महिला अधिकारः वैधानिक प्रावधान

साधना गुप्ता
 राजकीय स्नातकोतर महाविद्यालय, झालावाड़ मे कार्यरत. संपर्क : sadhanagupta0306.sg@gmail.com

स्त्री मातृत्व के बोझ तले दब कर धीरे.धीरे घर की चारदीवारी तक सीमित होती गई। परिणामतः आर्थिक उत्पादन के साधन एवं शिक्षा से भी वंचित होती गई। अंगों की कोमलता को उसकी शक्ति हीनता के रूप में आंका गया और सौन्दर्य एवं शील की रक्षार्थ उसे चारदीवारी तक सीमित कर दिया गया जिससे स्त्री की स्वतन्त्र विचारधारा एवं अधिकार बीते युग की बात हो गई।

हमारी पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था में यह स्थिति बद से बदतर होती चली गई। पतन का यह ग्राफ बढ़ता ही जा रहा था जिस पर राजाराम मोहन राय की दृष्टि गई। उन्होंने 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना कर महिलाओं की स्थिति में सुधार के प्रयास किए। एवं बाल-विवाह, बहु-विवाह, उत्तराधिकार में अधिकार प्राप्ति, विषयों को व्यावहारिक धरातल पर उठाते हुए ’’ वामा बोधनी ’’ नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया।’’ मैंअपनी झांसी नहीं दूंगी ’’ के दृढ़, निश्चय के साथ 1857 में रानी लक्ष्मी बाई द्वारा किया गया स्वतन्त्रता का प्रयास रंग लाया। स्वाधीनता के संघर्ष में अपने आधे अंग के जंग-जर्जरित रूप का एहसास प्रथम बार पुरूष प्रधान समाज को हुआ। परिणामतः सुधार के लिए प्रार्थना सभा, आर्य समाज इत्यादि की स्थापना हुई, कई वैधानिक प्रावधान किए गए।

1872 में ’ सिवल मैरिज एक्ट ’ पास किया गया जिसमें विवाह हेतु लड़की-लड़के की आयु क्रमश 14 एवं 18 वर्ष निर्धारित की गई। प्रार्थना सभा 1867 द्वारा 1869 में बाम्बे वीडोज रिमामर्स एसोशियसन की स्थापना की गई और इसी वर्ष प्रथम पुनर्विवाह करवाया गया। आर्य समाज द्वारा जाति प्रथा, स्त्री-पुरूष हेतु शिक्षा, कानून व बाल-विवाह निषेध इत्यादि पर बल दिया गया। 1916 में पूना एवं बम्बई में प्रथम महिला विश्वविद्यालय की स्थापना ’’ श्रीमती नथीबाई दामोदार ठाकरे विमन्स युनिवर्सिटी ’’ नाम से हुई। यह दक्षिणी पूर्वी एशिया का प्रथम महिला विश्वविद्यालय था।1916 में ही भोपाल की बेगम ’’ सैयद अहमद खा ’’ ने अपने कुछ साथियों के साथ अखिल भारतीय मुस्लिम महिला समझौते का सूत्रपात कर बहु विवाह उन्मुलन के प्रयास किए।

1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद 1889 में बम्बई अधिवेशन में दस महिलाओं द्वारा भागीदारी की गई थी, जो नाकाफी थी। स्वतन्त्रता संग्राम में महिलाओं की अहम् भूमिका के बिना गांधीजी को स्वतन्त्रता का सपना अधूरा लगा। आपके सतत प्रयास से 1918 के बाद स्वतन्त्रता संग्राम में महिलाओं की खुली भागीदारी दिखलाई दी। 1927 में  ’’आल इण्डिया वीमेन्स कांफ्रेस’’ नामक संस्था का गठन हुआ तथा इसी वर्ष ’डाॅ. मधुलक्ष्मी रेड्डी’मद्रास में पहली विधान मण्डल परिषद् सदस्य बनी।

सविनय अवज्ञा आन्दोलन एवं स्वेदशी आन्दोलन में विदेशी वस्तुओं का घेराव, शराब की दुकानों की तालाबन्दी एवं प्रभातफेरी में सक्रिय भागीदारी करते हुए महिलाएँ जेल गई।

महिला संगठनों के प्रयास से सातवें-आठवें दशक में अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस, अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष एवं महिलाओं सम्बधित सभा-गोष्ठियों का आयोजन किया गया। महिलाओं की स्थिति के आकलन हेतु भारत सरकार द्वारा 1971 में एक समिति का गठन किया गया जिसने अपनी रिपोर्ट 1974 में प्रस्तुत की। इसी कड़ी में ’’ कमेटी आॅन स्टेट्स आॅफ वीमेन इन इण्डिया 1974,’’ नेशनल कमीशन आॅन सेल्फ इम्प्लायड वीमेन 1988, नेशनल पर्शपेक्टिव प्लान फार वीमेन 1988 इत्यादि अस्तित्व में आए।

वैधानिक प्रावधान:-

भारतीय संविधान की निर्माण प्रक्रिया के दौरान ’’महिलओं की वैधानिक समानता’’ एवं ’’हिन्दू कोड’’, विचार के महत्वपूर्ण मुद्दे रहे। अतः महिला उत्थान के लिए किए गए वैधानिक प्रावधानों का विवरण निम्न हैं:-

1. बाल विवाह निषेध:-शारदा एक्ट 1929 में संशोधन कर 1954 में लड़की-लड़के की विवाह हेतु आयु क्रमशः 18        एवं 21 वर्ष की गई। परन्तु कानून के प्रभावी क्रियान्वयन को न देखकर 2006 में संसद में पारित ’’बाल             विवाह निवारण अधिनियम विधेयक 2004’’ में कानून मंत्रालय की निम्न सिफारिशों को स्वीकार किया           गया:-

1. बाल विवाह सम्पन्न होते ही अवैध माना जाएगा।
2. 2 वर्ष का कठोर कारावास एवं एक लाख रू. का जुर्माना।
3. बाल विवाह के शिकार बच्चों का सरकार द्वारा पुनर्वास आदि शामिल हैं।
   
 परन्तु अभी भी हम सफल नहीं हुए हैं। यूनीसेफ की रिपोर्ट के अनुसार 2000 से 2012 के बाल-विवाह के              मामले में भारत दूसरे स्थान पर हैं। शीर्ष दर बांग्लादेश में हैं यहाँ तीन में से दो कन्याओं की शादी 18 वर्ष            की उम्र के पहले हो जाती हैं। (अन्तर्राष्ट्रीय क्राॅनोलोजी नवम्बर 2014, पृ.15)

2. महिलाओं के विरूद्ध अपराध:-

अ. सती प्रथा पर रोक:-सती निवारण
अधिनियम 1987 द्वारा न केवल सती हेतु दण्डकी व्यवस्था है वरन् सती     की प्रशंसा को भी अपराध की श्रेणी में रखा गया हैं। लेकिन आधुनिक भारत में भी सती प्रथा के मामले               समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहते हैं। केशरिया तथा कुटु बाई के सती मामले इसी के उदाहरण हैं। (महिला       सशक्तिकरण-वीरेन्द्रसिंह यादव पृ. 305)

आ. दहेज:- दहेज निषेध अधिनियम 1961 में पारित एवं 1984, 1986 में संशोधित किया गया। भारतीय साक्षी       अधिनियम में भी संशोधन किया ताकि गवाह जुटाने की परेशानी से बचा जा सके। विवाह के सात वर्ष के            अन्दर विवाहिता की मृत्यु को असामान्य परिस्थितियाँ देने के लिए उत्तरदायी माना गया। परन्तु इन              प्रावधानों का दुरूपयोग देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति चन्द्रमौलि कुमार प्रसाद की अध्यक्षता        वाली पीठ ने सभी राज्य सरकारों को अपने पुलिस अधिकारियों को यह निर्देश देने के लिए कहा -                      भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498 क के तहत मामला दर्ज होने पर स्वयं गिरफ्तारी न करें। गिरफ्तारी             की आवश्यकता के बारे में स्वयं को संतुष्ट करे क्योंकि उन्हें मजिस्ट्रेट के समक्ष कारण व सामग्री पेश               करनी होगी। (अन्तर्राष्ट्रीय क्राॅनोलोजी सितम्बर 2014 च.12) पर, दहेज की सुरसा का मुँह बड़ा ही होता जा         रहा हैं।


इ. घरेलू हिंसा:-महिलाओं के प्रति हिंसा को रोकने के लिए भारतीय संसद के अपराधी कानून अधिनियम 1963        के अनुसार कोई भी घरेलू अत्याचार जो पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा किया गया हो, कानूनन अपराध            होगा। इसी प्रकार घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 जो 26 अक्टूबर 2006 से कानून रूप में सम्पूर्ण भारत में           लागू हुआ, के अनुसार शारीरिक मारपीट ही नहीं, अपितु उत्पीड़न, यौनिक, मौखिक, भावनात्मक एवं                 आर्थिक पक्ष के साथ-साथ महिला को घर से निकालना या इसकी धमकी देना घरेलू हिंसा की श्रेणी में रखा         गया हैं। इसके तहत उसे अपने पैतृक या ससुराल के मकान के एक भाग में रहने का अधिकार भी दिया गया       हैं।

ई. भ्रूण हत्या निषेध:-भारतीय दण्ड संहिता 1860 में 312 से 314 के द्वारा ऐसे गर्भपात को दण्डनीय माना गया     है जो स्त्री के जीवन रक्षक रूप में या उसकी सहमति से न किया गया हो। मेडिकल टर्मिनेशन आॅफ                  प्रिंगनेंसी एक्ट 1971 में भी इस प्रकार की व्यवस्था हैं परन्तु असफल होने से सरकार ने प्रसव पूर्व निदान            तकनीक विनिमय दुरूपयोग निवारण अधिनियम का निर्माण किया जिसे 2002 में संशोधित किया गया।          पी.सी.पी. एन. डी. टी. कानून 2002 के अनुसार -

A.  लिंग चयन में पहली बार दोषी जाए जाने पर तीन वर्ष की सजा एवं पचास हजार जुर्माना।
B. दूसरी बार दोषी पाए जाने पर पाँच वर्ष की सजा, एक लाख जुर्माना।
C. सभी अल्ट्रा साउण्ड क्लिनिकों को अल्ट्रासाउण्ड मशीन का पंजीकरण एवं जांच का प्रमाण-पत्र आवश्यक            किया। साथ ही अपनी मासिक रिर्पोट स्वास्थ विभाग की लाइसेंसिंग शाखा को भेजना भी अनिवार्य कर              दिया।

अधिनियम का उल्लंघन करने पर मशीन जब्त करने का प्रावधान भी हैं। 14 फरवरी,2003 को लागू यह कानून देशभर में प्रभावी हैं। परन्तु पालना न होने पर 19 अगस्त 2008 को उच्चतम् न्यायालय के हस्तक्षेप से लिंग परीक्षण सम्बन्धी उत्पादों और सेवाओं संबन्धित विज्ञापन दिखाने वाली साइडो के विरूद्ध कानूनी कार्यवाही की चेतावानी के बाद गूगल और माइक्रोसाफ्ट ने अपने ऐसे विज्ञापन हटा लिए। परन्तु कटु सत्य यह है कि अभी भी यह कार्य अधिकांश अस्पतालों में छद्म रूप से किया जाता हैं। यहाँ वहाँ पड़े कन्या भ्रूणों के समाचार-पत्रों में प्रकाशित समाचार किसी से छिपे नहीं हैं। पुत्र मोह गया नहीं हैं। एक सामाजिक संस्था का संवेक्षण- राजस्थान में 2015 में 2100 एवं 2016 सितम्बर तक 1984 महिलाएँ 5 बेटियों के बाद भी गर्भवती हैं (राज.पत्रिका 18.10.16)

उ. बलात्कार, वेश्यावृत्ति एवं क्रय-विक्रय निषेधः- भारतीय दण्ड संहिता की धारा 375 के तहत बलात्कार को        दण्डनीय माना गया हैं। सह अपराधी के रूप में महिला को दण्डित न करने के साथ यह प्रावधान है कि              शिकायत कर्ता भा. द. स. 1860 की धारा 45 के तहत प्रक्रिया शुरू करने की चाहे या न चाहे परन्तु जिलाधिकार/   शिकायत समिति को कार्यवाही करनी ही होगी। 16 दिसम्बर 2012 को घटित निर्भया काण्ड एवं उसके बाद       दिन-प्रतिदिन बढ़ती बलात्कार की घटनाएँ इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि कानून की पालना नहीं हो रही हैं।   धारा 370 से 373 के तहत महिला को दास के रूप में या वेश्यावृत्ति हेतु क्रय-विक्रय पर भी रोक लगाई गई हैं।

3. तलाक:- पर्सनल लाॅ द्वारा पति-पत्नी दोनों को तलाक लेने का पूर्ण अधिकार दिया गया हैं। विशेष विवाह          अधिनियम 1959 के अनुसार प्रत्येक धर्म समुदाय के स्त्री-पुरूष पसन्द से विवाह कर सकते हैं। इसमें विवाह      एवं तलाक के समान प्रावधान हैं।

4. मातृत्व लाभ:-अधिनियम 1961 के अनुसार माॅ बननें पर बच्चे की देखभाल के लिए 24 सप्ताह के सवैतनिक अवकाश का प्रावधान है साथ ही बालक के 18 वर्ष का होने तक आवश्यकता होने पर समय-समय पर दो वर्ष के सवैतनिक अवकाश का भी प्रावधान हैं। मातृत्व लाभ (संशोधन) विधेयक 2016 के द्वारा 24 सप्ताह के अवकाश में वद्धि की गई हैं। अब यह अवकाश दो बच्चों के जन्म तक 26 सप्ताह का एवं इसके बाद 12 सप्ताह तक मिलेगी। (अन्तर्राष्ट्रीय क्राॅनोलोजी, अक्टूबर 2016 पृ.15)

5. बाल सुरक्षा:-ठेका मजदूर अधिनियम 1970 के अनुसार महिला मजदूर के बच्चों की देखभाल के लिए एक         बच्चा गृह भी होना चाहिए। यह प्रावधान अप्रवासी अधिनियम 1979 में भी हैं।

6. समान भुगतान:-समान भुगतान अधिनियम 1973 के अनुसार एक जैसे कार्य के लिए स्त्री-पुरूष दोनों को         समान वेतन दिया जाएगा।

7. अभद्र प्रदर्शन निषेध:-महिलाओं का अभद्र प्रदर्शन (निषेध)अधिनियम 1989 के द्वारा किसी भी रूप में             महिला के अभद्र प्रदर्शन पर रोक लगाई गई हैं।

8. सम्पत्ति एवं उत्तराधिकार:-17 जून 1956 को लागू हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम पिता की सम्पत्ति में        पुत्री को भी पुत्र के समान अधिकार देता हैं। पति की सम्पत्ति पर भी उसके जीवन काल में पत्नी को पूर्ण            अधिकार एवं पति की मृत्यु के बाद संतान के समान एक हिस्से का अधिकार देता हैं। समय-समय पर इसमें      संशोधन कर महिलाओं के अधिकार का विस्तार किया जा रहा हैं। अभी कुछ दिन पूर्व हुए संशोधन के अनुसार    पिता की मृत्यु पर विवाहित पुत्री को भी अनुकम्पा नौकरी पाने का अधिकार दिया गया हैं।

अस्तु, इन सभी कानूनी प्रावधानों के अतिरिक्त भी भारत सरकार ने न जाने  कितनी योजनाएँ महिलाओं के कल्याण के लिए बना रखी है जिनमें करोड़ों रू. खर्च होते हैं। 67 करोड़ रू. का तो अकेला राष्ट्रीय महिला कोष है जो मुसीबत में फंसी महिला की मदद करता हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ से भी करोड़ों रू. प्राप्त होते हैं परन्तु जानकारी के अभाव में इनका दुरूपयोग ही होता हैं।

अन्त में केवल इतना कि बालिका के जन्म से पूर्व ही उसके संरक्षण का प्रयास करता है भारतीय कानून। आज आवश्यकता इस बात की है कि जनसाधारण को इन प्रावधानों से परिचित करवाया जाए। पूर्ण दायित्वों के साथ प्रशासन द्वारा इनकी अनुपालना की जाए, सार्वजनिक स्थलों पर इनकी जानकारी लिखी हो ताकि अपराधी अपराध करने से पूर्व कई बार सोचे, न्याय प्रक्रिया सरल हो। महिलाओं को स्वयं भी अपने अधिकारों के प्रति सचेत होना होगा साथ ही भोग एवं वासना की विस्तार धारा को छोड़ पुरूष समाज को एक स्वस्थ विचारधारा अपनानी होगी, एक ऐसा सांस्कृतिक वातावरण विकसित करना होगा जिस में नारी भय मुक्त होकर शील की रक्षा करते हुए, पूर्ण क्षमताओं को उजागर कर सके। यदि हम ऐसा कर पाए तो फिर महिलाओं को संरक्षण हेतु किसी आरक्षण या कानून की आवश्यकता नहीं रहेगी। अर्द्धनारीश्वर की कल्पना साकार हो सकेगी। अस्तु वर्षो से खामोश पड़ी शिलाओं से हीे लावा निकलता है अतः हम आशावान हैं।

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