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जनसत्ता में भावना भड़काती खबर: ‘बेशर्म सेल्फी’!

साम्प्रदायिक तनावों के बीच अखबारों की टिप्पणियाँ और ख़बरें इसमें आग का काम करती हैं. आज जब साम्प्रदायिकता अपने चरम पर है तब अखबारों की भूमिका और संवेदनशील हो जाती है. 14 अक्टूबर को जनसत्ता में छपी इस खबर से इसके प्रशंसकों को चोट पहुँच सकती है, जिन्होंने इसके पूर्व संपादकों, खासकर प्रभाष जोशी की साम्प्रदायिकता विरोधी प्रतिबद्धता को देखी है अथवा 1992 सहित कई अवसरों पर सांप्रदायिक तनावों के दौर में जनसत्ता की पत्रकारिता देखी है.

जनसत्ता इस खबर के साथ सबसे ऊपर जो कैप्शन लिख रहा है, उसकी क्या जरूरत है वह जनसत्ता के संपादक ही बता सकते हैं या रामनाथ गोयनका की विरासत वाले एक्सप्रेस समूह के प्रबन्धक. जनसत्ता ने इंट्रो में लिखा है: “कमाल की बात तो यह है कि हिंदुओं में पारंपरिक पोशाक मानी जाने वाली साड़ी में फातिमा की इस तस्वीर पर तमाम लोगों ने उल्टे-सीधे कमेंट किए हैं.” यह खबर एक्ट्रेस फातिमा सना शेख के बारे में लिखी गयी है. उनकी धार्मिक पहचान के बरक्स एक धार्मिक पहचान को भिडाने वाली यह टिप्पणी निंदनीय है.

हनीप्रीत की खबर नहीं सेक्स फंतासी बेच रही मीडिया

भर्त्सना के साथ पढ़ें पूरी खबर.

इस ‘बेशर्म सेल्फी’ के लिए सोशल मीडिया पर ट्रोल हुईं ‘दंगल’ एक्ट्रेस फातिमा सना शेख


कमाल की बात तो यह है कि हिंदुओं में पारंपरिक पोशाक मानी जाने वाली साड़ी में फातिमा की इस तस्वीर पर तमाम लोगों ने उल्टे-सीधे कमेंट किए हैं।

दिसंबर 2016 में रिलीज हुई आमिर खान स्टारर फिल्म ‘दंगल’ में पहलवान गीता फोगाट का किरदार निभाने वाली एक्ट्रेस फातिमा सना शेख एक बार फिर सोशल मीडिया पर ट्रोल्स का निशाना बन गईं। फातिमा द्वारा इंस्टाग्राम पर शेयर की गई इस तस्वीर में फातिमा ने नीले रंग की खूबसूरत साड़ी पहनी हुई है और लाल व पीले रंग का ब्लाउज पहना हुआ है। इस तस्वीर में उनकी कमर और गर्दन का कुछ हिस्सा खुला दिख रहा है। फातिमा को शायद पहले से ही इस बात का अंदाजा हो गया था कि इस तस्वीर पर कोई ना कोई विवाद हो सकता है, इसीलिए उन्होंने तस्वीर को अपलोड करते वक्त कैप्शन में खुद ही शेमलेस सेल्फी लिख दिया था।

मोदी जिनके प्रशंसक वे दे रहे महिला पत्रकार को रेप की धमकी

कमाल की बात तो यह है कि हिंदुओं में पारंपरिक पोशाक मानी जाने वाली साड़ी में फातिमा की इस तस्वीर पर तमाम लोगों ने उल्टे-सीधे कमेंट किए हैं। तमाम लोगों ने इन तस्वीरों पर अभद्र टिप्पणियां की हैं। एक शख्स ने कमेंट बॉक्स में लिखा कि खुदा तुम्हें देख रहा है और वह तुम्हें सजा देगा। एक यूजर ने लिखा कि फातिमा आपसे यह उम्मीद नहीं थी। किसी ने लिखा कि आप इस परिधान की मर्यादा का अनादर कर रही हैं तो किसी ने कहा कि फातिमा को साड़ी पहनना तक नहीं आता। बता दें कि रमजान के महीने से फातिमा के फोटोशूट की तस्वीरें सामने आई थीं जिसमें वह बिकिनी पहने समंदर के किनारे बैठी थीं। उस वक्त भी फातिमा को ट्रोल किया गया था।

सुधार 
तीन घंटे में जनसत्ता ने वह पंक्ति हटा ली जिसपर इस पोस्ट को आपत्ति थी. 

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इलायची

ज्योति प्रसाद

 शोधरत , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय. सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com

मुझे अपने स्कूल के दिन याद आ रहे हैं। सर्दियों वाले। सुबह-सुबह जगा दिया जाता था। रज़ाई में से ही पाँच मिनट और…पाँच मिनट और…बस उठ ही रही हूँ, वाली पंक्ति आज सोचकर अपने पर हंसी ही आती है। हम तीन बहनों में सर्दियों का मौसम मुझे ही बेकार लगता था। कई बार तो मैंने भगवान से शिकायत भी की कि इस मौसम को बनाने की क्या जरूरत थी! तुम्हें भी सर्दियों में स्कूल जाना पड़ता तो पता चलता! सभी के जगाने पर भी मेरी पाँच मिनट वाली मांग बनी रहती थी। लेकिन जैसी ही दादी की दहाड़ कानों में पड़ती वैसी ही मैं बिच्छू के डंक लगे जख्मी लड़की की तरह उछल पड़ती थी। मैंने कई बार इस बात की भी शिकायत की थी कि ऐसी दादी मुझे ही क्यों दी गई है। खुद की ऐसी दादी होती तो भगवान को भी अच्छी तरह पता चल जाता।

सर्दियों में रविवार का दिन और इलायची वाली चाय, ये दोनों ही मेरी पसंद के दायरे में आते थे। रविवार को मुझे एक घंटे अधिक सोने की इजाजत प्राप्त थी क्योंकि उस दिन पिताजी घर में रहते थे और किसी भी प्रकार की दहाड़ घर में सुनने को नहीं मिलती थी। इसके अलावा सतुआ, मेरी बड़ी बहन जो घर के काम रविवार को संभाल लिया करती थी, भी रहती थी। शनिवार के दिन क्लास में बैठे बैठे मैं उन लोगों को कोटी कोटी प्रणाम करती थी जिसने रविवार को छुट्टी का दिन बनाया था।

पिता जी का इलायची का छोटा सा धंधा था जो घर में घुसते ही महक से हर किसी को पता चल जाता था। मुझे भी इलायची को देखकर ही बहुत खुशी होती थी। हल्का हरा रंग और उसमें महकते काले दाने मानो एक नई दुनिया सी दिखलाते थे। मैं इन दानों को इलायची के बच्चे कहकर पुकारा करती थी। घर में इलायची का भरपूर इस्तेमाल होता था। पिताजी को मुनाफा कमाने का शौक था या लालच नहीं पता लेकिन उन्हों ने इलायची के साथ साथ कुछ ही दिनों में अन्य मसालों का धंधा भी छोटे धंधे में जोड़ लिया। इसलिए बहुत से साबुत मसालों का उस समय तक नाम और विवरण कुछ हद तक मुझे पता था। खाने में भी भरपूर मसाले झोंकें जाते थे। मसालों के मामले में हमारी आँख भले ही धोखा दे जाये पर घर के पूरे परिवार की नाकें धोखा नहीं देती थीं। या यूं कहूँ कि सूंघने के मामले में घर का प्रत्येक व्यक्ति हुनरमंद था। यही हुनर जन्म के साथ साथ मुझमें भी आ गया। और सूंघने का प्रतिशत मुझमें अधिक था क्योंकि स्कूल के बाद मेरा सारा समय मसालों के हिसाब किताब में गुजरता था। मुझे एक तरह से मुनीम बना दिया गया था। आसपास के घरों में किसी को मेरा असली नाम तक नहीं मालूम था। वे लोग भी मुझे मुनीम जी कहकर ही पुकारते थे।

इसके अलावा दादी को भी अदरक इलायची वाली चाय भाती थी। अगर बिना इनके चाय बन भी जाये तो वे पूरा घर सिर पर उठा लेती थीं। उनका खयाल था कि इन सब चीजों के असर पड़ते हैं। शरीर ठीक रहता है। सो मुझे भी यह बात खूब जम गई। बिना अदरक और इलायची के चाय नहीं पीती थी।

हमारा परिवार छोटा था। हम तीन बहनें घर में दृश्य होते हुए भी अदृश्य ही मानी जाती थीं। घर में रहते हुए भी हमारे हिस्से बहुत कुछ ऐसा नहीं था जिससे पता चल जाए कि इस घर में तीन लड़कियां सांस लेती हैं। बड़ी बहन का नाम सतुआ था। दादी ने ही रखा था। सतुआ को अपना नाम बेहद ‘ओल्ड फेशन्ड’ लगता था। बाक़ी बची हम दोनों बहनों के नाम नए जमाने से मैच करते थे। हम तीनों पर एक जोड़ी बूढ़ी आँखें जब तब पीछा किया करती थीं। यह सब बहुत गुस्सा दिलाने वाला भी होता था। कुर्ता भी सिलवाया जाता तब कॉलर लगवा दी जाती और आगे से बंद गला। ‘तहजीब बंद कपड़ों में होती है’- दादी का यही कहना था। कभी ऐसा लगता था कि हम तीनों की कन्डीशनिंग हो रही हो। ज़ुबान भी उतनी खोलने की इजाजत थी जितने की जरूरत होती। ‘लड़कियां चुप रहते हुए ही अच्छी लगती हैं’- यह पंक्ति हमेशा कान से टकराया करती थी। लेकिन दादी औरत होते हुए भी बहुत बोलती थीं। उनकी आवाज़ का वॉल्यूम भी सामान्य से अधिक रहता था। न मालूम कहाँ से वे सीखकर आई थीं।

सतुआ को इन सब से सबसे ज़्यादा चिढ़ होती थी। क्योंकि उसके कॉलेज का वक़्त भी दादी नोट किया करती थीं। एक मिनट इधर उधर हुआ तो घर में हाहाकार मच जाता था। सतुआ का हर खयाल बहुत ज़्यादा बड़ा होता था। उसका मानना था कि हम आसमानी उल्का पिंड थे। गलती से इस धरती पर ‘टपक’ गए हैं। जिस दिन बड़ी वाली आसमानी चुंबक हमें खींचेगी हम तुरंत उड़ते हुए अपनी अपनी जगह चले जाएंगे। इस कथा में मेरी दूसरी बहन छाया का उत्सुकता में पूछा गया सवाल सतुआ की आँख में किरकिरी जैसा ही होता था। “सतुआ, आसमान में पहुँचने के बाद क्या करेंगे? उल्कापिंड होना भी कोई ज़िंदगी है!” सतुआ इसके बाद नाक बनाती हुई जाती और कहती- “यहाँ सपनों की कोई कद्र ही कहाँ है!” इसके बाद मैं जाती हुई सतुआ को देखती और फिर बाद में छाया पर नज़र ले जाती।

छाया का भी हाल सतुआ जैसा ही था। विद्रोही टाइप का। मेरा कुछ भी नहीं था। मैं बोलती ही नहीं थी। …मुझे बोलना ही नहीं आता था। मुझे स्कूल जाना और घर में रहना आता था। हिसाब किताब करना आता था। सूंघना आता था। मेरी इस तरह की आदत दादी को पसंद थी। मुझे अपने घर में अपने ही लोग अजनबी लगते थे। इस अजनबियत को मैंने अपने अंदर समेट लिया था। जो कहा जाए वैसे करती थी। जो नहीं कहा जाता था वो नहीं करती थी। मैं पूरी तरह से आदर्श के खाके में फिट होने के लिए मुनासिब चरित्र बन ही चुकी थी। पर भला हो एक अजनबी औरत का जिसके चलते यह अनहोनी घटना होते होते रह गई।

इन्हीं दिनों हमारे सामने वाले घर में एक औरत किराए पर रहने आई। उस घर के मकान मालिक दूसरी जगह रहते थे सो उस औरत ने वह पूरा घर ही किराए पर ले लिया। लंबा क़द था। रंग गेहुआँ था। काले बाल। एक दम सीधे। बड़ी बड़ी आँखों में मोटा काजल लगाती थी। नाक में मोती का लॉन्ग हुआ करता था। कट बाजू वाले सूट पहना करती थी। बिंदी लगाती थी लेकिन सिंदूर नहीं। इस बात पर गली में एकाद बहस भी हुई कि वह शादीशुदा है या नहीं। लेकिन किसी की हिम्मत नहीं हुई उससे से सीधे पूछने की। मुझे वह बहुत अच्छी लगती थी। इतना ही नहीं सतुआ भी उससे प्रेरित हुई तो काजल लगाने लगी। इस पर दादी ने कहा कि बड़ी लड़की के लक्षण ठीक नहीं लग रहे। तब पिताजी ने कहा कि काजल लगाने में क्या गड़बड़ है। दादी चुप तो हो गईं पर हम तीनों पर निगरानी और बढ़ गई।

दादी का खयाल था कि हम उस नई ‘बदचलन औरत’ से ज़्यादा ही इंस्पायर्ड हो गए हैं। सब ऐसे ही चला रहा था। एक दिन घर में किसी के न रहने पर मुझे अखबार की जरूरत आन पड़ी। मैंने अपने घर के छज्जे से ही उनसे पूछा- “आपके पास आज का अखबार होगा?”वह मुस्कुरा कर बोलीं- “हाँ है। उसे लेने आपको मेरे घर में आना होगा।”अगले दस मिनट में मैं चुपके से उनके घर में थी।

घर में प्रवेश करते ही पीले रंग से मुलाक़ात हुई। मुझे पेंट की महक आई। बहुत ताज़ा ताज़ा ही पेंट हुआ था। सीढ़ियों की दिवारों पर सुंदर सुंदर पैंटिंग्स टंगी थीं। सीढ़ियां एक बैठक के गुलाबी पेंट वाले कमरे में ले जाती थीं। वहाँ लकड़ी का एक चरमराया हुआ सोफा रखा था। लेकिन उसकी सजावट मिट्टी रंग के कुशन से ऐसे की गई थी जैसे कोई संगीत महफिल लगने की तैयारी चल रही हो। मैंने सीढ़ियों के पास ही खड़े होकर अखबार मांगा। उन्होने मुस्कुराते हुए कहा- “जानती हूँ मुनीम लोग बहुत बिज़ी लोग होते हैं। पर उन्हें चाय पीने का वक़्त निकाल लेना चाहिए।” मैंने थोड़ा शर्माते हुए कहा- “आपको भी पता चल गया।…मैं फिर कभी आ जाऊँगी। अभी तो बस अखबार दे दीजिये।” उन्हों ने जिद्द की। मुझे चाय के लिए बैठाकर कर वह बैठक के दाई ओर बनी रसोई में प्रवेश कर गईं। रसोई की दीवारों का रंग सफ़ेद था।

दो कप चाय लाते हुए वे मेरा नाम पूछने लगीं। मुझे खुद दो मिनट इस बात को सोचते हुए लग गए कि मेरा नाम मसाला है, मुनीम है या फिर रोल नंबर 33। उन्हों ने दुबारा पूछा- “नाम क्या है आपका?” मैंने अपने पैरों पर बल देते हुए और सिर नीचे किए ही तारा कहा। वो तुरंत मज़ाक में बोलीं- “अरे वाह! तुम धरती पर क्या कर रही हो? तुम तो आसमान की रहने वाली हो।” मैंने कुछ कहने की बजाय मुस्कुराना ठीक समझा। मेरे पास कहने को कुछ था ही नहीं। मैंने धीरे से अपने हाथ कप की तरफ बढ़ाए। चाय में से इलायची की महक आ रही थी। मैंने सूंघते हुए कहा- “आप भी इलायची वाली चाय पसंद करते हो?” वो फिर अखबार खोजते हुए बोलीं- “हाँ। मुझे पसंद है। मुझे इसकी महक अच्छी लगती है।”

महक का नाम आते ही मैंने अपने कपड़ों में से मसालों की महक को एक बदबू की तरह पाया और मन ही मन शर्मिंदा हुई। मैंने अपने कपड़ों को सूंघा। मुझे उबकाई आई। मैंने उनसे और ज़्यादा बात नहीं की। वापस लौट आई।

इसके बाद अगली बार उनके यहाँ किस कारण जाना हुआ यह याद नहीं। लेकिन जो बात याद रही वह यह थी कि उनके निजी कमरे का रंग आसमानी था। मैंने कुछ देर के लिए अपनी आँख बंद की तब मुझे उल्का पिंड अपने चारों तरफ घूमते हुए दिखाई दिये। गुब्बारों से भी हल्के। जब उन्हों ने मेरा नाम पुकारा तब मेरा ध्यान टूटा और मैं अपने चारों तरफ हैरानी से देखने लगी। खुद में सवाल किया उल्का पिंड कहाँ गए!

पहली बार आसमान को किसी कमरे में पाया। मैं वह कमरा कभी भूल नहीं सकती। मुझे आज भी उस कमरे की रोशनी का शीतल अहसास है। वहाँ खूबसूरत चित्र थे। मैं हैरान थी। मैंने पूछा- “आप क्या करती हैं?’इस सवाल पर वह मेरा हाथ पकड़ कर एक ऐसे कमरे में ले गईं जहां सभी रंगों को मिक्स करके दीवारों में पुताई हुई थी। वहाँ एक अधूरी पेंटिंग को पूरा करने की तैयारी चल रही थी। और पूरे कमरे में बने हुए तरह तरह के चित्र रखे हुए थे। मुझे कुछ पल को हैरानी हुई।

मैंने चित्रों पर नज़र फिराते हुए पूछा- “आप इतने रंगों में कैसे रहती हैं? आपके सिर दर्द नहीं होता?”

वो अपनी आदत की तरह मुस्कुराते हुए बोलीं- “जब आपका जिसमें मन रम जाता है तो आप वही हो जाते हो। मन रमा तो राम भी बन सकते हो। जो न लगा तो वही बनते हो जो बाकी लोग हैं। मशीन!”

मैंने मुंह में कड़वा सा कुछ महसूस किया और दूसरा छोटा सवाल पूछा- “कैसे?”

रसोई में जाते हुए वह बोलीं- “दुनिया रंगती हूँ।…इलायची वाली चलेगी?”मैंने कहा- “हाँ, बिलकुल।”

वो आगे बोलीं- “मशीनों को देखा है…कैसे एक जगह बैठी रहती हैं। जो बटन दबाया जाता है वैसे ही वे काम करती हैं। उन्हें देखकर मुझे ऊब आती है। बात तो यही है कि आज़ादी की महक को आजमाना चाहिए। हमें यह तय करना चाहिए कि हम मशीन बनेंगे या फिर वो जो हम बनना चाहते हैं। मैंने पेंटर बनने का इसलिए नहीं सोचा कि यह मेरा पेशा है। बल्कि इसलिए क्योंकि यहाँ किसी की रोक टोक नहीं होती। जो मन आए वो करने की आज़ादी मिल जाती है जो बाहर की दुनिया में नहीं मिलती।”

मुझे उनकी बात समझ नहीं आई। मैंने अगली बार उनसे फिर मिलने का वादा किया और लौट आई। मुझे उनसे मिलना और बात करना अच्छा लगने लगा था। मुझे नहीं पता उनके रंगों का सम्मोहन था या फिर कुछ और था। यह तय था कि वह कमाल की औरत थीं जो किचन के लिए नहीं बनी थीं। वो अकेली ही रहती थीं। उनके यहाँ कुछ लोग आते थे जो उनके चित्रों के संबंध में आते थे। कुछ लोग तो मेरे सामने भी आते थे जो एफ. एन. सुज़ा से लेकर विंसेंट वॉन गोग जैसे नाम लेते थे। उस वक़्त ये नाम मुझे अजीब लगते थे। जब इनके बारे में सतुआ से पूछा तो उसने बताया कि ये नामी चित्रकार हैं।

सतुआ और छाया को जब इनके बारे में बताया तो उन दोनों में भी उस औरत से मिलने की ललक जग गई।इसी बीच सतुआ अपने कॉलेज के किताबघर से एक किताब लाई थी। उस किताब का नाम ‘एकांत के सौ वर्ष’ था। उसकी पढ़ने की आदत से हम दोनों बहनों को बहुत फायदा होता था। उसे लगभग हमारे हर सवाल का जवाब मालूम होता था। और वह न मालूम होने पर भी हमारे सवालों के जवाब खोज खोजकर बताया करती थी। उस दिन मैंने ‘एकांत के सौ वर्ष’ जैसा नाम के पीछे के कारण को जानना चाहा तब उसने किताब की कहानी टूटी फूटी तरह से हम दोनों के आगे परोस दी। उसने बहुत सारे किरदारों के नाम लिए और उनमें से एक रेमेदियोस के बारे में बताया जो बहुत सुंदर थी और एक दिन अचानक आसमान में चली जाती है…उड़कर। मैंने इस किरदार को कुछ इस तरह से समझा जैसे सतुआ की हमारे उल्का पिंड होने की कहानी। मुझे अब उसकी बात पर यकीन हुआ कि हम तीनों इस धरती के नहीं हैं। यहाँ ढेर सारे दरवाजे हैं जहां हर वक़्त ताला ही लगा रहता है। तालों के पीछे का कारण चोरी नहीं हैं बल्कि कोई लड़की घर से न बाहर चली जाये,यही इकलौती वजह थी।

कुछ दिनों बाद एक दिन आया। जाने क्यों?सुबह सुबह भयानक शोर घर में दस्तक दे रहा था। कहीं बहुत झगड़ा हो रहा था। छज्जे से झाँका तो वही औरत बीच में बहुत गुस्से में खड़ी थी और आसपास बहुत लोग खड़े थे। इतने में उसके मकान मालिक भी आ गए। …मैंने बहुत कोशिश की कि मुख्य मुद्दे को सुना और समझा जाये। पर पीछे से दादी ने एक तेज़ आवाज़ हम तीनों पर धमाके के साथ फेंक दी। हम डर गए। …पापा ने जो खबर हमें दी वह यह थी कि गली के कुछ लोगों को उसके अकेले रहने से परेशानी थी। इसके अलावा उसके काम के बारे में किसी को मालूम नहीं था। सबका खयाल था कि वह कोई गलत काम में शामिल है। ऐसी औरत का गलत प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए उसे घर खाली करने को कहा गया है।मैंने इस बीच यह कहा कि वह तो एक पेंटर है। चित्रकारी करती है। इतना ही कहना था कि दादी टूट पड़ीं। उस दिन वो न जाने क्या क्या बोलती रहीं। मुझे सिर्फ एक पंक्ति ही याद है। यह लड़की तो भाग जाएगी एक दिन। मैंने इसे सुनकर मन में कहा- “हम्म …रेमेदियोस की तरह। मैं आपके यहाँ नहीं रहूँगी। मुझे घुटन होती है। बहुत!” इसके बाद मैंने इलायची के रखे पैकटों को गिनने काम शुरू किया और कई घंटें लगातार करती रही। इलायची की महक मेरे अंदर घुसती रही। सतुआ के जबरन उठाने पर ही खाने के लिए उठी।

कुछ दिनों बाद एक बड़ा ट्रक आया जिसमें उस औरत का सामान रखा गया। जाते-जाते उन्हों ने हल्की गर्दन ऊंची की और मेरी तरफ देख कर मुस्कुरा दीं। वो चली गईं। अंदर दादी ने हुकुम दिया कि चाय बनाओ,इलायची वाली। रसोई में मैं दो तीन इलायची कूटने लगी। एक बहुत तेज़ महक उठी और साँसों के सहारे मेरे अंदर फिर घुस गई…दिमाग तक पहुँच गई।

दिन ऐसे ही बीत रहे थे। इस बीच एक ऐसी घटना घटी जिससे मैं और सतुआ खुश हुए पर पिताजी और दादी को बड़ा सदमा लगा। छाया किसी के साथ घर छोड़ कर जा चुकी थी। ये बात पूरे मौहल्ले में दादी के लाख छुपाने के बाद भी लीक हो चुकी थी। छाया की बात हम दोनों से होती रहती थी पर इस बात का पता घर के बाकी दो लोगों को नहीं मालूम था। कुछ दिन पिताजी के सीने में दर्द की शिकायत रही और अंत में उनका दर्द यह कहकर गया कि आज से वो हमारे लिए मर चुकी है।

अब हम दोनों ही अपनी बातों का बंटवारा करते। सतुआ का सपना बड़ा अजीब था। उसका कहना था कि वह सपने बेचने का काम करेगी। जो बच्चा या औरत- आदमी जिस तरह के सपने देखना चाहेंगे वह वही उनको बेचा करेगी। मसालों से कितनी गंदी महक आती है। इसलिए वह इन सब से दूर महकदार सपने बेचा करेगी जिसमें भीनी-भीनी महकें आया करेंगी। उसकी इस बात पर मैं बहुत देर तक हंसा करती थी। तब तक जब तक आँखों में पानी न आ जाए। इसके बाद पलट कर वह अपनी बड़ी आँखों में शरारत लाते हुए पूछती- “तारा, तू बता… तू क्या बनेगी?” …मैं बिना सोचे समझे झट कहती- “इलायची!” इस पर वह हंस कर कहती- “तब तो दादी तुझे कूट कूट कर चाय में घोल घोल कर गट कर जाएंगी।” ऐसे ही बात कर के हम आधी रात करते और सुबह फिर उठ जाते मशीन बनने की तैयारी में। ये हमारे अच्छे दिन थे। और हम दोनों ने चाहा कि ये दिन रुके रहें पर ऐसा नहीं होता।

सतुआ की शादी आनन-फानन में तय हुई। कुछ दिनों बाद ही दादी के कहे अनुसार सतुआ को निपटा दिया गया। उसकी पसंद को पूछे बिना या फिर जाने बिना। सतुआ में मौजूद विद्रोही स्वभाव को पिताजी ने अपने दो आंसुओं से लगभग समाप्त कर दिया था जिसका पता मुझे सतुआ के बताने पर चला कि पिताजी ने उसे अपना वास्ता देकर शादी के लिए मनाया है। उनको इस बात का डर था कि कहीं सतुआ भी छाया की तरह घर से न चली जाये। सतुआ की शादी के बाद फोन पर होने वाली बातचीत में वह जरा भी खुश नहीं मालूम होती थी। कई बार वह मेरी बीमारी का बहाना बनाकर हमारे पास कई दिनों तक रहती थी। मुझे उसके लिए बीमार होना पसंद भी था। इस पर भी दादी की नज़र पड़ी और उसने आना लगभग बंद कर दिया।

बहुत दिनों तक उसका हाल नहीं पता चला। उसने मुझसे भी बात करना लगभग बंद कर दिया। एक रोज़ फोन की घंटी बजी और पता चला कि सतुआ के साथ दुर्घटना घटी है। वह लगभग पूरी तरह से जली अवस्था में अस्पताल में मेरी आँखों के सामने पड़ी हुई थी। उसने कुछ बोलने की कोशिश भी की पर हम जान ही नहीं पाये कि आखिर क्या कहना चाह रही है। वह मर गई। मेरे सामने। मैंने रोते हुए आँखें बंद कीं। मुझे दिखा कि वो उल्का पिंड बनी हुई धीरे धीरे धरती से ऊपर उठ रही है। उसे कोई चुंबक खींच रही है। जाते हुए उसने कहा- “देख, मैं न कहती थी कि हम इस धरती के नहीं हैं।”

कई दिन बीत गए। सर्दियाँ आईं। मुझे चाय बनाने का हुक्म हुआ। मैंने इलायची कूटना शुरू किया और न जाने एक जहरीली महक मेरे दिमाग पर चढ़ी और उल्टी होने लगी। बहुत उल्टी हुई। इसके बाद मुझे याद नहीं कि क्या हुआ। मुझे जब होश आया तब सिर दर्द से फट रहा था। दादी को लगा कि मुझ पर किसी हवा का साया है। एक ताबीज़ बनवाकर गले में डाल दिया। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।रात के समय में मेरे कमरे में रोशनी उतर आती। खूब सारे उल्का पिंड और इनके साथ ही सतुआ, छाया और वह औरत धीरे -धीरे आसमान से उतरतीं। फिर जो बातों का सिलसिला चलता तो सुबह होने पर ही समाप्त होता। वह औरत पेंटिंग बनाती। सतुआ अपने साथ हमारे फर्माइशी सपने लाती। छाया और मैं दर्शक बनते। कुछ दिनों बाद यह खबर फैली कि तारा पागल हो गई है। मैंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया। हालांकि मुझे अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया था। फिर भी मैंने अपने पागल होने पर कभी यकीन नहीं किया।

फोटो: साभार गूगल


ज्योति प्रसाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा पीठ  में शोधरत हैं. कहानियां लिखती हैं और फिल्मों की समीक्षा में विशेष रुचि रखती हैं. 


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समकालीन ग़ज़ल में मुखर होता महिला रचनाकारों का स्वर

के. पी. अनमोल

हिन्दी ग़ज़ल क्षेत्र के उल्लेखनीय गज़लकार और आलोचक. ‘साहित्य रागिणी’ और ‘हस्ताक्षर’ वेब पत्रिका के संपादक.. संपर्क : मो. 8006623499
kpanmol.rke15@gmail.com

दुष्यन्त कुमार के अवतरण के बाद हिन्दुस्तानी साहित्य में ग़ज़ल विधा ने प्रमुखता से स्थान बनाया है। आज यह विधा कविता से भी अधिक लोकप्रिय होने की स्थिति में है। इसका कारण इसका तयशुदा लयात्मक प्रारूप और सरल-सहज शब्दावली में हर ख़ासो-आम के मन की बात प्रभावी तरीक़े से उकेरना है।

दुष्यन्त के बाद हिन्दुस्तानी ग़ज़ल में अनेक उम्दा ग़ज़लकार आये और उसे समृद्ध किया। आज हिन्दुस्तानी ग़ज़ल के पास ऐसे कई नाम हैं जो इस विधा के जाने-माने चेह्रे हैं। लेकिन अगर बात महिला ग़ज़लकारों की की जाए तो गिनती के लिए शायद हमें उँगलियों का ही इस्तेमाल करना पड़े।

ऐसा नहीं है कि ग़ज़ल में महिला रचनाकारों ने अभिव्यक्ति की ही नहीं, की है और बहुत सलीक़े से की है। अगर हिन्दुस्तानी ग़ज़ल में महिला रचनाकारों के नाम याद करना चाहें तो डॉ. रमा सिंह, सरोज व्यास, देवी नागरानी, ममता किरण, सिया सचदेव सहित कई नाम ज़ेहन में उभर कर आएँगे। जो लगातार कई सालों से ग़ज़लें कह रही हैं और उन्हें साधने में रत हैं।

वर्तमान में सोशल मीडिया के आने के बाद इस सूचि में बढ़ोतरी हुई है। आज ऐसी अनेक महिला ग़ज़लकारों के नाम पढ़ने-सुनने को मिलते हैं जो इस विधा में धारदार प्रस्तुति दे रही हैं। चूल्हे-चौके और घर की चार-दीवारी से बाहर निकल आज कई महिला ग़ज़लकार देश-दुनिया और समाज की समस्याओं पर भी समान अधिकार से अभिव्यक्ति कर रही हैं। कसे हुए शिल्प के साथ घर और बाहर के कई मुद्दों पर अपनी ग़ज़लों के माध्यम से खुल कर बोल रही हैं।

कच्चा मकां तो ऊँची इमारत में ढल गया
आँगन में वो जो रहती थी चिड़िया किधर गयी
(‘हस्ताक्षर’ वेब पत्रिका, दिसम्बर 2016)

वरिष्ठ ग़ज़लकार ममता किरण अपने इस शेर के माध्यम से विकास की भेंट चढ़े एक प्यारे-से एहसास को बहुत मार्मिकता से हमारे सामने रख, हमें यह सोचने पर विवश करती हैं कि क्या विकास के साथ-साथ हम अपने एहसासों को नहीं बचाए रख सकते!

याद कीजिए वह दिन जब हर घर के आँगन में एक वृक्ष हुआ करता था और उस वृक्ष में अनेक पक्षी अपना बसेरा बनाके रहा करते थे। सुबह सुबह जब आँख खुलती तो इन पक्षियों की तरह तरह की कर्ण-प्रिय आवाज़ें सुनने को मिलतीं। उस वृक्ष की डालियों पर पक्षी जब अठखेलियाँ करते तो उन्हें देखकर मन को कितना सुकून मिलता था। लेकिन आज शहरीकरण के इस दौर में यह दृश्य किसी सपने-सा प्रतीत होता है।

महज आकाश छूना प्यास का मिटना नहीं होता
ज़मीं पर पाँव का टिकना सफ़लता की निशानी है
(सत्यचक्र, ग़ाज़ियाबाद)

डॉ. तारा गुप्ता का यह शेर कितना सकारात्मक और प्रेरणास्पद है। सफ़लता प्राप्त कर लेने के बाद अगर किसी ने ज़मीन छोड़ दी तो उसकी सफ़लता का कोई औचित्य नहीं। यह शेर लाखों युवाओं के लिए मार्गदर्शक हो सकता है।

सामाजिक सरोकारों के साथ साथ महिला ग़ज़लकार एक महिला की ज़िंदगी के विभिन्न पहलुओं को भी बड़ी बारीकी से उकेर रही हैं। एक महिला के जीवन से जुड़े कई अनुभव ऐसे होते हैं जो केवल और केवल एक महिला ही समझ सकती है। ऐसे कई अनुभवों/ पहलुओं को इनकी ग़ज़लों में कथ्य के रूप में जगह मिल रही है। इस बहाने ‘स्त्री विमर्श’ भी आगे बढ़ता हुआ दिखता है।


नशे में धुत्त अपने आदमी से मार खाकर भी
बहुत ज़िन्दादिली से दर्द को वो भूल जाती है
(समकालीन महिला ग़ज़लकार, सं- हरेराम समीप)


डॉ. मालिनी गौतम के इस शेर के माध्यम से एक बहुत बड़े वर्ग की पीड़ा का बयान हुआ है। कितना वास्तविक और मर्मस्पर्शी शेर हुआ है यह। नशे की लत में डूबे अपने पति से मिली यातना के इस सच का इस तरह यथार्थ बयान किसी पुरुष ग़ज़लकार के शेर में आ पाना बहुत मुश्किल था।

वो समन्दर की तरह शोर मचाने से रही
जबकि सीने में नदी कितने भँवर रखती है


रश्मि सबा के इस शेर में यदि समन्दर और नदी के प्रतीकों का आशय पुरुष और स्त्री से लिया जाए तो शेर कितना खिलकर आता है! यह हक़ीक़त है एक महिला पुरुष की तुलना में कई गुणा दर्द अपने सीने में पालकर रखती है लेकिन उसे उफ्फ्फ़ तक करने की आज़ादी नहीं है। बहुत ही सलीक़े से कहे गए इस शेर की गूंज दूर तक सुनाई देती है।



महिलाओं के लिए असुरक्षित हमारे समाज में एक महिला हमसे क्या उम्मीद करती है, इसे समझना बहुत ज़रूरी है। हमें अपने बच्चों को यह समझ देनी होगी कि एक औरत का क्या मर्तबा है और उसका अदब करना कितना ज़रूरी है। हर पुरुष को यह समझना होगा कि एक बीवी, एक बेटी और एक बहन की क्या ख़्वाहिशें हैं और उन ख़्वाहिशों को पूरा करने के लिए उन्हें किस तरह के माहौल की ज़रूरत है। असमा सुबहानी का यह मार्मिक शेर देखिए जो एक गुहार है हर पुरुष से, हर बीवी, बेटी और बहन की-

उड़ानों के लिए रख लो ये सारा आसमां तुम ही
ज़मीं रहने दो पैरों में हमें इतना ही काफ़ी है

एक लड़की घर-परिवार की हो जाने के बाद अपने परिवारजनों की मिन्नतों, चाहतों और उम्मीदों में इस तरह खट जाती है कि उसे अपने होने का भी एहसास बहुत कम होता है। एक वक़्त के बाद जब उसे ज़िम्मेदारियों से ज़रा-सी फ़ुर्सत मिलती है तब वह अपने आपको टटोलती है और उस वक़्त उसे भान होता है कि इस बीते समय के साथ क्या-क्या पीछे छूट गया, समय कितनी तेज़ी से निकल गया। कुछ यही ख़याल दीपाली जैन ‘ज़िया’ ने कितना खूबसूरती से शेर में बाँधा है, देखिए-

उम्र ने दहलीज़ तन की लाँघ ली है और हम
आइने में झुर्रियों को ढांपते ही रह गए

एक माँ अपनी औलाद के प्रति क्या भाव रखती है, उसके मन में ममता का सैलाब किस तरह हिलोरें मारता है, यह एक महिला के अलावा कोई अभिव्यक्त नहीं कर सकता। कोख में पल रहे बच्चे से बातें, उसकी पहली किलकारी, पहली बार माँ शब्द का उच्चारा जाना, स्कूल का पहला दिन, औलाद की क़ामयाबी, बिटिया की विदाई आदि कई एहसास ऐसे हैं जो केवल एक माँ ही समझ सकती है। देखिए डॉ. भावना का एक ममता भरा शेर-

बड़ी होकर न जाने कितने वो क़िस्से सुनाएगी
मेरी नवजात बच्ची तो अभी से बात करती है
(हंस, दिसम्बर 16)

इश्क़-मोहब्बत जैसी पाक शय को निभाने का हुनर समझने में जहाँ दुनिया भर के विद्वान चूक जाते हैं, वहीं एक नौजवान शाइरा उसे कितनी आसानी से समझा देती है। देखिए पूनम यादव का एक नाज़ुक-सा शेर-

बड़ी तहज़ीब से निभती है साहिब
मुहब्बत रस्म मामूली नहीं है



हमारी संस्कृति में एक रूमानी जोड़ी; जो प्रेम का प्रतीक सा समझी जाती है, राधा-कृष्ण। कई कई प्रेम-काव्य इनके जीवन पर रचे गए हैं और उनमें लगभग सभी तरह के भाव उनमें समाहित हैं। लेकिन शरारत भरा एक जो ख़याल डॉ. तुलिका सेठ के एक शेर में आया है, वो अन्यत्र मिल पाना मुश्किल है-


कैसे ऊँगली पे कान्हा नचाये गए
राधिका से ज़रा ये पता कीजिए
(आईना ज़िंदगी का, ग़ज़ल संग्रह)


इस तरह हिंदुस्तानी ग़ज़ल में महिला रचनाकार बहुत प्रभावी तरीक़े अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती हुई नज़र आती हैं। ख़याल, कहन और लहजे में ताजगी के साथ ये रचनाकार ग़ज़ल विधा को नई ऊँचाइयों तक लेकर जाएँगी, ऐसी कामना अब हर ग़ज़ल-प्रेमी कर सकता है।

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हनीप्रीत की खबर नहीं सेक्स फंतासी बेच रही मीडिया

स्वरांगी साने

वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार और अनुवादक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित. संपर्क : swaraangisane@gmail.com

मीडिया में हनीप्रीत की खबरें एक महीने से अलग-अलग एंगल और फंतासियों के साथ बेची जा रही है. बलात्कार और सेक्स-अपराध की घटनाओं के बाद मीडिया-कवरेज बलात्कार और सेक्स की संभावनाओं को बेचते हैं. हनीप्रीत व्यक्तिवाचक से जातिवाचक संज्ञा में बदल जाती है ऐसी खबरों के साथ और एक स्त्री सारी स्त्रियों का विशेषण बन जाती है. . हनीप्रीत से लेकर जेएनयू तक के मिसाल के साथ इसका विश्लेषण कर रही हैं, स्वरांगी साने. आजतक, एनडीटीवी से लेकर बीबीसी हिन्दी तक एक ही भूमिका में दिख रहे इस विश्लेषण में: 

हनीप्रीत की रिमांड 10 अक्टूबर को भी तीन दिन के लिए बढ़ा दी गई। यह तो हुई ताजा खबर।   कितने ही दिनों से हनीप्रीत ने क्या खाया, क्या पहना, कहाँ सोई, करवाचौथ का व्रत किसके लिए रखा जैसी कितनी ही खबरें मुख्यधारा में दिखती रहीं, स्क्रोल में चलती रहीं और मीडिया में छपती रहीं। ‘आज तक’ पर इस लेख को लिखने से 12 घंटे पहले खबर थी- (‘6 दिनों की रिमांड के दौरान हनीप्रीत द्वारा उगले और छिपाए गए राज’)
कितनी काल्पनिक कथाएँ और राम रहीम के साथ उसके संबंधों को लेकर ये खबरें दर्शकों की सेक्सुअल फंतासी को उकसाती भी हैं। मसलन – (‘क्या है मुँहबोली बेटी हनीप्रीत के साथ गुरमीत राम रहीम के रिश्ते की सच्चाई?’ / एनडीटीवी इंडिया 31 अगस्त)

कौन है यह हनीप्रीत?
गुरप्रीत राम रहीम की तीसरी मुँहबोली बेटी है, जो हरदम उसके साथ साए के साथ रही, उसे जब सज़ा सुनाई गई थी तब भी हनीप्रीत उनके साथ थी। पंचकूला में डेरा समर्थकों के आतंक फैलाने के मामले में उसे गिरफ़्तार किया गया तो हो सकता है कि उसकी ख़बर उतनी महत्वपूर्ण हो, लेकिन जब वह फरार थी तो हर दिन खबर के नाम पर सनसनी बनाती काल्पनिक कहानियाँ परोसी गयीं। हनीप्रीत फरार थी तो उसके पति को ढूँढ-ढाँढ कर हनीप्रीत पर कीचड़ उछालना जारी रखा गया… बीबीसी हिंदी (22 सितंबर) में खबर थी कि (‘हनीप्रीत और राम रहीम को मैंने सेक्स करते देखा था- हनीप्रीत के पूर्व पति विश्वास गुप्ता’) क्या यह केवल एक शीर्षक है, नहीं बल्कि यह वह हकीकत है कि पत्नी तो पति की बपौती होती है और भले ही पूर्व पति हो तब भी वह कुछ भी कह (बक) सकता है जिसे यदि बीबीसी में तवज्जो मिलती है तो पुरुषों की तो बल्ले-बल्ले ही है।
 महिलाओं को साहस से भर देते हैं बलात्कारियों के खिलाफ ऐसे निर्णय



जेएनयू की खबर भी इसी एंगल से 
आख़िर यह किस तरह की मानसिकता है जो हम महिलाओं के मामले में रखते हैं? एक खबर और बनायी गयी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय परिसर के ब्यायज  होस्टल के 13 कमरों में लड़कियों के मिलने की ख़बर जिसे अमर उजाला में इस तरह से छापा गया जैसे महापाप हो गया हो। विश्वविद्यालय में लड़कों के छात्रावास में लड़कियों का प्रवेश निषिद्ध नहीं है। नियम लड़की या लड़के के लिए नहीं है, किसी भी बाहरी व्यक्ति को होस्टल में नहीं रुकाया जा सकता है चाहे वह स्त्री हो या पुरुष। गुरुवार को वार्डन की जाँच टीम ने होस्टल में जब छापा मारा तो वह नियमित दौरे से अलहदा कुछ नहीं था,जिसे सनसनीखेज बनाकर पेश किया गया। कांग्रेस के गढ़ माने जाते अमेठी में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने तंज कसते हुए जो कहा वह शीर्षक बन गया कि –(‘स्मृति के बहाने ही सही राहुल अमेठी में तीन दिन तो रहे –योगी’/ अमर उजाला, 10 अक्तूबर)…हम इतने कैसे गिर सकते हैं? महिला का सम्मान हमारे लिए कोई मायने नहीं रखता?

 क्या ‘महिलायें’ सिर्फ़ ‘पुरुषों’ की जरुरत की वस्तु हैं ??

आख़िर वे कौन लोग हैं जो इस तरह की ख़बरों में रुचि रखते हैं और जिनके लिए इन ख़बरों में सारा मिर्च मसाला डालकर इन्हें बनाया जाता है? उन सिरों (हैड्स) को देखा नहीं जा सकता उन चेहरों को पहचाना नहीं जा सकता लेकिन उस सोच की पड़ताल ज़रूर होनी चाहिए जो कहती है कि किसी  महिला को ‘टनाटन माल’ कह देना ख़बर बन सकती है- देखें खबर – (‘छत्तीसगढ़ की लड़कियाँ टनाटन होती हैं –बीजेपी सासंद बंसीलाल महतो’/ द डेलीग्राफ में 4 अक्तूबर को इसी शीर्षक से ख़बर थी) सासंद ने जो कहा, वह तो कहा लेकिन खबर बनकर उछालने का क्या औचित्य था..पढ़ने वाले को गुदगुदी हो यही इस तरह के शीर्षक का लक्ष्य होता है और खबर के फैलने से लक्ष्य प्राप्ति भी हो जाती है।

रामरहीम ने हनीप्रीत को अपनी तीसरी बेटी घोषित किया था पर उसने करवाचौथ का व्रत रखा या वह कभी पूरे मेकअप में होती थी, बिना कालीन ज़मीन पर कदम नहीं रखती थी और आज एक कंबल में रात बिताने को मजबूर है, वह फिल्मों में अभिनय भी कर चुकी है..आदि, आदि। क्या इन बातों को ख़बरें कहें? हनीप्रीत के बारे में इतनी ख़बरें क्यों आ रहीहैं? क्या उसके बारे में जानना इतना ज़रूरी है कि हम देश-दुनिया के अन्य सरोकारों से भी अधिक उसे तवज्जो दे रहे हैं? हनीप्रीत के जीवन की सारी कथाओं को इतना नमक-मिर्च लगाकर क्यों परोसा जा रहा है? यदि इसे टीआरपी बढ़ाने का ज़रिया माना जा रहा है तो टीआरपी कैसे बढ़ती है…टीआर पी बढ़ती है जब किसी चैनल पर कोई कार्यक्रम अधिक और अधिक और अधिक लोगों द्वारा लगातार देखा जाता है। समाचार अधिक कब देखे जाएँगे जब वे रुचिकर होंगे। समाचारों को कॉर्पोरेट ने जब हथियाया तब उन्होंने उसे केवल इंफ़ॉर्मेशन न कहते हुए समाचार चैनलों, अखबारों या कि पूरे माध्यमतंत्र को इंफोमेंट (इंफ़ॉर्मेशन प्लस इंटरटेनमेंट) कहना शुरू कर दिया। मतलब समाचार तो हो लेकिन उससे मनोरंजन भी हो और मनोरंजन के लिए स्तर तय होना ज़रूरी नहीं समझा जाता।

यौन हमलावारों से सख्ती से निपटें पीड़िताएं, तभी रुकेंगी बैंगलोर जैसी घटनाएं

बनारस विश्व विद्यालय का किस्सा याद ही होगा उसमें भी किसी ने यह नहीं पूछा कि वे लड़के कौन थे, वे कहाँ गए, उनके पिता ने उन लड़कों से नहीं कहा कि कॉलेज जाना बंद करो, घर बैठो। सारी ख़बरें ये आती रहीं कि लड़कियों के परिवार वाले क्या कह रहे हैं, लड़कियों के साथ क्या हुआ? ‘निर्भया’ नाम जितना हमें याद रहा उतना उन लड़कों का नहीं जो दोषी थे। बलात्कार के बारे में जो खबर आती है उसके साथ अमूमन जो स्कैच दिया जाता है वह भी घुटने में सिर छिपाए बैठी लड़की होती है, मतलब लड़की ही दोषी है यह अनजाने या जान-बूझकर समाज के दिमाग में फ़िट कर दिया जाता है या कि लड़की के बारे में ही हम जानना चाहते हैं।
सबसे बड़ा सवाल है मनोरंजन किसका? सदियों से हमारी मानसिकता है कि सामने जो दर्शक है वह पुरुष ही है और इसलिए कहा भी जाता है कि दर्शक/ श्रोता/ पाठक जो पसंद करता (पुल्लिंग वाचक) है, वही परोसा जाता है। यह मानकर चला जाता है कि देखने, सुनने और पढ़ने वाला पुरुष वर्ग ही है,  फ्रायड के सिद्धांत के अनुसार पुरुष को क्या पसंद आएगा तो स्त्री के बारे में जानना….बस स्त्री को परोस दिया जाता है। जैसे ‘राधे माँ’ क्या करती थी, कब मुंबई आई, किस  मिठाई वाले के बंगले में रहने लगी हमें सब पता है। क्या राधे माँ के बारे में जानना इतना ज़रूरी है?राधे माँ के चमत्कार, उसका गोदी में बैठना, उसका मस्त नाचना…मतलब वही न..उसी तरह  कि‘तू चीज़ बड़ी है मस्त-मस्त’। फिल्मों में आइटम सॉन्ग बनाकर और अब मीडिया में महज़ आइटम बनाकर, पेश किया जा रहा है स्त्री को।

सवाल है कि मीडिया के लिए कौन नियामक तय करेगा। अपनी तमाम संलिप्तताओं के बावजूद, जिसे अदालत से अभी सिद्ध होना है, हनीप्रीत एक स्त्री है। उसका निजत्व हनन क्यों हो रहा है? मीडिया दरअसल हनीप्रीत को व्यक्तिवाचक से अधिक महिलाओं के लिए एक समूहवाचक संज्ञा या विशेषण में तब्दील कर दे रही है और इस तरह स्त्रियाँ मीडिया के टार्गेट में हैं, महत्वाकांक्षी स्त्रियाँ, न कि हनीप्रीत।

जेएनयू के मामले में भी तो यही हो रहा है। अंततः उच्च शिक्षा में दाखिल होती स्त्रियों के लिए उनके घर अपने दरवाजे बंद कर देंगे। यदि ऐसा है तो यह ऐसी खाई है जिसके पार कुछ नहीं है…महिलाओं पर तंज कसता परिवार, फब्तियाँ करता समाज, भद्दे चुटकुलों से भरी सोशल साइट्स…कुछ अधिक लाइक्स मिलने की चाह में तैयार किए जाते शीर्षक…गौर से देखिए हम महिलाओं का मज़ाक बना रहे है या अपने आप का?

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सुप्रीम कोर्ट ने माना नाबालिग पत्नी के साथ सेक्स बलात्कार है: फिर भी अधूरा है न्याय



सरकार की अनिच्छा के बावजूद वैवाहिक बलात्कार को मानते हुए एक ऐतिहासिक फैसले में आज (11 अक्टूबर) की सुबह सुप्रीम कोर्ट ने 15 से 18 के बीच की पत्नी के साथ सेक्स को  बलात्कार की श्रेणी में ठहराया. इसके साथ ही इन्डियन पेनल कोड में बलात्कार की धारा में एक दूरगामी बदलाव भी आ गया. इसके पहले सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक बलात्कार को निजी मामला बताते हुए इसपर कोई निर्णय देने से इनकार कर दिया था और भारत सरकार भी इसी रूख पर थी. जबकि दुनिया के 80 देशों में वैवाहिक बलात्कार को अपराध माना जाता है.

जस्टिस मदन बी लोकुर के नेतृत्व वाली दो जजों की बेंच ने एक एनजीओ द्वारा दायर याचिका पर यह निर्णय सुनाया. इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए एससी ने बाल विवाह निषेध अधिनियम पर भरोसा किया। अदालत ने कहा कि एक पति को प्रतिरक्षा नहीं दी जा सकती है जो 15 से 18 की उम्र के बीच की अपनी पत्नी के साथ संभोग कर रहा है।


नाबालिग पत्नी से, बलात्कार का कानूनी अधिकार (हथियार): अरविंद जैन

एनजीओ इंडिपेंडेंट थॉट की एक याचिका ने धारा 375 आईपीसी (जो कि बलात्कार से संबंधित है) के तहत अपवाद खंड (2) को चुनौती दी है, जो कि 15 साल से ज्यादा उम्र की  पत्नी के साथ किसी संभोग या यौन कृत्य को बलात्कार नहीं मानता. इसने एक विरोधाभास बनाया क्योंकि सहमति की उम्र 18 साल थी. याचिका में यही  दलील थी।याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि यह लड़की के बच्चे के हित के खिलाफ भी है बुधवार को अदालत ने कहा कि आईपीसी की धारा 375 (2) को कोई कानूनी सुरक्षा नहीं दी जा सकती है। याचिका कर्ताओं ने इस खंड को संविधान की धारा 14, 15 और 21 का उल्लंघन मानते हुए उसे ख़त्म करने की अपील की थी.

याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने केंद्र से कहा था कि संसद कानून में इस तरह के अपवाद को कैसे बना सकती है। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह वैवाहिक बलात्कार के पहलू में नहीं जाना चाहता , लेकिन यह पूछा गया कि जब सहमति की उम्र “सभी उद्देश्यों” के लिए 18 साल थी, तो ऐसा अपवाद क्यों बनाया गया था?

दाम्पत्य में ‘बलात्कार का लाइसेंस’ असंवैधानिक है

केंद्र ने हालांकि वैवाहिक बलात्कार को बनाये रखने के हक में अपनी दलील दी और कहा कि  इस अपवाद को खत्म करने से  वैवाहिक बलात्कार का क्षेत्र खुल जाएगा, जो भारत में मौजूद नहीं है। केंद्र के वकील ने शादी के उद्देश्य के लिए मुसलमानों के बीच यौन की अवधारणा को संदर्भित किया और कहा कि निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले इन पहलुओं पर संसद द्वारा विचार-विमर्श किया गया है।

याचिकाकर्ताओं ने भी तर्क दिया कि अपवाद खंड बाल विवाह अधिनियम के निषेध के उद्देश्यों के खिलाफ गया था और अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों का उल्लंघन भी किया गया था, जिसके लिए भारत एक हस्ताक्षरकर्ता था।

अधूरी है लड़ाई 


वैवाहिक बलात्कार को खत्म करने की आज से 9 साल पहले याचिका दायर करने वाले स्त्रीवादी कानूनविद और सुप्रीम कोर्ट के अधिवकता अरविन्द जैन ने इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे अधूरी जीत बताया. उन्होंने कहा कि ‘यह 15 से 18 तक के वैवाहिक बलात्कार पर तो लागू होगा लेकिन 18 से ऊपर की पत्नियां बलात्कार का शिकार होती रहेंगी. उसके खिलाफ लड़ाई अभी जरूरी है. 80 देशों में वैवाहिक बलात्कार अपराध है.’

 यौन सम्बन्ध को प्यार का रूप देना जरुरी

2008 में अरविन्द जैन ने दिल्ली हाई कोर्ट में महादेव बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया एक याचिका दायर की थी. जिसके तहत उन्होंने बलात्कार की धारा 375 के कई अपवादों को चुनौती दी थी. मसलन 15 से बड़ी उम्र की पत्नी से सेक्स बलात्कार नहीं माना जायेगा. पत्नी यदि 12  से 15 के बीच है तो बलात्कार की सजा मात्र दो साल की जेल होगी. इस याचिका में और भी प्रावधानों को चुनौती दी गई थी. मसलन हिन्दू मायनॉरिटी एंड गार्जियन शिप एक्ट (सेक्सन 6 सी )के अनुसार पति नाबालिग पत्नी का नैचुरल लीगल गार्जियन है, जिसकी व्याख्या कोर्ट करते थे कि नाबालिग पति को भी यह हक़ है.  2012 तक बहस चलती रही . 2010 से 12 के बीच तत्कालीन सरकार ने तीन संशोधन बिल लाये और कोर्ट को यह बताया भी. 2013 में नये  बलात्कार क़ानून के बाद वह याचिका निरस्त कर दी गई थी. जैन इस अन्य मामले में आज के फैसले का अधूरी जीत के रूप में स्वागत कर रहे और स्त्रीवादियों को वैवाहिक बलात्कार की लड़ाई को जारी रखने के लिए सचेत कर रहे हैं.

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रेखा का खत अमिताभ बच्चन के नाम (!): काश, तुम्हारी जिंदगी लंबी के साथ बड़ी भी होती ?

आज तुम्हारा जन्मदिन है अमित
मुबारक हो

जीवन में कुछ इच्छाएं अधूरी रह जाएं, कुछ हसरतें पूरी न हो पाएं तो जीने की ललक बनी रहती है। हमने जो वक्त साथ बिताया उसे याद करती हूं तो आज के अमिताभ में उस पहले अमित को खोज नहीं पाती हूं। तुम हमेशा पॉलिटिकली करेक्ट बने रहे और मैं..मुझ पर से तुम्हारा नशा जब तक उतरा बहुत देर हो चुकी थी अमिताभ।

कल मेरा जन्मदिन था और आज तुम्हारा है। इस तरह नियति ने हमारा साथ सुनिश्चित किया। यह बात अलग है कि मेरे और तुम्हारे दोनों के जन्मदिन पर हमारा वह रिश्ता सुर्खियां बनता है जिसे तुम न तो कभी स्वीकार कर सके न नकार सके। सिलसिला फिल्म में आखिरी बार साथ में फिल्म किए हुए साढ़े तीन दशक बीत चुके हैं। लेकिन हमारा जिक्र एक साथ आज भी ऐसे आता है जैसे कल ही की बात हो।

तुम्हें तो याद भी नहीं होगा कि शुरुआती दौर में हमारे रिश्ते को अखबार किस तरह याद किया करते थे? वे कहते थे कि मोटी-काली और भद्दी रेखा पर अमिताभ का साथ मिलते ही निखार आ गया। यह किसी ने नहीं बताया कि यह कैसे होता है? मेरे नैसर्गिक साहस को तुम्हारे प्यार से जुड़ी बोल्डनेस करार दिया गया। मेरी अभिनय क्षमता को तुम्हारे नाम से जोड़कर उसे मेरी किस्मत का नाम दिया गया।



     फैंड्री : एक पत्थर जो हमारे सवर्ण जातिवादी दिलों में धंस गया है

आज चार दशक बाद भी हालात रत्ती भर भी नहीं बदले हैं। तुम्हें पता है आज एक वेबसाइट ने क्या लिखा है, ‘अमिताभ पर अपने हुस्न का जादू चलवाने के लिए रेखा ने खुद को पूरी तरह बदल दिया था। बतौर अभिनेत्री पहली हिंदी फिल्म ‘सावन भादो’ में मोटी सी दिखने वाली रेखा, अमिताभ से प्यार के बाद काफी बोल्ड दिखने लगी थीं। ‘

क्या यह सबकुछ तुम्हारी वजह से था अमित? मेरी दशकों की खुद्दारी, मेरी मेहनत का श्रेय मैं किसी और को नहीं लेने दूंगी। इतने दशकों तक यह अपमान-बदनामी और व्यंग्यात्मक सवालिया निगाहों का सामना करती हुई अपना वजूद कायम रखने में कामयाब रही तो केवल और केवल अपनी वजह से। मैं इस पत्र के माध्यम से ऐसा सोच रखने वाले हर शख्स को बताना चाहती हूं कि सन 1972 में जब मैंने 18 वर्ष की उम्र में मुंबई में अपना पहला फ्लैट खरीदा था तब तक मैं तुमसे मिली भी नहीं थी। वह दिन है और आज का दिन है। रेखा ने जो भी हासिल किया अपनी मेहनत और काबिलियत से।

मैंने चार शादियां की, मैं तुम्हारे नाम का सिंदूर लगाती हूं, मेरे पति ने आत्महत्या कर ली क्योंकि मैंने कभी उसे पति का दर्जा नहीं दिया। हर कोई जानता है कि इन बातों में कोई सच्चाई नहीं लेकिन चटखारे लेने का मौका कोई क्यों गंवाएगा?

रिश्ते में तो हम दोनों थे अमिताभ! फिर हमेशा मुझे ही विलेन के तौर पर क्यों पेश किया गया? क्या मैं तुम्हारा घर तोड़ रही थी? क्या यह एकतरफा रिश्ता था? मैंने कभी तुम्हारे बारे में कहा था कि एक गुलाब हमेशा गुलाब ही रहता है उसे चाहे किसी भी नाम से पुकारो। मुझे तुम्हारी ईमानदारी, सत्यनिष्ठ पर नाज था लेकिन 2004 में एक साक्षात्कार में यह कहकर तुमने मुझे बहुत बड़ा झटका दिया था कि मैं तुम्हारी सिर्फ सह-कलाकार रही। यह भी कि मेरा तुम्हारा कभी इसके अलावा कोई रिश्ता नहीं रहा।

 सावधान ! यहाँ बुर्के में लिपस्टिक भी है और जन्नत के लिप्स का आनंद लेती उषा की अधेड़ जवानी भी

तुम जानते हो हमारे रिश्ते से मेरी कोई उम्मीद जुड़ी नहीं थी। मुझे बस तुम्हारा साथ अच्छा लगता था। वह भी कुछ ही दिन का था। जैसा कि मैंने ऊपर कहा मेरे जीवन में तुम प्रेम की तरह आये लेकिन एक बुरे ग्रह की तरह तुम्हारा साया मेरे जीवन की हर अच्छी बुरी बात पर पड़ गया।  वह कहावत तो सुनी ही होगी तुमने कि आदमी की जिंदगी लंबी नहीं बड़ी होनी चाहिए। बढ़ती उम्र के साथ तुम्हारा कद लगातार छोटा होता जा रहा है अमिताभ। क्या तुम्हें इस बात का अहसास है? आज तुम्हारा 75वां जन्मदिन है  ईश्वर से मैं  यह कामना करना चाहती हूं कि तुम्हें जिंदगी में थोड़ी खुद्दारी अता फरमाए।

(अमिताभ के नाम रेखा का वह खत जो कभी लिखा ही नहीं गया)
यह काल्पनिक खत पत्रकार पूजा सिंह ने लिखा है. पूजा अपने स्त्रीवादी तेवर और हस्तक्षेप करती रपटों के लिए जानी जाती हैं. 

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वह आईएएस की पत्नी नहीं निर्वाचित मुखिया हैं, महिला-नेतृत्व की मिसाल

एक सक्रिय, सक्षम मुखिया ऋतु जयसवाल का आईएएस की पत्नी के रूप में ख़बरों की सुर्खियाँ बनना क्या एक उदाहरण है समाज और मीडिया में गहरे पैठे पुरुष मानसिकता का? ऋतु जयसवाल के काम, उनकी प्रतिभा, काम के प्रति समर्पण और राजनीतिक क्षमता को  आईएएस की पत्नी होने तक सीमित करती खबरें क्या कहना करना चाहती हैं? बिहार सहित कई राज्यों में ‘मुखियापति’, ‘सरपंच पति’ का अस्तित्व और महिला मुखिया के काम में उनकी दखल जिस मनोविज्ञान की परिघटना है क्या उससे इतर कोई मनोविज्ञान इन खबरों के प्रस्तोताओं का है? आइये समझते हैं ऋतु जयसवाल क्यों महिला नेतृत्व के लिए एक उदाहरण हैं, वे स्वयं एक खबर हैं अपनी वैवाहिक स्थिति और स्टेटस से अलग: 


अर्थशास्त्र में स्नातक ऋतु जयसवाल ने दिल्ली में होममेकर की अपनी सफल जिन्दगी से शिफ्ट लेते हुए 2014 में सीतामढी की  सिंहवाहिनी पंचायत में सामाजिक गतिविधियाँ शुरू की, जिसे वे इस इलाके की बदहाल सूरत को देखते हुए लिया गया निर्णय बताती हैं. उनका दावा है कि उनके ही प्रयासों से आजादी के बाद ‘नरकटिया’ गाँव में बिजली आयी. इसके अलावा उन्होंने सामाजिक जागृति कार्यक्रमों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, शैक्षणिक सेमिनारों के जरिये इस इलाके के प्रति अपने स्वप्न से लोगों को जोड़ना शुरू किया. जल्द ही 2016 में वे सिंहवाहिनी पंचायत की मुखिया चुनी गयीं. इस तरह दिल्ली में अपेक्षाकृत सुविधाजनक जिन्दगी को छोड़कर अपने बल पर कुछ करने की जिद्द के साथ वे उन्होंने पंचायत में नियमित और जिम्मेदारीपूर्वक अपेक्षाकृत कठिन जीवन का चुनाव किया.

बदल रही हैं पंचायत की सूरत 
मुखिया बनने के पूर्व और उसके बाद ऋतु जायसवाल ने इस पंचायात की बुनियादी सुविधाओं परा अपना ध्यान दिया, बिजली, शौचालय सड़क जैसे इंफ्रास्ट्रक्चरल विकास पर पहल लेने के अतिरिकित शिक्षा उनकी प्राथमिकताओं में है. स्त्रीकाल से बात करते हुए वे कहती हैं, ‘ यहाँ के लगभग 85% लोग शौचालय के लिए बाहर जाते रहे हैं. हमने 2100 से ज्यादा शौचालय अपनी पंचायत में अभी तक बनवाये हैं.’ ऋतु कहती हैं कि शिक्षा उनकी बड़ी प्राथमिकताओं में है और वे उसपर विशेष ध्यान देती हैं. वे स्वयं बच्चों को अपने स्तर पर पढवा रही हैं. वे कहती हैं कि ‘यहाँ दलितों की, खासकर मुसहर जाति की आबादी सबसे ज्यादा है. यह समुदाय बमुश्किल अपने लिए दो जून की रोटी जुटा पाता है. मूलतः खेत मजदूर और अन्य रूपों में मजदूर इस समुदाय के बच्चों को स्कूल तक पहुँचना बहुत मुश्किल काम है. इस काम के लिए हमने 12 लड़कियों की एक टीम बनाई है. उन्हें भी प्रशिक्षित किया गया है, सिलाई, बिनाई और ब्यूटीशियन, तथा कम्प्यूटर के कोर्स सीख रही हैं वे. उन्होंने और हमने बड़ी मुश्किल से इन दलित घरों से बच्चों को पढाई के लिए प्रेरित किया है. आज 500 से अधिक बच्चों को हम स्कूल के बाद, स्कूल के बाहर पढ़ा रहे हैं. हालात यह है कि मेरे पंचायत में एक भी ढंग का स्कूल नहीं है. सर्व शिक्षा अभियान के तहत एक स्कूल ऐसा है, जो कभी खुलता ही नहीं है. मैं कई दिनों से उस स्कूल पर जा रही हूँ, शिक्षक आता ही नहीं है.’ ऋतु कहती हैं, ‘ बिहार में शिक्षा की स्थिति बहुत बुरी है. पिछले कुछ एक दशक से यह और गर्त में ही गयी है. इस बार मैट्रिक की परीक्षा का परिणाम बहुत बुरा रहा. स्कूलों में बच्चे सिर्फ मिड डे मिल के लिए जा रहे हैं. उनके अटेंडेंस रजिस्टर में मेंटेन किये जा रहे हैं. बहुत बुरा हाल है, इस पर काम करने की जरूरत है.’

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आरक्षण जरूरी लेकिन वह आख़िरी उपाय नहीं  
खुद ओबीसी से आने वाली ऋतु यह मानती हैं कि समाज में समानता के लिए आरक्षण तबतक जरूरी है, जबतक समानता के दूसरे कारगर उपाय नहीं किये जायें. कहती हैं ‘ स्कूलों में, प्रायमरी स्तर पर जबतक समान शिक्षा लागू नहीं होती समता का रास्ता तबतक नहीं बनेगा. समान शिक्षा, समान स्कूल-जहाँ आम और ख़ास, सभी के बच्चे पढ़ते हों.’ ऋतु कहती हैं कि हमें निरंतर जाति के खिलाफ काम करने की जरूरत है. वे इसके लिए खुद को सजग भी बताती हैं. उनके अनुसार उनकी पंचायत में उनकी जाति से मात्र छः परिवार आते हैं. वे यहाँ जाति से ऊपर स्वीकृत हैं. कहती हैं ‘हालात यह कि जातियों का वर्गीकरण देश में एक समान नहीं है. बिहार में मेरी जाति ओबीसी है उत्तर प्रदेश में जनरल. जरूरत है जातियों में प्रतिभा निर्माण की, जरिया आरक्षण हो यह आख़िरी उपाय नहीं है, इसके लिए ठोस और कारगर कदम की जरूरत है.

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राजनीति में छलांग की जल्दी नहीं 
ऋतु अपने काम के प्रति गंभीर हैं. वे राजनीति में आगे बढ़ने को लेकर कहती हैं कि जनता ने उन्हें एक भूमिका के लिए चुना है तो वे उसे ईमानदारी से अपना वक्त और समर्पण देंगी. कहती हैं, ‘ऐसा नहीं है कि आप मुखिया बनें, फिर विधायक बनने की हड़बडी में हों और फिर संसद तक पहुँचने की जल्दीबाजी में. जनता आपको विश्वास से चुनती है. यदि आपको मुख्यमंत्री चुन चुकी है तो आप इसपर खुद को सिद्ध करें न कि प्रधानमंत्री बनने की होड़ में लग जायें. ऋतु कहती हैं कि ‘अभी तो हमारे पास सबसे बड़ा लक्ष्य है कि अपनी पंचायत को सुविधा संपन्न करूं. खुद को साबित करने की सबसे बड़ी जरूरत वंचित समूहों को ही होता है. महिला जनप्रतिनिधियों के मामले में, खासकर बिहार में, हालत यह है कि उनके पति निर्णय लेते हैं. वे अपनी गाड़ियों पर शौक से मुखियापति, प्रमुखपति से लेकर विधयाकपति तक लिखवाकर घूमते हैं और अपनी पत्नी की जगह उनके निर्वाचन क्षेत्र के सारे निर्णय खुद लेते हैं. वास्तविक और चुनी हुई जनप्रतिनिधि स्टैम्प बन जाती है. अपने मामले में मैं खुशनसीब हूँ कि मेरे पति दिल्ली में कार्यरत हैं और उनके स्वभाव में मेरे कामों में दखल देना नहीं है.” ऋतु जयसवाल उच्च शिक्षित आदर्श युवा सरपंच (मुखिया) के तौर पर सम्मानित भी हो चुकी हैं.

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निजी जीवन 
ऋतु जयसवाल ( 26 अगस्त 1977) का जन्म एक व्यवसायी परिवार में हाजीपुर, बिहार में हुआ. 1996 में उनका विवाह 1995 बैच के सिविल सर्विस ऑफिसर अरुण कुमार से हुआ. पति इस समय सेन्ट्रल विजिलेंस कमिशन में डायरेक्टर के पद पर कार्यरत हैं. इनके दो बच्चे, बेटा आर्यन और बेटी अवनी हैं. सेंट पॉल स्कूल से प्रारम्भिक शिक्षा और वैशाली महिला कॉलेज से अर्थशास्त्र में स्नातक ऋतु भरत नाट्यम और कथक की नृत्यांगना भी हैं.

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बाबा साहेब डा. अम्बेडकर की पत्नी (माई साहेब) को बदनाम किया नेताओं ने:रामदास आठवले

केन्द्रीय सामाजिक  न्याय और अधिकारिता मंत्री  (राज्य) रामदास आठवले ने कहा कि “नेताओं ने जानबूझ कर माई साहब को बदनाम करने की कोशिश की.  बाबा साहब डा. अम्बेडकर के साथ 1948 में उनकी शादी हुई..मैंने यह स्टैंड लिया कि माई साहब अम्बेडकर पर अन्याय हुआ है और ब्रह्मणों में यदि ऐसी कोई साजिश होती तो बाबा साहब के बुद्धिस्ट बनने से पहले ही ऐसा कुछ हो सकता था.”


यह बातचीत रामदास आठवले ने अपने ऊपर आ रही किताब ‘भारत के राजनेता: रामदास आठवले ( द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन की सीरीज किताब के तहत) के लिए की है. विस्तृत बातचीत किताब में शामिल: 


 भारत के राजनेता: अली अनवर 
  संपादक : राजीव सुमन 
  श्रृंखला संपादक : प्रमोद रंजन



राज्य (महाराष्ट्र )  में कोई ऐसी घटना घटी हो या केंद्र में, जिसके बारे में आपको लगा हो कि कुछ घटित हो रहा है और तब आप भी एकदम सक्रिय रूप से राजनीति में आ गये हों?

वह समय दलित पैंथर का था. मतलब जब मैं मुंबई आया था और सिद्धार्थ हास्टल में था. दलितों पर अत्याचारों की घटना सुनाने को मिलती. मतलब जगह-जगह पर अत्याचार होते रह रहे थे. दलित पैंथर का आंदोलन पहले ही शुरू था. मैं तो बाद में उधर आ गया. मैं जिस हॉस्टल में रहता था, उधर ही राजा ढाले मिलते थे और फिर राजा ढाले से मेरे अच्छे संबंध बनते गये. उनके साथ मेरे विचार अच्छे होते गये और फिर उसी तरह माई साहब अम्बेडकर,जो बाबा साहब अम्बेडकर की पत्नी थीं, उनके साथ भी मेरे बहुत ही अच्छे संबंध हो गये थे. मैंने उनके साथ हुए अन्याय के मुद्दे को उठाया था, राजा ढाले ने भी उठाया था कि माई साहब अम्बेडकर पर अन्याय हुआ है. ये जो बाबा साहब के बाद वाले लीडर्स थे, वे माईसाहब को ही बाबा साहब अम्बेडकर की मौत के लिए जिम्मेदार मानते थे और लगातार ऐसी चर्चायें करते थे कि ब्राह्मण लोगों ने जानबूझ कर बाबा साहब की हत्या माई साहेब से करवाई है. लेकिन यह सही बात नहीं है. सही बात यह है कि माईसाहब अम्बेडकर  बुद्धिस्ट थी. वह कुमकुम नहीं लगाती थी. तिलक नहीं लगाती थी. वे ब्राह्मण होने के बावजूद भी खुद को बुद्धिस्ट समझती थी. बाबा साहब अम्बेडकर के बारे में उन्होंने किताब भी लिखी है. किताब उनकी यादों के बारे में है. मैंने यह भूमिका ली कि माई साहब अम्बेडकर को जान-बूझ कर इन नेताओं ने बदनाम करने का काम किया ताकि माई साहब के पास कोई न जाये. इसलिए माई साहब अम्बेडकर  के बारे में समाज में इन लोगों ने इस तरह की गलतफ़हमी फैलाई थी. माई साहब अम्बेडकर मुंबई या महाराष्ट्र भी नहीं आती थी. वो दिल्ली रहती थीं. दिल्ली के महरौली में एक फॉर्महाउस था, वहां माईसाहब अम्बेडकर कई सालों तक रहीं. लेकिन जब मैंने यह स्टैंड लिया कि माई साहब अम्बेडकर पर अन्याय हुआ है और ब्रह्मणों में यदि ऐसी कोई साजिश होती तो बाबा साहब के बुद्धिस्ट बनने से पहले ही ऐसा कुछ हो सकता था. बाबा साहब अम्बेडकर के बुद्धिस्ट बनने के समारोह में 14 अक्टूबर 1956 को माई साहब अम्बेडकर मौजूद थी. सफ़ेद साड़ी पहन कर बाबा साहब के साथ उन्होंने धम्म की दीक्षा ली और बौद्ध धम्म ग्रहण किया.

तो आपको क्या लगता है नानकचन्द्र रत्तू और सोहनलाल शास्त्री, जो बाबा साहब के साथ थे,- ये दोनों, या कई अन्य नेता क्यों गये होंगे माईसाहब के खिलाफ?

साथ रहे थे. लेकिन इसी तरह का प्रचार उन्होंने समाज में किया और नेताओं ने जानबूझ कर माई साहब को बदनाम करने की कोशिश की. माई साहब बहुत सरल स्वभाव की थीं. सीधी-सादी औरत थी. बाबा साहब अम्बेडकर के साथ 1948 में उनकी शादी हुई. वे एमबीबीएस थीं, पुणे में पढाई की थीं. उनका परिवार कबीर सरनेम रखता था. . उन्होंने बीमारी में बाबा साहब की देख-भाल की. बाबा साहब की तबियत भी ठीक नहीं रहती थी इसीलिए बाबा साहब ने उनके सामने प्रस्ताव रखा कि मैं शादी करना चाहता हूँ इसलिए कि मुझे किसी केयर टेकर की आवश्यकता है. और मैं ऐसे ही किसी औरत को रखूँगा तो मेरे बारे में गलत-फ़हमी बनाई जा सकती है. मेरे साथ अभी कोई भी नहीं है इसीलिए शादी का प्रस्ताव उन्होंने रखा. उनकी उम्र का काफी अंतर भी था. उसके बावजूद माई साहब, जिनका नाम शारदा कबीर था  और पेशे से डाक्टर थीं, इतने बड़े आदमी के प्रस्ताव को ठुकरा नहीं पायीं और उन्होंने इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया. उनका नाम बाबा साहब ने सविता रख दिया.  वे कई सालों तक बाबा साहब के साथ रहीं. लगभग आठ सालों तक.

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डॉ. अंबेडकर का स्त्रीवाद (एक विश्लेषणात्मक पुनरावलोकन )

अमोल निमसडकर

शोधार्थी,टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, मुंबई . संपर्क : amolnimsadkar@gmail.com,मो.7028385569

स्त्री सशक्तिकरण के प्राचीन दस्तावेजों पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि  इसकी शुरुआत महात्मा गौतम बुद्ध की  विरासत  से  हुई और सम्राट अशोक के काल में विकसित रूप धारण किया । आगे चलकर भारत के अलग-अलग कालों के अलग-अलग महापुरुषों ने इस महत्वपूर्ण आंदोलन को जारी रखा, उसमें से इस आंदोलन के डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर आधुनिक भारतीय कालखंड के सबसे महत्वपूर्ण अग्रदूत थे । पर इस आंदोलन के आद्य प्रवर्तक के रूप में महात्मा जोतिबा फुले ने सबसे पहले नीव रखी । उन्हीं  से प्रेरणा लेकर और उन्हीं  को वैचारिक गुरु बनाकर डॉ.अंबेडकर ने इस आंदोलन को लोकतांत्रिक देश में सफल बनाने की कोशिश की । स्वतंत्र भारत का समकालीन स्त्री आंदोलन महिलाओं की उपेक्षा, शोषण, और श्रम में लिंग आधारित भेदभाव को समाप्त करने तथा बराबरी के सिद्धांत का दृढ़तापूर्ण पालन करने की नीति के साथ शुरू हुआ ।

20 वी सदी के पूर्वार्ध में स्त्री के माँ रूप का प्रतीक उभरा नारी शक्ति के अनुसार राष्ट्रमाता के रूप में रक्षा करने वाली उग्र रूपधारिणी महाकाली के रूप में देखा गया । 20 वी सदी की शुरुआत में मैडम कामा तथा सरोजिनी नायडू ने मातृशक्ति का बयान करते हुए चेतावनी दि कि “याद रखो जो हाथ पालना झुलाते हैं वही दुनिया पर राज करते है ।” तथा गांधीवादी विचारधारा के अनुसार स्त्री को कष्ट सहनेवाली सहनशील माँ के रूप में देखा गया । स्त्री के प्रति स्व-स्त्रैण विचारों एवं राजनीति का नारीकरण करने की प्रवृति के कारण उन्हे भारतीय महीला जागृति आंदोलन के जनक के रूप में ख्याति मिली ।  आजाद भारत में महिला सबलीकरण के विमर्श में  महात्मा गांधी कहा करते थे “जब तक आधी मानवता के आँखों में आंसू है, मानवता पूर्ण नहीं कही जा सकती” ।

स्त्री सशक्तिकरण मूलत: एक मानवतावादी विचारधारा का नाम है, इस तथ्य से हम सभी परिचित है यह विचारधारा और आचरणशास्त्र मात्र कोरा आदर्श नहीं । मनुष्यता का इतिहास देखा जाए तो सब शास्त्रों की रचना पुरुषों ने की है स्त्री ने रची हुई रचना हाथ पर गिनी हुई दिखाई देती है । इसलिए हमारे पास मौजूद स्त्री की जो छवि है वह आरोपित है । मगर दोनों के मनोविज्ञान में जमीन आसमान का फर्क है । विश्व की आदि आबादी की रुचि सन्यास या ईश्वर में भी नहीं के बराबर देखने को मिलती है । एक नजर से देखी  जाए तो धर्म भी पुरुष के मस्तिष्क की देन है । पूर्व हो की पश्चिम, वर्ग उच्च हो या निम्न,  जाति  हो या धर्म स्त्री   को प्रजनन की प्रक्रिया से तो गुजरना ही पड़ता है । स्त्री  का माँ बने रहने का इतिहास हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है । पर बगैर श्रेष्ठता से क्योंकि पिता ही सर्वोच्च है और उसी का वंश चलता है ।

इन्हीं तथ्यों का गंभीर अध्ययन करके डॉ.अंबेडकर ने मनु को दोषी ठहराया, जिसके क़ानून ने  महिलाओं को बंधन में रखा, उन पर घोर असमानताएँ लादी। उन्होंने मनु को ही भारत में महिलाओं के ह्रास और पतन के लिए जिम्मेदार ठहराया । इसी प्रासंगिक बात को आगे गर्डा लर्नर  अपनी पुस्तक ‘दि क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की’ में  स्त्री के अनवरत दमन, शोषण का एक कारण स्त्री का इतिहास न होना, उसके अपने नायकों आदि-आदि के रूप में देखती हैं । उससे पहले स्वतंत्रता के पक्षधर  जॉन स्टुअर्ट मिल ने अपनी पुस्तक ‘दि राइज़, दि सब्जेक्शन ऑफ वुमन’ में स्त्री के ऐतिहासिक दमन के लिए कानून व्यवस्था को जिम्मेदार माना, तथा कहा कि  मानव जाति की सभ्यता और संस्कृति के विकास का मूल स्त्रोत ‘महिला’ है ।”

डा. अम्बेडकर और स्त्री अधिकार – सुजाता पारमिता

डॉ. अंबेडकर के स्त्री सशक्तिकरण विषयक दृष्टिकोण :

डॉ. अंबेडकर के सम्पूर्ण विचार  में सबसे महत्वपूर्ण मंथन का हिस्सा महिला सशक्तीकरण   था । उन्होंने भारतवर्ष की तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एंव राजनैतिक व्यवस्था के अंदर का सूक्ष्म अध्ययन करके जाना  कि सभी समस्या के समाधान की मूल शर्त सामाजिक न्याय और परिवर्तन की क्रांति से है, न कि अन्य किसी भी बदलाव या क्रांति से है । एक महान फ्रांसीसी लेखक ने एक बार कहा था – “अगर आप मुझसे यह जानना चाहते हैं  कि कोई राष्ट्र कैसा है, या कोई सामाजिक संगठन कैसा है, तो मुझ यह बताइए कि उस राष्ट्र की  महिलाओं की स्थिति कैसी है ……” मतलब यह कि किसी भी देश का चरित्र सबसे आधिक इस बात से तय होता है कि वहाँ महिलाओं की क्या स्थिति है, और उस समाज में महिलाओं का क्या स्थान है ? यही बात डॉ. अंबेडकर ने  कही कि भारतीय समाजव्यवस्था में शैक्षणिक, सामाजिक, आर्थिक और अन्य क्षेत्रों पर भी उतनी ही लागू होती है ।


सामाजिक दृष्टिकोण

प्राचीन कालीन भारतीय समाज में वर्ण एंव जाति व्यवस्था आधारित सामाजिक संरचना होने के कारण भारतीय समाज का व्यावहारिक दर्शन महिला के लिए मुक्ति आन्दोलन से दूर  दिखाई पड़ता है । डॉ. अंबेडकर के समग्र अध्ययन और दूरदृष्टि में महिला प्रश्न (शोषण,उत्पीड़न, अज्ञान, अपमान एंव सामाजिक विषमता) का निर्णायक स्वरूप सदियों से  चली आ रही विषम समाज व्यवस्था और दृढ़ निरक्षरता की मौजूदगी के कारण है । संदर्भ के तौर पर उनके जीवन का प्रथम आंदोलन के रूप में महाड़ सत्याग्रह एक महिला सशक्तीकरण की प्रारंभिक शुरुआत हम मान सकते है । हालांकि  यह आंदोलन पीने के पानी के संबंध में था पर महिलाओं के सामाजिक परिवर्तन के उद्देश्य  से वह वहाँ कहते है कि, “तुम्हारी कोख से जन्म लेना गुनाह क्यों माना जाए और ब्राह्मण स्त्रियों की कोख से जन्म  लेना पुण्य क्यों माना जाए ?”  आगे  उन्होंने महिलाओं को सम्यक शील और आत्मसमान का महत्व समझाते हुए कहा कि, “हमे अपने स्वाभिमान की बलि दिए बगैर गरीबी में ही सही तरीके से और इज्जत से जीना सीखना चाहिए । ताकि समग्र शोषित नारी अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व का विकास कर कैसे अपना और अपने परिवार के उद्धार में सहयोग कर सकेगी ।

किसी भी देश के समग्र विकास के लिए उस देश के संतुलित सुशासन के लिए उस देश दिशा-निर्देश नीति जनकल्याणकारी होना पूर्व शर्त है । पर स्वतंत्रता पूर्व काल में राष्ट्र व्यवस्था में धार्मिक नीति निर्देशों का ही बोलबाल होने के कारण डॉ. अंबेडकर ने महिला सशक्ती करण के रूप में प्राचीन नीति निर्देश विधि मनुस्मृति दहन किया । जो भारतीय स्त्री उत्थान के इतिहास  में एक आविस्मरणीय घटना है । मनुस्मृति का दहन सार्वजनिक रूप से प्रतीकात्मक विरोध था । यह  भारतीय विशाल शोषित वर्ग के मुक्ति का दरवाजा खुलने जैसा था । मनुस्मृति के विरोध के निम्न बिन्दु थे-  सभी स्त्री-पुरुषों को शूद्र कहा था, सभी को  सारे सामाजिक आधिकारों से वंचित कर दिया था, इतना ही नहीं तो इस व्यवस्था ने स्त्रियों में भी भेद निर्माण कर दिया था । इस व्यवस्था को पूर्णतः अमान्य कर उसे तिलांजलि दे दी गई थी । इसलिए मनुस्मृति दहन स्त्री स्वतंत्रता (सशक्तिकरण) की दिशा में एक उज्जवल कदम माना जाता है । इस घटना के बाद स्त्री आंदोलन को एक व्यापक रूप मिला ।
जयभीम वाला दूल्हा चाहिए



डॉ. अंबेडकर के सामाजिक दृष्टिकोण में भारतीय महिलाओं, आंदोलन से जुड़ी हर तबके की महिलाओं की विविध  आंदोलोनों में हिस्सेदारी से स्त्री का  सामाजिक महत्व और उसके मूल आवश्यकता का अहसास  जिंदा हुआ । हाल ही के दिनों में स्टेट्स  ऑफ वीमेन कमिटी ने नारी की स्थिति का जायजा  लेने के लिए सुविधाओं की उपलब्धता को मापदंड बनाया परंतु धर्म और जाति  ने भी नारी की स्थिति को प्रदर्शित किया है । अंतः आर्थिक आधार के साथ-साथ सामाजिक और धार्मिक आधार पर भी नारी की स्थिति का मूल्याकन आवश्यक है ऐसा निष्कर्ष दिया । लिहाजा यह कि मूलतः : डॉ. अंबेडकर के की स्त्रीमुक्ति की दृष्टि  ही निर्णायक निष्कर्ष है । सामाजिक न्याय, सामाजिक पहचान, समान अवसर एंव संवैधानिक स्वतंत्रता के रूप में नारी सशक्तीकरण
के लिए उ नका योगदान हर पीढ़ी हमेशा याद रखेगी ।

सांस्कृतिक दृष्टिकोण :

भारतीय समाज का सांस्कृतिक स्वरूप विश्व के अन्य किसी भी देश के सांस्कृतिक स्वरूप से भिन्न है । एक ही देश में अनेक रीति रिवाज, परंपरा, खानपान, होने के कारण समाज के अंतर्गत सांस्कृतिक भेद  निश्चित दिखाई पड़ता है, जिसका संबंध सीधा देश की जीवन-व्यवस्था  से अटूट जुड़ा है । इस व्यवस्था में स्त्री की हैसियत दोयम है.

डॉ. अंबेडकर के विचार में महिला विषयक विषम सांस्कृतिक वर्चस्व का गंभीर कारण एक तो पितृसत्ताक मनुवादी व्यवस्था है  और दूसरा स्व: महिला ही इस बात से इंकार है । इसलिए महिलाओं  को संबोधित करते हुए  महाड़ सम्मेलन 25 दिसंबर 1927 में वे  सांस्कृतिक सीख देते हुए कहते हैं कि आप को कभी अछूत मत समझो । स्वच्छ जीवन जियो । सवर्ण महिलाओं कि तरह कपड़े पहनों यह मत देखो कि तुम्हारे कपड़ों में जगह-जगह चिंगारिया लगी हैं , बस यह देखो कि वे साफ तो हैं, कपड़े चुनने  और गहनों में धातु के इस्तेमाल की तुम्हारी आजादी पर कोई रोक नहीं लगा सकता । मन को सांस्कृतिक करने और आत्म-सहायता की भावना पर अधिक ध्यान दो ……..।” आगे कहते है – अगर तुम्हारा आदमी और बेटे पियक्कड़ है तो उन्हे किसी भी सूरत में खाने को मत दो । अपने बच्चों को स्कूल भेजो । शिक्षा औरत के लिए उतनी ही जरूरी है, जितनी कि मर्दो के लिए । अगर तुम पढ़ना लिखना सीख जाओ, तो अधिक प्रगति होगी । जैसी तुम होगी वैसे ही तुम्हारे बच्चे होंगे । उसके जीवन को सद्गुणों से भरो, क्योंकि बेटे ऐसे होने चाहिए कि उनपर दुनिया नाज करें …..।

जिस देश में मान कल्याण रहित परंपरा- रूढ़ियाँ, रिवाज ही कानून का स्थान ले चुकी हैं.कानून अगर धैर्य संहिता और आग्रह से चलना हो वहाँ कहीं न कहीं, शोषण एवं उत्पीड़न मौजूद होता ही है ।’ जहां यह उद्घोष हो की ‘रुधिविधेग्रारियासी’ अर्थात रिवाज कानून से भी अधिक शक्तिशाली है । वहाँ महिलाओं  में सांस्कृतिक पहचान एंव गरिमा जिंदा करने का काम डॉ. अंबेडकर ने विरोधी व्यवस्था के खिलाफ चलाया ।

शैक्षणिक दृष्टिकोण :

ग्रीक (यूनान) में सुकरात ने कहा था ‘knowledge is virtue’ अर्थात ज्ञान सबसे बड़ा सद्गुण है, जबकि महान अग्रेंजी दार्शनिक फ़्रांसिस बेकन ने कहा था ‘knowledge is power’ मतलब ज्ञान सबसे बड़ी शक्ति है । इसलिए डॉ. अंबेडकर को आधुनिक भारत का सुकरात और बेकन भी कहना गलत नहीं होगा । क्योंकि भारत में समाज के लिए शिक्षा का महत्व बताने वाले और शील (Virtue) के बगैर शिक्षा  बेकार है इस दर्शन का आग्रह करने वाला इकलोती विभूति डॉ. अंबेडकर थे यह सर्व मान्य है । विलियम्स शेक्सपियर ने ठीक ही कहा है की “ इंसान के जीवन में उतार-चढ़ाव आते है उससे लड़कर  यदि इस बाद को पार कर लिया जाए तो किस्मत बन जाती है और यदि नजरंदाज कर दिया तो उनके जीवन का सफर उथला हो जाता है और कष्टों से घिर जाता है ।” बिल्कुल इसी अंदाज में उनके शुरुआती शिक्षा सफर में रहते हुये शिक्षा का महत्व और आवश्यकता को संबोधित करते हुये 4 अगस्त 1913 को जमादार को न्यूयार्क से पत्र में लिखते हैं  कि, “हमें पूरी तरह भाग्य वाली धारणा को छोड़ देना चाहिए  ।  अभिभावक  बच्चे को ‘जन्म’ देते हैं न कि ‘कर्म’ । वे अपने बच्चों का भाग्य भी बदल सकते हैं और यदि हम  इस सिद्धान्त का अनुसरण करते हैं,  तब हमे निश्चित रूप से मान लेना चाहिए की हम जल्द ही बेहतर दिन देखेंगे और हमारे समाज का विकास और बढ़ जाएंगा । (गंगू-जमादार की एक लड़की महार समाज की वह पहली लड़की थी जो उस समय में चौथी कक्षा में पढ़ रही थी । ) पुरुष शिक्षा के साथ-साथ महिला शिक्षा भी चलनी चाहिए, उसका फल एंव परिश्रम आपको अपनी पुत्री के शिक्षित होने पर देखने को मिल सकता है ।”

डॉ. अंबेडकर की  सोच में यह स्पष्ट था कि “यदि हम लड़कों के साथ-साथ लड़कियों की शिक्षा की ओर भी ध्यान देने लग जाएं तो प्रगति कर सकते हैं ।  शिक्षा किसी खास   वर्ग की बापौती नहीं । उस पर किसी एक ही वर्ग का अधिकार नहीं । समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए  शिक्षा का समान अधिकार है । नारी शिक्षा पुरुष से भी अधिक महत्वपूर्ण है । चूंकि पूरी पारिवारिक व्यवस्था की धूरी भी नारी है, उसे नकारा नही जा सकता है ।”

डॉ. अंबेडकर के प्रसिद्ध मूलमंत्र की शुरुआत ही शिक्षित करो से होती है (‘Educate-Agitate-Organize’), इस मूलमंत्र से आज कितनी महिलाएं शिक्षित और सुशिक्षित होकर अपने पैरों पर जीवन यापन कर रही हैं । हजारों साल  से पीछे रह गया   एस.सी., एस.टी. और ओ.बी.सी. वर्ग आज के सामान्य वर्ग के साथ बराबरी से खड़ा है । आज दलित महिला मुख्यमंत्री (मायावती) पद तक पहुँच चुकी है । इस संदर्भ में डॉ. अंबेडकर का महिला शिक्षा आंदोलन एंव योगदान वर्तमान राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरणा स्त्रोत सिद्ध होता है ।

राजनैतिक दृष्टिकोण

जब तक किसी राष्ट्र में सामाजिक,आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और शैक्षणिक क्रांति नहीं होती तब तक राजनैतिक क्रांति पैदा नहीं हो सकती । यह डॉ. अंबेडकर के राजनैतिक दर्शन का सार था । इस दर्शन के सार में आधी आबादी की मुक्ति  का निर्धारण भी मुख्य रूप से शामिल है । सन 1932 का पुना करार, हिंदू कोड बिल आदि इस दर्शन शाखाओं के प्रतिकात्मक दस्तावेज़ हैं । किसी भी प्रकार का आंदोलन एक राजनितिक हितसंबंध से संबंधित होता  है । क्योंकि कानून के रूप में एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनैतिक आकार ही सारी समस्याओं के ताले खोल सकती है ।

इसके गहन अध्ययन के बाद डॉ. अंबेडकर ने सर्वांगीण भारतीय समाज व्यवस्था का आधा हिस्सा महिला वर्ग के सशक्तीकरण के लिए हिंदू कोड बिल नामक प्रामाणिक कानूनी दस्तावेज़ सन 1951 में तत्कालीन प्रधान मंत्री पंडित ज. नेहरू के मंत्रिमण्डल में केंद्रीय विधि मंत्री रहते हुए संसद में पेश किया । पर कुछ धार्मिक मतभेदों के कारण बहुत सांसदों  ने बिल का  विरोध किया । लिहाजा यह कि बिल पारित नहीं हो सका । डॉ. अंबेडकर की मनीषा में हिंदू समाज के मुक़ाबले में मुस्लिम समाज का एंव ईसाई समाज का अपना-अपना पर्सनल लॉ है जो सारे संसार में एक समाज व्यवस्था की तरह है । किसी भी स्वस्थ समाज के लिए उसे एक दायरे या कतार में रखने के समान सामाजिक कायदे कानून होने चाहिए ताकि वह उनका पालन करता हुआ अपना अस्तित्व बनाये रखे । इसलिए संवैधानिक रूप से भारत में  महिला सशक्तीकरण  के लिए पहला कानूनी दस्तावेज़ हिंदू कोड बिल पेश करने का  निर्णय  किया था ।

इस संदर्भ में ‘जेव्हा मी जात चोरली’(when I had concealed my caste) इस प्रसिद्ध कृति के मराठी दलित लेखक बाबुराव बागुल कहते है,  “हिन्दू कोड बिल महिला  सशक्तीकरण का असली आविष्कार है (“Hindu code bill is real invention of women empowerment.”)।  और गंभीर राष्ट्रीय विमर्श की भावना से कहते हैं कि  “अस्पृश्यता को नकारने वाली भीम स्मृति और अस्पृश्यता का पालन करने वाली मनुस्मृति एक ही सभागृह में और एक ही घर में साथ-साथ राज करती हैं । यानी देश एक ही समय में दो स्मृतियों, दो सत्ताओं और दो जीवंत-पद्धतियों में जीता है ।” तात्पर्य यह कि. अंबेडकर यह बात समझते थे कि स्त्रियॉं की स्थिति सिर्फ ऊपर से उपदेश देकर नहीं सुधरने वाली, कानूनी में उसके लिए व्यवस्था करनी होगी । डॉ.अंबेडकर निर्मित हिंदू कोड़ बिल के प्रस्तुति के बिन्दु  निम्नलिखित थे-

1 यह बिल हिंदू  स्त्रियों की  उन्नति के लिए प्रस्तुत किया गया था । 
2 इस बिल की वजह से ही स्त्रियों  को तलाक    देने का आधिकार । 
3 तलाक मिलने पर गुजारा भत्ता मिलने का अधिकार । 
4 एक पत्नी होते दूसरी शादी न करने का अधिकार । 
5 गोद लेने का अधिकार । 
6 बाप-दादा की संपत्ति में हिस्से का अधिकार । 
7 स्त्रियों   को अपनी कमाई पर अधिकार । 
8 लड़की को उत्तराधिकारी का अधिकार । 
9 अंतरजातीय विवाह करने का अधिकार ।
10 अपना उत्तराधिकारी निश्चित करने कि स्वतंत्रता । 

सभी मुख्य बिंदुओं का अवलोकन से स्पष्ट होता है कि हिंदू कोड बिल भारतीय महिलाओं  के लिए सभी मर्ज कि दवा थी । क्योंकि वह समझते थे कि असल में समाज की  मानसिक सोच जब तक नहीं बदलेगी तब तक व्यावहारिक सोच विकसित नहीं हो सकेंगी । माओत्से तुंग ने सच ही कहा है “सही विचार कहां से आते है ? क्या वे आसमान से टपकते है ? नहीं । क्या वे दिमाग में अंतरजात है ? नहीं । वे सामाजिक व्यवहार से आते है । पर अफसोस कि यह बिल संसद में पारित नहीं हो पाया इसी कारण डॉ. अंबेडकर ने विधि मंत्री पद का इस्तीफा दे दिया । जिससे यह स्पष्ट होता है कि उनको महिला उन्मूलन के लिए अपने पद तक को निछावर कर देने वाला भारतीय महिला क्रांति का ‘मसीहा’ कहा जाय तो अतिशयोक्ति  नहीं होगी ।

हिंदू महिलाओं के उत्थान और परिवर्तन के लिए जो कष्ट एंव परिश्रम डॉ.अंबेडकर ने सहे इस तुलना में अन्य किसी का नाम इतिहास में मिलना मुश्किल है ।

अम्बेडकरोत्तर भारतीय समाज में नारी का उत्पीड़न 

20 वी सदी के मध्य में डॉ. अंबेडकर के  गुजर जाने के बाद 21 वी सदी का आधुनिक समाज में  परिवार के भीतर स्त्री का उत्पीड़न आज भी मौजूद है । विश्व में पहला महिला मुक्ति का मेनिफिस्टो देने वाली मेरी वॉलस्टोनक्राफ्ट और बाद में बेट्टी फ्रेडेन वैश्विक जगत को महिला सशक्तीकरण  की  स्रोत रही । पर डॉ.अंबेडकर गुजरने के बाद के भारतीय परिदृश्य में महिला सशक्तीकरण का आंदोलन धीमी गति से प्रगति पर रहते दिखता है । अम्बेडकरोत्तर सामाजिक, आर्थिक एंव सांस्कृतिक बदलाव  के संबंध में एम.बी. फुलर कि रचना ‘द रोम्स ऑफ इंडियन विमेजहुड’ में वह लिखती हैं कि “पर्दे के पीछे क्या होता है यह भारत में बहुत थोड़े लोगों को मालूम होता है उसके अनुसार, भारतीय समाज `सुधारक भी स्त्री की वास्तविक स्थिति से अनभिज्ञ थे ।” भारतीय स्त्रियों  की गहराई का एहसास नहीं था जिससे वे उस समय थी । अमानवीय अत्याचार सहन  करने के बावजूद स्त्रियाँ समाज के सामने अपना दुख-दर्द रखने के लिए तैयार नहीं होती क्योंकि दूसरों के सामने अपने घर परिवार की तौहीन कर अपनी प्रतिष्ठा कम करने का भय रहता था ।

आधुनिक तकनीकी विकास ने भी स्त्री, दमन, शोषण तथा उसके विरुद्ध हिंसा को बढ़ावा दिया है । मसलन भ्रूणहत्या को बढ़ावा मिला (हालांकि विदेशों में भ्रूण परीक्षण विकलांगता जानने के लिए किए जाते है) है । इसका ताजा उदाहरण जनगणना 2011 के अनुसार हरियाणा में सेक्स रेशियो , 1000:861  है । यही हजार पुरुषों के पीछे 861 स्त्री मतलब भ्रूणहत्या और अन्य कारणों से 139 स्त्रियों की कमी हुई है  । लिहाजा यह कि सामाजिक संतुलन बनाएँ रखने में राष्ट्र नीति मुश्किल में है ।
स्त्रीवादी आंबेडकर की खोज
अंबेडकरोत्तर काल में स्त्री सशक्तीकरण की अवधारणा पुरानी होती नजर आ रही है । हमें एक लोकतन्त्र ढंग से इस समस्याओं का निराकरण करना होगा, जैसे एक लोकतन्त्र में सत्ताधारक पक्ष उतना ही महत्त्वपूर्ण होता है, जितना विरोधी पक्ष  इस लिहाज से जो तत्व हमने राजनीतिक मानवता से सम्पूर्ण देश को दिए है, वह तत्व अगर हम व्यावहारिकता में भी चलाने में कामयाब  होते तो शायद समस्या न होती । सरकारी तंत्र प्रणाली की  कोशिशों के बावजूद सही मात्रा में सफल नहीं हो पाये हम ।

अंबेडकरोत्तर काल में पुरुष इस सत्य को हमेशा झुठलाता रहा है की समाज की उन्नति और निर्माण में नर और नारी समान रूप से सहभागी है । इस संदर्भ में पूर्व राष्ट्रपति के.आर. नारायण महिलाओं पर अत्याचार अपने क्रूरतम रूप में जारी है और महिलाओं तथा दलितों के साथ भेदभाव उन्हे प्रजातन्त्र के अधिकार से जुदा करने जैसा है । स्त्रियों  के लिए आत्मनिर्भरता कोई हर समस्या का समाधान या हर मर्ज की दवा नहीं लेकिन परंपरा से हटकर जीवन गुजरने के रास्ते को सरल जरूर बनाती है । व्यक्तित्व को गंभीर जोखिम उठाने के लायक जरूर बनाती है । टूटने के स्थिति में जीवन को खो देने के दर्दनाक अहसास से बचाकर विकल्प की मानसिकता जरूर विकसित करती है । परंपरा या रिवाज के खिलाफ जाकर सहजीवन को भी जीने के लिए औरतों का अपने ऊपर निर्भर होना सबसे जरूरी शर्त हो जाती है ।

स्वतन्त्रता की अवधारणा ऐसे संबंध प्रारूप में अंतर्निहित है । इसलिए स्वतन्त्रता को जोखिम को झेलने का साहस भी हमेशा समेटकर रखना पड़ता है । यह सुकून का विषय है की अंबेडकरोत्तर भारत में महिलाओं का सम्मानजनक स्थान  सुनिश्चित करने के उद्देश्य से कई स्त्री हितकारी योजनाए सरकार ने आरंभ की है ।

अंतत: डॉ.बाबासाहेब अंबेडकर के अवलोकन में स्त्री-प्रश्न भारत में किसी भी दूसरे विकसित या पिछड़े मुल्क की तुलना में अधिक जटिल था । यह जटिलता परिवार, समाज, संस्कृति, कानून, रोजगार हर स्थल पर सैकडों रूपों में मौजूद था । वह समझते थे कि इस जटिलता को नजरंदाज करना देश के आधी आबादी के लिए नई गुलामी की बेड़ियाँ गाड़ने वाला जैसा था ।  उनका दावा था कि इस विशाल और जटिल देश में स्त्रियॉं के संघर्ष कहीं गहरे है । इन संघर्षों की संस्कृतिक जमीन को पुख्ता करना स्त्री-स्वतन्त्रता की प्राथमिक और अनिवार्य शर्त है । उनकी दृष्टि में स्त्रियॉं की गुलामी और प्रताड़ना की कुंठा के साथ नहीं , बल्कि अपने इतिहास की इस पूरी गरिमा के साथ उन्हे समता का एक नया दावा प्रस्तुत करने का एक अवसर देने से था ।

संदर्भसूची :
1. लर्नर, ग. (1986). द क्रिएशन ऑफ़ पैट्रिआर्की
2. मिल, जॉ. स. (1969). सब्जेक्शन ऑफ़ वीमेन
3. स्टेट ऑफ़ वीमेन कमिटी रिपोर्ट 
4. डॉ. अम्बेडकर द्वारा 4 ऑगस्ट 1013 को जमादार को न्यूयार्क से पत्र 
5. बागुल, बा. (1963). जेव्हा मी जात चोरली होती (When I had Concealed My Caste). अक्षर प्रकाशन.
6. फुलर एम्. बी.(1900) द रॉंग ऑफ़ इंडियन वीमेनहुड. रेवेल्ल : न्यूयार्क
7. जनगणना 2011

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ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया

प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका  (गजल,ठुमरी,दादरा ) बेगम अख्तर के जयंती पर विशेष 
प्रियंका 
अख्तरीबाई जब अपनी शोहरत की बुलंदियों पर थीं, तब उन्हें लखनऊ के एक जाने माने  वकील इश्तियाक अहमद अब्बासी से मोहब्बत हो गयी,यह मोहब्बत एकतरफा नहीं रही, लेकिन शादी इस शर्त पर तय हुई कि उन्हें गाना छोड़ना पड़ेगा ।इश्क के लिए यह बड़ी कीमत मांगी गयी थी, जिसे अख्तरीबाई ने स्वीकार कर लिया था ।1945 में उनकी शादी हुई और इसके बाद से ही वे बेगम अख्तर कहलाने लगीं ।

सिगरेट की बुरी लत ने बेगम अख्तर को फेफड़े की बीमारी तो दी ही थी, इसके साथ ही शादी के बाद उनकी छूट चुकी गायकी और माँ के देहांत से मिले सदमे ने उन्हें अवसाद की ओर भी धकेल दिया। अपनी माँ से उनका जुड़ाव बहुत गहरा था। मैं मानती हूँ कि गायकी से भी उनका जुड़ाव उतना ही गहरा था, लेकिन मानवीय सम्बंधों और संवेदनाओं को वे गायकी से भी बहुत अधिक महत्व देती थीं । लगभग चार वर्षों तक गायन से दूर रहने के बाद, अवसाद के दिनों में जब उन्हें एक डॉक्टर के पास ले जाया गया, तब डॉक्टर ने गायकी से उनकी जबरन बनायी गयी दूरी को अवसाद के एक बड़े कारण के रूप में पहचाना और अब्बासी साहब से कहा कि उन्हें अवसाद से बाहर लाने का एक ही रास्ता है कि उन्हें फिर से गाने दिया जाए। महफिलों में तो नहीं लेकिन बेगम को आकाशवाणी के लखनऊ केन्द्र में गाने की इजाज़त मिल गयी। गायन के फिर से शुरू हुए इस सिलसिले ने उन्हें अवसाद से बाहर आने में बहुत मदद की।

मोहब्बत और शादियों से जुड़ी शर्तें और समझौते न जाने कितनी औरतों की जिंदगी में अवसाद भरते रहे हैं। मोहब्बत या शादी के एवज में किसी औरत की ख़ास पहचान याउसके व्यक्तिव के मूल में मौजूद विशेषता को ही खत्म कर देने की शर्ते, कोई किस तरह रख सकता है!कई संभावनाशील और प्रतिष्ठित अभिनेत्रियों को उनके पतियों ने शादी के बाद अभिनय से दूर कर दिया। कई  स्पोर्ट्स वुमन के प्रदर्शनों से प्रभावित प्रेमियों ने उनसे इस शर्त पर ही शादी की कि वे बहुत खेल चुकीं, अब सिर्फ परिवार चलाने पर ध्यान देंगी। इसी तरह शिक्षा और कौशल के क्षेत्र में बहुत प्रतिभा सम्पन्न रही लड़कियों से ब्याह करते हुए यह शर्त रखी गयी कि वे नौकरियों या व्यवसाय में नहीं जाएँगी। यह वैसा ही है जैसे जिस विशेषता से हम प्रभावित हों, उसे ही नष्ट करने पर तुल जाएँ,कि जिससे हम प्यार करें, उसे ही ख़त्मकर देने पर आमदा हो जाएँ!

बेगम अख्तर की गायकी के छूटने और उनके अवसाद में चले जाने से अकेले उन्हीं का नुकसान होना था, ऐसा नहीं है । फर्ज़ करिए कि उन्होंने 1945 के बाद गाया ही नहीं होता तो आज उनके गाने के कई बेहतरीन रिकॉर्ड से हम और हमारी सांस्कृतिक विरासतवंचित ही रह जाते  ।इसी तरह जब किसी भी कुशल और प्रतिभाशाली स्त्री को विवाह संस्था, प्रतिष्ठा वगैरह की दुहाई देकर घर तक सीमित कर दिया जाता है, तो वह स्त्री जितना अधिक घाटा उठाती है, उससे भी कहीं अधिक घाटा यह समाज उठाता है, जो संभावित उपल्ब्धियों और बेहतरी से बुरी तरह चूक जाता है।


शोधार्थी, हिंदी विभाग
हैदराबाद विश्वविद्यालय




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