आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा : आख़िरी किस्त

रमणिका गुप्ता
रमणिका गुप्ता स्त्री इतिहास की एक महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं . वे आदिवासी और स्त्रीवादी मुद्दों के प्रति सक्रिय रही हैं . 'युद्धरत आम आदमी' की सम्पादक रमणिका गुप्ता स्वयं कथाकार , विचारक और कवयित्री हैं . आदिवासी साहित्य और संस्कृति तथा स्त्री -साहित्य की कई किताबें इन्होने संपादित की है. संपर्क :मोबाइल न. 9312039505.

( हम यहाँ रमणिका गुप्ता की शीघ्र प्रकाश्य आत्मकथा सीरीज ' आपहुदरी' के एक अंश किश्तों में प्रकाशित कर रहे हैं. रमणिका जी के जीवन के महत्वपूर्ण हिस्से धनवाद में बीते , जहां वे खुदमुख्तार स्त्री बनीं, ट्रेड यूनियन की सक्रियता से लेकर बिहार विधान परिषद् में उनकी भूमिका के तय होने का शहर है यह. 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' से कोयलानगरी की राजनीति को समझने वाली हमारी पीढी को यहाँ स्त्री की आँख से धनबाद से लेकर राज्य और राष्ट्रीय राजनीति के गैंग्स्टर मिजाज को समझने में मदद मिलेगी, और यह भी समझने में कि यदि कोइ स्त्री इन पगडंडियों पर चलने के निर्णय से उतरी तो उसे किन संघर्षों से गुजरना पड़ता रहा है , अपमान और  पुरुष वासना की अंधी गलियाँ उसे स्त्री होने का   अहसास बार -बार दिलाती हैं. उसे स्थानीय छुटभैय्ये नेताओं से लेकर मंत्री , मुख्यमंत्री , राष्ट्रपति तक स्त्री होने की उसकी औकात बताते रहे हैं . ६० -७० के दशक से राजनीति के गलियारे आज भी शायद बहुत बदले नहीं हैं. इस आत्मकथा में अपनी कमजोरियों को अपनी ताकत बना लेनी की कहानी है  और ' हां या ना कहने के चुनाव' की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष की भी कहानी है. इस जीवन -कथा की स्त्री उत्पीडित है, लेकिन हर घटना में अनिवार्यतः नहीं.   इस आत्मकथा के कुछ प्रसंग आउटलुक के लिए रमणिका जी के साक्षात्कार  में पहले व्यक्त हो चुके हैं. )

( आख़िरी किश्त  :पीछे चार   किश्तों में हम ६० सत्तर के दशक में कोयला नगरी से चल रही बिहार की खूनी और धनबल आधारित राजनीति ,तत्कालीन मुख्यमंत्री के बी सहाय से से लेकर स्थानीय नेताओं की कामुकता के बारे में पढ़ चुके हैं . साथ ही पढा है   भारत के राष्ट्रपति बने नीलम संजीव रेड्डी सहित पुरुष नेताओं की आक्रामक लम्पटता की कथा है , जिसकी लेखिका खुद भुक्तभोगी बनीं बिहार की तत्कालीन जातिवादी राजनीति के दाँव पेंच का विवरण है , जिसमें मुख्य खिलाड़ी , भूमिहार , राजपूत, ब्राहमण और कायस्थ नेता थे .रमणिका गुप्ता की आत्मकथा के इन अंशों में बिहार की राजनीति के ऐतिहासिक दस्तावेज हैं एक स्त्री के नजरिये से .  चौथी   किश्त में बिहार और देश की राजनीति के कुछ और पहलू थे  , जिसके कुछ जीवित पात्र अपनी बात भी रख सकते हैं . आख़िरी किश्त में आन्दोलन में सक्रिय रमणिका गुप्ता , संसद में जूता फेकने- अभियान  का नेतृत्व करती रमणिका गुप्ता के साहस और जुझारूपन के किस्से हैं . साथ ही राजनीति के गलियारों में प्रेम तलाशती स्त्री की कहानी भी , जो पुरुषों की वासना से गुजरती हुई उन्ही रेगिस्तानी मंजरों में पानी का एक सोता पा लेती है , प्रेम पा लेती है , प्रेम कर बैठती है.  इन्हें पिछले चार  किस्तों  के साथ पढ़ें )



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तब संसद में रमणिका गुप्ता के नेतृत्व में जूते फेंके गए थे

‘‘वाह! चंदे से कपड़ा नहीं लाएंगे तो कहाँ से लाएंगे, हम लोग कहीं कुछ कमाते हैं क्या?’’तब लेखानंद ने कहा,‘‘ये नियम केवल आप पर ही लागू क्यों होगा? सब पर लागू होगा न?’’मैंने कहा कि सबसे पहले धनबाद वाले छात्र  को कपड़े चाहिए। बाकी लोगों के पास फिर भी कुछ न कुछ है। लेकिन इस प्रकार बिना राय किए पैसा खर्च करना उचित नहीं है। मेरी राय में उस पैसे को खर्च करना नहीं चाहिए था। पर अब जब अवधेश  बाबू ने अपने पर खर्च कर ही दिया था तो सबके लिए एक-एक जोड़ा कपड़ा खरीदने का फैसला हुआ।

अगले दिन सवेरे ही अखबारों में हमने देखा कि मुखपृष्ठ  पर मेरी फोटो के साथ खबर छपी है। राम सेवक यादव जी ने पार्लियामेंट में पुलिस द्वारा हमारे साथ किए गए अभद्र व्यवहार का मामला उठाया था। अखबार में इसका विस्तारपूर्वक ब्यौरा और हमारी यात्रा का मकसद भी छपा था। रामसेवक जी के घर पर पुलिस के आई.जी. ने आकर हम लोगों से माफी भी माँगी। हम लोगों को इतनी उम्मीद नहीं थी कि ये खबर इतनी बड़ी हो जाएगी। खैर, उस दिन कई अखबार वाले हम लोगों से मिलने आए और वे लोग मेरा, शफीक आलम, लेखानंद और कुसुम का इंटरव्यू लेकर चले गए।

संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एस.एम. जोशी हमसे आकर मिले और हमारी रास्ते की सारी कठिनाइयों का ब्यौरा सुना। इस बीच पार्टी के कई वरिष्ठ एम.पी. और साथी बारी-बारी से हमारे भोजन की व्यवस्था भी करते रहे। उसमें असम के एम.पी. बेज बरण बरूआ भी थे। जोशी जी ने हमें ताकीद की कि किसी भी हालत में हम लोगों को ट्रकों में चढ़कर नहीं जाना है। उन्होंने सभी सांसदों से हमारी सहायता करने की अपील की और हमें रेल से जाने की राय दी। हालांकि इस बीच मैं दिल्ली ट्रक एसोसिएशन वालों से जाकर बात कर आई थी, जो अहमदाबाद की ओर जाने वाले ट्रकों से हमें भिजवाने को तैयार थे। मैं तो शायद रेल से जाना स्वीकार न करती लेकिन हमारे बाकी साथी जोशी जी की बात की आड़ लेकर रेल से जाने की जिद्द करने लगे। हम पास बनवा कर पार्लियामेंट हाउस गए और वहाँ सांसदों से चंदा माँगा। मैं महारानी पटियाला से भी मिली और उन्हें मैंने बताया कि मैं डाक्टर कर्नल प्यारे लाल बेदी की बेटी हूँ, जो पटियाला में उन्हीं की सेना में थे। वे बहुत खुश हुईं। उन्होंने मुझे सौ रुपये चंदा दिया। बाकी सबसे हम दस-दस रुपए चन्दा ले रहे थे।

इस बीच मैं अपने भाई रवि बेदी, भाभी बिमला और उसके बच्चों को भी मिल आई थी, जो तिलक मार्ग में रहते थे। मेरे भाई टाइम्स आॅफ इंडिया के चीफ फोटोग्राफर थे। रात को आकर मैं अपने साथियों के साथ ही ठहरती थी। दिल्ली में हमने कई नुक्कड़-सभाएं कीं और कच्छ आंदोलन में भाग लेने के लिए लोगों का आह्वान किया। कई पत्रकार हमारा साक्षात्कार लेने आए और अखबारों में काफी प्रचार-प्रसार भी हुआ। दरअसल बिहार में बड़े नेताओं द्वारा अपने पुत्रों या छुटभैये नेताओं के माध्यम से हमारा विरोध करवाने के पीछे यही मुख्य कारण था और पिताओं की राजनीति भंजाने वाले पुत्र-नेता इस यात्रा को व्यक्तिगत प्रचार का हथकंडा कहकर, हम लोगों की छीछालेदर कर रहे थे। लेकिन हम लोग इन टिप्पणियों और रास्ते की मुश्किलों  को पार करते हुए यहाँ तक आ पहुँचे थे। अंत में एस.एम जोशी और पार्टी के अन्य नेताओं के दबाव के आगे हमें झुकना पड़ा, चूंकि उनके दबाव में कोई पूर्वाग्रह नहीं था, कोई जलन नहीं थी, बल्कि हमारे लिए चिंता, सद्भावना और हमारे लक्ष्य पर पहुँचने की कामना निहित थी। स्वयं उन्हीं सब ने मिलकर हमारी प्रेस कांफ्रेस करवाई थी ताकि उनके द्वारा आयोजित इस राष्ट्रीय  कार्यक्रम को हमारे जोखि़म और हौसले की पहल से और अधिक प्रचार-प्रसार मिल सके। हम लोग सांसदों द्वारा दिए गए चंदे से रेल में सवार हुए और रेल की खिड़की में अपना झंड़ा लहराते हुए चल पड़े। पार्टी द्वारा अहमदाबाद संसोपा यूनिट को हमारे पहुँचने की सूचना दे दी गई थीं। हमें बताया गया था कि पार्टी के लोग प्लेटफार्म पर हमें मिलेंगे। अहमदाबाद स्टेशन पर हम ट्रेन  के दरवाज़े पर खड़े हो गए। स्टेशन पर लाल झंडों, नारों और उठती हुई मुट्ठियों में भरे जोश  को देखकर रास्ते की हमारी सब थकान दूर हो गई। यह सफर हमने बैठ कर काटा था चूंकि आरक्षण नहीं हो सका था। हम बारी-बारी सो लेते थे एक-दूसरे को उठा-बिठाकर। हम लोग बारह थे इसलिए नौ को बिठाकर तीन आराम करते थे फिर भी मन में अपराध-बोध समाया रहता था। खासकर अवधेश  जी महिलाओं को प्राथमिकता देने पर बहुत बिगड़ते थे। अहमदाबाद स्टेशन पर पार्टी के साथी हम लोगों को लेकर रिक्षा में कार्यालय तक ले गए। हमने अहमदाबाद में एक-दो नुक्कड़ मीटिंगें कीं, लेकिन समय के अभाव के चलते न हम चंदा कर पाए और न ही रास्ते के खर्च का जुगाड़ कर पाए। शायद पार्टी की स्थिति वहाँ इतनी अच्छी नहीं थी कि हमारी कुछ मदद कर सके, फिर भी उन्होंने गाठिया और भुजिया का नाश्ता देकर हमें बस में चढ़ा दिया। कुछ केले भी साथ में दे दिए। बस में काफी भीड़ थी। सफर लंबा था।
उपनिवेश भारत में महिलाएं : राह कभी इतनी आसान नहीं थी


गुजरात में गांधी-टोपी पहनने का बहुत चलन है। बिहार में उन दिनों गांधी-टोपी घृणा  की पर्याय बन चुकी थी। बिहार में सोशलिस्टों का पहनावा ज्यादा सम्मानजनक हो चुका था। गाड़ी में अधिकांश  लोग गांधी-टोपी पहने हुए थे। हमें लग रहा था जैसे कि हम कांग्रेस की बस में सवार हैं । मेरी बगल में धोती-कुर्ताधारी गांधी टोपी पहने सज्जन बैठे थे। जहाँ बस रुकती थी, वहीं हम में से एक साथ अपनी सीट पर बैठे ही नारे लगाने लगता था। जैसे ही बस उस पड़ाव से आगे बढ़ी उस सज्जन ने कहा,‘‘मैं तो इस जिले की कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष हूँ। लेकिन आपके इस आंदोलन में मैं मन से आपके साथ हूँ। जाहिर तौर पर हम आपका साथ नहीं दे सकते, चूंकि पार्टी अनुशासन का सवाल है। पर हमारा मन आपके साथ है।’’ मैंने उन्हें धन्यवाद दिया और कहा आपका मन हमारे साथ है, इसके लिए हम आपके शुक्रगुजार हैं। आप हमें तन से साथ नहीं दे सकते इसका हमें मलाल नहीं चूंकि ये आपकी मजबूरी है, लेकिन आप हमें धन से अगर साथ दे दें तो हमारे सब साथियों का आज का भोजन सुनिश्चित  हो जाएगा।’’

उन्होंने चुपके से पचास रुपए मुझे में पकड़ा दिए। जब भी हमारे साथियों को रास्ते में भूख लगती थी तो वे नारेबाजी करने के बाद एक नारा और लगा दिया करते थे,‘भूख लगी है भोजन दो, रमणिका दीदी भूख लगी है, भोजन दो।’ तब हम लोग हँसते हुए चंदा माँगने के लिए तैयार हो जाते या पास में पैसा होने पर कुछ-कुछ लेकर खा लेते थे। उस दिन भोजन का पैसा मिलते ही मैंने नारा लगाया, ‘हो गया रे हो गया, भोजन का प्रबंध हो गया।’ फिर तो हम लोग ‘पहुँचेंगे भाई पहुँचेंगे, कच्छ-भुज पहुँचेंगे’ के नारे लगाते हुए सफर सफर की थकान मिटाने में जुट गये। बस-यात्रियों को भी यदा-कदा हम अपने मकसद से अवगत कराते रहे। जिस बस-अड्डे पर बस देर तक रुकती वहाँ उतर कर कभी लेखानंद तो कभी शफीक आलम या कभी अवधेश  सिंह और मैं, बारी-बारी भाषण देते। ज्यादा भीड़ होती तो मुझे या लेखानंद को भाषण के अखाड़े में उतारा जाता। हम लोग अगले दिन सबेरे नदी के उस घाट पर पहुँचे, जहाँ से हमें नौका से सवार होकर गांधीधाम पहुँचना था। नौका के लिए भाड़ा हमने बस में ही चंदे से जुटा लिया था। नौका के टिकट खरीदने के बाद मेरी जेब में कुल पांच रुपए बचे थे। हम लोग जानते थे कि अवधेश  के पास कुछ पैसे चंदे के बाकी हैं लेकिन वे ‘गछने’ (स्वीकार करने) को तैयार ही नहीं थे और कहते थे,‘‘भुज पहुँचकर हिसाब दूँगा।’’ ये नौका हमें नदी पार करवाकर गुजरात की सीमा से सौराष्ट्र की सीमा में ले जा रही थी। हमारे पास कुछ गाठिया भी बचा हुआ था। हमने नौका पे सवार होकर गाठिया खाया लेकिन नदी की ठंडी हवा ने हमारी भूख तेज़ कर दी। अब क्या करें? सवाल यह था कि जेब में कुल पांच रुपए थे। हम लोग बारह थे। नौका में ऐसे भी हर चीज मंहगी थी। हमने चाय और रस्क खरीदे लेकिन वे बारह व्यक्तियों के लिए अलग-अलग पूरे नहीं पड़ रहे थे। हमने कुछ खाली कप लेकर सबकी चाय से थोड़ा-थोड़ा हिस्सा लेकर बारह लोगों में पुराया। वहाँ एक सज्जन कच्छ के मुद्दे पर हमसे उलझ गए। बहस काफी गरम हो रही थी। लग रहा था नौका पर सवार लोग भी दो दलों में बंट रहे हैं। दोनों तरफ से तर्क पर तर्क दिए जा रहे थे कि एक सज्जन ने खड़े होकर कहा,‘‘बहस बाद में कर लीजिए पहले इनके खाने की व्यवस्था कीजिए। देख नहीं रहे एक कप चाय को तीन-तीन आदमियों ने बांट कर पिया है, इनकी निष्ठा  देखिए।’’ बस एकाएक माहौल बदल गया। फटाफट सबके हाथ में एक-एक कप चाय थमा दी गई और ढेर सारा गाठिया लाकर अखबार पर रख दिया गया। तनाव ढीला हुआ। सब मुस्कुराने लगे और फिर जमकर नारेबाजी शुरू हुई , ‘‘कंजर कोट छाड़बेट हमारा है, हमारा है।’’ जार्ज फर्नांडीज, कर्पूरी ठाकुर, मधु लिमये के नारे लगे और नौका गांधीधाम घाट पर पहुँच गईं। उन दिनों गांधीधाम की लोकसभा सीट आडवाणी की सीट थी। गांधीधाम पहुँचते ही सैकड़ों साथियों ने हमारा स्वागत किया। कई लोग मेरी और कुसुम के आटोग्राफ के लिए आगे बढ़े और हमें भुज की बस में बिठा दिया गया। रास्ते में खाने के लिए ढेर सारा गाठिया, मट्ठियां और कुछ फल दे दिए गए। बस जहाँ भी रुकती पहले से ही स्वागत में खड़े लोग हमारे जत्थे की जय-जयकार करते मिलते। इतना लंबा सफर, हिचकोले खाती बसों की यात्रा, और नारे लगाते-लगाते सूख गए कंठ, हमें कुछ याद नहीं रहे। याद रहा केवल उनका अपार स्नेह और हमारे लक्ष्य के प्रति जनता की निष्ठा, सहभागिता और जीत का विश्वास । हम सब लगभग रात के बारह बजे भुज पहुँचे। पार्टी कार्यालय में हमारा बहुत स्वागत हुआ। मैंने पहुँचते ही जार्ज और लाडली मोहन निगम से मिलने की इच्छा जाहिर की। लोगों ने मुझे बताया कि हमारे पहुँचने के कुछ मिनट पहले ही सभा समाप्त हुई थी। सभा में  जार्ज, अटल बिहारी वाजपेयी और लाडली मोहन निगम ने बार-बार हमारे पहुँचने का जिक्र किया था कि किसी भी समय हम लोग सभा में पहुँच जाएंगे। लगभग रात के बारह बजे तक उन्होंने हमारा इंतजार करके सभा समाप्त करने का एलान किया था।

 ‘‘पूरी कच्छ की जनता हमें देखने को आतुर है’’, चलते-चलते हमारे पांव सूज गए हैं, यह सूचना भी उस रात की सभा में ही जनता को दी गई थी। जनता यह भी जानने को आतुर थी कि मैं कैसे हूँ? इतना अप्रत्याशित स्वागत और सत्कार देख-सुन कर हम सब लोग हतप्रभ हो गए। हमें तत्काल जीप में बिठाकर उन कैम्पों में ले जाया गया जहाँ समाजवादी खेमे के सत्याग्रही रुके हुए थे। देश  के कोने-कोने से सत्याग्रही वहाँ जमा थे। हमारे लिए अगले दिन का कार्यक्रम पहले ही निश्चित  कर दिया गया था। पूरे शहर में घूमने के बाद बगल के देहात में होकर आना और रात को हर रोज आयोजित हो रही आम सभा को सम्बोधित करना।मैंने सबसे पहला प्रश्न  किया, ‘कर्पूरी ठाकुर जी पहुँचे या नहीं?’’उत्तर मिला,‘‘वे एक हफ्ता बाद पहुँचेगे।’’ हम सब आपस में एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराए और लेखानंद ने ताली बजाते हुए कहा,‘‘दीदी, हम शर्त जीत गए।’’

रात का डेढ़ बजा होगा। हम लोग सब लेट गए थे पर सो नहीं सके थे चूंकि हम लोगों से सब लोग कुछ न कुछ प्रश्न  पूछते ही जा रहे थे। ऐसे तो दल के नेता शफीक आलम थे, पर पता नहीं क्यों संभवतः महिला होने के नाते, मुझसे या कुसुम से ही प्रश्न  पूछे जा रहे थे। कुसुम कुछ जवाब देती और कुछ के लिए मेरी तरफ इशारा कर देती। मैंने महसूस किया, सबमें तो नहीं लेकिन हमारे दल के एक-दो साथियों के चेहरे पर इर्ष्या  की लकीर खिंच आई थी। पर इसमें मैं क्या कर सकती थी। धनबाद के उस छात्र  ने संभवतः अभी तक बचपन की सीमा पार नहीं की थी, इसलिए वह हमारी प्रशंसा  से गद्गद् था।आखिर अवधेश  जी से रहा नहीं गया। उन्होंने कह ही दिया,‘‘रमणिका जी को महिला होने का फायदा मिल रहा है।“मुझसे भी रहा नहीं गया और मैंने कहा,‘‘मैं मिट्टी की माधो नहीं हूँ, बुद्धि भी रखती हूँ। मिट्टी के माधो की पूजा होती है, तर्कशील व्यक्ति सराहे जाते हैं। यहाँ मेरी पूजा नहीं हो रही, हम सबकी सराहना हो रही है, मुझे केवल प्रतीक बनाया जा रहा है।’’पर अवधेश  जी से तर्क की कोई बात करना हमेशा  कठिन था। महिलाओं के प्रति संभवतः वे किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित थे या फिर अपने प्रति हीन-भावना से त्रस्त थे, जो उनके अहं पर बार-बार चोट करती थी। मेरे ख्याल में हर पुरुष सक्षम स्त्री  के समक्ष ऐसी ही हीन-भावना से ग्रस्त हो जाता है। सभवतः उसकी भरपाई करने हेतु ही वह उस पर हमला करता है।
महिला नेतृत्व की पीढियां : रास्ते इन्होने बनाये


खैर, मैं बहक गई। रात के लगभग डेढ़-दो बजे लाडली मोहन निगम आए और मेरे पांव की तरफ बैठकर मेरे पांव को दबाते हुए बोले,‘‘बहुत थक गई हो न?’’मैं अपने पांवों को समेटते हुए एकाएक उठ बैठी ‘‘नहीं-नहीं इतना नहीं थकी कि आपको पांव दबाने पडे़ं।’’फिर भी वे मेरे पांव अपनी तरफ खींचकर दबाते हुए कहने लगे,‘‘बिहार में तुम्हें कितना जूझना पड़ा है इस जत्थे को लाने के लिए, मैं वह सब सुन चुका हूँ। रास्ते में तुम्हें कितनी मुसीबतें झेलनी पड़ीं, वह खबर भी मुझे दिल्ली से मिल गई है। अखबारों में हर रोज तुम्हारे जत्थे की गतिविधियों की खबरें हम लोग पढ़े रहे हैं। मुझे रोको मत।’’उनके स्नेह-भरे प्रस्ताव को मैं ठुकरा नहीं सकी। मैं सो गई, अगले दिन कैंप में हमारे लिए गाँव जाने के लिए जीप आई जिसके साथ में भुज की लड़कियों की एक टीम भी थी। दोपहर में हमें उनके साथ भुज में घूमना था।

माँडवी जेल से भावनगर जेल तक

अगले दिन से हमारे जत्थे को गाँवों में प्रचार के लिए भेजा गया। मेरे ठहरने की व्यवस्था  भुज के एक परिवार में कर दी गई थी। लाडली भी वहीं रहते थे। बाकी साथी दूसरे स्थानों पर रहने लगे। हम लोग ऊपर छत पर सोया करते थे, लाडली भी वहीं सोते थे, इसी बीच  लाडली जब तक मुझसे बात करते एकटक मुझे देखते रहते। उनकी इन नजरों की  सतत बौछार से मैं अपने को बचा न पाई। बचपन से ही आँखों में स्नेह की तलाश  में भटकती मेरी आँखें धुर-फिर कर उनकी आँखों से टकरा जाती थीं। इसी टकराहट में न जाने कैसे हम दोनों एक दूसरे के बहुत नजदीक आ गये। मन से भी देह से भी। सच कहूँ तो लाडली को आँखों से ही प्यार की इज़हार करना आता था। शायद देह की भाषा उन्होंने कभी सीखी ही नहीं थी। ये भाषा सिखाते समय मुझे कभी लगता कि मैं किसी बच्चे को लाड कर रही हूँ । फिर वह बच्चा पुरूष में बदलने लगता। खैर ,लाडली देह की भाषा सीख गये। हम लोग कोशिश करने लगे कि ज्यादा से ज्यादा कार्यक्रमों  में हम साथ रहें। जार्ज हमारी नजदीकियों को भांप गये थे। शायद हमारे साथी भी कुछ कयास लगाने लगे थे। संभवतः ऐसे समय इर्द गिर्द की दुनियां कुछ मायने नहीं रखती। इतने तीव्र लगाव या कहूँ दैहिक जुड़ाव के बावजूद भी हमारे कार्यक्रमों में जाने की रफ्तार नहीं घटी। लगता था इस लगाव ने कहीं और भी अघिक ऊर्जा  और लगन हममें भर दी है।

हम लोग उस घर में जमा होकर उस परिवार की लड़कियों को साथ लेकर प्रचार में जाते थे। कुछ दिनों बाद हमारे जत्थे की भी गिरफ्तारी की बारी आई और हम कोर्ट में पेश  हुए। दरअसल, हम लोग अंतिम जत्थे के साथ गिरफ्तारी देना चाहते थे लेकिन कुछ लोग जल्द लौटना चाहते थे, इसलिए हमने फैसला किया कि हम सब एक साथ जेल जाएंगे पर मैं और जो लोग रुकना चाहेंगे रुककर अंतिम जत्थे में जार्ज और कर्पूरी जी के साथ भी गिरफ्तारी देंगे। जार्ज के साथ बंबई से बहुत बड़ा जत्था आया हुआ था। तुलसी जी और सुधा बहन जत्थे भेजने का काम करते थे। साथ में जनसंघ तथा अन्य पार्टियों के लोग भी थे। आरिफ बेेग भी मध्य प्रदेश  से पहुँच चुके थे।उनके धुंआधार भाषणों से भुज-कच्छ के युवक सड़कों पर निकल आये थे। लाडली जी के भाषण इतनी गहरी चोट करते थे कि महिलाएं सत्याग्रहियों के लिए चंदे में अपने गहने सभा में ही दान कर जाती थीं। हम लोग संयुक्त सोषलिस्ट पार्टी वाले थे जो जार्ज, मधु लिमाये, राजनारायण और कर्पूरी जी के नेतष्त्व में चलते थे। एस.एम. जोषी हमारे अध्यक्ष थे पर सभी लोहियावादी उन्हें जय प्रकाष जी की सोशलिस्ट पार्टी का समर्थक मानते थे। सुधा जी और तुलसी जी गुजरात में कार्यरत थे और सोशलिस्ट ग्रूप के थे। जार्ज और हम लोगों को गरम दल माना जाता था। लाडली उसमें अग्रणी थे।(बाद में हुए बम केस में जार्ज के साथ लाडली मोहन भी अभियुक्त बनाए गए थे।)सो हम लोगों को मजिस्ट्रेट के सामने पेश  किया गया। हमने अपने लिखित और मौखिक बयान में कहा,”हम देश  की सीमा को पाकिस्तान को सौंपने नहीं देंगे और सीमा लांघ कर कंजरकोट जाएंगे।“ हमें दस दिन की सजा सुनाई गई। हमें माँडवी भेजने का आदेश  पुलिस ने ले लिया, क्योंकि भुज में किसी जेल या स्कूल, जिन्हें जेल बनाया गया था, में जगह नहीं थी।
जार्ज फर्नांडिज : कच्छ  आन्दोलन का नेता


माँडवी समुद्र के किनारे बसा एक कस्बा है। उसके एक स्कूल में हमें रखा गया। वहाँ पहले ही बहुत लोग गिरफ्तार होकर आए हुए थे। हमारे साथ भुज सुंदरगढ़ के संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के सचिव ने भी गिरफ्तारी दी। एक बड़े-से हाल में लोगों ने अपनी-अपनी चादर बिछाकर जगह ले ली। हमें खाने के लिए थाली-कटोरा व गिलास मिले थे। हमारे आने की खबर सुनकर माँडवी के कई नागरिक हमसे स्कूल की जेल में मिलने आए। वे भी हमारे लिए कुछ-कुछ खाने के लिए दे जाने लगे।हम लोग तो नियमानुसार खाना खाकर अपने बर्तन धो-माँज लेते थे पर अवधेश  जी पहले ही दिन अड़ गए। उन्होंने बर्तन मलने से इनकार कर दिया और बिहार जेल के मैनुअल के अनुसार बर्तन मलने के लिए जेल अधिकारियों से एक कैदी देने की माँग रख दी। हमने उन्हें बहुत समझाया कि ‘‘यहाँ कौन कैदी मिलेगा? यहाँ तो सब सत्याग्रही ही हैं और हम सुविधाएं लेने यहाँ नहीं आए। कोई खाने में कमी हो तो कहा जा सकता है, पर बर्तन मलने वाला कैदी माँगना गलत है चूंकि यह रेगुलर जेल नहीं है। यहाँ तो बंबई पे्रसीडेंसी का कानून अभी तक लागू होता होगा’’।सुंदरनगर के सचिव ने भी उन्हें समझायाµअधिकारियों ने भी कहा, पर वे नहीं माने। अंततः मैंने कहा,”ठीक है, मैं ही सबके बर्तन मल दूँगी पर ऐसी बातें उठाकर आप बिहार को बदनाम न करें।“ इसलिए जब तक हम माँडवी में रहे मैं उनके बर्तन मलके रख देती रही। वे अड़े रहे।

हमें दस दिन की बजाए 7 वें दिन ही बस में बिठाकर रवाना कर दिया गया। साथ में पुलिस भी थी। हमें नहीं बताया गया कि हमें कहाँ ले जाया जा रहा है। गाड़ी चारों ओर से बंद थी। सख्त गर्मी थी। रास्ते में रोककर किसी बिल्डिंग के अहाते में पेड़ों के नीचे बैठाकर हमें खाना खिला दिया जाता। वह भी पेटभर नहीं मिलता था। पानी की भी तंगी थी। बाहर का दृश्य  भी हम देखते हुए नहीं चल सकते थे। आगे-आगे एक जीप चलती थी, जिसमें उनके अधिकारी बैठे थे। हम नारे लगाते रहते,थक जाते तो चुप हो जाते,पर जब भी किसी आबादी वाले हिस्से से गुजरते तो नारे लगाना शुरू कर देते,”कंजरकोट हमारा है,छाड़वेट हमारा है,भारत सरकार निकम्मी है,कितनी लंबी जेल तुम्हारी, देख लिया है ,देखेंगे।“ आखिर हम भावनगर जेल पहुँचे। सबेरे पांच बजे हम शहर में पहुँच गए थे। जेल की खाना-पूर्ति करने में दो घंटे बीत गए। हम जेल के वार्डों में गए और तुरंत ही हमें छोड़ देने का निर्देश  भी मिल गया चूंकि सजा के दस दिन पूरे हो गए थे। संभवतः माँडवी में और लोग गिरफ्तार कर के भेज दिए गए थे, जगह की कमी के कारण,हमें दो दिन बस में ही घुमाकर दसवें दिन,भावनगर की जेल में छोड़ दिया। कुसुम और मुझे यहाँ पर महिला वार्ड में ले जाया गया था। भावनगर की जेल में लाकर,नाष्ता खिलाकर हमें छोड़ दिया गया। धनबाद वाला युवक धनबाद वापस जाना चाहता था। कुसुम भी लौटना चाहती थी। इस प्रकार जो-जो लौटना चाहते थे उन्हें उनके नगर के स्टेशन का रेल टिकट का पास तथा राह खर्च  देकर  जेल अधिकारियों ने छोड़ दिया । मैंने और लेखानन्द झा तथा अन्य दो साथियों ने वापस भुज का टिकट ले लिया और पुनः सत्याग्रह में शामिल होने भुज आ गए। अवधेश  जी जेल के अंदर ही किसी बात पर अधिकारियों से लड़ गए इसीलिये उन्हें जेल अधिकारियों ने बाद में छोड़ा। उन पर लाठी चार्ज भी हुआ और काफी मार-पीट भी गई। वे एक दिन बाद भुज लौट आए। हम सब भुज पहुँचकर अपने-अपने स्थान पहुँच गए और कर्पूरी जी की इंतजार करने लगे।

खावड़ा की यात्रा

यूँ जत्थे तो हर रोज जाते ही थे लेकिन खावड़ा में गिरफ्तारी देने के लिए यात्रा सत्याग्रह के अंतिम दिन भुज से शुरू होनी थी। इस यात्रा में देश  के बड़े-बड़े नेताओं को नेतृत्व करना था। कर्पूरी जी का इंतजार शिद्दत से हो रहा था। चूंकि ये यात्रा पैदल करनी थी और खावड़ा वहाँ से लगभग 40 किलोमीटर था, इसलिए पूरे 48 घंटे पहले यात्रा षुरू की गई। कर्पूरी जी रात को ही पहुँच गये थे। रास्ते में रात में हम सड़क पर ही कैंप करते। वहीं खाना बनता और सब सत्याग्रही खाते। मैं और लेखानन्द तथा अन्य साथी जार्ज के खेमे में थे। सबसे आगे। कर्पूरी जी तथा बिहार के अन्य नेता भी वहीं पर थे। महाराष्ट्र की महिलाएं विशेषकर  युवा लड़कियाँ भी भारी मात्रा में सत्याग्रह में भाग लेने आई हुई थीं। जनसंघ के लोग भी इस सत्याग्रह में साथ थे। अंतिम दिन खावड़ा की ओर जब जुलूस चला तो मैं सुधा बहन और एक जनसंघ की महिला नेत्री  जुलूस के आगे-आगे झंडा थामे चल रहे थे और तीन की कतार में मीलों लंबा जुलूस चल रहा था। भुज में जो भी सत्याग्रहियों का नया जत्था आता उसे खावड़ा वाली सड़क के लिए रवाना कर दिया जाता था। खावड़ा की सीमा पर जत्थे को रोक दिया गया जार्ज और उनके साथी सड़क पर ही बैठ गए। मैं भी अपने बिहार के साथियों के साथ आकर बैठ गई। ऊपर कड़कती धूप नीचे गर्म-तपती सड़क पर किसी को कुछ महसूस नहीं हो रहा था।

पुलिस ने हमें उठाकर बस में चढ़ाने की चेष्टा  की, पर मैं और लेखानन्द झा पहले ही  तयकर चुके थे कि इतनी आसानी से बस में नहीं चढ़ेंगे। जनसंघ वाले तो पुलिस के आते ही धरती छूकर प्रणाम करते, नारा लगाते और पुलिस के हाथ लगाने से पहले ही बस में चढ़ जाते थे। पर हम सभी ने कड़ा संघर्ष  करने की ठान ली थी। जार्ज भी अड़े हुए थे।हमें एक सरदार जी, जो पुलिस के बड़े वरीय पदाधिकारी थे ने कई बार कहा,”आपको गिरफ्तार किया गया, आप बस में बैठ जाएं।“ पर हम नहीं बैठे। एक बार पुलिस हमें घसीट कर बस में ले गई। मैंने उन्हें छूने से मना किया और महिला पुलिस लाने की माँग की। इसी तकरार में एक घंटा बीत गया। मैंने और लेखानन्द तथा शमीम आलम ने एक-दूसरे की बाहों में बाहें डाल कर एक त्रिगुट बना लिया था। अब पुलिस तीनों को एक साथ कैसे उठाए? मेरे लिए महिला पुलिस बुलाई गई। बस में  उन्होंने मिल कर बोरे की तरह पटक दिया। मैं बस की खिड़की की छड़ टेढ़ी के बस से कूदने को हुई तो पुलिस ने मेरे साथ मारपीट शरू कर दी। मैं बेहोश  हो गई। देर दोपहर एक अस्पताल में मेरी आँख खुली। मेरे होश  में आने पर वे हम सभी को बस से बिठाकर वापस भुज ले आए। उस समय सांझ हो गई थी, पर अंधेरा नहीं हुआ था। हमने बस के सभी साथियों से बात की और फैसला किया कि या तो ये लोग हमें जेल ले जाएं जहाँ जार्ज हैं, नहीं तो हम बस से नहीं उतरेंगे। हमारे पीछे और कई बसें भी आ लगीं, जिसमें सत्याग्रही ही थे। हमें न उतरता देख वे भी पुनः बसों में जा बैठे। अहमदाबाद की सोशलिस्ट पार्टी के श्री बारोट मुझसे पूछने आए। (जो बाद में कांग्रेस  की सरकार में केंद्रीय राज्य वित्तमंत्री भी बनेे।)उन्होंने पूछा,”सूं छे रमणिका बेन?“‘‘ये लोग कहते हैं हमें छोड़ दिया गया जबकि खावड़ा में ये लोग बोले थे आपको गिरफ्तार किया गया। अब हम इनसे पूछ रहे हैं कि जार्ज को भी तो हमारी तरह ही गिरफ्तार किया गया था,तो वे कहाँ हैं? उन्हें अगर जेल में भेजा है तो हम सभी को भेजा जाए,क्योंकि जो कानून उन्होंने तोड़ा है तो वही हमने तोड़ा है। अगर हमें गिरफ्तार किया तो किस कानून के तहत अब हमें बिना सुनवाई छोड़ा जा रहा है।  इसका क्या कारण है, हमें ये लोग लिखकर बताएं हमें यह भी बताया जाये कि किस कानून के तहत इन्होंने हमें इतनी देर इलीगल कस्टडी में रखा? हमें इन सब सवालों के लिखित जवाब चाहिए, नहीं तो हम बस से नहीं उतरेंगे।’’ मैंने उन्हें बताया।
साहित्यकारों के बीच रमणिका गुप्ता : आख़िरी पड़ाव


धीरे-धीरे खबर पूरे भुज शहर में फैल गई कि रमणिका बेन बस से नहीं उतर रही हैं। पुलिस बस अड्डे पर भर गई। पूरा भुज शहर बस अड्डे पर उमड़ आया। उपायुक्त आए तो लोगों ने उनकी गाड़ी को घेर लिया,कुछ पथराव भी हुआ। भीड़ उग्र हो गई। लाठी चार्ज हुआ। गोली भी चल गई। पुलिस ने हमें बसों से घसीट-घसीट कर उतारने के प्रयास किए गए, पर उतार नहीं पाए। हारकर अधिकारियों को लिखकर देना पड़ा। मेरा तर्क था कि हमें अवैध ढंग से रोककर रखा गया था और अब ऐसे ही छोड़ा जा रहा है तब जार्ज और अन्य सत्याग्रहियों को, जिन्होंने वही अपराध किया, जो हमने किया है, क्यों जेल भेजा गया? यही दस्तावेज जो प्रशासन ने मुझे लिखकर दिया था। हमने जार्ज का देे दिया मुकदमे में उसी बिना पर जार्ज के केस में बहस भी हुई। तुलसी जी, सुधा जी और अन्य सोशलिस्ट नेता आंदोलन तुरंत वापस लेना चाहते थे। हमने जार्ज से जेल में पुछवा भिजवाया और उनकी राय से आंदोलन चलाया, जो बिना किसी केंद्रीय नेतृत्व के सात दिनों तक चला।

मैं भुज में ही रूक  गई, बाकी लोग लौट गए। माँडवी जेल से लौटने के बाद जार्ज ने मुझे अगल-बगल की बस्तियों को संगठित करने को कहा था। जार्ज, लाडली तथा मैं भी भुज के बाहर जाकर अंतिम दिन के सत्याग्रह के लिए आह्नान करने जाया करते थे। रात को हम उसी भुज वाले परिवार के यहाँ रहते थे। लाडली, मैं और सब लोग ऊपर छत पर सोया करते थे जो बहुत खुली और बड़ी थी। खूब ठंडी हवा वहाँ आती थी। हमारी काफी बहसें भी होती थीं। उसी दौरान हम एक-दूसरे के काफी नजदीक भी आ गए थे। इसी बीच हम लोग छाडबेट की सीमा तक मिलट्री वालों के साथ घूम आए थे और रेगिस्तान की मृग मरीचिकाएं देख ही नहीं अनुभव भी कर आए थे। कर्नल राज हमें ले गए थे। लोकसभा सदस्य होने के नाते जार्ज को वे सब एस्काॅर्ट करके ले गए थे,मैं भी गई थी और भुज परिवार की वे दोनों लड़कियाँ भी हमारे साथ गई थीं, जिनके घर हम रहते थे। बाद में कच्छ जन परिषद की पिटीशन देते वक्त लोकसभा में इन्हीं दोनों ने ही लोकसभा में जूता फेंका था।

संसद में जूता फेंका

खैर, आंदोलन के बाद जब जार्ज जेल में थे तो उन्होंने मुझे पूरे भुज, सौराशष्ट्र तथा अहमदाबाद का दौरा कर जनमत बनाने का जिम्मा दिया और उनका केस लड़ने के लिए भी वकीलों की एक कमेटी बनाने के लिए अपने एक वकील मित्र का संदर्भ दिया। वे वकील मुझे जानते तो थे ही। मैंने उनसे बात करके वकीलों की एक सभा बुलाकर कमेटी गठित की। केस पर बहस में यही कमिटी सक्रिय रही। जार्ज और लाडली को कई दिनों तक जेल में रहना पड़ा। इस बीच मैं अहमदाबाद बारोट के यहाँ गई,वहाँ कई मीटिंगें हुईं,फिर सुंदर नगर गई,बैठकें भी कीं और कई ऐतिहासिक स्थल तथा सूर्य मंदिर भी देखा। पालिताना भी घूम आई, जहाँ नरेन्द्र देव ने 5000 लोगों को लेकर सोशलिस्ट पार्टी का सम्मेलन किया था। यह बड़ा सभागृह , जो पहाड़ के भीतर पहाड़ काट कर बना हुआ है। उसके नीचे दो बड़े कमरे बने थे ,जिनमें तेल के कड़ाहे खौलते रहा करते थे पुराने जमाने में और सजायाफ्ता लोगों को सजा के लिए खौलते तेल के कड़ाहे में ऊपर से ठेल दिया जाता था। उस बड़े सभागृह  में कहीं कोई स्तंभ नहीं था,एक ही बड़ी चट्टान काटकर बना हुआ है वह। 5000 लोग उसमें अट सकते हैं और भी बहुत किस्से हैं पालिताना के। ये क्षेत्रा मूलतः कपास उत्पादकों का क्षेत्र है,काली मिट्टी वाला क्षेत्र। बस व्यावसायिक फसलें उगाते हैं यहाँ के किसान।

जेल से छूटने के बाद जार्ज ने वहाँ संगठन खड़ा करने के इरादे से भुज में नागरिकों की बैठक बुलाई और कच्छ जन परिषद का गठन किया। मैंने उसमें सक्रिय भूमिका निभाई। आदेशानुसार मैंने  धनबाद जाकर कच्छ के कुछ युवक-युवतियों को साथ लेकर बिहार का दौरा किया पटना, धनबाद और रांची का दौरा करने के बाद हम  इंदौर भी गए। बिहार और छोटा नागपुर (तब छोटा नागपुर बिहार में था) का दौरा  करने के बाद हमने धनबाद में स्थानीय गुजराती लागों से भी मदद ली। ऐसे तो रसिक भाई बोहरा से मेरा सम्पर्क सामाजिक गतिविधयों के चलते पहले से ही था लेकिन कच्छ के मामले को लेकर वे मेरे ज्यादा नज़दीक आ गये। हमने कच्छ जन परिषद के लिए उनसे एक लाख रूपये की राशि जुटाने के लिए सहयोग माँगा जो उन्होंने जुटाया। पैसा जार्ज के पास चेक से भेज दिया गया।

फिर हम भुज लौट आए और एक लाख लोगों के हस्ताक्षर अभियान में लग गए। इसी बीच मैं दक्षिण के दौरे पर बैंगलोर और केरल भी गई। कर्नाटक में तब श्री पाटिल सोशलिस्ट पार्टी के प्रमुख नेता थे, जो बाद में कर्नाटक के मुख्यमंत्री भी बने। केरल से वीरेन्द्र कुमार ने मेरे दौरे संपन्न कराए। मैसूर के बड़े मैदान मेें मेरी पहली सभा कच्छ के मुद्दे पर हुई। मद्रास पहुँचते ही मेरे कपड़े, डायरियां, कविताएं और लाडली को लिखे मेरे पत्र और उसके मुझे लिखे पत्र ,सब के सब ट्रेन  में चोरी हो गए। कर्नाटक के साथी आकर मुझे मद्रास से ले गए।वापस भुज लौटने पर हमने गावों में प्रचार किया। हस्ताक्षर अभियान चलाया। फिर वहाँ के लोगों पर जिम्मा सौंपकर मैं और लाडली माउंट आबू होते हुए दिल्ली वापस लौटे। न जाने कितनी कविताएं लिखी थीं मैंने इस दौरान, पर सब चोरी हो गई थीं। केवल तीन-चार कविताओं को ही मैं पुनः याद कर के लिख पाई थी।दिल्ली से मैं कानपुर होते हुए बिहार लौट आई थी। दिल्ली में रमा मित्रा से भी मिली। मैं काफी तनाव में थी।

इसी बीच हस्ताक्षर होकर याचिका आ गई थी भुज-कच्छ से। उसी दिन जार्ज को लोकसभा में याचिका पेश  करनी थी। जार्ज पाटिल को हराकर जीते थे, इसलिए देश  भर में उनके बहुत चाहने वाले थे, खासकर मुंबई और गुजरात में। ऐसे भी वे बोलतेे बहुत अच्छा थे हीं और रिस्क भी लेते थे।उन दोनों लड़कियों को लोकसभा की गैलरी में पहुँचाने का जिम्मा मुझे मिला। तय हुआ कि जब जार्ज नीचे याचिका पेश करेंगे कच्छ विकास परिषद की तरफ से तो ऊपर की वे दोनों लड़कियाँ नारे लगाएंगी और नीचे सदन में जूता फेकेंगी। कांग्रेस के सभासदों के हस्ताक्षर से उन दोनों के पास बनवा दिए गए थे। मैं निर्णयानुसार ऊपर पहुँच गई थी और अनजान बनी बैठी थी कि जूता फेंका गया। भगदड़ मच गई!  मैं चुपचाप नीचे आ गई चूंकि उन दोनों की गिरफ्तारी तो होनी ही थी। बाद में उन्हें दिन भर रख कर छोड़ दिया गया,पर देश  का ध्यान कच्छ पर गया। ‘कच्छ जन परिषदद’ के लिए मैंने लगभग तीन माह सत्याग्रह के बाद भुज सौराष्ट्र और अहमदाबाद में गुजारे। वहीं कुछ गुजराती भी सीखी और जार्ज और लाडली के संपर्क में रहकर जुझारू आंदोलन करना सीखा। बोलने और भाषण  देने की कला एवं अंदाज भी मैंने इन्हीं दोनों से सीखा। हमारे बीच खासकर मेरी लाडली के साथ बहस भी हुआ करती थी, विवाद भी खड़े हो जाते थे जिन्हें प्रायः जार्ज सुलझाया करते थे।
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