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सामूहिक चेतना का ही प्रतिबिम्ब है स्त्रीविरोध का अनफेयर गेम



ज्योति प्रसाद


इसी बेसर्दी के महीने दिसंबर में द इक्नॉमिक्स टाइम्स ने एक सूचना छापी है कि विनी कॉस्मेटिक्स जो फॉग सेंट भी बनाती है अब एक प्रिटी 24 क्रीम बाज़ार में लेकर आई है।कंपनी के मैनिजिंग डायरेक्टर का मानना है कि अब बाज़ार में उपलब्ध उन ब्राण्ड्स का पर्दाफाश होगा जो कथित रूप से गोरापन बेचते हैं। कंपनी के मुताबिक प्रिटी 24 क्रीम भारतीय महिलाओं को उनके त्वचा के रंग के आधार पर हो रहे भेदभाव से मुक्त करेगी। दिलचस्प यह भी है कि यही कंपनी एक अन्य उत्पाद व्हाइट टोन फेस पाउडर भी बनाती है जिसको लगा लेने के बाद चेहरा निखरा निखरा, ईवन टोन और ऑइल फ्री दिखने लगता है। खैर आप उत्पाद के नाम पर ध्यान ज़रूर दें।



बाज़ार और रंगभेद


मेरे एक बहुत अच्छे मित्र ने एक बार एक पंक्ति कही थी जिसके द्वारा बाज़ार की वास्तविक मंशा समझी जा सकती है। उसने कहा था ‘गंजे को कंघी बेचना ही सेल करना होता है।’ बाज़ार एक वह जगह मानी जाती थी जहां से आपको अपना ज़रूरत का सामान लेना होता था। लेकिन भूमंडलीकरण और उदारीकरण के बहुत आगे निकल चुके हम लोग अब किसी दूसरे माहौल में रह रहे हैं। बहु-राष्ट्रीय कंपनियाँ सामान खरीदने की हर संभव
सुविधा देकर मनुष्य को उस उपभोक्ता में तब्दील कर चुकी हैं जो केवल मुंह से उपभोग न कर के हर अंग से उपभोग कर रहा है। सेवाएँ और वस्तु घर तक पहुंचा दिये जा रहे हैं। एक तरह से आप सामान खरीदने को बाध्य हैं। इस बाध्यता का ग्राहकों को रत्ती भर एहसास भी नहीं है। अमेज़ोन कंपनी का भारतीयकरण का लिबास पहना हुआ विज्ञापन हर तीसरे मिनट पर आ रहा है। अब टीवी देखने वाला और वाली इसके प्रभाव से कैसे बच सकते हैं? बाज़ार उत्पादन करता है और लोग उसके मुख्य उपभोक्ता हैं। वह अपने सामान को बेचेगा और मुनाफा कमाएगा। बाज़ार एक भीड़ जैसा हैं जिसमें कई कंपनियाँ अस्तित्व में होती हैं। भीड़ को समझना है तब उसके मिजाज को समझना होगा और बाज़ार को समझना है तो कंपनियों की रणनीतियों को समझना होगा। कंपनियाँ अपने उत्पाद के रंग से लेकर उसे बाज़ार में उतारने तक की रणनीति बनाती हैं। कंपनियाँ किसी भी क्षेत्र और जनता का अध्ययन करने के बाद विज्ञापन के मैदान में उतरती हैं और छा जाती हैं। इसलिए अब अगर कोई कंपनी गहरे या साँवले या फिर काले रंग के भेदभाव के मद्देनजर अपना एक उत्पाद ला रही है तो इसका दूसरा मतलब क्रीम को रंग के सहारे बेचने के पीछे एक सोची समझी रणनीति का होना है। उदाहरण के लिए फेयर एंड लवली क्रीम की ट्यूब गुलाबी और सफ़ेद रंग का इस्तेमाल करती हैं। गुलाबी का रंग सीधे महिलाओं और युवा लड़कियों को टारगेट करता है और सफ़ेद रंग त्वचा के रंग को। यह उत्पाद की सहज पहचान और पहुँच बनाने की रणनीति है।

साल 2015 में एक महत्वपूर्ण घटना घटी थी, जिसे बहुत जल्दी भुला दिया गया। कल्याण ज्वेलर्स ने ऐश्वर्या राय को लेते हुए एक विज्ञापन जारी किया था जिसमें वह गहनों से लदकर रानी के रूप में बैठी हुई हैं और एक अश्वेत लड़के ने जो गुलाम भी है, उनके ऊपर छाता लगा रखा है। बाद में लोगों की गहरी नाराजगी के चलते कंपनी ने माफी मांगते हुए विज्ञापन वापस ले लिया। इसके पीछे की मानसिकता को समझने के लिए आपको उस युग की
मानसिक और ऐतिहासिक सैर करनी होगी जब दुनिया में अश्वेत लोगों को गुलाम बनाया जाता था। उनकी खरीद फरोख्त होती थी। उन्हें प्रताड़ित किया जाता था। उन्हें जंजीरों से बांधा जाता था ताकि कहीं वे गुलाम(मनुष्य) भाग न जाये। भारत में जाति के नाम पर भेदभाव का पुराना इतिहास रहा है। चार वर्णों की व्यवस्था इसका सबूत है। आर्य जाति से अपने को जोड़ने वाले लोगों की कमी भी नहीं है। आर्य शब्द का एक अन्य अर्थ गोरा रंग भी
बताया जाता है। अतः जो आर्य नहीं है उन्हें कमतर अथवा निम्न माना जाता है, अभी भी। हाल ही में सोशल मीडिया पर आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास ‘शर्मा’ का एक वीडियो फैल रहा है जिसमें वे आरक्षण, एक बंदे और मेहतरानी जैसे शब्दों का खूब इस्तेमाल कर रहे हैं। आज जब यह पोस्ट लिख रही हूँ यह सन् 2017 है और आज तक कुमार विश्वास ‘शर्मा’ जैसे लोगों के दिमाग में से चार वर्ण व्यवस्था नहीं निकल पाई है। इनके लिए
आदर्श आज भी मनु ही है। एक बहुत बड़े मनुष्य तबके को गुलाम बनाए रखने की मानसिक कीड़े ने दम नहीं तोड़ा है। यह वही मानसिकता है जो एश्वर्या राय के विज्ञापन में दिखी थी। गुलाम काले होते हैं और गोरे राज करने वाले, क्या इस विज्ञापन को देखकर आसानी से इस भयानक असमानता को नहीं समझा जा सकता?



अभिनेत्री तनिष्ठा चटर्जी जब अपनी फिल्म ‘पार्च्ड’ का प्रमोशन करने एक टीवी चैनल के कॉमेडी शॉ में पहुंची थीं तब उनके रंग को लेकर शॉ में भद्दी पंक्तियों का इस्तेमाल किया गया और वे तुरंत ही शॉ को छोड़कर चली गईं। तनिष्ठा के वक्तव्यों पर यदि नज़र डालें तो वे कहती हैं कि कई लोग उन्हें इस बात का उलाहना देते हैं कि ब्राह्मण होकर भी आपका रंग गहरा क्यों हैं? मतलब यह है कि ब्राह्मण होने का एक और मतलब गोरा रंग होना है।


अखबारों में शादी के विज्ञापन साफ तौर पर गोरी, टॉल और वेल एजुकटेड लड़की/लड़के की मांग रखते हैं।इतना ही नहीं वे ब्राह्मण, बनिया, खत्री, अग्रवाल, जाट, चमार आदि खंडों में बंटे होते हैं। इसलिए भारत में जाति और रंग को पूरी तरह से अलग कर के नहीं देखा जा सकता। हिन्दी सिनेमा द्वारा किया जाने वाला रंगभेद
रुकिए बात यहीं खत्म नहीं हुई। निर्देशक शेखर कपूर की अति प्रसिद्ध फिल्म मि. इंडिया सन् 1987 में आई थी और बहुत बड़ी हिट भी रही थी। उसमें हवा हवाई गीत में एक ऐसा पड़ाव भी आता है जिसमें गोरी श्री देवी बीच में(आगे भी) नाच रही हैं और उनके पीछे कई युवक अपने ऊपर काला रंग पोत कर नाच रहे हैं। लेकिन भारतीय दर्शकों का ध्यान गाने और नाच पर कुछ इस तरह से टिका दिया जाता है कि वे इसको किसी भी तरह से
हिंसात्मक नहीं लेते। बल्कि वे भी श्री देवी के साथ गाने लगते हैं, कहते हैं मुझको हवा हवाई! जी हाँ, आप ठीक समझे कि फिल्में भी रंगभेद को जाने अनजाने बढ़ावा देती आई हैं। यदि कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाये तब अधिक से अधिक सिने तारिकाएँ गोरे रंग की ही हैं। जिन अभिनेत्रियों ने सांवले रंग के साथ अपने करीयर की शुरुआत की थी वे भी बाद में ट्रीटमेंट लेते लेते गोरी हो चुकी हैं। ठीक यही दशा अभिनेताओं की भी है। गीतकार शैलेंद्र ने 1967 में तीसरी कसम फिल्म का निर्माण किया था। फिल्म फणीशवरनाथ रेणु की चर्चित कहानी तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम पर आधारित थी। फिल्म का मुख्य पात्र हीरामन कथा साहित्य में काले रंग का है पर सिल्वर स्क्रीन पर वह गोरे शॉमैन राजकपूर में बदल जाता है। यह फिल्मों का वह पक्ष है जो बड़ी बारीकी से घातक खेल, खेल जाता है और फिल्मों के दीवाने पागल बन जाते हैं।


प्रियंका चोपड़ा को अपनी फैशन फिल्म के लिए बहुत तारीफ़ें मिली थीं पर उसी फिल्म में उस दृश्य के बारे में उन्हें अभी तक अफसोस नहीं हुआ जब वे एक अफ्रीकी मूल के व्यक्ति के साथ एक रात अंतरंग होती हैं और सुबह उठकर ग्लानि महसूस करती हैं। आधुनिक भारत कुमार यानि अक्षय कुमार अपनी फिल्म कमबख़्त इश्क़ में एक दृश्य में अफ्रीकी मूल की महिला के चेकिंग करवाने के दृश्य में दुखी दिखते हैं। फिल्म में यह दृश्य कॉमेडी दृश्य के रूप में पेश किया गया है। ऐसी रंगभेद फिल्मों और दृश्यों की हिन्दी सिनेमा में भरमार है और आज तक वे इस पर शर्मिंदा भी नहीं हैं।



आगे बढ़ते हैं और अन्य उदाहरणों की बात करते हैं। बॉलीवुड के एक अभिनेता हैं जिनका नाम है अभय देओल। उन्होने इसी साल सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखी थी जिसे पढ़कर बहुत से लोगों को बिजली का करंट लग गया था। उन्होने शाहरुख खान, सोनम कपूर, जॉन अब्राहम, दीपिका पादुकोण, विद्या बालन, सिद्धार्थ मल्होत्रा, इलियाना डिक्रूज़ कलाकारों केगोरा बनाने वाली क्रीम के प्रचार करने को लेकर अच्छी क्लास लगाई थी।शाहरुख खान इसी दिसंबर में टेड टॉक्स लेकर आ रहे हैं जिसमें वे प्रेरणा की बात करते नज़र आ रहे हैं तो दूसरी तरफ विद्या बालन महिला सशक्तिकरण पर आधारित फिल्में बेगम जान और तुम्हारी सुलू जैसी फिल्में कर रही हैं। यही नहीं शौच से जुड़े विज्ञापन पर भी वे देश को बता रही हैं कि शौचालय का इस्तेमाल क्या है? दीपिका पादुकोण और शाहिद कपूर अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की बात करते नज़र आ रहे हैं। जब अभय देओल ने अपनी पोस्ट के द्वारा रंगभेद पर निशाना लगाया था तब श्री लंका की सुंदरी जैकलीन फर्नांडीस ने उनका साथ दिया था और कहा था कि रंगभेद करना गलत है। लेकिन वे इस बात को न जाने कैसे भूल गईं कि खुद उनकी फिल्म ‘रॉय’ में वे चिल्ला-चिल्लाकर चिट्टियाँ कलाइयाँ पर नाच रही हैं। इस पूरे बोझिल वर्णन का तात्पर्य यह है कि ये सभी फिल्मी सितारे कला को कला की नज़र से कम बल्कि आय की नज़र से अधिक देखते हैं। युवा जमात को इन बातों को ध्यान से समझना चाहिए और आँख बंद कर के इनके पीछे नहीं जाना चाहिए।


राजनीति में रंगभेद के उदाहरण


पिछले साल 8 नवंबर को भारतीय इतिहास में एक असंभव राजनीतिक और आर्थिक घटनाको अंजाम दिया गया। नोटबंदी हुई और भारत में एक अफरा-तफरी का माहौल रहा। इसघटनाक्रम के दौरान ‘काला धन’ जैसे शब्द-जोड़े ने अपनी जगह हर किसी की जुबान पर बना ली थी। आमफहम बोलचाल में अगर शब्द बिना समझे इस्तेमाल होते हैं तब कुछ हद तकउसे समझा जा सकता है पर राजनीतिक स्तर पर भी इस शब्द का खूब प्रयोग हुआ वह भी बिना सोचे समझे। वह आगत जो गैर-जिम्मेदाराना तरीके से कमाई जाती है, जिसके पीछे लालच का बड़ा हाथ होता है, जो नैतिकता को दरकिनार करके कमाई जाती है वह कमाई और आगत गैर लोकतान्त्रिक, गैर-संवैधानिक होती है। अंग्रेज़ी में इसे ईल-लीगल मनी से समझा जा सकता है। लेकिन भारतीय सरकार और विपक्ष ने इसे काला धन कहकर संबोधित किया जो कि निहायती असमानता वादी लफ़्फ़ाज़ी है। राजनीतिक रूप से हमारे पास दुनिया का शानदार संविधान है और इस महान भाषाओं के देश में बार बार काला धन जैसे शब्दों
का इस्तेमाल यह दर्शाता है कि हमारे राजनेता अभी भी सोच नहीं पा रहे हैं।


इससे पहले बीजेपी सांसद तरुण विजय ने अलजजीरा को दिये इंटरव्यू में दक्षिण भारत के लोगों को लेते हुए विवादित रंगभेद टिप्पणी की थी। इस बयान के बाद बहुत से लोगों कीतीखी प्रक्रियाएँ सामने आई थीं। लेकिन कुछ ऐसे नेता भी हैं जो मुद्दों को काफी हदटक गंभीरता से लेते हैं। सयुंक्त राष्ट्र अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति ने ट्विटर पर अपनी एक तस्वीर साझा की थी जिसमें वे खिड़की के पास खड़े हैं और खिड़की में चार बच्चे दिखाई दे रहे हैं।
उनमें एक बच्चा अश्वेत भी है। वे दिवंगत दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला की उक्ति को लेते हुए लिखते हैं- “कोई भी किसी दूसरे व्यक्ति के लिए त्वचा के रंग, पृष्ठभूमि और धर्म के आधार पर नफ़रत लेकर जन्म नहीं लेता…” (No one is born hating another person because of the color of his skin or his background or his religion…) इसलिए भारत में जब इस तरह की सुलझी हुई मानसिकता के शब्द नहीं दिखते तब चिंता होना लाजिमी हो जाता है।



सुंदरता- एक मिथ


घर में बच्चे के जन्म से लेकर उसकी समझ बनने तक की प्रक्रिया में सुंदरता से जुड़े कितने ही प्रतिमान जाने अनजाने प्रदर्शित किए जाते हैं। उसे काजल लगाया जाता है। बच्चे के रंग को लेकर कितने ही शब्द बोले जाते हैं। कन्हैया का मिथक उठाकर लाया जाता है। संगीत से पता चलता है कि राधा क्यों गोरी मैं क्यों काला! धीरे धीरे  बाहर की दुनिया में (स्कूल) जाकर वह तरह तरह के रंग देखता है। सांवला और गहरा और गोरा आदि आदि। मज़ाक-मज़ाक में उसे चिढ़ाया जाता है…ओ काली, ओ काले कौवे..! हमारे यहाँ सुंदरता के प्रतिमान बहुत ही दकियानूस रहे हैं। गोरा रंग इसमें बहुत महत्वपूर्ण होता है। बाज़ार इस बात को अच्छे से अध्ययन करता है और इसलिए वह विश्व सुंदरी प्रतियोगिता करवा देता है। आप घर में बैठे बैठे गौरव करते रह जाते हैं और आपको पता भी नहीं चलने दिया जाता कि आप को रद्दी माना जा रहा है। इसमें मीडिया की कंपनियों के संग मिलीभगत वाले एंगल कोनज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।


सुंदरता वह समझी जाती है जो बाहर के पक्षों द्वारा सरासर आरोपित की जाती है। जबकि व्यक्ति को यह समझने का मौका ही नहीं दिया जाता है कि वास्तव में उसके स्वयं के लिए सुंदरता का वास्तविक अर्थ क्या है? व्यक्ति को बताया गया कि फलां महिला चूंकि विश्व सुंदरी है तो वह दुनिया की सबसे सुंदर औरत है। बताए जाने और आपको वह समझ पूरी तरह से ग्रहण करने के बीच बेहद उत्तेजक साधनों का प्रयोग होता है इसलिए आप खुद की सुंदरता की एक स्व-निर्मित समझ विकसित ही नहीं कर पाते। सुंदरता को आपके आँखों की देखने की क्रिया से ही जोड़ा जाता है, इसमें बाकी इंद्रियों को गौण बना दिया जाता है।

हर स्तर पर रंग को लेकर भेदभाव दिख जाता है। समझदार पाठक खुद मुझसे अधिक उदाहरण रोजाना देखते होंगे और उनका संज्ञान भी लेते होंगे। सारांश में कहूँ तो समानता की राह बहुत कठिन है। अगर वास्तव में हर तरह का भेदभाव मिटाना है तो एक प्रबुद्ध जनता का निर्माण करना होगा जो नैतिक मूल्य को आत्मसात किए हो। जहां एक बराबरी का माहौल हर किसी के लिए हो। यह सब ऐसे ही नहीं हो जाएगा। इसके लिए बेहतर समझ कीआवश्यकता होगी। इसके लिए राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक इच्छा शक्ति की जरूरत है। हमें एक ग्राहक और उपभोक्ता के नज़रिये से यह समझना होगा कि हमारी जरूरतें क्या हैं और क्या नहीं हैं। कोई क्रीम यदि हमारे चेहरे को सफ़ेदकर भी दे तो उससे क्या फर्क पड़ जाएगा। हम भोजन खाते हैं न कि क्रीम। नन्दिता दास की फोटो वाला अभियान स्टे अनफेयर तब तक कोई मायने नहीं रखता जब तक हम अपनी सोच में भेदभाव को ढोते हैं।

बाज़ार को अपना सामान बेचना है इसलिए उपभोक्ता को यह समझना होगा कि यदि आप गोरा बनाने वाली क्रीम खरीद रहे हैं तो भी कंपनी का फायदा है और यदि आप साँवले रंग की त्वचा की चमक के लिए उत्पाद खरीद रहे तो भी यह कंपनी का फायदा है आपका नहीं। (अगर साल 2018 की शुरुआत करनी ही है और इस लेख को पढ़कर यदि कोई प्रभावित होता है तब, मेरे जैसे अश्वेत लोग किसी भी तरह की गोरापन वाली क्रीम खरीदना बंद करदें। यह बहुत मुश्किल काम भी नहीं है।)

परिचय :-ज्योति जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के भाषा अध्ययन विभाग में शोधरत हैं. 
सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com 

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‘एक था गुल…’अलविदा शशि कपूर



स्वरांगी साने 


अचानक वाट्स एप्प पर संदेश आता है..न्यूज चैनल्स पर फ्लैश होने लगता है..फिर स्क्रोल चलने लगता है, शशि कपूर नहीं रहे…


पहली प्रतिक्रिया तो यही आती है- अरे, और उसके बाद हर जगह चाहे फेसबुक हो या वाट्सएप्प…नमन,श्रद्धांजलि और आरआईपी घूमने लगते हैं…इन सबकी परवाह किए बिना एक अभिनेता चुपचाप जा चुका होता है..


पिछले कितने ही सालों से वे डायलिसिस पर थे, एकाकी जीवन जी रहे थे…और कल जब अमूमन सबकी दोपहर की चाय का समय था, वे चले गए…



शशि कपूर का जाना…हमारी पीढ़ी के लिए क्या मायने रखता है, वे हमारी पीढ़ी के हीरो नहीं थे, जबकि सत्तर और अस्सी के दशक में जब हममें से कई लोग जन्मे या अपने बचपन को जी रहे थे वे तब बड़े परदे के हीरो थे…तब बड़ा परदा, बड़ा ही होता था, घरों में टीवी नहीं थे, टॉकिजों में जाकर फिल्में देखी जाती थी या किसी त्योहार,मेले-मौके पर किसी मैदान में बड़ा सफेद पर्दा लगाकर सबके लिए पिक्चर दिखाने का आयोजन होता था। तब पिक्चर देखना इतना कैजुअल नहीं था, कि जब मन हुआ चल दिए…बल्कि एक आयोजन ही होता था..और उस आयोजन की याद से जुड़े थे शशि कपूर…


बड़े भारी-भारी संवाद और उनके अर्थ समझ पाने की उम्र नहीं थी लेकिन ‘मेरे पास माँ है…’ का रुतबा तब भी बहुत ‘भारी’ लगता था, ऐसा लगता था जैसे सच में हम कितने अमीर है।


अपने बचपन के दौर में वह नायक था वह अल्हड़ सा शशि कपूर, गालों के गड्ढे और मासूम हँसी, और गीत.. ‘एक था गुल…’



तब हम जो बच्चे थे, वो किसी गीतकार आनंद बक्शी को नहीं जानते थे, हमें तो लगता था शशि कपूर सुना रहा है, मतलब उसी की कहानी होगी…और आज वह गीत जब हकीकत में बदल गया, शशि कपूर खुद अतीत हो गए तो पूरा दौर याद हो आया एक ही गीत के साथ कि ‘एक था गुल…’


कुछ बड़े हो जाने पर जाना कि अभिनेताओं के उस दौर में अपनी पहचान बना पाना शशि कपूर के लिए कितना कठिन रहा होगा… पृथ्वीराज कपूर के घर पर जन्म लेना और राज कपूर, शम्मी कपूर जैसे दोनों बड़े भाइयों के ऊँचे फिल्मी कद के साथ खुद को बैठा पाना उतना भी आसान नहीं रहा होगा। वर्ष 2011 में भारत सरकार ने पद्म भूषण से सम्मानित किया तो एक बार फिर इस अभिनेता का बहुआयामी जीवन रेखांकित हो गया। कुछ सालों बाद ही वर्ष 2015 में उन्हें वर्ष 2014 का दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिला।



केवल चॉकलेटी हीरो यह उनकी पहचान नहीं थी, सत्तर के दशक में उनके जैसा कोई व्यस्त कलाकार नहीं था। उन्होंने हर भूमिका के साथ न्याय किया, भूमिका चाहे हीरो की हो, बाल कलाकार की, सह कलाकार की या निर्माता-निर्देशक की, उन्होंने ब्रितानी फिल्मों में काम किया किसी ब्रिटिश की तरह, उन्होंने गैर परंपरागत फिल्मों में काम किया किसी समांनतर फिल्मों के अभिनेता की तरह, थियेटर के लिए खड़े हुए रंगकर्मी की तरह…भूमिकाएँ जो भी हो, उन्होंने दिलों-जान से निभाई…केवल 20 साल की उम्र में ब्रिटिश अभिनेत्री जेनिफर से शादी हो या संजना, करण, कुणाल के पिता की या रणधीर-ऋषि कपूर के चाचा या करिश्मा-करीना के दादा की… या अपने पिता के पृथ्वी थियेटर को नव संजीवनी देने की..उनका जीवन ‘आग (1948)’ से शुरू हुआ था, जिसकी ज्वाला ताउम्र उनके भीतर धधकती रही..1965 के बाद भी ‘जब-जब फूल खिले’ तब-तब उन्हें याद किया जाता रहेगा..अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा के मंच पर वे ‘सिद्धार्थ (1972)’थे,..वे एक ‘विजेता’ थे, जिसने इस ‘शान’ से जीवन जीया था, कि उनका जीवन ‘जुनून’ भी था और ‘उत्सव’ भी…लेकिन ‘कभी-कभी’ ही ऐसे लोग हुआ करते हैं…


जन्म- 18 मार्च 1938
मृत्यु – 04 दिसंबर 2017


परिचय :-वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार और अनुवादक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित. 
संपर्क :-swaraangisane@gmail.com

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उसने पद्मावतियों को सती/जौहर होते देखा है ..

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विलियम डैलरिम्पल/अनिता आनंद 

सती/ जौहर के फिल्मांकन से एक पक्ष अपना अर्थ-व्यापार कर रहा है तो दूसरा पक्ष उससे अपने जाति गौरव को जोड़कर राजनीति-व्यापार. इस खेल में क़ानून दाँव पर है और स्त्री के हक़ में लड़ाइयों का हासिल भी दाँव पर. इस द्विपक्षीय हुतूतू खेल के बीच क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जब पद्मवतियाँ सती/जौहर होती थीं, जब उनके साथ उनकी दासियाँ भी जला दी जाती थीं तब आसमान में करूण आर्तनाद की गूँज से धरती-आकाश की करुणा विदीर्ण हो जाती होगी. और यह सब होता रहा है रतनों/ रणजीतों की सामंती ऐय्याशियों को सांस्कृतिक आवरण देने के लिए. पद्मावती के लिए हो-हल्ला करते हुए जब थक गये हों तो राणा रणजीत सिंह और उनके वशंजों की मौत के बाद के उस करूण दृश्य को देखें, जो सामंतों की शान से बनी राख की ढेर और धुल से पैदा होता रहा है…. 


राख का शहर 18 जून 1839


तीन दिन और तीन रातों तक महाराजा की चिता की आग जलती रही। महल के बाग समेत पूरा परिसर चिता में जल रही चंदन की लकड़ी और महाराजा के पार्थिव शरीर की महक से भरा हुआ था। वैसे तो महाराजाओं की ज़िंदगी की तरह उनके अंतिम संस्कार किसी भी मायने में कमतर नहीं होते। पर भारतीयों ने खुद माना कि एक शेर की विदाई इसी तरह होनी चाहिए।


महाराजा के अंतिम संस्कार में हुए असंख्य रीति-रिवाजों का सबसे अच्छा विवरण एक यूरोपीय ने किया है जो लाहौर दरबार में कार्यरत था। आॅस्ट्रिया-हंगरी का मूल निवासी जान मार्टिन होनिगबर्गन एक होमियोपैथी का डाॅक्टर होने के साथ ही एक यात्री था जो दस साल पहले रणजीत सिंह के दरबार में पहुंचा था। रणजीत सिंह उससे इतने प्रभावित हुए कि उसे वापस नहीं जाने दिया और अपने दरबार में जगह दे दी।

 

महाराजा के दरबारी में बतौर बड़े ओहदेदार उस पर एक महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी थी, उसे यह सुनिश्चित करना था कि चिता की आग ठंडी होने पर अस्थि विसर्जन के लिए चिता की राख को इकट्ठा कराया जाए। उसके मुताबिक जो उसने देखा वह यह था कि कुछ डोम या महाब्राह्मण जैसे लोग, जिनकी त्वचा सूरज में रहने की वजह से पूरी तरह झुलस चुकी है, राख इकट्ठी कर उसमें से अस्थियां जमा कर रहे थे। किसी समय दुश्मनों के लिए दहशत और दुनिया को अपने वैभव और भव्यता से दंग कर देने वाला उनका मरीज महाराजा रणजीत सिंह अब राख और अस्थियों में तब्दील हो चुका था। वह भी उसकी नज़रों के सामने।


तीन दिन पहले जब महाराजा का अंतिम संस्कार शुरू हुआ था तो लाहौर किले को बाहरी दीवार और महल के बीच की जगह में उनकी चिता सजाई गई थी। उस दिन लग रहा था कि सारा का सारा पंजाब अपनी राजधानी में उमड़ रहा है। वेदना में डूबे हुए लोगों का एक सागर था और होनिगबर्गर के कान के पर्दे वहां होने वाले शोर से गूंज रहे थे।

होनिगबर्गर को अपनी गर्दनें ताने हुए खड़ी भीड़ में किसी रास्ता दिलाकर उनकी जगह तक पहुंचाया गया। उनके आसपास सिख सरदारों के सामंत सफेद कपड़ों में, नंगे पैर मौजूद थे। वहां पर उस दिन महाराजा के दरबार के सबसे बड़े सिख सामंतों, दरबार के मंत्रियों, अधिकारी और महाराजा के वजीरों के सिवाय हर वह शख्स मौजूद था जिसे वहां होना चाहिए था। दरअसल इन उच्चपदस्थ सिख दरबारियों को एक खास सम्मान मिला था। वे अपने महाराजा की अंतिम यात्रा को लेकर द्रवित थे पर उनका सहचर बनने के सम्मान से गौरवान्वित भी थे। होनिगबर्गर वहीं इंतजार करते रहे, उनका इंतजार खत्म हुआ जब उन्होंने दूर से अंतिम यात्रा को आते देखा। चौथाई मील लंबी  इस यात्रा के दोनों तरफ बंदूकधारी सैनिक मौजूद थे। अंतिम यात्रा करीब करीब जनमानस के सागर को दो भागों में चीरती हुई दूर से आती दिख रही थी। इसी रेखा के बीचोबीच महाराजा रणजीत सिंह का पार्थिव शरीर दिख रहा था। एक सोने के मंच पर रखा हुआ यह शरीर मानों एक सोने के पाल वाले जहाज़ की तरह दिख रहा था।1 दरअसल इसे जहाज कहना उस समय सबसे उपयुक्त लग भी रहा था। क्योंकि वह रोती बिलखती महाराजा की प्रजा के अपार जनसमुद्र के बीच से आता हुआ जो दिख रहा था। अंतिम यात्रा में संगीतकारों की धुनें इस करुण रुदन को और कातर बना रही थी।


महाराजा के पार्थिव शरीर के पास ही होनिगबर्गन की नज़र एक महिला की तरफ पड़ गई। वह रानी महताब देवी थीं जिन्हें महाराजा प्यार से गुड्डन बुलाते थे। वे सोने की एक पालकीनुमा कुर्सी पर बैठी थीं जिसे पसीने में लथपथ कहारों ने ऊपर उठा रखा था। उनके पीदे तीन और रानियां इस तरह की कुर्सियों पर सवार थीं।2 उसने सभी रानियों को देखा पर उसकी निगाह सिर्फ रानी गुड्डन पर ही टिकी रही। इसकी वजह भी थी। दरअसल वह और रानी पहली बार लाहौर समान वर्ष में आए थे। उस समय वह एक युवा डाॅक्टर और यात्री था जिसे शोहरत कमाने की भूख थी वहीं गुड्डन एक राजपूत राजकुमारी थीं। उनके साथ ही उनकी बहन रानी राज बंसो का विवाह भी महाराजा से ही कर दिया था।



रानी गुड्डन को देखकर होनिगबर्गर को अनायास ही उनके विवाह का दिन याद आ गया, जब वह शादी  के समारोह में दाखिल हो पाने में कामयाब रहा था। उसे यह भी याद आया कि रानी की बेपनाह खूबसूरती के चर्चे थे, जिनकी पुष्टि वह कर पाने में अक्षम था। शादी के दिन रानी घूंघट में थीं और उसके बाद से वो घूंघट में ही रही थीं। अब जाकर, दस बरसों के बाद, उनकी मौत के दिन वो सार्वजनिक रूप से उनका चेहरा देख पा रहा था। होनिगबर्गर ने देखा कि वे अभी भी खूबसूरत थीं।जैसे-जैसे गुड्डन और उनके साथ की तीन रानियां चिता के पास आती जा रही थीं वे अपने कंगन उतार कर उस भीड़ में फेंक रही थी जहां से हज़ारों हाथ उन कंगनों को प्रसार समझ कर लेने को आतुर थे।


सिख दरबार में उनके सहयोगियों ने होनिगबर्गर को बताया कि ये रानियां (महाराजा की 17 में से चार) स्वेच्छा से सदियों पुरानी परंपरा का हिस्से बनने वाली हैं। इसके बावजूद जो कुछ सामने आया, उसने उसे वितृष्णा से भर दिया। अपने पति के प्रति उसके जीवन और उसके बाद भी समर्पित ये औरतें सती थीं और उनकी सार्वजनिक आत्महत्या-या हत्या, जो आपके नजरिये पर निर्भर करता है-को चारों ओर सराहा जा रहा था। शाही इतिहासकार सोहनलाल, जिनका काम महाराजा के दरबार में हो रही घटनाओं को दर्ज करना था, ने आगे चल कर लिखा कि रानियां अपनी चिता के लिए तैयार होते समय ‘नशे में डूबी हाथियों की तरह नाचती और हंसती हुई’ प्रसन्नचित थीं।


वैसे होनिगबर्गर को सोहनलाल सूरी द्वारा वर्णित प्रसन्नता का कोई भी भाव उन अभागी औरतों के चेहरे पर नहीं दिखा। रानियों की गोद में महाराजा का सिर रखा गया, मानो वह सो रहे हों, रानियां बाकायदा उनके पार्थिव शरीर के आसपास सलीके से बैठी हुई थीं और उन्होंने अपनी आंखें बंद कर रखी थीं। उन्होंने युवराज खड़क सिंह को भले ही न देखा हो पर आग लिए हुए चिता को अग्नि देने आ रहे युवराज की मौजूदगी का अहसास उन्हें ज़रूर हुआ होगा। होनिगबर्गर यह तो सुन और समझ नहीं पास कि चिता में आग लगते ही क्या सती हो रही रानियों में से कोई चीखा। उन सबको जैसे ही चिता की आग ने अपनी आगोश में लिया तो ढोल नगाड़े और वहां मौजूद जनसमुद्र की गर्जना ने होनिगबर्गर के होश उड़ा दिए। सिर्फ होनिगबर्गर ही अकेला नहीं था जिस पर वहां का घटनाक्रम हावी हो रहा था। एक जोड़ी कबूतरों ने भी महाराजा की चिता में छलांग लगा दी। इस घटना ने तो जैसे पूरे जनसमूह को आह्लादित कर दिया। कहा गया कि इन्सान तो इंसान पशु पक्षी भी महाराजा रणजीत सिंह के लिए सती होना चाहते थे।


चिता की आग ठंडी होने में पूरे दो दिन और दो रातें लगीं। इस दौरान होनिगबर्गर अगले बीस घंटों तक चिता पर अपनी निगाहें गड़ाकर रखने को बाध्य था। दरबार के हर वरिष्ठ सदस्य से अपेक्षा थी कि वो अस्थियां प्रवाहित होने तक वहीं रहेगा। जब चिता की आग इतनी ठंडी हो गई कि उनमें गट्ठे पड़ी हुई उंगलियां काम कर सकें तो डोम लोगों ने, जो लाशों का प्रबंध करने वाली एक जाति है, अपना काम शुरू कर दिया। वे यह कैसे जानते थे कि कहां महाराजा की अस्थियां खत्म हुईं और रानियों की शुरू हुईं, यह एक राज ही था। सदियों से आम लोग और राजा-महाराजा डोमों की माहिर उंगलियों के बीच से गुज़रते रहे थे और उनके तौर-तरीकों पर आज तक कभी उंगली नहीं उठी। डोम अस्थियों को राजा और चार रानियों के पांच ढेरों में अलग-अलग कर रहे थे, लेकिन जब यह हो रहां था तो कोई भी उन सात गुलाम लड़कियों की अस्थियों की परवाह करता हुआ नहीं दिख रहा था जो उस स्याह राख में मिल गई थीं, रानियों की तरह वे भी अपने राजा के साथ जल कर मर गई थीं। लेकिन रानियों से उलट चिता तक उन्हें अपने पैरों पर चल कर आना था।

होनिगबर्गर के मन मस्तिष्क में ताउम्र उन सात लड़कियों का चेहरा दर्ज हो गया। वह भूल ही नहीं पा रहा था कि किस तरह से महाराजा की सात दासियां पालथी मारकर बैठी थीं उनके सिर पर तेल से पूरी तरह भीगी सरकंडे की चटाई रखी गई और फिर वो सती हो गईं। इन सात दासियों के बारे में कोई बात नहीं कर रहा था, उनका मातम कोई नहीं मना रहा था। यहां तक कि होनिगबर्गर के पता लगाने के बाद भी उनका नाम तक पता नहीं चल पाया। इस ‘घृणित समारोह’ को देखने के बाद होनिगबर्गर उनके लिए दयाभाव और लोगों के लिए घृणा से भर गया। बाद में जब होनिगबर्गर से पूछा गया कि वह इस समारोह के पहले ही पंजाब छोड़कर क्यों नहीं चला गया तो होनिगबर्गर ने अपने मित्र और महाराजा रणजीत सिंह के दरबार में उनके सहयोगी यूरोपीय जनरल ज्यां-फ्रांसुआ अलार्ड के शब्दों को उद्धत किया, ‘यहां पर आना बहुत मुश्किल है पर जाना उससे भी ज़्यादा मुश्किल है।’


दस साल पहले 1829 में होनिगबर्गर 34 साल का ऐसा युवक था जो एक उपनिवेशी आॅस्ट्रिया से मजबूत इरादों और उम्मीदों के साथ मेडिकल की पढ़ाई कर बाहर निकला था। उसके पास अपने पेशे के लिए ऐसे विचार थे जो उस समय के खांचे में फिट नहीं बैठते थे। एक घुमंतू युवक के तौर पर वह लाहौर पहुंचा जिसके पास दवाइयों का एक बक्सा और अनुशंसा का पत्र था। उसके इरादे बहुत ऊंचे थे, पर उसकी तरक्की की उड़ान को पंख नहीं मिल पा रहे थे। महाराजा रणजीत सिंह ने अपने आसपास ‘गोरे’ को डाॅक्टर रखने से इन्कार कर दिया था। लिहाजा उसे दरबार के छोटे अधिकारियों का ही इलाज करना पड़ रहा था। जब बहुत से लोगों का उसने सफल इलाज कर दिया तो उसे महल में तलब किया गया। होनिगबर्गर को यह उम्मीद तो कभी नहीं थी कि महल में उसके पहले शाही मरीज खुद महाराजा होंगे पर उसे यह उम्मीद तो कम से कम थी कि महल में उसका मरीज कोई इंसान होगा। उसका पहला मरीज एक बहुत ऊंचा घोड़ा था जिसे देखकर चिकित्सक के तौर पर वह बहुत आश्चर्य में था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। यह घोड़ा महाराजा को इंग्लैंड के राजा किंग जाॅर्ज चतुर्थ ने दोस्ती के बतौर उपहार दिया था। शाही अस्तबल में रहने के बावजूद इस घोड़े के पैर में फोड़े निकल आए थे। हकीमों ने उसका इलाज करने की बहुत कोशिश की पर जब सब हार गए तो अंतिम विकल्प के तौर पर होनिगबर्गर को बुलावा भेजा गया था। उसने घोड़े को बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश की पर घोड़े को बचा नहीं पाया। इस तरह के नतीजे के बाद यह आशंका थी कि होनिगबर्गर के लाहौर से बोरिया बिस्तर बांधने के दिन आ गये थे पर जिस तरह से होनिगबर्गर ने बीमार पशु की सेवा की और उसे बचाने की हर मुमकिन कोशिश की वह महाराजा रणजीत सिंह को भा गया। महाराज ने युवा डाॅक्टर को अपने दरबार में शामिल कर लिया और उसे इंसानों के इलाज की अनुमति दे दी। साथ ही उसके प्रयासों के लिए उसे उपहार भी दिए। इस उदारता के बाद भी होनिगबर्गर की महाराजा के बारे में व्यक्तिगत राय बहुत खराब थी। यहां तक वह महाराजा को निचले दर्जे का मानता था और घोड़े पर सवार महाराजा की तुलना वह हाथी पर सवार लंगूर से करता था।


महाराजा ने उसे अपनी तोपखाना बटालियन में एक ओहदा देने की पेशकश की। उनका मानना था कि वह भी दूसरे गारों की तरह सेना में उनके लिए भाग्यशाली साबित होगा। दूसरे गोरों को उन्होंने महत्वपूर्ण जगहों पर तैनात किया था क्योंकि वह गोरों को भाग्य का प्रतीक मानता था। होनिगबर्गर ने बिना सोचे ही इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। उसने कहा, ‘मैंने महाराजा से कह दिया कि जिस पद के लायक आप मुझे समझ रहे हैं उसकी मैं सलाहियत ही नहीं रखता हूं।’

महाराजा कहां मानने वाले थे। उन्होंने इस इन्कार का जवाब पहले से ही सोच रखा था। उन्होंने तुरंत दूसरा प्रस्ताव दिया। उन्होंने उसे शाही बारूदखाने में अधीक्षक बना दिया। इस पद में नाम और पैसा यानी दौलत और शोहरत दोनों ही इफरात में थी। होनिगबर्गर ने इस प्रस्ताव को महज इसीलिए स्वीकार कर लिया क्योंकि वह बहुत दिन तक पंजाब में रुकने वाला नहीं था। वह जल्द से जल्द अपने घर वापस जाना चाहता था। उसने लिखा है, ‘मैं इस ख्याल से ही इतना परेशान था कि अगर कोई मुझसे यह कहता कि कोहिनूर ले लो और यहीं पर बस जाओ तो मैं उसे भी मना कर देता।’ यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि वही होनिगबर्गर अगले दस साल तक महाराजा की इच्छा के मुताबिक दरबार में टिक गया।

पीढ़ी-दर-पीढ़ी सती 


राजतिलक होने से बहुत पहले ही खड़क सिंह ने महाराजा की पदवी धारण कर ली थी। जून 1839 में अपने पिता के अंतिम संस्कार के तुरंत बाद यह पदवी धारण करने वाला खड़क सिंह जल्दी ही सत्ता के दुर्गुणों से घिर गया। वह आलीशान दावतें करने लगा, जिनके अंत में वह नशे में पूरी तरह धुत इंसान के सिवा कुछ नहीं रहता था। उसने अपने शातिर वज़ीर ध्यान सिंह को नज़रअंदाज़ करना शुरू कर दिया और अपने सभी मंत्रियों और ताकतवर दरबारियों को हाशिए पर डाल दिया। धार्मिक खालसा जल्द ही नए महाराजा के व्यवहार से घृणा करने लगा था और ऐसा करने वाला वह अकेला नहीं था। नए महाराजा के तौर पर उसके सलाहकारों और सेनापतियों को जल्द ही उससे वितृष्णा हो गई, क्योंकि महाराजा के तौर पर उसकी रुचि राज्य के किसी भी मामले में नहीं थी बल्कि वह नशे, सुरा और सुन्दरी में ज़्यादा व्यस्त रहता था। उसके सिंहासन पर बैठने के चार महीने के भीतर ही उसकी हत्या की साजिश रच दी गई।


यह तय किया गया कि सफेदा कस्करी (सफेदा सीसा) और दस काफूर (पारे का मिश्रण) की खुराक महाराजा के रोज़ के खाने और शराब में मिलाई जाएगी। पहले तो इस ज़हर का असर कुछ खास नहीं दिखा। सिर्फ महाराजा की नशे में धुत रहने की अवधि बढ़ गई और उसकी आवाज़ हल्की लड़खड़ाने लगी। उसे अपने हाथ पांव में तालमेल करने में भी अब सामान्य से ज़्यादा समय लगने लगा था। इसके बाद धीरे-धीरे महाराजा अंधा होने लगा। इसके बाद उसके पूरे शरीर में एक रहस्मय लेकिन गंभीर पीड़ादायक खुजली मचने लगी और कुछ ही हफ्तों बाद उसके जोड़ों में दर्द और उसकी त्वचा में जगह-जगह से खून रिसने लगा। ज़हर की खुराक शुरू करने के छह मीने के भीतर ही महाराजा का एक-एक अंग धीरे-धीरे काम करना बंद करने लगा। खड़क सिंह अब सिंहासन से शय्या पर पहुंच चुका था। तिलतिल कर मर रहा वह मौत का इंतज़ार करने लगा था।


इस धीमी हत्या में ग्यारह महीने और लगे। इस दौरान खड़क सिंह के 18 साल के बेटे नौनिहाल सिंह को राजधानी बुलाकर युवराज बना दिया गया था। एक आकर्षक व्यक्तित्व और साहसी सेनानायक के तौर पर नौनिहाल सिंह वैसे तो सबकी पसंद था लेकिन उसे दरबारी सियासत का बिलकुल इल्म नहीं था। लिहाज़ा उसे अपने पिता के नाम और अपने वज़ीर की सलाह पर शासन संभालना पड़ा। अफवाहें इस तरह की भी रहीं कि खड़क सिंह को ज़हर देने की साज़िश शातिर वज़ीर ध्यान सिंह ने रची थी। हालांकि इसकी कभी पुष्टि नहीं हो सकी।


इस साज़िश में नौनिहाल सिंह के शामिल होने के कोई संकेत तो नहीं मिलते लेकिन उसने भी अपने पिता के प्रति कोई विशेष स्नेह या आदर नहीं दिखाया। जब खड़क सिंह जीवित और शय्या पर पड़ा था तो वह हर दिन अपने बेटे को देखने की भीख मांगता था। लेकिन होनिगबर्गर के लिखे संस्करण में यह साफ है कि नौनिहाल सिंह अपने पिता के पास बहुत कम अवसरों पर गया। खड़क सिंह की मौत 5 नवंबर 1840 को हुई और उसकी मौत को लोगों ने उस पर कुदरत का रहम माना। महाराजा की मौत के आधिकारिक एलान मंे बताया गया कि एक रहस्मय बीमारी से महाराजा की अचानक मृत्यु हो गई। इस एलान में महाराजा की महीनों से चल रही बीमारी का कोई ज़िक्र नहीं किया गया।



होनिगबर्गर के मुताबिक शायद किसी को महाराजा की मौत का न तो कोई दुख था, न ही कोई दिक्कत। लोगों ने उनकी मौत के कारण और उसके एलान पर सवाल उठाने की ज़हमत भी नहीं की। एक बार फिर से होनिगबर्गर पंजाब के शाही अंतिम संस्कार को इतनी जल्दी देख रहा था। उसका विवरण वह कुछ इस तरह लिखता है: ‘महाराजा के साथ उनकी तीन पत्नियां सती हो गईं। मैं एक बार फिर से यह भयावह दृश्य का साक्षी बना। यह भयावह ज़रूर था लेकिन इसकी तड़क-भड़क और धूमधाम में कोई कमी नहीं थी।’ उनके साथ उनकी ग्यारह दासियां भी सती हुईं लेकिन शायद यह विदेशी चिकित्सक सती के खौफनाक मंज़र का इस कदर आदी हो गया था कि वह उनके बारे में लिखना ही भूल गया।


खड़क सिंह ने जिस तरह अपने पिता को मुखाग्नि दी थी, नौनिहाल सिंह ने उस परंपरा का निर्वाह किया लेकिन खड़क सिंह से ठीक उलट, ऐसा करते समय नौनिहाल एक राजा की तरह व्यवहार कर रहा था। अपने पिता की रहस्यमय बीमारी के दौरान ही दरबारियों में लोकप्रिय हो चुका नौनिहाल सिंह नैसर्गिक नायक के तौर पर दरबार और जनता के बीच स्थापित हो चुका था। उसकी उम्र भले ही 18 वर्ष रही हो लेकिन उसकी परिपक्वता उसकी उम्र से कहीं आगे थी। और जो लोग अपने राजा में नायक और नेतृत्व तलाशते हैं उनके पैमान पर भी नौनिहाल सिंह कोहिनूर के असली हकदार के तौर पर खरा उतरा था।


पिता की चिता की राख ठंडी होने के बाद एक महाराजा अपने सभी दरबारियों को लेकर, जिनमें होनिगबर्गर शामिल था, रावी नदी के तट पर, ‘अस्थियां प्रवाहित करने पहुंचा जो पंबा की रवायत थी। इस बीच सबसे नज़रें बचाकर होनिगबर्गर वहां से निकल गया। उसने पंजाब की काफी ‘भयावह’ प्रथाएं देख ली थीं और अब उसके मरीज़ों को उसकी ज़रूरत थी। घर पहुंचकर उसने मरीज़ों को देखना शरू ही किया था कि महल से एक बेहद बौखलाया हुआ हरकारा उसके पास आया। नौनिहाल सिंह और उसके साथी रावी नदी से हजूरी बाग से होकर वापस लौट रहे थे, जिसे 1818 में रणजीत सिंह ने कोहिनूर हासिल करने की खुशी मेें बनवाया था। जब शाही काफिला हजूरी बाग के द्वार के नीचे से गुज़र रहा था, तो एक मेहराब से एक बड़ा सा पत्थर रहस्यमय तरीके से उनके ऊपर गिर पड़ा। पत्थर नौनिहाल और उसके दो साथियों पर गिरा, जिनमें से एक की तो मौके पर ही मौत हो गई। किस्मत से नौनिहाल को ज़्यादा चोट नहीं लगी और ब्योरे के मुताबिक वे पैदल वहां से चल कर गए। होनिगबर्गर अपनी दवाओं का बक्सा और मलहम लेकर आनन फानन में महल पहुंचा। उसे उम्मीद थी कि वह हल्की-फुल्की चोट खाए लेकिन सदमें में आए एक युवा महाराजा से मिलेगा। लेकिन उसका स्वागत दरबारियों के पीले पड़े चेहरों ने किया। वज़ीर राजा ध्यान सिंह ने होनिगबर्गर को अपने पीछे आने का इशारा किया:
एक मंत्री मुझे एक तंबू में ले गया। मंत्री ने मुझे निर्देश दिया कि मैं इस बारे में किसी को कुछ ना बताऊं। शिविर में नौनिहाल सिंह अपने पलंग पर थे। उनका सिर बुरी तरह कुचला हुआ था और उनकी हालत ऐसी थी कि अब उनके बचने की उम्मीद ही नहीं थी। इस विचार के साथ मैं शिविर से बाहर निकला और मंत्री से फुसफुसाकर कहा, ‘दबाएं अब इस अभागे राजकुमार का कोई भला नहीं कर सकतीं।’

नौनिहाल के साथ हुई इस ‘दुर्घटना’ के हालात पूरी तरह से अस्पष्ट थे और चश्मदीदों के बयान भी एक दूसरे से मेल नहीं खा रहे थे। वज़ीर का अपना भतीजा पत्थर के गिरने से घटनास्थल पर ही मारा गया था। और ब्योरे से उलट, ध्यान सिंह ने शपथ लेकर कहा कि नौनिहाल को हजूरी बाग में उनके भतीजे के समान ही चोट लगी थी। वहीं रणजीत सिंह की सेना में तोपची कर्नल एलेक्जैं़डर गार्डनर ने कुछ और ही कहानी सुनाई। जब ढांचा गिरा था तो गार्डनर युवराज के ठीक पीछे थे और उनके अपने आदमियों ने स्ट्रेचर पर ढो कर घायल नौनिहाल को महल तक पहुंचाया था। जैसा कि गार्डनर ने बताया, युवराज अपने पैरों पर चल कर जाने के लायक होशोहवास में थे और पानी मांग रहे थे। सिर्फ गार्डनर के आग्रह पर ही उन्हें स्ट्रेचर पर रख कर उनके बिस्तर तक पहुंचाया गया।


वहीं महज़ कुछ मिनटों बार होनिगबर्गर ने जिस युवराज को देखा वह न चलने के काबिल था और न ही बोल पा रहा था। नौनिहाल की खोपड़ी चकनाचूर हो गई थी और उसके बिस्तर की चादर उसके खून और भेजे के हिस्सों से सनी हुई थी। उसके जख्म इतने गंभीर थे कि वह कुछ घंटों बाद ही मर गया, हालांकि इस खबर को जनता से तीन दिनों तक छिपाकर रखा गया। नौनिहाल की चिता के लिए चंदन की लकड़ियां भी गोपनीय ढंढ से इकट्ठा की गईं और दिशाहीन पंजाब के आतंक की आगोश में समाने से पहले दरबार में खाली पड़ी गद्दी को भरने का खेल शुरू हो गया था। दरबारी मंत्री गद्दी पर अपना अपना दावा पेश कर रहे थे।


तीन दिन बाद जब इस ‘अनोखी दुर्घटना’ की खबर जनता को दी गई तो गार्डनर ने यह खबर देते हुए अटकलों को और हवा दी कि जिन पांच तोपचियों ने नौनिहाल को स्ट्रेचर पर ढोकर उसके पलंग तक पहुंचाया था, उनमें से रहस्मय ढंग से दो की मृत्यु हो गई, दो छुट्टी मांग कर गए और कभी नहीं लौटे और एक अजीबोगरीब ढंग से लापता हो गया। जब पंताब एक बार फिर से खुद को एक शाही अंतिम संस्कार के लिए तैयार कर रहा था-दो साल में तीसरी बार-तो ऐसे मंे कोहिनूर पर शक जाना स्वाभाविक था। क्या यह कोहिनूर का शाप था जो एक एक कर रणजीत हसंह के उत्तराधिकारियों को निगल रहा था?


9 नवंबर 1840 को नौनिहाल का अंतिम संस्कार हो रहा था तो उसकी किशाोर उम्र की दो पत्नियां उसके साथ सती होने के लिए उसकी चिता तक पहुंची। उसकी सबसे बड़ी पत्नी गर्भवती थी, इसलिए उसे सती नहीं होने दिया गया वहीं एक बेहद छोटी रानी को नौनिहाल के चाचा शेर सिंह ने सती होने से बचा लिया। होनिगबर्गर इस घटना को इस तरह दर्ज करता है: ‘दो बेहद खूबसूरत लड़कियां उसके साथ (नौनिहाल) लपटों की शिकार हो गईं। 12 साल की एक लड़की को बचा लिया गया… इसलिए कि उसकी उम्र बहुत कम थी और वह सती समारोह के लिए परिपक्व नहीं थी।’

 

इस बच्ची को बचाने वाले शेर सिंह खड़क सिंह के भाई थे। कद में नाटे, काली दाढ़ी, पैनी निगाहों और ओजस्वी दिखने वाले शेर सिंह ने अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए इस बच्ची को चिता की आग से बचा लिया था पर कोहिनूर और सिंहासन पर दावा जताना उनके अधिकार में नहीं था। अब वे अपने भतीजे नौनिहाल को चिता में जलते देख कर दुखी तो थे पर एक बच्ची को बचाने का आत्मसंतोष ज़रूर उनमें रहा होगा।


बालक राजा

शेर सिंह रणजीत सिंह के दूसरे सबसे बड़े बेटे थे, जो खड़क सिंह से पांच साल छोटे थे। 1807 में पैदा हुए शेर सिंह जुड़वां हुए थे। दोनों बेटों में शेर सिंह 5 मिनट बड़े थे जबकि उनके जुड़वां भाई तारा छोटे। पर इन दोनों भाइयों और सिंहासन के बीच एक खाई थी। उनकी मां, महारानी मेहताब कौर, जिनकी सगाई रणजीत सिंह के साथ तब हो गई थी जब वह चार साल की थीं और महाराजा छह साल के थे। उनका नमा मेहताब इसलिए रखा गया था क्योंकि इसका मतलब चांदनी होता है और रानी के गोरे और बेदाग चेहरे और काया से यह नाम पूरी तरह न्याय करता था। उनके अप्रतिम सौंदर्य के सामने महाराजा कहीं नहीं ठहरते थे। महाराजा बेहद दुबले और कुरुप थे जिन्हें चेचक ने दागदार बना दिया था और उनकी एक आंख छीन ली थी। बहरहाल उनका विवाह 1796 में हुआ।


शादी सफल नहीं हो सकी। अमीर घराने में पैदा हुई मेहताब कौर एक स्वाभिमानी महिला थीं, उन्हें यह बिलकुल गवारा नहीं था कि महाराज रणजीत सिंह पूरे पंजाब के एक छत्र राजा बनने की ललक में शादी के एक दशक तक सिर्फ युद्ध करते रहें। दरअसल महाराज के पास उन पर ध्यान देने का ज़रा भी वक्त नहीं था। उन्होंने युद्ध में जीतने के बाद अपने हरम में बहुत सी सुंदरियों को जगह दे दी थी। यह मेहताब को बर्दाश्त नहीं हो सकता और वह राजधानी से 65 मील उत्तर पूर्व में स्थित अपनी मां के घर बटाला रियासत लौट गईं। भले ही रणजीत सिंह मेहताब के घर यानी अपने ससुराल जाते रहे पर वास्तविकता यह थी कि दोनों के बीच रिश्ता सिर्फ नाम का ही बचा था। इसके बाद के कुछ सालों में महाराजा रणजीत सिंह ने बहुत सी महिलाओं से शादी की और बहुत सी दूसरी खूबसूरत महिलाओं को अपने हरम में रखा। जब महाराजा की दूसरी पत्नी दतर कौर ने खड़क सिंह को जन्म दिया तो मेहताब की मां ने उन्हें महाराजा के साथ संबंध सुधारने की सलाह दी। दरअसल खड़क सिंह के जन्म ने राजशाही में मेहताब की स्थिति कमज़ोर कर दी थी और यह न तो मेहताब के लिए मुफीद थी न ही उनके परिवार के लिए। महराजा के रहमोकरम पर पल रहे उनके परिवार के लिए तो यह बिलकुल अनुकूल नहीं था।


संबंध सुधारने के अच्छे परिणाम अपने भी लगे थे क्योंकि 1803 में मेहताब ने एक बच्चे इशर सिंह को जन्म दिया था पर उसकी एक साल का होते ही मौत हो गई। इस सदमे से वह उबर भी नहीं पाई थी कि उसकी मां ने उसे फिर से महाराजा को लुभाने के लिए कहा। इस बार महाराजा का ध्यान आकर्षित करना आसान नहीं था क्योंकि अब महाराजा एक मुस्लिम तवायफ मौरन के इश्क़ में अंधे हो चले थे। सिर्फ मेहताब ही नहीं मौरन के आगे महाराजा को पूरा हरम फीका लगने लगा था। अब सारा प्यार महाराजा उसे पर लुटाते थे। बावजूद इसके तीन साल बाद मेहताब ने महाराजा को फिर से हासिल कर लिया और जल्दी ही जुड़वां बच्चों शेर सिंह और तारा को जन्म दिया।

इस दोहरी खुशी की उम्र ज़्यादा लंबी नहीं थी। बटाला में चल रहे जश्न थमने लगे थे। बच्चों की पहली किलकारियों के साथ एक भयावह अफवाह ने भी जन्म ले लिया था। यह आरोप लगाए गए कि मेहताब ने लड़की को जन्म दिया था पर क्योंकि लड़कियां सिंहासन की उत्तराधिकारी नहीं हो सकतीं, इसलिए उन्होंने अपनी बेटी को किसी को दे दिया था और बदले में वे एक बुनकर और एक बढ़ई के दो बच्चे ले आई थीं। रानी पर अपनी बेटी बदलकर आम जनता के दो बेटे लेने का आरोप सही हो या गलत पर रणजीत सिंह ने इन दोनों को अपना कानूनी उत्तराधिकारी मानने से इन्कार कर दिया था। यह बात और थी कि रणजीत सिंह ने उन दोनों लड़कों को बेदखल नहीं किया था और उनका पालन-पोषण राजकुमारों की तरह महल में ही हुआ। पर सार्वजनिक तौर पर इन दोनों को उत्तराधिकारी न मानने से यह तय हो गया था कि तारा और शेर सिंह दोनों कभी भी राजा नहीं बन सकते थे। पिता की चुप्पी ही उनकी नियति बन गई थी। इसी के सहारे उन्होंने बचपन काटा और बाद में ताकतवर और समृद्ध भी बने, लेकिन शर्मिंदगी ने उनका पीछा नहीं छोड़ा।

यह हिस्सा लेखक द्वय की किताब ‘कोहिनूर’ (जगरनाट प्रकाशन) से उद्धृत है. 


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दिल्ली सरकार के खिलाफ आगे आये रंगकर्मी: मनीष सिसोदिया सवालों से बचते नजर आये



रंगकर्मियों के प्रदर्शन कभी-कभी के ही दृश्य होते हैं. रंगकर्म की अस्मिता और उसकी स्वायत्तता बचाये रखने के लिए रंगकर्मियों के एक समूह ने राजधानी के मंडी हाउस स्थित श्रीराम सेंटर के सामने आज (4दिसम्बर)  उस वक्त प्रदर्शन किया जब दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया साहित्य कला परिषद के युवा महोत्सव  का उदघाटन करने वहाँ पहुंचे. शांतिपूर्ण तरीके से हाथों में तख्तियां लिये रंगकर्मी श्रीराम सेंटर के गेट के पास खड़े थे लेकिन लोकतंत्र की कथित अगुआई करने वाली, उसकी बात करने वाली पार्टी के नम्बर दो मनीष सिदोदिया उन्हें नजरअंदाज कर आगे बढ़ते गये. यहाँ तक कि मीडियाकर्मियों ने जब उनसे इस बावत बात करनी चाही तो उन्होंने सिरे से मना कर दिया.



रंगकर्मियों का दिल्ली सरकार पर आरोप है कि वह मनमाने तरीके से रंगकर्म को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है. उनके अनुसार दिल्ली सरकार के साहित्य कला परिषद के युवा महोत्सव में अपनी दलगत राजनीति को बढ़ावा देने के लिए विषय नियंत्रित किये गये.

नाट्य निदेशक ईश्वर शून्य ने कहा कि ‘ इस तरह यह कोशिश रंगकर्म को अपने प्रचार तन्त्र में बदल देने की है, जो आने वाली सरकारों में और भी असर डालेगी .’  उन्होंने कहा कि देश भर के रंगकर्मियों की इस पर आपत्ति के बावजूद सरकार अपने निर्णय पर अडिग है.



दिल्ली सरकार के इस पहल को रंगकर्म के लोकतंत्र पर सीधा हमला बताते हुए समकालीन रंगमंच के संपादक राजेश चन्द्र ने कहा कि ‘ सरकार रंगकर्मियों को पर्याप्त मंचन सुविधा उपलब्ध कराने जैसे अपनी मुख्य भूमिका की जगह उसे अपने नियंत्रित माध्यम में बदलना चाहती है. उसे विभिन्न माध्यमों से बताया गया है कि सस्ती दर पर सरकार से जमीन लेकर श्रीराम सेंटर जैसे सभी थिएटर रंगकर्मियों से खूब पैसे वसूल करते हैं.’ गौरतलब है कि दिल्ली की मंहगी जगह में बना श्रीराम सेंटर एक रूपये के टोकन अमाउंट के बदले दी गयी जमीन पर बना है.

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आदिवासी बच्चों के स्कूल बंद कर रही सरकार और लूट लिये आदिवासी मद के पैसे

महाराष्ट्र में आदिवासी मद के पैसों  के  बड़े बंदरबाँट  का मामला सामने आया है. संघ प्रायोजित स्कूलों  और निजी स्कूलों के हित में सरकारी आदिवासी स्कूल बंद करने के आरोप स्थानीय आदिवासी समाज के लोग भाजपा सरकार पर लगा रहे हैं. पढ़ें पूरी रपट. मनीषा के साथ नितिन राउत और अशोक काम्बले. 

इन्डियन एक्सप्रेस से साभार

बच्चों की पढाई धीरे-धीरे सरकारों की प्राथमिकता सूची से गायब होती जा रही हैं और बच्चा यदि गरीब परिवार से, दलित या आदिवासी हो तब तो उसे और भी उदासीनताओं का सामना करना पड़ता है. शिक्षा अब सरकारों के सरोकार से ज्यादा पूंजी उगाहने का निजी तन्त्र बन चुका है और पैसा उगाहने के तंत्र को सत्ता में बैठे लोग अपने निर्णयों से बढ़ावा दे रहे हैं. हालांकि देश की राजधानी के स्कूलों से अच्छी खबरें आ रही हैं,  सरकार द्वारा नियंत्रित और संचालित स्कूल निजी स्कूलों को मात दे रहे हैं और इसका वाजिब श्रेय आम आदमी पार्टी की सरकार को जाता है. लेकिन देश के दूसरे हिस्सों में, जहां से विकास का ज्यादा शोर-शराबा है ख़बरें बेहद निराशाजनक और बुरी हैं.

फोटो अशोक कांबले

करोड़ो के बारे-न्यारे और फिर स्कूल पर ताला
शानदार भवन किसी कॉलेज का नहीं है, बल्कि बच्चों के स्कूल का बना नया भवन है, जिसे बनते ही ताला डाल दिया गया और स्कूल किसी दूसरे स्कूल में मर्ज कर दिया गया. हाँ, महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके में यह सरकार द्वारा संचालित ‘आदिवासीशाला’ का भवन है, जिसके निर्माण में करोड़ो खर्च हो गये, ठेकेदार को अपना हिस्सा मिला और दूसरों को अपना. फिर फरमान आया कि यह आश्रामशाला शिफ्ट किया जा रहा है. यह भवन वर्धा जिले के नवरगाँव का है. जिले के ही सिंडीविहरी सहित जिले और विदर्भ (हमारे पास अमरावती प्रकोष्ठ की सूची है) के दो दर्जन  से अधिक स्कूल बंद किये जा रहे या किसी दूसरे स्कूल में शिफ्ट किये जा रहे हैं. वहीं महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों में यह संख्या 50 से भी ऊपर है.

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शासकीय आदेश

लोगों में आक्रोश
इन स्कूलों के शिफ्ट किये जाने पर स्थानीय जनता में भारी आक्रोश है. आदिवासी अभिभावक सवाल कर रहे हैं कि आखिर हमारे बच्चे कहाँ जायेंगे, वहीं वे दूसरा सवाल भी सरकार से दाग रहे कि जब इन स्कूलों को शिफ्ट ही करना था तो फिर इनके भवन निर्माण में आदिवासी विकास के पैसे खर्च क्यों और किसके इशारे पर किये गये. आदिवासी नेता अवचित सयाम कहते हैं कि ऐसे दर्जनों स्कूल के भवन बनाये गये और उन्हें या तो बंद कर दिया गया है या एक दूसरे में समायोजित किया जा रहा है. उनके अनुसार आदिवासी मद के पैसों का बंदरबांट करने के लिए अफसरों-नेताओं और ठेकेदारों की मिलीभगत से इन स्कूलों के भवन बने और बनते ही यहाँ पढाई बंद कर दी गयी.

स्कूलों की सूची

अफसरों के बहाने 
आश्रमशालाओं के संचालन का  जिम्मेवार विभाग के अफसर इस मसले पर कई तर्क देते हैं. वे कहते हैं कि स्कूल बन गये तो कई स्कूलों के इलाके अभयारण्य में घोषित हो गये, इसलिए उन्हें शिफ्ट करना पड़ा तो कई स्कूल इसलिए एक समायोजित हो रहे हैं कि वहां बच्च्चे पढने नहीं आते. इन शालाओं के प्रशासन के सबसे बड़े अधिकारी महाराष्ट्र के आदिवासी कमिश्नर आर जे कुलकर्णी से जब इस बावत बात की गयी तो उन्होंने मामले को अमरावती जोन में असिस्टेंट ट्राइवल कमिश्नर की तरफ बढ़ा दिया, यानी उनसे बात करने की सलाह दे दी. हालांकि आदिवासी अभिभावक प्रतिप्रश्न पूछते हैं कि ‘क्या इलाकों का अभ्यारण्य घोषित होना कोई अचानक से लिया गया निर्णय है?’  वे कहते हैं कि विभागों में सम्बंधित फाइलें जब घूम रही होंगी तो सारे अफसर इस बात से अवगत थे लेकिन उन्हें आदिवासी मद का पैसा मिलजुलकर खाना था इसलिए उन्होंने बंद होने वाले स्कूलों के भवन बनवाये.

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निजी और संघ संचालित आश्रामशालायें
जहां  सरकार का दायित्व है कि अपने स्कूलों में वह बच्चों को आकर्षित करे, उन्हें पढने के लिए प्रेरित करे वहीं वह स्कूलों को समायोजित करने के निर्णय ले रही है. राज्य की भाजपा सरकार का कहर इन स्कूलों पर निजी स्कूलों और संघ संचालित स्कूलों में आदिवासी बच्चों को जाने के लिए प्रेरित करने का षड्यंत्र है. विदर्भ में कुल सरकारी आश्रम स्कूल (आदिवासी बच्चों के लिए ) 502 हैं और अनुदानित स्कूल 543, जो निजी हाथों में हैं या संघ के लोगों के नियन्त्रण में.

आदिवासी नेता सयाम  कहते हैं ‘ संघ हमारे बच्चों को उनकी संस्कृति से दूर कर हिन्दू संस्कृति में ढालता है, उनके कच्चे मानस पर शबरी और निषादराज का त्याग समर्पण आदि के आदर्श भरे जाते हैं ताकि वह कथित रामराज्य के लिए मरे. वे पूछते हैं कि वे ‘एकलव्य का उत्पीडन क्यों नहीं पढ़ाते? संघ ‘एकल विद्यालय’  ‘वन बंधु परिषद’ आदि नामों से कई स्कूल आदिवासी इलाकों में चलाता है. धरनी में एक छात्रावास हेडगेवार के नाम से है, इस नाम से कई स्कूल संचालित हो रहे हैं. स्थानीय इलाकों में घूमने पर बजरंग दल की सक्रियता के कई प्रमाण मिलते हैं. एक आदिवासी कार्यकर्ता ने बताया कि भाजपा नेता नितिन गडकरी ने नागपुर में अपने जन्मदिन पर संघ के वैसे कार्यकर्ताओं के बीच पैसे बांटे जो इन इलाकों में स्कूल संचालित करते हैं और उनसे और भी स्कूल खोलने का आग्रह भी किया.

दो-दो बच्चों की ह्त्या फिर भी भाजपा की महिला नेता और स्कूल प्रबंधक को बचा रही मोदी-खट्टर सरकार

साभार google

महाराष्ट्र में और भी स्कूल किये जा रहे बंद या समायोजित 

किसान नेता अविनाश काकड़े ने बताया कि आदिवासी इलाकों के अलावा भी कई स्कूल बंद किये जा रहे हैं. सैकड़ो स्कूल पूरे महाराष्ट्र में या तो बच्चों की कमी के नाम पर बंद किये जा रहे हैं या समायोजित. वे कहते हैं इन सरकारी स्कूलों में गरीब परिवारों के बच्चे  किसानों के, दलितों के आदिवासियों के बच्चे पढ़ते हैं. स्कूल के इलाकों के बच्चों को पर्याप्त व्यवस्था न देकर स्कूल बंद करना सबके लिए शिक्षा की नीति पर प्रहार करता है.

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वेश्यावृत्ति का समुदायिकरण और उसका परंपरा बनना

राहुल 

सेक्स वर्क (sex work) विशेषकर वेश्यावृत्ति (prostitution) समाज के यौनिक संगठन में ‘यौनिक आनंद’ की एक विशेषीकृत संस्था के बतौर मौजूद रहा है। वेश्यावृत्ति का कोई देशजता तलाशना काफी समस्यामूलक है, परंतु ऐतिहासिकता में गैर औद्योगिक वेश्यावृत्ति और औद्योगिक वेश्यावृत्ति के फर्क को समझना आवश्यक जान पड़ता है। वेश्यावृत्ति अपने सामाजिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक संदर्भ को स्वयं प्रदर्शित करता है। जाहिर है ऐसे में वेश्यावृत्ति का कोई सार्वभौमिक स्वरूप नहीं बनेगा, पर इसकी उपस्थिति सार्वभौमिक रहेगी। राजनैतिक आर्थिक संदर्भ में इसका स्वरूप लगातार बदलते रहे हैं। वेश्यावृत्ति में समाज की सत्ता संरचना (जेंडर, वर्ग और जाति) की घुसपैठ बनी रहती है और जिसके केंद्र में हमेशा स्त्री की यौनिकता है।


नारीवादी आंदोलन के दूसरी लहर यौनिक मौन (sexual silence) को तोड़ती हैं, जहां ‘वेश्यावृत्ति’ जैसे शब्दावली को सेक्स वर्क (sex work) के विमर्श  द्वारा उभारा जाता है, तभी यह क्षेत्र यानी वेश्यावृत्ति (प्रतिरोध एवं शोषण) मजबूत गठजोड़ के साथ में समस्याग्रस्त होता है। वेश्यावृत्ति के विविध आयाम के इतिहास, भूगोल को जानने और व्याख्यायित करने की प्रक्रिया यौनिक अर्थ व्यवस्था और यौनिकता के विमर्श को और प्रगाढ़ करती है। बावजूद इसके दक्षिण एशिया एवं अफ्रीकी समाजों में सामुदायिक वेश्यावृत्ति और औद्योगिक वेश्यावृत्ति जो कि परिवार के सहयोग और उसके समर्थन पर टिकी है, और वह परंपरा  और आधुनिकता के बीच रिश्ता बनाती है। दरअसल इस तरह के समुदायों को एक सेक्सुअल वजूद के साथ देखा जाता है और उपनिवेशवाद की प्रक्रिया, नीति, नियम और कारण के जरिए कई बंधन लगा देता है। जाहिर है ऐसे में यह पूरा का पूरा समुदाय ही यौनिक अपराधी के रूप में मुख्य धारा के सामने प्रस्तुत होता है।



अंग्रेजों ने कुछ ऐसी जातियों को प्रतिबन्ध के लिए चिन्हित किया जो खानाबदोश थे, घुमक्कड़ थे। जिनके जीवन में बंजारापन था। और यह बंजारापन उन्होंने उन्मुक्त जीवन के लिए तय नहीं किया था बल्कि यह उनकी मजबूरी थी। संपत्ति के नाम पर इनके पास कुछ पशु (एक दो भैंस) और कुछ बर्तन रहता था। नाचना-गाना और करतब दिखाना पेशा था जिससे इनका जीवन निर्वाह होता था। औपनिवेशिक काल में राज्य सत्ता (विक्टोरियन नैतिकता का  चोला ओढ़े ) का मनना था कि इन खानाबदोश जातियों से समाज में नैतिकता का पतन हो रहा है और इनके वजह से समाज में यौन संबन्धों में खुलापन आ रहा है।  इन खानाबदोश जातियों के पुरुषों को ठगी  के तहत जेलों में बंद कर दिया गया, और महिलाओं को एक जगह रहने के लिए बाध्य कर दिया गया।  1871 में ‘अपराधिक जनजाति अधिनियम’ ने इन खानाबदोश जातियों को अपराधिक घोषित कर दिया गया। और इनका जीवन दूभर होता चला गया।  पितृसत्तात्मक सामंती समाज में इस तरह की खानाबदोश समुदायों ने जीवन –निर्वाह के लिए  परिस्थितियों से समझौता किया और वह पारिस्थितिक समझौता धीरे-धीरे परंपरा में तब्दील होता चला गया जो आज एक सामाजिक बुराई बन गयी है। भारत में भी ऐसी कई जातियां व समुदाय हैं जिन्होंने पूरी तरह से सामुदायिक वेश्यावृत्ति को अपना लिया है और साथ ही इसे परंपरा का नाम दे दिया है। इस संदर्भ में नट, कंजर, सौंसिया, बेड़िया, बाछड़ा आदि जातियों/ समुदायों को देखा जा सकता है। इस आलेख में बेड़िया समुदाय को केंद्र में रखकर बात की गई है।


बेड़िया समुदाय के बारे में कोई लिखित जानकारी नहीं मिलती और न ही मौखिक इतिहास में इसके बारे में कोई विशेष जानकारी है। बेड़िया समुदाय की उत्पत्ति के बारे में दो कथाएं प्रचलित है। पहली कथा के अनुसार आज से लगभग 300 वर्ष पूर्व राजस्थान के भरतपुर में दो भाई रहते थे। एक का नाम था सैंसमुल और दूसरे का नाम था मुल्लानुर। सैंसमुल के वंशज सांसी (सांसिया) और मुल्लानुर के वंशज बेड़िया या कोल्लासी कहलाए। इनके यहां यौन संबंधों को लेकर खुलापन था या कहें की स्वच्छंद यौनाचार की प्रथा थी। इस समुदाय की सभी स्त्रियां सभी पुरूषों के साथ यौन संबंध बना सकती थी।


 डॉ. शरद सिंह अपनी पुस्तक ‘पिछले पन्ने की औरतें’ में लिखती हैं कि ‘‘इनके दल में स्त्री-पुरूष के बीच विवाह की बाध्यता नहीं रहती थी। कोई भी स्त्री आज एक पुरूष के साथ यौन संबंध बनाती थी तो कल दूसरे और परसो तीसरे के साथ। इसी प्रकार पुरूष भी किसी एक स्त्री के साथ संसर्ग में विश्वास नहीं रखते थे। ये लोग धार्मिक मामलो में भी निर्बंध थे। बेड़िया हिंदू अथवा मुसलमान कुछ भी हो सकते थे।” बेड़िया समुदाय की तरह ही भारत में बाछड़ा, नट, कंजर, संसिया, बोदिया, लोहरगढ़िया आदि समुदाय व जातियां हैं। इन जातियों ने भी नृत्य-संगीत के पेशे से होते हुए वेश्यावृत्ति तक का सफर तय किया है। इन जातियों व समुदायों के यहां भी यौनाचार पर बहुत कड़ा पहरा नहीं है बल्कि स्वछंद यौनाचार है। वैसे भी यौनिकता का सवाल संपत्ति के सवाल से जुड़ा हुआ है। भारत में ऐसे कई समुदाय या जातियां रही हैं जिनमें स्वछंद या मुक्त यौनाचार की व्यवस्था सहजता से रही है। बेड़िया, बाछड़ा, सांसी, कंजर आदि इसके उदाहरण हैं। कंजरों के बारे में ‘भगवान दास मोरवाल’ अपने उपन्यास ‘रेत’ में लिखते हैं ‘कंजर का अर्थ होता है कानन (जंगल) में विचरण करने वाला।’ इससे यह पता चलता है कि कंजर जंगल में रहने वाले नहीं हैं, बल्कि वे केवल विचरण करने वाले होते हैं या विचरण करते हैं।  लेकिन सवाल यह उठता है कि कोई भी जाति या समुदाय जंगलों में विचरण क्यों करेगी? इसका एक ही कारण हो सकता है कि वह किसी के डर से जंगल में छुपने के लिए ऐसा कर रही हो, ताकि वह अपने शत्रु से बच सके। कंजर अपने आप को राजपूत मानते हैं। इनके यहां भी युद्ध और राजपूत सेना में होने का जिक्र मिलता है। ऐसा जान पड़ता है कि युद्ध में पराजित हो जाने पर जो कुछ लोग बच गए थे उन्होंने जंगलो में शरण लिया। जंगल यानी कानन में शरण लेने की वजह से ही ये कंजर कहलायें। बाद में यह समुदाय भी जीविका के लिए वाया नाच-गाने से होता हुआ वेश्यावृत्ति तक पहुंचा। कंजरों के अलावा बाछड़ा, नट व सांसी जातियों का जीवन मूल्य व संस्कृति आपस में काफी मिलता-जुलता है।


यह पूर्णतया सत्य है कि सामुदायिक वेश्यावृत्ति करने वाली जातियां पूरी तरह से घुमक्कड़ एवं खानाबदोश रही हैं। अंग्रेज अधिकारी आर।बी। रसेल ने बेड़ियों के बारे में सन 1916 ई में टिप्पणी करते हुआ लिखा था कि ‘जिप्सियों की भांति पीढ़ी-दर-पीढ़ी खानाबदोश एवं जन्मजात घुमक्कड़ समूहों को बेड़िया कहा जाता है।



पद्मावत में मलिक मुहम्मद जायसी लिखते हैं ‘जानि गति बेड़िन दिखराई, बांह डुलाय जीऊ लेइ जाई’  यानी अपने नाचने की कला से बेड़नी दिल ले जाती है। यदि हम जायसी के रचना काल की बात करें तो वह 1570 के आस-पास ठहरता है। इससें पता चलता है कि बेड़िया समुदाय की मौजूदगी पूर्व से थी। ये नाचने-गाने के काम में पहले से संलग्न थे। यदि इन सब चीजों को आधार मान लिया जाय तो यह तय हो जाता है कि ये राजपूतों से ही निकला हुआ एक समुदाय है जो युद्ध और जिंदगी से जूझते हुए वाया नाचने-गाने से वेश्यावृत्ति का रास्ता तय करता है जो कि ये खुद भी मानते हैं।


किसी भी समुदाय या समाज का जीवन आय के स्रोत्रों पर ही निर्भर होता है। आय के स्रोत जीवन-निर्वाह को प्रभावित करते हैं। जीवन-निर्वाह स्वास्थ्य के साथ-साथ पुनरूत्पादन को भी प्रभावित करता है। जीवन-यापन केवल आय के स्रोत पर ही निर्भर नहीं होता, बल्कि भौगोलिक स्थितियां व जीवन के अन्य पहलू व युद्ध की विभीषिका व सांस्कृतिक आयाम भी जीवन-यापन को तय करते हैं। बेड़िया समुदाय ने भी विभिन्न परिस्थितियों से संघर्ष के बाद ही इसे पेशे के रूप में शुरू किया और बाद में यह परंपरा बन गई।

वर्तमान समय में बेड़िया समुदाय का जीवन-निर्वाह पूरी तरह से स्त्रियों पर टिका हुआ है। इस समुदाय की आमदनी का स्रोत राई नृत्य है। राई नृत्य के साथ ही साथ ये स्त्रियां वेश्यावृत्ति भी करती हैं या कहें कि इन्हें ऐसा करने के लिए विवश किया जाता है। औपनिवेशिक काल में बेड़िया समुदाय के पुरूष चोरी और राहजनी पर निर्भर थे लेकिन अंग्रेजी हुकूमत के सख्ती के बाद इनको इससे पीछे हटना पड़ा और ये पूरी तरह से अपनी स्त्रियों की कमाई पर आश्रित होते चले गए। स्त्रियां जो कि अभी तक नाचने-गाने तक ही सीमित थी लेकिन अत्यधिक दबाव होने व पुरूषों की स्वीकार्यता के कारण वेश्यावृत्ति को चुना। ‘समाज में जारज कही जाने वाली संतानों से विकसित बेड़िया समुदाय के पुरूषों ने मेहनत-मजदूरी से बड़ी जल्दी नाता तोड़ लिया था। उन्हें औरतों के द्वारा कमाकर लाये जाने वाले धन के उपयोग की आदत पड़ चुकी थी।’ सामाजिक बदलाव का ताना-बाना गणितीय फार्मूले पर निर्भर नहीं करता। यह राजकीय प्रयासों पर भी उतना निर्भर नहीं होता जितना की विकास के नारे लगाए जाते हैं। सामाजिक बदलाव की कड़ी विकास से जुड़ती तो जरूर है, लेकिन यह पूरी तरह से इस पर लागू नहीं होती। सामाजिक बुराईयों को दूर करने के लिए सबसे जरूरी चीज है कि बुराई जिस समाज या समुदाय में व्याप्त हो उसको पता होना चाहिए की यह एक बुराई है तभी वह इसे दूर करने का प्रयास करेगा। अंबेडकर के शब्दो में ‘‘जिस दिन गुलामों को यह पता लग जाए कि वे गुलाम है और उनका शोषण किया जा रहा है वे उसी दिन आजाद हो जाएगें।’’ यही बात सामाजिक बुराईयों/ कुरीतियों पर भी लागू होती है।

बेड़िया समुदाय की सामाजिक स्थिति भूमंडलीकरण व विकास की गढ़ी गयी परिभाषा में दम तोड़ रही है। सामाजिक समरसता इनके लिए बेमानी है। वैसे भी समाजिक समरसता ‘अर्थगत’ होता है जो इनके पास नहीं है। बेड़िया समुदाय आर्थिक रूप से मजबूत नहीं है। बेड़िया समुदाय का सामाजिक विकास अभी तक नहीं हो पाया है, लेकिन परिवर्तन जरूर हुआ है। यह परिवर्तन सामंती व्यवस्था के कुछ कमजोर पड़ने के कारण हुआ है, लेकिन अभी अधिकांश बेड़िया समुदाय जिन स्थानों पर रहते हैं वहां की सामाजिक संरचना में सामंती व्यवस्था दृढ़ता के साथ मौजूद है। राजस्थान, मध्य प्रदेश व बुंदेलखंड में बेड़िया समुदाय आज भी उसी दंश को झेल रहा है। इसके सामाजिक ताने-बाने में अभी भी बहुत ज्यादा फर्क नहीं आया है।

परंपरा के नाम पर जो परिस्थितियां पहले से तैयार की गई थी वहीं परिस्थितियां आज भी यथावत है। जीविका के साधन व रहने तक के लिए जमीन नहीं है। सरकारी योजनाएं इनकी पहुंच से बाहर है और यदि कुछ है भी तो, वह इतना कठिन है कि वे इसे करना नहीं चाहते। पूंजीवाद ने बेड़नियों को अपनी आर्थिक संपन्नता की शरण देने के बदले उन पर जो परिस्थितियां आरोपित की उसे कोई भी सामान्य स्त्री किसी भी मूल्य पर स्वीकार नहीं करेगी। बेड़िया समुदाय की स्त्रियों ने न केवल इसे स्वीकार किया बल्कि इसका मूल्य भी चुकाया, जो आज भी जारी है। पूंजीवाद के बारे में कहा जाता है कि इसने सबसे अधिक स्वतंत्रता स्त्रियों को दी है। स्त्रियों को इसने ड्योढ़ी से बाहर निकाला है और काम के अवसर मुहैया कराया है। पूंजीवाद का यह एक पक्ष है। अपने लाभ व पितृसत्ता के लिए इसने स्त्रियों को वस्तु बना दिया है।



पूंजीवादी, सामंतवादी, जातिवादी व्यवस्था व पितृसत्ता किसी भी ऐसी परंपरा का विरोध नहीं करती जिसमें उसका लाभ निहित हो। लाभ का यह सिद्धांत आज भी पंरपरा के नाम पर जीवित है। समय के साथ भले ही इसका स्वरूप बदल गया हो या बदल दिया जाय लेकिन उद्देश्य नहीं बदलता। सामाजिक बदलाव, आर्थिक विपन्नता एवं परंपरा की कड़िया आपस में जुड़ती है। बिना परंपरा के बदले सामाजिक संपन्नता नहीं आ सकती और बिना अर्थिक संपन्नता के सामाजिक बदलाव करना बेमानी है। बेड़िया समुदाय अभी भी पूरी तरह से अपने पारंपरिक वेश्यावृत्ति और राई नृत्य पर ही निर्भर है।


राई नृत्य ‘मशाल’ की रोशनी से बाहर निकलकर ‘हाईलोजन’ के दूधिया प्रकाश  में आ गई है, लेकिन सोहवतिया से लेकर गाने के बोल तक वहीं हैं और राई नृत्य का प्रयोजन भी। कैसी विचित्र बात है कि स्त्रियों की कला को स्त्री-देह से जोड़कर ही देखा जाता है। देवदासियों का भरतनाट्यम भी देह से ही जोड़कर देखा गया। भले ही इसे मंदिरों में देवताओं को खुश करने के लिए किया जाना वाला नृत्य का नाम देकर पर्दा डाला जाता रहा हो। इसकी शुरूआत भी कला के नाम पर नहीं बल्कि दैहिक शोषण के साथ हुई। भरतनाट्यम मंदिर से बाहर निकलकर संभ्रांत ब्राह्मणवादियों के हाथों में आया। इसे कला और व्यवसायिक बनाकर ब्राह्मणों ने देवदासियों को इससे दूर रखा। अभी तक राई नृत्य को अभी तक किसी ने कला के रूप में नहीं देखा है। इसे केवल अश्लीलता और देह से ही जोड़कर देखा जाता है। डॉ शरद सिंह लिखती हैं- ‘कितनी विचित्र हैं! न दिन के उजाले में जिस औरत के साथ पुरूष अछूत-सा व्यवहार करते हैं, रात के अंधेरे में वे ही पुरूष उस औरत की देह पर बिछे मिलते हैं। इस दोहरेपन के अंधेरे को जीने के लिए विवश रहती हैं वह औरत जिसे वेश्या, गणिका, नगरवधू, बेड़नी और न जाने कितने नामों से पुकारा जाता है। प्राचीन काल में सामाजिक श्रेष्ठता धारण करने वाले युवक काम शास्त्र के आसन सीखने इन्हीं औरतों के पास जाते थे। वापस आकर वे सीखी हुई कला को अपनी पत्नी अथवा प्रेमिका पर आजमाते थे। ये औरतें चौसठ कलाओं में निपुण होती थीं जिनमें से एक कला कामशास्त्र थी तो दूसरी नृत्य थी।’ इस संदर्भ में ‘राई नाचने वाली अनीता कहती हैं कि कभी भी पुरूष उसके कला पर ध्यान नहीं देते। वे कमर की लोच और गाने के बोल पर लट्टू होते हैं जबकि उसके जैसी ही अभिनेत्री माधुरी दीक्षित भी नाचती है। यहां कला का कोई मोल नहीं है। इसी कला से माधुरी दीक्षित लाखों रूपए कमाती है। वह कहती है कि केवल राई नाचकर परिवार का खर्च नहीं चलाया जा सकता। इसमें बहुत कम पैसे मिलते हैं और कोई भी केवल राई नृत्य की कला देखने के लिए हमें नहीं बुलाता।’


नृत्य जो एक मानवीय संवेग की अह्लादकारी अभिव्यक्ति रही है या होती है, वह चैसठ कलाओं में निपुण नगरवधुओं, देवदासियों एवं कोठों पर ही विकसित हुई है। जिस नृत्य के बदले पैसा प्राप्त किया गया उसे बजारू कहा जाता है और इसे वेश्या से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन ‘बजारू’ की स्थिति सदैव जीवित रही क्योंकि मनोरंजन के नाम पर इसे धन देकर जीवित रखने वाले हमेशा उपस्थित रहे और आर्थिक विपन्नता के कारण यह पंरपरागत होता गया जो आज भी अपने उसी रूप में है। प्राचीन काल में जो गणिका अथवा वेश्या थी, वह आधुनिक काल में कॉर्ल गर्ल अथवा सेक्स वर्कर कहलाने लगी हैं। इसके अलावा कुछ नहीं बदला। केवल नाम बदल दिया गया। काम जस का तस। सभ्य समाज के लोग उनसे कामकलाएं तो ली लेकिन उनको उपेक्षित रखा। कोठों व तवायफों से कुछ कलाएं बाहर आयी। इसे कलागुरूयों ने शास्त्रीय रूप में ढाल दिया। इन कला के असली हकदारों के पास कला के नाम पर अब कुछ नहीं बचा है। इसका पेटेंट कलागुरूओं ने अपने नाम करा लिया है। राई नृत्य के साथ अभी वह स्थिति नहीं आई है। इसे अभी बाजार में उस तरह नहीं भुनाया जा रहा है जिस तरह से अन्य नृत्य कलाओं को भुनाया गया। राई नृत्य के अधिकांश  स्टेप माधुरी दीक्षित ने अपने नृत्य में शामिल किया है। बेड़नी स्त्रियां इसे जानती तो हैं लेकिन इनके पास इसका कोई पेटेंट नहीं है। इनकी स्थिति तीसरी दुनिया के देशों की तरह हो गई है जिनका सब कुछ होते हुए भी उस पर अधिकार किसी और का होता है। बेड़िया समुदाय का भी यही हाल है। राई ये खुद नाचती है लेकिन इन पर अधिकार किसी और का होता है। यहां भी शोषण के सभी रूप मौजूद है। ‘आयोजक या उसके दलालों के बिस्तर पर से गुजरने वाली को अच्छे कार्यक्रम मिलते हैं। जब बेड़नियां किसी गांव में नाचने को बुलाई जाती है तो यह पहले ही तय हो जाता है कि बुलाने वाले में से किसको खुश  करेंगी।’


लोक संस्कृति जिसे हम अपनी बुनियादी एवं वास्तविक संस्कृति का मूलाधार मानते हैं, उनके संरक्षण और संवर्द्धन के लिए मात्र उन लोगों को उत्तरदायी ठहराया जाता है जो अशिक्षित या आर्थिक रूप से कमजोर हैं। बार-बार इनके पिछड़ने का कारण अशिक्षित होना बताया जाता है जबकि पिछड़ने का कारण मनोरंजन के नाम पर चला आ रहा दैहिक शोषण है। यदि लोक-संस्कृति बदलाव की कड़ी से गुजरती है तो उसे स्वीकार नहीं किया जाता। आधुनिक बोध जैसे ही उसमें समाहित होता है उसे लोक से कटा हुआ मान लिया जाता है। वैसे भी समाज के नियंता आधुनिकता को संदेह के नजरिए से देखते हैं। इसलिए वे नहीं चाहते कि उनकी इच्छा के विपरीत कोई भी परिवर्तन हो और जब प्रश्न  किसी कला को लेकर हो जिससे पुरूष अपनी कुंठाओं को शांत करता हो तो यह संभव ही नहीं कि इसमें बदलाव की चाह उसके अंदर हो। प्रदर्शित की जाने वाली किसी भी कला का स्वरूप चाहें परंपरागत हो या आधुनिक वह पूरी तरह से कला प्रेमियों, कला-ग्राहको व दर्शकों के चरित्र पर निर्भर करता है। यदि  दर्शक कला के माध्यम से किसी विचार को प्राप्त करना चाहता है तो कला का स्वरूप शास्त्रीय होगा। जैसा कि फिल्मों के बारे में भी कहा जाता है कि कला फिल्मे व मनोरंजन फिल्में। और यदि कला के माध्यम से दर्शक  अपनी कुंठाओं को शांत करना चाहता है तो कला अशास्त्रीय हो जाती है। इस तरह के कला को प्रदर्शित करने वाले कलाकार की यह विवशता हो जाती है कि या तो वह कला का प्रदर्शन  न करे और यदि करे तो दर्शक  की इच्छा के अनुरूप। यदि उसकी जीविका उसी कला पर निर्भर हो और अन्य कोई साधन नहीं है तो वह कला को दर्शक  के अनुरूप ही प्रस्तुत करेगा। पितृसत्ता, राज्य व सामाजिक ढाचें का आपसी ताना बाना, शोषण के जिस बुनियाद पर टिका है उसके पड़ताल के लिए बने-बनाये ढाचे से काम नहीं चलता। इसके लिए पड़ताल तो जरूरु है लेकिन पड़ताल के लिए नजरिया व टूल्स वर्तमान सामाजिक संदर्भों व श्रम की मान्य परिभाषा अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) एवं श्रम का मार्क्सवादी दृष्टिकोण जरूरी है। वेश्यावृत्ति व ‘सेक्स वर्क’ में श्रम की उपयोगिता, राज्य का नियंत्रण, पितृसत्ता का दबाव भी काम करता है।



परंपरा के नाम पर हो रहा शोषण जिसे स्त्रियों के लिए ऐसा माहौल बना दिया गया है जिसमें वे इसे अपनी नियति मानती हैं। बेड़िया समुदाय की स्त्रियों के साथ पूरी साजिश के साथ ऐसा किया जाता रहा है जो अभी भी जारी है। परंपरा के नाम पर देह व्यापार शुरू करना आसान है लेकिन इससे निकलना मुश्किल। भारत में ऐसे समुदायों की स्थिति बहुत कम है जिनमें देह के धंधे को सामान्य माना जाता है। बेड़िया समुदाय में वेश्यावृत्ति को हेय दृष्टि से नहीं देखा जाता जबकि सामान्य समाज में वेश्यावृत्ति को एक कलंक माना जाता है। यौन दासता में औरतों को जिन मुश्किलों से जुझना पड़ता है वे उसमें मुक्ति या पलायन के बाद भी खत्म नहीं होती।

मानवता के खिलाफ होने वाले किसी भी कार्य की निंदा होनी चाहिए और वेश्यावृत्ति की तो होनी ही चाहिए। वेश्यावृत्ति मनुष्यता की बदतरीन असफलताओं की एक मिसाल है। यह स्त्री शोषण की इंतहा है। पैसे के ताकत का खेल है। वेश्यावृत्ति एक ऐसा पेशा है जिसमें स्त्रियां एक दिन में 10 पुरूषों को यौन संतुष्टि प्रदान करने के बाद भी उन्हें अच्छा भोजन व रहने के लिए एक अदद मकान की समस्या बनी रहती है। वेश्यावृत्ति व सेक्स वर्कर बनने व बनाने के सवाल पर नारीवादियों में गहरा द्वंद है। लेकिन इतना तो सभी का मानना हैं कि यह स्त्रियों के शोषण के बुनियाद पर टिका हुआ है। यह अंतरंगता और वर्चस्व की संबंध की खरीददारी करने का मामला भी है। आधुनिक वेश्यावृत्ति या ‘सेक्स वर्क’ श्रम शोषण की आधुनिक पद्धति है। ‘सेक्स वर्कर’ और समुदायिक वेश्यावृत्ति करने वाली स्त्रियों में काफी अंतर है। बेड़िया स्त्रियों ने अपनी मर्जी से इस पेशे का चुनाव नहीं किया है, बल्कि सामंती पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने परंपरा के नाम पर चली आ रही इस प्रथा को पेशागत  बना दिया है। बेड़िया स्त्रियों के यहां स्वतंत्रता के जो मायने हैं वह पूंजीवादी वेश्यावृत्ति यानी ‘सेक्स वर्क’ से भिन्न है। बेड़िया स्त्रियां जिस स्थान पर रहती हैं वहां सामंतवादी संरचना का आधार काफी मजबूत है। और सामंतवादी संरचना अपने उपभोग के लिए परंपरा के नाम पर इसे बचाये रखना चाहता है।                                                                                                                                                                                                   
 बेड़िया स्त्रियों को इस पारंपरिक पेशे से निकालने के लिए राज्य ने अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करने के लिए केवल कागजी खानापूर्ति की है। कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। बेड़िया स्त्रियों को एक आम स्त्री में बदलने के लिए उनके वातावरण को बदलना आवश्यक है, जिससे वे विवशता के उन बंधनों से मुक्त हो सकें जिसे पुरूषों ने परंपरा के नाम पर अभी तक कायम रखा है।

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परिचय :- पी-एच. डी.(स्त्री अध्ययन विभाग) महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा 
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स्त्री देह पर लड़े जाते हैं युद्ध

गरिमा श्रीवास्तव

भारतीय भाषा विभाग जेएनयू, में प्राध्यापक हैं. सम्पर्क : drsgarima@gmail.com

मूल शीर्षक:-‘बनमाली गो तुमि पर जनमे होइयो राधा’’

दिल्ली से मास्को की हवाईयात्रा बहुत सुखद नहीं रही है, शेरमेट हवाईअड्डे पर बर्फ की मोटी चादर ने ज्यों दृष्टि बाधित कर दिया है जहाज के चौडे पंखों पर जमी बर्फ को लगातार गर्म पानी की बौछारों से पिघलाया जा रहा है। बर्फ की सफेदी और विस्तार भयकारक सा है। ढेर सारे टर्मिनल और उनके बीच की लम्बी दूरियां जो अपने पैरों ही तय करनी हैं प्रतीक्षा पंक्तियां, सम्प्रेषण की भाषा रशियन, अब तक की सीखी भाषाएं दामन छुड़ा असहाय कर गयी हैं कदम कदम पर कड़ी सुरक्षाजांच आपकी मनुष्यता पर विश्वास करने को कोई तैयार नहीं। जाग्रेब के लिए यहीं से दूसरी उड़ान लेनी है, पर अभी तक मालूम नहीं कि पहुंचना किस टर्मिनल पर है, यूरोप जाने का उत्साह मंद हो चला है जबकि यात्रा तो अभी शुरू ही हुई है। टी.एस. इलियट ने कभी पूछा था  डू आई डिस्टर्ब द यूनिवर्स, वही बात खुद से पूछती हूं मेरे लिखने न लिखने से क्या फर्क पड़ता है। दुनिया में सैकड़ों लोग अपने अनुभव, सुख दुख, उपलब्धि, संघर्ष, राग द्वेष की गाथाएं लिख कर चले गये उन्हें यह कभी मालूम ही नहीं चला होगा कि उनका लिखा किसने पढ़ा, किसका जीवन उससे बना बिगड़ा या किसी को जीवन पाथेय मिला। जो भी हो अनुभूतियां बांटने के लिए ही होती हैं लेकिन उन्हें व्यवस्थित और तरतीबवार ढंग से रख पाना सम्भव होता है क्या? क्योंकि तरतीब तो उनके आने में भी नहीं होती।

पिछले डेढ़ महीने से यहां हूं। दक्षिण मध्य यूरोप के एड्यिाट्रिक समुद्र के किनारे छोटे से शहर जाग्रेब में। परिचितों, मित्रों में से कुछ क्रोएशिया को एशिया समझते हैं, उनका कहना है इतनी ठंड में यूरोप जाने की जरूरत भी क्या है? कैसे बताऊँ ही कदमों से दुनिया को नाप लेने की ’ओ कृष्ण तुम अगले जन्म में राधा बनना’- बाउल गीत की पंक्ति 190 / तमन्ना मुझे यहां ले आयी है। बचपन में चार साल बड़ी बहन को स्कूल ड्रेस, जूते बस्ते समेत स्कूल जाता देख मेरा मन मचल जाता, मां ने ढाई साल की उम्र में स्कूल भेजना शुरू कर दिया था। समय के पहले, पांव में पहने कद से बड़े जूतों ने स्कूल के बंद अनुशासन के बीच खड़ा कर दिया। बचपन का खेल तो हो ही नहीं पाया। भारतीय सांस्कृतिक सम्बंध परिषद्, जाग्रेब विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग खोलना चाहता थाµ मुझे वही अवसर मिला है कि मैं दो वर्ष तक यूरोप में रह सकूं। छात्रा उत्साहित हैं। अतिथिगृह से विश्वविद्यालय सिर्फ दो किलोमीटर पर है इसलिए पैदल चलना अच्छा लगता है।यातायात और संचार सुविधा काबिले तारीफ है, समूचा क्रोएशिया आंतरिक तौर पर आठ राष्ट्रीय राजमार्गों से सम्बद्ध है। विश्वविद्यालय इवाना चेलाचीचा में है और भारतीय दूतावास कुलमरेस्का पर। गनीमत है कि दूतावास बार बार जाने की जरूरत नहीं पड़ती। राजदूत प्रदीप कुमार विनम्र और अनुशासनप्रिय हैं, जो अकसर भारत के दौरे पर रहते हैं और द्वितीय सचिव दूतावास की व्यवस्थादेखते हैं। कर्मचारी और अधिकारी शालीन हैंµ श्रीमती पासी हैं, आर्यन हैं, जिनसे हिन्दी में बात करने का सुख है। तीन मंजिला सफेद इमारत, साफ सुथरी सजी संवरी लेकिन जिन्दगी ज्यों धड़कना भूल गयी हो यहां, इसलिए इंडोलाॅजी विभाग के मुखिया प्रो. येरिच मिस्लाव से अनुरोध किया है कि वे मेरी व्यवस्था विश्वविद्यालय के नजदीक ही करें। सिएत्ना सेस्ता (फूलों की गली) की पांचवी मंजिल परएलविश मेस्त्रोविच के फ्लैट में मुझे ठहरने को कहा गया है फ्लैट सुंदर और सुख सुविधा वाला है। यह पर्याप्त है मेरे लिए। भारत से लायी सभी चीजें जमा ली गयी हैं। लैपटाॅप को विशेष जगह दी गयी है क्योंकि आने वाले दिनों में वही एकमात्रा दोस्त बचा रहने वाला है। अकसर तापमान शून्य से चार छह डिग्री कम रहता है। धूप कभी कभी निकलती है वो भी थोड़ी देर के लिए। धूप में भी कंपा देने वाली ठंड होती है। रविवार का दिन है। घड़ी को अभी मैंने भारतीय समय पर ही रहने दिया है। भारतीय समय से साढ़े चार घंटे पीछे नाश्ता लिया है दलिया और फ्रूट कर्ड। थोड़ा सोने को जी चाहा है। नींद में अपने देश में हूं, कभी भाई बहनों के साथ, कभी शांतिनिकेतन में मंजू दी के साथ। रतनपल्ली वाले घर में चैताली दी के साथ साईं बाबा को लेकर उनकी शाश्वत अडिग आस्था का मजाक उड़ाना चल रहा है। दूध के पतीले में अचानक उबाल आने पर वे ‘जयसांईं’, ‘जयसाईं’ कहते हुए फूंक मारने लगतीं, मेरे कहने पर कि गैस की नाॅब बंद कीजिए, उसके लिए साईं बाबा अवतार नहीं लेंगे, वे मुझ पर नाराज हो जाया करती हैं। दिल्ली में मां होली पर पुए बना रही है मैदा, घी,चीनी, दूध, मेवे के घोल को खूब फेंट कर सधे हाथों से गर्म घी में छोड़ती है छन्न की आवाज के साथ फूल जैसा पुआ आकार लेने लगता है, उसके बाद बारी आती है गर्म मसाले में पके कटहल के सालन की। और लिट्टी वह जो दादी बनाती हैं, उसका कोई जवाब नहीं। बैंगन के चटखदार चोखे के साथ खूब सत्तू, लहसुन और अजवायन से भरीपुरी जवां लिट्टी ये सारे व्यंजन अपने रूप रस गंध के साथ आंखों के आगे परसे चले आ रहे हैं। मंजू दी शांतिनिकेतन में मटर की कचैड़ी बनाती थीं, गांधी पुण्याह पर हरिश्चंद्र जी का बनाया सुगंधित सूजी का हलवा… जुबां पर स्वाद के कण अभी बाकी हैं… जोर की घरघराहट के साथ चौंक कर आंखें खुलती हैं कमरे में घुप्प अंधेरा कहीं कोई नहीं, अपना होना ही शंकालु बना रहा है

काबे की है हवास कभी कुए बुतां की है
मुझको खबर नहीं, मेरी मिट्टी कहां की है
                                          दाग देहलवी

कहां हूं मैं? मेडिकल की तैयारी कर रही दीदी ने कहीं बत्ती तो नहीं बुझा दी, वो दिन में सोती है, सारी रात पढ़ती है, मुझे पुकार कर कहती है सोनी तू सोती ही रहेगी पढ़ेगी कब? उक्की कहां  / 191 है? अमरूद के पेड़ के नीचे सहेली के साथ लकड़ी का स्कूल उल्टा करके गुड़िया का खेल रच रही होगी… देखो उसने फिर उल्टी चप्पल पहन ली, इतनी छोटी है लेकिन बहुत स्वाभिमानी और स्वतंत्रा चेता, किसी के साथ नहीं सोती… मम्मी के जाने के बाद बुआ के साथ भी नहीं। चार साल की उम्र में ही उसकी अकेली दुनिया है। चप्पल पहनूं, उठूं कि हिन्दू काॅलेज के दोस्त बुलाने चले आये हैं दो अध्यापकों डाॅ. हरीश नवल और सुरेश ऋतुपर्ण ने अपने घर बुलाया है खाना पीना, मौज मस्ती करके शाम ढले स्मिता दी के साथ घर लौटती हूं। लो आज आ गयी शामत डाॅ. कृष्णदत्त पालीवाल की क्लास है उन्होंने दुर्वासा सी भविष्यवाणी कर दी है तुम सब कहीं नहीं पहुंचोगे… कहीं नहीं… कहीं नहीं… तो पहुंची कहां हूं… करवट बदल कर, जोर लगा कर उठने की कोशिश में आंखें मुंदी चली जा रही हैं टोंस वैली से लगातार बंदूक की गोलियां दागने की आवाजें आ रही हैं। यह मेरी पहली नौकरी है भारतीय सैन्य अकादमी में अफसर बनाने के लिए जेंटिलमैन कैडेट्स को पढ़ाना है सुबह का सायरन बज रहा है, बैरक से निकल कर आर्मी कैडेट काॅलेज विंग की ओर जाने वाली गीली सड़क पर अंधेरे में चल रही हूं। सड़क के किनारे लैम्प पोस्ट टिमटिमा रहे हैं। बारिश की बूंदें पोस्ट पर चिपक सी गयी हैं। कैडेट्स सस्वर कदमताल करते हुए सैल्यूट देकर आगे बढ़ जाते हैं। झुंड के झुंड गुजर रहे हैं… कहां हूं मैं , घंटी की आवाज है, उठ कर दरवाजा खोलना पड़ता है। मुझे भौंचक देख मुस्करा कर क्रेशो कर्नित्ज हाथ मिलाते हैं यह दोस्ती की गर्माहट से भरा पुरसुकून स्पर्श है वे जाग्रेब विश्वविद्यालय में संस्कृत पढ़ाते हैं कांट्रेक्ट पर। दरवाजे के खुलने से ठंडी बर्फीली हवा का झोंका भीतर आ गया है, जिसने अवचेतन से चेतन में ला पटका है क्रेशो मेरी छोटी मोटी दिक्कतें समझते हैं, लैपटाॅप पर स्काइप इंस्टाल कर रहे हैं और भारत में फोन पर बात करने के लिए व्हाइप भी। अभी दिन के सिर्फ तीन बजे हैं लेकिन अंधेरा घिर आया है, कौआनुमा एक बड़ा सा पक्षी लैम्प पोस्ट पर आ बैठा है। ओवरकोट में ढंके लिपटे इक्का दुक्का लोग सड़क पर दीख रहे हैं मैं जाग्रेब में हूं और यहीं रहना है दो साल तक। सोचती हूं दो साल बहुत लम्बा समय है मौसम हमेशा धुंधलाया सा रहता है कैण्टीन में शाकाहारी भोजन की दशा ठीक नहीं। यहां के लोगों को भारतीय व्यंजन बहुत पसंद हैं। कहते हैं कभी तुर्केबाना येलाचीचा (जाग्रेब का केन्द्र) में किसी ने भारतीय रेस्टोरेण्ट खोला था किसी वजह से कालकवलित हो गया। वैसे मांसाहारी भोजन के लिए क्रोएशिया पूरे यूरोप में प्रसिद्ध है। ताजा पानी की मछली, गोमांस, सुअर का मांस और मेडिटेरियन ढंग से बनी सब्जियां यहां की खासियत हैं। ठंडे मौसम में पशु मांस के बड़े बड़े टुकड़ों को लोहे के हैंगरों में टांग दिया जाता है। बंद कमरे में जलती लकड़ियों के धुएं में वह टंगा मांस पकता है। धुएं की परत संरक्षक का काम करती है। इसे ‘स्मोक्ड मीट’ कहा जाता है। इसकी पाक विधि काफी प्राचीन है और लोकप्रिय भी। जैतून का तेल भी यहां काफी प्रयोग होता है।

सिएत्ना सेस्ता में घरों के दरवाजे काफी चौडे़ और मोटे हैं, मुख्यद्वार स्वतः बंद हो जाते हैं। अभ्यास न होने के कारण फ्लैट का दरवाजा बाहर से दो बार लाॅक हो चुका है। सामने के फ्लैट में द्रागित्सा रहती हैं जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती और मुझे क्रोएशियन। उनका लम्बा समय इटली में बीता है, जर्मन और इतालवी जानती हैं, वे क्रोएशियन, अंग्रेजी शब्दकोश खरीद लायी हैं, लगभग सत्तर वर्ष की चाक चौबंद। हां युवा ही, क्योंकि जीवन के इस पड़ाव पर ही पहली बार तनावमुक्त, उन्मुक्त जीवन जी रही हैं। सुंदर गोल चेहरा, रोमन नाक और कटे हुए सुनहरे बालµ हमेशा व्यस्त रहती हैं। उन्होंने फ्लैट के सामने फूलों के पौधे लगा रखे हैं, बेटी तान्या और नातिन नादिया सप्ताहांत में आती हैं। पैंतीस वर्षीय बेटा इगोर कलाकार है जिसे बेरोजगारी के आलम ने उदास और तिक्त बना दिया है। द्रागित्सा के पास फ्लैट की अपनी चाभी है, इगोर की अनियमित दिनचर्या का ज्यादा 192 / प्रभाव उस पर नहीं पड़ता। ऐसा वे कहती हैं लेकिन आंखें कुछ और कहती हैंµ ये धुर पश्चिम है जहां माता पिता 17 वर्ष की उम्र के बच्चों को मित्रा मानते हैं। देख रही हूं, दिनांेदिन यह अंतराल कम ही होता जा रहा है। नादिया के उ$पर इम्तहान पास करने का तनाव इतना है कि सिगरेट के बिना नहीं रह पाती। इम्तहान में फेल होने पर क्या करेगी, वह जानती नहीं। कहती है ‘‘आप क्या सोचती हैं, सिर्फ बड़े लोग ही तनावग्रस्त होते हैं। मुझे घर में रहना, पढ़ना बिल्कुल पसंद नहीं, सोचती हूं कब बड़ी होकर संगीतकार बनूं या फिल्म में काम करूं।’’ उसकी मां तान्या बेटी के लिए बहुत चिन्तित रहती है। वह दुबरावा के सरकारी अस्पताल में रेडियोलाॅजी विभाग में तकनीकी सहायक है। दो तलाक हो चुके हैं और ‘रिएका’ के म्लादेन नाम के व्यक्ति से भावनात्मक जुड़ाव है। अपने सम्बंध को लेकर सदैव सशंकित रहती है, नौकरी से छुट्टी मिलते ही ‘रिएका’ चली जाती है। इधर उसकी बेटी नादिया रात भर घर से गायब रहने लगी है। तान्या कहती है जो गलतियां मैंने कीं, चाहती हूं मेरी बेटी न करे, तुम्हारा देश अच्छा है जहां बच्चों पर अभिभावकों का कठोर नियंत्राण रहता है। वह नादिया को
डांटने फटकारने से डरती है।


 हम समुद्र के किनारे किनारे लांग ड्राइव पर जा रहे हैं। बायीं तरफ ड्राइविंग ह्वील अटपटा लगता है। पास में अंतरराष्ट्रीय लाइसेंस भी नहीं है। तान्या लगातार अपनी व्यथा कथा कह रही है, उसे अंगे्रजी में बात करना सुहाता है, कई बार क्रोएशियन शब्दों के अंग्रेजी पर्याय ढूंढ़ने के चक्क्र में बातचीत बाधित भी होती है। समुद्र के किनारे किनारे लैवेंडुला (लैवेंडर) की झाड़ियां हैं। पौधे दो से ढाई फुट ऊँचे। लैवेंडर की गंध समुद्र की नमकीन गंध के साथ मिल कर पूरे दक्षिणी यूरोप की हवा को नम बनाये रखती है। फ्रांस में तो लैवेंडर को भोजन में भी प्रयुक्त किया जाता है। कीटाणुनाशक सुगंधित लैवेंडर क्रोएशिया और यूरोप के अन्य भागों में निद्राजनित रोगों की औषधि है। वैसे क्रोएशिया पर्यटन और शराब उत्पादन के लिए मशहूर है। तान्या ने यह सूचित करते हुए पीने की इजाजत मांगी है कि उसका गला सूख रहा है। लगभग 641.355 वर्गमील में फैला जाग्रेब क्रोएशिया का सांस्कृतिक प्रशासनिक केन्द्र है जो मूलतः एक रोमन शहर था जो सन् 1200 में हंगरी के नियंत्राण में आ गया। सन् 1094 ई. में पहली बार पोप ने जाग्रेब में चर्च की स्थापना कर जाग्रेब नाम दिया। जर्मन में इसे ‘अग्रम’ कहा जाता है।


जाग्रेब और क्रोएशिया का इतिहास युद्ध का इतिहास है, सन् 1991 तक संयुक्त यूगोस्लाविया का अंग रहा क्रोएशिया अपने भीतर युद्ध की अनगिन कहानियों को लिए हुए मौन है। स्लोवेनिया,हंगरी, सर्बिया, बोस्निया, हर्जेगोविना और मांटेग्रो से इसकी सीमाएं घिरी हैं। आज के 21,851 वर्गमील में फैले क्रोएशिया ने एक तिहाई भूमि युद्ध में खो दी। 15 जनवरी 1992 को यूरोपीय आर्थिक संगठन और संयुक्त राष्ट्रसंघ ने इसे लोकतांत्रिक देश के रूप में मान्यता दी। इसके बाद भी तीन वर्ष तक अपनी भूमि वापस पाने के लिए 1 अगस्त 1995 तक उसे सर्बिया से लड़ना पड़ा और यूरोपीय यूनियन की सदस्यता तो उसे अभी हाल में 1 जुलाई 2013 को मिल पायी। इतने लम्बे युद्ध के निशान अभी तक धुले पुंछे नहीं हैं। उनकी शिनाख्त के लिए मुझे दूर नहीं जाना पड़ा। इटली और फ्रांस घूमने की इजाजत मिलने पर दूतावास ने मुझको दुशांका सम्राजिदेता की दूरिस्ट कम्पनी का पता दिया।

दुष्का का जीवन क्रोएशियाई सर्ब युद्ध का जीता जागता इतिहास है। कहीं पढ़ा था, युद्ध कहीं भी हो, किसी के बीच हो, मारी तो औरत ही जाती है। युद्ध ने दुष्का के जीवन को ही एक युद्ध बना दिया। युद्ध में सर्बों ने क्रोआतियों को मारा उनके घर जला दिये, बदले में क्रोआतियों ने पूरे क्रोएशिया को सर्बविहीन करने की मुहिम छेड़ दी। लोग भाग गये या मारे. दुष्का के मां बाप युद्ध के दौरान बेलग्रेड होते हुए अपनी बेटियों के पास पहुंच नहीं पाये। दुष्का को बिना नोटिस दिये नौकरी से निकाल  / 193 दिया गया। अब वह केवल ‘सर्ब’ थी मनुष्य नहीं, अड़ोसी पड़ोसी घृणा से इन दो सर्ब बहनों को देखते थे। जंग जोरों पर थी, अमेरिका की पौ बारह थी उस पर से युद्धविराम और भीतर से घातक हथियारों की आपूर्ति युद्धविराम होते थे, वायदे किये जाते जो तुरंत ही तोड़ भी दिये जाते। राजधानी होने के नाते जाग्रेब शहर में पुलिस और कानून व्यवस्था कड़ी थी, लेकिन लोगों के लिए दिमाग से घृणा और नफरत को निकालना असम्भव था। बसों में, ट्रामों में लोग सर्बों को देखते ही वाहीतबाही बकते, थूकते, घृणा प्रदर्शन करते। दुष्का ने कई साल पहले अपनी ट्रैवल एजेंसी का सपना पाला था। युद्ध ने दुनिया बदल दी। कुछ लोग रातोंरात अमीर हो गये और कुछ सड़क पर आ गये। युद्ध के थमने और गर्भ ठहरने दोनों की सूचना दुष्का को एक साथ मिली। दौड़ी थी उस दिन वह त्रायेशंवाचकात्रा से यांकोमीर तक, पैदल चल कर गयी सेवेस्का तक, कोई डाक्टर सर्ब लड़की का केस हाथ में लेने को तैयार नहीं हुआ। क्रोएशियन प्रेमी ने दुष्का को पहचानने से इनकार कर दिया। सर्ब कह कर गाली दी और उससे बात तक न की। दुष्का अविवाहित मां बनी और पिछले पंद्रह वर्षों में अपने मां बाप का सहारा भी।

इवाना, मिरता, वैलेंटीना, बोजैक अक्सर मिलने जुलने वाले विद्यार्थी हैं। लेकिन सप्ताहांत में जब चारों ओर बर्फीला सन्नाटा पसर जाता है, इनमें से कोई फोन नहीं उठाता। वृहस्पतिवार की शाम से ‘वीकएंड’ की तैयारी शुरू हो जाती है। भारत की अपेक्षा लड़कियां यहां ज्यादा स्वतंत्रा और उन्मुक्त हैं। रोजगार के अवसर सीमित हैं, ये आर्थिक तंगी के दौर का यूरोप है, बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अपने पूरे तामझाम के साथ मैकडोनाॅल्ड्स, रीबाॅक, वाॅन हुसैन, एडीडास जैसे ब्रांडों में मौजूद हैं, सप्ताह के पांच दिन यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले छात्रा सप्ताहांत में दुकानों के कर्मचारी बन जाते हैं। पचीस तीस कूना (मुद्रा) प्रति घंटे के हिसाब से। उनसे खूब जम कर काम लिया जाता है। मेरी प्रतिभाशाली छात्रा कार्मेन वुग्रिन मैकडोनाॅल्डस में सप्ताहांत और ग्रीष्मावकाश में बर्तन धोती, झाड़ू पोंछा कर खाना पकाती है। मरियाना जिसके घर में अभिभावक के नाम पर सिर्फ एक नाशपाती का पेड़ है, नाक कान में असंख्य बालियां पहने, बालों में बहुरंगी रिबन बांधे दुब्रोवा और तुर्केबाना येलाचीचा की गलियों में गिटार बजाती है। उसने कई भारतीय गाने सीख रखे हैं, धुन बजाती है, आने जाने वाले लोग सड़क पर बिछे कपड़े पर कुछ सिक्के डाल कर आगे बढ़ जाते हैं। अंद्रियाना और बोजैक तरह तरह की पोशाकें पहन कर, नकली नाम लगा कर पर्यटकों को रिझाते हैं। बोजैक तुर्केबाना में मुझे देख कर चैंकता है फिर लजा कर गलियों में गायब हो जाता है। यहां ‘क्रेशो’ नाम बहुत आम है जो यहां के राजा क्रेशीमीर के नाम का संक्षिप्त रूप है। रोमन नाक नक्श, गोरा रंग, लम्बी स्वस्थ कद काठी और सीधी सतर चाल क्रोएशियंस का वैशिष्ट्य है। हम भारत में रहते हुए यूरोप की समृद्धि की कल्पना से कुंठित होते रहते हैं, यहाँ आकर देखती हूं बाजार है, खरीददार नहीं, बड़ी बड़ी दुकानें, जिनमें जूते की दुकानें बहुतायत में हैं, वे वीरान हैं। सामान है, सजावट भी… खरीदने वालों से निहारने वालों की संख्या कई गुना ज्यादा है। आम आदमी की क्रयशक्ति कमजोर हो चली है। छात्रा छात्राएं ‘सेल’ के मौसम की प्रतीक्षा करते हैं। पुराने कपड़ों को खूब जतन से पहनते हैं, जाग्रेब के बाहरी हिस्से में पूर्व की रेलवे लाइन के किनारे ‘सेकेण्ड हैण्ड’ मार्केट लगती है, जिसे देख कर लालकिले के पीछे का बाजार याद आता है। मृतकों के इस्तेमाल किये हुए कपड़े, बैग, जूते, बेल्ट, चादरें, तकिये सब मिलते हैं। अच्छी अच्छी कमीजें पांच कूना में उपलब्ध हैं, देखती हूं इस बाजार में खरीददारों की संख्या बहुत बड़ी है। काला, सफेद और सलेटी यहां के प्रचलित रंग हैं, विशेषकर सर्दियों में, जो वर्ष के लगभग सात महीने रहती हैं।

यूरोप के आंतरिक भागों में सफर के लिए रेल अपेक्षाकृत सस्ता और सुरक्षित माध्यम है। 194 / जाग्रेब स्लोवेनिया से सटा हुआ है लेकिन वहां जाने के लिए शेनसंग वीसा की जरूरत है। मैंने दूतावास में वीसा की अर्जी दे दी है। तान्या के साथ मुझे स्लोवेनिया जाना है, लेकिन उससे भी पहले ‘रिएका’ शहर जहां क्रेशो कर्नित्स और उनकी पत्नी साशा के प्रकाशनगृह से रवीन्द्रनाथ टैगोर के नाटक ‘चित्रा’ का क्रोएशियन रूपांतरण छपा है।

हमें कार से दिन भर का सफर करना पड़ा। समुद्र तट पर धूप खिली हुई है और तट के समानांतर चैड़ी सड़क ‘रिएका’ की ओर जा रही है। साशा और क्रेशो बारी बारी से कार चला रहे हैं। एक दो जगह हम पेट्रोल लेने के लिए रुकते हैं, साशा दुबली पतली हैं , निरंतर सिगरेट पीने से उन्हें भूख भी कम ही लगती है। उनके पास कार में वाइन है, लेकिन मुझे तेज भूख लगी है, पेट्रोल स्टेशन पर ही मैंने सैंडविच खरीदा है कभी कभी घर की सूखी रोटी और आलू की भुजिया अपनी साधारणता में भी कितनी असाधारण और दुर्लभ हो जाती है। राजा क्रेशीमिर का किला रास्ते में पड़ा है और किले के भीतर बाजार लगा है गहने, तस्वीरें, मदर मेरी की मूर्तियां, खूब मोटी मुगदरनुमा जंघाओं वाले मध्यकालीन सैनिकों के बुत, किताबें, कैसेट्स, गीत संगीत और पर्यटक। यहां ‘बैक वाटर’ पोर्ट है जहां से ‘वेनिस’ के लिए नावें चलती हैं, जहां कुछ ही घंटों में पहुंचा जा सकता है। दोपहर तीन बजे हम लोग विमोचन स्थल पर पहुंचते हैं, पुस्तक के विमोचन के साथ नाश्ते का भी इंतजाम है। लोग पंक्ति में खड़े होकर प्लेटों में नाश्ता ले रहे हैं, सबकी आंखें व्यंजनों पर केन्द्रित हैं, मिलना जुलना बाद में पहले पेटपूजा। नाश्ते का इंतजाम न होता तो इतनी भीड़ जुट पाती यहां  पता नहीं। भीड़ में एक बुजुर्ग ललछौंहें चेहरे और चौड़ी नाक लिए इधर उधर देख कर जेब में बिस्किट के टुकड़े छिपाते जा रहे हैं। कोट की जेबें फूलती चली जा रही हैं, मैंने जल्दी से, उधर से नजर हटा ली है मन करुणा से भर आया है।



‘रिएका’ या ‘रिजेका’ क्रोएशिया का तीसरा बड़ा शहर है। समुद्र के किनारे बसा यह शहरबड़े बड़े पानी के जहाज बनाने के लिए प्रसिद्ध है, अपने भीतर बड़ा दिलचस्प बहुभाषिक इतिहास लिए हुए है। पांचवीं शताब्दी से ही यहां आॅस्टोगोथ, लोंबार्ड, अवार, फ्रैंक और क्रोआत रहे हैं, इसलिए रिएका में बहुत सी भाषाएं और बोलियां बोली जाती हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले तक यह पूरी तरह इतालवी शहर था। गोरिल्ला युद्ध और छापामार झड़पों में बहुत से नागरिक हताहत हो गये, और लगभग 800 लोगों को यातनाशिविरों में बंद कर दिया गया। आज इस शहर में लगभग बयासी प्रतिशत क्रोआत, छह प्रतिशत सर्ब, दो ढाई प्रतिशत बोस्नियाई और दो प्रतिशत इतालवी रहते हैं। ‘चित्रा’ के विमोचन का कार्यक्रम रिएका के सार्वजनिक पुस्तकालय में है, पुस्तकालय बड़ा और व्यवस्थित है, लेकिन उपरी मंजिल पर कई कमरे बंद हैं जिनमें प्राचीन पांडुलिपियां सुरक्षित हैं। पुस्तकालयाध्यक्ष का कहना है कि सरकारी अनुदान इतना कम है कि सभी कमरों का रखरखाव सम्भव नहीं। विमोचन कार्यक्रम की भाषा क्रोएशियन है, इतना तय है कि टैगोर यहां बहुत लोकप्रिय हैं। मुझे बताया गया है कि सन् 1926 में टैगोर जब जाग्रेब आये थे तब उन्होंने ‘रिएका’ का दौरा भी किया था। दार्शनिक पावाओ वुक पाब्लोविच (1894-1976) ने ‘गीतांजलि’ का क्रोएशियन में अनुवाद किया था जो जाग्रेब के दैनिक ‘भोर का पत्ता’ में 1914 की जनवरी में धारावाहिक रूप में छपा था। बाद में पावाओ ने ‘चित्रा’, ‘मालिनी’ और ‘राजा’ का भी अनुवाद किया। ‘चित्रा’ का मंचन क्रोएशियन नेशनल थियेटर में 1915 में कई बार हुआ। यहां के उदारवादी बौद्धिक प्रथम विश्वयुद्धोत्तर अवसानकाल में टैगोर को आध्यात्म और शांति के प्रतिनिधि के रूप में देखते थे। विमोचन समारोह में ‘चित्रा’ के पहले प्रदर्शन में अभिनय करने वाले क्रेशिमीर बारनोविच (1894-1975) का स्मरण किया जा रहा है। टैगोर की लोकप्रियता के जो भी कारण रहे होंµ एक बात तो तय है कि प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान उन्हें नोबेल / 195
मिलना और स्काटलैण्ड में नोबेल के लिए जर्मन राष्ट्रवादी लेखक पीटर रोसेगर का नाम चलना ये दो कारण थे जिन्होंने टैगोर को इस क्षेत्रा में लोकप्रियता दिलायी। भले ही टैगोर इस बात से अनभिज्ञ रहे हों, फिर भी यहां के लोग बताते हैं कि नोबेल की घोषणा के बाद जर्मन प्रेस ने टैगोर पर हमला बोल दिया था। आज क्रोएशियंस पीटर को भूले से भी याद नहीं करते और उनकी पूरी सहानुभूतिके पात्रा रवीन्द्रनाथ टैगोर हैं। ईसाई बौद्धिकों में से बहुत कम ऐसे थे, जो ‘गीतांजलि’ को केवल एक साहित्यिक कृति के रूप में सराहते थे, वे तो टैगोर के रहस्यवाद से प्रभावित थे। सन् 26 में यूरोप की यात्रा के दौरान रवीन्द्रनाथ टैगोर को क्रोएशियंस ने युद्धोत्तर क्षत विक्षत मानस को आध्यात्मिक नेतृत्व देने वाले व्यक्ति के रूप में देखा, उनकी कई कृतियों, मसलन ‘घरे बाइरे’, का क्रोआती में अनुवाद इसी दौर में हुआ, क्रोएशियन म्यूजिक कंजरवेटरी के सभागार में उन्होंने दो दिन भाषण दिये, जिनका आशु अनुवाद क्रोआती में किया गया, लेकिन रवीन्द्रनाथ को यह नागवार गुजरा। ये प्रसंग इसलिए क्योंकि यहां मुझे जो बातें कहनी हैं, उनका क्रोआती में सतत आशु अनुवाद होगा। गुरुदेव के रचनाकर्म और क्रोएशिया से उनके सम्बंधों पर टिप्पणी करते हुए मुझे बार बार रुकना पड़ रहा है। मेरे वक्तव्य पर श्रोताओं के चेहरे निर्विकार और भावशून्य हैं, आशु अनुवादक की बात पर ही उनकी आंखें झपकती और कभी चौड़ी होती, कभी सिकुड़ती हैं। श्रोता वक्ता का सम्बंध उचित सम्प्रेषण पर टिका होता है। मुझे मालूम ही नहीं चल रहा था कि मेरी बातें कहां और किस सीमा तक सम्प्रेषित हो रही हैं। साशा मंच संचालन कर रही हैं और मुझे बताया जाता है कि श्रोता टैगोर की कविता सुनना चाहते हैं। मालूम नहीं टैगोर के कई गीतों को छोड़ कर मुझे ‘ध्वनिलो
आह्वान’ सुनाने की इच्छा ही क्यों हो आयी है


ध्वनिलो आह्वान मधुर गम्भीर प्रभात अम्बर माझे
दिके दिगंतरे भुवन मंदिरे शांतिसंगीत बजे
हेरो गो अंतरे अरूपसुंदरे – निखिल संसार परमबंधुरे
ऐशो आनंदित मिलन – अंगने शोभन – मंगल साजे
कलुष – कल्भष विरोध विद्वेष होउक निःशेष
चित्ते होक जोतो विघ्न अपगत नित्य कल्याणकाजे
स्वर तरंगिया गाओ विहंगम, पूर्व पश्चिम बंधु संगम
मैत्राी – बंधन पुण्य मंत्रा पवित्रा विश्वसमाजे।

ये फरवरी का अंतिम सप्ताह है, धूप खिली हुई है, रात को गिरी बर्फ के फाहे सड़कों के किनारे किनारे रुई से रखे हुए हैं, हवा में नर्माहट की जगह तुर्शी है, बिल्कुल ठंडी, बर्फीली हवा जो एड्रियाट्रिक सागर को छूने के पहले पाइन वृक्षों की टहनियों पर जमी बर्फ को थोड़ा हिला भर देती है, सफेदी को झाड़ती नहीं। अंजीर और चेरी वृक्षों की सारी पत्तियां झड़ चुकी हैं, असमय ही बुढ़ाए ठूंठों को बर्फ ने नीचे से उपर तक ढंक लिया है, खिली धूप में ‘सिएत्ना सेस्ता’ के सामने की सड़क के दोनों किनारों पर खड़े पेड़ बेजान से दीख रहे हैं। जब तक हम बर्फ से रूबरू नहीं होते, वह हमारे भीतर अपनी पूरी सफेद मोहकता के साथ पिघलती है, रग रेशों में उतर कर रोमांटिक कल्पना के सहारे, बर्फ के ‘जूते बड़ी जैकेट’ पहने हम उसकी सफेद फिसलन पर उठ गिर रहे होते हैं और जब वही बर्फ दिन रात, सुबहो शाम का हिस्सा बन जाती है, सारे चिड़िया चुरुंग न जाने कहां छिप जाते हैं तो उसकी मोहकता को सन्नाटे में तब्दील होते कतई देर नहीं लगती। खिड़की के पर्दे हटाते ही दिल बैठ जाता है इतनी अफाट, निरभ्र सफेद परत पांचवी मंजिल से नीचे देखती हूं पार्किंग में खड़ी गाड़ियां बर्फ में एकसार हो गयी हैं। एक आदमी हाथ में फावड़ा लिए बर्फ हटाने में जुटा 196 / है, बर्फ खखोर खखोर कर सड़क के किनारे डालता है। जहां भूमिगत नाली का मुहाना है, बर्फ के थक्के बड़े बड़े हो जाते हैं। निचली सड़क गीली हो गयी है, पर बर्फ पिघलाने भर का ताप सूरज में अभी आया नहीं है, और पहर ढलने का समय भी हो गया। ‘सिएत्ना सेस्ता’ और सभी बहुमंजिली इमारतों के पिछवाड़े कतार में लोहे के पहिएदार कंटेनर रखे हुए हैं, ये कूड़ेदान हैं। नगरनिगम शहर के रखरखाव के लिए नागरिकों से कर वसूलता है जिसके निवेश में व्यवस्था और ईमानदारी दोनों हैं, भारत में जिसका अभाव सिरे से महसूस किया जाता है। अलस्सुबह बड़े ट्रकों में पिछले दिन का कूड़ा खाली कर दिया जाता है, खाली कंटेनर दिन भर पेट भरने के इंतजार में वहीं खड़े रहते हैं जिन पर क्रोआती में सूखे और गीले अवशिष्ट पदार्थों के संदर्भ में निर्देश लिखे हुए हैं।

विश्वविद्यालय में सुबह आठ बजे कक्षाएं शुरू हो जाती हैं। प्रोफेसर येरिच ने मुझसे कहा था कि या तो मैं सुबह आठ बजे कक्षा लूं या रात के आठ बजे। रात आठ बजे कक्षा पढ़ाने की अवधारणा ही मुझे अजीब सी लगती है, दिन भर की थकान के बाद अंत में कक्षा पढ़ाना, उफ। मैंने भारत में भी हमेशा सुबह सुबह ही पढ़ाया, दोपहर होते होते कक्षा पढ़ाने का उत्साह मंद हो जाया करता है। शांतिनिकेतन में तो सुबह साढ़े छः बजे ही वैतालिक की प्रार्थना के तुरंत बाद कक्षाएं शुरू हो जाती थीं। दिन का एक बजा नहीं कि कक्षाएं समाप्त। आधा दिन अपना था पुस्तकें पढ़ना, पुस्तकालय जाना, कंकाली तल्ला, अजय नदी का पुल, खोवाई, आमार कुटीर जैसी जगहों पर जाना और शाम ढले लौट आना, उसी अवकाश का सुफल था। भारतीय विश्वविद्यालयों विशेषकर मानविकी और समाज विज्ञान में शाम पांच छः बजे तक पढ़ाई समाप्त हो जाया करती है। सूरज अस्त, अध्यापक मस्त और विद्यार्थी पस्त। अभ्यास ही संस्कार बन जाया करता है। रात देर तक पढ़ना और सुबह उठ कर पढ़ाने को तैयार होना, इससे लगता है एक नया खूबसूरत सा दिन आप शुरू करने जा रहे हैं। सुबह एक नयी उर्जा और मुस्तैदी देती है इसलिए मैंने जाग्रेब में भी सुबह आठ बजे की कक्षाएं ही चुनी हैं। नब्बे मिनट की एक कक्षा, बीच में अवकाश, फिर कक्षा। अक्सर दिन के डेढ़ बजे तक मैं अपने आवास में लौट आती हूं। शाम में अक्सर पुस्तकालय, आजकल वहीं देर हो जाया करती है। पुस्तकालय खूब व्यवस्थित हैµ अंग्रेजी, क्रोआती (हरर्वास्त्की) और फ्रेंच पुस्तकेंµ लाल, नीली जिल्द चढ़ी विपुल, खूबसूरत किताबों का वृहत संसार। तापमान नियंत्रित किया रहता हैµ 20 से 22 डिग्री से. आरामदेह, पुरसुकून माहौल। लगता है इसके बाद कोई दुनिया नहीं, कई विद्यार्थी ‘अर्न ह्वाइल लर्न’ परियोजना के तहत घंटे के हिसाब से काम करते हैं, कैटलाॅग बनाते हैं, किताबें झाड़ते पोंछते हैं बदले में उनका जेबखर्च निकल आता है। सन् 1669 में स्थापित ‘स्वेस्लिस्ते उ जागरेबु’ दक्षिण मध्य यूरोप के प्राचीनतम विश्वविद्यालयों में से एक है। इवाना उलीचीचा के दसवें मार्ग पर यही पुस्तकालय मेरी शरणस्थली है। धूप की हल्की किरणों को, दिन के किसी भी समय घेर कर बादल दिन में अंधेरा कर देते हैं, बर्फीली बारिश बेआवाज टपकती रहती है। सब शांत पेड़ पौधे स्वच्छ और श्वेत बर्फ की चादर तले दिन और रात का फर्क कहीं गुम हो जाता है। आजकल मैंने ‘सीमोन द बोउवार’ को नये सिरे से पढ़ना शुरू किया। उसका लिखा घर से दूर होने की बेचैनी को कभी बढ़ाता तो कभी शांत करता है। उसके उपन्यासों और आत्मकथाओं से गुजरना मधुर त्रासदी से होकर गुजरना है। पुस्तकालय की गर्माहट, सीमोन की किताबेंµ इन्हें छोड़ कर फ्लैट के सन्नाटे की ओर लौटने का जी नहीं करता। काफी हाउस का अपरिचित शोर समझ में आने लगा है धुएं के छल्लों के बीच टेबल पर सिर झुकाये, चाइना क्रेप की फ्राॅक पहने सीमोन लिखती दीखने लगी हैं। मैंने सेर्गेई के कहने से आत्मकथात्मक उपन्यास ‘ए वेरी इजी डेथ’ का हिन्दी अनुवाद शुरू किया है। सीमोन को पढ़ना एक ऐसे अनुभव लोक से गुजरना है जहां से स्त्राीवाद का वैचारिक और राजनीतिक उत्स देखने को  / 197 मिलता है। जहां ‘सेकेण्ड सेक्स’ मनुष्य की स्वतंत्राता की, मनुष्य के रूप में स्त्राी पराधीनता के कारणों की पड़ताल करता है, वहीं ‘ए वेरी ईजी डेथ’, प्राइम आॅफ लाइफ, आॅल सेड एंड डन स्त्राीवाद के व्यावहारिक पक्ष की पड़ताल करती हैं। सीमोन ने सन् 1964 में ‘ऐ वेरी ईजी डेथ’ की रचना की जिसका प्रकाशन उसकी मां की मृत्यु के साल भर बाद हुआ था। छह सप्ताह के कालखंड में मरणशय्या पर मामन और सीमोन के साथ बातचीत में यह आत्मकथा गहरे निजत्व, दुख, पश्चाताप, पीड़ा के क्षणों का आख्यान हैµ मां बेटी की बदलती भूमिकाएं, स्त्राी की यातना में उसकी निज की भूमिका, पति पत्नी सम्बंध, डाक्टर और मरीज का सम्बंध, अस्पतालों की आंतरिक राजनीति के विविध पड़ावों से गुजरती हैं। मामन पिछले चौबीस वर्षों से विधवा और एकाकी है। सीमोन भी अपने स्वतंत्रा लेखन और जीवन में व्यस्त है। मामन को अंत तक मालूम नहीं कि उसे ‘प्राणघातक कैंसर’ है। वह मरना नहीं चाहती ठीक होकर 78 वर्ष की अवस्था में, फिर से जीवन को नये सिरे से जीना चाहती है। सीमोन को पढ़ने और अनुवाद करने की प्रक्रिया मुझे भीतर से कभी कभी बहुत अकेला कर देती है। भीतर कभी कभी घुप्प अंधेरों के साये चहलकदमी करते हैं, कभी सीमोन ही हाथ में कलम पकड़ा कर लिखवाती चलती हैं। नित्यानंद तिवारी जी से बात हुई है अनुवाद के कुछ अंश भेजे थे उन्हें।वे बहुत प्रभावित हैं लेकिन रचनात्मक अवसाद से बचने की सलाह देते हैं। विश्वनाथ त्रिपाठी ने भी अनुवाद का प्रथम प्रारूप पढ़ा है ए वेरी ईजी डेथ उन्हें मर्मस्पर्शी लगा है और सिन्धु आंटी तो पढ़ कर रो ही दी हैं।

शाम ढले सिएत्ना सेस्ता पहुंचती हूं, पिछवाड़े का रास्ता छोटा है। शाम का झुटपुटा है अभी, थोड़ी ही देर में गलियों की बत्तियां जल जायेंगी। हवा तेज और नम है, आकाश ज्यों झुका चला आ रहा हो, लगता है रात में बारिश होगी। बर्फ वाले जूते पहनने के कारण तेज तेज कदम बढ़ाना सम्भव नहीं हो पा रहा, ओवरकोट और कई स्वेटरों की तहें शरीर को अतिरिक्त बोझिल बना देती हैं। रास्ते में ‘माली दुचान’ (छोटी दुकान) पड़ती है।, शीशे के दरवाजे बंद हैं, काउण्टर पर बैठी लड़की के बाल ललछौंहें हैं, शायद ‘बरगंडी कलर’ से रंगे हैं। लाल नेलपालिश वाली पतली, लम्बी गोरी उंगलियों में सिगरेट फंसी है, दुकान में कोई ग्राहक नहीं, उसने ‘दोबरदान’ कह कर एक चलताउ मुस्कान फेंकी है। यह छोटी दुकान है जहां सब्जियां, ब्रेड और वाइन उपलब्ध है। मुझे ब्राउन चाकलेट्स लेनी है, कहीं पढ़ा है कि चाकलेट्स मूड बूस्टर का काम करती हैं। इन दिनों अक्सर चाकलेट्स की जरूरत मुझे पड़ती है। लड़की अंग्रेजी नहीं जानती, मैंने प्लास्टिक ट्रे में फ्रूट कर्ड, रेडवाइन और चाकलेट्स रख ली है। उसने कम्प्यूटर पर हिसाब करके मुझसे कार्ड ले लिया। सामान लेकर ‘ख्वाला’ (धन्यवाद) कहना अब सीख लिया है मैंने। इस हफ्ते दुश्का मेरे घर आमंत्रित हैं, वाइन के बिना आमंत्रण वैसा ही, जैसे लवणहीन भोजन। जल्द पैर बढ़ा कर मैं घर के पिछले हिस्से में हूं, सन्नाटा पसरा है, पड़ोस के फ्लैट की खिड़की के सफेद पर्दों के भीतर से पीली रोशनी छन कर बाहर आ रही है। कूड़ेदानों के पास हल्की खुरखुराहट है, जिज्ञासावश मेरी नजर वहां चली गयी है। काले बूट और लम्बा फ्राॅकनुमा कोट पहने जो औरत अक्सर उस अपार्टमेण्ट में आती जाती दीखती है वो सूखे कूड़ेदान के अंदर लगभग आधी लटकी हुई है। मैं अंजीर वृक्ष की ओट में हूं जहां लगभग अंधेरा है जो दिन के उजाले में, ऊँची एड़ी के जूते चटखाती, तिरछा हैट पहने हाथ में पालतू कुत्ते की चेन पकड़े इठलाती चलती है, वह शाम ढले कूडे़दान में…? मुझे उत्सुकता है थोड़ी ही देर में औरत के दस्ताने पहने हाथ बाहर निकलते हैं और नीचे रखे बड़े से पाॅलीथीन में इस्तेमाल कर फेंके जूते, पुराने कपड़े, छाते, बर्तन और यूं ही कई तरह का सामान रख देते हैं। कूड़ेदान में अधलटकी औरत बाहर आ चुकी है। हौले हौले, बेआवाज, पाॅलिथीन बैग की चुरमुराहट को भरसक नियंत्रित करते हुए बैग उठाती है, बड़ा है, शायद 198 / भारी भी लेकिन संभाल लेती है और सधे कदमों से अपने फ्लैट की ओर। यहां बुजुर्गों को मामूली सरकारी पेंशन मिलती है, बेरोजगारी भत्ता भी लेकिन ‘टैक्स’ का दबाव, मंहगाई में वह पेंशन कुछ ज्यादा काम नहीं आती। द्रागित्सा से पूछने पर उसने मुस्कराते हुए बात को टाल दिया। क्रोएशियन बहुत स्वाभिमानी होते हैं विदेशी के सामने पड़ोसी के बारे में कुछ कहना उन्हें गवारा नहीं। भारत में आबोहवा के कारण घर में कभी कैद होने की नौबत ही नहीं आयी। स्वेच्छा से घर में रहना और बाहरी दबाव से घर में कैद रहना दोनों में बहुत अंतर होता है। तब आप भीतर होकर भी बाहर ही होते हैंµ कभी ठंडी खिड़की के पल्ले से नाक सटाये बारिश देख रहे होते हैं, कभी बर्फ से जम चुकी सावा नदी की ओर देखते हुए उसमें बहते पानी की कल्पना करते हैं। सावा के पुल पर गाड़ियों की आवाजाही है। लोग पार्क में पालतू कुत्ते और बिल्लियों को घुमाने ले आये हैं, बेंचों पर लोग अकेले दुकेले बैठे हैं, कोने के मैदान में कुत्तों को पालतू बनाने का प्रशिक्षण चल रहा है। कुत्ते अलग अलग प्रजाति के हैं जिनकी देखरेख और सरंजाम काबिलेतारीफ है लेकिन लोग इस बात का बहुत ख्याल रखते हैं कि उनका पालतू किसी की परेशानी का सबब न बने, शिकायत दर्ज होने पर जुर्माना बहुत कड़ा है। वैसे तो भारत में भी श्वानप्रिय लोग हैंµ हैदराबाद विश्वविद्यालय परिसर में एक प्राध्यापक इतने श्वानविप्रय हां कि अपने क्वार्टर के सामने रात में कुत्तों के लिए सामूहिक भोज रख देते हैं। परिसर के सारे आवारा कुत्ते अपने भूले भटके साथियों को समवेत स्वर में आमंत्रित करने लगते हैं। भोजन कभी पर्याप्त नहीं, वंचित रह गये, गुर्राते, भूंकते हैं। शक्तिशाली भोजन का बड़ा हिस्सा उदरस्थ कर श्वान सिंह हो जाते हैं और अब मध्यरात्रि तक चलने वाला कर्णभेदी श्वानसंगीत शुरू होता है।यहां की ‘भौंक’ कैम्पस के बाहर वालों को भी भौंकने की कला के प्रदर्शन के लिए प्रेरित उत्तेजित करती है। पशुप्रेमी प्राध्यापक सर्वेभवंतु सुखिनः के भाव से आराम फरमाते हैं, और पड़ोसी संगीत सम्मेलन की समाप्ति की प्रतीक्षा करते हैं क्योंकि श्वानों को प्रताड़ित करना मेनका गांधी की टीम को आंमत्रित करना है। परिसर में श्वानप्रेम ‘सुसंस्कृत’ होने की पहचान भी है। एक अध्यापिका इतनी श्वानप्रेमी है कि कहीं भी रुक कर उन्हें पुचकारने लगती है
अपरिचयीकरण के दौर में शायद यह व्यावहारिक राजनीति का हिस्सा हो, अपने परिचितों की अनदेखी करने का एक हथियार। उस क्षण हो सकता है कई मनुष्य श्वान रूप धरने को तरस जाते हों। जो भी हो एक सप्ताह से तबियत नासाज है, दूतावास ने जिस डाॅक्टर के पास भेजा था उसे तगड़ा बिल बनाने के अलावा सिर्फ मुस्कराना आता है, इसलिए दुबरावा के बड़े अस्पताल जाना पड़ा है। अस्पताल बहुमंजिला, साफ सुथरा, नर्स डाक्टर चाक चैबंद। बाहरी हिस्से में कुछ दुकानें हैं जहां खूबसूरत चीजें बिक रही हैं, खुले आसमान के नीचे बेंचें लगी हुई हैं, क्यारियों में पौधे फूल, लतरें, हवा में लैवेंडर की पत्तियों की गंध फैली हुई है। मैं यहां दो दिनों से हूं। डाॅक्टर मिरनोविचि गले छाती के संक्रमण विशेषज्ञ हैं; बताते हैं कि टांसिलों में सूजन के कारण ज्वर आ रहा है।

अस्पताल का काम खत्म हुआ। अस्पताल की यात्रा मेरे लिए ‘ए वेरी ईजी डेथ’ की यात्रा भी थी, जिसने मुझे सीमोन और उसकी मां के आपसी सम्बंधों को नयी रोशनी में पहचनवाया। सीमोन के उपन्यास ‘शी केम टू स्टे’ और ‘द मेंडरीन’ ने नये दौर के स्त्राीवादी चेहरे को पहचानने में मदद की। उनके आत्मकथात्मक उपन्यासों से होकर गुजरना एक दिलचस्प और ईमानदार अनुभव रहा है।अस्पताल और बीमारी का यह समय मुझे सीमोन के और करीब ले आया हैµ ‘मेमोआयर्स आॅफ अ ड्यूटीफुल डाॅटर’ में विश्वविद्यालय में पढ़ने के दौरान ‘पुरुष की तरह दिमाग’ होने की इच्छा व्यक्त करते हुए अपनी तुलना वह सात्र् से करती हैं और इस निष्कर्ष पर पहुंचती हैं कि स्त्री के लिए पुरुष जैसी सोच होना सम्भव नहीं। ‘प्राइम आॅफ लाइफ’ में सीमोन ने होटलों में रह कर लिखने पढ़ने, एक  / 199 के बाद दूसरा होटल बदलने का जिक्र किया है। सोचती हूं सीमोन अपनी आर्थिक जरूरतें कैसे पूरी करती होंगी, यह भी कि होटलों में रहने का अर्थ हुआ कि आप हमेशा मेहमान हैंµ बिस्तर, परदे, कुर्सी टेबल कुछ भी आपका अपना नहीं। सीमोन के अनुभव पढ़ते हुए पाठक सीखता है कि कैफेटेरिया में कैसे बैठना चाहिए, लोगों से कैसे मिलना चाहिए, बहसें, पढ़ना लिखना और सोचने का सलीका भी। सीमोन कहती हैं कि कैफे में घुसते हुए यदि आप अपने ही दो आत्मीय मित्रों को आपस में बात करते हुए देखें तो उनके निकट बैठ कर बातचीत में बाधा न डालें, बेहतर हो चुपचाप वहां से हट जायें। ‘कहवाघर’ भी पढ़ने लिखने की जगह हो सकती हैµ इसे सीमोन साबित करती हंै और यह भी कि कैसे वह बिना संग साथ की अपेक्षा के सन् 1930 के आसपास मार्सिले और रोउन जैसे कस्बों में अध्यापन के वर्षों में लम्बी सैरों के लिए निकल जाया करती थीं। सोचती हूं कि आज भी स्त्रिायों के लिए उनका अपना ‘स्पेस’ खोजना मुश्किल होता है। भारतीय माहौल में कोई स्त्री काॅफी हाउस में बैठ कर लिखे, वो भी अकेली तो न जाने कितनी जोड़ी आंखें उसे बरजने को तत्पर हो जायेंगी। अब मेरी तबीयत बेहतर हो चली है। इन दिनों ‘फोर्स टू सरकमस्टांसेज’ पढ़ रही हूं जिसमें सीमोन द बोउवार ने युद्धोत्तर पेरिस का चित्रण किया है, जिसमें नये और बेहतर समाज के निर्माण का स्वप्न है, स्वतंत्रता के प्रति उत्तरदायित्व का बोध है। आत्मकथा के इसी भाग में उन्होंने नेल्सन एल्ग्रेन से अपने सम्पर्क की चर्चा की है। नेल्सन के साथ फाॅयरप्लेस के समक्ष संयोग और फिर पेरिस और शिकागो में दोनों का अलग अलग जीवन बिताना भी वर्णित है। भौगोलिक दूरी अपनी सातव्यता में कैसे आत्मीय सम्बंध का अंत कर देती है यह भी कि लिखने के लिए सीमोन ने पेरिस छोड़ना पसंद नहीं किया। इसके साथ बोउवार की उत्तर अफ्रीका, अमेरिका की वे लम्बी यात्राएं जो उसने अकेले कीं। सीमोन को यह चिन्ता भी खाये जा रही थी कि इतने सारे व्यापक जीवनानुभव, जीवन यात्राएं, ये सब उसके साथ ही खत्म हो जायेंगी। ‘आल सेड एंड डन’ में अपने मित्र सिल्विए बान के साथ आत्मीय सम्पर्क की चर्चा करते हुए सीमोन का कहना है कि उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि उम्र के साठवें वर्ष में उसे कोई सहयोगी और मित्रा मिलेगा, लेकिन मिला। इन आत्मकथाओं में दो बातें मेरी समझ में आती हैंµ एक तो आत्मनिर्भरता यानी अपनी जिम्मेदारी स्वयं उठाना, दूसरे अपने को हमेशा बेहतर ढंग से समझने का प्रयास। सीमोन ने सात्र्रा के साथ सहजीवन जिया लेकिन विवाह नहीं किया क्योंकि स्वाधीनता के अर्थ दोनों के लिए अलग अलग थे। सीमोन लिखती हैंµ ‘‘अद्भुत थी स्वाधीनता! मैं अपने अतीत से मुक्त हो गयी थी और स्वयं में परिपूर्ण और दृढ़निश्चयी अनुभव करती थी। मैंने अपनी सत्ता एक बार में ही स्थापित कर ली थी, उससे मुझे अब कोई वंचित नहीं कर सकता था, दूसरी ओर सात्र् एक पुरुष होने के नाते बमुश्किल ही किसी ऐसी स्थिति में पहुंचा था, जिसके बारे में उसने बहुत दिन पहले कल्पना की हो… वह वयस्कों के उस संसार में प्रविष्ट हो रहा था, जिससे उसे हमेशा से घृणा थी।’’

 वैसे, मैं अब उस खोज में हूं जिस ओर आंद्रियाना मेस्त्रोविच ने इशारा किया था। लिलियाना के निजी जीवन के बारे में मुझे विशेष जानकारी नहीं थी, वैसे भी किसी के निज की तफ्तीश असभ्यता ही मानी जाती है। प्रेमचंद ने भी कहा है कि ऐसा कोई भी प्रश्न जो सामने वाले को असुविधा में डाल दे, नहीं पूछा जाना चाहिए। सीमोन द बोउवार के लेखन के साथ सफर करते करते युद्धोत्तर यूरोप ओर उसकी बदली परिस्थितियों के बारे में जानना चाहती हूं और इसके लिए एक बंद दरवाजा है मेरे सामने लिलियाना का। वह वार विक्टिम है ऐसी सूचना मरीयाना ने भी दी थी। मुझे जो जानना है वह या तो लिली बता सकती है या दुष्का। दुष्का बहुत भावुक है, पता नहीं मेरी बात का क्या अर्थ निकाले। अपने घावों को खुद नखोरना कुरेदना और बात है और दूसरों के सामने खोल कर रख 200 / देना… लिलियाना को विदेशी पसंद हैं। विशेषकर गंदुमी सांवली रंगत। मेरे पास हैदराबाद से लाये हुए कुछ मोती हैं उन्हें ‘गिफ्ट रैपर’ में लपेट कर मैंने लिलियाना के घर जाना तय किया है। दुष्का साथ है। लिली खूब स्वस्थ लम्बी चैड़ी, लगभग पचास की उम्र छूती महिला है, जो सिर्फ सफेद टायलेट पेपर खरीदती है। रंगीन टायलेट पेपर के इस्तेमाल से कैंसर हो जाता है, ऐसा विश्वास है उसे। सन की तरह सुनहरे सफेद बाल, मैजेंटा रंग की गहरी लिपस्टिक, कड़कती ठंडी शाम में भी वह गर्दन और वक्ष का उ$परी भाग खुला रखती है। लोगों को देख ढलके वक्ष को थोड़ा सहारा देकर, उपर उठा गर्दन अकड़ा कर चलना उसकी आदत में शुमार है। हाई हील और ऊँची स्कर्ट पहने वह सम्भ्रांत लोगों के बीच उठती बैठती है। उसके हाव भाव मेरी अब तक की जानी चीन्ही स्त्रियों से अलग हैं। सन् 1992-95 के दौरान क्रोएशिया बोस्निया हर्जेगोविना में जो स्त्रियां सर्ब सेनाओं के दमन का शिकार हुईं, लिली उनमें से एक है। युद्ध के दौरान बलात्कार, यौन हिंसा के हजारों मामले सामने आये, कुछ मामले सरकारी फाइलों में दब गये, कुछ भुला दिये गये और कुछ शिकायतें वापस ले ली गयीं। कुछ स्त्रियां मार दी गयीं, कुछ अवसाद और अन्य रोगों का शिकार हो गयीं। हालांकि जेनेवा कन्वेंशन में युद्ध के दौरान यौन हिंसा और सैनिकों द्वारा स्त्रियों के एकल या सामूहिक बलात्कार को मानवता के विरुद्ध जघन्य अपराध माना गया लेकिन पूरे विश्व में युद्धनीति के तहत स्त्रियों के प्रति यौन हिंसा एक अलिखित चर्या है। युद्धकाल के बलात्कार सामान्य बलात्कारों से अलग माने जाते रहे हैं, इनमें से बहुत से वाकयों की तहकीकात भी नहीं हो पाती। कई बार शोषिताएं और घर्षिताएं सामने भी नहीं आतीं। लिलियाना उन 68 बोल्ड औरतों में से एक है जिसने व्यापक सामूहिक बलात्कार की घटना की न सिर्फ रिपोर्ट दर्ज की, बल्कि वक्त और परिस्थितियों के आगे हार नहीं मानी, मृत्यु और जीवन, मूकता और बोलने में से जीवन का चुनाव किया, चुप नहीं रही। प्रथम और द्वितीय दोनों विश्वयुद्धों में कई देशों में सैन्य और अर्धसैन्य बलों ने सामूहिक बलात्कार की अनगिनत घटनाओं को अंजाम दिया। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान बेल्जियम और रशिया औरतों के लिए सामूहिक मरणस्थली बने, वहीं दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान रूस, जापान, इटली, कोरिया, चीन, फिलीपींस और जर्मनी में बड़े पैमाने पर स्त्रिायों को घर्षित किया गया। आपसी छोटी बड़ी मुठभेड़ों में अफगानिस्तान, अल्जीरिया, अर्जेंटीना, बांग्लादेश, ब्राजील, बोस्निया, कम्बोडिया, कांगो, क्रोएशिया, साइप्रस, अल सल्वाडोर, ग्वाटेमाला, हैती, भारत, इंडोनेशिया, कुवैत, कोलम्बो, लाइबेरिया, मोजांबीक, निकारागुआ, पेरू, पाकिस्तान, रवांडा, सर्बिया, सोमालिया, टर्की, युगांडा, वियतनाम और जिम्बाब्वे जैसे देशों की लम्बी सूची है जहां यौन हिंसा और स्त्री की घटनाएं हुईं और बड़े बड़े भाषणों, राजनैतिक समझौतों के बीच प्रतिरोधी आवाजें दबा दी गयीं।

अब मुझे लिलियाना का पैर हिलाते हुए कंसर्ट सुनना, अंधाधुंध सिगरेट पीना, एक आंख को हल्का दबा कर हंस देना अटपटा नहीं लगता। स्पिलत के चारसितारा होटल का मालिक आजकल लिली पर दिलोजान से फिदा है। लिली का कहना है इन गर्मियों में वह स्पिलत जाकर पूरे साल का खर्चा निकाल लेगी। वह ‘एस्कोर्ट’ है जिसके साथ के लिए व्यापारी, पर्यटक अच्छी रकम खर्च करते हैं। लिली अपने बारे में गम्भीरता से बात नहीं करती। उसने यौन हिंसा और सामूहिक बलात्कार झेला है, वह हंसती है जिन्दगी पर। उसके साथ की चवालिस स्त्रियां (जो अभी जीवित हैं) सर्ब सैनिकों से कई बार घर्षित हुईं। इनमें से 21 यौनदासियों के रूप में सैन्यशिवरों में रहीं और 18 ऐसी वृद्धाएं थीं जो किसी न किसी बलात्कार की साक्षी रहीं। इनमें से 29 स्त्रियां बलात्कार के कारण गर्भवती हुईं जिनमें से 17 ने शर्म और अपमान से बचने के लिए गर्भपात करा लिया। कुछ ने संतान पैदा करके सरकारी अनाथाश्रम में मुक्ति पायी। लिली का एकमात्रा बेटा जो ड्रग के शिकंजे में सरकारी पुनर्वास योजना का मेहमान बना हुआ है, 1996 में ही जन्मा। लिलियाना को सब कुछ याद है ब्यौरेवार, लेकिन याद  / 201 करना नहीं चाहती। मैं भी उसे ज्यादा परेशान नहीं करती और अपने फ्लैट पर वापस आ जाती हूं। नींद नहीं आ रही क्या हुआ होगा लिलियाना जैसी सैकड़ों लड़कियों का, क्या गुजरी होगी उन पर। मैं घुप्प अंधेरे में हूँ… कोई चेहरा नहीं, सिर्फ कराहें… विक्टर फ्रैंकल ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ‘मैन्स सर्च फाॅर मीनिंग’ शीर्षक पुस्तक लिखी थी, जिसमें आश्वित्स के यातना शिविर की दैनंदिनी है। फ्रैंकल का कहना है कि जिस रूप में बंदी अपने भविष्य के बारे में सोचता था उसकी उम्र उसी पर निर्भर करती थी। उसने ‘लोगोथेरेपी’ का सिद्धांत दिया और बताया कि जिनके पास जीने का कोई कारण होता है, वे कैसे भी जी लेते हैं। इन यौनदासियों के पास जीने का क्या करण होगाµ पति, बच्चों, मां, सास के सामने निर्वस्त्र और बलात्कृत की जातीं, महीने दर महीने साल भर। उनके अपमान और यातना की कोई सीमा नहीं। उनके पास जीने का क्या कारण बच रहा होगा? अर्धनिद्रा में मुझे आश्तविज का यातना शिविर दीख रहा है बेचैनी, पसीना और घबराहट… गोद में बच्चा लिए लिलियाना दौड़ रही रही है, कांटेदार बाड़ के पास सैनिक ही सैनिक… गोरे लाल मुंह वाले लम्बे चैड़े सैनिक लिलियाना को नोच रहे हैं, घसीट रहे हैं, उसके मुंह पर थूक रहे हैं, पैरों को फैला रहे हैं, बछड़ा पैदा करती गाय सी डकरा रही है वह। उसके उपर एक एक करके लद गये हैं लोग… लिलि… लिलियाना…। अपनी चीख से नींद टूट गयी है… उठ कर देखा है फोन पर कुछ संदेश आये हैं… पानी पिया है, कभी की पढ़ी पंक्ति याद आती है


तुमि गुछिए किछू कथा बोलते पारो ना
शुधू समय निजे गल्पो बोले जाये

ठीक ही तो, कहां लिख पा रही हूं खूब व्यवस्था से। लिलियाना जैसी अनेकानेक ने मेरा चैन छीन लिया है, दिन रात उन्हीं के बारे में सोचती हूं और… और जानना चाहती हूं जिनकी कथा समय ही लिखेगा लेकिन कब?

लिलियाना और ईगोर ने मुझे पार्टी में चलने को कहा हैµ मैं थोड़े पेशोपेश में हूं। शाकाहारी और मदिरा से परहेज करने वाला भारतीय संस्कार चोले में मुंह दबाये हंस रहा है। पिता को मालूम चला और पितातुल्य गुरु नित्यानंद तिवारी, वे तो अविश्वस्त नेत्रों से ताकेंगे भर मुझे। लिली बताती है कि वहां कुछ औरतें मिलेंगी मुझे, जो हो सकता है अपने बारे में कुछ बोलें। खैर हम शलाटा जाते हैं जहां से ‘पाॅट पार्टी’ में जाना है। इसके बारे में मुझे कोई विशेष जानकारी नहीं, लेकिन पहंुचते ही लगा, नशीले धुएं से भरा माहौल दम घोंट देगा। कई लोग जिनमें लड़कियों की संख्या बहुत थी, हशीश, चरस, गांजा आदि का सेवन कर रहे हैं, बिना पिये ही सिर चकराने लगा। लोग चुप लेटे हैं, कोई छत ताक रहा है कोई दम लगा रही है, हल्का संगीत बज रहा है, ध्यान से सुना श्री श्री रविशंकर की सभाओं में बजने वाला हरे कृष्णा… राधे राधे यहां की हवाओं में झंकृत है। मैं बाहर जाना चाहती हूं, इस दमघोंटू माहौल में आकर गलती की… उफ नहीं आना चाहिए था। दीवार से सट कर एक जोड़ा खड़ा है, लड़के ने आगे बढ़ कर मुझसे कुछ कहा है और हौले से मेरे बाल छुए हैं। ‘जेलिम डौटाक्नुटी स्वोजे क्रेन ड्लाके’ (मैं तुम्हारे काले बाल छूना चाहता हूं) सुनते ही मैं दौड़ कर बाहर आ गयी हूं जैसे नरककुंड से बच कर लौटी हूं। लिलियाना और ईगोर का कुछ पता नहीं। मैंने तीन ट्रामें बदली हैं और सुरक्षित लौट आने के सुकून ने मुझे गहरी नींद दे दी। अगले रविवार लिलियाना हंस कर कहती हैं ‘नेमोज्ते से प्रेपाला’ यानी डरो मत, यहां जबरदस्ती कोई कुछ नहीं करेगा, तुम्हारे बाल काले हैं जो यहां वालों के लिए कुतूहल है।

तुर्केबाना येलाचीचा जाते हुए ट्राम लोहे की ईटों की सड़क के बीचोंबीच बने हुए ट्रैक पर मुड़ती है। गोल इमारत के ऊँचे-ऊँचे कांचदार दरवाजे जिनके भीतर भांति भांति की दुकानें हैं। उनी, 202 / सूती वस्त्र, जो अधिकतर भारत और चीन के टैग से सुसज्जित हैं, जूते वियतनाम और थाईलैण्ड के बिक रहे हैं, दुकानदार की शक्ल दुमकटे लोमड़ जैसी है। सपाट चेहरे पर लाल नाक और गहरी कंजी आंखें, व्यवहार में विनम्र दीखता है लेकिन लाल भूरे बालों के भीतर रखे सिर में कुछ ऐसा खदबदा रहा है, जिसे मैं ‘रंगभेद’ समझती हूं। सांवली रंगत का मनुष्य उसके बहुत सम्मान का पात्रा नहीं, ऐसी गंध मेरी छठी इंद्रिय को मिल रही है। दुकान के बाहर कोने पर एक छः सात वर्षीय गोरे, चित्तीदार चेहरे वाला लड़का शीशे से अपनी नाक सटाये है। बड़ा सा लबादा पहना हुआ है उसने। पैरों में नाप से बड़े जूते। दुकानदार को बाहर आते देख वह खरगोश की तरह फुदक कर गायब हो जाता है। इसके बाद ही जाग्रेब की मशहूर केक की दुकान है जहां क्रोशियन और जर्मन केक की ढाई सौ से अधिक किस्में अपने पूरे शबाब के साथ शीशे की पारदर्शी अलमारियों में भारी जेब के दिलदार खवैयों का इंतजार कर रही हैं। तुर्की की विजिटिंग प्रोफेसर गुलदाने कालीन ने इस दुकान की पेस्ट्री की तारीफ कई बार की है। आज सोचा खा ही लूं, इन केक्स की खूबी इनकी क्रीम है जो मनुष्य के मेदे और वजन को चुनौती देती है। मनचाहा सजीला संवरा, क्रीम में लिपटा, बारीक डिजाइनदार केक का रसीला बड़ा सा टुकड़ा प्लेट में सामने है, कीमत है पचास कूना यानी लगभग पांच सौ रुपये। अपने यहां भी ‘बरिस्ता’ में लगभग यही दाम है। केक का पहला टुकड़ा खाती हूं कि दुकान का मैनेजरनुमा आदमी बाहर खड़ बच्चे को दुरदुराता हुआ चिल्लाता है। हाथ में आलू चिप्स का फटा पैकेट लिए बच्चा दुकान के बीचोंबीच आ गया है, कर्मचारी लड़का उसका लबादा खींच कर घसीट रहा है। दुकान में सुरक्षा सायरन बजने लगा। बच्चा कुछ बोल नहीं पा रहा है, मेरे पहुंचते पहुंचते बच्चा फुटबाल की तरह सड़क पर फेंका जा चुका है। पूछने पर वह दुकान के कूड़ेदान की ओर इशारा करता है। ‘जा सम गलदना’ (मैं भूखा हूं) कह कर जार जार रो रहा है। अनुमान करती हूं कि किसी के अधखाये चिप्स उठा कर बच्चा पेट भर रहा होगा और दुकान मालिक ने देख लिया होगा। मुझे अब केक नहीं खाना। शायद कभी नहीं? खून से बच्चे की नाक रंग गयी है। केक खरीदती हूं उसके लिए। वह सुबकता हुआ जा रहा है, शायद शरणार्थी है। हाथ की मुट्ठी में दबे केक की सफेद क्रीम लाल हो रही है1 उफ मेरे मौला… ऐसे न जाने कितने बच्चे दरबदर हो भटक रहे हैंµ सम्मानहीन, भोजनहीन, आश्रयहीन। स्वयंसेवी संस्थाएं हैं, सरकारें हैं, लेकिन हम अपना सुखभोग छोड़ कर इनकी तरफ देखते हैं क्या? मन नम है और बाहर बरसात शुरू हो गयी है.

पास रहो, डर लग रहा है
लग रहा है कि शायद सच नहीं है यह पल
मुझे छुए रहो
जिस तरह श्मशान में देह को छुए रहते हैं
नितांत अपने लोग,
यह लो हाथ
इस हाथ को छुए रहो जब तक पास में हो
अनछुआ मत रखो इसे,
डर लगता है
लगता है कि शायद सच नहीं है यह पल
जैसे झूठा था पिछला लम्बा समय
जैसे झूठा होगा अगला अनंत
नवनीता देवसेन / 203

जाग्रेब पुनर्वास केन्द्र में औरतें जीवनयापन के लिए छोटेमोटे काम सीखती हैं जिनमें सामान की पैकेजिंग, मुरब्बे, जैम, अचार, मसाले इत्यादि बनाना शामिल है। बोस्निया, हर्जेगोविना, क्रोएशियाके खिलाफ युद्ध में सर्बिया ने नागरिकों को डराने के लिए उनकी स्त्रिायों पर बलात्कार किये। आक्रमणकारी छोटे छोटे समूहों में गांवों पर हमला करते जिनका पहला निशाना होतीं लड़कियां और औरतें। सामूहिक बलात्कार का सार्वजनिक प्रदर्शन किया जाता ताकि दूसरे गांवों को अपने हश्र का अंदाजा हो जाये। 1991-1995 के दौरान सर्ब सैनिकों ने सैन्य कैम्पों, होटलों, वेश्यालयों में बड़े पैमाने पर यौन हिंसा के सार्वजनिक प्रदर्शन किये। बोस्निया और हर्जेगोविना पर जब तक सर्बिया का कब्जा रहा, किसी उम्र की कोई स्त्री ऐसी नहीं बची जिसका घर्षण या बलात्कार न किया गया हो। लिली और दुष्का तब अपनी नानी के गांव में रहा करती थीं। दुष्का को पर्यटन विभाग में नौकरी मिली और वह जाग्रेब चली आयी। सर्ब होते हुए भी वे दोनों क्रोएशिया की नागरिक थीं और उससे भी पहले थीं लड़कियांµ ताजा, जिन्दा, टटका स्त्री मांस। लिली उन आभागी लड़कियों में से एक थी, जिन्हें नोचा खसोटा और पीट कर कैद में रखा गया। कई लड़कियों को अश्लीलता के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए बाध्य किया जाता रहा, यौनांगों को सिगरेट से दागा गया और एक दिन में कई बार बलात्कार किया जाता रहा। इन पुनर्वास केन्द्रों ने ऐसी स्त्रिायों को स्वावलम्बी बनने में मदद की थी और यह सिलसिला अब भी जारी है। युद्ध शुरू होते ही परिवार के परिवार गांवों को छोड़ कर भाग जाते, पीछे छूट जाते खेत, ढोर डंगर और पकड़ ली जातीं औरतें जिनकी उम्र दस से लेकर साठ सत्तर वर्ष की हुआ करती। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस तरह के अत्याचारों को युद्ध अपराध की संज्ञा दी गयी, लेकिन युद्ध थमने के बाद भी यौन हिंसा की शिकार इन औरतों के लिए कोई ठोस सरकारी नीति नहीं बनी। विश्व के कई देशों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी पर आधिपत्य जमाने के लिए ‘बलात्कार’ का हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। इसी तरह बांग्लादेशी स्त्रिायों का पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा बड़े पैमाने पर घर्षण किया गया। युगांडा के सिविल वार और इरान में स्त्रिायों से जबरदस्ती यौन सम्बंध बना कर अपमानित करने की घटनाओं से हम सब वाकिफ हैं। चीन के नानकिंग में जापानी सेना द्वारा स्त्रिायों का सामूहिक यौन उत्पीड़न, दमन और श्रीलंकाई स्त्रिायों के घर्षण के हजारों मामले ‘नवसाम्राज्यवाद’ को फैलाने के लिए जोरदार और कारगर हथियार बने। कई स्त्राीवादियों ने वृत्तचित्रों, फिल्मों द्वारा इस तरह की घटनाओं के खिलाफ जनमत संग्रह के कारगर प्रयास भी किये, लेकिन बोस्निया और हर्जेगोविना की औरतों की बात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गम्भीर चर्चा का विषय कभी बनी ही नहीं। क्रोएशिया से सटे बोस्निया जाने का निर्णय मैंने किया है, जिसके लिए भारतीय दूतावास से अनुमति अनिवार्य है।

दूतावास में बोस्निया जाने की अनुमति आसानी से मिल गयी लेकिन वहां के अधिकारी बड़े दबे स्वर में उपहास करते हैंµ ‘‘लोग तो पेरिस और इटली, जर्मनी घूमते हैं, मजे करते हैं और आप ‘वार विक्टिम’ के पीछे पड़ी हैं।’’ बोस्निया में लूट, भ्रष्टाचार, झूठ, राहजनी सभी कुछ हैं लेकिन हरियाले खेतों के बीच से जाती सड़क का रास्ता बुरा नहीं। बोजैक बोस्नियाई विद्यार्थी है, जो जाग्रेब में पढ़ता है, साथ ही कुछ रोजगार भी। उसकी उम्र पचास के उ$पर ही है, उसके सामने ही उसकी आठ वर्षीय बेटी और पत्नी को बार बार घर्षित किया गया। बच्ची तीन दिन तक रक्त में डूबी रही, सैनिक उससे खेलते रहे, इस बीच कब उसने अंतिम सांस ली, पता नहीं। बोजाक वह जगह दिखाता है जहां उसकी पत्नी दिल की बीमारी और अवसाद से मर गयी। ‘लाइफ मस्ट गो आॅन’ कह कर बोजाक फटी आंखों से हंसता है और अगला युद्ध कैम्प दिखाने चल पड़ता है। बच्ची को खोकर, बाद के वर्षों में उसकी पत्नी प्रभु ईसू से अपने अनकिये पापों के लिए दिन भर क्षमा मांगा करती। 204 / उसका पाप क्या था? इसके उत्तर में बोजाक कहता है ‘‘औरत होना…।’’ शांति स्थापित होने के बाद भी जिन्होंने युद्ध को अपनी देहों पर रेंगता, चलता, बहता महसूस किया, एक बार नहीं अनेक बार जिनकी कोखों ने क्रूर सैनिकों के घृणित वीर्य को जबरन वहन किया, वे हमेशा के लिए हृदय और मानसिक रोगों का शिकार हो गयीं। रवांडा में तो अकेले 1994 में लगभग 5000 बच्चे युद्ध हिंसा के परिणामस्वरूप जन्मे थे। क्रोएशिया में ऐसे बच्चों की सही संख्या का पता कोई एनजीओ नहीं लगा सका, क्योंकि अधिसंख्य मामलों में लोग चुप लगा गये, पड़ोसी नातेदार सब जान कर भी घाव कुरेदने से बचते रहे। युद्ध सबके दिलो दिमाग में पसर गया। बलात्कार की शिकार या गवाह रही अधिसंख्य स्त्रिायां मृत्युबोध से ग्रस्त हैं। वे सामाजिक सम्बंध भी स्थापित नहीं करना चाहतीं। कई तो बस सालों तक टुकुर टुकुर ताकती रहीं, कुछ बोल नहीं पातीं। कुछ ने अपना घरबार छोड़ दिया और फिर कभी यौन सम्बंध स्थापित नहीं कर पायीं। एक मोटे अनुमान के अनुसार बोस्निया में युद्ध के दौरान लगभग पचास हजार लड़कियां और औरतें बलात्कार का शिकार हुईं और उधर ‘इंटरनेशनल क्रिमिनल ट्रिब्यूनल फाॅर द फार्मर यूगोस्लाविया’ यौन दासता और बलात्कार को मानवता के प्रति अपराध के रूप में दर्ज कर कागज काले करता रहा।

संयुक्त यूगोस्लाविया का विखंडन बोस्निया और हर्जेगोविना, क्रोएशिया, मैसीडोनिया गणतंत्रा,स्लोवेनिया जैसे पांच स्वायत्त देशों में हुआ था, जो बाद में चल कर सर्बिया, मांटेग्रो और कोरनोवो में बंटा। क्रोएशियाई, सर्ब और बोस्नियाई लोगों के बीच जो युद्ध और झड़पें हुईं उनमें से अधिकतर भूमि अधिग्रहण को लेकर थीं। आज भी सात हजार से अधिक क्रोएशियन शरणार्थी बोस्निया और हर्जेगोविना में हैं और इस देश में लगभग 131,600 लोग विस्थापित हैं। क्रोएशिया और बोस्नया की 935 किमी की सीमा साझा है। हमें यहां पर धोखाधड़ी से बार बार क्रोएशियन दूतावास, जो सराजेवा में है, आगाह किया गया है। रास्ते में कई बार पासपोर्ट और वीजा चेक किया गया। मुझे यहां के खस्ताहाल संचार साधनों और सड़कों को देख कर भारत के कई छोटे शहरों की याद आती है। पूरे इलाके में बारूदी सुरंगों का खतरा है, इसलिए पुलिस ट्रैफिक को रो कर घंटों पूछताछ करती है। पुराने लोग अंग्रेजी नहीं समझते, जबकि नयी पीढ़ी अंग्रेजी बोलती और समझती है। युद्ध के दौरान कई
बोस्नियाई जर्मनी भाग गये थे, इसलिए इनकी भाषा में जर्मन शब्दों का आधिक्य है। हमें उना नदी में रिवर राफ्टिंग का आमंत्राण है लेकिन मेरा ध्यान कहीं और है।

कल लिली ने 1993 के लास एंजिल्स टाइम्स में प्रकाशित मिरसंडा की आपबीती दी थी। होटल लौट कर मैंने वही टुकड़ा उठाया हैµ ‘‘रोज रात को सफेद चीलें हमें उठाने आतीं और सुबह वापस छोड़ जातीं। कभी कभी वे बीस की तादाद में आते। वे हमारे साथ सब कुछ करते, जिसे कहा या बताया नहीं जा सकता। मैं उसे याद भी नहीं करना चाहती। हमें उनके लिए खाना पकाना और परोसना पड़ता नंगे होकर। हमारे सामने ही उन्होंने कई लड़कियों का बलात्कार कर हत्या कर दी, जिन्होंने प्रतिरोध किया, उनके स्तन काट कर धर दिये गये।

‘‘ये औरतें अलग अलग शहरों और गांवों से पकड़ कर लायी गयी थीं। हमारी संख्या लगभग 1000 थी। मैंने लगभग चार महीने कैम्प में बिताये। एक रात हमारे सर्बियाई पड़ोसी के भाई ने हममें से 12 को भगाने में मदद की। उनमें से दो को सैनिकों ने पकड़ लिया। हमने कई दिन जंगल में छुप कर बिताये। अगर पड़ोसी हमें न बचाता तो मैं बच ही नहीं पाती, शायद अपने को मार लेती, क्योंकि मैं जिस यातना से गुजरी, उतनी यातना तो मृत्यु में भी नहीं होती।

‘‘कभी कभी मुझे लगता है कि रात के ये दुःस्वप्न मेरा पीछा कभी न छोडेंगे। हर रात मुझे कैम्प के चौकीदार स्टोजान का चेहरा दीखता है। वह उन सबमें सबसे निर्मम था, उसने दस साल की  बच्ची को भी नहीं बख्शा था। ज्यादातर बच्चियां बलात्कार के बाद मर जाती थीं। उन्होंने बहुतों को मार डाला। मैं सब कुछ भूलना चाहती हूं, नहीं तो मर जाउगी।’’

 पढ़ कर मेरा मन घुटन से भर गया है, भूख नींद गायब हो गयी है। स्काइप खोल कर देखा है। कोई मित्र आत्मीय आॅनलाइन नहीं है। इस समय भारत में आधी रात होगी। दिल बहलता नहीं बाल्कन प्रदेश के पार से आती गुमसुम बोझिल हवाओं के घोड़ों पर सवार लम्बे, कद्दावर क्रूर सर्बियाई सैनिक दीखते हैं, हवा में तैरती चीखें और पुकारें हैं। 1992 में फोका की स्कूल जाने वाली लड़की बताती है कि कैसे जोरान वुकोविच नामक आदमी ने उससे जबरदस्ती संसर्ग किया और बाद में दूसरों के आगे परोस दिया। स्कूल में सैनिकों का जत्था घुसा और आठ लड़कियों को चुन कर उनसे निचले कपड़े उतार कर फर्श पर लेटने को कहा। पूरी क्लास के सामने इन आठों का जम कर बलात्कार किया गया। सैनिकों ने बोस्नियाई मुसलमान लड़कियां चुनीं, उनके मुंह में जबरन गुप्तांग ठूंसे और कहा ‘‘तुम मुसलमान औरतें (गाली देकर) हम तुम्हें दिखाते हैं।’’ उसके पास कोई शब्द ऐसा नहीं, जो उसकी यातना व्यक्त करने में सक्षम हो। बार बार यही कहती है ‘एक औरत के साथ इससे बदतर कुछ हो ही नहीं सकता।’

उसे बाद में पाट्रीजन स्पोर्ट्स हाॅल में, अलग अलग उम्र की लगभग साठ अन्य स्त्रिायों के साथ बंधक बना कर रखा गया। वे बारी बारी सर्ब सैनिकों द्वारा ले जायी जातीं और बलात्कार के बाद लुटी पिटी घायल अवस्था में स्पोर्ट्स हाल में बंद कर दी जातीं। सर्ब सेनाओं ने घरों, दफ्तरों और कई स्कूलों की इमारतों को यातना शिवरों में बदल डाला था। एक बोस्नियाई स्त्राी ने बतायाµ ‘‘पहले दिन हमारे घर पर कब्जा करके परिवार के मर्दों को खूब पीटा गया। मेरी मां कहीं भाग गयी, बाद में भी उसका कुछ पता नहीं चल पाया। वे मुझे नोचने खसोटने लगे। भय और दर्द से मेरी चेतना लुप्त हो गयी… जब जगी तो मैं पूरी तरह नंगी और खून से सनी हुई फर्श पर पड़ी थी… यही हाल मेरी भाभी का भी था… मैं जान गयी कि मेरा बलात्कार हुआ है… कोने में मेरी सास बच्चे को गोद में लिए रो रही थीं।… उस दिन से हमें हमारे ही घर में कैद कर दिया गया। यह मेरी जिन्दगी का सबसे बुरा वाकया था… वे हमेशा हमें पंक्तिबद्ध कर सैनिकों के सामने ले जाते और हमें परोस देते। मकान में वापस लाकर भी अश्लील हरकतों के लिए मजबूर करते और हमें रौंदते… हमारे बच्चों के सामने भी हमें खसोटते। ये सब एक साल तक चला, अधिकतर औरतें या तो मर गयीं, पागल हो गयीं या वेश्याएं बन गयीं।’’

युद्ध के बाद ‘डेटन एकाॅर्डस’ नाम से शांति समझौता हुआ था, जिसके अनुसार यौन हिंसा पीड़िताओं को घरवापसी पर मकान और सम्पत्ति दी जानी थी लेकिन ऐसी बहुत कम औरतें थीं, जो घरवापसी के लिए तैयार थीं। अधिसंख्य ने अपने पुराने मकानों में लौटने से इनकार कर दिया क्योंकिवहां उनकी यातना और अतीत के नष्ट जीवन के स्मृतिचिह्न थे।

अप्रैल 1992 के दिन को इतने वर्षों बाद भी हासेसिस नाम मुस्लिम स्कूली छात्रा भूल नहीं पायी है, जब सर्ब सैनिक उसे विजेग्राद के पुलिस स्टेशन के तहखाने में ले गयेµ ‘‘उस कमरे में लकड़ी का बहुत सा सामान था, कुर्सियां वगैरह। वहां मैंने मिलान ल्यूसिक और स्ट्रोजो लूसिक को देखा। मैं मिलान को अच्छी तरह जानती थी। उसने चाकू लहराते हुए कहाµ ‘अपने कपड़े उतारो, लगा वह मजाक कर रहा है… लेकिन सच यही था कि इतना पुराना सर्बियाई पड़ोसी कई सैनिकों के साथ मुझेअपमानित करने पर तुला था…।’


स्पाहोटल ‘विलिना व्लास’, जो आज पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है, विश्वास नहीं होता पर मुझे बताया जाता है कि यहां दो सौ औरतों को बंद करके रखा गया था। बूढ़ी बाल्कन स्त्री को 206 / तारीख याद नहीं लेकिन वाकया बखूबी याद है ‘‘मैं अपने बेटे को लेकर जंगल में छिप गयी थी। मेरा 16 साल का बेटा मेरे साथ था लेकिन बेटी को मैंने घर के तहखाने में छिपा दिया था, क्योंकि सुनने में आया था कि वे लड़कियां उठा ले जाते हैं। उन्होंने मुझे पकड़ कर धमकाया, बेटे के सामने मेरे कपड़े उतारे और चाकू से बेटे का गला रेत दिया, ‘मम्मी’ यही अंतिम शब्द था जो मेरा बेटा बोल पाया। कभी कभी वे मुझे दो दिन के लिए कैम्प ले जाते फिर होटल वापस छोड़ जाते। मैं गिनती ही भूल गयी कि उन्होंने कितनी बार मुझसे बलात्कार किया। होटल के सारे कमरों में ताले लगे रहते, वे खिड़की के रास्ते हमें रोटी फेंकते, जिसे हमें दांतों से पकड़ना पड़ता क्योंकि हमारे हाथ तो पीछे बंधे रहते। सिर्फ बलात्कार के वक्त ही हमारे हाथ खोले जाते। हमें समय का ज्ञान भूल गया। हमारी देह को सिगरेट से जलाया जाता, जीभ पर चाकू चला कर मांस का टुकड़ा काट लिया जाता। हममें से ज्यादातर औरतें न बोलती थीं, न रोती थीं। कुछ ने अपनी जान भी ले ली और कई तो दर्द और भूख से मर गयीं। कई औरतों का सात से नौ घंटे के बीच नौ बार बलात्कार हुआ। कुछ बलात्कारों की रिकार्डिंग भी की गयी, जिनका इस्तेमाल पोर्नोग्राफी के बाजार के लिए किया गया।’’



ये बलात्कार किसी सरकार द्वारा नहीं बल्कि व्यक्ति विशेष द्वारा किये गये थे, इसलिए कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों का मानना था कि ये मानवाधिकारों का उल्लंघन नहीं है क्योंकि उन्हें लगता था कि सिर्फ सरकारी संगठन ही मानवाधिकारों का उल्लंघन कर सकते हैं, लेकिन बाद में जब बोस्निया सरकार ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में सर्ब सैनिक टुकड़ियों की हिंसा को ‘जेनोसाइड’ कहा और 1993 में संयुक्त राष्ट्रसंघ ने पहली बार ‘अंतरराष्ट्रीय युद्ध अपराध ट्रिब्यूनल’ की घोषणा की, तब ऐसे कुछेक मामलों की सुनवाई आरम्भ हुई। इन सुनवाइयों में कभी आरोपी की पहचान से इनकार किया गया तो कभी मुद्दई ने आरोप वापस ले लिए। दिलचस्प यह भी था कि ट्रिब्यूनल के पास सुनवाइयों की व्यवस्था के लिए धन का नितांत आभाव था, जिसकी पुष्टि 7 दिसम्बर 1994 के न्यूयार्क टाइम्स की रपट करती है। दुखद आश्चर्य था कि ट्रिब्यूनल की 18 सदस्यीय जांच समिति में मात्रा तीन स्त्रियां थीं। लम्बी जांच प्रक्रिया के बाद बोस्निया में यातना शिविर चलाने और हिंसा के लिए 21 सर्ब सैनिक कमांडरों को दोषी पाया गया। न्यायालय ने कहा कि µ ‘ओर्मास्का कैम्प में स्त्रियों को बंधक बनाया गया, बलात्कृत कर जान से मारा गया। कइयों को बुरी तरह पीटा और अन्य बर्बर ढंग से बर्ताव किये गये।’ न्यूयार्क में अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून की विशेषज्ञ रोंडा कोंपलोन का मानना था कि  स्त्रिायों की अनुमति/सहमति के बिना ऐसे मामलों में उनकी पहचान को सार्वजनिक करना गलत है। बोस्निया की मुस्लिम बहुल आबादी में ऐसी स्त्रिायां बहुत कम थीं, जो आरोपियों को पहचानने के लिए आगे आयीं।


बोस्निया युद्ध हिंसा की शिकार अधिसंख्य स्त्रियों को न्याय नहीं मिला। कुछ मर खप गयीं और कुछ दूसरी जगहों पर बस गयीं। युद्ध में शक्ति प्रदर्शन, लिंग विशेष के प्रति संचित घृणा ही बलात्कार जैसे कृत्यों में परिणत होती है। बलात्कार और यौन हिंसा एक तरह की ‘युद्ध रणनीति’ है, जिसके लिए कठिनतम और कठोर दंड का प्रावधान जब तक नहीं होता तब तक बलात्कार के शिकार बच्चों, स्त्रियों या अन्य किसी भी व्यक्ति को न्याय नहीं मिल सकता। युद्धकालीन यौन हिंसा की ओर से आंखें मूंदे रखना अधिसंख्य देशों की अघोषित राष्ट्रीय रणनीति है, लेकिन कागज पर विश्व के तीन चैथाई देशों ने युद्ध के दौरान यौन हिंसा को खत्म करने के लिए ‘डेक्लरेशन आॅफ कमिटमेण्ट टू सेक्सुअल वायलेंस इन काॅनफ्लिक्ट्स’ पर दस्तखत कर रखे हैं। लौटने के पहले बोस्निया के ल्यूकोमीर गांव की तरफ हम घूमने गये हैं। कहा जाता है कि यह यूरोप में सबसे उ$ंचाई पर बसा हुआ गांव है जहां आज भी आदिम सभ्यता सुरक्षित है। बिजली और आधुनिक उपकरणों के बिना जीवनयापन  / 207 आराम से हो रहा है। इसमें मेरे लिए आश्चर्य वाली कोई बात नहीं क्योंकि भारत में आज भी कई गांव बिजली जैसी सुविधा से वंचित हैं। लिलियाना मुझे घुमाने में थक गयी है, मेकअप की गहरी परत के भीतर छिपा विषाद उसके चेहरे पर दीख रहा है। पूरे रास्ते उसने मेरा कंधा पकड़ रखा है, शायद सब कुछ कह देने के बाद मनुष्य कमजोर हो जाता है। रवीन्द्रनाथ ने अंतिम यूरोप यात्रा से लौट कर शांतिनिकेतन में कहा थाµ ‘आमि ओई खाने कंठ ता हारिए ऐशेछी’। आज समझ पायी हूं कि रवि बाबू यूरोप जाकर अपना गान भूल क्यों गये होंगे। क्रोएशियन हाइकू कवि और पेशे से डाॅक्टर तोमिस्लाव मारेतिच जाग्रेब आये हैं। उन्हें मैंने बोस्निया यात्रा वृत्तांत के कुछ टुकड़े सुनाये हैं। बड़ी देर चुप रहने के बाद इटली से मिहिनो का भेजा स्कार्फ मुझे देते हुए दोस्ताना पेशकश करते हैंµ ‘नेमोज्ते पिसाती ओवो। ने ओब्जाविती ओवो’ (कृपया मत लिखो इसे। प्रकाशित मत करो) मैंने मुस्करा कर क्रोएशियन ढंग से सिर हिला दिया है। छपाने न छपाने के द्वंद्व में तीन वर्ष गुजर गये हैं। सन् 2010-2011 की प्रवास दैनंदिनी अब मुक्त हुई है, स्वच्छंद उड़ान के लिए। मित्रा की बात न रख सकी, इसका अफसोस है। डायरी के पन्ने सुधारते सुधारते हर सुबह गुरुदेव गुनगुना जाते हैं
अंध जने देहो आलो
मृत जने देहो प्राण
तुमि करुणामृत सिन्धु
करो करुणादान
जे तोमाए डाके नहीं
तारे तुमि डाको, डाको…
(दृष्टिहीन को प्रकाश दो, मृत देह को दो प्राण, तुम करुणा अमृत के सागर हो, करो करुणा का दान। जिसने तुम्हें पुकारा नहीं उसे भी तुम पुकारो ‘गीतवितान’)

टेलिविजन पर बीबीसी बल्ड चल रहा है। युद्ध के दौरान यौन हिंसा के विवरण जुटाने और जांच करने के बारे में विलियम हेग और एंजेलीना जाॅली द्वारा शुरु किये गये अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकोल का प्रारूप प्रसारित हो रहा है.

‘‘हम सभी देशों से अपील करेंगे कि वे बलात्कार और यौन हिंसा सम्बंधी अपने कानूनों को अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के अनुरूप बनायें। हम सभी सैनिकों और शांतिरक्षकों के उचित प्रशिक्षण की मांग करेंगे ताकि वे युद्ध क्षेत्रा में यौन हिंसा को समझ और रोक सकें। शरणार्थी कैम्पों में रोशनी के प्रबंध से लेकर जलावन एकत्रा करने बाहर जाने वाली महिलाओं के साथ रक्षाकर्मी के जाने जैसे साधारण उपायों के जरिये हमले की संख्या में भारी कमी लायी जा सकती है और हम चाहते हैं कि ये आधारभूत सुरक्षा उपाय सार्वभौम हों।’’

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पद्मावती फिल्म में ‘सती’ दिखाये जाने के खिलाफ संसदीय समिति के सवाल: स्त्रीकाल में पहली बार दर्ज हुआ था यह सवाल

पिछले दिनों स्त्रीकाल में स्त्रीवादी अधिवक्ता अरविंद जैन ने एक लेख लिखकर पहली बार इस मुद्दे की ओर ध्यान दिलाया था कि फिल्म या कोई टेक्स्ट 1987 के सती क़ानून के बाद क्या सती का महिमांडन करती प्रस्तुति कर सकता है? संसदीय पैनल ने भी यही सवाल पद्मवती फिल्म के निदेशक संजय लीला भंसाली से पूछा कि क्या सती या जौहर दिखाया जा सकता है? हालांकि अधिकांश ख़बरों में इस महत्वपूर्ण सवाल पर चर्चा तक नहीं हुई.

19 नवंबर के अपने लेख में अरविंद जैनसवाल लिखते हैं: 

1987 के ‘सती प्रिवेंशन एक्ट’ ने यह सुनिश्चित किया कि सती की पूजा, उसके पक्ष में माहौल बनाना, प्रचार करना, सती करना और उसका महिमामंडन करना भी क़ानूनन अपराध है.  इस तरह  पद्मावती पर फिल्म बनाना, उसे जौहर करते हुए दिखाना, सती का प्रचार है, सती का महिमामंडन है और इसलिए क़ानून का उल्लंघन भी. यह एक संगेय अपराध है और इसका काग्निजेंस सेंसर बोर्ड को भी लेना चाहिए. क्योंकि सेंसर बोर्ड को भी जो गाइड लाइंस हैं वह स्पष्ट करती हैं कि कोई भी फिल्म ऐसी नहीं हो सकती जो क़ानून के खिलाफ हो या संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ जाती हो.  इसलिए सेंसर बोर्ड को भी देखना चाहिए कि क्या यह फिल्म सती प्रथा का महिमामंडन करती है?  यदि ऐसा है तो उसे फिल्म को बिना कट प्रमाण पत्र नहीं देना चाहिए. अदालतों को भी सुमोटो एक्शन लेना चाहिए था. यह ऐसा ही है कि देश में छुआछूत बैन हो और आप छुआछूत को जस्टिफाय करने वाली फ़िल्में बना रहे हैं. रचना कर रहे हैं.

30 नवंबर  को संसदीय पैनल ने पूछा: 


क्या सती और जौहर दिखाया जा सकता है? इसके अलावा अन्य सवाल थे:  क्या उन्होंने सेंसर बोर्ड को प्रभावित करने के मसकद से कुछ मीडिया समूहों को अपनी फिल्म दिखाई थी और क्या यह कदम उचित और नैतिक है?  ‘आपने 11 नवंबर को आवेदन करने के बाद यह कैसे मान लिया कि फिल्म एक दिसंबर रिलीज हो जाएगी, जबकि सिनेमैटोग्राफी एक्ट के अनुसार किसी फिल्म के प्रमाणन में 68 दिन का समय लग सकता है?’  क्या आजकल फिल्म को चर्चा में लाने के लिए उसके आसपास विवाद खड़ा किया जाता है? ऐसे ही अन्य सवाल.

पढ़ें अरविंद जैन का पूरा लेख: फिल्म पद्मावती पर सेंसर किये जाने की स्त्रीवादी मांग 




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हर्षिता दहिया की हत्या और न्याय का प्रश्न

प्रियंका

हर्षिता दहिया उस समाज की लड़की थी, जहाँ लड़कियों का घर से बाहर निकलना, जींस पहनना, फोन रखना तक बुरी बात समझी जाती है, ऑनर किलिंग जहाँ आम बात है, ऐसे समाज की कोई लड़की पंचायत में बैठकर सामाजिक उत्तरदायित्व और राजनीतिक मसलों पर मुखर होकर बात करे तो यह असाधारण घटना ही है।
17 अक्टूबर 2017 को हर्षिता किसानों के हकों के लिए आयोजित की गई एक सभा को संबोधित करने गई थी। वहाँ उसने बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया कि किसानों के हक़ छीने जा रहे हैं और यदि हम समय रहते उनके साथ खड़े नहीं हुए तो हम सब भूखे मरेंगे। उसने लोगों से किसानों के हक़ में जात-पाँत से ऊपर उठकर इंसानियत के नाते एकजुट होने का आग्रह किया। सभा सम्पन्न होने के बाद जब वह लौट रही थी, तब बीच रास्ते में उसकी कार को रोक कर उसपर ताबड़तोड़ गोलियां चलाकर, उसकी हत्या कर दी गयी।

हर्षिता कई मोर्चों पर संघर्षरत थी। हरियाणा की लोक गायिका और डांसर होने के नाते वह कलाकारों के अधिकारों के लिए भी संघर्ष कर रही थी। खबरों के मुताबिक अपने निजी जीवन में भी वह कई तरह के संघर्षों से गुजर रही थी।



अपनी बेबाकी, अपनी चेतना और साहस के कारण हर्षिता एक सशक्त महिला के बतौर उभर रही थी। कायरों ने उसकी हत्या करके अपनी बहादुरी तो साबित कर दी, लेकिन हरियाणा ने एक बहादुर और संभावनाशील लड़की को खो दिया।

हरियाणा के लोगों को इस हत्या के बाद उबल पड़ना चाहिए था और सरकार और कानून के रखवालों से हिसाब मांगना चाहिए था । उन्हें समाज की सड़ी हुई और हिंसक मानसिकता वाले तत्वों का बहिष्कार शुरू कर देना चाहिए था,लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। एक बार यह फिर से सिद्ध हुआ कि हत्या भले ही एक ज़िंदा लड़की की हुई हो, लेकिनबेशक वह मुर्दापरस्तों की बस्ती में रहा करती थी !

हर्षिता दहिया की हत्या की जाँच भी आनन-फानन में बहुत ही अजीब तरीके से हुई । हरियाणा पुलिस ने एक हफ्ते के भीतर इस मामले को सुलझा लेने का दावा किया था। हर्षिता की माँ की हत्या के मामले मेंपहले से जेल में बंद हर्षिता के बहनोई से यह कबूल करवा लिया गया कि उसी ने हर्षिता की भी हत्या करवायी है। खबरों के मुताबिक हर्षिता अपनी माँ की हत्या की एकमात्र चश्मदीद गवाह थी। जेल में पहले से बंद संगीन अपराध के एक आरोपी से यह कबूल करवा लेना कि उसी ने उसपर लगे आरोप के एक चश्मदीद की हत्या करवा दी, क्या बहुत कठिन काम है?


हर्षिता ने अपने कुछ पिछले फेसबुक लाइव में कुछ लोगों सेउसे मिल रही धमकियों की बात की थी। उसे फेसबुक प्रोफाइल पर सार्वजनिक रूप से भी धमकियाँ दी जा रही थीं। उसकी बातों से यह संकेत मिलता है, कि उसे धमकियाँ देने वाले उसके रिश्ते के लोग नहीं थे। यह अफसोसनाक है कि इस मसले पर हरियाणा पुलिस ने सभी ज़रूरी कोणों से जाँच करने की ज़रूरत नहीं समझी। मुमकिन हैकि अपने प्रतिरोधी स्वभाव, साहस और अपनी बढ़ रही लोकप्रियता की वज़ह से वह कुछ लोगों के निशाने पर हो।बहुत मुमकिन है कि हरियाणा पुलिस इस घटना के असल अपराधियों को उनके रसूख की वज़ह से बचा रही हो।

हरियाणा पुलिस के निष्कर्षो पर यकीन कर लेने से पहले हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हाल ही में हरियाणा पुलिस के द्वारा गुड़गाँव के रेयान इंटरनेशनल स्कूल के एक छात्र प्रद्युम्नकी हत्या का मामला सुलझाने का दावा भी ग़लत साबित हुआ है। स्कूल के बस कंडक्टर अशोक को हरियाणा पुलिस ने न सिर्फ पीडोफ़ाइल और हत्यारा बताया बल्कि कथित तौर पर अशोक को टॉर्चर करते हुए ज़ुर्म भी कबूल करवा लिया था। बाद के सीबीआई जाँच में अशोक को निर्दोष पाया गया और एकदम अलग ही थियरी सामने आयी ।

इस घटना का एक और दुर्भाग्यपूर्ण पहलू मीडिया की खराब रिपोर्टिंग है। हर्षिता दहिया की हत्या को लेकर संवेदनशीलता के साथ न्याय की ज़रूरत पर बात करना तो दूर मीडिया में हर्षिता को लेकर घटिया, अपमानजनक और पूर्वाग्रह से ग्रस्त रिपोर्टिंग की गयी। उदाहरण के लिए न्यूज चैनल ‘आजतक’ की वेबसाइट पर लगायी गयी रिपोर्ट की भाषा पर ग़ौर कीजिए, जो कहती है कि-‘दिल्ली और हरियाणा की महफिलों की जान हुआ करती थी हर्षिता’! स्त्री विरोधी और असंवेदनशील भाषा का प्रयोग तो खैर हमारे देश की मीडिया के लिए कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन पूर्वाग्रह और घटियापने की हद देखिए, जब रिपोर्टिंग आगे कहती है कि ‘हत्या से पहले भी एक शानदार कार्यक्रम देकर लौट रही थी हर्षिता’!

सच्चाई यह है कि वह हरियाणा के पानीपत जिले में ऐसी सभा को सम्बोधित कर के लौट रही थी, जो विभिन्न जाति बिरादरियों में एकता स्थापित कर किसानों के हक़ में संघर्ष को तेज करने के उद्देश्य से आयोजित की गयी थी। उसकी हत्या से दो घंटे पहले के फेसबुक लाइव हर्षिता की फेसबुक वॉल पर मौजूद है, कोई चाहे तो इन्हें देख सकता है।


हरियाणा पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था और जाँच प्रक्रिया पर सवाल उठाने के बजाय ‘आजतक’ हरियाणा पुलिस के हवाले से खबरें छाप रही थी कि, हर्षिता एक गैंगेस्टर थी और अपने लिए इंतकाम चाह रही थी! कितनी कमाल की थियरी है, एक इंतकाम चाहने वाली गैंगेस्टर निहत्थी गोलियाँ खाने के लिए निकल पड़ी थीं!

हर्षिता हरियाणा की उभरती लोक गायिका थी लेकिन उसकीजघन्य हत्या के मामले में सत्ता और विपक्ष तो छोड़िये वैकल्पिक राजनीति का दावा करने वाले हरियाणा के मुखर नेताओं में से भी किसी ने संवेदनशीलता के साथ प्रतिक्रिया देना तक ज़रूरी नहीं समझा। इस घटना को अब एक महीने से अधिक बीत चुका है। मीडिया से तो इस घटना से जुड़ीख़बरें तीन-चार दिन बाद ही ग़ायब हो गयी थी,हम सबने भी यह मानकर कि इस मामले में अब कुछ भी नहीं बचा है और यह मामला सुलझाया जा चुका है, उधर से ध्यान हटा लिया है। इस मामले में यदि कुछ बचा रह गया है, तो वह न्याय का प्रश्न है। कानून व्यवस्था का प्रश्न है। जीने के अधिकार का प्रश्न है। इस घटना के ज़िम्मेदारों कोचिह्नित करने का प्रश्न है। आगे से ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या उपायकिये गये, इसका प्रश्न है ।

वैसे हम सब को आदतन यह सब भुला कर प्रसन्न हो जाना चाहिए! एक ‘नाचने गाने वाली’ की जिंदगी के वैसे भी क्या मायने! इंतकाम लेने निकली निहत्थी गैंगेस्टर लड़की का तो यही हश्र होना ही चाहिए था! सच यह है कि हरियाणा पूरी तरह सुरक्षित है। पूरा देश ही बहुत सुरक्षित है। हर तरफ न्याय ही न्याय है! सत्यमेव जयते!

परिचय :-शोधार्थी, हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय
संपर्क:-priyankatangri@gmail.com
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अबोध पर अपराध थोपने के ख़तरे

प्रियंका
कल से आ रही ख़बरों के मुताबिक दिल्ली के एक स्कूल में नर्सरी में पढ़ने वाले चार साल के एक बच्चे पर, लगभग अपनी ही उम्र की एक सहपाठी के यौन उत्पीड़न का आरोप लगा है। बच्ची के अभिभावकों ने पुलिस में सहपाठी बच्चे के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करायी है। रेप के वास्तविक पीड़ितों के बार-बार गुहार लगाने के बावजूद भी एफआईआर तक दर्ज करने में आनाकानी करने के लिए बदनाम पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए, इस आरोप को दर्ज़ भी कर लिया है। अब उस बच्चे पर ‘द प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ओफेंसस’ (POCSO) एक्ट के तहत मुकदमा चलाने की सम्भावना तलाशी जा रही है। अधिक विचलित करने वाली बात ये है कि मीडिया भी इस घटना की रिपोर्टिंग एक क्राइम रिपोर्ट की तरह कर रही है। चार साल के एक बच्चे को रेपिस्ट की तरह प्रस्तुत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी है। उदाहरण के लिए ‘आजतक’ ने इस घटना को एक बच्चे के द्वारा किये गए यौन शोषण की एक चौंका देने वाली घटना कहा है, और ‘जनसत्ता’ ने अपनी खबर में इसे बलात्कार की संज्ञा दी है!

अब तक जो तथ्य उभर कर सामने आये हैं, वो ये हैं कि बच्चे ने स्कूल के वाशरूम में अपनी सहपाठी के वेजाइना में ऊँगली और पेंसिल से चोट पहुँचाने की कोशिश की और बच्ची को इससे चोट पहुंची भी है। बच्ची ने घर जाकर अपनी माँ को पेट के निचले हिस्से में दर्द की बात बतायी और बाद में वह घटना भी बतायी जो उसके साथ घटी। जो कुछ हुआ वह बहुत दुखद है, लेकिन इसे यौन शोषण या बलात्कार की एक घटना की तरह प्रस्तुत करना इससे भी बहुत अधिक दुखद है। इस घटना को बच्चे के यौन दुर्व्यवहार के रूप में देखने की कोई तुक ही नहीं है। इस घटना को उस बच्चे के अपने परिवेश से ग्रहण किये गए नकारात्मक प्रभाव और उसमें विकसित हो रही हिंसक मनोग्रंथि के परिणाम के रूप में देखा जाना चाहिए। चार साल के बच्चे में कांशियस सेक्सुअल सेंस डेवलप नहीं होता, और जब तक ये सेंस डेवलप नहीं है, तब तक के किसी बच्चे की किसी एक्टिविटी को, चाहे वो सेक्सुअल ऑर्गन से ही क्यों न जुड़ी हो, यौन उत्पीड़न या यौन शोषण की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। उस बच्चे को काउंसलिंग की ज़रूरत है, और सिर्फ़ उसी बच्चे को नहीं आजकल के माहौल में अधिकतर बच्चों को लगातार ऐसी काउंसलिंग की ज़रुरत है। अगर उस बच्चे को एक अपराधी की तरह प्रस्तुत किया गया तो उसमें सुधार की सम्भावना बहुत क्षीण हो जाएगी। उस बच्चे का विकास अपराधबोध के साथ होगा और उसकी विकास प्रक्रिया इस बात से भी प्रभावित होगी कि उसके साथ होने वाले बर्ताव के पीछे लोगों के बीच बनी उसकी अपराधिक छवि कहीं न कहीं काम कर रही होगी, और यह सब तब होगा जबकि अपराध करने, नहीं करने सम्बन्धी निर्णय लेने की मानसिक क्षमता उसमें है ही नहीं।

इसके अलावा उस बच्ची के भीतर यौन उत्पीड़ित होने की भावना को भर देना, जबकि उसका यौन उत्पीड़न हुआ ही नहीं है, उस बच्ची के लिए भी सकारात्मक नहीं होगा। अपनी ही उम्र के बच्चों के साथ उसका सहज हो पाना कठिन होगा। हम एक फ़ॉर्मूले के तहत बच्चों को ये तो बता देते हैं कि गुड टच और बैड टच क्या है, लेकिन इस बैड टच करने वाले की उम्र और परिपक्वता भी इस मसले पर मायने रखती है, यह स्वयं अभिभावकों के लिए अच्छी तरह समझना बहुत आवश्यक है। इसतरह के टच, बैड टच होते हुए भी उसी श्रेणी में नहीं रखे जा सकते जिस श्रेणी में किसी परिपक्व व्यक्ति के बैड टच को रखा जाता है। कम उम्र के बच्चों को यह समझाना होगा कि उनकी उम्र का कोई बच्चा भी उनके प्राइवेट पार्ट को टच करे तो यह गलत है और उन्हें उसके लिए मना करना चाहिए और अपने अभिभावकों को भी इसके बारे में बताना चाहिए। लेकिन इसके बाद ये अभिभावकों की ज़िम्मेदारी है कि इस घटना पर उनकी प्रतिक्रिया प्रकट-अप्रकट रूप से भी ऐसी नहीं होनी चाहिए कि उनके बच्चे का यौन शोषण हुआ है। इस मसले पर अभिभावकों के बीच बातचीत होनी चाहिए और बिना कोई अपराधबोध स्थापित किये इस तरह के व्यवहार करने वाले बच्चों में सुधार की कोशिश की जानी चाहिए।



जिस उम्र में बच्चों में ठीक से बोध विकसित न हो उस समय तक बच्चों की सारी ज़िम्मेदारी अभिभावकों की होती है, और इसे स्वीकार करना चाहिए। मीडिया और सोशल मीडिया पर भी इस तरह की घटनाओं को लेकर प्रतिक्रिया बहुत संजीदगी के साथ व्यक्त होनी चाहिए। इस तरह का अपराधबोध अगर चार-पांच साल के बच्चों के बीच प्रचारित कर दिया जाए, तो इससे बच्चों के बीच न सिर्फ लैंगिक भेदभाव बढ़ेगा, बल्कि बच्चों की आपसी दुनिया और दायरे में भी एक किस्म की अजनबियत, भय और अविश्वास का माहौल तैयार हो जाएगा, जिस माहौल का शिकार आज लगभग हमारा पूरा समाज है। बच्चों की आपसी दुनिया भी जब बहुत असहज हो जाएगी, तब हमारी दुनिया और कितनी अधिक कृत्रिम, कितनी अधिक बदरंग हो जाएगी, इसकी कल्पना करना भी कठिन है।

परिचय:-शोधार्थी, हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय
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