मोदी, केजरी को महिला कलाकार की ललकार: जान देंगे लेकिन जगह नहीं छोड़ेंगे !

'मेरे पति को उनकी कला के लिए राष्ट्रपति ने सम्मानित किया था और हमने 50 से अधिक देशों में भारत की लुप्त होती कला का प्रदर्शन किया है, मैं भी गई हूँ, मेरा बेटा इस वक्त फ्रांस में अपने देश का गौरव बढ़ा रहा है, लेकिन देश की बात करने वाली सरकार ने हमारा शौचालय गिरा दिया है, हमारे यहाँ एमसीडी कूड़े नहीं ले जाती, हम बजबजाती नालियों के बीच रहते हैं. हमारे घर गिरा दिये गये हैं. इसमें सबलोग मिले हैं नेता, बिल्डर और अफसर."



"हम जान दे देंगे लेकिन अपनी जगह नहीं छोड़ेंगे' गुस्से से भरी कठपुतली कलाकार शरबती खान राजधानी के दिल में (केंद्र में) शादीपुर में अपने और अपने लोगों के साथ हो रहे ज्यादतियां बयां करती हैं. उनके पति भगवानदास भट्ट अपनी कला के लिए राष्ट्रपति से सम्मानित किये जा चुके हैं."



बजबजाती नालियों के बीच देश के लगभग 12 से 16 राज्यों और भाषाओं के लोग प्रायः 70 सालों से वहाँ रहते रहे हैं-दिल्ली के शादीपुर में कठपुतली कॉलोनी में. अब वहाँ दिल्ली सरकार और डीडीए पब्लिक-प्राइवेट पैटर्न पर विकास करना चाहती है, जिसके लिए इनका आधा-अधूरा पुनर्वास भी कर रही है, घर बनाकर दे रही है. इनका विरोध है कि यहाँ रह रहे लगभग 5 हजार घरों में से आधे को ही घर देने का वादा किया जा रहा है, वह भी जगह छोड़ने के दो साल बाद. जब यहाँ रहने वाले लोगों ने  अपने पूर्ण पुनर्वास तक जगह न छोड़ने का संघर्ष छेड़ दिया तो स्वच्छता मिशन पर लगी सरकार की पुलिस ने इनके घर गिरा दिये, शौचालय तोड़ दिये. पूरा इलाका सीवर में तब्दील हो गया है.

पूरा इलाका ऐसी बजबजाती नालियों से भरा है


आलम यह है कि इनके खिलाफ अभियान में कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी, सारे दलों के नेता और पूरा तंत्र एकजुट है. यह इलाका पहले अजय माकन का रहा है. इस बार इस इलाके से सांसद बनी हैं बीजेपी की मीनक्षी लेखी. लोग बताते हैं कि जब वे यहाँ आई थीं तो खूब रोईं, उनका रुमाल गीला हो गया- मानो ग्लिसरीन लगा कर रो रही हों. जीत कर गई तो पलट कर नहीं देखा. इलाके का विधायक आम आदमी पार्टी से है. यहाँ के निवासियों के अनुसार वे भी इनके खिलाफ अभियान में शामिल हैं.

लोग रोज यहाँ इकट्ठे होते हैं और संकल्प लेते हैं संघर्ष का 


शरबती कहती हैं , 'दुनिया के लोगों के लिए भारत की राजधानी के केंद्र में बसे इस बजबजाते इलाके को देखकर अंदाज लगा लेना चाहिए कि भारत की सरकारें किस तरह पुनर्वास करती हैं. यहाँ की सरकारें अपने लोगों के प्रति कितना असंवेदनशील हैं. दुनिया वालों, दुनिया भर में घूमने वाले हमारे परधानमंत्री को अपनी राजधानी में ही अपने लोगों के खिलाफ हो रही ज्यादतियां नहीं दिखती हैं.' 
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