझुरी आ गई एस लाल को। पूरी खाल में चामरौधे की सडान्ध भिद गई।

खाना लगा दिया है “पत्नी माया की आवाज से वह वर्तमान में लौटे
“कुसुम कहां है? खाना नहीं खायेगी क्या?” एस लाल ने पूछा
“अपने कमरे में है आती होगी। आज ऑफिस से देर से आयी थी। कह रही थी,  ऑडिट है,  थोडा काम करना है।”
“हूंऽऽऊं। अरे वाह ! आज तो पनीर और खीर दोनो मेरी मनपसन्द चीजें बनायीं हैं क्या बात है,  कुछ कहना है क्या?
“जी” माया कुछ सकुचाते हुये बोली “कुसुम के साथ एक लडका काम करता है.. अच्छी पोस्ट पर है… और दोनों एक दूसरे को पसन्द भी करते है,  आप कहें तो……..?”
“ठीक हैऽ, ठीक हैऽ, भाई। हमें क्या आपत्ति हो सकती है।” खीर गटकते हुये उन्होने
पत्नी को प्यार से देखा।
“लेकिन वह………….” पत्नी हकलायी
“लेकिन क्या ? ” एस लाल विराम चिह्न से प्रश्नवाचक बन गये थे।
“जी वह….. मु……स……ह….र”
अचानक खीर के बर्तन में सुअरों को अपनी थूथन घुसाने का बिम्ब बना सुखिया से  एस लाल बने सुखलाल अगिया बेताल बन गये।

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दो लाख ले लो और मेरा पति लौटा दो: महाराष्ट्र सरकार से किसान विधवायें

महाराष्ट्र के यवतमाल जिले में कीटनाशकों के छिडकाव से मारे गये किसानों की विधवायें भीख मांगकर सरकार को दो लाख रूपये देना चाहती हैं, और अपने मृत पति के वापसी चाहती हैं. ऐसा वे सरकार द्वारा उन्हें बतौर मुआवजा  दिये जा रहे दो लाख रूपये और मुम्बई में स्टेशन हादसे में मारे गये लोगों को 5 लाख रूपये दिये जाने के प्रति रोष व्यक्त करने के उद्देश्य से कर रही हैं. इस बीच आम आदमी पार्टी के नेता जम्मू आनंद ने बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच में याचिका दाखिल कर मृतक के परिवारों को 20 लाख रूपये और प्रभावितों को 10 लाख रूपये के अतिरिक्त प्रतिबंधित दवाएं बेचने वाली कंपनियों और अधिकारियों पर ह्त्या का मुकदमा दर्ज करने की मांग की है. राज्य की भाजपा सरकार शाख बचानाने के लिए आंशिक रूप से हरकत में दिख रही है. यवतमाल से नितिन राउत की रिपोर्ट: 

यवतमाल के अस्पताल में दाखिल प्रभावित किसान

महाराष्ट्र के यवतमाल की किसान विधवायें भीख मांगकर दो लाख रूपये सरकार को देना चाहती हैं और अपना पति वापस चाहती हैं. पिछले दिनों यवतमाल जिले में फसलों पर कीटकनाशक का छिडकाव करते समय कीटकनाशक के प्रभाव में आने से 21 किसानों की मौत हो गयी थी. महाराष्ट्र सरकार मुआवजे के तौर पर मृत किसान के परिवार को 2 लाख रुपये देने की घोषणा कर चुकी है. लेकिन इस मुआवजे पर एक किसान की पत्नी ने ऐतराज जताया. वह सवाल करती है कि ‘मुंबई स्टेशन पर दुर्घटना में मरने वालों को 5 लाख रुपये तो किसानों की मौत की कीमत 2 लाख क्यो? वह इस भेदभाव से दुखी है और सरकार को भीख मांगकर 2 लाख देकर उसका पति वापस चाहती है.’

बंडू सोनोले की मौत जहरीले कीटकनाशक के छीडकाव से हुई थी .लेकीन पति के गुजर जाने के महज चंद दिनो बाद उनकी पत्नी गीता को सरकार बडा जख्म दे रही है. गीता की तरह सारी किसान विधवायें सरकार के फैसले से दुखी हैं. इस बीच आम आदमी पार्टी के नेता जम्मू आनन्द ने बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच में किसानों के लिए 20 लाख रूपये की मांग करते हुए याचिका दाखिल की है.

गांधी के गाँव से छात्राओं ने भेजा प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री को सेनेटरी पैड: जारी किया वीडियो

यवतमाल जिले में रोष व्याप्त है. इस रोष के कारण ही राज्य सरकार के एक मंत्री पर उसी जहरीले कीटनाशक के छिडकाव की कोशिश की गई, जिससे किसान मरे. किसान इस बात से भी नाराज हैं कि राज्य के मुख्यमंत्री अबतक किसानों से मिलने यवतमाल नहीं पहुंचे. जाँच के लिए कई समितियों गठन किया गया. एक समिति की रिपोर्ट के बाद जिला कृषि विकास अधिकारी को निलम्बित कर मामले की लीपापोती की शुरुआत हो गयी है.



महाराष्ट्र का यवतमाल एक ऐसा जिला है जो किसान मौत के चलते सुर्खियो मे रहता है साल दर साल दिल दहला देने वाले आंकड़े यवतमाल से आते हैं. इसी जिले की किसान विधवा कलावती के घर राहुल गांधी के जाने के बाद पूरे देश को किसान विधवाओं का दर्द पता चला था. आज जहरीले छिडकाव के चलते यवतमाल मौत की बंदरगाह बन चुका है .यवतमाल के साथ  बुलडाणा, गोंदिया, भंडारा, अकोला जिले में अबतक 34 किसानों की मौत ऐसे ही कीटनाशकों के छिडकाव के दौरान हुई है. तकरीबन 700 से अधिक किसान विषबाधा से बाधित है . 25 किसानों के अंधा होने की नौबत आ पडी है .

कीटकनाशक से विषबाधा का प्रकरण नया नहीं है. पिछले साल भी 150 किसानों को कीटनाशक छिडकाव करते समय विषबाधा हुई थी, उनमें से 6 किसानों की मौत हो गयी थी. लेकिन सरकार ने ठोस कदम नही उठाये. समय रहते सरकार ठोस कदम उठाती तो इन मासूम किसानों की मौत नहीं होती .

भारत मे कई जहारीले कीटनाशकों पर पाबंदी होने के बावजूद धडल्लेसे कीटकनाशक बेचे जाते हैं. जिसमें  कोब्रोरील , ट्रायझोफोज , डायक्लोरोव्ह जैसे कीटनाशक शामिल हैं . कपास पर आनेवाली कीटकनाशकों के लिये मालेथियोन, एन्डोसल्फान , कार्बारील , कॉपरऑक्सिक्लोराईड , वेटेबर, सल्फर , थायरम आदि जहरीली औषधी का इस्तेमाल होता है.   इस जहरीले व्यापार से सरकार अच्ची तरह से वाकीफ है मगर व्यापारियों के दवाब में सरकारें कारवाई करने से बचती हैं. कृषि मंत्रालयने 18 जानलेवा कीटकनाशकों में से 12 पर 2018 से रोक लगाई है. पर 6 जानलेवा कीटकनाशक बाजार मे धडल्ले से बिकते नजर आ रहे. इन्हें 2020 तक बेचने की अनुमति सरकार द्वारा दी गयी है.

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फ़ाइल फोटो: स्त्रीकाल

कृषि विभाग द्वारा इन जहरीले कीटकनाशको की जांच होनी थी.  लेकीन कृषि विभाग के अधिकारी किसान के खेतों तक क्यों पहुंचेंगे भला! हालांकि इसके लिये कृषि अधिकारी , कृषि सेवक, गुणवत्ता नियंत्रक आदि की नियुक्ति की जाती है. किसानों को  इसकी जानकारी देना बेहद जरुरी थ, क्योंकि कीटकनशक पर लिखी गई जानकारी अग्रेजी में लिखी होती है , जो किसानों के समझ से परे है.

बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच की सख्ती 
इस दर्दनाक हादसे के बाद जहां राज्य भर में किसानों के बीच आक्रोश है वहीं राज्य के और राष्ट्रीय मीडिया का रुख विचित्र है. कई बड़े मीडिया चैनलों और वेबसाईट पर इस मौत की वजह सिर्फ प्रशिक्षण का अभाव और सुरक्षा मानकों का उल्लंघन बताया जा रहा है. इसी चोर दरवाजे से भाजपा की सरकारों (राज्य और केंद्र) के बच निकलने का रास्ता है, क्योंकि मुख्य कारण जहरीली और हानिकारक दवाइयों की बिक्री पर वास्तविक रोक न होना है.’ आम आदमी पार्टी के नेता जम्मू आनंद ने नागपुर हाई कोर्ट में उन कंपनियों के खिलाफ भी कार्रवाई के लिए जनहित याचिका दायर की है, जो प्रतिबन्धित दवाएं बेच रही हैं. जम्मू कहते हैं , ‘ 3 दर्जन से अधिक किसान इस छिडकाव से मरे और 700 से ज्यादा प्रभावित हैं. इसीलिए न्यायिक जांच की मांग करते हुए मैंने याचिका डाली है. याचिका में न्यायिक जांच अथवा विशेष जांच समिति का गठन कर जाँच  के अलावा दोषी अधिकारी और कंपनियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग की गयी है, साथ ही मृत किसान परिवारों को 20 लाख तथा प्रभावित किसान परिवारों को 10 लाख रूपये की मुआवजे की मांग भी शामिल है.’ याचिकाकर्ता ने मांग के है कि कीटनाशक कंपनियों, दोषी अधिकारियों और फुटकर विक्रेताओं पर भारतीय दंड संहिता की धारा 304(सदोष मानव हत्या) और कीटनाशक कानून की धरा 29 के तहत एफआईआर दर्ज की जाये तथा प्रतिबंधित और जहरीली दवाओं की बाजार में उपलब्धता पर रोक लगाई जाये, साथ ही मौजूद दवाओं को जब्त कर संबंधित दुकानों को सील किया जाये.
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यवतमाल में किसानों के बीच आप नेता जम्मू आनंद

मुनाफाखोरी में सरकार और कंपनियों की मिलीभगत 
आप नेता जम्मू आनंद ने स्त्रीकाल से बातचीत करते हुए कहा कि ‘कीटनाशक कानून 1968 व कीटनाशक नियम 1971 के प्रावधानों का राज्य में कडाई से पालन नहीं होता है. मुनाफाखोरी के लिए कम्पनियां किसानों की जान से खेल रही हैं और सरकार तथा नेताओं का उन्हें संरक्षण प्राप्त है.

क्या है ‘ कीटनाशक कानून 1968 व कीटनाशक नियम 1971
मई 1958 में केरल व चेन्नई में कीटनाशक का छिडकाव के वक्त प्रभावित सैकड़ों किसानों की मौत हो गयी थी. उसकी जांच के लिए बनी समिति ने कीटनाशकों के उपयोग, बिक्री और इस्तेमाल के लिए नियम बनाने की संस्तुति की थी, जिसके अनुसार 2 सितम्बर 1968 से कीटनाशक क़ानून देश में लागू है. क़ानून की धारा 36 के अनुसार कीटनाशक के उपयोग के लिए नियम 1971 में बने से लागू हुआ. इसके अनुसार किसानों को प्रशिक्षण देना, कीटनाशक से सरंक्षण के लिए उपकरण और कपड़े आदि देना अनिवार्य है.

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प्रभावित किसान परिवार


याचिका का असर

8 अक्टूबर को याचिका की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट का रुख महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ काफी कडा था. नोटिस करते हुए कोर्ट ने जिले के अधिकारियों ने व्यक्तिगत स्तर पर यह हलफनामा दाखिल करने को कहा कि उन्होंने जिले में प्रतिबंधित कीटनाशकों की बिक्री पर रोक, जहरीले कीटनाशकों के छिडकाव के लिए प्रशिक्षण देने और किसानों की मौत के बाद दोषियों पर कार्रवाई के लिए क्या-क्या कदम उठाये हैं. हरकत में आई सरकार के मुखिया देवेन्द्र फडनवीस ने विशेष जाँच समिति का गठन कर दिया है और घोषित किया है कि दोषियों के खिलाफ एफआईआर भे दर्ज करवाई जायेगी.

नितिन राउत अमरावती जोन से पत्रकारिता करते हैं, मराठी की सरोकारी पत्रकारिता में स्थापित होता नाम. सम्पर्क: 9767777917

तस्वीरें गूगल के माध्यम से सम्बंधित वेबसाईट से साभार




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