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सांस्कृतिक ढकोसलों पर कुठाराघात करती फिल्म : ‘ क्वीन ‘

डॉ. महेश गुप्ता

डॉ. महेश गुप्ता


डा महेश गुप्ता कवि और कलाकार हैं . रंगमंच से भी इनका जुड़ाव रहा है , हिन्दी और गुजराती में मंचन, अभिनय दिग्दर्शन और नाट्य लेखन करते रहे हैं. इनकी गुजराती धारावाहिक सीरियल ‘जननी जोड़’ तथा गुजराती टेलीफिल्म ‘परिवर्तन’ में मुख्य भूमिका रही है . गुजराती नाट्य-पत्रिका ‘नांदीकार’ के सह संपादक. संप्रति : राजभाषा अधिकारी, भारतीय स्टेट बैंक,भोपाल.

( पिछले दिनों मार्च में रिलीज हुई फिल्म ‘क्वीन’ को स्त्रीवादी नजरिये से देख रहे हैं डा महेश गुप्ता . यह फिल्म मध्यम वर्गीय लड़की के लिए खुले आसमान का परिदृश्य उपस्थित करती है, उसकी  निर्धारित भूमिका , स्टीरियो टाइप से अलग . ‘स्त्रीकाल’  के लिए फिल्मों की स्त्रीवादी समीक्षाएं आमंत्रित हैं. )

मध्यमवर्गीय भारतीय स्त्री की युवा मनोदशा को केंद्र में रखकर बोलीवुड फिल्म ‘ क्वीन ‘ न केवल भारतीय सिनेमा को बल्कि तथाकथित संस्कृति पर गर्व करनेवाले हमारे समाज को एक सही राह दिखाती है. यहाँ कल्पना, वास्तविकता एवं उद्देश्यपरक घटकों का कलात्मक संगम दृष्टिगोचर होता है.

फिल्म का कथानक कुछ इस प्रकार है : फिल्म की नायिका रानी , राजौरी गार्डन , दिल्ली में रहने वाली एक 21 वर्षीय पंजाबी लड़की है. वह एक बहुत ही रूढ़िवादी परिवार से है. उसका छोटा भाई सुरक्षा की दृष्टि से हर जगह उसके साथ रहता है. शादी से दो दिन पहले, उसका मंगेतर विजय उसे कहता है कि अब उसका विचार बदल गया है और अब वह उससे शादी करना नहीं चाहता. दोनों की जीवन शैलियों का परस्पर कोई मेल नहीं है. यह बताने के लिए वह उससे एक स्थानीय कैफे में मिलता है. इस घटनाक्रम से हैरान रानी एक दिन के लिए अपने आप को कमरे में बंद कर लेती है.

वह इस घटनाक्रम पर काबू पाने का फैसला करती है और अपनी पसंदीदा जगह पेरिस की यात्रा के लिए पहले से बुक करवाए हुए हनीमून टूर पर जाने की योजना बनाती है जो उसने पहले कभी नहीं देखा था. अपने मंगेतर विजय की पसंदीदा जगह, एम्स्टर्डम की यात्रा भी इसमें शामिल की जाती है. प्रारंभिक झिझक के बाद, उसके माता-पिता इस बात पर सहमत होते हैं और रानी रवाना होती है.पेरिस में उसकी मुलाकात विजयलक्ष्मी से होती है जो स्पेनिश / फ्रेंच माँ और भारतीय पिता की संतान है. रानी जिस होटल में रहती है वहीं विजयलक्ष्मी काम करती है. पेरिस में रानी को कुछ परेशानियों से भी दो – चार होना पड़ता है. एक बार स्थानीय पुलिस के साथ और एक बार एक किसी पॉकेटमार के साथ. रानी जल्द ही भारत लौटने का मन बनाती है. इस बीच विजयलक्ष्मी उसकी अच्छी दोस्त बन जाती है और उसकी विश्वासपात्र भी. दोनों पेरिस की सैर करते हैं , स्वतन्त्र रूप से मौज करते हैं. यहाँ रोमांच की एल लंबी श्रृंखला चलती है. एक बार खरीदारी करते समय , रानी द्वारा विदेशी वस्त्रों वाली अपनी तस्वीर गलती से विजयलक्ष्मी के बजाय विजय को भेज दी जाती है. विजय को अपनी गलती का एहसास होता है. विजय इस तस्वीर को देखकर बहुत प्रभावित होता है और उससे मिलने की कोशिश करता है.

रानी का एम्स्टर्डम जाने का समय हो आता है. एम्स्टर्डम पहुँचने पर उसे पता चलता है कि उसे होटल के कमरे को तीन अन्य लोग, ताका, टिम और ओलेकजान्डर के साथ साझा करना है. वह काफी परेशान होती है मगर जल्द ही, चारों अच्छे दोस्त बन जाते हैं. खरीदारी, सैर–सपाटा, क्लब, नर्तन आदि में समय गुजरता है. रानी को गोलगप्पे बनाकर बेचने का मौका मिलता है जिससे उसे आर्थिक लाभ तो होता ही है साथ ही आत्मविश्वास भी बढ़ने लगता है. अपने मित्रों की पृष्ठभूमि के बारे में जानकर उसे एहसास होता है कि दुनिया के अन्य भागों में लोग कैसी-कैसी विपरीत परिस्थितियों में भी मौज से जीते हैं. उसे जीवन का एक नया पाठ मिलता है.

स बीच विजय उसे ढूँढता हुआ वहां आ पहुंचता है. वह माफी मांगता है और संबंधों पर पुनर्विचार करने के लिए कहता है. वह रानी को हड़पने की कोशिश भी करता है जिस पर रानी के दोस्त प्रतिकार करते हैं लेकिन रानी उन्हें विजय को छोड देने को कहती है. रानी विजय से कहती है कि वह दूसरे दिन मिलेगी. दोनों अगले दिन मिलते हैं. मुलाकात सुखद नहीं रहती और रानी कहती है कि उसे रॉक शो जाना है और वह उससे दिल्ली में बात करेगी. रॉक शो में वह अपने दोस्तों के साथ आखिरी बार मिलती है. भारत लौटने पर, वह विजय के घर अकेले मिलने जाती है. बिना कुछ कहे, बस उसे उसकी सगाई की अंगूठी लौटाती है और गले मिलकर धन्यवाद कहती है. रानी अपने घर की ओर आगे बढ़ती है, एक राहत के साथ, सुकून के साथ, प्रसन्नचित्त.

कथानक के माध्यम से एक मध्यम वर्गीय स्त्री  की मनोदशा और सामाजिक विडम्बना को भलीभांति चित्रित किया गया है. यहाँ प्रश्न केवल पुरुष प्रधान उस समाज का नहीं जहाँ वह स्त्री को जॉब करने तक की आज़ादी देने से भी कतराता है, बल्कि उस संकुचित मनोदशा वाले पुरुष समाज का है जो स्त्री के रूप तक ही अपनी सोच को मर्यादित रखता है. यहाँ सहज ही याद आ जाती हैं सुशीला टाकभौरे की कुछ पंक्तियाँ :

मुझे अनंत असीम दिगंत चाहिए
छत का खुला आसमान नहीं
आसमान की खुली छत चाहिए

निश्चित तौर पर यहाँ रानी को आसमान की खुली छत प्राप्त हो पाती है, और प्राप्त हो पाती है वह स्वतंत्रता जो किसी भी स्त्री  का एक दमित स्वप्न है. भारतीय सिनेमा में इस प्रकार की फिल्म का बनना एक संयोग के साथ-साथ आशा की चिंगारी भी है. फिल्म को जिस प्रकार रेटिंग प्राप्त हुई एवं दर्शकों ने जिस तादाद में इसे देखा वह इस बात को उजागर करता है कि भारतीय समाज ब करवट ले रहा है. मीडिया का सदुपयोग करते हुए एक ताकतवर मनोहर अभिव्यक्ति कैसे की जा सकती है इसका प्रमाण है यह फिल्म. फिल्म के कथानक से भी अधिक महत्वपूर्ण बन पड़े हैं वे छोटे छोटे दृश्य जो सहज ही बहुत कुछ कह जाते हैं और मजबूर कर जाते हैं भारतीय समाज को आत्ममंथन हेतु. शादी के बाद अपने आप को कमरे में बंद कर लेने वाली रानी जब सुबह मिठाई के पैकेट से एक मिठाई खाती है तब वह वास्तविक धरातल पर खड़ी उस नारी-सी दिखाई देती है जिसे शादी टूटने का दुःख अवश्य है लेकिन दिल के किसी कोने में जिन्दा रहने की तमन्ना अभी शेष है. शादी टूटने को जिस गंभीरता से वह लेती है उतनी गंभीरता से उसके परिवार के अन्य सदस्य कहाँ ले पाते हैं. परिवार के लिए यह घटना केवल इज्जत के सन्दर्भ में ही अधिक महत्वपूर्ण है. रानी जब नॉन वेज प्लेट को टेबल पर देख कर भागती है और बाहर जाकर उल्टी करने लगती है तो लोग उसकी तस्वीर लेने लगते हैं जैसे ऐसा दृश्य पहले कभी देखा ही न हो. शराब के नशे में चूर रानी जब बाहर आकर कार के पास खड़े हुए व्यक्ति के समक्ष तरह-तरह की हरकतें करने लगती है, तब उस व्यक्ति का पूर्णतः अन्यमनस्क रहना और रानी की ओर ध्यान तक न देना व्यक्ति स्वातंत्र्य की घोषणा नहीं तो और क्या है ? उम्र के दायरों से बाहर व्याप्त यौन कुंठा पर फ़िल्मकार तब आघात करता है जब नेट के माध्यम से रानी से बात करते हुए रानी के पिता और उसका छोटा भाई विजयलक्ष्मी के विषय में दिलचस्पी दिखाने लगते हैं और उसकी दादी इसे ब्लू फिल्म करार देती है .

विजयलक्ष्मी का पात्र स्वच्छंद अवश्य है लेकिन अश्लील कतई नहीं. यह फिल्म अपने परिवार की हिदायतों को आँख मूंदकर अपनाने वाली रूढिवादी, भोलीभाली नायिका रानी के रूपांतरण की यात्रा की यात्रा है जो अपने मंगेतर द्वारा प्यार से दी गई उपाधि के कारण ही नहीं वरन सही मायने में ‘ क्वीन ‘ सिद्ध होती है. कॉमेडी, ट्रेजेडी, नात्यात्मकता और भावना से भरपूर यह फिल्म हमें सामाजिक परिवेश और नारी स्वतंत्रता के विषय में गंभीर रूप से विचार करने हेतु मजबूर करती है.

एम्स्टर्डम में रानी जब एक कमरे में अन्य पुरुषों के साथ कमरा साझा करने से कतराती है और कमरे से बाहर सो जाती है एवं टीम द्वारा उठाए जाने पर जब वह चीखती है तब जिस तरह टीम उसे संभालता है या जिस तरह टीम सहित कमरे में रहने वाले अन्य पुरुष पात्र ( ताका और ओलेकजान्डर ) कमरे से बाहर सोने को तैयार हो जाते हैं वह प्रसंग सांस्कृतिक भिन्नता को सहर्ष स्वीकार करने का एक अनुकरणीय उदहारण प्रस्तुत करता है. जब रानी खाना खाते समय मिर्च वगैरह की मांग करती है, तब जिस प्रकार होटल का मालिक उस पर बिदकता है और सभी व्यंजनों को मिर्च मसाले से भर देने के भारतीय रवैये पर आश्चर्य व्यक्त करता है वह हास्य के फौवारे तो उपस्थित करता ही है लेकिन जब वह रानी के पैसे लौटाने लगता है तब व्यावसायिक नीतिमत्ता के अनुकरणीय मानदंड स्थापित करता है. इतना ही नहीं वह रानी को अपने अनुसार व्यंजन बनाकर बेचने हेतु ऑफर भी देता है. गोल गप्पे बनाए जाते हैं. कुछ समय तक कोई नहीं खाता लेकिन फिर नए स्वाद पर जब भीड़ उमड़ पड़ती है तब किसी भी नए स्वाद या विचार के स्वीकार हेतु सहर्ष प्रस्तुत लोकसंस्कृति के दर्शन होते हैं. हींग का अंग्रेजी समानार्थी जानने के लिए जब रानी फोन करती है तब अंत में मिलने वाला जवाब कि हींग को अंग्रेजी में हींग ही कहते है, हास्य की सृष्टि का सर्जन करने के साथ-साथ विदेश में रहने वाले भारतीयों के भाषाई ज्ञान पर भी एक करारा व्यंग्य है. जिस प्रकार रानी के आगमन पर विदेश स्थित परिचित परिवार के सदस्य झूठी भावनाएं व्यक्त करते हैं और अलग कमरे में रानी को शगुन में दी जाने वाली राशि पर जो चर्चा करते हैं उससे यही सिद्ध होता है कि व्यक्ति भारत में रहे या विदेश में, उसकी मानसिक दरिद्रता वही बनी रहती है.

कुल मिलकर स्त्रीवादी आन्दोलन, महिला सशक्तिकरण या समाज सुधार हेतु किसी उपन्यास से कहीं अधिक ताकतवर अभिव्यक्ति होकर उभरती है फिल्म ‘ क्वीन ‘. अपने जीवन को जीने के चुनाव हेतु भारतीय महिलाओं को प्राप्त स्वतंत्रता पर यह फिल्म कई प्रश्न खड़े करती है. यह फिल्म हमारे समाज को आत्ममंथन हेतु मजबूर करती है एवं विवश करती है यह सोचने पर कि हमें कहाँ और क्या सुधार करने की आवश्यकता है. रानी तो एक प्रतीक है उस समाज के दलित स्त्री पात्रों का जिन्हें आवश्यकता है जागृत होने की, अपने जीवन के विषय में सोचने की और उस सोच को कार्यान्वित करने हेतु हिम्मत करने की.
एक गंभीर विषय को लेकर चली यह फिल्म दर्शकों को कहीं भी बोझिल नहीं लगती वरन मुक्त हास्य की संभावनाएं हर जगह साथ लिए रहती है. दिमाग को घर पर रखकर देखी जाने वाली बोलीवुड की फिल्मों के बीच एक अर्से के बाद एक अर्थपूर्ण फिल्म की प्रस्तुति बोलीवुड से और अधिक अर्थपूर्ण फिल्मों की प्रस्तुति हेतु आशास्पद माहौल तैयार करती है जिससे सामाजिक परिवर्तनों का पथ प्रशस्त हो सके.

जीना जिन्दगी को आत्मकथा के नजरिये से -अंतिम किश्त

अर्चना वर्मा

अर्चना वर्मा प्रसिद्ध कथाकार और स्त्रीवादी विचारक हैं. संपर्क : जे-901, हाई-बर्ड, निहो स्कॉटिश गार्डेन, अहिंसा खण्ड-2, इन्दिरापुरम, ग़ाज़ियाबाद – 201014, इनसे इनके ई मेल आइ डी mamushu46@gmail.com पर भी संपर्क किया जा सकता है.

 ( ‘अन्या से अनन्या’ (प्रभा खेतान) ‘एक कहानी यह भी’ (मन्नू भण्डारी)
‘लगता नहीं है दिल मेरा’ (कृष्णा अग्नहोत्री) ‘जो कहा नहीं गया’ (कुसुम
अंसल)’हादसे’ (रमणिका गुप्ता) ‘कस्तूरी कुण्डल बसै’ (मैत्रेयी पुष्पा), तथा
अनुवादों में आँधेरे आलो (बेबी हालदार -बंगाली), ‘रसीदी टिकट’ (अमृता
प्रीतम-पंजाबी), ‘नंगे पाँवों का सफ़र’ (दिलीपकौर टिवाणा-पंजाबी),
‘खानाबदोश’ (अजीत कौर- पंजाबी), ‘कहती हूँ सुनो’ (हंसा वाडकर-मराठी)
‘स्मृतिचित्र’ (लक्ष्मी -मराठी) ‘नटी विनोदिनी’ (विनोदिनी–बंगाली), ‘आमार
जीबोन’ (राशुन्दरी देवी-बंगाली) आदि स्त्री – आत्मकथाओं के आलोक में
अर्चना वर्मा का यह आलेख महान पुरुषों’ की महानता ग्रंथि और उसके लिए
उन्हें प्राप्त सामाजिक -सांस्कृतिक सुविधा और समर्थन तथा स्त्री -आत्मकथाओ
के लिए  सामाजिक -सांस्कृतिक अवरोध  की व्याख्या करता है . दो किश्तों में प्रकाश्य  आलेख की अंतिम किश्त . पहली किश्त पर क्लिक करें

विचार के विकास के इतिहास में उत्तर
आधुनिक मोड़ पर आत्म और अस्मिता के विषय मेँ मान्यता है कि अस्मिता जन्मजात
नहीं, रचित होती है लेकिन जीवनकथा कोटि के साहित्य के विद्वानों ने उसके
सैद्धान्तीकरण में अस्मिता की भौतिक वास्तविकता पर बल दिया है – विशेषतः
नस्ल, सांस्कृतिक प्रजाति, वर्ग, लिंग और लैंगिकता के भौतिक नतीजों पर।
आत्मकथात्मक वृत्तान्त अपनी संस्कृति में उपलब्ध अस्मिता-कोटियों और
परम्परा-प्रसूत सांस्कृतिक वृत्तान्तों से प्रभावित होते हैँ। निजी प्रज्ञा
और व्यक्तिगत प्रयास/प्रतिरोध/आग्रह/संघर्ष/संकल्प से इस भौतिकता का
उल्लंघन, वैकल्पिक अस्मिता की रचना संभव होती है लेकिन नस्ल, सांस्कृतिक
प्रजाति, वर्ग, लिंग और लैंगिकता जैसी कोटियों से इतना तो तय हो ही जाता है
कि किस प्रकार के नियामक या दमनशील विमर्शों के विरुद्ध यह
प्रयास/प्रतिरोध/आग्रह/संघर्ष/संकल्प सक्रिय होगा और न केवल यह कि वह कैसा
रूप ग्रहण करेगा बल्कि शायद यह भी कि उससे जन्म लेने वाली वैकल्पिक अस्मिता
का रूप क्या होगा।

इन भौतिक वास्तविकताओं पर नज़र रखते हुए
आत्मकथाओं में व्यक्त स्त्री-आत्म तथा पुरुष-आत्म के अन्तर को देखा गया है।
पितृसत्ता में पुरुषों को सीमाओं के भीतर अपनी अस्मिता की उपलब्धि के लिये
संघर्ष की इजाज़त है, जबकि स्त्रियों पर उनकी अस्मिता लाद दी गयी है। पुरुष
के पास अवसर है कि जो उसको बनना है, बने जबकि स्त्री को बता दिया गया है
कि वह क्या है। जिन रिश्तोंी के ताने बाने मेँ वह जीवित हैं, उसके
विन्यासों के भीतर ही उसे अपनी निजता ओर वैयक्तिकता को उपलब्ध और अभिव्यक्त
करना है। ऐसा कोई नियम तो नहीं लेकिन अधिकांशतः एक
निश्शंक/निर्द्वन्द्व/आत्मकेन्द्रित/समंजित/समन्वित/एकीकृत अस्मिता की
अभिव्यक्ति पुरुष की आत्मकथा का लक्षण है और सम्बन्धों के ताने-बाने में
बँटे हुए आत्म का निरूपण स्त्री की आत्मकथा का। सम्बन्धजाल के भीतर
आत्म-निरुपण स्त्री की आत्मकथा की शैली का लक्षण है। न केवल सर्जनात्मक चयन
बल्कि सामाजिक मनोवैज्ञानिक ज़रूरत के द्वारा भी स्त्री अपनी जीवनकथाओं को
आत्म की रचना या तलाश के वृत्तान्त की तरह नहीं देखतीं, ‘ऐसा हुआ’ के
वृत्तान्त की तरह दर्ज करके रह जाती है।
अपने ‘आत्म’ की अनुभूति स्त्री को
आबद्ध-स्वयं या सम्बद्ध-स्वयं की तरह उपलब्ध होती है। आबद्ध-स्वयं अपनी
विवशताओं का बन्दी है। सम्बद्ध-स्वयं में सम्बन्धों का दबाव तो है किन्तु
स्वेच्छा और परस्परता की भावना के साथ।विच्छिन्न/ अलगावपूर्ण/
स्वयंपर्याप्त/ अहम्-केन्द्रित आत्म इसका विलोम है।
आत्मानुभूति/आत्मज्ञान/आत्मोपलब्धि की ये दो शैलियाँ हैं। पुनः, ऐसा कोई
नियम नहीं कि ज्ञान के ये दो प्रकार अनिवार्यतः दोनो प्रकारों की लैंगिक
अस्मिताओं अलग अलग जुड़े हुए हों लेकिन अधिकतर ऐसा देखा गया है कि
विच्छिन्न/ अलगावपूर्ण/ आत्मकेन्द्रित/एकोन्मुख/अहंप्रधान ज्ञान की
सार्वजनिक भाषा पुरुष के आत्मवृत्तान्त में अधिक पाई जाती है। वह श्रोता को
संगी की अपेक्षा शत्रु के रूप में कल्पित करती है और चुनौती की आवाज़ में
बोलती है। जैसे रूसो के ‘कन्फ़ेशन्स’ में – “एकत्र हों मेरे चारो ओर मेरे
अनगिनत साथी और सुनें मेरी आत्मस्वीकृति – मेरी अयोग्यताओं पर सिर धुनें और
मेरी अपूर्णताओं पर शरमाएँ।और फिर उनमें से हर एक स्पष्टता के साथ,
सिंहासन के चरणों में अपने हृदय के रहस्य का उद्घाटन करे और यदि साहस हो तो
कहे कि मैँ इस आदमी से अच्छा हूँ।”

स्त्री के आत्मवृत्तान्त की भाषा इससे अलग
सार्वजनिक भाषा के औपचारिक विन्यास और व्यक्तिगत भाषा के बीच एक निरन्तरता
बनाए रखने वाली अनुरोध की भाषा है।स्त्री के ‘आत्मज्ञान’ का विकास जिन
विभिन्न सरणियों से होकर गुजरता है उनमें पहली भाषापूर्व मौन अबोधता की है
जहाँ से शुरू करके वह समाज के नियामक विमर्शों और संस्कारों द्वारा प्रदत्त
ज्ञान तक, प्रदत्त ज्ञान से अनुभव द्वारा संचित और ग्रहीत ज्ञान तक, दोनो
के सामंजस्य/असमंजसता/समन्विति/टकराहट से रचित आत्मज्ञान तक, आत्मज्ञान से
उन रीतियों और प्रथाओं के ज्ञान तक पहुँचती है जिनसे सामाजिक स्वीकृति
मिलेगी। यह अन्तिम परिणति अनेक आवाज़ों का समुच्चय कही जा सकती है जो अन्ततः
समन्वित होकर उसकी अपनी ज्ञान-गढ़न्त बनती है।उसकी अपनी ज्ञान-गढ़न्त का
अर्थ प्रदत्त-ग्रहीत-अनुभूत ज्ञान की ऐसी निष्पत्ति जिसमें ज्ञाता और ज्ञेय
सम्बद्ध हो जाते हैँ। यह निष्पत्ति केवल कोई घरेलू आवाज़ मात्र नहीं,
सार्वजनिक विमर्श का विषय है लेकिन उसमें भी वह परिस्थितिजन्य हितों और
व्यक्तियों के–तथाकथित व्यक्तिगत मामलों के–सन्दर्भों को ध्यान में रखते
हुए ही संप्रेषण पर बल देती है। व्यक्तिगत और राजनीतिक का समन्वय(‘पर्सनल
इज़ पोलिटिकल’) या ‘भिन्नताओं का समारोह’ (सेलीब्रेशन ऑफ़ डाइवर्सिटीज़) जैसी
निष्पत्तियाँ इसी स्वभाव का नतीजा हैं। ‘सम्बद्ध’ आत्म की इस ज्ञानगढन्त
में परस्परता की आकांक्षा मौजूद होती है। वह अमूर्त/ सैद्धान्तिक/ तटस्थ/
सार्वभौम चौखटा-स्वरूप निष्पत्ति नहीं है। इसीलिये उनकी आत्मकथाओं के
विन्यास गैरपरम्परागत और विविध हुआ करते हैं और विधागत कानूनों या आधिकारिक
अहम् के मर्दाने प्रत्ययों में आसानी से दाखिल नहीं होते।
लैंगिकताद्वय द्वन्द्वात्मक विभक्ति की अन्तिम

ओर स्थायी कोटि नहीं है, अन्य अनेक वैकल्पिक लैंगिकताएँ संभव हैँ, यह
मानते हुए भी देखा जा सकता है आत्म व अहम् की एक स्त्री-कोटि है जिसमें
प्रवृत्ति/रुचि/रुख/रुझान के अनुसार पुरुष भी शामिल हो सकते हैं और दूसरी
पुरुषकोटि है जिसमेँ ठीक उन्हीं कारणों से स्त्रियाँ भी शामिल हो सकती हैं।
पुरुषकोटि की आत्मकथाओं में अपनी स्वयंता की एकान्विति और समन्वय को बढ़ावा
और उसकी दिशा मेँ विकास का उद्यम होता है जबकि स्त्री की आत्मकथाओं का
सामान्य निष्कर्ष स्वयं को पाने की तलाश का नतीजा स्वयं को खो देना यानी कि
अपने आपे के बाहर कहीं पाना है। स्त्री के लिये इससे अलग और अलावा अपने
आपे की तलाश में निकलना वस्तुतः असंभव की तलाश में निकलना है। अपने आबद्ध
या सम्बद्ध-स्वयं के सहज भाव-क्षेत्र में रहते हुए एकान्वित अहं की तलाश का
अर्थ शब्दशः पागलपन की तरफ़ जाने वाली आत्मकथा हो सकता है। हिन्दी की अबतक
उपलब्ध आत्मकथाओं मेँ चाहे नहीं, लेकिन दुनिया की बहुत सी भाषाओं में
स्त्री की आत्मकथा का अधिकांश पागलपन तक जाने की कहानी भी है लेकिन बहुत
बार इस पागलपन का कारण एकान्वित अहं की तलाश नहीं बल्कि उत्पीड़न की हदों के
बर्दाश्ते-बाहर हो जाने का नतीजा है।
स्त्री की आत्मकथा वस्तुतः
कथाबहुल, अस्मिताबहुल संभावनाओं के लपेटे में रचित ऐसा आत्मबिम्ब है जिसमें
प्रत्येक कथा, या कथा का प्रत्येक खण्ड उसके ‘स्वयं’ को ही प्रतिबिम्बित
करता है लेकिन ये सब की सब कहानियाँ आंशिक और अस्थायी हैं। स्वयं के किसी
एक श्रेणी – पत्नी, माँ, बहन, बेटी, दासी आदि– तक सीमित रह जाने से इंकार
करने वाली ये भूमिकाबहुल कहानियाँ विखण्डन और अनिश्च्य से शुरू और उसी मेँ
ख़त्म होती हैँ। प्रायः एकरैखिक, कालानुक्रमिक, वैयक्तिक, विगत के अनुभवों
के संचित पुंज और पहले से मौजूद किसी ऐसे एकान्वित स्वयं की उपलब्धि तक
नहीं जातीं जिसे उद्घाटित भर करना है और जो प्रायः आत्मकथा लेखन का
परम्परागत अनुकरणीय आदर्श है।

‘अन्या से अनन्या’ (प्रभा खेतान), ‘एक कहानी यह भी (मन्नू
भण्डारी) की ‘तद्भव’ मेँ प्रकाशित अपनी समीक्षा में अभय कुमार दूबे ने
दर्ज किया था कि वास्तव में ये स्त्री के आत्म-सशक्तीकरण
(self-empowerment) की कहानियाँ हैँ लेकिन इनकी लेखिकाओं में स्वयं इस बात
की पहचान नहीं है। यह टिप्पणी वास्तव में स्त्री के सम्बद्ध-स्वयं की
संरचना से पुरुष-आत्म के अपरिचय का नतीजा है। इन कहानियों मेँ अंकित मुक्ति
वस्तुतः उत्पीड़न और यंत्रणा के तात्कालिक संदर्भ से मुक्ति तथा विखण्डित
आत्म के साथ सामंजस्य और समायोजन की, संघात से उबरने की कहानियाँ हैं, उनके
साथ संबद्धता से मुक्ति की नहीं। आर्थिक स्वतंत्रता, आत्म-निर्भरता,
आत्म-निर्णय की क्षमता इत्यादि स्त्री के आत्म-सशक्तीकरण के महज़ आंशिक
उपकरण हैं, उसके ‘स्वयं’ की सम्पूर्णता का पर्याय नहीं।

आत्मकथा का औचित्य क्या है? किसी की निजी
ज़िन्दग़ी के स्याह-सफ़ेद मेँ ताकाझाँकी के पाठकीय कौतूहल और दिलचस्पी को
तृप्त करने के मनोरंजन-मसाले के अलावा भी आत्मकथा कुछ सामाजिक, नैतिक,
राजनैतिक, उपचारगत कार्य संपन्न करती है।अस्मिता और अनुभव की गढ़न्त सामाजिक
तौर पर होती है और ऐतिहासिक सांस्कृतिक सन्दर्भों के भीतर दैनिक जीवन तथा
वैयक्तिक अस्मिता में ढल जाती है। आत्मकथा का औचित्य उसके
लेखक-प्रवक्ता-चरित्र के आत्मचिन्तन/अन्तर्दर्शन/आत्मान्वेषण/अन्तरीक्षण की
अभिव्यक्ति में है।आत्मकथा का लेखक सदैव खुद को एक नैतिक औचित्य की सीमाओं
में रखता है और प्रवक्ता के माध्यम से उसे व्यक्त करता है, चरित्र ने भले
ही उन सीमाओं का उल्लंघन करते हुए ही अपनी जीवनकथा को गढ़ा हो। चूँकि
लेखक-प्रवक्ता-चरित्र तीनो एक ही हैं, लेकिन रचना की प्रक्रिया के स्तर पर
अभिन्न नहीं हैं अतः प्रवक्ताप्रवक्ता ‘चरित्र के आचरण का ‘साक्षी’ है और
लेखक उसका ‘निर्णायक’ और न्यायाधीश। लेकिन यह निर्णय और न्याय चरित्र के
विपक्ष में नहीं, उसके आचरण के नैतिक औचित्य का उद्घा टन करने के लिये है।
अपने किये-धरे लेखा-जोखा, सामाजिक अनौचित्य का हिसाब और पाठक के समक्ष अपने
कर्मों की सफ़ाई आत्मकथा को उसका कारण देती है।

लिंग/लैंगिकता/कामभावना के सिलसिले में समाज

के नैतिक पाखण्डों का पूरा बोझा स्त्री की कमज़ोर पीठ पर है।समाज के नियामक
विमर्शों की जकड़ का दमघोट दबाव उसके अस्तित्व की नाप से कहीं अधिक छोटा है
और उसे साँस लेने भर की जगह भी नहीं देता।उसकी
भूमिकाओं/दायित्त्वों/कर्त्तव्यों/कसौटियों का फैलाव उसकी सकत और सामर्थ्य
से बहुत अधिक बड़ा है। वह सामाजिक नैतिकता का पर्याय बन चुका है। उसका
दारोमदार सदियों से स्त्री की चुप्पी और स्वीकार पर टिका रहता आया है।
स्त्री-विमर्श के दायरे में प्रतिरोध के हथियार की तरह स्त्री की आत्मकथा
इस चुप्पी को तोड़ने और इस दोमुँहे नैतिक पाखण्ड को पलीता लगाने का काम करती
है। अन्याय और उत्पीड़न की तथाकथित नैतिक कसौटियों पर अनैतिक साबित होना
प्रतिरोध की राजनीति मेँ कहीं अधिक नैतिक हो सकता है। नैतिक प्रतिरोध की
तरह अनैतिक का चुनाव, और चुनाव से भी बढ़कर उसका बयान सामाजिक असहिष्णुता,
तिरस्कार से लेकर सार्वजनिक चीरहरण, दाग, दाह, संगसार, फाँसी जैसे
विधिसम्मत दण्ड का भागी होता है लेकिन तथाकथित समाजसम्मत सही रास्ते पर लगे
रहने की असफलता, अपने अनुभव के प्रकाश में नियामक विमर्शों की कसौटियों का
मूल्यांकन और विचलन का औचित्य इस ध्वंस को एक पवित्रता दे देता है।
सम्वेद से साभार

जीना ज़िन्दग़ी को आत्मकथा के नज़रिये से – पहली किश्त

अर्चना वर्मा

अर्चना वर्मा प्रसिद्ध कथाकार और स्त्रीवादी विचारक हैं. संपर्क : जे-901, हाई-बर्ड, निहो स्कॉटिश गार्डेन, अहिंसा खण्ड-2, इन्दिरापुरम, ग़ाज़ियाबाद – 201014, इनसे इनके ई मेल आइ डी mamushu46@gmail.com पर भी संपर्क किया जा सकता है.

 ( ‘अन्या से अनन्या’ (प्रभा खेतान) ‘एक कहानी यह भी’ (मन्नू भण्डारी)
‘लगता नहीं है दिल मेरा’ (कृष्णा अग्नहोत्री) ‘जो कहा नहीं गया’ (कुसुम
अंसल)’हादसे’ (रमणिका गुप्ता) ‘कस्तूरी कुण्डल बसै’ (मैत्रेयी पुष्पा), तथा
अनुवादों में आँधेरे आलो (बेबी हालदार -बंगाली), ‘रसीदी टिकट’ (अमृता
प्रीतम-पंजाबी), ‘नंगे पाँवों का सफ़र’ (दिलीपकौर टिवाणा-पंजाबी),
‘खानाबदोश’ (अजीत कौर- पंजाबी), ‘कहती हूँ सुनो’ (हंसा वाडकर-मराठी)
‘स्मृतिचित्र’ (लक्ष्मी -मराठी) ‘नटी विनोदिनी’ (विनोदिनी–बंगाली), ‘आमार
जीबोन’ (राशुन्दरी देवी-बंगाली) आदि स्त्री – आत्मकथाओं के आलोक में
अर्चना वर्मा का यह आलेख महान पुरुषों’ की महानता ग्रंथि और उसके लिए
उन्हें प्राप्त सामाजिक -सांस्कृतिक सुविधा और समर्थन तथा स्त्री -आत्मकथाओ
के लिए  सामाजिक -सांस्कृतिक अवरोध  की व्याख्या करता है . दो किश्तों में प्रकाश्य )

किसी सुदूर भविष्य की कल्पना में डूब कर वे तीनो पुरुषसुलभ परिहास और कविजनोचित कौतुक से सोचते थे कि एक दिन जब वे इतने बड़े कवि बन चुकेंगे, और जब उनकी जीवनी लिखी जाएगी, और कोई प्रेमी पाठक या शोधार्थी सामग्री की खोजबीन और जोड़-बटोर के लिये निकल ही पड़ेगा, उस दिन कहीं उसे

निराश न होना पड़े, तो जीवनी को दिलचस्प और पठनीय बनाने का दायित्त्व भावी साहित्यिक इतिहास के प्रति उनका कर्तव्य है। इसे वे ‘बायोग्राफ़िकल पॉइण्ट ऑफ़ व्यू’ से जीना कहते थे और एक दूसरे का मूल्यांकन भी इन शब्दों में करते थे कि तुम तो कसम खाकर अपनी बायोग्राफ़ी चौपट करने पर तुले हो या फिर अमुक या तमुक आजकल अपनी बायोग्राफ़ी की तरक्की मेँ जोर-शोर से जुटा है, फलाने या ढिमाके की तुलना मेँ तुम तो रहे वही बिल्कुल लद्धड़ इत्यादि। पता नहीं कुछ कर गुजरने के बाद या बिना कुछ किये धरे ही।

वे तब युवा रहे होंगे। उस सुदूर भविष्य (अब अतीत) तक जाकर वे प्रतिष्ठित और स्थापित हुए भी लेकिन जीवनी उनमें से अभी तक किसी की नहीं लिखी गयी। जीवन को सचमुच उन्होंने बायोग्राफ़िकल पॉइण्ट ऑफ़ व्यू से जिया कि नहीं, जीवनी को दिलचस्प और पठनीय बनाने लायक कुछ किया कि नहीं, जीवनी व आत्मकथा के अभाव में कौन जाने, लेकिन ‘दिलचस्प’ ओर ‘पठनीय’ के बारे में बेखटके कहा जा सकता है कि उसका मतलब व्यक्तिगत-सामाजिक-रचनात्मक जीवन में ऐसा उत्पात जो अगर मारधाड़ से भरपूर नहीं भी तो कम से कम सनसनीखेज-हैरतअंगेज साबित होता हो और जहाँ सनसनी और हैरत हो वहाँ स्त्री न हो, कम से कम पुरुष की जीवनी या आत्मकथा में ऐसा कैसे संभव है?
कल्पना कीजिये, हमारे उल्लिखित अनाम पात्रों की तरह एक स्त्री जीवन के साथ प्रयोग करते हुए जीना तय करती है। एक दिलचस्प और पठनीय जीवनी के लिये अपने जीवन में कुछ तथ्यों/सत्यों/यथार्थों को निष्पन्न करते हुए अनुभव-सामग्री संचित करना चाहती है।क्या और कैसा होगा वह संचय? पुरुष के जीवन को जो उत्पात, सनसनी और हैरत पठनीय और दिलचस्प बनाते हैं, स्त्री के जीवन मेँ वह सनसनीखेज-हैरतअंगेज उत्पात बलात्कार या छलात्कार जैसा कोई हादसा बनकर आते हैँ या फिर निषिद्ध फल का स्वाद वर्जित वर्षा में स्नान जैसी कोई पवित्र आत्मोपलब्धि जो अपनी गोपनता में पवित्र है लेकिन जो व्यक्त होते ही पारिवारिक सामाजिक दायरों में गर्हित, निन्दनीय और दण्डित अतः हादसे की ही तरह सांघातिक हो उठेगी। स्त्री के सन्दर्भ मेँ समाज के दमनशील नियामक विमर्शों और आचरण-संहिताओं के दबाव में स्त्री का जीवन हादसे के बिना भी हादसे की निरन्तर आशंका के कारण एक अनवरत दुर्घटना और सतत संघात है। भय और आशंका की जारी मनःस्थिति में जीवन के साथ प्रयोग करते हुए जीने का अर्थ जीवन में संघात को स्वयं निमंत्रण देना या कम से कम उसका खतरा मोल लेना ही हो सकता है लेकिन इससे मुँह मोड़ लेने का अर्थ भी अनुभव से, अवसर से वंचित रह जाना होगा जो अपने आप मेँ एक छोटा मोटा हादसा ही है। स्त्री का जीवन कुछ अपवादस्वरूप इलाकों को छोड़कर संघातों का अनन्त वास्तविक या संभावित सिलसिला है। वह निमंत्रण का मोहताज नहीं, अनिमंत्रित ही हर समय आशंका, आभास या आघात बनकर मौजूद है। और अवसर से, अनुभव से वंचित रह जाना सुरक्षाकवच है जिसे पहनकर वह वंचित तो ज़रूर रह जाती है, सुरक्षित फिर भी रह पाती है या नहीं, इसकि कोई गारण्टी नहीं।लेकिन अपनी आत्मकथाओं में स्त्री एक सुखद आश्चयर्य की तरह निडर उपस्थित नज़र आती है, कथानक मेँ अपने भय और आशंका को अभिव्यक्त करने के बावजूद निडर, निषेधों और वर्जनाओं के उल्लंघन का बयान करने की बहादुरी से लैस।

कथानक के स्तर पर स्त्री अपनी आत्मकथा में प्रायः संघात के असर में टूटती, जूझती,निकलती या डूबती दिखाई देती है। संघात की वजहें निजी पारिवारिक सम्बन्धों से लेकर सामाजिक राजनीतिक पैमाने की प्रायोजित हिंसा और मानवाधिकार हनन के मामलों तक प्रसरित हैं। घरेलू हिंसा, बलात्कार, छलात्कार, अगम्यागमन, युद्ध, बाल-यौन-शोषण जैसे हादसों के बीच स्त्री की देह को हिंसा और रक्तपात का प्राथमिक दुर्घटनास्थल कहा गया है। स्त्री की यौन-शुचिता की संस्कृति वाले समाज में अपने घावों पर लज्जित मौन की विवशता ऊपर से! जबरन आ पड़े हादसों के मामले में तो शायद फिर भी कहीं किसी करुणा और सहानुभूति की गुंजाइश हो, अपनी आकांक्षा के अनुगमन में चल निकलना तो अनिवार्य दण्डनीयता के औचित्य का उद्घोाष है।
स्त्रीजीवन के यथार्थ की इस पृष्ठभूमि के बाद आरंभिक प्रसंग में निहित सवाल सीधे शब्दों में यूँ पूछा जा सकता है कि आत्मकथा की लेखन-सामग्री जी चुकने के बाद संचित होती है या कि आत्मकथा की सामग्री संचित करने की प्रक्रिया में जिया जाता है? बात दर-अस्ल उतनी हास्यास्पद नहीं जितनी हमारे उल्लिखित अनाम पात्रों के परिहासप्रिय मन्तव्य में रही होगी या अभी आपको सुनने पर पहली बार में लग रही होगी। इसका अर्थ सजग भाव से, सचेत निर्णयों के साथ इस तरह जीना है कि मानो जीने की प्रक्रिया मेँ जीवन लिखा जा रहा हो, जीवन को यूँ देखना है कि उसका अर्थ महज़ बीतते हुए एक दिन शेष हो जाना नहीं, बल्कि मानो प्रतिक्षण के आचरण से जीवन का सृजन किया जा रहा हो। स्त्री के जीवन अपने आपे को इस तरह सिरजने की संभावना है या नहीं? अगर है तो कितनी दूर तक जाती है?जो आत्मकथाएँ हमारे पास हैँ वे इस संभावना का कोई साक्ष्य देती हैँ या नहीं? स्त्री का आत्म-सृजन जीने की प्रक्रिया मेँ सजग सचेत निर्णय द्वारा घटित होता है याकि आत्मकथा लेखन की प्रक्रिया में अतीत के पुनर्संयोजन द्वारा संभव किया जाता है?
जीने की प्रक्रिया मेँ अनुभव का संचय और आत्मबोध का विकास आत्मकथा का निरन्तर सृजन करता रहता है, फिर भले ही वह दर्ज की जाए या नहीं। यह एक अपनी कहानी हर एक के पास है, लिखित हो या मौखिक या फिर अव्यक्त। शायद इसी सहजता की वजह से विमर्शों की राजनीति में साहित्यिक औजार की तरह आत्मकथा नितान्त अपनी विधा की तरह स्वयं चुन गयी है। इतिहास में जिनके अस्तित्व का कोई निशान मौजूद नहीं वे अपने अस्तित्व को दर्ज करके अपने इतिहास का सूत्रपात करते हैं। शायद इसी राजनीति की वजह से विधा के तौर पर आत्मकथा विमर्शों में इतनी चर्चा और शोध का विषय है, भले ही जितनी चर्चा और शोध है उतनी मात्रा मेँ आत्मकथा-साहित्य हिन्दी में मौजूद न हो। विशेषतः स्त्री की आत्मकथाएँ गिनती में खासी कम है और इस गिनती बढ़ने की रफ़्तार भी बहुत धीमी है। वही गिनीचुनी आत्मकथाएँ बार बार गिनाईं और दोहराई जाती रहती हैं। इस आलेख की निष्पत्तियों के आधार समय समय पर पढ़ी गयी आत्मकथाओं में ‘अन्या से अनन्या’ (प्रभा खेतान) ‘एक कहानी यह भी’ (मन्नू भण्डारी) ‘लगता नहीं है दिल मेरा’ (कृष्णा अग्नहोत्री) ‘जो कहा नहीं गया’ (कुसुम अंसल)’हादसे’ (रमणिका गुप्ता) ‘कस्तूरी कुण्डल बसै’ (मैत्रेयी पुष्पा), तथा अनुवादों में आँधेरे आलो (बेबी हालदार -बंगाली), ‘रसीदी टिकट’ (अमृता प्रीतम-पंजाबी), ‘नंगे पाँवों का सफ़र’ (दिलीपकौर टिवाणा-पंजाबी), ‘खानाबदोश’ (अजीत कौर- पंजाबी), ‘कहती हूँ सुनो’ (हंसा वाडकर-मराठी) ‘स्मृतिचित्र’ (लक्ष्मी -मराठी) ‘नटी विनोदिनी’ (विनोदिनी–बंगाली), ‘आमार जीबोन’ (राशुन्दरी देवी-बंगाली)के विहंगम संदर्भों में हैं।
आत्मकथा भी प्रथमतः और अन्ततः एक कथा ही है। उसे ‘आत्म’ कथा बनाने वाला तथ्य केवल लेखक का यह दावा है कि वह उसकी अपनी, अपने जीवन की सच्ची कथा है। कथा यानी व्यतिक्रम। ढर्रा-रोज़मर्रा में ऐसा कोई उलटफेर या ऐसा कुछ अप्रत्याशित जो उसे दैनन्दिन का विलोम बनाए।आत्म की दैनंदिनी उसकी कथा है और वह कथा अपने व्यतिक्रमों से कहने-सुनने-लिखने-छपाने या छिपाने लायक बनती है। उसका आत्मकथा होना मानो लेखक या लेखिका का अपने पाठक के साथ एक अनुबन्ध है कि वह जो कहेगा या कहेगी, सच-सच और सिर्फ़ सच कहेगा या कहेगी। इस अनुबन्ध के अलावा उसके सच का और कोई साक्ष्य नहीं।जहाँ दैनन्दिनी में व्यतिक्रम की अधिकतम संभाव्य परिभाषा किसी न किसी किस्म का सांघातिक अनुभव हो वहाँ ‘सच और सिर्फ़ सच’ का अनुबन्ध सबसे पहले सन्दिग्ध हो उठता है। आत्मकथा अकेले की कथा नहीं होती। वहाँ उल्लिखित और चित्रित हर तथ्य व घटना में अन्य अनेक शामिल होते हैँ। उन तथ्यों का सत्य उनमें से किसी के लिये असुविधाजनक और बाधक भी साबित होगा। संघात निजत्व को चकनाचूर कर देनेवाला ऐसा विकराल अनुभव है जो निजी स्तर पर भाषा तथा वृत्तान्त को असंभव बना देता है, कहने की असंभवता के कारण तो वह ‘अकथनीय’ है ही, स्त्री की समूची ज़िन्दग़ी को यौनशुचिता की तराजू पर तोलने वाले समाज की संस्कृति के नियामक विमर्शों के दबाव में भी वह अकथनीय है। कोई स्त्री अगर सच कहने का फैसला कर ही बैठी हो तो ख़तरा केवल उसके अपने आपे तक के लिये नहीं होता। उसके सच को सन्दिग्ध/दण्डनीय/निरस्तित्व बनाना पितृसत्ता की आसान रणनीति है। तसलीमा नसरीन ने अपनी आत्मकथाओं के जो नतीजे भुगते हैँ वे साहित्यजगत की स्त्री-आबादी में जल्दी भुलाए नहीं जा सकते।लेकिन यह भी सच है कि तथ्य और गल्प का मसला आत्मकथा के सिलसिले मेँ इतनी आसानी से हल नहीं हो सकता। किसी भी एक तथ्यात्मक घटना में संलग्न अनेक व्यक्तियों के पास उसी एक तथ्य के अलग अलग सत्य हो सकते हैँ क्योँकि घटना के भीतर अपनी अपनी जगह के अनुसार संलग्नता के भी अलग अलग परिप्रेक्ष्य हो जाया करते हैं। एक के परिप्रेक्ष्य से दूसरे को सरासर झूठा सिद्ध किया जा सकता है। आत्मकथा की लेखिका की मंशा से उसका परिप्रेक्ष्य तय होता है। मैले कपड़ों की सार्वजनिक धुलाई का धोबीघाट या अपनी दुनिया की रंगचुंग साज सँवार – निजी कहानी की सार्वजनिक सुनवाई का एक परिप्रेक्ष्य अपने पक्ष की सफा़ई और दूसरे पर दोषारोपण है। “भूलें अपनी या प्रवंचना औरों की दिखलाऊँ मैँ” कहकर प्रसाद ने इसी विडम्बना की ओर संकेत किया था। अपने कुँए या किले या पिंजरे से खुद को बाहर निकालने की ज़रूरत के सिलसिले में दूसरों को और अपने आप को एक दूसरे की पारस्परिकता में समझना; दृष्टिकोण/ व्यवहार /गन्तव्य को बदलना और उस बदलाव की व्याख्या का सामाजिक दायित्त्व निभाना एक बिल्कुल ही दूसरे किस्म का परिप्रेक्ष्य है। एक निश्चित वास्तविक स्त्री-व्यक्ति के जीवन का बयान होने के कारण उसके भौतिक परिणाम भी होते हैं और बदले हुए व्यवहार का अर्थ अगर प्रतिरोध, विद्रोह, या ध्वंस हो तो ये भौतिक परिणाम भी उसी अनुपात मेँ पारिवारिक-सामाजिक प्रतिशोध या दण्ड या सम्बल-सहयोग-समर्थन का रूप ले सकते हैं। व्यक्तिगत होते हुए भी आत्मकथा यूँ सामाजिक जीवन और परिवर्तन का दस्तावेज होती है और कई बार कारक भी।

आत्मकथा साहित्य से अधिक इतिहास की एक किस्म है और इतिहास की धारा मेँ लेखक की निजी जगह के परिप्रेक्ष्य से सामाजिक प्रवृत्तियों का दस्तावेज कही जा सकती है। सत्य एक अतिशय आत्मपरक और व्याख्याबहुल मामला है। निजी ज़िन्दग़ी के बयान मेँ तथ्यपरकता की कोई वस्तुगत कसौटी संभव नहीं। घटनाओं का तटस्थ बयान नहीं किया जा सकता इसलिये तथ्यात्मक तौर पर सर्वथा सही प्रतीत होने वाली आत्मकथाओँ के भीतर भी कथा के तत्त्व होते हैं।सम्बद्ध व्यक्तियों के रहते तक उनके वैकल्पिक तथ्य निरूपण की वास्तविकता को विवादग्रस्त बना सकते हैं लेकिन अंतिम निर्णय फिर भी संभव नहीं। यह एक के मुकाबले दूसरे के बयान के वज़न का मामला है और दोनो ही एक दूसरे को सन्दिग्ध कर सकते हैं। जाँच के लिये दुर्लभ संयोगवश कथाकार दम्पत्ति राजेन्द्र यादव (मुड़ मुड़ के देखता हूँ) और मन्नू भण्डारी (एक कहानी यह भी) की आत्मकथाएँ उदाहरणार्थ मौजूद हैं। दोनो किताबों के प्रकाशन के बाद पत्र-पत्रिकाओं में वाद-विवाद और पत्रों-साक्षात्कारों का वह सिलसिला मौजूद है जो दोनो के बीच एक ही सम्बन्ध के अलग अलग चित्रों में अपनी अपनी स्मृति/समझ/मूल्य/मूल्यवत्ता के अनुसार अलग अलग तथ्यों को चुनता, रेखांकित करता या बलाघात का विषय बनाता है। एक के पक्ष से दूसरे को सच्चा या झूठा साबित करके न्यायाधीश के पद पर बैठने का लोभ अगर न हो तो दोनो में जीवन की अलग अलग दृष्टियाँ, मूल्य और संवेदनाओं के बीच इतनी लम्बी चौड़ी दरार–लगभग खाई– और संवाद-संप्रेषण का पूर्ण अभाव देखा जा सकता है कि मुद्दा मेरे जैसे पाठक के लिये कौन सच्चा कौन झूठा का नहीं, इस विस्मय का हो जाता है कि इसके बावजूद स्वेच्छा से पैंतीस वर्ष का साथ कैसे दोनो ने निभाया और अलगाव के बाद भी दोस्ती और निर्भरता को कायम रखा। भावना के मसले तर्क की सीमाओँ में सुलझते नहीं दिखते, तर्क और विवेक का दावा रखने वाले लेखक जीवों के बीच भी नहीं।
सम्बद्धताओं के दायरे के बाहर आत्मकथा भी केवल कथा ही है और सच तो यह है कि केवल कथा को भी आत्मकथा की तरह पढ़ने की प्रवृत्ति/मंशा/लालसा पाठक में दिखाई देती है। इसलिये आत्मकथा का सत्य उसकी तथ्यपरकता के बाहर खोजना अधिक उचित है। वृत्तान्त की सत्यता का अर्थ शब्दशः यथातथ्यता नहीं, बल्कि लेखक/लेखिका द्वारा स्वेच्छा से कुछ तथ्यों का त्याग; स्मृति की भूल से या जानते बूझते हुए अतीत/तथ्य का विरूपण भी लेखक/लेखिका के बारे में कुछ न कुछ उद्घाटित करता है। आत्मकथा का सत्य उसकी तथ्यपरकता से कहीं अधिक उसकी संवेदना मेँ रहता है और उसकी पढ़न्त में पाठक की संवेदना के प्रत्युत्तर से सत्यापित होता है। उसकी विश्वखसनीयता लेखक और पाठक के अनुबन्ध का फल है। इसलिये उसका गल्प भी उसके सत्य का ही विस्तार माना जा सकता है।
वह आत्म दरअसल क्या है जिसकी कथा कही जानी है? क्या वह स्त्री/पुरुष के सन्दर्भ में अलग अलग है? अगर हाँ, तो उसका निरूपण क्या उनकी आत्मकथाओं के आकार प्रकार को भी अलग अलग बनत देता है?
आत्मकथा का अर्थ वह कथा जिस का लेखक, प्रवक्ता और चरित्र एक ही व्यक्ति है और वही एक तीनो भूमिकाएँ एक साथ निभाता है। लेखक प्रवक्ता के माध्यम से चरित्र की कहानी सुनाता है।इस प्रक्रिया में उसकी स्वयंता विभक्त हो जाती है। वह एक होकर भी अभिन्न नहीं रहता, स्रष्टा, भोक्ता और वक्ता में बँट जाता है। इस अर्थ मेँ आत्मकथा स्वयंलिखित जीवनी है। जिस आत्म की जीवनी लिखी जा रही है वह भाषाजगत में प्रविष्ट होने के बाद ‘मैँ’, ‘तुम’, ‘वह,’ ‘वे’ के दायरे में अपनी स्वयंता को अर्जित करते हुए खुद को ‘मैं’ की तरह पहचानता है और पहचान के क्षण से ‘आत्म’ या ‘स्वयम् होना शुरू करता है। इस तरह अर्जित अहम् अपने अतीत का फल है, बूँद बूँद कर संचित अधिगम (learning) के स्मृतिपुंज का जमा-घटा-गुणा-भाग। अब तक का जिया गया जीवन संचित अतीत है और व्यवहार जगत में उसका अर्थ स्मृति-संचय है। स्मृति और कल्पना का गठबन्धन इस संचय को यथावत नहीं रहने देता। घटित होने के क्षण से लेकर लिखे जाने के क्षण तक में तथ्यों का स्वयंघटित संयोजन-पुनर्योजन और अचेतन की अबूझ तर्कातीत प्रक्रिया द्वारा उनका बिम्बों/आद्यबिम्बों/मिथकों/स्वप्नों में कायाकल्प, अपनी संस्कृति में उपलब्ध और सामूहिक अवचेतन में उपस्थित वृत्तान्तों/महावृत्तान्तों के साथ संश्ले्ष-विश्ले्ष इस स्मृति-संचय को एक जटिल तथा संचित होते हुए भी प्रवहमान प्रक्रिया बनाते हैं। इसीलिये कहते हैं कि स्मृति का अर्थ घटित हो चुकी कल्पना है और कल्पना का अर्थ अभी घटित होने को बाकी स्मृति है।
स्मृति यानी एक क्षण, एक दृश्यि, एक तथ्य जो एक विजड़न का विषय बनाया जाकर विस्मृति के सागर में डूबने से बचा लिया गया है, आत्मकथा के सन्दर्भ में वह कथा का रूपाकार है, कथा की जीवनशैली जो दिमाग़ में लगातार चलती रहती है और कहने के साथ बदलती भी रहती है। इस वृत्तान्त मेँ इतने बहुत से परस्पर विरोधी हितों की टकराहट के शामिल रहते हुए असंभव है कि जीवन कभी जैसा का तैसा पूरी तरह से स्वीकार्य होगा। इस अधूरेपन, इस खलिश, इस अस्वीकृति, इस टकराहट में आत्मकथा के लेखन की ज़रुरत की तड़प और छटपटाहट का उत्स है, स्त्री की आत्मकथा मेँ और भी अधिक।
उपलब्ध आत्मकथाओं के साक्ष्य पर ‘आत्म’ के अर्जन और निरूपण की दो स्थितियाँ दिखाई देती हैं। पहली स्थिति में निश्चित प्रवृत्तियों, रुचियों-रूझानों, अरुचियों-निषेधों से सम्पन्न पहले से मौजूद ‘आत्म’ जिसे केवल शब्दों में निरूपित किया जाना है और दूसरी जिसमें निरन्तर रचित होती हुई कथा की प्रक्रिया में निरन्तर रचित होता हुआ आत्म अभिव्यक्ति पाता है। आत्म की तलाश में कथा कही जाती है।पहली तरह की आत्मकथाओं में पहले से मौजूद ‘आत्म’ समाज के नियामक विमर्शों के, मूल्यों और सत्यों की सनातन अवधारणाओं के दबाव में निर्मित, परम्परागत कायदे कानूनों के साथ समंजित या फिर असमंजस के बावजूद समर्पित आत्म है। दूसरी तरह की आत्मकथाओं में क्रमशः आत्माविष्कार, आत्म-साक्षात्कार व आत्मोपलब्धि की कहानियाँ भी हैं तो दूसरी ओर आत्म का असमंजस, बेचैनी, छटपटाहट, ध्वंस, दण्ड, अन्ततः सामंजस्य अथवा अन्तिम अस्वीकार के साथ मानसिक विक्षेप, हत्या, आत्म-हत्या जैसी परिणतियों की कहानियाँ भी।
(संवेद से साभार )

‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’

स्त्रीकाल के द्वारा 2015 के फरवरी –मार्च में दिये जाने वाले ‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ के लिए आवेदन / संस्तुतियां  30 नवम्बर 2014 तक आमंत्रित हैं.

प्रतिवर्ष यह सम्मान हिन्दी की  मूल या भारतीय भाषाओं से हिन्दी  में  अनुदित स्त्रीवादी वैचारिकी  की किसी एक किताब के लिए उसके लेखक ( स्त्री या पुरुष ) को दिया जायेगा .सम्मानित लेखक को 12 हजार रुपये की राशि प्रदान की जायेगी . प्रथम सम्मान के लिए  2008 से 2013 तक  छपी किताब शामिल किये जायेंगे.

आवेदन या संस्तुतियां  भेजने की अंतिम तिथि : 30 नवम्बर 2014 

निम्नांकित पते पर आवेदन और संस्तुतियां भेजें  :
अनिता सिंह , द्वारा नरेश शर्मा Wz43c , पोसंगीपुर , जनकपुरी , नई दिल्ली -110058

किताबों की  दो प्रतियां अपेक्षित हैं . 5  सदस्यों की सदस्यता वाला एक  निर्णायक मन्डल  सम्मान की जाने वाली  एक किताब को संस्तुतित / चयनित करेगा . 

इस संदर्भ में किसी भी विशेष जानकारी या स्पष्टता के लिए प्रथम  ‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ के  समन्वयकों से सम्पर्क करें:
 निवेदिता : niveditashakeel@gmail.com
 राजीव सुमन rajeevsuman@gmail.com
 धर्मवीर सिंह : singhdharmveer85@yahoo.in
शिवम शर्मा : chhoteshivam@gmail.com ( भारतीय भाषाओं के लिए )

फूटते पेट वाली औरत और मर्दवाद

रति सक्सेना


डा रति सक्सेना संस्कृत की विदुषी हैं, कवयित्री हैं, आलोचक हैं.  साहित्य और संस्कृति की संस्था कृत्या की मैनेजिंग ट्रस्टी हैं.  इनकी हिन्दी में चार ( माया महा ठगिनी, अजन्मी कविता की कोख से जन्मी कविता, और सपने देखतासमुद्र, एक खिड़की आठ सलाखें), अंग्रेजी में दो और मलयालम में एक (अनूदित) एक द्विभाषी कविता पुस्तक , झील में मसालों की खुशबू कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं । इतालवी भाषा में भी एक कविता संग्रह और अथर्ववेद की प्रेम कविता का अनुवाद प्रकाशित हो के  हैं। (हिन्दी में दो और कविता संग्रह तथा अंग्रेजी में एक कविता संग्रह शीघ्र प्रकाशित होने वाले हैं ) वेदों को आधार बना कर लिखे गए लेख अपने विशेष दृष्टिकोण के कारण पठनीय रहें हैं . रति सक्सेना www.kritya.in नामक द्विभाषी कविता की पत्रिका की संपादिका है जो पिछले 10 वर्षों से चली आ रही है। कृत्या नामक संस्था द्वारा पिछले 8 वर्षों से स्तरीय कवितोत्सव मनाए जा रहे हैं, जो अपने स्तरीय प्रदर्शन के कारण वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध हैं। इनसे इनके ई मेल आइ डी : saksena.rati@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है

( रति सकेसना के ये दो संस्मरण   औरत की दुनिया , औरत बनने की कथा , मर्दवाद के प्रयोगशाला , पीढियों के फर्क और मर्द्वाद की पीढीवार निरंतरता , आदि को बेहद संजीदा ढंग से अभिव्यक्त करते हैं.)

1. फूटते पेट वाली औरत

दुखते जोड़ों को घसीटते घसीटते दिन भर तो कम में मशगूल रहती थी वह, लेकिन जरूर कुछ ना कुछ सोचा करती होगी, प्लाट बुनती होगी फिल्मी लेखकों की तरह, मन ही मन आवाज भी दुहराया करती होगीं, तभी तो साँझ ढलते ही वह भी ढल जाती आँगन में बिछी चोड़ी सी चारपाई पर लगे बिछे पर , और हाथ पैरों पर तेल चुपड़ते हुए जोर जोर से नवासे नवासियों को पुकारने लगती,, अरे भई, जिसे कहानी सुननी हो, सुन लो, मेरा तो पेट फूल रहा है, कहीं फट ही नहीं जाये कहानी के मारे…

बस फिर क्या गर्मियों की छुट्तियों में नानी के घर आये बच्चों में होड़ लगती कि कौन कितना चिपट कर कहानी सुने, जिसे जहाँ जगह मिलती घुस जाता, कोई पेट पर लदता तो कोई बाये कंधे को सिहाना लगाता, तो कोई पैताने उड़ंगा बैठ जाता।

नानी के भी तो १२ नवासे नावसियाँ थीं. और नानी के पास हर बार नई कहानी, ना जाने किस कारखाने से लाती थीं वे, हालांकि कुछ बेहद देसी कहानियाँ थीं, जो बार बार दुहराई जाने पर भी उबाऊ नहीं होती, लेकिन इन दो चार कहानियों के बल पर बच्चों को कितने दिन बाँध पाती , तो बस उसने अपना कारखाना शुरु कर दिया, उसके पात्र महाभारत से उतर कर वर्तमान में आते फिर कही भी चल देते, चाचा चौधरी तक खोज ना पायें, ऐसी थी उसकी कहानियाँ…

उसके नवासी नवासे बढ़े हो गये कब के, बड़े बड़े पदों पर हैं, लेकिन नानी का पेट फूलना और उसमें से कहानियों का निकलना उनकी सबसे खुबसूरत यादे हैं,..

अब मेरा पेट फूलता है,

मेरी खाट खाली है,

मेरे नवासे नवासियों को वक्त ही कहां इस बेहूदगी के लिये

2. मर्दवाद

उस पीढ़ी की हूँ जब औरत को कमजोर बनाना सामाजिक भूमिका का अंग हुआ करता था, भोजन से लेकर कामकाज तक, घर में कोई भाई ना होने के कारण मुझे व्यक्तिगत रूप से कभी यह अन्तर महसूस नहीं हुआ, लेकिन घोर बचपने में भी चकित रह गई थी, जब एक सखी ने आकर खुशी खुशी बताया था कि आज उसे करछी भर दूध मिला, जिसमें रोटी भिगो कर खाने का स्वाद वह स्कूल तक ले आई… मेरे लिये यह बात चकित करने वाली थी, क्यों कि मुझे रोजाना कप भर दूध पीने की बन्दिश खलती थी,,,, हमारे दूध के लिये आनाकानी करनेपर माँ कहती .. पी लो. पीलो… ससुराल में तो पीने को मिलेगा नहीं तब नखरे करना,,, उस वक्त तो बहुत गुस्सा आता लेकिन उनकी बात सोलह आने सच थी…

मैंने तो अपने बचपन में बीकानेर में सासों के मुँह से बीन्दनियों की बुराई कुछ इस तरह से सुनी थी कि .’.म्हारी बीन्दनी चुरा कर मट्ठा पीये है’…. मुझे उस वक्त भी आश्चर्य होता था  कि बीन्दनी चार चार गाय भेंसों को दुहे मट्ठा चलाये, घी निकाले लेकिन चुल्लू भर मट्ठे को होंठो से छुला ना पाये… जी यही समाज था…और इसे अच्छी बात मानी जाती थी…. माँ की ये बड़बड़ाहट कि पिता ने लड़कियों को सिर पर चढ़ा दिया है, ससुराल जायेंगी तो भुगतेंगी, सही प्रतीत हुआ…

घर परिवार में हर जगह औरत को कमजोर बनाने का अभियान इस कदर चलता था कि औरत भी उसी षडयन्त्र का हिस्सा थी. हमारी पीढ़ी ने कोशिश की लड़कियों को कम से कम भोजन तो अच्छा दिया जाये, उनकी शिक्षा भी उनकी रुचि के अनुसार ठीक ठाक हो…. लेकिन बेटियों के लिये एक कशमकश सामने रख दी कि जो उन्होंने अपने घर में देखा,वह सच है या जो वे दूसरे घर में देख  रही हैं वह?

अब घर से बाहर की बात… माँ ने साइकिल दिलाई,पिता ने साइकिल पर कालेज जाने की छूट दी… लेकिन बहुत कम उम्र में ही समझ आ गया था कि यदि साइकिल पर जाना है तो लड़कों के कालेज निकलने से काफी पहले के समयपर निकलों या लड़कियों के झुण्ड में चलो… नहीं तो साइकिल से ही डुप्पट्टा उड़ा लिया जायेगा या किसी अंग पर हाथ मार दिया जायेगा…. घिन आती थी, लेकिन किसी से शिकायत की हिम्मत भी नहीं होती थी, नहीं तो साइकिल छुड़वा कर घर पर बैठा नहीं दिया जाये…

जब राजस्थान यूनिवर्सिटी बस से जाना शुरु किया तो घर से बहुत जल्दी चल देते थे, दफ्तरी बाबुओ की शिफ्ट से कहीं पहले, क्यों कि उन दिनों युवा लड़के बस आवाजें कसते थे, लेकिन बाबुओं की मानसिकता चुपचाप हाथ मारनेकी होती थी….अकसर बसों की सीट को एक एक युवक हथिया लेता, लड़कियाँ या तो आधा घण्टे खड़ी रहें या किसी लड़के की बगल में बैठ बकवास सुने…मजा तब आता था कि जब कोई ग्रामीण औरत घाघरा लपेट कर किसी युवक के बगल में बैठ जाती थी, ग्रामीण महिलाऔं की जबान और कद काठी दोनो ही मजबूत हुआ करती थी…और हम पढ़ी लिखी  लड़कियाँ उनकी छत्रछाया में आश्रय लेती थी.

भाग्य से बेहद अच्छे प्रोफेसर मिले थे, मेरे गाइड यूनिवर्सिटी के भीतर अपने बंगले में ही पी एच डी की तैयारी करवाते थे, और जब तक वे देखते पढ़ते उनकी पत्नी बगल में ही जमीन में बैठी तरकारी काटती रहती, जब कभी उनकी पत्नी मैके जाती तो सुधीर कुमार गुप्त जी के घर के बाहर नोटिस लग जाता ,, कृपया शोधार्थी फलां तारीख के बाद ही आये, फला तारीख तक शोध कार्य नही चलेगा…. फोन आदि का जमाना ही नहीं था…अब जाकर महसूस होता है कि कितने सजग और महान गुरु थे हमारे, नहीं तो उस वक्त हम उनकी डाँट के कारण हिटलर ही समझते थे….

केरल में इस तरह की घटनायें काफी सुनी, सच कहा जाये तो मैंने यहाँ घर चल कर आई पोस्ट डाक्टरेट को इस लिये नहीं स्वीकारा कि यह ज्ञात हुआ कि वेदान्त विभाग के हेड आफ डिपार्टमेन्ट हद दर्जे के कमीने हैं, लड़कियों को बहुत छेड़ते छाड़ते हैं, यहाँ तक कि बस में चुकोटी भी काटते हैं…. इतनी हिम्मत ही नहीं थी कि ऐसे बदनाम व्यक्ति के विभाग में काम करूं.. और इसलिये जिन्दगी का बड़ा मौका जानबूझ कर  खोया….
फिर तो यहाँ की पर्ते भी खुलने लगी कि किस तरह स्कूल की लडकियाँ अपने साथ कम्पास या पिन लेकर चलती है, जिससे छेड़ छाड़ करने वालों से बच सकें,

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अय्यप्पा पणिक्कर ने इन महारथियों पर कविता भी लिख दी… जो हास्य में व्यंग्य के विद्रूप को दिखाती हैं….
बाहर की दुनिया बेहद जटिल है, और हर जगह अपने को बचाना औरत की मजबूरी होती है,,,,सच पूछो तो अपने को कठोर करने की कोशिश में कभी वह कर्कश भी हो जाती है, इसे भी समझा….अकेले यात्रा करना, रात को देर से लौटना बेहद कठिन है, कम से कम अपने देश में…. यह अच्छी तरह से समझ में आ गया…
यही नहीं यह भी समझ में आया कि साधारण कामगारों से काम करवाने में भी उसे अपने घर के पुरुषों की मदद लेनी पड़ती है,,, जैसे यदि किसी कामगार से घर की औरत ये कहे कि यह ठीक नहीं हुआ तो वो भड़क उठेगा , लेकिन यदि यदि वही बात घर का मर्द कहे तो वो चुपचाप कर लेगा…

मर्दवाद हर कदम में दिखा, कभी मर्द के रूप में तो कभी औरत के रूप में  मैं यह भी सोचती हूँ कि औरत को कमजोर बनाना एक सोची समझी चाल है, और औरत का मजबूत बनने का दिखावा करना अपने स्वत्व को खोने की कोशिश है…और औरत का वास्तब में मजबूत बनाने में औरत और मर्द दोनों की सार्थक भूमिका की मंग रखती है…

एक ऐसा इतिहास कि जो लिखा न गया किताबों में

फारूक शाह


मिजाज से फकीर और विचार से दार्शनिक फारूक शाह हिंदी और गुजराती के  कवि और आलोचक हैं .  ये   विशेष तौर पर हाशिये के लेखन ( दलित , दलित स्त्री और स्त्री लेखन ) , तथा मध्यकालीन निर्गुण -सूफी -जोगी साहित्य के प्रति समर्पित हैं ,  शोधरत हैं, और भारतीय भाषाओं में हो रहे  हाशिये के लेखन तथा संत साहित्य को   हिंदी में तथा गुजराती में प्रस्तुत करते रहे हैं .
लेखन और सम्पादन : ‘वही’ (कविता और लोकसंस्कृति की गुजराती पत्रिका) के संपादक. हिन्दी पत्रिका ‘वंचित जनता’ के साहित्य विभाग के संपादक.  *कविता संग्रह : ‘नकशानी एक रेखा’ (कविता संग्रह) *संपादन ‘सुण शबद कहे जो संत-फ़कीर’ (गुज. संत-सूफी-जोगी शबद) ‘कोयल आंबलियामां रमती’ (बेटी विषयक लोकगीत) ‘पाये पाये मानब मुक्तिर खोज’ ( अनुवाद और संपादन : दलित-शोषित बांग्ला साहित्य) ‘विश्वे व्यापवानी आकांक्षाए ऊभेली…’ (अनुवाद और संपादन : भारतीय भाषाओं से दलित स्त्री लेखन) ‘चित्त नवुं चन्द्रमा पण नवो’ (लल द्यद की कश्मीरी कविताओं का अनुवाद) ‘सोई सरवर ढूंढि लहे…’ (बाबा फरीद के पंजाबी सलोक के अनुवाद) .
स्त्रीकाल के पाठकों के लिए दलित स्त्री के बारे में इनकी तीन कवितायें . फारूक शाह  से farook_shah@gmail.com  पर सम्पर्क किया जा सकता है.

1. उत्पत्ति विचार 

पहले कुछ भी नहीं था
बाद में विश्व का सर्जन हुआ
हरेक जीव को जीने का अधिकार प्रकृति ने दिया
बाद में कई युग बीत गए
कहते है कि वानर से बन गया मानव
मानव जंगली था
फिर सभ्य हुआ
पहले हिंसक था
फिर रचनात्मक बना
बाद में उस रचनात्मकता के शास्त्र बने
शास्त्रों को प्रचारित करने वाला पुरोहित अस्तित्व में आया
उसने मानव को दो हिस्सों मेँ बाँट दिया
नर और नारी
नर का राज रहा
नारी ने नौकरी की

बाद में नर को भी बाँटा गया
जाति में
नर के साथ नारी भी जाति में बँट गई
फिर उच्च और नीच की श्रेणियाँ कायम हुई
फिर नारी जो नौकर थी और उच्च या नीच जाति थी
उसमें उच्च उच्च रही
नीच नीच रही
दोनों में सींचा गया
आपस के भेदभाव का संस्कार
फिर उनके रक्त निचोड़ने की पद्धतियाँ
बनाई गई
नीच के हिस्से जाति आई, बाहर की मजदूरी आई
और कई सारी दिक्कतें
देह को लेकर चारों ओर से आ घमकी
रक्त निचोड़ा गया सभी का

बाद में एक लम्बा समय-खण्ड गुज़र गया
तभी आशा का प्रकाश फैलाने वाले
कुछ लोग आये
उन्होंने कुछ रक्त विहीन देहों के दिलों में
आशा की ज्योत प्रज्वलित की
बाद में उन रक्त विहीन देहों के तल से
पैदा हो गई आग
फुफकारती तेज तर्रार आग
उस आग से उन्होंने पहले तो जलाया
अपने दिमाग में जमे हुए दु:खों को
फिर सूखी हुई रक्त-नलिकाओं में भर दिया
आग से उत्पन्न तेजपुंज
बाद में जलाया अपने आसपास उगाई गई
कंटीली झाड़ियों को
बाद में वे सब
जो कुछ भी जीवन के विरोध में हैं उसको जलाने के लिए
कटिबद्ध होकर जूझ रही हैं

2.  शायद अब

शायद अब समय आ गया है
हीनताओं की आपाधापी से
गरीबी की लाचारी से
जाति के धिक्कार से
गिद्धों के बीच फँसी गोरैया जैसी हालत से
इन्सान होने की शंकाओं से
और औरत होने के दंशों से
शायद अब तू बाहर आ सके

तेरे आसपास मंडराते आये हैं अविरत
अगणित सांप
अपनी जीभ लपकारते
विष टपकता मुँह डुलाते
डरावनी चेष्टाएँ करते

तेरे आसपास अज्ञान का अभिशाप
अपने तीक्ष्ण दाँत भींचता
क्षत-विक्षत करता आया है
सदियों से

तेरे आसपास शोषण के
प्रताड़ित करने के
सरंजामों का ढेर
करता आया है समाज
हमेशा से

तू बच्ची से बूढ़ी होती चली आ रही है
एक कृतक गढ़े हुए मिथक जैसी
तू सदा हीन ख्याल की तरह
सोची और समझी गई
तेरा अस्तित्व, तेरा आत्मबोध
तेरा अपना मनोजगत
अभी तक अनुपस्थित रहता आया है
इस पृथ्वी पर

फिर भी तू एक भ्रमणा हमेशा पालती रही
अपने भीतर कि तू कुछ है
तुझे पता ही न चला कि
तेरे होने का, तेरे मन का
तू जिसे अपना जीवन मानती हो उसका
तू जिन्हें अपनी महत्त्वाकांक्षाएँ समझती आई हो उन सब का
उपयोग होता आया है
तेरे अस्तित्व के विरुद्ध
तुझे थी – न थी करने वाला वातावरण रचने के लिए
उन सब बातों का इस्तेमाल होता आया है

तू हरेक युग में हर जगह थी
और तू होते हुए भी कहीं भी नहीं थी
ऐसा इसलिए लगता रहा कि
हकीकत में तुझे अवकाश में खड़ी की गई
बात की तरह प्रस्तुत करने की प्रथा
हमेशा से चली आई है

शायद अब समय आ गया है
तेरे बारे में जो भ्रांतियों की परम्पराएँ
सदियों से चलाई जा रही हैं
उन सब भ्रांतियों के परदें फाड़कर
बाहर आने का
शायद अब समय आ गया है
अपने होने का सत्य
अपने भीतर ही ढ़ूंढ़कर
अपने कण्ठ से
उसे व्यक्त करने का
तेरा सत्य तुझे व्यक्त करना चाहिए
क्योंकि दुनिया अभी तक उससे बेखबर है
तू इतना तो कर सकेगी न ?
इतनी कृपा करने का साहस तो तू जुटा ही सकती है

3.  निर्तिहास

एक इतिहास को लिए
अपने चहरे की उलझनों में
सफ़र करती रही
दलित शोषित समुदाय की स्त्री

एक ऐसा इतिहास
कि जो कभी
लिखा न गया किताबों में
जिसने भी कोशिश की
उसे लिखने की
उसके हाथों को काट दिया
क्रूर ठेकेदारों ने
जिसने भी प्रयत्न किया
उसके उच्चारण का
पाशविक दुकानदारों ने उसका
गला घोंट दिया
जिसने भी चेष्टा की उस इतिहास की ओर
संकेत करने की
तहस-नहस कर दिया रक्तपिपासु दरिंदों ने
उसके वजूद को

और इतिहास कोई रुकी हुई नदी जैसा नहीं होता
या तो कोई कोने में पड़ी
चेतनहीन चीज जैसा
हकीकत में वह होता है
दीमक के आदमखोर गिरोह जैसा
और होता है उन प्रचण्ड मस्तकधारी
डरावने प्रेतों की
युगों युगों तक फैली कतारों जैसा
जो अभिशाप उगलते रहते हैं

ये दीमक, ये प्रेत
दलित शोषित स्त्री के चेहरे की त्वचा में
सिमटने की जिद धरे न जाने क्यों आज तक
चले आये होंगे बेशर्मी से ?

स्त्री आखिर तो स्त्री होती है
उसके अंदर शक्ति होती है प्राकृतिक रूप से
उसे भूखी रखने से या उसके चेहरे से
अभिव्यक्त होने मथती भावनाओं को नोंचते रहने से
या उसके हाथ-पैर को शोषते रहने से
या तो उसके अंदर शक्ति के अभाव का वहम डालने का
षड़यंत्र चला-चलाकर
कब तक शक्ति को दबाया जा सकता है ?

कुदरत प्रतीक्षा रत है
ममता में डूबी माताएं
भीगी पलकें बिछाए राह देख रही हैं
बचपन की उजाड़ डगर पर छोटे-छोटे पाँव भरते
बेगुनाह बच्चे
आश भरे नयनों से घूर रहे हैं पालने-पोषने वाली को

गुज़री हुई और आने वाली पीढ़ियों की चेतना
बेचैन हो तड़प रही है
कोई उपाय के लिए
दबाई गई शक्ति जागृत हो सकती है
होनी ही चाहिए
जागृत होकर अणु-अणु से प्रबल प्राण विस्तारती
उखाड़ के फेंक देंगी
कीड़ें-मकोड़ों जैसे दीमक और प्रेतों को
पृथ्वी को इतिहास विहीन बना देंगी
अपनी ममता का समुद्र बहाकर
नए सिरे से वह निर्माण करेंगी इस विश्व में ऐसा जीवन
जैसा कि होना चाहिए

रचना भंडारी की दो कवितायें

रचना भंडारी


रचना भंडारी पत्रकारिता , अध्यापन , फिल्म और टेलीवीजन लेखन में सक्रिय रही हैं . 15 वर्ष तक अध्यापन के बाद विभिन्न टी वी चैनलों के लिए लिखती रही हैं . आजकल स्टार प्लस नेटवर्क में एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर हैं . इनसे rachanaa68@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है.

रचना भंडारी की इन दो कविताओं के अच्छे आदमी और अच्छी औरत हमारे आस -पडोस में रहते हैं , हमारे  घरों में रहते हैं , हम -आप भी हो सकते हैं ऐसी अच्छी औरत , अच्छे आदमी . अच्छी औरत पितृसत्तात्मक अनुकूलन की एक अच्छी कविता है , वही अच्छा आदमी पितृसत्तात्मक समाज के प्रतिनिधि पुरुष की.

अच्छी औरत 

अच्छी औरत  फ़रमाइश नहीं करती,
मानती है एहसान  कि  तुमने उसे अपना अमूल्य समय दिया .
अच्छी औरत  कभी तुम्हें इंतज़ार नहीं कराती,
क्योंकि  उसे सीखना पड़ता है  कि तुम्हारा मुट्ठी -भर समय
उसके बरसों के इंतज़ारसे कहीं बढ़कर है.

अच्छी औरत नहीं जताती अपना क्षोभ
कि मुश्किल से बनाया तुम्हारा मूड खराब न हो जाए ,
क्योंकि  यदि तुम उसे कोरा छोड़ कर चले गए तो उसके हिस्से आएगा
फिर एक  इंतज़ार… बेहद —लम्बा —इंतज़ार …   !

अच्छी औरत बिन-मांगे सामने रख देती है अपना बटुआ कि
तुम्हें मांगकर छोटा न होना पड़े…
पढ़ लेती है तुम्हारी मौन फरमाइश और बांच लेती है तुम्हारी  ख़ामोश ज़रूरत …
अच्छी औरत की ख़ामोशी किसी को सुनाई नहीं पड़ती…
उसकी चीखें भी नहीं…ना ही उसका बिफरता रुदन

अच्छी औरत मांगे भी तो उसे कोई देता नहीं एक  क्रोसीन या एक थपकी..
बिन-मांगे  मिलने की राहत समझती है अच्छी औरत.
अच्छी औरत जीती है तुम्हारे एक जन्मदिन से अगले जन्मदिन तक,
दिन-ब -दिन, लम्हा- दर- लम्हा
तब भी जब तुम उसके जन्मदिन भूलने का रिवाज़ निभाते जाते हो
एक अकड़-भरी बेशर्मी के साथ ।

अच्छी औरत नहीं थकती इतनी  ज़्यादा  अच्छी होने से…
वह  नहीं थकती तुम्हारे इतने ज़्यादा मतलबी  होने से …
तुम्हारी औरत होना उसकी  तक़दीर  है…और अच्छी होना उसकी नियति।

अच्छी औरत नहीं छोड़ती महकना तुम्हारी गंध से
तब भी जब तुमसे आती है बहकती महक उसकी अपनी सहेली की।
अच्छी औरत पोसती जाती है तुम्हारे अधूरे -से पौरुष को
तब भी जब तुम लाख कोशिश करके भी उसे पूरा नहीं  कर पाते
और अपनी औनी-पौनी मर्दानगी की रसीद मांगते हो
उसकी कोख की क्यारी में अपने बीमार बीज डालकर

आसान नहीं है अच्छी औरत को अच्छा मानना …
उसकी अच्छाई को आंकना …
उसकी औरतपन  को बूझना…
उसकी रातों को मापना…
उसकी हरारत को भांपना ..
उसकी करवटोंको सहलाना..
उसकी बेज़ुबान आहों से नुक्त  होना.
उसकी नज़रों कोसहना…

अच्छी औरत के पास नहीं है सामर्थ्य तुम्हें वैसे ही दुत्कार देने की
जैसे तुम निशब्द उसे दुत्कारते हो
और वह हिसाब करती है किसका गला घोंट देने से उसे कम तकलीफ होगी
अच्छी औरत की प्राण-वायु हो तुम —
तुम्हारा, अपना या अपनी अच्छाई का ।

अच्छी औरत जीती जाती है अपना अच्छी औरत होने का शाप
और मांगती जाती है तुम्हारे शतायु होने की दुआ .
अच्छी औरत  करती है इंतज़ार यम से मोल-भाव करने का
और इस जनम में तुम्हारे बिना जीना सीखने की सलीब उठाने का वरदान पाने का।।

अच्छा आदमी

अच्छा आदमी नहीं भूलता ६ हफ्ते बाद की मीटिंग की तारीख़,
अच्छा आदमी याद नहीं रख पाता ६ बजे मिलने का वादा…
अच्छे आदमी को अच्छा लगता है तोहफ़े पाना,
अच्छे आदमी को कोफ़्त होती है तोहफ़े जैसी गैर-ज़रूरी चीज़ों पर पैसे खर्च करना..
अच्छे आदमी को नागवार गुज़रता है उसीका कहा उसे याद दिलाना …
अच्छा आदमी सहज भूल जाता है अपना कहा सच कर दिखाना
अच्छा आदमी चोट करता है तुम्हारे मन पर,
और विवाद करता है तुम्हारे मस्तिष्क से…
अच्छा आदमी बुरा मान कर ख़ामोशी अख्तियार कर सकता है,
अच्छी औरत तभी अच्छी है जब रूठना भूल कर सिर्फ़ मनाना  सीखे।

अच्छे आदमी का अभिमान होता है उसके कद से बड़ा उसके भीतर छिपी बैठी छोटी-सी अच्छाई से कहीं बड़ा
अच्छा आदमी नहीं देखता कटु शब्दों के पीछे लुकी मिठास,
नहीं याद रखता फ़टकार में लिपटा सरोकार…
अच्छा आदमी भूल जाता है तुम्हारी हर स्तुति, हर अनुराग…
अच्छा आदमी जानता है तुमको खुद से वंचित करने का असर,
तुम्हारी धमनियों में सीसा भरकर जीतने का गुर…
अच्छा आदमी तुम्हें हराकर जीतने का सुख लेता है
और तुम वो सब फिर-फिर हार जाती हो जो बहुत अरसे पहले अच्छे आदमी को अर्पण करके तुमने जीता था.
अच्छे आदमी को सुख मिलता है तुम्हें तकलीफ़ में देख कर, बार-बार अपनी गरिमा को इक एहसान जता कर…

अच्छा आदमी तरस खाता है तुम पर,
और तुमको जब ख़ुद पर और तरस नहीं आता तो तुम्हें नफ़रत होती है अच्छे आदमी से आनेवाली हर राहत की याद से भी…
अच्छे आदमी की तकलीफ़ तुम्हारी सतही टीस से कहीं ज्यादा गहरी चीज़ है…
उसकी ऊंची अटारी तक नहीं,
केवल उसके क़दमों तक तुम्हारे मलिन हाथ पहुँचते हैं…

क्या होगा अगर अच्छा आदमी नहीं लेगा तुम्हारी ख़बर ??
ज़िन्दगी में कुछ रौशनी कम रहेगी न…
बस, वो एक दीया, वो मुट्ठी-भर धूप का अलाव, नहीं गरमाएगा तुम्हारे वजूद को — बसइतना ही न ?
सर्द पड़ गयी चाहत में ख़ुद को समेटे, अकेले ठिठुरने की आदी हो न तुम..?
अच्छा आदमी मर जायेगा मगर अपने अभिमान का कलफ़ ओढ़े रहेगा…
तब भी जब उसकी पीठ से मिन्नतें करते -करते तुम्हारी कोरें भीग जाएँ …
अच्छा आदमी तुम्हारा एक कौर खाकर थूक सकता है
और तुम कटे हुए होठों पर हंसी सजाकर पूछती हो –
कुछ और बना दूं? कुछ और बन जाऊं ?

अच्छा आदमी किवाड़ भेड़ कर जा सकता है
अपना मनपसंद कुछ चखने
तुम्हें पसारा समेट कर, खुद को, सेज को सजा कर
फिर तकनी है राह, ओढ़ लेनी है समर्पण वाली मुस्कान…
टुकड़े -चिंदे जमाकर गुदड़ी सीने में कुशल हो न तुम ?
सिर्फ़ इस बात से तुष्ट रहो — कि वो जो पावन, मनभावन, निशब्द, निस्वार्थ, निश्छल कुछ था…
उसको दुलारता, उसके पुरुषोचित अभिमान को पोसता , उसे ह्रदय से सींचता  ….
उसके बिना अच्छा आदमी भी कहीं गहरे, अकेले, यक़ीनन सिहरता होगा, कहीं बहुत गहरे, बिखरता होगा…
अपने हर मंतव्य पर अटल, हर गंतव्य तक सीध में चलता,

तुम्हारे होने-न होने से परे…
दुनिया के सामने –
अपनी हर कामयाबी का श्रेय तुम्हें देता
अपनी उपलब्धियों को तुम्हें समर्पित करता अच्छा आदमी
कितना नम्र है, नरमदिल है, मधुर है, उदार है…
अच्छा आदमी हमेशा सही है, सदा मुक्त  है !!

जच्चा

अनिता भारती


अनिता भारती साहित्य की विविध विधाओं में जितना लिखती हैं , उतना ही या उससे अधिक सामाजिक मोर्चों पर डंटी रहती हैं – खासकर दलित और स्त्री मुद्दों पर. स्त्रीकाल का दलित स्त्रीवाद अंक ( अंक देखने के लिए दलित स्त्रीवाद अंक पर  क्लिक करें ) इन्होंने अतिथि सम्पादक के रूप में सम्पादित किया है और दलित स्त्रीवाद की सैद्धंतिकी की इनकी एक किताब, समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध प्रकाशित हो चुकी है.  भी प्रकाशित है. कविता , कहानी के इनके अलग -अलग संग्रहों के अलावा बजरंग बिहारी तिवारी के साथ संयुक्त  सम्पादन में दलित स्त्री जीवन पर कविताओं , कहानियों के संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं. अनिता भारती दलित स्त्री जीवन और आलोचना की किताब भी सम्पादित कर रही है. इनसे इनके मोबाइल न.  09899700767  पर सम्पर्क किया जा सकता है.

(अनिता भारती की यह कहानी हम सब के आस -पास रोज घटती है. कहानी में कुछ अचानक या अविश्वसनीय घटित होने के आस्वाद वाले लोगों के लिए यह कहानी नहीं है. इसे छोटी कहानी को पढें , क्योंकि हमारी सम्वेदनायें हमारी अपनी ही व्यस्तता के साथ मरती जा रही हैं. इसे पढें कि रुटिन में चलती जिन्दगी में स्त्री साख्य और एक दूसरे से जुडी गहरी सम्वेदना कैसे स्त्रियों का संसार रचती है. हमारे आस -पास रोज घटित होती कहानियों में से एक बीन ली गई कहानी है यह. )

मैं बस अड्डें से मुद्रिका मे शालीमार बाग जाने के लिए चढ़ी। एक तो गर्मी, ऊपर से बस खचाखच यात्रियों से भरी हुई। पूरी बस में हाय-तौबा सी मची हुई थी। अगला बस स्टॉप आते ही, बस में एक औरत चढ़ी। उसे औरत कहूं या लड़की ?… उसे लड़की ही कहूँगी। 15-16 साल की रही होगी। रक्तहीन पीला चेहरा, बाल बिखरे हुए, गोद में मैले तौलिये में लिपटा कमजोर सा बहुत ही नन्हा सा बच्चा, क्या पता शायद नवजात ही हो। लड़की बस में कभी अपने को संभालती, तो कभी बच्चा, कभी अपनी साड़ी। उसका कद इतना ऊँचा भी नही था कि वह बस का डंड़ा पकड़ सके, फिलहाल तो उसके दोनों हाथ बच्चा पकड़े होने के कारण व्यस्त थे। जब भी ड्राईवर ब्रैक लगाता, वह लड़की कभी इधर सवारियों पर गिरती, कभी उधर। अपने आप को संभालते-संभालते उसके मुँह से ना जाने क्यों कराह सी निकल जाती।

एक तो बिखरे हुए बाल, मैले अस्त-व्यस्त कपड़े फिर गरीब और ऊपर से गोद में नन्हा बच्चा। बस के लोग उसे घूर-घूर कर देखने लगे, उनकी निगाहों से लग रहा था मानों उन्हें इस बात पर क्रोध हो कि यह बस में क्यों चढ़ी ? क्या बस इन जैसे गन्दे घिनौने लोगों के लिए बनी है ?   तभी ड्राईवर ने जोर से ब्रैक लगया। लड़की दर्द से चिहुँक उठी, शायद पास खड़े आदमी ने उसका पैर दबा दिया। लड़की कातर स्वर में, उस अधेड़ से दिखने वाले आदमी से बोली – “अंकल, जरा पैर हटा लो, मेरा पैर दब रहा है।”

अंकल संबोधन सुन उस आदमी की त्यौरियां  चढ़ गई, वह गुर्राकर बोला – “देखती नहीं बस में कितनी भीड़ है ? क्या मैं जानबूझकर तेरे पर पैर रखकर खड़ा हूँ ? खुदको बस में खड़े होने की तमीज नहीं, कभी इधर गिरती है कभी उधर !” आदमी की बात से लड़की का मुँह लटक गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह बस में बच्चा संभाले या कपड़े ? ऊपर से बगलवाले महाशय जी ओर सटे जा रहे थे !

महिला सीट पर बैठी महिलाएँ सिर झुकाए बैठी थी या फिर खिड़की से बाहर झांक रही थी। भरी बस में किसी को सीट देने का मतलब है खुद भारी असुविधा में खड़े होकर घर जाना। ऐसी असुविधा कौन मौल ले ? तभी लड़की से थोड़ी दूर खड़े साधारण से दिखने वाले आदमी ने चुटकी ली – “अजी ऐसा ही भोला मुंह बनाकर जेब काटती है, देखा नहीं गोद में बच्चा भी है ? इनके गिरोह हैं गिरोह। इनसे पंगे मत लेना, चाकू सटा देती है बगल में और जेब कब कटी पता भी नहीं चलेगा।”

   उसकी यूँ हंसी उड़ते देख मेरा दम सा घुटने लगा। मुझे लगा इनकी नज़र में हर वो औरत जेब कतरी है जो गरीब है, बेबस है। मैंने उस झूठी बात घड़ने वाले को घूरकर देखा और बदतमीजी से बोली – “तेरी जेब कट गई क्या ? क्या सबूत है तेरे पास कि ये जेब काटने बाली है, बोल ?”

शायद उस आदमी को यह उम्मीद नहीं थी कि उसकी बात इस बुरी तरीके से काटी जायेगी, उसे लगा होगा कि सब हाँ में हाँ मिलायेगे। तभी वह अधेड़ सा आदमी लगभग घूरते हुए सा उस लड़की को देखकर मुझसे बोला – “आप तो अच्छे घर की लगती, आपको इनका क्या पता ? अजी ये दिन में बच्चा गोद में लेकर जेब काटतीं हैं और शाम को इसी बच्चे को सड़क पर फेंककर सज-धज कर खड़ी हो जायेंगी।

 उस आदमी की बात सुन मेरे साथ-साथ बस में बैठी एक वृद्धा को भी गुस्सा आ गया। वह आदमी को डाँटते हुए बोली – “बेटे ऊँचे बोल मत बोल, तू भी बाल-बच्चे वाला होगा, ये तेरी लड़की के बराबर ही होगी।”  फिर वह बड़ी मुश्किल से सीट पर एक तरफ खिसकते हुए लड़की से अपनत्व भरे स्वर में बोली – “बेटी इतने छोटे बच्चे को लेकर घर में बैठ, देख तेरे साथ साथ यह भी बस मे घक्के खा रहा है।”

वृद्धा की अपनत्व भरी बात सुन लड़की की आँखे छलछला आई। लड़की रूआंसे स्वर में बच्चे की ओर इशारा करते हुए बोली – “ये अभी पाँच दिन का है, मेरी आज ही अस्पताल से छुट्टी हुई है। इसके पापा को हमें लेने आना था। मैं सुबह से अस्पताल के ग्रांऊड में इंतजार करती रही। मुझे लगा कि अब वे नहीं आएंगे, और अभी मुझसे ठीक से बैठा नहीं जा रहा है, तो में अपने आप हिम्मत जुटा कर घर जा रही हूँ।” लड़की हाथ में दबे एक मैले कुचेले पन्नी के लिफाफे में से कुछ कागज निकालकर दिखाती हुई बोली – “देखो, ये मेरी छुट्टी के कागज हैं और ये इसका जन्म कार्ड।”

वृद्धा के मुंह से अकस्मात शब्द निकले – “अरी तू तो जच्चा है। जंचकी में तो गाय-भैंस कुत्ते-बिल्ली तक को लोग सम्मान और दुलार देते है, और फिर तू तो मानुष जात है। और तेरी ये गत !” वृद्धा की आँखें नम हो गई।

अब मुझसे से और सहना मुश्किल हो गया था, मैं सीट पर जानबूझकर आंख बंद किए बैठे आदमी से गुस्से में बोली- “कब तक जानबूझकर आँखें बंद किए बैठा रहेगा, उठ, देख, इसके लिए खड़ा रहना भी कितना मुश्किल है ? यह महिला सीट है कम से कम यह जगह तो हमारी है।”

मेरी कड़क आवाज सुन सोता हुआ आदमी एकदम घबराकर उठ गया। उसकी इस हरकत पर मैं और वृद्धा दोनों मुस्कुरा उठी।

स्त्री-विरोधी लेखन दलित लेखन नहीं हो सकता

( उर्मिला पवार मराठी कथा साहित्य में स्त्री अभिव्यक्ति के रूप में एक महत्वपूर्ण उपस्थिति हैं.   ‘आमची इतिहास गढे़ला’ (इतिहास संबंधी पुस्तक) तथा ‘आयदान’ (आत्मकथ्य) के अतिरिक्त इनकी 9 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है, जिनका अनुवाद अंग्रेजी सहित अनेक भाषाओं में हुआ है।  युवा आलोचक तथा  स्त्रीकाल के सम्पादन मंडल के सदस्य धर्मवीर सिंह ने उनसे दलित -लेखन , दलित राजनीति और दलित स्त्रीवाद  पर ख़ास बातचीत की है ।  )

क्या केवल दलितों द्वारा ही लिखे गये साहित्य को दलित-साहित्य माना जाए या गैर दलितों द्वारा दलित जीवन पर लिखे गये साहित्य को भी दलित-साहित्य की श्रेणी में माना जा सकता है? जैसे हिन्दी में प्रेमचन्द, नागार्जुन, अमृतलाल नागर, गिरिराज किशोर आदि गैर-दलितों ने दलित जीवन पर जो कुछ लिखा है?

उर्मिला पवार

देखिए! किसी भी साहित्य को जांचने- परखने की कुछ खास कसौटियां होती हैं। दलित साहित्य के संदर्भ में यह कसौटी आम्बेडकरी चेतना की मौजूदगी है। यदि किसी दलित द्वारा लिखे गये साहित्य में भी स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्त्व की चेतना नहीं है तो मैं उसे दलित साहित्य नहीं मानती। रही गैर-दलितों द्वारा लिखे गये साहित्य की बात तो मैं यह मानती हूं कि दलित जीवन का जितना कटु, ठोस एवं यथार्थ अनुभव खुद दलित के पास होगा, उतना किसी गैर-दलित के पास नहीं हो सकता। लेकिन प्रेमचन्द, नागार्जुन आदि को पूर्णतः खारिज नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने दलित जीवन को अपने साहित्य का विषय बनाने का साहस किया, यहां तक अन्य सवर्ण लेखकों की दृष्टि पहुंचती ही नहीं थी।

समकालीन स्त्रीवाद  और दलितवाद दोनों ही से एक भिन्न एक अलग श्रेणी की मांग रख रहा है, ‘दलित स्त्रीवाद’। आप इस अवधारणा से कहां तक सहमत हैं?

भारतीय संदर्भों में अगर देखें तो स्त्रीवादी आंदोलन और उससे जुड़ी संस्थाओं का नेतृत्व सवर्ण-स्त्रियों के हाथ में रहा है। इसलिए वहां दलित-स्त्री की मुक्ति के मुद्दे केन्द्र में नहीं हैं। जातिवाद की घृणित मानसिकता यहां भी मौजूद है। दूसरी ओर दलितों का मर्दवाद है , इसलिए दलित-स्त्री को आज दोनों ही से पृथक ‘दलित-स्त्रीवाद’ की बात करनी पड़ रही है जो एकदम जायज है।

दलित-स्त्री लेखन की मजबूत उपस्थिति दलित साहित्य के भीतर स्वीकार नहीं की जा रही है जबकि इस  समाज की औरतें अधिक स्वाधीन रही हैं?

इस स्थिति का जिम्मेवार दलित पुरुषों के अवचेतन में बैठा हुआ मनुवाद है। इसलिए अनेक बार स्त्री के साथ वह भी वही व्यवहार करता है जो एक सवर्ण पुरुष करता है। जबकि प्रत्येक भारतीय भाषा में दलित महिला की एक जोरदार सृजनात्मक उपस्थिति है। अब उनकी इस आवाज़ को दबाना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं है। यदि दलित पुरुष अपने ही आन्तरिक सवालों से टकराने से बचना चाहता है , तो वह अब संभव नहीं है।

अनेक विचारकों का सोचना है कि दलित साहित्य को अब अधिक व्यापक नजरिये से देखने की जरूरत है। आदिवासियों, प्रत्येक वर्ण की स्त्रियों तथा वर्णवादी उत्पीड़न के शिकार सभी वर्ग के लोगों को इसमें शामिल किया जाना चाहिए। जैसा कि राजेन्द्र यादव सभी वर्ण की स्त्रियों को दलित मानते थे?

वर्णवाद से मुक्ति के संघर्ष में ऐसा बहुत कुछ हो सकता है जो सामूहिक या कॉमन हो। लेकिन जाति का सवाल भारत में बड़ा अहम् सवाल है, इसीलिए हो सकता है कि थोड़ी दूर संघर्ष में सब साथ चलें और फिर किसी मुद्दे पर वे अलग हो जायेंगे । खैरलाजी जैसी भयानक दर्दनाक घटना के खिलाफ मैं लड़ी हूं। जेल भी गई हूं। जो सवर्णवादी मीडिया और स्त्रीवादी संस्थाएं दिल्ली दुष्कर्म का विरोध कर रही थीं , वे उसमें साथ क्यों नहीं आई? समझ रहे हैं प्रतिरोध का सवर्ण चरित्र, घटनाओं के चुनाव में ही है . फिर  राजेन्द्र जी ने सब स्त्रियों को दलित कहा था , तब सवर्ण स्त्रियां ही क्या इसके विरोध में नहीं थीं।

किसी भी उत्पीड़ित या वंचित अस्मिता से यह अपेक्षा रहती है कि वह दूसरी निकटस्थ अस्मिताओं के साथ अधिक संवेदनशीलता से व्यवहार करे। हिन्दी दलित साहित्य की अगर इस संदर्भ में बात की जाए तो अनेक स्थानों पर गहरी निराशा हाथ लगती है। सवर्ण समाज की स्त्रियों को प्रतिशोध का निशाना बनाये जाने को आप किस रूप में देखती है? जबकि छिटपुट ही सही, इस रवैये के प्रति हिन्दी दलित-स्त्री लेखिकाओं ने अपना प्रतिरोध भी दर्ज किया है?

देखिए दलित भी व्यवस्था के मारे हैं। वह व्यवस्था वर्णवाद की देन है। स्त्री भी एक व्यवस्था की मारी है। वह व्यवस्था पितृसत्ता की देन है। अब अगर कोई दलित पुरुष उस व्यवस्था के प्रतिरोध तथा अपने साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय का बदला लेने के लिए अगर स्त्री को टार्गेट करता है तो इस तरह के लेखन को मैं तो दलित लेखन ही नहीं मानती हूं। इस प्रवृत्ति का पुरजोर विरोध सभी को करना चाहिए।

भारतीय संदर्भ में ‘परिवार’ नाम की संस्था की संरचना ब्राह्मणवादी मूल्यों के फ्रेम में ही है जो स्त्री के शोषण का आधार भी है। विवाह, यौन शुचिता, नैतिकता आदि स्त्री-विरोधी अवधारणाओं का आधार परिवार ही रहा है, जबकि दलित साहित्य ने अनेकों स्थानों पर परिवार के इस मॉडल का महिमा-मंडन किया है। क्या यह यथास्थिति को बनाये रखने का प्रयास नहीं है?

मैं मानती हूं कि ‘परिवार’ स्त्री जीवन के लिए बंधन है, पिंजरा है , जिसकी दीवारों को जरूर टूटना चाहिए। लेकिन इसका कोई अच्छा विकल्प नहीं है हमारे पास। इसलिए हमें ‘परिवार’ संस्था के अधिकतम जनतांत्रीकरण के लिए संघर्ष करना चाहिए,  जहां रिश्तों में किसी तरह की वरीयता का कोई अनुक्रम न हो। जहां किसी एक के महत्तर और दूसरे के कमतर की स्थिति न हो।

हिन्दी दलित साहित्य के संदर्भ में अक्सर कहा जाता है कि यह ‘मराठी दलित साहित्य की कलम है’। आप इस धारणा से कहां तक सहमत हैं? और इसी से जुड़ा दूसरा सवाल यह भी है कि विविध भारतीय भाषाओं में अभिव्यक्त दलित चेतना से मराठी दलित साहित्य किन अर्थों में विशिष्ट है?

पहली बात तो यह है कि महाराष्ट्र जनान्दोलनों की जमीन रहा है। जोतिबा फुले, सावित्री बाई फुले और बाबा साहब आम्बेडकर के आंदोलनों का स्थान है यह। इन आन्दोलनों से पैदा हुई चेतना यहां के हरेक दलित में मौजूद है। यह अनायास नहीं है कि गांधी गुजरात से होने के बाद भी सेवाग्राम, वर्धा से आन्दोलन शुरू करते हैं। इन जनान्दोलनों की सीधी अभिव्यक्ति है-मराठी दलित साहित्य। साहित्य और आन्दोलनों का इतना सीधा संबंध अन्य भारतीय भाषाओं में नहीं है, हिन्दी में भी नहीं।

दलित दर्शन में आजकल धर्म की भूमिका को लेकर बहुत से सवाल उठ रहे है। यहां तक कहा जा रहा है कि बाबा साहब ने एक क्षत्रिय का धर्म अपनाकर बहुत बड़ी भूल की। दलित चिंतक दलित धर्म की खोज ‘आजीवक’ धर्म के रूप में कर रहे हैं तथा इस धर्म की खोज को दलित चिंतन की उपलब्धि बता रहे हैं। आपके मत में दलित धर्म की अवधारणा क्या है? तथा एक दलित स्त्री के रूप में जीवन में ‘धर्म’ की भूमिका को किस रूप में देखती है?

धर्म की भूमिका किसी भी स्वस्थ समाज एवं राष्ट्र के निर्माण के तौर पर नकारात्मक ही रही है। धर्म घीरे-घीरे सम्प्रदायवाद एवं वंशवाद में परिणित होकर कट्टरता को ही फैलाता है। वैज्ञानिक सोच को खत्म करता है। स्त्री के लिए तो वह ओर भी खतरनाक होता है। राज्य के नियमों के साथ धर्म भी स्त्री के आचरण के लिए भेदभाव पूर्ण एक संहिता तैयार कर देता है। इसलिए धर्म वही अच्छा है जो समता, न्याय और बंधुत्त्व का पक्षधर हो और इस दृष्टि के उपयुक्त बौद्ध धर्म के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। बाबा साहब ने बहुत सोच-समझकर धर्मान्तरण किया था और इस विकल्प (बौद्ध धर्म) को अपनाया था। ‘आजीवक’ की बात मुझे समझ नहीं आती; वह दलितों का धर्म नहीं हो सकता।

दलित स्त्रीवादी लेखन पुरुष लेखन की तुलना में अधिक सृजनात्मक नज़र आता है। दलित स्त्री लेखन के शीर्षकों में ही इस बात को देखा जा सकता है। जैसे तिरस्कृत, जूठन, अपने-अपने पिंजरे की तुलना में आयदान (फूलों का टोकरा), हमारा जीवन, एक कदम मेरा भी कितने सृजनात्मक एवं सकारात्मक है। दलित स्त्री-लेखन की इस सृजनात्मकता को आप किस रूप में देखती हैं?

स्त्री सृजन का ही दूसरा नाम है। बच्चा जनने से लेकर, घर की हर सजावट में, खाना बनाने से लेकर तमाम दूसरे कामों में वह हमेशा कुछ नया रच रही होती है। इसलिए सृजनशीलता स्त्री स्वभाव की  बुनियादी विशेषता है जो बच्चे को लोरी सुनाने से लेकर कविता, कहानी, उपन्यास तक में अपनी अभिव्यक्ति पाती है। दूसरा दलित स्त्री के श्रम का सौंदर्य भी उसकी इस सृजनात्मकता में जुड़ता है जो उसे और गहरा और सकारात्मक बनाता है। आपने बहुत अच्छा सवाल रखा इस ओर मेरा भी ध्यान नहीं गया था, मैं भी कुछ और सोचूंगी।

इन्हें  भी देखें :

फैंसी स्त्रीवादी मुद्दों में जाति मुद्दों की उपेक्षा
स्त्रीवाद के भीतर दलित स्त्रीवाद
डा अम्बेडकर और स्त्री अधिकार
डा अम्बेडकर का मूल चिंतन है स्त्री चिंतन

दलित लेखन केवल लेखन नहीं आंदोलन भी है। जिसका उद्देश्य है जाति-मुक्त समता मूलक समाज की स्थापना करना। हम एक ऐसी स्थिति की कल्पना करें जब यह सपना हकीकत हो जाएगा। तब दलित साहित्य की प्रासंगिकता क्या रहेगी? मेरा मतलब कालजयी साहित्य से है जैसे शेक्सपीयर, मिल्टन, प्रेमचन्द, गोर्की,टालस्टाय, चेखव आज भी पढ़े जाते हैं? क्या शाश्वत साहित्य का सवाल दलित चिंतन के केन्द्र में है?

दलित लेखन मानवतावादी लेखन है। मनुष्य मात्र की स्वतंत्रता, उसकी बराबरी और न्यायोचित अधिकार की मांग का साहित्य है यह! क्या स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के ये मूल्य कभी अप्रासंगिक हो पायेंगे? यदि नहीं तो; दलित- साहित्य भी नहीं। जो मानवतावादी है उसका केवल नाम बदलेगा, मूल्य नहीं। समय की प्रवाहमान धारा में दलित- साहित्य में भी तथाकथित शाश्वत साहित्य से उच्च कोटि का साहित्य हमारे सामने आयेगा।

दलित साहित्य के वर्तमान परिप्रेक्ष्य को आप किस रूप में देखती हैं?

साहित्य में आत्मकथाओं के रूप में जगह बनाने वाला दलित साहित्य आज साहित्य की प्रत्येक विधा में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुका है। मनुवाद से लड़ने में उसे गहरा संघर्ष करना पड़ा है। समय के साथ दलित साहित्य ने अपेक्षित प्रौढ़ता भी हासिल की है। कलात्मक रूपों में उसकी अपनी आभा है। कला के परम्परागत सौंदर्यशास्त्र को प्रतिस्थापित कर उसने अपना एस्थेटिक्स विकसित किया। इतिहास और परंपराओं के छद्म को उसने उजागर किया है। नये-नये लेखक अपनी गहरी रचनात्मक ऊर्जा एवं समझ को लेकर सामने आ रहे हैं। मैं पूरी तरह आश्वस्त एवं खुश हूं। लेकिन जिस तरह के विचलन की बात आपने पहले कही, उसके स्त्री-पक्ष की जो चर्चा हमने की; मैं उससे निराश हूं। इस तरह का लेखन आम्बेडकरी दलित लेखन नहीं है उसका विरोध होना चाहिए वरना वह दलित साहित्य को पीछे ले जाएगा। बाबा साहब की बात आपको याद होगी,  उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा था कि अगर आप मेरे इस कठिनाइयों से यहां तक लाये गये जहाज को आगे नहीं ले जा सकते तो मेरी विनती है कि आप उसे वहीं छोड़ दें। उसे पीछे ले जाने का उपक्रम न करें। दलित-लेखन के इस तरह के स्त्री-दृष्टिकोण को सुनकर मैं आहत हुई हूं।

सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन के बतौर दलित-साहित्य का सपना वर्णमुक्त समता मूलक समाज की स्थापना का है। लेकिन जातियों और उप-जातियों के आधार पर खेमेबाजी तो दलित- साहित्यकारों में भी मौजूद है?

यह वर्णवादी व्यवस्था की देन है। किसी कार्यक्रम में दलित के नाम पर अपनी ही जाति के लोगों को शामिल करना, किसी पत्रिका का संपादक होने पर अपनी ही जाति के लोगों को छापना ये सब वर्णवाद के चिह्न हैं। इस तरह के लोगों में आम्बेडकरी चेतना का अभाव है। लेकिन अच्छे भविष्य के लिए दलित साहित्य को इन चीजों से ऊपर उठना होगा।

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में 56 इंच चौडे़ सीने वाली सांस्कृतिक-राष्ट्रवादी ताकतों ने सत्ता प्राप्ति के लिए अपनी पूरी जोड़-जुगत लगा दी। दलित समुदाय अपनी मुक्ति की छवि जिन चेहरों में देखता था उनका भी उन्हीं ताकतों के साथ खड़े हो जाना, जिनके विरुद्ध पूरा समुदाय लड़ रहा था, आहत करता है। जैसे रामदास अठावले, रामविलास पासवान, उदित राज आदि।

अवसरवाद एवं व्यक्तिगत स्वार्थ दलित राजनीति में भी पनपा है। पहले बाबा साहब के नाम पर गोलबंदी कर ताकत को अर्जित करना और उस अर्जित ताकत के मुताबिक अपना मोल-भाव तय कर लेना अवसरवाद नहीं तो और क्या है। लेकिन अठावले साहब के एक दूसरे पक्ष को भी मैं देखती हूं। यदि ये कभी सवर्ण हिन्दूत्त्ववादी ताकतों के साथ भी खड़े हुए हैं तो एक चौकीदार की भूमिका के रूप में। एक सिपाही की भूमिका के रूप में, इनके शिवसेना के साथ जुड़ने के बाद मुंबई में ही दलितों पर शिवसैनिकों के अत्याचार बहुत कम हुए हैं। ये वहां वॉच-डॉग की भूमिका में रहे हैं।
( युद्धरत आम आदमी से साभार )

यौनिकता की विश्वसनीय दृश्यता: भाग 3

एल.जे. रूस्सुम/ अनुवाद डा अनुपमा गुप्ता

(एल .जे .रुस्सुम का यह आलेख स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन के लिए भेजा गया था , जिसे हम स्त्रीकाल के अनियतकालीन प्रकाशन और विशेषांकों के कारण प्रकाशित नहीं कर पाये थे . इस लम्बे आलेख को हम तीन किश्तों में प्रकाशित करेंगे . यह तीसरी किश्त है , पहली और दूसरी  किश्त के कुछ उद्धरण हम दे रहे है, ताकि पाठ्कों की निरंतरता बनी रहे. नीचे लिखे पहली किश्त ‌‌‌_अंश और दूसरी किश्त _अंश  पर  क्लिक करें , तो पीछे के दो भाग पढे जा सकते हैं. यह आलेख पश्चिमी इतिहास लेखन में व्याप्त पितृसत्तात्मक प्रवृत्तियों की पड्ताल करता है, जिसे भारतीय इतिहास लेखन के संदर्भ में भी पढा जाना चाहिए .  मूल आलेख का हिंदी अनुवाद स्त्रीकाल के संपादक मंडल की सदस्य डा अनुपमा गुप्ता ने किया है .  रुस्सुम फ्लोरिडा ,यू एस ए, के एक कालेज में दर्शन पढाते हैं और डा अनुपमा एम जी आई एम एस , वर्धा , में कार्यरत हैं   रुस्सुम से LRussum@polk.edu पर संपर्क किया जा सकता है)

पहली किश्त – अंश :
यदि कुछ पल के लिए मान भी लें कि इतिहास अतीत की पुनर्रचना का अभिलेख है, तो भी हमें इससे कोई

 लगाव महसूस नहीं होता, क्योंकि यह पश्चिमी अभिलेख दरअसल भौगोलिक
रक्तस्नान के सिवा और कुछ नहीं है। इतिहास के नाम पर उपलब्ध ये रक्तस्नान-
विवरण सत्य के अभिलेखन का प्रयास नहीं, बल्कि इस बात के चिह्न  हैं कि
पश्चिम ने दुनिया की दूसरी ‘अमानुष’ संस्कृतियों पर विजय हासिल की है अथवा
उनमें सेंध लगाई है। यह इस तरह प्रदर्शित किया जाता है ,जैसे यह रक्तपात
है, पर फिर भी नहीं हैµयह तो भूमण्डल के शुद्धिकरण के लिए पश्चिम द्वारा
मजबूरीवश उठाये ग्ये अतिवादी, लेकिन अतिआवश्यक कदम हैं।
‘‘सतह पर दिखता नियतिवाद उन लोगों के लिए बढ़िया नकाब का काम करता है, जो
अन्यथा इन हत्याओं, दासत्व और रक्तपात को लेकर चिंतित हो सकते थे।
पिछले 350 वर्षों से यह अनवरत चल रहा है और इसके कम होने के कोई आसार
नहीं दिखते। अंततोगत्वा इस दैवीय दलील ने एक ऐसे जनसमुदाय को जन्म दिया है,
जिसके लिये हत्याएं और दासकरण स्वर्ग में पहुँचाने वाली सोने की सीढ़ी
है।’’

दूसरी किश्त – अंश

पुरुष- इतिहास स्वयं को उस मूल संदर्भ की तरह लेता है, जिसे खुद से अलग रह गये भाग को अर्थ प्रदान करने की जिम्मेदारी निभानी है (जो भोगा हुआ नहीं, बल्कि रचा गया यथार्थ है)µतस्वीर में औरतें हैं, लेकिन उनकी लैंगिकता कहीं दिखाई नहीं देती। लिपिबद्ध भाषा में निहित वर्गभेद के जरिये अपना नियंत्रण बनाये रखना ही इस इतिहास को रचने की विधि है। अब विखंडन की अवधारणा दावा करती है कि इसकी भाषा का सहज झुकाव समानताओं की ओर अधिक रहा है, यानी सहमति की ‘आवाजों’ को ही ग्रहण करने की ओर। इसका अर्थ यह हुआ कि मुख्यधारा का पश्चिमी इतिहास ‘हाशिये’ पर नियंत्रण द्वारा कृत्रिम रूप में सत्यापित की गई समानता प्राप्त करने के बारे में है। यहां ‘समानता’ कभी ‘समता’ के द्वारा प्राप्त नहीं की गई, अर्थात् पितृसत्तात्मक इतिहास के लिए द्वैत का अर्थ कभी दो समान ढांचों से नहीं रहा, बल्कि पहले भाव को विशेष बनाने के लिए दूसरे भाव को बहिष्कार का दंड भोगना पड़ा हैµकेन्द्र को दृश्यमान बनाये रखने के लिए इतर को दुर्लक्षित करने का यही अर्थ है। इससे एक समतापूर्ण नहीं, बल्कि श्रेणीबद्ध संरचना बनती है, जिसमें दूसरे स्थान के भाव को वर्गीकरण में हमेशा नकारात्मक माना जाता है। विलोम शब्दों के इस प्रकार के युग्मों के उदाहरण हमें भाषा में और भी मिलेंगे जैसे वाणी/ लेखन, अवधारणा/ रूपक, आंतरिक /बाहरी, उपस्थिति/ अनुपस्थिति, प्रकाश/ अंधकार, अमीर/ गरीब, इतरलैंगिक/ समलैंगिक और पुरुष/ स्त्री। विलोमों के वर्गभेद में वाणी लेखन को बहिष्कृत कर देती है, प्रकाश अंधकार को और उसी तरह पुरुष स्त्री को। यह बहिष्कार इतिहास में ऐसी पितृसत्ता की रचना करता है, जिसमें युग्म के दोनों शब्द एक-दूसरे के खिलाफ खड़े होते हैं, क्योंकि यह व्यवस्था पहले शब्द के केन्द्र में स्थापित होने की मंशा पूरी करती है और इस दौरान दूसरे शब्द को हाशिये पर कथ्यहीन/ वाचाहीन/ अलैंगिक कोरी जमीन बना कर पृष्ठ के मुख्य भाग के बाहर कर दिया जाता है।

तीसरा और अंतिम किश्त ;

और इसके लिये ‘दुर्लक्ष्यता’ की अवधारणा की बजाय कु-लक्ष्यता (Dis -visiblity) की धारणा पर कार्य करना अधिक कारगर होगा ताकि इतिहास के कथानक में स्त्री यौनिकता की वैकल्पिक दृश्यता की पूर्ण निर्मिति हो सके। उपसर्ग कु-का अर्थ एक नितांत भिन्न विलोमीकरण से है। ‘दुः’ से भिन्न ‘कु’ दृश्यता  अर्थ को ही उलट देता हैµयह पुरुष- इतिहास को स्त्री- इतिहास में बदलने की क्षमता रखता हैµहाशियेकरण के प्रयास को पहचानते हुए, लेकिन अपने लेखन से इसे वैध न बनाते हुए और दैहिक लैंगिकता के स्थायी स्वरूप की तरह इसे स्वीकार न करके।और इस तरह शोषितों का यौनिकता पर लेखन उनके प्रतिरोध का प्रतीक बन जाता हैµये कुदर्शित देहें पश्चिमी इतिहास में दृश्यमान यौनिकता के संदर्भ को एकदम बदल देती हैं। यह एक प्रामाणिक लौकिक यौनिकता की अवधारणा इतिहास निर्माण की नींव को बदल सकती है; यह शोषित स्त्रियों की दैहिकता की नई स्त्रीवादी कहानियाँ रच सकती है। ‘कुदर्शिता’ शब्द का मतलब होगा (आत्मकथात्मक) जीवनियों के द्वारा शोषित यौनिकता को दृश्यमान कर देना, भुक्तभोगी द्वारा अपनी स्वयं की दृश्यता रचना।

मुख्य कथानक के प्रति इस कुदृश्यता से यह संभावना ही समाप्त हो जाएगी कि इतिहास निर्मिति के बाद हाशिये द्वारा कभी भविष्य में केन्द्र की सत्ता को चोट पहुँचाई जाए, बल्कि निर्माण के समय ही मुख्य कथानक में नवकथ्य का भी स्थान हो। यही वह जमीन है, जिसे कवि Alexis De Veaux ‘शोषित आवाजों की प्रतिभा’ करार देते हैं, जहां शोषित अर्थों को बदल देते हैं, जहां पश्चिमी इतिहास विस्थापित हो जाता है।2 अपनी इसी प्रतिभा से ये शोषित संस्कृतियां स्त्री -यौनता को नागरिक असहयोग अभियान की तरह लिख रही हैंµअ-सहयोग के द्वारा कथ्य में दृश्यता को जबरन डाल रही हैं। कुदर्शित बन कर ये शोषित एक इतर इतिहास को जन्म दे रहे हैंµऐसा अतीत, जो पुरुष- इतिहास के साथ ही मौजूदगी दर्ज कराता है और वह भी उसकी शर्तों पर नहीं। यहां कुदृश्य देह इस दृश्यता को संदिग्ध मान कर उसे न देखने को नीतिसंगत बनाने के पश्चिम के सारे प्रयासों को धता बना रही है। पश्चिमी कथानक इसे अपनी अवमानना मानता है।
मुख्य कथानक के साथ सह-अस्तित्व में उपस्थित यह इतिहास केन्द्र-परिध के शब्द युग्म से नहीं बंधा  है। ये ‘जहीन स्त्री  कथाएं’ एक भिन्न स्रोत  से जन्म लेती हैं, ये शोषित स्त्रिायों के यौनिक अतीत का ‘रचा गया’ नहीं, बल्कि ‘भोगा गया’ यथार्थ विकल्प प्रस्तुत करती हैं। ये कथाएं अलक्षित और दुर्लक्षित के भाव को बदल कर कुदर्शित के संदर्भ में ले आती हैं, जहां दृश्यता को ढीठ, अभद्र, भौतिक देहों की जरूरत होती है।
कुदृश्यता की इस जमीन पर शोषित स्त्री की यौनता हमेशा पहले से ही दृश्यमान है। यहां स्त्री  इतिहास की ‘तलछट’ ने यूरोपकेन्द्रित पुरुष- इतिहास की महान ‘कलाकृतियों को नामंजूर कर दिया है। पुरुष- इतिहास में पुंसत्व प्रधान कलाकृतियां दरअसल शोषण की पराकाष्ठाएं हैं, जिन्हें कप्तानों, प्रधानों, पोपों, पुरोहितों, अयातुल्लाओं, इमामों, पादरियों, संतों, उद्धारकों देवों, कारपोरेट पदाधिकारियों, स्वयंसेवी संस्थाओं, जनकल्याण प्रतिनिधियों, पिताओं, बेटों, चाचाओं, भाइयों, न्यायधीशों, वकीलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पुलिस अधिकारियों, राष्ट्राध्यक्षों, राष्ट्रपतियों, तानाशाहों, प्रधानमंत्रियों और सरकारों ने अपने छद्म कथानक को विखंडित होने से बचाने के लिये निर्मित किया है।

कुदृश्यता’ का एक और पहलू है, जो स्त्री  यौनता- लेखन के लिए इसे अधिक प्रासंगिक बनाता है। Dis (कु) उपसर्ग (Disablot) यानी मद्यपान और किस्सागोई की प्रथा की दैवीय सत्ता को इंगित करता है। साथ ही मतभेद या कलह की रोमनदीवी भी डिसकॉर्डिया है। नोर्स मिथकों में क्पेंइसवज की प्रथा वालकाइरी और बल पशु को चुनने के उनके अधिकार को दिये गये समान की ओर संकेत करती है। शोषित यौनिकता ने आपबीती वाली किस्सागोई के जरिये ताकत हासिल की है, मतभेद दिखाने की ताकत, यथास्थिति बरकरार रखने के पुरुषीय इतिहास के चलने को बाधित करने की ताकत, स्वयं की तबाही का ब्यौरा किस स्वरूप में लिखा जाए, इसे चुनने की ताकत। कुदृश्यता किस्सागोई के द्वारा मतभेद दिखाती है। यह कथाकारी की विभिन्न शैलियों को पश्चिमी इतिहास के अभिलिखित तथ्यों के विरुद्ध खड़ा कर देती है। वह इन तथ्यों की प्रकृति और मुख्य कथानक के ‘सत्यता’ के दावों पर सवाल खड़े करती है। यदि इतिहास ‘सभी’ तथ्यों का दस्तावेजीकरण है तो फिर क्यों स्त्रिायों के खिलाफ इतने अधिक दर्जन किये गये अत्याचारों की भरमार है? हमारे पास दर्ज ये ब्यौरे और पुरुषीय इतिहास की किताबों में दमनकारियों की तस्वीरें और आत्मकथ्य (कबूलनामे?) कब से हमारी आंखों में आंखें डालकर खड़े हैं और फिर भी सदियों से स्त्रिायों के खिलाफ गुनाहों के लिए किसी ने सजा नहीं पाई, क्योंकि इन शोषित स्त्रिायों को ही अनदेखा बना दिया गया, लेकिन यह अब और नहीं चल पायेगा, क्योंकि शोषित लैंगिकता की कुदृश्यता अब स्वतंत्रता की मुखर जीवनी लिख रही है।

सिद्धांतकार जब स्त्री यौनिकता की बात करते हैं, तब वे ‘कु’ यानी अर्थ को उलट देने के बारे में कह रहे होते हैं। यह टोनी मॉरिसन को पुनर्स्मृति की अवधारणा, यानी इतिहास ने जिसे भुला दिया, उसके बारे में लिखना, वे अत्याचार जिन्हें स्त्रिायां भुलाना चाहती हैं, पर भुला नहीं पातीं, उसके बारे में लिखना। पश्चिमी ‘सत्य’ की छवि पर, कुलीनता की मढ़ी हुई ‘पारदर्शिता’ पर यह जैसे किसी पिशाच की कुदृष्टि पड़ गई है। स्त्री  देह को असल में इन डरावने घावों, उसके भूगोल पर बिखरी पड़ी चोटों पर ध्यान दिये बिना देखा ही नहीं जा सकता। (McKittric, 2006, p. xv) । कुदृश्यता की यह भूतिया उपस्थिति उस व्यवस्था की झलक दिखाती है, जिसे कैथरिन मॅककिट्रिक ‘अपूर्वनिश्चितता की व्यथा’ कहती हैंµवह व्यवस्था, जो शब्दों के पूर्वनिश्चित अर्थों से भिन्न अर्थ खोलने की संभावना जगाती है। ये नये अर्थ पुरुष की कथित श्रेष्ठता को विस्थापित या उस पर हावी नहीं होते, लेकिन उसके अधीनस्थ बनकर भी नहीं रहते, बल्कि उसके विधान और उसके मानवपन के मुख्य कथानक के बिल्कुल समान्तर चलते हैं।’’ (McKittric, 2006, पृ.-ग्ग्)।
डैमॉन (Daimon) शब्द का ग्रीक भाषा में अर्थ होता है ‘उच्चतर चेतना’ सचेत, उत्तेजित, उत्प्रेरित अवस्था। लेटिन में इसका अर्थ कुछ बदल कर अपवित्र, अनर्थित, अपश्चिमी, अ-दीक्षित और ‘निर्वाण में अक्षम’ हो गया है, जो इस ‘डेमन’  शब्द की ‘संक्रमित जैसी इरावती छवि प्रस्तुत करता है। कुदृश्यता शब्द भी शब्द-प्रधान पश्चिम को शब्द से ही घेर कर मात दे देता है। स्त्री  यौनिकता की समर्पित, अत्यंत निर्मल, निराकार पश्चिमी छवि के मुंह पर उग्र, बर्बर दास/ दैत्य की पश्चिमी कल्पना को बिम्बित कर देता है। इसी डरावनी मौजूदगी को Heather Bidellterms ‘पैशाचिक मानवता’ कहती हैं, उग्र मांसल बोध, भुक्तभोगी तथा समुदाय/ इतिहास के बीच दैहिक संवाद की चेतना। यह चेतना अब ‘पुरुष’ शब्द की पश्चिमी व्याख्या में अंतर्निहित ‘इतर’ अथवा ‘अमानुसी’ नहीं रह गई है, यह उस दुरात्मा को मानवों में शामिल करने वाली चेतना हैµपश्चिम के ‘पुरुष’ सिद्धांत का स्त्री प्रति-सिद्धांत। यह ‘दुरात्मा मानव’ अब अपनी पैशाचिक प्रवृत्ति के प्रतीकों को इस दैहिक भूगोल के अंतःस्थल में सहज भाव से मौजूद मानवता के बिना दिखाने की अनुमति नहीं देता
कुदर्शित नव-स्त्री  कथाएं गुलाम देह की यौनिकता को पराया कर देने के खिलाफ नागरिक असहयोग है। यह लेखन पश्चिमी छद्म कथानक के विरुद्ध राजनीतिक प्रतिक्रिया की जमीन/ संदर्भ/ मुजाहिरा बन गया है। सिद्धांतकार इस नागरिक असहयोग की जमीन से पश्चिमी इतिहास के खिलाफ जंग की ‘अराजकता’ का निर्माण कर रहे हैं।
नव- स्त्री-  इतिहास के रूप में अराजकता

अराजकता सत्ताधारियों को डांवाडोल करती है. ! अधिकांश पश्चिमी नागरिक जानते/ न जातने हुए भी दरअसल बौद्धिक जागरण ( ज्ञानोदय  ) की उपज हैं। वे स्वयं को तार्किकता के वंशज मानते आये हैं. ज्ञानोदय की मुख्य अवधारणा यह है कि  यदि मानवता  तर्क से काम लेगी तो ही सुख शांति से जी सकेगी.  जैसे कि Gelderloos का कहना है, ‘‘आज की दुनिया में सरकारें और कारपोरेट निगम सत्ता पर करीब-करीब एकाधिकार रखते हैं, जिसका एक बड़ा पहलू हिंसा है।’’ अब इन संस्थाओं को सबसे अधिक डर उनके एकाधिकार के खिलाफ हिंसक नागरिक विद्रोह से होता है (Gelderloos ,2007, पृ.-22)। यह निरंकुश सत्ता आत्मसमर्पण तभी करेगी, जब नागरिक समूह परिवर्तन के अस्त्र बनेंगे। सिद्धांतकारों को हिंसा की अवधारणा पर अब पुनर्विचार की जरूरत हैµएक विद्रोही होने का मतलब असल में क्या है? हमें अपनी राजनीतिक चेतना द्वारा यौनिकता की रक्षा के लिए नागरिक असहयोग अभियान छेड़ना चाहिए। यह अराजकताएं हमें मुफ्त में नहीं मिलेगी, लेकिन यदि हम इसे नहीं अपनाएंगे, क्योंकि हमें सजा मिलने, आर्थिक नुकसान और वर्गभेद का शिकार बनने का डर है तो अंततः यह डर, हिंसा के इस रूप से बहुत महंगा पड़ेगा, जो हमें एक नागरिक के रूप में सच्ची आजादी दिलवा सकता है।

वे सिद्धांतकार, जो स्त्री यौनिकता – लेखन को अराजकता लाने के औजार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं और वे नागरिक, जो हिंसक अराजकता फैला रहे हैं, समान हिंसक हैं। हम चाहते हैं कि आक्रामक  यौनिकता का यह लेखन और भी हिंसक हो, इस आक्रामक यौनिकता को अब बहुत समय तक आलमारी में या पितृसत्ता के बिस्तर में छुपा कर नहीं रखा जा सकता. वह क्षण, जब स्त्री  नागरिक अपनी यौनिकता को राजनीतिक वकतव्य बना ले , इस आराजकता को चुन ले , तो वह उसके सार्वजनिक रूप से प्रकट होने का पल होगा.
यौनिकता के बारे में लिखना शून्य में झांकने का वह क्षण है , ठीक वही चीज चुन लेने का क्षण , जिससे सभी पश्चिमी राजनीतिक संस्थायें बचती रही हैं- अराजकता का क्षण . यह आराजकता , जो , यौनिकता –लेखन को उसका स्थान प्रदान करती है , उतनी ही हिंसक प्रक्रिया है , जितना की यथास्थिति को अस्त व्यस्त करने वाला कोई भी हिंसक व्यवहार होगा. यह उस राजनीतिक नेतृत्व तंत्र का अस्वीकार होगा , जो दैहिक द्मन के माध्यम से नागरिकों पर नियंत्रण करना चाहता है.

पश्चिमी इतिहास ही एक मात्र सच्चाई नहीं है .  पश्चिम की मुख्यधारा का ऐतिहासिक विवरण ही इतिहास का एकलौता पाठ्यांतर नहीं है. ‘ यदि एक समुदाय किसी एकलौते व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों द्वारा शासित होता है , तो इसका साफ अर्थ है कि उसमें खुद को शासित करने का हुनर या सहस नहीं है,’ ( वाल्तेयर , 1994, पृ 195) . प्रत्येक दिन इस धरती पर कहीं कोई एक होना चाहिए , जो यौनिकता की अपनी नवकथा को राजनीतिक असहमति के रूप में लिख रहा हो.