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घूस-यार्ड

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने महत्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com



सूरज निकलने से पहले ही वह ‘शूटिंग’ के लिए निकल पड़ता और जब लौटता तो सड़क के किनारे-किनारे बसी झोपडि़यों में से किसी बूढ़े आदमी के खाँसने की आवाज रह-रह कर सुनाई पड़ती।

गेंहुए रंग के ‘रफ एंड टफ’ चेहरे पर उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में शायद कोई ‘टेलीलैंस’ फिट था और दिमाग में ‘माइक्रो फिल्म।’ चलता हुआ वह घने जंगल के अंधेरे में अकेले टहलते चीते के समान लगता था, जरा-सी आहट होने पर उसके कान खरगोश की तरह खड़े हो जाते और पलक झपकते ही वह सांप की तरह गायब हो जाता। बुलबुल, मैना या मोर की आवाज सुनते ही उसके चेहरे पर बिज्जू-सी चमक आ जाती। दिन में वह कबूतर-सा शांत मगर रात को रीछ-सा बेचैन नजर आता। बसन्त आता तो वह महीनों कमरे पर नहीं लौटता और रंग-बिरंगी तितलियों व फूलों की तलाश में भटकता रहता। आषाढ़ के दिनों में कमरे से बाहर ही नहीं निकलता और ढेरों किताबें दीमक की तरह चाट जाता। गर्मियों में छत पर सोता और देर गए तक चांद का पीछा करता रहता। सर्दियों में सारी रात साल भर से जमा रद्दी अखबार जलाकर आग सेंकता और सारा दिन कमरे में सोता रहता। ‘शूटिंग’ पर जाते हुए रास्ते में कहीं कोई नदी पड़ती तो कपड़े व झोला किसी पेड़ की खोह में रख देता और खुद घंटों मछली की तरह नदी में तैरता रहता। जमीन पर बने पांव के निशान देखते ही वह फौरन समझ जाता कि कौन-सा जानवर यहां से गुजरा है और निशानों के पीछे-पीछे तब तक चलता रहता, जब तक निशान दिखना बंद नहीं हो जाते।

कभी-कभी ‘शूटिंग’ से जल्दी निपट आता, तो लौटते वक्त वह पुराने किले के सामने कोर्ट-कैंटीन में जा बैठता। एक तो यहां खाना अच्छा मिलता, दूसरे कैंटीन रास्ते में ही पड़ती थी सो समय खराब नहीं होता। तीसरा कारण यह था कि कैंटीन के बाहर-भीतर, इधर-उधर घूमते बिलाव, बलुटनें और बिल्लियां देखना उसे अच्छा लगता था।वह जैसे ही कैंटीन के पास पहुंचता तो वहां आधे सफेद-आधे काले रंग के मोटे-ताजे विलावों के पीछे-पीछे दुबली-पतली बिल्लियां ओर छोटे-मोटे बलुटनें घूमते हुए दिखाई पड़ते। दरवाजे के दाई ओर पौधों की ओट में बैठे कुछ बिलाव और बिल्लियां नजर आतीं। एक बिलाव “मॉडर्न ब्रेड” खा रहा होता तो दूसरा पंजों में दबाकर हडृी पर बचा मांस नोच रह होता। बिल्लियाँ टुकुर-टुकुर बिलावों की तरफ देखती रहतीं। उसे लगता कि इनके हाथ हडृी नहीं लगी है। बिलाव हडृी चूस-चासकर फेंक देते तो बिल्लियाँ उन्हें चाटने लगतीं। दरवाजे के दूसरी तरफ थोड़ी ही दूरी पर एक छोटा सा पार्क था जिसमें कुछ बिलावों को घास पर लेटे देखकर उसे लगता जैसे धूप सेंक रहे हों। पार्क और दरवाजे के बीच के कमरे में टाइपिस्ट और कोर्ट स्टैम्प बेचने वालों की मेज- कुर्सियों के चारों ओर बिल्लियाँ घूमती रहती और बुलटनें कोने में दुबके बैठे रहते। खिड़की के नीचे कोई बिलाव सो रहा होता कोई घात लगाए बैठा होता। धीरे-धीरे चलती बिल्लियों को गौर से देखने के बाद चलता पेट से हैं। वह इतने ध्यान से इन्हें देखता रहता जैसे रिसर्च कर रहा हो। यह सब देखते- देखते वह बिलावों और बिल्लियों की रोचक व रहस्यमय दुनिया में खो जाता। उसे ध्यान ही नहीं रहता कि वह यहाँ लंच करने आया था- समय बचाने के लिए और इतना समय बिलावों व बिल्लियों के चक्कर में बरबाद कर दिया।

उसे ध्यान आता तो वह जल्दी-जल्दी अन्दर घुसता और एक जगह खड़ा होकर बैठने के लिए जगह ढूंढता, खाली जगह मिलती तो जाकर बैठ जाता और वेटर के आने का इंतजार करता लेकिन उसके दिमाग में बिलाव व बिल्लियाँ घूमते रहते। वह सोचता कि इन पर सोचने से क्या फायदा? पर……लंच करते हुए वह अक्सर देखता कि एक मेज पर बिलाव ‘कोल्ड कॉफी’ पी रहे हैं तो दूसरी मेज पर बिल्लियाँ चाय की चुस्कियाँ ले रही हैं। बिलावों के हाथ कभी-कभी “चीज सैंडविच” लग जाते तो कभी मटन हेमबर्गर। बलुटनें और बिल्लियाँ जूठी प्लेटें चाटकर भी खुश नज़र आते। जब कभी कोई बिलाव ऐसी प्लेटें बिल्लियों के लिए छोड़ देता तो बिल्लियाँ बड़े कृतज्ञ भाव से बिलाव की और निहारती और बिलाव बड़े गर्व से उन्हें देखता हुआ किसी और मेज की ओर बढ़ जाता। मोटे-ताजे बिलावों को वेटर ‘सरकारी बिलाव” कहते थे। वैसे किसी बिलाव को वेटर ‘प्रधान जी’ कहते और किसी को महामंत्री।’ वेटरों ने बिल्लियों के भी अलग-अलग नाम रख रखे थे जैसे किसी का बिजली तो किसी का शर्मिली।
एक दिन उसने वेटर को कहा, ‘‘भई, यह क्या है? देखो बिलाव और बिल्लियाँ इन बर्तनों में मुहँ मारते रहते हैं और इन्हीं बर्तनों में तुम….।’’ चुपचाप सुनता वेटर बीच में ही बोल पड़ा, ‘‘साहब! हम क्या कर सकते हैं? आप ही लोगों के पाले हुए हैं।’’ दूसरा वेटर भुनभुनाता हुआ बोला,‘‘ जनाब! आप लोगों के सहारे इनका पेट भर जाता हैं तो इसमें क्या बुरा है?’’
वह सुनता, सोचता झल्लाता और कोने में लगे जाले, छत पर उल्टे लटके चिमगादड़ और दीवार पर चिपकी छिपकालियाँ देखता रहता।

कभी-कभी लंच के बाद कैंटीन से निकलकर, सीढियाँ चढ़ता और एयरकंडीशंड बिल्डिंग के अंदर लायब्रेरी में “टाइम्स” या “न्यूज वीक” पढ़ने बैठ जाता। यहां भी बिलाव और बिल्लियां उसका पीछा नहीं छोड़ते। उस दिन तो वह यह देखकर बहुत देर हंसता रहता कि एक कोने में ढेर लगी ‘कांस्टीट्यूशन’ की मोटी-मोटी किताबों के बीच कोई बिलाव सो रहा है तो दूसरे कोने में कोई बिलाव इनकम टैक्स और कंपनी केसेस के ढेर में घुसा ऊंघ रहा है। कमरे में तीन तरफ ऊपर तक लगी किताबों की हर अलमारी के नीचे कोई बिलाव ध्यानमग्न बैठा होता तो कोई चुपचाप अपन पंजे चाट रहा होता। कोई अपनी पूंछ गोल किए छत की ओर घूरता रहता तो कोई पंजों से अपनी खोपड़ी खुजलाता हुआ नजर आता। बिल्लियां सोफों के नीचे रेस्ट कर रही होती हैं और बलुटनें बिल्लियों या बिलावों को ढूंढते हुए इधर-उधर परेशान से घूमते रहते। अलमारी में लगी किताबों के पीछे से जब कोई बिलाव गंभीर मुद्रा में निकलता हुआ दिखाई पड़ता तो उसे वह चिन्तन में डूबे किसी विद्वान प्रोफेसर-सा नजर आता। यह देखते-देखते उसकी नजरों के सामने बहुत-सी रिवाल्विंग चेयर और उन पर बैठे बिलाव चक्कर काटने लगते।

रास्ते में उसे याद आता कि जब वह छोटा था तो पिताजी की मृत्यु के बाद रसोई में रखा दूध अकसर बिलाव पी जाता और उसे बिना दूध पिए ही स्कूल जाना पड़ता था। मां ने बहुत उपाय किए, गांव के बड़े-बूढ़ों से पूछा, कई बार शहर भी गई लेकिन… कभी-कभी तो हर दूसरे-तीसरे दिन बिलाव सारा दूध पी जाता। हारकर मां ने छत के कुंडे से रस्सी बांधकर काफी ऊंचा छींका बनाया और दूध वहीं रखकर सोती। इसके बाद भी बिलाव आता रहा लेकिन दूध उसके हाथ नहीं लगता। एक रात बिलाव ने जाने कैसे छींके तक छलांग लगाई और दूध बिखेरकर अंधेरे में भाग गया। उस दिन के बाद बिलाव फिर कभी नहीं आया। उसे अब समझ आया था कि शायद यही कारण है कि वह अपने कमरे पर चाय बनाने के लिए डिब्बा बंद दूध इस्तेमाल करता है। थोड़े दिन बाद तो उसे ऐसा लगने लगा जैसे वह जहां कहीं भी जाता है कोई न कोई बिलाव या बिल्ली नजर आ ही जाती है। कबाड़ी बाजार से लेकर संसद तक कोई ऐसी जगह नहीं, जहां उसने बिलाव या बिल्ली न देखे हों। वह जब भी उन्हें देखता, पहचानने की कोशिश करता और बार-बार उसे लगता कि ये वही कोर्ट कैंटीन वाले बिलाव या बिल्लियां हैं। कभी-कभी उसे लगता जैसे इनका भी ‘प्रमोशन’ और ‘डिमोशन’ होता रहता है। तभी तो कोर्ट कैंटीन वाले बिलाव संसद कैंटीन में और संसद कैंटीन बाले बिलाव कोर्ट कैंटीन में दिखाई पड़ते हैं। कभी सोचता जैसे साइबेरिया से उड़कर पक्ष हर साल सर्दियों में भरतपुर आ जाते हैं, वैसे ही ये भी गर्मियों में कश्मीर, मसूरी या शिमला चले जाते होंगे। कभी उसके दिमाग में आता कि दूसरे देशों में जाने के लिए तो पासपोर्ट और वीसा बनवाने की जरूरत पड़ती है, तब वे कैसे जाते होंगे? वह घंटों तक उलझा रहता फिर यह सोचकर टाल देता कि हो सकता है कि किसी की टोकरी में छुपकर बैठ जाते हों और बिना पासपोर्ट और वीसा के दुनिया भर की सैर कर लेते हों ।

‘दि ग्रेट प्राइम मिनिस्टर्स कालोनी’ से गुजरते हुए उसने कई बार कुछ ‘काले-बिलाव’ देखे थे लेकिन वे कोर्ट कैंटीन में देखे बिलावों जैसे नहीं थे। एक दिन ‘शूटिंग’ से लौटते हुए उसने जाना था कि ‘काले बिलाव’ दरअसल बिलाव नहीं, जंगली कुत्ते हैं जो बहुत खुंखार होते हैं। बड़े-बड़े वनमानुष इन्हें अपनी सुरक्षा के लिए पालतू बनाकर रखते हैं। वह बार-बार सोचता ये बड़ी-बड़ी कोठियों में खूब ठाठ से पलते होंगे। डनलप के गद्दे, एयरकंडीशंड कमरे, लंबी-लम्बी कारें, मीट, मुर्गे, दूध, बिस्कुट…. लेकिन बाद में उसे पता लगा कि वास्तव में ये जंगली नहीं हैं, इन्हें ट्रेंड करके जंगली बनाया गया है और इनका काम बहुत जोखिम भरा होता है। वनमानुषों की जान बचाने के चक्कर में कई बार इन्हें खुद जान से हाथ धोना पड़ता था। कभी-कभी कोई जंगली कुत्ता पागल हो जाता तो वह वनमानुष की ही बोटी-बोटी करके चबा जाता। ऐसे पागल कुत्तों से तो वनमानुष भी डरते होंगे। फिर सोचने लगता कि कुत्ते पागल होते क्यों हैं?

कोर्ट कैंटीन जाते-जाते धीरे-धीरे उसने जाना कि यहां कोर्ट में जितनी फाइलें हैं उससे अधिक चूहे हैं। कुछ अच्छे खासे मोटे-ताजे चूहे और कुछ थोड़ा कमजोर से। कुछ चूहे तो सचमुच मरियल और बीमार नजर आते। कुछ तो तीन-तीन पीढि़यों से यहीं हैं। कुछ चूहे आपस में लड़त रहते और कुछ बेहद थके हुए उदास-उदास से घूमते रहते। मोटे ताजे चूहे हमेशा मस्त नजर आते। कुछ चूहे भारी फाइलों के नीचे दबकर मर जाते और किसी को पता नहीं लगता। ज्यादातर चूहे शायद इसलिए लड़ते थे कि एक चूहे ने दूसरे चूहे के बिल पर कब्जा कर लिया है या उधार लिया अनाज नहीं लौटा रहा है। चूहों और चुहियों के बीच अकसर इसलिए झगड़ा रहता कि चूहा चुहिया को ठीक से खाने के लिए नहीं देता, मारता-पीटता है या चुहिया को बिल से बाहर निकाल दिया है। कभी-कभी एक चुहिया, दूसरी चुहिया से इसलिए लड़ती कि चूहे के बिल व अनाज पर असली हक उसका है और वह ही चूहे की असली घरवाली है।

ऐसे चूहों की सुरक्षा के लिए बहुत सोच समझकर ‘एअर टाइट’ दरवाजे और खिड़कियां बनवाई गई हैं। लेकिन कभी-कभार खिड़की खुली रह जाती तो बिलावों के हाथ कुछ चूहे ही आ जाते। अकसर बिलाव मोटे-ताजे चूहों पर हाथ नहीं डालते लेकिन कभी-कभी मोटा-ताजा चूहा अपने भार, बुढ़ापे और सुस्ती के कारण भाग नहीं पाता इसलिए बिलावों की पकड़ में आ जाता। किसी बिलाव के हाथ जब कोई मोटा-ताजा चूहा लग जाता तो वह बिल्लियों और बलुटनों के साथ मिल-बांटकर खाता और उस समय ऐसा लगता जैसे किसी पांच तारा होटल में कोई शानदार पार्टी हो रही हो।

जब कभी ‘शूटिंग’ पर जाने में देर हो जाती तो वह सुबह के नाश्ते के लिए भी कोर्ट कैंटीन चला जाता। उसने कई बार देखा था कि सुबह एक बड़ी सी नीली गाड़ी कैंटीन के सामने आकर रुकती। गाड़ी के अगले और पिछले दरवाजे से कुछ कुत्ते बाहर निकलते। पता नहीं क्यों मटियाले रंग के सभी कुत्तों के गले में चमड़े का पट्टा पड़ा रहता और हर पट्टे पर अलग-अलग नम्बर। कुछ कुत्ते गाड़ी के आगे और कुछ पीछे खड़े हो जाते। चारों तरफ से चौकन्ना कुत्तों की देख-रेख में गाड़ी के अंदर से एक-एक करके बहुत से छोटे-छोटे पिंजरे निकले जाते। हर पिंजरे में बंद चूहे के पंजों में छल्ले पड़े रहते और हर छल्ले पर अलग-अलग नम्बर। पिंजरों में चूहे अधिक, चुहियां कम दिखाई पड़ती। ध्यान से देखने के बाद मालूम पड़ता कि किसी का सिर फूटा हुआ है तो किसी के पंजे कटे हुए हैं। किसी के पेट पर खून जमा होता है तो किसी की पूंछ गायब होती। चूहों के खाने के लिए पिंजरे में रोटी के टुकड़े पड़े रहते। पिंजरे में छटपटाते चूहों को देखकर उसे लगता जैसे बहुत देर से प्यासे हैं और उसका मन करता कि वह उन्हें थोड़ा पानी पिला दे, मगर कुत्तों के डर से चुपचाप खड़ा-खड़ा देखता रहता। छोटे-छोटे पिंजरे में कोई चूहा इसलिए बंद होता कि उसने किसी चूहे के बिल से अनाज चुराया था तो कोई इसलिए कि उसने किसी और की चुहिया को अपने बिल में छुपा रखा था। कुछ चूहे इसलिए बंद थे कि मोटे-ताजे चूहों के बिल के सामने धरना देकर बैठे थे तो कुछ इसलिए कि वे जानबूझकर आस-पास के चूहों को बिना वजह डराते-धमकाते थे। सभी पिंजरे कुत्तों की निगरानी में सारा दिन अलग-अलग कमरों में रखे रहते और शाम को नीली गाड़ी में भरकर न जाने कहां चले जाते।

एक दिन वह सूरज छिपने के कुछ देर बाद कैंटीन गया था। उसे ठीक तरह से तो याद नहीं था लेकिन उसे लगता था जैसे चाबियों का गुच्छा यहीं कैंटीन में कहीं रखकर भूल गया है। कैंटीन बंद हो चुकी थी लेकिन वह फिर भी इधर-उधर टार्चलाइट में चाबियों का गुच्छा ढूंढने की कोशिश करता रहा। चाबियां तो उसे नहीं मिलीं पर इस बीच अचानक टार्च लाइट में उसने देखा और देखता रहा कि एक मोटा चूहा किसी भारी फाइल को अपने दांतों में फंसाए घसीटता हुआ ले जा रहा है। वह चूहे के पीछे-पीछे भागा लेकिन चूहा फाइल समेत न जाने कहां गायब हो गया।

वह मोटे चूहे के इस कारनामें से बेहद हैरान था और चाबियां न मिलने के कारण परेशान भी। वह सोचता-सोचता पैदल ही चलने लगा। वह कभी चाबियां के बारे में सोचता तो कभी मोटे चूहे के बारे में। रास्ते में उसे ख्याल आया कि वह मोटा चूहा दरअसल चूहा नहीं ‘घूस’ होगी। उसे याद आने लगा कि मां ने उसे एक बार बताया था कि घूस चूहे की तरह ही होती है पर काफी मोटी। घूस दिन में दिखाई नहीं पड़ती। अंधेरा होने के बाद किसी गंदी नाली से निकलकर बाहर आती है। घूस नीचे ही नीचे सारी जमीन और घर की नींव का खोखला कर देती है। छोटे से छोटे रास्ते में से भी मोटी घूस आसानी से निकल जाती है। अलमारी में पीछे से सारी किताबों को कुतर-कुतरकर ढेर लगा देती है और सामने से देखने पर लगता है जैसे सब ठीक-ठाक है।

वह रास्ते भर घूस के बारे में ही सोचता रहा और फिर अचानक उसे लगा कि कहीं उसकी चाबियों का गुच्छा भी घूस तो उठाकर नहीं ले गई। उसे डर लगने लगा कि कहीं घूस उसके कमरे का ताला खोलकर सारा सामान लेकर चम्पत न हो जाए। वह जल्दी-जल्दी चलने लगा। ज्यों-ज्यों वह आगे बढ़ता उसका डर भी बढ़ने लगा। डर के मारे उसकी रफ्तार और तेज हो गई।गली के मोड़ पर पहुँचा तो वहाँ घुप्प अँधेरा था। वह एक क्षण रुका, बीड़ी सुलगाई और कमरे के पास आकर माचिस की तीली की रोशनी में ताला ढूँढने लगा। ताला सही सलामत देखकर उसकी जान मे जान आई। ताले में अटकी पर्चियाँ जेब में ठूंसी और हिम्मत करके उसने एक ईट उठाईं। दो- तीन बार में ही ताला खुलकर उसके हाथ में आ गया। उसे लगा कि वह  नाहक ही डर रहा था। ताला तोड़ने की आवाज सुनकर कोई पड़ोसी बाहर निकलकर नहीं आया। पड़ोस की दुनिया सोती रही। उसने दरवाजा बंद किया और अखबार उठाकर तख्त पर आ बैठा। देर गए तक वह ‘बोफार्स’ व ‘फेयरफैक्स’ की ख़बरें पढ़ता रहा और सारी रात उसके दिमाग में ‘घूस’ कुतर-कुतर करती रही।

अगले दिन वह ‘शूटिंग’ पर नहीं गया, सारा दिन कमरे मे पड़ा सोता रहा और उसे सारी रात नींद नहीं आई। वह बार-बार बीड़ी सुलगाता, पानी पीता और अखबार पलटता रहा लेकिन दिमाग में घुसे बिलावों, बिल्लियों, बलुटनों, चूहों, कुत्तों और घूस को भगा नहीं पाया। वह उनके बारे में कुछ भी न सोचने की कोशिश में बार-बार यही सोचता रहा कि शायद हर बिलाव अपने-अपने इलाकों के चूहों को अपना शिकार समझता है इसलिए एक बिलाव भले ही अपने इलाके के किसी चूहे को मारकर खा जाए लेकिन किसी दूसरे बिलाव को खाने नहीं देता। अगर कोई बाहरी बिलाव किसी चूहे को खा जाता या खाने की  कोशिश करता है तो बिलावों मे खूब लड़ाई होती है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि कोई बिलाव अकेले किसी चूहे को नहीं मार पाता है, तब वह बाहरी बिलावों की मदद लेता है और बदले में थोड़ा हिस्सा उन्हें भी दे देता है। बिलाव जब लड़ते हुए दिखाई पड़ते हैं तो उसका एक ही कारण होता है। एक चूहे पर किसी बिलाव का एकाधिकार। वरना बिलाव आपस में प्यार से खेलते, खाते, घूमते नजर आते हैं। वैसे एक बिलाव दूसरे बिलाव को होली-दीवाली या नए साल की खुशी में चूहे मारकर उपहार में भी भेजता है।

‘ब्लैक एंड व्हाइट बिलाव सारी दुनिया को सिर्फ ब्लैक एण्ड व्हाइट में ही देखते हैं क्योंकि उनमें बाकी रंग देखने की क्षमता और संवेदनशीलता होती ही नहीं है। उसे लगता है कि मोटे-ताजे बिलावों के पीछे-पीछे पूंछ हिलाते हुए घूमते रहना बिल्लियों और बलुटनों की मजबूरी है। पूंछ नहीं हिलायंगे तो बिलाव चूह मारने के गुर नहीं सिखाएगा और वे भूखे मर जाएगे। सच तो यह भी है कि चूहे मारने की ट्रेनिंग लेते हुए बलुटनें दरअसल खुद एक दिन मोटा-ताजा बिलाव बनने के सपने देखते रहते हैं पर कोई-कोई बलुटना ही बड़ा होकर मोटा-ताजा बिलाव बन पाता है वरना अधिकतर बलुटनें तो सारी उम्र बिलावों के पीछे-पीछे पूंछ हिलाते ही रह जाते हैं। बिलावों के मरने के बाद उसकी जगह उसके अपने बलुटनें ही लेते हैं और अगर किसी बिलाव का अपना कोई बलुटना न हो तो बाकी सारे बिलाव मिल-बांटकर उसके सारे चूहे खा जाते हैं।

चूहों के बारे में सोचते-सोचते उसे मालूम होता कि बिलाव के हाथ चूहे सिर्फ इसलिए लग जाते हैं कि आपस में लड़ते हुए चूहों को बिलाव का पता ही नहीं लगता होगा। चूहे आपस में न लड़ें तो हो सकता है कि बिलाव के हाथ कोई चूहा न लगे। उसे लगता कि शायद चूहे भी इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं, तभी तो कई बार लड़ाई होने पर आपस में ही सुलह-समझौता कर लेते हैं ताकि बिलाव के हाथों मारे जाने से बच जाएं। पर फिर भी यह सोचते-सोचते वह इस नतीजे पर पहुंचता कि जब कोई बिलाव किसी चूहे को मारकर खा जाता है तब उसके परिवार के अन्य चूहे बदला लेने की भावना से बिलाव की सारी किताबें कुतर डालते हैं। चूहे समझते होंगे कि बिलाव सारा दिन किताबों में घुसे रहते हैं इसलिए उन्हें किताबों से बहुत प्यार है या किताबों के ढेर में घुसे रहना उन्हें सबसे अच्छा लगता है। जब चूहे बिलावों की किताबें कुतर जाते होंगे तो बिलाव को गुस्सा आता होगा और वह पहले से अधिक चूहे मारना शुरू कर देता होगा। लेकिन उसकी समझ में यह कभी नहीं आया कि बिलाव चूहे मारकर खा जाते हैं इसलिए चूहे किताबें कुतरते हैं या चूहे किताबें कुतरते हैं इसलिए बिलाव चूहे मारता है।
उसने अभी तक सुना था कि कुत्ते बिलावों की आपस में कभी नहीं बनती लेकिन कोर्ट-कैंटीन के बाहर उसने कुत्तों और बिलावों को आस-पास बैठे, खाते, खेलते व घूमते कई बार देखा था। वह सोचता  कि कुत्तों को लोग वफदार और स्वामिभक्त मानते हैं इसलिए घर की रखवाली के लिए पालतू बनाकर रखते हैं। पालतू कुत्तों को लोग प्यार से खाने के लिए डबल रोटी, बिस्कुट, अंडे, मीट… भी देते हैं। कुत्ता अपने मालिक द्वारा देने पर ही कुछ खाता है। चोरी करके खाना उसकी आदत नहीं होती। लेकिन बिलाव को अक्सर घरों में पालतू बनाकर नहीं रखा जाता क्योंकि वह हर वक्त इस ताक में रहता है कि मालिक इधर-उधर हो तो उसे दूध-मलाई चाटने का मौका मिले। बिलाव जब भी दबे पांव दूध पीने के लिए रसोई की ओर बढ़ता है तो कुत्ता भौंकने लगता है। ऐसे में घर वाले सावधान हो जाते हैं और बिलाव के हाथ दूध नहीं लगता। यही कारण है कि कुत्ते और बिलावों की आपस में नहीं बनती।

लेकिन कैंटीन वाले बिलाव लगता है बहुत चालाक हैं। इसलिए कुत्तों को भी बराबर खाने के लिए कुछ न कुछ देते रहते हैं। इसलिए बिलावों को देखकर न कुत्ते भौंकते हैं और न किसी को पता चलता है कि बिलाव दूध मलाई चाट रहे हैं इस बीच पीछे से कोई चूहा पिंजर से भाग भी निकलता है तो कुत्ते थोड़ी देर भौंकभांक कर चुप हो जाते हैं।बिलावों, बिल्लियों, बलुटनों, चूहों और कुत्तों के बीच इन सारी ‘एडजस्टमैंट्स’ और ‘कन्ट्राडिक्शन्स’ को वह बार-बार नए दृष्टिकोण से समझने की कोशिश करता रहता। उसे लगता कि बिलावों,  बिल्लियों और बलुटनों  के बिना कुत्ते उदास नजर आते हैं और कुत्तों के बिना बिलाव, बिल्लियां ओर बलुटनें असुरक्षित महसूस करते हैं। बिलाव, बिल्लियां और बलुटने चूहों की तलाश में सारा दिन लगे रहते हैं। कोई चूहा मिल जाता है तो खुश दिखाई पड़ते हैं, नहीं मिलता है तो ऐसे लगता है जैसे बिना शिकार के कोई शिकारी वापस लौट आया हो। कुत्तों को जिस दिन कैंटीन में कोई मुर्गा हाथ लग जाता है तो शाम तक मूछों पर जीभ फेरते रहते हैं। कुत्तों और बिलावों में कभी-कभार झगड़ा होता नजर आता है लेकिन थोड़ी ही देर बाद सब फिर पहले जैसे खेलते, खाते, घूमते दिखाई पड़ते हैं।उसे लगता कि चूहों की आपसी लड़ाई और अकेले होने की कमजोरी का फायदा कुत्ते और बिलाव दोनों उठाते हैं। बिलावों और कुत्तों में वास्तव में कोई बैर नहीं है बशर्ते कि मिल-बांटकर खाने को बराबर मिलता रहे। सारी लड़ाई किसी एक द्वारा अकेले सब कुछ हड़प् कर जाने की है।

कुछ दिन बाद, जब भी उसे घूस का ध्यान आता तो वह यह सोचकर डरने लता कि घूस ने नीचे ही नीचे सारी जमीन खोखली कर दी होगी। जमीन पर पांव रखते हुए उसे भय रहता कि कहीं वह धंस न जाए। सड़क पर जाते हुए वाहन जब दूर जाकर दिखना बंद हो जाते तो उसे लगता जैसे धरती में समा गए होंगे। कमरे में सोते हुए उसे लगता जैसे रात को दीवार के नीचे दब जाएगा। बार-बार किताबें निकालकर देखता कि कहीं घूस कुतर तो नहीं गई। वह बार-बार सोचता कि धरती के नीचे बिल बना रही घूसों की कुतर-कुतर की आवाज लगातार बढ़ती जा रही है। कमरे में घुसता तो डर लगता, बाहर घूमता तो बेचैनी होती कि किसी तरह अपने कमरे पर पहुंच जाए। कुछ दिन बाद तो घूस के भय से वह इतना आतंकित हो गया कि शूटिंग पर जाने से भी डरने लगा। किसी से कहता कि घूस ने नीचे ही नीचे सारी जमीन खोखली कर दी है तो लोग हंसते और कहते, ‘‘लगता है पागल हो गए हो।’’

उस दिन वह कोर्ट-कैंटीन कई दिन बाद पहुंचा था। कैंटीन में घुसते ही उसने चारों ओर नजर घुमाकर देखा लेकिन एक भी बिलाब, बिल्ली या बलुटना नजर नहीं आया। अजीब सन्नाटा था। उसकी समझ में ही नहीं आया कि आखिर वे सब कहां चले गए। वह तेजी से कदम बढ़ाता हुआ अंदर पहुंचा तो हाल में मुश्किल से दो-चार लोग ही बैठे थे। वहां भी उसे कोई बिलाव, बिल्ली या बलुटना नजर नहीं आया। वेटर आया तो उसन आर्डर देने से पहले उससे पूछा, ‘‘भाई, यहां जो बिलाव, बिल्लियां और बलुटनें घूमते रहते थे…?’’
वेटर ने सुना तो हंसने लगा और मजाक के लहजे में बोला, ‘इंडिया गेट घूमने गये होंगे।’’
वह वेटर के मुंह की तरफ देखता रहा। वेटर ने चुप्पी तोड़ी और बोला, ‘‘क्या लाऊं साहब।’’
उसने चाय पी और बाहर निकलने ही वाला था कि तभी उसके पास वह टाइपिस्ट आ खड़ा हुआ जो उसे अक्सर वहां आता देखकर पहचानने लगा था।
टाइपिस्ट ने नमस्ते की और पूछा, ‘‘क्यों जनाब कैसे हो?’’
उसने कहा, ‘‘अच्छा हूँ… पर वो बिलाव, बिल्लियां और….?
टाइपिस्ट ने बताया, ‘‘अरे भाई जान, क्या पूछते हो। कुछ दिन हुए पता नहीं कहां से एक ‘‘जंगली कुतिया’’ यहां घुस आई और टॉयलट के बाहर सोये एक बलुटने को मुंह में दबाकर भाग गयी। तब से यहां कोई बिलाव, बिल्ली या बलुटना दिखाई नहीं पड़ रहा। कहते हैं, सब जंगल में उस जंगली कुतिया को ढूंढ रहे हैं।’’

वह वहां से फिर ‘‘शूटिंग’’ पर चला गया और रात को देर गए कमरे पर पहुंचा। रास्ते भर उसे लगता रहा कि घूस उसका पीछा कर रही है। लेटे-लेटे वह न जाने क्यों बार-बार बिलावों, बिल्लियों, बलुटनों, कुत्तों, चूहों और घूस के बारे में सोचता रहा। उसने देखा कि वह कोर्ट कैंटीन में बैठा चाय पी रहा था कि तभी एक बहुत जोर का धमाका हुआ जैसे कोई बम फटा हो। सब कुछ के साथ वह भी धीरे-धीरे नीचे धंसने लगा और उसके ऊपर किताबें, फाइलें और मलबा गिरने लगा। थोड़ी देर बाद उसके चारों ओर पानी ही पानी और पानी में तैरती किताबें फाइलें और मरे हुए चूहे नजर आने लगे। काफी हाथ-पैर मारने के बाद वह ठीक से खड़ा हो पाया तो उसे लगा जैसे वह किसी लंबी अंधेरी गुफा में फंस गया है। वह धीरे-धीरे सुरंग में चलने लगा। काफी दूर पहुँच कर उसे ध्यान आया कि उसके पास टार्च है। टार्च जलने की बहुत कोशिश करता रहा पर टार्च जली ही नहीं। वह धीरे-धीरे अंधेरे में ही चलता रहा। घंटों सुरंग में चलते-चलते वह हांफने लगा और उसे बाहर निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आया। वह एक पल सोचता कि इस सुरंग से निकलना मुश्किल है पर दूसरे ही क्षण उसे लगता कि आखिर कहीं न कहीं तो खत्म होगी ही। वह चलता रहा… चलता रहा… और जब हल्की-सी रोशनी दिखाई देने लगी तो उसकी सांस में सांस आई। कुछ कदम और चलते ही उसके सामने जानी-पहचानी संसद कैंटीन थी और कैंटीन में लंगूर ही लंगूर। वह बिना कुछ और देखे सीढि़यां चढ़ने लगा। जब बाहर निकला तो उसने देखा कि वहां गुम्बद पर गड़े लोहे के पोल पर झंडा लहरा रहा है, चारों ओर बनी इमारतें धरती में धंस गई है और आकाश में चीलें मंडरा रही हैं।

जब आंख खुली तो उसे लगा जैसे दमघोंटू विषैली गैस में घिर गया है और मरे हुए चूहों की गंध उसकी नस-नस में भरती जा रही है। वह जल्दी से उठा, जूते पैरों में फंसाये और झोला उठाकर कमरे से बाहर निकल आया। रास्ते में चाय की दुकान पर अखबार उठाकर देखा तो पहले पेज पर दो फोटो छपे थे। पहले में बहुत से बिलाव, बिल्लियां और बलुटनों एक झाड़ी को चारों ओर से घेरे खड़े हैं मगर झाड़ी में जंगली कुतिया का नामोनिशान तक नहीं है। दूसरे में-एक बड़ी सी कोठी के बाहर लॉन में कुर्सी पर बैठा वनमानुष पांव चाटती घूस की पीठ पर हाथ फेर रहा है, सामने गुर्राने की मुद्रा में जंगली कुतिया खड़ी है और चारों तरफ पहरा देते काले बिलाव घूम रहे है।
फोटो के नीचे उसका अपना नाम छपा था।

वह जब चाय पीकर उठा तो उसे ध्यान आया कि सूरज निकलने में अभी समय है और उसे ‘शूटिंग’ पर जाना है।

समाप्त






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डा. अम्बेडकर की पहली जीवनी का इतिहास और उसके अंश

संदीप मधुकर सपकाले 


डा. अम्बेडकर  की प्रमुख जीवनियों में  चांगदेव भवानराव खैरमोड़े द्वारा लिखित जीवनी (मराठी, प्रथम खंड प्रकाशन 14 अप्रैल 1952), धनंजय कीर द्वारा लिखी डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर  की जीवनी ‘Dr. Ambedkar: Life and Mission’ (अंग्रेजी, प्रकाशन 1954) तथा चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु द्वारा लिखित जीवनी ‘बाबा साहेब के जीवन संघर्ष’ (हिन्दी, प्रकाशन 1961) हैं. इन सारी जीवनियों से पहले डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  के जीवन काल में उनके समकालीन तानाजी बालाजी खरावतेकर ने सन 1943 में ‘डॉ.अम्बेडकर ’ शीर्षक से एक जीवनी लिखी थी.  संदीप मधुकर सपकाले बता रहे हैं इस पहली जीवनी के बारे में और उसका हिन्दी अनुवाद भी प्रस्तुत कर रहे हैं. पढ़ें  इस जीवनी के लेखन की प्रक्रिया का प्रसंग और जीवनी के  कुछ अंश: 



“चवदा एप्रिल एक्यानौ साली (1891) साली महू गावत जन्माला आला…झो बाळा, झो, झो रे, झो”पाळणा गीत
मराठी लोकगीतों की एक शैली ‘पाळणा’हैं जिसका शाब्दिक अर्थ ‘झूला’ है | बच्चें के जन्म के बाद जब उसे पहली बार झूले में डाला जाता हैं तब घर-परिवार की स्त्रियों द्वारा उस बच्चे को झूलाते हुए डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  की जीवन गाथा को गाने की इस लोकशैली को ‘पाळना’ कहा जाता है|

मराठी के लोकगीतों में डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  का व्यक्तित्व युगपुरुष महानायक के रूप में आता हैं | मराठी लोकगीतों में ईश्वर भक्ति के लिए जहाँ एक ओर पुराणकथा और हिंदू मिथकीय मान्यताओं के गीत पीढ़ियों से चले आ रहे हैं उसी लोक में डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  के संघर्षपूर्ण जीवन-कार्यों से प्रेरित होकर दलितलोक ने परम्परा से चले आ रहे कल्पित वर्णन विषयों को त्यागकर डॉ.अम्बेडकर  के जीवन दर्शन को उन्ही परंपरागत लोकगीतों की शैली का विषय बनाया | कालांतर से अम्बेडकर  आंदोलन की पृष्ठभूमि में इन लोकगीतों की हिंदू आस्थाओं, मान्यताओं और कथाओं के स्थान पर प्रमुखता से डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  का जीवन और दर्शन व्याप्त हो गया|
क्या आप जानते हैं गांधी की पहली जीवनी लेखिका कौन थीं, कब और किस भाषा की थीं ?

डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  के जीवन काल में उनके समकालीन तानाजी बालाजी खरावतेकर नेसन 1943 में ‘डॉ.अम्बेडकर ’ शीर्षक से एक जीवनी लिखी थी | इस जीवनी का लेखन उन्होंने कराची में किया था | श्रीयुत व्यंकटेश बा. ठाकुर की प्रेस रविकिरण छापखाना, असायलम रोड़, रणछोड़ लाइंस, कराचीमें महायुद्ध की स्थिति में उत्त्पन्न समस्याओं में कागज के अभाव के चलते 29 फरवरी 1946 को ‘डॉ.अम्बेडकर ’ जीवन चरित्र का मुद्रण प्रकाशन संभव हुआ था | जीवनी लेखक तानाजी बालाजी खरावतेकरइस जीवनी की भूमिका में लिखते हैं-
“डॉ.बाबासाहेब अम्बेडकर  की जीवनी को मैंने तीन वर्ष पहले ही लिखा था लेकिन कागज की कमी के चलते यह प्रकाशित नहीं हो पायी थी | पिछली जनवरी में रविकिरण के उत्साही प्रबंधक श्री व्यंकटेश ठाकुर को कागज का लाइसेंस मिल गया था उसके मिलते ही उन्होंने इस जीवनी की छपाई की सारी जिम्मेदारी अपने पर ली इसलिए मैं मानता हूँ कि इस जीवनी के प्रकाशन का वास्तविक श्रेय उन्हें जाता हैं इस कार्य के लिए उनका जितना भी आभार माना जाए कम हैं | अब लाइसेंस तो मिल गया था लेकिन बाबासाहब के जन्मदिन के अवसर पर इस जीवनी का प्रकाशन भी किया जाना था | कागज की कमी के चलते मुझे इस जीवनी से आधे से ज्यादेकी सामग्री कम करनी पड़ी थी |मैं जानता हूँ कि इस जीवनी में कई कमियां भी रह गयी हैं लेकिन दूसरी आवृत्ति के सुयोग से इस कमी को मैं जरुर पूरा कर लूँगा”

आज कराची का नाम सुनते ही पराए देश का भाव हमारे मन में पैदा होता हैं | सन 47 के पहले कराची जब बॉम्बे प्रेसिडेंसी का हिस्सा हुआ करता था उस समय कोंकण और मुंबई से सैनिक एवं अन्य सरकारी सेवाओं में बड़े पैमाने पर अम्बेडकरी समुदाय कराची में रहा करता था | डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  की मराठी भाषा में जीवनी लिखनेवाले लेखक तानाजी बालाजी खरावतेकर का जन्म कराची के इसी परिवेश में हुआ था | यह निश्चित ही माना जा सकता हैं कि खरावतेकर ने अपने पददलित अस्पृश्य जाति बांधवों में डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  के जीवन दर्शन को प्रसारित करने के उद्देश्य से इस जीवनी का लेखन किया था | 14 अप्रैल सन 1952 में चांगदेव भवानराव खैरमोड़े ने डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  की बृहद शोध पूर्ण जीवनी के पहले खंड को प्रकाशित किया था | खैरमोड़े द्वारा लिखी जीवनी ‘डॉ.भीमराव रामजी अम्बेडकर  खंड 1 से 15’ आज मराठी में कुल 15 खण्डों में उपलब्ध हैं इस जीवनी के पहले पांच खंड खैरमोड़े के जीवन काल में प्रकाशित हो पाए थे | उसी तरह अंग्रेजी पाठकों तक सन 1954 में धनंजय कीर द्वारा लिखी डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर  की जीवनी ‘Dr. Ambedkar: Life and Mission’ भी पहुंची | हिंदी में डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  की जीवनी चंद्रिकाप्रसाद  जिज्ञासु  ने ‘बाबा साहेब के जीवन संघर्ष’ लिखी , जो 1961 में उनके ही बहुजन प्रकाशन, लखनउ से प्रकाशित हुई | तानाजी बालाजी खरावतेकर के बाद के जीवनीकारों में सी.बी.खैरमोड़े को बाबासाहब अम्बेडकर  का भरपूर सान्निध्य प्राप्त हुआ ठीक उसी तरह धनंजय कीर को उन लोगों का सान्निध्य और सहयोग मिला जिन्होंने प्रत्यक्ष रूप से डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  और अम्बेडकर  आंदोलन को अपना जीवन समर्पित किया था | उपरोक्त दोनों ही स्थिति खरावतेकर के साथ नहीं थी उन्होंने तत्कालीन समय में अपने बौद्धिक सामर्थ्य और 1943 तक उपलब्ध डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  के जीवन और कार्यों को आधार बनाकर पहली जीवनी ‘डॉ.अम्बेडकर ’ की रचना की थी | इस जीवनी को मराठी में पुनः डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  की 125वीं जयंती के अवसर पर ओब्सर्वर रिसर्च फाउंडेशन, मुंबई ने उपलब्ध करवाया हैं |

तानाजी बालाजी खरावतेकर

इस जीवनी के प्रकाशन कार्य के दौरान जीवनी लेखक की तबियत अचानक बिगड़ गयी थी कराची में रहते हुए उन्हें डाक्टरी सलाह दी गयी थी कि मौसम बदलाव के लिए वे मीरज जाए | मीरज में भी जब इस असाध्य रोग ने उन्हें नहीं छोड़ा तब वे मुंबई के किंग जॉर्ज मेडिकल में इलाज के लिए आए थे बाबासाहब की जीवनी के प्रकाशन के तीन माह बाद 5 सितंबर 1946 को खरावतेकर का दुःखद निधन उम्र के 26वें वर्ष में हो गया| डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  के जीवनी लेखक तानाजी बालाजी खरावतेकर मूलतःरत्नागिरी जिले की राजापुर तहसील के ‘खरवते’ गांव के थे | उनकी बाल्यकाल कीशिक्षा से उच्च शिक्षा तक की पढाई कराची में हुई थी | 1945 में मुंबई विश्वविद्यालय से उन्होंने इतिहास विषय लेकर बीए की डिग्री प्राप्त की थी | डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  के बाद कोंकण के अस्पृश्यों में ग्रेजुएट होने का श्रेय उन्हें मिला था | कराची से डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  को लिखे गए उनके एक पत्र से स्पष्ट होता हैं कि खरावतेकर अपने समय के एक प्रतिभासंपन्न उभरते हुए मराठी साहित्यकार भी थे | 

Karachi, 21.5.43
The Hon’bleDr.B.R.Ambedkar,
M.A.,LL.B.,Ph.D., Bar-at-Law,
Member of the Vice-Regal Executive Council, New Delhi.
May it please your honour;
I, the undersigned, TanajiBalajiKharawtekar, beg to state as under for favourable consideration.
I am young man of 22. I have recently appeared for the Inter Arts Examination of the Bombay University through the D.J.Sind College, Karachi and hope to pass it with credit. I belong to the martial Mahar Community of Maharashtra, my mother-tongue being Marathi, in which I have written several stories and articles, and they are published in Marathi papers.
I propose to join the war commission. In case I do so, I will be required to give up my College Education and I will not be able to fulfil my ambition & becoming a double graduate. But if I do not join the commission, I may not get another chance to better my prospects. I am thus in a fix. I therefore approach your honour with a humble request to please guide me, so that I shall be able to raise my status and also be in a position to serve my community, of which, you are sole leader, under your banner.
Hoping to be excused for troubles.
I beg to remain
Sir, Your most obedient servant
T. B. Kharawtekar
New Dubash Building
Napier Street, Karachi (Camp)

डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर  को बड़ी ही तन्मयता और समर्पण के साथ खरावतेकर ने 22 वर्ष की आयु में यह पत्र लिखकर अपनी उत्साही इच्छा को प्रकट किया था | डॉ.अम्बेडकर  के जीवन और कार्यों से प्रेरणा पाकर शिक्षित होनेवाले युवा वर्ग में खरावतेकर अग्रणी थे किंतु अपने शैक्षणिक जीवन को छोड़कर वे कमीशन की नौकरी से अपने अस्पृश्य वर्गों के लिए कार्य करना चाहते थे | खरावतेकर के पत्र को संज्ञान लेते हुए डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  ने उन्हें एक सन्देश भिजवाया था-
“उससे कहों की आगे की शिक्षा भी ग्रहण करेंऔर कमीशन की नौकरी के लिए परेशान न रहे”
“Tell him to take education and not bother about Commissions, etc”
स्पष्ट था कि यहसन्देश मात्र खरावतेकर जैसे शिक्षा ग्रहण करनेवाले युवा तक न होकर उन सभी अस्पृश्य युवाओं के लिए था जो शिक्षित होने के एक कठिन रास्ते पर आगे बढ़ रहे थे | खरावतेकर के पत्र को प्रत्युत्तर  देते हुए डॉ.अम्बेडकर  ने एक ड्राफ्ट तैयार किया था-
“Dear Mr.Kharawtekar,
I have received your letter of the 21st in which you have sought my advice regarding your career. My advice is that you must continue your studies and don’t think of employment until you have completed your academic ambitions.
Yours Sincerely”

विमर्श नहीं, विचारधारा : अस्मितावाद की जगह आंबेडकर-चिंतन

डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  और खरावतेकर के बीच संपर्क का पता इन पत्रों के माध्यम से जाना जा सकता हैं |
डॉ.अम्बेडकर  इस चरित्र ग्रन्थ जीवनी का मराठी भाषा में 70 वर्ष पूर्व प्रकाशन कराची में हुआ था | आंबेडकरी इतिहास के दस्तावेजों में जात-पात तोड़क मंडल के लिए लिखे गए डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  के भाषण का सैद्धांतिक सामाजिक महत्त्व हैं | ‘Annihilation of Caste’ जातिभेद का उच्छेद इस भाषण का तय स्थान लाहौर में था | कोंकण में दलित मुक्ति आंदोलन और अम्बेडकर  साहित्य के अनुसन्धानकर्ता प्रो.रमाकांत यादव को अपने शोधकार्य के दौरान जनता साप्ताहिक की प्रतियाँ मिली थी इस साप्ताहिक में रत्नागिरी जिले के राजापुर से गोवा तक के कार्यकर्ताओं ने 14 मई 1938 में ‘कोंकण मंचमहाल महार परिषद’ का आयोजन कणकवली में आयोजित कि थी जिसकी अध्यक्षता डॉ.अम्बेडकर  ने कि थी इस परिषद के पुराने कार्यकर्ताओं से प्रो.यादव ने साक्षात्कार किए थे इन्हीं साक्षात्कारों के प्रसंग में एक पंपलेट उन्हें मिला जिसमें दक्षिण कोंकण से राजापुर के जनार्दन आर.जाधव, एस.एस.तांबे, जी.एस.खरावतेकर मास्टरजी और काशीराम येसू खरावतेकर ने इस पत्रक के निवेदन में ‘डॉक्टर अम्बेडकर ’ इस जीवनी के प्रकाशन का उल्लेख किया था | प्रो. रमाकांत यादव ने इस जीवनी की एकमात्र प्रति को खरावतेकर के कराची में रहे घनिष्ट मित्र शिवराम कुरुंगकर से प्राप्त किया था | प्रो.यादव ने सन 2010 में इस जीवनी का पुनर्प्रकाशन भी किया था किंतु यह जीवनी फिर भी चर्चा में नहीं आ सकी | कराची छावनी में तत्कालीन समय में ‘आंबेडकरी भजनी मंडल’ की स्थापना के माध्यम डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  के विचारों का प्रसार किया जाता था | इस समय युवा कार्यकर्ताओं में बाळकृष्ण कदम, तुकाराम रत्नाजी मुणगेकर, गोपाळ काळू माने, लक्ष्मण मोहिते-कादवलकर, गोविंद सावंत-करंजेकर प्रमुख थे | म्युनिसिपल कौन्सेलर काळू उमाजी माने ने जनता साप्ताहिक की आर्थिक सहायता के लिए ‘जनता सहाय्य समिति’की स्थापना की थी | कराची के रतन तालाब, सदर में इन कार्यकर्ताओं ने एक कार्यालय बनाया था जिसे कराची में अम्बेडकर  आंदोलन का प्रमुख केंद्र माना जाता था | प्रस्तुत जीवनी से कुछ अंश मूल मराठी से हिंदी में अनूदित कर प्रस्तुत किए गए हैं |

डॉ.अम्बेडकर 
(डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर  की 1946 में कराची से प्रकाशित सर्वप्रथम जीवनी)
जीवनी लेखक- तानाजी बालाजी खरावतेकर, बीए
प्रकरण एक 
वर्णव्यवस्था के समय से दबाएँ-कुचले गए दलित समाज को जागृत अवस्था में लानेवाले बनावटी और दिखावे के हिंदुत्व का हमारे भीतर संचार हुआ है ऐसी शेखी बघारने वाले हिन्दुओं कि छाती पर बैठकर वास्तविक कसौटी परखने वाले और अनायास ही अस्पृश्य वर्ग पर छींटे उड़ाने वाले अधमी लोगों के मुहँ पर कायम के लिए और खुलकर कालिख पोतनेवाले ऐसे हमारे परमपूज्य डॉ. भीमराव रामजी उर्फ़ बाबासाहेब अम्बेडकर  का जन्म तारीख 14 अप्रैल 1892  को उत्तर हिंदुस्तान के महू में हुआ था | डॉ.अम्बेडकर  के जन्म के समय उनके पिता कै.रामजी मालोजी सूबेदार इसी जगह पर सैनिक थे|

प्रकरण बारह
ईश्वर की राह
डॉ.अम्बेडकर  के कहे गए बोल यहाँ दिए बिना मन नहीं मान रहा हैं इसलिय यहाँ दे रहा हूँ –
“हमारा हिंदू धर्म पुरातन हैं| ग्रीक, रोमन जैसी पुरातन और प्रसिद्ध राष्ट्रों का नामोनिशान मिट गया हैं लेकिन हमारा हिंदू समाज आज भी जिंदा हैं हिन्दुओं द्वारा ऐसी शेखी अक्सर बघारी जाती हैं | इस दो कौड़ी के जीवन को जीना ही मनुष्य का मकसद नहीं होना चाहिए | मनुष्य आत्मसम्मान के साथ जी रहा हैं या नहीं इस बात महत्व इस बात का हैं | इस दृष्टिकोण से देखने पर पता चलता  हैं कि सिर्फ जिंदा रहकर ही हिंदू समाज ने कौनसी दिग्विजय प्राप्त कर ली ? दूसरों लादी गयी दासता को बेशर्मी से स्वीकार करने के अलावे उसने क्या किया हैं ? ऐसे जीवन जीने का भला क्या मतलब | अपने बल अपनी ताकत पर दो दिन जिंदा रहना सौं साल के गुलाम जीवन जीने से लाख गुना बेहतर हैं | दो लोगो कि लड़ाई में कोई एक पलायन करके भी अपना जीवन जी लेता हैं वहीँ दूसरा अपने प्रतिद्वंद्वी को हराकर जीवन जीता हैं | भागकर और दूसरों के वर्चस्व को स्वीकारते हुए जीवन जीने वाला मनुष्य भला क्या प्राप्त करता हैं ! वह गुलाम बनकर अपने स्वत्व को भूल जाता हैं और गुलामों के काफिलों की संख्या बढ़ता हैं बल्कि ऐसा मनुष्य नामर्दांगी का फैलाव करने लगता हैं इससे बेहतर तो उसका मर जाना हैं इसमें क्या बुराई हैं ? हिंदू समाज दूसरों का दास और गुलाम बनकर ही क्यों रहा इसपर विचार करने पर पता चलता हैं कि वे अपने उद्धार के लिए “ईश्वर की राह” ताकते हुए बैठे थे यही इसका कारण हैं यह मेरी दृढ़ मान्यता हैं | इस दुनिया में ईश्वर हैं या नहीं हैं इसपर विचार करते रहना आपके लिए एक अनावश्यक शगल हैं |

प्रकरण ग्यारह
तत्व/दर्शन
डॉ.साहब द्वारा प्रतिपादित दर्शन इस प्रकार हैं-
• जिस धर्म में मनुष्य का मनुष्य के साथ मानवतापूर्ण व्यव्हार का निषेध हैं वह धर्म न होकर आधिपत्य की एक सजावट हैं |
• अपनी वाणी में ईश्वर एक हैं कहनेवाले और कर्म में मनुष्य को पशुतुल्य माननेवाले लोग दाम्भिक हैं उनकी संगत नहीं करें |
• अशिक्षितों को अशिक्षित, निर्धनों को निर्धन रहने कि शिक्षा देनेवाला धर्म नहीं वस्तुतः दंड का एक विधान हैं |
• जिस धर्म में मनुष्य कि मनुष्यता कि पहचान करना अधर्म माना जाता हैं वह धर्म न होकर एक रोग हैं |
• चींटियों को शक्कर खिलानेवाले और मनुष्य को पानी न पीलाकर मार देनेवाले लोग दांभिक हैं उनकी संगत नहीं करें |
• जिस धर्म में किसी पशु के स्पर्श हो जाने को स्वीकार किया जाता हो और मनुष्य का स्पर्श निषिद्ध हो वह धर्म न होकर एक पागलपन हैं |
• जो धर्म किसी वर्ग विशेष के विद्यार्जन, धनसंचय और शस्त्र धारण करने पर रोक लगाने कि शिक्षा देता हो वह धर्म न होकर मनुष्य जीवन कि एक विडंबना हैं |
• दूसरों को अपने पास करनेवाले और अपनों को अपने से दूर धकेलने वाले समाजद्रोही हैं उनकी संगत नहीं करें |
जयभीम वाला दूल्हा चाहिए

प्रकरण दस
राजनीतिक नेताओं से तुलना
डॉ.बाबासाहेब, महात्मा गाँधी जैसे ही लोकप्रिय हैं | उनकी जगह जवाहरलाल नेहरु के समाजवाद की वास्तविकता का डेरा हैं लेकिन वह सिर्फ नाममात्र के लेखन या व्याख्यान के लिए ही सीमित नहीं हैं | वे कट्टर जातिनिष्ठ हैं किन्तु अपनी जाति अधिकारों कि मर्यादा उनकी संख्या के अनुपात से बाहर जाकर बैरिस्टर जिन्ना के समान जातिवाद को मिटाने कि संभावनाओं को उन्होंने ख़त्म नहीं किया हैं | राजगोपालाचारी की व्यावहारिक राजनीति की तरह राजनीति और समाजशास्त्र के लेखक भी वे हैं | सर तेजबहादुर सप्रू के राजनीतिक अध्ययन कि तरह डॉ.साहब का राजनीतिक अध्ययन गहरा हैं लेकिन सर सप्रू कि तरह के वे नरमदलवादी भी नहीं हैं | लोकमान्य तिलक कि तरह वे राजनीतिक दावपेंच बेलगाम खेलते हैं परंतु उनकी तरह पुरातन रूढ़िवादिता से चिपके रहने के वे आदि भी नहीं  हैं |
सारांश, बाबासाहब के भीतर, गांधीजी सी लोकप्रियता, जवाहरलाल जैसा समाजवाद, बैरिस्टर जिन्ना की जातिनिष्ठता, राजगोपालाचारी जैसी व्यावहारिक राजनीति, सर सप्रू सी राजनीतिक अध्ययनशीलता, लोकमान्य तिलक जैसे राजनीतिक दांवपेंच और सुभाषचंद्र बोस के समान साहसी गुणों का समन्वय हुआ हैं|

प्रकरण नौ
राजनीतिक कर्तव्य
हमारी उन्नति कैसे होगी ? इसका संपूर्ण विचार करने पर अस्पृश्य वर्ग को ज्ञात हुआ कि मनुस्मृति को जलाने के बाद वर्णव्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह किया जाए | ऐसा करने का कारण हैं कि उस समय के सपृश्य सवर्णों द्वारा अस्पृश्यों का अतिशय अमानवीय दमन | अस्पृश्य होने का अर्थ हैं कि आपको व्यापर का अधिकार नहीं, खेती करने और क्षत्रियों के समान शस्त्र धारण करने कि संपूर्ण बंदी ऐसी मान्यता पहले के सवर्ण स्पृश्य समाज में व्याप्त थी |
ऐसी मान्यता कितनी मूर्खतापूर्ण थी इसे बताने का अब औचित्य भी नहीं हैं किंतु इस कारण ऐसा हुआ कि स्पृश्य वर्ग ऊपर कि ओर बढ़ता गया और अस्पृश्य वर्ग नीचे मुहँ बाहे खड़ा रहा | उसके हाथ सत्ता नहीं होने के चलते उसकी गुलामी से भरी दासता कायम रहीं | डॉ. साहब ने जैसे ही इस बात को अपने हाथों लिया वैसे ही इस पुरातन मान्यतावाली जमीन पर एक नई दिशा की शुरुआत हुई |
डॉ.साहब की राजनीतिक लड़ाई के प्रमुख प्रसंगों को देखा जाए तो उसमें – 1919 का कानून, सायमन कमीशन, राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस, पुणे पैक्ट 1935 का कानून, 8 अगस्त 1940 की घोषणा और सर क्रिप्स का आगमन – यह क्रम हैं तब इनपर क्रमवार विचार करना उचित होगा | इस जीवनीकी प्रस्तुत भूमिका के अंत में तानाजी बालाजी खरावतेकर अपनी सघन भावनाओं को प्रकट करते हुए लिखते हैं – मुझे स्नेह करनेवालों ने इस जीवनी के लेखन में मेरा सक्रीय साथ दिया हैं | उनके प्रोत्साहन के बल पर मैं इसे लिख पाया हूँ आगे भी वे इसी तरह मेरा साथ देंगें | मेरे अस्पृश्य जाति बंधू और भगिनियों से निवेदन हैं कि वे इस किताब को अपने बच्चों को पढने के लिए दें अपने समाज के उत्कर्ष कि स्फूर्ति को वे अपने ह्रदय में उत्पन्न करेंगें ऐसा इस पुस्तक को लिखने का मेरा एकमात्र उद्देश्य हैं | सत्य संकल्प के दाता दयाधन परमेश्वर इस इच्छा को पूर्ण करें |
ता.बा.खरावतेकर, कराची, 29.3.1946

स्त्रीवादी आंबेडकर की खोज
1. प्रकाशन 
2.  जन्म 14 अप्रैल 1891, मध्यप्रदेश के महू में हुआ | लंबे समय तक लोगों में डॉ.आंबेडकर के जन्म वर्ष को लेकर एकमत नहीं था | उनके कॉलेज रजिस्टर से 14 अप्रैल 1891 की पुष्टि, बाद के जीवनीकारों ने की है| 


स्त्रीकाल के संस्थापक सदस्यों में रहे संदीप मधुकर सपकाले महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. संपर्क: 8668784132



फोटो: गूगल से साभार 
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संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

क्या आप जानते हैं गांधी की पहली जीवनी लेखिका कौन थीं, कब और किस भाषा की थीं ?

संदीप मधुकर सपकाले 

महात्मा गांधी की किसी भी भाषा में  पहली जीवनी मराठी में 1918 में लिखी गयी थी. अवंतिकाबाई गोखले द्वारा लिखी गयी इस जीवनी  की प्रस्तावना उस समय के सबसे बड़े नेता लोकमान्य तिलक ने लिखी थी. सबसे रोचक है यह जानना कि तिलक गांधी के बारे में 1918 में किन शब्दों में लिख रहे हैं. संदीप मधुकर सपकाले प्रथम जीवनी और जीवनी लेखिका के बारे में बता रहे हैं. एक जरूर पठनीय लेख.  इस आत्मकथा को संदीप हिन्दी में अनूदित भी कर रहे हैं.

नोआखाली  में महात्मा गांधी

महात्मा गाँधी का जीवन चरित्र विशेष परिचय, लेख और व्याख्यान, 1918 
(जीवनी लेखिका सौ.अवंतिकाबाई गोखले के कार्यों के सन्दर्भ में )

अवंतिकाबाई गोखले का जन्म महाराष्ट्र के तासगांव (पुराना सतारा जिला) में चितपावन ब्राह्मण परिवार में विष्णुपंत जोशी और सत्यभामाबाई के यहाँ हुआ था| उनके पिता विष्णुपंत जोशी एक रुढ़िवादी गृहस्थ थे किंतु रेलवे की नौकरी के चलते उन्हें अपना पैतृक निवास स्थान छोड़कर इंदौर में बसना पड़ा था | इंदौर में ही अवंतिकाबाई के पडोसी और साथी रेल-कर्मी नागपुर निवासी गोपालराव गोखले के पुत्र बबनराव गोखले के साथ उनका विवाह नौं वर्ष की आयु में सन 1891 में हुआ था | अपने पिता की रुढ़िवादी सोच के कारण अवंतिकाबाई को अपने ही घर से प्रारंभिक शिक्षा नहीं मिल पायी थी लेकिन विवाह के उपरांत उनके पति बबनराव गोखले ने उन्हें घर से ही पढ़ना प्रारंभ किया | बबनराव गोखले पेशे से इंजीनियर थे और मशीनरी पर काम सीखने के उद्देश्य से सन 1895 में नागपुर से लन्दन और चीन की यात्रा पर चले गए थे | गोपालराव गोखले ने अपनी पुत्रवधू अवंतिकाबाई की पढाई को रुकने नहीं दिया बल्कि उन्हें मिडवाईफरी (Midwifery)/नर्सिंग के डिप्लोमा की पढाई करवाई, जिसमें अवंतिकाबाई ने प्रथम श्रेणी में 1901 में उत्तीर्ण किया था | 1898 और 1903 में मशीन पर हुए किसी हादसे में बबनराव के हाथ क्षतिग्रस्त हो गएथे जिसके बाद उन्होंने विदेश छोड़कर 1904 से लेकर बाद का पूरा समय भारत में बिताया था | पति पर आए इस संकट के बावजूद अवंतिकाबाई ने अपने सवास्थ्य सेवाओं और सामाजिक कार्यों को प्रारंभ रखा था |सन 1904 से 1912 तक अवंतिकाबाई देशभर में नर्सिंग सेवाओं के लिए प्रसिद्ध हो चुकी थी | 1913 में उन्होंने सोशल सर्विस लीग के लिए काम करना शुरू किया था जिसमें कई सामाजिक कार्यकर्ताओं से उनकी भेंट हुई थी | रानी इचलकरंजी के साथ उन्होंने लंदन की यात्रा की थी | इस यात्रा में उन्होंने लंदन के अस्पताल एवं स्वास्थ्य सेवाओं का अध्ययन भी किया था | इस यात्रा में उन्हें गोपालकृष्ण गोखले और सरोजिनी नायडू से मिलने का अवसर भी प्राप्त हुआ था जिसके चलते राष्ट्रीय आंदोलन से आनेवाले समय में जुड़ना संभव हुआ था |

 गांधीजी ने अपनी आत्मकथा में चम्पारण के अपने सहयोगियों के कार्यों का वर्णन करते हुए अवंतिकाबाई गोखले की भूमिका को इस तरह प्रस्तुत किया है-
“साथियों से सलाह करके पहले तो छह गाँवो में बालको के लिए पाठशाला खोलने का निश्चय किया । शर्त यह थी कि उन गाँवो के मुखिया मकान और शिक्षक का भोजन व्यय दे , उसके दूसरे खर्च की व्यवस्था हम करे । यहाँ के गाँवो मे पैसे की विपुलता नही थी, पर अनाज वगैरा देने की शक्ति लोगों मे थी । इसलिए लोग कच्चा अनाज देने को तैयार हो गये थे| महान प्रश्न यह था कि शिक्षक कहाँ से लाये जायें ? बिहार मे थोड़ा वेतन लेने वाले अथवा कुछ न लेनेवाले अच्छे शिक्षको का मिलना कठिन था । मेरी कल्पना यह थी कि साधारण शिक्षको के हाथ मे बच्चो को कभी न छोडना चाहिये । शिक्षक को अक्षर-ज्ञान चाहे थोड़ा हो , पर उसमे चरित्र बल तो होना ही चाहिये । इस काम के लिए मैने सार्वजनिक रूप से स्वयंसेवको की माँग की । उसके उत्तर मे गंगाधरराव देशपांडे ने बाबासाहब सोमण और पुंडलीक को भेजा । बम्बई से अवन्तिकाबाई गोखले आयी । दक्षिण से आनन्दीबाई आयी । मैने छोटेलाल, सुरेन्द्रनाथ तथा अपने लड़के देवदास को बुला लिया । इसी बीच महादेव देसाई और नरहरि परीख मुझे मिल गये थे । महादेव देसाई की पत्नी दुर्गाबहन और नरहरि परीख की पत्नी मणिबहन भी आयी । मैने कस्तूरबाई को भी बुला लिया था । शिक्षको और शिक्षिकाओ का इतना संघ काफी था । श्रीमती  अवन्तिकाबाई और आनन्दीबाई की गिनती तो शिक्षितो में हो सकती थी, पर मणिबहन परीख और दुर्गाबहन को सिर्फ थोडी-सी गुजराती आती थी । कस्तूरबाई की पढाई तो नहीं के बराबर ही थी । ये बहनें हिन्दी-भाषी बच्चो को किसी प्रकार पढ़ाती ?चर्चा करके मैंने बहनों को समझाया कि उन्हें बच्चों को व्याकरण नहीं,  बल्कि रहन-सहन का तौर-तरीका सिखाना है । पढना-लिखना सिखाने की अपेक्षा उन्हें स्वच्छता के नियम सिखाने हैं । उन्हें यह भी बताया कि हिन्दी, गुजराती, मराठी के बीच कोई बड़ा भेद नही है , और पहले दर्जे मे तो मुश्किल से अंक लिखना सिखाना है । अतएव उन्हें कोई कठिनाई होगी ही नहीं । परिणाम यह निकला कि बहनों की कक्षायें  बहुत अच्छी तरह चली । बहनों मे आत्मविश्वास उत्पन्न हो गया और उन्हें अपने काम मे रस भी आने लगा । अवन्तिकाबाई की पाठशाला आदर्श पाठशाला बन गयी । उन्होने अपनी पाठशाला मे प्राण फूँक दिये । इन बहनों द्वारा गाँवो के स्त्री-समाज मे भी हमारा प्रवेश हो सका था”1 

पुणे पैक्ट के पूर्व गांधी का अनशन





1927 में प्रकाशित आत्मकथा अथवा सत्य के प्रयोग से पहले गांधीजी के व्यक्तित्व और जीवन कार्यों की प्रेरणा से अवंतिकाबाई गोखले ने ‘महात्मा गांधी यांचे चरित्र- विशेष परिचय, लेख व व्याख्यान’ (महात्मा गांधी का जीवन चरित्र- विशेष परिचय, लेख एवं व्याख्यान)इस प्रथम मराठी जीवनी का प्रकाशन सन 1918 में  हुआ था | गांधीजी की इस सर्वप्रथम मराठी जीवनी की विशेषता यह है कि इस जीवनी की प्रस्तावना लोकमान्य तिलक द्वारा लिखी गयी है |

अवंतिकाबाई जीवनी की शुरुआत में लिखती हैं “चंपारण में महात्मा गांधी के मार्गदर्शन में स्वयंसेविका का काम करते हुए उनके जीवन चरित्र को लिखने का विचार मेरे मन में आया था | इसी दौरान उनके भाषणों की अंग्रेजी किताबें पढ़ते हुए यह विचार और भी दृढ़ हो गया था | इस जीवनी को लिखते हुए थोडा-बहुत ही सही लेकिन उनके सान्निध्य में रहने का मौका मिला था | उसपर भी प्रभु रामचंद्र और भगवान बुद्ध के चरणों से पुनीत और महात्मा गांधी के सत्याग्रह से फिर चर्चा में आयी बिहार की इस भूमि पर ही इस काम को करने का अवसर मुझे मिला | जीवन चरित्र लिखने की शुरुआत तो हो चुकी थी | लेकिन इसकी भूमिका किससे लिखवाई जाए इसका रहस्य भी बना रहा उसी समय लोकमान्य तिलक ने भूमिका लिखने की मेरी विनती को स्वीकार कर लिया था | अपने बहुत से कार्यों की व्यस्तताओं के बावजूद मेरी निराशा न हो इसलिए उन्होंने इस जीवन चरित्र की प्रस्तावना के दो शब्द लिखकर दिए जिसके लिए उनका जितना भी आभार माना जाए कम है | महात्माजी से मुझसे अधिक परिचय है ऐसे मित्रों ने ‘विशेष परिचय’ और उनके अंग्रेजी भाषणों के मराठी अनुवाद सहर्ष करके दिए थे जिस कारण यह पुस्तक अपने इस मूर्त स्वरुप में बाहर आ सकी | अकारण ही संदर्भ प्राप्त नहीं होने की अवस्था में (स्थलसंकोच)कई लेख और व्याख्यान प्रकाशित नहीं हो पाएं | जिस किसी भी लेख अथवा भाषण के संदर्भ नहीं दिए गए हैं उन्हें मान लें कि वे ‘इंडियन ओपिनियन’ से लिए गए हैं | पुस्तक की तयारी में जिन लोगों ने सहायता की उन सभी का हृदयपूर्वक आभार मानते हुए पाठक वर्ग से बिनती करती हूँ कि इस पुस्तक को सिर्फ उपरी तौर पर न पढ़कर छोड़ें बल्कि उसका मनन करते हुए महात्माजी के उपदेशों के समान जीवन जीने का संभव हो, उतनी खटपट जरुर करें” (आत्माराम मेन्शन, गिरगांव, मुंबई, 1 जून 1918)2


मराठी पाठक वर्ग को इस जीवनी को पढने और गहराई से गांधी जीवन दर्शन को समझने का आग्रह अवंतिकाबाई करती हैं तो उसी तरह जीवनी की प्रस्तावना में लोकमान्य तिलक लिखते हैं- “बीते साल यानी 1917 के दिसंबर महीने में कलकत्ता कांग्रेस की सभा में गया था वहां सौ.अवंतिकाबाई गोखले ने बताया था कि वे महात्मा गांधी का चरित्र लिख रही हैं जिसकी प्रस्तावना लिखने की बिनती उन्होंने मुझसे की | यह बिनती अर्थात ही मुझसे अमान्य नहीं हो पायी | लेकिन उस समय मुझे इस बात की कल्पना तक नहीं थी कि इतनी जल्दी ये पुस्तक तैयार हो जाएगी | विशेषतः जब विदेश जाने के लिए निकला तब इस प्रस्तावना को इतनी जल्दबाजी में पूरा करना होगा इस बात को तब तक नहीं सोच पाया था | परंतु अब वैसी परिस्थिति बन चुकी हैं | अब जैसे-तैसे यह प्रस्तावना लिखनी पड़ रही है | महात्मा गांधी के जीवन चरित्र की प्रस्तावना लिखने के लिए थोड़ा अच्छा समय और फुर्सत मिलनी चाहिए थी वह मुझे मिल नहीं सकी | मुझे बुरा लग रहा हैं कि समय और फुर्सत के अभाव में मैं यह प्रस्तावना लिख पाया तथापि “अकारणान्मंदकरणं श्रेयः” इस न्याय से मैंने यह काम किया हैं | पुस्तक के पाठकऊपर व्यक्त वास्तविकता को ध्यान में रखकर मुझे माफ़ करेंगें ऐसी आशा करता हूँ”3 (पूणे शहर, 16 मार्च 1918, बाल गंगाधर तिलक) लोकमान्य तिलक ने दस पृष्ठों की अपनी प्रस्तावना में गांधीजी के उदार और शील चरित्र को पाठकों में बोधप्रिय और अनुकरणीय बनें इसी उद्देश्य से अवंतिकाबाई के द्वारा लिखी इस जीवनी को महत्वपूर्ण माना है |

सत्याग्रही महिलाओं के साथ गांधी

आगे तत्कालीन सन्दर्भ में गांधीजी के परिवेश को समझाते हुए तिलक लिखते हैं कि “महात्मा गांधी का नाम हिंदुस्तान में कोई नहीं जानता हो ऐसा नहीं हैं अर्थात उनके विषय में थोड़ी बहुत जानकारी प्राप्त करने की इच्छा भी सभी लोगों को हुई है, ऐसा कहने में कोई हर्ज नहीं लेकिन इस इच्छा को पूरा करने में मराठी भाषा में आज तक कोई पुस्तक उपलब्ध नहीं हैं सौ.अवंतिकाबाई ने इस सहज सरल जीवनी को लिखकर इस कमी को पूरा किया है| तब भी अवंतिकाबाई का कहती हैं कि महात्मा गाँधी का चरित्र अभी और भी आगे बढ़ने को हैं और आनेवाले भविष्य के जीवनी लेखकों के लिए यह पुस्तक दिशा दर्शक का काम करेगी”4 

सहज और सरल मराठी भाषा में लिखकर मराठी-पाठकों तक महात्मा गांधी की जीवनी को पहुँचाने के लिए तिलक ने स्वयं अवंतिकाबाई गोखले की सराहना की है | गांधी चरित्र की सादगी और वैचारिक उदात्त से प्रभावित जीवनी लेखिका ने जीवनी के आरंभ में ही लिखा है कि “इतने महान महात्मा के चरित्र को लिखने का काम मुझ जैसी अल्पमति स्त्री द्वारा किया जाना यानी छोटे मुंह बड़ी बात जैसा हुआ हैं | जिस तरह प्रभु के गुणगान की भक्ति का अधिकार सभी को हैं उसी तरह महात्मा के गुणों के गुणगान और भक्ति का अधिकार भी सभी के पास समान हैं | इसी भावना से प्रेरित होकर मैंने इस बिकट काम को हाथ में लिया हैं | दूसरा प्रमुख कारण ये कि मराठी में पाठक वर्ग के बीच ऐसे असाधारण व्यक्तित्व के चरित्र का फैलाव हो ऐसी मेरी दिली इच्छा हैं | मुझ जैसी अल्पमति स्त्री से जितना बन पड़ा उतना मैंने लिखने का विचार किया” 5

गांधीजी के प्रति उनके आंदोलन से जुडी आश्रमवासी स्त्रियों में कमोबेश यही भावना देखने को मिलती हैं जिसमें गांधीजी के प्रति भक्ति और समर्पण का भाव उन्हें राष्ट्र की स्वतंत्रता के साथ-साथ अपनी स्वतंत्रता के प्रति भी आश्वस्त करता हैं | गांधीजी के अहिंसक सत्याग्रह में अवंतिकाबाई जैसी स्त्रियों की भूमिका दृढ़ सत्याग्रही की थी | ये स्त्रियाँ शहरी और ग्रामीण दोनों स्तर पर शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता जैसे कार्यक्रमों में सक्रिय भूमिका में थी | परम्परागत हिंदू स्त्री की मानसिक संरचना में वर्ण की अपनी निजी समझ के अनुसार अवंतिकाबाई गांधी के जन्म के वर्णन में वे लिखती हैं कि “वैश्य कुल में जन्म लेने के बावजूद उनमें ब्राह्मणों के दैवीय शक्ति का वास है और क्षत्रियों में विद्यमान धैर्य भी उनमें पूरी तरह दिखाई पड़ता हैं”6

गांधी के परिवार की प्रारंभिक शिक्षा के बाद इंग्लैण्ड में उनकी शिक्षा, कस्तूरबा से विवाह और क्रमशः गांधीजी के सार्वजनिक राष्ट्रीय जीवन में प्रवेश जिसमें साउथ अफ्रीका, बोअर युद्ध आदि से जीवन चरित्र की आधार पृष्ठभूमि तैयार होती है | इन सबसे आगे बढ़कर भी अवंतिकाबाई कहती हैं कि “मोहनदास की हर-एक बात इतनी प्रशंसनीय हैं कि मुझ जैसी नई लेखिका के लिए इसका वर्णन कर पाना भी असंभव सा हैं प्लेग जैसी असाध्य और दुष्ट बीमारी से ग्रसित व्यक्ति के रिश्तेदार भी अंतसमय में उसके पास जाने से कतराते हैं जबकि मोहनदास ने प्लेग के रोगियों की सेवा खुद अपने हाथों से की”7

सन 1912 के यूनियन कानून के अंतर्गत अफ्रीका में जिन मुद्दों पर सत्याग्रह की स्थिति बनी थी उसपर गोखले की अफ्रीका यात्रा और अफ्रीका में गोखले-गांधी गुरुशिष्य संबंध को बताते हुए लिखती हैं कि “अपने गुरु के प्रेम के वश में होकर थोड़े समय के लिए अपने मत को वे किनारे कर लेते थे इसपर से देखा जा सकता हैं कि मि.गोखले पर उनका कितना निस्सीम प्रेम हैं”8

गांधी के साथ सत्याग्रह में स्त्रियों के आने की कहानी, जीवनी में इस प्रकार व्यक्त की गयी हैं “यूनियन सरकार ने विधी कौंसिल में एक नया कानून लाया | इस कानून का स्वरुप गंदा और अपमानजनक था कि हिंदी स्त्रियों तक को सत्याग्रही बनना पड़ा | इस कानून से हिंदू या मुसलमानी पद्धति से किए गए विवाह अवैधानिक माने जाएंगे इस कानून से हिंदी स्त्रियों को रखैल बनाकर उनकी संतति को संपत्ति का स्वाभाविक अधिकार न देते हुए सरकार द्वारा हड़प लेने की अद्भुत व्यवस्था इस कानून में सरकार ने अपने लिए कर ली हैं……..हिंदी राष्ट्र की पवित्रता पर आए इस संकट में सभी स्त्रियों ने अपने पातिव्रत्य की रक्षा के लिए, खुद की और अपने कुल की मर्यादाओं की रक्षा के लिए सत्याग्रह रूपि अग्नि में कूदने के लिए तैयार हो चुकी थी अच्छा हुआ कि महात्मा गांधी जैसे बुद्धिमान और सच्छील नेता इस समय अफ्रीका में मार्गदर्शक थे | अन्यथा हिंदी लोगों को शांत रख पाना इतना सरल भी नहीं था”9





ट्रांसवाल में कस्तूरबा और स्त्रियों के सत्याग्रह को अवंतिकाबाई ने विशेष प्रस्तुत किया हैं  “पहले सत्याग्रह के लिए पुरुषों को स्त्रियों द्वारा प्रोत्साहित किया जाता था लेकिन आज जब खुद स्त्रियों ने जेल जाने की ठानी है तब इन स्त्रियों का जेल जाना भी सत्याग्रह की शोभा बढ़ा रहा हैं | कई स्त्रियों ने गर्भवती होने के बावजूद भी जेल जाना स्वीकार किया है | कईयों ने अपने दूध पीते बच्चों को तक घर छोड़ दिया हैं | ट्रांसवाल के इस बंदिवास में जाने का एकमात्र कारण यह भी है कि आज तक किसी अश्वेत को यहाँ जाने नहीं दिया गया है | इन स्त्रियों के आंदोलन में उतरने की इस बातको  हमेशा ध्यान में रखना होगा की जेल में जानेवाला यह स्त्री समुदाय किसी भी बड़ी राजनीति में जाने का इच्छुक नहीं था और न ही वह बहुत शिक्षित भी था | लेकिन स्वाभिमान के इस दिव्य तेज को देखकर पुरुष सत्याग्रहियों में विशेष उत्साह का संचार हुआ था ऐसे में यूनियन गवर्मेंट के लोगों को एक धक्का भी लगा था | पश्चिमी लोगों की कल्पनाएँ और धारणाएं हम हिंदी स्त्रियों के प्रति अक्सर ऐसी रही है कि हिंदुस्तानी स्त्री यानी किसी सोने के पिंजरे में जकड़ा हुआ सुंदर पक्षी हो जिसे अपने खुद की बुद्धि भी न हो लेकिन अफ्रीका में सत्याग्रही इन स्त्रियों ने अपने अलौकिक धैर्य से इन धारणाओं को ध्वस्त कर दिया | इन सत्याग्रही स्त्रियों के बीच हमारी मिसेस गाँधी किसी सितारे की तरह चमक रही थी” 10

चंपारण सत्याग्रह


गांधीजी पर लिखी इस पहली मराठी जीवनी में गाँधी आंदोलन और उससे जुडी महिलाओं के विषय में कस्तूरबा पर अपने विचार रखते हुए लिखती हैं “यहाँ मिसेस गाँधी के बारे में लिखे बिना मेरा मन नहीं मान रहा हैं और इसमें कुछ गैर भी नहीं | वह सचमुच एक साध्वी स्त्री हैं | स्वभाव से ममतामयी, साधारणसा रहन सहन, लोकसेवा के लिए हमेशा तत्पर रहनेवाली, किसी भी परिश्रम के कार्यों को करने के लिए सजग रहनेवाली, हमेशा आनंद-वृत्ति में रहनेवाली, पति सेवा में तत्पर और पति की आज्ञा का पालन करनेवाली मिसेस गाँधी के इन सदगुणों पर महात्माजी को भी अभिमान होना चाहिए क्योंकि उनकी समस्त देश सेवा में इस सद्गुणी स्त्री का साथ हैं” 11





मुंबई के गिरगाव में 27 नवंबर 1918 को ‘हिंद महिला समाज’ बनाकर उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन के समानांतर स्त्री सशक्तिकरण में प्रमुख भूमिका निभाई थी |लगभग 38 वर्षों तक वे इस संगठन की अध्यक्ष रही | हिंदी महिला समाज के माध्यम से उन्होंने स्त्रियों को स्वावलंबी बनाने के उद्देश्य से सिलाई, कढ़ाई जैसे लघु उपक्रम सिखाने का काम किया जिसके माध्यम से शहरी स्त्रियों के लिए राष्ट्रीय आंदोलन के समानांतर रोजगार की एक जमीन भी तैयार हुई | सन 1926 से कुछ वर्षों तक के लिए वे मुंबई महानगर पालिका की सदस्या भी रही जिसके दौरान उन्होंने म्युनिसिपल अस्पतालों की सेवा सुविधाओं को बेहतर बनाने के साथ-साथ म्युनिसिपल कर्मचारियों की सुविधाओं के लिए भी अनेक कार्य किए | कांग्रेस की गतिविधियों में सहभागी होते हुए उन्हें 1920 से 1946 तक कई बार जेल जाना पड़ा था | गांधीजी द्वारा चलाए गए अस्पृश्यता निवारण कार्यक्रम में वे 1932 से सक्रीय सहभागी बनी रही | 24.09.1932 को गांधीजी और डॉ.बाबासाहब आंबेडकर के बीच हुए ऐतिहासिक पुणे पैक्ट के दूसरे दिन के हिंदू सम्मलेन में इस पैक्ट के समर्थन में हस्ताक्षर करनेवाली महिलाओं में हंसा मेहता और अवंतिकाबाई गोखले थी |12

‘भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में स्त्रियों की सहभागिता और कार्यक्रमों में अपनी क्षेत्रीय विविधिता होने के बावजूद वे राष्ट्रीय आंदोलन में एकसाथ मिलकर सत्याग्रह की भूमिका की नींव रख रही थी | असहयोग आंदोलन में बंगाल और महाराष्ट्र की भूमिका इसमें और भी मुखर स्वरुप की थी | मुंबई की डिस्ट्रिक्ट कांग्रेस कमिटी ने डिस्ट्रिक्ट वोलेंटियर बोर्ड का गठन किया हुआ था | डीसीसी या डीवीबी के अतिरिक्त स्त्रियों ने अपने राजनीतिक संगठन राष्ट्रीय स्त्री सभा (Independent Women’s Organisation ) का गठन सरोजिनी नायडू की अध्यक्षता में किया था | राष्ट्रीय स्त्री सभा की उपाध्यक्ष घोशिबेन नौरोजी और अवंतिकाबाई गोखले थी’|13 1930 के सत्याग्रह में समुद्र के पानी से नमक बनानेवाली स्त्रियों में अवंतिकाबाई गोखले और कमला देवी चट्टोपाध्याय का नाम प्रमुखता से आता हैं | मराठी में गाँधी चरित्र लिखने का अवन्तिकाबाई गोखले का उद्देश्य बहुत स्पष्ट था कि गाँधीजी के राष्ट्रीय आंदोलन में उपस्थित सादगीपूर्ण कर्मशील आदर्श जीवन को मराठी मानसमें प्रस्तुत करना था जिसे तिलक ने इस चरित्र कीभूमिका में भी प्रस्तुत किया हैं | अवन्तिकाबाई गोखले ने अपने से पूर्व गाँधी के एक और जीवनी लेखक मिस्टर डोक का स्मरण आद्य चरित्रकार के रूप में किया हैं | इस मराठी जीवनी के अंत में में वे लिखती हैं “ फ़िलहाल मैं चंपारण में स्वयंसेविका के अपने कामों में स्कूल की पढाई में अधिक व्यस्त हूँ जिस कारण लिखने के लिए बहुत कम ही समय मिलता हैं और यदि मिल भी जाए तो जल्दबाजी में किसी तरह कुछ लिख पाती हूँ लिखने का मेरा कोई अभ्यास भी नहीं हैं क्योंकि मैं कोई लेखिका भी नहीं हूँ, इसी कारण इस जीवनी में काफी दोष भी रह गए होंगे आनेवाले लेखक इन कमियों और दोषों को जरुर पूरा करेंगे क्योंकि गाँधी चरित्र का विकास दिनों दिन बढ़ने वाला हैं | जो भी कमियां या दोष रह गए होंगे उसके लिए आप मुझे माफ़ करेंगें लेकिन मेरे गुणग्राही बंधु भगिनी मेरे इस प्रयास की सराहना भी करेंगे ऐसी आशा करती हूँ”14 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे द्वारा गाँधीजी की हत्या के समाचार के बाद से अवन्तिकाबाई गोखले अस्वस्थ रहने लगी थी गाँधीजी की हत्या से आहत अवन्तिकाबाई गोखले का देहांत 26 मार्च 1949 को मुंबई में हुआ था | अवन्तिकाबाई पहली पीढ़ी की ऐसी गांधीवादी स्त्री थी जिन्होंने शहरी मध्यवर्गीयआधुनिक जीवनशैली को त्यागकर गाँधीजी के साथ राष्ट्रीय आंदोलन से जुडी थी |

संदर्भ सूची: 
1. गांधी, मोहनदास (1925) सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा, हिंदी अनुवाद, त्रिवेदी काशीनाथ(1957) नवजीवन प्रकाशन, अहमदाबाद, पृष्ठ संख्या 382-383
2.  गोखले, अवंतिकाबाई,(1918) (द्वितीय आवृत्ति 1972) महात्मा गांधी यांचे चरित्र : विशेष लेख व व्याख्याने, महाराष्ट्र राज्य साहित्य व संस्कृति मंडळ, मुंबई, पृष्ठ संख्या- 2
3. गोखले, अवंतिकाबाई,(1918) (द्वितीय आवृत्ति 1972) महात्मा गांधी यांचे चरित्र : विशेष लेख व व्याख्याने, महाराष्ट्र राज्य साहित्य व संस्कृति   मंडळ, मुंबई, पृष्ठ संख्या 7
4. वही, पृष्ठ संख्या 8
5. वही,  पृष्ठ संख्या 18
6. वही, पृष्ठ संख्या 19
7.  वही, पृष्ठ संख्या 33
8. वही, पृष्ठ संख्या 44
9.वही,  पृष्ठ संख्या45
10. वही, पृष्ठ संख्या 45
11. वही, पृष्ठ संख्या 95
12. Busi, S.N. BAWS, Vol. 17, Part 1, p. 202
13. Thapar, Bjorkert, Suruchi, Women in the Indian National Movement: Unseen Faces and Unheard Voices 14. (1930-1942)  Page No. 54-55 Sage Publication New Delhi
गोखले, अवंतिकाबाई,(1918) (द्वितीय आवृत्ति 1972) महात्मा गांधी यांचे चरित्र : विशेष लेख व व्याख्याने, महाराष्ट्र राज्य साहित्य व संस्कृति   मंडळ, मुंबई, पृष्ठ संख्या 96

सन्दर्भ ग्रन्थ–

गांधी, मोहनदास (1925) सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा, हिंदी अनुवाद, त्रिवेदी काशीनाथ(1957) नवजीवन प्रकाशन, अहमदाबाद

गोखलेअवंतिकाबाई,(1918) (द्वितीय आवृत्ति 1972) महात्मा गांधी यांचे चरित्र : विशेष लेख व व्याख्याने, महाराष्ट्र राज्य साहित्य व संस्कृति मंडळ, मुंबई

Busi, S.N. BabasahebAmbedkarWriting and Speeches, Vol. 17, Part-1

Thapar, Bjorkert, (1966) Women in the Indian National Movement: Unseen Faces and Unheard Voices (1930-1942) Sage Publication New Delhi

स्त्रीकाल के संस्थापक सदस्यों में रहे संदीप मधुकर सपकाले महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. संपर्क: 8668784132


फोटो: गूगल से साभार 
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जाति को नकारिये नहीं जनाब: यह जान ले लेती है

ज्योति प्रसाद 


चुनाव के बाद राजनीतिक दल अपने मुद्दों का भी मुद्दा बदल लेते हैं। नए नए मुद्दों में मुर्दे वाली सड़ांध होती है। इनका वास्तविकता की ज़मीन से कुछ लेना देना नहीं होता। एक हवाई क़िला खड़ा हो जाये बस यही उद्देश्य होता है। देश में लगातार आरक्षण के खिलाफ बहस होती रहती है और हर तरह का मीडिया अपना मत सामने रखता रहता है पर इसी देश में हर साल कितनी ही मौतें जातिगत भेदभाव की वजह से घट रही हैं, इन घटनाओं की सुध तक लेने वाला कोई नहीं है। कानून की किताब के बाहर सामाजिक समीकरण अभी तक जस के तस मौजूद हैं। गांवों में ही नहीं शहरों भी एक ऐसी पीढ़ी पढ़-लिखकर तैयार हो गई है जो अपने अधिनाम (सरनेम) के पीछे पागल हुई जा रही है। भारतीय लोग आज भी प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर भेदभाव करते हुए पाये जाते हैं।

विज्ञान पर हावी जातिवाद: 

एक अंग्रेज़ी अखबार की खबर के मुताबिक 15 अक्तूबर की सुबह, करीब 9 बजे बुलंदशहर के खेतलपुर भंसोली गाँव में रोजाना की तरह सावित्री देवी घरों से कूड़ा इकट्ठा कर फेंकने का काम कर रही थीं। उसी दौरान एक रिक्शा रास्ते में अचानक आया और वह अपना संतुलन खो बैठी और सीधे ऊंची जाति की एक महिला अंजु की बाल्टी से टकरा गईं। इसी बात पर अंजु अपना खो बैठी और सावित्री देवी को उनके पेट पर मारा। उनके सिर को दीवार से टकरा टकरा कर पीटा। इतना ही नहीं इस हैवानियत में अंजु के बेटे रोहित ने भी एक लाठी से हिस्सा लिया और बाल्टी को छूने का बदला सावित्री देवी को पीटते हुए लिया। इस घटना के 6 दिन बाद सावित्री देवी और उनके अजन्मे 8 महीने के बच्चे की मौत हो गई। सावित्री देवी के पति यह कहते हैं कि वे पत्नी को उसी रोज़ जिला अस्पताल ले गए पर उन्होंने यह कहते हुए इलाज़ से इंकार कर दिया कि किसी भी प्रकार की बाहरी चोट नहीं है, वापस घर ले जाओ। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सिर के अंदर लगे घाव को मौत की वजह बताया गया है।
इस देश के लीडरान को अपनी नज़रों को दुरुस्त करते हुए इस घटना पर गंभीरता से विचार करना और सोचना चाहिए। देश की तरक्की के लिए धुआँधार भाषणों की जरूरत नहीं होती। जुमलों की जरूरत नहीं होती। सभा और मुलाक़ातों की जरूरत नहीं होती। रैलियों की भी जरूरत नहीं होती। और न ही विदेशी दौरों की जरूरत होती है। जरूरत होती है दिमागदार जनता और दिमागदार नेताओं की जो मनुष्यता को साथ लेकर चलते हैं। जो कानून को गहरी आस्था के साथ समझते हैं। जो समानता को न सिर्फ किताबों में समझते हैं बल्कि उसे ज़मीन पर भी उतारते हैं। क्या समानता आसमानी फल है जो ज़मीन पर नहीं उग सकता?क्या सम्मान सिर्फ कुछ जातियों के पुरखों की जागीर है?…नहीं। गणराज्य भारत में सभी व्यक्ति समान हैं और सम्मान से जीने का हक़ रखते हैं।

यह कैसा देश है जो सन् 2017 में भी अपने इतिहास के खाते में दलितों के संग अन्याय को दर्ज़ कर रहा है!यह कोई नई घटना नहीं है बल्कि यह घटना सिलसिलेवार ढंग से अगड़ी जातियों द्वारा अंजाम दी जा रही हैं। बलात्कार से लेकर हत्या तक की जा रही है।

एक अंग्रेज़ी-भाषी बंगाली दलित महिला की कशमकश

एनसीआरबी के आंकड़ों पर नज़र डालें तब कुछ नंबर देश के कुछ राज्यों की जातिगत हिंसा की तस्वीर खींचते हैं। साल 2014 में उत्तर प्रदेश में 8066, राजस्थान में 6734, बिहार में 7874 और मध्य प्रदेश में 3294 शैड्यूल कास्ट के लोगों पर अपराध हुए हैं। हमें किसी भी तरह यह नहीं भूलना चाहिए थे कि ये आंकड़ें उन राज्यों में हैं जहां दलितों की स्थिति बहुत सोचनीय दशा में है। बहुत से मामले दर्ज़ नहीं किए जाते और कई बार लोग दर्ज़ करवाने भी नहीं जाते। आंकड़ों की वास्तविक संख्या कितनी होगी, यह कोई भी व्यक्ति समझ सकता है। मोहल्लों के छोटे–मोटे झगड़ों में लोग जाति सूचक शब्दों को आपत्तिजनक इस्तेमाल करते पाये जाते हैं।
इंडिया स्पेंड नामक ऑनलाइन वैबसाइट पर कुछ विश्लेषणात्मक लेख प्रकाशित किए गये हैं। इनमें सन् 2011 की जनगणना के कुछ आंकड़े पेश किए गये हैं। उसमें एसटी और एससी जातियों की शिक्षा, नौकरी आदि से संबन्धित आंकड़े रखे गये हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक एससी साक्षारता दर 66% और एसटी 59% थी। अनुसूचित जाति ऊंची साक्षरता प्रतिशत के अंतर्गत टॉप पाँच राज्यों में जगह बनाने वाले राज्य मिजोरम में 92%, त्रिपुरा में 90%, केरल में 89% गोवा में 84% और महाराष्ट्र में 80% है। वहीं नीचे से सोचनीय स्थिति वाले राज्य बिहार, झारखंड, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और आन्ध्र प्रदेश क्रमश: 40%, 56%, 60%, 62%, 62% है। आज़ादी के इतने सालों बाद भी हम आगे नहीं बढ़ पाये हैं।

ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (एचआरडी द्वारा) के आंकड़े भी बहुत कुछ कहते हैं। उच्च शिक्षा में टॉप पाँच राज्यों में मिजोरम, मणिपुर, मेघालय, तेलंगाना और तमिलनाडु क्रमश: 114.0%, 63.9%, 44.5%, 39.6% 33.7% है। उच्च शिक्षा में सबसे खराब पाँच राज्य बिहार, झारखंड, ओड़ीसा, पश्चिम बंगाल, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य क्रमश: 5.3%, 9.5%, 11.7%,12.9%, 13.6%है। कमाल की बात है कि बिहार के मुख्यमंत्री किसी एक मंत्री के भ्रष्टाचार पर अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनकर त्यागपत्र दे देते हैं पर कभी भी इन आंकड़ों पर नज़र तक नहीं डालते और न ही शर्मिंदा होते हैं।

फैंसी स्त्रीवादी आयोजनों में जाति मुद्दों की उपेक्षा

एनसीआरबी के ही आंकड़े बताते हैं कि साल 2014 में दलितों के खिलाफ़ 47,064 अपराध हुए। दलित महिलाओं के साथ बलात्कार के 2,233 मामले दर्ज़ हुए और हत्याओं की संख्या 744 रही। आंकड़े वही बात बता रहे हैं जो दर्ज़ किए ये हैं। जो दर्ज़ नहीं हुए वे अभी भी गुमशुदा हैं। हमारे देश में अहिंसा की बात बरसों से उठती रही है। इसके पीछे का वाजिब कारण यह है कि भारत के इतिहास में ही हिंसा का एक बड़ा धब्बा लगा है। विशाल लोगों के समूह को इंसान न मानकर जानवरों से भी खराब व्यव्हार के उदाहरण किताबों में भरे पड़े हैं। यह कैसा समाज है जो इंसान को इंसान नहीं मानता? आज भी तथाकथित उच्च जाति के लोग उस भयानक मानसिकता को ढो रहे हैं। दिल्ली में बैठे हुए लोग जब यह कहते हैं कि जातिगत भेदभाव पुरानी बात हुई तब जी खोलकर हंसने का मन करता है।

सावित्री देवी का अपने 8 महीने के अजन्मे बच्चे समेत मर जाना भारतीय समाज पर धब्बा है। यह उस विकास के मुंह पर थप्पड़ है जो विकास-विकास चिल्ला कर नाटक कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश की सरकार दीवाली पर अयोध्या में दीप उत्सव और ताजमहल की लफ़्फ़ाज़ी में उलझी हुई सरकार है। यह सरकारों का दिवालियापन ही है कि शिक्षा और सामाजिक बदलाव पर ध्यान न देकर दूसरे मामलों को मुद्दा बना रही है। राज्य और केंद्र की सरकारों के हाल को देखते हुए आज भी यह अंदाज़ा लग जाता है की समानता जैसा शब्द अभी ज़मीन पर नहीं उतर सकता। चुनाव जीतना और उसके बाद व्यक्तिगत से लेकर दलों तक का अपने निजी हित को साधने में लग जाना जनता और देश के लिए एक भयानक और सोचनीय स्थिति है।
‘दलित’ शब्द दलित पैंथर आंदोलन के इतिहास से जुड़ा है: रामदास आठवले

देश की दूसरी सबसे बड़ी आई टी कंपनी इंफ़ोसिस इस साल की शुरुआत में अचानक चर्चा में आ गई थी। कंपनी के कार्यकारी और संस्थापक में बहस चालू थी। लेकिन तत्कालीन मुख्य कार्यकारी विशाल सिक्का ने अपने एक बयान से सबको चौंका भी दिया। उन्होने साक्षात्कार में यह कहा-“मैं एक क्षत्रिय योद्धा हूँ। मैं यहाँ टिकने और लड़ने(जूझने) आया हूँ।”(I am kshatriya warrior. I am here to stay and fight.)सोचिए अगर देश की दूसरी सबसे बड़ी आईटी कंपनी का मुख्य कर्ता-धर्ता ऐसा सोचता और कहता है तब बाकी लोगों का क्या हाल होगा? जाति खून में बह रही है मानो। भारत में ऐसे लोग भी बहुत बड़ी संख्या में हैं जो सार्वजनिक मंचों पर जाति उन्मूलन के रिबन काटते हैं और निजी जगहों पर जाति सूचक गालियों के इस्तेमाल से भी नहीं चुकते। जो नेतागण माइक के आगे गले से (बिसलरी पीकर) ऊंची आवाज़ निकालते हैं, उन्हें इस तरह की मानसिकताओं से जूझने और समाप्त करने की नीतियों के बारे में सोचना चाहिए। क्या आप उस राम राज्य की बात करते हैं जहां चार वर्ण व्यवस्था की जगह है या फिर आप एक लोकतान्त्रिक शासन और समाज की तमन्ना करते हैं जहां सब बराबर हैं? अगली बार नेता वोट मांगने आयें तब यह सवाल पूछना जरूरी बन जाता है।

ज्योति जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के भाषा अध्ययन विभाग में शोधरत हैं. सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com  

फोटो: गूगल से साभार 
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बिल्डर और डीडीए के गुंडों ने मुझे मारा, शुरुआत दिल्ली पुलिस ने की थी: एनी राजा

‘पहली शुरुआत तो जरूर पुलिस ने की थी, लेकिन उसके बाद दिल्ली डेवलॉपमेंट अथॉरिटी (डीडीए) के और बिल्डर के गुंडों  के हवाले कर दिया. उसके बाद उन्होंने मुझे घेरकर मारना शुरू किया-लाठियों और लातों से.’ 30 अक्टूबर को दिल्ली की कठपुतली कॉलोनी में पुलिस के सहयोग से डीडीए ने बुलडोजर चलवाये. उस दौरान विरोध करने वाले कॉलोनी के वासियों पर लाठीचार्ज किया गया तथा उनका नेतृत्व कर रहे एनएफआईडवल्यू के महासचिव एनी राजा को बुरी तरह मारा गया.

घायल एनी राजा

राममनोहर लोहिया अस्पताल में इलाज करवा रही जख्मी एनी ने कहा कि ;मैंने पुलिस में अपने बयान दे दिये हैं और बिल्डर, डीडीए और दिल्ली पुलिस के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवा दिया है. पुलिस यदि सही से जांच करती है तो मुझे मार रहे गुंडों की तस्वीर उन्हें मिल सकती है,वहीं लगे सीसीटीवी फुटेज से.’

एनी ने बताया कि डीडीए के लोगों और बिल्डर ने ट्रांजिट कैम्प में रह रहे कठपुतली कॉलोनी के कुछ परिवारों की महिलाओं को भी बहला-फुसला कर वहाँ बुला रखा था. उनलोगों ने कहना शुरू किया कि ‘ जब हमें घर मिल रहा है तो तुमलोगों को क्या परेशानी है. वे आक्रोश में थीं. मैंने उन्हें कहा कि जब आपको घर मिल जाये तो मुझे भी बुलाना.’ सुनते ही वे एकदम से चुप्प हो गयीं और पीछे हट गयीं.’

दरअसल प्रशासन और बिल्डर दिल्ली के प्राइम लोकेशन में बसी इस झुग्गी बस्ती को खाली करवाने के लिए हर तरह के तरीके अपना रहे हैं-साम, दाम, दंड, भेद. वहाँ रहने वाले अधिकाँश लोग इसलिए विरोध कर रहे हैं कि उनमें से आधे से अधिक लोगों का पुनर्वास नहीं हुआ है और प्रशासन उनसे सख्ती से पेश आ रहा है. बेहतर पुनर्वास के लिए एनएफआईडवल्यू सहित कई संगठनों के लिए वहाँ सक्रिय है और तबतक इस बस्ती को उजाड़ने के खिलाफ हैं.

कल देर शाम तक 17 भाषाओं के लोगों से बसे लगभग चार हजार परिवारों वाली इस कॉलोनी को तोड़ दिया गया. पढ़ें स्त्रीकाल में इसकी रिपोर्ट.:

पुलिस ज्यादती: कठपुतली कलाकारों पर दिल्ली में बरसीं लाठियां: हजारो गरीब जबरन बेघर किये गये

आज सुबह से ही कार्रवाई जारी है. राज्यसभा के सांसद और सीपीआई नेता डी राजा ने बताया कि उनसे केन्द्रीय शहरी विकास मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने उनसे वादा किया था कि वे बातचीत कर रास्ता निकालेंगे, बलप्रयोग से बस्ती नहीं उजाड़ी जायेगी.’ फिर सवाल है कि मंत्री के न चाहने पर कल की हिंसक कार्रवाई कैसे हुई? कठपुतली कॉलोनी के स्थानीय लोगों ने कहा कि ‘डीडीए और बिल्डर के लोगों ने उन्हें धमकी दी थी कि वे इसे खाली करवाकर ही रहेंगे. उन्हें इसका अनुभव है.’



क्या है पूरा मामला?

रेहजा बिल्डर्स को बस्ती की यह जमीन अपने एक प्रोजेक्ट के लिए चाहिए. रहेजा का कहना है कि 190 मीटर ऊंची  54 मंजिला यह इमारत दिल्ली की सबसे ऊंची इमारत होगी। इसमें 170 लग्जरी फ्लैट, एक स्काई क्लब और हेलीपेड बनाए जा रहे हैं. छह अक्टूबर 2009 में रहेजा और डीडीए के बीच हुए करार के मुताबिक प्रोजेक्ट में दो कमरे के 2641 फ्लैट, पार्क, ओपन एयर थियेटर, दो स्कूल जैसी सुविधाओं का वादा किया गया है. इसके बदले में रहेजा बिल्डर्स ने 6.11 करोड़ का भुगतान डीडीए को किया. रहेजा बिल्डर्स के हिसाब से इस पूरे प्रोजेक्ट में 254.27 करोड़ का खर्च आने वाला है. कुल 5.22 हैक्टेयर जमीन में से 3.4 हैक्टेयर जमीन कॉलोनी के पुनर्वास में इस्तेमाल होगी. रहेजा बिल्डर्स को शेष 1।7 हैक्टेयर जमीन पर निर्माण करवाने का हक़ हासिल होगा. माने कुल जमीन का 60 फीसदी हिस्सा ही पुनर्वास के काम लिया जाएगा. हालांकि एनी राजा  ने बताया कि शुरुआती एग्रीमेंट में जरूर 60 फीसदी जगह पर पुनर्वास की बात थी, लेकिन वह धीरे-धीरे घटती गयी है और इनका इरादा भी नहीं दिख रहा सभी लोगों के पुनर्वास का.

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कहीं आपकी शादी भी बोझ न बन जाये

शादी की कहानी कोई नई थोड़ी है। ना ही कोई नया रास्ता है। चाहे-अनचाहे सभी इस रास्ते से गुजरते हैं। कुछ चाहकर और कुछ न चाहकर भी।….कुछ कम उम्र में तो कुछ चढ़ी उम्र में।…किंतु कमाल का सच ये है कि इस रास्ते में आई बाधाओं के किस्से चुटकलों के जरिए तो सुनने/पढ़ने को खूब मिलते हैं किंतु इन चुटकलों के सच को कोई भी पति अथवा पत्नी व्यक्तिश: स्वीकार नहीं करता। क्यों……? लोक-लज्जा का डर, पुरूष को पुरुषत्व का डर, पत्नी को स्त्रीत्व का डर…… डर दोनों के दिमाग में ही बना रहता है… इसलिए पति व पत्नी दोनों आपस में तो तमाम जिन्दगी झगड़ते रहते हैं किंतु इस सच को सार्वजनिक करने से हमेशा कतराते हैं।किंतु यह भावना कष्टकारी है। व्यापक तौर पर देखा जाए कि हमारे समाज में किसी भी सच को कोई भी उजागर करना का मन नहीं बना पाता।

दोस्तों! एक समय था कि जब शादी के मामले में लड़के और लड़की की इसके अलावा कोई भूमिका नहीं होती थी कि वो दोनों आँख और नाक ही नहीं अपितु साँस बन्द करके माँ-बाप अथवा दूसरे सगे-संबन्धियों की इच्छा के अनुसार शादी के लिए तैयार हो जाएं। इसके पीछे समाज का अशिक्षित होना भी माना जा सकता है।  किंतु जैसे-जैसे समाज में शिक्षा का व्यापक प्रचार और प्रसार हुआ तो नूतन समाज के विचार पुरातन विचारों से टकराने लगे, अब शादी के मामले में लड़के  और लड़की की इच्छाएं भी पुरातन संस्कृति के आड़े आने लगी हैं। फलत: पिछले कुछ दशकों से यह देखने को मिल रहा है कि शादी के परम्परागत पहलुओं के इतर शादी से पहले लड़के और लड़की को देखने का प्रचलन जोरों पर है। पहले यह उपक्रम केवल शहरों-नगरों तक ही सीमित था किंतु आजकल तो यह उपक्रम दूरस्थ गाँवों तक पहुँच गया है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है।

यहाँ एक सवाल का उठना बड़ा ही जायज लगता है कि शादी के उद्देश्य से लड़के और लड़की की पंद्रह-बीस मिनट की मुलाकात में लड़का लड़की और लड़की लड़के के विषय में क्या और कितना जान पाते होंगे, कहना कठिन है। सिवाय इसके कि एक दूसरा, एक दूसरे की चमड़ी भर को ही देख-भर ले। दोनों एक दूसरे की नकली हंसी को किसी न किसी हिचकिचाहट के साथ दबे मन से स्वीकार कर लें। इस सबका कोई साक्षी तो होता नहीं है। अगर हो भी तो उनका इस प्रक्रिया में कुछ भी कहने का कोई अधिकार यदि होता है तो वह केवल लड़के और लड़की को केवल शादी के लिए तैयार करना होता है। इसके अलावा और कुछ नहीं। कहना अतिशयोक्ति न होगा कि दो अनजान चेहरों के बीच पहली बैठक में बात शुरु करने में कुछ न कुछ तो हिचकिचाहट होती ही है। अमूनन देखा गया है कि शादी के बन्धन में बन्धने जा रहे जोड़े को दूसरी मुलाकात का मौका प्राय: दिया ही नहीं जाता।

धार्मिक बाधाएं इस सबके सामने खड़ी कर दी जाती हैं। हमको इस धार्मिक उपक्रम ने इस हद तक कमजोर और कायल बना दिया है कि हम सारा समय लड़के और लड़की की कुंडलियाँ मिलाने में गवां देते हैं। फिर ये कैसे मान लिया जाए कि शादी की पुरातन रीति आज की रीति से भिन्न है? हाँ!
शादी जीवन का एक अकेला ऐसा सौदा है जो एक-दो दिन की मुलाकात में ही तय मान लिया जाता है जबकि एक टी.वी. या फ्रिज जैसी दैनिक उपयोग की चीजें खरीदने की कवायद में सप्ताह, हफ्ता ही नहीं, यहाँ तक की कई-कई महीने तक लग जाते हैं…. कौन सी कम्पनी का लें? इसकी क्या और कितने दिनों की गारंटी है?……. इसका लुक औरों के मुकाबले कैसा है?… न जाने क्या-क्या…..। न जाने कितने मित्रों से इसकी जानकारी हासिल की जाती हैं….. इतना ही नहीं, सब्जी तक दस दुकानों की खाक छानने के बाद  भाव-मोल करने के बाद ही खरीदी जाती हैं।…किंतु लड़का-लड़की के बीच जीवन-भर का रिश्ता बनाने में जान-पहचान के बजाय बच्चों की शिक्षा के स्तर और उनकी आमदनी के विषय में ही ज्यादा सोचा जाता है।…………..और कुछ नहीं।

लगता  है कि यही प्रक्रिया आजकल के रिश्तों में टूटन का खास कारण है।…….. बच्चों की कमाई भी इसका एक कारण हैं, एक दूसरा एक दूसरे की कमाई पर हक जताने की जिद में हमेशा उलझे रहता हैं। ……लड़का और लड़की के घर वाले भी इस कवायद में कम भूमिका नहीं निभाते……. लड़का और लड़के के घर वाले लड़की की कमाई को हर-हाल हथियाने की कोशिश में लग रहते हैं, और लड़की  अपनी कमाई को लड़के के नाम क्यूँ करदे, इसी उलझन में फंसी रहती है।……. पड़े भी क्यूँ न?  जो लड़की अपने माँ-बाप के घर को छोड़कर लड़के के साथ उसके घर में रहने के लिए बाध्य होती है तो क्या वह अपनी कमाई से ससुराल वालों को पालने के लिए भी बाध्य है? यदि ऐसा होता है तो लड़की के लिए शादी के क्या माने रह जाते है?

हाँ! मान-सम्मान अता करने की बात अलग है। इस जद्दो-जहद के चलते लड़का और लड़की के बीच मतभेद हो न हो, घर वाले दोनों के बीच में दीवार खड़ा करने में अहम भूमिका निभाते हैं।  केवल माँ-बाप ही लड़का और लड़की के बीच की दीवार नहीं बनते, अपितु अनेक बार लड़का और लड़की भी अपने बीच दीवार खड़ा करने में पीछे नहीं रहते। इसी कश-म-कश के चलते, यह देखा गया है कि शादी हो जाने के बाद पति-पत्नि एक दूसरे को निभाने, या यूँ कहूँ कि पति-पत्नि के सामने इस  रिश्ते को ढोने के अलावा कोई और रास्ता शेष नहीं रह जाता।

जहाँ तक कुंडलियों के मिलान का सवाल है तो  यह सवाल उठता है कि  क्या कुंडली-मिलान रिश्तों के अमरत्व की कोई गारंटी देता है। क्या कुंडली-मिलान वाले जोड़ों के बीच कभी कोई दरार नहीं पड़ती? क्या उनका जीवन-भर मधुर साथ बना रहता है? क्या उनके जीवन में कोई प्राक्टतिक बाधा नहीं आती?  जैसी कि  कुंडली मिलाते समय आशा की जाती है।…..व्यापक रूप से ये भामक मानसिकता है, ऐसा करने से कभी भी किसी दम्पति को आशातित शांति शायद कभी नही और कतई नहीं मिलती। यह उपक्रम अपने को स्वय धोखा देने के बराबार है। मुझे लगता है कि इसके इतर यह अच्छा होगा कि लड़के और लड़की की जन्मकंडली के बदले उनकी चिकित्सीय कुंडलियों  का मिलान किया जाना चाहिए। मैं जानता हूँ कि मेरे इस प्रस्ताव को एक मानसिक रोगी की विचारधारा समझ नकार ही दिया जाएगा किंतु मेरी इस बात के महत्व को खुशवंत सिंह की पुस्तक ‘दिल्ली’ में उद्धृत  महात्मा शेख सादी के इस बयान से जाना जा सकता है – “यदि औरत बिस्तर से बेमजा उठेगी तो बिना किसी वजह के ही मर्द से बार-बार झग़ड़ेगी|”  किंतु ये एक ऐसा सत्य है जिसे कोई भी पुरुष अथवा औरत मानने वाली नहीं है …… किंतु ऐसा होता है। रिश्तों की खटास में यह भी एक और सबसे बड़ा कारण है। इस कारण के बाद आता है…….दौलत का सवाल…. श्रंगारिक संसाधनों की उपलब्धता……. गहनों की अधिकाधिक रमक……..आदि…. आदि। पुरुषों के मामले में दहेज का लालच….और न जाने क्या-क्या। क्या लड़के और लड़के के माता-पिता द्वारा इस ओर कुंडलियाँ मिलाते समय ध्यान दिया जाता है?

नवभारत टाइम्स – 06.02.2015 में छपे एक सर्वे के जरिए यह तथ्य सामने आया है कि ज्यादातर दम्पत्तियों के बीच शादी वाला प्यार शादी होने के पहले दो सालों में ही फुर्र हो जाता है …. कुछ का तीन सालों बाद …… और जिनका बचा रहता है ……. इनके सामने किसी न किसी प्रकार की सामाजिक मजबूरी ही होती है। …. ये पहले कभी होता होगा कि पति-पत्नी बुढ़ापे में एक दूसरे के मददगार बने रहते थे….. आज समय इतना बदल गया है कि बुढ़ापा आने से पहले ही सारा खेल बिगड़ जाता है…… पहला बच्चा पैदा होने के साथ ही पत्नी का प्रेम पति के प्रति इतना कम हो जाता है कि पति उसके लिए उधार की चीज बन जाता है……. ऐसा उधार कि जिसे वो उतार तो नहीं सकती ………बस! ढोने भर के लिए बाध्य होती है…….पति की हालत भी कमोवेश यही होती है।  यहाँ भी लोक-लाज ही ऐसे रिश्तों को निभाने के लिए आड़े आती है।…….

इन सबसे इतर, नवभारत टाइम्स दिनांक 23.05.2015 के माध्यम से अनीता मिश्रा कहती हैं कि शादी सिर्फ आर्थिक और शारीरिक जरूरतों को पूरा करने भारत का माध्यम नहीं है। लड़कियों को ऐसे जीवन साथी की तलाश रहती है जो उन्हें समझे। उनकी भावनात्मक जरूरतें भी उनके साथी के महत्तवपूर्ण हों।  वे  फिल्म ‘पीकू’ में एक संवाद का हवाला देती हैं…….   “ शादी बिना मकसद के नहीं होनी चाहिए। फिल्म की नायिका का पिता भी पारम्परिक पिताओं से हटकर है। वह कहता है, ‘ मेरी बेटी इकनामिकली, इमोशनली और सेक्सुअली इंडिपेंडेंट है, उसे शादी करने की क्या जरूरत?’ मैं समझता हूँ कि यह तर्क अपने आप में इमोशनल जरूर है। फिर भी यह आम-जन का ध्यान तो आकर्षित करता ही है।


अनीता जी आगे लिखती है कि  यहाँ एक सवाल यह भी है कि विवाह संस्था को नकारने का कदम स्त्रियां ही क्यों उठाना चाहती है। शायद इसके लिए हमारा पितृसत्तात्मक समाज दोषी है। वर्तमान ढांचे में विवाह के बाद स्त्री की हैसियत एक शोषित और उपयोग की वस्तु की हो जाती है। आत्मनिर्भर स्त्री के भी सारे निर्णय पति के परिवार वाले ही करते हैं। शादी होने के बाद (कुछ अपवादों को छोड़कर) उसका पति मालिक और निरंकुश शासक की तरह ही व्यवहार करता है। ऐसे में स्त्री के लिए दफ्तर की जिन्दगी और घरेलू जिन्दगी में तालमेल बिठाना मुश्किल हो जाता है। कहा जा सकता है कि ज्यादातर स्त्रियों को दफ्तर में काम करने के बाद भी घर में एक पारम्परिक स्त्री की तरह खुद को साबित करना होता है। किसी भी स्त्री को जब सफलता मिलती है तो यह भी जोड़ दिया जाता है कि उसने करियर के साथ सारे पारवारिक दायित्व कितनी खूबी से निभाए। जबकि पुरुषों की सफलता में सिर्फ उनकी उपलब्धियां गिनी जाती हैं। कामकाजी लड़कियों के लिए शादी के बाद इतनी सारी चीजों के बीच तालमेल बिठाना मुश्किल हो जाता है। नतीजतन संबंधों में खटास आ जाती है…. यहाँ तक की तलाक की स्थिति  भी उत्पन्न हो जाती है। ऐसी मिसालें देखकर आज कई लड़कियां शादी नहीं करने का निर्णय ले रही हैं। वे अपनी आजादी को पूरी तरह जीना चाहती हैं और अपने व्यक्तित्व और संपति की मालिक खुद होना चाहती हैं।



यहाँ यह सवाल उठना भी लाजिमी है कि शादी समाज की एक जरूरी व्यवस्था रही है किंतु आजादी चाहने वाली लड़कियां शादी को एक बन्धन की तरह देखती हैं। फिर मानव समाज की दृष्टि से एक सामाजिक व्यवस्था के तौर पर विवाह का विकल्प क्या है? क्या यह बेहतर नहीं होगा कि बदलते परिवेश में स्त्री शादी का विकल्प खुद खोजे? जाहिर तौर पर अब तक पुरुषों की आर्थिक स्वनिर्भरता और सक्षमता ने केवल उन्हें ही निर्णय लेने का अधिकार दे रखा था। अब अगर महिलाएं भी इसी हैसियत में पहुँचने के बाद अपनी जिन्दगी की दिशा तय करने वाला फैसला खुद लेने लगी हैं तो इसमें गलत क्या है? फिर क्यों न आत्मनिर्भर, जागरूक और सक्षम महिला को शादी करने, न करने का फैसला खुद लेने दिया जाए?

 उपर्युक्त के आलोक में महिलाओं और पुरुषों के बीच बराबरी के प्रश्न का हल एक लम्बी प्रक्रिया से होकर गुजरेगा। आनन-फानन में कुछ भी नहीं होने वाला है। किंतु इस प्रकार की बहसों का जन्म लेना सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को गति तो प्रदान करता ही है।

 लेखक परिचय:  तेजपाल सिंह तेज (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की दर्जन-भर किताबें प्रकाशित हैं- दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से आदि ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि, पुश्तैनी पीड़ा आदि (कविता संग्रह), रुन-झुन, खेल-खेल में आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), दो निबन्ध संग्रह  और अन्य। तेजपाल सिंह ‘तेज’  साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक, आजीवक विजन के प्रधान सम्पादक तथा अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर इन दिनों आप स्वतंत्र लेखन के रत हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं।


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पुलिस ज्यादती: कठपुतली कलाकारों पर दिल्ली में बरसीं लाठियां: हजारो गरीब जबरन बेघर किये गये

एक वह दिन था, अभी तीन महीने पहले, जब कठपुतली कलाकार सरबती भट्ट ने  स्त्रीकाल से बात करते हुए आक्रोश और जोश के साथ कहा था कि “हम जान दे देंगे लेकिन अपनी जगह नहीं छोड़ेंगे’. तब  गुस्से से भरी सरबती भट्ट ने  देश की राजधानी के के शादीपुर में, अपने और अपने लोगों के साथ हो रही  ज्यादतियां बयान की थीं और आज पुलिस की लाठियों से घायल और अपने दो बेटों के  पुलिस द्वारा उठा लिये जाने के बाद विलाप कर रही थीं. वे अपने लिए और पुलिस की लाठियों से घायल एनएफआईडवल्यू की महासचिव एनी राजा के लिए विलाप कर रही थीं. सरबती के पति भगवानदास भट्ट अपनी कला के लिए राष्ट्रपति से सम्मानित किये जा चुके हैं, बेटे भी देश-विदेश में अपनी कला का प्रदर्शन करते रहे हैं.”

ध्वस्त घर दिखाते कठपुतली कलाकार

जब हम कुछ पत्रकार मित्र 30 अक्टूबर को  पुलिस के बर्बर लाठी चार्ज के बाद लुटे-पिटी कठपुतली कॉलोनी पहुंचे तो पूरा इलाका पुलिस छावनी में तबदील दिखा और कॉलोनी के लोग विलाप करते, अस्त-व्यस्त, पस्त. कुछ लोग अपने समान ढो-ढोकर जा रहे थे. श्वेता यादव की विस्तृत रपट:

विलाप करती कलाकार सरबती खान

कहते हैं आशियाने बनाने में सालों लग जाते हैं और उजड़ने में वक्त नहीं लगता। शायद यही कहानी शादीपुर के पास बसे कठपुतली कॉलोनी के साथ घट रही है। एक समय था जब इन गलियों में घुसते ही ढोल-नगाड़े, कठपुतलियां और न जाने क्या-क्या करतब सुनाई और दिखाई पड़ते थे, आज वही गलियां मलबे में तब्दील थी और कुछ सुनाई दे रहा था तो वह था लोगों का रोना- चिल्लाना।

लगभग चार हज़ार परिवार सत्रह राज्यों के लोग और लगभग सत्रह भाषाएँ आज विस्थापित हो गईं। साठ साल से एक ही जगह रहने वाले लोग आज बेघर हो गए, जिन्हें आशियाना बनाने में सदियाँ लगी होंगी वे आज इस उम्मीद से बाहर से आने वाले हर व्यक्ति को देख रहे थे और सवाल कर रहे थे कि अब क्या होगा हमारा, कहाँ जायेंगे हम? बिखरे हुए लोग टूटे हुए मकान जाए तो जाएं कहाँ?

पुलिस की ज्यादती बयान करते लोगों की व्यथा सुनें वीडियो में :

30  अक्टूबर को राजधानी दिल्ली में पुलिस ने डीडीए की मदद से कठपुतली कॉलोनी की झुग्गियों को बिना किसी पूर्व नोटिस के तोड़ डाला। वहां के लोगों ने हमसे बात करते वक्त कहा कि हम लोगों को  इस बात की कोई पूर्व सूचना नहीं दी गई थी कि आज हमारे घर तोड़े जाएंगे ना ही हमें यह बताया गया कि इसके बाद हमें रहना कहाँ हैं? वहां के बाशिंदों ने हमसे बातचीत में कहा कि हमें अपने सामान तक को निकालने का समय नहीं दिया गया और सामान  के साथ ही हमारे घरों को तोड़ दिया गया।

मामले का विरोध कर रही एनएफआई डबल्यू की महासचिव एनी राजा को पुलिस और डीडीए के लोगों ने बुरी तरह से पीटा, वे राम मनोहर लोहिया ट्रॉमा सेंटर में भर्ती हैं। मीडिया के तमाम साथियों के साथ भी पुलिस के बर्बर रवैये की खबर है। गौरतलब बात यह भी है कि एनी राजा को छोड़कर कोई भी राजनैतिक व्यक्ति या पार्टी कठपुतली कालोनी के सपोर्ट में नहीं है कायदे से आंकलन  पर आपको यह स्पष्ट हो जाएगा कि बिना किसी राजनैतिक सपोर्ट के इस मामले का कठपुतली कॉलोनी के लोगों के पक्ष में जाना संभव नहीं जान पड़ता है।

जब हम वहां पहुंचे तो हमें लोगों ने बताया कि बिना सूचना बुलडोजर चलने के कारण एक बच्चे की मलबे में दब कर मौत हो गई तथा एक महिला की सदमें से मृत्यु हो गई। हालांकि अपनी तमाम कोशिश के बावजूद इस खबर की सत्यता की पुष्टि में हम असमर्थ रहे। इसके इतर हमें यह सूचना भी दी गई और इसकी पुष्टि करने में हम सफल रहे कि कठपुतली कालोनी के प्रधान की पत्नी ने आत्महत्या की भी कोशिश की जिन्हें सामूहिक प्रयास से बचा लिया गया और अभी वह ठीक हैं।

मोदी, केजरी को महिला कलाकार की ललकार: जान देंगे लेकिन जगह नहीं छोड़ेंगे !

घायल एनी राजा

चारो तरफ की चीख-पुकार लोगों और लोगों के सवालों से घिरे हम दो पत्रकार, मैं और स्त्रीकाल के सम्पादक संजीव चंदन -जब भी आँखें एक दूसरे से मिली शांत भाव से बस एक ही सवाल कौंधा की सच ही तो पूछ रहे हैं लोग कहाँ जाएंगे? क्या करेंगे? एक तरफ पुलिस का घेरा और दूसरी तरफ लोगों का गुस्सा सब झेलते हुए हम उनसे सवाल करते जा रहे थे कि क्या आप लोगों को पता नहीं था कि आपके मकान आज टूटने वाले थे? क्या आप लोगों को कोई नोटिस दी गई थी आज के लिए? अगर मामला कोर्ट में था तो क्या कोर्ट का कोई फैसला आ चुका है इस सम्बन्ध में हमारे सभी सवालों का सामूहिक स्वर में एक ही जवाब आ रहा था और वह था “नहीं”

मुझे आज तक सरकारों का रुख समझ में नहीं आया उन्हें जब भी कभी किसी को विस्थापित करना होता है तो वह जाड़े का समय ही क्यों चुनते हैं? इसके अलावा जिन ट्रांजिट कैम्पों में उनके रहने की व्यवस्था की गई है क्या वहां जीवन यापन के समुचित प्रबंध हैं? सामजिक कार्यकर्ता स्नेहलता शुक्ल जो की इस लड़ाई में लगातार कठपुतली कॉलोनी के साथ बनी रहीं हैं का कहना है कि जितने परिवार यहाँ से विस्थापित किए जा रहे हैं उतने परिवारों के रहने की व्यवस्था सरकार ट्रांजिट कैम्पों में नहीं कर पाई है। परियोजना के मुताबिक बस्ती के लोग दो साल के लिए आनंद पर्वत (दिल्ली में पश्चिम उत्तर का एक इलाका) में बने ट्रांजिट कैम्प जाएंगे। और वापस अपनी जमीन पर आने के लिए इन्हें पैसे भी देने पड़ेंगे।

तीन महीने पहले प्रतिरोध के लिए इकट्ठे होते थे लोग

क्या है पूरा मामला?

रेहजा बिल्डर्स को यह जमीन अपने एक प्रोजेक्ट के
लिए चाहिए। रहेजा का कहना है कि 190 मीटर ऊंची  54 मंजिला यह इमारत दिल्ली की सबसे ऊंची इमारत होगी। इसमें 170 लग्जरी फ्लैट, एक स्काई क्लब और हेलीपेड बनाए जा रहे हैं। छह अक्टूबर 2009 में रहेजा और डीडीए के बीच हुए करार के मुताबिक प्रोजेक्ट में दो कमरे के 2641 फ्लैट, पार्क, ओपन एयर थियेटर, दो स्कूल जैसी सुविधाओं का वादा किया गया है। इसके बदले में रहेजा बिल्डर्स ने 6.11 करोड़ का भुगतान डीडीए को किया। रहेजा बिल्डर्स के हिसाब से इस पूरे प्रोजेक्ट में 254.27 करोड़ का खर्च आने वाला है। कुल 5.22 हैक्टेयर जमीन में से 3.4 हैक्टेयर जमीन कॉलोनी के पुनर्वास में इस्तेमाल होगी। रहेजा बिल्डर्स को शेष 1।7 हैक्टेयर जमीन पर निर्माण करवाने का हक़ हासिल होगा। माने कुल जमीन का 60 फीसदी हिस्सा ही पुनर्वास के काम लिया जाएगा।

तीन महीने पहले स्त्रीकाल से बात करती सरबती भट्ट: वीडियो

डीडीए के 2010 के सर्वे को भी सही माना जाए तो बनाए जा रहे फ्लैट और मौजूद झुग्गियों की संख्या में बड़ा अंतर है। क्योंकि यह सर्वे 6 साल पुराना है तो फिलहाल कुल परिवारों की संख्या में अंतर के और बढ़ने से इनकार नहीं किया जा सकता। इस लिहाज से देखा जाए तो इस प्रोजेक्ट के जरिए कुछ लोगों का बेघर होना तय है।

आने वाले समय में सरकार और रहेजा मिलकर इन विस्थापित परिवारों का क्या भला करेंगे यह तो वक्त तय करेगा लेकिन इंसानियत के नाते इतना तो तय माना जा ही सकता है कि बिना किसी की मर्जी के उसे उसके घर से जबरन मार-पीट कर निकालना क़ानून अपराध है। लेकिन तब यह किस अपराध की श्रेणी में आएगा जब क़ानून के रखवाले ही किसी बिल्डर के साथ मिल कर घर गिराने लगें।

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दस द्वारे का पिंजरा: स्त्री मुक्ति की संघर्ष गाथा

अनामिका कृत ‘दस द्वारे का पिंजरा’ उपन्यास सन् 2008 को प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में नये प्रयोगों के कारण अनामिका जी को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। अनामिका जी हिन्दी की बहुचर्चित कथाकार, कवियत्री तथा आलोचक के रुप में जानी जाती हैं। एक स्त्री की नजर से पूरे समाज को परखने और समझने की उनकी अपनी तड़प है। उपन्यास ‘दस द्वारे का पिंजरा’ स्त्री मुक्ति के अनकहे मुद्दों के साथ जोड़कर नई व्याख्या की मांग करता है। उपन्यास दो खंडो में विभाजित है। प्रथम खंड पंडिता रमाबाई और दूसरा ढेलाबाई के जीवन संघर्ष की कथा है जो स्त्री विमर्श की परत-दर-परत खोलते हुए एक कोलाॅज बनाता है.

लेखिका ने नारकीय जीवन जीने वाली चकलाघरों में स्त्री की व्यथा का वर्णन ‘दस द्वारे का पिंजरा’ उपन्यास में किया है।‘दस द्वारे का पिंजरा’ लेखिका की सहपाठिनी वेश्या मासूमा नाज बहुत सुंदर थी और वह हमेशा एक रहस्यमयी चुप्पी ओढ़े रहती थी। एक दिन लेखिका अपनी मौसी के ससुराल जा रही थी। रास्ते में वेश्याओं का मुहल्ला पड़ता था। लेखिका ने अपनी सहपाठिन मासूमा नाज को वेश्याओं के मोहल्ले में पाँव में घुंघरु बांधे सज-धज कर खड़ी देख लिया। दोनों सहेलियों की नजरें आपस में टकराती हैं और उसके बाद वह कभी स्कूल नहीं आई। अनामिका सोचती है कि ‘‘आज इतने बरस बाद भी उन आँखों की दहशत मुझे ऊपर से नीचे तक दहला जाती है पूरी रफ्तार में नाचते पंखे से टकराकर गौरेय जैसे कट कर गिरती है, कुछ उसकी आँखों में फड़फड़ाया और एक एकदम से कट गिरा। अगर मेरी आँखें उस दिन मासूम रजा से नहीं मिलती, तो यह स्वाभिमानी लड़की स्कूल नहीं छोड़ती।’’1 इस घटना के लिये लेखिका स्वंय को जिम्मेदार मानती है। मासूम का दर्द लेखिका के लिए नासूर बनता है।

स्त्री मुक्ति के बारे में अनामिका ने स्पष्ट लिखा है। इस दुनिया में स्त्री की मुक्ति खोजना आकाश और धरती के सांस्कृतिक पुल बनाने से कम मुश्किल नहीं है। लेकिन यह कठिन काम अंजाम दिए बिना दस द्वारे के इस पिंजरे में रहने वाले सुंदर पंछी खुले गगन में उड़ने के लिए तैयार नहीं हो सकते।

उपन्यास में 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षों का लेखा-जोखा दो नायिकाएं रमाबाई और ढेलाबाई के माध्यम से सनातनी कुलीनता की चौखट को तोड़कर अपनी जगह बनाने की कोशिश करती है। पीर जी घसियोर और अफसानाबाई की बेटी मेहरुबाई, मेहरुबाई ढेल को जन्म देने के तीसरे दिन बाद स्वंय चल बसी ढेल की बेटी ठुमरी और ठुमरी की बेटी कानन। पंडित रमाबाई और ढेलबाई स्त्री मुक्ति आन्दोलन के साथ क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़कर अपना जीवन सार्थक बनाती है। लोहासिंह का ऐतिहासिक चरित्र है जो कथावाचक और सूत्रधार का किरदार निभाते हुए उपन्यास के सभी चरित्रों का परिचय करके देता है।

 महेन्द्र मिश्र भोजपुरी भाषा के विद्वान गीतकार, संगीतकार थे। वह अक्सर ढेलाबाई के कोठे पर गीत गाते थे।
उन्होंने ऐलान किया कि वह ढेलाबाई से विवाह कर उसे अपनी पत्नी का दर्जा देकर अपने परिवार में रखेंगे। ढेलाबाई महेन्द्र मिश्र को चाहती थी। ढेलाबाई ने संगीत कला-नृत्य की शिक्षा घर में ही ग्रहण की थी। बाबू हलवंत सहाय को ढेलाबाई उच्छी लगती थी लेकिन दोस्ती की वजह से सहाय ने अपने प्यार का गला घोंट दिया। महेन्द्र मिश्र मेले से ढेलाबाई को अगवा कर हलवंत सहाय को सौंप देता है। ढेलाबाई न चाहते हुए भी हलवंत सहाय के साथ रहने के लिए मजबूर हो जाती है। घर की चारदीवारी में उसे नारकीय जीवन जीना पड़ता है। पति सहाय उसे अपने अतीत से निकलने नहीं देता है। रात-दिन अंग्रेज अफसरों के सामने नाच-गाना करना पड़ता था। पति के सामने ही अंग्रेज अफसर ढेलाबाई के साथ अश्लील हरकतें करते हैं तो पति सहाय खुश होते थे। यह बाते ढेलाबाई को मन ही मन दुःखी करती थी। महेन्द्र मिश्र को लगता था अब सब कुछ ठीक हुआ होगा।



ढेलाबाई की जिंदगी को किनारा मिल गया। एक बार ढेलाबाई अपना दर्द ब्यान करती है -‘‘मिश्रा जी, मेरी स्थिति जरा भी नहीं बदली। जो मैं पहले थी अब भी हूँ। रण्डी के बेटी जिसे कोई कुछ भी कह सकता है, जिसके साथ कभी भी, किसी भी समय दरवाजा धकिया कर घुस सकता है भीतर। सामने पान की दुकान है। कोई खण्डर की दिवार से पूछकर तो पीक नहीं फेंकता उस पर। मैं हूं वह दीवार। हर रण्डी वही दीवार है कोठे पर हो चाहे कोठी में।’’2 स्त्री मुक्ति की छटपटाहट हर स्थान पर दिखाई देती है। ढेलाबाई कहती है -‘‘मैं जो पहले थी अभी भी वो ही हूँ। पहले भी मुजरा करती थी, अब भी करती हूँ। फर्क सिर्फ इतना है कि रुपया मेरे हाथ में आता था, अब मुख्तार साहब के हाथ में आता है। पहले पाँव में बस घुंघरु  थे, अब मोटी जंजीरें भी हैं, पाबन्दियों की। यहां मत जाओ, वहां मत जाओ, इससे बोलो, उससे मत बोलो। ये करो, वो मत करो, सुनते-सुनते मेरे दिमाग  की नसें तड़कने लगी हैं।’’3 पिंजरे में कैद ढेलाबाई हलवन्त सहाय के साथ रहने के लिए अभिशप्त है इसलिए स्वंय को एक जिंदा लाश समझती है। ‘‘खाना इनका दिया खाती हूँ, इसलिए सांस रोककर बगल में लेट जाती हूँ। हर रोज उबकाई आती है तो मन को यही दिलासा देती हूँ कि कर्जा चुका रही हूँ या किराया खाने-पीने का रहने-सहने का।’’4 लेखिका स्त्री मुक्ति के लिए समाज में परिवर्तन चाहती है।

महिला सुधारकों में पंडिता रमाबाई एक विदूषी स्त्री है। ब्राह्मण अनंत शास्त्री डांगे ने पत्नी और पुत्रियों को शास्त्र पढ़ाते और समान अधिकार दिए हैं जिसके कारण उन्हें जाति से बहिष्कृत किया गया। अनंत शास्त्री परिवार समेत गाँव छोड़कर निकल गए। लक्ष्मीबाई अपनी पुत्री रमा की प्रतिभा पर दामाद पोनप्पा को कहती हैं -‘‘जिन पर प्रकृति ज्यादा कृपा करती उनको वह पेरती भी बहुत है। जीवन के सामान्य सुख उनके लिए नहीं होते। अमृत की एक बूँद प्यास की पराकाष्ठा पर टपकाती है।’’5 रमाबाई अपने पिता की तरह साहसी, प्रगतिशील और निर्भीक थी। अकाल पड़ने से पिता अनंत शास्त्री और माता लक्ष्मीबाई की मृत्यु हो जाती है। रमाबाई अपने भाई को लेकर कलकत्ता पहुंच जाती है और वहां नवजागरण आंदोलन से जुड़ जाती है। बिहार की नीची जाति का युवक सदाव्रत रमाबाई के बचपन का साथी था। सदाव्रत इंग्लैंड से वकालत करता है। रमाबाई की नन्हीं बेटी का नाम मनोरमा है। सदाव्रत की हत्या होती है। परिवार में रमाबाई और मनोरमा के अलावा कोई भी नहीं बचता। रमाबाई हार न मानते हुए अपने जीवन साथ सपूर्ण स्त्री जीवन को ऊँचाई तक ले जाने की निरंतर कोशिश करती रही। सामन्तवादी पुरुषों के सामने चुनौती बनकर खड़ी हो जाती है। रमाबाई कहती है -‘‘कब तक पुरुष स्त्री को सिर्फ एक मादा मानते रहेंगे।’’6 लोगों के मिथ्या भाषण सुनने के बाद रमाबाई की आँखों के सामने बनारस, वृंदावन और मथुरा की लाखों विधवाओं की स्थिति अजागर हो जाती है। ‘‘ऐन भगवान की आँखों के आगे जो लगातार सेठों और पंडों का यौन शोषण/गाली-गलौच और रोटी के लाले झेलती, आधी जिबह मुर्गियों का जीवन जीने को अभिशप्त थी।’’7 रमाबाई का जीवन संघर्षमयी रहा है। उन्होंने विधवाओं को सहारा दिया और उन्हें शिक्षित करके आत्मनिर्भर बनने की शक्ति दी।

‘दस द्वारे का पिंजरा’ में लेखिका स्त्री मुक्ति की मांग करती है। स्त्री मुक्ति से ही समाज में परिवर्तन लाना चाहती है। ‘‘मुक्ति भी स्त्रीलिंग ही तो है। कभी अकेली नहीं मिलती। हरदम वह झुण्ड में ही हंसती-बोलती चलती है। थेरियों का झुण्ड हो या जैन साध्वियों, चिड़ियों और स्त्रियों के यह बृहत्तर सखा भाव रमाबाई को हमेशा ही आकर्षित करता है।’’8 द पब्लिक एजेंडा में नामवर सिंह ने कहा है, ‘‘दस द्वारे का पिंजरा’ इस उपन्यास के नाम में गहरा संदेश है। दस द्वारे का पिंजरा कबीर से लिया गया है। पाँच ज्ञान्द्रियाँ और पाँच कर्म इन्द्रियाँ मिलकर शरीर के दस द्वार बनते हैं, जिसमें आत्मा बसती है। इस तरह स्त्री की मुक्ति केवल बुद्धि की मुक्ति नहीं होती, केवल हृदय की मुक्ति नहीं होती, बल्कि तमाम इन्द्रियों की मुक्ति भी होती है। देह भी बंधन है और उससे मुक्ति ही पूर्ण मुक्ति है।’’9


‘दस द्वारे का पिंजरा’ स्त्री-मुक्ति, दलित-मुक्ति, देश-मुक्ति, वेश्या-मुक्ति की संघर्ष गथा है। रमाबाई विदुषी स्त्री थी और ढेलाबाई वेश्या पुत्री अनपढ़ थी। दोनों का संघर्ष स्त्री -मुक्ति का ही है। उपन्यास के अंत में दोनों पात्र एक ही कार्य के लिए जुट जाते हैं। इस उपन्यास की सफलता का कारण है कि दानों का स्त्री मुक्ति आन्दोलन से जुड़ जाना।

सन्दर्भ सूचि
1.अनामिका, दस द्वारे का पिंजरा, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2008, पृ. 6
2.वहीं, पृ. 206
3.वहीं, पृ. 206
4.वहीं, पृ. 207
5.वहीं, पृ. 22
6.वहीं, पृ. 58
7.वहीं, पृ. 111
8.वहीं, पृ. 93
9.वहीं, पृ. 62


लेखक :डाॅ. भारत भूषण
एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग,गुरु नानक कालेज, किल्लियांवाली,श्री मुक्तसर साहिब (पंजाब)-151211

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पितृसत्तात्मक हादसों से मुठभेड़ करती लेखिका की आत्मकथा: ‘हादसे’



स्त्री को सदा से पुरुष की अनुगामिनी बनकर जीवन जीने की शिक्षा दी जाती है। स्त्री  का लक्षमण रेखा लाँघना समाज के तथाकथित पहरेदारों की बर्दाश्त से बाहर होता है।औरत अगर खुदसर हो तो उसकी मुख़ालफ़त लाज़िमी होती है और अगर कहीं राजनीति में हो और वह भी लता बनकर नहीं बल्कि पेड़ या खूँटा बनकर तो उसे हिला देने की तरकीबें, झकझोर देने के ढंग, उखाड़ देने के प्रयास इन्तहा पर पहुँच जाते हैं। अगर वह ट्रेड यूनियन में हो, वह भी सफ़ेदपोशों की यूनियन में नहीं बल्कि स्वयं वर्गहीन होकर खाँटी खटनेवाले ब्लू कॉलर कोयला मज़दूरों के बीच रहकर उन्हें संगठित कर आन्दोलित करने का दम रखती हो, तब तो ’युद्ध और प्रेम में हर चीज़ जायज़ है’ का फ़ॉर्मूला लागू करने में सहयोगी, सहभागी- यहाँ तक कि प्रशंसक भी देर नहीं लगाते- दुश्मनों का तो कहना ही क्या ! हाँ, दुश्मनों का ! ऐसी औरत के दुश्मन खड़े हो जाते हैं। दुश्मनी इसलिए नहीं होती कि उससे कुछ नुकसान पहुँचेगा, वह समान कारण तो स्त्री-पुरुष दोनों पर ही लागू होता है- दुश्मनी इसलिए कि एक औरत ने इतने लोगों का विश्वास कैसे प्राप्त कर लिया- बिना उनकी मदद के यह कैसे संभव हुआ ! ज़रूर दाल में कुछ काला है ! यह डाह ही दुश्मन खड़ा कर देती है। तब ऐसी औरत के खिलाफ़ बहुत सी ’कनफुसकियाँ’, अफ़वाहें, चटपटी प्रणय कथाएँ, झूठे-सच्चे किस्से हवा में तैरने लगते हैं।1



पुरुष औरत को उसी हालत में बर्दाश्त करता है, जब उसे यह यकीन हो जाए कि वह पूरी तरह उसी पर आश्रित है और ख़ुद कोई निर्णय नहीं ले सकती या फिर वह स्वयं उस औरत से डरने लगे, तो वह उसे सहता है। पुरुष के मुकाबले में कोई पुरुष हो तो उन्हें अपनी क्षमता का फ़र्क उन्नीस या बीस ही नज़र आता है लेकिन अगर औरत खुदमुख्तार होकर सामने खड़ी हो जाए, वह भी निर्णय ले सकनेवाली औरत, तो चाहे बिन चाहे वह हीन-भावना से दब जाता है और उसे अपनी तुलना में वह औरत बाईस लगने लगती है।ईर्ष्यावश शत्रुता का अंकुर मन में जन्म लेता है। वह समझता है कि औरत के पास उसके समान गुणों के अतिरिक्त आकर्षित और प्रभावित करने की क्षमता अधिक होती है और इसे ही वह अपने पौरुष के लिए चुनौती मान बैठता है। अत्यंत प्रेम और समर्पण के क्षणों में भी पुरुष अपने निर्णय को अन्तिम साबित करने की ज़िद करता है।

रमणिका गुप्ता बचपन से ही राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन की धारणा से जुड़ी रहीं। जब पाँचवी-छठी कक्षा में पढ़ती थीं, तब ’सत्यार्थ प्रकाशन’ के समर्थन में तथा मूर्ति-पूजा के विरोध में घंटों बहस करती थीं। इन्हीं बहसों के कारण उन्होंने विक्टोरिया स्कूल की अपनी प्रधानाचार्या से बहुत डाँट खाई थी। वे अपने निर्णय स्वयं लेती थीं तथा उनका अच्छा-बुरा फल भोगने को सदैव तैयार रहती थीं।

आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा -पहली किस्त


पटियाला रियासत में उन दिनों वेश्याओं का प्रचलन था। उनके स्कूल में सईदा नाम की की एक वेश्या की लड़की पढ़ती थी। यदि कोई उसे चिढ़ाता था तो रमणिका उससे झगड़ा करती थी और मारपीट तक पर उतर आती थी। उनकी नज़र में सईदा का वेश्या की लड़की होना या उसकी माँ का वेश्या होना समाज का दोष था। वेश्या होने न होने से ही किसी स्त्री को पतित या सती करार देने को भी वे गलत मानती थीं।वे औरत के संबंध में पतित शब्द की परिभाषा से सहमत नहीं हैं कि यह शब्द औरत के चरित्र से जोड़ा जाता है और चरित्र का अर्थ केवल औरत के यौन-संबंधों को लेकर ही समझा जाता है। औरत के संदर्भ में चरित्र के अन्य गुण या लक्षण जैसे नैतिकता, शालीनता, ईमानदारी, परस्पर सद्‍भाव, संवेदनशीलता, बहादुरी और निडरता आदि को नज़रअन्दाज़ कर दिया जाता है।

उनकी मान्यता है कि औरतों को खुद का सहारा या सहयोगी बनना चाहिए, सहारा खोजना नहीं चाहिए। उन्हें ’थेथर’ बनना ज़रूरी है। ’छुई-मुई’ बनने से समाज में काम चलनेवाला नहीं है। आग पर चलने की हिम्मत जुटाना आवश्यक है। हवा के विपरीत चलने का इरादा अपेक्षित है।

रमणिका गुप्ता ने अनेक निर्णायक हठ किए और अप्रिय लगनेवाले कदम उठाए। उन्होंने अपने मानदंड खुद गढ़े। कहते हैं- “समरथ को नहिं दोष गुसाईं।“ वे स्वयं को समर्थ बनाकर अपनी शर्तों पर चलीं। उन्होंने समाज के पीछे चलने की बजाय समाज को अपने पीछे चलाया। उनका पहला हमला प्रचलित नियमों, प्रथाओं, प्रतिबन्धों, यहाँ तक कि यौन-संबंधों पर होता था। उन्हें रूढ़ियाँ तोड़ने में बड़ा मज़ा आता था और प्रतिक्रिया में रूढ़िवादियों का तिलमिलाना या झल्लाना अच्छा लगता था।2

आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा : दूसरी किस्त

परम्परा तोड़ने का हठ- इनका परिवार सामन्ती परिवार था। घर में परदा-प्रथा लागू थी तथा परिवार में लड़कियों का सिर ढकना लाज़िमी माना जाता था। पारिवारिक परम्परा तोड़ने के लिए सबसे पहले रमणिका गुप्ता ने ताँगे में आगे की सीट पर अपने पिता की बगल में बैठने की ज़िद शुरू की। कार या ताँगे में परदा लगाने पर भी वे मुँह बाहर निकालकर बैठती थीं। साइकिल लेकर सड़क पर निकल जाती तो घर में हंगामा मच जाता था। जब वे न मानीं तो उनकी माँ ने अल्टीमेटम दे दिया कि यदि सिर नहीं ढकना तो या तो बीस कदम आगे चलो या पीछे ताकि लोग न जानें कि वे साथ-साथ हैं। उन्होंने बीस कदम आगे चलना शुरू कर दिया। उस दिन से उन्हें घर में विद्रोही का-सा रुतबा मिल गया और हर समय टोका जाने लगा। पर वे ज़िद पर अड़ी रहीं।3

जाति तोड़कर प्रेम विवाह करने के फ़ैसले को परिवार ने एक चुनौती के रूप में देखा और इस निर्णय को बदलने के लिए बहुत दबाव डाला गया। मामा ने उनका घर से निकलना बंद कर दिया, रोज़ पिटाई होती थी और उन्हें पटियाला भेज दिया गया। एक दिन तंग आकर पापा जी ने कहा कि- “ये फ़ैसला तो बदलना ही होगा नहीं तो तुम दोनों में से किसी एक को ज़हर खाना होगा-तुम्हारी माँ को या तुम्हें।“ रमणिका ने तुरंत जवाब दिया- “मेरी माँ और आप ज़िंदगी का सुख देख चुके हैं, भोग चुके हैं। मुझे अभी ज़िन्दगी देखनी बाकी है इसलिए ज़हर मैं नहीं खाऊँगी, बीबी जी खाएँ।“ उनकी ये बातें परम्परावादी, औचित्यवादी, त्यागवादी और आचरणप्रिय लोगों को अखरती थीं परन्तु उनके लिए यह निर्णायक घड़ी थी। तभी वे जो करना चाहती थीं, कर पाईं। परम्पराओं को तोड़ना और रूढ़ियों के विपरीत चलना ही मानों उनका लक्ष्य बन गया था, इसके लिए अपनों के खिलाफ़ विद्रोह आवश्यक था-जिसके लिए उन्होंने स्वयं को तैयार कर रखा था।एक बार पिता ने तंग आकर उन्हें घर से भाग जाने की सलाह दी किन्तु उन्होंने साफ़ इनकार करते हुए कहा- “ शादी तो आप ही को करवानी होगी मेरी। मैं भागूँगी नहीं। इन्तज़ार करूँगी।“ उन्होंने खुद अपने माता-पिता को शादी की चिट्ठी लिखी और वे विवाह में सम्मिलित भी हुए। उनके ब्याह में न मँगनी हुई, न छेका, न दान और न दहेज, भाई सत्यव्रत बेदी से घर से प्रकाश उन्हें विदा करा लाए। उनके परिवार में किसी लड़की द्वारा परम्परा के विरुद्ध किया गया यह पहला विद्रोह था।4

वैवाहिक जीवन की कठिनाइयों की शिकायत उन्होंने कभी किसी ने नहीं की। उन्होंने न अपने घर में परदा किया और न ही छुआछूत चलने दी। छुआछूत का विरोध जताने की नीयत से उन्होंने एक मेहतरानी के ईसाई पुत्र को अपना रसोइया नियुक्त कर लिया। उन दिनों मुसलमानों और ईसाइयों को ’मलेच्छ’ माना जाता था और उनका हिन्दू घरों में आना-जाना, खान-पान वर्जित था।4

1960 में उन्होंने सक्रिय राजनीति में भाग लेने का निर्णय लिया और अपने विश्वास के मुताबिक औरतों के निर्णय लेने की आज़ादी को बरकरार रखने के लिए निर्णय के बाद ही इसकी सूचना प्रकाश को दी।उनकी नज़र मे औरत को किसी निर्णय के लिए पति की इजाज़त माँगना औरतों के अधिकार का हनन है। आपने इस परम्परा अपने जीवन में सदा नकारा। वे किसी समारोह इत्यादि में श्रीमती वी.पी.गुप्ता बनकर जाना पसंद नहीं करती थीं। उनके मन में यह भावना अति तीव्र हो गई थी कि- “मुझे लोग मेरे कारण पहचानें, प्रकाश की पत्नी होने के कारण नहीं।“5

धनबाद में रमणिका ने कई संस्थाएँ शुरू की थीं जिनमें लगभग डेढ़ सौ महिलाएँ जीविका अर्जित करती थीं। स्थानान्तरण के पश्चात उन्होंने पति के साथ कानपुर न जाने का निर्णय लिया ताकि उनका स्वयंसिद्धा होने का संकल्प पूरा हो सके। उन्होंने इसे अपना कर्त्तव्य माना जबकि लोगों ने इस फ़ैसले को निर्ममता, क्रूरता और निर्दयता से युक्त बताया क्योंकि दोनों बच्चियाँ पिता के साथ गई थीं और उन्हें हॉस्टल भेजना पड़ा था।6

राजनीति में वे पहले कांग्रेस में थीं जहाँ नेता स्त्री कार्यकर्ताओं को अपना कलेवा मानते थे जिसे भूख लगने पर खाने का एक स्वर्जित जन्मसिद्ध अधिकार उन्होंने प्राप्त कर रखा था। इन नेताओं का मानना था कि किसी पुरुष नेता-वृक्ष का सहारा लिए महिला नेता-लता पनप और बढ़ नहीं सकती थी परन्तु रमणिका जी लता बनने को तैयार नहीं थीं अत: उन्होंने अपनी सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया और कांग्रेस अध्यक्ष को यह लिखा कि- “मैं कांग्रेस से त्यागपत्र दे रही हूँ। मैं अपना रास्ता खुद बनाने में सक्षम हूँ, इसलिए अपना रास्ता खोज लूँगी, नहीं तो रास्ता ही मुझे खोज लेगा।“6


आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा : आख़िरी किस्त

 रमणिका गुप्ता कहती हैं कि- “बहुत पहले मैं अग्नि-दीक्षा ले चुकी थी, इसलिए अग्नि परीक्षाओं को हमेशा नकारा, ग़ैरज़रूरी समझा और उनसे गुज़रने की ज़हमत भी नहीं उठाई। मैंने अपने आचरण का स्पष्टीकरण कभी नहीं दिया। मैं जो हूँ, खुली किताब के रूप में सामने हूँ।” उन्होंने अपने यौन शोषण का आरोप किसी पर नहीं लगाया क्योंकि या तो वे स्वयं इसमें शामिल थीं या विरोध में डटी रही थीं और यदि कुछ हुआ भी तो खुद को कभी हतोत्साहित नहीं होने दिया।राजनीति में रणनीति के तहत उन्होंने कई बार कुछ परिस्थितिजन्य समझौते भी किए किन्तु स्वयं को कभी बेबस या असहाय नहीं माना।अन्याय का विरोध करना उनकी आदत का अभिन्न अंग रहा भले ही इसके चलते उन्हें व्यक्तिगत रूप से बहुत नुकसान भी उठाना पड़ा। उनका मानना है कि राजनीति और समाज-सेवा में आत्मविश्वास, हौसला, निडरता और हठ ज़रूरी चीज़ें हैं। एक औरत को आगे बढ़ने के लिए ’थेथर’ होना आवश्यक है। थेथर का अर्थ संवेदनारहित होना नहीं बल्कि पूर्णतया संवेदनशील होते हुए विपरीत परिस्थितियों में डटे रहना है- आरोपों, कलंकों और घटनाओं-दुर्घटनाओं तथा ज़्यादतियों को झेलते हुए, अपने रास्ते पर चलते रहना और संकल्प-शक्ति तथा इच्छा-शक्ति का बल बनाए रखना ही है। इसका मतलब है खुद को अपनों की बेरुखी सहने को भी तैयार रखना, हँसते-हँसते कुत्सित व्यंग्य, कुटिल मुस्कानें, द्विअर्थी वाक्य पचाने की आदत डालना और कभी-कभी दूसरों के वाक्यों को उन्हीं के खिलाफ़ मुहिम छेड़ने के लिए उछालना।पीठ थपथपाकर बहादुरी का वास्ता देने वाले राजनीति में बहुत मिलते हैं। उनकी नीयत को पहचानकर सोच-समझकर अपने फ़ैसलों पर अडिग रहना ही ’थेथरपन’ है जो राजनीति में स्त्रियों के लिए लाज़िमी है। ’सुनो जग की, करो मन की’ सूक्ति का पालन करना वे आवश्यक मानती हैं।7

सन् 1968 में उन्होंने मज़दूरों के बच्चों के लिए स्कूल बनाने के मुद्दे को लेकर टाटा कम्पनी से लड़ाई की और इसमें कामयाब भी हुईं। सरकार द्वारा पानी की योजना बनवाकर घर-घर में पानी पहुँचाया तो वे ’पानी की रानी’ के नाम से मशहूर हो गईं। आदिवासियों के साथ मिलकर जंगल के सिपाहियों के खिलाफ़ उन्होंने नारा दिया- “घूस नहीं, अब घूसा देंगे।“ मज़दूरों के अधिकारों को सुरक्षित रखने की खातिर यूनियन बनाने के लिए उन्होंने आमरण अनशन किया और अपनी माँगों को मनवाया। खदानों में खटने वाले अनाम मज़दूरों को परिचयपत्र दिलवाने के लिए जॉर्ज फ़र्नाडिस से बात की जिन्होंने आन्दोलन के लिए नारे दिए- “हम कौन हैं लिख कर दो- हमारा नाम क्या है लिख कर दो- हम क्या काम करते हैं लिखकर दो-हमारा वेतन क्या है लिखकर दो- हम कहाँ खटते हैं लिखकर दो !” इसके परिणामस्वरूप सभी मज़दूरों के परिचय-पत्र मिला जो राष्ट्रीयकरण के बाद खदानों में उनकी नौकरी का प्रमाणपत्र माना गया।8



इन आन्दोलनों के दौरान उन पर कई बार जानलेवा हमले हुए। कई दफ़ा लाठियाँ बरसाई गई जिनसे उनकी हड्डियाँ भी टूटीं परन्तु उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी और न ही हार मानी। वे जानती थीं और मानती थीं कि ऐसे अवसरों पर जोखिम उठाना ज़रूरी होता है। उनका कहना है कि यदि एक औरत आन पर आ जाए तो वह मरदों से अधिक जोखिम उठा सकने की कुव्वत रखती है। एक बार आन्दोलन के समय उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। वहाँ के सभी अधिकारी उन्हें महिला कैदी नहीं बल्कि एक नेता कैदी के रूप में देखते थे। वे अपना सुख-दुख मज़दूरों के सुख-दुख में महसूस करती थीं इसलिए उनकी तकलीफ़ देखकर उनका गुस्सा बढ़ता था। वे गुस्से में रोने लगतीं और पुन: कड़े संघर्ष के लिए तैयार हो जाती थीं। खदानों के राष्ट्रीयकरण के बाद उन्होंने मज़दूरों की बहाली को सुनिश्चित करने को लेकर एक लम्बी लड़ाई लड़ी। उन्होंने कभी सस्ती वाहवाही लूटने के लिए भारी पलड़े का साथ नहीं दिया।

उन्हें ऐसे हंगामे खड़े करने में बहुत मज़ा आता था जिनसे निजी स्वार्थ पर चोट पहुँचे। कई लोगों को लगता था कि वे खामख्वाह ही दुश्मन बना लेती हैं, कुछ मामलों में चुप भी रहा जा सकता है। परन्तु वे चुप रहना सीखी ही नहीं थीं। ज़रा-सा अन्याय देखते ही तीव्र प्रतिक्रिया करने की आदत ने उन्हें कई बार खतरनाक मोड़ों पर खड़ा कर दिया था। उनके साथ ऐसी कई घटनाएँ घटीं जब पार्टी प्रतिबद्धता और मानवीयता के बीच एक को चुनना था, उन्होंने हमेशा मानवीय संवेदना को ही प्राथमिकता दी और मज़दूरों के हित का साथ दिया भले पार्टी या उसका ओहदा उन्हें छोड़ना पड़ा।9

‘आपहुदरी’: ‘अपने शर्तों पर जीने की आत्मकथा’

1970 में एक चुनाव के दौरान उन्हें गाँव वालों से पता चला कि भुईनी औरतों का शोषण किया जाता है और इन घरों की नवब्याहताओं का डोला पहली रात बाबू साहब के यहाँ उतारा जाता था। कुछ दिन पहले एक भुईनी महिला का झोंपड़ा जला दिए जाने की खबर भी उन्हें मिली तो रमणिका जी ने आई.जी. को बुलाकर कहा- “उस भुईनी का घर वहाँ बन जाना चाहिए, नहीं तो मुझे स्वयं जाकर खुद खड़े होकर घर बनवाना होगा और अगर मेरे साथ कुछ दुर्घटना घट गई तो उसकी जिम्मेवारी आपकी होगी।“ आपके प्रयासों से भुईनी का घर भी बन गया और दोषियों की गिरफ़्तारी भी हुई।10

उनकी मान्यता थी कि –“अश्लीलता को सदन में कोई स्थान नहीं दिया जा सकता। उन्होंने कभी किसी लड़ाई को हल्के ढंग से नहीं लिया और न ही कभी अधूरा छोड़ा। उसको तार्किक निष्कर्ष तक पहुँचाया- चाहे जीत हो या हार। बचाव में हताश होकर भागी नहीं क्योंकि वे हार सहने की क्षमता भी रखती थीं। वैसे हर औरत हार सहने और स्वीकारने की आदी होती और हथियार डाल देती है किन्तु उन्होंने ’हथियार डालना’ तो सीखा ही नहीं था और न ही उनका इसमें विश्वास था।11


इस प्रकार उनकी आत्मकथा ’हादसे’ से पूर्णतया स्पष्ट होता है कि उन्होंने अपना जीवन अपनी शर्तों पर जीया और आज भी अपने जीवन के मानदण्ड स्वयं निर्धारित करती हैं। बँधी-बँधाई रूढ़ियों पर वे न विश्वास करती हैं और न ही पारम्परिक लीक पर चलने को उचित मानती हैं। वे ’स्वयंसिद्धा’ हैं और अन्य औरतों के लिए भी प्रेरणा का स्त्रोत हैं।

संदर्भ सूची
1.रमणिका गुप्ता, हादसे, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2010, पृ-15-16
2.वही, पृ- 17
3.वही, पृ- 18
4.वही, पृ- 24-25
5.वही, पृ- 26
6.वही, पृ- 27
7.वही, पृ- 52-54
8.वही, पृ- 74-78
9.वही, पृ- 186-190
10.वही, पृ- 192
11.वही, पृ- 250
लेखिका:-डॉ.राजेश्वरी, माल्या अदिति इंटरनेस्कूल, बंगलूरु, कर्नाटक
संपर्क:dr.rajeshwarig gmail.com


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सिंदूर बना विमर्श : पक्ष-विपक्ष में रचनाकार, मैत्रेयी पुष्पा हुईं ट्रॉल

यह सप्ताह स्त्रीवादी विमर्श के खाते में रहा. जहां अमेरिका स्थित भारतीय वकील सारा राय ने विद्यार्थियों के यौन उत्पीड़क प्रोफेसरों की सूची जारी की और उसपर कुछ स्त्रीवादियों ने प्रतिवाद किया वहीं हिन्दी अकादमी,दिल्ली की उपाध्यक्ष और चर्चित साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा ने ‘बिहारी महिलाओं’ के सिंदूर पोतने पर सवाल खड़ा कर छठ के अवसर को सोशल मीडिया पर विमर्श का अवसर बना दिया. रचनाकारों और अन्य लोगों से ट्रॉल  होकर उन्होंने पोस्ट हटा ली. हालांकि स्क्रीन शॉट घूम रहा है. पढ़ें पक्ष-विपक्ष की कुछ टिप्पणियाँ.


बिहारी औरतों की मांग में सिंदूर देखकर भडकिए मत.यह सिंदूर स्वाभाविक है,नकली नहीं है।इसी तरह जानकर रखें कि दुर्गा पूजा के समय बंगाली औरतें देवी के पंडाल में सिंदूर खेला,खेलती हैं.सिंदूर औरत के आनंद की निशानी है.पति की नहीं।
जगदीश्वर चतुर्वेदी 

मेरा सिंदूर : सांस्कृतिक प्रतीक
तेरा बुर्का : धार्मिक प्रतीक
हे हिन्दू नारी तुम भी क्या कमाल करती हो …धार्मिक कर्म कांड को तथाकथित संस्कृति से रिप्लेस कर धमाल करती हो …
#जय_हमारा_नारीवाद
नूतन यादव 

जिन्हें बिहार की महिलाओं के नाक से सिंदूर लगाने से,पूरी मांग सिंदूर लगाने से ऐतराज़ है तो वे ये बताएं कि उन्होंने खुद का विवाह हिन्दू रीति से क्यो किया? क्यो किया सिंदूर दान,क्यो पहना मंगलसूत्र? क्यो सर पर आँचल रखती है? नाक से सिंदूर लगाना छठ पूजा पर हमारे बिहार की संस्कृति है,जिन्हें हम पसंद से करते हैं। जिसमे कोई दास प्रथा नाम की चीज ही नहीं। हम किसी की बंदिनी नही,जीवनसंगिनी बनकर रहते है,ताउम्र।?
विभा रानी 


आपत्तिजनक टिप्पणी के सन्दर्भ में, उनसे एक बेबाक सम्वाद………..

.पुष्पा दीदी, हैरान हूँ आपके द्वारा किसी की आस्था पे किए गए उपहास जनक प्रहार से ! वैसे आप उम्रदराज़ होने के कारण अनुभव सम्पन्न है, साथ ही, लेखन से जुडी होने के कारण संवेदनशील और विचारशील भी है, सो जानती ही होगी कि किसी की भी आस्था पर चोट करना ‘संस्कारहीनता और संवेदनहीनता’ कहलाती है ! सिन्दूर लगाने की बात हो या व्रत-उपवास रखने की बात; ये सब भारतीय संस्कृति जुडी हुई सदियों से प्रेम और निष्ठा के तहत चली आ रही प्यारी आस्थाएं हैं ! उसमें किसी को किसी की आलोचना करने या मखौल सा उड़ाते हुए सवाल करने का हक नही ! आप व अन्य कोई सुहागन सिन्दूर नही लगाती, तो कोई बात नही क्योंकि ऐसा करने में आपकी और उनकी आस्था नही है ! इसी तरह जिन बहिनों की आस्था है, यदि उन्हें ऐसा करना पसंद है, उन्हे इससे सुख-सुकून मिलता है, तो उस पर आपके द्वारा ‘पोतना’ शब्द का प्रयोग करते हुए सवाल करना उचित नही ! आपने लिखा ‘क्यों पोत रच लेती है’….यदि कोई आपसे पूछने लगे कि आप विवाहित है पर आप माँग सूनी क्यों रखती है, सिन्दूर से क्यों नही भरती, बिछुए क्यों नही पहनती…वगैरा, वगैरा, तो दूसरे का ऐसा सोचना और पूछना भी गलत है ! यदि आपकी सोच, आपकी धारणा, दूसरों की तरह नही है, तो इसका मतलब यह नही कि सदियों से चली आ रही आस्थाओं के साथ जीने वाली स्त्रियों को, आप अपनी सोच, अपनी पसंद का हवाला देते हुए, पाठ पढाने लगे – ‘’ मैंने नहीं किया विवाह सिन्दूर की ख़ातिर , नहीं सहेजी कभी सिंदूर की डिबिया , नही सजाई माँग सिन्दूरी रंग से ।उसको नहीं माना वर , सुहाग और पति परमेश्वर । वह मेरे सुख दुख का साथी है ,सहचर है ।प्रेम मोहब्बत और विश्वास के साथ हम एक संग हैं’’

.Who cares………कि आपने विवाह क्यों किया ? आपसे कौन पूछ रहा है कि आप को पति वर, सुहाग मानती है या चौकीदार, बौडीगार्ड या पहरेदार ? किसी को रूचि नही है आपके वैवाहिक जीवन से जुडी बातो, या आपके करम-धरम और आपकी सोच को जानने की ! न आपके जीवन में झाँकने की और कमेन्ट पास करने की ! फिर आपका क्या अधिकार बनता है कि आप अन्य स्त्रियों की आस्था और धारणा पर चोट करे और पौराणिक उदाहरण देकर सिन्दूर की छीछालेदर करे ! सिन्दूर आपके लिए महज एक लाल रंग की ‘कुनाई’ हो सकता है, ‘चूरा’ हो सकता है, लेकिन दूसरी स्त्री के लिए वह प्रेम का पवित्र ‘भाव’ हो सकता है, उसे प्राणों से प्यारा हो सकता है ! भारत की हर शिक्षित-अशिक्षित आम स्त्री, निस्वार्थ भाव से वैवाहिक जीवन को लेकर, जो मूल्य-संस्कार मन में संजोये होती है, याद रखिये कि वे पुरुष द्वारा उसकी कद्र या उपेक्षा ‘से परे होते हैं ‘! पुरुष उसे प्यार करे या दुत्कारे – इसकी परवाह किए बिना, स्त्री अपनी आस्था पे कायम रहती है और उसकी यह दृढ़ता और विश्वास, स्त्री स्वभाव की ‘उदात्तता’ का परिचायक है !
.आपकी तरह, अन्य स्त्रियों को भी तो अपनी मान्यताओं,आस्था और विश्वास को संजोने का हक है ? अगर पौराणिक पात्रों की ही आप बात करती है तो, आपको सीता तो यद रही पर आप सावित्री को क्यों भूल गई, जो यम से पति को छुड़ा लाई थी ! आप पार्वती का हवाला भी दीजिए जिसने सिन्दूर और ‘करवाचौथ’ के व्रत के बल पर, शिव जैसे ‘महादेव’ को पाया था। द्रौपदी को मत भूलिए, जिसने कृष्ण के बताये अनुसार, जब सिन्दूर धारण करके करवाचौथ का व्रत रखा तो , उसके प्रताप और बल से पांडवो की महाभारत के युद्ध में विजय हुई थी ! निश्चित ही पांडवो का पुरुषार्थ तो था ही लेकिन स्त्री की प्रार्थना की शक्ति से वह चौगुना हो गया ! इसी तरह आप इस पौराणिक तथ्य को भी जानिये कि श्रीराम बालि को मारने ही वाले थे तो उनकी नजर अचानक बालि की पत्नी तारा की मांग पर पड़ी, जो कि सिंदूर से भरी हुई थी। इसलिए उन्होंने सिंदूर का सम्मान करते हुए बालि को नहीं मारा।

.
.तो दीदी किसी की आस्था पर प्रश्नचिन्ह मत लगाईये और उनकी आस्थाओं को निरर्थक सिद्ध मत कीजिए ! याद रखिये कि आस्थाएँ, तर्कों से अधिक ताकतवर होती है और उनसे निकली प्रार्थनाएँ अद्भुतं परिणाम भि देती आई है ! इसलिए ही अनेक डॉक्टर ईश्वर पर अपनी आस्था के तहत, क्लीनिक में सम्मान से इस उक्ति को मुख्य स्थान पर लगाते देखे गए हैं :
.
. I treat, ‘He’ cures
सो आस्थाओं को तोडना किसी के वश में नही ! उनकी नीव बड़ी गहरी होती है और उन पर टिका विश्वास सघन होता है ! इसलिए सबकी भावनाओ का सम्मान करना सीखिए !
दीप्ति गुप्ता 


सिंदूर लगाना या ना लगाना किसी महिला का व्यक्तिगत मामला हो सकता है, लेकिन छठ पूजा के दौरान सिंदूर नाक से लगाने की परंपरा पर सवाल उठाने पर दिग्गज साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा जी का जिस तरह से अपमान हुआ. उसे क्या कहा जाये? एक महिला पर इतनी आपत्तिजनक टिप्पणी? आखिर एक सवाल ही तो किया है उन्होंने, क्या एक सवाल मात्र से छठ पूजा की महत्ता कम हो जायेगी? या जो सवाल मैत्रेयी जी कर रही हैं, उसमें वही बात छुपी है जो एक स्त्री अधिकारों की पैरोकार होने के नाते वो कह रही हैं. सवाल उठाना तो एक लेखक एक्टिविस्ट का धर्म है, समाज जवाब दे, लेकिन सवाल की तो भ्रूण हत्या ना करे? जैसे बेटियों की कोख में करते हैं?

रजनीश आनंद 




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