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लल द्यद की काश्मीरी वाख कविता

(  लल द्यद मध्यकालीन भक्त कवयित्रियों में प्रमुख नाम है . स्त्रीकाल के लिए फारूक शाह लल द्यद की कविताओं की प्रस्तुति कर रहे हैं , इन कविताओं के अनुवाद  फारूक शाह ने किये हैं.
मध्यकाल की भक्ति कविता पर काफी काम हो  रहे हैं , कुछ स्त्रीवादी भी. लल द्यद पर भी स्त्रीवादी कामों में एक उल्लेखनीय काम  है  , जयश्री काक का  . )

अनुवादक का नोट :

लल द्यद : ललमोज, ललारिफ़ा, लल्लेश्वरी आदि नामों से भी ख्यात काश्मीरी शैव धर्म (त्रिक, प्रत्यभिज्ञा दर्शन) की परंपरा से संबंधित संत कवयित्री है. काश्मीरी लोक की मौखिक किंवदंतियों में योगी सिद्ध श्रीकंठ, नून्द रुषी (शेख नूरुद्दीन वली) और पीर अली हमदानी के साथ जुड़ी हुई यह रहस्यवादी संत-कवयित्री का स्वीकार सभी धार्मिक वर्गों व जाति के लोगों में समान रूप से है. इसलिए कश्मीरी लोक में वे शैव योगिनी, सूफी दरवेश तथा अपने अपने समुदाय की मानी जाती हैं. सदियों से उनकी वाख (सूक्ति) कविताएँ मर्मी लोक के ह्रदयों में उजाला फैलाती आई है. ऐतिहासिक साक्ष्यों से जो जानकारी मिलती हैं उसके अनुसार : जीवनकाल 1317 से 1388 ई. के दौरान. जन्म-स्थान पाम्पोर के निकट पान्द्रेठन (वर्तमान सिमपोर). निधन श्रीनगर-जम्मू के मार्ग पर स्थित बिजबिहाड़ा गाँव में माना जाता है.

उन्होंने मानप्रतिष्ठा की सारी मर्यादाओं को तिलांजलि देकर सतचिंतन में निरत एक रमती-डोलती योगिनी के रूप में जीवन बिताया. भीतर की अंतरी चाल से अस्तित्व के उँचे मुकाम पार किये, सत्य के प्रदेशों को दूर तक जाना. साथ ही लल द्यद ने उस समय के प्रसिद्ध सूफ़ी नून्द रुषी और पीर अली हमदानी के साथ मिलकर हाशिये के ग्रामीण लोगों में बौद्धिक व प्रगतिशील चेतना जगाकर उनके उत्कर्ष का बहुत बड़ा काम किया था. वे ऐसे लोकशिक्षक के तौर पर सदियों से काश्मीर के लोक-हृदयों में बिराजती आईं हैं जिसने जीवन विरोधी प्रथाओं से मुक्त मानव-मूल्य आधारित समाज-व्यवस्था का निर्माण करने का प्रयत्न अपने युग में किया हो.

उनकी ‘वाख’ कविताओं में अस्तित्व के सत्य की खोजी एक स्त्री का संघर्ष, लोकशिक्षण की भूमिका और अस्तित्व के पूरे सत्य की ऊंचाई से उच्चरित पूर्ण मनुष्यत्व के बोध की अभिव्यक्ति – ये तीनों स्तर दिखाई देते हैं. लिखित व मौखिक परम्पराओं के जरिये सदियों का रास्ता तय करती हुई ये कविताओं में लल द्यद की प्रखर मेधाशक्ति की प्रतीति देते ऐसे सच की ध्वनि गूँज रही है जो पूरे भाव से अंतर्सिद्ध चेतना को जगाए. चौदवें शतक में लल ने कही हुई इन कविताओं को आज आधुनिक इसलिए मानें कि वे आज भी जीवंत रूप से बह रही हैं, अस्तित्व की स्वर्णिम संभावनाओं को संकेत करती…
जार्ज ग्रियर्सन और डॉ. बर्नेट ने 1914 में लल-वाखों का संचय किया था. रिचर्ड टेम्पल ने भी वाखों का अंग्रेजी में अनूदित ग्रन्थ 1924 में दिया था. इन अनुवादों और मूल काश्मीरी पाठ की रोमन-देवनागरी प्रतियों के आधार पर यहाँ पर उनकी कुछ वाखों का रूपांतर हिन्दी में देखें :

लल द्यद की कविताएं :

आ गई सीधी राह से
लेकिन वापस न जा सकी
सीधी
चली जा रही थी बीच के पुल पर
कि दिन ढल गया
जेब में हाथ डाला तो
मिले न एक पैसा भी
अब पार उतरने के लिए
नाविक को
दूँ भी तो क्या दूँ ?

O

किस दिशा
और किस मार्ग से आई
नहीं जानती
किस दिशा और किस मार्ग से जाऊँगी
यह भी नहीं जानती
कोई तो मुझे सच बता दे
केवल प्राण–साधना का आधार तो
किसी काम का नहीं

O

बाण मिला
काठ के धनुष के लिए
तो वह घास का
बढ़ई मिला राजमहल बनाने
तो वह भी निपट बुद्धिहीन
मेरी दशा तो हो गई
बीच बाज़ार में
बिना ताले की दुकान हो ऐसी
रही मेरी देह तीर्थ-विहीन
भला, कौन समझ सकता है
मेरी इस लाचारी को ?

O

सड़क पर चिपक गया
पैर के तलुवों का मांस
तभी दिखाया
मुझे जिसने मार्ग
जो उस एक का नाम सुनेंगे
वे क्यों न पागल हो जाए ?
लल ने तो निकाल ली
सौ बातों में से

सार की एक बात
O

मैं एक थी
अनेक हो गई
पास रहकर भी रही दूर
अंदर–बाहर
दिखाई देता था एक
पर ये चौपन चोर (1)
सब कुछ खा-पी गए
और
मुझे धोखा देकर चले गए

O

सूई की नोक
या बाल जितनी भी
कभी पीछे न रही
मैंने भीतर के अंधकार को
पकड़ लिया
पकड़ के उसे चीर डाला

O

प्रेम की ओखली में
मैंने हृदय को कूटा
मेरी कुवृत्ति नष्ट हो गई
मैं हो गई बिलकुल शांत
बाद में
इस हृदय को भूना-पकाया
और चखा

अब मैं यह न जानूँ
मर जाउँगी
या जीवित रहूँगी ?

O

आई संसार में
तप करने के लिए
बुद्धि के प्रकाश में
पाया सहज (2) को
न मेरा कोई मरेगा
न तो मैं
किसी के लिए मरूँगी
मरूँ भी तो वाह
जीवित रहूँ भी तो वाह !

O

हृदय का सारा मल
जला डाला
जिगर का भी किया अंत
उसकी दहलीज पर अंचल पसार
बैठ गई अडिग
तभी कहीं जाकर हुआ
मेरा ‘लल’ नाम प्रसिद्ध

O

तन मन से खो गई
उसके ध्यान में
मुझे सत की घण्टी बजती
सुनाई दी

मैंने धारण कर लिया
अपनी धारणा को
और
आकाश-पाताल का भेद
जान लिया

O

पठन सरल
पर पालन मुश्किल
मुश्किल है सहज की खोज भी
अभ्यास के घने कुहरे में
भूल गई सभी शास्त्र
तब पा लिया चेतन आनंद को

O

अभी देखी
बहती नदी
और अभी देखा
उस पर न कोई सेतु
या पार उतरने
छोटी-सी कोई पुलिया भी

अभी देखी
फूलों से लची हुई डाली
और अभी देखे
उस पर
न फूल, न तो काँटे

O

कौन सोया हुआ है
और कौन जागा हुआ ?
कौन सा वह सरोवर है
जिससे रिसती है बूंद बूंद ?
वह कौन सी चीज़ है
जो हर के लिए आराधनीय है ?
और वह कौन सा परमपद है
जो प्राप्त होता है ?

O

अपनी चमड़ी को काटकर
तूने गाड़ दिए खूंटे
शरीर में चारों ओर
बोया नहीं भीतर ऐसा कोई बीज
मिले जिससे फल
अब तुझे समझना तो ऐसा
जैसे शिखर पर कंकर फेंकना
या बैल को गुड़ खिलाना

O

एक ज्ञानी को देखा
भूख से मरता
मानो पोष के पवन से जर्जर होता
और देखा
एक रसोइये को
मूर्ख के हाथों पीटता

मैं लल,
उस घड़ी की राह देखने लगी
जिसमें मेरा भवबंधन छूटे

O

देव पत्थर
देवल भी पत्थर
ऊपर – नीचे
एक समान ही स्थिति
रे पंडित,
इसमें किसकी करेंगा तू पूजा ?
इसीलिए कहती हूँ
अपने मन और प्राण को
एक कर दे !

O

जानते हुए भी
बन जा मूढ़
देखते हुए भी अंध
सुनते हुए भी बन जा बधिर
और जागते हुए भी जड़
जो जैसा बोले
उसके साथ वैसा ही बोल
यही अभ्यास है तत्त्वविद्‌ का

O

सर्वत्र व्याप्त है शिव
बारीक जाल बिछाये
कैसे वह रच-पच गया है
सबके शरीर में
उसे जीते जी नहीं देखेगा
तो क्या मरकर देखेगा ?
विवेक और मार्गचिंतन से काम ले
और ढूँढ़ निकाल उसे
अपने अंदर ही

O

वहाँ नहीं
वाणी, मन, कुल या अकुल
मौन मुद्राओं का भी
वहाँ प्रवेश नहीं
शिव और शक्ति भी
वहाँ रहते नहीं
तुम्हारे पास
बचा है जो शेष
वही परम उपदेश है

O

शील और मान तो
टोकरी में जल भरने जैसे
हाँ,  जो पवन को
मुट्‌ठी में बंद कर सके
और हाथी को
एक बाल से बाँध सके
वह हो जाएगा निहाल

O

अभ्यास से विस्तार का
लय हो जाए
तब दिखाई देने लगे
सगुण और गगन एक
शून्य भी हो जाता है नामशेष
बच जाता है केवल
अनामय शिव (3)
हे पंडित,
यही एकमात्र उपदेश है

O

छ: वनों को पार करके
मैंने शशिकला (4) को जगाया
मुझे पवन से प्रकृति को
सुखाना पड़ा
तब कहीं जाकर मैं
अपने शिव को पा सकी

O

तन पर
ज्ञानवस्त्र धारण कर
लल ने कहे जो पद
उन्हें हृदय में उतारना
प्रणवधून (5) के वाद्य पर
जैसे लल हो गई लीन
वैसे ही तेरे भीतर भी प्रकट होगी
मृत्यु की भ्रांति को नष्ट करती
जाग्रत ज्योत

O

शून्य का एक असीम मैदान
पार किया
तब मुझे, लल को
न बुद्धि रही न होश
सहज का भेद पाकर
कीचड़ में उगे कमल जैसी
हो गई

_____________________
1. ज्ञानेन्द्रियाँ-मनोवृत्तियाँ और विकार आदि चौपन पिण्ड व मनोगत घटक 2-3. समस्त अस्तित्व का पूरा सच, पूर्ण सत्य 4. शैवतंत्र अनुसार समस्त अस्तित्व के परम सत्य की ओर जाने वाला स्थान 5. उस सत्य की अनादि ध्वनि, अनाहत नाद, नाम, इस्मे-आज़म

स्त्रीकाल पर फारूक शाह की प्रस्तुतियां और  उनकी रचनायें : ( क्लिक करें )
1. एक ऐसा इतिहास जो लिखा न गया किताबों में
२. जब अपने संकल्प के साथ एक निर्भ्रांन्त जीवन शुरू किया
३. कुएं में मेढक : तेलगू कहानी

जोहरा आपा तुम्हें लाल सलाम!

स्वतंत्र मिश्र


स्वतंत्र मिश्र अपनी प्रतिबद्ध पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं. उनकी सरोकारी पत्रकारिता के लेखन का एक संकलन ‘जल, जंगल और जमीन : उलट-पुलट पर्यावरण’ नाम से प्रकाशित हो चुकी है.स्वतंत्र स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन के सम्पादन मंडल के सदस्य भी हैं . इनसे उनके मोबाइल न 9953404777 पर सम्पर्क किया जा सकता है.

( स्वतंत्र मिश्र ने १० जुलाई को दुनिया को अलविदा कह गई जोहरा सहगल को याद करते हुए मशहूर अदाकारा की जिन्दादिली  तथा शासन व्यवस्था और तंत्र की बेदिली का चित्र खींचा है और स्त्री स्वतन्त्रता तथा   कला के प्रति जोहरा के जज्बे को सलाम किया है. )

इसी साल,   अभी-अभी तो बीते 27 अप्रैल को ,  मशहूर नर्तकी-कोरियोग्राफर-अभिनेत्री (रंगमंच और फिल्म)जोहरा सहगल, ने 102 साल पूरे किए थे और इतनी जल्दी दुनिया को उनके अलविदा कह जाने की खबर से थोड़ा सकते में हूं ,क्योंकि जोहरा का मतलब जिंदगी और जिंदादिली से है। ऐसा उनके नाम का शाब्दिक अर्थ है या नहीं है, मुझे नहीं पता है। हां,  उनकी जीवटता को देखकर उनके नाम का अर्थ यूं ही कुछ-कुछ हो सकता है। उन्होंने कुछ साल पूर्व एक साक्षात्कार के दौरान एक पत्रकार के यह पूछे जाने पर कि वे 97  की हो गई,  उन्हें मौत से डर नहीं लगता तो उन्होंने पलट कर इस बेहूदे सवाल के जवाब में एक सवाल किया- ‘कौन दुनिया से पहले जाएगा,  मैं या आप,  यह कौन तय करेगा ?’ इसके बाद उन्होंने उस पत्रकार से कहा- ‘ मौत तय है, फिर क्यों डरना ! हां,  जिंदगी अनिश्चित है ,इसलिए  खुशी और सुकून पाने के लिए कुछ चीजें जरूरी हैं , मिसाल के तौर पर , मेहनत  , और मैं ताउम्र ऐसा करती रहूंगी।‘ जाहिर है कि उन्होंने अपने जीवन के लिए तय किए गए इस अनुशासन का सामर्थ्य  रहने तक दृढ़ता से पालन किया। टाइम्स ऑफ इण्डिया को एक साक्षात्कार में उन्होंने ९७ साल में भी अपनी जीजीविषा के लिए ‘ ह्यूमर और सेक्स’ को श्रेय दिया था. उन्होंने कहा था कि ‘ ह्यूमर के बिना जिन्दगी बोरियत से भर जाती है और सेक्स मैं आज भी चाहती हूँ , क्योंकि वह आपकी सक्रियता को बनाए रखता है.’  उन्होंने 95 वर्ष तक फिल्मों में काम किया। इसी साल की सर्दियों में मुझसे ‘शुक्रवार’ के तात्कालिक संपादक विष्णु नागर ने सरकार द्वारा उन्हें एक भूतल का मकान मुहैया नहीं कराने को लेकर एक स्टोरी करने को कहा। यह तो मेरे लिए मानो बिन मांगी मुराद जैसी ही बात थी। मैंने फिल्म निर्माण से जुड़े अनवर जमाल से उनकी बेटी किरण का मोबाइल नंबर लिया।किरण ने भी बहुत सहजता से समय दे दिया और उनके दिल्ली स्थित मंदाकिनी एन्कलेव वाले घर में हुई बातचीत के दौरान उन्होंने ही बताया कि अनवर ने जोहरा सहगल पर एक शानदार डाक्यूमेंट्री फिल्म भी बनाई है। मेरे साथ ‘शुक्रवार’ के ही मेरे वरिष्ठ सहयोगी मित्र नरेंद्र कुमार वर्मा और छाया पत्रकार मित्र रवि गिरोटा ने भी जोहरा से मिलने के लोभ में साथ चलने की इच्छा जताई। हम उनके घर पहुंचे। किरण से खूब सारी बातचीत हुई लेकिन जोहरा आपा से मिलने की मुराद पूरी नहीं हो पाई। इसकी वजह उनका स्वास्थ्य का दिन-ब-दिन गिरता चला जाना था। इसकी वजह केंद्र और दिल्ली सरकार द्वारा उनकी एक अदना से भूतल वाले घर की मांग पूरी न किया जाना था। एक वजह शायद यह भी हो कि जिन्होंने सात दशक से भी ज्यादा समय तक रंगमंच, कोरियोग्राफी,  विज्ञापन और फिल्मों में काम किया हो और कभी हार न मानी हो। जिसने हर बार कैमरे या व्यक्तिगत जीवन में सभी से पूरे जोशोखरोश से मिलना-मिलाना किया हो, जिनके पांवों ने कभी थिरकने से मना न किया हो, अब वे पूरी तरह अशक्त और कुर्सियों से बंध सी गई थी,  ऐसे में वे किसी के सामने कैसे आना मंजूर करतीं ! जो हमेशा यह कहतीं रही कि मैं रोहिल्ला पठान हूं, कभी हार नहीं मानूंगी,  ऐसे में  भला शून्य में टकटकी लगाए हुए जोहरा क्यों किसी से मिलना पसंद करतीं। सो हम उनके दर्शन से वंचित रह गए। हालांकि ओडिशी की मशहूर नृत्यांगना किरण ने हमारा बहुत गर्माहट से स्वागत किया और हम जोहरा से नही ,तो उनके अक्श, उनकी बेटी से तो मिल ही आए। वे भी सत्तर से ज्यादा की हो चुकी हैं। बच्चों को नृत्य सीखाने का काम करती हैं।

किरण ने हमसे मां और खुद के प्रति सरकारी उपेक्षा का दुःख बांटा और उम्मीद भी की कि शायद खबर छपने से कुछ असर हो जाए। हमारे  सहित तमाम अखबारों का कोई असर नहीं हुआ और सरकार ने उन्हें मरने तक भी भूतल का मकान नहीं मुहैया कराया। हां, मेरी खबर का असर इतना जरूर हुआ कि मुझे प्रसिद्ध पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र, वरिष्ठ कहानीकार अशोक गुप्ता सहित कुछ और लोगों ने फोन करके इस बारे में दिल्ली, केंद्र सरकार को पत्र लिखने की बात की थी पर यह किसी वजह से नहीं हो पाया। हम जिंदगी की तेज रफ्तार में कई बार कीमती आखिरी सांसों की परवाह करना तो दूर उन्हें रौंदते हुए आगे बढ़ जाना चाहते हैं। ऐसा ही इस मामले में भी हुआ। आज जब दफ्तर से जब घर लौटा तो जिंदगी और रोजीरोटी की जद्दोजहद में शरीर पस्त हो चुका था। संजीव चंदन का फोन आया कि जोहरा ने दुनिया को अलविदा कह दिया। मैं अवाक रह गया। संजीव चंदन ने पूछते हुए और लगभग याद दिलाते हुए उनके घर, उनकी बेटी के साथ की मुलाकात को समेटते हुए स्त्रीकाल वेबसाइट के लिए कुछ लिखकर देने का आग्रह किया। थोड़ी देर के लिए मुझे लगा कि क्या लिखूं और इस समय क्या लिखूं। पर उनकी जीवनी के किस्से मुझे एक-एक करके याद आने लगे। मेरे अंदर एक आवेग पैदा हुआ। मुझे लगा शायद इसी आवेग का नाम जोहरा है।

किरण ने जोहरा से मिलने की बात करने पर कहा कि वे मुलाकात के लिए 5000 रुपये और फोटो खीचने के दस हजार रुपये मांगती हैं। मैंने अफसोस जताया कि मेरे पास अगर 15 हजार रुपये होते तो मैं मुलाकात के पांच और फोटो के दस हजार रुपये जरूर देता क्योंकि मेरा मानना यह था कि जोहरा की मुलाकात का कीमत नहीं लगाया जा सकता है। मुंबई में कुछ होटल सिने तारिकाओं के साथ डिनर करने के भारी-भरकम रकम वसूल करता है। यह रकम उनकी चमकती त्वचा और उनके ग्लैमर की होती है। जोहरा के पास अब यह सब कुछ भी नहीं था ,लेकिन जोहरा के पास अतीत में किए गए काम की लंबी-चैड़ी पूंजी थी, जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए जोहरा के एक दर्शन पर न्योछावर करने के लिए काफी थी। अब उनके दांत टूट चुके थे। उन्हें न के बराबर दीखता है। सुनने की मशीन (हियरिंग एड) लगाने के बाद वह अपनी बेटी किरण सहगल से शाम के समय 15-20 मिनट बात कर पाती थीं। उल्लास और पूरे लय के साथ जिंदगी की गाड़ी खींच लेने के बाद सरकारी रवैये से खिन्न होकर जोहरा सबसे दूर अपने कमरे में ही बंदी जैसा जीवन बिता रही थीं। डाक्टर ने उन्हें अनिवार्य तौर पर सर्दियों में धूप खाने को कहा था लेकिन दूसरे मंजिल पर स्थित  से नीचे पार्क तक पहुंचने का मतलब एक भीषण पीड़ादायी प्रक्रिया से गुजरना होता था। जोहरा और किरण ने संयुक्त रुप से केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय, राज्यसभा सांसद श्याम बेनेगल,संगीत नाटक अकादमी और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री और दिल्ली के वर्तमान लेफ्टिनेंट गवर्नर को एक सरकारी आवास (ग्राउंड फ्लोर) मुहैया कराने के बारे में लिखा था, लेकिन मंत्रालय ने उनकी फाइल पर इस आशय का एक नोट लिखा कि कलाकार श्रेणी के अन्तर्गत 40-60 साल के लोगों को ही आवास मुहैया कराए जाने का प्रावधान है और वे इस श्रेणी में नहीं आती हैं। किरण ने बताया था कि ऐसी स्थिति में कैबिनेट से मंजूरी लेकर सरकार जोहरा और किरण को आवास मुहैया करा सकती थीं लेकिन उन्हें ऐसा करना बीते चार सालों में मुनासिब नहीं लगा। कभी जिनके पांवों के थिरकने और भाव-भंगिमा को देखने के लिए दुनिया के अलग-अलग मुल्कों में उनके प्रशंसक मचल उठते थे अब वे पैर कुर्सियों से बेजान होकर बंध से गए थे।

जोहरा का जन्म 27 अप्रैल 1912 में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में एक रोहिल्ला पठान के घर हुआ था। एक साल की उम्र में उनकी आंखों की रोशनी ग्लूकोमा की वजह से खो गई थी। वर्मिंघम में काफी इलाज के बाद उनमें रोशनी लौट पाई। छोटी सी उम्र में उनकी मां गुजर गईं लेकिन मां की इच्छा थी कि उनकी बेटियां लाहौर में पढ़ें। जोहरा को शिक्षा-दीक्षा के लिए लाहौर भेज दिया गया। वे वहां से जर्मनी के ड्रैसडेन स्थित मैरी विगमैन नृत्य स्कूल में दाखिला लिया। वे यहां दाखिला लेने वाली पहली भारतीय थीं। उन्होंने यहां बुर्का उतारकर फेंक दिया और कहा कि इस कपड़े से अच्छा पेटीकोट बन सकता है। उस जमाने के मशहूर नर्तक उदयशंकर अपनी टीम के साथ नृत्य प्रदर्शन के लिए यूरोप की यात्रा पर थे।

किरण सहगल के साथ स्वतंत्र मिश्र : छाया रवि गिरोटा

जोहरा ने उदयशंकर से मिलकर उनके साथ काम करने की इच्छा व्यक्त की तो उदय ने पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद उन्हें अपनी टीम में नौकरी देने का वादा किया लेकिन जोहरा को अचानक एक दिन उदयशंकर जी का एक तार मिला-‘हमलोग जापान नृत्य-यात्रा पर जा रहे हैं, क्या तुम हमारे साथ आ सकोगी?’  1935 में वे उदयशंकर के साथ जुड़ीं और पांच साल लगातार मिस्र, यूरोप और अमेरिका के अलग-अलग इलाकों में नृत्य टोली के साथ मुख्य नर्तकी की भूमिका का निर्वहन किया। इसके बाद उदयशंकर ने अल्मोड़ा में ‘उदयशंकर इंडियन कल्चरल सेंटर’ की नींव रखी। यहां जोहरा लोगों को नृत्य सिखाती थीं। उदयशंकर नृत्य शैली की उस जमाने में इतनी धूम थी कि उनसे नृत्य सीखने के लिए बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता और निर्देशक गुरूदत्त भी कुछ महीने अल्मोड़ा में टिक गए थे। जोहरा ने उदयशंकर के साथ आठ साल काम किया। यहीं जोहरा की मुलाकात वैज्ञानिक, पेंटर और नर्तक कामेश्वर सहगल से हुई। जोहरा ने कामेश्वर के खुद से आठ साल उम्र में छोटे होने और रूढि़वादी परिवार से नाता रखने के बाद भी शादी की। शादी के दो दिन बाद ही भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गांधी जी को समर्थन देने के चलते पति-पत्नी दोनों को जेल जाना पड़ा। जेल से छूटने के बाद वे मुंबई पलायन कर गए।

जोहरा 1945 में पृथ्वीराज कपूर की पृथ्वी थियेटर से जुड़ गईं। उनकी छोटी बहन उजरा बट्ट पहले से ही पृथ्वी थियेटर के लिए काम कर रही थीं। इन्हीं दिनों जोहरा इंडियन पीपल्स थियेटर एसोसिएशन (इप्टा) से जुड़ गईं। इन्होंने इप्टा से जुड़कर 14 साल तक काम किया। इप्टा के प्रोडक्शन में बनी ख्वाजा अहमद अब्बास द्वारा निर्देशित फिल्म ‘धरती के लाल’ में इन्होंने पहली बार पर्दे पर काम किया। इसके बाद इन्होंने चेतन आनंद की ‘नीचा नगर’ और गुरुदत्त की ‘बाजी’ में काम किया। सलमान खान के साथ ‘हम दिल दे चुके हैं सनम, शाहरुख खान के साथ ‘वीरजारा’ रणवीर कपूर के साथ ‘सांवरिया’ में काम किया। इन्होंने 2007 में आखिरी फिल्म ‘चीनी कम’ में  अमिताभ बच्चन के साथ काम किया था।

जोहरा के इस दुनिया से चले जाने के बाद क्या अपसंस्कृति के इस दौर में सांस्कृतिक अभियान को खड़ा करने के लिए कोई मुहिम छेड़ी जा सकेगी ? अगर ऐसा कुछ भी किया जा सका ,तो निश्चित तौर पर यह जोहरा के प्रति दी गई सच्ची श्रद्धांजलि होगी,  अन्यथा यह दुनिया तो आनी-जानी है ही। दिलों में वही पीढ़ी दर पीढ़ी बने रह जाते हैं, जो जीवन या समाज के लिए कुछ रच देना चाहते हों। जोहरा का इप्टा से 14 वर्षों तक जुड़े रहना, शादी के दो दिन बाद जेल जाना, यह अपने आप में यह बताता है कि वे मुक्ति का सपना देखती थीं। वे औरतों, बच्चों, युवाओं की मुक्ति का सपना देखती थीं तभी तो उन्होंने बहुत छोटी उम्र में बुर्का उतारकर फेंक दिया था। जोहरा का पर्देदारी और घुटन से भरी इस दुनिया से आज तक मुक्ति मिल पाई है ? आज भी औरतों के चेहरे को तेजाब से जलाने की कोशिश जारी है। आज उनकी देह पुरुषवादी सत्ता के निशाने पर है और यही वजह है कि यहां हर 22वें सेकेंड में दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया जा रहा है। जोहरा के सपनों की दुनिया को पूरा करने की मुहिम चल रही है पर उसकी धार अभी भी मर्दवादी समाज की कोशिशों के आगे कमजोर दिखाई पड़ते हैं। जोहरा को श्रद्धांजलि देने का मतलब तभी पूरा हो पाएगा जब मर्दवादी समाज की दीवारें ध्वस्त करके समतामूलक और स्वतंत्र समाज की स्थापना की जा सकेगी।

जोहरा आपा तुम्हें लाल सलाम!


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पुष्पा गोस्वामी की कवितायें

पुष्पा गोस्वामी


पुष्पा गोस्वामी मीडिया से जुड़ी हैं, इनसे इनके ई मेल आइ डी : <pushpagoswami@gmail.com> पर सम्पर्क किया जा सकता है

. अलाव में स्त्रियाँ
दहकते , सुलगते
गृहस्थी के अलाव में भुनती हैं
ताउम्र स्त्रियाँ
काली स्याह रातों में
सर्द उम्मीदों ,
उंघते सपनों
और ठिठुरती आत्मा से
सहेजती हैं
खोया हुआ पाने
और पाए हुए को न खोने की इच्छाएं
वे तमाम इच्छाएं
जो आशाओं और आशंकाओं के मध्य
चटखती , सुलगती है दिन रात
कमबख्त न कोयला बनती हैं
न होती हैं राख .

२. देह भर हैं वे
ये कैसी आग है
जिसमें
केवल देह बन कर
भुनती हैं स्त्रियाँ
रिश्तों , मान्यताओं और संस्कारों से परे
जिनका कोइ नाम
नहीं होता ,
सुर्ख़ियों में ढलकर
वे रोज आती हैं
अखबारों के पहले पन्ने पर,
वितृष्णा उपजाते हुए

वे बनती हैं केवल नगरवधू
न राधा , न सीता , न दूर्गा
न कोइ दूसरा नाम
चटखारों , गलीज मान्यताओं
और भद्दी कल्पनाओं के बीच
वे बस माध्यम भर बन जाती हैं
एक प्रक्रिया का ,
एक गलीज प्रक्रिया का !
३. सबक
ठोकनी होगी
कुछ मजबूत कीलें
पृथ्वी के ताबूत में ,
आँखें मूंदे –मूंदे
सूरज के चक्कर काटते हुए
थक चुकी है वह ,
उनींदे सपनों  से जागकर
कुनमुनाने लगी है,
और तो और
तारों को भी बताने लगी है
कि प्रकाश का जादू तो
हमारे स्वयं के भीतर होता है ,
सूरज के उजाले का उधार चुकाए बिना ही
उसने तोड़ दिया है सप्तपदी का घेरा ,
सूरज समझता है सब
तान ली है इसीसे से
उसने भस्म कर देने वाली दृष्टि
पृथ्वी को सबक सिखाने के लिए ,
इसी से दिन ब दिन बढ़ती जा रही है
पृथ्वी की गरमी इन दिनों !

न्याय व्यवस्था में दहेज़ का नासूर

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अरविंद जैन


स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. अ‍रविंद जैन से उनके मोबाइल न . 9810201120 पर या उनके ई मेल आई डी : bakeelsab@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है

“आमतौर पर सिर्फ कानून बनाने से ऐसी सामाजिक समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता, जिन की जड़ें बहुत गहरी हैं. कानून बनाना जरूरी और अनिवार्य है, हालांकि इन्हें हर संभव दृष्टि से देखना चाहिए. देखना चाहिए ताकि कानून के साथ-साथ सामाजिक चेतना का प्रसार हो सके और समय को नया रूप-स्वरुप दिया जा सके.” (दहेज़ निषेध अधिनियम, 1961 पर संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु की टिप्पणी)

दहेज उत्पीड़न विरोधी कानून की मूल विडंबना है कि यह स्त्रियों को सुरक्षा कम देता है, आतंकित और भयभीत ज्यादा करता है. आज तक इसका लाभ, वास्तविक पीड़िताओं को कम ही मिल पाया है. ईमानदारी से कहूँ तो साफ़ तौर पर कारण यह है कि कानून की भाषा में दहेज़ माँगना, लेना या देना किसी भी तरह ‘अपराध’ नहीं है, दहेज़ हत्या ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ मामला नहीं, दहेज़ उत्पीड़न ‘मृत्यु से ठीक पहले’ होना सिद्ध करो और अब दहेज़ अपराधियों की गिरफ्तारी पर भी रोक या अंकुश. नैशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो 2013 की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में हर घंटे एक महिला दहेज हत्या का शिकार हो रही है लेकिन दहेज प्रताड़ना के अधिकाँश मामले तो दर्ज ही नहीं होते. कानूनी जाल-जंजाल या समाज में बदनामी के भय से, उत्पीड़ित महिलाएं सामने नहीं आतीं और घुट-घुटकर जीती-मरती रहती हैं. इस सब के बावजूद देश की सब से बड़ी अदालत का कहना है कि महिलाएं कानून का ‘नाजायज इस्तेमाल’ ढाल की बजाय, हथियार के तरह कर रही हैं. सच यह है कि इस देश में बहुत से कानून हैं, मगर महिलाओं के लिए कोई कानून नहीं है और जो हैं वो अंततः स्त्री विरोधी हैं.

दहेज कानून का ‘दुरुपयोग’: गिरफ़्तारी पर अंकुश

2 जुलाई 2014 को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति चंद्रमौली कुमार प्रसाद और पिनाकी चन्द्र घोष की खंड पीठ ने, अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य  ( क्लिक करे) के मामले में दहेज कानून का ‘दुरुपयोग’ रोकने के लिए महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है. सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि जिन मामलों में 7 साल तक की सजा हो सकती है, उनमें गिरफ्तारी सिर्फ इस आधार पर नहीं की जा सकती कि आरोपी ने वह अपराध किया ही होगा.
गिरफ्तारी तभी की जाए, जब पर्याप्त सबूत हों, आरोपी की गिरफ्तारी ना करने से जांच प्रभावित हो, और अपराध करने या फरार होने की आशंका हो. अदालत के निर्देश यह भी हैं कि दहेज मामले में गिरफ्तारी से  पहले केस डायरी में कारण दर्ज करना अनिवार्य होगा, जिस पर मजिस्ट्रेट जरूरी समझे तो गिरफ्तारी का आदेश दे सकता है. इस आदेश की अनदेखी करने पर अधिकारी के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की जानी चाहिए. माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश जारी किया है कि दहेज उत्पीड़न के मामलों में भी आरोपी को बहुत जरूरी होने पर ही  गिरफ्तार किया जाना चाहिए. सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 498 ए या दहेज़ प्रतिषेध अधिनियम की धारा 4 तक ही सीमित नहीं है, बल्कि ऐसे सभी मामलों के लिए है जिनमे अपराध की सजा सात वर्ष से कम हो या अधिकतम सात साल तक हो. उल्लेखनीय है कि इस निर्णय द्वारा पति के सम्बन्धियों को भी ‘रक्त-विवाह और गोद संबंधों’ तक ही सीमित कर दिया गया है. शेष किसी सम्बन्धी के खिलाफ मामला नहीं चल सकता.

सत्या रानी चड्ढा अपनी बेटी शशिबाला की तस्वीर के साथ , शशिबाला १९७९ में
दहेज़ ह्त्या की शिकार हुई . इसके बाद सत्या रानी चड्ढा न सिर्फ अपनी के लिए
लड़ती रहीं , बल्कि वे दहेज़ के खिलाफ लड़ाई की प्रतीक बन गई. इसके पहले कि
उच्चतम न्यायालय का यह फैसला दो जुलाई को आया वे १ जुलाई को दुनिया को
अलविदा कह गईं

सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर से महिलाओं द्वारा दहेज़ कानून के ‘दुरूपयोग’  पर ‘गहरी चिंता’ जताते हुए कहा है कि यह कानून बनाया तो इसलिए गया था कि महिलाओं को दहेज़ प्रताड़ना से बचाया जा सके, परन्तु कुछ औरतों ने इसका ‘नाजायज इस्तेमाल’ किया और दहेज उत्पीड़न की झूठी शिकायतें दर्ज कराईं हैं. उल्लेखनीय है कि यह सर्वोच्च न्यायालय का ऐसा पहला या आखिरी निर्णय नहीं है, जिसे किसी न्यायमूर्ति विशेष का पूर्वग्रह या दुराग्रह मान-समझ कर नज़र अंदाज़ किया जा सके. हिंसा, यौन-हिंसा, घरेलू  हिंसा से लेकर सहजीवन में सहमति के संबंधों तक पर, उच्च न्यायालयों समेत और भी न्यायालय विवादस्पद सवाल उठा चुके हैं. दहेज़ कानूनों से परेशान ‘पति बचाओ’ या ‘परिवार बचाओ’ आन्दोलन भी सक्रिय है.

कानून अधिकार या हथियार?

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के ‘दुरुपयोग’ पर दिशा-निर्देश महिला संगठनों को बेहद चौंकाने वाले हैं. विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में ही स्त्रियों द्वारा दहेज़ कानूनों का ‘दुरूपयोग’ किया जा रहा है या पुलिस-अभियोग पक्ष की कमजोरियों के कारण सजा नहीं हो पाती ? क्या अपराधियों को गिरफ्तारी में असीमित छूट से पुलिस की निरंकुशता और भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं मिलेगा? सही है कि स्त्री-पुरुष के लिए एक जैसा होना चाहिए, मगर क्या दोनों की सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक स्थिति समान है? यह भी सही है कि निर्दोष की अविवेकपूर्ण गिरफ़्तारी या सजा नहीं होनी चाहिए, परन्तु यह काम तो पुलिस अधिकारी का है ना कि जांच-पड़ताल से पता लगाए- कौन-कौन अपराध में शामिल थे या नहीं थे? न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत ही है कि भले ही ‘हजारों निर्दोष छूट जांए, पर किसी निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए.’ ‘न्यायिक बुद्धिमता’ और ‘विवेक’ के कैसे-कैसे सिद्धान्त गढे-मढे जा रहे हैं, जो सचमुच अन्याय, शोषण और उत्पीड़न के खिलाफ उठने वाली हर आवाज़ का गर्भ में ही गला घोंट देना चाहते हैं.

हम क्यों और कैसे भूल जाते हैं कि दहेज अपराध में सजा की दर इसलिए भी बेहद कम है कि अपराध घर की चारदीवारी के भीतर होते हैं, जिनके पर्याप्त सबूत नहीं होते या नहीं हो नहीं सकते. कौन देगा ‘बहू’ के पक्ष में गवाही? ऊपर से कानून में इतने गहरे गढ्ढे हैं, कानून के रखवाले भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं, साधन-संपन वर्ग में दहेज के चलन का पहले से अधिक बढ़ा है, कानून ऊपरी तौर पर बेहद प्रगतिशील दिखते हैं पर दरअसल बेजान और नख-दन्त विहीन हैं. कहा यह जा रहा है कि महिलाएं कानून का ‘नाजायज इस्तेमाल’ हथियार के तरह कर रही हैं, ना कि ढाल के रूप में. कानून अगर हथियार ही है तो क्या सिर्फ महिलाएं ही इसका ‘नाजायज इस्तेमाल’ कर रही हैं? बाकी कानूनों के ‘दुरूपयोग’ और बढ़ते अपराधों के बारे में, आपका क्या विचार है?
सजग और चेतना संपन्न महिलाएं पूछ रही हैं “कहीं दहेज़ कानून के ‘दुरूपयोग’ की आड़ में असली मकसद, उन सत्ताधीशों, उच्च पदों पर आसीन अफसरों, संपादकों और भूत-पूर्व अपराधियों को बचाना तो नहीं- जिन पर गंभीर यौनाचार, शोषण या उत्पीड़न के आरोप लगते रहे (रहते) हैं.” निश्चय ही यह ‘ऐतिहासिक फैसला’ मेरे देश की ‘आधी आबादी’ को ‘कटघरे’ में खड़ा करके, स्वयं बहुत से संदेहास्पद सवालों में घिरा नज़र आता है. संदेह की सुई ना जाने कहाँ जा कर टिकेगी.

दहेज़ माँगना, लेना या देना ‘अपराध’ नहीं

निस्संदेह दहेज़ विरोधी कानून तो 1961 में ही बन गया, लेकिन इस पर लगाम लगने की बजाय, समस्या निरंतर जटिल और भयंकर होती गई. इसलिए 1983 में संशोधन करके भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 498A जोड़ा गया, साक्ष्य अधिनियम में बदलाव किये. कारण कानून की भाषा में दहेज़ माँगना, लेना या देना किसी भी तरह ‘अपराध’ नहीं माना-समझा गया. परिणाम स्वरुप दहेज़ उत्पीड़न और दहेज़ हत्याओं के आंकड़े, साल-दर-साल बढ़ते ही चले गए और आज तक दहेज़ हत्या किसी भी मामले में फाँसी की सज़ा नहीं हुई. जिन मामलों में हुई भी तो वो उच्च अदालतों ने, आजीवन कारावास में बदल दी. सर्वोच्च न्यायालय से उम्रकैद की सजा पाए हत्यारे, फाइलें गायब करवा के तब तक बाहर घुमते रहे जबतक अखबारों में “भंडाफोड़” नहीं हुआ. सुधा गोयल (State Delhi (Administration) vs Laxman Kumar & Ors,1986) और शशिबाला केस में “चौथी दुनिया” और टाइम्स ऑफ़ इंडिया में सनसनीखेज रिपोर्ट-सम्पादकीय छपने के बाद ही, हत्यारों को जेल भेजा जा सका. इस बारे में मैंने विस्तार से ‘वधुओं को जलाने की संस्कृति’ (‘औरत होने की सज़ा’ क्लिक करें ) में लिखा है.

दहेज़ हत्या : फाँसी नहीं उम्रकैद 

आश्चर्यजनक तो यह है कि जब दहेज़-हत्या के मामलों में फाँसी की सजा के मामले सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचने लगे, तो भारतीय संसद को 1986 में कानून बदलना पड़ा. सैंकड़ों मामले हैं, किस-किस के नाम गिनवाएं. भारतीय दंड संहिता, 1860 में, दहेज़ हत्याओं के लिए चालाकी पूर्ण ढंग से विशेष प्रावधान धारा 304B पारित किया. इस कानून में यह कहा गया कि शादी के 7 साल बाद तक अगर वधु की मृत्यु अस्वाभाविक स्थितियों में हुई है और ‘मृत्यु से ठीक पहले’ (‘soon before death’) दहेज़ के लिए प्रताड़ित किया गया है, तो अपराध सिद्ध होने पर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है. इससे पहले दहेज़ हत्या के केस भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 302 के तहत दर्ज़ होते थे और अधिकतम सजा फाँसी हो सकती थी. मगर संशोधन द्वारा यह पुख्ता इंतजाम कर दिया गया कि दहेज़ हत्या के जघन्य, बर्बर और अमानवीय अपराधों में भी, फाँसी का फंदा ‘पिता-पुत्र-पति’ के गले तक ना पहुँच सके और अगर सजा हो भी तो, सात साल से लेकर अधिकतम सजा ‘उम्रकैद’ ही हो.
मीडिया में प्रचारित-प्रसारित यह किया गया कि महिलाओं की रक्षा-सुरक्षा के लिया सख्त कानून बनाए गए हैं. ऐसे अनेक मामले हैं, जिनमे सर्वोच्च न्यायालय सहित विभिन्न अदालतों ने अपराधियों को, इसी आधार पर बाइज्ज़त रिहा किया कि पीडिता को ‘मृत्यु से ठीक पहले’     (‘soon before death’) दहेज़ के लिए प्रताड़ित नहीं किया गया था.

दहेज़ उत्पीड़न, ‘मृत्यु से ठीक पहले’ अनिवार्य 

5 अगस्त 2010 को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आर. एम. लोढ़ा (अब २०१४ में बने मुख्य न्यायाधीश) और पटनायक की खंड पीठ  ने अमर सिंह बनाम राजस्थान केस के फैसले में कहा कि दहेज़ हत्या के मामले में आरोप ठोस और पक्के होने चाहिए, महज अनुमान और अंदाजों के आधार पर ये आरोप नहीं ठहराए जा सकते . पति के परिजनों पर ये आरोप महज अनुमान के आधार पर सिर्फ इसलिए नहीं गढ़े-मढ़े जा सकते कि वे एक ही परिवार के है, सो उन्होंने ज़रूर  पत्नी को प्रताड़ित किया होगा. जस्टिस आर. एम. लोढ़ा (अब २०१४ में बने मुख्य न्यायाधीश) और पटनायक की  खंडपीठ ने यह कहते हुए पति की माँ और छोटे भाई के खिलाफ लगाये गए दहेज़ प्रताड़ना और दहेज़ हत्या के आरोपों को रद्द कर दिया. आरोपियों को बरी करते हुए खंडपीठ ने कहा “दहेज़ माँगना अपराध नहीं है और दहेज़ के लिए उत्पीड़न मृत्यु से ठीक पहले होना चाहिए, वरना सजा नहीं हो सकती. वधुपक्ष के लोग पति समेत उसके सभी परिजनों को अभियुक्त बना देते हैं, चाहे उनका दूर-दूर तक इससे कोई वास्ता ना हो. अनावश्यक रूप से परिजनों को अभियुक्त बनाने से असली अभियुक्त के छूट जाने का खतरा बना रहता है .
दहेज़ हत्या- ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ या नहीं?

दूसरी और 2010 में सुप्रीम कोर्ट जस्टिस मार्कंडेय काटजू और जस्टिस ज्ञान सुधा मिश्रा ने एक मामले में कहा कि दहेज हत्या के मामले में फांसी की सजा होनी चाहिए। ये केस ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ की श्रेणी में आते हैं। स्वस्थ समाज की पहचान है कि वह महिलाओं को कितना सम्मान देता है, लेकिन भारतीय समाज ‘बीमार समाज’ हो गया है। समय आ गया है कि वधु हत्या की कुरीति पर जोरदार वार कर इसे खत्म कर दिया जाए, इस तरह कि कोई ऐसा अपराध करने की सोच न पाए.सर्वोच्च न्यायालय की. खंड पीठ  ने कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले और आदेश से असहमत होने का कोई कारण नहीं है. वास्तव में  में यह धारा 302 (नृशंस और बर्बरतापूर्ण हत्या) का केस है, जिसमें मौत की सजा होनी चाहिए. लेकिन आरोप  धारा 302 के तहत नहीं लगाया गया, सो हम ऐसा नहीं कर सकते। वरना मामला तो यह दुर्लभतम में दुर्लभ की श्रेणी में आता है और अपराधियों को मौत की सजा होनी चाहिए. होनी चाहिए मगर…….! इस मुद्दे पर विधि आयोग की २०२वी रिपोर्ट पढने लायक है. विधि आयोग ने भी कोई विशेष संशोधन की सिफारिश नहीं की.

हकीक़त यह भी है कि विधायिका ने जानबूझ कर ‘आधे-अधूरे’ कानून बनाए और कभी समीक्षा करने की चिंता ही नहीं की. जिनके लिए कानून बनाया गये, उनसे न्याय व्यवस्था का कोई सरोकार बन ही नहीं पाया. दहेज कानून के मौजूदा रूप-स्वरूप पर पुनर्विचार कब-कौन करेगा? लाखों पीड़ित-उत्पीड़ित स्त्रियां ना जाने कब से, सम्मानपूर्वक जीने-मरने का अधिकार पाने के लिए रोज़ कचहरी के चक्कर काटती घूम रही हैं. क्या विधि-विधान की देवी (देवता) की आँखों पर पड़ी पट्टी कभी नहीं खुलेगी? ‘महिला सशक्तिकरण’ और ‘न्यायिक सक्रियता’ के दौर में भी नहीं!

स्त्रीकाल में अरविंद जैन को यहाँ भी पढ़ें : (आलेखों के  लिंक क्लिक करें )
१. मनुवादी न्याय का शीर्ष तंत्र
२. न्यायपालिका में मौजूद जातिवादी मानसिकता
३. मर्दों के लिए घर आशियाना और औरतों के लिए जेलखाना है

दहेज विरोधी कानून में सुधार की शुरुआत

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कमलेश जैन


कमलेश जैन सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं , स्त्री मुद्दों और कानूनी मसलों पर विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में नियमित स्तम्भ लेखन करती हैं.इनसे ई मेल आई डी : kamlesh205jain@gmail.comपर संपर्क किया जा सकता है

( दहेज़ कानून के मामले में सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णय के पक्ष में कमलेश जैन का मंतव्य . इसे पढ़ते हुए स्त्रीकाल में प्रकाशित अरविंद जैन के आलेख और आयडवा एवं पी यूं सी एल की अपील भी पढ़ें . लिंक क्लिक करें : न्याय व्यवस्था में दहेज़ का नासूर , और हम चार दशक पीछे चले गए हैं )

अंतत: सर्वोच्च न्यायालय ने उन लाखों पीड़ितों की पुकार सुन ली जो दहेज संबंधित तथाकथित अपराधों में जेल के अंदर रह रहे हैं या जो आनन-फानन में सलाखों के पीछे जाने वाले थे.वर्ष 1983 से लागू भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए कहती है- ‘जो कोई भी, पति या उसके रिश्तेदार, यदि स्त्री के साथ क्रूरता (मानसिक-शारीरिक) करता है, इस इरादे से कि वह और दहेज ला सके, तो उसे तीन ताल तक की सजा हो सकती है. जुर्माना भी देना पड़ सकता है.पत्नी खुद या उसका कोई रिश्तेदार जैसे ही पुलिस को इस बात की सूचना देगा, पति और उसके वे सब रिश्तेदार जिनका नाम एफआईआर में दर्ज है- सभी की गिरफ्तारी होगी.’ अमूमन, भारतीय दंड संहिता में तीन साल तक की सजा वाले अपराध जमानती हैं पर इस धारा को गैरजमानती बनाया गया. कारण, सचमुच भारतीय स्त्रियां दहेज प्रताड़ना की शिकार होती रही हैं. इस कानून को बनाने के पीछे इरादा था कि स्त्रियों को दहेज प्रताड़ना से छुटकारा मिल जाए. पर इन तीस वर्षों  में हुआ कुछ ऐसा जो अच्छे-भले लोगों के लिए सचमुच शब्दश: कारागार जाने की वजह बन गया.

कानून में पहले से ही एक त्रुटि रही- सभी बहुओं को अच्छे हृदय की नेक स्त्री समझा गया और ससुराल के बाकी सभी सदस्यों को पाषाण हृदय. वास्तव में ऐसा होता नहीं. न तो सभी बहुएं वैसी हैं भोली-अबला हैं जैसा समझा गया और न ही घर के बाकी सभी सदस्य निर्मम और अत्याचारी. कुछ समय बाद ही तमाम बहुओं और उनके मायके वालों द्वारा, जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, बहुओं को दिया गया ‘कवच’ ‘हथियार’ की तरह प्रयोग किया जाने लगा. कुछ बहुओं का विवाह के बाद ही से, उनके मायके की सहमति से, उद्देश्य रहा कि ससुराल पहुंचते ही मायके वालों को वहां बसा लेना और पति की पूरी आय और संपत्ति पर कब्जा जमाना.
तकरार इतनी बढ़ती कि जल्द ही पत्नी मायके जाती और भादंसं की धारा 498ए में एक एफआईआर दर्ज कराती और ससुराल वालों के सभी नजदीकी और दूरदराज के रिश्तेदारों का नाम उसमें दर्ज करवा देती. तमाम मामलों में वे रिश्तेदार जो सिर्फ विवाह में आकर एक-दो दिनों में अपने घर चले गए या वे जो विदेशों में हैं- उनके भी नाम प्राथमिकी में दर्ज हो जाते और सारा खानदान जेल जाने को मजबूर हो जाता. इतनी दूर रहने वाले, सिर्फ फोन पर बात करने वाले क्यों जेल जाएं, यह सोचने की बात रही.

ऐसा ही माहौल वर्ष 2003 में भी था. उस समय मैंने तिहाड़ जेल का कई बार दौरा किया. यहां की जेल नंबर छह में महिला कैदी रहती हैं. इस जेल की कुल जनसंख्या का 35 फीसद उन महिलाओं से भरा था जो दहेज कानून के अंतर्गत बंद थीं. वे थीं वृद्ध सासें तथा जवान अविवाहित ननदें. वृद्ध महिलाएं चल-फिर नहीं सकती थीं, अनेक रोगों का शिकार थीं. उनके पुरुष रिश्तेदार भी उसी जेल में थे. एक महिला के परिवार के नौ सदस्य तिहाड़ में थे और वे विभिन्न राज्यों से थे. मैंने एक जनहित याचिका सर्वोच्च न्यायालय में दायर की. 2003 में न्यायमूर्ति आरसी लाहौटी व बृजेश कुमार का आदेश आया. उन्होंने माना कि इस तरह अविवेकपूर्ण गिरफ्तारियां गलत हैं. संसद को पुनर्विचार कर कानून में संशोधन करना चाहिए. पर कुछ हुआ नहीं. खुशी है कि ग्यारह वर्ष बाद यह सख्त आदेश आया.

सर्वोच्च न्यायालय ने ताजा फैसले में कहा है– ‘जहां अधिकतम सजा सात वर्ष है, वहां यह सोच कर नहीं चला जा सकता कि अभियुक्त ने अपराध किया ही है. यह सोचने के लिए पर्याप्त सामग्री होनी चाहिए, पूरी छानबीन होनी चाहिए, यदि लगता है कि अभियुक्त सही छानबीन होने नहीं देगा या फिर कोई अपराध कर बैठेगा- तभी उसकी गिरफ्तारी हो अन्यथा नहीं.’ उन्होंने आगे कहा- ‘संक्षिप्त में पुलिस अफसर गिरफ्तार करने के पहले खुद से पूछे कि क्या गिरफ्तारी आवश्यक है? इससे कौन-सा हित होगा, किस उद्देश्य की प्राप्ति होगी- ऐसा एक भी उत्तर ठीक से आ जाए तब तो गिरफ्तारी हो, वरना नहीं.

नेशनल क्राइम रेकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े बताते हैं कि काफी बड़ी संख्या में इस अपराध में गिरफ्तारियां की गई है. ‘कवच’ की बजाय इस प्रावधान का प्रयोग चिढ़ी हुई तथा असंतुष्ट पत्नियां हथियार की तरह करती हैं. 2012 में इसके तहत करीब दो लाख लोग गिरफ्तार हुए जिसमें महिलाओं की संख्या 50 हजार थी. लगभग 93 प्रतिशत मुकदमों में चार्जशीट दायर हुई पर सजा सिर्फ 15 प्रतिशत मुकदमों में हुई.
अदालत ने कहा कि पुलिस आरोपी को तभी गिरफ्तार करे जब आशंका हो कि वह दूसरे अपराध को अंजाम देगा या मामले की सही जांच में रुकावट का अंदेशा हो या यह खतरा हो कि आरोपी सबूत नष्ट कर देगा या यह खतरा हो कि वह गवाहों-सबूतों को आने से रोक देगा, अभियुक्त कहीं भाग जाएगा या अभियुक्त की उपस्थिति अदालती कार्यवाही के दौरान सुनिश्चित कराने के लिए. पुलिस को मजिस्ट्रेट को कारण बताने होंगे कि अमुक मुकदमे में आरोपी की गिरफ्तारी क्यों चाहिए? यदि पुलिस इस आदेश/निर्देश को नहीं मानती तो उस पर कार्रवाई होगी.

ऐसे मुकदमों में पति के दोस्त, दूरदराज या पास के जान-पहचान वाले भी दहेज अत्याचार में नामित किए जाते हैं. उन्हें राहत देने के लिए अदालत ने कहा कि पति का रिश्तेदार सिर्फ वही है जो उससे खून, विवाह या गोद लेने से बंधा हुआ है- अन्य नहीं. असंतुष्ट और नाराज पत्नियां यदि पति से रूठ जाती हैं तो बात को बढ़ा-चढ़ाकर अदालत में रखती हैं और बिस्तर से लगे बूढ़े दादा-दादी, शादीशुदा बहनें जो घर से सैंकड़ों-हजारों मील दूर हैं उन्हें भी मुकदमे में पिरो देती हैं- बिना किसी भय के, उनके बिना कसूर के. ऐसे लोगों को सिर्फ दहेज प्रताड़ना के नाम पर या अपराध के गैर-जमानती होने की वजह से गिरफ्तार नहीं किया जा सकता. यह धारणा कि पहले गिरफ्तार करो और फिर पता लगाओ कि साक्ष्य है या नहीं, व्यक्ति अपराधी है या नहीं- घृणित है, अमानवीय है और मनुष्य की स्वतंत्रता का हनन है.

ऐसा होने पर जो भ्रष्टाचार होता है वह भी देखने लायक है. अदालत में अंदर जमानत की बहस होने वाली है- बाहर बेंच पर पुलिस अधिकारी और बहू बैठे हैं- सौदा हो रहा होता है- इतने लाख-करोड़ मांगों-मैं साथ हूं. यहां उद्देश्य यह कहना कतई नहीं है कि सारे मुकदमे ऐसे ही हैं और पीड़िता कोई नहीं. जो सचमुच पीड़ित हैं, उन्हें सामने आने का और मुकदमा करने का अवसर मिले, उनके साथ न्याय हो; पर जो चालाक हैं, शादी जिनके लिए एक व्यवसाय है, झूठे आंसू बहाकर, पैसे ऐंठकर मायके को मालामाल या खुद को धनी बनाने वाली औरतों पर लगाम लगाई जाए.दहेज प्रताड़ना की कई श्रेणियां होनी चाहिए. महज ताने कसने, गाली देने आदि पर गिरफ्तारी कड़ी सजा है. शारीरिक रूप से गहरी चोट, हत्या का प्रयास करने पर गिरफ्तारी हो पर बात-बात पर कतई नहीं. कुल मिलाकर देश की शीर्ष अदालत का आदेश है कि सभी आपराधिक मुकदमों की तरह दहेज प्रताड़ना के अपराध की भी छानबीन खुली आंखों से की जाए, न कि आंखों पर पट्टी बांधकर. कानून एक जैसा होना चाहिए- पुरुष के लिए भी, स्त्री के लिए भी. जो दोषी है वह सजा पाए, लेकिन निर्दोष न तो गिरफ्तार हो, न ही अदालत की दौड़ लगाने को विवश हो. झूठे मुकदमों के कारण परिवार भी बिखर जाते हैं, यह ध्यान भी रहे.

विमर्श से परे: स्त्री और पुरुष-आख़िरी क़िस्त

सुधा अरोड़ा

सुधा अरोडा


सुधा अरोडा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.



( अक्सर देखता हूं कि अपने फेसबुक स्टेट्स में या फिर स्त्रीकाल के पोस्ट में या किसी सभा में मैं स्त्रीवाद की बात करता हूं , तो पुरुष स्रोता या पठक पुरुष -विमर्श या पुरुषवाद के आग्रह के साथ उपस्थित होते हैं . सुधा जी का यह आलेख वैसे आग्रह रखने वाले पुरुष मित्रों को जरूर पढना चाहिए . पढना उन्हें भी चाहिए , जो दहेज कानून के द्वारा पुरुष -प्रताडना की बात करते हैं , भारत के न्यायालयों में बैठे मर्द  को भी. साथ ही उन्हें भी जो स्त्रीवाद को अनिवार्यतः पुरुष -विरोध के रूप में देखते हैं.  इसे हम तीन किश्तों में प्रकाशित कर रहे हैं . यह आख़िरी  किश्त है .  पहली किश्त के लिए यहाँ क्लिक करें. और दूसरी किश्त के लिए यहाँ  )

दरअसल विवाह संस्था आज भी निष्ठा , समर्पण और साहचर्य की प्रतीक है । अमेरिका जैसे खुले समाज में जहां देह की वर्जना नहीं है , वहां भी दाम्पत्य के मूल में निष्ठा ही है । वहां भी विवाहेतर सम्बन्ध तलाक का बायस बनते हैं । वहां भी बच्चों के भविष्य  और मानसिक स्वास्थ्य और विकास के मद्देनज़र कई – कई शादियाँ – टूटने की कगार पर पहुंचकर भी समझौते पर पहुंचती हैं और निस्सन्देह विवाह संस्था का बचा रहना यह बच्चों के पक्ष में जाता है और उनके भविश्य को सुरक्षित होने का अहसास दिलाता है । पर पुरुष के भीतर धंसे बैठे संस्कार , उसका अहंकार , उसका वर्चस्व और एकाधिकार (वनअपमैनशिप ) , इस गृहस्थी की गाड़ी को ठीक से चलने नहीं देता । जहां संतुलन को साधकर चला जाये , ऐसे परिवार की खुशहाली की खुशबू आप दूर से ही सूंघ सकते हैं ।

1993 के बाद एक पत्रिका ‘पुरुष उवाच‘ नाम से शुरु की गई थी जो वार्षिक  पत्रिका ‘स्त्री उवाच’ की तर्ज़ पर थी । बाद में इसका नाम ‘पुरुष स्पंदन’ कर दिया गया । पुरुष विमर्श  या पुरुष अध्ययन को विकसित करने की ज़रूरत है पर पूरी तरह जाति , वर्ग , वर्ण विभेद के अर्न्तसंबंधों की जानकारी रखने वाले उदार और प्रगतिवादी नज़रिये से । जैसे स्त्रियां एक समूह में बैठ कर ‘स्पीक आउट’ या ‘स्पीक अलाउड’ सेशन्स में अपने पर होती हिंसा, प्रताड़ना, शा सन और विभेद की बातें करती हैं, उसी तरह पुरुष अपने शासन, दमन, बलात्कार और हिंसा के पीछे छिपे मनोविज्ञान की पड़ताल करें – परिवार में हिंसा से लेकर समाज और देश में हो रही हिंसा के कारण तलाशने की कोशिश  करें । सवर्ण और दलित , उच्च और निम्न वर्ग की स्त्रियों के शासित और प्रताड़ित के अनुभवों में भी अंतर है । अगर हम अपने इर्दगिर्द फैले इस तरह के उदाहरणों को सामने रखकर , शोध के तहत कुछ निष्कर्षो  तक पहुंच पायें तो वे समाधान निश्चित  ही समाज को एक सकारात्मक दिशा  की ओर ले जायेंगे ।

मुंबई में और कोलकाता में महिलाओं के अधिकारों और उनपर होने वाली प्रताड़ना से निबटने के लिये मीडिया से जुड़े कुछ प्रगतिशील सोच वाले पुरुषों ने काउंसिलिंग सेंटर बनाये – तथापि , सहज , सहयोग वगैरह । ‘सहयोग’ ने युवाओं को साथ लेकर ‘गाली बंद‘ अभियान – स्त्री के यौनांगों को लेकर गांव खेड़े ही नहीं , महानगरों तक में जो गालियां पुरुषों की ज़बान पर हर दूसरे वाक्य के साथ आती हैं – उन्हें रोकने का कार्यक्रम ‘स्टॉप अब्यूज़’ शुरु किया , जिसमें उन्हें सफलता भी मिली । 1995 में मीडिया के कुछ लोगों ने मिलकर मुंबई में एक संगठन ‘मावा’ बनाया गया था। मावा  (MAVA – Men against violence and abuse) यानी मेन अगेंस्ट वायलेंस एंड अब्यूज़ । कई बार महिला संगठनों में हम प्रताड़ित महिला के पति को बुलाकर समझौता करवाना चाहते हैं , पर महिला संगठनों में जाना पुरुष  अपनी हेठी समझते हैं । ऐसे में पुरुषों  द्वारा बनाया संगठन बहुत मददगार सिद्ध होता है । ऐसे कुछ एक संगठन कुछ बड़े शहरों में हैं और नब्बे के दशक  में ही इनकी शुरुआत हुई । नारीवादी आंदोलन को सही दिशा  देने में और काम को आगे बढ़ाने में ये बहुत मददगार सिद्ध हुए हैं। इन्होंने महिलाओं के हक में मासिक पत्रिकायें और न्यूज़ लेटर भी निकाले जिसमें महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं के आलेखों को प्रमुखता से प्रकाशित किया । आठ मार्च को महिला दिवस के आयोजनों में इन्होंने भागीदारी निभाई और खुद भी आठ मार्च के लिये विशेष  कार्यक्रम आयोजित किये । कॉलेज के छात्रों के बीच जागरुकता फैलाने में इन पुरुष संगठनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।
तकलीफ़ तब होती है , जब हम सुनते हैं कि सामाजिक कार्यकर्ता पुरुष , जिन्होंने प्रताड़ित महिलाओं के लिये एक सपोर्ट सिस्टम तैयार किया, में से कुछ स्वयंसेवी बाहर तो इस तरह के सामाजिक काम करते रहे , पर अपने दूसरे संबंध बन जाने पर, घर में अपनी पत्नी को गलत दवाइयां देकर, मानसिक अस्पताल की दहलीज़ पर पहुंचाकर, उनसे निज़ात पानी चाही । यह एक आपराधिक स्थिति है और वह ऐसे ही रूढ़िग्रस्त समाजों में पनपती है जहां तलाक पाना मुश्किल  है , लेकिन मनोचिकित्सक को रिश्वत  देकर मानसिक अस्वस्थता का प्रमाणपत्र पाना आसान है । इसका भरपूर फायदा पुरुष अपने अनैतिक संबंधों को नैतिकता का जामा पहनाने के लिये उठाते हैं । ऐसी स्थितियां पुरुष  वर्ग पर भरोसा नहीं करने देतीं । तब यह कहना ही पड़ता है कि औरत की हैसियत , उसकी मानमर्यादा , उसके रुतबे , उसके चरित्र ,रोज़मर्रा के उसके अनथक श्रम पर लगातार आघात करता पुरुष  समाज क्या कभी थमेगा या बदलेगा ? समाजशास्त्र  के विचारक क्या इसका विश्लेष्ण  कर किसी नतीजे पर पहुंचेंगे कि क्यों पुरुष  घर के बाहर दबे-कुचलों के समर्थन में झंडा उठाने के बावजूद घर में घुसते ही उसी झंडे के डंडे से अपनी बीवी को पीटता है और इस कर्म में कभी थकता – हारता भी नहीं ? इसके मूल में वह प्रताड़ना ही है जिससे हम पिछले तीस सालों से लड़ रहे हैं पर अफसोस कि इसमें कहीं कोई कमी आती दिखाई नहीं दे रही , सिर्फ हिंसा के रूप बदल बदल कर हमारे सामने आ रहे हैं।

मुझे यही लगता है कि विमर्श के नाम पर कोई पुरुष प्रताड़ना पर एक चालू किस्म का संकलन संपादित कर ले या कोई पत्रिका अति उत्साह में पुरुष विमर्श पर एक विशेषांक निकाल डाले , अन्ततः उसकी परिणति स्त्री स्वभाव और स्त्री के बदलते स्वरूप को विश्लेषित करने में ही होगी (दशकों तक पुरुष  स्त्री जमात पर नियंत्रण करता रहा , अब उसे अपनी ज़ेरॉक्स जमात जब मुटिठयां भांजती दिख रही है तो बजाय इस असंतुलन की तह तक जाने के, वह इसी जमात को अपना ख़ैरख्वाह मान रहा है ) और इसी की आज जरूरत भी है जिसके लिये मैं पहले ही यह लिख कर अपना अफसोस जाहिर कर चुकी हूं -अफसोस इस बात का है कि स्त्रियों का भी पूरा फोकस इस पुरुषव्यवस्था का हिस्सा बनने में है । साहित्य हमेशा शोषित  के पक्ष में खड़ा होता है पर ऐसा अवसरवादी साहित्य कितना स्त्री सशक्तीकरण में योगदान दे पाएगा , मालूम नहीं । आखिर बदलाव ज़मीनी तौर पर स्त्रियों के लिए काम करनेवाली गैर महत्वाकांक्षी कार्यकर्ताओं से ही आएगा । साहित्य के जरिए हम कितना कर पाएंगे, कभी कभी यह सोच ही निराशा  के गर्त में धकेल देती है । आज समाज में बदलाव लाने की इच्छा रखने वाली सामाजिक कार्यकर्ताओं के सामने दोहरी लड़ाई है । इनकी पहली लड़ाई स्त्री देह में पुरुष सोच को पुष्पित  पल्लवित करने वाली इन स्त्रियों से ही है , पुरुषों का नम्बर तो दूसरा है। पुरुष चाहें तो इस वाक्य को पढ़कर खुश  हो सकते हैं कि ‘डिवाइड एंड रूल’ के तहत चित भी उनकी रही और अब पट भी ।

आज ऐसी स्त्रियों की एक ब्रीड पनप रही है जिसके लिये निजी संबंधों में नैतिकता और एकनिष्ठता  कोई मूल्य नहीं रही। इन मूल्यों के छूटते ही, संकोच और संवेदना दोनों तिरोहित हो जाते हैं। इस जमात के सामने कोई अवरोध और रुकावटें (inhibitions) नहीं हैं , इसलिये ये कोई हर्ट अपने साथ ले कर नहीं चलती । जैसे पुरुष अपनी एकनिष्ठ पत्नी की बेक़द्री कर, उसे छोड़ने में और दूसरा सम्बन्ध बनाने में कोताही नहीं बरतते थे, ये स्त्रियां भी न अपने पतियों की परवाह करती हैं, न छूट गये प्रेमियों की । संकोच और आचार संहिता को ताक पर रख कर इनके लिये जीना ज्यादा आसान हो गया। देह युक्त और भावना मुक्त होने के , आज के प्रैक्टिकल या बाजार-प्रमुख समय में बड़े शुभ  लाभ हैं । प्रेम अब अपने साथ आहत भावनाओं का पैकेज लेकर नहीं आता क्योंकि वह ‘प्रेम’ की पुरानी परिभाषा से बाहर आ चुका है । अब वह प्रेम कम और अर्थशास्त्र का नफ़ा-नुकसान वाला बहीखाता ज्यादा बन गया है ।

स्त्री विमर्श का हश्र हम देख ही रहे हैं। बोल्डनेस के नाम पर पत्रिकाओं के पन्नों पर देह विमर्श  परोसा जा रहा है। जब स्त्री विमर्श  शब्दकोश में सो रहा था , तब बग़ैर नारों और नगाड़ों के स्त्रियों के हक में ज्यादा महत्वपूर्ण रचनाएं लिखी गयीं । आज विमर्श  का जिन बोतल से बाहर आ गया है और हड़कंप मचा रहा है । महिला रचनाकारों की एक बड़ी जमात बिना किसी सरोकार और प्रतिबद्धता के स्त्री विमर्श  कर रही है और साहित्य के पन्नों पर कहानी और कविता के नाम पर रसरंजक साहित्य परोस रही है । यह एक अलग किस्म का एंटी क्लाइमेक्स है । एक ओर सदियों से चली आ रही दासता झेलने को अभिशप्त स्त्री , दूसरी ओर अपनी देह को दांव पर लगाते हुए पुरुषकी ही शतरंजी बिसात पर उसके ही मोहरों और उसकी ही चालों से उसे नेस्तनाबूद करती जमात । एक गुलामी को तोड़ने के लिये सिर्फ जगह बदल लेना और गुलाम का शोषक  की भूमिका में उतर आना कोई समाधान नहीं हो सकता । यह भूमिका जहां कुछ जगह घेरती दिखती है , वहीं से पुरुष विमर्श  का डंका बजाने वे ही महिलायें नौटंकी करती उठ खड़ी होती हैं जो इस भूमिका में शरीक  हैं । स्त्री विमर्श  को तो पुरुषोंने ही अपनी मनमर्ज़ी से संचालित किया और यह तो खालिस पुरुषों का तमाशा  ही है , जिसे कंधा देने के लिये ऐसी औरतें मौजूद हैं ।

भावना संवेदना विहीन, हिसाबी किताबी , इस्पात में ढली लड़कियों-महिलाओं की एक बदली हुई जमात हमारे सामने है ,पर इस जमात को खड़ा किसने किया है ? सत्ता  में बैठे प्रभुता संपन्न पुरुषों ने ही न ! यह स्त्री जाति की प्रताड़ना का विलोम है, एक औसत तस्वीर नहीं । आज भी इसका प्रतिशत प्रताड़ित होती स्त्रियों के मुकाबले बहुत कम है । बेशक प्रतिशत कम हो, पर इस पर गौर करना पुरुषों के लिये ज़्यादा बड़ी ज़रूरत है क्यों कि इस से पुरुष वर्ग ही मूर्ख बन रहा है ।  पुरुष की स्वभावगत कमज़ोरी इसने भांप ली है । वैसे तो नारीवाद , पुरुष और स्त्री की स्वभावगत – जन्मना या अर्जित – दोनों तरह की प्राकृतिक विशिष्टताओं  को सिरे से खारिज करता है और उनपर सवाल खड़े करता रहा है , यह जानते हुए भी इसे कहने का खतरा मैं उठा रही हूं । एक खास किस्म की स्त्रियों की जमात पर लिखी अपनी एक कविता – शतरंज के मोहरे – का एक अंश  दे रही हूं –
पनप रही है अब/ नयी सदी में नयी जमात / जो सन्नाटे का संगीत नहीं सुनती /सलाइयों में यादों के फंदे नहीं बुनती /जो करेले और भिंडी में कभी नहीं उलझती /अपने को बंद दराज़ में नहीं छोड़ती /अपने सारे चेहरे साथ लिए चलती है /कौन जाने , कब किसकी ज़रूरत पड़ जाए 
अपनी शतरंज पर / वह पिटे हुए मोहरों से खेलती है /एक एक का  शिकार  करती /उठापटक करती /उन्हें ध्वस्त होते देखती है /उसकी शतरंज का खेल है न्यारा / राजा धुना जाता है /और जीतता है प्यादा / उसकी उंगलियों पर धागे बंधे हैं /हर उंगली पर है एक चेहरा /एक से एक नायाब /एक से एक शानदार /उसके इंगित पर मोहित है /वह पूरी की पूरी जमात / जिसने /अपने अपने घर की औरत की / छीनी थी कायनात 
उन सारे महापुरुषों को /अपने ठेंगे पर रखती/एक विजेता की मुस्कान के साथ /सड़क के दोनों किनारों पर/फेंकती चलती है वह औरत /यह अहसास करवाए बिना /कि वे फेंके जा रहे हैं /और वे ही उसे सिर माथे बिठाते हैं /जिन्हें वह कुचलती चलती है !
इक्कीसवीं सदी की यह औरत /हाड़ मांस की नहीं रह जाती /इस्पात में ढल जाती है /और समाज का /सदियों पुराना /शोषण का इतिहास बदल डालती है /रौंदती है उन्हें /जिनकी बपौती थी इस खेल पर/उन्हें लट्टू सा हथेली पर घुमाती है /और ज़मीन पर चक्कर खाता छोड़/ बंद होंठों से तिरछा मुस्काती है /बाज़ार के साथ /बाज़ार बनती /यह सबसे सफल औरत है !



हमारा साहित्य इतने संतुष्ट, तृप्त, खाये पिये अघाये वर्ग से आता है कि उसे स्त्री यौनिकता के मुद्दे और देह की आज़ादी से बाहर निकल कर सामान्य वर्ग की तकलीफ़ पर बात करने की न फुर्सत है, न चाहत । ये एक विशिष्ट  तबके से आये विशिष्ट  ग्रह के वाशिन्न्दे  हैं , जिनकी कलम सिर्फ़ देह के सरोकारों के इर्द गिर्द अपने शब्दों की पच्चीकारी दिखाती है। रंगीन बाज़ार में सिर्फ़ रंगीनियां ही बिकाऊ हैं । वहां समाज के बड़े तबके के स्याह दुख त्याज्य हैं। उनके लिये यहां कोई जगह नहीं। उनकी बेहतरी की चिंता करने के लिये सामाजिक कार्यकर्ताएं और संस्थाएं हैं न ! साहित्य एक कला है और कला से समाज बहिष्कृत  हो रहा है। व्यावसायिक फिल्मों की तरह ही हिंदी साहित्य का प्रकाशक  भी यौनिकता का बाकायदा टैग लगाकर किस्से कहानियां बेच रहा है।

दरअसल पुरुषों के समानांतर, आज के उपभोक्तावादी समय में महत्वाकांक्षाओं और लिप्सा की मारी पुरुषनुमा स्त्रियों की एक व्यावहारिक जमात पनप रही है । इस व्यावहारिक जमात से पुरुषों को परहेज़ होना चाहिये था । ऐसा नहीं हुआ । इसके विपरीत आततायी और निरंकुश  पुरुषों से इन पुरुषनुमा स्त्रियों का गठबंधन बहुत मजबूत होता जा रहा है । नैतिक मूल्यों को थाती की तरह बचाकर रखने वाली कुछेक ‘सिरफिरी’ स्त्रियों को शुद्धतावादी ठहराकर , उनपर ‘मॉरल पोलिसिंग’ का लेबल लगाकर , उनके जनाज़े को कंधा देने के लिये , ये पुरुष और स्त्रियां एक साथ ताल से ताल मिलाकर चल रहे हैं । साहित्य के संसार में धकमपेल से अपनी जगह बनाती यह नियो रिच क्लास , जिनका कोई सामाजिक सरोकार नहीं हैं, जो ‘‘खाओ पियो , मौज करो‘‘ वाले फलसफे में यकीन करती है और जिसका देश  में व्याप्त भ्रश्टाचार और समाज की विसंगतियों से कोई वास्ता नहीं है, जो आज की नयी लड़की के हाथ में गला फाड़ चिल्लाने वाला भोंपू थमाकर बगावत का बेसुरा बिगुल बजाना चाहती है, जिसका एकमात्र सरोकार स्त्री में नयी किस्म की पनपती यौनिक आज़ादी है, अगर एक-दूसरे का हाथ थामे, आज आपके सामने बढ़ती चली जा रही है तो इन्हें आप कैसे ध्वस्त करेंगे  ! इनके पास तो खोने के लिये भी कुछ नहीं है !

समाप्त

उदय प्रकाश की कवितायें

उदय  प्रकाश


उदय प्रकाश अपनी भाषा में लिखते हुए दुनिया के बडे लेखकों में शुमार हैं . इनसे उनके मोबाइल न 9810711981 पर सम्पर्क किया जा सकता है.

( उदय प्रकाश हम सबके प्रिय कथाकार रहे हैं, जिनकी कहानियों का प्रभाव हमारी पीढी के कई लेखकों पर देखा जा सकता है – सफल , असफल प्रभाव. नब्बे के बाद के संश्लिष्ट सामाजिक -सांस्कृतिक परिवेश के कुशल कथाकार , जिनके यहाँ यथार्थ के विद्रूप और जीवन की त्रासदियों के प्रति गहरी संवेदना , साथ -साथ अभिव्यक्त होते हैं . उदय प्रकाश जितने महान कथाकार हैं , उतने ही संवेदनशील और बड़े कवि भी . इनकी ‘ तिब्बत’ कविता मेरी प्रिय कविताओं में से एक है . स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उनकी छः कविताएं : औरतें  और अरुंधती श्रृंखला की पांच कवितायें./ संजीव चन्दन
उदय
प्रकाश की कवितायेँ पढ़ते हुए आप गहरे और गहरे उतरते जायेंगे। जैसे किसी
ने माथे पर एक ठंडी हथेली रख दी हो । एक ऐसी तड़प जो आग पैदा करती हो।
जहां स्त्री नहीं जलती पूरी कायनात जलते हुए अक्षर में बदल जाती है। जलते
हुए अक्षर को पढ़ते हुए एहसास सुलगने लगते हैं. निवेदिता  )

औरतें

वह औरत पर्स से खुदरा नोट निकाल कर कंडक्टर से अपने घर

जाने का टिकट ले रही है

उसके साथ अभी ज़रा देर पहले बलात्कार हुआ है

उसी बस में एक दूसरी औरत अपनी जैसी ही लाचार उम्र की दो-तीन औरतों के साथ

प्रोमोशन और महंगाई भत्ते के बारे में

बातें कर रही है

उसके दफ़्तर में आज उसके अधिकारी ने फिर मीमो भेजा है

वह औरत जो सुहागन बने रहने के लिए रखे हुए है करवा चौथ का निर्जल व्रत

वह पति या सास के हाथों मार दिये जाने से डरी हुई

सोती सोती अचानक चिल्लाती है

एक और औरत बालकनी में आधीरात खड़ी हुई इंतज़ार करती है

अपनी जैसी ही असुरक्षित और बेबस किसी दूसरी औरत के घर से लौटने वाले

अपने शराबी पति का

संदेह, असुरक्षा और डर से घिरी एक औरत अपने पिटने से पहले

बहुत महीन आवाज़ में पूछती है पति से –

कहां खर्च हो गये आपके पर्स में से तनख्वाह के आधे से

ज़्यादा रुपये ?

एक औरत अपने बच्चे को नहलाते हुए यों ही रोने लगती है फूट-फूट कर

और चूमती है उसे पागल जैसी बार-बार

उसके भविष्य में अपने लिए कोई गुफ़ा या शरण खोज़ती हुई

एक औरत के हाथ जल गये हैं तवे में

एक के ऊपर तेल गिर गया है कड़ाही में खौलता हुआ

अस्पताल में हज़ार प्रतिशत जली हुई औरत का कोयला दर्ज कराता है

अपना मृत्यु-पूर्व बयान कि उसे नहीं जलाया किसी ने

उसके अलावा बाक़ी हर कोई है निर्दोष

ग़लती से उसके ही हाथों फूट गयी थी किस्मत

और फट गया था स्टोव

रामकृष्ण अडिग की कलाकृति

एक औरत नाक से बहता ख़ून पोंछती हुई बोलती है

कसम खाती हूं, मेरे अतीत में कहीं नहीं था कोई प्यार

वहां था एक पवित्र, शताब्दियों लंबा, आग जैसा धधकता सन्नाटा

जिसमें सिंक-पक रही थी सिर्फ़ आपकी खातिर मेरी देह

एक औरत का चेहरा संगमरमर जैसा सफ़े़द है

उसने किसी से कह डाला है अपना दुख या उससे खो गया है कोई ज़ेवर

एक सीलिंग की कड़ी में बांध रही है अपना दुपट्टा

उसके प्रेमी ने सार्वजनिक कर दिये हैं उसके फोटो और प्रेमपत्र

एक औरत फोन पकड़ कर रोती है

एक अपने आप से बोलती है और किसी हिस्टीरिया में बाहर सड़क पर निकल जाती है

कुछ औरतें बिना बाल काढ़े, बिना किन्हीं कपड़ों के

बस अड्डे या रेल्वे प्लेटफ़ार्म पर खड़ी हैं यह पूछती हुई कि

उन्हें किस गाड़ी में बैठना है और जाना कहां है इस संसार में

एक औरत हार कर कहती है -तुम जो जी आये, कर लो मेरे साथ

बस मुझे किसी तरह जी लेने दो

एक पायी गयी है मरी हुई बिल्कुल तड़के शहर के किसी पार्क में

और उसके शव के पास रो रहा है उसका डेढ़ साल का बेटा

उसके झोले में मिलती है दूध की एक खाली बोतल, प्लास्टिक का छोटा-सा गिलास

और एक लाल-हरी गेंद, जिसे हिलाने से आज भी आती है

घुनघुने जैसी आवाज़

एक औरत तेज़ाब से जल गयी है

खुश है कि बच गयी है उसकी दायीं आंख

एक औरत तंदूर में जलती हुई अपनी उंगलियां धीरे से हिलाती है

जानने के लिए कि बाहर कितना अंधेरा है

एक पोंछा लगा रही है

एक बर्तन मांज रही है

एक कपड़े पछींट रही है

एक बच्चे को बोरे में सुला कर सड़क पर रोड़े बिछा रही है

एक फ़र्श धो रही है और देख रही है राष्ट्रीय चैनल पर फ़ैशन परेड

एक पढ़ रही है न्यूज़ कि संसद में बढ़ाई जायेगी उनकी भी तादाद

एक औरत का कलेजा जो छिटक कर बोरे से बाहर गिर गया है

कहता है – ‘मुझे फेंक कर किसी नाले में जल्दी घर लौट आना,

बच्चों को स्कूल जाने के लिए जगाना है

नाश्ता उन्हें ज़रूर दे देना,

आटा तो मैं गूंथ आई थी

राजधानी के पुलिस थाने के गेट पर एक-दूसरे को छूती हुईं

ज़मीन पर बैठी हैं दो औरतें बिल्कुल चुपचाप

लेकिन समूचे ब्रह्मांड में गूंजता है उनका हाहाकार

हज़ारों-लाखों छुपती हैं गर्भ के अंधेरे में

इस दुनिया में जन्म लेने से इनकार करती हुईं

लेकिन वहां भी खोज़ लेती हैं उन्हें भेदिया ध्वनि-तरंगें

वहां भी,

भ्रूण में उतरती है

हत्यारी तलवार ।
(‘रात में हारमोनियम’, वाणी प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली: 1998 , में प्रकाशित ) 

अरुंधति: एक असमाप्त कविता के शुरूआती ड्राफ़्ट्

(यह कविता इसी तरह लिखी जा रही है, अलग-अलग समय और मूड्स में। यह किसी सूची में शामिल होने के लिए नहीं, अपने समय की चिंता का हिस्सा बनने के लिए लिखी जा रही है। जीवन की अनिश्चितताओं और बिखरावों के बीच। यह किसी भाषा विशेष की अभिव्यक्ति या उसकी कला-परंपरा का अंग नहीं है। यकीन मानिए, अगर कोई अन्य भाषा मैं इतनी जानता कि उसमें कविता लिख सकूं, तो उसी भाषा में लिखता। कहते हैं, हर कविता सबसे पहले अपने लिए प्राथमिक शर्त की तरह ‘सहानुभूति’ की मांग करती है, तो यह भी करेगी..आप सब दोस्तों से, जो इस ब्लाग में आते रहे हैं। बार-बार हौसला बढा़ते हुए। बस इतनी इज़ाज़त दें कि इन कड़ियों को आपका यह लेखक निरंतरता में नहीं बल्कि ऐसी ही अनियतकालिकता के साथ लिखता रहे।)

(एक)

जेठ की रात में

छप्पर के टूटे खपड़ैलों से दिखता था आकाश

अपनी खाट पर डेढ़ साल से सोई मां की मुरझाई सफेद-जर्द उंगली उठी थी

एक सबसे धुंधले, टिमटिमाते, मद्धिम लाल तारे की ओर

‘वह देखो अरुंधति !’

मां की श्वासनली में कैंसर था और वह मर गई थी इसके बाद

उसकी उंगली उठी रह गई थी आकाश की ओर

रामकृष्ण अडिग की कलाकृति

कल रात मैंने

फिर देखा अरुंधति को

वैशाली के अपने फ्लैट की छत से

पूरब का अकेला लाल तारा

अपनी असहायता की आभा में

हमारी उम्मीद की तरह कभी-कभी बुझता

और फिर जलता हरबार

साठ की उम्र में भी

मैं मां की उंगलियां भूल नहीं पाता ।

(दो)

उसका चेहरा

हमारे आंसुओं की बाढ़ में

बार-बार उतराता है

उसके अनगिन खरोंचों में से

हमारे अनगिन घावों का लहू रिसता है

हमारे हिस्से की यातना ने

वर्षों से उसकी नींद छीन रखी है

हमारे बच्चों के लिए लोरियां खोजने

वह जिस जंगल की ओर गई है

वहां से जानवरों की आवाज आ रही हैं

उधर गोलियां चल रही हैं

उसकी बहुत बारीक और नाजुक

कांपती आवाज़ में हमारी भाषा नयी सदी की नयी लिपि

और व्याकरण सीखती है

सोन की रेत में वह पैरों के चिन्ह छोड़ गई है

नर्मदा की धार में उसका चेहरा

चुपचाप झिलमिलाता हुआ बहता है

(तीन)

लुटियन के टीले से कभी नहीं दिखती अरुंधति

वहां अक्सर दिखता है पृथ्वी के निकट आता हुआ

अमंगलकारी रक्ताभ मंगल

या अंतरिक्ष में अपनी कक्षा से भटका कोई

गिरता हुआ टोही खुफि़या उपग्रह

रोहतक या मथुरा से देखो तो सूर्योदय के ठीक पहले

राजधानी के ऊपर हर रोज़ उगता है किसी गुंबद-सा

कोहरे का रहस्यपूर्ण रंगीन छाता

वर्णक्रम के सारे रंगों को किसी डरावनी आशंका में बदलता

संसद या केंद्रीय सचिवालय के आकाश में

नक्षत्र नहीं दिखते आजमा लो

न सात हल-नागर, न शुकवा, न धुरु, न गुरु

वहां तो चंद्रमा भी अपनी गहरी कलंकित झाइयों के साथ

किसी पीलिया के बीमार-सा उगता है महीने में कुछ गिनी-चुनी रात

नत्रजन, गंधक और कार्बन में बमुश्किल किसी तरह अपनी सांस खींचता

कभी-कभी आधीरात टीवी चैनल ज़रूर दिखाते हैं

टूटती उल्काओं की आतिशबाजी

किंग खान और माही के करिश्मों के बाद

दिल्ली से नहीं दिखता आकाश

यहां से नहीं दिखता हमारा गांव-देश, हमारे खाने की थाली,

हमारे कपड़े, हमारी बकरियां और बच्चे

दिल्ली से तो दादरी के खेत और निठारी की तंदूर तक नहीं दिखते

यहां के स्काइस्क्रैपर्स की चोटी पर खड़े होकर

गैलीलियो की दूरबीन से भी

लगभग असंभव है

अरुंधति की मद्धिम लाल

टिमटिमाती रोशनी को देख पाना।

(चार)

नोआखाली के समय मेरा जन्म नहीं हुआ था

मुझे नहीं पता चंपारण में निलहे बंधुआ मज़दूरों को

इंडिगो कंपनियों के गोरे मालिकों और उनके देशी मुसाहिबों ने

किस कैद में रखा

महीने में कितने रोज़ भूखा सुलाया

कितना सताया कितनी यातना दी

उन तारीखों के जो विद्वान आज हवाले देते फिरते हैं मेलों-त्यौहारों नें

उनके चेहरे संदिग्ध हैं

उनकी खुशहाली मशहूरियत और ताकत के तमाम किस्से आम हैं

मैं जब पैदा हुआ उसके पांच साल पहले से

प्राथमिक पाठशाला में पढ़ाया जाता था कि मुल्क आजा़द है

कि इंसाफ़ की डगर पे बच्चो दिखाओ चल के

कि दे दी हमें आजा़दी बिना खडग बिना ढाल

मैंने रामलीलाओं से बाहर कभी खडग असलियत में नहीं देखे न ढाल

साबरमती आज नक्शे में किस जगह है इसे जानते हुए डर लगता है

रही आजा़दी तो मेरे समय में तो गुआंतानामो है अबुग़रेब है

जालियांवाला बाग नहीं जाफना है

चौरीचौरा नहीं अयोध्या और अमदाबाद है

और यहां से वहां तक फैली हुई तीन तरह की खामोशियां हैं

एक वह जिसके हाथ खून में लथ-पथ हैं

दूसरी वह जिसे अपनी मृत्यु का इंतज़ार है

तीसरी वह जो कुछ सोचते हुए

आकाश के उस नक्षत्र को देख रही है जहां से

कई लाख करोड़ प्रकाश वर्षों को पार करती हुई आ रही है कोई आवाज़

इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि किसी नदी या नक्षत्र

पवन या पहाड़  पेड़ या पखेरू  पीर या फ़कीर की

भाषा क्या है ?

(पांच)

वहां एक पहाड़ी नदी चुपचाप रेंगती हुई पानी बना रही थी

पानी चुपचाप बहता हुआ बहुत तरह के जीवन बना रहा था

तोते पेड़ों में हरा रंग भर रहे थे

हरा आंख की रोशनी बनता हुआ दसों दिशाओं में दृश्य बनाता जा रहा था

पत्तियां धूप को थोड़ी-सी छांह में बदल कर अपने बच्चे को सुलाती

किसी मां की हथेलियां बन रहे थे

कुछ झींगुर सप्तक के बाद के आठवे-नौवें-दसवें सुरों की खोज के बाद

रेत और मिट्टी की सतह और सरई और सागवन की काठ और पत्तियों पर उन्हें

चींटियों और दीमकों की मदद से

भविष्य के किसी गायक के लिए लिपिबद्ध कर रहे थे

पेड़ों की सांस से जन्म लेती हुई हवा

नींद, तितलियां, ओस और स्वप्न बनाने के बाद

घास बना रही थी

घास पंगडंडियां और बांस बना रही थी

बांस उंगलियों के साथ टोकरियां, छप्पर और चटाइयां बुन रहे थे

टोकरियां हाट,

छप्पर परिवार

और चटाइयां कुटुंब बनाती जा रहीं थीं

ठीक इन्हीं पलों में आकाश के सुदूर उत्तर-पूरब से अरुंधति की टिमटिमाती मद्धिम अकेली रोशनी

राजधानी में किसी निर्वासित कवि को अंतरिक्ष के परदे पर कविता लिखते देख रही थी

उसी राजधानी में जहां कंपनियां मुनाफे, अखबार झूठ, बैंकें सूद, लुटेरे अंधेरा

और तमाम चैनल अफीम और विज्ञापन बना रहे थे

जहां सरकार लगातार बंदूकें बना रही थी

यह वह पल था जब संसार की सभी अनगिन शताब्दियों के मुहानों पर

किसी पहाड़ की तलहटी पर बैठे सारे प्राचीन गड़रिये

पृथ्वी और भेड़ों के लिए विलुप्त भाषाओं में प्रार्थनाएं कर रहे थे

और अरुंधति किसी कठफोड़वा की मदद से उन्हें यहां-वहां बिखरे

पत्थरों पर अज्ञात कूट लिपि में लिख रही थी

लोकतंत्र के बाहर छूट गए उस जंगल में

यहां-वहां बिखरे तमाम पत्थर बुद्ध के असंख्य सिर बना रहे थे

जिनमें से कुछ में कभी-कभी आश्चर्य और उम्मीद बनाती हुई

अपने आप दाढ़ियां और मुस्कानें आ जाती थीं
( वागर्थ में प्रकाशित )

विमर्श से परे: स्त्री और पुरुष-दूसरी किश्त

 सुधा अरोड़ा

सुधा अरोडा


सुधा अरोडा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.

( अक्सर देखता हूं कि अपने फेसबुक स्टेट्स में या फिर स्त्रीकाल के पोस्ट
में या किसी सभा में मैं स्त्रीवाद की बात करता हूं , तो पुरुष स्रोता या
पठक पुरुष -विमर्श या पुरुषवाद के आग्रह के साथ उपस्थित होते हैं . सुधा जी
का यह आलेख वैसे आग्रह रखने वाले पुरुष मित्रों को जरूर पढना चाहिए . पढना
उन्हें भी चाहिए , जो दहेज कानून के द्वारा पुरुष -प्रताडना की बात करते
हैं , भारत के न्यायालयों में बैठे मर्द  को भी. साथ ही उन्हें भी जो
स्त्रीवाद को अनिवार्यतः पुरुष -विरोध के रूप में देखते हैं.  इसे हम तीन
किश्तों में प्रकाशित कर रहे हैं . यह दूसरी किश्त है .  पहली किश्त के लिए यहाँ क्लिक करें. )
अब तक का सामाजिक परिदृश्य  यही बताता है कि पुरुष  ने दैहिक हिंसा से कभी परहेज़ नहीं किया और इसे एक तरह से उसके अधिकार की फेहरिस्त में डाल दिया गया – वह पुरुष  प्रेम भी तो करता है पत्नी से तो उसकी गलती पर कभी उसका हाथ उठ जाता है तो कौन सा कहर टूट पड़ा । औरतें पढ़ लिख गईं , पति भी संभ्रान्त, शालीन  थे तो मारपीट अशिक्षित होने की निशानी मान ली गई और पुरुषो ने पहचान लिया कि स्त्री का भावनात्मक पक्ष कमज़ोर है , वह वल्नरेबल है तो उसके भावात्मक पक्ष को हलाल करो । एक से एक प्रगतिशील , नामी , यशस्वी कलाकरों और साहित्यकारों के खाते में ऐसी भावात्मक प्रताड़ना ( इमोशनल अब्यूज़ ) अघोषित रूप से दर्ज है। असंख्य कॉमरेड पत्नियों की शिकायत है कि उनके कॉमरेड पति , पति का ओहदा पाने के बाद , अपने ही सिद्धांत और स्थापनाओं से परे , सिर्फ पति होकर रह गये , कॉमरेड ( यानी सहयोगी ) नहीं रहे । अधिकांश  दाम्पत्य आइसबर्ग की टिप पर बैठे हुए हैं – बाहर से सुरक्षित दिखने वाले और भीतर ऐसा घमासान कि लावा बाहर फूटने का निकास चाहता है ।
 समय के बदलने के साथ जब औरतें काम के लिये घर की छोटी स्पेस से बाहर के बड़े कार्यक्षेत्र में दखल देने लगीं तो बिल्कुल उसी तरह जैसे पुरुषों ने स्त्री की भावनात्मक कमज़ोरी की नस पहचान ली थी , स्त्रियों ने अपनी महत्वाकांक्षाओं के चलते पुरुषों की कमज़ोर नस भांप ली – उसकी यौन कामनाएं । देह मुक्ति के नाम पर अपनी देह पर अपना हक और देह के आज़ाद होने के सारे फलसफ़े हमारे साहित्य के विचारकों ने उन्हें थमा दिये । अब स्त्रियों की एक जमात नैतिकता को तिलांजलि देकर और मूल्यों को ताक पर रखकर वही करने लगी जो पुरुष आज तक करता आया था । भावना को देह से बनवास दिया और पूरी तरह देह बनकर रह गईं । पुरुषों को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया और मंजिल की ओर कदम बढ़ाये । कितनों को पीछे फेंका , देखने की न फुर्सत रही , न ज़रूरत । इस जमात के खिलाफ़ पुरुषों को खड़ा होना चाहिये था पर वे इसे सिर माथे बिठा रहे हैं । संबंध भावना-संवेदना विहीन होकर रह गए । स्त्री चिंतक भी स्त्रियों को तिरिया चरित सीखने और व्यवहार में लाने के गुर सिखाने लगीं । सारा असंतुलन यहां से शुरु हुआ । तराजू का एक पलड़ा झुक जाये और दूसरा अपनी ही जगह अड़ा रहे तो संतुलन कैसे बनेगा ? हमारी पूरी लड़ाई तो सामाजिक पितृसत्तात्मक  संरचना से है , सिर्फ पुरुष से नहीं । और सिर्फ स्त्री के लिये नहीं ।
आधुनिक मीडिया भी कारुणिकता और हृदयविदारकता को एक महान ‘दर्शनीय’ उपलब्धि बना कर पेश करता रहता है और पुरुष-विमर्श के दयनीय उद्भावक इसी बहाने अपना कद बढ़ाकर आकाश छू लेने का मंसूबा बांधते हैं लेकिन उन्हें ढेरों असुविधाजनक सवालों से जूझना पड़ेगा । स्त्री की शारीरिक बनावट और भावनात्मक संवेदना का प़क्ष उसे बहुत व्यावहारिक और सख्त होने नहीं देता इसलिये वे वल्नरेबल हैं और अपनी भीतर की कोमलता का शिकार हो जाती हैं । प्रकृति ने कुछ खास गुणों को अलग अलग स्त्रियों और पुरुषों के लिये गढ़ा है ,ऐसा दावे के साथ नहीं कहा जा सकता सौन्दर्य और कोमल भावनाएं स्त्रियों की वजह से सुरक्षित रह पाई , ऐसा सदियों का इतिहास हमें बताता है । आज की  परिस्थितियां उन्हें जटिलताओं और मुश्किलों से निबटने के लिये क्रूर और भौतिकतावादी होने को उकसा रही हैं । स्त्रियां कितना इन विकट परिस्थितियों से जूझ पायेगी , कितना अपने भीतर की स्त्री को बचाकर रख पायेंगी , यह तो समय ही बतायेगा । दाम्पत्य में टूटन और दम्पतियों में अलगाव का अनुपात बहुत बढ़ गया है । दाम्पत्य में तालमेल बिठाने के इस संकट से युवा वर्ग भी जूझ रहा है ।
पहले पुरुषों ने अपनी आज़ादी का भरपूर गलत फायदा उठाया । अब औरतें भी यहीं कर रही हैं । मूल्यों का विघटन , लड़कियों को मिली आज़ादी इतनी औचक और आकस्मिक है कि वे उसे संभाल नहीं पा रही हैं और उस आज़ादी के बहाव में बही चली जा रही हैं। आदमी के हाथ में सत्ता और सल्तनत रही और वह तानाशाह हो गया । आज कुछ औरतें भी दिखा रही हैं कि अब तुम हमारी भी तानाशाही देख लो।

प्रशांत पवार का स्केच

इसे अपनी तरह से साधती एक अलग किस्म की पुरुषवादी जमात भी खड़ी हो रही है , जिसका फलना-फूलना-पनपना पुरुषों के हक में कतई नहीं है क्योंकि पुरुष को अपना सामंजस्य बिठाने के लिये आखिर कोमलता और संवेदना की ही ज़रूरत होगी , स्त्री में जगते एक पुरुष की नहीं । पुरुष तो स्त्री कभी बन नहीं सकता पर स्त्री का पुरुष बन जाना और ज्यादा खतरनाक है । एक दूसरे का पूरक और सहयोगी बनकर ही गृहस्थी की गाड़ी चल सकती है – यह एक बहुत पुराना जुमला है जिसे आज की स्थितियों ने चलन से बाहर ( ऑब्सोलीट ) कर दिया है । पश्चिम में क्लारा जेटकिन ने सार्वजनिक निर्णयों में स्त्री की भूमिका की वकालत की । सिमोन द बोउवा ने स्त्री की उपेक्षा के जैविक कारणों  की पड़ताल की और जर्मेन ग्रीयर ने उसके बधियाकरण के अनेक स्रोतों की खोज की लेकिन दशकों पहले भारत में महिला प्रधानमंत्री होने के बावजूद इस प्रक्रिया में कोई विमर्श नहीं चला । इन्दिरा गांधी लौह महिला थीं,  लेकिन उनका लौहत्व पितृसत्ता के खिलाफ कोई हथियार न बन सका । वे राजनीतिक अधिनायकवाद का ही एक रूपक बनकर रह गईं।
स्त्री शासित है , इसलिये सार्वजनिक और राजनीतिक निर्णयों से वंचित है । अगर वह अपनी आवाज आज उठा रही है तो केवल इसलिए कि आज उसे अपनी गुलामी का अहसास हो चुका है । इस गुलामी के अहसास से ही नहीं , अपनी मां दादी नानी की पीढ़ी को इस गुलामी के नीचे ताज़िन्दगी पिसते देखकर और सामाजिक आर्थिक राजनीतिक घेरों में अपनी एक पहचान बना लेने के बाद भी जब स्त्रियों ने देखा कि उनके प्रति मर्दों के रवैये में कोई खास बदलाव नहीं आया है तो जहां एक किस्म की मध्यवर्गीय लड़कियों में आत्महंता प्रवृत्ति  ने घातक रूप से जड़ें जमायीं , वहीं दूसरी ओर एक आक्रामक जमात असंतुलित रूप से बगावत पर उतर आई ।
लड़कियों का लड़कों जैसा होना या दिखना – मानसिकता से अधिक पहरावे में बदलाव से शुरु हुआ ।पश्चिम  से शुरु हुई इस प्रवृत्ति  ने तेज़ी से भारत में भी घर कर लिया । पोशाक के खुलेपन से लेकर व्यवहार और भाषा तक में ‘स्त्री’ को तिलांजलि दी गई । यह बदलाव ज़ाहिर है , प्राकृतिक और बुनियादी फर्क की अभ्यस्त आंखों को रास नहीं आया । किसी भी व्यक्ति को चाहे वह पुरुष हो या स्त्री , आराम देह पोशाक पहनने का अधिकार है पर यह बदलाव सिर्फ पोशाक तक सीमित नहीं रहा । इसने हर ओर से स्त्री की निजी विशिष्टताओं  के लोप होते चले जाने पर सवाल खड़ा किया ।

इसमें संदेह नहीं कि आज पूरे विश्व में एक भ्रम , असंतुलन और दिशाहीनता का माहौल पैदा हो गया है । स्त्रियां अपनी देह पर सिर्फ पोशाक ही नहीं , अपने स्त्रियोचित गुण त्याग कर , मर्दाना अंदाज़ में बेखौफ़ गाली गलौज की भाषा इस्तेमाल कर , सिगरेट के छल्ले उड़ाते हुए अपने को पुरुषों के पेडेस्टल पर खड़ा करने में अपने जीवन की सार्थकता समझ रही हैं और उन्हें लगता है कि वे इसी तरह इस सामंती वर्ग को ‘सबक’ सिखा सकती हैं । स्त्रियों के आक्रामक बयान स्त्री भाषा के मानक को धूल चटाते दिखाई देते हैं । स्त्री प्रेम और संवेदना को दरकिनार कर अगर पुरुष जैसी बर्बर और नृशंस  बनती है तो उसकी आज़ादी या बहादुरी पर फख्र करने का कोई कारण नहीं है ।
भारत ही नहीं , पूरे विश्व  में दाम्पत्य सबसे ज़्यादा जटिल , संश्लिष्ट  और कठिन ‘पज़ल’ है जिसे सुलझाना बड़े बड़े विमर्शकारों के बस का नहीं है। इस गुत्थी को जितना सुलझाने की कोशिश करो , यह उतना ही उलझती जाती है । दोनों पक्ष एक-दूसरे को दोषी ठहराते हैं जबकि दोषी तीसरा है और वह आकार में इतना बड़ा है कि सामान्य आंखों से हमेशा  ओझल ही रहता है । जैसे भारतीय रसोई में दो बर्तन बिना टकराये नहीं रह सकते , यहां दो व्यक्ति टकराने में ही उम्र गुज़ार देते हैं । इन बर्तनों में  एक को अगर बदल भी दिया जाता है तो वह बदला हुआ बर्तन पहले से ज़्यादा शोर  पैदा करता है । कहा जाता है कि दाम्पत्य में दोनों में से जो पक्ष सहृदय और सहनशील होगा , वही दबाया जाएगा – वह स्त्री हो या पुरुष । या जिसके पास अर्थसत्ता होगी , वह भिक्षापात्र बढ़ाने वाले पक्ष पर अपना रुआब जतायेगा । यानी हर हाल में एक पक्ष दूसरे पर हुकूमत करेगा ही । एक पीड़ित ही होगा ओर दूसरा उत्पीड़क । अधिकांश  शादियां समझौते पर ही टिकी होती हैं , जिसमें एक पक्ष शासन और नियंत्रण करता है और दूसरा पक्ष उन दबावों के तले ज़िन्दगी गुज़ार देता है । एक पक्ष की सहनशीलता पर ही यह गठबंधन टिका रहता है और 95 प्रतिशत ( या इससे ज़्यादा ) यह पक्ष स्त्री का ही होता है ।
महिला सलाहकार केंद्रों में काउंसिलिंग के दौरान , प्रताड़ित स्त्रियों में एक बहुत बड़ा फर्क महसूस किया जा रहा है । आज से बीस साल पहले , हमारे पास 40 से 55 के बीच की उम्र की औरतें , सलाह के लिये सलाहकार केंद्रों में आया करती थीं – जब उनका अधेड़ होता शरीर और झेलने से इनकार करने लगता था । वहां आई दस महिलाओं में से आठ के कान के परदे हिंसा की मार से फटे होते थे । हड़िडयां पिट पिट कर कमज़ोर हो जाती थीं । बच्चों के बड़े होने के बाद उन्हें अपना ख्याल आता था कि ज़िंदगी के बचे खुचे साल अब चैन से गुज़ार सकें । कुछ तो पचपन साठ की उम्र में तलाक की कार्यवाही की जानकारी चाहती थीं । आज फर्क यह आया है कि पचीस से पैंतीस साल की लड़कियां शादी के एक डेढ़ साल बाद ही अपनी समस्याओं पर बात करना चाहती हैं । समय इतना बदल गया है पर आज भी संयुक्त परिवार में , नौकरी करते हुए देर सबेर लौटने का स्पष्टीकरण  उन्हें देना पड़ता है , आंखें नीची कर , घर में ऊंची आवाज़ में न बोलने की उनसे अपेक्षा की जाती है , अपनी पूरी तनखा सास या पति के हाथ में रखकर अपने दैनिक खर्च के लिये हाथ फैलाना पड़ता है यानी उनके पुराने तयशुदा रोल में अर्थोपार्जन की ज़िम्मेदारियां तो बढ़ गईं पर पर उनके कर्तव्यों की फेहरिस्त नहीं बदली । लेकिन यह मध्यवर्गीय युवा लड़की का एक चेहरा है ।

इसका एक विपरीत चेहरा भी है – ऐसी लड़कियां भी आती हैं जिनके पतियों से जब बात की तो पता चला – दोनों कमाते हैं , दोनों घर के काम में हाथ बंटाते हैं पर लड़की चाहती है कि वह अपनी तनखा घर के किराये और खाने पीने और वीकएंड पर सिनेमा या रेस्तरां में क्यों खर्च करे , वह ज़िम्मेदारी सिर्फ पति की है । यानी लड़की को घर से बाहर कमाने की छूट भी मिली , उसने अपना एक मुकाम भी बनाया पर घर खर्च की ज़िम्मेदारी आज भी पुरुषकी ही मानकर वे चल रही हैं । अधिकांश  दाम्पत्य की समस्याएं दोनों की कमाई , बैंक बैलेंस और खर्च के बंटवारे को लेकर है ।  आर्थिक आत्मनिर्भरता अपने साथ बहुमुखी नयी समस्याएं लेकर आई है जिसके बारे में पहले कल्पना करना भी असंभव था । यानी हम एक ही समय में दो परस्पर विषम स्थितियां देख रहे हैं । इसके बरअक्स लिव इन की अवधारणा आई ज़रूर पर अन्ततः उसकी परिणति भी कमोवेश  वैवाहिक संबंधों में उठने वाली समस्याओं पर ही हुई ।
सलाहकार केंद्रों में , हमने यह निष्कर्ष  भी निकाला कि पुरुष प्रताड़ना के अधिकांश  मामले पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरी के पास चले जाने से होते हैं। दूसरी पत्नी पहली को अपदस्थ कर आती है तो इस आशंका को साथ लिये आती है कि उसे भी कोई तीसरी अपदस्थ कर सकती है । इस स्थिति से चौकन्नी स्त्री पहली की सारी कमजोरियों से पहले अपने को मुक्त करती है और पति के बराबर दबंग हो जाती है । पति इस ‘दूसरी’ के सामने इतना दयनीय हो जाता है कि अपने किसी मित्र के आने पर उसे चाय पिलाने के लिये कहते हुए भी थर-थर कांपता है । ऐसे कुछ स्वनामधन्य पतियों से हम सब परिचित हैं जो दूसरी शादी के बाद सारा जीवन एक पछतावे की आग में चुप रहकर काटते हैं और अपना दुःख किसी से बांट भी नहीं सकते ।
स्त्रियों के मामले में यह और बड़ा सच है । एक पति की प्रताड़ना से तंग आकर जब वह दूसरा ठौर तलाशती है तो अधिकांश अपने को पहले से ज्यादा बड़े चक्रव्यूह में फंसा पाती है जिसमें से सामाजिक दबाव के कारण वह निकल भी नहीं पाती । वहां दूसरा पति अपनी पत्नी की कमज़ोरी को भांप कर अपने सैडिज़्म को पोसता है और उसे दैहिक – भावनात्मक हर तरह से शासित करता है।  गरज यह कि कुछ खुशकिस्मत कहे जाने वाले अपवादों को छोड़ दें तो औसत दाम्पत्य जीवन एक कसाईबाड़ा है , जहां एक कसाई है और दूसरा जिबह होने को तैयार खड़ा है । इस सच्चाई से भला कौन मुंह मोड़ सकता है !

यह चुप्पी खतरनाक है

 निवेदिता

निवेदिता


निवेदिता पेशे से पत्रकार हैं. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहती हैं. हाल के दिनों में वाणी प्रकाशन से एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’ के साथ इन्होंने अपनी साहित्यिक उपस्थिति भी दर्ज कराई है.निवेदिता से niveditashakeel@gamail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है.

( तहलका में यौन शोषण के मामले के विपरीत इंडिया टी वी की एंकर तनु शर्मा की आत्महत्या  के प्रयास  के मामले में मीडिया की खौफनाक चुप्पी हमसब ने देखी. आज भी आप गूगल करें तो आपको भड़ास, फर्स्ट पोस्ट और बी बी सी जैसे कुछ पोर्टल / ब्लॉग को छोड़ कर किसी मीडिया के द्वारा इसकी खबर की इंट्री नहीं मिलती है. भड़ास ने इसे मुहीम की तरह चलाया. इस आलेख में तनु शर्मा की आत्महत्या के प्रयास के सन्दर्भ से मीडिया सहित दूसरे क्षेत्रों में कामकाजी महिलाओं की कठिनाइयों की चर्चा कर रही हैं वरिष्ठ पत्रकार और स्त्रीकाल के सम्पादन मंडल की सदस्य निवेदिता. )

बाजार केंद्रित  मीडिया के लिए इंडिया टीवी की युवा महिला एंकर तनु शर्मा की आत्म हत्या की कोशिश कोई मायने नहीं रखती .  यह  वह  मीडिया है , जो  दूसरों के जख्मों पर हाथ रखती है पर अपने भीतर पड़े मवाद को छुपाये फिरती है। पिछले तीस सालों से  पत्रकारिता करते हुए मैंने पत्रकारिता के मूल्यों को इस तरह गिरते नहीं देखा। मेरे जैसे पत्रकार के लिए ये अवसाद के क्षण हैं। हम कैसी पत्रकारिता करना चाहते हैं, हम कैसी दुनिया बनाना चाहते हैं ! 

तनु की घटना अकेली घटना नहीं है। तहलका के प्रकरण से अभी हम उबरे भी नहीं हैं कि एक और हादसे ने पत्रकारिता को शर्मसार किया है। क्या हमारा समाज इस बात का इंतजार कर रहा है कि लड़कियां मौत के अंधेरे में घकेल दी जाएं, फिर हम शोक मनाएं। मैं कहना चाहती हूं दुनिया की तमाम लड़कियों से-इन अंधेरों से लड़ो…तुम हो तो पत्रकारिता के मूल्य बचे रहेंगे ,  तुम हो तो दुनिया के होने के मायने बने रहेंगे। अभी बहुत सारे जुल्मों का हिसाब बाकी हैं।

मैं यह बात पूरे यकीन के साथ कह सकती हूं कि कोई लड़ाई बेकार नहीं जाती। ये मेरे अनुभव हैं। मैं लगभग दो सालों तक एक मीडिया हाउस के खिलाफ लड़ती रही। यह लड़ाई सम्मान और बराबरी के अधिकार की लड़ाई थी। यह जरुरी नहीं है कि महिलाओं पर होने वाली हर हिंसा यौन हिंसा ही हो। और कई तरह के प्रसंग हैं , जहां वह हिंसा का सामना करती है। उसके हंसने,बोलने, कपड़े पहनने, उसके चरित्र जैसे तमाम प्रसंगों को लेकर उसे हर रोज कई तरह के अशोभनीय स्थितियों का सामना करना पड़ता है।

बिहार से निकलने वाले एक प्रमुख दैनिक अखबार में काम करने वाली महिला पत्रकार को अपनी नौकरी इसलिए गंवानी पड़ी क्योंकि उसने इस तरह की बातों का सख्त विरोध किया। एक न्यूज एजेंसी में काम करने वाली महिला पत्रकार ने ऐसे अशोभनीय दृष्यों का वर्षो सामना किया, जब उनके कुछ सहकर्मी सिर्फ अंडरवीयर पहन कर काम करते थे। दिन में भी शराब का दौर चलता था। बिहार के एक अंग्रजी अखबार में काम करने वाली महिला पत्रकार को रोज किसी सेक्सी और कम कपड़े पहने किसी महिला अदाकारा की तस्वीर निकाल कर अखबार में लगाना होता था। जब उसने इस तरह के काम नहीं देने का अनुरोध किया तो उससे कहा गया कि यह उसके काम का हिस्सा है उसे करना ही होगा। ऐसे हजारों मामले हैं जिसपर खुल कर बातें नहीं होती, क्योंकि हम अपने ही घर में फैले अंधेरे का समाना नहीं करना चहते।

निःसंदेह   ऐसी घटनाओं ने देश  के मीडिया को कठघरे में खड़ा किया है। ये सवाल  उठने लगे हैं कि क्या महिला पत्रकार यहां भी सुरक्षित नहीं है ,दरअसल इन तमाम घटनाओं को सामाजिक, आर्थिक,  राजनीतिक व लैंगिक परिप्रेक्ष्य  मंम देखना होगा। यह भी देखना होगा कि मीडिया का चरित्र पिछले ढ़ाई दशकों में कितना बदला है!
बॉलीवुड  की तरह इसमें भी मटमैली पूंजी का वर्चस्व बढ़ा है। सत्ता, ताकत व पूंजी के इस खेल में मीडिया नाक तक डूबी है। जब पूंजी मटमैली हो तो जाहिर है उसे बनाये रखने के लिए गुनाह होंगे ही। सत्ता प्रतिष्ठान में सीधे हस्तक्षेप की महत्वाकांक्षा भी बढ़ी है। मीडिया खुद बाजार का हिस्सा है और बाजार की ताकत को बनाये रखने के लिए वह सबकुछ करता है। बाजार ने स्त्री को सिर्फ देह माना है। बाजार केन्द्रित मीडिया भी स्त्री की  देह को ही भुनाती है। वह चाहे मनोरंजन के नाम पर हो या खबर परोसने के नाम पर। यह सब वह पूरी आक्रमकता से करता है। टी.वी चैनेलों पर दिखाए जाने वाले लगभग सभी हिन्दी धारावाहिकों की  कथा वस्तु के मुख्य स्वर विघटन, अविश्वास , परिवार- विभाजन, विवाहेत्तर संबंध के इर्द-गिर्द ही घूमता रहते हैं । यह दुर्भाग्य है कि मीडिया में जनपक्षीय खबरों को उतनी तरजीह नहीं मिलती जितनी वैसी खबरों को जिससे बाजार बनता है। जो लोग बगैर  किसी समझौता के संस्थान में टिके रहते हैं उनपर ऐसा मानसिक दबाव बनाया जाता है कि उसे आत्महत्या का रास्ता अपनाना पड़ता है। कारपोरेट घरानों के हाथों बिकी हुई मीडिया ने तनु से वह सब करने का दबाव बनाया, जो किसी भी लड़की के लिए अपमानजनक है।

सवाल बनाता  है कि तनु के साथ हुए इस हादसे के लिए कौन जिम्मेवार है, इस मुश्किल  दौर में आखिर आदमी किस पर भरोसा करे ! क्या ये मान लिया जाय की इस नपुंसक समय में मनुष्य बने रहना मुमकिन नहीं है। यह कैसा दंभ है जब एक स्त्री के शरीर और मन पर हमला करने वाला इन्सान पूरे गुरुर के साथ वहीं बना रहता है और एक पत्रकार को अपने को बचाने के लिए आत्महत्या का सहारा लेना पड़ता है। क्या अब भी हम रजत शर्मा जैसे पत्रकारों की वकालत करेंगे, रजत शर्मा और तेजपाल जैसे गुनहगार बचे रहेंगे तो पत्रकारिता में और अंधेरा बढ़ेगा, पत्रकारिता लहुलूहान होगी।

 तनु का मामला अकेला मामला नहीं है। ऐसी कई लड़कियाँ न्याय के अभाव में या तो दम तोड़ देती हैं या हथियार डाल देती हैं। क्या हुआ तरुण तेजपाल के मामले में, इस बात की चितां किसे है कि इन संस्थानों से लड़ने वाली ये लड़किया कितनी अकेली पड़ गयी हैं। कानून की पकड़ ढ़ीली है। उन तमाम यौन अपराधियों के लिए कानून को और पुख्ता व धारदार होना होगा। वह मामला चाहे किसी न्यायधीश  से जुड़ा हो या किसी राजनेता से। ये सारे आचरण इस बात का सबूत है कि हम स्त्री को उसकी यौनिकता से बाहर नहीं देखते। जस्टीस गांगुली ने अपने इंटर्न के साथ जो कुछ किया या नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह एक महिला की निजता में दखल दिया, उसकी जासूसी करायी, क्या इसके लिए इन दोनों को सजा नहीं होनी चाहिए. ये घटनाएं कहती हैं किहमारे समाज को कानून को नये सिरे से परिभाषित किए जाने की जरुरत है। निर्भया मामले के बाद वर्मा कमिटी की सिफारिशों  में एक हद तक महिलाओं के उपर हो रही हिंसा को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश की गयी, पर सरकार ने उसे भी पूरी तरह नहीं अपनाया है। यह समय की मांग है कि कानून अपने पुराने खोल से बाहर निकले । अगर ऐसा नहीं हुआ तो  मुक्त, निष्पक्ष व निर्भीक न्यायपालिका की परिकल्पना बेमानी होगी ।

रही बात  पत्रकारिता की , उसके और बुरे दिन आने वाले हैं। बुरे वक्त से लड़ रही महिलाओं के लिए अब काम के दरवाजे बंद होने वाले हैं। यह उन लोगों के लिए सुनहरा मौका है ,जो स्त्री को घर की दीवारों में ही दफन करना चाहते हैं। दुनिया के आंकड़े बताते हैं कि कामकाजी महिलाओं के लिए काम के अवसर लगातार कम हो रहे हैं। हमारे देश  की कामकाजी महिलाओं की तादाद में लगातार गिरावट है। महिलाओं के उपर हो रही हिंसा का ग्राफ यह बताता है कि हर तीन मिनट में एक महिला किसी न किसी तरह की हिंसा की शिकार है। नेशनल क्राइम रिकार्ड  ब्यूरो के मुताबिक हर 20 मिनट पर एक महिला के साथ बलात्कार होता है। सिर्फ दिल्ली के आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक साल के भीतर कुल 66 प्रतिशत महिलाएं कम से कम दो से पांच बार यौन हिंसा की शिकार हुई हैं। ऐसे बुरे समय से लड़ने के लिए उन लोगों को सामने आना होगा जो चाहते हैं, कि पत्रकारिता बची रहे। जो इस दागदार दुनिया में भी मूल्यों के साथ जीना चाहते हैं।
निवेदिता को यहाँ भी पढ़ें : ( क्लिक करें : जब जरा गरदन झुका ली देख ली तस्वीरें यार

विमर्श से परे: स्त्री और पुरुष-पहली किश्त

सुधा अरोडा


सुधा अरोडा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.

( अक्सर देखता हूं कि अपने फेसबुक स्टेट्स में या फिर स्त्रीकाल के पोस्ट में या किसी सभा में मैं स्त्रीवाद की बात करता हूं , तो पुरुष स्रोता या पठक पुरुष -विमर्श या पुरुषवाद के आग्रह के साथ उपस्थित होते हैं . सुधा जी का यह आलेख वैसे आग्रह रखने वाले पुरुष मित्रों को जरूर पढना चाहिए . पढना उन्हें भी चाहिए , जो दहेज कानून के द्वारा पुरुष -प्रताडना की बात करते हैं , भारत के न्यायालयों में बैठे मर्द  को भी. साथ ही उन्हें भी जो स्त्रीवाद को अनिवार्यतः पुरुष -विरोध के रूप में देखते हैं.  इसे हम तीन किश्तों में प्रकाशित कर रहे हैं )
स्त्री और पुरुष की जब भी बात हम करते हैं तो हमारे सामने सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पदानुक्रम, (हायार्की) वर्चस्व और प्राधिकार (डॉमिनेस) की एक ऐसी तस्वीर सामने आती है,  जिसमें एक का चेहरा हमेशा दूसरे की रंगत लिये होता है । इस रंगत में स्त्री हमेशा  पुरुष के प्रभाव को ढोती हुई दिखती है ! इसके पीछे मोटे तौर पर एक बड़ा कारण जैविक संरचना है । जैविक से होकर आगे बढ़ती हुई सामाजिक संरचना स्त्री को मानसिक नियंत्रण के लिये विवश करती दिखती है । अधिकांश स्थितियों में वह प्राकृतिक रूप से नियंत्रित रहती है और कुछ में उसे जबरन नियंत्रित किया जाता है। विवाह संस्था, परिवार और सामाजिकता में स्त्री की स्थिति इसी नियंत्रण का परिचायक है। शायद इसीलिये प्राचीन काल से लेकर अब तक स्त्री की हैसियत एक उत्पीड़ित और नियंत्रित मनुष्य की है और अलग अलग तरीके से इसको हम विमर्श में भी देखते हैं । अगर कहीं इस खांचे से अलग किसी स्त्री को हम देखते हैं तो हमारी पुरातनपंथी सोच समाज के रसातल में जाने की दुहाई देने लगती है। अक्क महादेवी से लेकर मीरा तक ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिन्हें स्त्री की आज़ादी के खिलाफ़ पुराना समाज अतिशय प्रतिक्रियावादी ढंग से आंकता है । बीसवीं शताब्दी में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में श्रम करने वाली स्त्रियों ने जब पुरुष वर्चस्व पर सवाल उठाया तब भी इसी तरह की प्रतिक्रिया हुई और परिवार के ध्वस्त होने की चीख माहौल में गूंजने लगी। स्त्री विमर्श के बरक्स पुरुश विमर्श का एजेंडा भी पूर्वाग्रहित प्रतिकियावाद का एक नमूना भर है। भले ही कुछ स्त्रियां कुछ कारणों से पुरुषो पर शासन करने का मकसद रखती हों पर पुरुष विमर्श  की अवधारणा के लिये दिये गये तर्क ज़मीन के एक छोटे से टुकड़े पर भी दखल नहीं दे पाते।
ऐसे कुछ तथ्यों को हमें सामने रखना ही पड़ेगा जो सच्चाई के कई आयामों को हमारे सामने लाते हैं । ऐसे तथ्य हमें सरकारी रपटों और संस्थानों के आंकड़ों के जरिये मिलते हैं । इस क्रम में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेषन यानी डब्ल्यू .एच.ओ. की जून 2013 की रिपोर्ट मेरे सामने है – विश्व  की हर तीन में से एक स्त्री घरेलू हिंसा की शिकार है , इसमें एशिया और मिडल ईस्ट देश  में तादाद ज़्यादा है। डब्ल्यू .एच.ओ. के स्त्री बाल स्वास्थ्य विभाग की प्रमुख फ्लेविया बुस्त्रेओ ने कहा – ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं और इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात है कि यह किसी एक देश  का नहीं, पूरे विश्व का फिनॉमिना है।
स्त्री की समस्या वैश्विक  है। सदियों से उसे दोयम दर्ज़ा दिया गया । धर्म , रूढ़ियों , सामाजिक परम्पराओं में उसे निचली पायदान पर रखने के हर संभव प्रयास किये गये । उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में, पूरे विश्व  में, व्यवस्था के खिलाफ़ स्त्रियों की एकजुट आवाज़ सुनाई दी । अरब देशों में सुन्नत की प्रथा के खिलाफ़, चीन में पैरों को बांधकर छोटा रखने की प्रथा के खिलाफ़, विकसित देशो में नारी अधिकारों को लेकर – विश्व  भर में आंदोलन खड़े हुए । स्त्रियों ने व्यवस्था के सामने अपने सवाल रखे । यह सिलसिला आज भी जारी है ।
एक ओर स्त्री पर हिंसा के आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं, दूसरी ओर साहित्य के बाज़ार में पुरुष विमर्श  का एक नया झुनझुना विमर्शकारों को लुभा रहा है। सोचने की बात है कि आज अलग से इसकी ज़रूरत क्यों महसूस की जा रही है ? क्या इसका कारण यह है कि सदियों से स्थापित पुरुष सत्ता को आज स्थानांतरण का खतरा दिखाई दे रहा है ? या इस सत्ता  की मजबूत दीवार में तरेड़ें दिखाई देने लगी हैं ? या फिर यह कि स्त्री यौनिकता के नाम पर एक निरंकुश  देहवादी विमर्श  चल ही रहा है , जिसने स्त्री विमर्श  को र्प्याप्त भटकाया है, लगे हाथ उसे और भरमाने के लिये पुरुष विमर्श  का धुंधलका भी उस पर फैला दिया जाये ।
एक सही और अनिवार्य विमर्श  के आज की तरह फैशन बनने से पहले , विमर्शों की शुरुआत ठीक-ठीक कब हुई , इसे रेखांकित कर पाना एक कठिन काम है लेकिन इतना तो तय है कि विमर्श का एक सिरा पीड़ित और दूसरा सिरा पीड़ा की ओर हुआ करता है और पीड़ित तथा पीड़ा के बीच निजी किस्म का सवाल कभी नहीं होता । मसलन भारतीय दार्शनिक विमर्श में मृत्यु और नश्वरता एक बड़ा सवाल था लेकिन किसी एक व्यक्ति की मृत्यु को लेकर विमर्श नहीं था । सारे संसार के अस्तित्व और मनुष्य की क्षणभंगुरता के बीच मृत्यु एक ऐसा सत्य था जिसके आगे मनुष्य एकदम लाचार था । इसीलिए मृत्यु के जितने भी आख्यान हैं, वे दरअसल मनुष्य की लाचारी के आख्यान हैं। इसी तरह दो मित्र या दो रिश्तेदार एक दूसरे को धोखा दें , तो वह विमर्श नहीं हो सकता । यह मानवीय गिरावट का एक पक्ष ही माना जाएगा । सभी दोस्त सभी दोस्तों को धोखा नहीं देते , इसलिए यह विमर्श का कारण नहीं हो सकता । लेकिन सभी पुरुष बल्कि कहना चाहिए कि ज़्यादातर पुरुष स्त्रियों को मनसा, वाचा, कर्मणा अपने कब्जे में रखते हैं और स्त्री का उनके नियंत्रण से बाहर होना या अपनी एक अलग पहचान बनाना और सम्मान पाना उन्हें गवारा नहीं होता, तब वे हिंसा के हर संभव तरीके – जिसके रूप और प्रकार कई हैं – को अपनाते हैं, यह विमर्श का हिस्सा हो सकता है । स्त्रियाँ क्यों कब्जे में रही आई हैं, क्यों नियंत्रण में रहना स्वीकार करती हैं, क्यों अपनी आवाज बुलंद नहीं करतीं, और क्यों कुछ स्त्रियां पुरूषवादी चोला पहनकर अपनी ही उत्पीड़ित जमात को ध्वस्त करने लगती हैं, यह विमर्श का कारण हो सकता है और इसे होना चाहिये ।
पुरुष विमर्श और स्त्री विमर्श – दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। स्त्री विमर्श भी दरअसल पुरुष की मानसिकता , व्यवहार और व्यवस्था का आकलन ही रहा है । हमारी सामाजिक संरचना पितृसत्तात्मक रही है,  जिसमें सारा अधिकार पुरुषो के हाथ में होता है । यह अधिकार बोध उन्हें शोषण  और प्रताड़ना का हक दे देता है । ज़ाहिर है , वे किसी भी रूप में हुक्मउदूली बर्दाश्त  नहीं कर सकते,  चाहे वह किसी स्त्री का इनकार और प्रतिरोध हो या मातहत का ।अगर हम कारणों की तह तक जायें तो सारा असामंजस्य और असंतुलन सामाजिक व्यवस्था में ही है, जिसके कारण पुरूष अपनी वर्चस्ववादी भूमिका से बाहर आकर सोच ही नहीं पाता । बचपन से ही उसे सत्ता  , ताकत और स्त्री से बेहतर होने की घुट्टी इस कदर पिला दी जाती है,  जिसका असर , बालिग होने के बाद भी , उसके ज़ेहन में बरकरार रहता है और अन्ततः अपने और अपने प

सर्वेश की फोटोग्राफी

रिवार के लिये वह ऐसा त्रासद माहौल खडा कर देता है,  जो ध्वंस की ओर ही ले जाता है ।
सिमोन की विख्यात पंक्ति है  – ‘One is not born a woman, but becomes one.’  जिस तरह लड़की पैदा नहीं होती , उसे बनाया जाता है , वैसे ही लड़का भी पैदा नहीं होता , उसे बचपन से ही ठोक पीट कर लड़का बनाया जाता है । वह रोये तो उसके आंसू छीन लिये जाते हैं – क्या लड़कियों की तरह रोता है ! यानी रोना गले तक आये तो भी आंसू मत बहा , क्योंकि आंसुओं पर लड़कियों की बपौती है । उससे कोमल, नरम, भीगे रंग छीन लिये जाते हैं – तू क्या लड़की है जो पीला गुलाबी रंग पहनेगा ? उसके लिये गाढ़े रंग हैं – काला , भूरा , गहरा नीला रंग ही उस पर फबेगा , आसमानी या गुलाबी में तो वह लड़की दिखेगा ! उसे सॉफ्ट टॉयज़ नहीं दिये जाते – तू क्या लड़की है, जो गुड़िया से खेलेगा ! उसके हाथ में पज़ल्स, ब्लॉक्स, बंदूक और मशीनी  औजार थमा दिये जाते हैं । कुल जमा बात यह कि एक बच्चे को शुरू  से ही कठोर, रुश्क-शुष्क , वर्चस्ववादी हिंसक होने का रोल थमा दिया जाता है ।
माना कि प्रकृति ने स्त्री और पुरुष की जैविक संरचना में आधारभूत अंतर रखा है पर प्रकृति ने जिस अंतर को एक दूसरे के पूरक के रूप में गढ़ा है, हम उसे ठोक-पीट कर दो परस्पर प्रतिद्वंद्वी या विपरीत खेमे में  बदल देते हैं । दोनों युद्धरत पक्ष ताउम्र सींग लड़ाते आपस में लहूलुहान होते रहते हैं या एक फुंफकारता है और दूसरा अपने बचाव में आड़ लेता उम्र गुज़ार देता है। दरअसल पुरुष स्वयं भी उसी सामाजिक व्यवस्था , परंपरागत सोच और रूढिग्रस्त संस्कारों का शिकार (विक्टिम) है !एक ओर लड़के की बचपन से ही ऐसी कंडीशनिंग, दूसरी ओर सदियों से लड़कियों के लिये मनाहियों और हिदायतों की लंबी फेहरिस्त । जब परिवार बना तभी से यह दोयम दर्जा तय हुआ । पुरुष ने स्त्री को घर के काम दिये । वह बाहर गया । जाने-आने के बीच उसके काम के घंटे निश्चित हुये, लेकिन स्त्री के काम के घंटे तय नहीं हुये क्योंकि वह बाहर गई ही नहीं । इसीलिए एक स्त्री के काम के घंटे जागने से शुरू होते हैं और सोने तक चलते रहते हैं । चूंकि पुरुष के काम के घंटे तय थे इसलिए उसका परिश्रमिक तय था । पारिश्रमिक तय होने से उसका दर्जा भी तय था । लेकिन स्त्री का कुछ भी तय नहीं था बल्कि उसपर सब थोपा हुआ था इसलिए उसका दर्जा शुरू से ही कमतर हो गया, जो पारिवारिक रूप से आज भी वैसा ही चला आ रहा है ।
पुरुष विमर्श  पर बात इसलिये तो की जा सकती है कि किसी भी तरह, किसी भी ज़रिये से स्थितियां बदले ( जो कार्यकर्ताओं की एक बहुत बड़ी जमात की अथक कोशिशों  के बावजूद बदल नहीं पा रही हैं ) पर इसलिये नहीं कि दो प्रतिशत पुरुष अपनी पत्नियों या प्रेमिकाओं द्वारा वहां सताये जाते रहे हैं, जहां उनकी सत्ता कमज़ोर है और वे उनके हाथों का खिलौना बने प्रताड़ित हो रहे हैं । यह दो प्रतिशत एक पूरे विमर्श  को नये सिरे से गढ़ने का आधार नहीं बन सकता और न इस पर विमर्श  की बात की जानी चाहिये । ज़रूरी यह है कि सदियों से जो रवायतें चली आ रही हैं और पुरुष जिनका अनिवार्य हिस्सा रहा है , उस पर वह अर्न्तमंथन करे कि आखिर क्यों वह परम्परागत वर्चस्व को छोड़ कर एक बराबरी का दर्जा अपने ‘बेटर हाफ’ को नहीं दे पा रहा है , और अपनी सत्ता बनाये रखने के लिये पूरे परिवार के ढांचे को विध्वंस की कगार पर ले जाता है । पुरुष से सहयोग की, बदलने की हम गुजारिश  कर सकते हैं, लेकिन उसे बदल पाना हमारे हाथ में नहीं है ! इसके लिये उसे स्वयं ही प्रयास करना पड़ेगा कि समाज में स्त्रियों के प्रति अपनी सोच और अपने व्यवहार को लेकर पुरुष वर्ग जागरुक हो और अपने सत्ताप्रमुख आचरण के कारणों की जांच परख करे।
ऐसा सुना जाता है कि हजारों वर्ष पहले भारत में स्त्री-पुरुष संबंध विवाह बंधन में नहीं बंधे थे बल्कि एक स्त्री पर कई पुरुषों का अधिकार होता था । बच्चों के पालन-पोषण का भार अकेले स्त्री पर हुआ करता था ।  जाहिर है , पितृत्व की अनिश्चितता के कारण । मिथक के अनुसार भूख से अकुलाये एक बच्चे ने अपनी माँ से खाना मांगा लेकिन उसी वक्त एक पुरुष आया और माँ का हाथ पकड़कर उससे यौनाचार करने लगा । भूख से व्याकुल यह बच्चा जब बड़ा हुआ तो उसने विवाह नाम की एक संस्था बनाई, जिसमें विवाहित स्त्री को कोई दूसरा पुरुष नहीं ले जा सकता था और न ही वह स्त्री  विवाह की मर्यादाओं को तोड़ सकती थी ।
यानी विवाह उस स्त्री को किसी दूसरे पुरुष की ज़ोर-जबर्दस्ती से बचाने वाली संस्था थी, लेकिन उसकी आंतरिक स्थिति ऐसी थी कि स्त्री अपने ऊपर विवाह के बाद के अत्याचारों के खिलाफ भी बोल नहीं सकती थी । चाहे वह यौन-हिंसा या यौन-असंतुष्टि को झेलते हुये दम तोड़ दे , चाहे आधा पेट खाकर ताउम्र अपने परिवार के लिये खाना पकाती रहे लेकिन पति उसका परमेश्वर ही होगा । उसके लिये स्वर्ग उसका पति-गृह रहेगा जिसके बिना उसका निस्तार नहीं होगा और सिंदूर , चूड़ियाँ या मंगलसूत्र उसके शुभ चिह्न होंगे जिनकी अनुपस्थिति में उसे अपसगुनी मान लिया जाएगा ।आज तक किसी ग्रंथ में किसी स्त्री की अतृप्ति का कोई सवाल कभी नहीं उठा , बल्कि उसे नियंत्रित करने के उपाय ही सामने आए । ग्रन्थों में पुरुषों की आकांक्षा और व्यथा का जितना विषद वर्णन मिलता है , स्त्री की व्यथा या आकांक्षा को बड़ी मेहनत से ढूँढना पड़ेगा । ऐसा इसलिए है क्योंकि स्त्री को ही नियंत्रित होना है , पुरूष को नहीं । पुरुष स्वच्छंदता , स्वतंत्रता का कामी रहा आया है । इसीलिए ब्राह्मण ग्रन्थों में स्त्री को बचपन में पिता , जवानी में पति और बुढ़ापे में बच्चों की आश्रिता बता कर महिमा मंडित किया गया । पुरुष-विमर्श के उद्भावकों को इस पर विचार कर लेना चाहिए कि स्त्री-विमर्श , स्त्री की ऐतिहासिक रूप से चली आ रही राजनीतिक , सांस्कृतिक , आर्थिक और सामाजिक पराधीनता से पैदा होता है । इसके बरक्स पुरुष-विमर्श के भौतिक और दार्शनिक आधार क्या हैं ? उसके ऐतिहासिक साक्ष्य कहाँ मिलते हैं ? और उसके दायरे में किस प्रकार के पुरुष हैं ? इन कुछ ज़रूरी सवालों का जवाब देने के बाद ही वे अपनी उद्भावना को विमर्श का जामा पहना सकेंगे ।

अरुणा बुरटे का रेखांकन

इस तरह की घटनायें अक्सर सुनने में आती रही हैं कि किसी पत्नी ने अपने पति को पीटा और घर से निकाल दिया । पति पीड़ित हो गया लेकिन एक तो मर्द होने का तुर्रा और उसपर स्त्री के हाथों पिटने की शर्मिंदगी ने उन्हें उसी तरह चुप्पा बनाए रखा जैसे इसके ठीक विपरीत कारणों ने स्त्रियों को चुप रहने पर मजबूर किया था । दहेज-उत्पीड़न के नाम पर कुछ पतियों को जेल जाना पड़ा और बमुश्किल उनकी जान छूटी । सवाल उठता है कि एक जेनुइन कानून को फर्जी हथियार बनानेवालों की कुछेक घटनाओं के बावजूद , देश में लाखों लड़कियां ही क्यों दहेज की वेदी पर चढ़ती  रहीं , उनके लिये ही स्टोव फटते रहे, किरासिन का तेल डाल कर वे खुद जलीं या उनकी सास-ननद-पति ने उन्हें जलाया और कुछ सालों बाद वे सब मृतक स्त्री की आत्म हत्या का बेनिफिट ऑफ डाउट पाकर बरी भी हो गये और हत्यारे पति ने धूमधाम से दूसरी शादी भी रचा ली ! हां , वह इस बार इतना सतर्क जरूर रहा कि दूसरी पत्नी पढी लिखी नौकरानी का ओहदा निभाती रहे और उसके लिये अपने को जलाने या शिकायत दर्ज करने की नौबत न आये । इसके बरक्स क्या एक प्रतिशत पुरुषों के त्रस्त होने से या दहेज प्रताड़ना की धारा को हथियार बनाने के खिलाफ , एक विमर्श बन सकता है ?
अक्टूबर सन् 2005 में घरेलू-हिंसा निवारण अधिनियम लागू हुआ लेकिन अनवरत हिंसा का शिकार होने बावजूद स्त्रियाँ इसका उपयोग नहीं करतीं क्योंकि इससे घर टूटता है । हालांकि जिनके सिर के ऊपर से पानी गुजरा उन्होंने आवाज भी उठाई और हो सकता है इतने बड़े देश में कुछ महिलाओं ने इसका गलत फायदा भी उठाया हो लेकिन क्या इसी आधार पर पुरुष-विमर्श चला देना चाहिए ? 498 ए की धारा के खिलाफ़ एक पुरुष संगठन भी बनाया गया,  जो इस धारा द्वारा त्रस्त पुरुषों के मामले सामने लाता है, लेकिन यह संगठन पूरी तरह स्त्रीविरोधी है ।आज तक हम यही सुनते आए हैं कि फलां जगह स्त्री छेड़छाड़ की शिकार हुई , लेकिन कोई पुरुष भी कभी छेड़छाड़ का शिकार हो गया हो यह खबर हंसी के अलावा शायद ही कोई संवेदना पैदा कर पाती है । क्योंकि छेड़छाड़ हमेशा कमजोर पक्ष के साथ होती है । इस मामले में यह एक शाश्वत  सत्य है । जाहिर है इस आधार पर भी पुरुष-विमर्श को कोई जमीन नहीं मिल सकती ।

दरअसल स्त्रियों में आया बदलाव हमारी सामाजिक व्यवस्था के गले से नीचे नहीं उतर रहा । यह व्यवस्था स्त्रियों को हमेशा  से हीनतर , कमतर मानती रही है और इसे मानने के कारण हमारे  धर्मग्रंथों से लेकर सामाजिक व्यवस्था में निहित हैं । ज़्यादा नहीं , सौ साल पहले के भारत में स्त्रियों की स्थिति को देखें – भारतीय स्त्रियों को अपनी सामाजिक स्थिति और अपनी यातना की पहचान ही नहीं थी । अपने घर की चहार दीवारी की परेशानियों से बिला शिकायत जूझना उनकी मजबूरी थी और उन्हें यथासंभव संवार कर चलना उनका स्वभाव । घर से बाहर उनकी गति नहीं थी इसलिये जहां , जितना , जैसा मिला ,सब शिरोधार्य था . सहनशीलता और त्याग उनके आभूषण थे । अगर सम्मान मिला तो अहोभाग्य , दुत्कार मिली तो नियति – क्योंकि अपने जीवन से एक स्त्री की अपेक्षाएं कुछ थी ही नहीं . एक मध्यवर्ग की स्त्री अगर प्रतिभावान और रचनात्मक हुई तो वह रसोई और बच्चों की देखभाल के बाद दोपहर के बचे हुए समय में , घर के फेंके जाने वाले सामान से चित्रकला या क्रोशिए से बॉर्डर या कवर बिनतीं , साड़ियां , चादरें और तकिया गिलाफ काढ़तीं – इस तरह अपना पूरा समय वे घर की चहारदीवारी के भीतर की स्पेस को सजाने-संवारने- निखारने में बिता देतीं । पुरुषघर के लिये अर्थ उपार्जन करने बाहर जाता और स्त्रियों का दायरा ढेर सारे नियम कानून बंदिशों के साथ घर के भीतर की चौहद्दी में कैद था । शिकायत का अवकाश  ही नहीं था । हां , कुछ दबंग औरतें उस काल में भी थीं ,जो घर के पुरुषों को अपने अनुसार चलातीं और आदेश देती थीं पर उनका प्रतिशत इतना कम था कि उसे अपवादस्वरूप ही देखा जा सकता है ।
अपने अधिकारों के प्रति अज्ञानता , अपने घरेलू श्रम को कम करके आंकना , बचपन में विवाह , विधवा हो जाने पर सामान्य जीवन जीने पर अंकुश आदि ऐसी कुरीतियां थीं जिसके चलते उन्हें शिक्षित करना उस कालखंड की अनिवार्यता बन गई . स्त्री शिक्षित हुईं . शिक्षा से स्त्रियों का जागरुक होना स्वाभाविक था . लेकिन बाहरी स्पेस में उनका काम स्कूल में अध्यापन करने तक ही सीमित रहा . शिक्षा के बाद की दूसरी सीढ़ी आई , उन्हें आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाया गया और शिक्षण से आगे , बैंकों में , सरकारी दफ्तरों में , कॉरपोरेट जगत में और अन्य सभी क्षेत्रों में स्त्रियों ने दखल देना  शुरू  किया . आर्थिक रूप से हर समय अपना भिक्षापात्र पति के आगे फैलाने वाली स्त्री ने घर को चलाने में अपना आर्थिक योगदान भी दिया . पर इससे उसके घरेलू श्रम में कोई कटौती नहीं हुई . इस दोहरी जिम्मेदारी को भी उसने बखूबी निभाया . माना कि भारतीय समाज में वैवाहिक सम्बन्धों में बेहतरी के लिये समीकरण बदले हैं , पर वह स्त्रियों के एक बहुत छोटे से वर्ग के लिये ही है – जहां पुरुषों में कुछ सकारात्मक बदलाव आये हैं . मध्यवर्गीय स्त्री के एक बड़े वर्ग के लिये आज स्थितियां पहले से भी बहुत ज्यादा जटिल होती जा रही हैं . अगर ऐसा न होता तो  2011 में मुंबई महानगर में चार महीनों में चार सी.ए. , एम.बी.ए. , आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर , नौकरीपेशा लड़कियां इस तरह आत्महत्या नहीं करतीं । घरेलू हिंसा पर खूब बात की जाती रही है । हर देश में हिंसा के सालाना आंकड़े मौजूद हैं पर मार पीट वाली हिंसा से कहीं ज़्यादा , लगभग शत प्रतिशत स्त्रियां जिस भावात्मक हिंसा या अनचीन्हीं मानसिक प्रताड़ना का शिकार होती हैं , इसके आंकड़े कहां मिलेंगे , जब पीड़ित खुद उसे पहचान नहीं पा रहा ।

यौन या भावात्मक शोषण से निबटने के लिये पहले लैंगिक वर्चस्व और लैंगिक शोषण की पहचान करनी होगी जिसकी नींव पर यह समाज बाहर से दिखती खुशहाली पर टिका हुआ है, जबकि स्त्री संबंधी सारी समस्याओं की जड लैंगिक वर्चस्व है । इसकी पहचान के बगैर शोषण और हिंसा की दिशा में कदम बढाना वैसा ही है जैसे खराब जड़ को नजरअंदाज कर आप सूखती शाखों और मुरझाये पत्तों का इलाज करते रहें । इस विषय पर मेरा एक लंबा आलेख है – जिसके निशान नहीं दीखते यानी चुप्पी की हिंसा …. हिंदी समय की साइट पर इसे पढ़ा जा सकता है !

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