Home Blog Page 68

बनारस घराने की अंतिम ठसक का विदा-लेख

अभिषेक श्रीवास्तंव 


बुधवार की शाम बनारस बेचैन था और कलकत्ता मौन। काल के निरंतर प्रवाह में सदियों से ठिठके हुए ये दो शहर जो हमेशा ही जुड़वां नज़र आते रहे, आज इनका दिल जुड़ा गया था। विदुषी गिरिजा देवी- बहुतों के लिए अप्पाजी- जा चुकी थीं। ”बाबा विश्व नाथ, गंगा और गिरिजा” की तिकड़ी टूट चुकी थी। बिस्मिल्लाह खां जि़ंदा होते तो उनके लिए बनारस में जीने की एक वजह आज कम हो गयी रहती।

बीते दिनों कई फ़नकार हमारे बीच से गये। जगह खाली होती रही। गिरिजा देवी का जाना एक बड़े-से खोखल का अचानक पैदा हो जाना है। उस खोखल में कुछ चीज़ें रह-रह कर चमकती हैं। गूंजती हैं। मसलन, उनके करीने से संवारे हुए झक सफेद केश। बिलकुल एमएस सुब्बु लक्ष्मी के जैसे। उनकी अलग से दमकती लौंग। बिलकुल बेग़म अख़्ंतर के जैसी। गाते वक्त उनकी मुख-मुद्रा की दृढ़ता और स्वर के माधुर्य के बीच जो विपर्यय पैदा होता, ऐसा लगता कि यह तो उस्तााद बड़े गुलाम अली खां का हूबहू संस्करण है। वे जब बीच में गायन रोक कर समझाती थीं, तो ऐसा लगता था गोया पूरी दुनिया उनकी शागिर्द है और वे प्राइमरी की मास्टर।

यह कला में आस्था से उपजा ‘कनविक्शन’ था। इसी ने उन्हें गढ़ा था। इसी कनविक्शन ने बेग़म अख़्तर को भी गढ़ा। शादी के बाद दोनों का निजी जीवन बहुत त्रासद रहा था। उस दौर में जबकि औरतों का सार्वजनिक रूप से गाना ठीक नहीं समझा जाता था, गिरिजा देवी ने एक परंपरागत हिंदू परिवार की बेडि़यों से कैसे मोलभाव किया होगा, यह केवल सोचा ही जा सकता है।

आम तौर से हम लोग जब किसी कलाकार के बारे में बात करते हैं तो उसकी कला तक खुद को सीमित कर लेते हैं। अमूमन श्रद्धांजलि देना कलाकार की उपलब्धियों को गिनवाने का पर्याय बन जाता है। कम ही देखा जाता है कि उसकी कला के अलावा पूरी की पूरी जिंदगी ही अपने आप में एक उपलब्धि हो सकती है। कलाकार की पृष्ठभूमि पर बात करना तो लगभग वर्जित ही हो चला है।

ऐसे में यह बताया जाना ज़रूरी है कि गिरिजा देवी के पिता भले रसिक रहे हों, लेकिन वे बनारस के जिस परिवार और बिरादरी से आती थीं वह बनारस घराने की ब्राह्मणवादी परंपरा का प्रतिनिधि नहीं था। वह याचक नहीं था। वह शासक था। कहने को तो पूरब अंग के प्रतिनिधि छन्नूलाल मिश्र भी हैं, लेकिन उन्हें  आज तक शास्त्रीय परंपरा में रामकथा वाचक से आगे की शोहरत नहीं मिल पाई तो इसकी वजह जातीयता की जड़ों में है।

संगीत समाजशास्त्रीय विवेचन के बगैर अधूरा है। ये बातें स्मृतिशेष में वर्जित मानी जाती हैं, लेकिन गिरिजा देवी के गायन में मुख-मुद्रा की ठसक और कालांतर में पति के निधन के बाद कृष्ण पक्ष की ओर उनका रुझान समझने के लिए ज़रूरी हैं। उन्हें ऐसे ही ‘क्वीन ऑफ ठुमरी’ नहीं कहते। जिस खूबसूरती से वे झूले में बंदिश और ठुमरी की मुर्कियों को निभाती थीं, कोई सहज ही प्रश्न कर सकता है कि उन्होंरने आरंभिक जीवन में खयाल गायकी को क्यों नहीं अपनाया। वास्तरव में बार-बार उनसे यह सवाल पूछा गया है। इसका जवाब बनारस घराने की ब्राह्मणवादी परंपरा से विक्षेप में है। इस पर आगे भी बातें होती रहेंगी।

वे कलकत्ता में रहकर बनारस में एक अदद संगीत अकादमी खोलने के प्रयास में जुटी रहीं। सरकार ने बरसों जमीन नहीं दी। आज भी कोशिश चल रही है। बनारस से उनका प्रेम भाव कभी रत्ती भर कम नहीं हुआ। हां, इस बार कुल 22 साल बाद वे संकटमोचन संगीत समारोह में हिस्सा लेने आई थीं। यह अपने आप में दर्ज की जाने वाली बात है। कुल दो दशक से ज्यादा वक्त तक वे इस पारंपरिक आयोजन से दूर रहीं। यह केवल छह महीने पहले की बात है। रह-रह कर सवाल उठता है कि क्यां उन्हें अपनी रुख़सती का इल्म  हो गया था?

वे अपनी पीढ़ी की आखिरी फ़नकारा थीं जो रसूलन बाई, सिद्धेश्वरी देवी और बेग़म अख्तर की विरासत को अपने भीतर संजोए हुए थीं। जिनके भीतर एमएस सुब्बु लक्ष्मी के भी दर्शन होते थे। जिनके स्वर में राम नहीं, कृष्ण पक्ष हावी था। जहां बनारस घराने के ब्राह्मणवाद की याचना नहीं थी, ठसक थी। वह ठसक, वह टनकार, एक अफ़सोस की तरह अब रसिकों के दिलों में पैबस्त, है। वे कलकत्ता, से आखिरी बार बनारस आ रही हैं। कभी न लौटने के लिए। इस ढहते हुए प्राचीन शहर में एक संगीत अकादमी का खुल जाना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

अभिषेक श्रीवास्तव अपनी पत्रकारिता और अपनी सरोकारी प्रतिबद्धता के लिए जाने जाते हैं. सम्पर्क: 8800114126

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें    :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें  उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए…

‘ठुमरी की रानी’ के रूप में आदर प्राप्त शास्त्रीय संगीत गायिका गिरिजा देवी का मंगलवार रात करीब 9 बजे कोलकाता में दिल का दौरा पड़ने से 88 साल की उम्र में निधन हो गया। पिछले कई दिनों से उनका इलाज बीएम बिड़ला नर्सिंग होम में  चल रहा था।

पद्मविभूषण गिरिजा देवी का जन्म 8 मई, 1929 को वाराणसी में हुआ था। गायकी के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें वर्ष 1972 में पद्मश्री, वर्ष 1989 में पद्मभूषण और वर्ष 2016 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। उन्हें संगीत नाटक अकादमी द्वारा भी सम्मानित किया गया था।

बनारस घराने की परंपरा को अपनी गायिकी से समृद्ध करने वाली गिरिजा देवी को लोग प्यार से अप्पा कहकर बुलाया करते थे। शास्त्रीय संगीत,  खासकर ठुमरी गायन को परिष्कृत करने और इसे लोकप्रिय बनाने में अप्पा ने  बहुत बड़ी भूमिका निभाई।



नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर उनके निधन पर शोक जताया. पूरा देश उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दे रहा है.
बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए, रस के भरे तोरे नैन आदि के उल्लेखनीय गीत हैं.

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें    :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें  उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

विवाह नाबालिग लड़की से बलात्कार का लाइसेंस नहीं है

0
प्रमोद मीणा


एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, मानविकी एवं भाषा संकाय, महात्मा  गाँधी केंद्रीय विश्वाविद्यालय, मोतिहारी. सम्पर्क: –7320920958, pramod.pu.raj@gmail.com,

जनता के द्वारा लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकारें भीड़ के दबाव में या वोट बैंक की राजनीति के चलते अथवा अपनी पुंसवादी धार्मिक तुष्टिकरण की नीति के चलते बहुधा कानून बनाते समय उसमें कुछ ऐसे छिद्र रख देती हैं जिनसे होकर आगे चलकर अपराधी तत्व  कानून की पेचीदगियों और अंतर्विरोधों का फायदा उठाकर कानून के शिकंजे से साफ बच निकलते हैं। इस प्रकार सरकारें प्रगतिशीलता का दिखावा करते हुए भी यथास्थितिवादी बनी रहती हैं। बलात्कार से संबंधित भारतीय दंड संहिता के अनुच्छेद 375 में दी गई छूट संख्या् 2 इसी प्रकार का एक कानूनी अंतर्विरोध रहा है जिसके चलते 15 से 18 साल के बीच की नाबालिग लड़की के पति को अपनी पत्नी की बिना सहमति के भी उसके साथ यौन संसर्ग करने की व्यापक छूट और अधिकार प्राप्त था जबकि अनुच्छेद 375 स्वयं यह कहता है कि 18 से कम साल की लड़की के साथ दैहिक संबंध बनाना संविधिक रूप से बलात्कारर की श्रेणी में परिगणित किया जाएगा, चाहे इसप्रकार के संबंध में लड़की की सहमति हो या न हो। बाल अधिकारों और किशोरियों के यौन उत्पीाड़न के खिलाफ सक्रिय मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के द्वारा बार-बार कानून की इस विसंगति को उठाने के बाद भी केंद्र में बैठी सरकारें बाल विवाह के नाम पर किशोर वधुओं की देह के साथ होने वाले खिलवाड़ पर रोक लगाने के लिए कानून की इस कमी को दूर करने को तैयार न हो पाती थीं। किंतु 11 अक्टूबर को आए सर्वोच्च न्यायलय के दो न्यायधीशों मदन बी. लोकुर और दीपक गुप्ता की पीठ के एक निर्णय ने अंतत: दशकों पुरानी इस कानूनी विसंगति को दूर करके नाबालिग लड़कियों के साथ होने वाले दैहिक उत्पीड़न और बलात्कार पर रोकथाम लगाने वाले विभिन्न कानूनों के बीच एकसूत्रता भी ला दी है जिसके लिए लंबे समय से मानवाधिकार कार्यकर्ता संघर्षरत थे।कुल 127 पृष्ठों के अपने पृथक-पृथक निर्णयों में दोनों न्यायधीशों ने स्वेयंसेवी संगठन इंडिपेंडेंट थॉट द्वारा अनुच्छेद 375 में दी गई छूट को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए अपने निर्णय में स्पष्ट  किया है कि एक आदमी के द्वारा 18 वर्ष से कम आयु की अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाना बलात्कार है। अदालत ने अपने निर्णय में रेखांकित किया है कि किसी बालिका के मानवाधिकारों की उपेक्षा नहीं की जा सकती चाहे वह विवाहिता हो या अविवाहिता हो। उसके मानवाधिकारों को हमें स्वीकारना ही होगा। अदालत ने अपने निर्णय में कहा है कि अनुच्छेद 375 में प्रदत्त छूट संख्या 2 का अर्थ अब यही लगाना चाहिए कि किसी पुरुष के द्वारा 18 साल से ज्यादा उम्र की अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाना या यौन कृत्‍य करना बलात्कार नहीं है।

15 साल की उम्र से ऊपर की पत्नी के साथ अनुच्छेद 375 में पति को यौन संसर्ग की जो छूट मिली हुई थी, उस 15 साल वाली जादुई संख्या के रहस्य का खुलासा करते हुए अपने निर्णय में न्यायधीश दीपक गुप्ता ने कहा है कि इसका कारण कानून के इतिहास में 1940 तक पीछे निहित है। 1940 में यौन संसर्ग में लड़की द्वारा सह‍मति व्यक्त‍ करने की न्यूनतम उम्र 16 साल और विवाह की न्यूनतम उम्र 15 साल हुआ करती थी अत: उस समय छूट विषयक धारा में विवाह अंतर्गत पत्नी  के साथ यौन संबंध बनाने की न्यूनतम उम्र भी 15 साल थी। 1975 में यौन संसर्ग पर सहमति देने की न्यूनतम उम्र 16 साल और विवाह की न्यूनतम उम्र 18 साल कर दी गई किंतु छूट विषयक उम्र 15 साल ही रह गई। आज जब सहमति और विवाह की न्यूनतम उम्र, दोनों 18 साल हैं तब भी छूट विषयक उम्र की सूई 15 साल पर ही अटकी हुई है। स्पष्ट है कि छूट की इस उम्र सीमा को भी विवाह की न्यू नतम उम्र के तुल्य करना आवश्यक था।

18 साल से कम उम्र की लड़की को भारतीय कानून में नाबालिग माना गया है अत: विवाह होने से उसकी नाबालिगीयत की संविधिक स्थिति में कोई अंतर नहीं आ जाता और इसीलिए यौन संबंधों में उसकी इच्छा और सहमति का बहाना किसी पुरुष को बलात्कार के अपराध से मुक्त नहीं कर सकता चाहे वह पुरुष उसका पति ही क्यों न हो। किंतु सर्वोच्च अदालत के इस निर्णय से पहले पति नाम के इस प्राणी को 15 साल से ज्यादा और 18 साल से कम उम्र की अपनी नाबालिग पत्नी के साथ दैहिक संसर्ग करने पर भी बलात्कार के अभियोग से बाहर रखा गया था। स्पष्ट है कि बलात्कार को अपराध ठहराने वाली भारतीय दंड संहिता के अनुच्छेद 375 में दी गई छूट संख्या  2 के कारण 15 से 18 साल के बीच की किशोर पत्नियाँ एक व्यक्ति के रूप में वैवाहिक जीवन में अपना कोई अस्तित्व नहीं रखती थीं। पति को अपनी इस नाबालिग पत्नी को वस्तु मान अपनी काम वासना संतुष्ट करने की पूर्ण अनुमति बलात्कार विषयक कानून में प्रदत्त यह छूट दे रही थी। अत: सर्वोच्च  अदालत ने अपने निर्णय में बिल्कुल ठीक कहा है कि 18 साल से कम उम्र की बालिकाएँ उपभोक्ता वस्तुएँ नहीं हैं जिन्हें अपनी ही देह को लेकर ना कहने का अधिकार न हो। उन्हें भी यौन संसर्ग को ना कहने का अधिकार है।



 न्यायधीश लोकुर ने अनुच्छेद 375 द्वारा प्रदत्त छूट संख्या 2 की विसंगति को अन्यायपूर्ण घोषित करते हुए लिखा है कि एक अविवाहित लड़की अपने साथ बलात्कार करने वाले पुरुष के खिलाफ अदालत में बलात्कार के अपराध का अभियोग लगा सकती है जबकि 15 से 18 साल तक की विवाहिता लड़की अपने पति द्वारा किये जाने वाले बलात्कार के खिलाफ इसप्रकार का अभियोग तक नहीं लगा सकती। शेक्सपीयर की प्रसिद्ध दार्शनिक उक्ति –‘एक गुलाब को किसी भी नाम से पुकारा जाए, वह सदैव सुगंध ही देता है’ में व्यंजित शाश्वत सत्य‘ को उद्धृत करते हुए न्यायधीश लोकुर निर्णय में कहते हैं कि एक बच्चा सदैव बच्चा ही रहता है चाहे वह बच्चा गली का बच्चा हो या एक परित्यक्त‘ बच्‍चा हो या दत्तक बच्‍चा हो।इसीप्रकार एक बालिका, बालिका ही रहती है चाहे वह एक विवाहिता बालिका हो या अविवाहिता बालिका हो,चाहे तलाकशुदा बालिका हो या पति द्वारा परित्य क्त बालिका हो या विधवा बालिका हो। मतलब यह हुआ कि किसी भी प्रकार का उपसर्ग कानून की नज़र में बालक या बालिका को नाबालिग से बालिग नहीं बना सकता। स्प्ष्ट है कि भारतीय दंड संहिता के अनुच्छेद 375 में विवाहित नाबालिग लड़की और अविवाहित नाबालिग लड़की के बीच जो विभेद किया गया था, वह गैर तार्किक था। अदालत ने भी अपने निर्णय में विवाहित लड़की और अविवाहित लड़की के इस भेद को अनावश्यक और कृत्रिम बताया है। इस अनुच्छेद में बलात्कार के मामले में नाबालिग पत्नी के पति को दी गई छूट अपनी देह पर नाबालिग विवाहिता लड़की के अधिकार को मान्येता नहीं देती थी और न ही पुनरुत्पादन के निर्णय को लेकर ऐसी अवयस्क विवाहिता लड़की की इच्छा  या अनिच्छा का कोई सम्मान करती थी। वास्तन में अनुच्छेद 375 अंतर्गत प्रदत्त छूट संख्या 2 के समर्थक विवाह के नाम पर होने वाली छोटी-छोटी बच्चियों के बलात्कार और मानव तस्करी के यथार्थ के प्रति जाने-अनजाने आँखें मूँद लेते हैं.


सर्वोच्च अदालत के वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने एक स्वर से इसे एक प्रगतिशील कदम बताया है। सर्वोच्च अदालत द्वारा भारतीय दंड संहिता में विद्यमान बलात्कार के इस कानून की दूर की गई विसंगति के परिणाम कानूनी क्षेत्र में दूर तक जाएँगे। इस निर्णय से अब बलात्कार को लेकर बनाये गये दंड संहिता के अनुच्छेद 375 के अंतर्गत भी बालक-बालिका होने को परिभाषित करने वाली उम्र बाल संरक्षण विषय अन्य कानूनों में निर्धारित उम्र के सममुल्य  हो गई है। बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 ; यौन अपराधों से बच्चों की सुरक्षा अधिनियम, 2012 और किशोर न्याय अधिनियम, 2011 जैसे तमाम बाल संरक्षण के नियमों में 18 साल से कम उम्र के हर शख़्स को बालक-बालिका की परिभाषा में रखा गया है। इस निर्णय ने बाल विवाह के स्वत: ही अमान्य हो जाने और उसके पूर्णत: निषेध का रास्ता खोल दिया है।इस निर्णय का एक त्वरित परिणाम यह निकलेगा कि जो युग्म् पहले से बाल विवाह की परिधि में हैं, उन्हें  पत्नी  के 18 साल की उम्र प्राप्त करने तक पृथक-पृथक रहना होगा ताकि वे कानूनी झमेले से स्वयं को बचा सके। भविष्य् में यह निर्णय बाल विवाह पर रोक लगाने की दिशा में महत्पूर्ण अवरोधक साबित होगा क्योंकि यह निर्णय सीधे-सीधे पति को बलात्कार का दोषी बना देता है।

बाल विवाह निषेध अधिनियम में बाल विवाह प्रतिबंधित अवश्य  है किंतु इस कानून के अंतर्गत इसप्रकार का विवाह स्वत: अमान्य नहीं हो जाता। वर्तमान कानून में विवाह को अदालत से अमान्य साबित कराने का आधार है – बच्चे को संरक्षकों के परिक्षण से दूर करके धोखे से विवाह बंधन में बांधना अथवा मानव व्या्पार  के उद्देश्य से विवाह के नाम पर बच्चे को बेचा जाना।  इसप्रकार के विवाह को अमान्य घोषित करवाने के लिए पति-पत्नी, दोनों में से किसी एक पक्ष को अदालत में अपील करनी होती है किंतु व्यवहार्य में बालिका वधू को ही अदालत का दरवाजा खटखटाना होता है। इसके लिए उसे वयस्कसता की उम्र प्राप्ति के दो साल के अंदर इसप्रकार के विवाह की मान्यता को रद्द करवाने के लिए अदालत की शरण लेनी होती है। बाल विवाह को स्वत: अमान्य न करार दिये जाने को लेकर सर्वोच्च अदालत की पीठ ने अपने इस निर्णय में बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006की आलोचना भी की है।

बाल विवाह की विकरालता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य  सर्वेक्षण-Ⅲ के आंकड़ों के अनुसार 18-29 आयु वर्ग की 46 प्रतिशत महिलाओं की हमारे देश में शादी 18 साल की उम्र से पहले हो चुकी थी। इसीप्रकार 2011 की जनगणना के मुताबिक उस साल लगभग 49.5 लाख भारतीय लड़कियाँ 18 साल से कम उम्र की थीं और उनका विवाह हो चुका था। नाबालिग लड़कियों की कुल संख्या में से विवाहिता नाबालिग लड़कियों के अनुपात की दृष्टि राजस्थान का पहला स्थान था जबकि मिजोरम में यह अनुपात सबसे कम था। लड़कियों की साक्षरता और शिक्षा की दृष्टि से फिसड्डी राज्यों  में शुमार होते रहे राजस्थान में बाल विवाह का इतना ज्यादा प्रचलन अशिक्षा और बाल विवाह के बीच सीधा-सीधा संबंध व्यंजित कर देता है। इस संदर्भ में किसी धर्म विशेष को बाल विवाह के लिए जबावदेह नहीं ठहराया जा सकता। मुसलिमों से पूर्वाग्रह रखने वाली कुछ हिंदुत्ववादी ताकतें मुसलिम धर्म के ऊपर बाल विवाह की इजाजत देने के आरोप लगाती हैं किंतु यथार्थ यह है कि भारत के सभी धर्मालंबियों में एक समान रूप से बाल विवाह का प्रचलन मिलता है। श्रीनिवासन रमानी और विग्नेश राधाकृष्णन द्वारा संकलित आंकड़ों से पता चलता है कि हमारे यहाँ सभी धर्मालंबियों के यहाँ लगभग 2 प्रतिशत लड़कियों का विवाह बालिग होने की उम्र से पहले ही कर दिया जाता है।गामीण क्षेत्र में चार में से एक लड़की और शहरी इलाकों में पाँच में से एक लड़की 18 साल की होने से पहले ही बियाह दी जाती है। बालिग होने से पूर्व ही लड़कियों का विवाह कर दिया जाना बाल मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन का हेतु साबित होता है। बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराई के कारण लड़कियों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य   पर बड़ा घातक प्रभाव पड़ता है। कम उम्र में विवाह हो जाने से शिक्षा प्राप्त् करने और अपने व्यक्तित्व का विकास करने के अवसर लड़कियों के हाथ से छिन जाते हैं।अपनी ही देह पर उनका नियंत्रण नहीं रहता और जीवन के तमाम पहलुओं में वे पति और पति के घरवालों के अधीन हो जाती हैं।


अत: अदालत द्वारा अपने निर्णय में इस बात पर चिंता जाहिर करना वाजिब है कि बाल विवाह निषेध अधिनियम अंतर्गत विवाह विलोपन को लेकर अभियोगों की संख्याा बहुत ही कम हैं।अपने निर्णय में न्या यधीश गुप्ताय लिखते हैं कि वे इस भयावह यथार्थ से अनभिज्ञ नहीं हैं कि अधिकांश बाल वधुओं की उम्र 15 साल से भी कम हैं। उन्होंने देश के विभिन्नं हिस्सों में वय:संधि की उम्र से भी पहले छोटे बच्चों के विवाह पर खेद प्रकट किया है। ऐसे मासूम बच्चे तो विवाह का मतलब तक नहीं जानते। अस्तुि, परंपरा के नाम पर प्रचलित बाल विवाह पर लगाम लगाने में यह निर्णय निश्चय ही दूरगामी साबित होगा। इस संदर्भ में विभिन्न धर्मों के निजी कानून भी कोई अड़ंगा नहीं लगा पाएँगे क्यों कि अपराधिक दंड संहिता विषयक कानून धर्म और जाति विशेष की परंपराओं के नाम पर सीमित नहीं किये जा सकते। इसीप्रकार विशेषज्ञों के अनुसार वैवाहिक संबंधों में होने वाले बलात्कार को आपराधिक कृत्या ठहराने और उस पर निषेधात्मक कानून बनाने की नारीवादी मुहिम को भी अब ज्यादा बल मिलेगा।


किंतु भारत सरकार सर्वोच्च अदालत द्वारा अनुच्छेद 375 में प्रदत्त छूट संख्या 2 की विसंगति को दूर किये जाने के पक्ष में नहीं रही है। और इस मामले को लेकर पिछली यूपीए और वर्तमान एनडीए सरकार में अद्भुत मतैक्य  दिखाई देता है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के हर निर्णयको पलटने की जिद पर अड़ी वर्तमान मोदी सरकार ने इस मामले में मनमोहन सिंह सरकार द्वारा फरबरी, 2014 में अदालत में प्रस्तु्त पुराने शपथपत्र को ही एक बार फिर ज्यों का त्यों  प्रस्तुकत करते हुए बाल विवाह की परंपरा का हवाला देते हुए अनुच्छेद 375 में प्रदत्त छूट को न हटाने का अनुरोध किया था। सरकार का कहना था कि नाबालिग बच्चों  के विवाह की परंपरा भारत के सभी सामाजिक समूहों में प्रचलित है अत: नाबालिग पत्नी के साथ पति द्वारा बनाये दैहिक संबंध को बलात्कार पर की संज्ञा देना और इसप्रकार बाल विवाहों को पूर्णत: अमान्य   ठहराना अनुचित है। कुछ साल पहले नोबेल पुरस्कार प्राप्त कैलाश सत्यार्थी के स्वसयंसेवी संगठन ‘बचपन बचाओ’ ने जब अनुच्छेद 375 में प्रदत्त  छूट संख्या 2 की वैधानिकता पर पुनर्विचार के लिए अदालत से गुजारिश की थी तब इस मुद्दे को लेकर सरकार के दो मंत्रालय तक आमने-सामने खड़े दिखे थे। वैसे केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने अनुच्छेकद 375 में प्रदत्तर छूट का परंपरा के नाम पर समर्थन करते हुए भी महिला और बाल विकास मंत्रालय को दिये अपने जबाव में अदालत के निर्देशों का सम्मान करने की बात कही थी। अदालत में केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुंत शपथपत्र में अनुच्छेद 375 में प्रदत्त् छूट को जैसे तैसे वैधानिकता देने के यथास्थितिवादी प्रयास की निंदा करते हुए न्या्यधीश लोकुर ने कहा है कि केंद्र सरकार को 15 से 18 साल की उम्र के बीच में बियाह दी जाने वाली लड़कियों की यंत्रणा को नहीं भुलाना चाहिए। अदालत के समक्ष प्रस्तु्त अपने शपथ पत्र में अनुच्छेद 375 में प्रदत्त छूट के पक्ष में केंद्र सरकार का तर्क था कि विधायिका ने बाल विवाह के व्यापक प्रचलन के मद्देनज़र बाल विवाह की पूर्णता के द्योतक यौन संसर्ग को अपराध घोषित किये जाने को युक्तियुक्ते नहीं पाया था। किंतु अदालत इस तर्क से संतुष्ट नहीं हुई और उसने अपने निर्णय में कहा कि अपने पति के साथ यौन संसर्ग से इनकार करने के नाबालिग पत्नीे के अधिकार को अनुच्छेद 375 में प्रदत्त् छूटसंविधिक रूप से अस्वीधकृत कर देती है। स्पष्ट है कि यह छूट नाबालिग पत्नी  के मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन साबित हो रही थी। और यही कारण था कि अदालत अपने निर्णय में इस निष्कर्ष पर पहुँची कि अपनी नाबालिग पत्नी के साथ यौन संसर्ग करने का अपराधी साबित होने पर पति को बलात्कार के लिए दंडित किया जाएगा। अस्तु, सर्वोच्च‍ अदालत के इस निर्णय ने गेंद केंद्र सरकार के पाले में डाल दी है और अब यह सरकार के ऊपर है कि वह इस निर्णय को एक स्वर्णिम अवसर के रूप में ले और बाल विवाह के कलंक और लज्जा  से देश को मुक्त करे।

बच्चों और महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष कार्यकर्ताओं ने अदालत के इस निर्णय की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है किंतु इसके क्रियान्वयन को लेकर अपनी चिंताएँ भी मीडिया के साथ साझा की हैं। और इन चिंताओं को खारिज भी नहीं किया जा सकता विशेषत: तब जब स्वयं केंद्र सरकार बाल विवाह के व्यापक यथार्थ का तर्क देकर बाल विवाह अंतर्गत दैहिक संसर्ग को वैध ठहराने और उसे बलात्का्र के दायरे से बाहर रखने का अनुरोध अदालत के समक्ष प्रस्तुत अपने हलफनामे में करती हो। बाल विवाह निषेध अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन से पीछे हटती रही केंद्र और राज्ये सरकारों से कोई ज्याुदा उम्मीद भी हम नहीं कर सकते।

लड़कियों की साक्षरता और स्त्री  सशक्तिकरण के माध्यम से ही अदालत के इस निर्णय के क्रियान्वंयन की सफलता सुनिश्चत की जा सकती। स्वयं लड़कियों और स्त्रियों की पहल ही अदालत के इस निर्णय की रोशनी में बाल विवाह और नाबालिग पत्नियों पर होने वाले बलात्कारों पर अंकुश लगा सकती है।अदालत के इस निर्णय की किंचित नकारात्मक परिणतियों का समाहार भी किया जाना अपेक्षित है। भारतीय दंडसंहिता के मुताबिक किसी भी अपराध की सूचना देना अनिवार्य है और अब अदालत के निर्णय के बाद 15 से 18 साल की नाबालिग पत्नीे के साथ यौन संबंध बलात्कारर की श्रेणी में आएगा अत: सुरक्षित प्रजनन और अन्यण स्वास्थ्य  सेवाओं की जरूरत पड़ने पर भी परिवार के टूटने के डर से नाबालिग पत्नी् को समुचित चिकित्सा सेवाएँ नहीं मिल पाएँगी। पति को बलात्कार के आरोप से बचाने के लिए स्वयं नाबालिग पत्नी ही वैकल्पिक चिकित्सा  पर निर्भर होने को मजबूर हो जाएगी। इसप्रकार परोक्ष रूप से अदालत का यह निर्णय नाबालिग पत्नियों के स्वास्थ्य   के साथ समझौते को बढ़ावा देने वाला साबित हो सकता है। इस समस्या  के निराकरण के लिए और नाबालिग पत्नी और उसके पति को होने वाली अनावश्यक कानूनी समस्याओं के समाधान हेतु यह प्रावधान किया जा सकता है कि पति द्वारा 15 से 18 साल की अपनी पत्नी केसाथ स्थाापित किये जाने वाले यौन संबंधों की शिकायत करने का अधिकार तृतीय पक्ष को न दिया जाए। सिर्फ पीड़ि‍त पक्ष को अर्थात नाबालिग पत्नी  को ही पति के खिलाफ अनुच्छे।द 375 के तहत बलात्कार की शिकायत का अधिकार दिया जाना चाहिए। वैसे पत्नी के नाबालिग होने के कारण तृतीय पक्ष को इसप्रकार के बलात्कार की सूचना पुलिस को दिये जाने की छूट दी जा सकती है। और हमें यह भी याद रखना चाहिए कि 15 से 18 साल की आयु वाली लड़कियों से विवाह करने वाले समस्ती पुरुषों विशेषत: नाबालिग लड़कों को बलात्कार का आरोपी ठहराकर अदालत में उन पर आपराधिक अभियोग चलाना न तो संभव है और न वांक्षित। अत: अदालत द्वारा अनुच्छेद 375 में प्रदत्त छूट रद्द कर दिए जाने के बाद भी 15 से 18 साल की विवाहित लड़कियों के पतियों के खिलाफ दायर बलात्कार के अभियोगों की सुनवाई में अदालतों को अपने विवेक से काम लेना होगा। बाल विवाह एक सामाजिक बुराई है और मात्र कानून बनाकर उसे खत्म नहीं किया जा सकता। इसके लिए तो जन जागरण और सामाजिक आंदोलन अपेक्षित है। बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतिश कुमार द्वारा की गई पहल इस संदर्भ में प्रशंसनीय है। आज समय बदल चुका है अत: समय के साथ कदमताल मिलाते हुए बाल विवाह जैसी पिछड़ी परंपराओं का खात्मा भी जरूरी हो चुका है। मात्र कानून बनाने से कुछ नहीं होगा, कानून के समुचित क्रियान्व़न हेतु प्रशासन को अपनी मानसिकता भी बदलनी होगी। अदालत ने एक रास्ता दिखा दिया है, अब इस पर चलना तो हम सभी को है।

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें    :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें  उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

यौन उत्पीड़क प्रोफेसरों की जारी सूची पर छिड़ा विवाद: जेएनयू, डीयू सहित 33 बड़े संस्थानों के 61 प्रोफेसर सूची में

अमेरिका स्थित एक स्त्रीवादी भारतीय वकील राया  सरकार ने उन शिक्षाविदों के नामों की सूची  अपने  फेसबुक पेज पर डाली है, जिनपर उनकी विद्यार्थियों ने यौन उत्पीडन का आरोप लगाया है. यह सूची राया सरकार ने सोशल मीडिया में #MeToo कैम्पेन के बाद जारी की है. राया ने यह सूची पीड़िताओं द्वारा उन्हें बताये गये नामों के आधार पर बनायी है, पीड़िताओं ने उन्हें अपने उत्पीड़क के नाम मेसेज किये थे, विवरण के साथ .

हालांकि इस सूची के जारी होने के बाद कई भारतीय स्त्रीवादियों ने लोगों के नामों की सूची जारी करने की निंदा करते हुए काफिला पर एक वक्तव्य जारी किया. आयशा किदवई, जानकी नायर, कविता कृष्णनन, नंदिनी राव, निवेदिता मेनन ,वृंदा ग्रोवर सहित कई अकादमिक जगत से जुड़ी और उसके बाहर की अन्य स्त्रीअधिकार की कार्यकर्ताओं ने इस सूची की निंदा करते हुए कहा कि हमने जो एक लम्बे दौर से  कार्य स्थलों पर  यौन उत्पीडन  की शिकायत के लिए एक  व्यवस्था बनायी है, उसे ऐसे प्रयासों से नुकसान होगा. यह न्याय के ‘प्राकृतिक सिद्धांत’ के भी खिलाफ जाता है.

हालांकि इस निंदा के विपक्ष में भी लोगों ने तर्क दिये हैं कि ‘यह एक कुलीन बचाव और एकता है.’ उनका सवाल है कि यदि ऐसे ही नाम यदि ‘उबर ड्राइवर या अन्य गैरकुलीन पेशों के आते तो क्या निंदा जारी करने वाली स्त्रीवादियों के तर्क यही होते.

वे प्रोफेसर जिनके नाम राया सरकार ने जारी किये
1). दीपेश चक्रवर्ती, जादवपुर , 2)  कनक सरकार, जादवपुर , 3) प्रसन्ना चक्रवर्ती, दिल्ली विश्वविद्यालय, अंग्रेजी विभाग, 4) पार्थ चटर्जी, राजनीतिक सिद्धांतवादी और इतिहासकार, 5) नेड बर्टज़, हवाई विश्वविद्यालय / अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली, इतिहास विभाग, 6) मानस रे, सीएसएसएस कलकत्ता,7) प्रदोष  भट्टाचार्य, जादवपुर विश्वविद्यालय, जूडई, 8) बिद्युत  चक्रवर्ती, डीयू राजनीतिक विज्ञान विभाग, 9) राजर्षि दासगुप्ता, सीपीएस, जेएनयू, 10) कौशिक रॉय, जादवपुर विश्वविद्यालय, जुदेपिस, 11) सुमित कुमार बरुआ, जादवपुर विश्वविद्यालय, जेयूसीएल, 12) निलानंजन दत्ता, फिल्म और टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई) एडिटिंग विभाग, 13) संदीप चटर्जी, निर्देशन विभाग एफटीआईआई, 14) मितुल बरुआ, अशोक विश्वविद्यालय, 15) आर.सी. नटराजन, पूर्व निदेशक, ग्रामीण विकास आनंद संस्थान (आईआईआरएएमए), गुजरात, 16) अली अहमद इद्रसी, दिल्ली यूनिरेविटी, 17) पार्थ मुखर्जी, सेंट जेवियर्स कॉलेज, कोलकाता, 18) श्यामल कर्मकार, एचओडी ऑफ एडिटिंग , सत्यजीत रे फिल्म और टेलीविज़न इंस्टीट्यूट (एसआरएफटीआई), 1 9) श्यामल सेनगुप्ता, पूर्व एचओडी उत्पादन, एसआरएफटीआई, 20) शुभराध चौधरी, एसआरएफटीआई, डायरेक्शन डिप्टी
21) अर्ल नंबी, शिक्षक, परमाणु ऊर्जा उच्च माध्यमिक केंद्रीय विद्यालय, कुडनकुलम, टीएन। (तमिल कवि और लेखक), 22) सोम बोस, टेरी विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, अर्थशास्त्र विभाग, 23) अभिजीत गुप्ता, जादवपुर विश्वविद्यालय, 24) मृदुल बोस, जादवपुर विश्वविद्यालय, 25) अमित अब्राहम, प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक, स्कॉटलैंड चर्च कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल कोलकाता।, 26) गोपाल बालकृष्णन, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के सांताक्रूज और न्यू बाएं रिव्यू, 27) अंकुर बरुआ, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, 28) अनुप धर, अम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली (एयूडी)
2 9) अशोक नागपाल, एयूडी, 30) विक्र मित्रा, एयूडी, 31) बेंजामिन  जचिर्या, प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी, कलकत्ता / ट्राएर विश्वविद्यालय, जर्मनी, 32) विश्वजीत चटर्जी, जादवपुर विश्वविद्यालय, अर्थशास्त्र विभाग, 33) रवीन्द्र सेन, जादवपुर विश्वविद्यालय, अंतर्राष्ट्रीय संबंध विभाग, 34) भास्कर मोइत्रा, जादवपुर विश्वविद्यालय, अर्थशास्त्र विभाग
35) सागर नाइक, डी वाई पाटिल यूनिवर्सिटी, आतिथ्य और पर्यटन [भावनात्मक रूप से और शारीरिक रूप से लड़ रहे पुरुष छात्र, 36) खालिद वासिम, तिस तुलजापुर, 37) स्वर्गीय एमएसएस पांडियन, 38) सुरिंदर एस जोधका, जेएनयू, 39) कानव गुप्ता, दिल्ली विश्वविद्यालय, 40) परशुरा सिंह, यूसी रिवरसाइड, 41) लॉरेंस लिआंग, एयूडी, 42) अर्घ्य बसु, पूर्व संकाय एफटीआईआई, दस्तावेजी फिल्म निर्माता, 43) जयंत धूपकर, ईएफएलयू, हैदराबाद, 44) बी एन रे, पूर्व उपराष्ट्रपति, रामजास कॉलेज, डीयू, 45) जॉयदेव चोटापाध्याय, आईएसआई कोलकाता, 46) बिलाल आबिद, निफ्ट दिल्ली, 47) गौतम चक्रवर्ती, दिल्ली विश्वविद्यालय, अंग्रेजी विभाग. 48) पप्पू वेणुगोपाल राव, संगीत अकादमी मद्रास. 49) ईश मिश्रा, हिंदू कॉलेज, डीयू, 50) कौशिक बसु, एनएलएसआईयू बैंगलोर, 51) देवमालिया चटर्जी, ज्यू प्रोडक्शन इंजीनियरिंग विभाग, 52) सरोज गिरि, दिल्ली विश्वविद्यालय, 53) दारा एस अमर, सेंट जॉन्स मेडिकल कॉलेज बैंगलोर, 54) पिता वर्गीज, मसीह विश्वविद्यालय
55) मिहिर भट्टाचार्य, फिल्म विभाग के संस्थापक और पूर्व एचओडी, जादवपुर विश्वविद्यालय [शिकायतकर्ता, एक पूर्व संकाय ने सार्वजनिक रूप से इस बारे में बात की, लेकिन मुझे धमकाने के बाद अपना नाम बंद करना चाहता था), 56) शिभाशिश बोस, ज्यू, आर्किटेक्चर विभाग, 57) अहमर अनवर, श्री वेंकटेश्वर कॉलेज, डीयू, 58) देबायुध चटर्जी, जूड, डीयू रिसर्च विद्वान, 59) शॉनवाज़ अली रेहान, ऑक्सफोर्ड के छात्र और प्रोफेसर नहीं बल्कि यौन उत्पीड़न, 60) एशले टेलिस, 61) प्रवीण, दुसाने एमईएस अबासाहेब गरवारे कॉलेज, पुणे

सोशल मीडिया में जारी यहां उन कॉलेजों की सूची दी गई है जहां कथित यौन उत्पीड़कों ने काम किया या काम करना जारी रखा है

1) जादवपुर विश्वविद्यालय, कोलकाता
2) दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
3) हवाई विश्वविद्यालय, होनोलूलू, हवाई (यूएस)
4) अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली (एयूडी)
5) सेंटर फॉर स्टडीज इन सोशल साइंसेज (सीएसएसएस), कोलकाता
6) जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), नई दिल्ली)
7) फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट (एफटीआईआई), पुणे
8) अशोक विश्वविद्यालय, सोनिपत, हरियाणा
9) ग्रामीण प्रबंधन आनंद संस्थान (आईआईआरएमए), गुजरात
10) सेंट जेवियर्स कॉलेज, कोलकाता
11) सत्यजीत रे फिल्म और टेलीविजन संस्थान (एसआरएफटीआई), कोलकाता
12) परमाणु ऊर्जा उच्च माध्यमिक केंद्रीय विद्यालय, कुडनकुलम, तमिलनाडु
13) टेरी विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
14) स्कॉटिश चर्च कॉलेज, कोलकाता
15) कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सांता क्रूज़
16) यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज
17) प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी, कलकत्ता
18) यूनिवर्सिटी ऑफ ट्राएर, जर्मनी
19) डी वाई पाटिल विश्वविद्यालय, मुंबई
20) टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस, ऑफ-कैंपस, तुलजापुर, उस्मानाबाद जिला, महाराष्ट्र
21) मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज, चेन्नई
22) कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, रिवरसाइड, कैलिफ़ोर्निया, संयुक्त राज्य अमेरिका
23) अंग्रेजी और विदेशी भाषाएं विश्वविद्यालय (ईएफएलयू), हैदराबाद
24) रामजास कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय
25) भारतीय सांख्यिकी संस्थान (आईएसआई), कोलकाता

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें    :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें  उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

स्त्रीकाल (अक्टूबर-दिसंबर) पढ़ें नॉटनल पर

स्त्रीकाल का ताजा अंक (अक्टूबर-दिसंबर) नॉटनल पर. ऑनलाइन पढ़ने के लिए सबसे नीचे दिये गए लिंक को क्लिक करें: 

ताजा अंक में
संसद के दोनो सदनों में महिला आरक्षण पर हुई बहस के साथ-साथ निशा शेंडे,शम्भु गुप्त, अस्मिता राजुरकर, अरविन्द जैन, सौम्या गुलिया, संजीव चंदन, एल, जे रुस्सुम, डा. अनुपमा गुप्ता, डा.पूरन सिंह, विपिन चौधरी, प्रतिमा, पूजा खिल्लन, संध्या नवोदिता आदि के लेख, रचनायें लतिका रेणु (फणीश्वरनाथ रेणु की पत्नी) से अनंत का साक्षात्कार, तथा महिला आरक्षण पर स्त्रीकाल द्वारा आयोजित राउंडटेबल की पूरी बातचीत शामिल है. अंक में अनुवाद डा. अनुपमा गुप्ता, पूजा सिंह और श्रीप्रकाश ने किये हैं।

स्त्रीकाल (अक्टूबर-दिसंबर)

क्यों महिला विरोधी है दिल्ली मेट्रो का किराया बढ़ाना?

ज्योति प्रसाद

 शोधरत , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय. सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com

हाल ही में दिल्ली मेट्रो का किराया फिर से बढ़ा दिया गया है। इस बीच दिल्ली सरकार और मेट्रो अधिकारियों के बीच खूब कहा सुनी और खींचतान जारी रही। यह अहम विषय है और इसे कतई नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। कल ही भैया दूज के दिन मेट्रो ने लगभग 45 मिनट तक लोगों को रुलाया तो वहीं कुछ दिन पहले राजीव चौक स्टेशन पर चली ‘गंदी वाली’ फिल्म ने सभी को मुंह खोलने के मौका भी दे दिया था। जी हाँ, दिल्ली मेट्रो के संदर्भ में ऐसे किस्से चल रहे हैं। अब बढ़े हुए किराए ने फिर एक बार उसे चर्चा का विषय बना दिया है।


मेट्रो ने सफर के नए अनुभवों में अपनी अच्छी ख़ासी जगह बनाई है और निरंतर बना भी रही है। ‘इश्क़ में मेट्रो होना’ किताब के लिए अच्छी ख़ासी सामाग्री मेट्रो के अंदर और बाहर मिल सकती है। मनुष्य, उसका सफर और संसाधनों के बीच गुंथा हुआ भी है। छोटी कक्षाओं में पढ़े गए यातायात के संसाधनों के उन प्राचीन स्रोतों को दिमाग में घुमा लेना जरूरी है। इतिहास की किताबों में बड़े ही दिलचस्प अंदाज़ में तस्वीरों और छोटे छोटे वर्णनों के प्रयोग से परिवहन को समझाया जाता था और शायद आज भी ऐसा हो रहा होगा। आदि मानव से शुरू हुई कहानी पहिये के चमत्कारिक और क्रांतिकारी आविष्कार के साथ आगे बढ़ती है और बच्चों के नन्हे दिमाग को यह समझ आने लगता है कि सफर किन पड़ावों से गुज़र चुका है। और आज जब हम बड़े हुए हैं तब यह मालूम चलता है कि उस जानवर वाली गाड़ी के पीछे वाला हिस्सा जिसमें पहिया लगा था आज मेट्रो और रेल को कितनी शानदार गति प्रदान कर रहा है। इसमें यह बात भी जोड़ लेनी चाहिए कि विद्युत का असीम योगदान है।

सफर मानव स्वभाव में कई चीज़ों की बदौलत उभरता है। जरूरत,कौतुक, रोमांच, दिलचस्पी, जगहों के भ्रमण की तीव्र इच्छा और न जाने क्या क्या कारक हैं। इतिहास में सफर-संस्मरण, यात्रियों के संस्मरणों के रूप में दस्तक देते रहते हैं। भारत के इतिहास का एक बहुत बड़ा टुकड़ा विदेशी यात्रियों की बदौलत सामने आता है। मेगास्थनीज़, अल बिरूनी(बिरनी भी कहते हैं लोग), फाहियान या फिर ह्वेन सांग आदि आदि यात्रियों ने जो देखा और दर्ज़ किया। इनके द्वारा लिखा वृतांत भारतीय इतिहास के लिए आगे चलकर अहम दस्तावेज़ में तब्दील हो गए।यात्रा ने मानव मस्तिष्क के अनुसार अपने रवैये और साधन को बदलाया मानव मस्तिष्क ने यात्रा की शक्ल बदली। जो बात नहीं बदली वह यात्रा ही थी और है। यात्रा मानव सभ्यता की एक तहज़ीब है।
लेकिन फिर भी किसी औरत का नाम उस चमक से नहीं उभरता जिस चमक के साथ पुरुष यात्रियों का सुनाई पड़ता है। हमारी किताबें अधिकतर महिला यात्रियों के संदर्भ में मौन रहती हैं। जब इब्न बतूता का नाम सुना था तब पहला सवाल मन में यह आया था कि कोई इब्नी बतूती भी हुई है क्या? ह्वेनी  सांगी,फाहियानी,मेगास्थनीज़ी…फेहरिश्त लंबी हो सकती है। सोचिए, अगर महिला यात्रियों के वर्णन हमारे सामने होते तब आज इतिहास की अक्ल-शक्ल बेहद अलग होती। भारत के संदर्भ में तो यह और भी हैरान करने वाली हो सकती थी।

यात्रा पर पुरुषों का एकाधिकार महसूस होता है। किसी महिला की व्यक्तिगत प्राचीन यात्रा के संदर्भ में बहुत कम जानकारी मिलती है। ज़्यादातर महिलाओं की यात्रा पुरुषों के साथ दिखाई देती हैं।विकिपीडिया पर‘लिस्ट ऑफ फीमेल एक्सप्लोरर्स एंड ट्रेवलर्स’नाम से एक सूची है। इस सूची में प्राचीन व मध्यकाल के समय की एक भी स्त्री का नाम नहीं है। इसके अलावा आधुनिक होते हुए भी इसमें भारत की एक भी औरत का नाम नहीं है।पर मुझे ऐसा यकीन नहीं होता कि भारत की स्त्रियाँ यात्रा-रहित रही हों कभी भी। क्योंकि हमारे यहाँ तो बादल और कबूतर तक सफर किया करते थे।

इसके पीछे के कई कारण हो सकते हैं। आप सोचिए। महीन से महीन कारण मिलेंगे। उँगलियों पर गिनने से भी खत्म नहीं होंगे। बल्कि ढेर सारी वजहें दिखेंगी। उनका यहाँ विश्लेषण देना आसान नहीं है। किसी भी यात्रा में यात्री, यात्रा का रास्ता,यात्रा और यात्री का साधन, समय, परिवेश, समय आदि घटक यात्रा के खाके को रचते हैं। महिलाओं के संदर्भ में हमेशा से ही इनमें अकाल पड़ा रहा। आज भी लोग आदि मानव को यायावर कहते हैं न कि आदि मानवी को। ऐसे बहुत से अवरोधक रहे हैं जिन्होंने औरत को यात्री में तब्दील नहीं होने दिया।
ग्लोबलाइज़ेशन के ज़माने में आश्चर्यजनक रूप से बदलाव आया है। अब तो ‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ जैसी रचनाएँ दिखने लगी हैं। यहाँ तक आना निश्चित ही बिना किसी आधार के नहीं हुआ होगा। ज़रूर कथा-कहानियों और समय के अंदर वे स्त्रियाँ रही होंगी जिन्होंने घूमने में दिलचस्पी ली होगी। वे इतिहास में सक्रिय महिलायें होंगी जिन्होंने औरतों को पूरी तरह से गुमशुदा नहीं होने दिया। बल्कि खुद को घर की चौहद्दी से बाहर निकाला होगा। हाल के वर्षों में हो रहे शोध अब जानबूझकर गुमशुदा कर दी गईं औरतों को प्रकट करने में अपनी अहम भूमिका निभा रहे हैं। यह अच्छी बात है।

सफर नितांत घर से बाहर से जुड़ा हुआ है। जबकि परिवार जैसे संस्था के प्रकट हो जाने के बाद महिला घरेलू हो गई। थोड़े रिश्ते गाढ़े हुए तो वह सम्मानीय हो गई जहां सम्मान तो था पर जान चली गई। कुछ अरसे बाद वह वस्तु में परिवर्तित हो गई। ऐसी जानकारियाँ किताबों में अटीं पड़ी हैं। लोग चाहे तो इसे पढ़ें और समझें। वास्तव में छवियों के बनने से परेशानी नहीं हुई, परेशानी तब हुई जब वह लोहे की तरह जम गईं। यही वजह है के आज जब वे छवियाँ गलाने की कोशिश हो रही हैं तब महिलाओं के प्रति हिंसा उभर कर आ रही है।

हिंसा का कारण यही है- पुरानी छवियों को टूटने न देने की ज़िद्द। इसलिए घर से बाहर किसी भी लड़की और औरत को एक दूसरे तरह के ज़ोन का सामना करना पड़ रहा है। हर तरह के हमले हो रहे हैं फिर चाहे वे सामाजिक, आर्थिक, नैतिक, मनो-वैज्ञानिक, शारीरिक, संस्थानिक, राजनैतिक आदि आदि। हाँ, इन सब के बीच घरेलू हमलों और हिंसा को नहीं भूलना चाहिए।

मेट्रो का किराया बढ़ना एक अदृश्य संस्थानिक हमला है। हो सकता है लोग इस बात पर हँसे और खूब हँसे। परवाह नहीं। लेकिन यह सच है कि मेट्रो का किराया बढ़ना महिलाओं के प्रति न दिखने वाली हिंसा है जो उन पर दूरगामी प्रभाव डालेगी। जो हिंसा दिखाई देती है उस पर तो खुद दिल्ली मेट्रो अपनी वेबसाइट पर उल्लेख करती है। उदाहरण के लिए,यात्री सूचना के टैब में महिला यात्रियों के लिए सुविधा नाम के वर्ग में खूब बढ़ा चढ़ा कर राग आलापा गया है कि महिलाओं के लिए अलग से डिब्बा आरक्षित है। चेकिंग के लिए महिला कर्मचारी है, रखवाली के लिए जवान गश्त लगाते हैं, महिला डिब्बे में पुरुष यात्री अगर आते हैं तो उन पर 250/- रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा, शराबियों और उत्पात मचाने वालों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, आपात कालीन बटन और एक टीम है जो त्वरित कारवाई करेगी अगर कुछ अनहोनी घटना घट जाती है। इसके अलावा सीसीटीवी कैमरा से निगरानी की जाती है।


बेशक उपर्युक्त बातें महिला सुरक्षा के संदर्भ में दिल्ली मेट्रो कहती ज़रूर है पर इसके पीछे उनका व्यवसाय का एक पक्ष छिपा है। इन सब सुविधाओं के बदले महिला यात्री भी पुरुष यात्रियों के समान योगदान देती हैं। इसलिए अगर ये सब सुविधा बार-बार महिला कह कर और जतला कर दी भी जा रही है तो वह अहसान कतई नहीं है बल्कि वह मेट्रो संचालन की आर्थिक क्रिया से जुड़ा है। टोकन का रुपया महिला होने पर बदल नहीं जाता।
महिलाओं के लिए आरक्षित डिब्बों वाली बात को गौर से समझने की जरूरत है। क्या हमारे साथ रहने वाले पुरुष इतने बड़े जानवर हैं कि वे महिलाओं को देखते ही हमला कर देंगे? क्या वे इतने हद तक खतरनाक हैं कि चंद मिनटों की यात्रा वह महिला यात्रियों के संग नहीं कर सकते? अगर यही है तब तो समाज की एनएसएल और नींव का चेक अप होना चाहिए। महिलाओं को पालतू बनाकर एक दड़बे में घुसेड़ देना वास्तव में उन्हें और डिफ़ेंसिव मोड में ला देने जैसा है।

महिलाओं को चूंकि एक लंबे समय से घरेलू बनाकर रखा गया है इसलिए उनमें कुछ विशेषताएं स्वाभाविक हैं। (हो सकता है पुरुषों में भी हों) बचत करने की अद्भुत क्षमता बहुत सी औरतों में होती है। छोटे कीमत के नोट या सिक्के चावल दाल के डिब्बों में मिलना इस बात का सबूत है। पिछले साल की गई नोट बंदी में इस आदत ने बहुत से परिवारों को संभाल लिया। बल्कि इस नोटबंदी ने महिलाओं की बचतों का सत्यानाश भी कर दिया। औरतों को एक बड़ा झटका दिया। कई औरतों को 5-5 रुपये की बचत करते हुए देखा जा सकता है। मेट्रो का अंतिम किराया 60 रुपये बताया जा रह है और शुरुआती किराया 10 रुपये। ऐसे में महिलाएं छोटी बचत की खातिर सीधे उन यातायात के साधनों का रुख कर रही हैं जो सफर के लिहाज से असुरक्षित हैं। आराम के मामले में भयानक। उदाहरण के लिए छोटी छोटी दूरी पर चलने वाली ग्रामीण सेवा जैसे वाहन कम दूरी का अधिकतम किराया सुबह और रात को वसूलते हैं। छः यात्रियों की जगह 8 से 10 यात्री बैठा लेते हैं। इसके अलावा दिल्ली के बहुत से ऑटो वाले मीटर का प्रयोग न के बराबर करते हैं। ओला और उबर सेवा अभी तक विश्वास हासिल नहीं कर पाई हैं। ऐसे में मेट्रो का बढ़ा किराया महिलाओं को एक असुरक्षित स्पेस में धकेल रहा है।

दिल्ली मेट्रो कोई मामूली परिवहन-जगह नहीं है। वह खुद भारत के विकास और परिवहन के शानदार नमूनों में से एक है। कुछ मेट्रो स्टेशन पर भारत के इतिहास और ऐतिहासिक इमारतों की प्रदर्शनी की झलक तो मिलती ही है साथ ही साथ मेट्रो के बनने की प्रक्रिया भी चित्रों में दिखलाई पड़ती है। मेट्रो के लिए औरत हो या आदमी, बच्चे हों या बूढ़े, सभी के मन में एक प्यार और इज्जत की जगह मौजूद है। वहाँ का रख रखाव और साफ सफाई, कर्मचारी और हर तरह की सहूलियत यात्रियों के दिल को जीत लेती है। जो लोग देख सुन नहीं सकते उन्हें भी बाकी जगहों के मुक़ाबले मेट्रो में सम्मान मिल जाता है।

मेट्रो अधिकरण का कहना है कि किराया कई सालों से बढ़ाया नहीं गया था और लगातार घाटा हो रहा है। उसे मेट्रो बनाने के लिए कर्जे का भुगतान भी करना है। इन सब वजहों को सुनकर हंसी ही आती है। जब इतने सालों से किराया नहीं बढ़ाया गया था तब अचानक अब घाटे की दुहाई देकर क्यों बढ़ाया जा रहा है? क्या घाटा तौलने का अधिकारियों को दीवा स्वप्न आ गया था? क्या जिन विदेशी कंपनियों से कर्जा लिया गया था, वे अचानक मेट्रो का कॉलर पकड़ कर कर्जे की मांग 2017 में करने लग गईं? मेट्रो में कई लाख लोग रोजाना सफर करते हैं। ऐसा नहीं है कि वे लोग एक या दो दिन ही करते हैं, बल्कि वे यात्री रोज़ ही मेट्रो का इस्तेमाल करते हैं। वे नियमित हैं। इसके अलावा हाल के समय में मेट्रो स्टेशनों में बहुत से कर्मचारियों की जगह मशीनों को फिट कर दिया गया है। जिससे व्यक्ति विशेष की नौकरी तो गई साथ में हर महीने का पगार का भी झंझट नहीं। क्या मेट्रो कार्पोरेशन हर महीने मशीनें खरीदती है? ये सवाल तो हैं ही साथ में और भी सवाल हैं जिनसे मेट्रो के अधिकारी टकराना नहीं चाहते। ऐसे समय में जब देश नोटबंदी और जीएसटी की मार तो झेल ही रहा है साथ ही बेरोजगारी में अव्वल इजाफा हुआ है तब मेट्रो का किराया बढ़ाना निहायती अमानवीय कृत्य है।

हालिया आई एक रिपोर्ट कहती है कि सुरक्षा के लिहाज से दिल्ली सबसे खतरनाक शहर है। इसलिए मेट्रो के बढ़े किराए का असर महिलाओं की सुरक्षा को प्रभावित करेगा। यदि किसी के पास किराये के उचित पैसे नहीं तो वह कैसे मेट्रो में जाएगा। मेट्रो के बजाय उपलब्ध साधन जो कि संतोषजनक नहीं है, का इस्तेमाल करेगा। निर्भया हादसे में तो साफ दिखा था कि कैसे ऑटो चालक ने आधे रास्ते तक ही छोड़ा और डीटीसी की बस की कमी के कारण अनधिकृत बस में जाना पड़ा। इसलिए परिवहन के साधनों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। उनके किराए में तो कटौती की जानी चाहिए न कि बढ़ौती।

मेट्रो की छोटी यात्राएं बेशक एक बड़ी यात्राएं नहीं हैं, फिर भी वे महिलाओं में यात्रा करने का आत्मविश्वास तो जगाती ही हैं। सफर का अंदाज़ देती हैं। और इस बात की पूरी संभावना है कि छोटी-छोटी यात्राएं करने वालियाँ एक दिन दुनिया की सैर पर निकल जायें।

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें    :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें  उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

‘विज्ञापनों में महिलाओं का प्रस्तुतीकरण:आर्थिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य’

उपासना गौतम


पी-एच. डी शोधार्थी,महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,वर्धा. सम्पर्क: sonpari2003@gmail.com

प्रस्तावना


लिंगाधारित व्यवस्था में खड़ी विभिन्न संस्थाओं  और उसके घटकों ने स्त्री अधीनस्थता का पूरा लाभ उठाते हुए वैश्वीकरण के दौर में महिलाओं के श्रम और देह को अपने मुनाफे में बदल दिया है । विज्ञापनों और फिल्मों में इसकी बड़ी भूमिका है। विज्ञापनों में महिला का जैसा प्रस्तुतीकरण हो रहा है उस पर गंभीर प्रश्न खड़ा होता है कि आखिर उत्पाद क्या है और किसको बेचा जा रहा है ? महिला के इतने विकृत चित्रण को उत्पाद बिक्री का जरिया बनाने में कौन से कारण और मानसिकता कार्यरत है । यही मुख्य सवाल है जिस पर बाजार के दृष्टिकोण के अनुसार बहुत कुछ लिखा जा चुका है । लेकिन यह विषय नितांत बाजार के दृष्टिकोण के साथ ही अन्य सामाजिक-राजनीतिक पहलुओं को सम्मिलित करने की  अपील करता है जिसे समझना मुख्य बात है ।आज विज्ञापनों में रचनाओं पर अश्लीलता हावी है । विज्ञापन एजेंसियों ने उपभोक्तावाद को एक भ्रामक उच्चवर्गीय जीवन शैली के अंतर्गत प्रचारित  किया है । अयोग्य सामानों को बेचने में महिला की देह का नियोजित ढंग से प्रयोग किया है । पुरुष उत्पादों के विज्ञापनों में महिला माडल को इतने निर्लज्ज तरीके से दिखाते हैं , जो ब्रांडेड परफ्यूम या अंडरवियर के कारण पुरुष का चेहरा चुंबन से भर देती है , संभोग तक कर लेती है। ऐसे  विज्ञापन सिखाते हैं कि सुंदर महिला उसी पुरुष को चाहेगी जिसके पास कीमती ब्रांडेड उपभोक्ता वस्तुएँ हैं । वास्तव में इस उपभोक्तावादी संस्कृति ने औरत को उपभोक्तावाद  के घेरे में जकड़ लिया है ।

पुरुष उत्पादों के विज्ञापनों में महिला-


 विज्ञापनों में महिलाओं का विज्ञापित होना विचारकों के लिये एक चर्चा का विषय बना हुआ है। फिर चाहे वे टी.वी. के विज्ञापन हों  या फिर अन्य प्रकार के विज्ञापन हर प्रकार के विज्ञापनों में महिलाओं की दैहिक कमनीयता और उसका सजा-संवरा रूप ही प्रत्यक्ष रूप में हमारे सामने है । टी॰वी॰ पर प्रसारित होने वाले ढेरों विज्ञापन इसका उदाहरण हैं । पुरुष के अंडरवियर , बनियान से लेकर ब्लेड तक में स्त्री को इस तरह प्रस्तुत किया गया है जहाँ उसकी प्रस्तुति पर सवाल खड़े होते हैं । यदि इससे इतर विज्ञापनों पर नजर डाले तो भी स्थिति निराशाजनक है। वास्तव में समस्या विज्ञापन में स्त्री की उपस्थिति को लेकर नहीं हैं बल्कि उसकी उपस्थिति  कैसी है यह सोचने-समझने का विषय है । पिछले पाँच सालों से अबतक के विज्ञापनों पर नजर डालें  तो एक बात साफ हैं कि ये अनावश्यक कामुकता से भरे हुए है। इस कड़ी में कुछ उत्पादों जैसे पर्फ्यूम , पुरुषों के अंतर्वस्त्र , कोंडम के एक मिनट के विज्ञापनों ने अश्लीलता को घर-घर तक पहुँचा दिया है । इन विज्ञापनोंमें स्त्रियों की गरिमा तथा उनकी अस्मिता पर जबरदस्त कुठाराघात करने का कार्य किया है। ऐसे में सवाल उठता हैं कि वह कौन सी अनिवार्यता हैं जो स्त्री की देह को उसकी कामुकता को उत्पाद बेचने का जरिया बनाया गया है ? आखिर कौन सी मानसिकता मूल रूप से विद्यामान है ?उत्पाद पुरूषो के हैं जिसका लक्ष्य उपभोक्ता पुरूष है मगर फिर भी स्त्री को एक उत्पाद के रूप में प्रस्तुत किया गया है।टी.वी. पर बाइक का एक विज्ञापन आता था। इसमें एक स्त्री जो बाइक पर लेटी हुई दिखायी जाती है फिर वह बाइक के रूप में बदल जाती है, उसी दौरान उस पर एक पुरुष सवार होता दिखाया जाता है। इस पूरे विज्ञापन के देखने से स्पष्ट हो जाता है कि बाइक की तुलना एक स्त्री (युवती) से की गई है। बल्कि कहना चाहिए कि वह बाइक की खूबियों का एक प्रतीक बनाकर प्रस्तुत की गई है। कंपनी इस विज्ञापन के माध्यम से यह बताना चाहती है कि बाइक कितनी आरामदायक और आनंददायक, संतुष्टि देने वाली है।



दरअसल इस बात से इंकार नही किया जा सकता कि बड़ी-बड़ी विज्ञापन एंजेसिया इसी मानसिकताके वशीभूत होकर विज्ञापन बनाने मे लगी हुई है। तमाम  कंपनियाँ सौन्दर्य के नए मानक परोस रही हैं इसी सौन्दर्य जिज्ञासा यानि ‘ब्युटि मिथ’ को जगाकर वे इनकी जेबों से पैसा निकालने में भी सफल हैं । साँवले रंग को गोरा कैसे बनाया जाए इसके लिए दर्जनों ब्रांड के उत्पाद बाजार में मौजूद हैं ऐसे उत्पादों की कंपनियों में विज्ञपनों के द्वारा कड़ी प्रतियोगिता देखने को मिलती है जो बड़े से बड़े दावे के साथ किसी भी साँवली स्त्री को गोरा बनाकर उसके जीवन को ऊंचाई देते नजर आते हैं ।गोरा बनते ही लड़की में आत्मविश्वास आता है,अच्छी जॉब मिलती है , कल तक शादी के लिए लड़का राजी नहीं था गोरा बनते ही अब वह उस लड़के को शादी के लिए इंकार करती है , क्यों कि अब हर रूप में वह पूरी तरह से सक्षम है । इस संदर्भ में नाओमि वुल्फ़ अपनी किताब ‘ब्यूटी मिथ’ में लिखती हैं –“सौन्दर्य मिथ ने महिला की स्वतंत्रता को मोड़कर उसके चेहरे और देह में बदल दिया । जब महिला को अधूरा बताया जाता है तो ब्यूटी मिथ शुरू होता है । कॉस्मेटिक्स आते हैं ,कपड़े-लत्ते , फैशन उसकी पहचान के नाम पर आते हैं । सौन्दर्य मिथ ने महिला को झूठी चयनशीलता दी है ”सौन्दर्य पात्रता को प्रतिष्ठित करने वाले विज्ञापनों की भरमार से स्त्री -स्थिति के समाजशास्त्र को बहुकोणीय रूप में देखने की अनिवार्यता को किसी भी तौर पर अनदेखा नहीं किया जा सकता । इस प्रकार के अनेक विज्ञापनों मेंराजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक इन सभी दृष्टिकोणों के समावेश के बिना किसी भी तरह जड़ तक नहीं पहुंचा जा सकता । आज मुक्त बाजार और पाशविक उपभोक्तावाद ने लोगों की घेराबंदी की है जिससे बच पाना एक चुनौती से कम नहीं है। ठीक यही मानसिकता विज्ञापनों में महिलाओं की भूमिका भी तय करती है । यह  लिंग – भेद पर आधारित इस पितृसत्तात्मक विचारधारा की देन है जो आज की अर्थव्यवस्था को केंद्र में रखते हुए सम्पूर्ण व्यवस्था से बहुत ही नजदीक से जुड़ाव रखती है ।

घरेलू उत्पादों के विज्ञापनों में महिला की सांस्कृतिक छवि–


घरेलू रोजमर्रा की चीजें जैसे-डिटरर्जेण्ट पाउडर, मिर्च, हल्दी (मसालों) बर्तन धोने के उत्पादों आदि के विज्ञापनों में पुरूषो की उपस्थिति दर्ज होने पर उनका पुरूषाई वर्चस्व कायम रखा जाता है। ठीक यही प्रक्रिया अन्य घरेलू उत्पादों के विज्ञापनों में भी दिखाई पड़ती है जैसे मसालों के विज्ञापनों को ही लें तो ऐसे विज्ञापनों में मसालों की गुणवत्ता स्वाद के तौर पर बताने के लिये स्त्री को खाना बनाते हुए दिखाया जाता है और पुरुष इन विज्ञापनों में खाते हुए,खाने की तारीफ करते हुए दिखाया जाता हैऔर जहाँ कोई भी बर्तन चमकाने वाले उत्पाद का विज्ञापन हो तो पुरूष ऐसे विज्ञापनों में सेलर की भूमिका में होता है । इसका क्या अर्थ है? कही न कही यह पूरी परिपाटी पुरूषाई वर्चस्व के अधीन है। समाज में स्त्री पुरूष के संदर्भ में पुरूष को नियामक तथा मुखिया या कर्ता का स्थान प्राप्त हैं। पुंसवादी समाज में वही पहले दर्जे का नागरिक है। स्त्री उसके अधीन है न कि वह स्त्री के। यही समाज की संरचना के मूल में है। जिसके तहत घरेलू कामकाज महिलाओं के लिये ही निर्धारित किये गये है। पुरूष का इनसे कोई लेना-देना नहीं क्योंकि वह कमाता है और ठोस कारण यह भी है कि वह मुखिया होता है स्त्री उसकी बंदिनी के रूप में होती है इसलिये घर के काम केवल उसे ही निबटाने हैं। उन्हें इनसे किसी भी मुकाम पर पहुँच मुक्ति नहीं मिलती ।

इन विज्ञापन में महिलाओं का कपड़े, धोना, बर्तन मांजना, पति को आफिस के लिये रवाना करना से लेकर उनका मिजाज सही करने तक को दिखाया जाता है। देखने में तो यह सब बड़ा आसान लगता है लेकिन वास्तव में यह उतना आसान नहीं है।कोई भी स्त्री पुरूष से कम कार्य नहीं करती बल्कि हम देखते हैं कि पुरूष दिन भर काम करने बाद घर में बिलकुल कार्यमुक्त हो जाता है मगर एक ग्रहिणी कभी कार्यमुक्त नहीं होती घर के काम काज लेकर बच्चों की देख रेख की सम्पर्ण जिम्मेदारी जैसे अनेक घरेलू कार्य उसे कभी भी मुक्त नहीं रहने देते जबकि पुरूष धनोपार्जन के कार्य के बाद एकदम निश्चिंत होता है उसे घर के किसी काम-काज या देख-रेख से कोई सरोकार नहीं होता। यह सब उसकी स्वेच्छा पर निर्भर करता है जब कि महिलाओं के लिए घरेलू काम-काज स्वेच्छात्मक नहीं होते। उनके लिए यह अनिवार्य होते है। कुछ महिलाये जो कामकाजी/व्यवसायिक कार्य करती है वे घर के भी सारे काम निबटाती हैं क्यों कि घर के कार्य उन्ही के पल्लू से बांधे गये है तो ऐसे में निष्कर्ष यही निकलता है कि ऐसी कामकाजी महिलाये तो पुरूषो  से अधिक ही नहीं वरन् अत्याधिक कार्य करती हैं तब फिर ऐसे हालातों में  कभी पुरूषो  को विपरीत धारा में क्यों नहीं दिखाया जाता? क्यों स्त्री-पुरूष के सम्बन्धों के पारम्परिक ढर्रे को ज्यों का त्यों बरकरार रखा जाता है? और अगर कभी किसी विज्ञापन में ऐसा दिखाया भी गया हो तो वह अपवाद स्वरूप ही होगा क्योंकि विज्ञापन भी उसी पारम्परिक सामंती-पितृसत्तामक संस्कृति को बरकार रखते हुए बनाये जा रहे हैं जिसमें महिला अपने निर्धारित परिपाटी से बाहर नहीं निकलती। यही प्रक्रिया सभी विज्ञापनों में देखने को मिलती हैं। यह कितना उचित है?  महिलाओं के लिये हमारे समाज में दायरा तय है और उस दायरे के तहत ये घरेलू कामकाज उसी के लिये है या उसी के पल्लू से बंधे है। महिलाओं के लिये यह निर्धारित कार्य हैं जो उसी को निबटाने होते है । फिर चाहे स्थिति जो हो। वह चाहे शिक्षित हो जाये या फिर वह कामकाजी/व्यवसायिक हो तब भी उसके लिये घरेलू कार्य अनिवार्यता से जुड़े होते हैं। ठीक इसी सांस्कृतिक मानस को ध्यान में रखकर विज्ञापन भी बनाये जाते हैं।

विज्ञापनों में महिलाओं का दूसरा रूप उनके तथाकथित ढर्रे में ही दिखाया जाता है।मीडिया भी इसी व्यवस्था के पैराकारों के द्वारा संचालित हो रहा है। जिसके कारण विज्ञापनों में पारंपरिक मूल्यों व संस्कृति को बरकरार रखने का कार्य किया जा रहा है।इन विज्ञापनों की मूल मानसिकता पितृसत्तावादी चलन को बरकरार रखने की है। यह बाजार की मांग प्रचारित कर रहा है। यह एक ऐसी मानसिकता विकसित कर रहा है जिसमें स्त्री की गुलामी प्रत्यक्ष रूप में बड़े सौम्य तरीके से तथा परोक्ष रूप में बड़ी चतुराई से एक जाल की भांति समाज में फैलाई जा रही है। तब फिर यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि पुरूष के उत्पादों के विज्ञापनों में महिला के शरीर को ने बेचा जाए जब कि बाजार के अर्धसामान्ती और अर्धऔपनिवेशिक चेहरा बिल्कुल साफ दिखाई दे रहा है। बाजार ने इन्हीं सामाजिक संरचना के सरोकरों को बाजारू बनाया है जिसमें फंसकर युवतियां अपनी मुक्ति के नाम पर इनकी घटिया साजिश का शिकार हो रही है।शहर के चर्चित स्थानों पर लगे बड़े बड़े र्होडिंग्स, वाल राइटिंग, अखबारो, पत्रिकाओं आदि के विज्ञापन एक ही प्रक्रिया में जुटे हैं। महिलाओं की देह को उत्पाद बेचने का एक ठोस जरिया बन चुका  है।  ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि जिससे उपभोक्ताओं के बीच अनाव्यश्यक मांग पैदा हो और उपभोक्ता वर्ग की संख्या में बढ़ोत्तरी हो।यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि विज्ञापन केवल व्यावसायिक दृष्टी से ही महत्वपूर्ण नहीं है,बल्कि सामाजिक क्षेत्र में इसका व्यापक प्रभाव पड़ता है ।

पूंजीवाद और  विज्ञापन का सह:संबंध –


महिलाओं के संदर्भ में विज्ञापनों पर विचार करें तो मूल रूप से बाजार की उन्मुखता का जिक्र पूरी तरह से जरूरी है।1990 के दशक में उदारीकरण के प्रभाव सामने आये वैसे कार्यक्रम तो 1980 के दशक से ही प्रारंभ हो चुके थे। उदारीकरण और वैश्वीकरण के आने पर बाजारवाद को हावी होने का भरपूर मौका मिला जिसके चलते इस देश की अर्द्धसामन्ती व्यवस्था के पारम्परिक सामंती मूल्यों को भुनाकर उन्हें मुनाफे का यंत्र बना दिया गया। इसलिए आज बीस अरब का कॉस्मेटिक्स उद्योग है ,तीन सौ अरब का कॉस्मेटिक्स सर्जरी उद्योग है, और सात अरब का पॉर्न उद्योग है । यह उद्योग उस  भ्रामकता पर टिके हैं जो विज्ञापनों या कहा जाए मास-मीडिया के द्वारा प्रेषित की जा रही है । जिसे ‘अनावश्यक मांग’ पैदा करना कहा जाता है ।पुरूषो के उत्पादों के विज्ञापनों में महिलाओं की कामोत्तेजक प्रस्तुति इसी का भयानक अंग है। बाजारीकरण की विचारधारा ने पुंसवादी समाज की इसी नस को पकड़कर अपने बाजार की मजबूती को बरकरार रखने में अपार सफलता अर्जित की है। पर्दे की दुनिया में महिलाओं को उनके बौद्धिक स्तर पर नही वरन् दैहिक स्तर पर पेश किया जाता हैं क्योंकि महिलाओं को एक वस्तु के रूप में, देह के  रूप में मानने सामन्ती मूल्य आज भी समाज में जड़ कियें हुए है। इस प्रक्रिया में तो सबसे अधिक विज्ञापनों ने स्त्री की देह को विज्ञापन बना डाला है। टी.वी. पर चाहें जो चैनल देखों हर चैनल पर आने वाले उन्ही विज्ञापनों में महिलाओं की स्थिति का खुला आंकलन करने का प्रमाण आपके समक्ष होगा।


पुरूषो के दाढ़ी बनाने वाले यंत्रों की सौम्यता और सुगमता की तुलना स्त्री की देह से करने का और क्या कारण हो सकता है सिवाय इसके किआज भी वही सामन्ती विचारधारा इस व्यवस्थाकेमूलमें है जिसमें पुरूष हर दूसरी स्त्री को भोगी नजरों से तथा नग्नदेखना चहता है या फिर वह स्त्री को भोग की वस्तु के रूप में ही देखता है। इसी सामंतवाद को बाजारवाद ने नये फ्रेम में मढ़कर पर्दे पर विज्ञापनों में स्त्री की स्वतन्त्रता को उसके नग्न शरीर तथा कामोत्तेजक गतिविधियों अथवा प्रदर्शनसे जोड़ा है, जिसका जीता-जागता उदाहरण पर्दे पर दिखाई जाने वाली हिन्दी फिल्में हैं जिसमें अश्लील दृश्यों की भरमार रहती है इन  दृश्यों को ‘बोल्ड सीन’कहना चलन में है। इसके मायने क्या है? स्पष्ट है कि पर्दे पर महिला का साहस (बोल्डनेस) और स्वतंत्रता इस रूप मे चित्रित की जा रही हैजो यह सामन्ती विचारधारावाला समाज हर पराईस्त्रीकेलिए चाहताहै।जबकि पूंजीवाद की सन्तान बाजारवाद ने महिला वर्ग में पढ़ी – लिखी महिलाओं को इस दिशा में बढ़ाने का कार्य किया है जिसमें वह  अपनी  दैहिकक मनीयता  को हथियार के रूप में मान रही है,जबकि सच्चाई इससे परे है। देखा जाये तो यह एक प्रकार की गुलामी ही है जिसमें महिलाओं की बौद्धिकता को दरकिनार कर महज उसके दैहिक सौन्दर्य को परोसने भर का कार्य करवाया जाता है। यह उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व की उपेक्षा है जहां वह एक बुद्धिमान, प्रतिभावान, गौरवान्वित अस्तित्वान मनुष्य के रूप में नही बल्कि एक उत्पाद (प्रोडक्ट) के रूप में प्रस्तुत की जाती है। यह कहना गलत नही होगा कि बाजारवाद में महिलाओं की अस्तित्वहीनता और लिंग-विभाजन श्रम पर आश्रित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिला है क्योंकि एड़ी से लेकर चोटी तक ऐेसे अनगिनत उदाहरण प्रत्यक्ष रूप में हमारे सामने है। इस बात को नजरअंदाज नही किया जा सकता कि लिंगाधारित श्रम विभाजन वहाँ (पर्दे की दुनिया विज्ञापनों में) भी पूरी तरह से मौजूद है। इसलिये स्त्री -पुरूषो के बीच काम की समरूपता कोसों दूर है।इसके साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि इन सभी विज्ञापनों का लक्ष्य मुख्य रूप से मध्यम वर्ग ही है। विज्ञापनों में दिखायी जाने वाली ब्रांडेड वस्तुएं निम्न वर्ग की पहुच से बाहर है। उदाहरण के तौर पर एक रिक्शा चालक या मजदूर किसी भी ब्रांडेड बनियान की जगह किसी छोटी -मोटी दुकान से कोई सस्ती और किफायती बनियान ही खरीदेगा यह भी हो सकता है कि वह बनियान ही न पहने केवल कमीज से ही काम चलाये। कहने का तात्पर्य यही है कि इस देश  में आज के दौर में भी मजदूर वर्ग या निम्न वर्ग के सामने रोजी-रोटी का सवाल बहुत बडा हैं।
देश  की 80 प्रतिशत आबादी के सामने जो चुनौतियां है वे बुनियादी जरूरतों की है। ऐसे में उनके ब्रांडेड अण्डरवियर या अन्य उत्पादों जो अच्छी-खासी ब्रांड के या नामी-गिरामी ब्रांड के है उन्हें इस्तेमाल में लाने का तो सवाल ही पैदा नही होता। इन हालातो में यह साफ है कि देश का उच्चवर्ग और मुख्य रूप से मध्यम वर्ग ही इन विज्ञापनों का लक्ष्य हैं। तमाम विज्ञापन एजेंसियां इन्ही वर्गों को लुभाने की बेजोड़ कवायद में लगी हैं। यह समझना जरूरी है कि  महिला वर्ग इससे पूरा जुड़ाव रखता है ।सवाल खड़ा होता है कि भूमंडलीकरण ने जिन महिलाओं का प्रतिनिधित्व किया है वे करोड़ों महिलाओं में कितनी संख्या में हैं ?मास –मीडिया ने किसान और मजदूर या श्रमिकवर्ग की महिलाओं के जीवन से जुड़ी वास्तविक समस्याओं को प्रचारित करने का काम कभी नहीं किया । विज्ञापन तो ऐसा माध्यम बन चुका है जिसका काम मतिभ्रमों को बढ़ाकर उत्पाद बेचना है । महिलावर्ग को लक्ष्य बनाकर बहुत कुछ बेचा जा रहा है । स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नूडल्स को माँ बच्चों के टिफिन में रखते दिखाई जाती है क्योंकि इसके दो फायदे बताए जाते हैं एक तो यह कि यह दो मिनट में झट से तैयार होता है दूसरा इतना स्वादिष्ट है कि बच्चे इसके बिना रह नहीं सकते । दुनिया का सबसे खराब जी मचलाने वाला खाना बर्गर आदि को स्टेंडराइज़ बना दिया गया है कि उसके बिना न तो पढ़ी-लिखी माँ आधुनिक होती है और न ही उनके बच्चे आधुनिक होंगे व्यावहारिक रूप से इस बात को समझने के लिए आंकड़ो कि जरूरत नहीं है क्योंकि हर शहर के रेस्तरां और तमाम शहरों में पहुँचे डोमिनोज के पिज्जा हट जैसी कई प्रतिष्ठित दुकानों में विज्ञापनो के इस प्रभाव को देखा जा सकता है । यहाँ डर यह है कि बच्चे कहीं उस धारा से पिछड़ न जाएँ । खाद्य उत्पादों में यही सोच निश्चित रूप से मिलती है ।इस मानक को खड़ा करने का लाभ यह है कि आज तैंतीस करोड़ अरब डालर से ऊपर का भोजन उद्योग है ।

यहाँ इस बात का जिक्र करना लाजिमी है कि मीडिया संदेशों के प्रसारण का ठोस माध्यम है और कई तरीकों से वह अपने संदेश लोगों तक पहुँचाता है, जिनमें मुख्य रूप से मनोरंजक कार्यक्रमों, धारावाहिकों, समाचारों और विज्ञापनों के द्वारा इस प्रकार के संदेश प्रसारित किये जाते है। देश की मुख्यधारा या लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मीडिया को जनता से आज कोई सरोकार नही रह गया है। मीडिया पूरी तरह से देशी – विदेशी  कंपनियों के लाभ के लिये काम करता हुआ दिखाई पड़ता है। मीडिया एक बहुत बड़े उद्योग के रूप में स्थापित हो चुका है।  उसे केवल अपने मुनाफे की चिंता  है । महिलाओं के प्रति पूरे विश्व का रवैया पितृसत्तात्मक ही है,मीडिया भी इन्ही पितृसत्तात्मक मूल्यों का पोषण करता है फिर चाहे प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रानिक मीडिया हो सब जगह पितृसत्तामकता और उसमें लिप्त बाजारू मूल्यों को ही परोसना मीडिया का असली चरित्र है । ऐसे में विज्ञापनों में महिला विरोधी मूल्य ही दिखायी देंगे लगभग हर विज्ञापन मुनाफा कमाने की प्रक्रिया की अटूट कड़ी से ग्रसित है।इस तरह के विज्ञापनों पर (जो पुरूषो उत्पादों के हैं), नजर डालें तो देश और दुनियाभर में महिलाओं के विरूद्ध खड़े पितृसत्ता, शासक वर्ग और बाजार के नजरिये का पता लगाना बहुत ही आसानबात है।  बाइक के विज्ञापन तथा ऐसे तमाम विज्ञापनों को जो इस समय टी.वी. पर प्रसारित किये जा रहे हैं।इनका आशय केवल इतना है कि महिला सिर्फ आनंद, आराम और संतुष्टि देने की वस्तु मात्र है।

 पुरूषवादी सोच महिलाओं को सिर्फ इसी रूप में देखती है। इसलिए बाजार भी महिलाओं को अपने मुनाफे के लिए इसी रूप में दिखाता है और इससे अधिक दिखाकर प्रचारित करने से वह अनाव्यश्यक माँग भी पैदा करता है । ज्यादातर विज्ञापनोंमें  इसी सोच के तहत महिलाओं के शरीर को बेचा जाता है। टी वी पर प्रसारित इन विज्ञापनों के प्रसार में जो मूल प्रवृत्ति है वह पितृसत्ता ही है। जिसका बाजार अपने फायदे के लिए हथियार स्वरूप इस्तेमाल कर रहा है। यह विडम्बना ही है कि बालीबुड की कई अभिनेत्रियों कला से अधिक स्लीमट्रीम बनने तथा अश्लीलप्रदर्शन की होड़ में इस कदर जुटी है मानो उनका ’बोल्ड और सेक्सी’ होने का तमगा उनसे छिन गया तो उन्हे फिल्म जगत में कोई नहीं पूछेगा जो कि सच्चाई भी है फिल्मबिकने के लिए बनायी जा रही है इनका मुख्य उद्देश्य व्यापार करना है और उनमें महिलाओं का ‘बोल्ड-सेक्सी‘ होना बाजार में  फिल्म बेचने का एक मजबूत जरिया बना दिया है। इसका कारण जो समाज में नहीं दिखता वो खूब दिखाओ और जब आदत बन जाए तो जाहिर है वह मांग में बदल जाती है दूसरी तरफ समाज का मानस भी ऐसा बनता जा रहा है।यह सब एक प्रकार की साजिश  के तहत हो रहा है। पहले से ही समाज का पुरूष वर्ग महिलाओं को इसी परिपाटी में देखता आया है लेकिन मीडिया जगत ने खास तौर पर फिल्मों और विज्ञापनों ने इस विचारधारा को और अधिक हवा दी है, और अधिक दृढ़ता प्रदान की है। किसी भी उम्र का व्यक्ति फिर चाहे वे बच्चे ही क्यों न हो इससे अछूते नही है क्योंकि अपने सही समय से पहले ही वे इस पहलू से वाकिफ हो रहे, परिपक्व हो रहे है। इतना ही नहीं किशोरावस्था के नव युवक-युवतियों की दिशा भ्रमित करने का दायित्व भी इन्हीं पर है। इस संदर्भ में विज्ञापनों में दिखाई जाने वाली माडल भी अभिनेत्रियों से पीछे नहीं हैं क्योंकि उनको भी फिल्म जगत में या फिर माडलिंग में स्थापित होना है या कहा जाये कि कीर्तिमान स्थापित करना है तो इस प्रतिस्पर्धा में सर्वश्रेष्ठ बनने का तयशुदा मूलमंत्र अपनाना होगा ।

यहाँ यह कहना गलत नहीं होगा कि ऊपर बैठे तेज-तर्रार लोग तथा व्यवस्था के पैरोकारों ने आधुनिक शब्द को अपने मुताबिक मोड़कर उसको सम्पूर्ण अर्थ को चालाकी से बदल कर समाज में प्रसारित किया जा रहा है जोकि किसी भी सूरत में समाज के लिये घातक है। महिलाओं को बल-बुद्धिसे कम आंकना या फिर एक तरह से देखा जाये तो हर लिहाज से कम आंकना सामन्तवादी पितृसत्ता के मूल में है क्योंकि उन्हें इस व्यवस्था में मनुष्य होने का दर्जा आज भी पूरी तरह से प्राप्त नहीं है। ऐसी स्थिति में ऊपर बैठे इस व्यवस्था के पैरोकारो द्वारा दी जाने वाली महिलाओं की मुक्ति का रास्ता भी वैसा ही होगा जिसमें उनका लाभ हो और उनका बाजार गर्म रहे इस बात को ध्यान में रखते हुए ही उनकी सभी गतिविधियां लागू होती है। इसलिये महिलाओं के लिये आधुनिकता का इसी रूप में प्रचार किया जा रहा है या मानस बनाया जा रहा है जब कि इस शब्द के मायने काफी बड़े स्तर के है न कि विज्ञापन और फिल्मों में दिखायी जाने वाली महिलाओं के जैसा बनने में। अन्य शब्दों में कहा जाये तो आधुनिकता के अर्थ को दैहिक सौन्दर्य  तक ही सीमित किया रहा है।

 निष्कर्ष – 

विज्ञापनों में महिलाओं के दो रूप प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं। एक तो पूर्णतः बाजारवाद जिसमें महिला का उत्तेजक व अश्लील रूप में मिलता है और दूसरा पूर्णतः पारम्परिक, सामंती मूल्यों को जारी  रखने के रूप में जिसमें घर और पितृसत्तात्मक संस्कृति को बनाये रखने का भाव पूर्णरूप से दिखाई देता है,जितने भी घरेलू उत्पादों के विज्ञापन हैं उनमें महिलाओं का वही पारंपरिक सांस्कृतिक रूप ही दिखाया जाता है। ऐसे घरेलू उत्पादों के विज्ञापनों की पूरी थीम ही श्रम विभाजन को स्पष्ट समझाती है । उदारीकरण और वैश्वीकरण के चलते बाजार ने इस व्यवस्था के पितृसत्ताई -सामंती मूल्यों को कायम रखने का पूरा प्रयास किया है तो दूसरी तरफ यह भी समझना होगा कि पूंजीवाद ने अपने फायदे के लिए स्त्री को, स्त्री स्वतन्त्रता की एक झूठी चयनशीलता दी है ।वास्तव में  यह एक प्रकार का भयावह मतिभ्रम है जहाँ महिला की वास्तविक मुक्ति नगण्य है क्योंकि स्त्री-मुक्ति के रास्ते को भूमंडलीकरण ने बेहद भ्रामक मोड़ दिया है ।

संदर्भ सूची :-
1.रूबीना, लेख 2010, टूटती साँकलें
2.गौतम रूपचन्द, मीडिया और संस्कृति 2008, श्री नटराजन प्रकाशन
3.त्रिपाठी कुशुम, 2013, पटपड़गंज दिल्ली, भावना प्रकाशन
4.http://www.dw.com/hi/विज्ञापनों-में-महिलाएं/g-18691477
5.विज्ञापन फिल्में

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें    :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें  उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

देश के सबसे बड़े अस्पताल (एम्स) में मेडिकल दलाल सक्रिय: कर्मचारियों की मिलीभगत

यह रिपोर्ट एक फैक्ट चेक है एम्स (ऑल इण्डिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल सायसेंज) का स्वास्थ्य मंत्री के उस बयान के बाद कि एम्स के डाक्टर बिहारियों को वापस भेज दें और इस बीच डाक्टरों की एक टीम का उनके खिलाफ सामने आने के बाद. यह रिपोर्ट बताती है कि देश के सबसे बड़े अस्पताल एम्स में मेडिकल दलाल कैसे सक्रिय हैं, अस्पताल के कर्मियों की मिलीभगत से. एम्स प्रशासन स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा मरीजों की मुफ्त जांच के सुझाव पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहा, उधर दलाल मरीजों को लूट रहे हैं. संजीव चंदन की रिपोर्ट 


वह अपने राज्य के सभी बड़े अस्पतालों का चक्कर काटकर, निराश होकर अंततः देश की राजधानी स्थित सबसे बड़े अस्पताल में पहुंचा जहां उसके शरीर के एक अंग में तेजी से फैलता कैंसर डायग्नोस हुआ. कैंसर के डाक्टरों ने उसे तुरत ऑपरेशन का सुझाव दिया और अस्पताल में ही दाखिल कर लिया. यहाँ तक तो देश के सबसे बड़े अस्पताल आल इण्डिया मेडिकल इंस्टिट्यूट (एम्स) एक तत्पर और गरीबों के प्रति हमदर्द व्यवस्था वाला अस्पताल दिखता है. लेकिन ज़रा ठहरिये तस्वीर का यह हिस्सा एक पक्ष है. उस गरीब मरीज के साथ आगे होने वाला घटनाक्रम आपकी आँखें खोल देगा.

एम्स मेट्रो स्टेशन पर सोये गरीब मरीजों के तीमारदार और कुछ मरीज

बेतुके बयान वाले स्वस्थ्य मंत्री मरीज के राज्य से ही आते हैं
वह उन्हीं दिनों एम्स में दाखिल  हुआ जब देश के स्वास्थ्य मंत्री (राज्य) अश्विनी चौबे का विवादास्पद और बेतुका बयान आया कि ‘बिहार से लोग छोटी बीमारियों में भी एम्स पहुँच जाते हैं और भीड़ बढाते हैं. वे यहाँ तक कहते हैं डाक्टर बिहार से आये मरीजों को वापस भेज दें. मंत्री बिहार में पैदा हुए और बिहार से ही चुनकर विधानसभा, लोकसभा पहुँचते रहे हैं और मरीज भी बिहार से चलकर एम्स में दाखिल हुआ था, जिसे उन्हीं दिनों बायप्सी रिपोर्ट के बाद डाक्टरों ने कैंसर का जल्दी से जल्दी ऑपरेशन की तारीख दी क्योंकि बीमारी बढ़ रही थी, फ़ैल रही थी. वह बिहार के ओबीसी इसके लिए एम्स से ही जरूरी जांच के लिए कहा गया. 9 अक्टूबर को अश्विनी चौबे ने अपना बयान दिया, जिसका बचाव बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किये जाने के रूप में किया गया. मरीज बिहार के ओबीसी परिवार से आता है. परिवार और वह स्वयं मजदूरी का काम करते हैं.

जांच से इनकार मरीज और उसके तीमारदार परेशान 
एम्स के जिस विभाग से जांच होना था उसने कुछ सामान्य से जांच के मामलों में कहा कि इसकी मशीनें खराब हैं और कैंसर के लिए जरूरी ‘पेट स्कैन’ जांच के लिए डेढ़ महीने बाद की तारीख दे दी और यह सलाह भी कि यदि उसे जल्दबाजी है तो बाहर से जांच कराये. देश की राजधानी में एक कैंसर से पीड़ित एक गरीब मरीज मर रहा है, उसके देखभाल के लिए आये लोग पैसों की कमी से जूझ रहे हैं, जांच के लिए कर्ज ले रहे हैं और स्वास्थ्य मंत्री उस जैसे मरीजों को ज्ञान दे रहे हैं कि बीमारियों का इलाज राज्य में ही कराओ. राज्य की राजधानी में भी कैंसर की जांच की सुविधा है लेकिन वहाँ भी प्राइवेट अस्पतालों के दलालों की खबरें मीडिया में आती रही हैं. गरीब मरीज ने फिर से कैंसर के डाक्टरों को ही सबकुछ बताया. उन्होंने हालत की गंभीरता को देखते हुए जल्द जांच का लिखित अनुरोध किया, लेकिन नतीजा ढाक का तीन पात.

मातृ-मृत्यु का नियंत्रण महिला -स्वास्थ्य का जरूरी पहलू : चार्म

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री (राज्य) का पत्र भी बेकार गया. 
परेशान मरीज के लोगों ने भारत सरकार के सामजिक न्याय मंत्री (राज्य), रामदास आठवले, का दरवाजा खटखटाया. उन्होंने एम्स के डायरेक्टर को फोन मिलाया. वे व्यस्त थे कहीं मीटिंग में. मत्री महोदय ने निदेशक के नाम एक पत्र लिख दिया और किसी इंचार्ज से उनके पीए ने बात की. मरीज को लगा कि देश की राजधानी में कुछ काम होता है. लेकिन फिर निराशा. पत्र देखकर भी जांच वाले विभाग ने कहा कि एक सप्ताह में कर देंगे अभी मशीन खराब है. और फिर लगे हाथ सुझाव जल्दी हो तो बाहर से करा लो. उधर कैंसर के डाक्टर ने ऑपरेशन के लिए दाखिल कर रखा था और जल्दी कह रहे थे.

और भी थे परेशान मरीज जिन्हें जांच के लिए बाहर भेजा जा रहा था
इस रिपोर्टर को कैंसर के मारीज के परेशान परिवार वाले सामाजिक न्याय के मंत्री के यहाँ से लौटते हुए मिल गये. मामले की गंभीरता को देखते हुए साथ लगने पर पता चला कि जांच वाले लोग ऐसे ही कई मरीजों को बाहर भेज रहे थे. यह एक गंभीर मामला था, देश के सबसे बड़े अस्पताल में दलाली का और मरीजों से लूट के नेक्सस का. पूरे माजरे को समझने के लिए अस्पताल प्रशासन के मीडिया विभाग से सम्पर्क किया गया. उन्हें कुछ सवाल भेजे गये. सवाल थे:
1. “ PET स्कैन’ के इक्विपमेंट कब से खराब हैं
2. एम्स में इस जांच की कितनी मशीनें हैं?
3. क्या अस्पताल में मशीनें खराब होने पर कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है? खासकर तब जब एक्सपर्ट डाक्टर जल्द ऑपरेशन करने की संस्तुति लिख रहे हैं.
4. कृपया इन मशीनों के ठीक कराने संबंधी विभागीय पत्राचार की कॉपी दें
5. और भी कितनी मशीनें किन जांचों के खराब हैं क्योंकि और छोटे जांच के लिए भी मरीज बाहर भेजे जा रहे हैं.

योनि के ऊपरी हिस्से को काटने की प्रथा (सुन्नत) के खिलाफ बोहरा महिला ने पीएम को लिखा खत

सरकारी आदेशों की भी अनदेखी 
इस बीच इस खबर पर काम करते हुए यह भी पता चला कि भारत सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय वित्त मंत्रालय के सुझावों के अनुरूप एम्स को कई पत्र भेज चुका है यह निर्देश देते हुए कि वह मरीजों से जांच के लिए लिए जा रहे शुल्क न ले. एम्स गैरयोजना मदों में खर्च के लिए प्रतिवर्ष अतिरिक्त 300 करोड़ की राशि माँगता है, जबकि सरकार उससे यह चाहती रही है कि 500 रूपये से कम शुल्क वाली जांच मुफ्त किये जायें. इस आशय के कई पत्र स्वास्थ्य मंत्रालय ईएमएस को भेज चुका है लेकिन ईएमएस प्रशासन ने एक का भी जवाब नहीं दिया.

मीडिया विभाग की सक्रियता से पहुँची मदद 
 एम्स के  मीडिया प्रोटोकॉल अधिकारी, बी एन आचार्या, ने बताया कि ‘ हमारे यहाँ सारी मशीनें ठीक हैं और किसी को भी एम्स बाहर जांच के लिए नहीं भेजता, न कहता है. हमारे कर्मचारियों की जगह कोई और उन्हें गुमराह कर रहा होगा. हालांकि तथ्य बता रहे हैं कि बहार जांच के लिए एम्स के विभाग प्रेरित कर रहे हैं. बहरहाल, बी एन आचार्या की पहल पर एक मरीज को थोड़ी सहूलियत मिल गयी. हालांकि मेरे सवाल भेजने और आचार्या के सक्रिय होने तक सम्बंधित मरीज का ‘ PET स्कैन’ टेस्ट बाहर से हो गया था, वे घबड़ाये हुए थे. कैंसर विभाग के डाक्टर पहले से ही तत्पर और संवेदनशील थे, आचार्या के सक्रिय होने के बाद उसका ऑपरेशन तुरत हो भी गया.

गर्भवती महिलायें कर सकती हैं मांसाहार और सेक्स: विशेषज्ञों की राय

एम्स ओपीडी में नम्बर लागाते मरीजों की भीड़



लेकिन सवाल 
लेकिन सवाल है कि और मरीजों का क्या ? क्या गरीब मरीजों को एम्स जैसे अस्पताल में दलाल लूट रहे हैं और इसमें उनके कर्मचारियों की भी मिलीभगत है. और सबसे बड़ा सवाल कि स्वास्थ्य मंत्रालय और मंत्री का अपने ही मेडिकल कॉलेज पर बस नहीं चलता लेकिन वे जनता को क्यों विवादास्पद नसीहतें देते रहते हैं? उनसे बेहतर वे डाक्टर हैं जो इस मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में सक्रिय हैं और तत्पर होकर जांच के लिए आगे आते हैं, मंत्री के बयान के बाद भी और इस केस में भी. और आख़िरी सवाल कि आंतरिक और बाह्य दलालों द्वारा मरीजों की लूट का यह खेल कौन बंद करने की पहल करेगा?

तस्वीरें गूगल से साभार 

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें    :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें  उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

महिला पत्रकार की हत्या: पनामा लीक की खबर से दुनिया भर में पैदा किया था राजनीतिक भूचाल

माल्टा की एक खोजी पत्रकार  17 अक्टूबर को अपनी कार में एक बम विस्फोट से मारी गयी. डेफने कारुआना गैलिज़िया नामक पत्रकार ने लीक पनामा पत्रों के माध्यम से दीप के राष्ट्रों का अपतटीय टैक्स हेवन से संपर्कों को उजागर किया था.

प्रधान मंत्री जोसेफ मस्कट ने कहा, “53 वर्षीय डेफने कारुआना गैलिज़िया, माल्टा के मुख्य द्वीप के एक बड़े शहर मोस्टा में अपने घर से बाहर निकली ही थी कि जब बम विस्फोट हुआ.  विस्फोट काफी तीव्र था, उसने गाडी के परखच्चे उड़ा दिये.’

माल्टा के सबसे प्रसिद्ध खोजी पत्रकार के बेटे ने मंगलवार को कहा था कि उनकी मां राजनीतिक भ्रष्टाचार को उजागर करने के कारण मार दी गयीं. सैकड़ों लोगों ने न्याय मांगने के लिए  प्रदर्शन किया.


माल्टा  के अधिकारियों ने डच फोरेंसिक विशेषज्ञों और अमेरिकन एफबीआई एजेंटों से जांच में मदद माँगी है. मारी गयी पत्रकार के बेटे मैट्यू कारुआना गैलिज़िया ने फेसबुक पर कहा, “मेरी मां को हत्या कर दी गई थी क्योंकि वह एक मजबूत पत्रकार की तरह कानून के शासन और उनके बीच खड़ी थी जो इसका उल्लंघन करते थे।”

मंगलवार की दोपहर, सैकड़ों लोगों ने अदालतों के सामने प्रदर्शन करते हुए मारी गयी पत्रकार के लिए न्याय की मांग की.

हाल ही में, गैलिज़िया ने तथाकथित पनामा पत्रों में दर्ज जानकारी पर तहकीकात कर रही थीं, जो सेंट्रल अमेरिकी राष्ट्र में एक अपतटीय कानून फर्म के दस्तावेजों का एक बड़ा संग्रह है, जो 2015 में लीक हो गए थे. पनामा पत्रों की लीक ने कई देशों में भूचाल ला दिया था. नवाज शरीफ का नाम होने के कारण पाकिस्तान की राजनीति में उथल-पुथल मच गयी तो भारत में अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या राय तक का  नाम पनामा पेपर घोटाले से जुड़ा था.

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें    :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें  उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com