‘आपहुदरी’: ‘अपने शर्तों पर जीने की आत्मकथा’

कुमारी ज्योति गुप्ता
कुमारी ज्योति गुप्ता भारत रत्न डा.अम्बेडकर विश्वविद्यालय ,दिल्ली में हिन्दी विभाग में शोधरत हैं सम्पर्क: jyotigupta1999@rediffmail.com
‘आपहुदरी’ रमणिका गुप्ता की आत्मकथा की दूसरी कड़ी है। पुस्तक का  शीर्षक ही  है, ‘आपहुदरी एक जिद्दी  लड़की की आत्मकथा।’ यानी यह एक ऐसी लड़की की आत्मकथा , है जिसमें उसकी अपनी इच्छा का महत्त्व है जो अपनी शर्तों पर जीना चाहती है या यूं कहे कि वह स्वेच्छाचारी है। आत्मकथा में वे इस बात को स्वीकार भी करती हैं और कहती हैं ‘‘मैं औरत के लिए स्वछंद शब्द को स्वतंत्र से बेहतर मानती हूँ, हालांकि भाषाविद् स्वच्छंदता को हेय मानते हैं। उनके ऐसा मानने से क्या? मैं स्वच्छंद होना श्रेयस्कर समझती हूँ चूँकि इसमें छद्म नहीं है, दम्भ भी नहीं है।’’1 अतः यह एक ऐसी स्त्री की आत्मकथा है जो अपनी इच्छानुसार आचरण करने का साहस रखती है। अपने निर्णय पर कायम रहने तथा उसका परिणाम भोगने को भी तैयार दिखती है।

रमणिका गुप्ता एक ऐसी लेखिका, सामाजिक तथा राजनीतिक कार्यकता हैं,  जो तयश शुदा मापदंड के खिलाफ स्वयं को खड़ा करती हैं। हर उस चैखट को पार करती हैं जो स्त्रियों के लिए निर्धारित है तथा हर रुढ़ परंपरा के खिलाफ स्वयं को खड़ा करती हैं। सामंती परिवारों में स्त्रियों के लिए बड़े कायदे होते हैं। औरतें उन नियमों का पालन करने में ही अपना कर्तव्य समझती हैं। इतना ही नहीं पत्नियों द्वारा अपने पति का दूसरा ब्याह करके ले जाने की प्रथा सामंती परिवारों में आम थी, खासकर रियासतों में।

आत्मकथा में ऐसे कई प्रसंग का चित्रण है लेकिन रमणिका गुप्ता उन मान्यताओं के खिलाफ आवाज़ उठाती हैं एक प्रसंग का ज़िक्र  इस प्रकार है ‘‘सिर ढ़क कर चलो।’’मां ने घर से बाहर कदम रखते ही कहा।‘‘नहीं ढ़कूंगी सिर! क्यों ढ़कूं ? क्या लड़के सिर ढ़ककर चलते हैं ? रवि को क्यों नहीं कहती सिर ढ़कने को ? मैं कोई उससे कम हूं क्या ? नाना जी की हवेली और क्लब में इतनी मेमें आती हैं, वे ‘चुन्नी’ (दुपट्टा) नहीं  ओढ़तीं। मैं क्यों न उनकी तरह बिना दुपट्टा ओढ़े चल सकती ?’’
यह अच्छे घर की लड़कियों का रिवाज़ नहीं है।’’मां मुझे समझाते हुए कहती। ‘‘मुझे नहीं चाहिए अच्छे घर के रिवाज़। मैं नहीं बनूंगी अच्छे घर की लड़की। यह सब पुरानी बातें हैं । मैं नहीं मानूंगी कोई पुरानी बात। मैं अपना ही रिवायत़ चलाउंगी खुद अपने आप।’’2 अतः यह जानते हुए भी कि सामंती परिवारों में लड़कियां जवाब नहीं देती,विरोध करना तो दूर की बात है। रमणिका गुप्ता अपनी बात भी कहती हैं और पुरानी रुढ़ि परंपरा के खिलाफ विद्रोह भी करती हैं।

इस आत्मकथा में कई पहलू खुल कर सामने आए हैं चूंकि आत्मकथा एक ऐसी विधा है जो सच की कसौटी पर कसी जाती है। सच कहने का अपना तरीका होता है। इस आत्मकथा का सच हिम्मत के साथ कहा गया सच है। रमणिका गुप्ता ने बिना किसी लाग लपेट के सब कुछ स्पष्ट  कह दिया है इसलिए हम कह सकते हैं कि इस आत्मकथा का जो सच है वह नितांत निजी है,  जिसे लेखिका सामाजिक बनाना चाहती हैं। रमणिका गुप्ता ने अपने बचपन की कुछ ऐसी घटनाओं का ज़िक्र किया है जो नितांत निजी है,  क्यांकि वह यौन-संबंधों से जुड़ी है और हमारे समाज में यौन संबंधों की बात करना वर्जित है। हालांकि सामंती परिवारों में लड़कियों का यौन शोषण  कोई नई बात नहीं लेकिन पितृसत्तात्मक समाज में औरत की विडम्बना यह है कि यौन शोषण और बलात्कार की शिकार  तो वे होती हैं और चुप रहने की नसीहत भी उन्हें ही दी जाती है। किसी लड़की को जब कोई  बेपर्दा करता है तो उसके परिवार वाले उसे चुप रहने की सलाह देते हैं। भारतीय समाज में शुचिता शब्द का इतना महत्त्व है कि जन्म से ही लड़की के ज़हन में इसे कूट-कूट कर भर दिया जाता है इसलिए अपने साथ हुए बलात्कार को भी लड़की खुलकर बता नहीं पाती क्योंकि उसे अपनी नहीं अपने परिवार की चिंता होती है। शुचिता  से संबंधित जो डर है वह उसे कुछ भी कहने से रोकता है। लेखिका कहती हैं ‘ शुचिता भंग होने का दंश , अपराध बनकर जीवन भर कसकता है और इसी के कारण औरत जन्म-जन्मांतर तक अपरपधिनी, बेवफा, विश ्वासघातिनी और छिनाल कहलाती है। अगर औरत इसकी निर्रथकता पहले ही समझ जाए तो शायद हीन ग्रंथि से ग्रसित होने से बच सकती है।’’हमारे यहां तो विडम्बना यह है कि पीड़िता अपने को ही दोषी मान बैठती है। इसका कारण हमारी सामाजिक संरचना है। इस आत्मकथा की विशेषता  यह है कि यहां पीड़िता अपने को दोषी नहीं मानती और समय आने पर इसका खुलकर विरोध भी करती है। परिवार के डर से वह मास्टर की हरकतों का खुलासा पहले नहीं कर पाती लेकिन यही चीज जब लज्या  के साथ दुहराई  जाती है तोउसके सब्र का बांध टूट जाता है और वह कहती हैं ‘‘आप तो मुझपर विशवास  नहीं करते थे,पर आपकी आंख तले यह हमारा शोषण करता रहा और अब लज्या का कर रहा है। मुझे भी ब्लैकमेल कर रहा है अब या तो यह मास्टर घर में रहेगा या मैं रहूंगी।’’4 वर्तमान समाज में लड़कियों के साथ जो भी हो रहा है उसका कारण उनका चुप रहना ही हैइस आत्मकथा में लेखिका के संबंध बहुतों से हुए इसकी बेबाक स्वीकारोक्ति भी इसमें है। नई पीढी  को इससे यह सीखना चाहिए कि अपने खिलाफ हो रहे गलत आचरण का विराध किया जाए और हर लड़की को ऐसा करना भी चाहिए।

इस आत्मकथा में रमणिका गुप्ता ने हर जगह अपना पक्ष  बिल्कुल साफ-साफ प्रस्तुत किया है। अपनी श र्तों पर जीने की जिद्द उनकी है उसका परिणाम भी उन्होंने ही भोगा। श ादी के पहले ही अपने होने वाले पति के सामने अपना पक्ष  साफ रखते हुए वे कहती हैं ‘‘मैं न तो पर्दा करूंगी न किसी का जुल्म सहूंगी। मैं सबको आदर दूंगी,पर मेरा भी आदर हो। पर्दा या छूआ-छूत या घर वालों के सामने तुमसे अलग रहना, ये तो मुझसे न होगा।’’5 अतः अपने होने वाले पति के सामने न केवल अपनी बात रखती हैं बल्कि अपने अतीत का खुलासा भी कर देती हैं। इतनी शिद्दत  से सब कुछ कहने का साहस भी बहुत कम लोगों में होता है। यह आत्मकथा कहीं से अपना महिमामंडन नहीं करती बल्कि सबकी पोल खोलते हुए अपने को भी कटघरे में खड़ा करती हैं। कहीं कुछ भी छिपाने की प्रवृत्ति उनमें नहीं दिखती क्योंकि छिपाने को वे स्त्री की परतंत्रता मानती हैं और कहती हैं‘‘गोपनीयता ही स्त्री की परतंत्रता का सबस बड़़ा औज़ार है। यौन की गोपनीयता न सिर्फ स्त्री के लिए घातक है बल्कि सामाजिक व्यवस्था के लिए भी खतरनाक है। यही अपराधों को जन्म देती है। न रिश्तों  में छिपाव होंगे, न कोई ब्लैकमेल करेगा।’’6 एक आत्मकथाकार की सबसे बड़ी विशेषता यह है किवह अपने लेखन के प्रति ईमानदार रहे क्योंकि यहां कल्पना और झूठ की कोई गुंजाइश  नहीं होती। यह आत्मकथा इस बात पर खरी उतरती है। आपसी रिश्ता हो, सामाजिक या राजनीतिक मामला हो, हर जगह रमणिका जी ने अपना स्टैण्ड रखा है। रिश्ता  है तो स्वीकारा है नहीं है तो फटकारा भी है। यह स्वेच्छा से जीने वाली स्त्री की आत्मकथा है जिन्होंने परिणाम को ध्यान में रखकर कोई काम नहीं किया। सचमुच यह एक जिद्दी लड़की की आत्मकथा है।

संदर्भ-सूची

1. गुप्ता रमणिका - आपहुदरी , संस्करण -2016 , सामयिक प्रकाश न, नई दिल्ली -110002 , पृ0 सं0 -448

2. वही  ... पृ0 सं0 -33

3. वही  ... पृ0 सं0 -19

4. वही  ... पृ0 सं0 -300

5. वही  ... पृ0 सं0 -210

 6. वही  ... पृ0 सं0-20

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