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क्यों महिला विरोधी है दिल्ली मेट्रो का किराया बढ़ाना?

ज्योति प्रसाद

 शोधरत , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय. सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com

हाल ही में दिल्ली मेट्रो का किराया फिर से बढ़ा दिया गया है। इस बीच दिल्ली सरकार और मेट्रो अधिकारियों के बीच खूब कहा सुनी और खींचतान जारी रही। यह अहम विषय है और इसे कतई नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। कल ही भैया दूज के दिन मेट्रो ने लगभग 45 मिनट तक लोगों को रुलाया तो वहीं कुछ दिन पहले राजीव चौक स्टेशन पर चली ‘गंदी वाली’ फिल्म ने सभी को मुंह खोलने के मौका भी दे दिया था। जी हाँ, दिल्ली मेट्रो के संदर्भ में ऐसे किस्से चल रहे हैं। अब बढ़े हुए किराए ने फिर एक बार उसे चर्चा का विषय बना दिया है।


मेट्रो ने सफर के नए अनुभवों में अपनी अच्छी ख़ासी जगह बनाई है और निरंतर बना भी रही है। ‘इश्क़ में मेट्रो होना’ किताब के लिए अच्छी ख़ासी सामाग्री मेट्रो के अंदर और बाहर मिल सकती है। मनुष्य, उसका सफर और संसाधनों के बीच गुंथा हुआ भी है। छोटी कक्षाओं में पढ़े गए यातायात के संसाधनों के उन प्राचीन स्रोतों को दिमाग में घुमा लेना जरूरी है। इतिहास की किताबों में बड़े ही दिलचस्प अंदाज़ में तस्वीरों और छोटे छोटे वर्णनों के प्रयोग से परिवहन को समझाया जाता था और शायद आज भी ऐसा हो रहा होगा। आदि मानव से शुरू हुई कहानी पहिये के चमत्कारिक और क्रांतिकारी आविष्कार के साथ आगे बढ़ती है और बच्चों के नन्हे दिमाग को यह समझ आने लगता है कि सफर किन पड़ावों से गुज़र चुका है। और आज जब हम बड़े हुए हैं तब यह मालूम चलता है कि उस जानवर वाली गाड़ी के पीछे वाला हिस्सा जिसमें पहिया लगा था आज मेट्रो और रेल को कितनी शानदार गति प्रदान कर रहा है। इसमें यह बात भी जोड़ लेनी चाहिए कि विद्युत का असीम योगदान है।

सफर मानव स्वभाव में कई चीज़ों की बदौलत उभरता है। जरूरत,कौतुक, रोमांच, दिलचस्पी, जगहों के भ्रमण की तीव्र इच्छा और न जाने क्या क्या कारक हैं। इतिहास में सफर-संस्मरण, यात्रियों के संस्मरणों के रूप में दस्तक देते रहते हैं। भारत के इतिहास का एक बहुत बड़ा टुकड़ा विदेशी यात्रियों की बदौलत सामने आता है। मेगास्थनीज़, अल बिरूनी(बिरनी भी कहते हैं लोग), फाहियान या फिर ह्वेन सांग आदि आदि यात्रियों ने जो देखा और दर्ज़ किया। इनके द्वारा लिखा वृतांत भारतीय इतिहास के लिए आगे चलकर अहम दस्तावेज़ में तब्दील हो गए।यात्रा ने मानव मस्तिष्क के अनुसार अपने रवैये और साधन को बदलाया मानव मस्तिष्क ने यात्रा की शक्ल बदली। जो बात नहीं बदली वह यात्रा ही थी और है। यात्रा मानव सभ्यता की एक तहज़ीब है।
लेकिन फिर भी किसी औरत का नाम उस चमक से नहीं उभरता जिस चमक के साथ पुरुष यात्रियों का सुनाई पड़ता है। हमारी किताबें अधिकतर महिला यात्रियों के संदर्भ में मौन रहती हैं। जब इब्न बतूता का नाम सुना था तब पहला सवाल मन में यह आया था कि कोई इब्नी बतूती भी हुई है क्या? ह्वेनी  सांगी,फाहियानी,मेगास्थनीज़ी…फेहरिश्त लंबी हो सकती है। सोचिए, अगर महिला यात्रियों के वर्णन हमारे सामने होते तब आज इतिहास की अक्ल-शक्ल बेहद अलग होती। भारत के संदर्भ में तो यह और भी हैरान करने वाली हो सकती थी।

यात्रा पर पुरुषों का एकाधिकार महसूस होता है। किसी महिला की व्यक्तिगत प्राचीन यात्रा के संदर्भ में बहुत कम जानकारी मिलती है। ज़्यादातर महिलाओं की यात्रा पुरुषों के साथ दिखाई देती हैं।विकिपीडिया पर‘लिस्ट ऑफ फीमेल एक्सप्लोरर्स एंड ट्रेवलर्स’नाम से एक सूची है। इस सूची में प्राचीन व मध्यकाल के समय की एक भी स्त्री का नाम नहीं है। इसके अलावा आधुनिक होते हुए भी इसमें भारत की एक भी औरत का नाम नहीं है।पर मुझे ऐसा यकीन नहीं होता कि भारत की स्त्रियाँ यात्रा-रहित रही हों कभी भी। क्योंकि हमारे यहाँ तो बादल और कबूतर तक सफर किया करते थे।

इसके पीछे के कई कारण हो सकते हैं। आप सोचिए। महीन से महीन कारण मिलेंगे। उँगलियों पर गिनने से भी खत्म नहीं होंगे। बल्कि ढेर सारी वजहें दिखेंगी। उनका यहाँ विश्लेषण देना आसान नहीं है। किसी भी यात्रा में यात्री, यात्रा का रास्ता,यात्रा और यात्री का साधन, समय, परिवेश, समय आदि घटक यात्रा के खाके को रचते हैं। महिलाओं के संदर्भ में हमेशा से ही इनमें अकाल पड़ा रहा। आज भी लोग आदि मानव को यायावर कहते हैं न कि आदि मानवी को। ऐसे बहुत से अवरोधक रहे हैं जिन्होंने औरत को यात्री में तब्दील नहीं होने दिया।
ग्लोबलाइज़ेशन के ज़माने में आश्चर्यजनक रूप से बदलाव आया है। अब तो ‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ जैसी रचनाएँ दिखने लगी हैं। यहाँ तक आना निश्चित ही बिना किसी आधार के नहीं हुआ होगा। ज़रूर कथा-कहानियों और समय के अंदर वे स्त्रियाँ रही होंगी जिन्होंने घूमने में दिलचस्पी ली होगी। वे इतिहास में सक्रिय महिलायें होंगी जिन्होंने औरतों को पूरी तरह से गुमशुदा नहीं होने दिया। बल्कि खुद को घर की चौहद्दी से बाहर निकाला होगा। हाल के वर्षों में हो रहे शोध अब जानबूझकर गुमशुदा कर दी गईं औरतों को प्रकट करने में अपनी अहम भूमिका निभा रहे हैं। यह अच्छी बात है।

सफर नितांत घर से बाहर से जुड़ा हुआ है। जबकि परिवार जैसे संस्था के प्रकट हो जाने के बाद महिला घरेलू हो गई। थोड़े रिश्ते गाढ़े हुए तो वह सम्मानीय हो गई जहां सम्मान तो था पर जान चली गई। कुछ अरसे बाद वह वस्तु में परिवर्तित हो गई। ऐसी जानकारियाँ किताबों में अटीं पड़ी हैं। लोग चाहे तो इसे पढ़ें और समझें। वास्तव में छवियों के बनने से परेशानी नहीं हुई, परेशानी तब हुई जब वह लोहे की तरह जम गईं। यही वजह है के आज जब वे छवियाँ गलाने की कोशिश हो रही हैं तब महिलाओं के प्रति हिंसा उभर कर आ रही है।

हिंसा का कारण यही है- पुरानी छवियों को टूटने न देने की ज़िद्द। इसलिए घर से बाहर किसी भी लड़की और औरत को एक दूसरे तरह के ज़ोन का सामना करना पड़ रहा है। हर तरह के हमले हो रहे हैं फिर चाहे वे सामाजिक, आर्थिक, नैतिक, मनो-वैज्ञानिक, शारीरिक, संस्थानिक, राजनैतिक आदि आदि। हाँ, इन सब के बीच घरेलू हमलों और हिंसा को नहीं भूलना चाहिए।

मेट्रो का किराया बढ़ना एक अदृश्य संस्थानिक हमला है। हो सकता है लोग इस बात पर हँसे और खूब हँसे। परवाह नहीं। लेकिन यह सच है कि मेट्रो का किराया बढ़ना महिलाओं के प्रति न दिखने वाली हिंसा है जो उन पर दूरगामी प्रभाव डालेगी। जो हिंसा दिखाई देती है उस पर तो खुद दिल्ली मेट्रो अपनी वेबसाइट पर उल्लेख करती है। उदाहरण के लिए,यात्री सूचना के टैब में महिला यात्रियों के लिए सुविधा नाम के वर्ग में खूब बढ़ा चढ़ा कर राग आलापा गया है कि महिलाओं के लिए अलग से डिब्बा आरक्षित है। चेकिंग के लिए महिला कर्मचारी है, रखवाली के लिए जवान गश्त लगाते हैं, महिला डिब्बे में पुरुष यात्री अगर आते हैं तो उन पर 250/- रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा, शराबियों और उत्पात मचाने वालों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, आपात कालीन बटन और एक टीम है जो त्वरित कारवाई करेगी अगर कुछ अनहोनी घटना घट जाती है। इसके अलावा सीसीटीवी कैमरा से निगरानी की जाती है।


बेशक उपर्युक्त बातें महिला सुरक्षा के संदर्भ में दिल्ली मेट्रो कहती ज़रूर है पर इसके पीछे उनका व्यवसाय का एक पक्ष छिपा है। इन सब सुविधाओं के बदले महिला यात्री भी पुरुष यात्रियों के समान योगदान देती हैं। इसलिए अगर ये सब सुविधा बार-बार महिला कह कर और जतला कर दी भी जा रही है तो वह अहसान कतई नहीं है बल्कि वह मेट्रो संचालन की आर्थिक क्रिया से जुड़ा है। टोकन का रुपया महिला होने पर बदल नहीं जाता।
महिलाओं के लिए आरक्षित डिब्बों वाली बात को गौर से समझने की जरूरत है। क्या हमारे साथ रहने वाले पुरुष इतने बड़े जानवर हैं कि वे महिलाओं को देखते ही हमला कर देंगे? क्या वे इतने हद तक खतरनाक हैं कि चंद मिनटों की यात्रा वह महिला यात्रियों के संग नहीं कर सकते? अगर यही है तब तो समाज की एनएसएल और नींव का चेक अप होना चाहिए। महिलाओं को पालतू बनाकर एक दड़बे में घुसेड़ देना वास्तव में उन्हें और डिफ़ेंसिव मोड में ला देने जैसा है।

महिलाओं को चूंकि एक लंबे समय से घरेलू बनाकर रखा गया है इसलिए उनमें कुछ विशेषताएं स्वाभाविक हैं। (हो सकता है पुरुषों में भी हों) बचत करने की अद्भुत क्षमता बहुत सी औरतों में होती है। छोटे कीमत के नोट या सिक्के चावल दाल के डिब्बों में मिलना इस बात का सबूत है। पिछले साल की गई नोट बंदी में इस आदत ने बहुत से परिवारों को संभाल लिया। बल्कि इस नोटबंदी ने महिलाओं की बचतों का सत्यानाश भी कर दिया। औरतों को एक बड़ा झटका दिया। कई औरतों को 5-5 रुपये की बचत करते हुए देखा जा सकता है। मेट्रो का अंतिम किराया 60 रुपये बताया जा रह है और शुरुआती किराया 10 रुपये। ऐसे में महिलाएं छोटी बचत की खातिर सीधे उन यातायात के साधनों का रुख कर रही हैं जो सफर के लिहाज से असुरक्षित हैं। आराम के मामले में भयानक। उदाहरण के लिए छोटी छोटी दूरी पर चलने वाली ग्रामीण सेवा जैसे वाहन कम दूरी का अधिकतम किराया सुबह और रात को वसूलते हैं। छः यात्रियों की जगह 8 से 10 यात्री बैठा लेते हैं। इसके अलावा दिल्ली के बहुत से ऑटो वाले मीटर का प्रयोग न के बराबर करते हैं। ओला और उबर सेवा अभी तक विश्वास हासिल नहीं कर पाई हैं। ऐसे में मेट्रो का बढ़ा किराया महिलाओं को एक असुरक्षित स्पेस में धकेल रहा है।

दिल्ली मेट्रो कोई मामूली परिवहन-जगह नहीं है। वह खुद भारत के विकास और परिवहन के शानदार नमूनों में से एक है। कुछ मेट्रो स्टेशन पर भारत के इतिहास और ऐतिहासिक इमारतों की प्रदर्शनी की झलक तो मिलती ही है साथ ही साथ मेट्रो के बनने की प्रक्रिया भी चित्रों में दिखलाई पड़ती है। मेट्रो के लिए औरत हो या आदमी, बच्चे हों या बूढ़े, सभी के मन में एक प्यार और इज्जत की जगह मौजूद है। वहाँ का रख रखाव और साफ सफाई, कर्मचारी और हर तरह की सहूलियत यात्रियों के दिल को जीत लेती है। जो लोग देख सुन नहीं सकते उन्हें भी बाकी जगहों के मुक़ाबले मेट्रो में सम्मान मिल जाता है।

मेट्रो अधिकरण का कहना है कि किराया कई सालों से बढ़ाया नहीं गया था और लगातार घाटा हो रहा है। उसे मेट्रो बनाने के लिए कर्जे का भुगतान भी करना है। इन सब वजहों को सुनकर हंसी ही आती है। जब इतने सालों से किराया नहीं बढ़ाया गया था तब अचानक अब घाटे की दुहाई देकर क्यों बढ़ाया जा रहा है? क्या घाटा तौलने का अधिकारियों को दीवा स्वप्न आ गया था? क्या जिन विदेशी कंपनियों से कर्जा लिया गया था, वे अचानक मेट्रो का कॉलर पकड़ कर कर्जे की मांग 2017 में करने लग गईं? मेट्रो में कई लाख लोग रोजाना सफर करते हैं। ऐसा नहीं है कि वे लोग एक या दो दिन ही करते हैं, बल्कि वे यात्री रोज़ ही मेट्रो का इस्तेमाल करते हैं। वे नियमित हैं। इसके अलावा हाल के समय में मेट्रो स्टेशनों में बहुत से कर्मचारियों की जगह मशीनों को फिट कर दिया गया है। जिससे व्यक्ति विशेष की नौकरी तो गई साथ में हर महीने का पगार का भी झंझट नहीं। क्या मेट्रो कार्पोरेशन हर महीने मशीनें खरीदती है? ये सवाल तो हैं ही साथ में और भी सवाल हैं जिनसे मेट्रो के अधिकारी टकराना नहीं चाहते। ऐसे समय में जब देश नोटबंदी और जीएसटी की मार तो झेल ही रहा है साथ ही बेरोजगारी में अव्वल इजाफा हुआ है तब मेट्रो का किराया बढ़ाना निहायती अमानवीय कृत्य है।

हालिया आई एक रिपोर्ट कहती है कि सुरक्षा के लिहाज से दिल्ली सबसे खतरनाक शहर है। इसलिए मेट्रो के बढ़े किराए का असर महिलाओं की सुरक्षा को प्रभावित करेगा। यदि किसी के पास किराये के उचित पैसे नहीं तो वह कैसे मेट्रो में जाएगा। मेट्रो के बजाय उपलब्ध साधन जो कि संतोषजनक नहीं है, का इस्तेमाल करेगा। निर्भया हादसे में तो साफ दिखा था कि कैसे ऑटो चालक ने आधे रास्ते तक ही छोड़ा और डीटीसी की बस की कमी के कारण अनधिकृत बस में जाना पड़ा। इसलिए परिवहन के साधनों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। उनके किराए में तो कटौती की जानी चाहिए न कि बढ़ौती।

मेट्रो की छोटी यात्राएं बेशक एक बड़ी यात्राएं नहीं हैं, फिर भी वे महिलाओं में यात्रा करने का आत्मविश्वास तो जगाती ही हैं। सफर का अंदाज़ देती हैं। और इस बात की पूरी संभावना है कि छोटी-छोटी यात्राएं करने वालियाँ एक दिन दुनिया की सैर पर निकल जायें।

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‘विज्ञापनों में महिलाओं का प्रस्तुतीकरण:आर्थिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य’

उपासना गौतम


पी-एच. डी शोधार्थी,महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,वर्धा. सम्पर्क: sonpari2003@gmail.com

प्रस्तावना


लिंगाधारित व्यवस्था में खड़ी विभिन्न संस्थाओं  और उसके घटकों ने स्त्री अधीनस्थता का पूरा लाभ उठाते हुए वैश्वीकरण के दौर में महिलाओं के श्रम और देह को अपने मुनाफे में बदल दिया है । विज्ञापनों और फिल्मों में इसकी बड़ी भूमिका है। विज्ञापनों में महिला का जैसा प्रस्तुतीकरण हो रहा है उस पर गंभीर प्रश्न खड़ा होता है कि आखिर उत्पाद क्या है और किसको बेचा जा रहा है ? महिला के इतने विकृत चित्रण को उत्पाद बिक्री का जरिया बनाने में कौन से कारण और मानसिकता कार्यरत है । यही मुख्य सवाल है जिस पर बाजार के दृष्टिकोण के अनुसार बहुत कुछ लिखा जा चुका है । लेकिन यह विषय नितांत बाजार के दृष्टिकोण के साथ ही अन्य सामाजिक-राजनीतिक पहलुओं को सम्मिलित करने की  अपील करता है जिसे समझना मुख्य बात है ।आज विज्ञापनों में रचनाओं पर अश्लीलता हावी है । विज्ञापन एजेंसियों ने उपभोक्तावाद को एक भ्रामक उच्चवर्गीय जीवन शैली के अंतर्गत प्रचारित  किया है । अयोग्य सामानों को बेचने में महिला की देह का नियोजित ढंग से प्रयोग किया है । पुरुष उत्पादों के विज्ञापनों में महिला माडल को इतने निर्लज्ज तरीके से दिखाते हैं , जो ब्रांडेड परफ्यूम या अंडरवियर के कारण पुरुष का चेहरा चुंबन से भर देती है , संभोग तक कर लेती है। ऐसे  विज्ञापन सिखाते हैं कि सुंदर महिला उसी पुरुष को चाहेगी जिसके पास कीमती ब्रांडेड उपभोक्ता वस्तुएँ हैं । वास्तव में इस उपभोक्तावादी संस्कृति ने औरत को उपभोक्तावाद  के घेरे में जकड़ लिया है ।

पुरुष उत्पादों के विज्ञापनों में महिला-


 विज्ञापनों में महिलाओं का विज्ञापित होना विचारकों के लिये एक चर्चा का विषय बना हुआ है। फिर चाहे वे टी.वी. के विज्ञापन हों  या फिर अन्य प्रकार के विज्ञापन हर प्रकार के विज्ञापनों में महिलाओं की दैहिक कमनीयता और उसका सजा-संवरा रूप ही प्रत्यक्ष रूप में हमारे सामने है । टी॰वी॰ पर प्रसारित होने वाले ढेरों विज्ञापन इसका उदाहरण हैं । पुरुष के अंडरवियर , बनियान से लेकर ब्लेड तक में स्त्री को इस तरह प्रस्तुत किया गया है जहाँ उसकी प्रस्तुति पर सवाल खड़े होते हैं । यदि इससे इतर विज्ञापनों पर नजर डाले तो भी स्थिति निराशाजनक है। वास्तव में समस्या विज्ञापन में स्त्री की उपस्थिति को लेकर नहीं हैं बल्कि उसकी उपस्थिति  कैसी है यह सोचने-समझने का विषय है । पिछले पाँच सालों से अबतक के विज्ञापनों पर नजर डालें  तो एक बात साफ हैं कि ये अनावश्यक कामुकता से भरे हुए है। इस कड़ी में कुछ उत्पादों जैसे पर्फ्यूम , पुरुषों के अंतर्वस्त्र , कोंडम के एक मिनट के विज्ञापनों ने अश्लीलता को घर-घर तक पहुँचा दिया है । इन विज्ञापनोंमें स्त्रियों की गरिमा तथा उनकी अस्मिता पर जबरदस्त कुठाराघात करने का कार्य किया है। ऐसे में सवाल उठता हैं कि वह कौन सी अनिवार्यता हैं जो स्त्री की देह को उसकी कामुकता को उत्पाद बेचने का जरिया बनाया गया है ? आखिर कौन सी मानसिकता मूल रूप से विद्यामान है ?उत्पाद पुरूषो के हैं जिसका लक्ष्य उपभोक्ता पुरूष है मगर फिर भी स्त्री को एक उत्पाद के रूप में प्रस्तुत किया गया है।टी.वी. पर बाइक का एक विज्ञापन आता था। इसमें एक स्त्री जो बाइक पर लेटी हुई दिखायी जाती है फिर वह बाइक के रूप में बदल जाती है, उसी दौरान उस पर एक पुरुष सवार होता दिखाया जाता है। इस पूरे विज्ञापन के देखने से स्पष्ट हो जाता है कि बाइक की तुलना एक स्त्री (युवती) से की गई है। बल्कि कहना चाहिए कि वह बाइक की खूबियों का एक प्रतीक बनाकर प्रस्तुत की गई है। कंपनी इस विज्ञापन के माध्यम से यह बताना चाहती है कि बाइक कितनी आरामदायक और आनंददायक, संतुष्टि देने वाली है।



दरअसल इस बात से इंकार नही किया जा सकता कि बड़ी-बड़ी विज्ञापन एंजेसिया इसी मानसिकताके वशीभूत होकर विज्ञापन बनाने मे लगी हुई है। तमाम  कंपनियाँ सौन्दर्य के नए मानक परोस रही हैं इसी सौन्दर्य जिज्ञासा यानि ‘ब्युटि मिथ’ को जगाकर वे इनकी जेबों से पैसा निकालने में भी सफल हैं । साँवले रंग को गोरा कैसे बनाया जाए इसके लिए दर्जनों ब्रांड के उत्पाद बाजार में मौजूद हैं ऐसे उत्पादों की कंपनियों में विज्ञपनों के द्वारा कड़ी प्रतियोगिता देखने को मिलती है जो बड़े से बड़े दावे के साथ किसी भी साँवली स्त्री को गोरा बनाकर उसके जीवन को ऊंचाई देते नजर आते हैं ।गोरा बनते ही लड़की में आत्मविश्वास आता है,अच्छी जॉब मिलती है , कल तक शादी के लिए लड़का राजी नहीं था गोरा बनते ही अब वह उस लड़के को शादी के लिए इंकार करती है , क्यों कि अब हर रूप में वह पूरी तरह से सक्षम है । इस संदर्भ में नाओमि वुल्फ़ अपनी किताब ‘ब्यूटी मिथ’ में लिखती हैं –“सौन्दर्य मिथ ने महिला की स्वतंत्रता को मोड़कर उसके चेहरे और देह में बदल दिया । जब महिला को अधूरा बताया जाता है तो ब्यूटी मिथ शुरू होता है । कॉस्मेटिक्स आते हैं ,कपड़े-लत्ते , फैशन उसकी पहचान के नाम पर आते हैं । सौन्दर्य मिथ ने महिला को झूठी चयनशीलता दी है ”सौन्दर्य पात्रता को प्रतिष्ठित करने वाले विज्ञापनों की भरमार से स्त्री -स्थिति के समाजशास्त्र को बहुकोणीय रूप में देखने की अनिवार्यता को किसी भी तौर पर अनदेखा नहीं किया जा सकता । इस प्रकार के अनेक विज्ञापनों मेंराजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक इन सभी दृष्टिकोणों के समावेश के बिना किसी भी तरह जड़ तक नहीं पहुंचा जा सकता । आज मुक्त बाजार और पाशविक उपभोक्तावाद ने लोगों की घेराबंदी की है जिससे बच पाना एक चुनौती से कम नहीं है। ठीक यही मानसिकता विज्ञापनों में महिलाओं की भूमिका भी तय करती है । यह  लिंग – भेद पर आधारित इस पितृसत्तात्मक विचारधारा की देन है जो आज की अर्थव्यवस्था को केंद्र में रखते हुए सम्पूर्ण व्यवस्था से बहुत ही नजदीक से जुड़ाव रखती है ।

घरेलू उत्पादों के विज्ञापनों में महिला की सांस्कृतिक छवि–


घरेलू रोजमर्रा की चीजें जैसे-डिटरर्जेण्ट पाउडर, मिर्च, हल्दी (मसालों) बर्तन धोने के उत्पादों आदि के विज्ञापनों में पुरूषो की उपस्थिति दर्ज होने पर उनका पुरूषाई वर्चस्व कायम रखा जाता है। ठीक यही प्रक्रिया अन्य घरेलू उत्पादों के विज्ञापनों में भी दिखाई पड़ती है जैसे मसालों के विज्ञापनों को ही लें तो ऐसे विज्ञापनों में मसालों की गुणवत्ता स्वाद के तौर पर बताने के लिये स्त्री को खाना बनाते हुए दिखाया जाता है और पुरुष इन विज्ञापनों में खाते हुए,खाने की तारीफ करते हुए दिखाया जाता हैऔर जहाँ कोई भी बर्तन चमकाने वाले उत्पाद का विज्ञापन हो तो पुरूष ऐसे विज्ञापनों में सेलर की भूमिका में होता है । इसका क्या अर्थ है? कही न कही यह पूरी परिपाटी पुरूषाई वर्चस्व के अधीन है। समाज में स्त्री पुरूष के संदर्भ में पुरूष को नियामक तथा मुखिया या कर्ता का स्थान प्राप्त हैं। पुंसवादी समाज में वही पहले दर्जे का नागरिक है। स्त्री उसके अधीन है न कि वह स्त्री के। यही समाज की संरचना के मूल में है। जिसके तहत घरेलू कामकाज महिलाओं के लिये ही निर्धारित किये गये है। पुरूष का इनसे कोई लेना-देना नहीं क्योंकि वह कमाता है और ठोस कारण यह भी है कि वह मुखिया होता है स्त्री उसकी बंदिनी के रूप में होती है इसलिये घर के काम केवल उसे ही निबटाने हैं। उन्हें इनसे किसी भी मुकाम पर पहुँच मुक्ति नहीं मिलती ।

इन विज्ञापन में महिलाओं का कपड़े, धोना, बर्तन मांजना, पति को आफिस के लिये रवाना करना से लेकर उनका मिजाज सही करने तक को दिखाया जाता है। देखने में तो यह सब बड़ा आसान लगता है लेकिन वास्तव में यह उतना आसान नहीं है।कोई भी स्त्री पुरूष से कम कार्य नहीं करती बल्कि हम देखते हैं कि पुरूष दिन भर काम करने बाद घर में बिलकुल कार्यमुक्त हो जाता है मगर एक ग्रहिणी कभी कार्यमुक्त नहीं होती घर के काम काज लेकर बच्चों की देख रेख की सम्पर्ण जिम्मेदारी जैसे अनेक घरेलू कार्य उसे कभी भी मुक्त नहीं रहने देते जबकि पुरूष धनोपार्जन के कार्य के बाद एकदम निश्चिंत होता है उसे घर के किसी काम-काज या देख-रेख से कोई सरोकार नहीं होता। यह सब उसकी स्वेच्छा पर निर्भर करता है जब कि महिलाओं के लिए घरेलू काम-काज स्वेच्छात्मक नहीं होते। उनके लिए यह अनिवार्य होते है। कुछ महिलाये जो कामकाजी/व्यवसायिक कार्य करती है वे घर के भी सारे काम निबटाती हैं क्यों कि घर के कार्य उन्ही के पल्लू से बांधे गये है तो ऐसे में निष्कर्ष यही निकलता है कि ऐसी कामकाजी महिलाये तो पुरूषो  से अधिक ही नहीं वरन् अत्याधिक कार्य करती हैं तब फिर ऐसे हालातों में  कभी पुरूषो  को विपरीत धारा में क्यों नहीं दिखाया जाता? क्यों स्त्री-पुरूष के सम्बन्धों के पारम्परिक ढर्रे को ज्यों का त्यों बरकरार रखा जाता है? और अगर कभी किसी विज्ञापन में ऐसा दिखाया भी गया हो तो वह अपवाद स्वरूप ही होगा क्योंकि विज्ञापन भी उसी पारम्परिक सामंती-पितृसत्तामक संस्कृति को बरकार रखते हुए बनाये जा रहे हैं जिसमें महिला अपने निर्धारित परिपाटी से बाहर नहीं निकलती। यही प्रक्रिया सभी विज्ञापनों में देखने को मिलती हैं। यह कितना उचित है?  महिलाओं के लिये हमारे समाज में दायरा तय है और उस दायरे के तहत ये घरेलू कामकाज उसी के लिये है या उसी के पल्लू से बंधे है। महिलाओं के लिये यह निर्धारित कार्य हैं जो उसी को निबटाने होते है । फिर चाहे स्थिति जो हो। वह चाहे शिक्षित हो जाये या फिर वह कामकाजी/व्यवसायिक हो तब भी उसके लिये घरेलू कार्य अनिवार्यता से जुड़े होते हैं। ठीक इसी सांस्कृतिक मानस को ध्यान में रखकर विज्ञापन भी बनाये जाते हैं।

विज्ञापनों में महिलाओं का दूसरा रूप उनके तथाकथित ढर्रे में ही दिखाया जाता है।मीडिया भी इसी व्यवस्था के पैराकारों के द्वारा संचालित हो रहा है। जिसके कारण विज्ञापनों में पारंपरिक मूल्यों व संस्कृति को बरकरार रखने का कार्य किया जा रहा है।इन विज्ञापनों की मूल मानसिकता पितृसत्तावादी चलन को बरकरार रखने की है। यह बाजार की मांग प्रचारित कर रहा है। यह एक ऐसी मानसिकता विकसित कर रहा है जिसमें स्त्री की गुलामी प्रत्यक्ष रूप में बड़े सौम्य तरीके से तथा परोक्ष रूप में बड़ी चतुराई से एक जाल की भांति समाज में फैलाई जा रही है। तब फिर यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि पुरूष के उत्पादों के विज्ञापनों में महिला के शरीर को ने बेचा जाए जब कि बाजार के अर्धसामान्ती और अर्धऔपनिवेशिक चेहरा बिल्कुल साफ दिखाई दे रहा है। बाजार ने इन्हीं सामाजिक संरचना के सरोकरों को बाजारू बनाया है जिसमें फंसकर युवतियां अपनी मुक्ति के नाम पर इनकी घटिया साजिश का शिकार हो रही है।शहर के चर्चित स्थानों पर लगे बड़े बड़े र्होडिंग्स, वाल राइटिंग, अखबारो, पत्रिकाओं आदि के विज्ञापन एक ही प्रक्रिया में जुटे हैं। महिलाओं की देह को उत्पाद बेचने का एक ठोस जरिया बन चुका  है।  ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि जिससे उपभोक्ताओं के बीच अनाव्यश्यक मांग पैदा हो और उपभोक्ता वर्ग की संख्या में बढ़ोत्तरी हो।यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि विज्ञापन केवल व्यावसायिक दृष्टी से ही महत्वपूर्ण नहीं है,बल्कि सामाजिक क्षेत्र में इसका व्यापक प्रभाव पड़ता है ।

पूंजीवाद और  विज्ञापन का सह:संबंध –


महिलाओं के संदर्भ में विज्ञापनों पर विचार करें तो मूल रूप से बाजार की उन्मुखता का जिक्र पूरी तरह से जरूरी है।1990 के दशक में उदारीकरण के प्रभाव सामने आये वैसे कार्यक्रम तो 1980 के दशक से ही प्रारंभ हो चुके थे। उदारीकरण और वैश्वीकरण के आने पर बाजारवाद को हावी होने का भरपूर मौका मिला जिसके चलते इस देश की अर्द्धसामन्ती व्यवस्था के पारम्परिक सामंती मूल्यों को भुनाकर उन्हें मुनाफे का यंत्र बना दिया गया। इसलिए आज बीस अरब का कॉस्मेटिक्स उद्योग है ,तीन सौ अरब का कॉस्मेटिक्स सर्जरी उद्योग है, और सात अरब का पॉर्न उद्योग है । यह उद्योग उस  भ्रामकता पर टिके हैं जो विज्ञापनों या कहा जाए मास-मीडिया के द्वारा प्रेषित की जा रही है । जिसे ‘अनावश्यक मांग’ पैदा करना कहा जाता है ।पुरूषो के उत्पादों के विज्ञापनों में महिलाओं की कामोत्तेजक प्रस्तुति इसी का भयानक अंग है। बाजारीकरण की विचारधारा ने पुंसवादी समाज की इसी नस को पकड़कर अपने बाजार की मजबूती को बरकरार रखने में अपार सफलता अर्जित की है। पर्दे की दुनिया में महिलाओं को उनके बौद्धिक स्तर पर नही वरन् दैहिक स्तर पर पेश किया जाता हैं क्योंकि महिलाओं को एक वस्तु के रूप में, देह के  रूप में मानने सामन्ती मूल्य आज भी समाज में जड़ कियें हुए है। इस प्रक्रिया में तो सबसे अधिक विज्ञापनों ने स्त्री की देह को विज्ञापन बना डाला है। टी.वी. पर चाहें जो चैनल देखों हर चैनल पर आने वाले उन्ही विज्ञापनों में महिलाओं की स्थिति का खुला आंकलन करने का प्रमाण आपके समक्ष होगा।


पुरूषो के दाढ़ी बनाने वाले यंत्रों की सौम्यता और सुगमता की तुलना स्त्री की देह से करने का और क्या कारण हो सकता है सिवाय इसके किआज भी वही सामन्ती विचारधारा इस व्यवस्थाकेमूलमें है जिसमें पुरूष हर दूसरी स्त्री को भोगी नजरों से तथा नग्नदेखना चहता है या फिर वह स्त्री को भोग की वस्तु के रूप में ही देखता है। इसी सामंतवाद को बाजारवाद ने नये फ्रेम में मढ़कर पर्दे पर विज्ञापनों में स्त्री की स्वतन्त्रता को उसके नग्न शरीर तथा कामोत्तेजक गतिविधियों अथवा प्रदर्शनसे जोड़ा है, जिसका जीता-जागता उदाहरण पर्दे पर दिखाई जाने वाली हिन्दी फिल्में हैं जिसमें अश्लील दृश्यों की भरमार रहती है इन  दृश्यों को ‘बोल्ड सीन’कहना चलन में है। इसके मायने क्या है? स्पष्ट है कि पर्दे पर महिला का साहस (बोल्डनेस) और स्वतंत्रता इस रूप मे चित्रित की जा रही हैजो यह सामन्ती विचारधारावाला समाज हर पराईस्त्रीकेलिए चाहताहै।जबकि पूंजीवाद की सन्तान बाजारवाद ने महिला वर्ग में पढ़ी – लिखी महिलाओं को इस दिशा में बढ़ाने का कार्य किया है जिसमें वह  अपनी  दैहिकक मनीयता  को हथियार के रूप में मान रही है,जबकि सच्चाई इससे परे है। देखा जाये तो यह एक प्रकार की गुलामी ही है जिसमें महिलाओं की बौद्धिकता को दरकिनार कर महज उसके दैहिक सौन्दर्य को परोसने भर का कार्य करवाया जाता है। यह उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व की उपेक्षा है जहां वह एक बुद्धिमान, प्रतिभावान, गौरवान्वित अस्तित्वान मनुष्य के रूप में नही बल्कि एक उत्पाद (प्रोडक्ट) के रूप में प्रस्तुत की जाती है। यह कहना गलत नही होगा कि बाजारवाद में महिलाओं की अस्तित्वहीनता और लिंग-विभाजन श्रम पर आश्रित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिला है क्योंकि एड़ी से लेकर चोटी तक ऐेसे अनगिनत उदाहरण प्रत्यक्ष रूप में हमारे सामने है। इस बात को नजरअंदाज नही किया जा सकता कि लिंगाधारित श्रम विभाजन वहाँ (पर्दे की दुनिया विज्ञापनों में) भी पूरी तरह से मौजूद है। इसलिये स्त्री -पुरूषो के बीच काम की समरूपता कोसों दूर है।इसके साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि इन सभी विज्ञापनों का लक्ष्य मुख्य रूप से मध्यम वर्ग ही है। विज्ञापनों में दिखायी जाने वाली ब्रांडेड वस्तुएं निम्न वर्ग की पहुच से बाहर है। उदाहरण के तौर पर एक रिक्शा चालक या मजदूर किसी भी ब्रांडेड बनियान की जगह किसी छोटी -मोटी दुकान से कोई सस्ती और किफायती बनियान ही खरीदेगा यह भी हो सकता है कि वह बनियान ही न पहने केवल कमीज से ही काम चलाये। कहने का तात्पर्य यही है कि इस देश  में आज के दौर में भी मजदूर वर्ग या निम्न वर्ग के सामने रोजी-रोटी का सवाल बहुत बडा हैं।
देश  की 80 प्रतिशत आबादी के सामने जो चुनौतियां है वे बुनियादी जरूरतों की है। ऐसे में उनके ब्रांडेड अण्डरवियर या अन्य उत्पादों जो अच्छी-खासी ब्रांड के या नामी-गिरामी ब्रांड के है उन्हें इस्तेमाल में लाने का तो सवाल ही पैदा नही होता। इन हालातो में यह साफ है कि देश का उच्चवर्ग और मुख्य रूप से मध्यम वर्ग ही इन विज्ञापनों का लक्ष्य हैं। तमाम विज्ञापन एजेंसियां इन्ही वर्गों को लुभाने की बेजोड़ कवायद में लगी हैं। यह समझना जरूरी है कि  महिला वर्ग इससे पूरा जुड़ाव रखता है ।सवाल खड़ा होता है कि भूमंडलीकरण ने जिन महिलाओं का प्रतिनिधित्व किया है वे करोड़ों महिलाओं में कितनी संख्या में हैं ?मास –मीडिया ने किसान और मजदूर या श्रमिकवर्ग की महिलाओं के जीवन से जुड़ी वास्तविक समस्याओं को प्रचारित करने का काम कभी नहीं किया । विज्ञापन तो ऐसा माध्यम बन चुका है जिसका काम मतिभ्रमों को बढ़ाकर उत्पाद बेचना है । महिलावर्ग को लक्ष्य बनाकर बहुत कुछ बेचा जा रहा है । स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नूडल्स को माँ बच्चों के टिफिन में रखते दिखाई जाती है क्योंकि इसके दो फायदे बताए जाते हैं एक तो यह कि यह दो मिनट में झट से तैयार होता है दूसरा इतना स्वादिष्ट है कि बच्चे इसके बिना रह नहीं सकते । दुनिया का सबसे खराब जी मचलाने वाला खाना बर्गर आदि को स्टेंडराइज़ बना दिया गया है कि उसके बिना न तो पढ़ी-लिखी माँ आधुनिक होती है और न ही उनके बच्चे आधुनिक होंगे व्यावहारिक रूप से इस बात को समझने के लिए आंकड़ो कि जरूरत नहीं है क्योंकि हर शहर के रेस्तरां और तमाम शहरों में पहुँचे डोमिनोज के पिज्जा हट जैसी कई प्रतिष्ठित दुकानों में विज्ञापनो के इस प्रभाव को देखा जा सकता है । यहाँ डर यह है कि बच्चे कहीं उस धारा से पिछड़ न जाएँ । खाद्य उत्पादों में यही सोच निश्चित रूप से मिलती है ।इस मानक को खड़ा करने का लाभ यह है कि आज तैंतीस करोड़ अरब डालर से ऊपर का भोजन उद्योग है ।

यहाँ इस बात का जिक्र करना लाजिमी है कि मीडिया संदेशों के प्रसारण का ठोस माध्यम है और कई तरीकों से वह अपने संदेश लोगों तक पहुँचाता है, जिनमें मुख्य रूप से मनोरंजक कार्यक्रमों, धारावाहिकों, समाचारों और विज्ञापनों के द्वारा इस प्रकार के संदेश प्रसारित किये जाते है। देश की मुख्यधारा या लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मीडिया को जनता से आज कोई सरोकार नही रह गया है। मीडिया पूरी तरह से देशी – विदेशी  कंपनियों के लाभ के लिये काम करता हुआ दिखाई पड़ता है। मीडिया एक बहुत बड़े उद्योग के रूप में स्थापित हो चुका है।  उसे केवल अपने मुनाफे की चिंता  है । महिलाओं के प्रति पूरे विश्व का रवैया पितृसत्तात्मक ही है,मीडिया भी इन्ही पितृसत्तात्मक मूल्यों का पोषण करता है फिर चाहे प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रानिक मीडिया हो सब जगह पितृसत्तामकता और उसमें लिप्त बाजारू मूल्यों को ही परोसना मीडिया का असली चरित्र है । ऐसे में विज्ञापनों में महिला विरोधी मूल्य ही दिखायी देंगे लगभग हर विज्ञापन मुनाफा कमाने की प्रक्रिया की अटूट कड़ी से ग्रसित है।इस तरह के विज्ञापनों पर (जो पुरूषो उत्पादों के हैं), नजर डालें तो देश और दुनियाभर में महिलाओं के विरूद्ध खड़े पितृसत्ता, शासक वर्ग और बाजार के नजरिये का पता लगाना बहुत ही आसानबात है।  बाइक के विज्ञापन तथा ऐसे तमाम विज्ञापनों को जो इस समय टी.वी. पर प्रसारित किये जा रहे हैं।इनका आशय केवल इतना है कि महिला सिर्फ आनंद, आराम और संतुष्टि देने की वस्तु मात्र है।

 पुरूषवादी सोच महिलाओं को सिर्फ इसी रूप में देखती है। इसलिए बाजार भी महिलाओं को अपने मुनाफे के लिए इसी रूप में दिखाता है और इससे अधिक दिखाकर प्रचारित करने से वह अनाव्यश्यक माँग भी पैदा करता है । ज्यादातर विज्ञापनोंमें  इसी सोच के तहत महिलाओं के शरीर को बेचा जाता है। टी वी पर प्रसारित इन विज्ञापनों के प्रसार में जो मूल प्रवृत्ति है वह पितृसत्ता ही है। जिसका बाजार अपने फायदे के लिए हथियार स्वरूप इस्तेमाल कर रहा है। यह विडम्बना ही है कि बालीबुड की कई अभिनेत्रियों कला से अधिक स्लीमट्रीम बनने तथा अश्लीलप्रदर्शन की होड़ में इस कदर जुटी है मानो उनका ’बोल्ड और सेक्सी’ होने का तमगा उनसे छिन गया तो उन्हे फिल्म जगत में कोई नहीं पूछेगा जो कि सच्चाई भी है फिल्मबिकने के लिए बनायी जा रही है इनका मुख्य उद्देश्य व्यापार करना है और उनमें महिलाओं का ‘बोल्ड-सेक्सी‘ होना बाजार में  फिल्म बेचने का एक मजबूत जरिया बना दिया है। इसका कारण जो समाज में नहीं दिखता वो खूब दिखाओ और जब आदत बन जाए तो जाहिर है वह मांग में बदल जाती है दूसरी तरफ समाज का मानस भी ऐसा बनता जा रहा है।यह सब एक प्रकार की साजिश  के तहत हो रहा है। पहले से ही समाज का पुरूष वर्ग महिलाओं को इसी परिपाटी में देखता आया है लेकिन मीडिया जगत ने खास तौर पर फिल्मों और विज्ञापनों ने इस विचारधारा को और अधिक हवा दी है, और अधिक दृढ़ता प्रदान की है। किसी भी उम्र का व्यक्ति फिर चाहे वे बच्चे ही क्यों न हो इससे अछूते नही है क्योंकि अपने सही समय से पहले ही वे इस पहलू से वाकिफ हो रहे, परिपक्व हो रहे है। इतना ही नहीं किशोरावस्था के नव युवक-युवतियों की दिशा भ्रमित करने का दायित्व भी इन्हीं पर है। इस संदर्भ में विज्ञापनों में दिखाई जाने वाली माडल भी अभिनेत्रियों से पीछे नहीं हैं क्योंकि उनको भी फिल्म जगत में या फिर माडलिंग में स्थापित होना है या कहा जाये कि कीर्तिमान स्थापित करना है तो इस प्रतिस्पर्धा में सर्वश्रेष्ठ बनने का तयशुदा मूलमंत्र अपनाना होगा ।

यहाँ यह कहना गलत नहीं होगा कि ऊपर बैठे तेज-तर्रार लोग तथा व्यवस्था के पैरोकारों ने आधुनिक शब्द को अपने मुताबिक मोड़कर उसको सम्पूर्ण अर्थ को चालाकी से बदल कर समाज में प्रसारित किया जा रहा है जोकि किसी भी सूरत में समाज के लिये घातक है। महिलाओं को बल-बुद्धिसे कम आंकना या फिर एक तरह से देखा जाये तो हर लिहाज से कम आंकना सामन्तवादी पितृसत्ता के मूल में है क्योंकि उन्हें इस व्यवस्था में मनुष्य होने का दर्जा आज भी पूरी तरह से प्राप्त नहीं है। ऐसी स्थिति में ऊपर बैठे इस व्यवस्था के पैरोकारो द्वारा दी जाने वाली महिलाओं की मुक्ति का रास्ता भी वैसा ही होगा जिसमें उनका लाभ हो और उनका बाजार गर्म रहे इस बात को ध्यान में रखते हुए ही उनकी सभी गतिविधियां लागू होती है। इसलिये महिलाओं के लिये आधुनिकता का इसी रूप में प्रचार किया जा रहा है या मानस बनाया जा रहा है जब कि इस शब्द के मायने काफी बड़े स्तर के है न कि विज्ञापन और फिल्मों में दिखायी जाने वाली महिलाओं के जैसा बनने में। अन्य शब्दों में कहा जाये तो आधुनिकता के अर्थ को दैहिक सौन्दर्य  तक ही सीमित किया रहा है।

 निष्कर्ष – 

विज्ञापनों में महिलाओं के दो रूप प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं। एक तो पूर्णतः बाजारवाद जिसमें महिला का उत्तेजक व अश्लील रूप में मिलता है और दूसरा पूर्णतः पारम्परिक, सामंती मूल्यों को जारी  रखने के रूप में जिसमें घर और पितृसत्तात्मक संस्कृति को बनाये रखने का भाव पूर्णरूप से दिखाई देता है,जितने भी घरेलू उत्पादों के विज्ञापन हैं उनमें महिलाओं का वही पारंपरिक सांस्कृतिक रूप ही दिखाया जाता है। ऐसे घरेलू उत्पादों के विज्ञापनों की पूरी थीम ही श्रम विभाजन को स्पष्ट समझाती है । उदारीकरण और वैश्वीकरण के चलते बाजार ने इस व्यवस्था के पितृसत्ताई -सामंती मूल्यों को कायम रखने का पूरा प्रयास किया है तो दूसरी तरफ यह भी समझना होगा कि पूंजीवाद ने अपने फायदे के लिए स्त्री को, स्त्री स्वतन्त्रता की एक झूठी चयनशीलता दी है ।वास्तव में  यह एक प्रकार का भयावह मतिभ्रम है जहाँ महिला की वास्तविक मुक्ति नगण्य है क्योंकि स्त्री-मुक्ति के रास्ते को भूमंडलीकरण ने बेहद भ्रामक मोड़ दिया है ।

संदर्भ सूची :-
1.रूबीना, लेख 2010, टूटती साँकलें
2.गौतम रूपचन्द, मीडिया और संस्कृति 2008, श्री नटराजन प्रकाशन
3.त्रिपाठी कुशुम, 2013, पटपड़गंज दिल्ली, भावना प्रकाशन
4.http://www.dw.com/hi/विज्ञापनों-में-महिलाएं/g-18691477
5.विज्ञापन फिल्में

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देश के सबसे बड़े अस्पताल (एम्स) में मेडिकल दलाल सक्रिय: कर्मचारियों की मिलीभगत

यह रिपोर्ट एक फैक्ट चेक है एम्स (ऑल इण्डिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल सायसेंज) का स्वास्थ्य मंत्री के उस बयान के बाद कि एम्स के डाक्टर बिहारियों को वापस भेज दें और इस बीच डाक्टरों की एक टीम का उनके खिलाफ सामने आने के बाद. यह रिपोर्ट बताती है कि देश के सबसे बड़े अस्पताल एम्स में मेडिकल दलाल कैसे सक्रिय हैं, अस्पताल के कर्मियों की मिलीभगत से. एम्स प्रशासन स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा मरीजों की मुफ्त जांच के सुझाव पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहा, उधर दलाल मरीजों को लूट रहे हैं. संजीव चंदन की रिपोर्ट 


वह अपने राज्य के सभी बड़े अस्पतालों का चक्कर काटकर, निराश होकर अंततः देश की राजधानी स्थित सबसे बड़े अस्पताल में पहुंचा जहां उसके शरीर के एक अंग में तेजी से फैलता कैंसर डायग्नोस हुआ. कैंसर के डाक्टरों ने उसे तुरत ऑपरेशन का सुझाव दिया और अस्पताल में ही दाखिल कर लिया. यहाँ तक तो देश के सबसे बड़े अस्पताल आल इण्डिया मेडिकल इंस्टिट्यूट (एम्स) एक तत्पर और गरीबों के प्रति हमदर्द व्यवस्था वाला अस्पताल दिखता है. लेकिन ज़रा ठहरिये तस्वीर का यह हिस्सा एक पक्ष है. उस गरीब मरीज के साथ आगे होने वाला घटनाक्रम आपकी आँखें खोल देगा.

एम्स मेट्रो स्टेशन पर सोये गरीब मरीजों के तीमारदार और कुछ मरीज

बेतुके बयान वाले स्वस्थ्य मंत्री मरीज के राज्य से ही आते हैं
वह उन्हीं दिनों एम्स में दाखिल  हुआ जब देश के स्वास्थ्य मंत्री (राज्य) अश्विनी चौबे का विवादास्पद और बेतुका बयान आया कि ‘बिहार से लोग छोटी बीमारियों में भी एम्स पहुँच जाते हैं और भीड़ बढाते हैं. वे यहाँ तक कहते हैं डाक्टर बिहार से आये मरीजों को वापस भेज दें. मंत्री बिहार में पैदा हुए और बिहार से ही चुनकर विधानसभा, लोकसभा पहुँचते रहे हैं और मरीज भी बिहार से चलकर एम्स में दाखिल हुआ था, जिसे उन्हीं दिनों बायप्सी रिपोर्ट के बाद डाक्टरों ने कैंसर का जल्दी से जल्दी ऑपरेशन की तारीख दी क्योंकि बीमारी बढ़ रही थी, फ़ैल रही थी. वह बिहार के ओबीसी इसके लिए एम्स से ही जरूरी जांच के लिए कहा गया. 9 अक्टूबर को अश्विनी चौबे ने अपना बयान दिया, जिसका बचाव बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किये जाने के रूप में किया गया. मरीज बिहार के ओबीसी परिवार से आता है. परिवार और वह स्वयं मजदूरी का काम करते हैं.

जांच से इनकार मरीज और उसके तीमारदार परेशान 
एम्स के जिस विभाग से जांच होना था उसने कुछ सामान्य से जांच के मामलों में कहा कि इसकी मशीनें खराब हैं और कैंसर के लिए जरूरी ‘पेट स्कैन’ जांच के लिए डेढ़ महीने बाद की तारीख दे दी और यह सलाह भी कि यदि उसे जल्दबाजी है तो बाहर से जांच कराये. देश की राजधानी में एक कैंसर से पीड़ित एक गरीब मरीज मर रहा है, उसके देखभाल के लिए आये लोग पैसों की कमी से जूझ रहे हैं, जांच के लिए कर्ज ले रहे हैं और स्वास्थ्य मंत्री उस जैसे मरीजों को ज्ञान दे रहे हैं कि बीमारियों का इलाज राज्य में ही कराओ. राज्य की राजधानी में भी कैंसर की जांच की सुविधा है लेकिन वहाँ भी प्राइवेट अस्पतालों के दलालों की खबरें मीडिया में आती रही हैं. गरीब मरीज ने फिर से कैंसर के डाक्टरों को ही सबकुछ बताया. उन्होंने हालत की गंभीरता को देखते हुए जल्द जांच का लिखित अनुरोध किया, लेकिन नतीजा ढाक का तीन पात.

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सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री (राज्य) का पत्र भी बेकार गया. 
परेशान मरीज के लोगों ने भारत सरकार के सामजिक न्याय मंत्री (राज्य), रामदास आठवले, का दरवाजा खटखटाया. उन्होंने एम्स के डायरेक्टर को फोन मिलाया. वे व्यस्त थे कहीं मीटिंग में. मत्री महोदय ने निदेशक के नाम एक पत्र लिख दिया और किसी इंचार्ज से उनके पीए ने बात की. मरीज को लगा कि देश की राजधानी में कुछ काम होता है. लेकिन फिर निराशा. पत्र देखकर भी जांच वाले विभाग ने कहा कि एक सप्ताह में कर देंगे अभी मशीन खराब है. और फिर लगे हाथ सुझाव जल्दी हो तो बाहर से करा लो. उधर कैंसर के डाक्टर ने ऑपरेशन के लिए दाखिल कर रखा था और जल्दी कह रहे थे.

और भी थे परेशान मरीज जिन्हें जांच के लिए बाहर भेजा जा रहा था
इस रिपोर्टर को कैंसर के मारीज के परेशान परिवार वाले सामाजिक न्याय के मंत्री के यहाँ से लौटते हुए मिल गये. मामले की गंभीरता को देखते हुए साथ लगने पर पता चला कि जांच वाले लोग ऐसे ही कई मरीजों को बाहर भेज रहे थे. यह एक गंभीर मामला था, देश के सबसे बड़े अस्पताल में दलाली का और मरीजों से लूट के नेक्सस का. पूरे माजरे को समझने के लिए अस्पताल प्रशासन के मीडिया विभाग से सम्पर्क किया गया. उन्हें कुछ सवाल भेजे गये. सवाल थे:
1. “ PET स्कैन’ के इक्विपमेंट कब से खराब हैं
2. एम्स में इस जांच की कितनी मशीनें हैं?
3. क्या अस्पताल में मशीनें खराब होने पर कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है? खासकर तब जब एक्सपर्ट डाक्टर जल्द ऑपरेशन करने की संस्तुति लिख रहे हैं.
4. कृपया इन मशीनों के ठीक कराने संबंधी विभागीय पत्राचार की कॉपी दें
5. और भी कितनी मशीनें किन जांचों के खराब हैं क्योंकि और छोटे जांच के लिए भी मरीज बाहर भेजे जा रहे हैं.

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सरकारी आदेशों की भी अनदेखी 
इस बीच इस खबर पर काम करते हुए यह भी पता चला कि भारत सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय वित्त मंत्रालय के सुझावों के अनुरूप एम्स को कई पत्र भेज चुका है यह निर्देश देते हुए कि वह मरीजों से जांच के लिए लिए जा रहे शुल्क न ले. एम्स गैरयोजना मदों में खर्च के लिए प्रतिवर्ष अतिरिक्त 300 करोड़ की राशि माँगता है, जबकि सरकार उससे यह चाहती रही है कि 500 रूपये से कम शुल्क वाली जांच मुफ्त किये जायें. इस आशय के कई पत्र स्वास्थ्य मंत्रालय ईएमएस को भेज चुका है लेकिन ईएमएस प्रशासन ने एक का भी जवाब नहीं दिया.

मीडिया विभाग की सक्रियता से पहुँची मदद 
 एम्स के  मीडिया प्रोटोकॉल अधिकारी, बी एन आचार्या, ने बताया कि ‘ हमारे यहाँ सारी मशीनें ठीक हैं और किसी को भी एम्स बाहर जांच के लिए नहीं भेजता, न कहता है. हमारे कर्मचारियों की जगह कोई और उन्हें गुमराह कर रहा होगा. हालांकि तथ्य बता रहे हैं कि बहार जांच के लिए एम्स के विभाग प्रेरित कर रहे हैं. बहरहाल, बी एन आचार्या की पहल पर एक मरीज को थोड़ी सहूलियत मिल गयी. हालांकि मेरे सवाल भेजने और आचार्या के सक्रिय होने तक सम्बंधित मरीज का ‘ PET स्कैन’ टेस्ट बाहर से हो गया था, वे घबड़ाये हुए थे. कैंसर विभाग के डाक्टर पहले से ही तत्पर और संवेदनशील थे, आचार्या के सक्रिय होने के बाद उसका ऑपरेशन तुरत हो भी गया.

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लेकिन सवाल 
लेकिन सवाल है कि और मरीजों का क्या ? क्या गरीब मरीजों को एम्स जैसे अस्पताल में दलाल लूट रहे हैं और इसमें उनके कर्मचारियों की भी मिलीभगत है. और सबसे बड़ा सवाल कि स्वास्थ्य मंत्रालय और मंत्री का अपने ही मेडिकल कॉलेज पर बस नहीं चलता लेकिन वे जनता को क्यों विवादास्पद नसीहतें देते रहते हैं? उनसे बेहतर वे डाक्टर हैं जो इस मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में सक्रिय हैं और तत्पर होकर जांच के लिए आगे आते हैं, मंत्री के बयान के बाद भी और इस केस में भी. और आख़िरी सवाल कि आंतरिक और बाह्य दलालों द्वारा मरीजों की लूट का यह खेल कौन बंद करने की पहल करेगा?

तस्वीरें गूगल से साभार 

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महिला पत्रकार की हत्या: पनामा लीक की खबर से दुनिया भर में पैदा किया था राजनीतिक भूचाल

माल्टा की एक खोजी पत्रकार  17 अक्टूबर को अपनी कार में एक बम विस्फोट से मारी गयी. डेफने कारुआना गैलिज़िया नामक पत्रकार ने लीक पनामा पत्रों के माध्यम से दीप के राष्ट्रों का अपतटीय टैक्स हेवन से संपर्कों को उजागर किया था.

प्रधान मंत्री जोसेफ मस्कट ने कहा, “53 वर्षीय डेफने कारुआना गैलिज़िया, माल्टा के मुख्य द्वीप के एक बड़े शहर मोस्टा में अपने घर से बाहर निकली ही थी कि जब बम विस्फोट हुआ.  विस्फोट काफी तीव्र था, उसने गाडी के परखच्चे उड़ा दिये.’

माल्टा के सबसे प्रसिद्ध खोजी पत्रकार के बेटे ने मंगलवार को कहा था कि उनकी मां राजनीतिक भ्रष्टाचार को उजागर करने के कारण मार दी गयीं. सैकड़ों लोगों ने न्याय मांगने के लिए  प्रदर्शन किया.


माल्टा  के अधिकारियों ने डच फोरेंसिक विशेषज्ञों और अमेरिकन एफबीआई एजेंटों से जांच में मदद माँगी है. मारी गयी पत्रकार के बेटे मैट्यू कारुआना गैलिज़िया ने फेसबुक पर कहा, “मेरी मां को हत्या कर दी गई थी क्योंकि वह एक मजबूत पत्रकार की तरह कानून के शासन और उनके बीच खड़ी थी जो इसका उल्लंघन करते थे।”

मंगलवार की दोपहर, सैकड़ों लोगों ने अदालतों के सामने प्रदर्शन करते हुए मारी गयी पत्रकार के लिए न्याय की मांग की.

हाल ही में, गैलिज़िया ने तथाकथित पनामा पत्रों में दर्ज जानकारी पर तहकीकात कर रही थीं, जो सेंट्रल अमेरिकी राष्ट्र में एक अपतटीय कानून फर्म के दस्तावेजों का एक बड़ा संग्रह है, जो 2015 में लीक हो गए थे. पनामा पत्रों की लीक ने कई देशों में भूचाल ला दिया था. नवाज शरीफ का नाम होने के कारण पाकिस्तान की राजनीति में उथल-पुथल मच गयी तो भारत में अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या राय तक का  नाम पनामा पेपर घोटाले से जुड़ा था.

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भगवान! ‘एक कटोरा भात खिला दो बस, भारत में भात नहीं मिला’

ज्योति प्रसाद

 शोधरत , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय. सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com

स्वर्ग और नरक के बीच भूखी बच्ची वहाँ भी फंस गयी, उम्र 11 साल. क्या पाप और क्या पुण्य उसी ने लिखा है आपके नाम एक खत. पुण्यआत्माओं, बहुत बोलने से थक गये हों तो पढ़ें इसे और हृदय हो तो रो लें.

मुझे नहीं पता कि मैं किस दरवाज़े पर खड़ी हूँ! धरती पर जब तक रही यही सुनने को मिला कि स्वर्ग और नरक दो जगहे हैं। मैं काफी थक गई हूँ। यहाँ दरवाज़े पर कोई नहीं है। मुझे यह भी नहीं मालूम कि जब यह दरवाजा खुलेगा तो नरक का होगा या स्वर्ग का। मेरी उम्र 11 बरस है। मेरा नाम संतोषी कुमारी है। पहले मैं धरती पर झारखंड में रहती थी। हाँ, वही जो भारतनाम के देश में है। वहाँ 100 स्मार्ट सिटी बनाने का काम ज़ोरों पर चल रहा है। लेकिन सच्ची बोलूँ, मुझे नहीं पता कि उस स्मार्ट सिटी में मेरी जगह थी भी या नहीं, यह मुझको नहीं मालूम। मुझे न बहुत सी बातें नहीं मालूम। लेकिन कुछ-कुछ मालूम है। अच्छा एक बात और बताऊँ, पिछले कुछ दिनों से माँ राशन लेने जब भी जाती थी खाली हाथ लौट आती थी। मुझे अच्छा नहीं लगता था। मुझे रोना आता था। मुझे बहुत भूख लगती थी। बहुत ज़्यादा। कोई कार्ड-वार्ड का चक्कर था। मुझे नहीं पता कि आधार क्या होता है। कुछ दिनों से स्कूल में भी दुर्गा पूजा की छुट्टियाँ पड़ गई थीं। मुझे अच्छा नहीं लगा था। छुट्टी पड़ जाने से स्कूल में भी खाना मिलना बंद हो गया था। न जाने ये दुर्गा पूजा क्यों आई थी?


अच्छा, ये दरवाजा खुल नहीं रहा। ज़रा और देर बैठ जाऊँ।… आप लोगों को बताऊँ कि मैं मरना नहीं चाहती थी। बचपन में भला कौन मरना चाहता है। 11 बरस की उम्र को लोग कहते हैं कि बच्चों की उम्र है। मुझे नहीं मालूम कि क्या सच है और क्या झूठ है। लेकिन मैं तो स्कूल से लौटकर माई के संग काम करवाती थी। माई अकेले थक जाती है न। वो भी क्या करे। उसे भी तो भात खाने को नहीं मिलता। वो कमजोर है। मैं भी तो कमजोर ही हूँ। सुबह स्कूल में प्रार्थना के समय खड़े होने पर मेरा सिर चकरा जाता था। आँखें बंद करने पर काले काले धब्बे दिखते थे। एक दिन मैं बेहोश होकर गिर भी गई थी। लेकिन तब भी मैं मरी नहीं। स्कूल के खाने में स्वाद नहीं होता था तब भी अच्छा लगता था। मुझसे भूख बर्दाश्त नहीं होती थी।

भूख लगने पर मानो जैसे पेट में बड़ी तेज़ आग लग जाती थी। छूने पर पेट गरम सा लगता था। बार-बार पानी पीने पर भी नहीं जाती थी। सिर के एक हिस्से में दर्द होता था। आँखों से दिखता भी नहीं था। कुछ भी अच्छा नहीं लगता था जब भूख लगती थी। हाथ पैर सुख रहे थे। और माई को यह चिंता होती थी कि मैं कमजोर हो रही थी। इसी बीच माई जब राशन लेने गई तब राशन वाले ने राशन देने से मना कर दिया। कहने लगा कि आधार कार्ड जुड़वा के लाओ। माई काम पर जाए या आधार कार्ड जुड़वाए। हमें तो पता भी नहीं था कि कैसे जुड़ेगा। पर राशन नहीं मिला।…ओह! भूख बहुत बुरी होती है। जब पेट में कुछ न हो तब कुछ अच्छा भी नहीं लगता। कुछ दिखता भी नहीं और सुनाई भी नहीं देता।



अच्छा मरने के बाद दिमाग बहुत बड़ा और किसी संत के दिमाग की तरह बन जाता है। देखो मैं बैठे बैठे क्या सोच रही हूँ। ऊपर होने पर सब कुछ दिखने लगता है। धरती की हर तरह की हलचल का पता चलता है। एक शांति सी है। फिलहल अभी भूख नहीं लग रही। पेट वाला हिस्सा गुब्बारे की तरह हल्का लग रहा है। हाँ, माई की याद आ रही है। लेकिन मैं तो अब मर गई हूँ, भूख से। एक रपट आई थी मेरे मरने के पहले। इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (IFPRI) वैश्विक भूख सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडेक्स) में भारत 100वें नंबर पर तरक्की कर गया है। पिछले साल यह 97वें था। कितनी गजब बात है कि नोट बंदी जैसे फैसले से आया हुआ काला धन होते हुए भी मैं मर गई। कहाँ गया वह अकूत पैसा? कितनी अजीब बात है कि 100 स्मार्ट सिटी बनाने वाले देश में भूख बच्चों की जान ले रही है। सबसे बड़ी विपदा खाना होते हुए भी खाना न मिलना है। दूध के तो मैंने कभी सपने भी नहीं देखे। मुझे तो भात के कटोरे से ही संतोष हो जाता था। शायद यही वजह होगी जो माई ने मेरा नाम ‘संतोषी कुमारी’ रखा होगा।


यह दरवाजा तो खुल ही नहीं रहा। न जाने कब खुलेगा? क्या भगवान भी भूख से मर गया है? या फिर कहीं वह भी आधार कार्ड बनवाने गया है। हो सकता है। वह भी दस्तावेज़ बनवाने गया हो। आज का समय बड़ा कठिन हो गया है। यहाँ पर कोई पक्की सड़क नहीं है। बिजली का बल्ब भी नहीं है। लगता है यहाँ का भी विकास नहीं हुआ है। …विकास…अरे विकास से याद आया कि यह लफ़्फ़ाज़ी बहुत ज़्यादा गली-गली और द्वारे-द्वारे घूम रही थी धरती पर। आते जाते हलवाई की दुकान पर सुना था कि अच्छे दिन आएंगे।…गाना कुछ ऐसा था …मोदी आया मोदी आया रे, झारखंड विकास करे मोदी आया रे…गाना तो अच्छा ही लगता था। मुझे लगा था कि अच्छे दिन आने पर हलुआ का एक कटोरा खाने को मिलेगा। मेरे लिए तो भरपेट खाना ही अच्छे दिन की तरह लगता है। लेकिन मेरा विकास नहीं हुआ। न मेरी माई का। न मेरे घर का। उल्टा मेरी तो भूख से जान चली गई। क्या फायदा ऐसे विकास का जो खाना भी न मिलने दे।

ऐसी प्रणाली का क्या फायदा जो डिजिटल बनने के बाद भी खाना खाने से रोक दे। मशीनों को कब भूख लगा करती है। हम क्या जाने डिजिटल और विजिटल क्या होता है? भारत को डिजिटल करने से पहले भूख और गरीबी को डिजिटल करने का सोचना चाहिए था। भूख तो भूख होती है। अमीर और गरीब दोनों को लगती है। आदमी और औरत को भी। नेता और आम जन को भी। पहले जो अभावग्रस्त हैं उनको डिजिटल कीजिये। जिनको इलाज़ नहीं मिल रहा उनको डिजिटल कीजिये। जो भीख मांग रहे हैं, उनको कैसे डिजिटल करेंगे? जो सिग्नल पर गुलाब के फूल बेचने की मशक्कत में लगे रहते हैं, उनको कैसे डिजिटल करेंगे? जो सड़कों पर सर्दियों और गर्मी की रात काट देते हैं, जिनके लिए बसेरे का मतलब कुछ भी नहीं होता उनको कैसे डिजिटल करेंगे? जो बच्चे भिखमंगे बना दिये जाते हैं, जो बलात्कार का शिकार हो जाते हैं, उनको कैसे डिजिटल करेंगे? जिनको बेच दिया जाता है, उनका कब डिजिटाइजेशन होगा?आखिर यह कौन सी बला है? अगर मेरी भूख तुम्हारे डिजिटाइजेशन के दायरे में नहीं आती तो रख लो इसे अपने पास। मुझे नहीं चाहिए तुम्हारा डिजिटाइजेशन-विजिटाइजेशन। तुम्हारे विकास से बंद नालियों के सड़ते हुए पानी की बू आती है।

दरवाजा खुले तो मैं यहा के देवता से कुछ अर्ज़ कर लूँगी। यही कि कहीं और जन्म दे। यहाँ तो अगस्त में बच्चे मर जाते हैं। वही आठवाँ महीना जिसमें आज़ादी का जश्न मनाया जाता है। देवता से पूछ लूँगी कि अगस्त में ऑक्सीज़न कम छोड़ते हो क्या? ये कैसी जगह है कि जब देश के प्रधानमंत्री नोटबंदी का हिसाब किताब और फायदा लाल क़िले से बता रहे थे तब ठीक उसी समय चंडीगढ़ में एक 12 साल की बच्ची से रेप हो गया। …मुझे भूख नहीं लग रही। कमाल है। …शायद मरने के बाद भूख नहीं लगती।


जब 2006 में पहली बार वैश्विक भूख सूचकांक बनाया गया था तब भी 119 विकासशील देशों में भारत का स्थान 97वें नंबर पर था। आज भी वही स्थिति है। इस सूचकांक को बनाने में कुल चार घटकों को सूचित किया जाता है- आबादी में कुपोषित लोगों की संख्या, बाल मृत्युदर, अविकसित बच्चों की संख्या, अपनी उम्र की तुलना में कम वजन और कद वाले बच्चों की संख्या। जिस देश के बच्चे कुपोषित, अविकसित, बीमार, कम कद और वजन के हों वह देश ख्वाबी तरक्की के सपने कभी देख नहीं सकता। मैं शायद इन चारों संकेतकों में शामिल थी। हाँ, अगर मौत तरक्की है तो मेरा विकास हो गया।

वास्तव में मैं जिस समाज का हिस्सा थी वह भी कब ज़िंदा था! मुर्दा समाज था। कई तो वास्तव में गरीबी के कारण ज़िंदा वाले मुर्दे थे। कई अमीरी और सत्ता के कारण ज़िंदा वाले बदबूदार मुर्दे थे। जिनको वोट दिया और जो जीत गए, वे सबसे बड़े मुर्दा थे। इन्हें ये भी ठीक से नहीं मालूम कि ये मरे हुए हैं और इनमें से भयानक सड़ांध आती थी। इतनी कि उबकाई आ जाती थी। जिस भारत माता के नाम पर अपने सीने चौड़े करते हैं और जिसे कलेंडरों में देवी देवता के शक्ल में पूजते हैं और ज़मीन पर मार देते हैं,वास्तव में वे पतनशील दिमाग के मालिक हैं। समाज का पतन यह भी माना जाय कि वह अपने भावी भविष्य को भूख से मार देता है। धोखेबाज़ प्रणाली जो छिनने के लिए बनाई गई है, भी जिम्मेदार है। बेटी को मारो, बेटो को ऊपर पहुंचाओ वाला नारा परिणित किया जा रहा। कितना घिनौना है यह सब।

…शायद भगवान ने अपने चौकीदार को दरवाजा खोलने भेजा है। किसी के कदमों की आहट मिल रही है। मेरे पाप और पुण्य कुछ भी नहीं है। हाँ, इच्छा पूछेंगे तब कहूँगी कि एक कटोरा भात खिला दो बस। भारत में भात नहीं मिला।

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‘दलित’ शब्द दलित पैंथर आंदोलन के इतिहास से जुड़ा है: रामदास आठवले



‘दलित’ शब्द पर प्रतिबंध के खिलाफ सरकार के मंत्री आठवले 

केरल सरकार ने दलित और हरिजन शब्दों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है. सरकार के पब्लिक रिलेशन विभाग ने दलित और हरिजन शब्दों के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए सर्कुलर जारी किया है। पीआर विभाग ने एसटी/एससी कमिशन की एक सिफारिश का हवाला देते हुए नोटिस जारी किया है। पीआर विभाग ने सर्कुलर के जरिए सभी सरकारी पब्लिकेशन और सरकार की प्रचार-प्रसार सामग्री में ‘दलित’, ‘हरिजन’ शब्दों के इस्तेमाल पर रोक लगाने की अपील की है।

पीआर विभाग का यह सर्कुलर सरकार और अन्य विभागों के बीच इन शब्दों पर बैन लगाने को लेकर चल रही चर्चा के बीच आया है। सर्कुलर में दलित/हरिजन शब्दों की जगह एससी/एसटी शब्द इस्तेमाल करने का सुझाव दिया गया है। एससी/एसटी कमिशन के सूत्रों का कहना है कि दलित और हरिजन शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगाने की सिफारिश उन सामाजिक भेदभाव को खत्म करने के लिए की गई थी जो आज भी कई जगहों पर हो रहे हैं।

इस बीच केंद्र सरकार में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री (राज्य) और दलित नेता रामदास आठवले इस दलित शब्द को प्रतिबंधित किये जाने के पक्ष में नहीं हैं. आठवले महाराष्ट्र के दलित पैंथर आन्दोलन से जुड़े रहे हैं. उन्होंने प्रतिबंध के खिलाफ यह विचार उनपर शीघ्र प्रकाश्य किताब ‘ भारत के राजनेता: रामदास आठवले’ में संकलित  एक बातचीत में रखा है.

दलित शब्द का जो राजा ढाले और दूसरे लोग  विरोध कर रहे हैं उसको आप कैसे देखते हैं 

राजा ढाले दलित का विरोध नहीं करते हैं. उनके दिमाग में था कि भाई हम बुद्धिष्ट हैं . राजा ढाले ‘दलित’ शब्द का विरोध नहीं करते थे, क्यूंकि दलित पैंथर उन्होंने ही स्थापित किया था. लेकिन राजा ढाले कम्युनिजम का ज्यादा विरोध करते थे और उनका कहना ये था कि वर्ग आधारित लड़ाई से अपने देश के अन्दर से जाति व्यवस्था नहीं जायेगी. जो कम्युनिस्ट लोग सोचते हैं कि भाई वर्ग की लड़ाई होनी चाहिए , लेकिन जब तक जातिवाद ख़त्म होता नहीं होता तब तक वर्ग एक वर्ग नहीं होता है. इसलिए राजा ढाले कम्युनिज् का विरोध करते थे. बाबा साहब अम्बेडकर  भी बोलते थे कि मैं जन्म से कम्युनिस्ट हूँ. माओवादी विचार, मारपीट करने का विरोध राजा ढाले करते थ. ढसाल भी अम्बेडकराइट ही थे ,लेकिन उनके संबंध थोड़े कम्युनिस्ट लोगों के साथ थे, इसलिए राजा ढाले इनलोगों पर कम्युनिस्ट हैं, ऐसा  आरोप करते थे. राजा ढाले का दलित शब्द से ऐसा कोई विरोध नहीं था, क्यूंकि राजा ढाले दलित पैंथर मूवमेंट के संस्थापकों में से एक हैं.

लेकिन वही आश्चर्य है कि अभी शायद एक मुकदमा भी है. नागपुर हाई कोर्ट में मुकदमा है, दलित शब्द को हटाने का एक जनहित याचिका है. वहां सरकार भी आई है कि हम शेड्यूल कास्ट कहेंगे? एक प्रोफ़ेसर हैं हमारे, प्रोफ़ेसर एल कारुण्यकारा वे इस मुकदमे में दलित शब्द के पक्ष में हस्तक्षेप कर रहे हैं.

नहीं दलित शब्द कैसे ख़त्म होगा. हरिजन शब्द ख़त्म हो गया ये ठीक बात है, सरकारी रिकॉर्ड से हरिजन निकल गया है.

लेकिन दलित शब्द नहीं होना चाहिए ऐसा आपका मानना है?

नहीं दलित शब्द तो होना ही चाहिए दलित का अर्थ तो लोग समझते हैं कि दलित का मतलब शेड्यूल कास्ट. लेकिन हम बोलते हैं दलित का मतलब सभी कष्ट करने वाले लोग, झुग्गी-झोपडी में रहने वाले लोग, गरीब लोग बेरोजगार लोग महिला, पिछड़े अल्पसंख्यक सब दलित हैं.

झुग्गी-झोपडी में कुछ ऊंची जाति के लोग भी रहते हैं तो आप उनको भी दलित कहेंगे? 


ऊंची जाति के लोग भी रहते हैं तो गरीब हैं, अभी ऐसा है.बाबा साहब को लीजिये कि बाबा साहब अम्बेडकर  ने संविधान लिखा और जो पहला इलेक्शन हुआ 1952 में तो बाबा साहब अम्बेडकर नार्थ बोम्बे लोकसभा क्षेत्र से लड़े और बाबा साहब अम्बेडकर वहां हार गये, आल इंडिया शेड्यूल कास्ट फेडेरेशन की टिकट पर. फिर 54 में भंडारा से बोरकर नाम के एक दलित आदमी ने बाबा साहब को हराया. पंडारा से बाबा साहब अम्बेडकर खड़े हुए और कांग्रेस के बोरकर नाम के आदमी ने बाबा साहब अम्बेडकर को हराया. बोरकर मांग समाज के थे. फिर बाबा साहब ने विचार किया दो बार हारने के बाद कि हमें अभी रिपब्लिकन नाम की पार्टी स्थापित करनी चाहिए और उन्होंने एक पत्र लिखा राममनोहर लोहिया को. बाबा साहब का कहना ये था कि जिस तरह अमरीका, इंग्लेंड, जर्मनी, फ्रांस मं् और बहुत सारे यूरोपीय देशों में ‘टू पार्टी सिस्टम’ है. अपने देश में भी दो पार्टियाँ होनी चाहिए- एक पार्टी कांग्रेस पार्टी और दूसरी रिपब्लिकन पार्टी और रिपब्लिकन पार्टी में सब लोगों को आना चाहिए. कांग्रेस के खिलाफ बना विचार था यह. बाबा साहब अम्बेडकर  54 के बाद थोडा नाराज हुए थे. उन्होंने थोड़ा धम्म के तरफ ध्यान दिया. बुद्ध धम्म पर किताब लिखी और 14 अक्टूबर 56 को बाबा साहब ने बौध धर्म की दीक्षा ले ली, फिर उसके बाद बाबा साहब अम्बेडकर की 6 दिसंबर 1956 को मृत्यु हो गयी.  अगर बाबा साहब अम्बेडकर  और दस साल अपने बीच होते तो उनकी उपस्थिति में रिपब्लिकन पार्टी स्थापित होती और यह पार्टी एक बार बाबा साहब के टाइम पर सत्ता में आती, जिस तरह जय प्रकाश नारायण के टाइम पर जनता पार्टी आई. बहुत आन्दोलन हुआ कांग्रेस के खिलाफ सब लोग इकठ्ठा आये और जनता पार्टी की सत्ता आ गई थी, वैसे ही बाबा साहब चाहते थे कि रिपब्लिकन पार्टी ऐसी होनी चाहिए. बाबा साहब अम्बेडकर गरीबों का सपोर्ट करते थे. बाबा साहब ने आल इंडिया शेड्यूल कास्ट फेडेरेशन इसलिए बर्खास्त करने का निर्णय लिया था कि खाली शेड्यूल कास्ट के वोट पर राजनीति में सफलता नहीं मिलेगी इसीलिए सब लोगों को साथ में लेना चाहिए.

अब ब्राह्मण लोगों का जहां तक सवाल है. बाब साहब के महार के चौहार तालाब का सत्याग्रह आंदोलन, काला राम मंदिर का सत्याग्रह, आदि उनके आंदोलनों में ब्राह्मण लोगों ने काफी सपोर्ट किया. केशव सीता राम ठाकरे, जो बाल ठाकरे के पिताजी थे, बाबा साहब का पूरा समर्थन करते थे. बाबा साहब के बड़े समर्थक चिटनिस, चित्रे, सहस्रबुद्धे   आदि थे. बाबा साहब का कहना था कि मैं ब्राह्मण जाति का विरोध नहीं करता हूँ मैं ब्राह्मणवाद का विरोध करता हूँ. जहाँ-जहाँ मुझे ब्राह्मणवाद नजर आता है, जातिवाद नजर आता है उनका मैं विरोध करता हूँ. मैं व्यक्तिगत समाज का विरोध नहीं करता हूँ. बाबा साहब सब जाति को लेकर ही राजनीति करना चाहते थे.

यह बातचीत सामाजिक न्याय मंत्री (राज्य) रामदास आठवले से लम्बी बातचीत का हिस्सा है. पूरी बातचीत ‘द मार्जिनलाइज्ड’ प्रकाशन से प्रकाशित किताब ‘भारत के राजनेता: रामदास आठवले’ में संकलित है.

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
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यौन उत्पीड़न के शिकार वे सब: वे कोई भी हैं, वे जिन्हें हम जानते हैं

अपने यौन उत्पीड़न के बारे में #MeToo हैश टैग के साथ बताने का सिलसिला ट्वीटर से शुरू होकर फेसबुक पर जारी है. सोशल मीडिया में स्त्रियाँ अपने बुरे अनुभव को शेयर कर रही हैं, उनमें महिलाओं पर यौन हिंसा के खिलाफ मुखर आवाज रही कविता कृष्णन से लेकर कई साहित्यकार, कलाकार, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं. कई नामचीन हस्तियों के साथ-साथ वे सब अपने अनुभव शेयर कर रही हैं, जो हमारे-आपके बीच हैं और जो साहसी हैं. शेयर करना ही, कहना ही पहली शुरुआत है हमले के विरुद्ध माहौल बनाने के लिए, हमलावरों पर कार्रवाई के लिए या उन्हें अपराधबोध से भरने के लिए.

अपराजिता शर्मा का रेखांकन

कविता कृष्णन ( महिला अधिकार कार्यकर्ता )


मुझे भी यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा – कई बार, अवांछित छूना और टेक्स्ट भेजना, ‘इनकार’ को तबज्जो न देना. मेरी शारीरिक निष्क्रियता, नियमित प्रश्नों का एक-आध शब्द में जवाब और उपेक्षा भाव को एकदम से तबज्जो नहीं दिया गया. जैसा ही उसने अपनी उत्पीड़न बढ़ाई, मैंने बिना देर किये ‘ना’ कहा, फिर भी यह जारी रखा गया. मेरी उम्मीद थी कि वह एक अनुभवी मेंटर के रूप में आदर प्राप्त व्यक्ति था, जिसे मैं वर्षों से जानती थीं, मेरे ‘ना’ का सम्मान करेगा लेकिन मुझे धोखा हुआ. सबसे खराब बात यह थी पचौरी शैली, वह ऐसा बर्ताव करता जैसे कि मैं जिस व्यवहार से घृणा कर रही थी, वह वास्तव में हमारे बीच एक गुप्त रोमांटिक समझौता था – मुझे लगता है कि उसके जैसे पुरुष यह स्वीकार नहीं करना चाहते हैं कि वे उत्पीड़न कर रहे हैं, वे इस तरह पेश आते हैं मानो अशिक हों. हाँ, मैं यहाँ इस बारे में बात नहीं करना चाहती कि मैं यह उत्पीड़न कैसे रोक सकी.

यदि हम सब, जिन्हें उनसे यौन उत्पीड़न या हमले का सामना करना पड़ा है जिन्हें हम जनाते रहे, अपनी बात कहें कहें #MeToo तो शायद समस्या की भयावहता हो हम स्पष्ट कर सकते हैं. लेकिन सर ‘मी टू’ कहना भर ही पर्याप्त नहीं है यदि हम उन यौन उत्पीडन की शिकार महिलाओं को यह अहसास देना चाहते हैं कि ‘यदि यह सचमुच में गंभीर होता तो मैंने तुम्हारे जैसा व्यवहार नहीं किया होता’, जैसा कि भारत में बलात्कार या यौन हिंसा का सामना करने वाली महिलाओं के बारे में कुछ लोगों को कहते सुना है. यौन हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए बहुत अधिक सहानुभूति, सम्मान होना चाहिए और उनके साथ खड़े होने की जरूरत है.

   अपने यौन शोषण की घटनायें बताने का हैश टैग #MeToo 

मीनाक्षी चंडीवाल (शिक्षिका, दिल्ली विश्वविद्यालय)
हम सब जुड़वा है,अपने अनुभवों में!!आवाजे!जिन्हें हमने अपने घर,गली-मोहल्लों में सुना है..हमारे कान जुड़वा है! हमारे अनुभवों में याद आने वाले वो लिजलिजे स्पर्श…हमारे शरीर जुड़वे है !हम भूले नही है! पर आज हमारी आवाजे भी जुड़वा है उन ‘आवाजो’ के खिलाफ,हम जुड़वा है,उन घूरती निगाहों के खिलाफ…आखिर ये जुड़वापन कब खिलखलायेगा एक आज़ाद ख्याल की रोशनी मे??हम अपने जुड़वे होने के शायद कुछ खुश रंग अहसास भी बाँट पाएंगी एक दिन…..#Metoo#

कविता (साहित्यकार)
#MeToo. जब कहानियों में कहा कई बार तो यहां भी कहने से गुरेज नहीं ..मैं कहती हूँ और इसलिये भी कहती हूँ कि कुछ और जुबान पर पडे चुप्पी के ताले शायद इस तरह टूटे …
(सोशल मीडिया पर सुबह से ही ये ट्रेंड चल रहा है। जिसमें हर वो लड़की जो कभी-ना-कभी यौन हमले का शिकार हुई हैं वो अपने वॉल पर #MeToo लिख रही हैं। अमेरिका से शुरू हुए इस ट्रेंड में दुनिया भर की महिलाएं हिस्सा ले रही हैं, जो साफ बताता है कि महिलाओं के साथ सेक्शुअल हरासमेंट की घटना कितनी भयावह है और हां ये कोई अपवाद नहीं।)

रंडी, या रंडी से कम और हाँ, बीबी से भी बलात्कार हक़ नहीं

सवा दीवान (लेखिका, फिल्मकार)
#MeToo एक बच्चे के रूप में, जब मैं बड़ी हो रही थी, एक वयस्क महिला के रूप में, उन पुरुषों द्वारा जिन्हें मैं जानती थी, या अजनबियों द्वारा भी.
अगर हम सब, जिन्होंने यौन उत्पीड़न या यौन हमले झेले हैं #MeTOO लिखते हैं तो हम इस समस्या की भयावहता को सामने ला सकते हैं. यदि यह आप पर भी लागू होता है तो कृपया इस स्टेट्स को कॉपी पेस्ट करें, और आप ऐसा करते हुए सुरक्षित महसूस करें.

जीतेंद्र कुमार ( शोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय)
#MeToo और कोई ऐसी भी है जो मेरे कारण लिख सकती है #MeTo

नागपुर में अखिल भारतीय महिला क्रांति परिषद (1942) का अमृत महोत्सव

डा. बाबा साहेब अम्बेडकर की उपस्थिति में नागपुर में 20 जुलाई 1942 को हुई अखिल भारतीय महिला परिषद का के 75वें  वर्ष में कई संगठनों की संयुक्त पहल से त्रिदिवसीय अखिल भारतीय महिला परिषद का आयोजन होने जा रहा है. इस त्रिदिवसीय महिला परिषद के उदघाटन सत्र की अध्यक्षता सामाजिक कार्यकर्ता और बामसेफ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मनीषा बांगर होंगी तथा फिल्म अभिनेत्री शबाना आजमी इसका उदघाटन करेंगी. इस ऐतिहासिक त्रिदिवसीय सम्मेलन में देश भर से महिला अधिकार के लिए संघर्ष करने वाली नामचीन हस्तियाँ शामिल हो रही हैं.

20 जुलाई 1942 को नागपुर में सुलोचनाबाई डोंगरे की अध्यक्षता में  अखिल भारतीय महिला परिषद परिषद संपन्न हुई थी. इस परिषद की विशेषता यह थी कि परिषद में डॉ. बाबासाहब आंबेडकर स्वयं उपस्थित थे. दलित महिलाओं का अलग संगठन हो, यह इच्छा स्वयं डॉ. बाबासाहब आंबेडकर की थी. लगभग पच्चीस हजार महिलायें इस परिषद में  रूप से सहभागी हुई थी. उनका उत्साह एक नई क्रांति का बिगुल बजा रहा था. यह एक क्रांतिकारी सम्मेलन था. दलित, शोषित, वंचित बहुजन  समाज की महिलाओं की आवाज संपूर्ण क्रांति की मांग करती नजर आ रही थी. यह परिषद अपने आप में दुनिया की ऐतिहासिक परिषद थी. इस परिषद में हुई घोषणा एवं मांगें महत्वपूर्ण थी.

सुलोचनाताई डोंगरे

22 से 24 तक होने वाले इस त्रिदिवसीय सम्मलेन में ‘भारतीय महिलाओं के उत्थान में बुद्ध, फुले और डा. बाबा साहेब अम्बेडकर का योगदान’, ‘अनुसूचित जाति-जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाएं और संविधान’, ‘शोषित पीड़ित महिलों के मुक्ति मार्ग’ जैसे विषयों पर बातचीत की जायेगी

इस कार्यक्रम की एक ख़ास ऐतिहासिकता यह भी है कि 1942 में तीन दिवसीय सम्मेलन की अध्यक्षता सुलोचना ताई डोंगरे ने की थी आज उनकी दूसरी पीढी, उनकी भांजी, मनीषा बांगर इस सम्मेलन के उदघाटन सत्र की अध्यक्षता कर रही हैं. इस ऐतिहासिक पुनः आवृत्ति के संबंध मनीषा बांगर कहती हैं कि आयोजकों ने पिछले कई वर्षों से बहुजन भारत के लिए मेरे काम को सम्मान दिया है.

स्त्री अध्ययन विभागों पर शामत, असोसिएशन भी सवालों के घेरे में

देश भर में विभिन्न विश्वविद्यालयों में लगभग दो सौ  के आस-पास स्त्री अध्ययंन विभाग/केंद्र आज नयी चुनौतियों से जूझ रहे हैं. अभी बमुश्किल चार दशक हुए हैं स्त्री अध्ययन का पहला सेंटर (1974) एसएनडीटी, मुम्बई में खुले हुए और इसे एक सुनियोजित हमला झेलना पड़ रहा है, अनिश्चितता के दौर से गुजरना पड़ रहा है. वैसे भी विश्वविद्यालयों के पुरुष-सत्ताक ढाँचे और प्रशासन में महिलाओं की न्यूनतम उपस्थिति के कारण इस विषय का बहुत स्वागत भी नहीं हुआ है, सेंटर पैसों की कमी से जूझ रहे हैं, धीरे-धीरे कई विश्वविद्यालयों में इसका मोड सेल्फ फायनांसिंग का होता गया है. विषय में डिग्री के बाद नौकरियों की गारंटी नहीं है, स्पष्ट है कि सेल्फ फायनांस मोड में विद्यार्थी मिलना मुश्किल है.

स्त्री-अधययन विभागों/केद्रों  ने भी अलग राह ले ली है 
इन केन्द्रों की भी विसंगतियां कम नहीं है. देश के कई स्त्री अधययन विभाग सिलाई-बुनाई के सेंटर की तरह दिखते हैं. विभागाध्यक्ष पितृसत्ता और पुरुष नियन्त्रण के प्रतीकों के पक्ष में तर्क देते सुहाग चिह्नों के लिए सेमिनारों में वकालत करती भी देखी जा सकती हैं या फिर भारतीय परिवार और परम्परा में स्त्री के लिए तय भूमिका की वकालत. स्त्री अध्ययन की एक प्राध्यापिका कहती हैं ‘देश भर में उँगलियों पर गिने जाने वाले स्त्री अध्ययन सेंटर और विभाग ही कमोवेश इस डिसिप्लीन की शुरुआत के उद्देश्यों के अनुरूप काम कर रहे हैं.’हालात यह है कि उदयपुर विश्वविद्यालय में स्त्री अध्ययन विभाग फैशन डिजायनिंग का कोर्स पढ़ा रहा है, मानो वह कोई स्किल डेवलपमेंट सेंटर हो.हालांकि स्त्री आन्दोलन के एक्टिविस्ट और विदुषियों-विद्वानों के बीच भी इसे एक समुचित डिसिप्लिन के रूप में विकसित करने को लेकर शुरू से ही मत-मतांतर रहा है.

सिर मुड़ाते ही पड़े ओले 
यूं तो महिला आन्दोलन और स्त्री अधययन विभाग पर पहले से ही जाति के दायरे से बाहर नहीं आने के आरोप लगते रहे हैं. इसके कारण भी हैं. हिन्दी में पहली दलित महिला आत्मकथा लेखिका कौशल्या बैसंत्री ने इस तरह के अनुभव व्यक्त किये हैं और यह दावा, विवाद तथा संवाद आज भी जारी है. आज भी उनपर सावित्रीबाई फुले, महात्मा फुले और डा. अम्बेडकर की उपेक्षा का आरोप है. हाल के दिनों में इन आरोपों से मुक्ति के प्रयास भी हो रहे हैं. अपने प्रशासनिक ढाँचे के वर्गीय और जाति-चरित्र के कारण भी इन आरोपों को झेलते महिला अध्ययन सेंटर-विभाग अभी दो चार कदम ही चले हैं कि परम्परावादी सोच का सीधा हमले भी उनपर शुरू हो गये  हैं. यह हमला उस सामाजिक-प्रशासनिक ढाँचे से हो रहा है, जिसका आदर्श मनुस्मृति आधारित शासन रहा है, जिसके प्रवक्ता संविधान लागू होते वक्त ही मनु स्मृति की पैरवी कर रहे थे. डा. अम्बेडकर हिन्दू स्त्री की गुलामी का सबसे बड़ा कारण इस ग्रन्थ के साथ-साथ स्मृतियों के नियमन को ही बताते हैं.

क्रमिक मौत की केन्द्रीय साजिश 
विश्वविद्यालयों की नियामक संस्था विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने कुछ महीने पहले सभी विश्वविद्यालयों को कुछ ख़ास चीजें पढ़ाने को कहा, तभी वे इन्हें फंड देते रहने की स्थिति में थे. वे ख़ास चीजें थीं विद्यार्थियों को आदर्श भारतीय नारी से रु-ब-रु कराने के सीमित लक्ष्य से निर्धारित, जो इस विषय के पढाये जाने के मूल लक्ष्य पर ही एक सुनियोजित हमला था. 29 मार्च, 2017 को यूजीसी ने एक नोटिफिकेशन के जरिये स्त्री अध्ययन के सभी केन्द्रों और विभागों को सूचित किया कि उन्हें प्लान हेड के तहत मिलने वाला बजट 30 सितम्बर के बाद यूजीसी की समीक्षा के बाद ही जारी किया जा सकेगा. जिसका अर्थ था यूजीसी के पाठ्यक्रम संबंधी निर्देशों का पालन एक शर्त होगी. कई केन्द्रों ने यूजीसी और सरकार के इरादे पर ऐतराज जताया तो यूजीसी से उन्हें कहा गया कि वे यह बताएं कि वे पढ़ाते क्या हैं? हालांकि कुछ केन्द्रों और विभागों ने यूजीसी के प्रति समर्पण कर दिया है. कुछ संस्थान हिंदूवादी संगठनों के साथ मिलकर कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं तो कुछ हिंदूवादी नेताओं की याद में कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं.

लगे हाथ यह भी स्पष्ट करते चलें कि इन दिनों केन्द्रीय सत्ता की रूचियां भारत की शिक्षा व्यवस्था को कथित राष्ट्रवादी बनाने की है. संघ प्रायोजित कुछ संगठन तो सीधे विश्वविद्यालयों को निर्देशित कर रहे हैं, पत्र लिख रहे हैं कि उन्हें क्या पढ़ाना है. और विश्वविद्यालय प्रशासन उन पत्रों का यथाशीघ्र अनुसरण का नोट विभागों को भेज रहे हैं. 12सितंबर को जागरुकता, देशभक्ति और राष्ट्रवाद के दृष्टिकोण से काम करने का दावा करने वाली संस्था  भारतीय शिक्षण मंडल ने ईमेल से कुछ विश्वविद्यालयों और संस्थानों को सुझाव भेजा है कि वे अपने पाठ्क्रमों को राष्ट्रवादी बनायें. एक विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार ने 22 सितम्बर को इस निर्देश के आलोक में यथाशीघ्र अपने विभागों को इसके सुझावों की दिशा में काम करने का निर्देश जारी किया है. संस्था ने लिखा कि “पाठ्यक्रम एवं शिक्षण पद्धति का निर्माण इस प्रकार से हो कि जिससे विद्यार्थी का समय व्यक्तित्व विकास एवं राष्ट्रीय एकता के साथ उसका भावनात्मक जुड़ाव सुनिश्चित किया जा सके। सत्व एवं रजस की उसके जीवन में प्रधानता रहे, निष्काम भाव से किये जाने वाले कर्म के महत्व को समझकर एक कर्मयोगी के रूप में अपने समसत कर्तव्यों का निर्वहन कर सके। 16 विद्याओं एवं 64 कलाओं में से कम से कम एक विद्या व एक कला पर उसका अधिपत्य हो, शास्त्रीय एवं मौलिक, विजिक्षु दृष्टिकोण हो, विश्वबंधुत्व के भाव से संपूर्ण विश्व को आच्छादित करने का जिसमें सामर्थ्य हो , अभय के साथ पूर्णता अथवा शून्य की ओर उन्मुख होकर आने वाले युग का पथ प्रदर्शक बन सके।”

स्त्री विमर्श की पठनीय किताबें 

हालांकि स्त्री अध्ययन विभागों और संस्थानों की प्रतिनिधि संस्था असोसिएशन फॉर वीमेन स्टडीज (स्थापित 1982) की अध्यक्ष इंद्राणी मजूमदार कहती हैं कि ‘इसके पहले भी केंद्र में जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार आयी थी और अटल बिहारी वाजपयी प्रधानमंत्री थे तो स्त्री अधययन केंद्र/ विभाग को ‘ स्त्री अध्ययन और परिवार कल्याण’ विभाग बनाने का नोटिफिकेशन किया गया था.’

वित्तीय अनिश्चितता की स्थिति और केन्द्रों की चिंता
देश के अधिकांश स्त्री अधययन केंद्र यूजीसी के प्लान हेड में प्राप्त वित्तीय सहयोग से चलते हैं. छठे प्लान की अवधि 30 सितम्बर को खत्म हो रही है. इसके लिए 29 मार्च के नोटिफिकेशन से यूजीसी ने सारे केन्द्रों और विभागों को बताया कि प्लान के तहत आगे अनुदान देना यूजीसी की समीक्षा के बाद ही संभव है. बहुत कम ही केंद्र और विभाग विश्वविद्यालयों के सीधे हिस्सा हैं, इसलिए अधिकाँश केन्द्रों पर आर्थिक संकट की स्थिति स्वाभाविक तौर पर बन गयी है.

यूजीसी के इस नोटिफिकेशन के बाद स्त्री अध्ययन केन्द्रों में खलबली मच गयी. असोसिएशन फॉर वीमेन स्टडीज के बुलावे पर 23 अगस्त को दिल्ली में स्त्री अधयन केन्द्रों से 200 प्रतिनिधि जुटे, एक दिन का कन्वेंशन हुआ और मानव संसाधन विकास मंत्रालय को ज्ञापन दिया गया. इसके बाद यूजीसी ने आश्वस्त किया कि यूजीसी का फंड रोकने का कोई इरादा नहीं है. स्त्री अध्ययन विभागों से पता करने पर पता चला कि इस आशय का कोई पत्र आजतक यूजीसी ने उन्हें नहीं भेजा है और 30 सितम्बर के बाद रिव्यू के आधार पर फंड का उनका नोटिफिकेशन यथावत है. यूजीसी की साईट पर हालांकि इस एक नोटिस देखी जा सकती है कि यूजीसी का इरादा फंड रोकने का नहीं है, लेकिन किसी स्पष्टता के अभाव में इरादे और घोषणा में तालमेल नहीं दिखता.

कुछ केंद्र कर रहे समर्पण जो अड़े उनका दमन 
स्त्री अधययन की एक प्राध्यापिका ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि ‘यूं तो देश के अधिकाँश विश्वविद्यालयों के स्त्री अधययन केंद्र यूं ही परम्परावादी नेतृत्व से संचालित है, लेकिन इधर जिन विश्वविद्यालयों ने स्त्रीवाद के क्षेत्र में अध्याय लिखे वहाँ हिंदुत्ववादी संगठनों के साथ तालमेल और सेमिनार की खबरें आ रही हैं. यूजीसी ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर वाद-विवाद प्रतियोगिता आयोजित करने या ऐसे ही कार्यक्रमों के लिए सुझाव और फंड दिया है. दुखद है कि स्त्री अधययन विभागों से जुड़े लोग भी ऐसे आयोजन संचालित कर रहे हैं. सवाल है कि दीनदयाल उपाध्याय का योगदान स्त्रीवाद के लिए क्या है?’

इस बीच जो केंद्र यूजीसी के सुझावों और रिव्यू के बाद प्लान फंड की योजना के खिलाफ आवाज बना सके उन्हें तरह-तरह से प्रताड़ित किया जा रहा है. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्त्री अधययन केंद्र के साथ प्रशासनिक विवाद अखबारों की सुर्खियाँ बन रही हैं. यद्यपि केंद्र विश्वविद्यालय का हिस्सा है लेकिन इसके बहुत से कार्यक्रम प्लान फंड से चलते हैं. फंड की कमी के कारण वहाँ होने वाली ‘रुकैया व्याख्यानमाला बाधित हो रही है. केंद्र द्वारा संचालित स्त्री अधययन रिफ्रेशर कोर्स की जिम्मेदारी उससे लेकर दो प्राध्यापकों को दे दी गयी है. केंद्र की विभागाध्यक्ष लता सिंह बताती हैं कि ‘ इस कारण रिफ्रेशर कोर्स में आने वाली बहुत सी एक्सपर्ट ने इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया है.

असोसिएशन फॉर वीमेन स्टडीज की भूमिका पर उठ रहे सवाल 

यद्यपि असोसिएशन फॉर वीमेन स्टडीज ने फंड के मामले में त्वरित कदम उठाये.  2016 में आयोजित चेन्नई कांफ्रेंस में ‘स्त्री अध्ययन’ पर आये संकट का मुद्दा उठा. असोसिएशन की अध्यक्ष इंद्राणी मजूमदार बताती हैं कि ‘ जलीकटू वाले हंगामे के कारण इस पर कोई ठोस प्रस्ताव पास नहीं हुआ. जल्दी-जल्दी में हमें कांफ्रेस समेटना पड़ा.’ एक साल के भीतर ही 23 अगस्त को असोसिएशन ने दुबारा कांफ्रेंस बुलाया और फंड रोके जाने के मुद्दे पर सरकार को ज्ञापन दिया. इंद्राणी बताती हैं कि ‘इसी दवाब में यूजीसी को स्पष्टीकरण देना पड़ा.’ हालांकि वे शायद यह भूल जाती हैं कि पिछले नोटिफिकेशन का अस्तित्व बना है और रिव्यू के साथ यूजीसी का एजेंडा भी.

स्त्रीकाल से बात करते हुए स्त्री अधययन के विद्यार्थियों ने कहा कि असोसिएशन की भूमिका दूसरे विषयों के असोसिएशन से भिन्न नहीं है. हमारी शिक्षिकाएं एक्टिविज्म और रिसर्च टार्गेट से लगाव का सिद्धांत बताती हैं लेकिन व्यवहार में विषय अधिक सांस्थानिक होता गया है. यह विषय अंतरअनुशासनिक (इंटरडिसिप्लीनरी) अध्ययन-अध्यापन के पक्ष में है, लेकिन इस दिशा में सारे विभागों में पहल हो इसपर इनकी कोई भूमिका नहीं है.  नियुक्तियों में अंतरअनुशासनिकता वन वे ट्रैफिक है, यानी इसके केन्द्रों विभागों में दूसरे विषय के शिक्षक नियुक्त किये जाते हैं लेकिन इस विषय के विद्यार्थियों को दूसरे विषय इंटरटेन नहीं करते.

 बहुजन परम्परा की ये किताबें पढ़ें 

असोसिएशन फॉर वीमेन स्टडीज की भूमिका तब भी संदेह के घेरे में आयी थी जब 2010 में अपने कांफ्रेंस में एक ऐसे कुलपति को जेंडर समानता सम्मान से सम्मानित किया गया था, जिसने सम्मलेन के तीन-चार पूर्व ही लेखिकाओं को गाली दी थी और उसके खिलाफ महिलाओं ने आवाज मुखर की थी. उन्हें सम्मान दिये जाने का दलित महिला आन्दोलनकारियों ने विरोध किया था और असोशिएशन का टीए-डीए के लिए कुलपति के समक्ष समर्पण का आरोप लगाया था.


जरूरत है आत्मनिरीक्षण की
शिक्षा में बदलाव की सरकारी तत्परता देखते हुए स्त्री अध्ययन विभागों/ केन्द्रों पर मंडरा रहा खतरा स्थायी है और एजेंडे के अनुरूप असर दिखाएगा भी. इस विषय की नेताओं ने कुछ विभागों और केन्द्रों  में इसके उद्देश्य को बनाये तो रखा लेकिन इसका विस्तार देश भर के केन्द्रों तक नहीं हुआ. यूजीसी और सरकार के लिए ऐसे केंद्र प्राणवायु हैं. यदि असोसिएशन और इस विषय के नेतृत्व ने आत्मनिरीक्षण नहीं किया तो वर्तमान और आसन्न संकट समीप है. उदहारण के तौर पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के केंद्र ने अपने कर्मचारियों और शिक्षकों की छटनी प्लान बजट के बारे में यूजीसी के नोटिफिकेशन के पहले ही कर दी थी.

और यह मजबूत आरोप 
स्त्री अध्ययन विभागों और इससे जुड़े प्राध्यापकों तथा आन्दोलन से सबसे उल्लेखनीय सवाल भारत के  पहले  मुकम्मल वामपंथी महिला संगठन एनएफआईडवल्यू की महासचिव एनी राजा करती हैं कि ‘इस विषय के भीतर एक ख़ास बेईमानी भारत में महिला आन्दोलन के इतिहास को लेकर है.  वे स्त्री आन्दोलन  को 74 के टुवर्ड्स इक्वलिटी रिपोर्ट और उसके बाद के आन्दोलनों तक ही सीमित कर देती हैं जबकि एनएफआई डव्ल्यू की स्थापना काफी पहले (1954) हो गयी थी. इन आन्दोलनों के काफी पहले इसकी स्थापना हो चुकी थी।  अरुणा आसफ अली को ये छोड़ देते हैं. ‘ यही आरोप दलित महिला आन्दोलन की तरफ से स्त्री अधययन और स्त्री आन्दोलन  पर लगाया जाता है. 1942 में डा. अम्बेडकर की उपस्थिति में नागपुर में हुआ दलित महिला सम्मलेन महिला मुक्ति का पहला घोषणापत्र पेश करता है, इसका नामोल्लेख तक नहीं होता।

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