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हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन में महिला कलाकारों का योगदान

राकेश कलोत्तरा


पी.एच.डी. शोधार्थी,संगीत विभाग,दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली . सम्पर्क:  rakeshkalotra21@gmail.comमो. 9717655412

भारतीय शास्त्रीय संगीत का इतिहास वैदिक काल से ही माना जाता है. मानव और संगीत का इतना गहरा संबंध है ,जो उसके जन्म के साथ ही चला आ रहा है. प्राचीन साहित्य के उल्लेखों को देखतें हुए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि जहां तक धार्मिक अवसर का संबंध था ब्राह्मण एवं क्षत्रिय दोनों वर्ग अपने जातिगत धर्म के अनुसार यज्ञादि में भाग लेते थे. यज्ञ में धार्मिक संस्कारों पर कन्याओं एवं यजमानों की पत्नियों का संगीत से संबंध प्राप्त होता है. साम-गायन जैसे धार्मिक अवसर तथा अन्य यज्ञ एवं धार्मिक संस्कारों के अवसरों से लेकर सामाजिक अवसरों तक में स्त्रियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है .महाव्रत यज्ञ इत्यादि के अवसर पर साम गायक पुरुषों के साथ–साथ उनकी स्त्रियाँ गायन-वादन करती थीं. दास कुमारियों द्वारा नृत्य तथा  गाथाओं का गायन किया जाता था. संगीत संबंधी सभी अवसरों पर महिलाओं का विशेष सहयोग रहता था. ऋग्वेद में स्त्रियों के गायन और नृत्य की चर्चा गई है.

‘शतपथब्राह्मण’ तैत्तिरीय संहिता’ आदि में भी साम-गान स्त्रियों का विशेष कार्य माना गया तथा उस समय भी संगीत स्त्रियों का विशिष्ट गुण माना जाता था. महाभारत काल में भी स्त्रियों की संगीत में विशेष भूमिका रही है. जिसमें क्षत्रिय वर्ग की स्त्रियों द्वारा विराट पर्व में नृत्य कला की प्रस्तुतियाँ एवं ब्राह्मण कुल की स्त्रियों के साम गायन आदि के उल्लेख मिलतें हैं. देवगंधर्वो के साथ साथ मेनका, रंभा आदि अप्सराओं के नृत्य कारामायण काल में भी उल्लेख मिलता है| अनेक प्रकार के उत्सवों में स्त्रियों द्वारा गायन-वादन तथा नृत्य के कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते थे. महाभारत युग में भी संगीत स्त्रियों के लिए निषिद्ध नहीं था.


हरिवंश पुराण’ में ऐसा उल्लेख मिलता है कि यादवों का अत्यंत प्रिय गान छालिक्य गान था. विष्णु पर्व में ऐसापाया जाता है कि महाराजा अग्रसेन ने अपना राज्य-भार वसुदेव को सौंप कर श्री कृष्ण और यादवों के साथसमुद्र-यात्रा की थी. जिसमें सत्यभामा,रेवती के आलावा सोला सौ रमणियां भी श्री कृष्ण के साथ थीं औरयादवों ने अपनी पत्नियों को भी साथ लिया था. क्रीड़ा के समय विभिन्न नृत्य गीतों का आयोजन हुआ था. इसके लिये अप्सरा आदि नर्तकियां भी साथ थीं. इन अप्सराओं ने नृत्य, गीत,वाद्य में अपना योगदान दिया और नर्तकी रंभा ने असारित नृत्य के बाद अपने नृत्य से सबको विमुग्ध कर दिया था. यह उल्लेखनीय है कि प्रथम और द्वितीय शताब्दी में कई नट-नटिनियों की मूर्तियाँ मिलती हैं, जिससे यह प्रमाणित होता है कि उस कल में भी गीत, वाद्य, नृत्य आदि में महिलाओं का योगदान था. इस प्रकार की मूर्तियाँ हमें हिन्दू मंदिरों व बुद्ध विहारों में भी मिलती हैं. मुगलकाल के मोहम्मद शाह रंगीले के दरबार में गायिकाएं और नर्तकियां गायन, वादन, नृत्य और शास्त्र की विधिवत शिक्षा ग्रहण करतीं थीं. रामपुर की सदारंग परम्परा के प्रतिनधि आचार्य बृहस्पति के अनुसार मुगलकाल में अकबर के राज्य के समय में संगीत का उत्कर्ष चरम पर था. उनके दरबार में कई संगीतज्ञ थे, जिनमें तानसेन का नाम विशेष उल्लेखनीय है. तानसेन की पुत्री सरस्वती बड़ी कलाकार हुई जिसका विवाह मिश्री सिंह (नौबत खां) के साथ हुआ.



इसी काल में ग्वालियर घराना अपनी अष्टांग गायकी के लिये प्रसिद्ध रहा है. इस घराने की शिष्य परम्परा बहुत
बड़ी है. अन्य सभी संगीत घरानों का उद्गम भी इसी घराने से मन जाता है. इस घराने के काशीनाथ बुवा की
शिष्या सुशीला मराठे, बलदेव जी बुवा की शिष्या डॉ. सुमति मुटाटकर, गजानन बुवा जोशी की शिष्या मांजरेकर, पंडित ओंकारनाथ ठाकुर की शिष्या बिजनवाल, विनायक राव पटवर्धन की शिष्या कमल केलकर,कालिंदी केलकर एवं सुनंदा पटनायक, बलवंत राय भट्ट की शिष्या सुभद्रा चौधरी. पंडित गोविन्द राव राजुरकर की शिष्या मालिनी राजुरकर, पंडित कुमार गंधर्व की पत्नी वसुंधरा कोमकाली एवं शिष्या मीरा राव, पंडितशंकर राव बोडस  की पुत्री एवं शिष्या वीणा सहस्त्रबुद्धे, लक्ष्मण पंडित की शिष्या चित्रा चक्रवर्ती तथा आशालता करल्गीकर के नाम उल्लेखनीय हैं. इन गायिकाओं ने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन में अच्छी ख्याति आर्जित की. हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के इतिहास के बारे में चर्चा की जाये तो इस क्षेत्र में अनेक महान विदुषी गायिकाएं हुई हैं. जिन्होंने शास्त्रीय संगीत को विकसित किया. इतिहास का कोई कालखंड ऐसा नहीं है जब महिलाओं ने अपनी कलाप्रियता एवं सृजन कौशल का परिचय न दिया हो. स्त्री और कला एक दूसरे की पर्यावाची हैं. स्त्री सृष्टि की वह सुंदर रचना है  जिसका संबंध ललित कलाओं से होना स्वाभाविक है. अर्थात गायन-वादन और नृत्य के गुण उसमें स्वभावतः पाये जाते हैं. गायन के क्षेत्र में महिला कलाकारों ने क्रियात्मक संगीत के साथ-साथ नित्य नवीन रागों का निर्माण एवं गायन शैलियों में नये जोड़ का समावेश कर अपनी सृजनात्मक प्रतिभा को अनन्त विस्तार दिया है.

इन महान गायिकाओं की निरंतर कठोर साधना, रियाज़, शिक्षातथा जिस लगन के साथ इस कला को उन्होंने अपनाया है उसे देखकर हम उनकेसामने नतमस्तक हो जाते हैं.हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की अनमोल गायन परम्परा को आधुनिक काल में भी अनेक संगीत साधिकाओं ने अपनी योग्यता और सृजन क्षमता से भारतीय संगीत को अति उच्च स्थान पर पहुँचाया है. इनमें प्रमुख नाम हैं-सुश्री केसरबाई केरकर, किराना घराने की गान कोकिला हिराबाई बडोदेकर, जयपुर घराने की गायिका मोगुबाई कुर्डीकर, मल्लिका-ए- ग़ज़ल बेग़म अख्तर, गंगूबाई हंगल, डॉ. प्रभा आत्रे, गान सरस्वती किशोरीअमोनकर, शोभा गुर्टू, मालिनी राजुरकर, परवीन सुलताना और सुगम संगीत की अलौकिक आवाज़ की गायिका लता मंगेशकर आदि हिन्दुस्तानी संगीत के जगमगाते सितारे हैं. इन सब गायिकाओं ने अपने जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए अपनी लगन तथा मेहनत से गायिकी में अपने आपको निपुण बनाने के लिए कठोर साधना की और शास्त्रीय गायन की समृद्ध परम्परा को आगे बढ़ाने में विशिष्ट भूमिका निभायी.

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“रूह कंपाने वाली यात्रा–डायरी”

चैताली सिन्हा 


शोधार्थी – जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, भारतीय भाषा केंद्र
(हिंदी विभाग) . सम्पर्क:  .chaitalisinha4u@gmail.com


‘बनमाली गो तुमि पर जनमे होइयो राधा’
बांगला में गाया जानेवाला यह बाउल गीत बंगाली समाज में बहुत प्रचलित एवं कृष्ण को उलाहना देने के संदर्भ में है. बनमाली अर्थात् कृष्ण को राधा बनने और राधा के माध्यम से एक स्त्री के दर्द या स्त्री मन को समझने की ओर संकेत किया गया है. जिस प्रकार कृष्ण राधा को जीवनभर एक प्रेमिका ही बनाकर रखे और शायद कभी राधा की पीड़ा को नहीं समझ सके ठीक उसी प्रकार जब आप इस यात्रा डायरी को पढेंगे तो आप भी आश्चर्यचकित रह जाएंगे कि अंततः इस शीर्षक का कितना गहरा अर्थ है, जो अपने शीर्षक के अर्थ को सार्थक करती नज़र आती है. अक्सर हम एक ही स्थान पर रहते – रहते ऊबने और छटपटाने लगते हैं और हमें उस स्थान की हर चीज़ बुरी लगने लगती है, और एकबारगी को मन ऐसा भी होने लगता है कि बस यहाँ से दूर बहुत दूर किसी अनजान जगह पर जाकर सुख और चैन के दिन बिताएं ! परन्तु जब आप इस यात्रा डायरी को पढेंगे, उसी क्षण आपका मोहभंग और उस अनजान जगह जाने का सपना दिल से निकल जाएगा . ठीक उसी तरह जिस तरह की एक कहावत हमारे देश में प्रचलित है – “दूर के ढोल सुहावने होते हैं .” कहने का तात्पर्य वह नहीं जो अबतक आप समझ रहे थे, बल्कि वह जो अब आप समझ सकेंगे . इस ‘यात्रा’ को पढ़ते हुए भारत से इतर उन तमाम देशों में घटित होनेवाली ऐसी मार्मिक और रोंगटे खड़े कर देने वाली घटनाएं जिनके बारे में सुनकर और सोचकर कलेजा मुँह को आ जाता है . कल्पना मात्र से शरीर का पोर-पोर एक भयानक टीस का अनुभव करने लगता है. इसे पढ़ते हुए मन और शरीर के भीतर जो कोलाहल मची हुई थी उसे शब्दों में बयाँ करना बहुत-बहुत मुश्किल है . दिल्ली से आरम्भ होकर कब यह बोस्निया एवं क्रोएशिया की भावभूमि पर ठहर जाती है, पता ही नहीं चलता . सीमोन द बोउआर से आरम्भ होकर कब क्रोएशियन हाइकू कवि तोमिस्लाव मारेतिच तक पहुँच जाते हैं इसका भी ज्ञान बहुत बाद में होने लगता है. यूरोप की यात्रा करना किसे प्रिय नहीं होगा, यहाँ तक कि विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर को भी प्रिय लगा होगा परन्तु इसी यात्रा के दौरान जो रचनाकार अपना अनुभव संसार उठा लाते हैं वह अद्भुत, रहस्यमय,अद्वितीय एवं अतुलनीय होते हैं. इस यात्रा डायरी में तमाम ऐसी घटनाएं उद्धृत की गई हैं जो साक्ष्य एवं आंकड़े सहित हैं. रचनाकार जब कुछ लिखते हैं तो तथ्यों सहित लिखते हैं, जिससे उनकी तटस्थता का आभास होता है. इतना ही नहीं बल्कि अपने अंतर्मन में न जाने कितने ही प्रश्नों के अंबार लगाए हुए वे अपनी घुमक्कड़ी प्रवृत्ति को अंजाम तक पहुंचाने को निकलते हैं. लिखने की सार्थकता पर विचार करते हुए गरिमा श्रीवास्तव एक बहुत बड़ा प्रश्न आज की उन युवापीढ़ी के बरक्स खड़ा करती नज़र आती हैं जब वह कहती हैं कि –“मेरे लिखने न लिखने से क्या फर्क पड़ता है . दुनिया में …………..किसी को जीवन पाथेय मिला .” (तद्भव/189). स्वयं के अनुभव से हम समाज को कितना कुछ दे सकते हैं, इस ओर भी इसका संकेत स्पष्ट है जहाँ वे अपनी बात भी टी.एस.इलियट के कथन से आरंभ करती हैं. यदि टी.एस.इलियट यह न कहते तो आज हमें भी यह वाक्य लेखिका के माध्यम से सुनने या पढने को नहीं मिलता – “डू आई डिस्टर्ब द यूनिवर्स .” परन्तु रचनाकार की घुमक्कड़ी प्रवृत्ति उन्हें विवश करते हैं अपने ही क़दमों से दुनिया को नाप लेने की . इस यात्रा डायरी को पढ़ते हुए सबसे पहला भ्रम तो यह टूटा कि अब तक जहाँ हम केवल अपनी डफली,अपना राग आलापते रहते थे, वह डफली इस यात्रा डायरी को पढ़ते हुए फट चुकी थी . यानी हमारी सीमित बुद्धि परिधि केवल भारतीय परिदृश्य तक ही फैली हुई होती है परन्तु यहाँ आप देश से ऊपर उठकर विश्व फ़लक में पहुँच जाते हैं और न केवल भारत देश में स्त्रियों की मार्मिक दशा का आपको ज्ञान होता है बल्कि विश्व की प्रायः प्रत्येक भूमि स्त्री पीड़ा की गाथा सुनाती नज़र आती है. आधी-आबादी कही जानेवाली स्त्री वास्तव में कितनी आधी-अधूरी और हीन भाव से देखी और समझी जाती है इसकी जानकारी हमें इस यात्रा डायरी से होने लगता है.

 प्रथम विश्वयुद्ध से लेकर द्वितीय विश्वयुद्ध तक जितने भी देशों ने एक-दुसरे देशों पर विजय पताका फहराई वहां हर पराजित देश ने न केवल अपना साम्राज्य खोया बल्कि वस्तुओं के साथ-साथ स्त्री अस्मिता को भी खाया, लूटा . क्या कारण है कि जिस उद्देश्य से युद्ध लड़ा जाता है वह उद्देश्य वहां की केंद्रबिंदु से हटकर स्त्री शोषण पर केन्द्रित हो जाती है? युद्ध में स्त्री अस्मिता का लूटा जाना क्या इस ओर संकेत नहीं कि आज भी स्त्री देह मात्र एक संपत्ति समझी जाती है. स्त्री देह ही स्त्री की दीन-हीन दशा का कारण है. तो क्या आधी आबादी कहा जानेवाला यह वेद वाक्य थोथा साबित नहीं हो जाता? और कितना समय अभी बाक़ी है स्त्री को मनुष्य समझने में? उसे मानव श्रेणी में रखने में? रचनाकार इस यात्रा में तमाम ऐसे आंकड़े बताती नज़र आती हैं जहाँ स्त्री का शोषण सर्व सैन्यों द्वारा बड़ा ही क्रूरता एवं वहशियाना तरीके से किया गया था – “सन 1992-95 के दौरान क्रोएशिया, बोस्निया, हर्जेगोविना में जो स्त्रियाँ सर्व सेनाओं के दमन का शिकार हुईं, लिली उनमें से एक है. युद्ध के दौरान बलात्कार, यौन हिंसा के हज़ारों मामले सामने आए कुछ मामले सरकारी फाइलों में दब गए,कुछ भुला दिए गए और कुछ शिकायतें वापस ले ली गयीं .” वहीं प्रथम विश्वयुद्ध एवं द्वितीय विश्वयुद्ध में कई देशों में सैन्य और अर्धसैन्य बलों ने सामूहिक बलात्कार की अनगिनत घटनाओं को अंजाम दिया . “प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान बेल्जियम और रशिया औरतों के लिए सामूहिक मरणस्थली बने, वहीं   कोरिया,चीन,फिलीपींस और जर्मनी में बड़े पैमाने पर स्त्रियों को घर्षित किया गया .” (तद्भव;पृ.200).सदियों से कुचली गई स्त्री अस्मिता का इतना भयानक एवं वीभत्स रूप देखकर आज स्त्री विमर्श की बात करना बेमानी सा लगता है. कौन-सी ऐसी मिट्टी है इस जहाँ में, जहाँ औरत को नंगा न किया गया हो? उसकी लुटी-पिटी अस्मिता में भी रस न लिया गया हो? मरकर फ़िर से मरने का मर्म केवल स्त्री समझती है, वह पितृसत्ता समाज नहीं जो आज स्त्री विमर्श जैसे शब्द से परहेज़ करता नज़र आता है.



अफ्गानिस्तान,अल्जीरिया,अर्जेन्टीना,बांग्लादेश,ब्राज़ील,बोस्निया,क्रोएशिया,सर्बिया आदि ऐसे अनेक देशों की लम्बी सूची है – जहाँ यौन हिंसा और स्त्री घर्षण की घटनाएं हुईं और बड़े-बड़े भाषणों,राजनैतिक समझौतों के बीच प्रतिरोधी आवाजें दबा दी गयीं . युद्ध के दौरान स्त्री का बलात्कार होना एक बड़ा प्रश्न यह खड़ा करता है कि क्या स्त्री पूरे परिवार के साथ-साथ उस समाज की धूरी का भी प्रतिनिधित्व नहीं करता ? जिसको विजित करने के लिए सर्वप्रथम उस परिवार या समाज की स्त्री को टारगेट किया जाता है. लेखिका के अनुसार सन 1991-1995 के दौरान सर्ब सैनिकों ने सैन्य कैम्पों, होटलों, वेश्यालयों में बड़े पैमाने पर यौन हिंसा के सार्वजनिक प्रदर्शन किए . बोस्निया और हर्जेगोविना पर जब तक सर्बिया का कब्जा रहा, किसी उम्र की कोई स्त्री ऐसी नहीं बची, जिसका शोषण  या बलात्कार न किया गया हो . इसी तरह इस यात्रा डायरी में लेखिका ने न जाने कितने ही ब्यौरे क्रमवार से हमारे समक्ष प्रस्तुत किए हैं,जिन्हें पढ़कर मन बजबजा जाता है और दुःख एवं आक्रोश से भर उठता है. फिर चाहे वह बांग्लादेशी स्त्रियों का पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा किया गया घर्षण हो या युगांडा के सिविल वार और ईरान में स्त्रियों से ज़बरदस्ती यौन संबंध बनाने की घटना ? या फिर चीन के नानकिंग में जापानी सेना द्वारा स्त्रियों का सामूहिक यौन उत्पीड़न आदि . विकसित एवं प्रगतिशील कहे जाने वाले देशों में भी स्त्री के साथ इतना क्रूर व्यवहार होना संभव हो पाया है इससे बड़ा आश्चर्य और कुछ नहीं हो सकता . भूमंडलीकरण का दौर नया नहीं है,आज विश्वबंधुत्व की परिकल्पना भी नयी नहीं है बल्कि बीसवीं सदी में ही इसका शोर ज़ोर पकड़ चुका था . कहने का अर्थ यह है कि यदि विकसित देशों में भी स्त्री की इतनी भयावह स्थिति रह चुकी है तो विकासशील कहे जानेवाले देश (भारत) की स्थिति का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है. परन्तु एक सच्चाई यह भी है जिस ओर लेखिका ने इशारा किया है कि इन देशों में किस क़दर बेरोजगारी एवं गरीबी है. जिसका आधार है ख़राब अर्थव्यवस्था .  इतनी ग़रीबी एवं बेरोज़गारी की समस्या कि छात्रों को अपने जेब खर्च हेतु दिहाड़ी पर काम करना पड़ता है, वह भी एक सीमित सीमा एवं ऋतु में . परन्तु यहाँ एक दूसरा तथ्य हमारे समक्ष यह भी है कि वहां के बाज़ारों में उत्पाद तो है परन्तु उपभोक्ता (क्रेता) वर्ग की कभी है. तुर्केबाना का ज़िक्र करते हुए लेखिका बताती हैं कि – “बाज़ार है,खरीददार नहीं . बड़ी – बड़ी दुकानें, जिनमें जूते की दुकानें बहुतायत में हैं,वे वीरान हैं. सामान है, सजावट  भी…..खरीदने वालों से निहारने वालों की संख्या कई गुना ज़्यादा है. आम-आदमी की क्रयशक्ति कमज़ोर हो चली ही . छात्र-छात्राएं ‘सेल’ के मौसम की प्रतीक्षा करते हैं.” (पृ.193).

इसी संदर्भ में आगे जाग्रेब के ‘सेकेण्ड हैण्ड’ मार्केट का ज़िक्र हमें मिलता है जहाँ की तुलना हम दिल्ली की ‘सरोजिनी’ अथवा ‘करोलबाग़’ मार्केट से कर सकते हैं. दिखावे की संस्कृति केवल भारत में ही नहीं जाग्रेब जैसे देशों में भी देखने को मिलती है. जहाँ खरीदारों की भीड़ दिल्ली के फुटकर विक्रेताओं की तरह लगी रहती है. एक बार प्रयोग में लाए जा चुके वस्तुओं को पुनः प्रयोग में लाने का प्रचलन, वह भी बड़े सस्ते एवं चाव से . यह ‘सो कॉल्ड शो ऑफ़ कल्चर’ ही तो है! यहाँ देखनेवाली बात यह है कि प्रवास में रहकर या घूम कर ही आप अपने देश के साथ साम्यता और वैसम्यता का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं. इस यात्रा डायरी में आप पाएंगे कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर का यूरोपीय देशों में उस समय यानी सन 1926 से ही कितना प्रभाव पड़ चुका था कि उनकी ‘गीतांजलि’ को लोग साहित्यिक कृति के रुप में सराहने लगे थे . सन 1926 में रवीन्द्रनाथ ठाकुर जाग्रेब गए और वहां से ‘रिएका’ का दौरा भी किया . लेखिका बताती हैं कि – “दार्शनिक पावाओ वुक पाब्लोविच (1894-1976) ने ‘गीतांजलि’ का क्रोएशियन में अनुवाद किया था जो जाग्रेब के दैनिक ‘भोर का पत्ता’ में 1914 की जानकारी में धारावाहिक रूप में छपा था . बाद में पावाओ ने ‘चित्रा’, ‘मालिनी’ और ‘राजा’ का भी अनुवाद किया . ‘चित्रा का मंचन ‘क्रोएशियन नेशनल थियेटर’ में 1915 में कई बार हुआ .” समय कितना मूल्यवान होता है इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि आज कवि गुरु न जाने कहाँ होंगे परन्तु उनकी साहित्यिक योगदान आनेवाली पीढ़ी तक भी याद रखेगी . मुझे याद नहीं कि निम्नलिखित पंक्तियाँ किसकी है, परन्तु इतना याद है कि बचपन में मैं इसे अक्सर अपनी माँ और बड़ी माँ के मुँह से सुना करती थी –
“समय  चोलिया जाए, नोदिर स्रोतेर पांए                                                                                               जे जोन न बुझे तारे धिक्-शत-धिक् 
    बोलेछे सोनार घोड़ी (घड़ी),टिक-टिक-टिक
          जा किछु बाकी आछे कोरे फेलो ठीक
            बोलेछे सोनार घोड़ी टिक-टिक-टिक……….!”


संपूर्ण यात्रा डायरी स्त्री-यातना एवं उसकी करुण आहः और चीत्कार से भरा हुआ है. प्रायः हर देश का ज़िक्र मात्र ही है स्त्री दासता की कहानी, उसकी दयनीय दशा का चित्रण . यह यात्रा हमें उन देशों का सैर कराते हुए चलती हैं,जहाँ स्त्री को ग़ुलाम और यौन दासी बनाकर रखने का सिलसिला बहुत लम्बे समय तक चलता रहा . चाहे वह देश बोस्निया हो या हर्जेगोविना . इन दोनों देशों पर जब तक सर्बिया का कब्ज़ा रहा, किसी उम्र की कोई स्त्री ऐसी नहीं बची जिसका घर्षण या बलात्कार न किया गया हो . (पृ.203) इसका उदाहरण देख सकते हैं – “बोजैक बोस्नियाई विद्ध्यार्थी है, जो जाग्रेब में पढ़ता है, साथ ही कुछ रोजगार भी . उसकी उम्र पचास के ऊपर ही है, उसके सामने ही उसकी आठ वर्षीय बेटी और पत्नी को बार – बार घर्षित किया गया . बच्ची तीन दिन तक रक्त में डूबी रही, सैनिक उससे खेलते रहे,इस बीच कब उसने अंतिम सांस ली,पता नहीं .”
    

ओह! वाकई ‘लाइफ मस्ट गो ऑन’….……..! ऐसे ही न जाने कितनी हृदय विचलित कर देनेवाली घटनाओं का उल्लेख लेखिका ने इस यात्रा में किया है,जिसे पढ़ते ही आँखें शून्य और भीतर गहरे एक भयानक चीत्कार, हाहाकार से भर उठता है. दिल को यकीन दिलाना कठिन हो जाता है यह पढ़कर कि किस तरह का क्रूर एवं अमानवीय व्यवहार सर्ब सैनिकों द्वारा मुस्लिम स्कूली लड़कियों के साथ किया गया . किस प्रकार यौन हिंसा एवं उन्हें ग़ुलाम बनाकर रखा जाता था . नस्लीय एवं जातीय भेद का कडुवा अनुभव यहाँ पढने को मिलता है. बोस्नियाई बच्चियों के साथ जो दुर्व्यवहार सैनिकों द्वारा किया गया उसे पढ़कर वाकई कभी – कभी यह एहसास होने लगा था कि एक औरत के साथ इससे बदतर और कुछ हो ही नहीं सकता . इन घटनाओं को पढ़ते हुए ऐसा अनुभव हुआ कि स्त्री न केवल अपने देश में बल्कि वैश्विक धरातल पर भी कितनी कुचली एवं प्रताड़ित की जाती रही है. इस पूरे यात्रा वृतांत से एक बात हमें यह भी जानने को मिलती है कि लेखिका का भाषा पर ज़बरदस्त अधिकार है, जो स्थान विशेष पर बोली जानेवाली भाषा का प्रयोग करती जान पड़ती हैं . दिल्ली की खड़ी बोली से शुरू होकर कोलकाता की बांगला,बिहार की भोजपुरी,अंग्रेजी,बोस्निया,क्रोआतिन (क्रोएशियाई) और न जाने क्या – क्या . यह एक ख़ास विद्वता है जो प्रतिभाशाली व्यक्तित्व की पहचान है. जब हम क्रोएशिया की बात करते हैं तो वहां की भयावह स्थिति का ज्ञान होता है जहाँ लेखिका इस यात्रा डायरी में बतातीं हैं कि असल में क्रोएशिया का इतिहास युद्ध का इतिहास है. सन 1991 तक संयुक्त युगोस्लाविया का अंग रहा क्रोएशिया अपने भीतर युद्ध की अनगिनत कहानियों को लिए मौन है.

स्लोवेनिया,हंगरी,सर्बिया,बोस्निया,हर्जेगोविना और मांटेग्रो से इसकी सीमाएं घिरी हैं. आज के 21,851 वर्ग मील में फैले क्रोएशिया ने एक तिहाई भूमि युद्ध में खो दी . लेखिका इसका उदाहरण प्रस्तुत करते हुए लिखतीं हैं –“भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् की ओर से क्रोएशिया के जाग्रेब विश्वविद्यालय में जब उन्हें अध्यापन के लिए भेजा गया तो पूर्वी यूरोप के इस भाग में युद्धोत्तर यूरोप के जीते-जागते साक्ष्यों से उनके सामने एक ऐसा चेहरा प्रस्तुत किया गया जो उनकी दैनन्दिनी का हिस्सा बना .” क्रोएशिया के संदर्भ में जो सबसे चौंकाने वाली बात लेखिका बताती हैं कि किस प्रकार यह सेक्स ट्रेफिकिंग के लिए पश्चिमी यूरोप के प्रमुख द्वार का काम करता है,जहाँ  स्लोवेनिया,बोस्निया और सर्बिया से औरतों,लड़कियों को आसानी से लाया जाता है. बहुत ही भयावह!
  



उपर्युक्त जानकारियाँ किसी भी सभ्य समाज एवं देश की संस्कृति के लिए सबक लेने जैसा कार्य हो सकता है, जहाँ एक ओर तो स्त्री को देवी एवं पूज्या बनाई जाती हैं और वहीं दूसरी ओर उसी स्त्री की अस्मिता की चिंदी-चिंदी उड़ाई जाती है. उसे केवल मात्र एक देह एवं भोग्या समझकर उसका दलन किया जाता है. जिस स्त्री के सम्मान मात्र से देवता  के वास होने के वेद-वाक्य कहे गए हैं वहीं स्त्री का केवल और केवल अपमान एवं शोषण होता दिखाई देता है. उसे मानव समझने में जब तक समाज सक्षम नहीं होगा, तब तक स्त्री अस्मिता लुटती रहेगी . )
“फिर भी कहते हो कह डालूं, दुर्बलता अपनी बीती
                 तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे यह गागर रीति .”

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महिला सरपंच : संप्रभुता का सवाल (प्राथमिक डाटा के आधार पर महिला सरपंचों की वास्तविक स्थिति का अध्ययन)

शंभु गुप्त / अस्मिता राजुरकर

भूमिका :
भारत गणराज्य के महाराष्ट्र राज्य में पंचायती राज्य विधेयक 1992 के तहत ग्रामपंचायतों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त है। इसमें सरपंच तथा ग्राम पंचायत समिति सदस्य दोनों पदों पर महिलाओं को आरक्षण प्राप्त है।

उक्त आरक्षण के तहत समस्त ग्राम पंचायतों के सरपंचों की कुल संख्या का आधा हिस्सा महिला सरपंच है। गत कई वर्षों से हम वर्धा जिले की कुछ तहसीलों की ग्राम पंचायतों की महिला सरपंचों का एक व्यापक प्रश्नावली के तहत अध्ययन कर रहे हैं। इस प्रश्नावली में जाति तथा वर्ग के अतिरिक्त जेंडरगत दृष्टि को सर्वेक्षणात्मक अध्ययन का आधार बनाया गया है। महिला सरपंचों की सामाजिक और  राजनीतिक के साथ-साथ व्यक्तिगत जेंडरगत अस्मिता का परिप्रेक्ष्य प्रधानता के साथ लिया गया है।

प्रस्तुत आलेख में हमने वर्धा जिले की वर्धा तहसील की बोरगांव (मेघे) ग्राम पंचायत की महिला सरपंच योगिता देवढे के साथ कई बैठकों (06 जुलाई, 2017, 18 जुलाई, 2017 तथा 27 जुलाई, 2017) में पूरी हुई लंबी बातचीत में प्रमुखता के साथ उभरकर सामने आए मुद्दों को उजागर किया है। इस आलेख में पहले इस बातचीत में उभरे प्रमुख मुद्दों की चर्चा होगी तथा उसके बाद इस साक्षात्कार के संपादित अंश प्रस्तुत किए जाएंगें।

सुश्री योगिता देवढे न केवल अन्य सरपंचों (इनमें महिला सरपंच भी शामिल हैं) में अत्यधिक सक्रिय, कार्य-तत्पर तथा समर्पित महिला सरपंच हैं, बल्कि अपेक्षाकृत एक बड़ी ग्राम पंचायत (बोरगांव (मेघे) ) की महिला सरपंच हैं। इस ग्राम पंचायत में छः वार्ड हैं और कुल जनसंख्या तीस हजार से उपर है।

प्रस्तुत आलेख महाराष्ट्र राज्य की महिला सरपंचों संबंधी हमारे विस्तृत अध्ययन का एक बानगी-स्वरूप सर्वेक्षण है। योगिता देवढे से प्राप्त सूचनाएँ , आंकड़े, स्थिति-विवरण इत्यादि सामान्य रूप से इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि महाराष्ट्र राज्य में अधिकांश सक्रिय महिला सरपंच लगभग इन्हीं स्थितियों में कार्यरत हैं। योगिता देवढे के साथ लंबी बातचीत में जो तथ्य, मुद्दे, समस्याएँ, स्थितियाँ आदि उभरकर सामने आयी है, वे लगभग सर्वसामान्य स्थितियाँ हैं। (इस बातचीत में प्रो. शंभु गुप्त, डॉ. सर्वेश जैन, सुश्री अस्मिता राजुरकर शामिल थे)।

योगिता देवढे के सार्थ तीन बैठकों में हमारी आमने-सामने यह मौखिक बातचीत हुई, वह एक विस्तृत प्रश्नावली पर आधारित थी। बाद में योगिता जी से इन प्रश्नों के लिखित उत्तर भी लिए गए जो विस्तार के साथ मराठी में लिखकर उन्होंने हमें दिए।

साक्षात्कार की इस लंबी और व्यापक प्रक्रिया एवं प्रविधि के जो परिणाम हमें उपलब्ध हुए. उनका विवरण निम्नलिखित बिंदुओं के रूप में समेकित किया जा सकता है।

1. राजनीतिक सहभागिता एवं नेतृत्व का प्रश्न

हमारी साक्षात्कार अनुसूची के प्रथम नौ प्रश्न महिला नेतृत्व से संबंधित ही थे जिनमें हमने यह जानने की कोशिश की कि सरपंच बनने की इच्छा उनकी स्वयं अपनी थी या किसी और के कहने, किसी और की इच्छा के अनुसार उन्होंने सरपंच का चुनाव लड़ने का निश्चय किया था। इसी से जुड़ा हुआ दूसरा सवाल यह था कि क्या चुनाव के दौरान केवल उनका नाम चलाया गया था? क्या एक उम्मीदवार के रूप में वे स्वयं व्यक्तिगत तौर पर चुनाव प्रचार में सक्रिय थीं? चुनाव पंचार की रणनीति किसने बनायी? उसमें उनका खुद का कितना योगदान रहा? चुनाव प्रचार में इनकी उपस्थिति वास्तविक थी या प्रतीकात्मक-मात्र? चुनाव जीवने के बाद उसका श्रेय और स्वागत किसे दिया गया? इत्यादि।

इन सभी प्रश्नों के उत्तर के रूप में जो कुछ योगिता जी ने कहा उसका निष्कर्ष लगभग यही है कि उनकी स्वयं की इच्छा भी थी और उनके पिता, भाई, मामा आदि भी चाहते थे जिनकी सामाजिक कार्यों एवं राजनीति में पहले से सक्रियता थी। विशेषतः उनके पिता चाहते थे कि उनकी बेटी सरपंच बने।

वह आईएएस की पत्नी नहीं निर्वाचित मुखिया हैं, महिला-नेतृत्व की मिसाल

कह सकते हैं कि उन्हें अपने पितृ-परिवार की ओर से पूरा-पूरा सहयोग मिला किन्तु बाद में उनमें स्वयं भी सरपंच बनने की राजनैतिक इच्छाशक्ति जागृत हुई जो उनके चुनाव प्रचार कार्यक्रम, रणनीति, कार्य-विधि इत्यादि के रूप में उजागर हुई। उनकी बातचीत से स्पष्ट होता है कि चुनाव प्रचार के दौरान नेतृत्व उनके स्वयं के हाथ में था या उसे उन्होंने अधिकांशतः अपने स्वयं के हाथ में रखने की कोशीश की थी।

हालांकि 18 जुलाई, 2017 को उनके साथ हुई एक अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने मौजूदा राजनीतिक माहौल के अपराधी प्रवृतत्ति वाले लोगों से भरे होने की शिकायत की थी और बताया था कि आज राजनीति में अपराधी प्रवृत्ति हावी है। राजनीतिक हल्कों की भाषा उद्दंडता-भरी और गंदी हो गई है। इस तरह की भाषा में दक्ष होना मुझे अप्रिय था इसलिए कई बार राजनीति में आने का मन नहीं होता था।

चूँकि योगिताजी के मन में राजनीति में सक्रिय होने और सरपंची का चुनाव लड़ने और उसकी कमान अपने हाथ में रखने की आकांक्षा और अनुभव अर्जित हो गया था इसलिए जब चुनाव जीतकर वे आईं तो उन्हें यह ठीक ही लगा कि एक महिला राजनितिकर्मी के रूप में यह उनको अपनी ही जीत हुई है। हालांकि बातचीत में उन्होंने यह भी माना था कि चूँकि उनके पितृ-परिवार, पिता, भाई इत्यादि की सामाजिक सक्रियता के कारण एक व्यक्ति के रूप में गांव के लोग पहले से उन्हें जानते थे, अतः जब वो सरपंची का चुनाव लड़ीं तो लोगों ने उन्हें अपना ही समझा।

उक्त विवरण से यह स्पष्ट होता है कि जब तक महिलाओं को यह महसूस नहीं होगा कि एक व्यक्ति के रूप में राजनीतिक नेतृत्व की आकांक्षा वे अत्मसात कर सकती हैं तब तक रजनीति में उन्हें स्वायत्त पहचान नहीं मिल सकती। योगिता जी को यह पहचान इसलिए मिली कि उन्हें शीघ्र ही यह महसूस हो गया कि वे राजनीति में सहजसा के साथ आगे बढने की इच्छा रख सकती हैं।

2. पारिवारीक हस्तक्षेप एवं पारिवारीक दायित्व और राजनीतिक सक्रियता –

हमारी साक्षात्कार अनुसूची के अगले छः प्रश्न इस सन्दर्भ से जुड़े हुए थे कि सरपंच बनने के बाद एक स्त्री (पुत्री, पत्नी एवं माँ) के रूप में उनके दायित्वों में क्या बदलाव आया? उनके राजनैतिक कार्यक्रलापों में, निर्णयों में, उनके पारिवारिक संबंधी (पिता, पति एवं अन्य कुटुम्बीजन) कितना हस्तक्षेप करते हैं तथा उनकी राजनीतिक गतिविधियों पर अंकुश लगाने की कोशिश करते हैं।

भारतीय पितृसत्तात्मक समाज एवं राज्य-व्यवस्था का यह कटुतम सत्य है कि यहाँ स्त्रियों की पहचान एक व्यक्ति के स्थान पर उनके सामाजिक संबंधों के माध्यम से होती है। पुत्री, पत्नी और माँ इत्यादि की सीमा-रेखाएँ उसे अपनी अस्मितागत पहचान से सदैव महरूम रखती हैं। पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं के लिए किया गया आरक्षण भी इस स्थिति को तोड़ नहीं पाया है। इसीलिए जब भी कोई महिला राजनीति में सक्रिय होती है और किसी पद पर पहुँचती है तो उसके स्वयं के पारिवारिक लोग उस पर हावी होने, उसे एक रबर स्टाम्प बनाने तथा उसके कंधे पर रखकर बंदूक चलाने की हैसियत में उसे ले आने का हर संभव प्रयास करते हैं। हालाँकि यंत्र-तत्र, यदा-कदा इसके कुछ अपवाद भी मिल जाते हैं। किंतु वे अपवाद ही हैं। इसीलिए जब हमने योगिता जी से यह सवाल किया कि सरपंच बनने के बाद आपके पारिवारिक दायित्वों में क्या गुणात्मक एवं मात्रात्मक परिवर्तन आया तो उन्होंने हमें कई ऐसे तथ्यों से अवगत कराया जो राजनीति में एक महिला की अन्तहीन संघर्षशील दिनचर्या की सूचना देते हैं। इस बातचीत में उन्होंने हमें बताया कि जब वे घर पर होती हैं तो एक माँ और पत्नी के रूप में होती हैं और पंचायत में होती हैं तो एक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में होती हैं। इस बातचीत में उन्होंने हमें यह भी बताया कि कभी-कभी जब बहुत अधिक राजनीतिक व्यस्तता होती है तो घर और बच्चों की जिम्मेदारी वे पति के सहारे छोड़कर अपने काम पर निकल जाती हैं; हालाँकि घर और बच्चों की चिन्ता लगातार उन्हें रही आती है. लेकिन इससे यह तो सूचना मिलती ही है कि पुरूष वर्ग ने अब इस हकीकत को स्वीकार कर लिया है कि यदि उनकी पत्नी राजनीति में है तो उन्हें घर के उसके दायित्वों में सहभागी होना पड़ेगा।

पंचायतों में महिलाओं के आरक्षण का यह असर तो हुआ है कि पुरुषों में स्त्रियों के साथ सहकारिता, सहयोग की भावना बढ़ी है। शायद यही कारण है कि योगिता जी के पति (श्री राजू देशमुख) घर की जिम्मेदारियों से लेकर बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का ज़िम्मा भी स्वयं सँभालते हैं और अपनी पत्नी को यह अवसर देते हैं कि वह अपने सार्वजनिक राजनीतिक दायित्वों को बख़ूबी निभा सके। श्री राजू देखमुख ने इस हकीक़त को जल्दी पहचान लिया तो इसका एक कारण यह भी है कि वे स्वयं सुशिक्षित हैं और एक पॉलीटेक्नीक कॉलेज में व्याख्याता हैं। हालाँकि सभी सुशिक्षित पति इतने खुले दिल के और  उदार नहीं होते किन्तु महिला आरक्षण व्यवस्था की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि पति लोग अपना अंकुश ढीला करें। योगिता देवढे एक मानक महिला सरपंच के बतौर इसलिए भी हमें प्रतीत होती हैं कि एक व्यक्ति के रूप में वे सुदृढ़ इच्छाशक्ति और निर्णय-क्षमता की योग्यता से सम्पन्न हैं। उनके व्यक्तित्व में ढुलमुलपन, दुविधाग्रस्तता की प्रवृत्ति नहीं है इसीलिए उनके प्रति उनका परिवार, पति एवं अन्य कुटुम्बीजन आश्वस्त रहते हैं तथा उन पर पूरा भरोसा करके चलते हैं। एक बार की बातचीत में (06/05/2017) में उन्होंने बताया था कि परिवार के लोग मुझे जिम्मेदार मानते हैं। अपने दृढ़निश्चयी और प्रबल इच्छाशक्ति के बल पर ही वे यह मनवा पायी हैं कि बौद्धिकता में महिलाएँ पुरुषों से कमतर नहीं होतीं। स्पष्टतः कहा जा सकता है कि योगिता देवढे जैसी जिम्मेदार महिलाएँ ही पंचायती राज विधेयक के इन उद्देश्यों और प्रतिज्ञाओं को वास्तविक रूप में अमली जामा पहना सकती हैं  जो महिला-समानता और सशक्तीकरण हेतु निश्चित की गई हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि यहाँ हमें ‘सरपंच-पति’ जैसी उस बीभत्स और हास्यास्पद स्थिति से निज़ात मिलती दिखायी दे रही है जो आज कई राज्यों में एक भयावह रूप ले चुकी है। पत्नी कहने भर को सरपंच है किन्तु उसके सारे काम यहाँ तक कि उसके एवज़ में बैठकों में शामिल होना, उच्च अधिकारियों से मिलने जाना, आम जनता से संपर्क इत्यादि सभी कार्यों में सरपंच जी के पति महाशय मूँछों पर ताव देकर सक्रिय रहते हैं। महाराष्ट्र में अन्य राज्यों की अपेक्षा ‘सरपंच-पति’ ‘प्रधान-पति’ जैसी स्थितियाँ अपेक्षाकृत कम हैं। जब तक सरपंच-पति, प्रधान-पति जैसी स्थितियाँ पूरी तरह समाप्त नहीं होंगी; पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं के आरक्षण का ठोस और सकारात्मक परिणाम आगे नहीं आ पायेगा।
3. राजनीति में महिलाएँ: संप्रभुता का सवाल

योगिता देवढे के साथ लम्बी बातचीत में जिस मुद्दे पर सबसे ज्यादा चर्चा हुई और जो सबसे बड़े  सवाल के रूप में उभरकर आया वह था- राजनीति में महिलाओं की संप्रभु स्थिति। अन्य शब्दों में संप्रभुता को स्वायत्तता भी कहा जा सकता है। कानून अपनी जगह होता है, उसके प्रावधान, उसकी मंशाएँ अपनी जगह होती हैं किन्तु जो मनुष्य-समाज, राजनीतिक व्यवस्था, शासकीय यंत्रणा (मशीनरी) इत्यादि उसे अपनाती और क्रियान्वित करती हैं, वे अपने स्वरूप में अलग होती हैं। यानी कि क़ानून के प्रावधानों और उसे अपनाने और क्रियान्वित करने वाली इकाइयों के बीच पारस्परिकता और सहकारिता की स्थितियाँ यदि नहीं हैं तो कितना भी अच्छा कानून हो और कितने भी अच्छे उसके प्रावधान हों: वे एक ज़मीनी हकीक़त के रूप में दृष्टिगोचर नहीं हो सकते।

महिला अधिकारः वैधानिक प्रावधान

पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं के आरक्षण से सम्बन्धित बहुत ही महत्वपूर्ण और ज़रूरी यह क़ानून भी भारतीय समाज के इसी गुंजलक में फँसा नज़र आता है। इस सर्वेक्षण एवं अलग-अलग महिला सरपंचों से हमारी बातचीत का ज़्यादातर सम्बन्ध इसी सन्दर्भ से था। यह कितनी विचित्र और अफ़सोसनाक स्थिति है कि राजनीति में सक्रियता के हमारे पैमाने, प्रस्तावनाएँ, प्रविधियाँ इत्यादि  महिलाओं और पुरुषों के सन्दर्भ में कितने अलग-अलग और दोगले हैं। मंच पर हम स्त्री-जाति को न जाने किस-किस रूप में कितना-कितना महान बताने में कोई कसर नहीं उठा रखते लेकिन मंच से उतरते ही और फिर घर पहुँचते ही हम वही सर्वशक्तिमान बन जाते हैं जिसके अधीन सारी क़ायनात होनी चाहिए! यह कितना विचित्र है कि पुरुष जब राजनीति में सक्रिय होता है तो उसके संबंध में हम ‘संप्रभुता’ का सिद्धान्त निरूपित करते हैं लेकिन जब स्त्री की राजनीतिक सक्रियता की बात आती है तो उसे ‘स्वायत्तता‘ में रिड्यूस कर देते हैं। इस संदर्भ में स्वायत्तता (Autonomy) की उत्पत्ति के इतिहास का सन्दर्भ लिया जा सकता है। यह सन्दर्भ स्पष्ट करता है कि स्वायत्तता पूर्ण स्वतन्त्रता के स्थान पर एक सीमित स्वाधीनता है। पंचायती राज व्यवस्था में महिला सरपंचों की राजनीतिक नियति अपने उच्चतम रूप में भी इस स्थिति से आगे नहीं जा पाती। इसे एक विडंबना ही कहा जाएगा कि राजनीति में संप्रभुता का स्वप्न देखने वाली महिलाएँ अपनी उच्चतम स्थिति में भी संप्रभुता के स्थान पर मात्र स्वायत्तता को छू पाती हैं। आखिर  इसका क्या कारण है? क्या भारत सरकार, राज्य सरकारों के पंचायती राज विधेयकों में कोई इस तरह के अव्यक्त छिद्र हैं, जिनका लाभ पितृसत्तात्मक व्यवस्था उठाती है? क्या इन विधेयकों के इन हिडन लूप-होल्स की तहकीकात नहीं की जानी चाहिए जो जाने-अनजाने यहाँ रखे गए हैं ? क्योंकि असमानता, उँच-नीच, छोटा-बड़ा जैसे प्रत्यय स्त्री और पुरुष पर लागू नहीं होते। इन दोनों की भिन्न इयत्ताएँ हैं जो एक तरफ नैसर्गिक हैं तो दूसरी तरफ अपने-आप में पूर्ण अर्थात संपूर्ण हैं। अतः एक श्रेष्ठ पंचायती राज क़ानून वही हो सकता है जो स्त्री को अपनी राजनीतिक सक्रियता में संप्रभुता की स्थिति तक पहुँचा सके।

योगिता देवढे के साथ इस लम्बी बातचीत में हमने यह पाया कि बावजूद अपनी प्रबल इच्छा-शक्ति, दक्षता और कार्यशीलता की योग्यता रखने के एक स्त्री किस तरह राजनीति के क्षेत्र में हीन समझी जाती है और हतोत्साहित की जाती है! यह एक भारी विडम्बनात्मक स्थिति है.

4. राजनीति और लैंगिकता 


इस आलेख में यहाँ ‘संप्रभुता’ की जो बात की जा रही है उसका एक विशिष्ट संदर्भ है। वह संदर्भ है – लैंगिकता। जेंडर-दृष्टि। जेंडर गेज। अर्थात वह पैमाना जिसके आधार पर स्त्री और पुरुष के बीच श्रेष्ठता और हीनता का विभेद करके हम चलते हैं। लैंगिकता जैसे नैसर्गिक तत्व के आधार पर श्रेष्ठता और हीनता का विभेद करना न केवल प्रकृति बल्कि समाज की भी एक श्रेष्ठ व्यवस्था के विरुद्ध है। योगिता देवढे की बातचीत में बार-बार यह तथ्य सामने आता है कि लैंगिकता के आधार पर परिवार, समाज, सरकारी मशीनरी, साथ में काम करने वाले लोग इत्यादि सब के सब स्त्री और पुरुष को अलग-अलग निगाह से देखते हैं। अपने एक संवाद में योगिता कहती हैं, ‘‘राजनीतिज्ञ और अधिकारी वर्ग पुरुषों को अधिक महत्व देते हैं। पुरुष अधिकारीगण, सरपंच अगर महिला है तो, उसे महत्व न देकर उप-सरपंच पुरुष को महत्व देते हैं।’’ (18 जुलाई, 2017 को हुई बातचीत के आधार पर)। इसका एक पहलू यह भी है कि सरपंच यदि महिला है तो अधिकारीगण उसके साथ असहयोग करते हैं। पुरुष अधिकारियों की यह दृढ़  मान्यता होती है कि महिलाएँ सही निर्णय नहीं ले सकतीं, उनमें बौद्धिकता का अभाव होता है; आदि-आदि। जबकि वस्तुस्थिति यह है कि जान-बूझकर ऐसा माहौल बनाया गया है कि महिला सरपंच स्वतन्त्र रूप से कोई निर्णय न ले सकें। वे हर स्तर पर पुरुषों से पूछ-पूछकर काम करें और यदि ऐसा न करें तो उन्हें सबक सिखाया जाए! योगिता ने एक स्थान पर कहा “सभी महिलाएँ निर्णय नहीं ले सकतीं क्योंकि वे अधिकारियों से डरती हैं। उन्हें लगता है कि यह अधिकारी जो पुरुष है वह कुछ भी कर सकता है। महिलाओं में काम करते वक्त पुरुषों को लेकर एक डर-सा पैदा हुआ रहता है।’’ (27 जुलाई, 2017)। योगिता देवढे ने अपनी बातचीत में कई बार इस तथ्य को रेखांकित किया कि राजनीति में सक्रिय महिलाओं को पुरुषों के लैंगिक अहंकार का बार-बार सामना करना पड़ता है। महिला राजनीति की यह एक सामान्य चुनौती मानी जा सकती है कि उसे सबसे पहले लैंगिकता की लड़ाई लड़नी पड़ती है, जिसके लिए वह उत्तरदायी नहीं है।

योगिता देवढे की बातचीत में यह तथ्य सामने आया कि एक महिला सरपंच चाहे कितना भी अच्छा काम कर ले उसे पुरुष अधिकारियों की ओर से कभी योग्य ‘प्रतिसाद’ (उत्साहवर्द्धन/प्रशंसा) नहीं मिलता। यह योगिता का अपना अनुभव भी है और यह लगभग अधिकांश महिला सरपंचों का अनुभव भी है। यह सचमुच घनघोर दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है और पंचायती राज में महिलाओं के आरक्षण संबंधी बिल की मूल भावना के खिलाफ है।

पुरुष किस तरह से अपनी श्रेष्ठता-ग्रंथि की गिरफ्त में रहते हैं तथा एक कर्मठ व योग्य महिला सरपंच को भी ढंग से काम नहीं करने देते; इसका बहुविध उल्लेख योगिता देवढे ने अपनी बातचीत में किया है। उन्होंने कहा कि कई पुरुष यह कोशिश करते हैं कि ग्रामसभा आयोजित न हो और यदि हो भी तो पंवाड़ा शुरू कर देते हैं। यह पंवाड़ा इस रूप में होता है कि वे कुछ ऐसे मुद्दे, विषय सामने ले आते हैं जिनकी न तो कोई सामूहिक प्रासंगिकता होती है और न ही जिनका असल समस्याओं से कोई लेना-देना होता है। पंवाड़ा करने वाले ये लोग असामाजिकता की हद तक चले जाते हैं, असामाजिक तत्वों के साथ इनका उठना-बैठना होता है और ये दबंगई करते हैं। कुछ नागरिक, अन्य सदस्य तथा कुछ दूसरे पुरुष इनका सहयोग करते हैं। महिला सरपंचों को इस स्थिति का सामना कई बार करना पड़ता है। कई बार स्थिति यहाँ तक पहुँच जाती है कि पुलिस की सहायता लेनी पड़ती है। योगिता देवढे ने लैंगिकता के आधार पर महिला सरपंचों को हतोत्साहित किए जानेवाला एक तथ्य यह भी उजागर किया कि पुरुषों का एक समूह एक स्त्री के रूप में उन्हें बदनाम करने, चरित्र पर सवाल उठाने, अपशब्दों से भरी भाषा का उपयोग करने, उनके विषय में गलत और झूठा प्रचार करने जैसे कामों में लगा रहता है। इसे सामान्यीकृत भी किया जा सकता है क्योंकि स्त्रियों के प्रति पुरुषों की दृष्टि और रवैया ग्रामीण क्षेत्रों में ज़्यादातर लगभग यही है। इन सारी स्थितियों को देखते हुए कोई गरिमामय, आत्मसम्मान-युक्त महिला आखिर कितने दिन तक राजनीति में बनी रह सकती है और आगे बढ़ सकती है? या तो  राजनीति से उसका मोह भंग हो जाएगा या फिर उसमें स्वयं को अनफिट मानते हुए वह उससे किनारा कर लेगी। राजनीति से महिलाओं का अलगाव और कुछ समय के बाद उससे उनका ‘ड्रॉप-आउट’ भारत में गाँव से लेकर महानगर तक की एक आम समस्या है। योगिता देवढे ने अपनी बातचीत में हमें यह महसूस कराया कि आगे राजनीति में उनकी सक्रिय रहने की इच्छा मर चुकी है। बातचीत में उन्होंने एक बार कहा ‘राजनीति के मेरे अनुभव अच्छे नहीं है इसलिए अब मेरी इच्छा नहीं है।’ उनका यह भी कहना था कि उनके बच्चों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ रहा है। उनके संस्कार बिगड़ रहे हैं। महिला राजनीति के संदर्भ में भाषा का अपना एक विशेष महत्त्व है। वैसे तो हमारी भाषा अधिकांशत: पुरुष वर्चस्वकारी और स्त्री के प्रति दुराग्रही रवैया लेकर चलती है किन्तु हमारे राजनीतिक व्यवहारों में यह अपनी सारी सीमाएँ और मर्यादाएँ लाँघकर असामाजिकता और अश्लीलता की हद तक जा पहुँचती है और यदि महिलाएँ  राजनीति में कुछ करना चाहें और अपनी योग्यता और दक्षता से आगे बढ़ना चाहें तो लैंगिक दुराग्रहपूर्ण भाषा का हथियार उनके स्वागत में तैयार बैठा रहता है! योगिता देवढे ने भी राजनीतिक भाषा की इस समस्या को अपनी बातचीत में उठाया है और इसे ‘टपोरीशाही’ कहा है। उनके शब्दों का विवरण इस प्रकार है – “सरपंच पद  पर रहने के लिए एक विशिष्ट भाषा का प्रयोग करना पड़ता है जिस भाषा को मैं पसंद नहीं करती। राजनीति की भाषा खराब हो गई है। राजनीति में ‘टपोरीशाही’ या ‘टपोरीगिरी’ ज्यादा है। ऐसे टपोरी लोगों की निगाह में महिला सरपंच की किसी भी मेहनत का कोई मूल्य नहीं है। इस ‘टपोरीगिरी’ के पीछे लैंगिक दुराग्रह तो होते ही हैं; राजनैतिक विरोधियों की कुछ दुरभिसन्धियाँ भी होती हैं जो अपने स्वरूप में नकारात्मक होती हैं।

यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि योगिता देवढे जैसी साहसी, कर्मठ और सक्षम महिला सरपंच को भी अंतत: इस निर्णय पर पहुँचना पड़ता है कि ‘‘परिवार की सुरक्षा को देखकर अब मेरी आगे किसी भी राजनीतिक पद को लेने की इच्छा नहीं है।’’

5.  राजनीति में महिलाएँ : राजनीति के लिए वरदान 

यों, ‘वरदान’ एक अतिशय अध्यात्मवादी शब्द-संरचना है लेकिन आज के टपोरीशाही राजनीतिक माहौल का मुक़ाबला करने के लिए इस प्रकार के प्रत्येय आवश्यक प्रतीत होते हैं। यह बिलकुल भी आश्चर्य जनक नहीं है कि महिलाएं यदि राजनीति में अधिक से अधिक संख्या में और आगे से आगे बढ़कर सक्रिय हो जाएँ तो उनकी उपस्थिती राजनीति के मौजूदा चरित्र में मौलिक परिवर्तन ला दे!

5.1. सामान्यत: यह देखा गया है कि पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियाँ ज्यादा कर्मठ, सहनशील, कार्य के प्रति समर्पित तथा निर्णयक्षम होती हैं, शायद इसका कारण हमारी समाजिकीकरण की वह विशिष्ट प्रक्रिया हो जिसमें स्त्री हमेशा खराद-सी  पर चढ़ाए रखी जाती है। हमेशा उसे किसी न किसी चुनौती का सामना करना होता है । इस समाजीकरण के परिणामस्वरूप वह अत्यधिक धैर्यशील, शालीन व संघर्षशील हो जाती है। अत: यह कहा जाना गलत नहीं होगा कि यदि स्त्रियों को राजनीति में अपेक्षाकृत अधिक अवसर मिले, उनके कार्यों को प्रोत्साहन मिले, तो राजनीति का चरित्र काफी कुछ बदल सकता है। योगिता देवढे ने अपनी बातचीत में कुछ ऐसे तथ्य स्पष्ट किए जो हमारी इस बात की पुष्टि करते हैं। जैसे उन्होंने कहा कि “महिलाएं अगर राजनीति में ज्यादा रहेंगी तो भ्रष्टाचार कम होगा क्योंकि महिलाएँ नियमों से डरती हैं। इसलिए नियमों का पालन करके ही वह काम करती हैं।”

मंडल और महिला आरक्षण

इस मामले में मायावती को वे अपने व अन्य महिलाओं के लिए आइकॉन जैसा मानती है। उनका कहना है कि मायावती राजनीति में काम करनेवाली आम महिलाओं के लिए एक आइकॉन के रूप में काम करती हैं। मायावती पर भ्रष्टाचार के अनेक आरोप लगे हैं, इस संबंध में प्रतिप्रश्न किए जाने पर योगिता देवढे ने कहा कि राजनीति में आने के बाद वे वैसी हो गईं। मीडिया भी उन्हें इस रूप में ज्यादा दिखाता है किंतु एक महिला राजनीतिज्ञ के रूप में मायावती एक मानक हैं।


5.2.  दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य इस बातचीत में यह निकलकर आया कि यदि महिलाओं की भागीदारी राजनीति में बढ़ती है तो राजनीति की प्राथमिकताएँ तथा मुद्दे काफी कुछ बदल सकते हैं। उदाहरण के लिए योगिता देवढे ने अपनी बातचीत में बताया कि पुरुष सरपंचों की अपेक्षा महिला सरपंच विकास कार्यों को लेकर अच्छा निर्णय ले सकती हैं। इसके अलावा महिलाएँ जब कोई काम अपने हाथ में लेती हैं तो उसे पूरा करने के बाद ही साँस लेती हैं। महिलाएँ चूँकि अधिक संवेदनशील होती हैं इसलिए वे लोकहित की दृष्टि से ज्यादा सोचती हैं। (27/07/2017 के लिखित उत्तर के आधार पर)।

5.3. तीसरा महत्वपूर्ण बिंदु इस बातचीत में यह उभरकर आया कि राजनीति में यदि महिलाएँ ज्यादा सक्रिय होंगी तो महिलाओं से संबंधित समस्याओं, महिलाओं के मुद्दों पर ज्यादा ध्यान दिया जा सकता है यानी कि विकास के लैंगिक संतुलन को बचाने और बनाए रखने की दृष्टि से महिलाओं का राजनीति में आना अत्यावश्यक है, जैसे कि योगिता देवढे ने एक बातचीत में यह कहा कि सरपंच यदि महिला होती है तो ग्राम पंचायत में ज्यादा महिलाएँ अपने काम को लेकर आती हैं जबकि सरपंच यदि पुरुष है तो उन्हें आने में संकोच होता है। ग्रामसभाओं में भी महिलाओं की संख्या अधिक होती है। स्त्रियों को ऐसा लगता है कि पुरुष की अपेक्षा एक स्त्री उनकी बात पर ज्यादा ध्यान देगी और वे भी उससे खुलकर बात कर सकेंगी। एक जगह उन्होंने कहा, ‘‘महिलाएँ खुद बोलती हैं कि हम अब तक ग्रामपंचायत की सीढ़ियाँ नहीं चढ़े थे, अब हमें लगता है कि हमारा यहाँ प्रतिनिधि है’’। (27/07/2017)। इस मत में दो राय हो सकती हैं किंतु इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि महिलाएँ महिलाओं की समस्याओं, मुद्दों को ज्यादा अच्छी तरह समझ सकती हैं। एक महिला होने के नाते महिला मुद्दों के प्रति वे संवेदनशील होती हैं इसलिए महिलाओं का यदि विकास करना है तो राजनीति में महिलाओं का अधिक से अधिक संख्या में आना जरूरी है, यह देखकर आश्चर्य होता है कि किसी दक्ष स्त्रीवादी कार्यकर्ता की भाँति योगिता देवढे ने भी कहा कि ‘‘महिलाओं का अगर विकास करना है तो महिलाओं का राजनीति में आना जरूरी है, क्योंकि महिलाओं के विकास का पक्ष महिलाएँ ही अच्छी तरह से रख सकती हैं’’। (27/07/ 2017 को दिए गए लिखित उत्तर में)।

5.4. जैसा कि उल्लेख किया गया, महिलाएँ यदि राजनीतिक नेतृत्व में होती हैं तो विकास कार्यक्रमों की प्राथमिकताएँ अधिक जनहितकारी हो जाती हैं। उदाहरण के लिए, योगिता देवढे ने बताया कि स्त्री में परिवार की देखभाल, बच्चों के भरण-पोषण, प्रबंधन इत्यादि का एक विशेष गुण होता है जो पुरुषों में नहीं होता। वह जैसे अपने परिवार को अपना समझती है उसी तरह समस्त पंचायत भी, उसके समस्त नागरिक भी उसके लिए एक परिवार की तरह ही होते हैं। इस भावनात्मक संबंध की परिणति काफी सकारात्मक होती है और महिलाएँ पंचायत को ही अपना घर समझने लगती हैं। इसका तात्पर्य है कि जैसे परिवार या घर का हित एक स्त्री के लिए सर्वोपरि होता है उसी तरह लोकहित भी उसके लिए सर्वोपरि होता है।

इस दृष्टि से विचार करने पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि महिलाएँ अपनी विकास योजनाओं की प्राथमिकताओं में अपेक्षाकृत अधिक जनोन्मुख होती हैं, जैसे कि जब हमने योगिता देवढे से महिला सरपंचों के विकास मुद्दों की प्राथमिकताओं के बारे में पूछा तो यों उन्होंने वही बातें कहीं जो एक घाघ पुरुष नेता अपने बयानों में कहता है किंतु हमने देखा कि योगिता जब अपनी इन प्राथमिकताओं को गिना रही थीं तो उनके चेहरे पर गहरा आत्मविश्वास का भाव और आँखों में उत्साह था। उन्होंने महिला सरपंचों की जो विकास संबंधी प्राथमिकताएँ गिनाईं, वे इस प्रकार थीं –
1. नागरिकों को बुनियादी सेवाएँ प्रदान करना।
2. महिला सशक्तीकरण।
3. आँगनबाड़ी सेविका, स्वास्थ्य सेविका, आशा वर्कर इनको ग्राम विकास के प्रवाह में लाना।
4. महिलाओं सम्बन्धी विकास योजनाओं पर प्रभावी रूप से अमल करना।
5. महिलाओं के लिए स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन करना।
6. सरकारी योजनाओं पर प्रभावी रूप से अमल करना।
7. युवकों के लिए मार्गदर्शन शिविर लगाना।
8. ग्राम के सामाजिक संगठनों की ग्राम विकास के लिए सहभागिता को बढ़ावा देना।
स्पष्ट है कि महिलाओं का वर्चस्व अगर राजनीति में बढ़ता है तो यह लोकहित की दृष्टि से श्रेयस्कर होगा। पुरुषों को इससे भय खाने की जरूरत नहीं है क्योंकि स्त्रियाँ अधिक समावेशी और सहयोगी होती हैं।

6. अपेक्षाएँ, आवश्यकताएँ एवं सुझाव  


6.1. योगिता देवढे ने अपनी बातचीत में अपनी वे अपेक्षाएँ और आवश्यकताएँ व्यक्त कीं जो वे इस व्यवस्था से चाहती हैं । सबसे पहले तो उन्होंने यह बताया कि महिला सरपंचों को सरपंच होने के बाद पर्याप्त आवश्यक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। ग्राम पंचायत में कई पेचीदा रेकॉर्ड्स होते हैं, कार्य निष्पादन की प्रक्रियाएँ होती हैं अत: इस सबको समझने के लिए नवनिर्वाचित महिला सरपंचों को यथोचित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। अभी मात्र तीन दिन का प्रशिक्षण नवनिर्वाचित सरपंचों के लिए होता है जिसे बढ़ाकर कम से कम एक माह का किया जाना चाहिए। पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं के लिए लंबी अवधि का यह प्रशिक्षण ज्यादा आवश्यक है क्योंकि वे नई-नई सत्ता में आ रही हैं। उनसे गलतियाँ न हों, पुरुष अधिकारी उनकी गैर जानकारी का गलत फायदा न उठा सकें इसलिए भी महिला सरपंचों को यह प्रशिक्षण दिया जाना लाज़िमी है।


6.2. पूर्व में ‘शासकीय यंत्रणा’ का उल्लेख किया गया। यहाँ पुनः उसका संदर्भ दिया जाना आवश्यक है क्योंकि महिला सरपंचों का यह मानना है कि ‘शासकीय यंत्रणा’ (गवर्नमेंट मशीनरी) में पुरुषों का दबदबा होने की वज़ह से महिलाओं को पूरा स्पेस नहीं मिलता। उनकी बात नहीं सुनी जाती। इसीलिए योगिता देवढे का सुझाव है कि ग्राम पंचायत स्तर पर ग्रामसेवक इत्यादि पदों पर महिलाएँ पदस्थ की जाएँ तथा उच्च अधिकारियों में भी महिलाओं की संख्या पर्याप्त हो ताकि महिला सरपंच खुलकर अपनी बात उनसे कह सकें।


शंभु गुप्त , प्रोफ़ेसर , स्त्री अध्ययन विभाग, महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीयकरण हिंदी विश्वविद्यालय , वर्धा फ़ोन:- 8600552663, 9414789779
e-mail- shambhugupt@gmail.com 
 अस्मिता राजुरकर : स्त्री अध्ययन विभाग, महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीयकरण हिंदी विश्वविद्यालय , वर्धा,में शोध-कार्य पूर्ण.
थिंक फाउन्डेशन के माध्यम से स्वतंत्र सामाजिक शोध-कार्य में संलग्न.
फ़ोन 9049723994 e-mail: striasmita@gmail.com 


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खुर्राट पुरुष नेताओं को मात देने वाली इंदिरा प्रियदर्शिनी

ऋचा मणि

दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास पढ़ाती हैं और जेएनयू से पीएचडी कर रही हैं. संपर्क :
maniricha@gmail.com

इंदिरा गांधी की जन्मशती पर विशेष

इंदिरा गाँधी (19 नवंबर 1917 – 31 अक्टूबर 1984 ) आधुनिक भारतीय इतिहास की एक ऐसी पात्र हैं,जिन्हें विस्मृत करना कठिन है. जनवरी 1966 से लेकर 31 अक्टूबर 1984, पौने तीन वर्षों के एक अंतराल (24 मार्च 1977 से 10 जनवरी 1980) तक वह भारत की प्रधानमंत्री रहीं.उनका शासनकाल उपलब्धियों और घटनाओं से खचित रहा . उनकी उपस्थिति सबको महसूस होती थी. उन्होंने अपनी पार्टी कांग्रेस को तोड़ा और पडोसी देश पाकिस्तान को भी.अपने ही देश के संविधान की खूब ऐसी-तैसी की और उसे कुछ समय केलिए तो अपना खिलौना बना लिया. उन्नीस महीने तक तानाशाह बनने का खेल भी खेला.निजी जिंदगी और राजनीति में अनेक मुश्किलों और संघर्षों से गुजरते -जूझते, प्रधानमंत्री रहते,अपने ही आवास परिसर में,अपने ही अंगरक्षकों द्वारा मारी गयीं. इसलिए कहा जाना चाहिए कि वह इतिहास भी हैं और किंवदंती भी. उनका चरित्र अंतर्विरोधों का एक जटिल पुंज है,और उनके व्यक्तित्व का मूल्यांकन महा -मुश्किल कार्य.

मैं उन लोगों में हूँ जिनका जन्म इंदिरा गाँधी के गुजर जाने के बाद हुआ है. लेकिन आज करोड़ों लोग हैं,जिन्होंने उन के समय को देखा है. बहुत से लोगों ने उन्हें देखा -सुना है और वे आज भी उनके बारे में एक राय रखते हैं. उन के समय में उनके राजनीतिक विरोधियों की संख्या भी कम नहीं थी. लेकिन सब यह स्वीकार करते थे कि वह असाधारण थीं. हमलोग तो उस पीढ़ी के हैं जिन्होंने उन्हें चर्चाओं और किताबों से जाना,चित्रों से झांकती उनकी शख्सियत देखी,लेकिन कह सकती हूँ कि वह केवल मुल्क की प्रधानमंत्री नहीं थीं, बल्कि उसकी धड़कन थी.हालांकि उनके समय के एक चापलूस ने उनके लिए यह बात कही थी. वह होतीं तो इन पंक्तियों के लिखे जाने तक,सौ साल की होतीं. लेकिन यह उनका पार्थिव रूप होता और तब शायद उस इंदिरा गाँधी से दूर होतीं,जिसे रखांकित करने केलिए मैंने कलम उठाई है.

दादा मोतीलाल नेहरू जब उदास हो गये


इंदिरा गाँधी का सब कुछ राजनीतिक था.जन्म, घर -परिवार से लेकर मृत्यु तक. वह उस साल और उस महीने जन्मीं,जिस वर्ष और जिस महीने बोल्शेविक क्रांति हुई. मशहूर राजनेता,लेखक और थोड़े दार्शनिक अंदाज़ के जिंदादिल इंसान जवाहरलाल नेहरू की इकलौती बेटी. जब इंदिरा दो वर्ष की ही थीं,तब नेहरू ने पहली जेलयात्रा की.उनके परिवार को एक महात्मा का साया लग चुका था. 1916 में, दक्षिण अफ्रीका से समाज,जीवन और विचारके कुछ सूत्र तलाश कर लौटे एक ‘साधु ‘-जिन्हे लोग गाँधी कहते थे, से जवाहरलाल की पहली मुलाकात हुई और नेहरू परिवार में एक बहस शुरू हो गई. युवा जवाहरलाल पर गाँधी का जादू धीरे -धीरे चढ़ने लगा. उसी वर्ष कमला से उनका विवाह हुआ.अगले ही वर्ष इंदिरा का पदार्पण हो गया .

नयापन नाम में भी था. कुछ ही साल पहले इतिहासकारों और पुरातत्ववेत्ताओं को ‘अशोक ‘ के बारे में ढंग की कुछ जानकारी मिली थी.इतिहास के दीवाने जवाहरलाल की नज़र से यह जानकारी कैसे छुप सकती थी.तीस साल बाद 1947 में भारत की संविधान सभा में नेहरू भारत के राष्ट्रीय झंडे में जिस अशोक चक्र को रखने की वकालत करते हुए खूबसूरत और इतिहास की जानकारियों से भरपूर भाषण दे रहे थे,उस अशोक से वह इंदिरा के जन्म के पूर्व ही प्रभावित हो चुके थे. ‘Indira: the life of Indira Nehru Gandhi’की अमेरिकी लेखिका कैथरीन फ्रैंक की मानें तो मोतीलाल नेहरू का पूरा परिवार बेटे की उम्मीद लिए बैठा था. 19 नवंबर 1917 की रात के 11 बजे व्हिस्की की घूंट ले रहे अपने वकील शौहर मोतीलाल नेहरू को जब स्वरूप रानी ने पोती होने की जानकारी दी,तब वह थोड़े उदास हो गए. शायद वह जमाना ही ऐसा था. जवाहरलाल शायद उदास होने वालों में न थे.हालांकि खुश होने के भी कोई सबूत उन्होंने नहीं छोड़े हैं. अपनी आत्मकथा से भी उन्होंने इस प्रसंग को अलग ही रखा है. हालांकि अपनी संतान केलिए उन्होंने नाम शायद पहले से ही ‘प्रियदर्शी’ चुन रखा था.अशोक के साथ जुड़े रहने वाले ‘पियदस्सी’का तत्सम रूप. जब बेटी हुई तब इसका स्त्री रूप दे दिया गया होगा ‘प्रियदर्शिनी ‘. इंदिरा प्रियदर्शिनी नाम रखा गया.प्राचीनता का  नवीनता के साथ एक जुड़ाव और प्राचीन दुनिया में भी अपनी अलग परंपरा का समर्थन इस नाम में भी जुड़ा था .

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राजनीति नियति भी चुनाव भी

1921 के दिसम्बर में,जब इंदिरा के पिता और दादा जेल में थे,और वह केवल चार साल की थी,उनकी माँ और दादी ने साबरमती की यात्रा जेल के तीसरे दर्ज़े में बैठकर की. इंदिरा माँ की गोद में थी. साबरमती गाँधी जी का आश्रम था. गोद में ही सही,लेकिन इंदिरा गाँधी की यह पहली राजनीतिक यात्रा थी.उसके लिए सब कुछ अजनबी रहा होगा.साबरमती में शायद उसे तितलियों की तलाश होगी. मेरे कहने का तात्पर्य यह की इस उम्र से ही राजनीतिक उथल -पुथल से जुड़ जाना उनकी नियति बन गई थी.

पिता नेहरू ज्यादातर जेल में रहे और बाहर रहे तब राजनीतिक व्यस्तताओं और यात्राओं में. माँ कमला का अपना स्वभाव था.माता -पिता के बीच सबकुछ खुशनुमा ही नहीं था.लेकिन इन्दु की परवाह दोनों को थी. नौ -दस साल की इंदिरा को उनके पिता ने जेल से ही चिट्ठियां लिखनी शुरू की.इन चिट्ठियों की एक किताब छपी -‘फादर्स लेटर टू हिज डॉटर’.चिट्ठियों का दूसरा सिलसिला इन्दु के तेरहवें साल में शुरू हुआ.इन चिट्ठियों का तो एक एक ग्रन्थ ही बन गया –‘ग्लिम्प्सेस ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री’.इस तरह इतिहास अनेक रूपों में उनके वजूद का हिस्सा बनने लगा.

हर इंसान की निजी जिंदगी होती है,इंदिरा की भी थी.यह जाहिर बात है कि उन्होंने अपनी मर्जी से विवाह किया और जमाने की नहीं,अपने दिल की सुनी. 1946 में ही उनके पिता अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री बन गए और ऑफिस में ही उन्होंने आखिरी सांसें ली. पिता के जीवन में ही 1959में वह कांग्रेस अध्यक्ष बनीं.इसके पूर्व 1958 में वह विधवा हो गई थीं. 27 मई 1964 को पिता की मृत्यु के बाद वह बीस और अठारह साल के दो बच्चों की माँ भर थीं. 1962 में चीनी आक्रमण के बाद देश में नेहरू की लोकप्रियता को करारा झटका लगा था.देश की शर्मनाक हार केलिए नेहरू की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा था. उनके विरोधियों को जनता में जगह मिलने लगी थी. लाल बहादुर शास्त्री देश के नए प्रधानमंत्री थे. उन्हें महसूस हुआ इंदिराजी को कैबिनेट में रखा जाना चाहिए. इंदिरा गाँधी सूचनाऔर प्रसार मंत्री बनीं. लेकिन 11 जनवरी 1966 को जब शास्त्रीजी का हृदयाघात से अचानक निधन हो गया तब एक नाटकीय घटनाक्रम के बाद इंदिरा गाँधी मुल्क की प्रधानमंत्री बनीं. यह एक नयी इंदिरा थीं .

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भारत असाधारण देश है.भूगोल और जनसंख्या के हिसाब से तो बड़ा है ही,सांस्कृतिक विविधताएं इसे बेहद जटिल और इसीलिए खूबसूरत बना देती हैं. ऐसे देश का शासक होना आसान नहीं होता. कवियों और दार्शनिकों ने बतलाया है इस देश का नाम भारत उस भरत के नाम पर पड़ा है,जो शकुंतला की संतान था और जिसे पिता ने अपनाने से इंकार कर दिया था. हमारे संत -दार्शनिकों ने हमेशा ही उदारता की वकालत की है. उदारचरितांतु वसुधैव कुटुंबकम.  उदार हृदय वालों केलिए पूरी दुनिया परिवार है. जवाहरलाल नेहरू ने अपनी किताब ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ में जिस भारत की खोज की है,वह ऐसा ही बड़ा और उदार भारत  है. नेहरू ने अपने प्रधानमंत्रित्व में ऐसे ही भारत को विकसित करने की कोशिश की.इंदिरा ने पिता की नीतियों पर चलने की कोशिश जरूर की,लेकिन नेहरू बनना आसान नहीं था .

वह आधुनिक रजिया


इंदिरा के साथ दूसरी कठिनाइयां भी थी. उनके मूल्यांकन कर्ताओं ने उनके इस स्वरूप पर बहुत ध्यान नहीं दिया. वह स्त्री भी तो थीं. भारत की उदार परम्पराएं है,तो रूढ़ियाँ भी हैं. एक स्त्री केलिए दुनिया भर के समाजों में कठिनाइयां है. हमारे भारतीय समाज में कुछ ज्यादा. मनु ने स्त्रियों के मामले में शूद्रों की तरह ही अनुदारता बरती है. मा भजेतस्त्रीस्वतंत्रताम. स्त्रियों को स्वतंत्रता मत दो. सार्वजानिक -राजनीतिक जीवन में स्त्रियों केलिए कोई स्थान नहीं है.  उन्नीसवीं सदी में पंडिता रमाबाई ने कितने कष्ट नहीं झेले. मध्यकाल में रजिया हिंदुस्तान की  सुल्तान (1236 -1240) तो बन गयीं,लेकिन मर्दों ने उन्हें चैन से रहने नहीं दिया. इंदिरा गाँधी की भी वही स्थिति थी. उनकी ही पार्टी में उनके खिलाफ खुर्राट नेताओं का सिंडिकेट विकसित होने लगा. कदम -कदम पर उन्हें अपमानित करने की कोशिश की गयी. 1969 में राष्ट्रपति जाकिर हुसैन की अचानक मौत के बाद नए राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार तय करने केलिए कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक(बंगलुर 10 -12 जुलाई 1969) हुई.इंदिरा गाँधी ने जगजीवन राम का नाम प्रस्तावित किया. सिंडिकेट ने इसके मुकाबले नीलम संजीव रेड्डी का नाम प्रस्तावित किया और उसे बहुमत की स्वीकृति मिल गई. यह इंदिरा को अपमानित करने केलिए किया गया था. लेकिन इस अपमान को उन्होंने चुनौती के रूप में लिया. उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार वी वी गिरी को समर्थन दिया और वह जीते. यह एक नई रजिया का अवतार था,जो हारने वाली नहीं थी. इंदिरा गाँधी,जिसे लोगों ने गूंगी गुड़िया कहा था,अब बोलने लगी थी और उनकी बातें सुनी जाने लगी थीं. उन्होंने बैंकों के राष्ट्रीयकरण किये,राजाओं को मिलने वाले प्रिवी पर्स को खत्म कर दिया.विपक्ष ने उन्हें चुनाव की चुनौती दी,उन्होंने 1971 में मध्यावधि चुनाव करवाए और विपक्ष को धूल चटा दी.. चुनाव से उठीं तब बांग्ला देश के मुक्ति संग्राम को समर्धन दिया,नतीजतन  पाकिस्तान दो हिस्सों में विभक्त हो गया.इस अभियान में एक लाख पाकिस्तानी फ़ौज का आत्मसमर्पण करवाकर युद्ध के इतिहास में एक मिसाल कायम कर दिया. यह सब इंदिरा गाँधी का साहस था.एक स्त्री का साहस .

 महिलाओं , महान बनने के सपने देखो: डा.आंबेडकर

लेकिन वही इंदिरा गाँधी तानाशाह भी बनी. 1975 के जून में मुल्क पर इमरजेंसी थोपकर उन्होंने जनतंत्र का गला घोंटने का प्रयास किया.संविधान से मनमानी की.1977 में उन्हें इसकी चुनावी सजा मिली. वह बुरी तरह पराजित हुईं. ऐसा लगा कि उनकी राजनीति ख़त्म  हो गयी. लेकिन उनके साहस को रेखांकित करना ही पड़ेगा कि वह उस तरह विचलित नहीं हुईं,जैसे दूसरे राजनेता हो जाते हैं. उन्होंने मुश्किलों का मुकाबला किया. उनकी गिरफ़्तारी हुई,उपचुनाव जीत जाने के बाद सदस्य्ता रद्दकी गई.लेकिन चतुराई से ऐसी चाल चली कि जनता पार्टी सरकार छिन्न -भिन्न हो गई. 1980 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपने विरोधियों को तहस -नहस कर दिया. वह पुनः प्रधानमंत्री बनीं और शानदार बहुमत के साथ .

और वे नहीं रहीं


जून 1984 में सिक्ख उग्रवादियों के खिलाफ आपरेशन ब्लूस्टार उनकी आखिरी लड़ाई थी,जिसमे वह सफल हुईं,लेकिन उन्हें अपनी आहुति देनी पड़ी. 31 अक्टूबर1984 को अपने अंगरक्षकों द्वारा ही वह मारी गईं.1948 में महात्मा गाँधी मारे गए थे और 1984 में इंदिरा गाँधी. दोनों साम्प्रदायिक वैमनस्य के कारण मारे गए.लेकिन दोनों घटनाओं में एक बड़ा फर्क था.1948 में गाँधी के मारे जाने पर सांप्रदायिक दंगे बंद हो गए थे,लेकिन 1984 में शुरू हो गए.क्यों?जवाब देना आसान नहीं है. इससे इंदिरा गाँधी और कांग्रेस का चरित्र भी परिभाषित होता है.

निसंदेह इंदिरा गाँधी नेहरू नहीं थी.हो भी नहीं सकती थी. नेहरू होना इतना आसान नहीं है. जैसा कि उन्होंने स्वयं एक बार कहा था -‘हमारे पिता संत थे ,लेकिन मैं  राजनीतिज्ञ हूँ’. सचमुच इंदिरा जी राजनीतिज्ञ ही थी.लेकिन,मर्दों के बीच काम करती एक ऐसी राजनीतिज्ञ,जिन्हे अपने स्त्री होने का थोड़ा गुमान था.
उनके जन्म-शती समापन वर्ष में यथोचित सम्मान.

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फिल्म पद्मावती पर सेंसर किये जाने की स्त्रीवादी मांग


अरविंद जैन 

फिल्म पद्मावती के खिलाफ एक ओर तो समाज के भीतर परंपरावादी ताकतों और सत्ता तन्त्र के गठजोड़ के साथ उग्र प्रदर्शन  इतिहास और फिक्शन के खांचे में बहस के विषय हैं लेकिन क्या दोनो ही पक्ष-फिल्मकार और प्रदर्शनकारी सती क़ानून 1987 के दायरे में सजा के हकदार नहीं हैं. एक ओर जौहर/सती का महिमामंडन करता फिल्मांकन  और दूसरी ओर ‘जो रोज बदलते शौहर वे क्या जानें जौहर’ जैसे नारों के साथ प्रदर्शन के जरिये जौहर/सती का महिमामंडन करते प्रदर्शन. अरविन्द जैन का विश्लेषण:

इतिहास अपनी जगह, परम्पराएं अपनी जगह और राजपूती आन-बान अपनी जगह. लेकिन 1987 के सती एक्ट के बाद, यानी रूप कंवर सती काण्ड के बाद  देश भर में महिलाओं  के आक्रोश के बाद बने क़ानून के आलोक में फिल्म बनने और उसके प्रदर्शन को समझना चाहिए और फिल्म के विरोध के प्रदर्शनों को भी. भारत में सती प्रथा पर रोक तो लार्ड विलियम बेंटिक और राजाराम मोहन राय के जमाने में ही लग गयी थी. लेकिन 1987 के ‘सती प्रिवेंशन एक्ट’ ने यह सुनिश्चित किया कि सती की पूजा, उसके पक्ष में माहौल बनाना, प्रचार करना, सती करना और उसका महिमामंडन करना भी क़ानूनन अपराध है.  इस तरह  पद्मावती पर फिल्म बनाना, उसे जौहर करते हुए दिखाना, सती का प्रचार है, सती का महिमामंडन है और इसलिए क़ानून का उल्लंघन भी. यह एक संगेय अपराध है और इसका काग्निजेंस सेंसर बोर्ड को भी लेना चाहिए. क्योंकि सेंसर बोर्ड को भी जो गाइड लाइंस हैं वह स्पष्ट करती हैं कि कोई भी फिल्म ऐसी नहीं हो सकती जो क़ानून के खिलाफ हो या संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ जाती हो.  इसलिए सेंसर बोर्ड को भी देखना चाहिए कि क्या यह फिल्म सती प्रथा का महिमामंडन करती है?  यदि ऐसा है तो उसे फिल्म को बिना कट प्रमाण पत्र नहीं देना चाहिए. अदालतों को भी सु मोटो एक्शन लेना चाहिए था. यह ऐसा ही है कि देश में छुआछूत बैन हो और आप छुआछूत को जस्टिफाय करने वाली फ़िल्में बना रहे हैं. रचना कर रहे हैं.

उस आख़िरी दृश्य में अनारकली !

उधर जो विरोध भी हो रहा है वह भी सती का ही महिमामंडन कर रहा है. परम्परा के नाम पर. लोग सती के पक्ष में नारे लगा रहे हैं.  वे जौहर को आन-बान-शान बता रहे हैं. यह खेल वर्तमान शासक समूह को भी खूब भा रहा है. राज्य और केंद्र में बैठे शासक-प्रशासक इसे हवा दे रहे हैं. उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित भाजपा के कई नेता  फिल्म निर्माता और अभिनेत्री को धमकियां दे रहे लोगों के साथ हैं या उनकी भावना का दोहन कर रहे हैं. अब तो राजस्थान की मुख्यमंत्री विजयाराजे सिंधिया ने भी अपना मुंह खोला है. ये वो लोग हैं जो 1987 में राजस्थान के ‘देवराला सती काण्ड’ के समर्थन में थे और उसके खिलाफ बन रहे क़ानून की मुखालफत कर रहे थे. सिर्फ भाजपा नेता भैरों सिंह शेखावत ने सती प्रथा का तब विरोध किया था.  यह दोधारी मामला है. एकतरफ अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में अमानवीय परम्पराओं का महिमामंडन हो रहा है और दूसरी तरफ लोग इस अभिव्यक्ति के खिलाफ प्रदर्शन इसका महिमामंडन कर रहे हैं – संजय लीला भंसाली और राजपूत संगठन इस मामले में एक सिक्के के दो पहलू हैं और इन सबका फायदा शासक समूह उठा रहा है.

  ‘पिंक’एक आज़ाद-ख्याल औरत की नज़र से

पिछली जो भी फ़िल्में बनी हैं चाहे 1963 में बनी हों..  आज वे रिपीट करना चाहते हैं तो उसपर भी 1987 का क़ानून लागू हो जायेगा. बना लिया ठीक है, लेकिन अब वह सती के प्रचार और महिमामंडन के दायरे में आयेगा. पद्मावती पर इक्का-दुक्का फिल्में ही बनी हैं। डायरेक्टर चित्रापू नारायण मूर्ति निर्देशित तमिल फिल्म चित्तौड़  रानी पद्मिनी 1963 में रिलीज हुई थी। फिल्म में वैजयंतीमाला ने रानी पद्मावती, शिवाजी गणोशन ने चित्ताैड़ के राजा रतन सिंह और उस समय के प्रमुख विलेन एमएन नाम्बियार ने अलाउद्दीन खिलजी का किरदार किया था। फिल्म असफल रही। हिंदी में जसवंत झावेरी के 1961 में फिल्म ‘जय चित्तौड़’  बनी.  1964 में रिलीज ‘महारानी पद्मिनी’ में जायसी के पद्मावत को पूरी गंभीरता से परदे पर उतारा था। महारानी पद्मिनी (1964) में जयराज, अनीता गुहा और सज्जन ने राणा रतन सिंह, रानी पद्मिनी और अलाउद्दीन खिलजी के किरदार किए थे। इस फिल्म में झावेरी ने खिलजी को बतौर विलेन नहीं दिखाया था। फिल्म में खिलजी पद्मिनी से माफी मांगता है। पद्मिनी उसे माफ कर देती और खुद जौहर कर लेती है। इस फिल्म के निर्माण में तत्कालीन राजस्थान सरकार ने सहयोग किया था। सोनी पर सीरियल ‘चित्तौड़ की रानी पद्मिनी का जौहर’ 2009 में प्रसारित हुआ था। पद्मावती से पहले भंसाली ने ओपेरा पद्मावती का निर्देशन किया था। साठ के दशक की किसी भी फिल्म का विरोध नहीं किया गया। ( फिल्म के इतिहास का इनपुट राष्ट्रीय सहारा से)

लग रहे हैं नारे: जो रोज बदलते शौहर वे क्या जानें जौहर 

जाघों से परे ‘पार्च्ड’ की कहानी: योनि नहीं है रे नारी, वह भी मानवी प्रतिष्ठित

एक दूसरा प्रसंग भी इसमें है. यह फिल्म जायसी के ‘पद्मावत’ पर आधारित है. इसके पहली भी इस तरह की फिल्म बनी है. सवाल है कि क्या जायसी के पद्मावत को तोड़-मरोड़ कर अपने हिसाब से परिवर्तित कर फिल्म बनायी जा सकती है? यह कॉपीराइट एक्ट की धारा 57 के खिलाफ है. इस धारा के तहत न तो ऐसी रचनानों को संशोधित किया जा सकता है, न तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है-चाहे वह रचना जायसी की हो, प्रेमचन्द की हो या शरत चन्द्र की या किसी और की.  हालांकि ये रचनाएं पब्लिक डोमेन में आ गयी हैं लेकिन उन रचनाओं को भी कॉपीराइट क़ानून के तहत मोडीफाय नहीं किया जा सकता.

स्त्रीवादी क़ानूनविद अरविंद जैन से बातचीत पर आधारित. सम्पर्क: 9810201120

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सरस्वती और अन्य कविताएँ

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सरस्वती 


उसे नहीं पता की बचपन की सही जगह स्कूल है,
किताबो में उसके जैसे बच्चो का नाम फूल है,
पर सब्जियों के भाव उसे मुंहजबानी रहते है याद,
बाज़ार से हमेशा दो रुपये किलो महंगा रहता है उसके यहाँ प्याज़|
आप कितनी भी सब्जियां लो,
हरी मिर्च डाल कर वो दाम राउंड फिगर पर ले आती है|
उसे भोली समझने की भूल मत करना,
कईयों को तो वो भुल्कियाती है|

सोता आदमी भी जाता है जाग,
जब वो लगाती है हांक|
चाचा ,भैया,दीदी,काकी,
बाप रे ,सारे ग्राहक उसके रिश्तेदार है|
उसके हुनर के आगे तो ,
बिजनेस मैनेजमेंट की क्लास भी बेकार है|
मशीन की तरह सब्जिया तौलती है,
कैलकुलेटर की तरह जोडती है दाम|
एक बार पूछा था मैंने,
सुरसती बताया था अपना नाम|

अन्नपूर्णा 


उसकी सुबह की शुरुआत तू ,तू,मैं,मैं से होती है,
कभी गरजती है,कभी चिल्लाती है ,कभी खाली रोती है|
शाम तक स्टेशन पर चाय बेचकर उसका पति ,
खुद देसी पीकर हो गया था ढेर |
ढहते ,ढीमलियाते अभी घर पहुंचा है,
गोला उगने के बेर|
बच्चे टुअर टापर बने अन्दर बाहर कर रहे है,
अपनी मूकता से भी ना जाने कैसे वो माँ में बेचैनी भर रहे है|
बेचारी माँ कभी बाप के  शर्ट के पौकेट टटोलती है,
कभी घर के डब्बे कनस्तर खोलती है|
आख़िरकार कर ही लेती है,  कुछ पैसो का इंतजाम,
चूल्हा लीप कर ले आती है ,बाजू के किराने दुकान से सामान |
सवा किलो चावल,आधा किलो आलू,अढाई सौ पियाज,
तसली में लेवा लगाके बार देती है आंच|
दुआचिया चूल्हा पर तरकारी भात हो जाता है  तैयार,
बोरारूढ़ खाने लगता है  पांच जन का परिवार|

लक्ष्मी 


मैडम जी ,हमरा पति हमको लक्ष्मीनिया कहता है ,
पीने के बाद तो हरमेशा हमको छमिया कहता है|
कहता है की हमारे गोड में चक्का लगा है,
कहियो घर में कोई और हमसे पहिले नहीं जगा है|अन्दर बाहर,अंगना दुवार रोज लिप के चमकाते है,
सास ,ससुर ,लईका फईका सब के फरमाइश पुगाते है
झारू ,बुहारू,फटकन ,झटकन हम एक तनिका में फरियाते है,
कहता है कि पते नहीं चलता है की हम कब खाएक बनाते है|
साचो मैडम जी ,कोई से आपन घर ना संभलता है ,
हम चार गो घर में कमाते है,
तब भी हम को कभी हारल थाकल नहीं देखिएगा,
हम हरमेशा मस्ती में गीत गाते है |
रोज रात जब हमारा पति आता है,
हमको लक्षमिनिया कह के बुलाता है,
आ जब हम उसके गोड जातते है,
तब धीरे ,धीरे मुस्कियता है |

भवानी

भीड़ भरी बस में वो भारी  टोकरी के साथ जगह बना रही है,
जब हम लजा ,सकुचा रहे है,जाने कैसे वो मर्दों को धकिया रही है|
भर हाथ नाखी चूड़ी पहने ,वो बेफिक्री से पान चबा रही है,
हे भगवान् ,कान तो देखो ,पांच छेदों में वो पांच बालिया,झुमके झमका रही है|
जम्फर पर  छिटदार साडी पहने,

बालो में परांदा झुला रही है |
तिस पर नाक में झुलनी,
ये बंजारन तो कहर बरपा रही है|
“बस रोको कंडक्टर जी” वाह रे ,आवाज में दम है,
पर इस भीड़ भरी बस से टोकरी समेत निकलना ,
क्या किसी जंग से कम है?
ये मैं क्या देख रही हूँ,
झट टोकरी ,पट बच्चा ,फिर एक और बच्चा झट पट उतर रही है,
सर पर टोकरी,कमर पर बच्चा और एक की ऊँगली थामे ,
सरपट चलती वो बंजारन मुझे भवानी नजर आ रही है|

लेखिका:- प्रीति प्रकाश
शोधार्थी,हिंदी विभाग,तेजपुर यूनिवर्सिटी


Email  id-preeti281192prakash@gmai.com


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एक थी रमता और अन्य कविताएँ

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मुकेश कुमार ‘मुकुल’


एक थी रमता

उसे एहसास नही था
लड़की होने का
पुरुष-वर्चस्व वाले समाज में
पुरुषों की ग़ुलामी करने का
पुरुषों के जूतों तले रहने का
सदियों से पैरों में बेड़ियाँ बँधे होने का

राम से आम तक को अग्निपरीक्षा देने का
तुलसीदास की ताड़ना झेलने का
पिता-पति-पुत्र की ग़ुलामी झेलने का,
एक थी रमता…
चल दी डंके की चोट पर उस समाज को चुनौती देने
जिसने सदियों से उसे दासता  मुक्त नही होने दिया
यत्र नारी पूज्यन्ते  तत्र देवता रमन्ते
से अबला हाय तेरी यही कहानी
तक मूर्ख बनाकर
असहाय बना कर
अबला होने का अहसास दिलाने वाले पुरुषों को चुनौती देने

एक थी रमता..
देखा उसने ख्वाब
न्याय का डंडा लेकर
पुलिस की वर्दी में
ठीक करेगी पुरुष-वर्चस्व को
महिलाओं का मान-सम्मान बढ़ाकर
करेगी प्रहार सोच पर
बदलेगी सामाजिक धारा

लेकिन
लेकिन यह हो न सका
कुचल दिये गये उसके अरमान
मारे जाने के पहले कुचला गया उसका अस्तित्व
यह सन्देश था कि कोई रमता न बने

चलो देते हैं चुनौती इस वर्चस्व के खेल को
हर घर से पैदा करते हैं एक रमता

2.
अब रुक भी जा.
क्यों बोझ उठा रही हो
इस ग़ुलाम संस्कृति का
श्रृंगार के नाम पर पैरों में पायल पहना दिया
कि पायल की खनकती आवाज झंकृत करती  है पुरुष- मन मस्तिष्क को
लेकिन सदियों से मूर्ख बनाये गए तुम
पायल नही हैं ये
ये तो बेड़ियाँ हैं

सभ्यता पागल और अपराधी  के नाम पर
डालती है बेड़ियाँ
यही सन्देश है पुरुष-वर्चस्व का
क्या तुम अपराधी हो
या उनकी परिभाषा की पागल

ख़ूबसूरती के नाम पर नाक में नथिया डाल दिया गया
कि नाक में चमकता नथिया पुरूषों को आसक्त करता है
शृंगार नही है

यह तो नाथ है
जो कथित मरखंड जानवरों को नाथा जाता है
ताकि जब वे भड़कें, विद्रोह करें पालतूपन से
तो नाथ पकड़कर
परास्त किया जा सके

इसलिए रुक, रुक जा साथी
उतार फेक जुआ
इस गुलाम संस्कृति का

परिचय :-मुकेश कुमार ‘मुकुल’ प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी हैं।

(अरवल जिला के पिढ़ो निवासी रमता की सेना/पुलिस में भर्ती होने की तैयारी करने/दौड़ने के दौरान कुछ दरिदों द्वारा अस्मिता तार-तार कर उसकी हत्या कर दी गयी)

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भारत की मानुषी छिल्लर ने जीता मिस वर्ल्ड 2017 का ताज



मानुषी छिल्लर से पहले साल 2000 में बॉलिवुड और हॉलिवुड की सफल ऐक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा भारत की तरफ से मिस वर्ल्ड बनीं थी। 20 साल की मानुषी छिल्लर 67वीं मिस वर्ल्ड हैं। वह मेडिकल की स्टूडेंट हैं और कार्डिएक सर्जन बनना चाहती हैं। मानुषी को पैराग्लाइडिंग, बंजी जंपिंग और स्कूबा डाइविंग जैसे स्पोर्ट्स पसंद हैं। इसके अलावा मानुषी ट्रेंड इंडियन क्लासिकल डांसर हैं और स्केचिंग और पेंटिंग भी बनाती हैं।



मिस वर्ल्ड बनना मानुषी के बचपन का सपना था। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, ‘बचपन में, मैं हमेशा से इस कॉम्पिटिशन में हिस्सा लेना चाहती थी और मुझे यह कभी नहीं पता था कि मैं यहां तक पहुंच जाऊंगी। अब मिस वर्ल्ड का खिताब जीतना केवल मेरा ही नहीं बल्कि मेरी फैमिली और दोस्तों का भी सपना बन गया था।’ मिस वर्ल्ड में जाने से पहले मानुषी समाजसेवा के कार्यों से भी जुड़ी रही हैं। उन्होंने महिलाओं की माहवारी के दौरान हाइजीन से संबंधित एक कैंपेन में करीब 5000 महिलाओं को जागरूक किया है।

दीपा कर्माकर से पीवी सिंधु तक: विपरीत परिस्थितियों में खेल और जीत रही हैं लडकियां

बता दें कि 1966 तक कोई भी एशियन महिला ने मिस वर्ल्ड का खिताब नहीं जीता था। 1966 मेडिकल फाइनल इयर की स्टूडेंट रीता फारिया भारत से पहली मिस वर्ल्ड बनीं थीं। उसके बाद ऐश्वर्या राय ने 1994, डायना हेडन ने 1997 में, युक्ता मुखी ने 1999 में और प्रियंका चोपड़ा ने साल 2000 में मिस वर्ल्ड का खिताब जीता था।

उनसे पहले ये खिताब 17 साल पहले 2000 में प्रियंका चोपड़ा ने जीता था. चिल्लर ने चीन के सान्या शहर एरीना में आयोजित समारोह में दुनिया के विभिन्न हिस्सों से 108 सुंदरियों को पछाड़ कर यह खिताब अपने नाम किया है.

साभार :-एन.डी.टीवी इंडिया,नवभारत टाइम्स


मिस वर्ल्ड 2016 की विजेता प्यूर्टो रिको की स्टेफनी डेल वैले नई विश्व सुंदरी को प्रतिष्ठित ताज पहनाएंगी. चिल्लर हरियाणा की रहने वाली हैं और उन्होंने इस साल फेमिना मिस इंडिया 2017 का खिताब जीता था.

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हिन्दी कविता में मुक्तिबोध के पूर्वज थे जयशंकर प्रसाद – प्रो.मैनेजर पाण्डेय

हिन्दी भाषा-साहित्य और समाज-विज्ञानों में शोध की दुनिया आज विमर्शों के दबाब में हैं. जिसके कारण आकर -ग्रंथों के निर्माण और उन ग्रंथों पर शोध की प्रवृति में भी कमी आई है. ऐसे दौर में डॉ.कमलेश वर्मा तथा डॉ. सुचिता वर्मा द्वारा लिखित एवं सम्पादित तथा “द मर्जिनालाइजड पब्लिकेशन,वर्धा”द्वारा प्रकाशित “प्रसाद काव्य-कोश”का आगमन अत्यंत सुखद अहसास है.

बायें से दायें : ओमप्रकाश सिंह, सुधा सिंह, मैनेजर पाण्डेय, अर्चना वर्मा, विश्वनाथ त्रिपाठी, कमलेश वर्मा

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के SSS-1 सभागार में इस काव्य-कोश के विमोचन एवं परिचर्चा कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ आलोचक प्रो. मैनजेर पाण्डेय ने कहा कि प्रसाद मूलतः सभ्यता-समीक्षा के कवि हैं जिसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण उनकी अमर महाकाव्यात्मक कृति “कामायनी”है.  प्रसाद के काव्य और उनके नाटकों में आये गीतों का गंभीर अध्ययन करने पर हम पायेंगे की उनकी कविता गहरी विचारशीलता,गंभीर सामाजिक-सांस्कृतिक एवं दार्शनिक चिंतन तथा गहन वैचारिक द्वंद्व की कविता है जिनकी विरासत का सच्चा प्रतिनिधित्व आगे की कविता में मुक्तिबोध करते हैं . इस दृष्टि से जयशंकर प्रसाद हिन्दी कविता में मुक्तिबोध के पूर्वज थे. जिस गहन सामाजिक-सांस्कृतिक तथा वैचारिक द्वन्द का आरम्भ प्रसाद की कामायनी में होता है उसकी तीव्रता और गहन तनाव आगे मुक्तिबोध की लम्बी कविता”अँधेरे में” दीखता है.  यही कारण है कि प्रसाद की प्रसाद की काव्य-भाषा अपने अर्थ तक ठीक-ठीक पहुँचने के लिए अलग काव्य-कोश की मांग करती है.  डॉ.कमलेश वर्मा ने यह कोश तैयार कर इस अभाव की पूर्ति की है जिसके लिए वे बधाई के पात्र हैं.

सावित्रीबाई फुले रचना समग्र 

प्रो.ओमप्रकाश सिंह ने काव्य-कोशों के आवश्यकता बताते हुए कहा कि हिन्दी की अनेक क्लासिक कृतियों के कॉपीराईट मुक्त होने के बाद दृष्टिहीन प्रकाशन उपक्रमों की भीड़ द्वारा उन कृतियों के गलत मुद्रण ने भी कविता में अर्थ का संकट पैदा किया है.  ऐसी स्थिति में काव्य-कोश हमें कविता के मूल अर्थ तक ले जाने में मदद करते हैं.  उन्होंने स्वयं द्वारा “प्रसाद ग्रंथावली”तथा”भारतेन्दु-समग्र” के संपादन के अनुभवों का हवाला देते हुए कहा कि यदि हम कामायनी के मूल संस्करण और आज बाज़ार में उपलब्ध कामायनी के संस्करणों की तुलना
करेंगे तो हमे पाठालोचन की आवश्यकता महसूस होगी .

चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु ग्रंथावली 

अपना वक्तव्य देते हुए सुधा सिंह बायें से दायें : ओमप्रकाश सिंह, मैनेजर पाण्डेय,  कमलेश वर्मा, धर्मवीर और रेणु

कार्यक्रम में डॉ. सुधा सिंह तथा डॉ.अर्चना वर्मा ने स्त्रीवादी दृष्टि से प्रसाद की कविता पर विचार का आग्रह किया.  डॉ.सुधा सिंह ने कहा कि स्त्रीवादी नजरिये से बात करते हुए अक्सर प्रसाद की “ध्रुवस्वामिनी”पर ही बात होती है लेकिन “प्रलय की छाया”मुझे इस दृष्टि से अपील करती है. डॉ. अर्चना वर्मा ने कोशकार की इस स्थापना से अपनी असहमति व्यक्त कि “प्रसाद प्राय:अबूझ शब्दों का प्रयोग नहीं करते .”

बहुजन परम्परा की किताबें 

द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन की किताबें

वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने छायावादी-कवियों के भाषा निर्माण पर बात करते हुए कहा कि प्रसाद की कविता गहरे दार्शनिक और सांस्कृतिक बिम्बों से निर्मित कविता है जिसकी ठीक- ठीक पड़ताल के लिए इस कोश की नि:संदेह गहरी उपयोगिता है और डॉ कमलेश वर्मा इस श्रमसाध्य कार्य के लिए बधाई के पात्र है.  कार्यक्रम का संचालन धर्मवीर ने किया.

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“आम औरत की दैहिक या मानसिक यातना के लिए दहकते सवाल“

नीलम कुलश्रेष्ठ


जिंदगी की तनी डोर, ये स्त्रियाँ, परत दर परत स्त्री सहित कई किताबें प्रकाशित हैं.
सम्पर्क:  .kneeli@rediffmail.com,

 आदरणीय सुधा अरोडा जी की पुस्तक मंगाने से पहले उसकी  समीक्षा लिखने के अपने निर्णय से पहले मैंने सोचा भी नहीं था कि मैं एक जटिल चुनौती को आमंत्रित कर रहीं  हूँ। इस पुस्तक में  स्त्रियों की एक एक समस्या ,उनके बौद्धिक विश्लेषण ,बरछी की नोंक जैसे दिल में उतर जाते शब्दों से लहूलुहान होकर मैं समझ पाती हूँ कि  किस तरह `कथादेश `के स्तम्भ `औरत की दुनियाँ `में एक एक तराशे -संजोये सुधाजी के शब्द पहले भी अपने नियमित स्तम्भ लेखन के कारण धारदार हैं।

बरसों  पूर्व `जनसत्ता `के` वामा `स्तम्भ की ऐसी लेखिका का स्तम्भ पुरुष सम्पादकों ,उपसंपादकों के पुरुष वर्चस्ववादी षड्यंत्र ने बंद करवा दिया था। सुधाजी की आत्मकथ्य `में इस बात  को पढ़कर पाठक दुखी हो सकते हैं.   सुधा जी भी उन दिनों टूटी  होंगी लेकिन इससे  मिलते जुलते अपने अनुभवों से स्वयं गुज़र कर मुझे लगता है कि किस तरह एक समर्थ लेखिका ने इस सत्ता  को झकझोर कर रख दिया होगा जो सब षणयंत्र करने पर मजबूर हुए।

 घर के खर्च के लिए कितने पुरुष खुशी खुशी रुपया देतें हैं  ?एक एनजीओ में शिकायत लेकर आई स्त्रियों के दर्द से उन्होंने जाना। सुधा जी ने अपने लेख में इस बात को रेखांकित किया है कि आजकल की मांए जी जान से बेटियों के कैरियर बनाने में जुटीं हैं जिससे उनके हाथ में भिक्षा पात्र न हो. वे प्रश्न भी करतीं हैं कि यदि औरत होने का मतलब सिर्फ घर व बच्चों की देखभाल हो तो इनमें  कितनी बेटियां अपने बच्चों को स्वतंत्र होकर  पाल पाएंगी ? कुछ दमदार स्त्रियों का बूता है कि वह पति को अहसास दिला सकतीं हैं कि वह भिक्षा नहीं मांग रहीं ,न वे घुसपैठिया हैं , न चुप रहने वाली।

आज कॉर्पोरेट्स में काम करने वाली लड़की अपना घर बनाने का दमखम रखतीं हैं लेकिन उनकी संख्या है कितनी है?ये पुस्तक संपत्ति अधिकार की बात भी करती है कि किन घरों में स्त्रियों को सम्पत्ति में  अधिकार दिया जाता है या कितना अपना हक मांग  पातीं हैं ?या रिश्तों की ऊष्मा बचने के लिए चुप रहना ही पसंद करतीं हैं। नासिरा शर्मा जी की कहानी `मेहर `पड़ने  के बाद मैंने कुछ मुस्लिम महिलायों से पूछा था कि क्या उन्हें मेहर दिया जाता है ?उनका उत्तर  था कि ये सिर्फ मौखिक  ही दुल्हिन को दिया जाता है.

शौहर शादी के बाद सुहागरात को ही उसे बहला फुसलाकर `मेहर `की रकम मुआफ़  करवा लेता है। कभी वह`मेहर `की रकम मांगती है तो उसे काइयाँपन से बहलाया जाता है ,“तुम और हम लोग थोड़े ही हैं ?मेरा सब कुछ तो तुम्हारा ही है। “

` यह भिक्षापात्र विरासत में  देने के लिए नहीं है`,`आदर्श औरत की परिभाषा `,`और चुप रहे तभी महान है `आदि अनेक लेख `वामा `स्तम्भ में स्त्री समस्यायों की परत दर परत  उघाड़ते रहते थे। हिंदी अकादमी ,दिल्ली से पुरस्कृत गुजराती लेखिका बिंदु भट्ट ने एक महिला दिवस के कार्यक्रम में कहा था ,“सब स्त्रियाँ अपने माता पिता से छोटे मोटे  झगड़े करतीं हैं। बहिन को या  भाभी को चार साड़ियां दीं हैं ,मुझे दो ही दी हैं.उन्हें आगे बढ़कर संपत्ति के अपने अधिकार के  लिये लड़ना चाहिए। “
              
 ऐसा  ही आवाहन करने वाली सुधा जी `मनुस्मृति संस्करण सन १९९७ `से एक ऐसे मूलभूत कारण को इंगित कर रहीं हैं कि  किस तरह लड़कियों को गोरखपुर  की प्रेस की एक पुस्तक द्वारा स्त्री को सिर्फ़ माँ ,बेटी व  पत्नी के खाने में फ़िट किया जाता था। बरसों पूर्व हर लड़की को ये पुस्तक उसकी शादी में दी जाती थी। इसे पढ़ कर उसका दिमाग इतना पंगु हो जाता था की अपने अस्तित्व व अधिकारों के लिए लड़ने की बात सोच नहीं सकती थी। तभी अखबार ऐसी खबर से भरे रहतें हैं -`झुलस कर विवाहिता की मृत्यु `,`युवती ने खुदखुशी की `,नवविवाहिता की संदेहास्पद मौत ,`दहेज़ प्रतारणा `.इस किताब ने भी इन दुर्घटनाओं के होने में  अहम भूमिका निबाही   थी.

 सुधा जी  ने लिखा है कि ये समाज फ्रेंच लेखिका सीमोन  द `बुवा `की पुस्तक `द सेकेण्ड सेक्स. `,तसलीमा नसरीन की ,`औरत होने का हक़ में `.अरविन्द जैन की `औरत होने की  सज़ा `[ये मैं अपनी तरफ़  से लिख रहीं हूँ लता शर्मा की पुस्तक `खिड़की के पास वाली जगह `[मेधा बुक्स ,देल्ही ]तो लड़कियों व उनके माँ बाप को ज़रूर पढ़वानी चाहिए। साथ ही मेरी पुस्तकें `जीवन की तनी डोर ;ये स्त्रियाँ `[मेधा बुक्स ],`परत दर परत स्त्री `[नमन प्रकाशन ],`मुझे जन्म दो माँ `[संतोष श्रीवास्तव ]]आदि  समाज क्यों नहीं पढ़ने  को देता जबकि गोरखपुर प्रेस की पुस्तक की दस लाख से ऊपर प्रतियां बिक चुकी हैं।

पुस्तक के अनुसार कलकत्ता जैसे शहर की राजस्थानी महिलायें अपनी छोटी बच्चियों के साथ राजस्थान सती मेला देखने जातीं हैं। वे सोचने की ज़हमत नहीं उठातीं कि उस जैसी हाड़ मांस की स्त्री  आग की चिंगारियों में किस तरह ज़िंदा ,तड़पते ,चीखते जान दी होगी। तो उसका मृत्यु उत्सव मनाने में  कैसा नृशंस आल्हाद है ?

मेरे लिए गिरिजा व्यास इसलिए आदर की पात्र हैं कि उनके विरोध के कारण राजस्थान सरकार सती चौरों को पर्यटन स्थल का दर्ज़ा नहीं दे पाई थी वर्ना देवीत्व की असीम सीमाएं छूने वाली भारतीय स्त्री का विदेशों में और भी डंका बजता। ऐसी महिमा से और भी परिवार अपने घर की विधवाओं की सती की आड़ में ह्त्या करते।

औरत बनने की उम्र से पहले की उम्र की लड़कियों की आत्महत्या की छानबीन में कोलकत्ता की  प्रख्यात  अनुवादक सुशील गुप्ता की भतीजी कीर्ति  गुप्ता भी शामिल हैं। उस घर में  तीन पीढ़ियों  बाद विवाह का आयोजन हो रहा था। कीर्ति ने वरपक्ष की अंधाधुंध मांगों से तंग आकर शादी से एक महीना  पहले आत्महत्या करके पिता को कर्ज़ से बचा लिया। एक दूसरी लड़की ने कॉलेज की रैगिंग से घबरा कर जान दे दी। सुधा जी की कलम ढ़ूढ़ने का प्रयास करती है कि हमारे सामजिक ,शैक्षणिक क्षेत्र में क्या कमी है जो हमारी लड़कियाँ ऐसा कायरता पूर्ण कदम उठातीं हैं ,अपने  भविष्य का गला घोंट डालतीं हैं.इस शब्दों को पढ़ कर कुछ लोग तो चिंतन करें ऐसी दुर्घटनाएं फिर ना हों।

स्त्री जब बच्चों को पाल पोस कर बड़ा कर देती है ,होना तो ये चाहिए कि वह चैन से बैठकर एक एक सांस लेकर  इत्मीनान से ज़िंदगी बिताये लेकिन कभी कभी सुनियोजित षडयंत्र से पागल करार करके मानसिक अस्पताल में पहुंचा दी जाती है। इस पुस्तक की उपयोगिता तभी पता लगती है जब `तहलका `की इन्वेस्टिंग टीम पर्दाफ़ाश करती है कि किस तरह से मनोचिकित्सक को रुपए खिलाकर कोई भी अपनी पत्नी को पागल होने का प्रमाण पत्र पा सकता है। सोहेब इल्यासी जैसे लोग कोर्ट से क्लीनचिट पाकर गर्दन ऊंची किये निकलते हैं। स्त्रियां ही क्यों स्टोव से जलतीं हैं  ? किसी रंजिश या अपने काबू में नहीं आ रही स्त्री को वस्त्रहीन करके गाँव में  घुमाया जाता है।एन आर आई पतियों द्वारा विदेशों में क्यों पत्नियाँ मार दी जातीं हैं या पागल करार कर दी जातीं हैं या वह प्रताड़ित होकर ,नस काटकर मरने को मजबूर हो जातीं हैं।

इस दूर  दूर तक पहुंचवाली पुरुष व्यवस्था  के अपराधी पंजे पुलिस ,कोर्ट ,अस्पातल  ,कैरियर  ख़राब करने के लिए कहाँ कहाँ पहंच सकतें हैं। एक क्राईम थ्रिलर फ़िल्म की साथी  अपराधी महिला का अक्सर अन्त में अपने साथी द्वारा ही गोली से से भून दी जाती है  या लूट  का मालकर वह अकेले ही फ़रार हो जाता है।

सुधा जी की कलम आपको कहाँ कहाँ झांकने का अवसर देगी। आप चहारदीवारी में सुरक्षित भारतीय देवी की कथाएं पढ़िए जिन्हें डर लगता है ,“मेरे पति  की पहुँच दूर दूर तक है। कहीं वो मुझे पागलखाने ना भिजवा दें। “

नाबालिग उम्र से शोषण की शिकार फूलनदेवी किस तरह `बेंडिट क्वीन `बनकर बंदूक़ उठा लेती है। इसमें लेख है शेखर कपूर की फ़िल्म का जिसमें वे कैमरे की आँख लिये दलित महिला जीवन के उतार चढ़ाव की ,उसके वहिशयाना शोषण व उसकी बगावत में वहशी बन जाने की दास्तान को सेल्युलाइड पर उकेरते हैं। लोग शेखर कपूर पर `एलीट `वर्ग के लिए फिल्म बनाने का आरोप लगाते हैं। सुधा जी की तीक्षण आँख कलम के ज़रिये जुबां खोलती है कि इसे घर घर में दिखाना चाहिए। जिसने ये फ़िल्म  देखी है  वह समझ सकतें हैं कि जैसे अशोक मेहता का कैमरा भिंड,मुरैना में चम्बल की घाटियों में ऊँचे नीचे मिट्टी बीहड़ों में बलखाता घूमता चलता  है ,ऐसा ही है स्त्री जीवन ,ऐसा लगता है  –हम बेहद दुर्गम व ख़तरनाक रास्तों से गुज़र रहे हैं।

 जब मैं अहमदाबाद में ये समीक्षा लिख रही थी तो एक अजीब इत्तेफ़ाक हुआ था। नई नौकरी लगा बेटा बोला था ,“आज शनिवार है। हम  कुछ दोस्त एक दोस्त के यहां फ़िल्में देखेंगे,लंच  वहीं लूंगा। हम लोग `बवंडर ` फिल्म ढूंढ़ रहे हैं। मम्मी ये फ़िल्म वही  है न जब हम छोटे थे नानी  के घर आप बड़े लोगों ने हम  बच्चों को भगाकर ,कमरा बंद करके ये फ़िल्म देखी थी। “

 “हाँ ,–नहीं —वह फ़िल्म `बेंडिट क्वीन `थी। `बवंडर `की स्क्रिपट राइटर की पुस्तक सुधा अरोड़ा की पुस्तक की   मैं आजकल समीक्षा लिख रहीं हूँ। “

 मैं उससे यह भी कहना चाहतीं हूँ ,“अब तुम बड़े  हो गए हो ऐसी फ़िल्में ढूंढ़ कर देखो  ,तुम्हारी माँ ने स्त्री समस्यायें सुनकर तुम्हारे कान पकाये हैं ,वह नंगा सच आंखों से देखो। “

स्त्री से जुड़ा एक जघन्य अपराध है बलात्कार।स्त्री की उम्र ३ वर्ष  से लेकर कुछ भी हो सकती है। ये पुस्तक अनेक  बलात्कार के बहुचर्चित  काण्ड पर व उस पर बनी फ़िल्म ` बवंडर `की अंदरूनी कहानी कहती है कि पुरुष व्यवस्था किस तरह तरह स्त्री को डराकर रखना चाहती है -`कोर्ट में बलत्कृत स्त्री मुक़दमा करती है तो हार जाने पर बलात्कारी जयघोष करते हैं ,`नाक कटी किसकी ,मूंछ कटी किसकी ,इज़्ज़त घाटी किसकी `का जयघोष करके उसे चुप रहने पर मजबूर करना चाहती है। ऐसे बलात्कारियों के छूट जाने पर सुधा जी सुझाव देतीं हैं कि स्कूलों में यौनशिक्षा तुरंत अनिवार्य हो और स्वयंसिद्धा जैसे स्वरक्षा के प्रशिक्षण केम्प लगाएं जाएँ .यहां मुझे नमिता सिंह जी  की  कहानी याद आ रही है `गणित `.एक ढाबे वाले की पत्नी पिटाई करने वाले अपने पति की पुरुष व्यवस्था की प्रतीक डंडी तोड़ देती हैं।

इस पुस्तक में `मीडिया में औरत `प्रभाग में इस फ़िल्म के बहाने दिखाया है  कि कैसे भंवरी बाई का पहले दैहिक शोषण होता है ,फिर समाज उसका मानसिक शोषण करता है। उसी के बलात्कार को  एनकैश करके कैसे उसकाआर्थिक शोषण किया जाता है। सुधा अरोरा जी ने इस की स्क्रिप्ट लिखने की राशि भँवरी  बाई के नाम  कर दी थी  .वह भी उस तक नहीं पहुँचाई गई थी।   इस फिल्म के अंत में समाज सेविका  बनी दीप्ति  नवल एक संवाद बोलती हैं ,“भंवरी बाई को न्याय नहीं मिला तो क्या हुआ ? उस ग्रामीण महिला ने आवाज़ उठाने का साहस तो किया। शी इज़ अ लेजेंड  .“

इस केस के सात आठ साल बाद भंवरी बाई के दुस्साहस की प्रतिध्वनि गुजरात के पाटन मे दिखाई दी। प्राथमिक शिक्षा का प्रशिक्षण देने वाले संस्थान  में रहने वाली एक आदिवासी लड़की पर छ;प्रशिक्षक महीनों बलात्कार करते रहे जिनमें एक विकलाँग  भी था इस लड़की ने अपनी शिक्षिका की सहायता से ऍफ़ आई आर लिखवा दी थी बाप पांच लाख के लालच में बिकने को तैयार हो गया था। इस पर सामजिक ,राजनीतिक दवाब पड़ने लगा। वह आत्महत्या पर भी उतारू हो गई। अंतत; डीआई  जी ,एक महिला पुलिस अधिकारी डॉ. मीरा रामनिवास जी व एन जी ओ से सहारा मिला और उसने  केस जीतकर एक इतिहास रचा।
           
शोभा डे जिसने जिस तरह प्रिंसेस डायना की मौत पर टिप्पणी की है। सुधा जी उनकी ख़बर  ले डालतीं हैं। वे बहुत गहन संवेदना से रेखांकित करतीं हैं कि ब्रिटेन  के राजप्रसाद में रही डायना  और संसार की  हर स्त्री का दुःख सार्वभौमिक है। उसके सामने दो रास्ते हैं -पति की आवारगी को झेले या बगावत कर दे और फिर समाज से जुड़कर उसके दर्द का इतना निदान करे  कि  उसकी मौत पर बच्चे ,बूढ़े व सभी नौजवान रो पड़ें।
        
इस पुस्तक की उपलब्धि है कुरान की नारीवादी व्याख्या ,सुन्नत का विवरण व हज़रात मुहम्मद  को नारीवादी बताना .सफिया बीवी व इमराना काण्ड पर इस पुस्तक में सटीक टिप्पणी की है।
 

      
सुधा जी उन पाखंडी नारीवादी महिलाओं को बेनक़ाब करने  से नहीं चूकतीं जो पुरुष प्रधान सत्ता का प्रतिरूप या राजनेताओं की कठपुतली बन जातीं हैं। उनके लिए नारीवादी होना एक धंधा है। ऐसी स्त्रियों के लिए सुधा जी के शब्द हैं ,“—-फिर महिला दिवस पर औरत होने का जश्न मनाने के बजाय दो मिनट मौन रखने के अलावा क्या विकल्प रह जाएगा ?“

(मार्च 2009 हंस में प्रकाशित)

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