सोनिया गांधी का नागरिकता प्रसंग : पितृसत्ता का राग-विराग

संजीव चंदन

( २०१४ में टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा को तेलंगाना का ब्रांड अम्बेसडर बनाए जाने पर सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों के द्वारा किये जा रहे हंगामे का सीन और उसके तर्क १० साल पहले २००४ में सोनिया गांधी की नागरिकता के सवाल पर हुए हंगामे की याद दिलाते हैं . यह आलेख २००५ में गोवा में आल इंडिया असोसिएशन फॉर वीमेन स्टडीज़ के कांफ्रेंस में प्रस्तुत किया गया था, यह एक बार फिर से प्रासंगिक हो गया है.  सोनिया गांधी इटली की बेटी थी , बहु भारत  की थी , तो उनकी नागरिकता और निष्ठा पर संदेह किया गया  . अब सानिया मिर्जा इस  देश की बेटी है और पड़ोसी देश की बहु ,तब भी उनकी  नागरिकता और निष्ठा पर संदेह है . पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्रियों का  न तो कोइ घर होता है , न देश !)

सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने की योग्यता-अयोग्यता के विवाद से जो निहितार्थ बनते हैं, उनका मूल संदर्भ भारतीय समाज की पितृसत्तात्मक सोच और समझ से है। सोनिया के सवाल पर कट्टर रुढि़वादियों से लेकर मध्यममार्गियों के पक्ष-विपक्ष की भाषा, तर्क, तर्कों की समझ पितृसत्तात्मक समाज की विचार-परम्परा से ही संचालित है। इस आलेख में सोनिया गांधी से जुड़े गहरे शास्त्रीय  राजनीतिक निष्कर्षों से विशेष सरोकार न रखकर इसके सामाजिक संदर्भों की ही पड़ताल की गयी है, जबकि भविष्य की राजनीतिक दशा-दिशा के सूत्र इन संदर्भों में सूत्रबद्ध भी हैं, क्योंकि पिछले कुछ दशक से जिस राजनीतिक विचारधारा ने भारतीय राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत की है, वह परिवार और राष्ट्र की पितृसत्तापेक्षी भाषा में ही बात करती है तथा इसका पूर्वज संस्कार भारतीय नवजागरण के राष्ट्रवादी स्वरों से भी जा जुड़ता है।

सोनिया गांधी भारत के  पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ : आत्मीय क्षण

सोनिया गांधी, जो कि इटली में पली-बढ़ी, भारत में एक राजनीतिक परिवार की बहू बनकर आयी, जिसके दो-दो सदस्य (पंडित जवाहरलाल नेहरू तथा श्रीमती इंदिरा गांधी) इस देश के प्रधानमंत्री बन चुके थे, तीसरे का  बनना तब शेष था। यह परिवार राजनीति की धूरि में था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय राजनीति का चक्का इसी धूरि के इर्द-गिर्द नाचता रहा। देश को इस विवाह पर कोई विशेष एतराज नहीं था बल्कि एक गर्व-भाव ही रहा होगा, जो अक्सर पितृसत्तात्मक समाज के वर-पक्ष को होता है, विजेता भाव एक भारतीय की गैर भारतीय नस्ल, वह भी गोरे  नस्ल ,की कन्या पर विजय। विदेशी कन्या, गोरे नस्ल की अंग्रेज कन्या पर विजय, आहत भारतीय मन को आत्मतुष्ट करता है, जिसके स्वाभिमान को उपनिवेशवादी गुलामी ने चोट पहुंचाई थी।

परिवार, समाज या राष्ट्र का भाव अथवा राष्ट्रवाद  मूलतः पुरुषवादी स्मृति, आहत पौरुष और पुरुषवादी आशा से उत्पन्न हुआ है। राष्ट्र अपना गौरव ‘स्त्री-छवि’ को निर्मित कर गढ़ता है और अपने अपमान का बदला शत्रु  राष्ट्र की स्त्रियों के अपमान से लेता है। पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियां परिवार, समाज और राष्ट्र की इज्जत का प्रतीक होती हैं, इसीलिए इतिहास गवाह है कि विजेता जातियां/ राष्ट्र विजितों की स्त्रियों पर बलात्कार कर उनका अपमान कर उनके मान-सम्मान का दलन करते हैं। भारतीय संदर्भ में ‘ब्रिटिश  -राष्ट्र’ पर किसी विजय की गुंजाइश नहीं होने के कारण हर वह अवसर जब भारतीय पुरुष विदेशी कन्या को विवाह लाता है, भारतीय मानस की आत्मतुष्टि का कारण बनता है।

ब्रिटिश उपनिवेश ने अपने आर्थिक प्रभावों के अतिरिक्त और ज्यादा समय तक असरकारी प्रभाव सांस्कृतिक स्तर पर डाले थे। गुलाम भारतीयों के लिए अंग्रेज स्त्रियां  आदर्श थीं, उनके रहन-सहन बोल-चाल के मद्देनजर सुधारवादी भारतीयों ने अपनी पत्नियों को भी सुशिक्षित गृहिणी बनाने के भरपूर प्रयास किए थे, परंतु आकर्षण की हदें गोरे चमड़े में बसी थीं, गोरी नस्ल में समाहित थीं। गोरों का यह आतंक आज भी है, इसलिए सोनिया गांधी का श्वेत नस्ल से होना भी एक विशेष स्थिति पैदा करता है। कैम्ब्रिज से एक व्यक्ति ने इंटरनेट पर एक सवाल छोड़ रखा है कि क्या सोनिया गांधी Mary Antonitee नाम से इटली मूल की होने के बजाय ‘अबेबी गांधी’ नाम से अफ्रीकन मूल की काली महिला होती तब भी क्या उसके प्रधानमंत्री  होने के प्रति आग्रह-दुरग्रह ऐसे ही होते। स्पष्ट है कि रंगीन भारतीयों के लिए काले नस्ल की विविधता श्रेष्ठता पूर्ण चुनौती नहीं देती है या आकर्षण पैदा नहीं करती है, स्पष्ट ही है कि सोनिया के प्रसंग में आहत राष्ट्रीयता और नस्ल-श्रेष्ठता के आधार पर भेद-भाव की दुहरी प्रवृत्ति है। यहां अफ्रीकी नामांकन में एक सचेत संदर्भ भी है। नाइजीरिया में अबेबी का अर्थ होता है ‘चाहा और पा लिया’ अर्थात् आसानी से प्राप्य। आसानी से प्राप्यता की गुंजाइश गोरे नस्ल की सोनिया गांधी के साथ नहीं बनती है,अर्थात् विजेता भाव की संभावना और भी प्रबल हो जाती है तथा आगे चलकर अतिरिक्त आग्रह को प्रेरित भी करती है।

सोनिया और राजीव का विवाह  साथ में राजीव गांधी की माँ और भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी

भारतीय विवाह-संस्था यद्यपि अंतरजातीय विवाहों को हतोत्साहित करती है, परंतु विवाह कोई समर्थ उच्च वर्गीय पुरुष कर रहा है, तो उसकी व्यवस्था भी करती है;
शुद्रैव भार्या शुद्रस्य सा चस्वा च विशः स्मृते
ते चस्वा चैव राजश्च ताश्व स्वा चाग्रजन्मनः।
यद्यपि स्वतंत्र भारत का आधुनिक संविधान कानून के समक्ष सबकी समानता की घोषणा करता है, परन्तु उच्चवर्गीय श्रेष्ठता का ऐतिहासिक श्रोत आज भी मनुस्मृति जैसे प्राचीन कानून-ग्रंथ हैं, जो आम भारतीय मानस को गहरे स्तर पर प्रभावित करते हैं, और खासकर जब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रयास राष्ट्रीयता को एक होमोजेनाइज्ड हिन्दू राष्ट्रीयता में समेटकर पेश करने का है तब इस प्रकार की मानसिक उर्वरता और भी उपयोगी सिद्ध होती है।

सोनिया के प्रसंग में भारतीय मानस का आह्लाद इसलिए भी चरम पर था कि गांधी-नेहरू परिवार, जिसे असंवैधानिक तौर पर परम्परा से भारत के प्रथम परिवार या राज-परिवार का दर्जा प्राप्त था, उसका उत्तराधिकारी उसे ब्याह कर लाया था, अर्थात् एक जातीय गौरव का सर्वोत्तम प्रसंग बनता था। समस्या तब उठ खड़ी हुई जब सोनिया का राजनीति में आना उसकी और कांग्रेस  की मजबूरी बनी तथा वह प्रधानमंत्री पद की प्रबल दावेदार बनती चली गयी। समस्या की हास्यास्पद गंभीरता तब तक बनी रही जब तक स्वयं उसने यह घोषणा नहीं कर दी कि प्रधानमंत्री का पद उसके लक्ष्यों में नहीं है। इस पूरे प्रकरण में पक्ष-विपक्ष की भाषा और समझ को समझा जाना चाहिए, जो अधिकांशतः राजनीति-प्रेरित हाते हुए भी एक पितृसत्तात्मक सामाजिक सच का प्रतिनिधित्व कर रही थी।

राष्ट्रवाद की अपनी मूल प्रवृत्ति के अनुरूप ही भारतीय राष्ट्रवाद ने स्वयं को परिवार की भाषा में ही अभिव्यक्त किया है और केन्द्र में रही स्त्री । भारत-देश की तस्वीर उभरते राष्ट्रवाद के दौरान शृंखलिता देश माता के रूप में बनायी गयी थी, जिसे विदेशियों के शृंखलाबंध से आजाद होना था। बंकिम चंद्र की शस्य-श्यामला भारत-भूमि अंग्रेजों के द्वारा बलात्कृत थी। इसी भाषा में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री भी समस्या को संबोधित करते थे। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और उसके पूर्व सुधारवादी आंदोलनों में स्त्री  की मातृ छवि ही अधिक समादृत थी। जननी और जन्मभूमि, जिन्हें वाल्मीकि रामायण ‘स्वर्गादपि गरियसी’ बनाता एक दूसरे का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। सुधार आंदोलनों में स्त्री शिक्षा का जो मूल उद्देश्य था वह रक्त-शुद्ध आर्य नस्ल के लिए सुशिक्षित माता और सुगृहिणी के निर्माण को ही लक्ष्य कर निर्मित था। एकमात्र फुले और उनके साथ दलित चिंतक स्त्री -शिक्षा को स्त्री -पुरुष समानता के लिए उपयोगी बता रहे थे अथवा 1848 में प्रथम महिला विद्यालय खोलकर एक क्रांतिकारी पहल ले रहे थे। पत्नी सावित्री बाई फुले समाज की लांछना सहकर भी अथवा अपने ऊपर पत्थर, गोबर के आक्रमण को झेलते हुए भी लड़कियों को पढ़ना अपनी प्राथमिकताओं में शामिल कर चुकी थीं। वैसे भी पुरुष सुधार आंदोलनों से अलग स्त्री -चिंतक, लेखिकाओं की चिंताओं में विवाह और मातृत्व प्राथमिक तौर पर शामिल नहीं थे। पंडित रमाबाई, ताराबाई शिंदे, एक अज्ञात हिन्दू महिला, स्त्री -मुक्ति के अन्य जरूरी मुद्दों पर ज्यादा जोर दे रही थी। परंतु बाद में भी राष्ट्रीय आंदोलन की सबसे बड़ी पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से ऐतिहासिक तौर पर विरादराना सिद्ध करने वाली कांग्रेस में सोनिया के प्रसंग में एक बार फिर स्त्री  का मातृ-रूप, पालक-रूप ही मुखर हो उठा।

जब सोनिया गांधी ने भारत का प्रधानमंत्री होने से इनकार कर दिया

मरती हुई कांग्रेस को जिलाने की  गुहार परिवार की विरासत बचाने में मां की भूमिका को निभाने के नाम पर कांग्रेस जन सोनिया से करते रहे। सोनिया के छवि-निर्माण की योजना बनाने वालों ने भी सुहागिन मां और फिर विधवा का ही आदर्श गढ़ा, जिसमें वह भारतीय परिवार में ब्याह कर आती है और फिर मां बनती है फिर विधवा, राष्ट्र के लिए शहीद पति का पत्नी के रूप में। शहादत और बलिदान देने वाली स्त्री -छवि को आसानी से आम भारतीय जन के बीच भुनाया जा सकता है। भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रबोध में जाति की शहादत के बाद जौहर करनेवाली स्त्री  (मुंडमाल, शिवपूजन सहाय) को विशेष आदर प्राप्त है। यहां जौहर य सती होना महिमामंडित तो नहीं हो सकता (सती प्रथा का महिमामंडल रूपकंवर कांड से ही कानूनन अवैध है) लेकिन पति और बच्चों का शहादत देने के लिए तैयार मामतामयी मां का महिमामंडन तो संभव ही है, भारतीय हिन्दू समाज से वोट प्राप्ति के लिए आवश्यक भी। अब 21वीं शताब्दी में राष्ट्रवाद का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में मस्जिद भंजन नुमा विकास की स्थिति में भी भाषा वही रही, भय भी वही विदेशी पद दलन का। सोनिया गांधी के सवाल को भारतीय राष्ट्र के लिए खतरा निर्धारित किए जाने में राष्ट्रवाद की चिंताएं उपनिवेशकालीन चिंताओं से ही जा जुड़ती है, तभी जार्ज फर्नाडिज को दो घटनाएं एक जैसी ही दिखती हैं, ईस्ट इंडिया कंपनी के बहाने गोरों का राज्य या सोनिया के प्रधानमंत्रीत्व  के रास्ते विदेशी साम्राज्य।

भयदोहन के इस खेल में एक-से-बढ़कर एक ऐतिहासिक संदर्भों का इस्तेमाल किया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साप्ताहिक ऑर्गनाइजर ने 6 जून 1999 के अंक में इसे इवेन्जलाइजेशन की संज्ञा दी तो उर्दू साप्ताहिक ‘हमारा कदम’ के मुख्य संपादक सोहैल ने सोनिया गांधी को ‘सोनिया डी गामा’ नाम से संज्ञेय किया। एस. गुरुमूर्ति ने ‘स्वदेशी जागरण मंच’ के 15 मई 99 के अंक में  लिखा , ‘ All that  nation has told Sonia in silent mode is : Madam, it is India now, not East India any more… The conviction that Sonia as Prime Minister of India will be a national shame cut across all parties including the Congress.’
यहां यह भी गौर किए जाने लायक है कि भारत की पुनः गुलामी का यह आतंक भारतीय राजनीति की तमाम वर्चस्वशाली विचारधारा तब बना रही है, जब उनके ही नेतृत्व में भूमंडलीकरण के रास्ते आर्थिक उपनिवेश की हकीकत सामने है, अथवा राष्ट्र राज्यों की सीमा को सैन्य-अतिक्रमण के द्वारा या सैन्य ताकत के बल पर उपनिवेश बनाना आवश्यक नहीं है, जब इंटरनेशनल कंपनियां या अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएं सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक स्तर पर नये-नये उपनिवेशों को रौंदने में लगी हैं।

केन्द्र में स्त्री  है, विदेशी स्त्री ,जो भारतीय परिवार की बहू बनी है परंतु विदेशी होने के नाते वह मूल देश से ही जा जुड़ती है, उसके हित वहीं से जुड़ते हैं। इसीलिए वह ‘भारत-माता’ की पार्थिव प्रतिनिधि या मातृ-भाव की भौतिक छवि नहीं हो सकती। यहां मानदंड दोहरा अपनाया जा रहा है। भारतीय समाज में ‘बेटी’ ब्याह के बाद ससुराल के परिवार में जा मिलती है तथा उसके हित नए परिवार के हितों से जुड़ते हैं, उसकी अर्थी  ही बाहर निकलती है, वह नहीं। स्त्री  का अपना अस्तित्व पति और परिवार से ही निर्धारित होता है, उसमें ही निहित होता है। अनिच्छुक सोनिया को कांग्रेसी-जनों ने इसी तर्क से कांग्रेस की जिम्मेदारी संभालने के लिए मनाया तथा इसी तर्क से वे उसके प्रधानमंतरी  होने को भी गलत  नहीं मानते। किसी विदेशी पुरुष के भारतीय परिवार में विवाह के बाद क्या तर्क ऐसे ही बनते, यह भी विचारणीय है।

सुषमा स्वराज ने सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री होने का यह कह कर विरोध किया था कि वे उनके प्रधानमंत्री बनने पर अपना सिर मुड़वा लेंगी

सोनिया गांधी भी पति-गृह की जिम्मेदारियों को संभालती हुई उत्तराधिकारी (राहुल गांधी) के संरक्षण और उसके इसी दिशा में विकास का बखूबी काम करती रहीं। ध्यात्व है कि पितृसत्तात्मक परिवार की परंपरा के अनुरूप राहुल गांधी को ही कांगे्रस का भावी नेता बनाया जा रहा है, जबकि उससे कम कुशल और अनुभवी प्रियंका गांधी सिद्ध नहीं हुई। पितृसत्ता पुरुष-रेखा (Male –lienage ) में ही पुनर्जीवित होती है।यहां जो और भी उल्लेखनीय है, वह सोनिया की संतान के प्रधानमंत्री बनने पर  किसी सवाल का स्वतः नहीं उठना। स्पष्ट है सोनिया भले ही विदेशी हो परंतु पितृसत्ता की व्याख्या में संतान विदेशी नहीं होगी, क्योंकि शास्त्रों की व्याख्या में स्त्रियां खेत (क्षेत्र)  मानी जाती हैं और फसल (संतान) ,उसकी जिसका बीज (वीर्य) हो। इस प्रकार सोनिया की संतान स्वतः ही खेत (सोनिया) के ख्यातनाम मालिकों नेहरू-गांधी परिवार की वंश-परंपरा का वाहक हो जाती है, भले ही प्राथमिकता पुरुष-सतान को दी जा रही हो।

पति-गृह या उसकी पार्टी की जिम्मेदारी का निर्वहन  पति की मृत्यु के बाद, भारतीय पितृसत्तात्मक परिवार के अनुरूप ही बनता है, जहां स्त्री  का जीवन पति के जीवन की ही प्रतिच्छाया बन जाती है तथा जिसकी पराकाष्ठा स्त्री  के ‘सतीत्व’ में अभिव्यक्त होती है। भारतीय पुरुष का मोक्ष ऊर्ध्वमूलीय  है, जगत से परे ब्रह्मचिंतन के माध्यम से और स्त्री  को मोक्ष मिलता है, देह के माध्यम से पति-सेवा के द्वारा। रूपकंवर  को लेकर परंपरा और अस्मिता के नाम पर उत्साहित होने वाली जमात को सानिया का भी राजीव गांधी के साथ सती होना शायद मर्यादित लगता, उसके स्वागत में पलक-पावड़े बिछाए जाते और सोनिया भारतीय परंपरा की एक आदर्श बहू के रूप में अमर बनायी जातीं। जो विदेश में जन्म लेकर भी, पल-बढ़कर भी ‘भारतीय-संस्कृति’ में संस्कारित हुईं। विदेशी स्त्री  का भारतीयकरण सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के लिए एक अलग और विशिष्ट रोमांच पैदा करता। यहां पति के जीवन-उद्देश्यों को ही अपना जीवन-उद्देश्य मानकर स्वयं को लगभग समाप्त कर जीने और सती हो जाने में कोई विशेष फर्क भी नहीं है। अर्थात् परिवार की जिस भाषा में पक्ष के प्रयास और तर्क बने, उसकी खतरनाक संगति परंपरावादी पितृसत्तात्मक समझ से ही बनती है, जो सोनिया के प्रधानमंत्री होने का विरोध कर रही है।

सोनिया के द्वारा प्रधानमंत्री का पद ठुकराए जाने पर विभिन्न टी.वी. चैनलों ने विमर्श आमंत्रित किए। एन.डी़ टी.वी. ने ‘क्या सोनिया के समक्ष सभी भारतीय नेता बौने हो गए’ सवाल पर बातचीत आयोजित की। समस्या तो इस विषय में ही है जो सोनिया (विदेशी) और अन्य नेताओं (भारतीय) का द्वैध बना रही है। बातचीत के दौरान जिस त्याग और तपस्या को लेकर राजनीतिज्ञ और चिंतक सोनिया के पक्ष में अपनी बात कर रहे थे, उसी त्याग और तपस्या की भूरि-भूरि प्रशंसा भारतीय जनता पार्टी के प्रतिनिधि-विचारक भी कर रहे थे, जिन्हें सोनिया गांधी का प्रधानमंत्री बनना सर्वाधिक संक्रामक प्रतीत हो रहा था। त्याग-तपस्या की जिस अवधारणा से सोनिया बड़ी बनायी जा रही थी वही त्याग-तपस्या और मातृत्व और मातृत्व की तथाकथित महानता, आदि स्त्रिायों को छद्म आदर पहले भी दिलवाते रहे हैं
कुपुत्रो जायेत क्वचिद्पिकुमाता न भवति (दुर्गा सप्तशती)
अहल्या और अनुसूइया की प्रशंसा की परंपरा इस देश में प्राचीनतम है। परंतु स्त्री  के स्वयं के कर्तापन का क्या? सोनिया की तमाम सक्रियता, सशक्तता के बावजूद यदि स्त्री  के रूप में सोनिया से कुछ छिना है तो उसका कर्तापन, क्योंकि  उसके कार्य पति गृह से नियंत्रित हैं और मानकर चला जा रहा है कि वह जो भी करेगी, शुभ ही करेगी।

सोनिया राय बरेली में , उन्होंने अपने नेतृत्व का लोहा मनवाया , विरोध करने वाले शरद पवार जैसे नेता भी बाद में उनका नेतृत्व स्वीकार करने को बाध्य हुए

यदि प्रधानमंत्री के सवाल पर सोनिया का पक्ष बनाना ही था तो उसे वैश्विक संदर्भ में बनाना चाहिए था, जिसको लेकर विश्व-ग्राम के पक्षधर आशान्वित दिखते हैं, तर्क गढ़ते हैं। ऐसा कहते हुए मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि वैश्वीकरण पूंजी  के जिस आतंक से संचालित है, यहां बात उसकी नहीं की जा रही है। पूंजी राष्ट्र राज्य की सीमाएं तोड़ती है, तो यह टूटन अपने साथ वैश्विक समता-समानता का कोई आदर्श लेकर नहीं आता बल्कि पूंजी  के क्षुद्र स्वार्थों के लिए एक छद्म ही गढ़ता है। यही कारण है कि पूंजी के स्वतंत्र आवागमन के साथ ही विभिन्न देशों में राष्ट्रवाद का कट्टर चरित्र भी उभरा है। इससे ही जोड़कर समझा जा सकता है कि जिस राजनीतिक जमात की सरकार विदेशी-निवेश के लिए बेचैन-प्रयासरत है ,वही जमात सोनिया के सवाल पर इतना अधिक संवेदनशील क्यों हो गया?

सोनिया के प्रसंग में स्त्रियो की नागरिकता के सवाल पर भी गौर किया जाना चाहिए। यद्यपि सोनिया गांधी ने 1983 में विधिवत भारतीय नागरिकता ग्रहण कर ली थी परंतु 1980 से ही उसका नाम वोटर लिस्ट में था, उन्हें  मतदाता का अधिकार प्राप्त था, अर्थात् उनकी नागरिकता पति की नागरिकता से पुष्ट हो रही थी। मनुस्मृतीय व्यवस्था में पति का घर ही स्त्री  का घर होता है। अन्यथा स्त्रियों का अपना कोई घर नहीं। भारत पाकिस्तान बंटवारे में किसी देश की संपत्ति, जमीन, मकान पर स्त्रियों का अधिकार नहीं था। उनकी नागरिकता धर्म से निर्धारित हो रही थी। विभाजन के बाद दोनों देशों की अपहृत महिलाओं की पुनर्वापसी अभियान में स्त्रियों की नागरिकता के संदर्भ में अपनी राय का कोई अधिकार नहीं था, जबकि दोनों राष्ट्र बनना इसी आधार पर तय हुआ था कि किसी भी राष्ट्र में रहने का चुनाव नागरिक की स्वेच्छा पर निर्भर करेगा। परंतु पुनर्वापसी में हिन्दू और सिख महिलाओं के लिए उनका घर भारत ही था और मुस्लिम महिलाओं का स्वाभाविक घर पाकिस्तान। धर्म किस प्रकार नागरिकता तय करती है अथवा किसी दूसरे राष्ट्र में, जहां किसी अन्य धर्म को नागरिकता की बहुलता है, एक धर्म दुर्राभसंधि की संभावनाएं पैदा करता है, इसका उदाहरण अशोक सिंघल के 12 जून 1999 में नागपुर में दिए गए भाषण में मिलता है, ‘सोनिया गांधी के छद्म वंश में पोप भारत पर शासन करना चाहता है।’

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद तो धर्म के आधार पर नागरिकता को अपना व्यापक सरोकार भी घोषित करता है। भारतीय मुसलमानों के लिए हिन्दुवादी विचारधारा की स्पष्ट घोषणा है कि भारत में रहना होगा तो वंदेमातरम् कहना होगा, रामकृष्ण को अपना पुरखा मानना होगा और मुहम्मदी हिन्दू बनकर रहना होगा।
सोनिया स्वयं भी पोपुलर  राजनीति के मानस से संचालित अपने संबोधनों में भारत में अपनी नागरिकता के आधार पर स्वयं को प्रस्तुत नहीं करती हैं बल्कि भावनात्मक दोहन का प्रयास करती हैं, ‘मैं यही सुहागिन बनी फिर मां बनी और विधवा भी हुई।’ यानी पत्नी और मां के रूप में स्त्री  को प्रतिष्ठा देने वाली भारतीय पितृसत्तात्मक समाज को वे सुविधा ही मुहैया करा रही होती हैं।

इस पूरे प्रकरण में विवाद के तौर-तरीके भी पितृसत्ता की लम्पट भाषा के साथ ही शालीन तर्क के भीतर थे। स्त्री  के खिलाफ स्त्रियां खड़ी हुईं। सोनिया को सुषमा स्वराज और उमा भारती ललकार रही थी। एक विदेशी (सोनिया) के खिलाफ पिछड़ी जाति (उमा भारती) अखाड़े में उतरी,सब कुछ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और पितृसत्ता के सपनों के अनुरूप ही था, मलेच्छ के खिलाफ पिछड़े - दलित भी सवर्ण हितों के साथ जा खड़ा होता है, हिन्दू हित के नाम पर और स्त्री  के खिलाफ स्त्रियां ही जाती हैं। इसी दौरान किसी तमिल पत्रिका ने सोनिया गांधी की एक विवादास्पद तस्वीर छापी-प्रयास ‘इज्जत-हरण’ का था, इज्जत सोनिया की, स्त्री की, और चूंकि वह परिवार की इज्जत है इसलिए कांग्रेस की। पक्ष के बौखलाए लोगों की चिंता भी इसी इज्जत की धारणा से संचालित थी क्योंकि सोनिया का अपमान संपूर्ण राष्ट्र का अपमान था, क्योंकि  वह इस राष्ट्र की बहू हो चुकी थी। है न पितृसत्ता की लम्पट भाषा और उसके शालीन तर्क!

फोटो प्रकरण का एक और खतरनाक निहितार्थ है। पुरुष-दर्शन के लिए निर्मित तस्वीर या स्त्रिायों के भीतर की पुरुष-दृष्टि (Male Gaze) की तुष्टि के लिए बनायी गयी तस्वीर दर्शकों/ पाठकों की एक मनोग्रंथि को संतुष्ट करती है, जिसे Voeurism कहते हैं, कामुक नग्नता/अश्लीलता को देखकर प्राप्त आनंद। सोनिया विदेशी है, उच्च वर्ग की लोकप्रिय महिला है, इसीलिए मनोग्रंथि के तमाम फण्टैसियों के लिए उपयुक्त पात्रा भी है, बाजार पाठकों/दशकों/क्रेताओं की हर कमजोरी और ताकत से रुपए बनाता है, फिर राजनीतिक कृपालुओं की कृपा भी पाना चाहता है।

१० सालों बाद वही नागरिकता विवाद , भावुक सानिया मिर्ज़ा

इस प्रकार के संवेदनशील मुद्दों पर बेवाक राय बनाने में सावधानी बरतने की आवश्यकता इसलिए है कि रुढि़वादी भी यदि आपके निष्कर्षों तक ही पहुंचते हैं या इन निष्कर्षों में उन्हें आंशिक समर्थन भी प्राप्त होता है, तो उनका गलत इस्तेमाल आसानी से किया जा सकता है। सोनिया गांधी को सिर्फ राजीव की विधवा होने के कारण प्रधानमंत्री नहीं होना चाहिए का निष्कर्ष इस स्थापना के साथ दिया जाए कि परिवारवाद का लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं होना चाहिए  तथा बहू होने के नाम पर प्रधानमंत्री पद की दावेदारी का तर्क बनाना लोकतांत्रिक  समाज के लिए बाधा है, तो परंपरावादियों को ही बल मिल रहा होगा। इसके पूर्व भी शाहबानों प्रकरण में नारीवादियों की चिंताओं को हिन्दूवादी राजनीति के नेताओ ने भुनाया था तथा प्रकरण की आड़ में ही समान नागरिक संहिता की राय को अधिक मजबूती देने की कोशिश की थी। गड्डमड होने के इस खतरे के बावजूद स्त्रीवादी  दृष्टि तो इस प्रकरण पर बनायी ही जानी चाहिए।
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