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सरस्वती और अन्य कविताएँ

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सरस्वती 


उसे नहीं पता की बचपन की सही जगह स्कूल है,
किताबो में उसके जैसे बच्चो का नाम फूल है,
पर सब्जियों के भाव उसे मुंहजबानी रहते है याद,
बाज़ार से हमेशा दो रुपये किलो महंगा रहता है उसके यहाँ प्याज़|
आप कितनी भी सब्जियां लो,
हरी मिर्च डाल कर वो दाम राउंड फिगर पर ले आती है|
उसे भोली समझने की भूल मत करना,
कईयों को तो वो भुल्कियाती है|

सोता आदमी भी जाता है जाग,
जब वो लगाती है हांक|
चाचा ,भैया,दीदी,काकी,
बाप रे ,सारे ग्राहक उसके रिश्तेदार है|
उसके हुनर के आगे तो ,
बिजनेस मैनेजमेंट की क्लास भी बेकार है|
मशीन की तरह सब्जिया तौलती है,
कैलकुलेटर की तरह जोडती है दाम|
एक बार पूछा था मैंने,
सुरसती बताया था अपना नाम|

अन्नपूर्णा 


उसकी सुबह की शुरुआत तू ,तू,मैं,मैं से होती है,
कभी गरजती है,कभी चिल्लाती है ,कभी खाली रोती है|
शाम तक स्टेशन पर चाय बेचकर उसका पति ,
खुद देसी पीकर हो गया था ढेर |
ढहते ,ढीमलियाते अभी घर पहुंचा है,
गोला उगने के बेर|
बच्चे टुअर टापर बने अन्दर बाहर कर रहे है,
अपनी मूकता से भी ना जाने कैसे वो माँ में बेचैनी भर रहे है|
बेचारी माँ कभी बाप के  शर्ट के पौकेट टटोलती है,
कभी घर के डब्बे कनस्तर खोलती है|
आख़िरकार कर ही लेती है,  कुछ पैसो का इंतजाम,
चूल्हा लीप कर ले आती है ,बाजू के किराने दुकान से सामान |
सवा किलो चावल,आधा किलो आलू,अढाई सौ पियाज,
तसली में लेवा लगाके बार देती है आंच|
दुआचिया चूल्हा पर तरकारी भात हो जाता है  तैयार,
बोरारूढ़ खाने लगता है  पांच जन का परिवार|

लक्ष्मी 


मैडम जी ,हमरा पति हमको लक्ष्मीनिया कहता है ,
पीने के बाद तो हरमेशा हमको छमिया कहता है|
कहता है की हमारे गोड में चक्का लगा है,
कहियो घर में कोई और हमसे पहिले नहीं जगा है|अन्दर बाहर,अंगना दुवार रोज लिप के चमकाते है,
सास ,ससुर ,लईका फईका सब के फरमाइश पुगाते है
झारू ,बुहारू,फटकन ,झटकन हम एक तनिका में फरियाते है,
कहता है कि पते नहीं चलता है की हम कब खाएक बनाते है|
साचो मैडम जी ,कोई से आपन घर ना संभलता है ,
हम चार गो घर में कमाते है,
तब भी हम को कभी हारल थाकल नहीं देखिएगा,
हम हरमेशा मस्ती में गीत गाते है |
रोज रात जब हमारा पति आता है,
हमको लक्षमिनिया कह के बुलाता है,
आ जब हम उसके गोड जातते है,
तब धीरे ,धीरे मुस्कियता है |

भवानी

भीड़ भरी बस में वो भारी  टोकरी के साथ जगह बना रही है,
जब हम लजा ,सकुचा रहे है,जाने कैसे वो मर्दों को धकिया रही है|
भर हाथ नाखी चूड़ी पहने ,वो बेफिक्री से पान चबा रही है,
हे भगवान् ,कान तो देखो ,पांच छेदों में वो पांच बालिया,झुमके झमका रही है|
जम्फर पर  छिटदार साडी पहने,

बालो में परांदा झुला रही है |
तिस पर नाक में झुलनी,
ये बंजारन तो कहर बरपा रही है|
“बस रोको कंडक्टर जी” वाह रे ,आवाज में दम है,
पर इस भीड़ भरी बस से टोकरी समेत निकलना ,
क्या किसी जंग से कम है?
ये मैं क्या देख रही हूँ,
झट टोकरी ,पट बच्चा ,फिर एक और बच्चा झट पट उतर रही है,
सर पर टोकरी,कमर पर बच्चा और एक की ऊँगली थामे ,
सरपट चलती वो बंजारन मुझे भवानी नजर आ रही है|

लेखिका:- प्रीति प्रकाश
शोधार्थी,हिंदी विभाग,तेजपुर यूनिवर्सिटी


Email  id-preeti281192prakash@gmai.com


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एक थी रमता और अन्य कविताएँ

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मुकेश कुमार ‘मुकुल’


एक थी रमता

उसे एहसास नही था
लड़की होने का
पुरुष-वर्चस्व वाले समाज में
पुरुषों की ग़ुलामी करने का
पुरुषों के जूतों तले रहने का
सदियों से पैरों में बेड़ियाँ बँधे होने का

राम से आम तक को अग्निपरीक्षा देने का
तुलसीदास की ताड़ना झेलने का
पिता-पति-पुत्र की ग़ुलामी झेलने का,
एक थी रमता…
चल दी डंके की चोट पर उस समाज को चुनौती देने
जिसने सदियों से उसे दासता  मुक्त नही होने दिया
यत्र नारी पूज्यन्ते  तत्र देवता रमन्ते
से अबला हाय तेरी यही कहानी
तक मूर्ख बनाकर
असहाय बना कर
अबला होने का अहसास दिलाने वाले पुरुषों को चुनौती देने

एक थी रमता..
देखा उसने ख्वाब
न्याय का डंडा लेकर
पुलिस की वर्दी में
ठीक करेगी पुरुष-वर्चस्व को
महिलाओं का मान-सम्मान बढ़ाकर
करेगी प्रहार सोच पर
बदलेगी सामाजिक धारा

लेकिन
लेकिन यह हो न सका
कुचल दिये गये उसके अरमान
मारे जाने के पहले कुचला गया उसका अस्तित्व
यह सन्देश था कि कोई रमता न बने

चलो देते हैं चुनौती इस वर्चस्व के खेल को
हर घर से पैदा करते हैं एक रमता

2.
अब रुक भी जा.
क्यों बोझ उठा रही हो
इस ग़ुलाम संस्कृति का
श्रृंगार के नाम पर पैरों में पायल पहना दिया
कि पायल की खनकती आवाज झंकृत करती  है पुरुष- मन मस्तिष्क को
लेकिन सदियों से मूर्ख बनाये गए तुम
पायल नही हैं ये
ये तो बेड़ियाँ हैं

सभ्यता पागल और अपराधी  के नाम पर
डालती है बेड़ियाँ
यही सन्देश है पुरुष-वर्चस्व का
क्या तुम अपराधी हो
या उनकी परिभाषा की पागल

ख़ूबसूरती के नाम पर नाक में नथिया डाल दिया गया
कि नाक में चमकता नथिया पुरूषों को आसक्त करता है
शृंगार नही है

यह तो नाथ है
जो कथित मरखंड जानवरों को नाथा जाता है
ताकि जब वे भड़कें, विद्रोह करें पालतूपन से
तो नाथ पकड़कर
परास्त किया जा सके

इसलिए रुक, रुक जा साथी
उतार फेक जुआ
इस गुलाम संस्कृति का

परिचय :-मुकेश कुमार ‘मुकुल’ प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी हैं।

(अरवल जिला के पिढ़ो निवासी रमता की सेना/पुलिस में भर्ती होने की तैयारी करने/दौड़ने के दौरान कुछ दरिदों द्वारा अस्मिता तार-तार कर उसकी हत्या कर दी गयी)

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भारत की मानुषी छिल्लर ने जीता मिस वर्ल्ड 2017 का ताज



मानुषी छिल्लर से पहले साल 2000 में बॉलिवुड और हॉलिवुड की सफल ऐक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा भारत की तरफ से मिस वर्ल्ड बनीं थी। 20 साल की मानुषी छिल्लर 67वीं मिस वर्ल्ड हैं। वह मेडिकल की स्टूडेंट हैं और कार्डिएक सर्जन बनना चाहती हैं। मानुषी को पैराग्लाइडिंग, बंजी जंपिंग और स्कूबा डाइविंग जैसे स्पोर्ट्स पसंद हैं। इसके अलावा मानुषी ट्रेंड इंडियन क्लासिकल डांसर हैं और स्केचिंग और पेंटिंग भी बनाती हैं।



मिस वर्ल्ड बनना मानुषी के बचपन का सपना था। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, ‘बचपन में, मैं हमेशा से इस कॉम्पिटिशन में हिस्सा लेना चाहती थी और मुझे यह कभी नहीं पता था कि मैं यहां तक पहुंच जाऊंगी। अब मिस वर्ल्ड का खिताब जीतना केवल मेरा ही नहीं बल्कि मेरी फैमिली और दोस्तों का भी सपना बन गया था।’ मिस वर्ल्ड में जाने से पहले मानुषी समाजसेवा के कार्यों से भी जुड़ी रही हैं। उन्होंने महिलाओं की माहवारी के दौरान हाइजीन से संबंधित एक कैंपेन में करीब 5000 महिलाओं को जागरूक किया है।

दीपा कर्माकर से पीवी सिंधु तक: विपरीत परिस्थितियों में खेल और जीत रही हैं लडकियां

बता दें कि 1966 तक कोई भी एशियन महिला ने मिस वर्ल्ड का खिताब नहीं जीता था। 1966 मेडिकल फाइनल इयर की स्टूडेंट रीता फारिया भारत से पहली मिस वर्ल्ड बनीं थीं। उसके बाद ऐश्वर्या राय ने 1994, डायना हेडन ने 1997 में, युक्ता मुखी ने 1999 में और प्रियंका चोपड़ा ने साल 2000 में मिस वर्ल्ड का खिताब जीता था।

उनसे पहले ये खिताब 17 साल पहले 2000 में प्रियंका चोपड़ा ने जीता था. चिल्लर ने चीन के सान्या शहर एरीना में आयोजित समारोह में दुनिया के विभिन्न हिस्सों से 108 सुंदरियों को पछाड़ कर यह खिताब अपने नाम किया है.

साभार :-एन.डी.टीवी इंडिया,नवभारत टाइम्स


मिस वर्ल्ड 2016 की विजेता प्यूर्टो रिको की स्टेफनी डेल वैले नई विश्व सुंदरी को प्रतिष्ठित ताज पहनाएंगी. चिल्लर हरियाणा की रहने वाली हैं और उन्होंने इस साल फेमिना मिस इंडिया 2017 का खिताब जीता था.

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हिन्दी कविता में मुक्तिबोध के पूर्वज थे जयशंकर प्रसाद – प्रो.मैनेजर पाण्डेय

हिन्दी भाषा-साहित्य और समाज-विज्ञानों में शोध की दुनिया आज विमर्शों के दबाब में हैं. जिसके कारण आकर -ग्रंथों के निर्माण और उन ग्रंथों पर शोध की प्रवृति में भी कमी आई है. ऐसे दौर में डॉ.कमलेश वर्मा तथा डॉ. सुचिता वर्मा द्वारा लिखित एवं सम्पादित तथा “द मर्जिनालाइजड पब्लिकेशन,वर्धा”द्वारा प्रकाशित “प्रसाद काव्य-कोश”का आगमन अत्यंत सुखद अहसास है.

बायें से दायें : ओमप्रकाश सिंह, सुधा सिंह, मैनेजर पाण्डेय, अर्चना वर्मा, विश्वनाथ त्रिपाठी, कमलेश वर्मा

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के SSS-1 सभागार में इस काव्य-कोश के विमोचन एवं परिचर्चा कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ आलोचक प्रो. मैनजेर पाण्डेय ने कहा कि प्रसाद मूलतः सभ्यता-समीक्षा के कवि हैं जिसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण उनकी अमर महाकाव्यात्मक कृति “कामायनी”है.  प्रसाद के काव्य और उनके नाटकों में आये गीतों का गंभीर अध्ययन करने पर हम पायेंगे की उनकी कविता गहरी विचारशीलता,गंभीर सामाजिक-सांस्कृतिक एवं दार्शनिक चिंतन तथा गहन वैचारिक द्वंद्व की कविता है जिनकी विरासत का सच्चा प्रतिनिधित्व आगे की कविता में मुक्तिबोध करते हैं . इस दृष्टि से जयशंकर प्रसाद हिन्दी कविता में मुक्तिबोध के पूर्वज थे. जिस गहन सामाजिक-सांस्कृतिक तथा वैचारिक द्वन्द का आरम्भ प्रसाद की कामायनी में होता है उसकी तीव्रता और गहन तनाव आगे मुक्तिबोध की लम्बी कविता”अँधेरे में” दीखता है.  यही कारण है कि प्रसाद की प्रसाद की काव्य-भाषा अपने अर्थ तक ठीक-ठीक पहुँचने के लिए अलग काव्य-कोश की मांग करती है.  डॉ.कमलेश वर्मा ने यह कोश तैयार कर इस अभाव की पूर्ति की है जिसके लिए वे बधाई के पात्र हैं.

सावित्रीबाई फुले रचना समग्र 

प्रो.ओमप्रकाश सिंह ने काव्य-कोशों के आवश्यकता बताते हुए कहा कि हिन्दी की अनेक क्लासिक कृतियों के कॉपीराईट मुक्त होने के बाद दृष्टिहीन प्रकाशन उपक्रमों की भीड़ द्वारा उन कृतियों के गलत मुद्रण ने भी कविता में अर्थ का संकट पैदा किया है.  ऐसी स्थिति में काव्य-कोश हमें कविता के मूल अर्थ तक ले जाने में मदद करते हैं.  उन्होंने स्वयं द्वारा “प्रसाद ग्रंथावली”तथा”भारतेन्दु-समग्र” के संपादन के अनुभवों का हवाला देते हुए कहा कि यदि हम कामायनी के मूल संस्करण और आज बाज़ार में उपलब्ध कामायनी के संस्करणों की तुलना
करेंगे तो हमे पाठालोचन की आवश्यकता महसूस होगी .

चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु ग्रंथावली 

अपना वक्तव्य देते हुए सुधा सिंह बायें से दायें : ओमप्रकाश सिंह, मैनेजर पाण्डेय,  कमलेश वर्मा, धर्मवीर और रेणु

कार्यक्रम में डॉ. सुधा सिंह तथा डॉ.अर्चना वर्मा ने स्त्रीवादी दृष्टि से प्रसाद की कविता पर विचार का आग्रह किया.  डॉ.सुधा सिंह ने कहा कि स्त्रीवादी नजरिये से बात करते हुए अक्सर प्रसाद की “ध्रुवस्वामिनी”पर ही बात होती है लेकिन “प्रलय की छाया”मुझे इस दृष्टि से अपील करती है. डॉ. अर्चना वर्मा ने कोशकार की इस स्थापना से अपनी असहमति व्यक्त कि “प्रसाद प्राय:अबूझ शब्दों का प्रयोग नहीं करते .”

बहुजन परम्परा की किताबें 

द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन की किताबें

वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने छायावादी-कवियों के भाषा निर्माण पर बात करते हुए कहा कि प्रसाद की कविता गहरे दार्शनिक और सांस्कृतिक बिम्बों से निर्मित कविता है जिसकी ठीक- ठीक पड़ताल के लिए इस कोश की नि:संदेह गहरी उपयोगिता है और डॉ कमलेश वर्मा इस श्रमसाध्य कार्य के लिए बधाई के पात्र है.  कार्यक्रम का संचालन धर्मवीर ने किया.

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“आम औरत की दैहिक या मानसिक यातना के लिए दहकते सवाल“

नीलम कुलश्रेष्ठ


जिंदगी की तनी डोर, ये स्त्रियाँ, परत दर परत स्त्री सहित कई किताबें प्रकाशित हैं.
सम्पर्क:  .kneeli@rediffmail.com,

 आदरणीय सुधा अरोडा जी की पुस्तक मंगाने से पहले उसकी  समीक्षा लिखने के अपने निर्णय से पहले मैंने सोचा भी नहीं था कि मैं एक जटिल चुनौती को आमंत्रित कर रहीं  हूँ। इस पुस्तक में  स्त्रियों की एक एक समस्या ,उनके बौद्धिक विश्लेषण ,बरछी की नोंक जैसे दिल में उतर जाते शब्दों से लहूलुहान होकर मैं समझ पाती हूँ कि  किस तरह `कथादेश `के स्तम्भ `औरत की दुनियाँ `में एक एक तराशे -संजोये सुधाजी के शब्द पहले भी अपने नियमित स्तम्भ लेखन के कारण धारदार हैं।

बरसों  पूर्व `जनसत्ता `के` वामा `स्तम्भ की ऐसी लेखिका का स्तम्भ पुरुष सम्पादकों ,उपसंपादकों के पुरुष वर्चस्ववादी षड्यंत्र ने बंद करवा दिया था। सुधाजी की आत्मकथ्य `में इस बात  को पढ़कर पाठक दुखी हो सकते हैं.   सुधा जी भी उन दिनों टूटी  होंगी लेकिन इससे  मिलते जुलते अपने अनुभवों से स्वयं गुज़र कर मुझे लगता है कि किस तरह एक समर्थ लेखिका ने इस सत्ता  को झकझोर कर रख दिया होगा जो सब षणयंत्र करने पर मजबूर हुए।

 घर के खर्च के लिए कितने पुरुष खुशी खुशी रुपया देतें हैं  ?एक एनजीओ में शिकायत लेकर आई स्त्रियों के दर्द से उन्होंने जाना। सुधा जी ने अपने लेख में इस बात को रेखांकित किया है कि आजकल की मांए जी जान से बेटियों के कैरियर बनाने में जुटीं हैं जिससे उनके हाथ में भिक्षा पात्र न हो. वे प्रश्न भी करतीं हैं कि यदि औरत होने का मतलब सिर्फ घर व बच्चों की देखभाल हो तो इनमें  कितनी बेटियां अपने बच्चों को स्वतंत्र होकर  पाल पाएंगी ? कुछ दमदार स्त्रियों का बूता है कि वह पति को अहसास दिला सकतीं हैं कि वह भिक्षा नहीं मांग रहीं ,न वे घुसपैठिया हैं , न चुप रहने वाली।

आज कॉर्पोरेट्स में काम करने वाली लड़की अपना घर बनाने का दमखम रखतीं हैं लेकिन उनकी संख्या है कितनी है?ये पुस्तक संपत्ति अधिकार की बात भी करती है कि किन घरों में स्त्रियों को सम्पत्ति में  अधिकार दिया जाता है या कितना अपना हक मांग  पातीं हैं ?या रिश्तों की ऊष्मा बचने के लिए चुप रहना ही पसंद करतीं हैं। नासिरा शर्मा जी की कहानी `मेहर `पड़ने  के बाद मैंने कुछ मुस्लिम महिलायों से पूछा था कि क्या उन्हें मेहर दिया जाता है ?उनका उत्तर  था कि ये सिर्फ मौखिक  ही दुल्हिन को दिया जाता है.

शौहर शादी के बाद सुहागरात को ही उसे बहला फुसलाकर `मेहर `की रकम मुआफ़  करवा लेता है। कभी वह`मेहर `की रकम मांगती है तो उसे काइयाँपन से बहलाया जाता है ,“तुम और हम लोग थोड़े ही हैं ?मेरा सब कुछ तो तुम्हारा ही है। “

` यह भिक्षापात्र विरासत में  देने के लिए नहीं है`,`आदर्श औरत की परिभाषा `,`और चुप रहे तभी महान है `आदि अनेक लेख `वामा `स्तम्भ में स्त्री समस्यायों की परत दर परत  उघाड़ते रहते थे। हिंदी अकादमी ,दिल्ली से पुरस्कृत गुजराती लेखिका बिंदु भट्ट ने एक महिला दिवस के कार्यक्रम में कहा था ,“सब स्त्रियाँ अपने माता पिता से छोटे मोटे  झगड़े करतीं हैं। बहिन को या  भाभी को चार साड़ियां दीं हैं ,मुझे दो ही दी हैं.उन्हें आगे बढ़कर संपत्ति के अपने अधिकार के  लिये लड़ना चाहिए। “
              
 ऐसा  ही आवाहन करने वाली सुधा जी `मनुस्मृति संस्करण सन १९९७ `से एक ऐसे मूलभूत कारण को इंगित कर रहीं हैं कि  किस तरह लड़कियों को गोरखपुर  की प्रेस की एक पुस्तक द्वारा स्त्री को सिर्फ़ माँ ,बेटी व  पत्नी के खाने में फ़िट किया जाता था। बरसों पूर्व हर लड़की को ये पुस्तक उसकी शादी में दी जाती थी। इसे पढ़ कर उसका दिमाग इतना पंगु हो जाता था की अपने अस्तित्व व अधिकारों के लिए लड़ने की बात सोच नहीं सकती थी। तभी अखबार ऐसी खबर से भरे रहतें हैं -`झुलस कर विवाहिता की मृत्यु `,`युवती ने खुदखुशी की `,नवविवाहिता की संदेहास्पद मौत ,`दहेज़ प्रतारणा `.इस किताब ने भी इन दुर्घटनाओं के होने में  अहम भूमिका निबाही   थी.

 सुधा जी  ने लिखा है कि ये समाज फ्रेंच लेखिका सीमोन  द `बुवा `की पुस्तक `द सेकेण्ड सेक्स. `,तसलीमा नसरीन की ,`औरत होने का हक़ में `.अरविन्द जैन की `औरत होने की  सज़ा `[ये मैं अपनी तरफ़  से लिख रहीं हूँ लता शर्मा की पुस्तक `खिड़की के पास वाली जगह `[मेधा बुक्स ,देल्ही ]तो लड़कियों व उनके माँ बाप को ज़रूर पढ़वानी चाहिए। साथ ही मेरी पुस्तकें `जीवन की तनी डोर ;ये स्त्रियाँ `[मेधा बुक्स ],`परत दर परत स्त्री `[नमन प्रकाशन ],`मुझे जन्म दो माँ `[संतोष श्रीवास्तव ]]आदि  समाज क्यों नहीं पढ़ने  को देता जबकि गोरखपुर प्रेस की पुस्तक की दस लाख से ऊपर प्रतियां बिक चुकी हैं।

पुस्तक के अनुसार कलकत्ता जैसे शहर की राजस्थानी महिलायें अपनी छोटी बच्चियों के साथ राजस्थान सती मेला देखने जातीं हैं। वे सोचने की ज़हमत नहीं उठातीं कि उस जैसी हाड़ मांस की स्त्री  आग की चिंगारियों में किस तरह ज़िंदा ,तड़पते ,चीखते जान दी होगी। तो उसका मृत्यु उत्सव मनाने में  कैसा नृशंस आल्हाद है ?

मेरे लिए गिरिजा व्यास इसलिए आदर की पात्र हैं कि उनके विरोध के कारण राजस्थान सरकार सती चौरों को पर्यटन स्थल का दर्ज़ा नहीं दे पाई थी वर्ना देवीत्व की असीम सीमाएं छूने वाली भारतीय स्त्री का विदेशों में और भी डंका बजता। ऐसी महिमा से और भी परिवार अपने घर की विधवाओं की सती की आड़ में ह्त्या करते।

औरत बनने की उम्र से पहले की उम्र की लड़कियों की आत्महत्या की छानबीन में कोलकत्ता की  प्रख्यात  अनुवादक सुशील गुप्ता की भतीजी कीर्ति  गुप्ता भी शामिल हैं। उस घर में  तीन पीढ़ियों  बाद विवाह का आयोजन हो रहा था। कीर्ति ने वरपक्ष की अंधाधुंध मांगों से तंग आकर शादी से एक महीना  पहले आत्महत्या करके पिता को कर्ज़ से बचा लिया। एक दूसरी लड़की ने कॉलेज की रैगिंग से घबरा कर जान दे दी। सुधा जी की कलम ढ़ूढ़ने का प्रयास करती है कि हमारे सामजिक ,शैक्षणिक क्षेत्र में क्या कमी है जो हमारी लड़कियाँ ऐसा कायरता पूर्ण कदम उठातीं हैं ,अपने  भविष्य का गला घोंट डालतीं हैं.इस शब्दों को पढ़ कर कुछ लोग तो चिंतन करें ऐसी दुर्घटनाएं फिर ना हों।

स्त्री जब बच्चों को पाल पोस कर बड़ा कर देती है ,होना तो ये चाहिए कि वह चैन से बैठकर एक एक सांस लेकर  इत्मीनान से ज़िंदगी बिताये लेकिन कभी कभी सुनियोजित षडयंत्र से पागल करार करके मानसिक अस्पताल में पहुंचा दी जाती है। इस पुस्तक की उपयोगिता तभी पता लगती है जब `तहलका `की इन्वेस्टिंग टीम पर्दाफ़ाश करती है कि किस तरह से मनोचिकित्सक को रुपए खिलाकर कोई भी अपनी पत्नी को पागल होने का प्रमाण पत्र पा सकता है। सोहेब इल्यासी जैसे लोग कोर्ट से क्लीनचिट पाकर गर्दन ऊंची किये निकलते हैं। स्त्रियां ही क्यों स्टोव से जलतीं हैं  ? किसी रंजिश या अपने काबू में नहीं आ रही स्त्री को वस्त्रहीन करके गाँव में  घुमाया जाता है।एन आर आई पतियों द्वारा विदेशों में क्यों पत्नियाँ मार दी जातीं हैं या पागल करार कर दी जातीं हैं या वह प्रताड़ित होकर ,नस काटकर मरने को मजबूर हो जातीं हैं।

इस दूर  दूर तक पहुंचवाली पुरुष व्यवस्था  के अपराधी पंजे पुलिस ,कोर्ट ,अस्पातल  ,कैरियर  ख़राब करने के लिए कहाँ कहाँ पहंच सकतें हैं। एक क्राईम थ्रिलर फ़िल्म की साथी  अपराधी महिला का अक्सर अन्त में अपने साथी द्वारा ही गोली से से भून दी जाती है  या लूट  का मालकर वह अकेले ही फ़रार हो जाता है।

सुधा जी की कलम आपको कहाँ कहाँ झांकने का अवसर देगी। आप चहारदीवारी में सुरक्षित भारतीय देवी की कथाएं पढ़िए जिन्हें डर लगता है ,“मेरे पति  की पहुँच दूर दूर तक है। कहीं वो मुझे पागलखाने ना भिजवा दें। “

नाबालिग उम्र से शोषण की शिकार फूलनदेवी किस तरह `बेंडिट क्वीन `बनकर बंदूक़ उठा लेती है। इसमें लेख है शेखर कपूर की फ़िल्म का जिसमें वे कैमरे की आँख लिये दलित महिला जीवन के उतार चढ़ाव की ,उसके वहिशयाना शोषण व उसकी बगावत में वहशी बन जाने की दास्तान को सेल्युलाइड पर उकेरते हैं। लोग शेखर कपूर पर `एलीट `वर्ग के लिए फिल्म बनाने का आरोप लगाते हैं। सुधा जी की तीक्षण आँख कलम के ज़रिये जुबां खोलती है कि इसे घर घर में दिखाना चाहिए। जिसने ये फ़िल्म  देखी है  वह समझ सकतें हैं कि जैसे अशोक मेहता का कैमरा भिंड,मुरैना में चम्बल की घाटियों में ऊँचे नीचे मिट्टी बीहड़ों में बलखाता घूमता चलता  है ,ऐसा ही है स्त्री जीवन ,ऐसा लगता है  –हम बेहद दुर्गम व ख़तरनाक रास्तों से गुज़र रहे हैं।

 जब मैं अहमदाबाद में ये समीक्षा लिख रही थी तो एक अजीब इत्तेफ़ाक हुआ था। नई नौकरी लगा बेटा बोला था ,“आज शनिवार है। हम  कुछ दोस्त एक दोस्त के यहां फ़िल्में देखेंगे,लंच  वहीं लूंगा। हम लोग `बवंडर ` फिल्म ढूंढ़ रहे हैं। मम्मी ये फ़िल्म वही  है न जब हम छोटे थे नानी  के घर आप बड़े लोगों ने हम  बच्चों को भगाकर ,कमरा बंद करके ये फ़िल्म देखी थी। “

 “हाँ ,–नहीं —वह फ़िल्म `बेंडिट क्वीन `थी। `बवंडर `की स्क्रिपट राइटर की पुस्तक सुधा अरोड़ा की पुस्तक की   मैं आजकल समीक्षा लिख रहीं हूँ। “

 मैं उससे यह भी कहना चाहतीं हूँ ,“अब तुम बड़े  हो गए हो ऐसी फ़िल्में ढूंढ़ कर देखो  ,तुम्हारी माँ ने स्त्री समस्यायें सुनकर तुम्हारे कान पकाये हैं ,वह नंगा सच आंखों से देखो। “

स्त्री से जुड़ा एक जघन्य अपराध है बलात्कार।स्त्री की उम्र ३ वर्ष  से लेकर कुछ भी हो सकती है। ये पुस्तक अनेक  बलात्कार के बहुचर्चित  काण्ड पर व उस पर बनी फ़िल्म ` बवंडर `की अंदरूनी कहानी कहती है कि पुरुष व्यवस्था किस तरह तरह स्त्री को डराकर रखना चाहती है -`कोर्ट में बलत्कृत स्त्री मुक़दमा करती है तो हार जाने पर बलात्कारी जयघोष करते हैं ,`नाक कटी किसकी ,मूंछ कटी किसकी ,इज़्ज़त घाटी किसकी `का जयघोष करके उसे चुप रहने पर मजबूर करना चाहती है। ऐसे बलात्कारियों के छूट जाने पर सुधा जी सुझाव देतीं हैं कि स्कूलों में यौनशिक्षा तुरंत अनिवार्य हो और स्वयंसिद्धा जैसे स्वरक्षा के प्रशिक्षण केम्प लगाएं जाएँ .यहां मुझे नमिता सिंह जी  की  कहानी याद आ रही है `गणित `.एक ढाबे वाले की पत्नी पिटाई करने वाले अपने पति की पुरुष व्यवस्था की प्रतीक डंडी तोड़ देती हैं।

इस पुस्तक में `मीडिया में औरत `प्रभाग में इस फ़िल्म के बहाने दिखाया है  कि कैसे भंवरी बाई का पहले दैहिक शोषण होता है ,फिर समाज उसका मानसिक शोषण करता है। उसी के बलात्कार को  एनकैश करके कैसे उसकाआर्थिक शोषण किया जाता है। सुधा अरोरा जी ने इस की स्क्रिप्ट लिखने की राशि भँवरी  बाई के नाम  कर दी थी  .वह भी उस तक नहीं पहुँचाई गई थी।   इस फिल्म के अंत में समाज सेविका  बनी दीप्ति  नवल एक संवाद बोलती हैं ,“भंवरी बाई को न्याय नहीं मिला तो क्या हुआ ? उस ग्रामीण महिला ने आवाज़ उठाने का साहस तो किया। शी इज़ अ लेजेंड  .“

इस केस के सात आठ साल बाद भंवरी बाई के दुस्साहस की प्रतिध्वनि गुजरात के पाटन मे दिखाई दी। प्राथमिक शिक्षा का प्रशिक्षण देने वाले संस्थान  में रहने वाली एक आदिवासी लड़की पर छ;प्रशिक्षक महीनों बलात्कार करते रहे जिनमें एक विकलाँग  भी था इस लड़की ने अपनी शिक्षिका की सहायता से ऍफ़ आई आर लिखवा दी थी बाप पांच लाख के लालच में बिकने को तैयार हो गया था। इस पर सामजिक ,राजनीतिक दवाब पड़ने लगा। वह आत्महत्या पर भी उतारू हो गई। अंतत; डीआई  जी ,एक महिला पुलिस अधिकारी डॉ. मीरा रामनिवास जी व एन जी ओ से सहारा मिला और उसने  केस जीतकर एक इतिहास रचा।
           
शोभा डे जिसने जिस तरह प्रिंसेस डायना की मौत पर टिप्पणी की है। सुधा जी उनकी ख़बर  ले डालतीं हैं। वे बहुत गहन संवेदना से रेखांकित करतीं हैं कि ब्रिटेन  के राजप्रसाद में रही डायना  और संसार की  हर स्त्री का दुःख सार्वभौमिक है। उसके सामने दो रास्ते हैं -पति की आवारगी को झेले या बगावत कर दे और फिर समाज से जुड़कर उसके दर्द का इतना निदान करे  कि  उसकी मौत पर बच्चे ,बूढ़े व सभी नौजवान रो पड़ें।
        
इस पुस्तक की उपलब्धि है कुरान की नारीवादी व्याख्या ,सुन्नत का विवरण व हज़रात मुहम्मद  को नारीवादी बताना .सफिया बीवी व इमराना काण्ड पर इस पुस्तक में सटीक टिप्पणी की है।
 

      
सुधा जी उन पाखंडी नारीवादी महिलाओं को बेनक़ाब करने  से नहीं चूकतीं जो पुरुष प्रधान सत्ता का प्रतिरूप या राजनेताओं की कठपुतली बन जातीं हैं। उनके लिए नारीवादी होना एक धंधा है। ऐसी स्त्रियों के लिए सुधा जी के शब्द हैं ,“—-फिर महिला दिवस पर औरत होने का जश्न मनाने के बजाय दो मिनट मौन रखने के अलावा क्या विकल्प रह जाएगा ?“

(मार्च 2009 हंस में प्रकाशित)

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इतिहास से अदृश्य स्त्रियाँ

कुसुम त्रिपाठी

स्त्रीवादी आलोचक.  एक दर्जन से अधिक किताबें
प्रकाशित हैं , जिनमें ‘ औरत इतिहास रचा है तुमने’,’  स्त्री संघर्ष  के सौ
वर्ष ‘ आदि चर्चित हैं. संपर्क: kusumtripathi@ymail.com



महादेवी वर्मा ने ठीक ही लिखा है, “युगों के अनवरल प्रवाह में बड़े-बड़े साम्राज्य बाह गये, संस्कृतियाँ लुप्त हो गई, जातियाँ मिट गई, संसार में अनेक असम्भव परिवर्तन सम्भव हो गये। परन्तु भारतीय स्त्रियों के ललाट में विधि की वज्रलेखनी से अंकित अदृष्ट लिपि नहीं घुल सकी।”1

ज्यादातर परम्परागत इतिहासकारों ने पुरुष सत्ता के चौखट में कार्य करनेवाले इतिहासकारों ने स्त्रियों के इतिहास की खोज करने की जरूरत ही महसूस नहीं की। इस जमात के इतिहासकारों ने समाज के दबे-पिछड़े पददलित मनुष्य के गुटों के इतिहास को भी अदृश्य रखा। परम्परागत तथा पुरुषों द्वारा लिखे गये इतिहास में स्त्रियाँ और दलित दोनों अदृश्य रहते हैं। जैसाकि प्रसिद्ध स्त्रीवादी चिंतक पुष्पा भावे ने कहा है – “यह विचार, किस विचार प्रक्रिया द्वारा आया, यह समझना आवश्यक है। हमेशा से इतिहास लेखन में कुछ अपवाद को छोड़कर, इतिहास लेखन सत्ता और सत्तातर के बीच बँट गया। जो केंद्र में सत्तारूढ़ पक्ष है, उनका इतिहास लिखा गया। इस कारण सत्ता से बाहर रहने वाले सभी सामाजिक घटकों को इतिहास में अदृश्य कर दिया गया।”2


जब भारत में आज से तीन हजार वर्ष पहले मनुस्मृति की रचना की गई, तब दलितों और स्त्रियों को शिक्षा के अधिकार से वंचित कर दिया गया। दोनों ही सामाजिक स्तर पर दास/दासी कहलाये। दोनों को वैदिक पाठ पढ़ने-सुनने पर पाबंदी लगाई गई और भूल से यदि कोई सुन भी ले, तो उनके कान में पीसा काँच डालने का दण्ड विधान रखा गया। दोनों जब पढ़-लिख ही नहीं सकते थे, समाज में दोयम स्तर का जीवन-जी रहे थे। उन्हें ‘मानव’ के केटेगरी में मानाही नहीं जाता था।

शिक्षा के अभाव में अनपढ़ अंधविश्वासी दोनों ही बने रहे। ऐसे में दोनों अपना इतिहास लिखते ही कैसे ? ब्राह्मणवादी मनुस्मृति पर आधारित व्यवस्था में स्त्रियों की छवि देवीसीता, सावित्री जैसी त्यागी, बलिदान, आदर्शवादी, एकनिष्ठ, पतिव्रता पत्नी के रूप में रही। मनुस्मृति में लिखा गया – “स्त्री को बचपन, जवानी, बुढ़ापे में क्रमश: पिता, पति और पुत्र से वियुक्त (अलग रहकर स्वतंत्र) रहने की इच्छा नहीं करनी चाहिए क्योंकि उनके अभाव में स्त्री दोनों (पिता और पति) के वंशों को निन्दित कर देती है।”१ आगे लिखा है – “स्त्रियों के लिए पृथक (पति के बिना) यज्ञ नहीं है और पति की आज्ञा के बिना व्रत तथा उपवास नहीं है। पति के सेवा से ही स्त्री स्वर्ग लोक में पूजित होती है।”२ ‘मनुस्मृति’ विश्व की प्राचीनतम न्यायायिक और सामाजिक व्यवस्था है और यह इतनी ठोस है कि भारतीय संविधान और हमारी हिन्दू सामाजिक व्यवस्था आज भी इसी पर आधारित है। यही कारण है कि ब्राह्मणवादी इतिहासकारों ने स्त्रियों तथा दलितों के इतिहास को इतिहास के पन्नों से अदृश्य कर दिया।

प्रारम्भिक भारत में स्त्रियों की स्थिति से सम्बन्धित सामग्री की गम्भीर सीमाएँ हैं। १९ वीं सदी में भारत और इंग्लैण्ड के बीच सांस्कृतिक टकराव के संदर्भ में राष्ट्रवादी इतिहास लेखन की शुरुआत हुई। इसी टकराव ने प्रारम्भिक भारत में महिलाओं की स्थिति पर लेखन की दिशा निर्धारित की थी। जेम्स मिल की कृति ‘ब्रिटिश भारत का इतिहास’ में हिंदू सभ्यता की बर्बरता को हिंदू स्त्री की दयनीय अवस्था में स्थापित किया। इसी तरह विसेंट स्मिथ सिंड्रोम की आमराय यह थी कि जो कुछ भी भारतीय है, वह खराब और निकृष्ट है। प्रसिद्ध स्त्री इतिहासकार उमा चक्रवर्ती ने कहा – “प्राचीन भारत में महिलाओं की स्थिति पर लिखने वाले इतिहासकारों ने इसी तर्क को उल्टा करके भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए तर्क देना शुरु किया कि तीन हजार वर्ष पहले भारतीय स्त्रियों को जैसा सम्मानजनक दर्जा मिला था वैसा दुनिया भर में कही भी नहीं दिया जाता था।
राजा राम मोहन रॉय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, स्वामी दयानंद सरस्वती और आर.जी.भंडारकर आदि सभी सुधारक पुनर्जागरणवादी, रूढ़िवादियों पर प्रहार करने के लिए संस्कृत कृतियों – शास्त्रों से जमकर उद्धरण दिया करते थे। इस तरह ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज, आर्य समाज ने १९ वीं सदी में ब्राह्मणवादी मॉडल के आधार पर हिंदू सभ्यता में महिलाओं की स्थिति को महिमा-मण्डित करके ब्रिटिश के सामने प्रस्तुत किया।”१ इन लोगों ने कहा – अतीत में महिलाओं की स्थिति काफी बेहतर थी। वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति बेहद ऊँची थी। उनका कहना था वैदिक काल के बाद विदेशी आक्रमणकारियों की घुसपैठ के कारण, महिलाओं का अपहरण होने लगा। उन्होंने विशेष रूप से इस्लाम आक्रमणकारियों का नाम लिया, जिन्होंने स्त्रियों का अपहरण करके उनको भ्रष्ट किया इसलिए परदा, सती और बालिका शिशु हत्या जैसी कुरीतियाँ पैदा हुई।

नारीवादी इतिहासकार उमा चक्रवर्ती के अनुसार – “सातवीं सदी में हर्षवर्धन के प्रारम्भिक काल से सम्बन्धित विवरणों में सती प्रथा उच्च जाति की महिलाओं के साथ साफ-साफ जुड़ी देखी जा सकती है। महिलाओं के अधीनीकरण सुनिश्चित करने वाली संस्थाओं का ढाँचा अपने मूल रूप में मुस्लिम धर्म के उदय के भी काफी पहले अस्तित्व में आ चुका था। इस्लाम के अनुयायियों का आना तो इन तमाम उत्पीड़क कुरीतियों को वैधता देने के लिए एक आसान-सा बहाना भर है। ये तर्क उन लोगों को अधिक भाता है जो प्रारम्भिक भारत में जेंडर संबंधों को नियंत्रित करने वाली संस्थागत ढाँचे को नहीं देखना चाहते है क्योंकि मोटे तौर पर, समकालीन समाज के जेंडर संबंध भी इसी ढाँचे पर आधारित है।”2

भारतीय नारीत्व के खो चुके रूतबे को वापस पाने की कोशिश में राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने प्राचीन कृतियों के कुछ विशेष पहलुओं पर चुनिंदा फोकस रखा है। इस प्रवृति ने अक्सर ही स्त्री-पुरुष के बीच घटित घटनाओं की साफ-सुथरी तस्वीर पेश की, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण गार्गी-याज्ञवल्क्य शास्त्रार्थ की राष्ट्रीयवादी व्याख्या है। शकुंतला राव शास्त्री ने ‘विमेन इन द स्केयरड लॉ’ (१९५९, पृ. १७२-१७३) पुस्तक में बहस के ब्योरे का सबसे महत्त्वपूर्ण बिंदू बहस को निष्कर्ष तक पहुँचाने का तरीका है। वे अंत में कहती हैं – “गार्गी के सवालों का उद्देश्य ब्राह्मण की प्रकृति के विषय में याज्ञवल्क्य की परीक्षा लेना नहीं बल्कि उनसे सीखना था।” इस तरह शकुंतला राव के विवरण में गार्गी की निर्भीकता, स्वतंत्र चेतना और एक सुविख्यात दार्शनिक से दो-दो हाथ कर सकने की क्षमता पर पानी फेर दिया।

इसी तरह एस.एस. अल्टेकर ने अपनी पुस्तक ‘द पोजीशन ऑफ विमेन इन हिंदू सिविलाइजेशन’ में हिंदू सभ्यता में महिलाओं की स्थिति का अध्ययन महिलाओं के विषय में किये गये अध्ययन में सर्वाधिक चर्चित सम्यक राष्ट्रवादी कृति है। यह अध्ययन मोटे तौर पर ब्राह्मणवादी स्त्रोतों पर आधारित है। यह कृति इतिहास में महिलाओं के अध्ययन विषय में हमारे पास उपलब्ध सबसे सुंदर कृति है। इस पुस्तक में महिला शिक्षा, विवाह और तलाक, विधवा की स्थिति, सार्वजनिक जीवन में महिलाएँ, स्त्रियों की सम्पत्ति अधिकार और आम समाज में स्त्रियों की स्थिति पर कानूनी निर्मताओं के तमाम दृष्टिकोणों का खुलासा किया गया है। लेकिन उनकी यह महिला प्रश्न राष्ट्रवादी समझ से ओत-प्रोत भी है। महिलाओं के बारे में उनकी सबसे ज्यादा चिंता परिवार के संदर्भ में है। जिससे ऐसा लगता है कि हिंदुओं का शारीरिक उत्थान बेहद जरूरी है। अल्टेकर महिलाओं को मूलत: एक शक्तिशाली नस्ल के उद्गम के रूप में ही देखते है। महिला शिक्षा के समर्थक तो है पर उन पर इसके लिए दबाव नहीं बनाना चाहते। उत्तराधिकार बेटे को ही दिया जाता था, इस पर बड़ी सफाई से ये निकल जाते है। अल्टेकर जैसे इतिहासकारों ने महिलाओं को एक विशेष सामाजिक संरचना के भीतर और पितृसत्तात्मक अधीनता के तहत ही देखा।


पुरुष इतिहासकारों में जो थोड़े उदारवादी थे, उन्होंने महिला इतिहास को, आंदोलनों में उनकी भूमिका को साधारण आंदोलनों के साथ शामिल किया। सिर्फ औरत होना ही औरत की पहचान नहीं है। दरअसल वे विभिन्न वर्गों, समुदायों से आती है। इसलिए जब इतिहास के पन्नों पर हम नारी के दमन और शोषण की बात करते है, तो सिर्फ एक औरत के दमन – शोषण की बात नहीं करती, बल्कि एक किसान, मजदूर, एक दस्तकार, यहाँ तक की एक नागरिक के शोषणवदमन की बात करते है। अत: इतिहासकारों ने औरतों के इतिहास को भी साधारण इतिहास के साथ जोड़ दिया जबकि नारी आंदोलनों में हमेशा से ही पितृतंत्र के खिलाफ संघर्ष रहता ही आया है। जन-इतिहास जो उपेक्षित पड़ा है खासकर जन-इतिहास के एक हिस्से के तौर पर नारी-इतिहास भी सामंती – बूर्जुआ इतिहास की वजह से उपेक्षित रहा है। नारीवादी संदर्भों तक सीमित रहने के बावजूद यह श्रेय  नारीवादियों को दिया जाना चाहिए कि उन्होंने उस उपेक्षित इतिहास का पुनरूद्धार किया। शायद तेलंगाना आंदोलन में नारियों के संघर्ष पर स्त्री शक्ति संगठना की ‘वी.आर. मेंकिग हिस्टरी लाईफ स्टोरी ऑफ वीमेंस इन द तेलंगाना’एक मात्र पुस्तक है। वामपंथी आंदोलनों ने पूरी तरह उपेक्षा की।


वामपंथियों को और सुधारवादियों को यह भूल माननी होगी कि उन्होंने अपने आंदोलनों में नारी की भूमिका को ठीक तरह से रेखांकित नहीं किया जो कि आंदोलनों में नारी की भूमिका को पहचान न पाने की उनकी प्रवृत्तियों को न समझ पाने का ही दुष्परिणाम है। वामपंथी महिलाओं में १९४७ के पहले के आंदोलनों में अपनी भूमिका के बारे में ही लिखा था फिर वाम आंदोलनों में नारी की भूमिका के बारे में। उन्होंने आधुनिक भारत के इतिहास में नारी की व्यापक भूमिका के बारे में कुछ लिखने की कोशिश नहीं की। उनकी तरफ से इसे उचित परिप्रेक्ष्य में रखने की कोई कोशिश ही नहीं हुई कि अतीत की व्याख्या करते हुए वर्तमान की ओर कदम बढ़ाने में या इसे अपने समय की सामायिक क्रांति का एक हिस्सा होने के तौर पर देखा-समझा जाये।

आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी को नारी शिक्षा या समाज सुधार से जोड़ने के लिए इतिहासकारों ने सिर्फ उच्च वर्ग की संभ्रान्त महिलाओं की ही भूमिका को प्रमुखता से दर्शाया और ऐसा करते हुए उन्होंने आदिवासी, किसान और मजदूर वर्ग की उन महिलाओं के योगदान को नजरअंदाज कर दिया, जिन्होंने बहुत बड़ी संख्या में, विभिन्न आंदोलनों में, संघर्षों में प्रत्यक्ष हिस्सेदारी की – इनमें घरेलू औरते हैं, माताएँ और पत्नियाँ, कई वेश्याएँ भी शामिल थी और वे महिलाएँ भी जिनके पति संघर्षों में मारे गये या जेल में बंद हो गये, उन्होंने परिवार की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाकर आंदोलनों में अप्रत्यक्ष योगदान किया।


हमारी साधारण पाठ्य पुस्तकें और शैक्षणिक इतिहास की पुस्तकों में अधिकतर लिंगभेद की मानसिकता का परिचय देती है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि हममें से ज्यादातरों ने कई महिला नेताओं, सुधारकों के नाम तभी जानें, जब हमने नारी आंदोलनों के प्रति खास रुचि पैदा हुई और हमने कुछ अतिरिक्त किताबें पढ़ी या रिसर्च किया। क्योंकि उनके बारे में कुछ पढ़ाया ही नहीं जाता। इन पुस्तकों में वर्गों को लेकर भी पक्षपात होता है। इसलिए जब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं के योगदान को दर्ज करने की बात आती है, तब सिर्फ उच्च वर्ग और ऊँची जाति और वह भी कांग्रेसी महिला नेताओं की ही चर्चा होती है, साधारण दलित, किसान, आदिवासी मजदूर महिलाओं के योगदान को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाता है। पुलिस दमन के खिलाफ उनके साहस, सामाजिक कलंक के आरोपों का सामना करने की उनकी हिम्मत और आंदोलनों में भागीदारी करने की खातिर उनकी दोहरी कठिनाइयों का जिक्र तक नहीं होता। अब यह हमारी जिम्मेदारी है कि इतिहास के अंधेरे कोनों की हम खुदाई करें और महिलाओं की बहादुरी की सही तस्वीरों को सामने लायें।


ब्रिटिश वर्चस्व के खिलाफ 1763-१८५७ तक सैकड़ों छोटे-मोटे विद्रोहों के अलावा ४० बड़े विद्रोह हुए। आदिवासियों के साथ १२ बड़े सशस्त्र विद्रोह देखे गयें। हाँलाकि इन विद्रोहों में औरतों की भूमिका के बारे में ज्यादा कुछ दस्तावेजी प्रमाण नहीं मिलते, लेकिन हम जानते है कि इन सभी विद्रोहों में आदिवासी-जनजाति महिलाओं की सक्रिय हिस्सेदारी थी। आदिवासी समाज में चूंकि औरतों को शुरु से ही बराबरी का दर्जा मिला हुआ था। अत: युद्धों में भी बराबर हिस्सा लेना उन समुदायों की औरतों के लिए सहज स्वाभाविक हैं। बंगाल में पहले-पहल विद्रोह का परचम लहराने वाले चुआर विद्रोही थे। बिहार और बंगाल के कुछ जिलों में यह विद्रोह हुआ। छोटा नागपुर का कोल विद्रोह, संथालविद्रोह, खारवारविद्रोह, उलगुलान – विरसा मुंडा विद्रोह, मनयानविद्रोह, नीलविद्रोह। इन सभी विद्रोहों में पुरुष ब्रिटिश पुलिस से छुपकर जब जंगलों में चले जाते थे, औरते रात को फौजी घेरे से चुपके से निकलकर जंगलों में छिपे पुरुषों को भोजन, खबरें और हथियार पहुँचाती थी। कुछ औरतें गिरफ्तार होती, फौज उन पर जुल्म करती पर वे अडिग खड़ी रहती। कहीं-कहीं तो महिलाएँ सीधे विद्रोह में शामिल थी जैसे नीलविद्रोह में थालियों, ईंटों और अत्यंत मजबुत छिलके वाले बेल फलों से हथियार बनाये। हमलावरों को डराने के लिए औरतें मिट्टी की पक्की थालियों को बजाकर ऐसी आवाजें पैदा करती, जिससे नसें फट जाती थी। ‘नील दर्पण’ नाटक में नील विद्रोह में शामिल औरतों को अंग्रेजों ने कैसे सताया, अपहरण किया, अत्याचार किये, उसकी भयंकर तस्वीर प्रस्तुत की गयी।

अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का इतिहास दो सौ वर्षों से भी ज्यादा पुराना है। सत्ता वर्ग द्वारा प्रकाशित इतिहास पुस्तकों में सिर्फ रानियों को गौरवपूर्ण तरीके से पेश किया गया है, जबकि सच्चाई यह है कि ऐसी लड़ाइयों में साधारण वर्ग की गरीब महिलाओं ने भी बहादुरी से लड़ते हुए अपनी जान दी। ऐसी रानियों में जो कुछ प्रसिद्द हुई, उसकी जानकारी भी हमें अंग्रेजों ने कुछ अनिच्छा से लिखा, वही पता है। १८२८ में कित्तुर की रानी चैन्नम्मा, १८५७ की लड़ाई में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की फ़ौज में हर धर्म, जाति, वर्ग व समुदाय की औरतें शामिल थी। दलित महिलाएँ पुस्तक की भूमिका में डॉ. धर्मकीर्ति ने लिखा है – “दलित समाज की दस-वीरांगनाओं के बारे में बताया गया है जिनका अध्ययन करके दलित महिलाएँ अपने ऊपर होने वाले शोषण, उत्पीड़न, अत्याचार, अन्याय के विरुद्ध संघर्षरत होकर विकास कर सकेंगी। झलकारी बाई, लोजी, महाबीरी देवी, पन्ना, जगरानी पासी, नन्हीबाई, रानी गुडियालो, अवंती बाई, वीणादास और ऊदादेवी के जीवन-चरित्र दलित महिलाओं के लिए प्रेरणादायक सिद्ध होंगे।”१

 

लक्ष्मीबाई के साथ उनकी हमशकल झलकारी बाई को इतिहास से अदृश्य किया गया। मंगल पांडे को फांसी लगी, तब लाजो नामक दलित स्त्री अपने पति मातादीन के साथ कंधे से कंधा भिड़ाकर लड़ी और शहीद हुई। वे १८५७ स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम चिंगारी थी। मुजफ्फरनगर उत्तर प्रदेश की महाबीरी देवी अंग्रेजों के साथ सशस्त्र संघर्ष की उनकी टोली में कुछ २३ औरतें थी, सभी मारी गई। पर भंगी जाति की होने के कारण इनका इतिहास नहीं लिखा गया। बेगम हजरत महल के साथ लड़ने वाली पासी महिला जगरानी पासी थी, अंग्रेजों को मरने के बाद पता चला कि वे पुरुष नहीं महिला थी। नागालैंड के उत्तरी कछार की रानी गुडियालो १३ वर्ष की उम्र में ही स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हुई। पूर्वी सीमांत क्षेत्र में वे “हीरो” की तरह याद की जाती है। पर यह दुखद है स्वतंत्रता संग्राम की जानकारी देनेवाली हमारी पुस्तकें और पाठ्यपुस्तकों में उनका उल्लेख नहीं मिलता। ये सभी हमारी राजनीतिक विरासत का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। इन सभी के अपूर्व शौर्य, साहस और बलिदान को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाना चाहिए।

दूसरे तमाम आन्दोलनों की तरह समाज-सुधार आन्दोलनों में भी महिला समाज सुधारिकाओं के बारे में बहुत ही कम जानकारी मिलती है लेकिन चूँकि इन आन्दोलनों का थोड़ा लेखा-जोखा रखा गया था, इसलिए पिछले इतिहासों की तरह इन आन्दोलनों में महिलाओं की भूमिका के बारे में सूचनाएँ हासिल करना असंभव नहीं। यह वह समय था जब महिलाओं ने लिखना शुरू कर दिया था।अतः उनके युग, कार्यो और नजरिये के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ खुद उनके लिखित अनुभवों में मिल जाती है। फिर भी यदि इन्होंने नारीवादी दृष्टिकोण से और अधिक इतिहास का मूल्यांकन किया होता, तो ये पता चलता कि ताराबाई शिंदे ने ‘स्त्री-पुरुष तुलना’ ये पुस्तक क्यों लिखी। बाल गंगाधर तिलक जो राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के युग पुरुष थे, उनकी औरतें के बारे में क्या राय थी?

ताराबाई दो घटनाओं से विक्षिप्त हो गई थी और “स्त्री-पुरुष तुलना” पुस्तक की रचना की। यह घटना है – ‘द टाइम्स ऑफ़ इंडिया” में २६ मई १८८१, सत्यमित्र में २७ मई १८८१ तथा इंदुप्रकाश में १२ जून १८८१ में एक खबर छपी। विजयलक्ष्मी नाम की एक २५ वर्षीय ब्राह्मण विधवा थी, जिसे १८८० में पता चला वह गर्भवती है। उसके गर्भवती होने की घटना को कोर्ट में घसीटा गया। कोर्ट से आदेश आया, बच्चे की भ्रूणहत्या न की जाये, पर विजयलक्ष्मी ने कोर्ट के आदेश का पालन न करते हुए बच्चे की भ्रूणहत्या कर दी, इस पर मजिस्ट्रेट ने विजयलक्ष्मी को फांसी की सजा सुनाई। इस केस से ताराबाई के मन पर बहुत बड़ा आघात लगा। वे विचलित होने लगी। उनकी कलम से तभी आग उगलने लगी।

दूसरी घटना रखमाबाई की है। बचपन में उनका विवाह कर दिया गया। विवाह के पश्चात वे पढ़-लिख ली और अपने अनपढ़ पति के साथ ससुराल जाने से मना कर दी। उनके पति दादाजी भीकाजी ने अदालत में वैवाहिक अधिकारों की प्रतिष्ठान का दावा दायर किया। जिला अदालत में रखमाबाई जीत गई, पर बम्बई हाईकोर्ट में पति जीत गया। फिर भी रखमाबाई ने कोर्ट के सामने चुनौती देते हुए कहा – “चाहे तो मुझे फाँसी पर लटका दो पर मैं इस आदमी के साथ ससुराल नहीं जाऊँगी।”इस पर तिलक ने ‘केसरी में लिखा, स्त्री शिक्षा आंदोलन के बहाने रखमाबाई की आड़ में हमारे पुरातन धर्म पर आक्रमण का प्रयास किया जा रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि अंग्रेजों की नीयत हमारे अनन्त धर्म को बाँझ बनाने की है।” तिलक जैसे राष्ट्रीय युग पुरुष नेता के ऐसे व्यक्तव्य से ताराबाई बौखला गई। इन दोनों घटनाओं से आहत होकर उन्होंने स्त्री-पुरुष तुलना की रचना की।
२० वीं सदी के पूर्वार्द्ध में महात्मा गाँधी के नेतृत्व में भारी संख्या में औरतें सड़कों पर उतरी। गांधीजी ने पर्दे में रहने वाली औरतों, अनपढ़ गंवार कही जाने वाली औरतों, शहरी, गांवों, कस्बों की औरतों, पढ़ी-लिखी औरतों सभी को, चाहे वे बुद्धिजीवी हो या हथकरधा पर काम करने वाली सभी को, स्वतंत्रता की लड़ाई का हिस्सा बनाया। इतिहास में इसके पहले औरतों की इतनी भरी संख्या नहीं दिखी थी। जैसा कि लता सिंह लिखती है – “गांधीजी आंदोलनों में महिलाओं की भागादारी के पूर्ण पक्षधर थे। वे महिलाओं की सभाओं में अपने भाषणों में, आन्दोलनों में उनकी भागीदारी अनिवार्य बताते थे और साथ ही उन्हें यह कहकर प्रेरित करते थे कि देवियों और वीरांगनाओं की तरह उनकी अपनी अलग भूमिका है। ……..उन्होंने महिला नेताओं को सीता, द्रोपदी और दमयंती की तरह सात्विक, दृढ़ और नियंत्रित होना चाहिए, तभी वे स्त्रियों के भीतर पुरुषों के साथ बराबरी का भाव जगा सकेंगी और अपने अधिकारों के प्रति सचेत तथा स्वतंत्रता के प्रति जाग्रत रह सकेंगी।”१

इतिहास में गांधीजी का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान यह था कि उन्होंने सार्वजनिक गतिविधियों में महिलाओं की सहभागिता के औचित्य को सिद्ध करते हुए उसे विस्तार दिया। ताकि वे वर्ग एवं सांस्कृतिक बंधनों को तोड़कर आगे बढ़ें। नारीवादी इतिहासकार राधाकुमार कहती है – “इसी समय महिलाओं के स्वभाव और भूमिका के बारे में गाँधी की परिभाषा हिन्दू पितृसत्ता से गहराई से जुड़ी नजर आई और अक्सर उनका झुकाव महिला आंदोलन को आगे बढ़ाने के बजाए उन्हें सीमित करने की ओर रहा।”२ कांग्रेसी महिलाओं ने भी अपने पुरुष साथियों तथा गांधीजी के पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण के खिलाफ जो संघर्ष किया, कुछ हद तक उसे सामने रखा।
१९४७ के पहले के आंदोलनों में औरतों की भूमिका पर लिखते हुए डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर के नेतृत्व में हुए जातिवाद विरोधी आंदोलन में दलित महिलाओं की भूमिका की इतिहासकारों ने अनदेखी की। आंबेडकर के आंदोलन में औरतों की भूमिका पर उर्मिला पवार और मीनाक्षी मून की लिखी पुस्तक “आम्ही ही इतिहास घडवल” है जो सबसे अच्छी पुस्तकों में से एक है।

इसी तरह अल्पसंख्यक मुस्लिम और ईसाई महिलाओं की भूमिका भी ठीक से दर्ज नहीं। जब तक मुस्लिम महिलाएँ अखिल भारतीय महिला कांग्रेस में रही तब तक उनका इतिहास दर्ज किया गया, पर जब वे मुस्लिम लीग बना उसके बाद की जानकारी इतिहास में दर्ज नहीं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शुरुआती दिनों में कुछ विदेशी ईसाई महिलाओं की भूमिका बहुत ही महत्त्वपूर्ण रही। भारतीय महिलाओं की अलग संगठनों की स्थापना में भी उनका बड़ा योगदान रहा।

राष्ट्रीय क्रन्तिकारी आंदोलन में महिलाओं के योगदान के बारे में कुछ साहित्य जरूर लिखा गया, लेकिन आसानी से उपलब्ध नहीं। ऐसे साहित्य पुनर्मुद्रित नहीं हुए।कुछ साहित्य बांग्ला में लिखे गये, लेकिन चूँकि उनका संघर्ष मुख्यत: ब्रिटिश सरकार के खिलाफ था और कुछ सीमा तक उसे दर्ज किया गया। चूँकि इन महिलाओं ने सशस्त्र संघर्ष किया, इसीलिए पाठ्यपुस्तकों में उन्हें महत्त्व नहीं दिया गया। कुछ पुस्तकों में तो उनकी चर्चा भी नहीं है। भगतसिंह ने चूँकि अपने विचारों से तथा शहादत से देशवासियों के दिलों में अमिट छाप छोड़ी इसलिए उनकी चर्चा अनिच्छा और बेदिली से की जाती है किन्तु महिला क्रांतिकारियों को आसानी से नजरअंदाज किया जाता है। सुभाषचंद्र बोस के आजाद हिन्द फ़ौज में सिर्फ कैप्टन लक्ष्मी का नाम लिया जाता है। उन एक हजार औरतों का इतिहास उपलब्ध नहीं, जो झाँसी की रानी रेजिमेंट का हिस्सा थी।

कम्युनिस्टों के नेतृत्व में जो सशस्त्र संघर्ष हुए तेलंगाना, तेभागा आंदोलन, उसमें दलितों, किसानों, अल्पसंख्यकों और आदिवासियों की महिलाओं की भूमिका के बारे में काफी हद तक लिखा गया। मजदूर संघों की कुछ महिला नेताओं केबारे में काफी हदतक जानकारियाँ उपलब्ध है। लेकिन मजदूर संघों के संघर्षों में मजदूर महिलाओं की भूमिका के बारे में यहाँ-वहाँ छपे कुछ लेखों के अलावा विस्तृत सूचनाएँ उपलब्ध नहीं। वामपथियों और सुधारवादियों द्वारा लिखी गयी मजदूर-संघर्ष के इतिहास की पुस्तकों में भी मजदूर महिलाओं के संघर्षों का जिक्र नहीं मिलता। कुछ कारखानों में उनकी दुर्दशा के बारे में कुछेक अध्याय लिखे गये। हाँलाकि इन्हीं आंदोलनों से कुछ महिला नेताओं का उदय हुआ।


डॉ. आशा शुक्ला और कुसुम त्रिपाठी की पुस्तक की भूमिका में उन्होंने लिखा है – “किसान आंदोलनों में भी महिलाओं में साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष के दौरान पितृसत्तात्मक आंदोलन में हिस्सा लेने वाली महिलाओं की गवाहियाँ इस बात की बेहतर सबूत है कि पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण की वजह से उन्हें कैसी-कैसी समस्याओं से गुजरना पड़ा।”१

देश के कई भागों में सामंती व राजकीय दमन के विरुद्ध सशस्त्र-विद्रोह आयोजित हुए। बंगाल, बिहार, आंध्रप्रदेश, केरल, पंजाब के संघर्ष उल्लेखनीय है। वायनाड संघर्ष के बारे में अजिता ने पार्टी ढांचों के भीतर महिलाओं के सवाल पर लिखा तो श्रीकाकुलम संघर्ष पर विंध्या ने लिखा कि गिरिजन संघम् में महिलाओं के यौन-जीवन और मातृत्व के मसालों को सही ढंग से हाथ में ले पाने में असमर्थ रहा।


ईलीना सेन के अनुसार – “महिलाएँ सभी प्रकार की राजनीतिक कार्यवाइयों धरने, घेराव, पिकेटिन आदि में शामिल रही। …….चिपको आंदोलन, मुंबई का गिरणी कपड़ा मिलोंके कामगार आंदोलन, केरलके मछुआरों का आंदोलन, नशाखोरी विरोधी आंदोलन, बिहार का बोधगया आंदोलन, असम आंदोलनसे संबंधित अख़बारों की रिपोर्टों तथा फोटोग्राफों से पता चलता है कि प्रदर्शन और बैठकों में बड़ी संख्या में महिलाओं ने भाग लिया। पर वह सांगठनिक अनुभव कहीं भी पर्याप्त रूप से अभिलिखित नहीं है।”१

 



स्वायत्त महिला आंदोलन (ऑटोनॉमस विमेंस मूवमेंट) अनेक छोटे-छोटे समूहों को संगठित करके स्थापित किया गया। मैं भी इस आंदोलन में सक्रिय थी। १९८० में देशके विभिन्न हिस्सों से राष्ट्रीय स्तरके बड़े आंदोलनअभियानों में सक्रिय होने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर महिलाओं से संबंधित समस्याओं और मुद्दों को उठाते रहते थे। ऐसी गतिविधियों की अनेक रिपोर्ट विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में भरे पड़े है। अधिवेशनों में पढ़े गये परचे बिखरे पड़े है। इन्होंने कुछ किताबें भी लिखी। वे सभी सुरक्षित हैं। दस्तावेजीकरण की वजह से कोई छोटा-सा आंदोलन भी शोधकर्मियों को उपलब्ध हो जाता है जबकि बड़ा आंदोलन रेकॉर्ड न रखे जाने की वजह से अनदेखा-अनजाना रह जाता है।

८० के दशक के बाद जब नारीवादी आंदोलनों की शुरुआत हुई, तब विश्व स्तर पर नारीवादी महिलाओं ने महसूस किया कि इतिहास के पन्नों से नारियों के इतिहास को उपेक्षित किया है। सामंतवादी, बुर्जुआ, ब्राह्मणवादी इतिहासकारों की वजह से नारी इतिहास को इतिहास के पन्नों में शामिल नहीं किया गया।

इसलिए हम नारियों को स्वयं अपने इतिहास को पुनर्लेखन करना होगा, तब इतिहास की “री-राइटिंग” शुरू की गयी। हमारे देश में नारी देसाई, मीना मेनन, उमा चक्रवर्ती, उर्वशी बुटालिया, कमला भसीन, राधा कुमार, मधु किश्वर, सुशीला गोखले जैसे कुछ नारीवादी इतिहासकारों ने इतिहास के पन्नों से नारीवादी दृष्टिकोण से इतिहास लेखन शुरू किया।

जैसाकि गौरी लंकेश ने लिखा है – “मनुवादियों ने बहुजनों तथा महिलाओं के समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास को अपने हिसाब से तोडा-मरोड़ा। हमें इतिहास पर पड़े धूल-धक्कड को झाडना पड़ेगा, पौराणिक झूठों का पर्दाफाश करना पड़ेगा और अपने लोगों तथा अपने बच्चों को सच्चाई बतानी पड़ेगी। यही एकमात्र रास्ता है, जिस पर चलकर हम अपने सच्चे इतिहास के दावेदार बन सकते हैं।”१

संदर्भ सूचि

१. श्रृंखला की कड़िया – महादेवी वर्मा, भारती-भंडार प्रेस, प्रयागपृ. २१
२. जब स्त्रियों ने इतिहास रचा-कुसुम त्रिपाठी की पुस्तक की भूमिका, नवजागरण प्रकाशन, नागपुर, पृष्ठ – १
१. मनुस्मृति (हिंदी रुपांतर) – प्रस्तुति गोविंद सिंह, साहनी पब्लिकेशन, दिल्ली, पृ. ९५
२. मनुस्मृति (हिंदी रुपांतर) – प्रस्तुति गोविंद सिंह, साहनी पब्लिकेशन, दिल्ली, पृ. ९६
१. अल्टकेरियन अवधारणा से परे : प्रारम्भिक भारतीय इतिहास में जेंडर संबंधो की नई समझ – उमा चक्रवर्ती, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, पृ. १२७
२. अल्टकेरियन अवधारणा से परे : प्रारम्भिक भारतीय इतिहास में जेंडर संबंधो की नई समझ – उमा चक्रवर्ती,      दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, पृ. १२९
१.दलित महिलाएँ- संकलन-डॉ. मंजू सुमन, संपादन – ज्ञानेंद्र रावल, सम्यक प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ ७.
१. “राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाएँ – भूमिका के सवाल – लता सिंह, नारीवादी राजनीति:संघर्ष एवं मुद्दे, दिल्ली         विश्वविद्यालय, दिल्ली, पृष्ठ १५७
२. स्त्री संघर्ष का इतिहास -‘राधा कुमार’, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ – १७५

 

१.उपनिवेशवाद, राष्ट्रवाद और जेंडर – प्रो. आशा शुक्ला, कुसुम त्रिपाठी, बरकतउला विश्वविद्यालय, भोपाल,        पृष्ठ – ९
१. संघर्ष के बीच : संघर्ष के बीज,  इलीना सेन, सारांश प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ – १७      
१. गौरी लंकेश का लेख – “हमारा माहिषासुर, २९ फरवरी २०१६, वेब पार्टल बैंगलोर मिरर में प्रकाशित 


 संदर्भ ग्रंथ सूची


१. मनुस्मृति (हिंदी रुपांतर) – प्रस्तुति गोविंद सिंह, साहनी पब्लिकेशन, दिल्ली–२००४
२. श्रृंखला की कड़िया – महादेवी वर्मा, भारती-भंडार प्रेस, प्रयाग- २००५
३. नारीवादी राजनीति संघर्ष एवं मुद्दे – संपादक – साधना आर्य, निवेदिता मेनन, जिनी लोकनीता, हिंदी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, २००१
४. स्त्री संघर्ष का इतिहास – ‘राधा कुमार’, अनुवाद-संपादन – रमाशंकर सिंह, ‘दिव्य दृष्टि’वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, २००२
५. समाजवादी देशों की महिलाएँ:एक सिंहावलोकन – कुसुम त्रिपाठी, संगिनी प्रकाशन, मुम्बई – २००७
६. संघर्ष के बीच : संघर्ष के बीज –संपादक इलीना सेन, सारांश प्रकाशन, दिल्ली – २००७ 
७.दलित महिलाएँ- संकलन- डॉ.मंजू सुमन, संपादन – ज्ञानेंद्र रावल, सम्यक प्रकाशन, नयी दिल्ली – २००४
८. स्त्री अस्मिता के सौ साल – कुसुम त्रिपाठी, संस्कार साहित्य माला, मुम्बई–२०१०
९. स्त्री अध्ययन : आधारभूत मुद्दे भाग-१, भाग-२, संपादक – आशा शुक्ला, कुसुम त्रिपाठी, साहित्य भंडार, इलाहाबाद – २०१६
१०. भारतीय समाज में नारी–नीरा देसाई, मेकमिलन इंडिया प्रकाशन, मुम्बई
११. औरत इतिहास रचा है तुमने – कुसुम त्रिपाठी, कल्याणी शिक्षा परिषद, नई दिल्ली – २०१०
१२. स्त्री-पुरुष तुलना – ताराबाई शिंदे, सुधीर प्रकाशन, वर्धा – २००३
१३. आजादी की महिलाएँ – रेणु दीवान, एजूकेशन बुक सर्विस, नई दिल्ली – २०१०
१४.उपनिवेशवाद, राष्ट्रवाद और जेंडर – प्रो. आशा शुक्ला, कुसुम त्रिपाठी, महिला अध्ययन विभाग, बरकतउल्ला विश्वविद्यालय, भोपाल – २०१४
१५. श्रीकाकुलम गिरिजन आंदोलन का संक्षिप्त इतिहास – विजयवाड़ा सोशलिस्ट पब्लिकेशन
१६. स्त्री संघर्ष के मुद्दे (भारतीय एवं पाश्चात्य संदर्भ) – महिला अध्ययन विभाग, बरकतउल्ला विश्वविद्यालय, भोपाल – २०१४
१७. वीमेंस इन द तेभागा अपराइजिंग – पीट कस्टरस
१८. वी. आर. मेंकिग हिस्टरी – लाईफ स्टोरी ऑफवीमेंस इन द तेलंगाना पीपुल्स-स्ट्रमल, कालीफॉर वीमेन प्रकाशन,नई दिल्ली – १९८९
१९. वीमेंस मुवमेंट इन इंडिया – प्रतिमा अस्थाना, विकास पब्लिकेशन, नई दिल्ली–१९७४
२०. फेमेनिज्म हेज़ एक्सपिरियंस–नीरा देसाई, स्पैरो प्रकाशन, मुम्बई – २००६
२१. रिराइटिंग हिस्टरी – उमा चक्रवर्ती, कालीफॉर वीमेन प्रकाशन, दिल्ली – १९९८
२२. टू सर्च ऑफ आनसर्स– मधु किश्वर, रूथ वनिता, हॉरिजॉन इंडिया बुक, नई दिल्ली – १९९१
२३. आम्ही ही इतिहास घडवला – उर्मिला पवार, मीनाक्षी मून, सुगावा प्रकाशन, पुणे – २०००

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अंजुमन खाला को गुस्सा क्यों नहीं आता…

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सोनी पाण्डेय


प्रकाशित पुस्तकें – मन की खुलती गिरहें (कविता सग्रह) ,सारांश समय का (साझा काव्य सग्रह),विभिन्न पत्र- पत्रिका में
कविताऐं..कहानी ,लेख प्रकाशित. सम्पर्क:  .pandeysoni.azh@gmail.com,

सलमा का दुपट्टा असलम की साईकिल के घूमते पहिए में फस गया…..फस गया या जबरन फसाया गया इसमें सन्देह था।रेशमी गुलाबी दुपट्टे का सुनहरा गोटा उघड़ गया…. दुपट्टा बचा कर निकालते- निकालते मछली का जाला बन गया…..हूँssssssआं…हूँssssssssssआं कर सात साल की सलमा का रुदन देख असलम की सिट्टी – पिट्टी गुम।शेख चचा लड़की को पुचकार कर चुप करा रहे थे कि कपड़े रंगती असलम की अम्मी आग पर चढ़ा हंडा छोड़ दनदनाती आकर कान उमेठते उसे लेकर चलीं….साथ -साथ सप्तम सुर में चिल्ला रही थी…” करम जली ,ना जाने किस जनम का बदला लेती है मुझसे….पहले तो खसम खा बैठी ,ऊपर से चार- चार बेटियाँ जन के बैठ गयी ।हाय अल्ला! …रहम कर मौला! , किस महूरत में अपने मासूम रहमान मियाँ को इस कलमुही के पल्ले बाँधाssssssssss…।”

उसका राग भैरवी चालू था…रह -रह कर कच्ची मिट्टी की दीवारों से हायssssssssss, की चीखें अब भी आ रही थीं। अंज़ुमन खाला बरामदे से रोती बेटी को देख भागती हुई आईं….बगल के मकान से हाय तौबा की आवाजें साफ सुनाई दे रही थीं। वह क्या पूरी रंगरेज गली उनकी बहन परवीन  की फ़ितरत से वाक़िफ थी,…दिन- रात बहन को ज़लील करने का मौका तलाशती रहती ।..अंज़ुमन खाला एक चुप ,हजार चुप ।पहाड़ सा धैर्य समेटे बेवा खाला चार बेटियों को सिलाई ,कढ़ाई कर पाल पोश रहीं थीं।भूले से बहन की चौखट पर मदद के लिए पैर नहीं रखतीं …न ही बेबसी का रोना रोतीं।
दोनों बहनों में छत्तीस का विकट आंकड़ा…एक का पति शहर का सबसे हुनरमन्द रंगरेज और दूसरे का टाप वन दर्जी। रहमान टेलर के नाम का आलम यह था कि शहर तो शहर आस- पास के पड़ोसी जिले के दुल्हों की शेरवानियाँ यहीं सिलतीं….रोज़ी में बरकत थी ….हुनरमन्द ,सलीक़ेदार बीबी और चार प्यारी बेटियों से रौनक उनके गुलिस्तां में कमी थी तो केवल एक बेटे की। दोनों जनें पाँचों समय नियम के नमाजी…खुदा पर पूरा यकीन रखते थे कि एक न एक दिन चश्मेचराग ज़रुर देखेंगे और हर पीर पैगम्बर के दर की खाक छानते। अभी तो अजमेर शरीफ से लौटे थे ….कितनी अकीदत से कुरानखानी कराई थी….या मौला sssssssतू ने ये क्या कर दिया।नेक बन्दों की ही तूझे भी ज़रुरत रहती है ,कहते -कहते असलम की अम्मी जिन्हें हम बच्चे परवीन खाला कहते थे ,उस दिन छाती पीट -पीट दहाड़े मार रही थीं।सामने अहाते में रहमान मियाँ की लाश पर बेटियाँ सिर पटक -पटक रो रही थीं।रात दावत से लौट कर सोये तो सोये ही रह गये।शरीर नीला पड़ गया था। जलनखोरों की कमी नहीं थी,घर पर केवल दावतखाने की बात कह कर निकले थे….कभी किसी से अदावत नहीं की ,हाँ रोजी रोज़ बढ़ते देख कुछ सिलने वाले जात भाईयों की डाह जरुर थी। ….अन्तत: पुलिस ने खुदकुशी का मामला बता पल्ला झाड़ लिया।

 चालीसे तक तो भाई जात और रिश्तेदार मदद करते रहे पर धीरे- धीरे सबके दरवाजे बन्द होने लगे। चार- चार बेटियाँ ,सबसे बड़ी सना नौवीं में…सबा सातवीं में…सब्बो छठी में और सलमा दूसरी क्लास में पढ़ती थीं। लड़कियों की फीस, कॉपी ,किताब कपड़े से लेकर घर के राशन और बूढ़ी सास की अस्थमा की बीमारी के खयाल में डूबी अंजुमन खाला ने एक दिन घर के आगे की दुकान का सटर उठा दिया….पति के साथ -साथ सिलाई करती थीं….मशीन पर बैठीं तो फिर जम कर बैठ गयीं।लड़किया तुरपाई ,काज ,बटन करतीं और उनकी मशीन खड़खडाते हुए पूरे दिन दहाड़ती।हसद बड़ी बुरी चीज होती है…आदमी पहले खुद राख होता है फिर शिकार की मुश्किलें बढ़ाता है। हमशीरा  बहन परवीन जो बगल में ब्याही थी एक बार फिर हौसला और बरकत देख कुढ़ने लगी ।मौका मिलते तोहमतों की बरसात कर देती…ज़बान थी की कैंचीं….सरsssssssssसरssssss रुह काटते उसे तनिक रहम नहीं आता।
   गुनिया की माई
दिन ,महीने ,साल बीते…..हर सिंगार खिल कर झर गये…..सावन के झूले उतरे और औरते फगुवा की फुनगी पर बैठ सपनों की सतरंगी ओढ़नी ताने फुदकती….महकती …गमकती जीने लगीं ,अपने औरत होने के तमाम रंजो ग़म सहेजे।गली ,मुहल्ले में धीरे- धीरे रौनक़ लौटने लगी।रंगरेज गली फिरसे गुलज़ार हो उठी ….लोग हर दिल अज़ीज रहमान दर्जी को भुलाने लगे। अब चर्चे थे तो एक गुस्ताख बेवा का तन कर दर्जी की दुकान में बेपर्दा हो मर्दों से नाप जोख करने का । अंजुमन खाला एक चुप हजार चुप ,…चेहरे पर तनिक भी बेबसी हावी नहीं होने देतीं।धीरे -धीरे पुराने आर्डर निबटाने के बाद दुकान पर नया बोर्ड टंगवा दिया …”रहमान लेडीज एण्ड जेण्टस सूट श्पेसलिस्ट”। जानतीं थीं बेटियों को आगे इसी हुनर को बढ़ाना है सो औरतों के कपड़ों की सिलाई की ओर मुड़ीं,..वैसे भी मर्द अब किसी ज़नानी से कपड़े सिलाने से परहेज़ करने लगे थे।उपर से परवीन की कतरनी ज़बान पहले से कस्टमर को भड़काती रहती।

 सना हमारी क्लास मेट थी,गुलाबी होंठ और हिरनी जैसी आँखों वाली।उजली ऐसी की चाँदनी भी शरमा जाए … गाती तो मादक महुए की रस भरी जैसे टप टप टपकते हुए दूर -दूर तक रसगन्ध फैला आती कि देखो फागुन आया है।ऐसी थी चर्चा पूरे स्कूल की दीवारों से निकलकर बगल के लड़कों के कालेज तक। हम पहली बार रंगरेज गली में सना के साथ ही घुसे थे…सकरी गली सरपीली गोल -गोल घूमती रही घण्टों तक ,जैसे लखनऊ की भूल भुलैया ।मैं कई बार सना का हाथ पकड़ती और डर जाती….गली के दोनों तरफ तंग मकान…मकानों के सामने के हिस्से  में रंगरेजों की दुकान….दुकान क्या बड़ी -बड़ी भट्ठियों पर हण्डों में उबलते रंगीन पानी के भाप  से रंगी पूरी होली की छावनी ….जैसे हमारे गाँवों में होली के दिनों में रहता है। एक अहाते में अलगनी पर लाइन से बाँधनी के रंग बिरंगे दुपट्टे टंगे देख हम खिल गये।हाँ….यही तो चाहिए था हमें एन्नुवल फंक्शन के लिए….गली में खोने का डर फुर्र हो गया।हम सना के घर पहुँचे… आगे दुकान में उसकी माँ कपड़े सिल रही थीं…लड़कियों का हुजूम देख मुस्कुराकर स्वागत किया।रेहाना ने झुक कर आदाब खाला कहा  और बिना कुछ सोचे समझे हम सब ने फालो किया ,समवेत स्वर में…..आदाब खाला गूंज उठा। हम बगल के गलियारे से अन्दर घुसे….अन्दर बड़ा सा बारामदा..,बरामदे में चौकी पर एक बूढ़ी औरत हाथ में सफेद मोतियों की माला लिए फेर रही थी ..ऐनक चढ़ा कर हमें पहचानने की कोशिश कर ही रही थीं कि अबकी सब एक साथ आदब बजा सर्र से आगे बढ़ गयीं सना के साथ….सना ने बरामदे का दरवाज़ा खोला ….सामने बड़ा सा अहाता…..जो एक विशाल पोखरे के किनारे था ।

क़रीब दस बकरियाँ देखते मिमियाने लगीं....बत्तख ,कोकच भी देखते मटकते आगे बढ़ने लगे,मुर्गियाँ भी भागती हुई आकर परिक्रमा करने लगीं जैसे बत्तखों को चिढ़ा रही हों कि देखों रेस जीत लिया। एक तरफ कबूतरों का दरबा दिखा….शायद कबूतर चरने निकले थे। दूसरी तरफ गाय की मड़ई …हम सावधान की मुद्रा में खड़े इस पूरे दृश्य को सहमें देख रहे थे इस डर से कि अगले पल कौन और प्रगट होगा?…..खैर दस मिनट में स्थिति सामान्य हो गयी।सना मुट्ठी में दाने ले दूर बिखेर कर हँसती हुई आई …..सब टूट पड़ें थे दानों पर। नकाब खोलते हुए एक तरफ खड़ी चारपाई को बिछाने के लिए रेहाना को कह वह अन्दर चली गयी।रेहाना उसकी दूर की खालाजात बहन थी।

हम अभी तक इस पशु मेले से असहज थे कि एक देशी कुत्ता भौंकता हमारे सामने आकर खड़ा हो गया ,हम चरपाई पर चढ़ कर खड़े हो गये। मुझे गुस्सा आ रहा था….यार ये घर है की चिड़िया घर?…रेहाना हँसने लगी मेरी बात सुनकर । कुत्ते को पुचकार कर वापस भेज दिया ….,वह पूँछ हिलाता निकल ही रहा था कि सना कांच की कटोरियों से सजा ट्रे लेकर आती दिखी….वह फिर पीछे हो लिया। सना चने दाल का हलवा ,खुरमा और चिप्पस लिए चारपाई पर आकर बैठ गयी। हिन्दू लड़कियाँ कुछ खाने में संकोच कर रही थीं। सभी असहज थीं इस भय से कि कैसे खाऐं मुसलमान के घर का…खास कर तीन पण्डित और दो ठाकुर लड़कियाँ,…पाँचों ने मना कर दिया।बची मैं और दो तीन…..सना ने ना जाने क्या सोच कर बर्फी की आकार में कटा चने दाल का हलवा मेरी तरफ बढ़ाया,…..प्यार भरी सजल आँखें, मैं संकोचते अम्मा से डरते एक पीस उठा ली और पहला टुकड़ा काटते तारीफ करने लगी।सच में हलवा हमारे घरों के बेसन के हलवे से अलग और स्वादिष्ट था। …..मैं खा रही थी…धीरे -धीरे सबके हाथ बढ़ने लगे कि यदि ये पण्डित होकर खा सकती है तो हम क्यों नहीं ? नाश्ते के बाद हम बगल के रंगरेज की दुकान पर पहुँचे..हाथ में हमारे बड़ा सा कपड़े का गट्ठर देख परवीन खाला खिल गयीं। रेहाना सब समझा रही थी …..खाला ! चुनरी डिजाइन के पचास दुपट्टे छब्बीस जनवरी से पहले चाहिए।वह दुपट्टे गिन एक तरफ रख बोलीं ….हो जाएगा।रेहाना से हाल चाल, दुआ सलाम खत्म हुआ तो हम चलने को हुए।रेहाना अपनी गली में हमें छोड़कर मुड़ गयी।हम अटक गये….डर से माथे पर पसीने की चुहल कदमी बढ़ी और मैं अनयास ही .पीछे मुड़ कर देखने लगी ,इस उम्मीद में कि कोई आकर हाथ थाम इस गली से बाहर निकाले….भय के स्वेद बिन्दू सबके माथे पर रेंग रहे थे कि  अंजुमन खाला मुस्कुराती खड़ी मिलीं….हमें समझ में नहीं आ रहा था आगे किधर मुडें. ..चलो बच्चियों,मैं चौराहे तक जा रही ।खाला ने नकाब का पर्दा उठाकर मुस्कुराते हुए कहा।शायद वह माजरा समझ चुकी थी़ं।हमने अपना भय समेटा और चुपचाप उनके पीछे हो लिए। वह आगे -आगे हम पीछे -पीछे रेल के डिब्बे की तरह पतली गली में चले जा रहे थे….किनारे के घरों से कुछ औरतें पर्दे की ओट से खाला को टोकतीं….मेरी सलवार कमीज हुई की नहीं बाजी?…..वह चलते हुए कहतीं….हो गया ….किसी को भेज कर मंगा लो। हम लगभग बीस मिनट पर चौक चौराहे पर पहुँचे,जानी पहचानी सड़क देख कर जान में जान आई। खाला को सलाम कर हम अपने अपने घरों को रिक्शे से रवाना हुए।

दुपट्टे रंग गये और रेहाना सना के साथ जाकर ले आई। हमारी हिम्मत पस्त थी गली की घुमावदार तिलस्म के नाम पर। छब्बीस जनवरी का वह रंगारंग कार्यक्रम आज भी याद आता है तो मन रोमांच से भर जाता है जिसमें चार चाँद बाँधनी के  सतरंगी ओढ़नी ने लगाया था। इसी बहाने गली का प्रचार हमारे हिन्दू मुहल्लों तक आया और औरतें कभी पुरानी साड़ियों की रंगाई तो कभी चादरों पर चुनरी डिजाइन रंगाने रंगरेज गली में आने लगीं।
धीरे -धीरे अंजुमन खाला के हुनर का भी प्रचार हुआ और परवीन से ज्यादा भीड़ इधर जुटने लगी। सना मेरी अम्मा के ब्लाऊज़ के कपड़े और नाप धीरे से बस्ते में रख, ले जाती और सिला कर चुपचाप मेरे बस्ते में ला रख देती।अम्मा खाला की सिलाई की ऐसी मुरीद हुई की खाला के जीते जी साथ नहीं छोड़ा।

 देखो-देखो ‘चमईया’ हमार सुतुही                


 इधर परवीन का हाले आलम यह था कि टोना टोटका पीर मज़ार सब छानती फिरती की अंजुमन का धन्धा बैठ जाऐ…..किन्तु जहाँ मेहनत है बरकत होती ही होती है।घर का पिछला हिस्सा पक्का बनावाने का ख्वाब लिए रहमान मियाँ अल्ला को प्यारे हो गये थे….खाला ने पीछे एक नम्बर का पाँच कमरों का मकान बनवाया….बड़ी अक़ीदत से क़ुरानखानी करा सबको दावत दी। परवीन के कलेजे पर डाह की नागिन कुण्डली मारे बैठ गयी ….लगी सबसे कहने”जरुर रहमान कोई तस्करी -वस्करी का धन्धा करता था….इतना रुपया गड़ा था कि मरते कोठी उठ गयी।ज़रुर लाले को धन्धेबाजों ने मारा होगा कहते हुए अफवाहों का बाज़ार गर्म करती। सरपीली रंगरेज गली में गोल -गोल घूमतीं बातें खाला के घर पहुँची….सास बड़ी बहू से जा भिंड़ी ….बूढ़ी सास दरवाजे पर खड़ी हो चिल्ला रही थीं…..तेरे आँख में मिर्च झोंकूं मूईsss,ज़बान में कीड़े पड़ें रेsssss
सोई तो सोई रह जा कि तेरी ज़बान जल जाए हरामी,जो मेरे फरिश्ते से बेटे पर तोहमत लगाती है।


परवीन रसोईं में खाना पका रही थी,कान में सास की आवाज पड़ी तो तमतमाते हुए कलछुल फेंक कर चली…..हाथ लहराते आकर मुँह के पास सट कर खड़ी हो गयी….हाँ क्यों नहीं अम्मी! गालियाँ तो मुझे ही दोगी, धम्म से दरवाजे के चबूतरे पर बैठ गयी,….छाती पीटते हुए…बदुआऐं मेरे हिस्से और रक़म रहमान मियाँ ,हायsssss मेरी तो क़िस्मत फूटी थी जो इस कलमुही को देवरानी बना लाई अल्लाह । हायsssssss
परवीन का हाय तौबा सुन मुहल्ला जुट गया ,लोग खुसुर -फुसुर करने लगेे।सना और सबा दादी को पकड़ कर अन्दर लाईं।खाला मशीन में गर्दन गड़ाए किसी के ब्याह की पियरी में गोटा लगा रहीं थीं ,चुपचाप ,जबकि  सारी आवाजें साफ कानों में पड़ रही थीं। सास चौकी पर बैठ सिसक -सिसक के रो रही थीं ,बेटियाँ भी। खाला एक दम से सिलाई छोड़ सास के सीने से जा लगीं ….औरतों के सामुहिक रुदन से माहौल मातमी हो गया पर अंजुमन खाला की ज़बान नहीं खुली,वही पुरानी रवायत ….एक चुप हजार चुप।

हम इण्टर में पहुँचे,अब तक रंगरेज गली हमारी सबसे प्रिय गली बन चुकी थी,कारण थीं अंजुमन खाला….बस एक नज़र भर देख कर नाप के कपड़े उतार कर रख देतीं। हम इशारे में समझाते कपड़े की डिजाइन और वह चुप देखती रहतीं और लो तैयार हो गया डिजाइनर लिबास। इसी साल सना का निकाह हुआ ,सना की दादी अड़ी हुई थीं बेटी के निकम्मे बेटे से सना के निकाह के लिए ,उम्र में दस साल बड़ा जावेद अव्वल नम्बर का निकम्मा था ।इधर एक साल से आए दिन ननिहाल चला आता और नानी की खिदमत कर चापलूसी बजाता रहता । इसमें भी परवीन की चाल थी,जबसे मकान बना था सीने पर साँप लोट रहा था,एक दिन मौक़ा देख ननद को चढ़ाया कि अंजुमन के पास खज़ाना गड़ा है,इससे पहले की दूसरी बेटियों के शौहर आकर जमें ,बेटे का निकाह कर नकेल डाल लो । ननद माँ के कान भरने लगी….”ज़माना बड़ा खराब है अम्मी, इससे पहले की बिन मर्द के घर में कोई अनहोनी हो सना का ब्याह कर हज कर आओ।

बुजु़र्ग औरत इन दिनों मर्दों सी बेधक अंजुमन को फैसले लेते देख रही थी, उनके लाख मना करने पर भी खाला ने घर के आगे का हिस्सा गिरवा कर एक तरफ दुकान बनवा बाकी हिस्से में चाहरदीवारी उठवा फ़ाटक लगवा दिया था ,जैसा रहमान मियाँ चाहते थे। दुकान काफी बड़ा हो गया था,एक साथ चार मशीनें खड़खड़ाने लगीं थीं…..आगे पर्दा तन गया था।जवान बेटियाँ किताबें पढ़ डिजाइन बनाने लगी थीं। लगन ,तीज ,त्योहारों में सोने की फुर्सत नहीं मिलती।ननद रोज़ दुकान में नोटों से भरा गल्ला देखती और माँ के कान भरती की अंजुमन रुपये गांठ कर उसे बड़ी परवीन के घर भेज देगी….अनपढ़ औरतों को अक़ल ही कितनी होती है….उस रोज़ से जो ज़िद लेकर बैठी ,निकाह करा कर ही चैन लिया। चाँद सी सना ,अन्धेरी रात सा स्याह जावेद,बेचारी रो- रो मरी जा रही थी।हम सब ने खाला को समझाया,गली के सैकड़ों लड़के उसके नाम पर ज़हर खालें,ऐसी दिवानगी।कई की माऐं सुनते दौड़तीं आईं रिश्ता लेकर पर खाला की बेबसी का आलम यह था कि बेटी के सामने मुस्कुरातीं,पीछे दम भर रोतीं,एक बार फिर वह मौन साध गयीं,एक चुप हजार चुप। अन्तत: सना का निकाह जावेद से रोते, गाते हो गया।हम सब उस रात एक फूल सी लड़की की अनचाही शादी के गवाह बने….एक ने तो जावेद से मज़ाक ही मज़ाक में कह भी दिया।लंगूर के हाथ हूर लगी…..।



अभी हाथ की मेंहदी भी नहीं छूटी थी ससुराल में सना की ,कि जावेद उसे ले ससुराल में आ जमा।दिन भर किवाड़ भिड़का कमरे में सोता शाम को सास से बिना पूछे गल्ले से सौ पचास निकाल सैर सपाटे पर चल देता। अंजुमन खाला ने ननद को बुला मशविरा किया और घर के पीछे बड़ा सा हाल बनवा दमाद के लिए लुंगी की बुनाई का पावरलूम बिठवा दिया।न चाहते जावेद को हाथ रोकना पड़ा,अन्दर ही अन्दर सास से चिढ़े रहते और आए दिन सना से मार पीट करते।अगर गलती से दुकान पर सना किसी मर्द से बात कर लेती ,तुरन्त उसके चरित्र पर लांछन लगाने लगते।तीन बरस में सना दो बच्चों की माँ बन गयी।एक बेटा ,एक बेटी।इधर सिलाई करना भी बन्द कर दिया था।चेहरा धीरे- धीरे अपनी रौनक़ खोता जा रहा था। इस बीच हम बी.ए.पास कर एम.ए.में आ गये पर रंगरेज गली का आकर्षण कम नहीं हुआ,कारण थीं अंजुमन खाला।

इस साल सबा का भी निकाह हो गया,इनके मियाँ जावेद से भी आगे निकले ।वलीमे के दूसरे दिन ही ससुराल आ धमके और पूरी रवायत से लूम में अपनी हिस्सेदारी तय कर ली। झगड़ा बढ़ता देख खाला ने लूम में मशीनें बैंक से लोन ले बढ़ा दीं और खट कर भरने लगीं।उनकी मुश्किलों से परवीन के कलेजे को खूब ठण्डक मिलती।दामादों को आए दिन दावत देती और सास को तंग कर रुपये ऐंठने के नुस्खे बताती। इतना सब कुछ चुप सहती खाला के माथे पर कभी सिकन नहीं देखा और सोचती रही कि उन्हें गुस्सा क्यों नहीं आता? मैं सोचती रही और जिन्दगी बढ़ती रही सरपट रेस के घोड़े की तरह । किसी को ठहर कर दो पल फुर्सत नहीं थी सोचने की, कि आखिर क्यों कर अंजुमन इतना ज़ुल्म सहती है बहन का।
                           
एम.ए.अन्तिम साल में पहुँचते मेरी शादी की तलाश में पिता जी ज़मीन आसमान एक करने लगे ,कहीं बात बनती तो लड़की दिखाने का उपक्रम शुरु होता ,और मेरी पैकिंग महंगे गिफ्ट पैकेट की तरह होने लगती। पार्लरवाली ने अम्मा से कहा…..”आंटी जी जब दिखाईएगा पीली जार्जेट की भारी बार्डरवाली साड़ी में दिखाईएगा,साँवली लड़कियों का रंग निखर कर आता है लाईटिंग में।अम्मा परेशान साड़ी की तलाश में दुकान -दुकान भटकती फिर रही थीं कि बाजार में सना से टकरा गयीं ।सना ने हाल चाल पूछा तो परेशानी का सबब जान हँस पड़ी….चच्ची इतनी सी बात पर आप इतनी परेशान हैं,कोई पुरानी बनारसी साड़ी और पीली जार्जेट की प्लेन साड़ी लेकर आईएगा ,फिर देखिएगा जादू।वह कहते हुए हँस रही थी। मेरे पास जादू की छड़ी है…..समझीं। इतना सुनते अम्मा को चैन पड़ा।अगले दिन माता जी बक्से खोल बनारसी साड़ी छांटने लगी। कोई डाल की तो नइहर की तो कोई बिदाई की कह निकालती और रखती।उन साड़ियों के प्रति उसका मोह देखते ही बनता था ,…..समझ सकती हूँ कि कलेजे पर पत्थर रख कर अम्मा ने लाल बनारसी साड़ी निकाली होगी। हम अगले दिन अपनी प्रिय रंगरेज गली में घुसे …..उस तंग गली में जिन्दगी गमकती थी…..घुसते शेख चचा की मिठाई की दुकान जिस पर शहर की सबसे मशहूर कचौड़ी मिलती थी ,हम वापसी में दस बीस ज़रुर लेकर आते,..कढ़ाई में गोल गोल फुल कर नाच रही थी….एक तरफ चूड़िहारिन एक औरत की कलाईयाँ दबा दबा चूड़ियाँ पहना रही थीं,कुछ इन्तजार में बैठी थीं।पूरी गली करघे की खटखट नाद से खटकती ज्यों एकतारे पर जोगी जीवन का श्रमगीत गा रहा हो।बच्चे हाथ में गुल्ली डण्डा लिए कहीं दिखते तो कहीं पजामें का नाड़ा सम्हालते नाक पोंछते गोली खेलते। कुछ छत पर पतंग ले पेंचा लड़ाते,हाँ लड़कियाँ बाहर नहीं दिखतीं इस गली में….छोटी से छोटी लड़की मऊवाली साड़ी के पीछे के तार काटने का काम घर घर करतीं इस लिए।हर हाथ व्यस्त था ,इतना की सर उठे तो बस नमाज़ और घर के दूसरे ज़रुरी काम के लिए….हम चल रहे थे ,लगन के दिन,दुकान पर भीड़ दूर से दिखाई दे रही थी।मैं गेट खोल सीधे घर में घुस गई,सलमा ने भाग कर सना को आवाज दी….बाजी ssss देखो प्रिया बाजी आई हैं । सब्बो ने आगे के बैठक में हमें बिठा दिया और अन्दर चली गई ।सना गोद में अपनी गोल मटोल बेटी को लेकर आई और दादी के पास लेकर गई । दादी क़ुरान में सिर झुकाए बैठी थीं।मैंने धीरे से आदाब कहा तो मुस्कुराकर पोथी बन्द कर माथे से लगा एक तरफ रख दिया।माँ ने नमस्ते किया और हम उनके कहने पर पास की चौकी पर बैठ गये।सना ने साड़ी का पैकेट ले दादी को खोल कर दिखाया …..बनारसी साड़ी को दिखाते हुए …..इसका बार्डर पीली साड़ी पर चढ़ाना है। उन्होंने माँ से पूछा….कब ज़रुरत है? माँ ने कहा अगले शुक तक हर हाल में चाहिए।शनिवार को लड़के वाले आ रहे हैं।वह मुस्कुराकर चुप रह गयीं।माँ का अगला सवाल था…..पैसे…..बात पूरी भी नहीं हुई कि वह डपट पड़ी….बस यही रह गया है,जैसी मेरी सना वैसी ये।ये काम छोड़े तो जमाना हो गया बेटी, मेरी तरफ देख कर, पिरिया की बात है तो कर दूंगी । माँ चुप हो गयी।

सब्बो ट्रे में चाय नाश्ता लेकर आई… माँ ने व्रत का बहाना कर टाल दिया ।मैं खा पीती रही और माँ घूरती रही। आज प्रत्यक्ष को प्रमाण की ज़रुरत नही थी कि मैं उनकी सबसे बड़ी वादाखिलाफ बेटी थी उन दिनों। मेरी टिफिन कभी रसोईं में नहीं जाती थी इस आरोप के साथ कि मियाँ मकुनी सबका खाती खिलाती है।मैं धोती …मैं ही रखती,मजाल की किसी बर्तन से छुला जाए।खैर मैंने इन्हीं लड़कियों से वेज बिरयानी,जर्दा,मूंग चने दाल का हलवा,सेवईं बनाने की विधियाँ सीखीं ,जिसके दम पर ससुराल में बेस्ट बाबर्ची घोषित हुई। साड़ी सना सब्बों संग आकर पहुँचा गयी,माँ ने उसके बच्चों के हाथ पर वापसी में पचास पचास के नोट धर एहसास कराया कि वह भी मेरे घर में अपनों जैसी है ,जैसा उसके घर में मेरा मान था ….मान दिया। माँ का ये बदलाव मुझे उस दिन इतना अच्छा लगा कि सना के जाते मैं लिपट कर उसके गालों को चुमने लगी…..माँ ने मेरे लिए आज धर्म की सकरी गली की थोड़ी सी चौड़ाई बढ़ाई थी …..दिलों की भी।ये हुनरमंद औरतें मेरे देखते देखते धर्म की गलियों से निकर मनुष्यता की सड़क पर मिलने लगीं थीं जिसमें रंगरेज गली की अहम भूमिका थी।



शनिवार को मेरी प्रस्तुति सजा धजा कर सास के सामने सराहनीय रही ।कुछ पार्लर के मेकप का असर तो कुछ शानदार बनारसी साड़ी का कमाल था कि ससुराल की औरतें मुग्ध हो गयीं। शादी तय हुई और एक माह के भीतर मैं भी अपने सपनों के अंखुवाने के दिनों में उस धरती से उखाड़ दी गयी जड़ समेत ,जहाँ अंकुरित हो पौधा बनी थी।खैर जो रवायत है रहेगी ही….इस मुद्दे पर प्रलाप का कोई फायदा नहीं।दिन ऐसे भागने लगे जेसे बचपन में हम जेठ की भरी दोपहरी में पुनपुन बाग में भागते थे। देखते देखते दस साल यूँ बीते जैसे आते जाते मौसम….. मैं मऊ जाती और घर से लौट आती। गली दोस्त मुहल्ले हाट बाज़ार सब छूट गये। एक बस मेरे शहर से जाती और आज़मगढ़ मोड़ पर उतार देती…..वहाँ से सटा घर,वापसी भी वहीं से। अम्मा मेरी बिदाई का ब्लाऊज अंजुमन खाला के यहाँ से सिला कर मंगा देती और उधर जाने का बहाना खत्म।इन दिनों शहर तेजी से बदला था..पैराडाइज सिनेमा हाल बन्द हो चुका था….अली बिल्डिंग में पूरा बाजार समाता जा रहा था….मुन्शीपुरा की औरतों को चौक बाजार जैसे था ही नहीं,…. जैसा हाल,…जब पूरा शहर बाजार लिए घर के मुहाने पर सिमट गया हो ,भला रंगरेज गली को कौन पूछे। मैं भी अपनी दुनिया में रमती बसती बढ़ रही थी…कि इकलौते भाई की शादी पड़ी।पहली बार शादी के बाद मैं शहर के भूले बिसरे दुकानों पर माँ और बहन के साथ युद्धस्तर पर खरिद्दारी करने में मशगूल थी….अली बिल्डि़ग में भाभी की डाल की साड़ियों की मैचिंग चूड़ियाँ ढूढते हम दुकान दुकान घूम रहे थे कि एक दुकान से कुछ पहचानी सी आवाज आई…..प्रिया बाजीsss
मैंने पलट कर देखा….सामने इण्टर में पढ़नेवाली सना सी सक्लो सूरत की लड़की हाथ हिला कर बुला रही थी…..मैं नज़दिक पहुँची…..तुम सलमा हो न?…लड़की चहक उठी… बाजी!….आप तो ईद का चाँद हो गयीं।… दुकान में खासी भीड़ थी,एक इकहरे बदन का लड़का औरतों को रैक से मैचिंग चुड़ियाँ निकाल कर दिखा रहा था।मैं चौंकी….उसे गौर से देखते हुए सलमा से पूछा…ये असलम है न?…वह लजा गयी। चेहरे पर लाज की लाली समेटे शिकायत किया,क्या बाजी ,अपनी दुकान छोड़ यहाँ वहाँ घूम रही हैं…हाथ से साड़ियों का पैकेट झट ले एक लड़के को पकड़ा कर कहा…सबसे बढ़ियाँ मैचिंग लगा …और दूसरे को हमारे मना करने के बाद भी चाय के लिया दौड़ा दिया।नन्हीं सलमा हमारे सामने कुशल दुकानदार बन गयी थी। सिर का  दुपट्टा बार बार ठीक करती और ग्राहकों से रस मिसरी घोल बतियाती सलमा को देख सना अनायास याद आ जाती,वह अपना काम करते करते पूरे घर का हाल बताती रही और मैं आदतन मुस्कुराती चुप सुनती रही।असलम मियाँ ने बड़ी सुघड़ता से चूड़ियों के सेट तैयार कर सामने रख सलमा से मुस्कुराकर कहा….हिसाब ढ़ंग से लगाना,..सलमा भी उसी अदा से बोली…लो जी,बाजी मेरी हैं की आप की?


हिसाब की पर्ची देख माँ और बहन खुश हो गयीं।चूड़ियाँ बाजार भाव से काफी सस्ती थीं।चलते वक्त उसने वादा लिया ,घर जरुर आइएगा।मैं खुश थी आज ,….इस लिए नहीं की चूड़ियाँ सस्ती मिलीं थीं,बल्कि खुशी कारण सलमा और असलम की प्यारी जोड़ी थी।बातों ही बातों में उसने अपनी शादी की कहानी भी बता ड़ाली….बाजी इनकी अम्मी तो सुनते सदमें में आ गयी कि असलम मुझसे निकाह करना चाहते हैं।खूब कुहराम मचा और अन्त में सना बाजी के समझाने बुझाने पर ना जाने कैसे मान गयीं।मैं उस भोली लड़की की मासूम कहानी सुनती रही और समझती भी कि परवीन खाला जरुर इस तरह भी अंजुमन खाला को नीचा दिखाना चाहती रही होंगी।

उनकी निगाह पहले से उनकी जगह ज़मीन पर थी और भोली लड़की उनके बनावटी विरोध को सच समझ बैठी होगी। खैर जो हुआ ,अच्छा हुआ था….सलमा खुश दिखी थी,जिस खुशी से सना और सबा को महरुम रहना पड़ा था सलमा के चेहरे पर सहज था।औरत जीवन में एक अदद मोहब्बत ही तो चाहती है मर्द से,बदले में उसके लिए खुशी खुशी कुर्बान हो जाती है। मैं उन लड़कियों और अंजुमन खाला में उलझी जाकर छत पर एकान्त पा चारपाई पर लेट गयी।नीचे शादी के घर की चहल पहल जारी थी।मैं लौट रही थी रंगरेज गली की स्मृतियों में….एक सुनहरा शहर फड़फड़ाकर पंख फैला उड़ रहा था…..अजान और आरती की एक साथ गूंजती आवाजों वाला शहर मऊ…..मऊवाली साड़ी….वनदेवी का विशाल नौरात्रों का मेला….मालिकताहिर बाबा की मजार से सटा मुख्य चौक बाजार और करघे की खटखट धुन पर थिरकती कर्मनिष्ठ उंगलियों का लय में नर्तन एक एक कर चलचित्र की तरह उभरने लगा।राग/विराग की गहरी खूंट यहीं कहीं गड़ी है आज भी मेरी,जिसके सहारे  चलती है  मेरी जिन्दगी …..एक टूटे सितार सी पड़ी स्मृतियों की डायरी में दर्ज यौवन के संगीतमय दिन की तलाश और बिखरे सपनों को समेटने की धुन रह गयी आज भी मन के किसी कोने में शेष….।
नीचे औरतें ब्याह का गीत गा रही थीं…..
बन पइठी खोजिहा ए बाबा चन्दन हो लकड़िया
देश पइठी खोजिहा ए बाबा पढ़ल हो पंड़ितवा………
अचानक आँगन में से माँ की आवाज गूंजी…प्रियाsssssssss


मन भारी था….थकान से नींद भी आ रही थी। मैं बेमन से नीचे लौटी…माँ अपने कमरे में पलंग पर अपनी बिदाई की पीली बनारसी खोले सिर पर हाथ रखे दुखी बैठी थी। जाते ही…..ये देख प्रिया ,ड्राई क्लीन कराते खिसक गयी….वह रुआंसी थी। माँ इकलौते बेटे के परछन पर वही पहनना चाहती थी …..चालीस साल पुरानी साड़ी के रेशम के तन्तु कट गये थे।मैं चुप खड़ी देख रही थी कि माँ का फरमान जारी हुआ….कल अंजुमन बी के घर लेकर जाओ और उसी तरह दूसरी साड़ी पर आँचल बार्डर चढ़वा कर लाओ जैसा तुम्हें दिखाते समय बनवाया था। बारात तीन दिन बाद उठनी थी….मैंने लम्बी साँस छोड़ते हुए धीरे से कहा….उनकी सास तो कबकी मर खप गयीं,अब कौन करेगा?….साड़ी के प्रति गजब का मोह था माँ को,तन कर बैठ गयीं….मैं कुछ नहीं जानती,…..कल तुम लोग रंगरेज गली जाओ ….जरुर कोई मिलेगा।

अगले दिन समझा बूझा कर हम थक हार गये….माँ अड़ी रही।मैं छोटी बहन के साथ अन्तत:  बारह साल बाद रंगरेज गली में घुसी….कदम रखते पहले तो मुझे लगा कि हम किसी और गली में जा रहे हैं पर ध्यान देने पर पाया कि नुक्कड़ की शेख चचा की कचौड़ी की दुकान शेख स्वीट्स हाऊस में बदल गयी है। अगर आगे काउंटर पर बूढ़े शेख चचा न होते तो हम पहचान भी न पाते कि ये उनकी दुकान है।दुकान बहुत बड़ी थी….शायद घर का नीचे का पूरा हिस्सा तोड़ कर दुकान में उनके बेटों ने बदल दिया था।हाँ आगे की तरफ कढ़ाई में तैरती नाचती कचौड़ियों की पुरानी खुशबू जरुर आ रही थी।मैं दम साधे खड़ी थी कि बहन ने तन्द्रा तोड़ा….क्या देख रही है?…जल्दी चलिए।


गली पहले से चौड़ी हो गयी थी….दोनों तरफ के मकान ,दुकान में बदल गये थे। अच्छा खासा बाजार में बदल गया था रंगरेज गली। हम आगे बढ़ रहे थे ….न भट्ठियाँ दिख रही थीं न रंगों के रंगीन हण्डे। जिस गली में करघे की खटखट पूरे दिन सुनाई देती थी वहाँ आज कोई आवाज थी तो फिल्मी गीतों की ,….हम चले जा रहे थे,सामने रहमान टेलर का बोर्ड देख कदम ठिठके और हम यन्त्रवत गेट खोल घर में दाखिल हो गये।
जाज़िम
घर के बाहरी हिस्से में गहन सन्नाटा पसरा था..दरवाजे पर दस्तक दे हम खड़े हो गये….अन्दर से तेज आवाज आई….आती हूँsssss,दरवाजा खोलने वाली बड़बड़ा रही थी,दरवाजा खोलने की ड्यूटी केवल मेरी है….सबको सीढ़ियाँ उतरने नानी याद आती है।कमर टेढ़ी होती है…मैं नौकरानी हूँ क्या सबकी?…..दरवाजा खोलते प्रश्न दाग वह बिना हमारी सूरत देखे मुड़ गयी और दनदनाती सीढ़ियाँ चढ़ती वापस चली गयी। अन्दर एक बड़े से बरामदे में हम खड़े हो सोचने लगे क्या करें ?बरामदे के दोनों कोने से सीढ़ी ऊपर के तल्ले पर गयी थीं।शायद मकान चार हिस्से में बंट गया था ।दो बहने नीचे,दो ऊपर की कल्पना में उलझी सोच विचार रही थी कि सामने की खिड़की से एक नेह भरी लरजती आवाज कानों में पड़ी …..अरेsss! पिरिया…..और सामने का दरवाजा खटाक से खुला।सफेद झक्क सलवार कुर्ते में सामने अंजुमन खाला मुस्कुराते खड़ी थीं ,जैसे कह रही हों कि अब रंगरेज गली की संवेदनाऐं सुफैद हो गयी हैं बच्ची। ……हमें इशारे से बुलाकर अन्दर ले गयीं…. चौकी पर बिठा आवाज लगाई…..सनाss । बगल के कमरे से पर्दा सरका एक दुबली पतली बीमार बेवा सामने आ खड़ी हो गयी…मैं आवाक उसे ताकती एसी चकराई की कमरा आँखों के सामने नाचने लगा। सना धीरे से कुर्सी खींच आ कर हमारे सामने बैठ सुबकने लगी….मैं रोती रही….उफ्फ! ये सेमल की रुई सी सुकोमल लड़की क्या से क्या हो गयी ,सनाsss



वह उठ कर मुझसे लिपट गयी …हम फूट पड़े...जैसे तपती धरती की दरारें स्याह बादलों की प्रतीक्षा में हूकती हैं ,सना को सौहर के लिए हूकते देख मैं तड़प उठी।सना के तीनों बच्चे आकर माँ से लिपट गये। दोनों बेटियों के बीच में बेटा , घर का मर्द,…..एक ना समझ दस साल का बच्चा अपनी माँ से लिपटा पूरी तरह दिलाशा दिला रहा था कि वह सब सम्हाल लेगा। खाला ने बताया…गलत संगत ने जावेद को असमय मौत के मुँह में ढ़केल दिया। वह पछतावे की आग में गीली लकड़ी सी सुलग रही थीं कि क्यों कर सास की बात मान सना को जावेद से ब्याहा।खैर जो होना था सो हो चुका था….घर की फूट साफ झलक रही थी….बेवा माँ बेटी एक बार फिर नए संघर्ष पथ पर थीं।हमने ढ़ाढ़स बँधा आने का कारण बताया ….अंजुमन खाला ने भारी मन से मुस्कुराने की कोशिश की….अम्मी जाते -जाते अपना हुनर और करघा सना को सौंप गयीं पिरिया!…आज कल इसी से घर चल रहा है। लोग खोजते हुए आते हैं इधर ,नम आँखो में बची अन्तिम उम्मीद की ड़ोर थामें अंजुमन खाला हमें अन्दर के कमरे में लेकर आईं ।मेज पर साड़ी फैलाकर देखा और हँस कर कहा …गोटे को छोड़ सब झर गयी है।मैं आदतन मुस्कुराकर रह गयी। छोटी ने पूछा ….परसों तक हो जाएगी न खाला? कल आकर ले जाना …उन्होंने पीठ ठोंकते हुए कहा।तुम्हारी माँ हमेसा घोड़े पर चढ़ कर काम भेजती है।हम सब हँस पड़े।सना की बेटियों ने बड़े प्यार से चाय नाश्ता कराया।अन्दर बनारसी साढ़ियों का ढ़ेर देख कर शूूकुन मिला कि चलो रोटी की किल्लत नहीं है खाला और सना को। हम घर लौटने लगे तो बच्चियों ने दुबारा आने का प्यार भरा न्योता दिया ।मैंने तीनों के हाथ पर पचास पचास की नोट रख टॉफी खाने का आग्रह किया और सना नाराजगी जताती रही कि यह सब क्यों कर रही हो ?खाला एक बार फिर रो पड़ी ….इन तीनों को खाला का मतलब तो आज पता चला है पिरिया ….वरना अपनी पेटजात तो चवन्नी ईदी तक हाथ पर नहीं रखतीं।सना चुप थी।हम फाटक से बाहर निकले तो ऊपर देखा ….चहल पहल थी ….रौनक भी।नीचे मातमी सन्नाटा ।खाला मौन …..सना भी ।मैं एक बार फिर सोच में पड़ गयी कि इतना सब कुछ बिखर गया और खाला ने किसी को कुछ भी बुरा नहीं कहा ,बदले में खुद को कोशती रहीं।आखिर उन्हें गुस्सा क्यों नहीं आता? सोचते चली जा रही मैं बिजली के खम्भे से टकराते टकराते बची,…..छोटी मेरी आदत जानंती थी।भनभनाते रिक्शा रोक मुझे हाथ पकड़ बिठाया और पूरे राश्ते फालतू बातें न सोचने की नसिहत देती रही।

एक दिन बाद मैं भाई संग बाईक से सना के घर साड़ी लेने पहुँची। आज उसकी छोटी बेटी खिलखिलाती हुई दौड़ कर मुझे देखते आई और हाथ पकड़ कर अन्दर ले चली….भाई ने पहले ही हड़का दिया था कि बैठना मत ,शादी का घर है। अन्दर पहले से साड़ी तैयार लिफाफे में पड़ी थी।सना ने मुस्कुराकर लिफाफा बढ़ा दिया । खाला भी सूचना पा बाहर निकलीं …मैंने पाँच सौ की नोट बाजार भाव को ध्यान में रख खाला की तरफ बढ़ा दिया। खाला नाराज हो गयीं…दिमाग खराब है क्या तुम्हारा….जैसी सना वैसी तू मेरे लिए…पैसे  से तौलने लगी,हाथ थाम लिया और पैसे लौटा कर नम आँखों से देखती रहीं….नमी इतनी गहरी थी कि मैं डूबने लगी….सना भी नाराज हो रही थी।बाजार अपने चरम पर ,..रिश्ते रेडीमेट लिफाफों में सजे धजे जब बिक रहे हों पैसे के नाम पर ,खाला का प्रेम पाकिजगी की हद तक मुझे भींगोए लिए जा रहा था।मैं खाला के जीवन संघर्ष और हौसले की गवाह एक बार फिर सना के साथ उसी चौराहे पर उन्हें खड़ी देख रही थी ,जहाँ बरसों पहले  मिली थी । मैं खाला को पकड़ कर रो पड़ी।भाई बाहर बाईक पर बैठा बार -बार हार्न बजाए जा रहा था।शादी में आने का न्यौता दे मैं सना की छोटी बेटी के हाथ पर पाँच सौ की नोट रख चलने लगी…पैसे देते देख ऊपर से दनदनाती सब्बो उतरती हुई आई ….मैं बढ़ रही थी,कानों में सब्बो की आवाज साफ सुनाई दे रही थी….जो मिले सबकी रहमत इन्हीं के बाल बच्चों की है…हम तो जैसे शौतेले हैं आपके….ठूसों तुम्हीं लोग इनकी कमाईsssssssss
पीछे एक बार फिर मैं एक परवीन और अंजुमन की कहानी नए सिरे से उभरती छोड़े जा रही थी।मन में आज भी द्वन्द शेष था कि अंजुमन खाला को गुस्सा क्यों नहीं आता?

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कोई अपना और अन्य कविताएँ

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प्रिया


कोई अपना

सुबह के पाँच बजे होंगे शायद
एक हाथ उठा
और शरीर पर रेंगने लगा
पहले छातियों और पेट से होता हुआ
नीचे तक पहुंचा…
अचानक नींद से जागी

स्वप्न नहीं था यह
हडबड़ाई
सिसकी
और दहाड़ मार कर रोई
अपने ही अंतर्मन में
चीखना चिल्लाना तो दूर
कुछ कर भी ना सकी
क्योंकि जब देखा वो हाथ किसका है?
तो……
कोई बहुत अपना
लेटा हुआ था पास में.

कठपुतलियों ने उड़ना सीख लिया है

एक स्त्री हूँ मैं
माँ, बहन, बेटी, पत्नी
बस यही है मेरी नियति !
इससे ज्यादा ना सोचा गया
और न ही समझा गया
और सोचा भी गया
तो सिर्फ इतना
कि बस एक कठपुतली हूँ…..
पिता, भाई, पति और बेटे की
एक कठपुतली
ना मुझे बैठने दिया
और ना ही चलने दिया
पंख लगा के उड़ना
तो बस स्वप्न ही था
पर कब तक ठहरना था…..
हां हूँ मैं एक स्त्री
अब मैंने उड़ना सीख लिया है
शुरू शुरू में
डर लगता था
पंख फैलाने से
काट दिए थे उन्होंने
हमारी सोच में ही पंखों को
पर जब पहली बार कोशिश की
तो फड़फड़ाकर ही रह गयी
जो छोटे छोटे पंख
तैयार किये थे मैंने
उन्हें कुतर दिया गया था
हर बार
बड़ी निर्ममता से
तमाम कोशिशों के बावजूद
कुतर दिए जाते मेरे पंख
पर हार मानना
कब सीखा है
चिड़िया ने
उड़ना ही था एक दिन
पंख फैलाकर
सारे बन्धनों को तोड़
स्पर्श करनी थी
खुले आकाश की

स्वच्छ और स्वतंत्र हवा
देखना था
सम्पूर्ण संसार को
उस उंचाई पर जाकर
जहाँ अनंत आकाश
हमारे सामने हो
जहाँ सब कुछ बहुत खुला,
बहुत साफ़,
सुन्दर
और स्वतंत्र नजर आता है |


एक लड़की के लिए प्रेम के मायने

प्रेम
क्या है?
स्वतंत्रता……
क्यों चाहिए?
जीने के लिए !
जीना क्यों है?
प्रेम करने के लिए…..
प्रेम क्यों करना है?
स्वतंत्रता के लिए…..
स्वतंत्रता क्यों चाहिए?
जीने के लिए……….

परिचय : शोधार्थी(पी-एच.डी.), हिंदी विभाग, गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय
संपर्क : ई.मेल-mailtourmipriya@gmail.com

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बलात्कार पीड़िताओं पर मुकदमे वापस लेने का दवाब बनाती है पुलिस: रिपोर्ट

स्मिता शर्मा


पिछले दिनों मध्यप्रदेश  में पुलिस महकमे में कार्यरत दम्पति की बेटी के साथ बलात्कार की शिकायत दर्ज करने के मामले में खुद पुलिस जितनी असंवेदनशील दिखी वह सिर्फ एक घटना की हकीकत नहीं है बल्कि यह भारतीय समाज की हकीकत से बना सामान्य व्यवहार है. यौन हिंसा की शिकार उत्तरजीवियों के साथ पुलिस, क़ानून, चिकित्सा और समाज के व्यवहार को लेकर ह्यूमन राइट्स वाच का एक अधययन सामने आया है. 


सारांश: 


मई 2017 में हरियाणा राज्य के रोहतक जिले में एक 23 वर्षीय महिला की हत्या कर दी गई.  पीड़िता का शव दो लोगों द्वारा उनके कथित अपहरण के चार दिन बाद मिला, जिन्होंने उनके साथ बलात्कार किया, सिर ईंट से कुचल दिया और उसके बाद शरीर पर कार चढ़ा दी. शव परीक्षण से पता चला कि अंदरूनी चोटें नृशंस और क्रूर यौन उत्पीड़न का नतीज़ा थीं.


पीड़िता के परिवार ने आरोप लगाया कि घटना से एक महीने पहले उन्होंने मुख्य आरोपी के नाम का जिक्र करते हुए  पुलिस को शिकायत की थी. आरोपी शादी करने से इंकार करने के कारण पीड़िता को परेशान कर रहा था. परिवार के सदस्यों ने कहा कि पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की.


दिसंबर 2012 में दिल्ली में एक युवा छात्रा के सामूहिक बलात्कार और मौत के पांच साल बाद, जिसने कानूनी और अन्य सुधारों की राह दिखाई, भारत में यौन हिंसा और बलात्कार की उत्तरजीवी लड़कियों और महिलाओं को न्याय और स्वास्थ्य देखभाल, परामर्श और कानूनी सहायता जैसी सहायता सेवाएं पाने में भारी बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है. अप्रैल 2013 में, भारतीय संसद ने सर्वसम्मति से कानून में संशोधन किया, महिलाओं और लड़कियों के विरुद्ध हिंसा से सम्बंधित अपराधों की नई श्रेणियों को शामिल किया और सजा को और अधिक कठोर बना दिया. विधेयक पारित होने के बाद तत्कालीन गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा था, “भारत में ऐसा कानून पहली बार अस्तित्व में आया है और संसद ने इसकी मंजूरी दी है. यह देश में क्रांति का आगाज़ करेगा.”

हालांकि सकारात्मक कदम उठाए गए हैं, जिसमें भारतीय राजनेताओं और अधिकारियों की महती  राजनीतिक इच्छाशक्ति का संकेत दिखाई देता है, मगर जिन परिवर्तनों का वादा किया गया था वे हकीकत से बहुत दूर रह गए हैं. मई 2017 के रोहतक मामले में, पुलिस ने यह दावा करते हुए अपना बचाव किया कि परिवार ने केवल मौखिक शिकायत की थी और बाद में इसे वापस ले लिया. इस बलात्कार और हत्या पर सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन के बाद ही राज्य सरकार ने मामला निपटाने में लापरवाही के लिए दो पुलिस अधिकारियों को निलंबित और एक अन्य को स्थानांतरित कर दिया. ह्यूमन राइट्स वॉच ने यह भी पाया कि भारत में महिलाओं और लड़कियों को अक्सर कलंकित होने के डर के कारण हमलों की रिपोर्ट दर्ज कराने से डर लगता है, और क्योंकि पीड़ितों या गवाहों को कोई सुरक्षा प्रदान नहीं करनेवाली आपराधिक न्याय प्रणाली में वे संस्थागत बाधाओं को पार करने में असमर्थ महसूस करती हैं.

यौन उत्पीड़न के शिकार वे सब: वे कोई भी हैं, वे जिन्हें हम जानते हैं



यौन हिंसा और बलात्कार की उत्तरजीवियों, विशेषकर हाशिए के समुदायों के लोग, पुलिस में शिकायतें दर्ज कराना मुश्किल पाते हैं. वे अक्सर पुलिस थानों और अस्पतालों में अपमान का सामना करते हैं, उन्हें अब भी चिकित्सा पेशेवरों द्वारा अपमानजनक परीक्षणों के लिए मजबूर किया जाता है, और जब मामला अदालत पहुँचता है तो उन्हें उन्हें डर लगता है. मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में स्कूल ऑफ जेंडर स्टडीज की अंजली दवे ने कहा, “बलात्कार को अब भी महिलाओं की शर्मिंदगी के बतौर पेश किया जाता है और इसपर बात करने में महिलाओं के सामने कई सामाजिक बाधाएं खड़ी रहती हैं.”


भारत में अब लैंगिक हिंसा से निपटने के लिए कई कानून हैं जैसे कि आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013, यौन अपराधों से बाल सुरक्षा अधिनियम, और अगर पीड़ित दलित (पूर्व में “अस्पृश्य”) या आदिवासी समुदाय से हैं तो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम. समय के साथ कानूनी बदलाव प्रभावी हुए और 2015 (सबसे हालिया साल जिसके लिए आंकड़े उपलब्ध है) के अंत तक पुलिस के पास दर्ज हुए बलात्कार की शिकायतों की संख्या में 39 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई. 2012 में 24,923 मामलों के मुकाबले 2015 में 34,651 मामले दर्ज हुए. यह संभवतः अपने मामलों को अदालत तक ले जाने की उत्तरजीवियों की बढ़ती तत्परता को दिखाता है.


हालांकि, ह्यूमन राइट्स वॉच का अध्ययन यौन हिंसा के शिकार लोगों को न्याय दिलाने के उद्देश्य से बने कानूनों, प्रासंगिक नीतियों और दिशानिर्देशों को लागू करने में लगातार सामने आ रही कमियों को सामने रखता है. इस रिपोर्ट में 21 मामलों में- जिनमें 10 में घटना के समय लड़कियों की उम्र 18 साल से कम थी- गहन शोध, भारतीय संगठनों के शोध और ह्यूमन राइट्स वॉच द्वारा पीडितों, उनके परिवार के सदस्यों, अधिवक्ताओं, नागरिक समाज कार्यकर्ताओं, वकालत करनेवालों, डॉक्टरों, फॉरेंसिक विशेषज्ञों और सरकारी व पुलिस अधिकारियों के 65 साक्षात्कारों का इस्तेमाल करते हुए समस्या की व्यापकता का वर्णन किया गया है. साथ ही इस रिपोर्ट में पीड़ितों, उनके परिवार के सदस्यों, वकीलों, नागरिक समाज कार्यकर्ताओं, अधिवक्ताओं, डॉक्टरों, फॉरेंसिक विशेषज्ञों और सरकारी व पुलिस अधिकारियों से ह्यूमन राइट्स वॉच द्वारा किए गए 65 से अधिक साक्षात्कार शामिल हैं. रिपोर्ट में इन मामलों का इस्तेमाल करते हुए विस्तृत सिफारिश की गई है कि किसप्रकार अधिकारी यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि आपराधिक न्याय प्रणाली में पीड़ितों और उनके परिवारों से संवेदनशीलता, गरिमा के साथ और बिना भेदभाव के व्यवहार हो.

अपर्याप्त पुलिस कार्रवाई


भारतीय कानून में यह प्रावधान है कि यौन उत्पीड़न या यौन उत्पीड़न के प्रयास के मामलों में,  प्रशिक्षित महिला पुलिस अधिकारी उत्तरजीवी की गवाही दर्ज करे, उसके बयान का वीडियो टेप तैयार करे और यथाशीघ्र न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान दर्ज कराए. आपराधिक दंड संहिता में 2013 हुए संशोधनों ने पुलिस अधिकारियों द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकायतें दर्ज करना अनिवार्य बना दिया है, जो ऐसा करने में विफल रहते हैं उन्हें दो साल तक जेल की सजा हो सकती है.


ह्यूमन राइट्स वॉच ने पाया कि पुलिस हमेशा इन नियमों का पालन नहीं करती है. वे प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज करने में बाधा डालते हैं, जबकि पुलिस जांच शुरू करने के लिए यह पहला कदम है, खासकर यदि पीड़िता आर्थिक या सामाजिक रूप से हाशिए वाले समुदाय से आती हो. पुलिस जब-तब पीड़िता के परिवार पर “मामला निपटाने” या “समझौता” करने का दबाव डालती है, खासकर यदि अपराधी शक्तिशाली समुदाय का हो.


उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश राज्य के ललितपुर जिले में 22 वर्षीय बरखा और उसके पति पर 30 जनवरी, 2016 को उनके घर पर आधी रात के करीब उनके गांव के तीन लोगों ने हमला किया, पुलिस ने इसकी शिकायत दर्ज करने से इनकार कर दिया. बरखा ने कहा कि दो लोगों ने उसके पति को पीटा और उन्हें उठा कर ले गए और तीसरा, जो एक प्रभावशाली जाति से आता है,  ने उसके साथ बलात्कार किया, उसे जातिसूचक गलियां दीं और पुलिस के पास जाने पर उसे  जान से मारने की धमकी दी. बरखा बताती है कि पुलिस कार्रवाई करने में अनिच्छुक रही क्योंकि मुख्य आरोपी सत्तारूढ़ राजनीतिक दल का स्थानीय नेता था. आखिरकार, जब 2 मार्च को बरखा अदालत पहुंची तो अदालत ने पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने और उचित कार्रवाई करने का आदेश दिया. हालांकि, एफआईआर दर्ज करने के लिए पुलिस ने और आठ महीने का समय लिया. इस बीच, बरखा और उसके पति को आरोपी और गांव के अन्य लोगों से लगातार मिल रही धमकियों और उत्पीड़न के बाद गांव से पलायन कर सैकड़ों मील दूर चले जाना पड़ा. बरखा कहती है कि उसने न्याय की आस छोड़ दी है:
हम इस तरह कब तक भागते रहेंगे? हम अपना परिवार, घर और गांव देखने में सक्षम नहीं हैं? पूरा परिवार बिखर गया है. पुलिस मामले की जांच नहीं करना चाहती. हम गांव में नहीं रह पाए क्योंकि वे [आरोपी] हमें मारने के लिए तैयार बैठे हैं और पुलिस ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है. हम गांव के मुखिया के पास भी गए लेकिन उन्होंने भी हमारी नहीं सुनी. हमारा कोई नहीं है.

विवाह नाबालिग लड़की से बलात्कार का लाइसेंस नहीं है

हालाँकि 2013 का संशोधन पुलिस द्वारा बलात्कार की शिकायत दर्ज करने में विफलता को अपराध करार देता है, लेकिन बरखा का मामला दर्ज करने से इनकार करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक दंड संहिता की धारा 66ए के तहत कोई कार्रवाई नहीं की गई. मजिस्ट्रेट भी पुलिस को जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मामला दायर करने का निर्देश देने में नाकाम रहे.


एक दूसरे मामले में, पुलिस ने बलात्कार की एक उत्तरजीवी और उसके पिता को अपने बयानों को बदलने के लिए कथित रूप से मनमाने ढंग से हिरासत में रखा, मारा- पीटा और धमकी दी. 23 वर्षीय काजल द्वारा 14 सितंबर, 2015 को सामूहिक बलात्कार की शिकायत दर्ज कराने के बाद मध्य प्रदेश राज्य की पुलिस ने उसे एफआईआर की प्रति देने से इनकार कर दिया और अगले दिन वापस आने के लिए कहा ताकि मजिस्ट्रेट के समक्ष उसका बयान दर्ज कराया जा सके. काजल ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया कि जब वे पुलिस स्टेशन पहुंचे, तो पुलिस ने उसके पिता को हवालात में डाल दिया और उसे अदालत से यह कहने के लिए कहा कि अपने पिता के कहने पर उसने बलात्कार की झूठी शिकायत दायर की थी. काजल ने कहा कि पुलिस ने कई सादे पन्नों पर उससे हस्ताक्षर भी कराए, उसे थप्पड़ मारा और डंडे से पिटाई की. पुलिस ने कथित तौर पर काजल के पिता को धमकी दी थी कि अगर उन्होंने इस बयान पर हस्ताक्षर नहीं किया कि उनकी बेटी ने झूठी शिकायत दर्ज की तो उन्हें  झूठे आरोपों में गिरफ्तार कर लिया जाएगा. काजल ने बताया कि डर से उसने अदालत में झूठा बयान दिया. पुलिस ने दिसंबर 2015 में एक अंतिम जांच रिपोर्ट दायर की, जिसमें कहा गया कि काजल और उसके पिता ने मुख्य आरोपी के साथ जमीन विवाद के कारण झूठा मामला दायर किया. इसके बाद, काजल ने धमकी का जिक्र करते हुए एक अपील दायर की.

2013 के आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम में यौन अपराधों की परिभाषा का विस्तार करके ताक-झांक और पीछा करने जैसे नए अपराधों को शामिल कर लिया गया. हालांकि, 2014 में कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव द्वारा दिल्ली और मुंबई में किये अध्ययन से पता चलता है कि पुलिस के पास ऐसे अपराध बहुत कम दर्ज कराए जाते हैं और यहां तक कि जहां रिपोर्ट दर्ज भी की गई है, वहां भी ऐसे मामलों में पुलिस अक्सर एफआईआर दर्ज करने या इन अपराधों की ठीक से जांच करने में नाकाम रही है. कई माता-पिता ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया कि पुलिस शिकायत दर्ज करने के बाद उन्हें अपनी बेटियों की सुरक्षा की चिंता थी क्योंकि आरोपी को जमानत मिल गई और फिर उसने लड़कियों को धमकी दी. अक्सर, लड़कियां  घर से बाहर की अपनी गतिविधियों पर खुद रोक लगा लेती हैं या माता-पिता उनकी  गतिविधियों पर और ज्यादा प्रतिबंध लगा देते हैं.


अक्टूबर 2016 में, 16 वर्षीय मीना ने उत्तर प्रदेश राज्य के झांसी के एक गांव में उस पर हमला करने वाले तीन लोगों के खिलाफ पुलिस शिकायत दर्ज कराई, आरोपियों के परिवार ने मीना के परिवार को जान से मारने की धमकी देना शुरू कर दिया. मीना के माता-पिता ने सुरक्षा मांगते हुए पुलिस से अपील की. उन्होंने पुलिस अधीक्षक से भी गुहार लगाई. लेकिन पुलिस धमकी पर कोई कार्रवाई करने में विफल रही है और अभी तक मामला दर्ज नहीं किया है. इस बीच, मीना के माता-पिता उसकी सुरक्षा को लेकर इतने चिंतित हैं कि वे उसे घर से बाहर नहीं निकलने देते हैं, यहां तक कि स्कूल भी नहीं जाने देते हैं. उसकी मां ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया: हमने अपनी बेटी की पढ़ाई रोक दी क्योंकि हमले के बाद हम उसे स्कूल भेजने से डर गए थे. यदि अभियुक्त जेल में हों, तो हमें उसे स्कूल में भेजने में डर नहीं लगेगा. लेकिन तब तक, हमें उसे अपने साथ सुरक्षित रखना होगा. हमने इस घटना की रिपोर्ट दर्ज कराई थी लेकिन अब हम अपना सम्मान खो चुके हैं.

कई उत्तर भारतीय राज्यों, जैसे हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पंजाब और राजस्थान में अनधिकृत ग्रामीण जातीय परिषद, जिसे खाप पंचायत कहा जाता है, यदि अभियुक्त प्रभावशाली जाति का हो, तो  दलित या अन्य तथाकथित “निम्न जाति” के परिवारों पर आपराधिक मामला आगे नहीं बढ़ाने का दवाब डालते हैं. स्थानीय राजनेता और पुलिस अक्सर इन पंचायतों के फरमानों से सहानुभूति रखते हैं या उनसे आँखें मूँद लेते हैं, इस तरह वे अप्रत्यक्ष तौर पर हिंसा का समर्थन करते हैं. भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अप्रैल 2011 में उनके कार्यों को “पूर्णतः अवैध” करार दिए जाने के बावजूद ऐसा हो रहा है. हरियाणा के सभी जाट जातीय परिषदों के शक्तिशाली छतरी संगठन सर्व खाप पंचायत के प्रवक्ता  सूबे सिंह समैन ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया कि बलात्कार के विरुद्ध बने कानूनों का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग किया जा रहा है: “एक आदमी बिना सहमति के कभी महिला का बलात्कार नहीं कर सकता है. कभी-कभी सहमति से बने संबंध में चीजें बिगड़ जाती हैं और फिर उसे बलात्कार का नाम दे दिया जाता है.”


देश में रेप कल्चर- एक हकीकत


हरियाणा की 30 वर्षीय दलित कल्पना ने 10 मार्च, 2015 को एफआईआर दर्ज करायी कि  प्रभुत्वशाली जाट जाति के छह लोगों ने उसका सामूहिक बलात्कार किया. 28 मार्च को पुलिस ने अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत बलात्कार सहित अपहरण और हमले का आरोप दर्ज किया. हालांकि, फॉरेंसिक नतीजों के इंतजार में सुनवाई में देर हुई जो कि अपर्याप्त फॉरेंसिक प्रयोगशाला के कारण होने वाली आम समस्या है. कल्पना के परिवार ने कहा कि उन्हें खाप पंचायत द्वारा परेशान किया जाने लगा और धमकी दी जाने लगी. कल्पना अंततः अदालत में प्रतिपक्षी गवाह बन गई और सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया गया. वह और उसका परिवार गांव छोड़कर चले गए.



पर्याप्त स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ करने में विफलता


भारत में डॉक्टर कानूनी तौर पर ऐसी महिलाओं और लड़कियों को प्राथमिक उपचार या चिकित्सीय इलाज़ मुहैया कराने के लिए बाध्य हैं, जो उनसे संपर्क करते हैं और बलात्कार की बात जाहिर करते हैं. मेडिकल जांच न केवल चिकित्सीय जरूरतें पूरा करती है, बल्कि संभावित फॉरेंसिक सबूत इकट्ठा करने में भी मदद करती है. भारतीय आपराधिक कानून के तहत, अभियोजन पक्ष केवल बलात्कार की उत्तरजीवी की गवाही पर बलात्कार के लिए दोषसिद्धि सुनिश्चित कर सकता है, जहां वह तथाकथित भौतिक विवरणों में अकाट्य और सुसंगत है. फॉरेंसिक पुष्टिकरण कानूनी रूप से प्रासंगिक माना जाता है लेकिन आवश्यक नहीं है. लेकिन व्यवहार में, चूँकि न्यायाधीश और पुलिस फॉरेंसिक साक्ष्य को बहुत महत्व देते हैं, इसीलिए मानकीकृत चिकित्सीय-कानूनी सबूत संग्रह और इसकी सीमाओं के बारे में जागरूकता आवश्यक हो जाता है.

2014 में, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने यौन हिंसा उत्तरजीवियों के लिए चिकित्सीय-कानूनी सेवा हेतु दिशानिर्देश जारी किए जिससे कि स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों द्वारा यौन उत्पीड़न उत्तरजीवियों की जांच और इलाज को मानकीकृत किया जा सके. ये दिशानिर्देश गोपनीयता, गरिमा, भयमुक्त माहौल बनाने और ज्ञात सहमति सम्बन्धी महिलाओं और बच्चों के अधिकार का सम्मान करने के लिए तैयार की गई प्रक्रियाओं को एकीकृत करते हैं.

ये दिशानिर्देश वैज्ञानिक चिकित्सीय जानकारी और प्रक्रियाएं भी मुहैया करते हैं जो उन प्रचलित  मिथकों और बलात्कार से जुड़े अपमानजनक व्यवहारों को सुधारने में सहायता करती हैं जिन्हें आम चिकित्सीय-कानूनी व्यवहारों द्वारा बढ़ावा दिया गया है. यह “चिकित्सीय रूप से निर्दिष्ट” पीड़िता की आन्तरिक योनि जाँच तक सीमित करने वाले “टू फिंगर टेस्ट”(दो उँगलियों द्वारा परीक्षण) के प्रचलित तरीके को ख़त्म करता है और कहीं पीड़िता “सेक्स की आदी” तो नहीं, जैसे अवैज्ञानिक तथा अपमानजनक चरित्रहनन वाले चिकित्सीय निष्कर्ष के इस्तेमाल को ख़ारिज करता है.


भारत के संघीय ढांचे के तहत, स्वास्थ्य सेवा राज्य का विषय है,  इसलिए राज्य सरकारें 2014 के दिशानिर्देशों को अपनाने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं हैं. अब तक, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र, जहां ह्यूमन राइट्स वॉच ने उत्तरजीवियों और डॉक्टरों का साक्षात्कार किया है, सहित केवल 9 राज्यों ने इन दिशानिर्देशों को अपनाया है. लेकिन ह्यूमन राइट्स वॉच ने पाया कि चिकित्सीय पेशेवर, यहां तक कि दिशानिर्देश अपनाने वाले राज्यों में भी, हमेशा उनका पालन नहीं करते हैं. उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में, ह्यूमन राइट्स वॉच ने पाया कि यौन हमले की  उत्तरजीवियों की जांच करने वाले डॉक्टर उन्हें जाँच के बारे में पर्याप्त जानकारी देने में नाकाम रहे और उनके साथ डॉक्टरों के व्यवहार में संवेदनशीलता की कमी थी. इन राज्यों के छह मामलों में, डॉक्टरों ने जहाँ जांच के दौरान महिला पुलिसकर्मियों को उपस्थित रहने की अनुमति दे रखी थी, वहीँ वे कभी-कभी परिवार के सदस्य को अनुमति देने से मना कर देते थे.


मध्य प्रदेश में 18 वर्षीय दलित महिला पलक का अपहरण और बलात्कार किया गया. इस मामले में स्वास्थ्य पेशेवर ने पीड़िता पर दोष मढ़ा जिससे उसे और भी नुकसान पहुंचा. बेटी की  चिकित्सा जांच के दौरान उसके साथ कमरे में मौजूद पलक की मां ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया कि डॉक्टर ने यह इंगित किया कि पलक झूठ बोल रही है और कि सेक्स सहमति से हुआ है: डॉक्टर ने मेरी बेटी से कहा “यदि वे आप के साथ जबरदस्ती करते, तो आपके शरीर पर     निशान होना चाहिए था, लेकिन आपके शरीर पर ऐसा कुछ नहीं है. आपने जरूर अपनी इच्छा से ऐसा किया होगा.” जांच के बाद मेरी बेटी और ज्यादा डर गई.


मुंबई में नगरपालिका अस्पताल की एक वरिष्ठ प्रसूति रोग विशेषज्ञ, जिन्हें अक्सर अदालत में बयान देने के लिए बुलाया जाता है, ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया कि न्यायाधीश विशेष रूप से निचली अदालतों के न्यायाधीश, अक्सर चिकित्सीय-कानूनी दिशानिर्देशों से अनजान होते हैं और पुलिस के माँग-प्रपत्र में भी दिशा निर्देशों की अनदेखी की जाती है. डॉक्टर ने कहा, “पुलिस हमेशा हमसे पूछती है कि क्या जबरन [यौन] हमला हुआ है, क्या वीर्य मौजूद है. उन्हें प्रशिक्षित नहीं किया गया है और यही कारण है कि वे ऐसे प्रश्न पूछते हैं. पुलिस के लिए, यौन हमले का मतलब केवल (लिंग) प्रविष्टि है.”


कई राज्यों के अपने दिशानिर्देश हैं, लेकिन वे अक्सर पुराने होते हैं और 2014 के केंद्र सरकार के दिशानिर्देशों जैसे विस्तृत और संवेदनशील नहीं होते हैं, इनमें ऐसी प्रक्रियाओं और चिकित्सा जांच की आवश्यकता होती है, जो जरूरी नहीं भी हो सकते हैं. उदाहरण के लिए, राजस्थान के अस्पतालों में इस्तेमाल किए जाने वाले मानक फॉर्म में एक ऐसा कॉलम अभी भी है जो योनिच्छद (हैमेन) की स्थिति के बारे में जानकारी मांगता है और डॉक्टर इसे भरने के लिए फिंगर टेस्ट करते हैं. जयपुर के एक अस्पताल में फॉरेंसिक साक्ष्य विभाग के एक मेडिकल कानूनविद ने कहा, “ये फॉर्म्स मेरे जन्म से पहले के हैं”. हालांकि, हरियाणा राज्य सरकार ने 2014 के बेहतर दिशानिर्देशों से पहले 2012 में अपनी चिकित्सीय-कानूनी नियमावली जारी की थी, मगर अस्पताल हमेशा उन प्रोटोकॉल्स का पालन नहीं करते हैं. हिसार जिले के सरकारी अस्पताल में, ह्यूमन राइट्स वॉच ने पाया कि सरकार द्वारा जारी किए गए 17 पृष्ठों के विस्तृत फॉर्म के बजाय डॉक्टरों ने दो पृष्ठ वाले फॉर्म का इस्तेमाल किया. रेजिडेंट चिकित्सा अधिकारी ने कहा, “सरकारी प्रपत्र विस्तृत है. इंटरनेट हमेशा काम नहीं करता है, फिर कभी-कभी प्रिंटर काम नहीं करता, इसलिए हम ज्यादातर पुराने नियमावली फॉर्म का उपयोग करते हैं.”


एक ओर जहाँ अधिकारी फॉरेंसिक साक्ष्यों के संग्रह को मानकीकृत करने के लिए दिशानिर्देशों को लागू करने के लिए छोटे-छोटे कदम उठा रहे हैं, वहीँ स्वास्थ्य सेवा प्रणाली यौन हिंसा की उत्तरजीवियों को चिकित्सीय देखभाल और परामर्श प्रदान करने में काफी हद तक विफल रही है. इसमें सुरक्षित गर्भपात तक पहुँच और यौन संचारित बीमारियों के परीक्षण के लिए सलाह शामिल हैं. 2014 के दिशानिर्देश उत्तरजीवियों के लिए मनोसामाजिक देखभाल का खाका खींचते हुए कहते हैं कि स्वास्थ्य पेशेवरों को स्वयं फर्स्टलाइन (प्राथमिक) सेवाएं प्रदान करनी चाहिए या उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कुछ अन्य प्रशिक्षित व्यक्ति सुविधा केन्द्रों में हों जो ऐसी सेवाएं प्रदान करें. इसमें शामिल हैं- उत्तरजीवी के कल्याण पर ध्यान देना, उन्हें अपनी भावनाओं को व्यक्त करने और संकटकालीन परामर्श लेने के लिए प्रोत्साहित करना, सुरक्षा मूल्यांकन करना और सुरक्षा योजना बनाना तथा इलाज प्रक्रिया में परिवार और दोस्तों को शामिल करना. ह्यूमन राइट्स वॉच द्वारा दस्तावेजीकरण किए गए बलात्कार के लगभग सभी मामलों में, महिलाओं और लड़कियों ने कहा कि परामर्श सहित उनकी स्वास्थ्य आवश्यकताओं पर लगभग कोई ध्यान नहीं दिया गया, जबकि यह स्पष्ट हो गया था कि उन्हें इसकी बहुत जरूरत थी.

काजल को उसके पति और परिवार ने छोड़ दिया था और सितंबर 2015 में सामूहिक बलात्कार  का मामला दर्ज कराने के महीनों बाद उसे चिकित्सीय सहायता और परामर्श की अविलंब जरूरत थी. वह अपने माता-पिता के साथ रहने के लिए लौट आई, लेकिन जल्द ही वे अभियुक्तों की धमकियों के बाद जगह बदलने के लिए मजबूर हो गए. हालांकि, जांच करने वाले चिकित्सक ने परामर्श के लिए उसे किसी के पास नहीं भेजा था. काजल ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया:
मैंने सब कुछ खो दिया और सब मुझे दोषी ठहराते है. घटना के बाद एक महीने तक मैं घर के बाहर नहीं गई. मैं पड़ोसियों के ताने सुन-सुन के थक गई थी. मैंने खाना-पीना छोड़ दिया था, बस घर पर किसी पागल महिला की तरह पड़ी रहती थी. ऐसा लगता था जैसे मैंने अपना मानसिक संतुलन खो दिया हो.


प्रभावी कानूनी सहायता तक पहुंच का अभाव


दिल्ली की वरिष्ठ आपराधिक वकील रेबेका मैमन जॉन ने कहा कि सुनवाई की प्रक्रिया भयभीत करने वाली और भ्रामक हो सकती है और “पीड़िता को शर्मिंदा करने की कोशिशें अभी भी अदालतों में खूब होती हैं. हमें अदालती भाषा को बदलने के लिए काम करने की आवश्यकता है.” प्रायः भारतीय सुनवाई प्रक्रियाओं में हानिकारक रूढ़ियां कायम हैं. अदालतों में न केवल न्यायाधीशों बल्कि बचाव पक्ष के वकीलों द्वारा भी यौन हमले की उत्तरजीवियों के प्रति अक्सर पक्षपाती और अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया जाता है. उत्तरजीवियों के लिए प्रभावी कानूनी सहायता इस तरह के पूर्वाग्रहों को दूर करने में मदद कर सकती है.

अपर्याप्त कानूनी सहायता विशेषकर उन उत्तरजीवियों के लिए चिंता का विषय है जो गरीब और हाशिए के समुदायों से आते हैं. 1994 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कहा गया कि यौन हमले की  पीड़िताओं को कानूनी सहायता प्रदान की जानी चाहिए और सभी पुलिस स्टेशनों को कानूनी सहायता विकल्पों की सूची रखनी चाहिए. दिल्ली में यह सुनिश्चित करने के प्रयास हुए हैं – दिल्ली महिला आयोग एक रेप क्राइसिस सेल का संचालन करता है जो पुलिस स्टेशनों के साथ समन्वय करता है, हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह भी तदर्थ व्यवस्था है और पूरी तरह प्रभावी नहीं है – फिर भी देश के अन्य हिस्सों, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसी व्यवस्था दुर्लभ है. ह्यूमन राइट्स वॉच द्वारा जिन 21 मामलों का दस्तावेजीकरण किया गया है उनमें से किसी में भी पुलिस ने पीड़िता को कानूनी सहायता के उनके अधिकार के बारे में सूचित नहीं किया या कानूनी सहायता प्रदान नहीं की.

ताकि पीड़िताओं को बार –बार बलात्कार से न गुजरना पड़े

केंद्र सरकार ने महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध के मामलों के तेज निपटारे के लिए पूरे देश में करीब 524 फास्ट-ट्रैक अदालतों की स्थापना की है. इनकी प्रभावकारिता को निर्धारित करने के लिए अभी तक कोई भी देशव्यापी अध्ययन मौजूद नहीं है. हालांकि,ऐसा प्रतीत होता है कि केवल फास्ट-ट्रैक अदालतों की स्थापना अपर्याप्त है: पीड़ितों को इस व्यवस्था में मार्गदर्शन  करने में मदद के लिए कानूनी सहायता जैसे अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं पर समान रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए.


बच्चों से जुड़े मामलों में, कानून जांच और सुनवाई की पूरी प्रक्रिया के दौरान बच्चे की मदद करने के लिए सहयोगी व्यक्ति उपलब्ध कराता है. हालांकि, जैसा कि ह्यूमन राइट्स वॉच ने पाया कि इस संबंध में कार्यान्वयन की कमी है, जबकि बलात्कार की वयस्क उत्तरजीवियों के लिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं है. दिल्ली स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी की विशेष सचिव गीतांजली गोयल ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया, “बलात्कार के मामलों जैसे पोस्को (यौन अपराधों से बाल संरक्षण अधिनियम) में सहयोगी व्यक्ति उपलब्ध कराया जाना चाहिए. यह अनिवार्य नहीं है, लेकिन एक विकल्प होना चाहिए, क्योंकि पीड़ित को मामले की स्थिति, पुलिस जांच, क्या चार्जशीट दर्ज की गई, क्या अभियुक्त ने जमानत के लिए आवेदन कर दिया है जैसी बातों के बारे में भी जानकारी नहीं होती है.”

पूरी रिपोर्ट पढ़ें : “सब मुझे दोष देते हैं”

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सत्ता का पुरुष चरित्र: राजनीति-गली अति सांकर

स्वरांगी साने

वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार और अनुवादक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित. संपर्क : swaraangisane@gmail.com

‘क्या किसी महिला के साथ सेल्फी लेने से महिला और पुरुष का चरित्र खराब हो जाता है? क्या महिलाओं के साथ सेल्फी लेना गुनाह है?’ यह सवाल बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव ने उठाया है। दरअसल तेजस्वी यादव की एक तस्वीर जेडीयू ने बाकयदा प्रेस कॉन्फ़रेंस कर सार्वजनिक की थी। सारे मामले को परे रख भी दें तब भी तेजस्वी ने जो सवाल उठाए हैं उनके जवाब दिए ही जाने चाहिए। बकौल तेजस्वी ‘क्या नीतीश जी ने यह तस्वीर जारी करवाने से पहले इस महिला की इज़ाजत ली थी? क्या ये निजता का उल्लंघन नहीं है?’ राजनीति की गलियों में घूमती सेक्स सीडियां किसी महिला पक्षधरता का नमूना नहीं होतीं. जब संबंधों में कोई पीड़ित पक्ष सामने नहीं आया तो एक को ठिकाने लगाने के लिए दूसरे की निजता का उल्लंघन पुरुष-वर्चस्व के हु-तू-तू का खेल है.


स्त्री-पुरुष के बीच के संबंध उनकी निजता के होते हैं और उसे चौराहे पर ला खड़ा करना, उतने ही ओछेपन का प्रतीक। फिर लोग कोई ढाल तलाशते हैं मतलब जैसे गुरमीत मामले में यह कहना कि हनीप्रीत मेरी बेटी जैसी है। स्त्री-पुरुष को साथ में देखा ही नहीं जा सकता और यदि वे साथ हैं, तो ग़लत ही है..पर यदि बेटी (या पत्नी) कहकर कितना भी अत्याचार कर लें, सही है। दो व्यक्तियों के बीच के संबंधों पर तीसरे का दखल क्यों हो?समाज किसी भी स्त्री के मामले में ठेकेदार बन क्यों उभरता है? स्त्री जिसे वह (समाज) जैसा चाहे नचा ले…और राजनीति की काली कोठरी में तो स्त्रियों का नाम उछालना बड़े गर्व (!) की बात।

अनचिन्हा कोलाज़….स्वरांगी साने की कविताएँ

हम एक से बढ़कर एक कद्दावर महिला राजनेताओं की बात कर लें लेकिन सबसे ज़्यादा उनकी वे तस्वीरें देखी जाती हैं जिसमें वे ग्लैमरस दिखती हैं। सत्ता किसी की भी हो, वह स्त्रीवाची नहीं होती और स्त्री के प्रति उसका नज़रिया भी सकीर्ण होता है। वरना क्या कारण है कि अभी दो-तीन दिन पहले नंदुरबार जिले में एक चीनी के कारखाने में आयोजित कार्यक्रम में महाराष्ट्र के जल संसाधन मंत्री गिरीश महाजन कह उठते हैं कि शराब के ब्रांड को महिलाओं का नाम दे दिया जाए, तो यह खूब बिकेगी। ऐसे में क्या कोई फ़र्क दिखता है बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राजनैतिक पैंतरे और महाराष्ट्र के मंत्री की सोच में? लगता है दोनों ही मानते हैं कि महिला का नाम उछालना दोनों हाथ में लड्डू होने जैसा है, यदि तीर निशाने पर लग गया तो भी ठीक और नहीं लगा तब भी खबर तो बन ही जाएगी…बदनाम कर दिया या बदनाम हो गए, दोनों सूरत में नाम तो हो ही जाएगा। और इस हथकंडे में वे इस्तेमाल करते हैं स्त्री को।

हनीप्रीत की खबर नहीं सेक्स फंतासी बेच रही मीडिया

कथित ‘त्रिया चरित्र’ की दुहाई देने वालों से बड़ी कठोरता से पूछने का मन करता है कि इस मानसिकता के लिए वे पुरुष चरित्र जैसा कोई नाम क्यों नहीं रचते? क्या वजह है कि जैसे किसी मंच की शोभा बढ़ाने के लिए फूलदान को रख दिया जाता है, वैसे ही महिलाओं को भी मंच पर बैठा दिया जाता है…या वैसे ही राजनीति में उनका स्थान तय कर दिया जाता है।

उत्तरप्रदेश में होने वाले नगर निकाय के चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस जी-जान एक किये हैं तो प्रदेश में सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी के लिए यह प्रतिष्ठा का मुद्दा है। लेकिन यहाँ भी महिला का इस्तेमाल चुनावी हथकंडे जीतने के लिए किया जा रहा है। कानपुर के बिठूर से भाजपा विधायक अभिजीत सांगा की माँ निर्मला सिंह को भाजपा ने बिठूर नगर पंचायत से प्रत्याशी बनाया और बस्ती जिले के रुधौली नगर पंचायत से वहाँ के विधायक संजय जायसवाल की पत्नी संगीता जायसवाल को प्रत्याशी बनाया गया है जबकि कहा जा रहा था जमीनी कार्यकता को टिकट दी जाएगी। यदि इन महिलाओं को जमीनी कार्यकर्ता के रूप में टिकट दी गई है तो स्वागत है लेकिन इन्हें विधायक सांसद के रिश्तेदार के तौर पर टिकट दी गई है। ऊपरी तौर पर महिला को टिकट लेकिन वह केवल कठपुतली।मड़ियाहूँ सीट से माफ़िया डॉन मुन्ना बजरंगी की पत्नी सीमा सिंह मैदान में हैं पर भाई लोग कह रहे हैं- ‘सब जानत हैं कि भइया जी लड़ रहे हैं। भाभी का नामे भर है’।


ऐसा ही तब भी कहा गया था जब पहली बार राबड़ी देवी सत्ता में आई थी। लेकिन समय ने बताया कि यदि किसी भी, एकदम घरेलू महिला को भी अवसर दिया जाए तो वह खुद को सिद्ध कर देती है लेकिन यह और ऐसे अनगिनत उदाहरण हो सकते हैं जहाँ महिलाओं को केवल उस खिलौने की तरह माना जाता है, जिसका जैसा चाहे इस्तेमाल कर लो…वह क्या कर लेगी? किसी के साथ उसकी तस्वीर को हवा में उछाल दो या उसकी ही हॉट तस्वीर जारी कर दो। ‘राहुल गांधी, स्मृति ईरानी से डरते हैं’ का जुमला उछाल दो या ऐसा ही कुछ कर लो…

यह स्थिति भारत की नहीं पूरे विश्व की है। आँकड़े बताते हैं पूरे विश्व में विधायिकाओं में केवल 10.5 प्रतिशत महिलाएँ हैं और मंत्री पद पर सिर्फ 6.1 प्रतिशत महिलाएँ ही हैं। भारत में 17 वीं विधानसभा की 403 में से केवल 98 सीटें महिलाओं को दी गई, मतलब 25 प्रतिशत से भी कम और वह भी अधिकांश अपनी बहू-बेटियों में बाँट दी गईं। महिलाओं को खुद से कम आँकना, ‘ये क्या जानती हैं’, वाली मानसिकता और महिलाएँ कुछ समझ नहीं सकतीं, वाला भाव दूर होना चाहिए। बसपा की तो मुखिया ही महिला है तब भी टिकट बँटवारे में महिलाओं की सबसे ज़्यादा उपेक्षा की गई, 400 सीटों पर केवल 21 महिला प्रत्याशी। भाजपा ने 370 में से 46 सीटें महिलाओं को दीं, कांग्रेस ने 105 में से केवल पाँच महिलाओं को सपा ने 299 में से केवल 29 महिलाओं को दीं।

महिलाओं ने लगातार अपने आपको सिद्ध किया लेकिन पुरुषों की मानसिकता दकियानूस ही रही। इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री बनने से पहले ही देश के सबसे बड़े राज्य अविभाजित उत्तरप्रदेश में सुचेता कृपलानी (1963 से 1967) बनकर देश की पहली महिला मुख्यमंत्री रहीं। उसी उत्तरप्रदेश में अगर कानून व्यवस्था के राज की बात की जाती है तो वो कल्याण सिंह और मायावती की ही होती है। देश के सबसे बड़े राज्य के सबसे ताकवतर लोगों में मायावती हैं। अखिलेश यादव के साथ कंधे से कंधा मिलाने वाली डिम्पल यादव हैं। बिहार में पहली बार 1997 में भले ही मजबूरी में राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनाई गई थी लेकिन 2005 तक वे तीन बार मुख्यमंत्री पद को मुस्तैदी से सँभाल चुकी हैं। पश्चिम बंगाल का नाम आए तो ममता बनर्जी को भूल जाएँ यह हो ही नहीं सकता। सोनिया गाँधी पर विदेशी मूल का होने का आरोप लगता रहा हो लेकिन सबसे लंबे समय तक कांग्रेस अध्यक्ष का रिकॉर्ड उनके नाम दर्ज हो चुका है। जम्मू-कश्मीर में महबूबा मुफ्ती का मुख्यमंत्री बन जाना कोई आसान बात नहीं थी। पंजाब में आतंकवाद का निपटारा करते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री राजिंदर कौर भट्टल को देखा जा सकता था। देश की राजधानी दिल्ली में लंबे समय तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर शीला दीक्षित का कब्जा था। राजस्थान में वसुंधरा राजे का बोलबाला है वे 2003 से 2008 तक यहाँ मुख्यमंत्री थीं। उत्तराखंड में नारायण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्री काल में सबसे ताकतवर मंत्री इंदिरा हृदयेश रहीं। तमिलनाडु में शशिकला के लिए रास्ता बनाने का काम जयललिता ने किया था जब उन्होंने वहाँ के पुरुष वर्चस्व की राजनीति को मटियामेट कर दिया था।



…ज़ाहिर है अब पुरुषों को साबित करना होगा कि वे महिलाओं को अपने देखने के दृष्टिकोण को बदलेंगे..महिला के बारे में विचार करते हुए उनकी आँखें जिस एक्स-रे मशीन का काम करती हैं उस चश्मे से महिलाओं की त्रि-आयामी छवि बनाने की बजाए अपने दिमाग के जाले झाड़कर महिलाओं के बहुआयामों को समझेंगे और महिलाओं का इस्तेमाल किसी भी तरीके से अपने हित में करना बंद करेंगे।

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