दीपा कर्माकर से पीवी सिंधु तक: विपरीत परिस्थितियों में खेल और जीत रही हैं लडकियां

अपने ऊपर देश भर टिकी निगाहों के बीच पीवी सिंधु ने भारत को ओलंपिक में बैडमिन्टन में पहला रजत दिलाया. 21 साल की पीवी सिंधु अबतक ओलंपिक में रजत पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी भी बनीं. उन्होंने विश्व चैंपियन के साथ हुए फाइनल में जबर्दस्त खेल का प्रदर्शन किया.


रोमांचक मैच में विश्व चैंपियन स्पेन की कैरोलीना मारिन ने सिंधु को 19-21, 21-12, 21-15 से मात दी. पहला गेम यद्यपि सिंधु 19-21 से जीत गईं लेकिन उसके बाद के दो गेम विश्व की नंबर के की खिलाड़ी कैरोलीना के हक़ में रहे. तीसरे गेम में कैरोलीना से शुरूआत में ही दबाव बनाया और एक समय वो स्कोर को 7-2 तक ले गईं. बाद में सिंधु ने वापसी की और 10-10 तक अंक पहुंचाया. हालांकि उसके बाद   कैरोलीना के आक्रामक खेल के सामने सिंधु को रजत पदक पर ही संतोष करना पडा. दूसरा गेम भी कैरोलीना ने 21-12 से जीत लिया था.
पुसरला वेंकटा सिंधु

पीवी सिंधु नाम से ख्यात पुसरला वेंकटा सिंधु पूर्व वॉलीबाल खिलाड़ी पीवी रमना और पी विजया की बेटी हैं. रमना को 2000 में खेलों के लिए अर्जुन सम्मान भी मिल चुका है.

इसके पहले भारतीय पहलवान साक्षी मलिक ने रियो ओलंपिक में कांस्य पदक हासिल कर इतिहास रचा. उन्होंने रियो ओलंपिक में भारत के लिए पहला पदक हासिल किया. महिलाओं की फ्रीस्टाइल कुश्ती के 58 किलोग्राम भारवर्ग में भारत के लिए पदक जीतने के लिए साक्षी ने पदक के लिए प्लेऑफ मुक़ाबले में कर्गिस्तान की पहलवान आइसूलू टाइनेकबेकोवा को 8-5 के अंतर से हराया. हरियाणा के रोहतक की रहने वाली साक्षी मलिक दिल्ली में एक बस कंडक्टर की बेटी है.

साक्षी मलिक

सिंधु और साक्षी के पहले भारत की ओर से ओलंपिक में सिर्फ तीन महिला खिलाड़ी कर्णम मल्लेश्वरी, मैरी कॉम और साइना नेहवाल ने क्रमशः 2000, 2012, 2012 में यह उपलब्धि हासिल की थी. सन 2000 में मल्लेश्वरी भारोत्तोलन में कांस्य जीत कर ओलंपिक में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं. उसके बाद 2012 में मेरी कॉम ने मुक्केवाजी में और 2012 में ही सायना नेहवाल ने बैडमिंटन में भारत की पहली महिला पदक विजेता बनने का इतिहास रचा.

रियो में पदक की पहली उम्मीद जिमनास्ट की खिलाड़ी दीपा कर्माकर ने जगाई थी, लेकिन बेहतरीन प्रदर्शन के बावजूद वे चौथे नंबर पर रहीं. साधारण परिवार  से आने वाली दीपा ने अपने संघर्ष के बूते यह उपलब्धि हासिल की थी. दीपा कर्माकर के पिता दुलाल कर्माकर भारत में वेट लिफ्टिंग के कोच हैं और मां गृहिणी हैं.

दीपा कर्माकर

भारत में लड़कियों के खिलाफ सामाजिक जड़ता और बंदिशों के बीच तथा खेलों के लिए सर्वथा विपरीत माहौल में लडकियां अपने बल-बूते पर उपलब्धियां हासिल कर रही हैं. इन लड़कियों की विजय गाथा ही काफी है यह स्पष्ट करने के लिए कि भारतीय समाज अपने नायकों के खिलाफ पूरा अवरोध उपस्थित कर उनकी विजय के बाद किस कदर उनके नायकत्व के उत्सव में शामिल होता है. नायिकाओं के लिए तो यह समाज और भी विपरीत और षड़यंत्रकारी है.
Blogger द्वारा संचालित.