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इतिहास से अदृश्य स्त्रियाँ

कुसुम त्रिपाठी

स्त्रीवादी आलोचक.  एक दर्जन से अधिक किताबें
प्रकाशित हैं , जिनमें ‘ औरत इतिहास रचा है तुमने’,’  स्त्री संघर्ष  के सौ
वर्ष ‘ आदि चर्चित हैं. संपर्क: kusumtripathi@ymail.com



महादेवी वर्मा ने ठीक ही लिखा है, “युगों के अनवरल प्रवाह में बड़े-बड़े साम्राज्य बाह गये, संस्कृतियाँ लुप्त हो गई, जातियाँ मिट गई, संसार में अनेक असम्भव परिवर्तन सम्भव हो गये। परन्तु भारतीय स्त्रियों के ललाट में विधि की वज्रलेखनी से अंकित अदृष्ट लिपि नहीं घुल सकी।”1

ज्यादातर परम्परागत इतिहासकारों ने पुरुष सत्ता के चौखट में कार्य करनेवाले इतिहासकारों ने स्त्रियों के इतिहास की खोज करने की जरूरत ही महसूस नहीं की। इस जमात के इतिहासकारों ने समाज के दबे-पिछड़े पददलित मनुष्य के गुटों के इतिहास को भी अदृश्य रखा। परम्परागत तथा पुरुषों द्वारा लिखे गये इतिहास में स्त्रियाँ और दलित दोनों अदृश्य रहते हैं। जैसाकि प्रसिद्ध स्त्रीवादी चिंतक पुष्पा भावे ने कहा है – “यह विचार, किस विचार प्रक्रिया द्वारा आया, यह समझना आवश्यक है। हमेशा से इतिहास लेखन में कुछ अपवाद को छोड़कर, इतिहास लेखन सत्ता और सत्तातर के बीच बँट गया। जो केंद्र में सत्तारूढ़ पक्ष है, उनका इतिहास लिखा गया। इस कारण सत्ता से बाहर रहने वाले सभी सामाजिक घटकों को इतिहास में अदृश्य कर दिया गया।”2


जब भारत में आज से तीन हजार वर्ष पहले मनुस्मृति की रचना की गई, तब दलितों और स्त्रियों को शिक्षा के अधिकार से वंचित कर दिया गया। दोनों ही सामाजिक स्तर पर दास/दासी कहलाये। दोनों को वैदिक पाठ पढ़ने-सुनने पर पाबंदी लगाई गई और भूल से यदि कोई सुन भी ले, तो उनके कान में पीसा काँच डालने का दण्ड विधान रखा गया। दोनों जब पढ़-लिख ही नहीं सकते थे, समाज में दोयम स्तर का जीवन-जी रहे थे। उन्हें ‘मानव’ के केटेगरी में मानाही नहीं जाता था।

शिक्षा के अभाव में अनपढ़ अंधविश्वासी दोनों ही बने रहे। ऐसे में दोनों अपना इतिहास लिखते ही कैसे ? ब्राह्मणवादी मनुस्मृति पर आधारित व्यवस्था में स्त्रियों की छवि देवीसीता, सावित्री जैसी त्यागी, बलिदान, आदर्शवादी, एकनिष्ठ, पतिव्रता पत्नी के रूप में रही। मनुस्मृति में लिखा गया – “स्त्री को बचपन, जवानी, बुढ़ापे में क्रमश: पिता, पति और पुत्र से वियुक्त (अलग रहकर स्वतंत्र) रहने की इच्छा नहीं करनी चाहिए क्योंकि उनके अभाव में स्त्री दोनों (पिता और पति) के वंशों को निन्दित कर देती है।”१ आगे लिखा है – “स्त्रियों के लिए पृथक (पति के बिना) यज्ञ नहीं है और पति की आज्ञा के बिना व्रत तथा उपवास नहीं है। पति के सेवा से ही स्त्री स्वर्ग लोक में पूजित होती है।”२ ‘मनुस्मृति’ विश्व की प्राचीनतम न्यायायिक और सामाजिक व्यवस्था है और यह इतनी ठोस है कि भारतीय संविधान और हमारी हिन्दू सामाजिक व्यवस्था आज भी इसी पर आधारित है। यही कारण है कि ब्राह्मणवादी इतिहासकारों ने स्त्रियों तथा दलितों के इतिहास को इतिहास के पन्नों से अदृश्य कर दिया।

प्रारम्भिक भारत में स्त्रियों की स्थिति से सम्बन्धित सामग्री की गम्भीर सीमाएँ हैं। १९ वीं सदी में भारत और इंग्लैण्ड के बीच सांस्कृतिक टकराव के संदर्भ में राष्ट्रवादी इतिहास लेखन की शुरुआत हुई। इसी टकराव ने प्रारम्भिक भारत में महिलाओं की स्थिति पर लेखन की दिशा निर्धारित की थी। जेम्स मिल की कृति ‘ब्रिटिश भारत का इतिहास’ में हिंदू सभ्यता की बर्बरता को हिंदू स्त्री की दयनीय अवस्था में स्थापित किया। इसी तरह विसेंट स्मिथ सिंड्रोम की आमराय यह थी कि जो कुछ भी भारतीय है, वह खराब और निकृष्ट है। प्रसिद्ध स्त्री इतिहासकार उमा चक्रवर्ती ने कहा – “प्राचीन भारत में महिलाओं की स्थिति पर लिखने वाले इतिहासकारों ने इसी तर्क को उल्टा करके भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए तर्क देना शुरु किया कि तीन हजार वर्ष पहले भारतीय स्त्रियों को जैसा सम्मानजनक दर्जा मिला था वैसा दुनिया भर में कही भी नहीं दिया जाता था।
राजा राम मोहन रॉय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, स्वामी दयानंद सरस्वती और आर.जी.भंडारकर आदि सभी सुधारक पुनर्जागरणवादी, रूढ़िवादियों पर प्रहार करने के लिए संस्कृत कृतियों – शास्त्रों से जमकर उद्धरण दिया करते थे। इस तरह ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज, आर्य समाज ने १९ वीं सदी में ब्राह्मणवादी मॉडल के आधार पर हिंदू सभ्यता में महिलाओं की स्थिति को महिमा-मण्डित करके ब्रिटिश के सामने प्रस्तुत किया।”१ इन लोगों ने कहा – अतीत में महिलाओं की स्थिति काफी बेहतर थी। वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति बेहद ऊँची थी। उनका कहना था वैदिक काल के बाद विदेशी आक्रमणकारियों की घुसपैठ के कारण, महिलाओं का अपहरण होने लगा। उन्होंने विशेष रूप से इस्लाम आक्रमणकारियों का नाम लिया, जिन्होंने स्त्रियों का अपहरण करके उनको भ्रष्ट किया इसलिए परदा, सती और बालिका शिशु हत्या जैसी कुरीतियाँ पैदा हुई।

नारीवादी इतिहासकार उमा चक्रवर्ती के अनुसार – “सातवीं सदी में हर्षवर्धन के प्रारम्भिक काल से सम्बन्धित विवरणों में सती प्रथा उच्च जाति की महिलाओं के साथ साफ-साफ जुड़ी देखी जा सकती है। महिलाओं के अधीनीकरण सुनिश्चित करने वाली संस्थाओं का ढाँचा अपने मूल रूप में मुस्लिम धर्म के उदय के भी काफी पहले अस्तित्व में आ चुका था। इस्लाम के अनुयायियों का आना तो इन तमाम उत्पीड़क कुरीतियों को वैधता देने के लिए एक आसान-सा बहाना भर है। ये तर्क उन लोगों को अधिक भाता है जो प्रारम्भिक भारत में जेंडर संबंधों को नियंत्रित करने वाली संस्थागत ढाँचे को नहीं देखना चाहते है क्योंकि मोटे तौर पर, समकालीन समाज के जेंडर संबंध भी इसी ढाँचे पर आधारित है।”2

भारतीय नारीत्व के खो चुके रूतबे को वापस पाने की कोशिश में राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने प्राचीन कृतियों के कुछ विशेष पहलुओं पर चुनिंदा फोकस रखा है। इस प्रवृति ने अक्सर ही स्त्री-पुरुष के बीच घटित घटनाओं की साफ-सुथरी तस्वीर पेश की, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण गार्गी-याज्ञवल्क्य शास्त्रार्थ की राष्ट्रीयवादी व्याख्या है। शकुंतला राव शास्त्री ने ‘विमेन इन द स्केयरड लॉ’ (१९५९, पृ. १७२-१७३) पुस्तक में बहस के ब्योरे का सबसे महत्त्वपूर्ण बिंदू बहस को निष्कर्ष तक पहुँचाने का तरीका है। वे अंत में कहती हैं – “गार्गी के सवालों का उद्देश्य ब्राह्मण की प्रकृति के विषय में याज्ञवल्क्य की परीक्षा लेना नहीं बल्कि उनसे सीखना था।” इस तरह शकुंतला राव के विवरण में गार्गी की निर्भीकता, स्वतंत्र चेतना और एक सुविख्यात दार्शनिक से दो-दो हाथ कर सकने की क्षमता पर पानी फेर दिया।

इसी तरह एस.एस. अल्टेकर ने अपनी पुस्तक ‘द पोजीशन ऑफ विमेन इन हिंदू सिविलाइजेशन’ में हिंदू सभ्यता में महिलाओं की स्थिति का अध्ययन महिलाओं के विषय में किये गये अध्ययन में सर्वाधिक चर्चित सम्यक राष्ट्रवादी कृति है। यह अध्ययन मोटे तौर पर ब्राह्मणवादी स्त्रोतों पर आधारित है। यह कृति इतिहास में महिलाओं के अध्ययन विषय में हमारे पास उपलब्ध सबसे सुंदर कृति है। इस पुस्तक में महिला शिक्षा, विवाह और तलाक, विधवा की स्थिति, सार्वजनिक जीवन में महिलाएँ, स्त्रियों की सम्पत्ति अधिकार और आम समाज में स्त्रियों की स्थिति पर कानूनी निर्मताओं के तमाम दृष्टिकोणों का खुलासा किया गया है। लेकिन उनकी यह महिला प्रश्न राष्ट्रवादी समझ से ओत-प्रोत भी है। महिलाओं के बारे में उनकी सबसे ज्यादा चिंता परिवार के संदर्भ में है। जिससे ऐसा लगता है कि हिंदुओं का शारीरिक उत्थान बेहद जरूरी है। अल्टेकर महिलाओं को मूलत: एक शक्तिशाली नस्ल के उद्गम के रूप में ही देखते है। महिला शिक्षा के समर्थक तो है पर उन पर इसके लिए दबाव नहीं बनाना चाहते। उत्तराधिकार बेटे को ही दिया जाता था, इस पर बड़ी सफाई से ये निकल जाते है। अल्टेकर जैसे इतिहासकारों ने महिलाओं को एक विशेष सामाजिक संरचना के भीतर और पितृसत्तात्मक अधीनता के तहत ही देखा।


पुरुष इतिहासकारों में जो थोड़े उदारवादी थे, उन्होंने महिला इतिहास को, आंदोलनों में उनकी भूमिका को साधारण आंदोलनों के साथ शामिल किया। सिर्फ औरत होना ही औरत की पहचान नहीं है। दरअसल वे विभिन्न वर्गों, समुदायों से आती है। इसलिए जब इतिहास के पन्नों पर हम नारी के दमन और शोषण की बात करते है, तो सिर्फ एक औरत के दमन – शोषण की बात नहीं करती, बल्कि एक किसान, मजदूर, एक दस्तकार, यहाँ तक की एक नागरिक के शोषणवदमन की बात करते है। अत: इतिहासकारों ने औरतों के इतिहास को भी साधारण इतिहास के साथ जोड़ दिया जबकि नारी आंदोलनों में हमेशा से ही पितृतंत्र के खिलाफ संघर्ष रहता ही आया है। जन-इतिहास जो उपेक्षित पड़ा है खासकर जन-इतिहास के एक हिस्से के तौर पर नारी-इतिहास भी सामंती – बूर्जुआ इतिहास की वजह से उपेक्षित रहा है। नारीवादी संदर्भों तक सीमित रहने के बावजूद यह श्रेय  नारीवादियों को दिया जाना चाहिए कि उन्होंने उस उपेक्षित इतिहास का पुनरूद्धार किया। शायद तेलंगाना आंदोलन में नारियों के संघर्ष पर स्त्री शक्ति संगठना की ‘वी.आर. मेंकिग हिस्टरी लाईफ स्टोरी ऑफ वीमेंस इन द तेलंगाना’एक मात्र पुस्तक है। वामपंथी आंदोलनों ने पूरी तरह उपेक्षा की।


वामपंथियों को और सुधारवादियों को यह भूल माननी होगी कि उन्होंने अपने आंदोलनों में नारी की भूमिका को ठीक तरह से रेखांकित नहीं किया जो कि आंदोलनों में नारी की भूमिका को पहचान न पाने की उनकी प्रवृत्तियों को न समझ पाने का ही दुष्परिणाम है। वामपंथी महिलाओं में १९४७ के पहले के आंदोलनों में अपनी भूमिका के बारे में ही लिखा था फिर वाम आंदोलनों में नारी की भूमिका के बारे में। उन्होंने आधुनिक भारत के इतिहास में नारी की व्यापक भूमिका के बारे में कुछ लिखने की कोशिश नहीं की। उनकी तरफ से इसे उचित परिप्रेक्ष्य में रखने की कोई कोशिश ही नहीं हुई कि अतीत की व्याख्या करते हुए वर्तमान की ओर कदम बढ़ाने में या इसे अपने समय की सामायिक क्रांति का एक हिस्सा होने के तौर पर देखा-समझा जाये।

आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी को नारी शिक्षा या समाज सुधार से जोड़ने के लिए इतिहासकारों ने सिर्फ उच्च वर्ग की संभ्रान्त महिलाओं की ही भूमिका को प्रमुखता से दर्शाया और ऐसा करते हुए उन्होंने आदिवासी, किसान और मजदूर वर्ग की उन महिलाओं के योगदान को नजरअंदाज कर दिया, जिन्होंने बहुत बड़ी संख्या में, विभिन्न आंदोलनों में, संघर्षों में प्रत्यक्ष हिस्सेदारी की – इनमें घरेलू औरते हैं, माताएँ और पत्नियाँ, कई वेश्याएँ भी शामिल थी और वे महिलाएँ भी जिनके पति संघर्षों में मारे गये या जेल में बंद हो गये, उन्होंने परिवार की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाकर आंदोलनों में अप्रत्यक्ष योगदान किया।


हमारी साधारण पाठ्य पुस्तकें और शैक्षणिक इतिहास की पुस्तकों में अधिकतर लिंगभेद की मानसिकता का परिचय देती है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि हममें से ज्यादातरों ने कई महिला नेताओं, सुधारकों के नाम तभी जानें, जब हमने नारी आंदोलनों के प्रति खास रुचि पैदा हुई और हमने कुछ अतिरिक्त किताबें पढ़ी या रिसर्च किया। क्योंकि उनके बारे में कुछ पढ़ाया ही नहीं जाता। इन पुस्तकों में वर्गों को लेकर भी पक्षपात होता है। इसलिए जब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं के योगदान को दर्ज करने की बात आती है, तब सिर्फ उच्च वर्ग और ऊँची जाति और वह भी कांग्रेसी महिला नेताओं की ही चर्चा होती है, साधारण दलित, किसान, आदिवासी मजदूर महिलाओं के योगदान को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाता है। पुलिस दमन के खिलाफ उनके साहस, सामाजिक कलंक के आरोपों का सामना करने की उनकी हिम्मत और आंदोलनों में भागीदारी करने की खातिर उनकी दोहरी कठिनाइयों का जिक्र तक नहीं होता। अब यह हमारी जिम्मेदारी है कि इतिहास के अंधेरे कोनों की हम खुदाई करें और महिलाओं की बहादुरी की सही तस्वीरों को सामने लायें।


ब्रिटिश वर्चस्व के खिलाफ 1763-१८५७ तक सैकड़ों छोटे-मोटे विद्रोहों के अलावा ४० बड़े विद्रोह हुए। आदिवासियों के साथ १२ बड़े सशस्त्र विद्रोह देखे गयें। हाँलाकि इन विद्रोहों में औरतों की भूमिका के बारे में ज्यादा कुछ दस्तावेजी प्रमाण नहीं मिलते, लेकिन हम जानते है कि इन सभी विद्रोहों में आदिवासी-जनजाति महिलाओं की सक्रिय हिस्सेदारी थी। आदिवासी समाज में चूंकि औरतों को शुरु से ही बराबरी का दर्जा मिला हुआ था। अत: युद्धों में भी बराबर हिस्सा लेना उन समुदायों की औरतों के लिए सहज स्वाभाविक हैं। बंगाल में पहले-पहल विद्रोह का परचम लहराने वाले चुआर विद्रोही थे। बिहार और बंगाल के कुछ जिलों में यह विद्रोह हुआ। छोटा नागपुर का कोल विद्रोह, संथालविद्रोह, खारवारविद्रोह, उलगुलान – विरसा मुंडा विद्रोह, मनयानविद्रोह, नीलविद्रोह। इन सभी विद्रोहों में पुरुष ब्रिटिश पुलिस से छुपकर जब जंगलों में चले जाते थे, औरते रात को फौजी घेरे से चुपके से निकलकर जंगलों में छिपे पुरुषों को भोजन, खबरें और हथियार पहुँचाती थी। कुछ औरतें गिरफ्तार होती, फौज उन पर जुल्म करती पर वे अडिग खड़ी रहती। कहीं-कहीं तो महिलाएँ सीधे विद्रोह में शामिल थी जैसे नीलविद्रोह में थालियों, ईंटों और अत्यंत मजबुत छिलके वाले बेल फलों से हथियार बनाये। हमलावरों को डराने के लिए औरतें मिट्टी की पक्की थालियों को बजाकर ऐसी आवाजें पैदा करती, जिससे नसें फट जाती थी। ‘नील दर्पण’ नाटक में नील विद्रोह में शामिल औरतों को अंग्रेजों ने कैसे सताया, अपहरण किया, अत्याचार किये, उसकी भयंकर तस्वीर प्रस्तुत की गयी।

अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का इतिहास दो सौ वर्षों से भी ज्यादा पुराना है। सत्ता वर्ग द्वारा प्रकाशित इतिहास पुस्तकों में सिर्फ रानियों को गौरवपूर्ण तरीके से पेश किया गया है, जबकि सच्चाई यह है कि ऐसी लड़ाइयों में साधारण वर्ग की गरीब महिलाओं ने भी बहादुरी से लड़ते हुए अपनी जान दी। ऐसी रानियों में जो कुछ प्रसिद्द हुई, उसकी जानकारी भी हमें अंग्रेजों ने कुछ अनिच्छा से लिखा, वही पता है। १८२८ में कित्तुर की रानी चैन्नम्मा, १८५७ की लड़ाई में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की फ़ौज में हर धर्म, जाति, वर्ग व समुदाय की औरतें शामिल थी। दलित महिलाएँ पुस्तक की भूमिका में डॉ. धर्मकीर्ति ने लिखा है – “दलित समाज की दस-वीरांगनाओं के बारे में बताया गया है जिनका अध्ययन करके दलित महिलाएँ अपने ऊपर होने वाले शोषण, उत्पीड़न, अत्याचार, अन्याय के विरुद्ध संघर्षरत होकर विकास कर सकेंगी। झलकारी बाई, लोजी, महाबीरी देवी, पन्ना, जगरानी पासी, नन्हीबाई, रानी गुडियालो, अवंती बाई, वीणादास और ऊदादेवी के जीवन-चरित्र दलित महिलाओं के लिए प्रेरणादायक सिद्ध होंगे।”१

 

लक्ष्मीबाई के साथ उनकी हमशकल झलकारी बाई को इतिहास से अदृश्य किया गया। मंगल पांडे को फांसी लगी, तब लाजो नामक दलित स्त्री अपने पति मातादीन के साथ कंधे से कंधा भिड़ाकर लड़ी और शहीद हुई। वे १८५७ स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम चिंगारी थी। मुजफ्फरनगर उत्तर प्रदेश की महाबीरी देवी अंग्रेजों के साथ सशस्त्र संघर्ष की उनकी टोली में कुछ २३ औरतें थी, सभी मारी गई। पर भंगी जाति की होने के कारण इनका इतिहास नहीं लिखा गया। बेगम हजरत महल के साथ लड़ने वाली पासी महिला जगरानी पासी थी, अंग्रेजों को मरने के बाद पता चला कि वे पुरुष नहीं महिला थी। नागालैंड के उत्तरी कछार की रानी गुडियालो १३ वर्ष की उम्र में ही स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हुई। पूर्वी सीमांत क्षेत्र में वे “हीरो” की तरह याद की जाती है। पर यह दुखद है स्वतंत्रता संग्राम की जानकारी देनेवाली हमारी पुस्तकें और पाठ्यपुस्तकों में उनका उल्लेख नहीं मिलता। ये सभी हमारी राजनीतिक विरासत का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। इन सभी के अपूर्व शौर्य, साहस और बलिदान को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाना चाहिए।

दूसरे तमाम आन्दोलनों की तरह समाज-सुधार आन्दोलनों में भी महिला समाज सुधारिकाओं के बारे में बहुत ही कम जानकारी मिलती है लेकिन चूँकि इन आन्दोलनों का थोड़ा लेखा-जोखा रखा गया था, इसलिए पिछले इतिहासों की तरह इन आन्दोलनों में महिलाओं की भूमिका के बारे में सूचनाएँ हासिल करना असंभव नहीं। यह वह समय था जब महिलाओं ने लिखना शुरू कर दिया था।अतः उनके युग, कार्यो और नजरिये के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ खुद उनके लिखित अनुभवों में मिल जाती है। फिर भी यदि इन्होंने नारीवादी दृष्टिकोण से और अधिक इतिहास का मूल्यांकन किया होता, तो ये पता चलता कि ताराबाई शिंदे ने ‘स्त्री-पुरुष तुलना’ ये पुस्तक क्यों लिखी। बाल गंगाधर तिलक जो राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के युग पुरुष थे, उनकी औरतें के बारे में क्या राय थी?

ताराबाई दो घटनाओं से विक्षिप्त हो गई थी और “स्त्री-पुरुष तुलना” पुस्तक की रचना की। यह घटना है – ‘द टाइम्स ऑफ़ इंडिया” में २६ मई १८८१, सत्यमित्र में २७ मई १८८१ तथा इंदुप्रकाश में १२ जून १८८१ में एक खबर छपी। विजयलक्ष्मी नाम की एक २५ वर्षीय ब्राह्मण विधवा थी, जिसे १८८० में पता चला वह गर्भवती है। उसके गर्भवती होने की घटना को कोर्ट में घसीटा गया। कोर्ट से आदेश आया, बच्चे की भ्रूणहत्या न की जाये, पर विजयलक्ष्मी ने कोर्ट के आदेश का पालन न करते हुए बच्चे की भ्रूणहत्या कर दी, इस पर मजिस्ट्रेट ने विजयलक्ष्मी को फांसी की सजा सुनाई। इस केस से ताराबाई के मन पर बहुत बड़ा आघात लगा। वे विचलित होने लगी। उनकी कलम से तभी आग उगलने लगी।

दूसरी घटना रखमाबाई की है। बचपन में उनका विवाह कर दिया गया। विवाह के पश्चात वे पढ़-लिख ली और अपने अनपढ़ पति के साथ ससुराल जाने से मना कर दी। उनके पति दादाजी भीकाजी ने अदालत में वैवाहिक अधिकारों की प्रतिष्ठान का दावा दायर किया। जिला अदालत में रखमाबाई जीत गई, पर बम्बई हाईकोर्ट में पति जीत गया। फिर भी रखमाबाई ने कोर्ट के सामने चुनौती देते हुए कहा – “चाहे तो मुझे फाँसी पर लटका दो पर मैं इस आदमी के साथ ससुराल नहीं जाऊँगी।”इस पर तिलक ने ‘केसरी में लिखा, स्त्री शिक्षा आंदोलन के बहाने रखमाबाई की आड़ में हमारे पुरातन धर्म पर आक्रमण का प्रयास किया जा रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि अंग्रेजों की नीयत हमारे अनन्त धर्म को बाँझ बनाने की है।” तिलक जैसे राष्ट्रीय युग पुरुष नेता के ऐसे व्यक्तव्य से ताराबाई बौखला गई। इन दोनों घटनाओं से आहत होकर उन्होंने स्त्री-पुरुष तुलना की रचना की।
२० वीं सदी के पूर्वार्द्ध में महात्मा गाँधी के नेतृत्व में भारी संख्या में औरतें सड़कों पर उतरी। गांधीजी ने पर्दे में रहने वाली औरतों, अनपढ़ गंवार कही जाने वाली औरतों, शहरी, गांवों, कस्बों की औरतों, पढ़ी-लिखी औरतों सभी को, चाहे वे बुद्धिजीवी हो या हथकरधा पर काम करने वाली सभी को, स्वतंत्रता की लड़ाई का हिस्सा बनाया। इतिहास में इसके पहले औरतों की इतनी भरी संख्या नहीं दिखी थी। जैसा कि लता सिंह लिखती है – “गांधीजी आंदोलनों में महिलाओं की भागादारी के पूर्ण पक्षधर थे। वे महिलाओं की सभाओं में अपने भाषणों में, आन्दोलनों में उनकी भागीदारी अनिवार्य बताते थे और साथ ही उन्हें यह कहकर प्रेरित करते थे कि देवियों और वीरांगनाओं की तरह उनकी अपनी अलग भूमिका है। ……..उन्होंने महिला नेताओं को सीता, द्रोपदी और दमयंती की तरह सात्विक, दृढ़ और नियंत्रित होना चाहिए, तभी वे स्त्रियों के भीतर पुरुषों के साथ बराबरी का भाव जगा सकेंगी और अपने अधिकारों के प्रति सचेत तथा स्वतंत्रता के प्रति जाग्रत रह सकेंगी।”१

इतिहास में गांधीजी का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान यह था कि उन्होंने सार्वजनिक गतिविधियों में महिलाओं की सहभागिता के औचित्य को सिद्ध करते हुए उसे विस्तार दिया। ताकि वे वर्ग एवं सांस्कृतिक बंधनों को तोड़कर आगे बढ़ें। नारीवादी इतिहासकार राधाकुमार कहती है – “इसी समय महिलाओं के स्वभाव और भूमिका के बारे में गाँधी की परिभाषा हिन्दू पितृसत्ता से गहराई से जुड़ी नजर आई और अक्सर उनका झुकाव महिला आंदोलन को आगे बढ़ाने के बजाए उन्हें सीमित करने की ओर रहा।”२ कांग्रेसी महिलाओं ने भी अपने पुरुष साथियों तथा गांधीजी के पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण के खिलाफ जो संघर्ष किया, कुछ हद तक उसे सामने रखा।
१९४७ के पहले के आंदोलनों में औरतों की भूमिका पर लिखते हुए डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर के नेतृत्व में हुए जातिवाद विरोधी आंदोलन में दलित महिलाओं की भूमिका की इतिहासकारों ने अनदेखी की। आंबेडकर के आंदोलन में औरतों की भूमिका पर उर्मिला पवार और मीनाक्षी मून की लिखी पुस्तक “आम्ही ही इतिहास घडवल” है जो सबसे अच्छी पुस्तकों में से एक है।

इसी तरह अल्पसंख्यक मुस्लिम और ईसाई महिलाओं की भूमिका भी ठीक से दर्ज नहीं। जब तक मुस्लिम महिलाएँ अखिल भारतीय महिला कांग्रेस में रही तब तक उनका इतिहास दर्ज किया गया, पर जब वे मुस्लिम लीग बना उसके बाद की जानकारी इतिहास में दर्ज नहीं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शुरुआती दिनों में कुछ विदेशी ईसाई महिलाओं की भूमिका बहुत ही महत्त्वपूर्ण रही। भारतीय महिलाओं की अलग संगठनों की स्थापना में भी उनका बड़ा योगदान रहा।

राष्ट्रीय क्रन्तिकारी आंदोलन में महिलाओं के योगदान के बारे में कुछ साहित्य जरूर लिखा गया, लेकिन आसानी से उपलब्ध नहीं। ऐसे साहित्य पुनर्मुद्रित नहीं हुए।कुछ साहित्य बांग्ला में लिखे गये, लेकिन चूँकि उनका संघर्ष मुख्यत: ब्रिटिश सरकार के खिलाफ था और कुछ सीमा तक उसे दर्ज किया गया। चूँकि इन महिलाओं ने सशस्त्र संघर्ष किया, इसीलिए पाठ्यपुस्तकों में उन्हें महत्त्व नहीं दिया गया। कुछ पुस्तकों में तो उनकी चर्चा भी नहीं है। भगतसिंह ने चूँकि अपने विचारों से तथा शहादत से देशवासियों के दिलों में अमिट छाप छोड़ी इसलिए उनकी चर्चा अनिच्छा और बेदिली से की जाती है किन्तु महिला क्रांतिकारियों को आसानी से नजरअंदाज किया जाता है। सुभाषचंद्र बोस के आजाद हिन्द फ़ौज में सिर्फ कैप्टन लक्ष्मी का नाम लिया जाता है। उन एक हजार औरतों का इतिहास उपलब्ध नहीं, जो झाँसी की रानी रेजिमेंट का हिस्सा थी।

कम्युनिस्टों के नेतृत्व में जो सशस्त्र संघर्ष हुए तेलंगाना, तेभागा आंदोलन, उसमें दलितों, किसानों, अल्पसंख्यकों और आदिवासियों की महिलाओं की भूमिका के बारे में काफी हद तक लिखा गया। मजदूर संघों की कुछ महिला नेताओं केबारे में काफी हदतक जानकारियाँ उपलब्ध है। लेकिन मजदूर संघों के संघर्षों में मजदूर महिलाओं की भूमिका के बारे में यहाँ-वहाँ छपे कुछ लेखों के अलावा विस्तृत सूचनाएँ उपलब्ध नहीं। वामपथियों और सुधारवादियों द्वारा लिखी गयी मजदूर-संघर्ष के इतिहास की पुस्तकों में भी मजदूर महिलाओं के संघर्षों का जिक्र नहीं मिलता। कुछ कारखानों में उनकी दुर्दशा के बारे में कुछेक अध्याय लिखे गये। हाँलाकि इन्हीं आंदोलनों से कुछ महिला नेताओं का उदय हुआ।


डॉ. आशा शुक्ला और कुसुम त्रिपाठी की पुस्तक की भूमिका में उन्होंने लिखा है – “किसान आंदोलनों में भी महिलाओं में साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष के दौरान पितृसत्तात्मक आंदोलन में हिस्सा लेने वाली महिलाओं की गवाहियाँ इस बात की बेहतर सबूत है कि पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण की वजह से उन्हें कैसी-कैसी समस्याओं से गुजरना पड़ा।”१

देश के कई भागों में सामंती व राजकीय दमन के विरुद्ध सशस्त्र-विद्रोह आयोजित हुए। बंगाल, बिहार, आंध्रप्रदेश, केरल, पंजाब के संघर्ष उल्लेखनीय है। वायनाड संघर्ष के बारे में अजिता ने पार्टी ढांचों के भीतर महिलाओं के सवाल पर लिखा तो श्रीकाकुलम संघर्ष पर विंध्या ने लिखा कि गिरिजन संघम् में महिलाओं के यौन-जीवन और मातृत्व के मसालों को सही ढंग से हाथ में ले पाने में असमर्थ रहा।


ईलीना सेन के अनुसार – “महिलाएँ सभी प्रकार की राजनीतिक कार्यवाइयों धरने, घेराव, पिकेटिन आदि में शामिल रही। …….चिपको आंदोलन, मुंबई का गिरणी कपड़ा मिलोंके कामगार आंदोलन, केरलके मछुआरों का आंदोलन, नशाखोरी विरोधी आंदोलन, बिहार का बोधगया आंदोलन, असम आंदोलनसे संबंधित अख़बारों की रिपोर्टों तथा फोटोग्राफों से पता चलता है कि प्रदर्शन और बैठकों में बड़ी संख्या में महिलाओं ने भाग लिया। पर वह सांगठनिक अनुभव कहीं भी पर्याप्त रूप से अभिलिखित नहीं है।”१

 



स्वायत्त महिला आंदोलन (ऑटोनॉमस विमेंस मूवमेंट) अनेक छोटे-छोटे समूहों को संगठित करके स्थापित किया गया। मैं भी इस आंदोलन में सक्रिय थी। १९८० में देशके विभिन्न हिस्सों से राष्ट्रीय स्तरके बड़े आंदोलनअभियानों में सक्रिय होने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर महिलाओं से संबंधित समस्याओं और मुद्दों को उठाते रहते थे। ऐसी गतिविधियों की अनेक रिपोर्ट विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में भरे पड़े है। अधिवेशनों में पढ़े गये परचे बिखरे पड़े है। इन्होंने कुछ किताबें भी लिखी। वे सभी सुरक्षित हैं। दस्तावेजीकरण की वजह से कोई छोटा-सा आंदोलन भी शोधकर्मियों को उपलब्ध हो जाता है जबकि बड़ा आंदोलन रेकॉर्ड न रखे जाने की वजह से अनदेखा-अनजाना रह जाता है।

८० के दशक के बाद जब नारीवादी आंदोलनों की शुरुआत हुई, तब विश्व स्तर पर नारीवादी महिलाओं ने महसूस किया कि इतिहास के पन्नों से नारियों के इतिहास को उपेक्षित किया है। सामंतवादी, बुर्जुआ, ब्राह्मणवादी इतिहासकारों की वजह से नारी इतिहास को इतिहास के पन्नों में शामिल नहीं किया गया।

इसलिए हम नारियों को स्वयं अपने इतिहास को पुनर्लेखन करना होगा, तब इतिहास की “री-राइटिंग” शुरू की गयी। हमारे देश में नारी देसाई, मीना मेनन, उमा चक्रवर्ती, उर्वशी बुटालिया, कमला भसीन, राधा कुमार, मधु किश्वर, सुशीला गोखले जैसे कुछ नारीवादी इतिहासकारों ने इतिहास के पन्नों से नारीवादी दृष्टिकोण से इतिहास लेखन शुरू किया।

जैसाकि गौरी लंकेश ने लिखा है – “मनुवादियों ने बहुजनों तथा महिलाओं के समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास को अपने हिसाब से तोडा-मरोड़ा। हमें इतिहास पर पड़े धूल-धक्कड को झाडना पड़ेगा, पौराणिक झूठों का पर्दाफाश करना पड़ेगा और अपने लोगों तथा अपने बच्चों को सच्चाई बतानी पड़ेगी। यही एकमात्र रास्ता है, जिस पर चलकर हम अपने सच्चे इतिहास के दावेदार बन सकते हैं।”१

संदर्भ सूचि

१. श्रृंखला की कड़िया – महादेवी वर्मा, भारती-भंडार प्रेस, प्रयागपृ. २१
२. जब स्त्रियों ने इतिहास रचा-कुसुम त्रिपाठी की पुस्तक की भूमिका, नवजागरण प्रकाशन, नागपुर, पृष्ठ – १
१. मनुस्मृति (हिंदी रुपांतर) – प्रस्तुति गोविंद सिंह, साहनी पब्लिकेशन, दिल्ली, पृ. ९५
२. मनुस्मृति (हिंदी रुपांतर) – प्रस्तुति गोविंद सिंह, साहनी पब्लिकेशन, दिल्ली, पृ. ९६
१. अल्टकेरियन अवधारणा से परे : प्रारम्भिक भारतीय इतिहास में जेंडर संबंधो की नई समझ – उमा चक्रवर्ती, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, पृ. १२७
२. अल्टकेरियन अवधारणा से परे : प्रारम्भिक भारतीय इतिहास में जेंडर संबंधो की नई समझ – उमा चक्रवर्ती,      दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, पृ. १२९
१.दलित महिलाएँ- संकलन-डॉ. मंजू सुमन, संपादन – ज्ञानेंद्र रावल, सम्यक प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ ७.
१. “राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाएँ – भूमिका के सवाल – लता सिंह, नारीवादी राजनीति:संघर्ष एवं मुद्दे, दिल्ली         विश्वविद्यालय, दिल्ली, पृष्ठ १५७
२. स्त्री संघर्ष का इतिहास -‘राधा कुमार’, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ – १७५

 

१.उपनिवेशवाद, राष्ट्रवाद और जेंडर – प्रो. आशा शुक्ला, कुसुम त्रिपाठी, बरकतउला विश्वविद्यालय, भोपाल,        पृष्ठ – ९
१. संघर्ष के बीच : संघर्ष के बीज,  इलीना सेन, सारांश प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ – १७      
१. गौरी लंकेश का लेख – “हमारा माहिषासुर, २९ फरवरी २०१६, वेब पार्टल बैंगलोर मिरर में प्रकाशित 


 संदर्भ ग्रंथ सूची


१. मनुस्मृति (हिंदी रुपांतर) – प्रस्तुति गोविंद सिंह, साहनी पब्लिकेशन, दिल्ली–२००४
२. श्रृंखला की कड़िया – महादेवी वर्मा, भारती-भंडार प्रेस, प्रयाग- २००५
३. नारीवादी राजनीति संघर्ष एवं मुद्दे – संपादक – साधना आर्य, निवेदिता मेनन, जिनी लोकनीता, हिंदी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, २००१
४. स्त्री संघर्ष का इतिहास – ‘राधा कुमार’, अनुवाद-संपादन – रमाशंकर सिंह, ‘दिव्य दृष्टि’वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, २००२
५. समाजवादी देशों की महिलाएँ:एक सिंहावलोकन – कुसुम त्रिपाठी, संगिनी प्रकाशन, मुम्बई – २००७
६. संघर्ष के बीच : संघर्ष के बीज –संपादक इलीना सेन, सारांश प्रकाशन, दिल्ली – २००७ 
७.दलित महिलाएँ- संकलन- डॉ.मंजू सुमन, संपादन – ज्ञानेंद्र रावल, सम्यक प्रकाशन, नयी दिल्ली – २००४
८. स्त्री अस्मिता के सौ साल – कुसुम त्रिपाठी, संस्कार साहित्य माला, मुम्बई–२०१०
९. स्त्री अध्ययन : आधारभूत मुद्दे भाग-१, भाग-२, संपादक – आशा शुक्ला, कुसुम त्रिपाठी, साहित्य भंडार, इलाहाबाद – २०१६
१०. भारतीय समाज में नारी–नीरा देसाई, मेकमिलन इंडिया प्रकाशन, मुम्बई
११. औरत इतिहास रचा है तुमने – कुसुम त्रिपाठी, कल्याणी शिक्षा परिषद, नई दिल्ली – २०१०
१२. स्त्री-पुरुष तुलना – ताराबाई शिंदे, सुधीर प्रकाशन, वर्धा – २००३
१३. आजादी की महिलाएँ – रेणु दीवान, एजूकेशन बुक सर्विस, नई दिल्ली – २०१०
१४.उपनिवेशवाद, राष्ट्रवाद और जेंडर – प्रो. आशा शुक्ला, कुसुम त्रिपाठी, महिला अध्ययन विभाग, बरकतउल्ला विश्वविद्यालय, भोपाल – २०१४
१५. श्रीकाकुलम गिरिजन आंदोलन का संक्षिप्त इतिहास – विजयवाड़ा सोशलिस्ट पब्लिकेशन
१६. स्त्री संघर्ष के मुद्दे (भारतीय एवं पाश्चात्य संदर्भ) – महिला अध्ययन विभाग, बरकतउल्ला विश्वविद्यालय, भोपाल – २०१४
१७. वीमेंस इन द तेभागा अपराइजिंग – पीट कस्टरस
१८. वी. आर. मेंकिग हिस्टरी – लाईफ स्टोरी ऑफवीमेंस इन द तेलंगाना पीपुल्स-स्ट्रमल, कालीफॉर वीमेन प्रकाशन,नई दिल्ली – १९८९
१९. वीमेंस मुवमेंट इन इंडिया – प्रतिमा अस्थाना, विकास पब्लिकेशन, नई दिल्ली–१९७४
२०. फेमेनिज्म हेज़ एक्सपिरियंस–नीरा देसाई, स्पैरो प्रकाशन, मुम्बई – २००६
२१. रिराइटिंग हिस्टरी – उमा चक्रवर्ती, कालीफॉर वीमेन प्रकाशन, दिल्ली – १९९८
२२. टू सर्च ऑफ आनसर्स– मधु किश्वर, रूथ वनिता, हॉरिजॉन इंडिया बुक, नई दिल्ली – १९९१
२३. आम्ही ही इतिहास घडवला – उर्मिला पवार, मीनाक्षी मून, सुगावा प्रकाशन, पुणे – २०००

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अंजुमन खाला को गुस्सा क्यों नहीं आता…

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सोनी पाण्डेय


प्रकाशित पुस्तकें – मन की खुलती गिरहें (कविता सग्रह) ,सारांश समय का (साझा काव्य सग्रह),विभिन्न पत्र- पत्रिका में
कविताऐं..कहानी ,लेख प्रकाशित. सम्पर्क:  .pandeysoni.azh@gmail.com,

सलमा का दुपट्टा असलम की साईकिल के घूमते पहिए में फस गया…..फस गया या जबरन फसाया गया इसमें सन्देह था।रेशमी गुलाबी दुपट्टे का सुनहरा गोटा उघड़ गया…. दुपट्टा बचा कर निकालते- निकालते मछली का जाला बन गया…..हूँssssssआं…हूँssssssssssआं कर सात साल की सलमा का रुदन देख असलम की सिट्टी – पिट्टी गुम।शेख चचा लड़की को पुचकार कर चुप करा रहे थे कि कपड़े रंगती असलम की अम्मी आग पर चढ़ा हंडा छोड़ दनदनाती आकर कान उमेठते उसे लेकर चलीं….साथ -साथ सप्तम सुर में चिल्ला रही थी…” करम जली ,ना जाने किस जनम का बदला लेती है मुझसे….पहले तो खसम खा बैठी ,ऊपर से चार- चार बेटियाँ जन के बैठ गयी ।हाय अल्ला! …रहम कर मौला! , किस महूरत में अपने मासूम रहमान मियाँ को इस कलमुही के पल्ले बाँधाssssssssss…।”

उसका राग भैरवी चालू था…रह -रह कर कच्ची मिट्टी की दीवारों से हायssssssssss, की चीखें अब भी आ रही थीं। अंज़ुमन खाला बरामदे से रोती बेटी को देख भागती हुई आईं….बगल के मकान से हाय तौबा की आवाजें साफ सुनाई दे रही थीं। वह क्या पूरी रंगरेज गली उनकी बहन परवीन  की फ़ितरत से वाक़िफ थी,…दिन- रात बहन को ज़लील करने का मौका तलाशती रहती ।..अंज़ुमन खाला एक चुप ,हजार चुप ।पहाड़ सा धैर्य समेटे बेवा खाला चार बेटियों को सिलाई ,कढ़ाई कर पाल पोश रहीं थीं।भूले से बहन की चौखट पर मदद के लिए पैर नहीं रखतीं …न ही बेबसी का रोना रोतीं।
दोनों बहनों में छत्तीस का विकट आंकड़ा…एक का पति शहर का सबसे हुनरमन्द रंगरेज और दूसरे का टाप वन दर्जी। रहमान टेलर के नाम का आलम यह था कि शहर तो शहर आस- पास के पड़ोसी जिले के दुल्हों की शेरवानियाँ यहीं सिलतीं….रोज़ी में बरकत थी ….हुनरमन्द ,सलीक़ेदार बीबी और चार प्यारी बेटियों से रौनक उनके गुलिस्तां में कमी थी तो केवल एक बेटे की। दोनों जनें पाँचों समय नियम के नमाजी…खुदा पर पूरा यकीन रखते थे कि एक न एक दिन चश्मेचराग ज़रुर देखेंगे और हर पीर पैगम्बर के दर की खाक छानते। अभी तो अजमेर शरीफ से लौटे थे ….कितनी अकीदत से कुरानखानी कराई थी….या मौला sssssssतू ने ये क्या कर दिया।नेक बन्दों की ही तूझे भी ज़रुरत रहती है ,कहते -कहते असलम की अम्मी जिन्हें हम बच्चे परवीन खाला कहते थे ,उस दिन छाती पीट -पीट दहाड़े मार रही थीं।सामने अहाते में रहमान मियाँ की लाश पर बेटियाँ सिर पटक -पटक रो रही थीं।रात दावत से लौट कर सोये तो सोये ही रह गये।शरीर नीला पड़ गया था। जलनखोरों की कमी नहीं थी,घर पर केवल दावतखाने की बात कह कर निकले थे….कभी किसी से अदावत नहीं की ,हाँ रोजी रोज़ बढ़ते देख कुछ सिलने वाले जात भाईयों की डाह जरुर थी। ….अन्तत: पुलिस ने खुदकुशी का मामला बता पल्ला झाड़ लिया।

 चालीसे तक तो भाई जात और रिश्तेदार मदद करते रहे पर धीरे- धीरे सबके दरवाजे बन्द होने लगे। चार- चार बेटियाँ ,सबसे बड़ी सना नौवीं में…सबा सातवीं में…सब्बो छठी में और सलमा दूसरी क्लास में पढ़ती थीं। लड़कियों की फीस, कॉपी ,किताब कपड़े से लेकर घर के राशन और बूढ़ी सास की अस्थमा की बीमारी के खयाल में डूबी अंजुमन खाला ने एक दिन घर के आगे की दुकान का सटर उठा दिया….पति के साथ -साथ सिलाई करती थीं….मशीन पर बैठीं तो फिर जम कर बैठ गयीं।लड़किया तुरपाई ,काज ,बटन करतीं और उनकी मशीन खड़खडाते हुए पूरे दिन दहाड़ती।हसद बड़ी बुरी चीज होती है…आदमी पहले खुद राख होता है फिर शिकार की मुश्किलें बढ़ाता है। हमशीरा  बहन परवीन जो बगल में ब्याही थी एक बार फिर हौसला और बरकत देख कुढ़ने लगी ।मौका मिलते तोहमतों की बरसात कर देती…ज़बान थी की कैंचीं….सरsssssssssसरssssss रुह काटते उसे तनिक रहम नहीं आता।
   गुनिया की माई
दिन ,महीने ,साल बीते…..हर सिंगार खिल कर झर गये…..सावन के झूले उतरे और औरते फगुवा की फुनगी पर बैठ सपनों की सतरंगी ओढ़नी ताने फुदकती….महकती …गमकती जीने लगीं ,अपने औरत होने के तमाम रंजो ग़म सहेजे।गली ,मुहल्ले में धीरे- धीरे रौनक़ लौटने लगी।रंगरेज गली फिरसे गुलज़ार हो उठी ….लोग हर दिल अज़ीज रहमान दर्जी को भुलाने लगे। अब चर्चे थे तो एक गुस्ताख बेवा का तन कर दर्जी की दुकान में बेपर्दा हो मर्दों से नाप जोख करने का । अंजुमन खाला एक चुप हजार चुप ,…चेहरे पर तनिक भी बेबसी हावी नहीं होने देतीं।धीरे -धीरे पुराने आर्डर निबटाने के बाद दुकान पर नया बोर्ड टंगवा दिया …”रहमान लेडीज एण्ड जेण्टस सूट श्पेसलिस्ट”। जानतीं थीं बेटियों को आगे इसी हुनर को बढ़ाना है सो औरतों के कपड़ों की सिलाई की ओर मुड़ीं,..वैसे भी मर्द अब किसी ज़नानी से कपड़े सिलाने से परहेज़ करने लगे थे।उपर से परवीन की कतरनी ज़बान पहले से कस्टमर को भड़काती रहती।

 सना हमारी क्लास मेट थी,गुलाबी होंठ और हिरनी जैसी आँखों वाली।उजली ऐसी की चाँदनी भी शरमा जाए … गाती तो मादक महुए की रस भरी जैसे टप टप टपकते हुए दूर -दूर तक रसगन्ध फैला आती कि देखो फागुन आया है।ऐसी थी चर्चा पूरे स्कूल की दीवारों से निकलकर बगल के लड़कों के कालेज तक। हम पहली बार रंगरेज गली में सना के साथ ही घुसे थे…सकरी गली सरपीली गोल -गोल घूमती रही घण्टों तक ,जैसे लखनऊ की भूल भुलैया ।मैं कई बार सना का हाथ पकड़ती और डर जाती….गली के दोनों तरफ तंग मकान…मकानों के सामने के हिस्से  में रंगरेजों की दुकान….दुकान क्या बड़ी -बड़ी भट्ठियों पर हण्डों में उबलते रंगीन पानी के भाप  से रंगी पूरी होली की छावनी ….जैसे हमारे गाँवों में होली के दिनों में रहता है। एक अहाते में अलगनी पर लाइन से बाँधनी के रंग बिरंगे दुपट्टे टंगे देख हम खिल गये।हाँ….यही तो चाहिए था हमें एन्नुवल फंक्शन के लिए….गली में खोने का डर फुर्र हो गया।हम सना के घर पहुँचे… आगे दुकान में उसकी माँ कपड़े सिल रही थीं…लड़कियों का हुजूम देख मुस्कुराकर स्वागत किया।रेहाना ने झुक कर आदाब खाला कहा  और बिना कुछ सोचे समझे हम सब ने फालो किया ,समवेत स्वर में…..आदाब खाला गूंज उठा। हम बगल के गलियारे से अन्दर घुसे….अन्दर बड़ा सा बारामदा..,बरामदे में चौकी पर एक बूढ़ी औरत हाथ में सफेद मोतियों की माला लिए फेर रही थी ..ऐनक चढ़ा कर हमें पहचानने की कोशिश कर ही रही थीं कि अबकी सब एक साथ आदब बजा सर्र से आगे बढ़ गयीं सना के साथ….सना ने बरामदे का दरवाज़ा खोला ….सामने बड़ा सा अहाता…..जो एक विशाल पोखरे के किनारे था ।

क़रीब दस बकरियाँ देखते मिमियाने लगीं....बत्तख ,कोकच भी देखते मटकते आगे बढ़ने लगे,मुर्गियाँ भी भागती हुई आकर परिक्रमा करने लगीं जैसे बत्तखों को चिढ़ा रही हों कि देखों रेस जीत लिया। एक तरफ कबूतरों का दरबा दिखा….शायद कबूतर चरने निकले थे। दूसरी तरफ गाय की मड़ई …हम सावधान की मुद्रा में खड़े इस पूरे दृश्य को सहमें देख रहे थे इस डर से कि अगले पल कौन और प्रगट होगा?…..खैर दस मिनट में स्थिति सामान्य हो गयी।सना मुट्ठी में दाने ले दूर बिखेर कर हँसती हुई आई …..सब टूट पड़ें थे दानों पर। नकाब खोलते हुए एक तरफ खड़ी चारपाई को बिछाने के लिए रेहाना को कह वह अन्दर चली गयी।रेहाना उसकी दूर की खालाजात बहन थी।

हम अभी तक इस पशु मेले से असहज थे कि एक देशी कुत्ता भौंकता हमारे सामने आकर खड़ा हो गया ,हम चरपाई पर चढ़ कर खड़े हो गये। मुझे गुस्सा आ रहा था….यार ये घर है की चिड़िया घर?…रेहाना हँसने लगी मेरी बात सुनकर । कुत्ते को पुचकार कर वापस भेज दिया ….,वह पूँछ हिलाता निकल ही रहा था कि सना कांच की कटोरियों से सजा ट्रे लेकर आती दिखी….वह फिर पीछे हो लिया। सना चने दाल का हलवा ,खुरमा और चिप्पस लिए चारपाई पर आकर बैठ गयी। हिन्दू लड़कियाँ कुछ खाने में संकोच कर रही थीं। सभी असहज थीं इस भय से कि कैसे खाऐं मुसलमान के घर का…खास कर तीन पण्डित और दो ठाकुर लड़कियाँ,…पाँचों ने मना कर दिया।बची मैं और दो तीन…..सना ने ना जाने क्या सोच कर बर्फी की आकार में कटा चने दाल का हलवा मेरी तरफ बढ़ाया,…..प्यार भरी सजल आँखें, मैं संकोचते अम्मा से डरते एक पीस उठा ली और पहला टुकड़ा काटते तारीफ करने लगी।सच में हलवा हमारे घरों के बेसन के हलवे से अलग और स्वादिष्ट था। …..मैं खा रही थी…धीरे -धीरे सबके हाथ बढ़ने लगे कि यदि ये पण्डित होकर खा सकती है तो हम क्यों नहीं ? नाश्ते के बाद हम बगल के रंगरेज की दुकान पर पहुँचे..हाथ में हमारे बड़ा सा कपड़े का गट्ठर देख परवीन खाला खिल गयीं। रेहाना सब समझा रही थी …..खाला ! चुनरी डिजाइन के पचास दुपट्टे छब्बीस जनवरी से पहले चाहिए।वह दुपट्टे गिन एक तरफ रख बोलीं ….हो जाएगा।रेहाना से हाल चाल, दुआ सलाम खत्म हुआ तो हम चलने को हुए।रेहाना अपनी गली में हमें छोड़कर मुड़ गयी।हम अटक गये….डर से माथे पर पसीने की चुहल कदमी बढ़ी और मैं अनयास ही .पीछे मुड़ कर देखने लगी ,इस उम्मीद में कि कोई आकर हाथ थाम इस गली से बाहर निकाले….भय के स्वेद बिन्दू सबके माथे पर रेंग रहे थे कि  अंजुमन खाला मुस्कुराती खड़ी मिलीं….हमें समझ में नहीं आ रहा था आगे किधर मुडें. ..चलो बच्चियों,मैं चौराहे तक जा रही ।खाला ने नकाब का पर्दा उठाकर मुस्कुराते हुए कहा।शायद वह माजरा समझ चुकी थी़ं।हमने अपना भय समेटा और चुपचाप उनके पीछे हो लिए। वह आगे -आगे हम पीछे -पीछे रेल के डिब्बे की तरह पतली गली में चले जा रहे थे….किनारे के घरों से कुछ औरतें पर्दे की ओट से खाला को टोकतीं….मेरी सलवार कमीज हुई की नहीं बाजी?…..वह चलते हुए कहतीं….हो गया ….किसी को भेज कर मंगा लो। हम लगभग बीस मिनट पर चौक चौराहे पर पहुँचे,जानी पहचानी सड़क देख कर जान में जान आई। खाला को सलाम कर हम अपने अपने घरों को रिक्शे से रवाना हुए।

दुपट्टे रंग गये और रेहाना सना के साथ जाकर ले आई। हमारी हिम्मत पस्त थी गली की घुमावदार तिलस्म के नाम पर। छब्बीस जनवरी का वह रंगारंग कार्यक्रम आज भी याद आता है तो मन रोमांच से भर जाता है जिसमें चार चाँद बाँधनी के  सतरंगी ओढ़नी ने लगाया था। इसी बहाने गली का प्रचार हमारे हिन्दू मुहल्लों तक आया और औरतें कभी पुरानी साड़ियों की रंगाई तो कभी चादरों पर चुनरी डिजाइन रंगाने रंगरेज गली में आने लगीं।
धीरे -धीरे अंजुमन खाला के हुनर का भी प्रचार हुआ और परवीन से ज्यादा भीड़ इधर जुटने लगी। सना मेरी अम्मा के ब्लाऊज़ के कपड़े और नाप धीरे से बस्ते में रख, ले जाती और सिला कर चुपचाप मेरे बस्ते में ला रख देती।अम्मा खाला की सिलाई की ऐसी मुरीद हुई की खाला के जीते जी साथ नहीं छोड़ा।

 देखो-देखो ‘चमईया’ हमार सुतुही                


 इधर परवीन का हाले आलम यह था कि टोना टोटका पीर मज़ार सब छानती फिरती की अंजुमन का धन्धा बैठ जाऐ…..किन्तु जहाँ मेहनत है बरकत होती ही होती है।घर का पिछला हिस्सा पक्का बनावाने का ख्वाब लिए रहमान मियाँ अल्ला को प्यारे हो गये थे….खाला ने पीछे एक नम्बर का पाँच कमरों का मकान बनवाया….बड़ी अक़ीदत से क़ुरानखानी करा सबको दावत दी। परवीन के कलेजे पर डाह की नागिन कुण्डली मारे बैठ गयी ….लगी सबसे कहने”जरुर रहमान कोई तस्करी -वस्करी का धन्धा करता था….इतना रुपया गड़ा था कि मरते कोठी उठ गयी।ज़रुर लाले को धन्धेबाजों ने मारा होगा कहते हुए अफवाहों का बाज़ार गर्म करती। सरपीली रंगरेज गली में गोल -गोल घूमतीं बातें खाला के घर पहुँची….सास बड़ी बहू से जा भिंड़ी ….बूढ़ी सास दरवाजे पर खड़ी हो चिल्ला रही थीं…..तेरे आँख में मिर्च झोंकूं मूईsss,ज़बान में कीड़े पड़ें रेsssss
सोई तो सोई रह जा कि तेरी ज़बान जल जाए हरामी,जो मेरे फरिश्ते से बेटे पर तोहमत लगाती है।


परवीन रसोईं में खाना पका रही थी,कान में सास की आवाज पड़ी तो तमतमाते हुए कलछुल फेंक कर चली…..हाथ लहराते आकर मुँह के पास सट कर खड़ी हो गयी….हाँ क्यों नहीं अम्मी! गालियाँ तो मुझे ही दोगी, धम्म से दरवाजे के चबूतरे पर बैठ गयी,….छाती पीटते हुए…बदुआऐं मेरे हिस्से और रक़म रहमान मियाँ ,हायsssss मेरी तो क़िस्मत फूटी थी जो इस कलमुही को देवरानी बना लाई अल्लाह । हायsssssss
परवीन का हाय तौबा सुन मुहल्ला जुट गया ,लोग खुसुर -फुसुर करने लगेे।सना और सबा दादी को पकड़ कर अन्दर लाईं।खाला मशीन में गर्दन गड़ाए किसी के ब्याह की पियरी में गोटा लगा रहीं थीं ,चुपचाप ,जबकि  सारी आवाजें साफ कानों में पड़ रही थीं। सास चौकी पर बैठ सिसक -सिसक के रो रही थीं ,बेटियाँ भी। खाला एक दम से सिलाई छोड़ सास के सीने से जा लगीं ….औरतों के सामुहिक रुदन से माहौल मातमी हो गया पर अंजुमन खाला की ज़बान नहीं खुली,वही पुरानी रवायत ….एक चुप हजार चुप।

हम इण्टर में पहुँचे,अब तक रंगरेज गली हमारी सबसे प्रिय गली बन चुकी थी,कारण थीं अंजुमन खाला….बस एक नज़र भर देख कर नाप के कपड़े उतार कर रख देतीं। हम इशारे में समझाते कपड़े की डिजाइन और वह चुप देखती रहतीं और लो तैयार हो गया डिजाइनर लिबास। इसी साल सना का निकाह हुआ ,सना की दादी अड़ी हुई थीं बेटी के निकम्मे बेटे से सना के निकाह के लिए ,उम्र में दस साल बड़ा जावेद अव्वल नम्बर का निकम्मा था ।इधर एक साल से आए दिन ननिहाल चला आता और नानी की खिदमत कर चापलूसी बजाता रहता । इसमें भी परवीन की चाल थी,जबसे मकान बना था सीने पर साँप लोट रहा था,एक दिन मौक़ा देख ननद को चढ़ाया कि अंजुमन के पास खज़ाना गड़ा है,इससे पहले की दूसरी बेटियों के शौहर आकर जमें ,बेटे का निकाह कर नकेल डाल लो । ननद माँ के कान भरने लगी….”ज़माना बड़ा खराब है अम्मी, इससे पहले की बिन मर्द के घर में कोई अनहोनी हो सना का ब्याह कर हज कर आओ।

बुजु़र्ग औरत इन दिनों मर्दों सी बेधक अंजुमन को फैसले लेते देख रही थी, उनके लाख मना करने पर भी खाला ने घर के आगे का हिस्सा गिरवा कर एक तरफ दुकान बनवा बाकी हिस्से में चाहरदीवारी उठवा फ़ाटक लगवा दिया था ,जैसा रहमान मियाँ चाहते थे। दुकान काफी बड़ा हो गया था,एक साथ चार मशीनें खड़खड़ाने लगीं थीं…..आगे पर्दा तन गया था।जवान बेटियाँ किताबें पढ़ डिजाइन बनाने लगी थीं। लगन ,तीज ,त्योहारों में सोने की फुर्सत नहीं मिलती।ननद रोज़ दुकान में नोटों से भरा गल्ला देखती और माँ के कान भरती की अंजुमन रुपये गांठ कर उसे बड़ी परवीन के घर भेज देगी….अनपढ़ औरतों को अक़ल ही कितनी होती है….उस रोज़ से जो ज़िद लेकर बैठी ,निकाह करा कर ही चैन लिया। चाँद सी सना ,अन्धेरी रात सा स्याह जावेद,बेचारी रो- रो मरी जा रही थी।हम सब ने खाला को समझाया,गली के सैकड़ों लड़के उसके नाम पर ज़हर खालें,ऐसी दिवानगी।कई की माऐं सुनते दौड़तीं आईं रिश्ता लेकर पर खाला की बेबसी का आलम यह था कि बेटी के सामने मुस्कुरातीं,पीछे दम भर रोतीं,एक बार फिर वह मौन साध गयीं,एक चुप हजार चुप। अन्तत: सना का निकाह जावेद से रोते, गाते हो गया।हम सब उस रात एक फूल सी लड़की की अनचाही शादी के गवाह बने….एक ने तो जावेद से मज़ाक ही मज़ाक में कह भी दिया।लंगूर के हाथ हूर लगी…..।



अभी हाथ की मेंहदी भी नहीं छूटी थी ससुराल में सना की ,कि जावेद उसे ले ससुराल में आ जमा।दिन भर किवाड़ भिड़का कमरे में सोता शाम को सास से बिना पूछे गल्ले से सौ पचास निकाल सैर सपाटे पर चल देता। अंजुमन खाला ने ननद को बुला मशविरा किया और घर के पीछे बड़ा सा हाल बनवा दमाद के लिए लुंगी की बुनाई का पावरलूम बिठवा दिया।न चाहते जावेद को हाथ रोकना पड़ा,अन्दर ही अन्दर सास से चिढ़े रहते और आए दिन सना से मार पीट करते।अगर गलती से दुकान पर सना किसी मर्द से बात कर लेती ,तुरन्त उसके चरित्र पर लांछन लगाने लगते।तीन बरस में सना दो बच्चों की माँ बन गयी।एक बेटा ,एक बेटी।इधर सिलाई करना भी बन्द कर दिया था।चेहरा धीरे- धीरे अपनी रौनक़ खोता जा रहा था। इस बीच हम बी.ए.पास कर एम.ए.में आ गये पर रंगरेज गली का आकर्षण कम नहीं हुआ,कारण थीं अंजुमन खाला।

इस साल सबा का भी निकाह हो गया,इनके मियाँ जावेद से भी आगे निकले ।वलीमे के दूसरे दिन ही ससुराल आ धमके और पूरी रवायत से लूम में अपनी हिस्सेदारी तय कर ली। झगड़ा बढ़ता देख खाला ने लूम में मशीनें बैंक से लोन ले बढ़ा दीं और खट कर भरने लगीं।उनकी मुश्किलों से परवीन के कलेजे को खूब ठण्डक मिलती।दामादों को आए दिन दावत देती और सास को तंग कर रुपये ऐंठने के नुस्खे बताती। इतना सब कुछ चुप सहती खाला के माथे पर कभी सिकन नहीं देखा और सोचती रही कि उन्हें गुस्सा क्यों नहीं आता? मैं सोचती रही और जिन्दगी बढ़ती रही सरपट रेस के घोड़े की तरह । किसी को ठहर कर दो पल फुर्सत नहीं थी सोचने की, कि आखिर क्यों कर अंजुमन इतना ज़ुल्म सहती है बहन का।
                           
एम.ए.अन्तिम साल में पहुँचते मेरी शादी की तलाश में पिता जी ज़मीन आसमान एक करने लगे ,कहीं बात बनती तो लड़की दिखाने का उपक्रम शुरु होता ,और मेरी पैकिंग महंगे गिफ्ट पैकेट की तरह होने लगती। पार्लरवाली ने अम्मा से कहा…..”आंटी जी जब दिखाईएगा पीली जार्जेट की भारी बार्डरवाली साड़ी में दिखाईएगा,साँवली लड़कियों का रंग निखर कर आता है लाईटिंग में।अम्मा परेशान साड़ी की तलाश में दुकान -दुकान भटकती फिर रही थीं कि बाजार में सना से टकरा गयीं ।सना ने हाल चाल पूछा तो परेशानी का सबब जान हँस पड़ी….चच्ची इतनी सी बात पर आप इतनी परेशान हैं,कोई पुरानी बनारसी साड़ी और पीली जार्जेट की प्लेन साड़ी लेकर आईएगा ,फिर देखिएगा जादू।वह कहते हुए हँस रही थी। मेरे पास जादू की छड़ी है…..समझीं। इतना सुनते अम्मा को चैन पड़ा।अगले दिन माता जी बक्से खोल बनारसी साड़ी छांटने लगी। कोई डाल की तो नइहर की तो कोई बिदाई की कह निकालती और रखती।उन साड़ियों के प्रति उसका मोह देखते ही बनता था ,…..समझ सकती हूँ कि कलेजे पर पत्थर रख कर अम्मा ने लाल बनारसी साड़ी निकाली होगी। हम अगले दिन अपनी प्रिय रंगरेज गली में घुसे …..उस तंग गली में जिन्दगी गमकती थी…..घुसते शेख चचा की मिठाई की दुकान जिस पर शहर की सबसे मशहूर कचौड़ी मिलती थी ,हम वापसी में दस बीस ज़रुर लेकर आते,..कढ़ाई में गोल गोल फुल कर नाच रही थी….एक तरफ चूड़िहारिन एक औरत की कलाईयाँ दबा दबा चूड़ियाँ पहना रही थीं,कुछ इन्तजार में बैठी थीं।पूरी गली करघे की खटखट नाद से खटकती ज्यों एकतारे पर जोगी जीवन का श्रमगीत गा रहा हो।बच्चे हाथ में गुल्ली डण्डा लिए कहीं दिखते तो कहीं पजामें का नाड़ा सम्हालते नाक पोंछते गोली खेलते। कुछ छत पर पतंग ले पेंचा लड़ाते,हाँ लड़कियाँ बाहर नहीं दिखतीं इस गली में….छोटी से छोटी लड़की मऊवाली साड़ी के पीछे के तार काटने का काम घर घर करतीं इस लिए।हर हाथ व्यस्त था ,इतना की सर उठे तो बस नमाज़ और घर के दूसरे ज़रुरी काम के लिए….हम चल रहे थे ,लगन के दिन,दुकान पर भीड़ दूर से दिखाई दे रही थी।मैं गेट खोल सीधे घर में घुस गई,सलमा ने भाग कर सना को आवाज दी….बाजी ssss देखो प्रिया बाजी आई हैं । सब्बो ने आगे के बैठक में हमें बिठा दिया और अन्दर चली गई ।सना गोद में अपनी गोल मटोल बेटी को लेकर आई और दादी के पास लेकर गई । दादी क़ुरान में सिर झुकाए बैठी थीं।मैंने धीरे से आदाब कहा तो मुस्कुराकर पोथी बन्द कर माथे से लगा एक तरफ रख दिया।माँ ने नमस्ते किया और हम उनके कहने पर पास की चौकी पर बैठ गये।सना ने साड़ी का पैकेट ले दादी को खोल कर दिखाया …..बनारसी साड़ी को दिखाते हुए …..इसका बार्डर पीली साड़ी पर चढ़ाना है। उन्होंने माँ से पूछा….कब ज़रुरत है? माँ ने कहा अगले शुक तक हर हाल में चाहिए।शनिवार को लड़के वाले आ रहे हैं।वह मुस्कुराकर चुप रह गयीं।माँ का अगला सवाल था…..पैसे…..बात पूरी भी नहीं हुई कि वह डपट पड़ी….बस यही रह गया है,जैसी मेरी सना वैसी ये।ये काम छोड़े तो जमाना हो गया बेटी, मेरी तरफ देख कर, पिरिया की बात है तो कर दूंगी । माँ चुप हो गयी।

सब्बो ट्रे में चाय नाश्ता लेकर आई… माँ ने व्रत का बहाना कर टाल दिया ।मैं खा पीती रही और माँ घूरती रही। आज प्रत्यक्ष को प्रमाण की ज़रुरत नही थी कि मैं उनकी सबसे बड़ी वादाखिलाफ बेटी थी उन दिनों। मेरी टिफिन कभी रसोईं में नहीं जाती थी इस आरोप के साथ कि मियाँ मकुनी सबका खाती खिलाती है।मैं धोती …मैं ही रखती,मजाल की किसी बर्तन से छुला जाए।खैर मैंने इन्हीं लड़कियों से वेज बिरयानी,जर्दा,मूंग चने दाल का हलवा,सेवईं बनाने की विधियाँ सीखीं ,जिसके दम पर ससुराल में बेस्ट बाबर्ची घोषित हुई। साड़ी सना सब्बों संग आकर पहुँचा गयी,माँ ने उसके बच्चों के हाथ पर वापसी में पचास पचास के नोट धर एहसास कराया कि वह भी मेरे घर में अपनों जैसी है ,जैसा उसके घर में मेरा मान था ….मान दिया। माँ का ये बदलाव मुझे उस दिन इतना अच्छा लगा कि सना के जाते मैं लिपट कर उसके गालों को चुमने लगी…..माँ ने मेरे लिए आज धर्म की सकरी गली की थोड़ी सी चौड़ाई बढ़ाई थी …..दिलों की भी।ये हुनरमंद औरतें मेरे देखते देखते धर्म की गलियों से निकर मनुष्यता की सड़क पर मिलने लगीं थीं जिसमें रंगरेज गली की अहम भूमिका थी।



शनिवार को मेरी प्रस्तुति सजा धजा कर सास के सामने सराहनीय रही ।कुछ पार्लर के मेकप का असर तो कुछ शानदार बनारसी साड़ी का कमाल था कि ससुराल की औरतें मुग्ध हो गयीं। शादी तय हुई और एक माह के भीतर मैं भी अपने सपनों के अंखुवाने के दिनों में उस धरती से उखाड़ दी गयी जड़ समेत ,जहाँ अंकुरित हो पौधा बनी थी।खैर जो रवायत है रहेगी ही….इस मुद्दे पर प्रलाप का कोई फायदा नहीं।दिन ऐसे भागने लगे जेसे बचपन में हम जेठ की भरी दोपहरी में पुनपुन बाग में भागते थे। देखते देखते दस साल यूँ बीते जैसे आते जाते मौसम….. मैं मऊ जाती और घर से लौट आती। गली दोस्त मुहल्ले हाट बाज़ार सब छूट गये। एक बस मेरे शहर से जाती और आज़मगढ़ मोड़ पर उतार देती…..वहाँ से सटा घर,वापसी भी वहीं से। अम्मा मेरी बिदाई का ब्लाऊज अंजुमन खाला के यहाँ से सिला कर मंगा देती और उधर जाने का बहाना खत्म।इन दिनों शहर तेजी से बदला था..पैराडाइज सिनेमा हाल बन्द हो चुका था….अली बिल्डिंग में पूरा बाजार समाता जा रहा था….मुन्शीपुरा की औरतों को चौक बाजार जैसे था ही नहीं,…. जैसा हाल,…जब पूरा शहर बाजार लिए घर के मुहाने पर सिमट गया हो ,भला रंगरेज गली को कौन पूछे। मैं भी अपनी दुनिया में रमती बसती बढ़ रही थी…कि इकलौते भाई की शादी पड़ी।पहली बार शादी के बाद मैं शहर के भूले बिसरे दुकानों पर माँ और बहन के साथ युद्धस्तर पर खरिद्दारी करने में मशगूल थी….अली बिल्डि़ग में भाभी की डाल की साड़ियों की मैचिंग चूड़ियाँ ढूढते हम दुकान दुकान घूम रहे थे कि एक दुकान से कुछ पहचानी सी आवाज आई…..प्रिया बाजीsss
मैंने पलट कर देखा….सामने इण्टर में पढ़नेवाली सना सी सक्लो सूरत की लड़की हाथ हिला कर बुला रही थी…..मैं नज़दिक पहुँची…..तुम सलमा हो न?…लड़की चहक उठी… बाजी!….आप तो ईद का चाँद हो गयीं।… दुकान में खासी भीड़ थी,एक इकहरे बदन का लड़का औरतों को रैक से मैचिंग चुड़ियाँ निकाल कर दिखा रहा था।मैं चौंकी….उसे गौर से देखते हुए सलमा से पूछा…ये असलम है न?…वह लजा गयी। चेहरे पर लाज की लाली समेटे शिकायत किया,क्या बाजी ,अपनी दुकान छोड़ यहाँ वहाँ घूम रही हैं…हाथ से साड़ियों का पैकेट झट ले एक लड़के को पकड़ा कर कहा…सबसे बढ़ियाँ मैचिंग लगा …और दूसरे को हमारे मना करने के बाद भी चाय के लिया दौड़ा दिया।नन्हीं सलमा हमारे सामने कुशल दुकानदार बन गयी थी। सिर का  दुपट्टा बार बार ठीक करती और ग्राहकों से रस मिसरी घोल बतियाती सलमा को देख सना अनायास याद आ जाती,वह अपना काम करते करते पूरे घर का हाल बताती रही और मैं आदतन मुस्कुराती चुप सुनती रही।असलम मियाँ ने बड़ी सुघड़ता से चूड़ियों के सेट तैयार कर सामने रख सलमा से मुस्कुराकर कहा….हिसाब ढ़ंग से लगाना,..सलमा भी उसी अदा से बोली…लो जी,बाजी मेरी हैं की आप की?


हिसाब की पर्ची देख माँ और बहन खुश हो गयीं।चूड़ियाँ बाजार भाव से काफी सस्ती थीं।चलते वक्त उसने वादा लिया ,घर जरुर आइएगा।मैं खुश थी आज ,….इस लिए नहीं की चूड़ियाँ सस्ती मिलीं थीं,बल्कि खुशी कारण सलमा और असलम की प्यारी जोड़ी थी।बातों ही बातों में उसने अपनी शादी की कहानी भी बता ड़ाली….बाजी इनकी अम्मी तो सुनते सदमें में आ गयी कि असलम मुझसे निकाह करना चाहते हैं।खूब कुहराम मचा और अन्त में सना बाजी के समझाने बुझाने पर ना जाने कैसे मान गयीं।मैं उस भोली लड़की की मासूम कहानी सुनती रही और समझती भी कि परवीन खाला जरुर इस तरह भी अंजुमन खाला को नीचा दिखाना चाहती रही होंगी।

उनकी निगाह पहले से उनकी जगह ज़मीन पर थी और भोली लड़की उनके बनावटी विरोध को सच समझ बैठी होगी। खैर जो हुआ ,अच्छा हुआ था….सलमा खुश दिखी थी,जिस खुशी से सना और सबा को महरुम रहना पड़ा था सलमा के चेहरे पर सहज था।औरत जीवन में एक अदद मोहब्बत ही तो चाहती है मर्द से,बदले में उसके लिए खुशी खुशी कुर्बान हो जाती है। मैं उन लड़कियों और अंजुमन खाला में उलझी जाकर छत पर एकान्त पा चारपाई पर लेट गयी।नीचे शादी के घर की चहल पहल जारी थी।मैं लौट रही थी रंगरेज गली की स्मृतियों में….एक सुनहरा शहर फड़फड़ाकर पंख फैला उड़ रहा था…..अजान और आरती की एक साथ गूंजती आवाजों वाला शहर मऊ…..मऊवाली साड़ी….वनदेवी का विशाल नौरात्रों का मेला….मालिकताहिर बाबा की मजार से सटा मुख्य चौक बाजार और करघे की खटखट धुन पर थिरकती कर्मनिष्ठ उंगलियों का लय में नर्तन एक एक कर चलचित्र की तरह उभरने लगा।राग/विराग की गहरी खूंट यहीं कहीं गड़ी है आज भी मेरी,जिसके सहारे  चलती है  मेरी जिन्दगी …..एक टूटे सितार सी पड़ी स्मृतियों की डायरी में दर्ज यौवन के संगीतमय दिन की तलाश और बिखरे सपनों को समेटने की धुन रह गयी आज भी मन के किसी कोने में शेष….।
नीचे औरतें ब्याह का गीत गा रही थीं…..
बन पइठी खोजिहा ए बाबा चन्दन हो लकड़िया
देश पइठी खोजिहा ए बाबा पढ़ल हो पंड़ितवा………
अचानक आँगन में से माँ की आवाज गूंजी…प्रियाsssssssss


मन भारी था….थकान से नींद भी आ रही थी। मैं बेमन से नीचे लौटी…माँ अपने कमरे में पलंग पर अपनी बिदाई की पीली बनारसी खोले सिर पर हाथ रखे दुखी बैठी थी। जाते ही…..ये देख प्रिया ,ड्राई क्लीन कराते खिसक गयी….वह रुआंसी थी। माँ इकलौते बेटे के परछन पर वही पहनना चाहती थी …..चालीस साल पुरानी साड़ी के रेशम के तन्तु कट गये थे।मैं चुप खड़ी देख रही थी कि माँ का फरमान जारी हुआ….कल अंजुमन बी के घर लेकर जाओ और उसी तरह दूसरी साड़ी पर आँचल बार्डर चढ़वा कर लाओ जैसा तुम्हें दिखाते समय बनवाया था। बारात तीन दिन बाद उठनी थी….मैंने लम्बी साँस छोड़ते हुए धीरे से कहा….उनकी सास तो कबकी मर खप गयीं,अब कौन करेगा?….साड़ी के प्रति गजब का मोह था माँ को,तन कर बैठ गयीं….मैं कुछ नहीं जानती,…..कल तुम लोग रंगरेज गली जाओ ….जरुर कोई मिलेगा।

अगले दिन समझा बूझा कर हम थक हार गये….माँ अड़ी रही।मैं छोटी बहन के साथ अन्तत:  बारह साल बाद रंगरेज गली में घुसी….कदम रखते पहले तो मुझे लगा कि हम किसी और गली में जा रहे हैं पर ध्यान देने पर पाया कि नुक्कड़ की शेख चचा की कचौड़ी की दुकान शेख स्वीट्स हाऊस में बदल गयी है। अगर आगे काउंटर पर बूढ़े शेख चचा न होते तो हम पहचान भी न पाते कि ये उनकी दुकान है।दुकान बहुत बड़ी थी….शायद घर का नीचे का पूरा हिस्सा तोड़ कर दुकान में उनके बेटों ने बदल दिया था।हाँ आगे की तरफ कढ़ाई में तैरती नाचती कचौड़ियों की पुरानी खुशबू जरुर आ रही थी।मैं दम साधे खड़ी थी कि बहन ने तन्द्रा तोड़ा….क्या देख रही है?…जल्दी चलिए।


गली पहले से चौड़ी हो गयी थी….दोनों तरफ के मकान ,दुकान में बदल गये थे। अच्छा खासा बाजार में बदल गया था रंगरेज गली। हम आगे बढ़ रहे थे ….न भट्ठियाँ दिख रही थीं न रंगों के रंगीन हण्डे। जिस गली में करघे की खटखट पूरे दिन सुनाई देती थी वहाँ आज कोई आवाज थी तो फिल्मी गीतों की ,….हम चले जा रहे थे,सामने रहमान टेलर का बोर्ड देख कदम ठिठके और हम यन्त्रवत गेट खोल घर में दाखिल हो गये।
जाज़िम
घर के बाहरी हिस्से में गहन सन्नाटा पसरा था..दरवाजे पर दस्तक दे हम खड़े हो गये….अन्दर से तेज आवाज आई….आती हूँsssss,दरवाजा खोलने वाली बड़बड़ा रही थी,दरवाजा खोलने की ड्यूटी केवल मेरी है….सबको सीढ़ियाँ उतरने नानी याद आती है।कमर टेढ़ी होती है…मैं नौकरानी हूँ क्या सबकी?…..दरवाजा खोलते प्रश्न दाग वह बिना हमारी सूरत देखे मुड़ गयी और दनदनाती सीढ़ियाँ चढ़ती वापस चली गयी। अन्दर एक बड़े से बरामदे में हम खड़े हो सोचने लगे क्या करें ?बरामदे के दोनों कोने से सीढ़ी ऊपर के तल्ले पर गयी थीं।शायद मकान चार हिस्से में बंट गया था ।दो बहने नीचे,दो ऊपर की कल्पना में उलझी सोच विचार रही थी कि सामने की खिड़की से एक नेह भरी लरजती आवाज कानों में पड़ी …..अरेsss! पिरिया…..और सामने का दरवाजा खटाक से खुला।सफेद झक्क सलवार कुर्ते में सामने अंजुमन खाला मुस्कुराते खड़ी थीं ,जैसे कह रही हों कि अब रंगरेज गली की संवेदनाऐं सुफैद हो गयी हैं बच्ची। ……हमें इशारे से बुलाकर अन्दर ले गयीं…. चौकी पर बिठा आवाज लगाई…..सनाss । बगल के कमरे से पर्दा सरका एक दुबली पतली बीमार बेवा सामने आ खड़ी हो गयी…मैं आवाक उसे ताकती एसी चकराई की कमरा आँखों के सामने नाचने लगा। सना धीरे से कुर्सी खींच आ कर हमारे सामने बैठ सुबकने लगी….मैं रोती रही….उफ्फ! ये सेमल की रुई सी सुकोमल लड़की क्या से क्या हो गयी ,सनाsss



वह उठ कर मुझसे लिपट गयी …हम फूट पड़े...जैसे तपती धरती की दरारें स्याह बादलों की प्रतीक्षा में हूकती हैं ,सना को सौहर के लिए हूकते देख मैं तड़प उठी।सना के तीनों बच्चे आकर माँ से लिपट गये। दोनों बेटियों के बीच में बेटा , घर का मर्द,…..एक ना समझ दस साल का बच्चा अपनी माँ से लिपटा पूरी तरह दिलाशा दिला रहा था कि वह सब सम्हाल लेगा। खाला ने बताया…गलत संगत ने जावेद को असमय मौत के मुँह में ढ़केल दिया। वह पछतावे की आग में गीली लकड़ी सी सुलग रही थीं कि क्यों कर सास की बात मान सना को जावेद से ब्याहा।खैर जो होना था सो हो चुका था….घर की फूट साफ झलक रही थी….बेवा माँ बेटी एक बार फिर नए संघर्ष पथ पर थीं।हमने ढ़ाढ़स बँधा आने का कारण बताया ….अंजुमन खाला ने भारी मन से मुस्कुराने की कोशिश की….अम्मी जाते -जाते अपना हुनर और करघा सना को सौंप गयीं पिरिया!…आज कल इसी से घर चल रहा है। लोग खोजते हुए आते हैं इधर ,नम आँखो में बची अन्तिम उम्मीद की ड़ोर थामें अंजुमन खाला हमें अन्दर के कमरे में लेकर आईं ।मेज पर साड़ी फैलाकर देखा और हँस कर कहा …गोटे को छोड़ सब झर गयी है।मैं आदतन मुस्कुराकर रह गयी। छोटी ने पूछा ….परसों तक हो जाएगी न खाला? कल आकर ले जाना …उन्होंने पीठ ठोंकते हुए कहा।तुम्हारी माँ हमेसा घोड़े पर चढ़ कर काम भेजती है।हम सब हँस पड़े।सना की बेटियों ने बड़े प्यार से चाय नाश्ता कराया।अन्दर बनारसी साढ़ियों का ढ़ेर देख कर शूूकुन मिला कि चलो रोटी की किल्लत नहीं है खाला और सना को। हम घर लौटने लगे तो बच्चियों ने दुबारा आने का प्यार भरा न्योता दिया ।मैंने तीनों के हाथ पर पचास पचास की नोट रख टॉफी खाने का आग्रह किया और सना नाराजगी जताती रही कि यह सब क्यों कर रही हो ?खाला एक बार फिर रो पड़ी ….इन तीनों को खाला का मतलब तो आज पता चला है पिरिया ….वरना अपनी पेटजात तो चवन्नी ईदी तक हाथ पर नहीं रखतीं।सना चुप थी।हम फाटक से बाहर निकले तो ऊपर देखा ….चहल पहल थी ….रौनक भी।नीचे मातमी सन्नाटा ।खाला मौन …..सना भी ।मैं एक बार फिर सोच में पड़ गयी कि इतना सब कुछ बिखर गया और खाला ने किसी को कुछ भी बुरा नहीं कहा ,बदले में खुद को कोशती रहीं।आखिर उन्हें गुस्सा क्यों नहीं आता? सोचते चली जा रही मैं बिजली के खम्भे से टकराते टकराते बची,…..छोटी मेरी आदत जानंती थी।भनभनाते रिक्शा रोक मुझे हाथ पकड़ बिठाया और पूरे राश्ते फालतू बातें न सोचने की नसिहत देती रही।

एक दिन बाद मैं भाई संग बाईक से सना के घर साड़ी लेने पहुँची। आज उसकी छोटी बेटी खिलखिलाती हुई दौड़ कर मुझे देखते आई और हाथ पकड़ कर अन्दर ले चली….भाई ने पहले ही हड़का दिया था कि बैठना मत ,शादी का घर है। अन्दर पहले से साड़ी तैयार लिफाफे में पड़ी थी।सना ने मुस्कुराकर लिफाफा बढ़ा दिया । खाला भी सूचना पा बाहर निकलीं …मैंने पाँच सौ की नोट बाजार भाव को ध्यान में रख खाला की तरफ बढ़ा दिया। खाला नाराज हो गयीं…दिमाग खराब है क्या तुम्हारा….जैसी सना वैसी तू मेरे लिए…पैसे  से तौलने लगी,हाथ थाम लिया और पैसे लौटा कर नम आँखों से देखती रहीं….नमी इतनी गहरी थी कि मैं डूबने लगी….सना भी नाराज हो रही थी।बाजार अपने चरम पर ,..रिश्ते रेडीमेट लिफाफों में सजे धजे जब बिक रहे हों पैसे के नाम पर ,खाला का प्रेम पाकिजगी की हद तक मुझे भींगोए लिए जा रहा था।मैं खाला के जीवन संघर्ष और हौसले की गवाह एक बार फिर सना के साथ उसी चौराहे पर उन्हें खड़ी देख रही थी ,जहाँ बरसों पहले  मिली थी । मैं खाला को पकड़ कर रो पड़ी।भाई बाहर बाईक पर बैठा बार -बार हार्न बजाए जा रहा था।शादी में आने का न्यौता दे मैं सना की छोटी बेटी के हाथ पर पाँच सौ की नोट रख चलने लगी…पैसे देते देख ऊपर से दनदनाती सब्बो उतरती हुई आई ….मैं बढ़ रही थी,कानों में सब्बो की आवाज साफ सुनाई दे रही थी….जो मिले सबकी रहमत इन्हीं के बाल बच्चों की है…हम तो जैसे शौतेले हैं आपके….ठूसों तुम्हीं लोग इनकी कमाईsssssssss
पीछे एक बार फिर मैं एक परवीन और अंजुमन की कहानी नए सिरे से उभरती छोड़े जा रही थी।मन में आज भी द्वन्द शेष था कि अंजुमन खाला को गुस्सा क्यों नहीं आता?

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कोई अपना और अन्य कविताएँ

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प्रिया


कोई अपना

सुबह के पाँच बजे होंगे शायद
एक हाथ उठा
और शरीर पर रेंगने लगा
पहले छातियों और पेट से होता हुआ
नीचे तक पहुंचा…
अचानक नींद से जागी

स्वप्न नहीं था यह
हडबड़ाई
सिसकी
और दहाड़ मार कर रोई
अपने ही अंतर्मन में
चीखना चिल्लाना तो दूर
कुछ कर भी ना सकी
क्योंकि जब देखा वो हाथ किसका है?
तो……
कोई बहुत अपना
लेटा हुआ था पास में.

कठपुतलियों ने उड़ना सीख लिया है

एक स्त्री हूँ मैं
माँ, बहन, बेटी, पत्नी
बस यही है मेरी नियति !
इससे ज्यादा ना सोचा गया
और न ही समझा गया
और सोचा भी गया
तो सिर्फ इतना
कि बस एक कठपुतली हूँ…..
पिता, भाई, पति और बेटे की
एक कठपुतली
ना मुझे बैठने दिया
और ना ही चलने दिया
पंख लगा के उड़ना
तो बस स्वप्न ही था
पर कब तक ठहरना था…..
हां हूँ मैं एक स्त्री
अब मैंने उड़ना सीख लिया है
शुरू शुरू में
डर लगता था
पंख फैलाने से
काट दिए थे उन्होंने
हमारी सोच में ही पंखों को
पर जब पहली बार कोशिश की
तो फड़फड़ाकर ही रह गयी
जो छोटे छोटे पंख
तैयार किये थे मैंने
उन्हें कुतर दिया गया था
हर बार
बड़ी निर्ममता से
तमाम कोशिशों के बावजूद
कुतर दिए जाते मेरे पंख
पर हार मानना
कब सीखा है
चिड़िया ने
उड़ना ही था एक दिन
पंख फैलाकर
सारे बन्धनों को तोड़
स्पर्श करनी थी
खुले आकाश की

स्वच्छ और स्वतंत्र हवा
देखना था
सम्पूर्ण संसार को
उस उंचाई पर जाकर
जहाँ अनंत आकाश
हमारे सामने हो
जहाँ सब कुछ बहुत खुला,
बहुत साफ़,
सुन्दर
और स्वतंत्र नजर आता है |


एक लड़की के लिए प्रेम के मायने

प्रेम
क्या है?
स्वतंत्रता……
क्यों चाहिए?
जीने के लिए !
जीना क्यों है?
प्रेम करने के लिए…..
प्रेम क्यों करना है?
स्वतंत्रता के लिए…..
स्वतंत्रता क्यों चाहिए?
जीने के लिए……….

परिचय : शोधार्थी(पी-एच.डी.), हिंदी विभाग, गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय
संपर्क : ई.मेल-mailtourmipriya@gmail.com

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बलात्कार पीड़िताओं पर मुकदमे वापस लेने का दवाब बनाती है पुलिस: रिपोर्ट

स्मिता शर्मा


पिछले दिनों मध्यप्रदेश  में पुलिस महकमे में कार्यरत दम्पति की बेटी के साथ बलात्कार की शिकायत दर्ज करने के मामले में खुद पुलिस जितनी असंवेदनशील दिखी वह सिर्फ एक घटना की हकीकत नहीं है बल्कि यह भारतीय समाज की हकीकत से बना सामान्य व्यवहार है. यौन हिंसा की शिकार उत्तरजीवियों के साथ पुलिस, क़ानून, चिकित्सा और समाज के व्यवहार को लेकर ह्यूमन राइट्स वाच का एक अधययन सामने आया है. 


सारांश: 


मई 2017 में हरियाणा राज्य के रोहतक जिले में एक 23 वर्षीय महिला की हत्या कर दी गई.  पीड़िता का शव दो लोगों द्वारा उनके कथित अपहरण के चार दिन बाद मिला, जिन्होंने उनके साथ बलात्कार किया, सिर ईंट से कुचल दिया और उसके बाद शरीर पर कार चढ़ा दी. शव परीक्षण से पता चला कि अंदरूनी चोटें नृशंस और क्रूर यौन उत्पीड़न का नतीज़ा थीं.


पीड़िता के परिवार ने आरोप लगाया कि घटना से एक महीने पहले उन्होंने मुख्य आरोपी के नाम का जिक्र करते हुए  पुलिस को शिकायत की थी. आरोपी शादी करने से इंकार करने के कारण पीड़िता को परेशान कर रहा था. परिवार के सदस्यों ने कहा कि पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की.


दिसंबर 2012 में दिल्ली में एक युवा छात्रा के सामूहिक बलात्कार और मौत के पांच साल बाद, जिसने कानूनी और अन्य सुधारों की राह दिखाई, भारत में यौन हिंसा और बलात्कार की उत्तरजीवी लड़कियों और महिलाओं को न्याय और स्वास्थ्य देखभाल, परामर्श और कानूनी सहायता जैसी सहायता सेवाएं पाने में भारी बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है. अप्रैल 2013 में, भारतीय संसद ने सर्वसम्मति से कानून में संशोधन किया, महिलाओं और लड़कियों के विरुद्ध हिंसा से सम्बंधित अपराधों की नई श्रेणियों को शामिल किया और सजा को और अधिक कठोर बना दिया. विधेयक पारित होने के बाद तत्कालीन गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा था, “भारत में ऐसा कानून पहली बार अस्तित्व में आया है और संसद ने इसकी मंजूरी दी है. यह देश में क्रांति का आगाज़ करेगा.”

हालांकि सकारात्मक कदम उठाए गए हैं, जिसमें भारतीय राजनेताओं और अधिकारियों की महती  राजनीतिक इच्छाशक्ति का संकेत दिखाई देता है, मगर जिन परिवर्तनों का वादा किया गया था वे हकीकत से बहुत दूर रह गए हैं. मई 2017 के रोहतक मामले में, पुलिस ने यह दावा करते हुए अपना बचाव किया कि परिवार ने केवल मौखिक शिकायत की थी और बाद में इसे वापस ले लिया. इस बलात्कार और हत्या पर सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन के बाद ही राज्य सरकार ने मामला निपटाने में लापरवाही के लिए दो पुलिस अधिकारियों को निलंबित और एक अन्य को स्थानांतरित कर दिया. ह्यूमन राइट्स वॉच ने यह भी पाया कि भारत में महिलाओं और लड़कियों को अक्सर कलंकित होने के डर के कारण हमलों की रिपोर्ट दर्ज कराने से डर लगता है, और क्योंकि पीड़ितों या गवाहों को कोई सुरक्षा प्रदान नहीं करनेवाली आपराधिक न्याय प्रणाली में वे संस्थागत बाधाओं को पार करने में असमर्थ महसूस करती हैं.

यौन उत्पीड़न के शिकार वे सब: वे कोई भी हैं, वे जिन्हें हम जानते हैं



यौन हिंसा और बलात्कार की उत्तरजीवियों, विशेषकर हाशिए के समुदायों के लोग, पुलिस में शिकायतें दर्ज कराना मुश्किल पाते हैं. वे अक्सर पुलिस थानों और अस्पतालों में अपमान का सामना करते हैं, उन्हें अब भी चिकित्सा पेशेवरों द्वारा अपमानजनक परीक्षणों के लिए मजबूर किया जाता है, और जब मामला अदालत पहुँचता है तो उन्हें उन्हें डर लगता है. मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में स्कूल ऑफ जेंडर स्टडीज की अंजली दवे ने कहा, “बलात्कार को अब भी महिलाओं की शर्मिंदगी के बतौर पेश किया जाता है और इसपर बात करने में महिलाओं के सामने कई सामाजिक बाधाएं खड़ी रहती हैं.”


भारत में अब लैंगिक हिंसा से निपटने के लिए कई कानून हैं जैसे कि आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013, यौन अपराधों से बाल सुरक्षा अधिनियम, और अगर पीड़ित दलित (पूर्व में “अस्पृश्य”) या आदिवासी समुदाय से हैं तो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम. समय के साथ कानूनी बदलाव प्रभावी हुए और 2015 (सबसे हालिया साल जिसके लिए आंकड़े उपलब्ध है) के अंत तक पुलिस के पास दर्ज हुए बलात्कार की शिकायतों की संख्या में 39 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई. 2012 में 24,923 मामलों के मुकाबले 2015 में 34,651 मामले दर्ज हुए. यह संभवतः अपने मामलों को अदालत तक ले जाने की उत्तरजीवियों की बढ़ती तत्परता को दिखाता है.


हालांकि, ह्यूमन राइट्स वॉच का अध्ययन यौन हिंसा के शिकार लोगों को न्याय दिलाने के उद्देश्य से बने कानूनों, प्रासंगिक नीतियों और दिशानिर्देशों को लागू करने में लगातार सामने आ रही कमियों को सामने रखता है. इस रिपोर्ट में 21 मामलों में- जिनमें 10 में घटना के समय लड़कियों की उम्र 18 साल से कम थी- गहन शोध, भारतीय संगठनों के शोध और ह्यूमन राइट्स वॉच द्वारा पीडितों, उनके परिवार के सदस्यों, अधिवक्ताओं, नागरिक समाज कार्यकर्ताओं, वकालत करनेवालों, डॉक्टरों, फॉरेंसिक विशेषज्ञों और सरकारी व पुलिस अधिकारियों के 65 साक्षात्कारों का इस्तेमाल करते हुए समस्या की व्यापकता का वर्णन किया गया है. साथ ही इस रिपोर्ट में पीड़ितों, उनके परिवार के सदस्यों, वकीलों, नागरिक समाज कार्यकर्ताओं, अधिवक्ताओं, डॉक्टरों, फॉरेंसिक विशेषज्ञों और सरकारी व पुलिस अधिकारियों से ह्यूमन राइट्स वॉच द्वारा किए गए 65 से अधिक साक्षात्कार शामिल हैं. रिपोर्ट में इन मामलों का इस्तेमाल करते हुए विस्तृत सिफारिश की गई है कि किसप्रकार अधिकारी यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि आपराधिक न्याय प्रणाली में पीड़ितों और उनके परिवारों से संवेदनशीलता, गरिमा के साथ और बिना भेदभाव के व्यवहार हो.

अपर्याप्त पुलिस कार्रवाई


भारतीय कानून में यह प्रावधान है कि यौन उत्पीड़न या यौन उत्पीड़न के प्रयास के मामलों में,  प्रशिक्षित महिला पुलिस अधिकारी उत्तरजीवी की गवाही दर्ज करे, उसके बयान का वीडियो टेप तैयार करे और यथाशीघ्र न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान दर्ज कराए. आपराधिक दंड संहिता में 2013 हुए संशोधनों ने पुलिस अधिकारियों द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकायतें दर्ज करना अनिवार्य बना दिया है, जो ऐसा करने में विफल रहते हैं उन्हें दो साल तक जेल की सजा हो सकती है.


ह्यूमन राइट्स वॉच ने पाया कि पुलिस हमेशा इन नियमों का पालन नहीं करती है. वे प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज करने में बाधा डालते हैं, जबकि पुलिस जांच शुरू करने के लिए यह पहला कदम है, खासकर यदि पीड़िता आर्थिक या सामाजिक रूप से हाशिए वाले समुदाय से आती हो. पुलिस जब-तब पीड़िता के परिवार पर “मामला निपटाने” या “समझौता” करने का दबाव डालती है, खासकर यदि अपराधी शक्तिशाली समुदाय का हो.


उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश राज्य के ललितपुर जिले में 22 वर्षीय बरखा और उसके पति पर 30 जनवरी, 2016 को उनके घर पर आधी रात के करीब उनके गांव के तीन लोगों ने हमला किया, पुलिस ने इसकी शिकायत दर्ज करने से इनकार कर दिया. बरखा ने कहा कि दो लोगों ने उसके पति को पीटा और उन्हें उठा कर ले गए और तीसरा, जो एक प्रभावशाली जाति से आता है,  ने उसके साथ बलात्कार किया, उसे जातिसूचक गलियां दीं और पुलिस के पास जाने पर उसे  जान से मारने की धमकी दी. बरखा बताती है कि पुलिस कार्रवाई करने में अनिच्छुक रही क्योंकि मुख्य आरोपी सत्तारूढ़ राजनीतिक दल का स्थानीय नेता था. आखिरकार, जब 2 मार्च को बरखा अदालत पहुंची तो अदालत ने पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने और उचित कार्रवाई करने का आदेश दिया. हालांकि, एफआईआर दर्ज करने के लिए पुलिस ने और आठ महीने का समय लिया. इस बीच, बरखा और उसके पति को आरोपी और गांव के अन्य लोगों से लगातार मिल रही धमकियों और उत्पीड़न के बाद गांव से पलायन कर सैकड़ों मील दूर चले जाना पड़ा. बरखा कहती है कि उसने न्याय की आस छोड़ दी है:
हम इस तरह कब तक भागते रहेंगे? हम अपना परिवार, घर और गांव देखने में सक्षम नहीं हैं? पूरा परिवार बिखर गया है. पुलिस मामले की जांच नहीं करना चाहती. हम गांव में नहीं रह पाए क्योंकि वे [आरोपी] हमें मारने के लिए तैयार बैठे हैं और पुलिस ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है. हम गांव के मुखिया के पास भी गए लेकिन उन्होंने भी हमारी नहीं सुनी. हमारा कोई नहीं है.

विवाह नाबालिग लड़की से बलात्कार का लाइसेंस नहीं है

हालाँकि 2013 का संशोधन पुलिस द्वारा बलात्कार की शिकायत दर्ज करने में विफलता को अपराध करार देता है, लेकिन बरखा का मामला दर्ज करने से इनकार करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक दंड संहिता की धारा 66ए के तहत कोई कार्रवाई नहीं की गई. मजिस्ट्रेट भी पुलिस को जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मामला दायर करने का निर्देश देने में नाकाम रहे.


एक दूसरे मामले में, पुलिस ने बलात्कार की एक उत्तरजीवी और उसके पिता को अपने बयानों को बदलने के लिए कथित रूप से मनमाने ढंग से हिरासत में रखा, मारा- पीटा और धमकी दी. 23 वर्षीय काजल द्वारा 14 सितंबर, 2015 को सामूहिक बलात्कार की शिकायत दर्ज कराने के बाद मध्य प्रदेश राज्य की पुलिस ने उसे एफआईआर की प्रति देने से इनकार कर दिया और अगले दिन वापस आने के लिए कहा ताकि मजिस्ट्रेट के समक्ष उसका बयान दर्ज कराया जा सके. काजल ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया कि जब वे पुलिस स्टेशन पहुंचे, तो पुलिस ने उसके पिता को हवालात में डाल दिया और उसे अदालत से यह कहने के लिए कहा कि अपने पिता के कहने पर उसने बलात्कार की झूठी शिकायत दायर की थी. काजल ने कहा कि पुलिस ने कई सादे पन्नों पर उससे हस्ताक्षर भी कराए, उसे थप्पड़ मारा और डंडे से पिटाई की. पुलिस ने कथित तौर पर काजल के पिता को धमकी दी थी कि अगर उन्होंने इस बयान पर हस्ताक्षर नहीं किया कि उनकी बेटी ने झूठी शिकायत दर्ज की तो उन्हें  झूठे आरोपों में गिरफ्तार कर लिया जाएगा. काजल ने बताया कि डर से उसने अदालत में झूठा बयान दिया. पुलिस ने दिसंबर 2015 में एक अंतिम जांच रिपोर्ट दायर की, जिसमें कहा गया कि काजल और उसके पिता ने मुख्य आरोपी के साथ जमीन विवाद के कारण झूठा मामला दायर किया. इसके बाद, काजल ने धमकी का जिक्र करते हुए एक अपील दायर की.

2013 के आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम में यौन अपराधों की परिभाषा का विस्तार करके ताक-झांक और पीछा करने जैसे नए अपराधों को शामिल कर लिया गया. हालांकि, 2014 में कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव द्वारा दिल्ली और मुंबई में किये अध्ययन से पता चलता है कि पुलिस के पास ऐसे अपराध बहुत कम दर्ज कराए जाते हैं और यहां तक कि जहां रिपोर्ट दर्ज भी की गई है, वहां भी ऐसे मामलों में पुलिस अक्सर एफआईआर दर्ज करने या इन अपराधों की ठीक से जांच करने में नाकाम रही है. कई माता-पिता ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया कि पुलिस शिकायत दर्ज करने के बाद उन्हें अपनी बेटियों की सुरक्षा की चिंता थी क्योंकि आरोपी को जमानत मिल गई और फिर उसने लड़कियों को धमकी दी. अक्सर, लड़कियां  घर से बाहर की अपनी गतिविधियों पर खुद रोक लगा लेती हैं या माता-पिता उनकी  गतिविधियों पर और ज्यादा प्रतिबंध लगा देते हैं.


अक्टूबर 2016 में, 16 वर्षीय मीना ने उत्तर प्रदेश राज्य के झांसी के एक गांव में उस पर हमला करने वाले तीन लोगों के खिलाफ पुलिस शिकायत दर्ज कराई, आरोपियों के परिवार ने मीना के परिवार को जान से मारने की धमकी देना शुरू कर दिया. मीना के माता-पिता ने सुरक्षा मांगते हुए पुलिस से अपील की. उन्होंने पुलिस अधीक्षक से भी गुहार लगाई. लेकिन पुलिस धमकी पर कोई कार्रवाई करने में विफल रही है और अभी तक मामला दर्ज नहीं किया है. इस बीच, मीना के माता-पिता उसकी सुरक्षा को लेकर इतने चिंतित हैं कि वे उसे घर से बाहर नहीं निकलने देते हैं, यहां तक कि स्कूल भी नहीं जाने देते हैं. उसकी मां ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया: हमने अपनी बेटी की पढ़ाई रोक दी क्योंकि हमले के बाद हम उसे स्कूल भेजने से डर गए थे. यदि अभियुक्त जेल में हों, तो हमें उसे स्कूल में भेजने में डर नहीं लगेगा. लेकिन तब तक, हमें उसे अपने साथ सुरक्षित रखना होगा. हमने इस घटना की रिपोर्ट दर्ज कराई थी लेकिन अब हम अपना सम्मान खो चुके हैं.

कई उत्तर भारतीय राज्यों, जैसे हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पंजाब और राजस्थान में अनधिकृत ग्रामीण जातीय परिषद, जिसे खाप पंचायत कहा जाता है, यदि अभियुक्त प्रभावशाली जाति का हो, तो  दलित या अन्य तथाकथित “निम्न जाति” के परिवारों पर आपराधिक मामला आगे नहीं बढ़ाने का दवाब डालते हैं. स्थानीय राजनेता और पुलिस अक्सर इन पंचायतों के फरमानों से सहानुभूति रखते हैं या उनसे आँखें मूँद लेते हैं, इस तरह वे अप्रत्यक्ष तौर पर हिंसा का समर्थन करते हैं. भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अप्रैल 2011 में उनके कार्यों को “पूर्णतः अवैध” करार दिए जाने के बावजूद ऐसा हो रहा है. हरियाणा के सभी जाट जातीय परिषदों के शक्तिशाली छतरी संगठन सर्व खाप पंचायत के प्रवक्ता  सूबे सिंह समैन ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया कि बलात्कार के विरुद्ध बने कानूनों का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग किया जा रहा है: “एक आदमी बिना सहमति के कभी महिला का बलात्कार नहीं कर सकता है. कभी-कभी सहमति से बने संबंध में चीजें बिगड़ जाती हैं और फिर उसे बलात्कार का नाम दे दिया जाता है.”


देश में रेप कल्चर- एक हकीकत


हरियाणा की 30 वर्षीय दलित कल्पना ने 10 मार्च, 2015 को एफआईआर दर्ज करायी कि  प्रभुत्वशाली जाट जाति के छह लोगों ने उसका सामूहिक बलात्कार किया. 28 मार्च को पुलिस ने अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत बलात्कार सहित अपहरण और हमले का आरोप दर्ज किया. हालांकि, फॉरेंसिक नतीजों के इंतजार में सुनवाई में देर हुई जो कि अपर्याप्त फॉरेंसिक प्रयोगशाला के कारण होने वाली आम समस्या है. कल्पना के परिवार ने कहा कि उन्हें खाप पंचायत द्वारा परेशान किया जाने लगा और धमकी दी जाने लगी. कल्पना अंततः अदालत में प्रतिपक्षी गवाह बन गई और सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया गया. वह और उसका परिवार गांव छोड़कर चले गए.



पर्याप्त स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ करने में विफलता


भारत में डॉक्टर कानूनी तौर पर ऐसी महिलाओं और लड़कियों को प्राथमिक उपचार या चिकित्सीय इलाज़ मुहैया कराने के लिए बाध्य हैं, जो उनसे संपर्क करते हैं और बलात्कार की बात जाहिर करते हैं. मेडिकल जांच न केवल चिकित्सीय जरूरतें पूरा करती है, बल्कि संभावित फॉरेंसिक सबूत इकट्ठा करने में भी मदद करती है. भारतीय आपराधिक कानून के तहत, अभियोजन पक्ष केवल बलात्कार की उत्तरजीवी की गवाही पर बलात्कार के लिए दोषसिद्धि सुनिश्चित कर सकता है, जहां वह तथाकथित भौतिक विवरणों में अकाट्य और सुसंगत है. फॉरेंसिक पुष्टिकरण कानूनी रूप से प्रासंगिक माना जाता है लेकिन आवश्यक नहीं है. लेकिन व्यवहार में, चूँकि न्यायाधीश और पुलिस फॉरेंसिक साक्ष्य को बहुत महत्व देते हैं, इसीलिए मानकीकृत चिकित्सीय-कानूनी सबूत संग्रह और इसकी सीमाओं के बारे में जागरूकता आवश्यक हो जाता है.

2014 में, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने यौन हिंसा उत्तरजीवियों के लिए चिकित्सीय-कानूनी सेवा हेतु दिशानिर्देश जारी किए जिससे कि स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों द्वारा यौन उत्पीड़न उत्तरजीवियों की जांच और इलाज को मानकीकृत किया जा सके. ये दिशानिर्देश गोपनीयता, गरिमा, भयमुक्त माहौल बनाने और ज्ञात सहमति सम्बन्धी महिलाओं और बच्चों के अधिकार का सम्मान करने के लिए तैयार की गई प्रक्रियाओं को एकीकृत करते हैं.

ये दिशानिर्देश वैज्ञानिक चिकित्सीय जानकारी और प्रक्रियाएं भी मुहैया करते हैं जो उन प्रचलित  मिथकों और बलात्कार से जुड़े अपमानजनक व्यवहारों को सुधारने में सहायता करती हैं जिन्हें आम चिकित्सीय-कानूनी व्यवहारों द्वारा बढ़ावा दिया गया है. यह “चिकित्सीय रूप से निर्दिष्ट” पीड़िता की आन्तरिक योनि जाँच तक सीमित करने वाले “टू फिंगर टेस्ट”(दो उँगलियों द्वारा परीक्षण) के प्रचलित तरीके को ख़त्म करता है और कहीं पीड़िता “सेक्स की आदी” तो नहीं, जैसे अवैज्ञानिक तथा अपमानजनक चरित्रहनन वाले चिकित्सीय निष्कर्ष के इस्तेमाल को ख़ारिज करता है.


भारत के संघीय ढांचे के तहत, स्वास्थ्य सेवा राज्य का विषय है,  इसलिए राज्य सरकारें 2014 के दिशानिर्देशों को अपनाने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं हैं. अब तक, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र, जहां ह्यूमन राइट्स वॉच ने उत्तरजीवियों और डॉक्टरों का साक्षात्कार किया है, सहित केवल 9 राज्यों ने इन दिशानिर्देशों को अपनाया है. लेकिन ह्यूमन राइट्स वॉच ने पाया कि चिकित्सीय पेशेवर, यहां तक कि दिशानिर्देश अपनाने वाले राज्यों में भी, हमेशा उनका पालन नहीं करते हैं. उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में, ह्यूमन राइट्स वॉच ने पाया कि यौन हमले की  उत्तरजीवियों की जांच करने वाले डॉक्टर उन्हें जाँच के बारे में पर्याप्त जानकारी देने में नाकाम रहे और उनके साथ डॉक्टरों के व्यवहार में संवेदनशीलता की कमी थी. इन राज्यों के छह मामलों में, डॉक्टरों ने जहाँ जांच के दौरान महिला पुलिसकर्मियों को उपस्थित रहने की अनुमति दे रखी थी, वहीँ वे कभी-कभी परिवार के सदस्य को अनुमति देने से मना कर देते थे.


मध्य प्रदेश में 18 वर्षीय दलित महिला पलक का अपहरण और बलात्कार किया गया. इस मामले में स्वास्थ्य पेशेवर ने पीड़िता पर दोष मढ़ा जिससे उसे और भी नुकसान पहुंचा. बेटी की  चिकित्सा जांच के दौरान उसके साथ कमरे में मौजूद पलक की मां ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया कि डॉक्टर ने यह इंगित किया कि पलक झूठ बोल रही है और कि सेक्स सहमति से हुआ है: डॉक्टर ने मेरी बेटी से कहा “यदि वे आप के साथ जबरदस्ती करते, तो आपके शरीर पर     निशान होना चाहिए था, लेकिन आपके शरीर पर ऐसा कुछ नहीं है. आपने जरूर अपनी इच्छा से ऐसा किया होगा.” जांच के बाद मेरी बेटी और ज्यादा डर गई.


मुंबई में नगरपालिका अस्पताल की एक वरिष्ठ प्रसूति रोग विशेषज्ञ, जिन्हें अक्सर अदालत में बयान देने के लिए बुलाया जाता है, ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया कि न्यायाधीश विशेष रूप से निचली अदालतों के न्यायाधीश, अक्सर चिकित्सीय-कानूनी दिशानिर्देशों से अनजान होते हैं और पुलिस के माँग-प्रपत्र में भी दिशा निर्देशों की अनदेखी की जाती है. डॉक्टर ने कहा, “पुलिस हमेशा हमसे पूछती है कि क्या जबरन [यौन] हमला हुआ है, क्या वीर्य मौजूद है. उन्हें प्रशिक्षित नहीं किया गया है और यही कारण है कि वे ऐसे प्रश्न पूछते हैं. पुलिस के लिए, यौन हमले का मतलब केवल (लिंग) प्रविष्टि है.”


कई राज्यों के अपने दिशानिर्देश हैं, लेकिन वे अक्सर पुराने होते हैं और 2014 के केंद्र सरकार के दिशानिर्देशों जैसे विस्तृत और संवेदनशील नहीं होते हैं, इनमें ऐसी प्रक्रियाओं और चिकित्सा जांच की आवश्यकता होती है, जो जरूरी नहीं भी हो सकते हैं. उदाहरण के लिए, राजस्थान के अस्पतालों में इस्तेमाल किए जाने वाले मानक फॉर्म में एक ऐसा कॉलम अभी भी है जो योनिच्छद (हैमेन) की स्थिति के बारे में जानकारी मांगता है और डॉक्टर इसे भरने के लिए फिंगर टेस्ट करते हैं. जयपुर के एक अस्पताल में फॉरेंसिक साक्ष्य विभाग के एक मेडिकल कानूनविद ने कहा, “ये फॉर्म्स मेरे जन्म से पहले के हैं”. हालांकि, हरियाणा राज्य सरकार ने 2014 के बेहतर दिशानिर्देशों से पहले 2012 में अपनी चिकित्सीय-कानूनी नियमावली जारी की थी, मगर अस्पताल हमेशा उन प्रोटोकॉल्स का पालन नहीं करते हैं. हिसार जिले के सरकारी अस्पताल में, ह्यूमन राइट्स वॉच ने पाया कि सरकार द्वारा जारी किए गए 17 पृष्ठों के विस्तृत फॉर्म के बजाय डॉक्टरों ने दो पृष्ठ वाले फॉर्म का इस्तेमाल किया. रेजिडेंट चिकित्सा अधिकारी ने कहा, “सरकारी प्रपत्र विस्तृत है. इंटरनेट हमेशा काम नहीं करता है, फिर कभी-कभी प्रिंटर काम नहीं करता, इसलिए हम ज्यादातर पुराने नियमावली फॉर्म का उपयोग करते हैं.”


एक ओर जहाँ अधिकारी फॉरेंसिक साक्ष्यों के संग्रह को मानकीकृत करने के लिए दिशानिर्देशों को लागू करने के लिए छोटे-छोटे कदम उठा रहे हैं, वहीँ स्वास्थ्य सेवा प्रणाली यौन हिंसा की उत्तरजीवियों को चिकित्सीय देखभाल और परामर्श प्रदान करने में काफी हद तक विफल रही है. इसमें सुरक्षित गर्भपात तक पहुँच और यौन संचारित बीमारियों के परीक्षण के लिए सलाह शामिल हैं. 2014 के दिशानिर्देश उत्तरजीवियों के लिए मनोसामाजिक देखभाल का खाका खींचते हुए कहते हैं कि स्वास्थ्य पेशेवरों को स्वयं फर्स्टलाइन (प्राथमिक) सेवाएं प्रदान करनी चाहिए या उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कुछ अन्य प्रशिक्षित व्यक्ति सुविधा केन्द्रों में हों जो ऐसी सेवाएं प्रदान करें. इसमें शामिल हैं- उत्तरजीवी के कल्याण पर ध्यान देना, उन्हें अपनी भावनाओं को व्यक्त करने और संकटकालीन परामर्श लेने के लिए प्रोत्साहित करना, सुरक्षा मूल्यांकन करना और सुरक्षा योजना बनाना तथा इलाज प्रक्रिया में परिवार और दोस्तों को शामिल करना. ह्यूमन राइट्स वॉच द्वारा दस्तावेजीकरण किए गए बलात्कार के लगभग सभी मामलों में, महिलाओं और लड़कियों ने कहा कि परामर्श सहित उनकी स्वास्थ्य आवश्यकताओं पर लगभग कोई ध्यान नहीं दिया गया, जबकि यह स्पष्ट हो गया था कि उन्हें इसकी बहुत जरूरत थी.

काजल को उसके पति और परिवार ने छोड़ दिया था और सितंबर 2015 में सामूहिक बलात्कार  का मामला दर्ज कराने के महीनों बाद उसे चिकित्सीय सहायता और परामर्श की अविलंब जरूरत थी. वह अपने माता-पिता के साथ रहने के लिए लौट आई, लेकिन जल्द ही वे अभियुक्तों की धमकियों के बाद जगह बदलने के लिए मजबूर हो गए. हालांकि, जांच करने वाले चिकित्सक ने परामर्श के लिए उसे किसी के पास नहीं भेजा था. काजल ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया:
मैंने सब कुछ खो दिया और सब मुझे दोषी ठहराते है. घटना के बाद एक महीने तक मैं घर के बाहर नहीं गई. मैं पड़ोसियों के ताने सुन-सुन के थक गई थी. मैंने खाना-पीना छोड़ दिया था, बस घर पर किसी पागल महिला की तरह पड़ी रहती थी. ऐसा लगता था जैसे मैंने अपना मानसिक संतुलन खो दिया हो.


प्रभावी कानूनी सहायता तक पहुंच का अभाव


दिल्ली की वरिष्ठ आपराधिक वकील रेबेका मैमन जॉन ने कहा कि सुनवाई की प्रक्रिया भयभीत करने वाली और भ्रामक हो सकती है और “पीड़िता को शर्मिंदा करने की कोशिशें अभी भी अदालतों में खूब होती हैं. हमें अदालती भाषा को बदलने के लिए काम करने की आवश्यकता है.” प्रायः भारतीय सुनवाई प्रक्रियाओं में हानिकारक रूढ़ियां कायम हैं. अदालतों में न केवल न्यायाधीशों बल्कि बचाव पक्ष के वकीलों द्वारा भी यौन हमले की उत्तरजीवियों के प्रति अक्सर पक्षपाती और अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया जाता है. उत्तरजीवियों के लिए प्रभावी कानूनी सहायता इस तरह के पूर्वाग्रहों को दूर करने में मदद कर सकती है.

अपर्याप्त कानूनी सहायता विशेषकर उन उत्तरजीवियों के लिए चिंता का विषय है जो गरीब और हाशिए के समुदायों से आते हैं. 1994 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कहा गया कि यौन हमले की  पीड़िताओं को कानूनी सहायता प्रदान की जानी चाहिए और सभी पुलिस स्टेशनों को कानूनी सहायता विकल्पों की सूची रखनी चाहिए. दिल्ली में यह सुनिश्चित करने के प्रयास हुए हैं – दिल्ली महिला आयोग एक रेप क्राइसिस सेल का संचालन करता है जो पुलिस स्टेशनों के साथ समन्वय करता है, हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह भी तदर्थ व्यवस्था है और पूरी तरह प्रभावी नहीं है – फिर भी देश के अन्य हिस्सों, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसी व्यवस्था दुर्लभ है. ह्यूमन राइट्स वॉच द्वारा जिन 21 मामलों का दस्तावेजीकरण किया गया है उनमें से किसी में भी पुलिस ने पीड़िता को कानूनी सहायता के उनके अधिकार के बारे में सूचित नहीं किया या कानूनी सहायता प्रदान नहीं की.

ताकि पीड़िताओं को बार –बार बलात्कार से न गुजरना पड़े

केंद्र सरकार ने महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध के मामलों के तेज निपटारे के लिए पूरे देश में करीब 524 फास्ट-ट्रैक अदालतों की स्थापना की है. इनकी प्रभावकारिता को निर्धारित करने के लिए अभी तक कोई भी देशव्यापी अध्ययन मौजूद नहीं है. हालांकि,ऐसा प्रतीत होता है कि केवल फास्ट-ट्रैक अदालतों की स्थापना अपर्याप्त है: पीड़ितों को इस व्यवस्था में मार्गदर्शन  करने में मदद के लिए कानूनी सहायता जैसे अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं पर समान रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए.


बच्चों से जुड़े मामलों में, कानून जांच और सुनवाई की पूरी प्रक्रिया के दौरान बच्चे की मदद करने के लिए सहयोगी व्यक्ति उपलब्ध कराता है. हालांकि, जैसा कि ह्यूमन राइट्स वॉच ने पाया कि इस संबंध में कार्यान्वयन की कमी है, जबकि बलात्कार की वयस्क उत्तरजीवियों के लिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं है. दिल्ली स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी की विशेष सचिव गीतांजली गोयल ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया, “बलात्कार के मामलों जैसे पोस्को (यौन अपराधों से बाल संरक्षण अधिनियम) में सहयोगी व्यक्ति उपलब्ध कराया जाना चाहिए. यह अनिवार्य नहीं है, लेकिन एक विकल्प होना चाहिए, क्योंकि पीड़ित को मामले की स्थिति, पुलिस जांच, क्या चार्जशीट दर्ज की गई, क्या अभियुक्त ने जमानत के लिए आवेदन कर दिया है जैसी बातों के बारे में भी जानकारी नहीं होती है.”

पूरी रिपोर्ट पढ़ें : “सब मुझे दोष देते हैं”

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सत्ता का पुरुष चरित्र: राजनीति-गली अति सांकर

स्वरांगी साने

वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार और अनुवादक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित. संपर्क : swaraangisane@gmail.com

‘क्या किसी महिला के साथ सेल्फी लेने से महिला और पुरुष का चरित्र खराब हो जाता है? क्या महिलाओं के साथ सेल्फी लेना गुनाह है?’ यह सवाल बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव ने उठाया है। दरअसल तेजस्वी यादव की एक तस्वीर जेडीयू ने बाकयदा प्रेस कॉन्फ़रेंस कर सार्वजनिक की थी। सारे मामले को परे रख भी दें तब भी तेजस्वी ने जो सवाल उठाए हैं उनके जवाब दिए ही जाने चाहिए। बकौल तेजस्वी ‘क्या नीतीश जी ने यह तस्वीर जारी करवाने से पहले इस महिला की इज़ाजत ली थी? क्या ये निजता का उल्लंघन नहीं है?’ राजनीति की गलियों में घूमती सेक्स सीडियां किसी महिला पक्षधरता का नमूना नहीं होतीं. जब संबंधों में कोई पीड़ित पक्ष सामने नहीं आया तो एक को ठिकाने लगाने के लिए दूसरे की निजता का उल्लंघन पुरुष-वर्चस्व के हु-तू-तू का खेल है.


स्त्री-पुरुष के बीच के संबंध उनकी निजता के होते हैं और उसे चौराहे पर ला खड़ा करना, उतने ही ओछेपन का प्रतीक। फिर लोग कोई ढाल तलाशते हैं मतलब जैसे गुरमीत मामले में यह कहना कि हनीप्रीत मेरी बेटी जैसी है। स्त्री-पुरुष को साथ में देखा ही नहीं जा सकता और यदि वे साथ हैं, तो ग़लत ही है..पर यदि बेटी (या पत्नी) कहकर कितना भी अत्याचार कर लें, सही है। दो व्यक्तियों के बीच के संबंधों पर तीसरे का दखल क्यों हो?समाज किसी भी स्त्री के मामले में ठेकेदार बन क्यों उभरता है? स्त्री जिसे वह (समाज) जैसा चाहे नचा ले…और राजनीति की काली कोठरी में तो स्त्रियों का नाम उछालना बड़े गर्व (!) की बात।

अनचिन्हा कोलाज़….स्वरांगी साने की कविताएँ

हम एक से बढ़कर एक कद्दावर महिला राजनेताओं की बात कर लें लेकिन सबसे ज़्यादा उनकी वे तस्वीरें देखी जाती हैं जिसमें वे ग्लैमरस दिखती हैं। सत्ता किसी की भी हो, वह स्त्रीवाची नहीं होती और स्त्री के प्रति उसका नज़रिया भी सकीर्ण होता है। वरना क्या कारण है कि अभी दो-तीन दिन पहले नंदुरबार जिले में एक चीनी के कारखाने में आयोजित कार्यक्रम में महाराष्ट्र के जल संसाधन मंत्री गिरीश महाजन कह उठते हैं कि शराब के ब्रांड को महिलाओं का नाम दे दिया जाए, तो यह खूब बिकेगी। ऐसे में क्या कोई फ़र्क दिखता है बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राजनैतिक पैंतरे और महाराष्ट्र के मंत्री की सोच में? लगता है दोनों ही मानते हैं कि महिला का नाम उछालना दोनों हाथ में लड्डू होने जैसा है, यदि तीर निशाने पर लग गया तो भी ठीक और नहीं लगा तब भी खबर तो बन ही जाएगी…बदनाम कर दिया या बदनाम हो गए, दोनों सूरत में नाम तो हो ही जाएगा। और इस हथकंडे में वे इस्तेमाल करते हैं स्त्री को।

हनीप्रीत की खबर नहीं सेक्स फंतासी बेच रही मीडिया

कथित ‘त्रिया चरित्र’ की दुहाई देने वालों से बड़ी कठोरता से पूछने का मन करता है कि इस मानसिकता के लिए वे पुरुष चरित्र जैसा कोई नाम क्यों नहीं रचते? क्या वजह है कि जैसे किसी मंच की शोभा बढ़ाने के लिए फूलदान को रख दिया जाता है, वैसे ही महिलाओं को भी मंच पर बैठा दिया जाता है…या वैसे ही राजनीति में उनका स्थान तय कर दिया जाता है।

उत्तरप्रदेश में होने वाले नगर निकाय के चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस जी-जान एक किये हैं तो प्रदेश में सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी के लिए यह प्रतिष्ठा का मुद्दा है। लेकिन यहाँ भी महिला का इस्तेमाल चुनावी हथकंडे जीतने के लिए किया जा रहा है। कानपुर के बिठूर से भाजपा विधायक अभिजीत सांगा की माँ निर्मला सिंह को भाजपा ने बिठूर नगर पंचायत से प्रत्याशी बनाया और बस्ती जिले के रुधौली नगर पंचायत से वहाँ के विधायक संजय जायसवाल की पत्नी संगीता जायसवाल को प्रत्याशी बनाया गया है जबकि कहा जा रहा था जमीनी कार्यकता को टिकट दी जाएगी। यदि इन महिलाओं को जमीनी कार्यकर्ता के रूप में टिकट दी गई है तो स्वागत है लेकिन इन्हें विधायक सांसद के रिश्तेदार के तौर पर टिकट दी गई है। ऊपरी तौर पर महिला को टिकट लेकिन वह केवल कठपुतली।मड़ियाहूँ सीट से माफ़िया डॉन मुन्ना बजरंगी की पत्नी सीमा सिंह मैदान में हैं पर भाई लोग कह रहे हैं- ‘सब जानत हैं कि भइया जी लड़ रहे हैं। भाभी का नामे भर है’।


ऐसा ही तब भी कहा गया था जब पहली बार राबड़ी देवी सत्ता में आई थी। लेकिन समय ने बताया कि यदि किसी भी, एकदम घरेलू महिला को भी अवसर दिया जाए तो वह खुद को सिद्ध कर देती है लेकिन यह और ऐसे अनगिनत उदाहरण हो सकते हैं जहाँ महिलाओं को केवल उस खिलौने की तरह माना जाता है, जिसका जैसा चाहे इस्तेमाल कर लो…वह क्या कर लेगी? किसी के साथ उसकी तस्वीर को हवा में उछाल दो या उसकी ही हॉट तस्वीर जारी कर दो। ‘राहुल गांधी, स्मृति ईरानी से डरते हैं’ का जुमला उछाल दो या ऐसा ही कुछ कर लो…

यह स्थिति भारत की नहीं पूरे विश्व की है। आँकड़े बताते हैं पूरे विश्व में विधायिकाओं में केवल 10.5 प्रतिशत महिलाएँ हैं और मंत्री पद पर सिर्फ 6.1 प्रतिशत महिलाएँ ही हैं। भारत में 17 वीं विधानसभा की 403 में से केवल 98 सीटें महिलाओं को दी गई, मतलब 25 प्रतिशत से भी कम और वह भी अधिकांश अपनी बहू-बेटियों में बाँट दी गईं। महिलाओं को खुद से कम आँकना, ‘ये क्या जानती हैं’, वाली मानसिकता और महिलाएँ कुछ समझ नहीं सकतीं, वाला भाव दूर होना चाहिए। बसपा की तो मुखिया ही महिला है तब भी टिकट बँटवारे में महिलाओं की सबसे ज़्यादा उपेक्षा की गई, 400 सीटों पर केवल 21 महिला प्रत्याशी। भाजपा ने 370 में से 46 सीटें महिलाओं को दीं, कांग्रेस ने 105 में से केवल पाँच महिलाओं को सपा ने 299 में से केवल 29 महिलाओं को दीं।

महिलाओं ने लगातार अपने आपको सिद्ध किया लेकिन पुरुषों की मानसिकता दकियानूस ही रही। इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री बनने से पहले ही देश के सबसे बड़े राज्य अविभाजित उत्तरप्रदेश में सुचेता कृपलानी (1963 से 1967) बनकर देश की पहली महिला मुख्यमंत्री रहीं। उसी उत्तरप्रदेश में अगर कानून व्यवस्था के राज की बात की जाती है तो वो कल्याण सिंह और मायावती की ही होती है। देश के सबसे बड़े राज्य के सबसे ताकवतर लोगों में मायावती हैं। अखिलेश यादव के साथ कंधे से कंधा मिलाने वाली डिम्पल यादव हैं। बिहार में पहली बार 1997 में भले ही मजबूरी में राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनाई गई थी लेकिन 2005 तक वे तीन बार मुख्यमंत्री पद को मुस्तैदी से सँभाल चुकी हैं। पश्चिम बंगाल का नाम आए तो ममता बनर्जी को भूल जाएँ यह हो ही नहीं सकता। सोनिया गाँधी पर विदेशी मूल का होने का आरोप लगता रहा हो लेकिन सबसे लंबे समय तक कांग्रेस अध्यक्ष का रिकॉर्ड उनके नाम दर्ज हो चुका है। जम्मू-कश्मीर में महबूबा मुफ्ती का मुख्यमंत्री बन जाना कोई आसान बात नहीं थी। पंजाब में आतंकवाद का निपटारा करते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री राजिंदर कौर भट्टल को देखा जा सकता था। देश की राजधानी दिल्ली में लंबे समय तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर शीला दीक्षित का कब्जा था। राजस्थान में वसुंधरा राजे का बोलबाला है वे 2003 से 2008 तक यहाँ मुख्यमंत्री थीं। उत्तराखंड में नारायण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्री काल में सबसे ताकतवर मंत्री इंदिरा हृदयेश रहीं। तमिलनाडु में शशिकला के लिए रास्ता बनाने का काम जयललिता ने किया था जब उन्होंने वहाँ के पुरुष वर्चस्व की राजनीति को मटियामेट कर दिया था।



…ज़ाहिर है अब पुरुषों को साबित करना होगा कि वे महिलाओं को अपने देखने के दृष्टिकोण को बदलेंगे..महिला के बारे में विचार करते हुए उनकी आँखें जिस एक्स-रे मशीन का काम करती हैं उस चश्मे से महिलाओं की त्रि-आयामी छवि बनाने की बजाए अपने दिमाग के जाले झाड़कर महिलाओं के बहुआयामों को समझेंगे और महिलाओं का इस्तेमाल किसी भी तरीके से अपने हित में करना बंद करेंगे।

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घूस-यार्ड

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने महत्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
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सूरज निकलने से पहले ही वह ‘शूटिंग’ के लिए निकल पड़ता और जब लौटता तो सड़क के किनारे-किनारे बसी झोपडि़यों में से किसी बूढ़े आदमी के खाँसने की आवाज रह-रह कर सुनाई पड़ती।

गेंहुए रंग के ‘रफ एंड टफ’ चेहरे पर उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में शायद कोई ‘टेलीलैंस’ फिट था और दिमाग में ‘माइक्रो फिल्म।’ चलता हुआ वह घने जंगल के अंधेरे में अकेले टहलते चीते के समान लगता था, जरा-सी आहट होने पर उसके कान खरगोश की तरह खड़े हो जाते और पलक झपकते ही वह सांप की तरह गायब हो जाता। बुलबुल, मैना या मोर की आवाज सुनते ही उसके चेहरे पर बिज्जू-सी चमक आ जाती। दिन में वह कबूतर-सा शांत मगर रात को रीछ-सा बेचैन नजर आता। बसन्त आता तो वह महीनों कमरे पर नहीं लौटता और रंग-बिरंगी तितलियों व फूलों की तलाश में भटकता रहता। आषाढ़ के दिनों में कमरे से बाहर ही नहीं निकलता और ढेरों किताबें दीमक की तरह चाट जाता। गर्मियों में छत पर सोता और देर गए तक चांद का पीछा करता रहता। सर्दियों में सारी रात साल भर से जमा रद्दी अखबार जलाकर आग सेंकता और सारा दिन कमरे में सोता रहता। ‘शूटिंग’ पर जाते हुए रास्ते में कहीं कोई नदी पड़ती तो कपड़े व झोला किसी पेड़ की खोह में रख देता और खुद घंटों मछली की तरह नदी में तैरता रहता। जमीन पर बने पांव के निशान देखते ही वह फौरन समझ जाता कि कौन-सा जानवर यहां से गुजरा है और निशानों के पीछे-पीछे तब तक चलता रहता, जब तक निशान दिखना बंद नहीं हो जाते।

कभी-कभी ‘शूटिंग’ से जल्दी निपट आता, तो लौटते वक्त वह पुराने किले के सामने कोर्ट-कैंटीन में जा बैठता। एक तो यहां खाना अच्छा मिलता, दूसरे कैंटीन रास्ते में ही पड़ती थी सो समय खराब नहीं होता। तीसरा कारण यह था कि कैंटीन के बाहर-भीतर, इधर-उधर घूमते बिलाव, बलुटनें और बिल्लियां देखना उसे अच्छा लगता था।वह जैसे ही कैंटीन के पास पहुंचता तो वहां आधे सफेद-आधे काले रंग के मोटे-ताजे विलावों के पीछे-पीछे दुबली-पतली बिल्लियां ओर छोटे-मोटे बलुटनें घूमते हुए दिखाई पड़ते। दरवाजे के दाई ओर पौधों की ओट में बैठे कुछ बिलाव और बिल्लियां नजर आतीं। एक बिलाव “मॉडर्न ब्रेड” खा रहा होता तो दूसरा पंजों में दबाकर हडृी पर बचा मांस नोच रह होता। बिल्लियाँ टुकुर-टुकुर बिलावों की तरफ देखती रहतीं। उसे लगता कि इनके हाथ हडृी नहीं लगी है। बिलाव हडृी चूस-चासकर फेंक देते तो बिल्लियाँ उन्हें चाटने लगतीं। दरवाजे के दूसरी तरफ थोड़ी ही दूरी पर एक छोटा सा पार्क था जिसमें कुछ बिलावों को घास पर लेटे देखकर उसे लगता जैसे धूप सेंक रहे हों। पार्क और दरवाजे के बीच के कमरे में टाइपिस्ट और कोर्ट स्टैम्प बेचने वालों की मेज- कुर्सियों के चारों ओर बिल्लियाँ घूमती रहती और बुलटनें कोने में दुबके बैठे रहते। खिड़की के नीचे कोई बिलाव सो रहा होता कोई घात लगाए बैठा होता। धीरे-धीरे चलती बिल्लियों को गौर से देखने के बाद चलता पेट से हैं। वह इतने ध्यान से इन्हें देखता रहता जैसे रिसर्च कर रहा हो। यह सब देखते- देखते वह बिलावों और बिल्लियों की रोचक व रहस्यमय दुनिया में खो जाता। उसे ध्यान ही नहीं रहता कि वह यहाँ लंच करने आया था- समय बचाने के लिए और इतना समय बिलावों व बिल्लियों के चक्कर में बरबाद कर दिया।

उसे ध्यान आता तो वह जल्दी-जल्दी अन्दर घुसता और एक जगह खड़ा होकर बैठने के लिए जगह ढूंढता, खाली जगह मिलती तो जाकर बैठ जाता और वेटर के आने का इंतजार करता लेकिन उसके दिमाग में बिलाव व बिल्लियाँ घूमते रहते। वह सोचता कि इन पर सोचने से क्या फायदा? पर……लंच करते हुए वह अक्सर देखता कि एक मेज पर बिलाव ‘कोल्ड कॉफी’ पी रहे हैं तो दूसरी मेज पर बिल्लियाँ चाय की चुस्कियाँ ले रही हैं। बिलावों के हाथ कभी-कभी “चीज सैंडविच” लग जाते तो कभी मटन हेमबर्गर। बलुटनें और बिल्लियाँ जूठी प्लेटें चाटकर भी खुश नज़र आते। जब कभी कोई बिलाव ऐसी प्लेटें बिल्लियों के लिए छोड़ देता तो बिल्लियाँ बड़े कृतज्ञ भाव से बिलाव की और निहारती और बिलाव बड़े गर्व से उन्हें देखता हुआ किसी और मेज की ओर बढ़ जाता। मोटे-ताजे बिलावों को वेटर ‘सरकारी बिलाव” कहते थे। वैसे किसी बिलाव को वेटर ‘प्रधान जी’ कहते और किसी को महामंत्री।’ वेटरों ने बिल्लियों के भी अलग-अलग नाम रख रखे थे जैसे किसी का बिजली तो किसी का शर्मिली।
एक दिन उसने वेटर को कहा, ‘‘भई, यह क्या है? देखो बिलाव और बिल्लियाँ इन बर्तनों में मुहँ मारते रहते हैं और इन्हीं बर्तनों में तुम….।’’ चुपचाप सुनता वेटर बीच में ही बोल पड़ा, ‘‘साहब! हम क्या कर सकते हैं? आप ही लोगों के पाले हुए हैं।’’ दूसरा वेटर भुनभुनाता हुआ बोला,‘‘ जनाब! आप लोगों के सहारे इनका पेट भर जाता हैं तो इसमें क्या बुरा है?’’
वह सुनता, सोचता झल्लाता और कोने में लगे जाले, छत पर उल्टे लटके चिमगादड़ और दीवार पर चिपकी छिपकालियाँ देखता रहता।

कभी-कभी लंच के बाद कैंटीन से निकलकर, सीढियाँ चढ़ता और एयरकंडीशंड बिल्डिंग के अंदर लायब्रेरी में “टाइम्स” या “न्यूज वीक” पढ़ने बैठ जाता। यहां भी बिलाव और बिल्लियां उसका पीछा नहीं छोड़ते। उस दिन तो वह यह देखकर बहुत देर हंसता रहता कि एक कोने में ढेर लगी ‘कांस्टीट्यूशन’ की मोटी-मोटी किताबों के बीच कोई बिलाव सो रहा है तो दूसरे कोने में कोई बिलाव इनकम टैक्स और कंपनी केसेस के ढेर में घुसा ऊंघ रहा है। कमरे में तीन तरफ ऊपर तक लगी किताबों की हर अलमारी के नीचे कोई बिलाव ध्यानमग्न बैठा होता तो कोई चुपचाप अपन पंजे चाट रहा होता। कोई अपनी पूंछ गोल किए छत की ओर घूरता रहता तो कोई पंजों से अपनी खोपड़ी खुजलाता हुआ नजर आता। बिल्लियां सोफों के नीचे रेस्ट कर रही होती हैं और बलुटनें बिल्लियों या बिलावों को ढूंढते हुए इधर-उधर परेशान से घूमते रहते। अलमारी में लगी किताबों के पीछे से जब कोई बिलाव गंभीर मुद्रा में निकलता हुआ दिखाई पड़ता तो उसे वह चिन्तन में डूबे किसी विद्वान प्रोफेसर-सा नजर आता। यह देखते-देखते उसकी नजरों के सामने बहुत-सी रिवाल्विंग चेयर और उन पर बैठे बिलाव चक्कर काटने लगते।

रास्ते में उसे याद आता कि जब वह छोटा था तो पिताजी की मृत्यु के बाद रसोई में रखा दूध अकसर बिलाव पी जाता और उसे बिना दूध पिए ही स्कूल जाना पड़ता था। मां ने बहुत उपाय किए, गांव के बड़े-बूढ़ों से पूछा, कई बार शहर भी गई लेकिन… कभी-कभी तो हर दूसरे-तीसरे दिन बिलाव सारा दूध पी जाता। हारकर मां ने छत के कुंडे से रस्सी बांधकर काफी ऊंचा छींका बनाया और दूध वहीं रखकर सोती। इसके बाद भी बिलाव आता रहा लेकिन दूध उसके हाथ नहीं लगता। एक रात बिलाव ने जाने कैसे छींके तक छलांग लगाई और दूध बिखेरकर अंधेरे में भाग गया। उस दिन के बाद बिलाव फिर कभी नहीं आया। उसे अब समझ आया था कि शायद यही कारण है कि वह अपने कमरे पर चाय बनाने के लिए डिब्बा बंद दूध इस्तेमाल करता है। थोड़े दिन बाद तो उसे ऐसा लगने लगा जैसे वह जहां कहीं भी जाता है कोई न कोई बिलाव या बिल्ली नजर आ ही जाती है। कबाड़ी बाजार से लेकर संसद तक कोई ऐसी जगह नहीं, जहां उसने बिलाव या बिल्ली न देखे हों। वह जब भी उन्हें देखता, पहचानने की कोशिश करता और बार-बार उसे लगता कि ये वही कोर्ट कैंटीन वाले बिलाव या बिल्लियां हैं। कभी-कभी उसे लगता जैसे इनका भी ‘प्रमोशन’ और ‘डिमोशन’ होता रहता है। तभी तो कोर्ट कैंटीन वाले बिलाव संसद कैंटीन में और संसद कैंटीन बाले बिलाव कोर्ट कैंटीन में दिखाई पड़ते हैं। कभी सोचता जैसे साइबेरिया से उड़कर पक्ष हर साल सर्दियों में भरतपुर आ जाते हैं, वैसे ही ये भी गर्मियों में कश्मीर, मसूरी या शिमला चले जाते होंगे। कभी उसके दिमाग में आता कि दूसरे देशों में जाने के लिए तो पासपोर्ट और वीसा बनवाने की जरूरत पड़ती है, तब वे कैसे जाते होंगे? वह घंटों तक उलझा रहता फिर यह सोचकर टाल देता कि हो सकता है कि किसी की टोकरी में छुपकर बैठ जाते हों और बिना पासपोर्ट और वीसा के दुनिया भर की सैर कर लेते हों ।

‘दि ग्रेट प्राइम मिनिस्टर्स कालोनी’ से गुजरते हुए उसने कई बार कुछ ‘काले-बिलाव’ देखे थे लेकिन वे कोर्ट कैंटीन में देखे बिलावों जैसे नहीं थे। एक दिन ‘शूटिंग’ से लौटते हुए उसने जाना था कि ‘काले बिलाव’ दरअसल बिलाव नहीं, जंगली कुत्ते हैं जो बहुत खुंखार होते हैं। बड़े-बड़े वनमानुष इन्हें अपनी सुरक्षा के लिए पालतू बनाकर रखते हैं। वह बार-बार सोचता ये बड़ी-बड़ी कोठियों में खूब ठाठ से पलते होंगे। डनलप के गद्दे, एयरकंडीशंड कमरे, लंबी-लम्बी कारें, मीट, मुर्गे, दूध, बिस्कुट…. लेकिन बाद में उसे पता लगा कि वास्तव में ये जंगली नहीं हैं, इन्हें ट्रेंड करके जंगली बनाया गया है और इनका काम बहुत जोखिम भरा होता है। वनमानुषों की जान बचाने के चक्कर में कई बार इन्हें खुद जान से हाथ धोना पड़ता था। कभी-कभी कोई जंगली कुत्ता पागल हो जाता तो वह वनमानुष की ही बोटी-बोटी करके चबा जाता। ऐसे पागल कुत्तों से तो वनमानुष भी डरते होंगे। फिर सोचने लगता कि कुत्ते पागल होते क्यों हैं?

कोर्ट कैंटीन जाते-जाते धीरे-धीरे उसने जाना कि यहां कोर्ट में जितनी फाइलें हैं उससे अधिक चूहे हैं। कुछ अच्छे खासे मोटे-ताजे चूहे और कुछ थोड़ा कमजोर से। कुछ चूहे तो सचमुच मरियल और बीमार नजर आते। कुछ तो तीन-तीन पीढि़यों से यहीं हैं। कुछ चूहे आपस में लड़त रहते और कुछ बेहद थके हुए उदास-उदास से घूमते रहते। मोटे ताजे चूहे हमेशा मस्त नजर आते। कुछ चूहे भारी फाइलों के नीचे दबकर मर जाते और किसी को पता नहीं लगता। ज्यादातर चूहे शायद इसलिए लड़ते थे कि एक चूहे ने दूसरे चूहे के बिल पर कब्जा कर लिया है या उधार लिया अनाज नहीं लौटा रहा है। चूहों और चुहियों के बीच अकसर इसलिए झगड़ा रहता कि चूहा चुहिया को ठीक से खाने के लिए नहीं देता, मारता-पीटता है या चुहिया को बिल से बाहर निकाल दिया है। कभी-कभी एक चुहिया, दूसरी चुहिया से इसलिए लड़ती कि चूहे के बिल व अनाज पर असली हक उसका है और वह ही चूहे की असली घरवाली है।

ऐसे चूहों की सुरक्षा के लिए बहुत सोच समझकर ‘एअर टाइट’ दरवाजे और खिड़कियां बनवाई गई हैं। लेकिन कभी-कभार खिड़की खुली रह जाती तो बिलावों के हाथ कुछ चूहे ही आ जाते। अकसर बिलाव मोटे-ताजे चूहों पर हाथ नहीं डालते लेकिन कभी-कभी मोटा-ताजा चूहा अपने भार, बुढ़ापे और सुस्ती के कारण भाग नहीं पाता इसलिए बिलावों की पकड़ में आ जाता। किसी बिलाव के हाथ जब कोई मोटा-ताजा चूहा लग जाता तो वह बिल्लियों और बलुटनों के साथ मिल-बांटकर खाता और उस समय ऐसा लगता जैसे किसी पांच तारा होटल में कोई शानदार पार्टी हो रही हो।

जब कभी ‘शूटिंग’ पर जाने में देर हो जाती तो वह सुबह के नाश्ते के लिए भी कोर्ट कैंटीन चला जाता। उसने कई बार देखा था कि सुबह एक बड़ी सी नीली गाड़ी कैंटीन के सामने आकर रुकती। गाड़ी के अगले और पिछले दरवाजे से कुछ कुत्ते बाहर निकलते। पता नहीं क्यों मटियाले रंग के सभी कुत्तों के गले में चमड़े का पट्टा पड़ा रहता और हर पट्टे पर अलग-अलग नम्बर। कुछ कुत्ते गाड़ी के आगे और कुछ पीछे खड़े हो जाते। चारों तरफ से चौकन्ना कुत्तों की देख-रेख में गाड़ी के अंदर से एक-एक करके बहुत से छोटे-छोटे पिंजरे निकले जाते। हर पिंजरे में बंद चूहे के पंजों में छल्ले पड़े रहते और हर छल्ले पर अलग-अलग नम्बर। पिंजरों में चूहे अधिक, चुहियां कम दिखाई पड़ती। ध्यान से देखने के बाद मालूम पड़ता कि किसी का सिर फूटा हुआ है तो किसी के पंजे कटे हुए हैं। किसी के पेट पर खून जमा होता है तो किसी की पूंछ गायब होती। चूहों के खाने के लिए पिंजरे में रोटी के टुकड़े पड़े रहते। पिंजरे में छटपटाते चूहों को देखकर उसे लगता जैसे बहुत देर से प्यासे हैं और उसका मन करता कि वह उन्हें थोड़ा पानी पिला दे, मगर कुत्तों के डर से चुपचाप खड़ा-खड़ा देखता रहता। छोटे-छोटे पिंजरे में कोई चूहा इसलिए बंद होता कि उसने किसी चूहे के बिल से अनाज चुराया था तो कोई इसलिए कि उसने किसी और की चुहिया को अपने बिल में छुपा रखा था। कुछ चूहे इसलिए बंद थे कि मोटे-ताजे चूहों के बिल के सामने धरना देकर बैठे थे तो कुछ इसलिए कि वे जानबूझकर आस-पास के चूहों को बिना वजह डराते-धमकाते थे। सभी पिंजरे कुत्तों की निगरानी में सारा दिन अलग-अलग कमरों में रखे रहते और शाम को नीली गाड़ी में भरकर न जाने कहां चले जाते।

एक दिन वह सूरज छिपने के कुछ देर बाद कैंटीन गया था। उसे ठीक तरह से तो याद नहीं था लेकिन उसे लगता था जैसे चाबियों का गुच्छा यहीं कैंटीन में कहीं रखकर भूल गया है। कैंटीन बंद हो चुकी थी लेकिन वह फिर भी इधर-उधर टार्चलाइट में चाबियों का गुच्छा ढूंढने की कोशिश करता रहा। चाबियां तो उसे नहीं मिलीं पर इस बीच अचानक टार्च लाइट में उसने देखा और देखता रहा कि एक मोटा चूहा किसी भारी फाइल को अपने दांतों में फंसाए घसीटता हुआ ले जा रहा है। वह चूहे के पीछे-पीछे भागा लेकिन चूहा फाइल समेत न जाने कहां गायब हो गया।

वह मोटे चूहे के इस कारनामें से बेहद हैरान था और चाबियां न मिलने के कारण परेशान भी। वह सोचता-सोचता पैदल ही चलने लगा। वह कभी चाबियां के बारे में सोचता तो कभी मोटे चूहे के बारे में। रास्ते में उसे ख्याल आया कि वह मोटा चूहा दरअसल चूहा नहीं ‘घूस’ होगी। उसे याद आने लगा कि मां ने उसे एक बार बताया था कि घूस चूहे की तरह ही होती है पर काफी मोटी। घूस दिन में दिखाई नहीं पड़ती। अंधेरा होने के बाद किसी गंदी नाली से निकलकर बाहर आती है। घूस नीचे ही नीचे सारी जमीन और घर की नींव का खोखला कर देती है। छोटे से छोटे रास्ते में से भी मोटी घूस आसानी से निकल जाती है। अलमारी में पीछे से सारी किताबों को कुतर-कुतरकर ढेर लगा देती है और सामने से देखने पर लगता है जैसे सब ठीक-ठाक है।

वह रास्ते भर घूस के बारे में ही सोचता रहा और फिर अचानक उसे लगा कि कहीं उसकी चाबियों का गुच्छा भी घूस तो उठाकर नहीं ले गई। उसे डर लगने लगा कि कहीं घूस उसके कमरे का ताला खोलकर सारा सामान लेकर चम्पत न हो जाए। वह जल्दी-जल्दी चलने लगा। ज्यों-ज्यों वह आगे बढ़ता उसका डर भी बढ़ने लगा। डर के मारे उसकी रफ्तार और तेज हो गई।गली के मोड़ पर पहुँचा तो वहाँ घुप्प अँधेरा था। वह एक क्षण रुका, बीड़ी सुलगाई और कमरे के पास आकर माचिस की तीली की रोशनी में ताला ढूँढने लगा। ताला सही सलामत देखकर उसकी जान मे जान आई। ताले में अटकी पर्चियाँ जेब में ठूंसी और हिम्मत करके उसने एक ईट उठाईं। दो- तीन बार में ही ताला खुलकर उसके हाथ में आ गया। उसे लगा कि वह  नाहक ही डर रहा था। ताला तोड़ने की आवाज सुनकर कोई पड़ोसी बाहर निकलकर नहीं आया। पड़ोस की दुनिया सोती रही। उसने दरवाजा बंद किया और अखबार उठाकर तख्त पर आ बैठा। देर गए तक वह ‘बोफार्स’ व ‘फेयरफैक्स’ की ख़बरें पढ़ता रहा और सारी रात उसके दिमाग में ‘घूस’ कुतर-कुतर करती रही।

अगले दिन वह ‘शूटिंग’ पर नहीं गया, सारा दिन कमरे मे पड़ा सोता रहा और उसे सारी रात नींद नहीं आई। वह बार-बार बीड़ी सुलगाता, पानी पीता और अखबार पलटता रहा लेकिन दिमाग में घुसे बिलावों, बिल्लियों, बलुटनों, चूहों, कुत्तों और घूस को भगा नहीं पाया। वह उनके बारे में कुछ भी न सोचने की कोशिश में बार-बार यही सोचता रहा कि शायद हर बिलाव अपने-अपने इलाकों के चूहों को अपना शिकार समझता है इसलिए एक बिलाव भले ही अपने इलाके के किसी चूहे को मारकर खा जाए लेकिन किसी दूसरे बिलाव को खाने नहीं देता। अगर कोई बाहरी बिलाव किसी चूहे को खा जाता या खाने की  कोशिश करता है तो बिलावों मे खूब लड़ाई होती है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि कोई बिलाव अकेले किसी चूहे को नहीं मार पाता है, तब वह बाहरी बिलावों की मदद लेता है और बदले में थोड़ा हिस्सा उन्हें भी दे देता है। बिलाव जब लड़ते हुए दिखाई पड़ते हैं तो उसका एक ही कारण होता है। एक चूहे पर किसी बिलाव का एकाधिकार। वरना बिलाव आपस में प्यार से खेलते, खाते, घूमते नजर आते हैं। वैसे एक बिलाव दूसरे बिलाव को होली-दीवाली या नए साल की खुशी में चूहे मारकर उपहार में भी भेजता है।

‘ब्लैक एंड व्हाइट बिलाव सारी दुनिया को सिर्फ ब्लैक एण्ड व्हाइट में ही देखते हैं क्योंकि उनमें बाकी रंग देखने की क्षमता और संवेदनशीलता होती ही नहीं है। उसे लगता है कि मोटे-ताजे बिलावों के पीछे-पीछे पूंछ हिलाते हुए घूमते रहना बिल्लियों और बलुटनों की मजबूरी है। पूंछ नहीं हिलायंगे तो बिलाव चूह मारने के गुर नहीं सिखाएगा और वे भूखे मर जाएगे। सच तो यह भी है कि चूहे मारने की ट्रेनिंग लेते हुए बलुटनें दरअसल खुद एक दिन मोटा-ताजा बिलाव बनने के सपने देखते रहते हैं पर कोई-कोई बलुटना ही बड़ा होकर मोटा-ताजा बिलाव बन पाता है वरना अधिकतर बलुटनें तो सारी उम्र बिलावों के पीछे-पीछे पूंछ हिलाते ही रह जाते हैं। बिलावों के मरने के बाद उसकी जगह उसके अपने बलुटनें ही लेते हैं और अगर किसी बिलाव का अपना कोई बलुटना न हो तो बाकी सारे बिलाव मिल-बांटकर उसके सारे चूहे खा जाते हैं।

चूहों के बारे में सोचते-सोचते उसे मालूम होता कि बिलाव के हाथ चूहे सिर्फ इसलिए लग जाते हैं कि आपस में लड़ते हुए चूहों को बिलाव का पता ही नहीं लगता होगा। चूहे आपस में न लड़ें तो हो सकता है कि बिलाव के हाथ कोई चूहा न लगे। उसे लगता कि शायद चूहे भी इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं, तभी तो कई बार लड़ाई होने पर आपस में ही सुलह-समझौता कर लेते हैं ताकि बिलाव के हाथों मारे जाने से बच जाएं। पर फिर भी यह सोचते-सोचते वह इस नतीजे पर पहुंचता कि जब कोई बिलाव किसी चूहे को मारकर खा जाता है तब उसके परिवार के अन्य चूहे बदला लेने की भावना से बिलाव की सारी किताबें कुतर डालते हैं। चूहे समझते होंगे कि बिलाव सारा दिन किताबों में घुसे रहते हैं इसलिए उन्हें किताबों से बहुत प्यार है या किताबों के ढेर में घुसे रहना उन्हें सबसे अच्छा लगता है। जब चूहे बिलावों की किताबें कुतर जाते होंगे तो बिलाव को गुस्सा आता होगा और वह पहले से अधिक चूहे मारना शुरू कर देता होगा। लेकिन उसकी समझ में यह कभी नहीं आया कि बिलाव चूहे मारकर खा जाते हैं इसलिए चूहे किताबें कुतरते हैं या चूहे किताबें कुतरते हैं इसलिए बिलाव चूहे मारता है।
उसने अभी तक सुना था कि कुत्ते बिलावों की आपस में कभी नहीं बनती लेकिन कोर्ट-कैंटीन के बाहर उसने कुत्तों और बिलावों को आस-पास बैठे, खाते, खेलते व घूमते कई बार देखा था। वह सोचता  कि कुत्तों को लोग वफदार और स्वामिभक्त मानते हैं इसलिए घर की रखवाली के लिए पालतू बनाकर रखते हैं। पालतू कुत्तों को लोग प्यार से खाने के लिए डबल रोटी, बिस्कुट, अंडे, मीट… भी देते हैं। कुत्ता अपने मालिक द्वारा देने पर ही कुछ खाता है। चोरी करके खाना उसकी आदत नहीं होती। लेकिन बिलाव को अक्सर घरों में पालतू बनाकर नहीं रखा जाता क्योंकि वह हर वक्त इस ताक में रहता है कि मालिक इधर-उधर हो तो उसे दूध-मलाई चाटने का मौका मिले। बिलाव जब भी दबे पांव दूध पीने के लिए रसोई की ओर बढ़ता है तो कुत्ता भौंकने लगता है। ऐसे में घर वाले सावधान हो जाते हैं और बिलाव के हाथ दूध नहीं लगता। यही कारण है कि कुत्ते और बिलावों की आपस में नहीं बनती।

लेकिन कैंटीन वाले बिलाव लगता है बहुत चालाक हैं। इसलिए कुत्तों को भी बराबर खाने के लिए कुछ न कुछ देते रहते हैं। इसलिए बिलावों को देखकर न कुत्ते भौंकते हैं और न किसी को पता चलता है कि बिलाव दूध मलाई चाट रहे हैं इस बीच पीछे से कोई चूहा पिंजर से भाग भी निकलता है तो कुत्ते थोड़ी देर भौंकभांक कर चुप हो जाते हैं।बिलावों, बिल्लियों, बलुटनों, चूहों और कुत्तों के बीच इन सारी ‘एडजस्टमैंट्स’ और ‘कन्ट्राडिक्शन्स’ को वह बार-बार नए दृष्टिकोण से समझने की कोशिश करता रहता। उसे लगता कि बिलावों,  बिल्लियों और बलुटनों  के बिना कुत्ते उदास नजर आते हैं और कुत्तों के बिना बिलाव, बिल्लियां ओर बलुटनें असुरक्षित महसूस करते हैं। बिलाव, बिल्लियां और बलुटने चूहों की तलाश में सारा दिन लगे रहते हैं। कोई चूहा मिल जाता है तो खुश दिखाई पड़ते हैं, नहीं मिलता है तो ऐसे लगता है जैसे बिना शिकार के कोई शिकारी वापस लौट आया हो। कुत्तों को जिस दिन कैंटीन में कोई मुर्गा हाथ लग जाता है तो शाम तक मूछों पर जीभ फेरते रहते हैं। कुत्तों और बिलावों में कभी-कभार झगड़ा होता नजर आता है लेकिन थोड़ी ही देर बाद सब फिर पहले जैसे खेलते, खाते, घूमते दिखाई पड़ते हैं।उसे लगता कि चूहों की आपसी लड़ाई और अकेले होने की कमजोरी का फायदा कुत्ते और बिलाव दोनों उठाते हैं। बिलावों और कुत्तों में वास्तव में कोई बैर नहीं है बशर्ते कि मिल-बांटकर खाने को बराबर मिलता रहे। सारी लड़ाई किसी एक द्वारा अकेले सब कुछ हड़प् कर जाने की है।

कुछ दिन बाद, जब भी उसे घूस का ध्यान आता तो वह यह सोचकर डरने लता कि घूस ने नीचे ही नीचे सारी जमीन खोखली कर दी होगी। जमीन पर पांव रखते हुए उसे भय रहता कि कहीं वह धंस न जाए। सड़क पर जाते हुए वाहन जब दूर जाकर दिखना बंद हो जाते तो उसे लगता जैसे धरती में समा गए होंगे। कमरे में सोते हुए उसे लगता जैसे रात को दीवार के नीचे दब जाएगा। बार-बार किताबें निकालकर देखता कि कहीं घूस कुतर तो नहीं गई। वह बार-बार सोचता कि धरती के नीचे बिल बना रही घूसों की कुतर-कुतर की आवाज लगातार बढ़ती जा रही है। कमरे में घुसता तो डर लगता, बाहर घूमता तो बेचैनी होती कि किसी तरह अपने कमरे पर पहुंच जाए। कुछ दिन बाद तो घूस के भय से वह इतना आतंकित हो गया कि शूटिंग पर जाने से भी डरने लगा। किसी से कहता कि घूस ने नीचे ही नीचे सारी जमीन खोखली कर दी है तो लोग हंसते और कहते, ‘‘लगता है पागल हो गए हो।’’

उस दिन वह कोर्ट-कैंटीन कई दिन बाद पहुंचा था। कैंटीन में घुसते ही उसने चारों ओर नजर घुमाकर देखा लेकिन एक भी बिलाब, बिल्ली या बलुटना नजर नहीं आया। अजीब सन्नाटा था। उसकी समझ में ही नहीं आया कि आखिर वे सब कहां चले गए। वह तेजी से कदम बढ़ाता हुआ अंदर पहुंचा तो हाल में मुश्किल से दो-चार लोग ही बैठे थे। वहां भी उसे कोई बिलाव, बिल्ली या बलुटना नजर नहीं आया। वेटर आया तो उसन आर्डर देने से पहले उससे पूछा, ‘‘भाई, यहां जो बिलाव, बिल्लियां और बलुटनें घूमते रहते थे…?’’
वेटर ने सुना तो हंसने लगा और मजाक के लहजे में बोला, ‘इंडिया गेट घूमने गये होंगे।’’
वह वेटर के मुंह की तरफ देखता रहा। वेटर ने चुप्पी तोड़ी और बोला, ‘‘क्या लाऊं साहब।’’
उसने चाय पी और बाहर निकलने ही वाला था कि तभी उसके पास वह टाइपिस्ट आ खड़ा हुआ जो उसे अक्सर वहां आता देखकर पहचानने लगा था।
टाइपिस्ट ने नमस्ते की और पूछा, ‘‘क्यों जनाब कैसे हो?’’
उसने कहा, ‘‘अच्छा हूँ… पर वो बिलाव, बिल्लियां और….?
टाइपिस्ट ने बताया, ‘‘अरे भाई जान, क्या पूछते हो। कुछ दिन हुए पता नहीं कहां से एक ‘‘जंगली कुतिया’’ यहां घुस आई और टॉयलट के बाहर सोये एक बलुटने को मुंह में दबाकर भाग गयी। तब से यहां कोई बिलाव, बिल्ली या बलुटना दिखाई नहीं पड़ रहा। कहते हैं, सब जंगल में उस जंगली कुतिया को ढूंढ रहे हैं।’’

वह वहां से फिर ‘‘शूटिंग’’ पर चला गया और रात को देर गए कमरे पर पहुंचा। रास्ते भर उसे लगता रहा कि घूस उसका पीछा कर रही है। लेटे-लेटे वह न जाने क्यों बार-बार बिलावों, बिल्लियों, बलुटनों, कुत्तों, चूहों और घूस के बारे में सोचता रहा। उसने देखा कि वह कोर्ट कैंटीन में बैठा चाय पी रहा था कि तभी एक बहुत जोर का धमाका हुआ जैसे कोई बम फटा हो। सब कुछ के साथ वह भी धीरे-धीरे नीचे धंसने लगा और उसके ऊपर किताबें, फाइलें और मलबा गिरने लगा। थोड़ी देर बाद उसके चारों ओर पानी ही पानी और पानी में तैरती किताबें फाइलें और मरे हुए चूहे नजर आने लगे। काफी हाथ-पैर मारने के बाद वह ठीक से खड़ा हो पाया तो उसे लगा जैसे वह किसी लंबी अंधेरी गुफा में फंस गया है। वह धीरे-धीरे सुरंग में चलने लगा। काफी दूर पहुँच कर उसे ध्यान आया कि उसके पास टार्च है। टार्च जलने की बहुत कोशिश करता रहा पर टार्च जली ही नहीं। वह धीरे-धीरे अंधेरे में ही चलता रहा। घंटों सुरंग में चलते-चलते वह हांफने लगा और उसे बाहर निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आया। वह एक पल सोचता कि इस सुरंग से निकलना मुश्किल है पर दूसरे ही क्षण उसे लगता कि आखिर कहीं न कहीं तो खत्म होगी ही। वह चलता रहा… चलता रहा… और जब हल्की-सी रोशनी दिखाई देने लगी तो उसकी सांस में सांस आई। कुछ कदम और चलते ही उसके सामने जानी-पहचानी संसद कैंटीन थी और कैंटीन में लंगूर ही लंगूर। वह बिना कुछ और देखे सीढि़यां चढ़ने लगा। जब बाहर निकला तो उसने देखा कि वहां गुम्बद पर गड़े लोहे के पोल पर झंडा लहरा रहा है, चारों ओर बनी इमारतें धरती में धंस गई है और आकाश में चीलें मंडरा रही हैं।

जब आंख खुली तो उसे लगा जैसे दमघोंटू विषैली गैस में घिर गया है और मरे हुए चूहों की गंध उसकी नस-नस में भरती जा रही है। वह जल्दी से उठा, जूते पैरों में फंसाये और झोला उठाकर कमरे से बाहर निकल आया। रास्ते में चाय की दुकान पर अखबार उठाकर देखा तो पहले पेज पर दो फोटो छपे थे। पहले में बहुत से बिलाव, बिल्लियां और बलुटनों एक झाड़ी को चारों ओर से घेरे खड़े हैं मगर झाड़ी में जंगली कुतिया का नामोनिशान तक नहीं है। दूसरे में-एक बड़ी सी कोठी के बाहर लॉन में कुर्सी पर बैठा वनमानुष पांव चाटती घूस की पीठ पर हाथ फेर रहा है, सामने गुर्राने की मुद्रा में जंगली कुतिया खड़ी है और चारों तरफ पहरा देते काले बिलाव घूम रहे है।
फोटो के नीचे उसका अपना नाम छपा था।

वह जब चाय पीकर उठा तो उसे ध्यान आया कि सूरज निकलने में अभी समय है और उसे ‘शूटिंग’ पर जाना है।

समाप्त






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डा. अम्बेडकर की पहली जीवनी का इतिहास और उसके अंश

संदीप मधुकर सपकाले 


डा. अम्बेडकर  की प्रमुख जीवनियों में  चांगदेव भवानराव खैरमोड़े द्वारा लिखित जीवनी (मराठी, प्रथम खंड प्रकाशन 14 अप्रैल 1952), धनंजय कीर द्वारा लिखी डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर  की जीवनी ‘Dr. Ambedkar: Life and Mission’ (अंग्रेजी, प्रकाशन 1954) तथा चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु द्वारा लिखित जीवनी ‘बाबा साहेब के जीवन संघर्ष’ (हिन्दी, प्रकाशन 1961) हैं. इन सारी जीवनियों से पहले डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  के जीवन काल में उनके समकालीन तानाजी बालाजी खरावतेकर ने सन 1943 में ‘डॉ.अम्बेडकर ’ शीर्षक से एक जीवनी लिखी थी.  संदीप मधुकर सपकाले बता रहे हैं इस पहली जीवनी के बारे में और उसका हिन्दी अनुवाद भी प्रस्तुत कर रहे हैं. पढ़ें  इस जीवनी के लेखन की प्रक्रिया का प्रसंग और जीवनी के  कुछ अंश: 



“चवदा एप्रिल एक्यानौ साली (1891) साली महू गावत जन्माला आला…झो बाळा, झो, झो रे, झो”पाळणा गीत
मराठी लोकगीतों की एक शैली ‘पाळणा’हैं जिसका शाब्दिक अर्थ ‘झूला’ है | बच्चें के जन्म के बाद जब उसे पहली बार झूले में डाला जाता हैं तब घर-परिवार की स्त्रियों द्वारा उस बच्चे को झूलाते हुए डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  की जीवन गाथा को गाने की इस लोकशैली को ‘पाळना’ कहा जाता है|

मराठी के लोकगीतों में डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  का व्यक्तित्व युगपुरुष महानायक के रूप में आता हैं | मराठी लोकगीतों में ईश्वर भक्ति के लिए जहाँ एक ओर पुराणकथा और हिंदू मिथकीय मान्यताओं के गीत पीढ़ियों से चले आ रहे हैं उसी लोक में डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  के संघर्षपूर्ण जीवन-कार्यों से प्रेरित होकर दलितलोक ने परम्परा से चले आ रहे कल्पित वर्णन विषयों को त्यागकर डॉ.अम्बेडकर  के जीवन दर्शन को उन्ही परंपरागत लोकगीतों की शैली का विषय बनाया | कालांतर से अम्बेडकर  आंदोलन की पृष्ठभूमि में इन लोकगीतों की हिंदू आस्थाओं, मान्यताओं और कथाओं के स्थान पर प्रमुखता से डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  का जीवन और दर्शन व्याप्त हो गया|
क्या आप जानते हैं गांधी की पहली जीवनी लेखिका कौन थीं, कब और किस भाषा की थीं ?

डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  के जीवन काल में उनके समकालीन तानाजी बालाजी खरावतेकर नेसन 1943 में ‘डॉ.अम्बेडकर ’ शीर्षक से एक जीवनी लिखी थी | इस जीवनी का लेखन उन्होंने कराची में किया था | श्रीयुत व्यंकटेश बा. ठाकुर की प्रेस रविकिरण छापखाना, असायलम रोड़, रणछोड़ लाइंस, कराचीमें महायुद्ध की स्थिति में उत्त्पन्न समस्याओं में कागज के अभाव के चलते 29 फरवरी 1946 को ‘डॉ.अम्बेडकर ’ जीवन चरित्र का मुद्रण प्रकाशन संभव हुआ था | जीवनी लेखक तानाजी बालाजी खरावतेकरइस जीवनी की भूमिका में लिखते हैं-
“डॉ.बाबासाहेब अम्बेडकर  की जीवनी को मैंने तीन वर्ष पहले ही लिखा था लेकिन कागज की कमी के चलते यह प्रकाशित नहीं हो पायी थी | पिछली जनवरी में रविकिरण के उत्साही प्रबंधक श्री व्यंकटेश ठाकुर को कागज का लाइसेंस मिल गया था उसके मिलते ही उन्होंने इस जीवनी की छपाई की सारी जिम्मेदारी अपने पर ली इसलिए मैं मानता हूँ कि इस जीवनी के प्रकाशन का वास्तविक श्रेय उन्हें जाता हैं इस कार्य के लिए उनका जितना भी आभार माना जाए कम हैं | अब लाइसेंस तो मिल गया था लेकिन बाबासाहब के जन्मदिन के अवसर पर इस जीवनी का प्रकाशन भी किया जाना था | कागज की कमी के चलते मुझे इस जीवनी से आधे से ज्यादेकी सामग्री कम करनी पड़ी थी |मैं जानता हूँ कि इस जीवनी में कई कमियां भी रह गयी हैं लेकिन दूसरी आवृत्ति के सुयोग से इस कमी को मैं जरुर पूरा कर लूँगा”

आज कराची का नाम सुनते ही पराए देश का भाव हमारे मन में पैदा होता हैं | सन 47 के पहले कराची जब बॉम्बे प्रेसिडेंसी का हिस्सा हुआ करता था उस समय कोंकण और मुंबई से सैनिक एवं अन्य सरकारी सेवाओं में बड़े पैमाने पर अम्बेडकरी समुदाय कराची में रहा करता था | डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  की मराठी भाषा में जीवनी लिखनेवाले लेखक तानाजी बालाजी खरावतेकर का जन्म कराची के इसी परिवेश में हुआ था | यह निश्चित ही माना जा सकता हैं कि खरावतेकर ने अपने पददलित अस्पृश्य जाति बांधवों में डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  के जीवन दर्शन को प्रसारित करने के उद्देश्य से इस जीवनी का लेखन किया था | 14 अप्रैल सन 1952 में चांगदेव भवानराव खैरमोड़े ने डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  की बृहद शोध पूर्ण जीवनी के पहले खंड को प्रकाशित किया था | खैरमोड़े द्वारा लिखी जीवनी ‘डॉ.भीमराव रामजी अम्बेडकर  खंड 1 से 15’ आज मराठी में कुल 15 खण्डों में उपलब्ध हैं इस जीवनी के पहले पांच खंड खैरमोड़े के जीवन काल में प्रकाशित हो पाए थे | उसी तरह अंग्रेजी पाठकों तक सन 1954 में धनंजय कीर द्वारा लिखी डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर  की जीवनी ‘Dr. Ambedkar: Life and Mission’ भी पहुंची | हिंदी में डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  की जीवनी चंद्रिकाप्रसाद  जिज्ञासु  ने ‘बाबा साहेब के जीवन संघर्ष’ लिखी , जो 1961 में उनके ही बहुजन प्रकाशन, लखनउ से प्रकाशित हुई | तानाजी बालाजी खरावतेकर के बाद के जीवनीकारों में सी.बी.खैरमोड़े को बाबासाहब अम्बेडकर  का भरपूर सान्निध्य प्राप्त हुआ ठीक उसी तरह धनंजय कीर को उन लोगों का सान्निध्य और सहयोग मिला जिन्होंने प्रत्यक्ष रूप से डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  और अम्बेडकर  आंदोलन को अपना जीवन समर्पित किया था | उपरोक्त दोनों ही स्थिति खरावतेकर के साथ नहीं थी उन्होंने तत्कालीन समय में अपने बौद्धिक सामर्थ्य और 1943 तक उपलब्ध डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  के जीवन और कार्यों को आधार बनाकर पहली जीवनी ‘डॉ.अम्बेडकर ’ की रचना की थी | इस जीवनी को मराठी में पुनः डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  की 125वीं जयंती के अवसर पर ओब्सर्वर रिसर्च फाउंडेशन, मुंबई ने उपलब्ध करवाया हैं |

तानाजी बालाजी खरावतेकर

इस जीवनी के प्रकाशन कार्य के दौरान जीवनी लेखक की तबियत अचानक बिगड़ गयी थी कराची में रहते हुए उन्हें डाक्टरी सलाह दी गयी थी कि मौसम बदलाव के लिए वे मीरज जाए | मीरज में भी जब इस असाध्य रोग ने उन्हें नहीं छोड़ा तब वे मुंबई के किंग जॉर्ज मेडिकल में इलाज के लिए आए थे बाबासाहब की जीवनी के प्रकाशन के तीन माह बाद 5 सितंबर 1946 को खरावतेकर का दुःखद निधन उम्र के 26वें वर्ष में हो गया| डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  के जीवनी लेखक तानाजी बालाजी खरावतेकर मूलतःरत्नागिरी जिले की राजापुर तहसील के ‘खरवते’ गांव के थे | उनकी बाल्यकाल कीशिक्षा से उच्च शिक्षा तक की पढाई कराची में हुई थी | 1945 में मुंबई विश्वविद्यालय से उन्होंने इतिहास विषय लेकर बीए की डिग्री प्राप्त की थी | डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  के बाद कोंकण के अस्पृश्यों में ग्रेजुएट होने का श्रेय उन्हें मिला था | कराची से डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  को लिखे गए उनके एक पत्र से स्पष्ट होता हैं कि खरावतेकर अपने समय के एक प्रतिभासंपन्न उभरते हुए मराठी साहित्यकार भी थे | 

Karachi, 21.5.43
The Hon’bleDr.B.R.Ambedkar,
M.A.,LL.B.,Ph.D., Bar-at-Law,
Member of the Vice-Regal Executive Council, New Delhi.
May it please your honour;
I, the undersigned, TanajiBalajiKharawtekar, beg to state as under for favourable consideration.
I am young man of 22. I have recently appeared for the Inter Arts Examination of the Bombay University through the D.J.Sind College, Karachi and hope to pass it with credit. I belong to the martial Mahar Community of Maharashtra, my mother-tongue being Marathi, in which I have written several stories and articles, and they are published in Marathi papers.
I propose to join the war commission. In case I do so, I will be required to give up my College Education and I will not be able to fulfil my ambition & becoming a double graduate. But if I do not join the commission, I may not get another chance to better my prospects. I am thus in a fix. I therefore approach your honour with a humble request to please guide me, so that I shall be able to raise my status and also be in a position to serve my community, of which, you are sole leader, under your banner.
Hoping to be excused for troubles.
I beg to remain
Sir, Your most obedient servant
T. B. Kharawtekar
New Dubash Building
Napier Street, Karachi (Camp)

डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर  को बड़ी ही तन्मयता और समर्पण के साथ खरावतेकर ने 22 वर्ष की आयु में यह पत्र लिखकर अपनी उत्साही इच्छा को प्रकट किया था | डॉ.अम्बेडकर  के जीवन और कार्यों से प्रेरणा पाकर शिक्षित होनेवाले युवा वर्ग में खरावतेकर अग्रणी थे किंतु अपने शैक्षणिक जीवन को छोड़कर वे कमीशन की नौकरी से अपने अस्पृश्य वर्गों के लिए कार्य करना चाहते थे | खरावतेकर के पत्र को संज्ञान लेते हुए डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  ने उन्हें एक सन्देश भिजवाया था-
“उससे कहों की आगे की शिक्षा भी ग्रहण करेंऔर कमीशन की नौकरी के लिए परेशान न रहे”
“Tell him to take education and not bother about Commissions, etc”
स्पष्ट था कि यहसन्देश मात्र खरावतेकर जैसे शिक्षा ग्रहण करनेवाले युवा तक न होकर उन सभी अस्पृश्य युवाओं के लिए था जो शिक्षित होने के एक कठिन रास्ते पर आगे बढ़ रहे थे | खरावतेकर के पत्र को प्रत्युत्तर  देते हुए डॉ.अम्बेडकर  ने एक ड्राफ्ट तैयार किया था-
“Dear Mr.Kharawtekar,
I have received your letter of the 21st in which you have sought my advice regarding your career. My advice is that you must continue your studies and don’t think of employment until you have completed your academic ambitions.
Yours Sincerely”

विमर्श नहीं, विचारधारा : अस्मितावाद की जगह आंबेडकर-चिंतन

डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  और खरावतेकर के बीच संपर्क का पता इन पत्रों के माध्यम से जाना जा सकता हैं |
डॉ.अम्बेडकर  इस चरित्र ग्रन्थ जीवनी का मराठी भाषा में 70 वर्ष पूर्व प्रकाशन कराची में हुआ था | आंबेडकरी इतिहास के दस्तावेजों में जात-पात तोड़क मंडल के लिए लिखे गए डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  के भाषण का सैद्धांतिक सामाजिक महत्त्व हैं | ‘Annihilation of Caste’ जातिभेद का उच्छेद इस भाषण का तय स्थान लाहौर में था | कोंकण में दलित मुक्ति आंदोलन और अम्बेडकर  साहित्य के अनुसन्धानकर्ता प्रो.रमाकांत यादव को अपने शोधकार्य के दौरान जनता साप्ताहिक की प्रतियाँ मिली थी इस साप्ताहिक में रत्नागिरी जिले के राजापुर से गोवा तक के कार्यकर्ताओं ने 14 मई 1938 में ‘कोंकण मंचमहाल महार परिषद’ का आयोजन कणकवली में आयोजित कि थी जिसकी अध्यक्षता डॉ.अम्बेडकर  ने कि थी इस परिषद के पुराने कार्यकर्ताओं से प्रो.यादव ने साक्षात्कार किए थे इन्हीं साक्षात्कारों के प्रसंग में एक पंपलेट उन्हें मिला जिसमें दक्षिण कोंकण से राजापुर के जनार्दन आर.जाधव, एस.एस.तांबे, जी.एस.खरावतेकर मास्टरजी और काशीराम येसू खरावतेकर ने इस पत्रक के निवेदन में ‘डॉक्टर अम्बेडकर ’ इस जीवनी के प्रकाशन का उल्लेख किया था | प्रो. रमाकांत यादव ने इस जीवनी की एकमात्र प्रति को खरावतेकर के कराची में रहे घनिष्ट मित्र शिवराम कुरुंगकर से प्राप्त किया था | प्रो.यादव ने सन 2010 में इस जीवनी का पुनर्प्रकाशन भी किया था किंतु यह जीवनी फिर भी चर्चा में नहीं आ सकी | कराची छावनी में तत्कालीन समय में ‘आंबेडकरी भजनी मंडल’ की स्थापना के माध्यम डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  के विचारों का प्रसार किया जाता था | इस समय युवा कार्यकर्ताओं में बाळकृष्ण कदम, तुकाराम रत्नाजी मुणगेकर, गोपाळ काळू माने, लक्ष्मण मोहिते-कादवलकर, गोविंद सावंत-करंजेकर प्रमुख थे | म्युनिसिपल कौन्सेलर काळू उमाजी माने ने जनता साप्ताहिक की आर्थिक सहायता के लिए ‘जनता सहाय्य समिति’की स्थापना की थी | कराची के रतन तालाब, सदर में इन कार्यकर्ताओं ने एक कार्यालय बनाया था जिसे कराची में अम्बेडकर  आंदोलन का प्रमुख केंद्र माना जाता था | प्रस्तुत जीवनी से कुछ अंश मूल मराठी से हिंदी में अनूदित कर प्रस्तुत किए गए हैं |

डॉ.अम्बेडकर 
(डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  की 1946 में कराची से प्रकाशित सर्वप्रथम जीवनी)
जीवनी लेखक- तानाजी बालाजी खरावतेकर, बीए
प्रकरण एक 
वर्णव्यवस्था के समय से दबाएँ-कुचले गए दलित समाज को जागृत अवस्था में लानेवाले बनावटी और दिखावे के हिंदुत्व का हमारे भीतर संचार हुआ है ऐसी शेखी बघारने वाले हिन्दुओं कि छाती पर बैठकर वास्तविक कसौटी परखने वाले और अनायास ही अस्पृश्य वर्ग पर छींटे उड़ाने वाले अधमी लोगों के मुहँ पर कायम के लिए और खुलकर कालिख पोतनेवाले ऐसे हमारे परमपूज्य डॉ. भीमराव रामजी उर्फ़ बाबासाहेब अम्बेडकर  का जन्म तारीख 14 अप्रैल 1892  को उत्तर हिंदुस्तान के महू में हुआ था | डॉ.अम्बेडकर  के जन्म के समय उनके पिता कै.रामजी मालोजी सूबेदार इसी जगह पर सैनिक थे|

प्रकरण बारह
ईश्वर की राह
डॉ.अम्बेडकर  के कहे गए बोल यहाँ दिए बिना मन नहीं मान रहा हैं इसलिय यहाँ दे रहा हूँ –
“हमारा हिंदू धर्म पुरातन हैं| ग्रीक, रोमन जैसी पुरातन और प्रसिद्ध राष्ट्रों का नामोनिशान मिट गया हैं लेकिन हमारा हिंदू समाज आज भी जिंदा हैं हिन्दुओं द्वारा ऐसी शेखी अक्सर बघारी जाती हैं | इस दो कौड़ी के जीवन को जीना ही मनुष्य का मकसद नहीं होना चाहिए | मनुष्य आत्मसम्मान के साथ जी रहा हैं या नहीं इस बात महत्व इस बात का हैं | इस दृष्टिकोण से देखने पर पता चलता  हैं कि सिर्फ जिंदा रहकर ही हिंदू समाज ने कौनसी दिग्विजय प्राप्त कर ली ? दूसरों लादी गयी दासता को बेशर्मी से स्वीकार करने के अलावे उसने क्या किया हैं ? ऐसे जीवन जीने का भला क्या मतलब | अपने बल अपनी ताकत पर दो दिन जिंदा रहना सौं साल के गुलाम जीवन जीने से लाख गुना बेहतर हैं | दो लोगो कि लड़ाई में कोई एक पलायन करके भी अपना जीवन जी लेता हैं वहीँ दूसरा अपने प्रतिद्वंद्वी को हराकर जीवन जीता हैं | भागकर और दूसरों के वर्चस्व को स्वीकारते हुए जीवन जीने वाला मनुष्य भला क्या प्राप्त करता हैं ! वह गुलाम बनकर अपने स्वत्व को भूल जाता हैं और गुलामों के काफिलों की संख्या बढ़ता हैं बल्कि ऐसा मनुष्य नामर्दांगी का फैलाव करने लगता हैं इससे बेहतर तो उसका मर जाना हैं इसमें क्या बुराई हैं ? हिंदू समाज दूसरों का दास और गुलाम बनकर ही क्यों रहा इसपर विचार करने पर पता चलता हैं कि वे अपने उद्धार के लिए “ईश्वर की राह” ताकते हुए बैठे थे यही इसका कारण हैं यह मेरी दृढ़ मान्यता हैं | इस दुनिया में ईश्वर हैं या नहीं हैं इसपर विचार करते रहना आपके लिए एक अनावश्यक शगल हैं |

प्रकरण ग्यारह
तत्व/दर्शन
डॉ.साहब द्वारा प्रतिपादित दर्शन इस प्रकार हैं-
• जिस धर्म में मनुष्य का मनुष्य के साथ मानवतापूर्ण व्यव्हार का निषेध हैं वह धर्म न होकर आधिपत्य की एक सजावट हैं |
• अपनी वाणी में ईश्वर एक हैं कहनेवाले और कर्म में मनुष्य को पशुतुल्य माननेवाले लोग दाम्भिक हैं उनकी संगत नहीं करें |
• अशिक्षितों को अशिक्षित, निर्धनों को निर्धन रहने कि शिक्षा देनेवाला धर्म नहीं वस्तुतः दंड का एक विधान हैं |
• जिस धर्म में मनुष्य कि मनुष्यता कि पहचान करना अधर्म माना जाता हैं वह धर्म न होकर एक रोग हैं |
• चींटियों को शक्कर खिलानेवाले और मनुष्य को पानी न पीलाकर मार देनेवाले लोग दांभिक हैं उनकी संगत नहीं करें |
• जिस धर्म में किसी पशु के स्पर्श हो जाने को स्वीकार किया जाता हो और मनुष्य का स्पर्श निषिद्ध हो वह धर्म न होकर एक पागलपन हैं |
• जो धर्म किसी वर्ग विशेष के विद्यार्जन, धनसंचय और शस्त्र धारण करने पर रोक लगाने कि शिक्षा देता हो वह धर्म न होकर मनुष्य जीवन कि एक विडंबना हैं |
• दूसरों को अपने पास करनेवाले और अपनों को अपने से दूर धकेलने वाले समाजद्रोही हैं उनकी संगत नहीं करें |
जयभीम वाला दूल्हा चाहिए

प्रकरण दस
राजनीतिक नेताओं से तुलना
डॉ.बाबासाहेब, महात्मा गाँधी जैसे ही लोकप्रिय हैं | उनकी जगह जवाहरलाल नेहरु के समाजवाद की वास्तविकता का डेरा हैं लेकिन वह सिर्फ नाममात्र के लेखन या व्याख्यान के लिए ही सीमित नहीं हैं | वे कट्टर जातिनिष्ठ हैं किन्तु अपनी जाति अधिकारों कि मर्यादा उनकी संख्या के अनुपात से बाहर जाकर बैरिस्टर जिन्ना के समान जातिवाद को मिटाने कि संभावनाओं को उन्होंने ख़त्म नहीं किया हैं | राजगोपालाचारी की व्यावहारिक राजनीति की तरह राजनीति और समाजशास्त्र के लेखक भी वे हैं | सर तेजबहादुर सप्रू के राजनीतिक अध्ययन कि तरह डॉ.साहब का राजनीतिक अध्ययन गहरा हैं लेकिन सर सप्रू कि तरह के वे नरमदलवादी भी नहीं हैं | लोकमान्य तिलक कि तरह वे राजनीतिक दावपेंच बेलगाम खेलते हैं परंतु उनकी तरह पुरातन रूढ़िवादिता से चिपके रहने के वे आदि भी नहीं  हैं |
सारांश, बाबासाहब के भीतर, गांधीजी सी लोकप्रियता, जवाहरलाल जैसा समाजवाद, बैरिस्टर जिन्ना की जातिनिष्ठता, राजगोपालाचारी जैसी व्यावहारिक राजनीति, सर सप्रू सी राजनीतिक अध्ययनशीलता, लोकमान्य तिलक जैसे राजनीतिक दांवपेंच और सुभाषचंद्र बोस के समान साहसी गुणों का समन्वय हुआ हैं|

प्रकरण नौ
राजनीतिक कर्तव्य
हमारी उन्नति कैसे होगी ? इसका संपूर्ण विचार करने पर अस्पृश्य वर्ग को ज्ञात हुआ कि मनुस्मृति को जलाने के बाद वर्णव्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह किया जाए | ऐसा करने का कारण हैं कि उस समय के सपृश्य सवर्णों द्वारा अस्पृश्यों का अतिशय अमानवीय दमन | अस्पृश्य होने का अर्थ हैं कि आपको व्यापर का अधिकार नहीं, खेती करने और क्षत्रियों के समान शस्त्र धारण करने कि संपूर्ण बंदी ऐसी मान्यता पहले के सवर्ण स्पृश्य समाज में व्याप्त थी |
ऐसी मान्यता कितनी मूर्खतापूर्ण थी इसे बताने का अब औचित्य भी नहीं हैं किंतु इस कारण ऐसा हुआ कि स्पृश्य वर्ग ऊपर कि ओर बढ़ता गया और अस्पृश्य वर्ग नीचे मुहँ बाहे खड़ा रहा | उसके हाथ सत्ता नहीं होने के चलते उसकी गुलामी से भरी दासता कायम रहीं | डॉ. साहब ने जैसे ही इस बात को अपने हाथों लिया वैसे ही इस पुरातन मान्यतावाली जमीन पर एक नई दिशा की शुरुआत हुई |
डॉ.साहब की राजनीतिक लड़ाई के प्रमुख प्रसंगों को देखा जाए तो उसमें – 1919 का कानून, सायमन कमीशन, राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस, पुणे पैक्ट 1935 का कानून, 8 अगस्त 1940 की घोषणा और सर क्रिप्स का आगमन – यह क्रम हैं तब इनपर क्रमवार विचार करना उचित होगा | इस जीवनीकी प्रस्तुत भूमिका के अंत में तानाजी बालाजी खरावतेकर अपनी सघन भावनाओं को प्रकट करते हुए लिखते हैं – मुझे स्नेह करनेवालों ने इस जीवनी के लेखन में मेरा सक्रीय साथ दिया हैं | उनके प्रोत्साहन के बल पर मैं इसे लिख पाया हूँ आगे भी वे इसी तरह मेरा साथ देंगें | मेरे अस्पृश्य जाति बंधू और भगिनियों से निवेदन हैं कि वे इस किताब को अपने बच्चों को पढने के लिए दें अपने समाज के उत्कर्ष कि स्फूर्ति को वे अपने ह्रदय में उत्पन्न करेंगें ऐसा इस पुस्तक को लिखने का मेरा एकमात्र उद्देश्य हैं | सत्य संकल्प के दाता दयाधन परमेश्वर इस इच्छा को पूर्ण करें |
ता.बा.खरावतेकर, कराची, 29.3.1946

स्त्रीवादी आंबेडकर की खोज
1. प्रकाशन 
2.  जन्म 14 अप्रैल 1891, मध्यप्रदेश के महू में हुआ | लंबे समय तक लोगों में डॉ.आंबेडकर के जन्म वर्ष को लेकर एकमत नहीं था | उनके कॉलेज रजिस्टर से 14 अप्रैल 1891 की पुष्टि, बाद के जीवनीकारों ने की है| 


स्त्रीकाल के संस्थापक सदस्यों में रहे संदीप मधुकर सपकाले महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. संपर्क: 8668784132



फोटो: गूगल से साभार 
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क्या आप जानते हैं गांधी की पहली जीवनी लेखिका कौन थीं, कब और किस भाषा की थीं ?

संदीप मधुकर सपकाले 

महात्मा गांधी की किसी भी भाषा में  पहली जीवनी मराठी में 1918 में लिखी गयी थी. अवंतिकाबाई गोखले द्वारा लिखी गयी इस जीवनी  की प्रस्तावना उस समय के सबसे बड़े नेता लोकमान्य तिलक ने लिखी थी. सबसे रोचक है यह जानना कि तिलक गांधी के बारे में 1918 में किन शब्दों में लिख रहे हैं. संदीप मधुकर सपकाले प्रथम जीवनी और जीवनी लेखिका के बारे में बता रहे हैं. एक जरूर पठनीय लेख.  इस आत्मकथा को संदीप हिन्दी में अनूदित भी कर रहे हैं.

नोआखाली  में महात्मा गांधी

महात्मा गाँधी का जीवन चरित्र विशेष परिचय, लेख और व्याख्यान, 1918 
(जीवनी लेखिका सौ.अवंतिकाबाई गोखले के कार्यों के सन्दर्भ में )

अवंतिकाबाई गोखले का जन्म महाराष्ट्र के तासगांव (पुराना सतारा जिला) में चितपावन ब्राह्मण परिवार में विष्णुपंत जोशी और सत्यभामाबाई के यहाँ हुआ था| उनके पिता विष्णुपंत जोशी एक रुढ़िवादी गृहस्थ थे किंतु रेलवे की नौकरी के चलते उन्हें अपना पैतृक निवास स्थान छोड़कर इंदौर में बसना पड़ा था | इंदौर में ही अवंतिकाबाई के पडोसी और साथी रेल-कर्मी नागपुर निवासी गोपालराव गोखले के पुत्र बबनराव गोखले के साथ उनका विवाह नौं वर्ष की आयु में सन 1891 में हुआ था | अपने पिता की रुढ़िवादी सोच के कारण अवंतिकाबाई को अपने ही घर से प्रारंभिक शिक्षा नहीं मिल पायी थी लेकिन विवाह के उपरांत उनके पति बबनराव गोखले ने उन्हें घर से ही पढ़ना प्रारंभ किया | बबनराव गोखले पेशे से इंजीनियर थे और मशीनरी पर काम सीखने के उद्देश्य से सन 1895 में नागपुर से लन्दन और चीन की यात्रा पर चले गए थे | गोपालराव गोखले ने अपनी पुत्रवधू अवंतिकाबाई की पढाई को रुकने नहीं दिया बल्कि उन्हें मिडवाईफरी (Midwifery)/नर्सिंग के डिप्लोमा की पढाई करवाई, जिसमें अवंतिकाबाई ने प्रथम श्रेणी में 1901 में उत्तीर्ण किया था | 1898 और 1903 में मशीन पर हुए किसी हादसे में बबनराव के हाथ क्षतिग्रस्त हो गएथे जिसके बाद उन्होंने विदेश छोड़कर 1904 से लेकर बाद का पूरा समय भारत में बिताया था | पति पर आए इस संकट के बावजूद अवंतिकाबाई ने अपने सवास्थ्य सेवाओं और सामाजिक कार्यों को प्रारंभ रखा था |सन 1904 से 1912 तक अवंतिकाबाई देशभर में नर्सिंग सेवाओं के लिए प्रसिद्ध हो चुकी थी | 1913 में उन्होंने सोशल सर्विस लीग के लिए काम करना शुरू किया था जिसमें कई सामाजिक कार्यकर्ताओं से उनकी भेंट हुई थी | रानी इचलकरंजी के साथ उन्होंने लंदन की यात्रा की थी | इस यात्रा में उन्होंने लंदन के अस्पताल एवं स्वास्थ्य सेवाओं का अध्ययन भी किया था | इस यात्रा में उन्हें गोपालकृष्ण गोखले और सरोजिनी नायडू से मिलने का अवसर भी प्राप्त हुआ था जिसके चलते राष्ट्रीय आंदोलन से आनेवाले समय में जुड़ना संभव हुआ था |

 गांधीजी ने अपनी आत्मकथा में चम्पारण के अपने सहयोगियों के कार्यों का वर्णन करते हुए अवंतिकाबाई गोखले की भूमिका को इस तरह प्रस्तुत किया है-
“साथियों से सलाह करके पहले तो छह गाँवो में बालको के लिए पाठशाला खोलने का निश्चय किया । शर्त यह थी कि उन गाँवो के मुखिया मकान और शिक्षक का भोजन व्यय दे , उसके दूसरे खर्च की व्यवस्था हम करे । यहाँ के गाँवो मे पैसे की विपुलता नही थी, पर अनाज वगैरा देने की शक्ति लोगों मे थी । इसलिए लोग कच्चा अनाज देने को तैयार हो गये थे| महान प्रश्न यह था कि शिक्षक कहाँ से लाये जायें ? बिहार मे थोड़ा वेतन लेने वाले अथवा कुछ न लेनेवाले अच्छे शिक्षको का मिलना कठिन था । मेरी कल्पना यह थी कि साधारण शिक्षको के हाथ मे बच्चो को कभी न छोडना चाहिये । शिक्षक को अक्षर-ज्ञान चाहे थोड़ा हो , पर उसमे चरित्र बल तो होना ही चाहिये । इस काम के लिए मैने सार्वजनिक रूप से स्वयंसेवको की माँग की । उसके उत्तर मे गंगाधरराव देशपांडे ने बाबासाहब सोमण और पुंडलीक को भेजा । बम्बई से अवन्तिकाबाई गोखले आयी । दक्षिण से आनन्दीबाई आयी । मैने छोटेलाल, सुरेन्द्रनाथ तथा अपने लड़के देवदास को बुला लिया । इसी बीच महादेव देसाई और नरहरि परीख मुझे मिल गये थे । महादेव देसाई की पत्नी दुर्गाबहन और नरहरि परीख की पत्नी मणिबहन भी आयी । मैने कस्तूरबाई को भी बुला लिया था । शिक्षको और शिक्षिकाओ का इतना संघ काफी था । श्रीमती  अवन्तिकाबाई और आनन्दीबाई की गिनती तो शिक्षितो में हो सकती थी, पर मणिबहन परीख और दुर्गाबहन को सिर्फ थोडी-सी गुजराती आती थी । कस्तूरबाई की पढाई तो नहीं के बराबर ही थी । ये बहनें हिन्दी-भाषी बच्चो को किसी प्रकार पढ़ाती ?चर्चा करके मैंने बहनों को समझाया कि उन्हें बच्चों को व्याकरण नहीं,  बल्कि रहन-सहन का तौर-तरीका सिखाना है । पढना-लिखना सिखाने की अपेक्षा उन्हें स्वच्छता के नियम सिखाने हैं । उन्हें यह भी बताया कि हिन्दी, गुजराती, मराठी के बीच कोई बड़ा भेद नही है , और पहले दर्जे मे तो मुश्किल से अंक लिखना सिखाना है । अतएव उन्हें कोई कठिनाई होगी ही नहीं । परिणाम यह निकला कि बहनों की कक्षायें  बहुत अच्छी तरह चली । बहनों मे आत्मविश्वास उत्पन्न हो गया और उन्हें अपने काम मे रस भी आने लगा । अवन्तिकाबाई की पाठशाला आदर्श पाठशाला बन गयी । उन्होने अपनी पाठशाला मे प्राण फूँक दिये । इन बहनों द्वारा गाँवो के स्त्री-समाज मे भी हमारा प्रवेश हो सका था”1 

पुणे पैक्ट के पूर्व गांधी का अनशन





1927 में प्रकाशित आत्मकथा अथवा सत्य के प्रयोग से पहले गांधीजी के व्यक्तित्व और जीवन कार्यों की प्रेरणा से अवंतिकाबाई गोखले ने ‘महात्मा गांधी यांचे चरित्र- विशेष परिचय, लेख व व्याख्यान’ (महात्मा गांधी का जीवन चरित्र- विशेष परिचय, लेख एवं व्याख्यान)इस प्रथम मराठी जीवनी का प्रकाशन सन 1918 में  हुआ था | गांधीजी की इस सर्वप्रथम मराठी जीवनी की विशेषता यह है कि इस जीवनी की प्रस्तावना लोकमान्य तिलक द्वारा लिखी गयी है |

अवंतिकाबाई जीवनी की शुरुआत में लिखती हैं “चंपारण में महात्मा गांधी के मार्गदर्शन में स्वयंसेविका का काम करते हुए उनके जीवन चरित्र को लिखने का विचार मेरे मन में आया था | इसी दौरान उनके भाषणों की अंग्रेजी किताबें पढ़ते हुए यह विचार और भी दृढ़ हो गया था | इस जीवनी को लिखते हुए थोडा-बहुत ही सही लेकिन उनके सान्निध्य में रहने का मौका मिला था | उसपर भी प्रभु रामचंद्र और भगवान बुद्ध के चरणों से पुनीत और महात्मा गांधी के सत्याग्रह से फिर चर्चा में आयी बिहार की इस भूमि पर ही इस काम को करने का अवसर मुझे मिला | जीवन चरित्र लिखने की शुरुआत तो हो चुकी थी | लेकिन इसकी भूमिका किससे लिखवाई जाए इसका रहस्य भी बना रहा उसी समय लोकमान्य तिलक ने भूमिका लिखने की मेरी विनती को स्वीकार कर लिया था | अपने बहुत से कार्यों की व्यस्तताओं के बावजूद मेरी निराशा न हो इसलिए उन्होंने इस जीवन चरित्र की प्रस्तावना के दो शब्द लिखकर दिए जिसके लिए उनका जितना भी आभार माना जाए कम है | महात्माजी से मुझसे अधिक परिचय है ऐसे मित्रों ने ‘विशेष परिचय’ और उनके अंग्रेजी भाषणों के मराठी अनुवाद सहर्ष करके दिए थे जिस कारण यह पुस्तक अपने इस मूर्त स्वरुप में बाहर आ सकी | अकारण ही संदर्भ प्राप्त नहीं होने की अवस्था में (स्थलसंकोच)कई लेख और व्याख्यान प्रकाशित नहीं हो पाएं | जिस किसी भी लेख अथवा भाषण के संदर्भ नहीं दिए गए हैं उन्हें मान लें कि वे ‘इंडियन ओपिनियन’ से लिए गए हैं | पुस्तक की तयारी में जिन लोगों ने सहायता की उन सभी का हृदयपूर्वक आभार मानते हुए पाठक वर्ग से बिनती करती हूँ कि इस पुस्तक को सिर्फ उपरी तौर पर न पढ़कर छोड़ें बल्कि उसका मनन करते हुए महात्माजी के उपदेशों के समान जीवन जीने का संभव हो, उतनी खटपट जरुर करें” (आत्माराम मेन्शन, गिरगांव, मुंबई, 1 जून 1918)2


मराठी पाठक वर्ग को इस जीवनी को पढने और गहराई से गांधी जीवन दर्शन को समझने का आग्रह अवंतिकाबाई करती हैं तो उसी तरह जीवनी की प्रस्तावना में लोकमान्य तिलक लिखते हैं- “बीते साल यानी 1917 के दिसंबर महीने में कलकत्ता कांग्रेस की सभा में गया था वहां सौ.अवंतिकाबाई गोखले ने बताया था कि वे महात्मा गांधी का चरित्र लिख रही हैं जिसकी प्रस्तावना लिखने की बिनती उन्होंने मुझसे की | यह बिनती अर्थात ही मुझसे अमान्य नहीं हो पायी | लेकिन उस समय मुझे इस बात की कल्पना तक नहीं थी कि इतनी जल्दी ये पुस्तक तैयार हो जाएगी | विशेषतः जब विदेश जाने के लिए निकला तब इस प्रस्तावना को इतनी जल्दबाजी में पूरा करना होगा इस बात को तब तक नहीं सोच पाया था | परंतु अब वैसी परिस्थिति बन चुकी हैं | अब जैसे-तैसे यह प्रस्तावना लिखनी पड़ रही है | महात्मा गांधी के जीवन चरित्र की प्रस्तावना लिखने के लिए थोड़ा अच्छा समय और फुर्सत मिलनी चाहिए थी वह मुझे मिल नहीं सकी | मुझे बुरा लग रहा हैं कि समय और फुर्सत के अभाव में मैं यह प्रस्तावना लिख पाया तथापि “अकारणान्मंदकरणं श्रेयः” इस न्याय से मैंने यह काम किया हैं | पुस्तक के पाठकऊपर व्यक्त वास्तविकता को ध्यान में रखकर मुझे माफ़ करेंगें ऐसी आशा करता हूँ”3 (पूणे शहर, 16 मार्च 1918, बाल गंगाधर तिलक) लोकमान्य तिलक ने दस पृष्ठों की अपनी प्रस्तावना में गांधीजी के उदार और शील चरित्र को पाठकों में बोधप्रिय और अनुकरणीय बनें इसी उद्देश्य से अवंतिकाबाई के द्वारा लिखी इस जीवनी को महत्वपूर्ण माना है |

सत्याग्रही महिलाओं के साथ गांधी

आगे तत्कालीन सन्दर्भ में गांधीजी के परिवेश को समझाते हुए तिलक लिखते हैं कि “महात्मा गांधी का नाम हिंदुस्तान में कोई नहीं जानता हो ऐसा नहीं हैं अर्थात उनके विषय में थोड़ी बहुत जानकारी प्राप्त करने की इच्छा भी सभी लोगों को हुई है, ऐसा कहने में कोई हर्ज नहीं लेकिन इस इच्छा को पूरा करने में मराठी भाषा में आज तक कोई पुस्तक उपलब्ध नहीं हैं सौ.अवंतिकाबाई ने इस सहज सरल जीवनी को लिखकर इस कमी को पूरा किया है| तब भी अवंतिकाबाई का कहती हैं कि महात्मा गाँधी का चरित्र अभी और भी आगे बढ़ने को हैं और आनेवाले भविष्य के जीवनी लेखकों के लिए यह पुस्तक दिशा दर्शक का काम करेगी”4 

सहज और सरल मराठी भाषा में लिखकर मराठी-पाठकों तक महात्मा गांधी की जीवनी को पहुँचाने के लिए तिलक ने स्वयं अवंतिकाबाई गोखले की सराहना की है | गांधी चरित्र की सादगी और वैचारिक उदात्त से प्रभावित जीवनी लेखिका ने जीवनी के आरंभ में ही लिखा है कि “इतने महान महात्मा के चरित्र को लिखने का काम मुझ जैसी अल्पमति स्त्री द्वारा किया जाना यानी छोटे मुंह बड़ी बात जैसा हुआ हैं | जिस तरह प्रभु के गुणगान की भक्ति का अधिकार सभी को हैं उसी तरह महात्मा के गुणों के गुणगान और भक्ति का अधिकार भी सभी के पास समान हैं | इसी भावना से प्रेरित होकर मैंने इस बिकट काम को हाथ में लिया हैं | दूसरा प्रमुख कारण ये कि मराठी में पाठक वर्ग के बीच ऐसे असाधारण व्यक्तित्व के चरित्र का फैलाव हो ऐसी मेरी दिली इच्छा हैं | मुझ जैसी अल्पमति स्त्री से जितना बन पड़ा उतना मैंने लिखने का विचार किया” 5

गांधीजी के प्रति उनके आंदोलन से जुडी आश्रमवासी स्त्रियों में कमोबेश यही भावना देखने को मिलती हैं जिसमें गांधीजी के प्रति भक्ति और समर्पण का भाव उन्हें राष्ट्र की स्वतंत्रता के साथ-साथ अपनी स्वतंत्रता के प्रति भी आश्वस्त करता हैं | गांधीजी के अहिंसक सत्याग्रह में अवंतिकाबाई जैसी स्त्रियों की भूमिका दृढ़ सत्याग्रही की थी | ये स्त्रियाँ शहरी और ग्रामीण दोनों स्तर पर शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता जैसे कार्यक्रमों में सक्रिय भूमिका में थी | परम्परागत हिंदू स्त्री की मानसिक संरचना में वर्ण की अपनी निजी समझ के अनुसार अवंतिकाबाई गांधी के जन्म के वर्णन में वे लिखती हैं कि “वैश्य कुल में जन्म लेने के बावजूद उनमें ब्राह्मणों के दैवीय शक्ति का वास है और क्षत्रियों में विद्यमान धैर्य भी उनमें पूरी तरह दिखाई पड़ता हैं”6

गांधी के परिवार की प्रारंभिक शिक्षा के बाद इंग्लैण्ड में उनकी शिक्षा, कस्तूरबा से विवाह और क्रमशः गांधीजी के सार्वजनिक राष्ट्रीय जीवन में प्रवेश जिसमें साउथ अफ्रीका, बोअर युद्ध आदि से जीवन चरित्र की आधार पृष्ठभूमि तैयार होती है | इन सबसे आगे बढ़कर भी अवंतिकाबाई कहती हैं कि “मोहनदास की हर-एक बात इतनी प्रशंसनीय हैं कि मुझ जैसी नई लेखिका के लिए इसका वर्णन कर पाना भी असंभव सा हैं प्लेग जैसी असाध्य और दुष्ट बीमारी से ग्रसित व्यक्ति के रिश्तेदार भी अंतसमय में उसके पास जाने से कतराते हैं जबकि मोहनदास ने प्लेग के रोगियों की सेवा खुद अपने हाथों से की”7

सन 1912 के यूनियन कानून के अंतर्गत अफ्रीका में जिन मुद्दों पर सत्याग्रह की स्थिति बनी थी उसपर गोखले की अफ्रीका यात्रा और अफ्रीका में गोखले-गांधी गुरुशिष्य संबंध को बताते हुए लिखती हैं कि “अपने गुरु के प्रेम के वश में होकर थोड़े समय के लिए अपने मत को वे किनारे कर लेते थे इसपर से देखा जा सकता हैं कि मि.गोखले पर उनका कितना निस्सीम प्रेम हैं”8

गांधी के साथ सत्याग्रह में स्त्रियों के आने की कहानी, जीवनी में इस प्रकार व्यक्त की गयी हैं “यूनियन सरकार ने विधी कौंसिल में एक नया कानून लाया | इस कानून का स्वरुप गंदा और अपमानजनक था कि हिंदी स्त्रियों तक को सत्याग्रही बनना पड़ा | इस कानून से हिंदू या मुसलमानी पद्धति से किए गए विवाह अवैधानिक माने जाएंगे इस कानून से हिंदी स्त्रियों को रखैल बनाकर उनकी संतति को संपत्ति का स्वाभाविक अधिकार न देते हुए सरकार द्वारा हड़प लेने की अद्भुत व्यवस्था इस कानून में सरकार ने अपने लिए कर ली हैं……..हिंदी राष्ट्र की पवित्रता पर आए इस संकट में सभी स्त्रियों ने अपने पातिव्रत्य की रक्षा के लिए, खुद की और अपने कुल की मर्यादाओं की रक्षा के लिए सत्याग्रह रूपि अग्नि में कूदने के लिए तैयार हो चुकी थी अच्छा हुआ कि महात्मा गांधी जैसे बुद्धिमान और सच्छील नेता इस समय अफ्रीका में मार्गदर्शक थे | अन्यथा हिंदी लोगों को शांत रख पाना इतना सरल भी नहीं था”9





ट्रांसवाल में कस्तूरबा और स्त्रियों के सत्याग्रह को अवंतिकाबाई ने विशेष प्रस्तुत किया हैं  “पहले सत्याग्रह के लिए पुरुषों को स्त्रियों द्वारा प्रोत्साहित किया जाता था लेकिन आज जब खुद स्त्रियों ने जेल जाने की ठानी है तब इन स्त्रियों का जेल जाना भी सत्याग्रह की शोभा बढ़ा रहा हैं | कई स्त्रियों ने गर्भवती होने के बावजूद भी जेल जाना स्वीकार किया है | कईयों ने अपने दूध पीते बच्चों को तक घर छोड़ दिया हैं | ट्रांसवाल के इस बंदिवास में जाने का एकमात्र कारण यह भी है कि आज तक किसी अश्वेत को यहाँ जाने नहीं दिया गया है | इन स्त्रियों के आंदोलन में उतरने की इस बातको  हमेशा ध्यान में रखना होगा की जेल में जानेवाला यह स्त्री समुदाय किसी भी बड़ी राजनीति में जाने का इच्छुक नहीं था और न ही वह बहुत शिक्षित भी था | लेकिन स्वाभिमान के इस दिव्य तेज को देखकर पुरुष सत्याग्रहियों में विशेष उत्साह का संचार हुआ था ऐसे में यूनियन गवर्मेंट के लोगों को एक धक्का भी लगा था | पश्चिमी लोगों की कल्पनाएँ और धारणाएं हम हिंदी स्त्रियों के प्रति अक्सर ऐसी रही है कि हिंदुस्तानी स्त्री यानी किसी सोने के पिंजरे में जकड़ा हुआ सुंदर पक्षी हो जिसे अपने खुद की बुद्धि भी न हो लेकिन अफ्रीका में सत्याग्रही इन स्त्रियों ने अपने अलौकिक धैर्य से इन धारणाओं को ध्वस्त कर दिया | इन सत्याग्रही स्त्रियों के बीच हमारी मिसेस गाँधी किसी सितारे की तरह चमक रही थी” 10

चंपारण सत्याग्रह


गांधीजी पर लिखी इस पहली मराठी जीवनी में गाँधी आंदोलन और उससे जुडी महिलाओं के विषय में कस्तूरबा पर अपने विचार रखते हुए लिखती हैं “यहाँ मिसेस गाँधी के बारे में लिखे बिना मेरा मन नहीं मान रहा हैं और इसमें कुछ गैर भी नहीं | वह सचमुच एक साध्वी स्त्री हैं | स्वभाव से ममतामयी, साधारणसा रहन सहन, लोकसेवा के लिए हमेशा तत्पर रहनेवाली, किसी भी परिश्रम के कार्यों को करने के लिए सजग रहनेवाली, हमेशा आनंद-वृत्ति में रहनेवाली, पति सेवा में तत्पर और पति की आज्ञा का पालन करनेवाली मिसेस गाँधी के इन सदगुणों पर महात्माजी को भी अभिमान होना चाहिए क्योंकि उनकी समस्त देश सेवा में इस सद्गुणी स्त्री का साथ हैं” 11





मुंबई के गिरगाव में 27 नवंबर 1918 को ‘हिंद महिला समाज’ बनाकर उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन के समानांतर स्त्री सशक्तिकरण में प्रमुख भूमिका निभाई थी |लगभग 38 वर्षों तक वे इस संगठन की अध्यक्ष रही | हिंदी महिला समाज के माध्यम से उन्होंने स्त्रियों को स्वावलंबी बनाने के उद्देश्य से सिलाई, कढ़ाई जैसे लघु उपक्रम सिखाने का काम किया जिसके माध्यम से शहरी स्त्रियों के लिए राष्ट्रीय आंदोलन के समानांतर रोजगार की एक जमीन भी तैयार हुई | सन 1926 से कुछ वर्षों तक के लिए वे मुंबई महानगर पालिका की सदस्या भी रही जिसके दौरान उन्होंने म्युनिसिपल अस्पतालों की सेवा सुविधाओं को बेहतर बनाने के साथ-साथ म्युनिसिपल कर्मचारियों की सुविधाओं के लिए भी अनेक कार्य किए | कांग्रेस की गतिविधियों में सहभागी होते हुए उन्हें 1920 से 1946 तक कई बार जेल जाना पड़ा था | गांधीजी द्वारा चलाए गए अस्पृश्यता निवारण कार्यक्रम में वे 1932 से सक्रीय सहभागी बनी रही | 24.09.1932 को गांधीजी और डॉ.बाबासाहब आंबेडकर के बीच हुए ऐतिहासिक पुणे पैक्ट के दूसरे दिन के हिंदू सम्मलेन में इस पैक्ट के समर्थन में हस्ताक्षर करनेवाली महिलाओं में हंसा मेहता और अवंतिकाबाई गोखले थी |12

‘भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में स्त्रियों की सहभागिता और कार्यक्रमों में अपनी क्षेत्रीय विविधिता होने के बावजूद वे राष्ट्रीय आंदोलन में एकसाथ मिलकर सत्याग्रह की भूमिका की नींव रख रही थी | असहयोग आंदोलन में बंगाल और महाराष्ट्र की भूमिका इसमें और भी मुखर स्वरुप की थी | मुंबई की डिस्ट्रिक्ट कांग्रेस कमिटी ने डिस्ट्रिक्ट वोलेंटियर बोर्ड का गठन किया हुआ था | डीसीसी या डीवीबी के अतिरिक्त स्त्रियों ने अपने राजनीतिक संगठन राष्ट्रीय स्त्री सभा (Independent Women’s Organisation ) का गठन सरोजिनी नायडू की अध्यक्षता में किया था | राष्ट्रीय स्त्री सभा की उपाध्यक्ष घोशिबेन नौरोजी और अवंतिकाबाई गोखले थी’|13 1930 के सत्याग्रह में समुद्र के पानी से नमक बनानेवाली स्त्रियों में अवंतिकाबाई गोखले और कमला देवी चट्टोपाध्याय का नाम प्रमुखता से आता हैं | मराठी में गाँधी चरित्र लिखने का अवन्तिकाबाई गोखले का उद्देश्य बहुत स्पष्ट था कि गाँधीजी के राष्ट्रीय आंदोलन में उपस्थित सादगीपूर्ण कर्मशील आदर्श जीवन को मराठी मानसमें प्रस्तुत करना था जिसे तिलक ने इस चरित्र कीभूमिका में भी प्रस्तुत किया हैं | अवन्तिकाबाई गोखले ने अपने से पूर्व गाँधी के एक और जीवनी लेखक मिस्टर डोक का स्मरण आद्य चरित्रकार के रूप में किया हैं | इस मराठी जीवनी के अंत में में वे लिखती हैं “ फ़िलहाल मैं चंपारण में स्वयंसेविका के अपने कामों में स्कूल की पढाई में अधिक व्यस्त हूँ जिस कारण लिखने के लिए बहुत कम ही समय मिलता हैं और यदि मिल भी जाए तो जल्दबाजी में किसी तरह कुछ लिख पाती हूँ लिखने का मेरा कोई अभ्यास भी नहीं हैं क्योंकि मैं कोई लेखिका भी नहीं हूँ, इसी कारण इस जीवनी में काफी दोष भी रह गए होंगे आनेवाले लेखक इन कमियों और दोषों को जरुर पूरा करेंगे क्योंकि गाँधी चरित्र का विकास दिनों दिन बढ़ने वाला हैं | जो भी कमियां या दोष रह गए होंगे उसके लिए आप मुझे माफ़ करेंगें लेकिन मेरे गुणग्राही बंधु भगिनी मेरे इस प्रयास की सराहना भी करेंगे ऐसी आशा करती हूँ”14 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे द्वारा गाँधीजी की हत्या के समाचार के बाद से अवन्तिकाबाई गोखले अस्वस्थ रहने लगी थी गाँधीजी की हत्या से आहत अवन्तिकाबाई गोखले का देहांत 26 मार्च 1949 को मुंबई में हुआ था | अवन्तिकाबाई पहली पीढ़ी की ऐसी गांधीवादी स्त्री थी जिन्होंने शहरी मध्यवर्गीयआधुनिक जीवनशैली को त्यागकर गाँधीजी के साथ राष्ट्रीय आंदोलन से जुडी थी |

संदर्भ सूची: 
1. गांधी, मोहनदास (1925) सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा, हिंदी अनुवाद, त्रिवेदी काशीनाथ(1957) नवजीवन प्रकाशन, अहमदाबाद, पृष्ठ संख्या 382-383
2.  गोखले, अवंतिकाबाई,(1918) (द्वितीय आवृत्ति 1972) महात्मा गांधी यांचे चरित्र : विशेष लेख व व्याख्याने, महाराष्ट्र राज्य साहित्य व संस्कृति मंडळ, मुंबई, पृष्ठ संख्या- 2
3. गोखले, अवंतिकाबाई,(1918) (द्वितीय आवृत्ति 1972) महात्मा गांधी यांचे चरित्र : विशेष लेख व व्याख्याने, महाराष्ट्र राज्य साहित्य व संस्कृति   मंडळ, मुंबई, पृष्ठ संख्या 7
4. वही, पृष्ठ संख्या 8
5. वही,  पृष्ठ संख्या 18
6. वही, पृष्ठ संख्या 19
7.  वही, पृष्ठ संख्या 33
8. वही, पृष्ठ संख्या 44
9.वही,  पृष्ठ संख्या45
10. वही, पृष्ठ संख्या 45
11. वही, पृष्ठ संख्या 95
12. Busi, S.N. BAWS, Vol. 17, Part 1, p. 202
13. Thapar, Bjorkert, Suruchi, Women in the Indian National Movement: Unseen Faces and Unheard Voices 14. (1930-1942)  Page No. 54-55 Sage Publication New Delhi
गोखले, अवंतिकाबाई,(1918) (द्वितीय आवृत्ति 1972) महात्मा गांधी यांचे चरित्र : विशेष लेख व व्याख्याने, महाराष्ट्र राज्य साहित्य व संस्कृति   मंडळ, मुंबई, पृष्ठ संख्या 96

सन्दर्भ ग्रन्थ–

गांधी, मोहनदास (1925) सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा, हिंदी अनुवाद, त्रिवेदी काशीनाथ(1957) नवजीवन प्रकाशन, अहमदाबाद

गोखलेअवंतिकाबाई,(1918) (द्वितीय आवृत्ति 1972) महात्मा गांधी यांचे चरित्र : विशेष लेख व व्याख्याने, महाराष्ट्र राज्य साहित्य व संस्कृति मंडळ, मुंबई

Busi, S.N. BabasahebAmbedkarWriting and Speeches, Vol. 17, Part-1

Thapar, Bjorkert, (1966) Women in the Indian National Movement: Unseen Faces and Unheard Voices (1930-1942) Sage Publication New Delhi

स्त्रीकाल के संस्थापक सदस्यों में रहे संदीप मधुकर सपकाले महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. संपर्क: 8668784132


फोटो: गूगल से साभार 
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जाति को नकारिये नहीं जनाब: यह जान ले लेती है

ज्योति प्रसाद 


चुनाव के बाद राजनीतिक दल अपने मुद्दों का भी मुद्दा बदल लेते हैं। नए नए मुद्दों में मुर्दे वाली सड़ांध होती है। इनका वास्तविकता की ज़मीन से कुछ लेना देना नहीं होता। एक हवाई क़िला खड़ा हो जाये बस यही उद्देश्य होता है। देश में लगातार आरक्षण के खिलाफ बहस होती रहती है और हर तरह का मीडिया अपना मत सामने रखता रहता है पर इसी देश में हर साल कितनी ही मौतें जातिगत भेदभाव की वजह से घट रही हैं, इन घटनाओं की सुध तक लेने वाला कोई नहीं है। कानून की किताब के बाहर सामाजिक समीकरण अभी तक जस के तस मौजूद हैं। गांवों में ही नहीं शहरों भी एक ऐसी पीढ़ी पढ़-लिखकर तैयार हो गई है जो अपने अधिनाम (सरनेम) के पीछे पागल हुई जा रही है। भारतीय लोग आज भी प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर भेदभाव करते हुए पाये जाते हैं।

विज्ञान पर हावी जातिवाद: 

एक अंग्रेज़ी अखबार की खबर के मुताबिक 15 अक्तूबर की सुबह, करीब 9 बजे बुलंदशहर के खेतलपुर भंसोली गाँव में रोजाना की तरह सावित्री देवी घरों से कूड़ा इकट्ठा कर फेंकने का काम कर रही थीं। उसी दौरान एक रिक्शा रास्ते में अचानक आया और वह अपना संतुलन खो बैठी और सीधे ऊंची जाति की एक महिला अंजु की बाल्टी से टकरा गईं। इसी बात पर अंजु अपना खो बैठी और सावित्री देवी को उनके पेट पर मारा। उनके सिर को दीवार से टकरा टकरा कर पीटा। इतना ही नहीं इस हैवानियत में अंजु के बेटे रोहित ने भी एक लाठी से हिस्सा लिया और बाल्टी को छूने का बदला सावित्री देवी को पीटते हुए लिया। इस घटना के 6 दिन बाद सावित्री देवी और उनके अजन्मे 8 महीने के बच्चे की मौत हो गई। सावित्री देवी के पति यह कहते हैं कि वे पत्नी को उसी रोज़ जिला अस्पताल ले गए पर उन्होंने यह कहते हुए इलाज़ से इंकार कर दिया कि किसी भी प्रकार की बाहरी चोट नहीं है, वापस घर ले जाओ। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सिर के अंदर लगे घाव को मौत की वजह बताया गया है।
इस देश के लीडरान को अपनी नज़रों को दुरुस्त करते हुए इस घटना पर गंभीरता से विचार करना और सोचना चाहिए। देश की तरक्की के लिए धुआँधार भाषणों की जरूरत नहीं होती। जुमलों की जरूरत नहीं होती। सभा और मुलाक़ातों की जरूरत नहीं होती। रैलियों की भी जरूरत नहीं होती। और न ही विदेशी दौरों की जरूरत होती है। जरूरत होती है दिमागदार जनता और दिमागदार नेताओं की जो मनुष्यता को साथ लेकर चलते हैं। जो कानून को गहरी आस्था के साथ समझते हैं। जो समानता को न सिर्फ किताबों में समझते हैं बल्कि उसे ज़मीन पर भी उतारते हैं। क्या समानता आसमानी फल है जो ज़मीन पर नहीं उग सकता?क्या सम्मान सिर्फ कुछ जातियों के पुरखों की जागीर है?…नहीं। गणराज्य भारत में सभी व्यक्ति समान हैं और सम्मान से जीने का हक़ रखते हैं।

यह कैसा देश है जो सन् 2017 में भी अपने इतिहास के खाते में दलितों के संग अन्याय को दर्ज़ कर रहा है!यह कोई नई घटना नहीं है बल्कि यह घटना सिलसिलेवार ढंग से अगड़ी जातियों द्वारा अंजाम दी जा रही हैं। बलात्कार से लेकर हत्या तक की जा रही है।

एक अंग्रेज़ी-भाषी बंगाली दलित महिला की कशमकश

एनसीआरबी के आंकड़ों पर नज़र डालें तब कुछ नंबर देश के कुछ राज्यों की जातिगत हिंसा की तस्वीर खींचते हैं। साल 2014 में उत्तर प्रदेश में 8066, राजस्थान में 6734, बिहार में 7874 और मध्य प्रदेश में 3294 शैड्यूल कास्ट के लोगों पर अपराध हुए हैं। हमें किसी भी तरह यह नहीं भूलना चाहिए थे कि ये आंकड़ें उन राज्यों में हैं जहां दलितों की स्थिति बहुत सोचनीय दशा में है। बहुत से मामले दर्ज़ नहीं किए जाते और कई बार लोग दर्ज़ करवाने भी नहीं जाते। आंकड़ों की वास्तविक संख्या कितनी होगी, यह कोई भी व्यक्ति समझ सकता है। मोहल्लों के छोटे–मोटे झगड़ों में लोग जाति सूचक शब्दों को आपत्तिजनक इस्तेमाल करते पाये जाते हैं।
इंडिया स्पेंड नामक ऑनलाइन वैबसाइट पर कुछ विश्लेषणात्मक लेख प्रकाशित किए गये हैं। इनमें सन् 2011 की जनगणना के कुछ आंकड़े पेश किए गये हैं। उसमें एसटी और एससी जातियों की शिक्षा, नौकरी आदि से संबन्धित आंकड़े रखे गये हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक एससी साक्षारता दर 66% और एसटी 59% थी। अनुसूचित जाति ऊंची साक्षरता प्रतिशत के अंतर्गत टॉप पाँच राज्यों में जगह बनाने वाले राज्य मिजोरम में 92%, त्रिपुरा में 90%, केरल में 89% गोवा में 84% और महाराष्ट्र में 80% है। वहीं नीचे से सोचनीय स्थिति वाले राज्य बिहार, झारखंड, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और आन्ध्र प्रदेश क्रमश: 40%, 56%, 60%, 62%, 62% है। आज़ादी के इतने सालों बाद भी हम आगे नहीं बढ़ पाये हैं।

ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (एचआरडी द्वारा) के आंकड़े भी बहुत कुछ कहते हैं। उच्च शिक्षा में टॉप पाँच राज्यों में मिजोरम, मणिपुर, मेघालय, तेलंगाना और तमिलनाडु क्रमश: 114.0%, 63.9%, 44.5%, 39.6% 33.7% है। उच्च शिक्षा में सबसे खराब पाँच राज्य बिहार, झारखंड, ओड़ीसा, पश्चिम बंगाल, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य क्रमश: 5.3%, 9.5%, 11.7%,12.9%, 13.6%है। कमाल की बात है कि बिहार के मुख्यमंत्री किसी एक मंत्री के भ्रष्टाचार पर अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनकर त्यागपत्र दे देते हैं पर कभी भी इन आंकड़ों पर नज़र तक नहीं डालते और न ही शर्मिंदा होते हैं।

फैंसी स्त्रीवादी आयोजनों में जाति मुद्दों की उपेक्षा

एनसीआरबी के ही आंकड़े बताते हैं कि साल 2014 में दलितों के खिलाफ़ 47,064 अपराध हुए। दलित महिलाओं के साथ बलात्कार के 2,233 मामले दर्ज़ हुए और हत्याओं की संख्या 744 रही। आंकड़े वही बात बता रहे हैं जो दर्ज़ किए ये हैं। जो दर्ज़ नहीं हुए वे अभी भी गुमशुदा हैं। हमारे देश में अहिंसा की बात बरसों से उठती रही है। इसके पीछे का वाजिब कारण यह है कि भारत के इतिहास में ही हिंसा का एक बड़ा धब्बा लगा है। विशाल लोगों के समूह को इंसान न मानकर जानवरों से भी खराब व्यव्हार के उदाहरण किताबों में भरे पड़े हैं। यह कैसा समाज है जो इंसान को इंसान नहीं मानता? आज भी तथाकथित उच्च जाति के लोग उस भयानक मानसिकता को ढो रहे हैं। दिल्ली में बैठे हुए लोग जब यह कहते हैं कि जातिगत भेदभाव पुरानी बात हुई तब जी खोलकर हंसने का मन करता है।

सावित्री देवी का अपने 8 महीने के अजन्मे बच्चे समेत मर जाना भारतीय समाज पर धब्बा है। यह उस विकास के मुंह पर थप्पड़ है जो विकास-विकास चिल्ला कर नाटक कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश की सरकार दीवाली पर अयोध्या में दीप उत्सव और ताजमहल की लफ़्फ़ाज़ी में उलझी हुई सरकार है। यह सरकारों का दिवालियापन ही है कि शिक्षा और सामाजिक बदलाव पर ध्यान न देकर दूसरे मामलों को मुद्दा बना रही है। राज्य और केंद्र की सरकारों के हाल को देखते हुए आज भी यह अंदाज़ा लग जाता है की समानता जैसा शब्द अभी ज़मीन पर नहीं उतर सकता। चुनाव जीतना और उसके बाद व्यक्तिगत से लेकर दलों तक का अपने निजी हित को साधने में लग जाना जनता और देश के लिए एक भयानक और सोचनीय स्थिति है।
‘दलित’ शब्द दलित पैंथर आंदोलन के इतिहास से जुड़ा है: रामदास आठवले

देश की दूसरी सबसे बड़ी आई टी कंपनी इंफ़ोसिस इस साल की शुरुआत में अचानक चर्चा में आ गई थी। कंपनी के कार्यकारी और संस्थापक में बहस चालू थी। लेकिन तत्कालीन मुख्य कार्यकारी विशाल सिक्का ने अपने एक बयान से सबको चौंका भी दिया। उन्होने साक्षात्कार में यह कहा-“मैं एक क्षत्रिय योद्धा हूँ। मैं यहाँ टिकने और लड़ने(जूझने) आया हूँ।”(I am kshatriya warrior. I am here to stay and fight.)सोचिए अगर देश की दूसरी सबसे बड़ी आईटी कंपनी का मुख्य कर्ता-धर्ता ऐसा सोचता और कहता है तब बाकी लोगों का क्या हाल होगा? जाति खून में बह रही है मानो। भारत में ऐसे लोग भी बहुत बड़ी संख्या में हैं जो सार्वजनिक मंचों पर जाति उन्मूलन के रिबन काटते हैं और निजी जगहों पर जाति सूचक गालियों के इस्तेमाल से भी नहीं चुकते। जो नेतागण माइक के आगे गले से (बिसलरी पीकर) ऊंची आवाज़ निकालते हैं, उन्हें इस तरह की मानसिकताओं से जूझने और समाप्त करने की नीतियों के बारे में सोचना चाहिए। क्या आप उस राम राज्य की बात करते हैं जहां चार वर्ण व्यवस्था की जगह है या फिर आप एक लोकतान्त्रिक शासन और समाज की तमन्ना करते हैं जहां सब बराबर हैं? अगली बार नेता वोट मांगने आयें तब यह सवाल पूछना जरूरी बन जाता है।

ज्योति जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के भाषा अध्ययन विभाग में शोधरत हैं. सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com  

फोटो: गूगल से साभार 
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बिल्डर और डीडीए के गुंडों ने मुझे मारा, शुरुआत दिल्ली पुलिस ने की थी: एनी राजा

‘पहली शुरुआत तो जरूर पुलिस ने की थी, लेकिन उसके बाद दिल्ली डेवलॉपमेंट अथॉरिटी (डीडीए) के और बिल्डर के गुंडों  के हवाले कर दिया. उसके बाद उन्होंने मुझे घेरकर मारना शुरू किया-लाठियों और लातों से.’ 30 अक्टूबर को दिल्ली की कठपुतली कॉलोनी में पुलिस के सहयोग से डीडीए ने बुलडोजर चलवाये. उस दौरान विरोध करने वाले कॉलोनी के वासियों पर लाठीचार्ज किया गया तथा उनका नेतृत्व कर रहे एनएफआईडवल्यू के महासचिव एनी राजा को बुरी तरह मारा गया.

घायल एनी राजा

राममनोहर लोहिया अस्पताल में इलाज करवा रही जख्मी एनी ने कहा कि ;मैंने पुलिस में अपने बयान दे दिये हैं और बिल्डर, डीडीए और दिल्ली पुलिस के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवा दिया है. पुलिस यदि सही से जांच करती है तो मुझे मार रहे गुंडों की तस्वीर उन्हें मिल सकती है,वहीं लगे सीसीटीवी फुटेज से.’

एनी ने बताया कि डीडीए के लोगों और बिल्डर ने ट्रांजिट कैम्प में रह रहे कठपुतली कॉलोनी के कुछ परिवारों की महिलाओं को भी बहला-फुसला कर वहाँ बुला रखा था. उनलोगों ने कहना शुरू किया कि ‘ जब हमें घर मिल रहा है तो तुमलोगों को क्या परेशानी है. वे आक्रोश में थीं. मैंने उन्हें कहा कि जब आपको घर मिल जाये तो मुझे भी बुलाना.’ सुनते ही वे एकदम से चुप्प हो गयीं और पीछे हट गयीं.’

दरअसल प्रशासन और बिल्डर दिल्ली के प्राइम लोकेशन में बसी इस झुग्गी बस्ती को खाली करवाने के लिए हर तरह के तरीके अपना रहे हैं-साम, दाम, दंड, भेद. वहाँ रहने वाले अधिकाँश लोग इसलिए विरोध कर रहे हैं कि उनमें से आधे से अधिक लोगों का पुनर्वास नहीं हुआ है और प्रशासन उनसे सख्ती से पेश आ रहा है. बेहतर पुनर्वास के लिए एनएफआईडवल्यू सहित कई संगठनों के लिए वहाँ सक्रिय है और तबतक इस बस्ती को उजाड़ने के खिलाफ हैं.

कल देर शाम तक 17 भाषाओं के लोगों से बसे लगभग चार हजार परिवारों वाली इस कॉलोनी को तोड़ दिया गया. पढ़ें स्त्रीकाल में इसकी रिपोर्ट.:

पुलिस ज्यादती: कठपुतली कलाकारों पर दिल्ली में बरसीं लाठियां: हजारो गरीब जबरन बेघर किये गये

आज सुबह से ही कार्रवाई जारी है. राज्यसभा के सांसद और सीपीआई नेता डी राजा ने बताया कि उनसे केन्द्रीय शहरी विकास मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने उनसे वादा किया था कि वे बातचीत कर रास्ता निकालेंगे, बलप्रयोग से बस्ती नहीं उजाड़ी जायेगी.’ फिर सवाल है कि मंत्री के न चाहने पर कल की हिंसक कार्रवाई कैसे हुई? कठपुतली कॉलोनी के स्थानीय लोगों ने कहा कि ‘डीडीए और बिल्डर के लोगों ने उन्हें धमकी दी थी कि वे इसे खाली करवाकर ही रहेंगे. उन्हें इसका अनुभव है.’



क्या है पूरा मामला?

रेहजा बिल्डर्स को बस्ती की यह जमीन अपने एक प्रोजेक्ट के लिए चाहिए. रहेजा का कहना है कि 190 मीटर ऊंची  54 मंजिला यह इमारत दिल्ली की सबसे ऊंची इमारत होगी। इसमें 170 लग्जरी फ्लैट, एक स्काई क्लब और हेलीपेड बनाए जा रहे हैं. छह अक्टूबर 2009 में रहेजा और डीडीए के बीच हुए करार के मुताबिक प्रोजेक्ट में दो कमरे के 2641 फ्लैट, पार्क, ओपन एयर थियेटर, दो स्कूल जैसी सुविधाओं का वादा किया गया है. इसके बदले में रहेजा बिल्डर्स ने 6.11 करोड़ का भुगतान डीडीए को किया. रहेजा बिल्डर्स के हिसाब से इस पूरे प्रोजेक्ट में 254.27 करोड़ का खर्च आने वाला है. कुल 5.22 हैक्टेयर जमीन में से 3.4 हैक्टेयर जमीन कॉलोनी के पुनर्वास में इस्तेमाल होगी. रहेजा बिल्डर्स को शेष 1।7 हैक्टेयर जमीन पर निर्माण करवाने का हक़ हासिल होगा. माने कुल जमीन का 60 फीसदी हिस्सा ही पुनर्वास के काम लिया जाएगा. हालांकि एनी राजा  ने बताया कि शुरुआती एग्रीमेंट में जरूर 60 फीसदी जगह पर पुनर्वास की बात थी, लेकिन वह धीरे-धीरे घटती गयी है और इनका इरादा भी नहीं दिख रहा सभी लोगों के पुनर्वास का.

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