आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा -पहली किस्त

रमणिका गुप्ता
रमणिका गुप्ता स्त्री इतिहास की एक महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं . वे आदिवासी और स्त्रीवादी मुद्दों के प्रति सक्रिय रही हैं . 'युद्धरत आम आदमी' की सम्पादक रमणिका गुप्ता स्वयं कथाकार , विचारक और कवयित्री हैं . आदिवासी साहित्य और संस्कृति तथा स्त्री -साहित्य की कई किताबें इन्होने संपादित की है. इनसे इनके मोबाइल न. 9312039505 पर संपर्क किया जा सकता है.

( हम यहाँ रमणिका गुप्ता की शीघ्र प्रकाश्य आत्मकथा सीरीज ' आपहुदरी' के एक अंश किश्तों में प्रकाशित कर रहे हैं. रमणिका जी के जीवन के महत्वपूर्ण हिस्से धनवाद में बीते , जहां वे खुदमुख्तार स्त्री बनीं, ट्रेड यूनियन की सक्रियता से लेकर बिहार विधान परिषद् में उनकी भूमिका के तय होने का शहर है यह. 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' से कोयलानगरी की राजनीति को समझने वाली हमारी पीढी को यहाँ स्त्री की आँख से धनबाद से लेकर राज्य और राष्ट्रीय राजनीति के गैंग्स्टर मिजाज को समझने में मदद मिलेगी, और यह भी समझने में कि यदि कोइ स्त्री इन पगडंडियों पर चलने के निर्णय से उतरी तो उसे किन संघर्षों से गुजरना पड़ता रहा है , अपमान और  पुरुष वासना की अंधी गलियाँ उसे स्त्री होने का   अहसास बार -बार दिलाती हैं. उसे स्थानीय छुटभैय्ये नेताओं से लेकर मंत्री , मुख्यमंत्री , राष्ट्रपति तक स्त्री होने की उसकी औकात बताते रहे हैं . ६० -७० के दशक से राजनीति के गलियारे आज भी शायद बहुत बदले नहीं हैं. इस आत्मकथा में अपनी कमजोरियों को अपनी ताकत बना लेनी की कहानी है  और ' हां या ना कहने के चुनाव' की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष की भी कहानी है. इस जीवन -कथा की स्त्री उत्पीडित है, लेकिन हर घटना में अनिवार्यतः नहीं.   इस आत्मकथा के कुछ प्रसंग आउटलुक के लिए रमणिका जी एक इन्टरव्यु में पहले व्यक्त हो चुके हैं )

दहशतजदा धनबाद और मुक्ति की छटपटाहट

धनबाद! कोयले की नगरी धनबाद! मज़दूरों और मालिकों की नगरी धनबाद! गरीबी और अमीरी के मापदण्ड तोड़ती, माफिया और पहलवानों के भय को भोगती,भ्रष्टाचार  के बटखरे पर सबसे भारी उतरने वाली,राजनीति की बड़ी-बड़ी हस्तियों का आकर्षण  केंद्र,आकांक्षाओं की धुरी,पैंतरेबाजी के लिए प्रसिद्ध अखाड़ा,सरकारों को बदलने, उलटने-पलटने, मन्त्रिायों के विभाग और मुख्यमंत्रियों के बनने-बनाने, हटने-हटाने की मंत्रणाओं का गढ़। इनके कार्यान्वयन हेतु धन जुटाने का अजस्र स्रोत  भी यही धनबाद। इस शहर में गॉडडफादर भी जबरदस्त थे। सबसे बड़े गॉडडफादर थे बी.पी. सिन्हा,मज़दूर नेता। आई.एन.टी.यू.सी.,कांग्रेस पार्टी (सत्ता पार्टी) से सम्बद्ध ‘कोलियरी मजदूर संघ’ यूनियन के अध्यक्ष थे। उनके विरोधियों का भी एक भारी-भरकम मजमा था। सारी नौकरशाही इन गॉडडफादरों  की ताबेदारी करती थी, खासकर बी.पी. सिन्हा की। दरअसल कोयला एशिया  में सबसे बड़ा रोजगार देने वाला उद्योग था, जहाँ मजदूर लाखों की तादाद में काम करते थे। वहाँ सैकड़ों की तादाद में नेता थे और हजारों की तादाद में दलाल। नौकरशाही की भी एक बड़ी फौज़ थी। इन सबसे तालमेल रखने वाले थे गॉडडफादर । नेता और अफसर, अक्सर इनके तलवे चाटते थे। मजदूर एवं उन मजदूरों के छोटे-बड़े नेता इनकी जागीर थे। ये उन्हें जितना ज्यादा से ज्यादा भुना सकते थे, भुनाते थे। मालिकों का नुकसान न हो,मजदूरों को भी कुछ टुकड़े मिलते रहें,यही यहाँ के नेताओं, अफसरों और दलालों की तिकडि़यों का धन्धा था। मजदूरों की गरीबी पर ये दिन-प्रतिदिन अमीर से अमीर हो रहे थे। दिनों-दिन रूतबा बढ़ रहा था इनका। कभी-कभार कोई चालाक अफसर इन दोनों गुटों को लड़वा भी दिया करता था पर प्रायः अफसर इनके बाहर नहीं जा सकते थे। ट्रांसफर, पोस्टिंग, प्रमोशन सब के पैरवीकार यही गॉडडफादर थे। ये राजधानी पटना के एजेन्ट थे। कोई भी नया अफसर आता, खासकर श्रम विभाग काµउसे बी.पी. सिन्हा के यहाँ हाजरी देनी ही होती थी। उनके यहाँ आयोजित रात्रि भोज और शराब पार्टियों में जाकर, साथ में शराब पीना और आगे की राजनीति, स्ट्रेटेजी या यूनियन की कार्यनीति, सभी तो इनके यहाँ तय होती थी। यहाँ कोयले की सबसे बड़ी यूनियन ‘इन्टक’ से सम्बद्ध ‘कोलियरी मजदूर संघ’ थी, जिसके सिरमौर बी.पी. सिन्हा ही थे। (बाद में इसका नाम बदल कर राष्ट्रीय  कोलियरी मजदूर सभा कर दिया गया जो आज तक चला आ रहा है) बी.पी. सिन्हा के यहाँ आयोजित पार्टियों में कोलियरी मालिक भी शामिल रहते थे, इसलिए मालिकों से सम्बन्धों के संदर्भ में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सभी हिदायतें, इन्हीं पार्टियों में दी जाती थीं। पुराने अफसरों के जरिए  भी नये अफसरों को यह हिन्ट मिल जाता था कि क्या करना है,किस मालिक से कैसे पेश  आना है और किस हद तक मज़दूरों के मुद्दों की पक्षधरता करनी है।


बड़ा चन्दा करना हो तो पटना के सभी लीडर-जन बी.पी. सिन्हा के घर आ जाते थे,वहीं कोलियरियों के मालिक व ठेकेदार, जिनमें ज्यादा यूनियन के लीडर ही होते थे,जमा हो जाते,और तय राशि पटना से आए नेताओं को दे दी जाती थी. कुछ सिन्हा साहब भी रख लेते थे ,अपने छुटभैयों में बांटने के लिएु, बाकी अपने या अपने खास लोगों के लिए।सबसे पहले जयप्रकाश  नारायण ने धनबाद में ‘हिन्द मज़दूर सभा’ (एच.एम.एस.) से सम्बद्ध यूनियन का गठन किया था। बाद में उन्होंने इस यूनियन की दो शाखाएं बर्ड कम्पनी की दोकोलियरियों,सिरका तथा अरगड्डा,जो हजारीबाग जिला में पड़ती हैं, में भी खोल दी थीं। उन दिनों इमामुल हई खान भी उनके साथ थे। बाद में बी.पी. सिन्हा ने उनसे अलग होकर इन्टक से सम्बद्ध कोलियरी मजदूर संघ नामक यूनियन बना ली। कुछ कोलियरियों पर इमामुल हई खान का भी दबदबा बना रहा। हई खान की यूनियन एच.एम.एस. से सम्बद्ध थी।
फ्लोरा स्मिथ का रेखांकन


इसी धनबाद में एक बंगाली लेबर लीडर को काले पानी की सजा हुई थी। वे एक ईमानदार नेता थे, जो मालिकों के आगे बिके नहीं थे। मारपीट में मालिक के अतिरिक्त मारे तो ज्यादा मजदूर ही गये थे, पर वे मालिकों पर मजदूरों की हत्या करने का जुर्म साबित नहीं कर सके थे। उलटे लेबर लीडर को ही सजा भोगनी पड़ी थी।
इन्टक में ही दो खेमे थे, जिनमें प्रायः हिंसक संघर्ष  भी हो जाया करते थे। हत्या तो आम बात थी। इन्टक चूंकि कांग्रेस से सम्बद्ध थी, इसलिए सत्ता में उसका दखल था। पटना किसके हाथ में रहे,लड़ाई यही थी। मालिक किसका आदेश  मानें,झगड़ा यहाँ था। जहाँ तक मज़दूरों के हक का सवाल था,वह इंटक के लिए खास मायने नहीं रखता था। मालिक ही मज़दूरों का चन्दा और यूनियन की सदस्यता काट कर दफ्तर में भिजवा देते थे। दरअसल यूनियन के प्रायः सभी नेता व कई सरकारी अफसर भी, सच कहा जाए तो बी.पी. सिन्हा के प्रति ही वफादार थे और उन्हीं की कृपा  से ठेकेदारियां भी करते थे। बस, जो साहब (बी.पी. सिन्हा को सभी साहब कह कर सम्बोधित करते थे) ने एग्रीमेंट कर दिया ,वह मज़दूर से लेकर मालिक, ठेकेदार, अफसर और सरकारी श्रम मशीनरी को मंजूर करना पड़ता था। बड़े-बड़े लठैत यूनियन के कार्यकर्ता थे,उनके खिलाफ बेचारा कौन मजदूर बोलेगा? जो बोलेगा पिट जाएगा या नौकरी से बर्खास्त हो जाएगा।

कांग्रेस पार्टी में बी.पी. सिन्हा के खिलाफ रंगलाल चैधरी सक्रिय थे, जो धनबाद कांग्रेस के अध्यक्ष भी थे। वे एकदम विशुद्ध  शाकाहारी भूमिहार नेता थे। यूनियन के भीतर राम नारायण शर्मा ,जो लोकसभा सदस्य भी चुने जा चुके थे,बी.पी. सिन्हा के विरोधी गुट में थे। वे यूनियन के जनरल सेक्रेटरी थे। बी.पी. सिन्हा अध्यक्ष थे। राम नारायण शर्मा ईमानदारी के लिए मशहूर थे और वे बी.पी. सिन्हा के गलत समझौतों का विरोध भी करते थे। कान्ती भाई (गुजराती) और दास गुप्ता भी यूनियन में थे और बी.पी. विरोधी थे,पर वे मुखर नहीं हो पाते थे। उन्होंने बाद में कोयला की फेडरेशन बनाकर खुद को फेडरेशन का अध्यक्ष और दासगुप्ता को महामन्त्री बना दिया था। वे असन्तुष्ट , यानी बी.पी. लॉबी के विरोधियों तथा बिहार के बाहर के कोयला प्रतिनिधियों के समर्थन से जीत जाते थे। फेडरेशन के स्तर पर वे ठेकेदारों को यूनियन में लाने के विरोधी थे,पर जहाँ सारा संगठन ही ठेकेदारों को हाथ में हो, तो वहाँ फेडरेशन के एक-दो नेताओं की कौन परवाह करता?ऐसे एक बार बी.पी. सिन्हा ने धनबाद से बर्ड कम्पनी के एक बड़े अफसर प्राण प्रसाद को धनबाद से सांसद का चुनाव लड़वाया था। उस चुनाव में लोगों को साइकिल भी बांटे थे। इस पर भी प्राण प्रसाद बुरी तरह पराजित हुए थे और उनकी जमानत जब्त हो गई थी। रामनारायण शर्मा ही सदैव कांग्रेस से जीतते थे,वे ही अन्ततः जीते। बी.पी. सिन्हा की जनता में नहीं चली।

बड़ी-बड़ी अंग्रेजी कम्पनियों  के अतिरिक्त वोरा, चंचनी और अग्रवाल बड़े खदान मालिकों में थे। कुछ ठाकुर,कुछ भूमिहार, जो पहले ठेकेदारों के यहाँ पहलवानी करने आए थे,छोटी-मोटी ठेकेदारियां लेकर बाद में मालिकों को भ कर खुद ही मालिक बन बैठे थे। वे लेबर लीडर भी थे। शंकर दयाल सिंह, सतदेव सिंह, सूरजदेव सिंह आदि पहले पहलवान के रूप में ही बी.पी. सिन्हा की शरण में धनबाद आए थे,फिर ठेके लिए और बाद में खदानें हड़प कर मालिक बन गए।अन्त में तो अपनी स्वतन्त्रा सत्ता कायम करने के बाद, सभी के सभी मुख्यतः जातीय आधार पर या जिला-जवार के नाम पर बी. पी. सिन्हा के खिलाफ हो गये या इन्होंने अपने स्वतंत्र गुट व खेमे बना लिये। इन सबके तार पटना से जुड़े थे। धीरे-धीरे इन्होंने राजनीति में भी हिस्सा लेना शुरू कर दिया और कांग्रेस पार्टी में अपनी जाति के नेताओं और मंत्रियों से जुड़कर अपनी पैठ बना ली। शंकरदयाल सिंह जैसे लोग, तो न केवल जिला बोर्ड के अध्यक्ष बन गये बल्कि बिहार सरकार में केबिनेट मंत्री  भी बन गये थे। उनके भाई सतदेव सिंह कोलयरियों के मालिक थे और शंकर दयाल सिंह मालिक तो थे ही, मजदूर नेता और सरकार में मंत्री  भी थे। धनबाद एवं उसके आस-पास के क्षेत्रों, बल्कि कहा जाए बंगाल तक बड़ी-बड़ी अंग्रेजी कंपनियों के अतिरिक्त राजस्थान के मारवाड़ी और गुजरात के चंचनी और व्होरा ग्रुप की भी कई-कई खदानें थीं। खदानों में स्थानीय लोगों की बजाय बाहरी लोग ज्यादा थे। खासकर प्रबन्धन में या ठेकेदारियों में आरा, छपरा, बलिया, भोजपुर, दरभंगा और गया के लोग थे या फिर पंजाबी, गुजराती, मारवाड़ी और बंगाली। इनके सारे के सारे मजदूर या तो स्थानीय होते थे या फिर मध्य प्रदेश  के रायगढ़, बिलासपुर, उड़ीसा के गंजाम जिला, बंगाल के पुरूलिया और उत्तर प्रदेश  के गोरखपुर से लाए जाते थे।  प्रायः बिहार के पलामू, गया, भोजपुर, आरा, छपरा व मुंगेर से भी मजदूर लाए जाते थे, जो मजदूर-कम-लठघर (ठेकेदारों की तरफ से) दोनों होते थे अपने डील-डौल के कारण, खास कर गोरखपुर और पलामू के लेबर मालिक के लिए लठैती भी करते थे। छोटानागपुर के लोग यानी वर्तमान झारखण्ड के लोग प्रायः ठेकेदारियों में खटते थे।
सब ठेकेदार अपने-अपने पहलवान रखते थे, जिनका मकसद था यूनियनों को उभरने न देना, खासकर इन्टक विरोधी यूनियनों को। इन्टक सम्बद्ध यूनियनों में प्रायः ठेकेदार ही यूनियन के लीडर होते थे।


जब हम 1960 में धनबाद आए तो बी. पी. सिन्हा इन्हीं जमातों के नेता थे और इनके मार्फत कोलियरी मलिकों और मजूदरों, दोनों पर अपना दबदबा बनाए रखते थे। लेकिन धीरे-धीरे सबने अपनी स्वतन्त्र सत्ता कायम करनी शुरू कर दी। के. बी. सहाय के बाद संविद की सरकारें बननी शुरू हो गईं और इनमें से कुछ नेता कांग्रेस और इन्टक छोड़कर जनता दल में भी चले गये। कांग्रेसी सरकार में तो पांच साल में दो-दो तीन-तीन बार मुख्यमंत्री बदलने लगे थे, यानी राजनीति में अस्थिरता आ गई थी। कांग्रेस की केन्द्र सरकार ने खासकर मोहन कुमार मंगलम, जो कोयला मंत्री  थे और इंदिरा गांधी, दो बातों से काफी विचलित थे। एक बात तो यह कि धनबाद, जो कोयला क्षेत्र का केन्द्र था, के पैसे का पटना की कांग्रेस सरकारों के मुख्यमंत्रियों या सरकारों को हटाने या बनाने में जबरदस्त दखल था। बाद में दूसरे दलों के लोग भी धनबाद के खजाने में हिस्सा बंटा कर सरकार को बनाने-गिराने लगे थे। कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के लिए इस ‘सरकार भंजक केन्द्र’ को तोड़ना जरूरी हो गया था।

नोट: इसी बीच में संसोपा से कुज्जू माँडू चुनाव लडने पहुँची

दूसरा महत्वपूर्ण कारण यह था कि देश  के विकास के लिए बिजली की सख्त जरूरत थी, रेलों के विस्तार की जरूरत थी, जिसके लिए उर्जा का एकमात्र स्रोत  कोयले की खदानें थीं, जिनके विस्तार की बहुत आवश्यकता  थी। इसकी पूर्ति के लिए धन की जरूरत थी। सरकार ने कोलियरी मालिकों से कोयला खदानों के विस्तार की पेशकश  की थी। कोयला बोर्ड में सरकारी नुमाइंदों के अतिरिक्त कोलियरी मालिक भी शामिल  होते थे और मजदूर नेता भी। कोलियरी मालिकों ने कोलियरियों के विस्तार के लिए पर्याप्त पूंजी लगाने में असमर्थता जाहिर की थी। ऐसे भी सरकार के पास ये रिपोर्ट थी कि कोलियरी मालिक कोलियरियों का उत्खनन बहुत ही अवैज्ञानिक ढंग से कर रहे हैं। वे कम पूँजी लगाकर ज्यादा मुनाफा पाने के लिए ऊपर  की परतों से कोयला निकाल कर, नीचे बची हुई परतों को ओवरवर्डेन से ढक देते थे और अंडरग्राउंड खदानों के कोयले में आग लगने अथवा पानी भर जाने से बचाने की बजाय उन्हें ढँक कर नया मुहाना खोल देते थे। खदानों की कटाई भी वर्टिकल होती थी और भूगर्भ खदानों को बालू भरे बिना छोड़ दिया जा रहा था। आग बुझाने के लिए भी बालू केवल कागजों में ढोया जाता था।

ऐसे हालात में सरकार ने खदानों के सरकारीकरण का फैसला किया। चूंकि  स्टील कारखानों के लिए कोयले की सख्त जरूरत थी ,जिसमें केवल कोकिंग कोल ही इस्तेमाल हो सकता था, इसलिए सरकार ने सन् 1970 में पहले केवल कोकिंग कोल वाली खदानों का ही सरकारीकरण किया, जिसमें धनबाद की सारी और बंगाल की अधिकांश  खदानें चली गईं। इस प्रकार धनबाद में ‘भारत कोकिंग कोल लिमिटेड’ (बी.सी.सी.एल.) बनी।
इन्टक का नेतृत्व  भौंचक रह गया, क्योंकि उनकी सारी कमाई तो कोलियरी मालिकों से होती थी। इन्टक के जितने भी ठेकेदार या मजदूर लीडर थे वे सब के सब रातों-रात कोलियरियों के स्टाफ बन गये। सबके भाई-भतीजे और लठैत-पहलवान, मुंशी  या मजदूर बन गये। असली मज़दूर खदेड़े जाने लगे। अफसर, पुलिस और प्रशासन की मदद से, यहाँ तक कि कोर्ट के जजों की मदद से नये-नये लोग काम पाने लगे और पुराने लोग भगाये जाने लगे। नौकरी की इस भ्रष्ट  मिलीभगत में लाखों रुपए के वारे-न्यारे होने लगे। स्थानीय और असली मजदूर हक्के-बक्के रह गए। उनकी आँखों के सामने लूटी जा रही थी उनकी नौकरियाँ और वे कुछ नहीं कर पा रहे थे। उनके अपने ही नेता उन्हें बेच रहे थे। बस, एक दिन सब्र का बाँध फूट गया,खासकर स्थानीय मजदूरों और किसानों का। मजदूर स्पष्ट  रूप से दो खेमों में बंट गया,बाहरी और स्थानीय अर्थात् देशज ।  
ठेकेदारी के जमाने से ही ए. के. राय की यूनियन धनबाद में अपने पाँव पसार चुकी थी और इन्टक की कोलियरी मजदूर संघ (बाद में राष्ट्रीय  कोलियरी मजदूर संघ) एवं ‘बिहार कोलियरी मजदूर सभा’ में प्रायः रोज हिंसक झड़पें होने लगी थीं। इन्टक के अधिकांश  लीडर सूदखोर थे। ए. के. राय की यूनियन, जो सी. आई. टी. यू. से सम्बद्ध  थी, ठेकेदारी और सूदखोरी के विरुद्ध लड़ाई के साथ-साथ लोकल की बहाली और विस्थपितों की लड़ाई भी लड़ रही थी। ए. के. राय पहले पेशे  से इंजीनियर थे लेकिन मजदूरों की दुर्दशा  देख कर वे नौकरी छोड़ कर मजदूर संगठन से जुड़ गए। उन दिनों विनोद बिहारी महतो एक नामी वकील थे और शिबू  सोरेन छोटानागपुर के उभरते आदिवासी नेता, जो अलग झारखण्ड की माँग कर रहे थे। तीनों एकजुट हुए और एक बड़ा संघर्ष  चला। खासकर कोलियरियों के सरकारी होने के बाद। इस संघर्ष  के नारे थे स्थानीय लोगों को नौकरी दो, विस्थापितों  का पुनर्वास करो, नौकरी दो। ये लड़ाइयाँ बहुत लम्बी चलीं। हालांकि बाद में शिबू  सोरेन ए.के. राय से अलग हो गये लेकिन विनोद बिहारी महतो आजीवन ए. के. राय के साथ रहे।
मैं इन स्थितियों का वर्णन इसलिए कर रही हूँ कि धनबाद में एक गॉडडफादर से कई गॉडडफादरों  का बनना, आपस में लड़ना, मारा जाना, मजदूर शक्तियों का उभरना, पटना में सत्ता केन्द्रों का बदलना या केन्द्र में नीतियों का बदलना, बहुत हद तक धनबाद की धरती से ही जुड़ा था। इस तिकड़म, षड़यंत्र , धोखाधड़ी, हत्या और दूसरी तरफ विद्रोह, बलिदान, हक, पहचान और क्रांति की उभरती हुई इच्छा,एक साथ घटते-बढ़ते हुए सुदृढ़  हो रही थी। मैं उसी माहौल में एक बहुत छोटी-सी इकाई के रूप में उभरी और मैंने अपना एक छोटा सा केन्द्र कायम किया। लोग मुझसे जुड़ने लगे या कहूँ मेरे गिर्द जमा होने लगे। मेरे घेरे का दायरा विस्तृत होता गया।

हाँ, तो मैं चर्चा कर रही थी कि गॉडडफादर जब आपस में लड़-लड़कर कमज़ोर हो गए, तो खुले मंच पर जनता के बीच ही एक-दूसरे का गला पकड़ने लगे। एक बार तो कतरास में हो रही इन्टक की बहुत बड़ी सभा में, जो शंकर  दयाल सिंह ने बुलाई थी और जिसमें राष्ट्रीय  कोलियरी मजदूर संघ के अध्यक्ष बी. पी. सिन्हा, महासचिव बिन्देश्वरी  दुबे और कार्यकारिणी के सदस्य सूर्यदेव सिंह भी उपस्थित थे, में मंच पर ही हाथापाई शुरू हो गई। सूर्यदेव सिंह ने मंच पर ही बी. पी. सिन्हा का गिरेबां पकड़ कर उन्हें झकझोर दिया था। बिन्देश्बरी  दुबे तटस्थ बने बैठे रहे थे, जबकि वे महासचिव थे। दरअसल भूमिहार और राजपूत की लड़ाई में ब्राहमणों  की आदत है, दूसरों को लड़ा कर अपने नेता बने रहना, कोई फैसला ही नहीं होने देना। मेरी और दामोदर पाण्डेय की लड़ाई में भी दुबे जी प्रायः चुप्पी साध लेते थे, जबकि एकांत में वे मुझे कहते थे कि मैं ही ठीक हूँ। मैं उन्हें हमेशा  कहती,‘‘हम दोनों की लड़ाई में दोनों कैसे ठीक हो सकते हैं ,कोई एक तो गलत होगा। आप हममें से किसी एक को गलत बता कर लड़ाई का समाधान कीजिए। दोनों को सही बता कर आप खुद तो नेता बने रहते हैं पर हमारी लड़ाई का समाधान नहीं करते।’’


सूर्यदेव सिंह द्वारा बी. पी. सिन्हा को अपमानित करने का असर यह हुआ कि इन्टक के जिस भी नेता ने बी.पी. सिन्हा के अपमान के बारे में सुना वह मजदूरों को लेकर इन्टक कार्यालय धनबाद में आ जुटा। मैं भी लगभग दस हजार मजदूर लेकर बी. पी. सिन्हा के समर्थन में हजारीबाग से धनबाद पहुँच गई। उन दिनों मैं इन्टक में थी और ‘राष्ट्रीय  कोलियरी मजदूर संघ’ की उपाध्यक्ष थी।बरसों से बी. पी. सिन्हा के नेतष्त्व में चला आ रहा भूमिहार और राजपूतों का मेल और संगठन उस दिन दो फाड़ हो गया। हालांकि संगठन में नेतृत्वकारी  भूमिका में या हस्तक्षेप करने की क्षमता रखने वालों में भूमिहार ही ज्यादा थे। राजपूत या पिछड़ा फैक्टर हमेशा  कम था। विडम्बना यह थी कि बी .पी. सिन्हा का विरोध राजपूतों से ज्यादा भूमिहार ही किया करते थे। इसका एक कारण तो यह था कि मालिकों और सत्ता में दबदबे के कारण और राजपूत लठैतों के बल पर बी.पी. सिन्हा दूसरे भूमिहार नेतृत्व  को पीछे धकेल देते थे और मजदूरों की बलि चढ़ा कर अकेले धन-सुख और सत्ता-सुख भोग रहे थे। हालांकि  धनबाद से हमेशा  रामनारायण शर्मा, जो भूमिहार ही थे, सांसद चुने जाते थे। वे राष्ट्रीय  कोलियरी मजदूर संघ के महासचिव भी थे। वे ईमानदार माने जाते थे। वे बी. पी. सिन्हा की गतिविधियों में भाग नहीं लेते थे। या यह कहा जाए कि वे बी. पी. विरोधी थे। बी. पी. सिन्हा ने उन्हें हटाकर राष्ट्रीय  कोलियरी मजदूर संघ का महासचिव बिन्देश्बरी  दुबे को बना दिया था। विडम्बना यह हुई कि एक ब्राहमण के आ जाने से बी. पी सिन्हा द्वारा निर्मित किया गया वर्षों  पुराना राजपूत-भूमिहार-पिछड़ा समीकरण बिगड़ गया और बी. पी. सिन्हा कमज़ोर पड़ गये। हालांकि  संकट की इस घड़ी में उनके कट्टर विरोधी राम नायायण शर्मा (बिरादरी द्वारा) उनके साथ जुड़ने को बाध्य कर दिये गये।

सूर्यदेव सिंह जनता पार्टी के विधायक बन गये। बाद में उसने बी.पी. सिन्हा की हत्या भी करा दी। मैं कई बार बी. पी सिन्हा को चेतावनी दे चुकी थी। बिहार विधान परिषद के सदस्य होने के नाते मैंने कतरास में हुए इंटक के कार्यकर्ता की हत्या पर प्रश्न  उठाए थे, जिसमें सूर्यदेव सिंह और उनके साथियों का हाथ था। तब भी मैंने सिन्हा साहब को उनकी पत्नी डोरोथी के माध्यम से और प्रत्यक्ष रूप से चेताया था। मैंने कहा था,
‘‘देखिए, यह सूर्यदेव सिंह ही आपके लिए खतरनाक साबित होगा। वह आपके लिए खतरा है क्योंकि वह हत्यारा है। उससे स्वयं को बचा कर रखिए।’’ बी. पी. सिन्हा हँस दिया करते थे चूंकि उन दिनों सूर्यदेव सिंह उनके यहाँ बहुत आता था। बी. पी. सिन्हा की पत्नी मुझसे सहमत थी.’ ‘‘रमणिका सही कह रही है, बी केयरफुल ऑफ़  हिम।’’

वर्षों  से बी. पी. सिन्हा की पहली पत्नी उनके यहाँ नहीं आती थी। बी.पी. सिन्हा स्वयं ही गाँव हो आया करते थे। इनका बेटा जवान हो चुका था पर वह घर पर ही रहता था। उसकी पढ़ाई और हॉस्टल का खर्च बी.पी. सिन्हा भेज देते थे। शायद असुरक्षित महसूस होने के कारण ही अपनी हत्या के पहले यानी अपने अन्तिम दिनों में बी. पी सिन्हा ने अपनी पत्नी और बेटे को अपने पुराने घर में आने की इजाजत दी, जहाँ वे अपना दरबार लगाते थे। बी. पी सिन्हा की पकड़ अन्त में अपने कार्यकर्ताओं पर भी ढीली हो गई थी।उनकी पत्नी डोरोथी, जो पार्टियों की रौनक और अंग्रेजी की अच्छी-खासी कवयित्री थीं, से मेरी काफी घनिष्टता  थी। मैं काफी मुंहफट थी। साफ-साफ बात कर दिया करती थी। बी.पी. सिन्हा के कई भूमिहार कार्यकर्ताओं को डोरोथी पसन्द नहीं करती थी, खासकर उमा बाबू को,चूंकि बी.पी. सिन्हा राजनीति में जब कमज़ोर पड़ गए, तो उनके उमा बाबू जैसे चेले-चमचे,काफी अश्लील  हरकतें करके डोरोथी को अपनी ओर आकर्षित  करने की कोशिश  करते थे। डोरोथी मुझसे बताती,बी.पी. सिन्हा से शिकायत भी करती, पर शायद  वे अपनी अक्षमता और उन चमचों को अपनी रक्षा हेतु जरूरी समझ कर, कुछ बोलते नहीं थे। ये काफी बाद की बात है। जब 1960 में मैं धनबाद पहुँची थी तब सभी उनसे बहुत डरते थे।

उपरोक्त परिदृश्य  धनबाद और बिहार के इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। मेरे साथ आगे घटने वाली घटनाओं की पृष्ठभूमि  का भी यह एक महत्वपूर्ण अंग है। मैंने 1960 से लेकर 1980-82 तक का एक संक्षिप्त या कहूँ अधूरा-सा ब्योरा दिया है। मैं स्वयं इसका हिस्सा थी। 1967 में, जब तक मैं धनबाद में रही तब तक बी.पी. सिन्हा की दखलन्दाजी मेरे कार्यों में रही,हालांकि उनकी वर्चस्वता को भी तोड़कर अपनी स्वतंत्र पहचान कायम करने की, उनकी नज़र में हिमाकत,अपनी नज़र में हिम्मत, मैंने की थी। इसके बाद मैं हजारीबाग चली गई, माण्डू से सोशलिस्ट पार्टी का चुनाव लड़ने। 1960 से 1967-68 तक धनबाद में मेरी राजनीति में मेरी सक्रियता विकसित हुई और लक्ष्य पनपा। यह परिदृश्य  आगे घटी घटनाओं के संदर्भ में कई मायने में महत्वपूर्ण रहा। मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि धनबाद में इन सबसे जूझने के लिए जहाँ मेरी जिद ने साथ दिया, वहाँ मैंने अपने समर्थकों का सहारा लेकर भी अपना साध्य साधा। मैंने उनके दुष्मनों का इस्तेमाल भी किया। जहाँ मैंने नेताओं का सहयोग लिया,वहीं उनका उपयोग भी किया। उन्होंने भी मेरा कम दोहन नहीं किया। राजनीति में ऐसा होना आम बात है,फिर मैं उससे कैसे बच सकती थी?आइए अब देखें क्या हुआ जब 1960 में हम धनबाद पहुँचे।

हम धनबाद पहुँचे

हम धनबाद पहुँचे! रहने को कोई घर नहीं था। हम लोग रीजनल लेबर कमिश्नर  रंजीत सिंह के कार्यालय में ही उनके साथ रहने लगे। वे भी कार्यालय के एक हिस्से में रहते थे। उनके पास तीन कमरे थे। उनमें से उन्होंने एक हमें रहने के लिए दे दिया। हमारा किचन साझा था। उनकी पत्नी और छोटी बच्ची हमारी बहुत मदद करती थीं।

धनबाद में मैं नई उड़ान की चाह लिए पहुँची थी। अब तक मैं धरती पर से ही सपने देखती थी,धनबाद में मैंने मुंडेर पर बैठ कर नीचे धरती और ऊपर  आकाश  को देखना शुरू  किया। मुंडेर को ही अपनी उड़ान का प्रस्थान बिन्दु बना कर, आकाश  के पार जाकर आने की, आकाश  गंगाओं को खंगालने की सपना साकार करने की धुन मुझ पर सवार हो गई । ‘मुंडेर’ अगर दूसरे की हो या कमज़ोर हो, तो डर बना रहता है,मुंडेर ढह या छिन गई, तो क्या होगा? कई मुंडेरों के दरकने, ढहने, कमज़ोर पड़ जाने या छिन जाने के बाद मैंने सीखा था,‘खुद ही अपनी मुंडेर बनाना,जो मदद करना चाहे उससे मदद लेना, मुंडेर ढहाने वालों से लोहा लेना!’ और फिर तो! मैं अपनी मुंडेर खुद बन गई। मदद लेना स्वीकार है,पर अहसान नहीं ! तोड़ना चाहते हो, तो आओ, हाथ आज़माओ! जूझने को तैयार हूँ! फिर मैंने इस मुद्रा में और शुरुआत की! प्रकाश  की अफसरी का मैंने कभी सहारा नहीं लिया, उलटे उसकी पत्नी होने के कारण मेरे सब दुश्मन  उसके भी दुश्मन  बन गए थे। खैर! धनबाद धनबाद ही था,है और रहेगा भी!

खैर, जब मैं उससे उबरी और मेरी स्त्री  ने अपनी खोज-खबर लेनी शुरू  की तो मेरी स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ लौटने लगीं और मेरी देह में देह की जरूरतें भी हरकत करने लगी थीं। बेरोक-टोक और असीमित प्यार की एक भूख-सी जगने लगी। ऑपरेशन से पहले तो न जाने क्यों जैसे ही प्यार की भूख जगती, मेरे भीतर से डर का एक पुतला स्प्रिंग लगे खिलौने की तरह उछल कर खड़ा हो जाया करता था। वह बार-बार सिर हिला कर पूछने लगता,‘कहीं फिर माँ बन गई तो?’ यह प्रश्न  मेरे प्यार की भूख को ही खा जाता। स्त्री  के लिए यह डर बहुत मारक होता है। अन्तिम क्षणों तक पहुँचते-पहुँचते कभी-कभी इसी भय के कारण वह एक दम ठण्डी पड़ जाती है, शायद यद प्यासी भी रह जाती है। जैसे खड़ी फसल में लगे कनकउए को देखकर चिडि़याँ उड़ जाती हैं, उसी तरह इस डर के कनकउए को देख मेरे आवेश  और जोश  की चिडि़याँ भी उड़ जाया करती थीं। शायद इसी डर से सजग स्त्रियाँ प्रायः अधूरी रह जाती हैं। ऑपरेशन के बाद मुझे बड़ी राहत मिल गई थी। एक विश्वास  जग गया था कि अब नहीं रहूँगी प्यासी,शायद मैं अधूरेपन को भी पूर्णता दे सकूँ।

मैं बच्चा होने के भय से मुक्त हो चुकी थी। मुझे नृत्य  और अभिनय का बड़ा शौक  था उन दिनों। बच्चे नहीं होंगे,तो मुझे अपने शौक  पूरे करने, नृत्य  सीखने और करने का मौका मिलेगा। अभिनय और साहित्य के विकास के लिए समय मिलेगा। हर समय एक डर-सा बना रहता था कि कहीं गड़बड़ हो गई, तो बच्चा पैदा करने और उसे पालने के लिए घर में कैद रहना पड़ेगा। अब वह भी खत्म हो गया था। अनचाहे गर्भ से मुक्ति पाने की सात त्रासदियों से गुजरने के जोखि़म मैं उठा चुकी थी। माँ बनने का डर मनचाहे प्यार-प्रणय की छूट तो देता ही नहीं,उल्टे भविष्य  को भी एक ढर्रे में बांध देता है। स्त्री  को अपना पूरा अस्तित्व आने वाले अस्तित्व के निमित्त खत्म करना पड़ जाता है, चूँकि माँ बनते ही स्त्री  स्त्री  न रह कर माँ में बदल जाती है। माँ के साथ ममता का नाभि-नाल का सम्बन्ध जुड़ा। सच तो यह है कि ममता ही स्त्री  को माँ बनाती है। वह अपनी अन्य पहचानें खो कर, उसी में इतना रम जाती है कि उसे अपने होने की खबर तक नहीं रहती। मैं इस दौर से गुजर चुकी थी। टूटू के पैदा होने के बाद मैं अपना होना ही भूल गई थी।

बच्चे न होने के अहसास ने मुझे स्त्री -सुलभ वर्जनाओं और अनिवार्यताओं से मुक्ति दिलाई थी। अब तो केवल जन्मे हुए बच्चों को पालना है,स्कूल भेजना है। इस आभास ने ही मुझे स्वतंत्राता और निडरता का अहसास करवाया। ‘अब समय पर मेरा अधिकार रहेगा’,यह एहसास मुझे गुदगुदाने लगा। अब माँ पर स्त्री  हावी हो रही थी या कहूँ, अब स्त्री  मुक्त हो रही थी थोपे गये स्त्रीत्व  से और ममत्व की मजबूरियों से। शायद  उर्वशी  की दुविधा भी कुछ ऐसी ही होगी, जब उसने प्यार का अनन्त रास्ता चुना,पुरूरवा के बदले अपने पुत्र के प्यार को चुना। मैंने भी प्यार की प्रक्रिया को चुना। व्यक्ति गौण था मेरे लिए। वह कौन होगा,यह मेरा निर्णय होगा? प्यार का ढंग क्या होगा,वह भी मैं ही तय करूँगी?  मैं खुद को प्रकाश  से मुक्त करने का प्रयास करने लगी थी।
अब मेरी देह मेरी देह बन गई थी और एक औरत की देह को मुक्त प्यार ही पूर्णता दे सकता है।मैं अब मुक्त थी। भय मुक्त ! निडर! मेरे आवेश  पर कोई रोक नहीं थी। यह आवेश  ही तो स्त्री  को पूर्ण करता है। पुरुष  के लिए इस डर के कोई मायने नहीं होते। मैं अब सब परिधियाँ लाँघ सकती थी,सीमाएँ तोड़ सकती थी। दरअसल सीमा में रहना मुझे सदैव कचोटता है, इसलिए सीमा को तोड़ने मात्रा का आभास ही मुझे अत्यधिक सुखकारी लगता है। मैं वर्जनाएँ तोड़ सकती हूँ,इसी की अनुभूति मुझे सुकून देती है। सीमा तोड़ना, मर्यादा उलाँघना, वर्जनाओं को नकारना, मुझे एक विश्वास  देता है कि अपनी देह की मैं खुद मालिक हूँ। मैं संचालक हूँ, संचालित नहीं। स्त्री  के लिए ममत्व एक बहुत ही कोमल-स्नेहसिक्त अहसास है,तो यह एक कड़ा और कठिन बन्धन भी है। इस ऑपरेशन  के बाद मैं उस ढर्रे से मुक्त हो गई, बस रह गया अपने बच्चों के प्रति केवल ममत्व का कोमल अहसास।
(आगे भी जारी )
Blogger द्वारा संचालित.