किन्नर अब ‘थर्ड जेंडर’ की तरह पहचाने जाएंगे

(‘जल,जंगल और जमीन: उलट-पुलट पर्यावरण’ नामक चर्चित पुस्तक के लेखक सरोकारी पत्रकार स्वतंत्र मिश्र का यह लेख किन्नरों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘थर्ड जेंडर’ माने जाने की समीक्षा करते हुये उनकी समस्याओं को समझने का एक गंभीर प्रयास है। संपादक।)
                                                                                                                                                   स्वतंत्र मिश्र


महानगरों की लाल बत्तियों पर कार के शीशे पर दस्तक देकर भीख मांगने वाले किन्नरों के बीच से कोई संघर्ष करके खेल या  नौकरी में खुद को योग्य साबित करता था तो उसे यह कहकर बाहर का रास्ता दिख दिया जाता है कि ये तो ताली पीटने वाले हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक और साहसिक फैसले के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि अब हमारी विविधता की संस्कृति पहले की तुलना में कहीं और गंभीर और गहरी होगी
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सुप्रीम कोर्ट ने 15 अप्रैल को अपने एक ऐतिहासिक फैसले से किन्नर समाज को एक नई पहचान दी है। कोर्ट ने अपने अंतिम निर्णय में कहा कि हर सरकारी दस्तावेज में महिला और पुरुष के साथ-साथ एक कॉलम थर्ड जेंडर या किन्नर का भी हो। केंद्र सरकार, राज्य सरकार और केंद्रशासित प्रदेश किन्नरों के साथ सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर पिछड़े हुए वर्ग की तरह उन्हें सारी सुविधाएं मुहैया कराए। शैक्षिक संस्थाओं और नौकरियों में उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग को मिलने वाले आरक्षण का लाभ भी मुहैया कराए। के.एस. राधाकृष्णन और ए.के. सीकरी की खंडपीठ ने अपने फैसले में किन्नरों को सभी न्यायायिक और संवैधानिक अधिकार देने की बात कही है जो देश के आम नागरिकों को प्राप्त हैं। इस फैसले से किन्नर समाज के लोग काफी उत्साहित है क्योंकि अब उन्हें शादी करने, तलाक लेने-देने, बच्चा गोद लेने का अधिकार, उत्तराधिकार, वंशानुगतता सहित केंद्र और राज्यों की ओर से चलाई जाने वाली सभी स्वास्थ्य व कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिल सकेगा। इस खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि संविधान में वर्णित अनुच्छेद 19 (1) के तहत उन्हें निजता और वैयक्ति स्वतंत्रता के सभी अधिकार हासिल होंगे और केंद्र और राज्यों सरकारों का यह दायित्व होगा कि वे उनके अधिकारों की हरसंभव रक्षा करे।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों को इस फैसले को अगले छह महीने के भीतर हर हाल में लागू करने को कहा है। इस फैसले पर ‘अस्तित्व’ नाम की एक गैर-सरकारी संस्था की अध्यक्ष और इसी समुदाय से आने वाली लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने बहुत भावुक होते हुए कहा- ‘मैं जब फैसले से पूर्व कोर्ट में दाखिल हो रही थी तब मुझे बहुत सारी नजरें घूर रही थीं, पर जब मैं इस फैसले के साथ बाहर आई तो मुझे उन घूरती हुई नजरों की रत्ती भर चिंता नहीं थी क्योंकि अब मेरे हाथ में वे तमाम अधिकार हैं जिनका हमें बहुत लंबे वक्त से इंतजार था।’ गौरतलब है कि ‘अस्तित्व’ एलजीबीटी (लेस्बियन-गे, बायसैक्सुअल ऐंड ट्रांसजेंडर कम्युनिटी) समुदाय के लिए 2007 से संघर्षरत है। लक्ष्मी कहती हैं, ‘किन्नरों को अब तक सिर्फ नाचने-गाने वाला समझा जाता था। समाज ने कभी उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं दिया लेकिन दस साल की कानूनी लड़ाई के बाद हमें जीत मिली है और सुप्रीम कोर्ट ने किन्नरों को एक नई पहचान दी।’

हालांकि किन्नरों की आबादी को लेकर कोई सटीक आंकड़ा तो उपलब्ध नहीं है, लेकिन एक अनुमान के अनुसार देश में किन्नरों की आबादी लगभग 20 लाख के आसपास है। कोर्ट ने कहा है कि केंद्र सरकार एक कमेटी बनाए जो तीन महीने के अंदर किन्नरों की हालत को बेहतर बनाने के सिलसिले में रिपोर्ट दे। छह महीने के अंदर कमेटी की सिफारिशों को लागू किया जाए।
इस फैसले से इतर हम अबतक किन्नर समुदाय के प्रति समाज और राज्य के रवैये पर गौर फरमाएं तो जो तथ्य मिलते हैं, वे हमारी संवेदनशीलता पर सवालिया निशान लगाते हैं। पिछले दिनों की एक घटना का जिक्र करना यहां ठीक होगा। तमिलनाडु के विल्लुपुरम जिले की एक खिलाडी का चयन राज्य पुलिस में ग्रेड.2 के पद पर होते.होते रह गया। उसने पुलिस सेवा में नियुक्ति की सारी लिखित, मानसिक और शारीरिक परीक्षाएं पास कर ली थी लेकिन मेडिकल जांच में जब यह पाया गया कि वह एक लडकी नहीं बल्कि किन्नर है तो पदाधिकारियों ने उसकी तमाम योग्यताओं को दरकिनार करते हुए उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया। उसका रिकाॅर्ड खेल में, एनसीसी में तथा पढाई में भी किसी सामान्य छात्र-छात्राओं के मामले में उन्नीस नहीं रहा था। पीडित के पिता सफाई कर्मचारी हैं। इस किन्नर को नौकरी से बाहर का रास्ता दिखाए जाने पर एक वरिष्ठ पुलिस पदाधिकारी का कहना था कि नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान पाया गया कि वह किन्नर है। इस तरह प्रारंभिक पूछताछ के बाद उसकी नियुक्ति रद्द कर दी गई। अपमान झेलने वाली वह कोई पहली किन्नर नहीं थी। लैंगिक भेदभाव की त्रासदी झेलने वाली इस आबादी के साथ सरकारी और गैर.सरकारी संस्थानों में नियुक्तियों को लेकर होने वाले भेदभाव का कोई ठोस आंकडा तो नहीं मिलता है लेकिन इस सवाल पर संघर्षरत लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी का कहना है कि देश में किन्नरों की संख्या लाखों में होते हुए भी आजादी से लेकर आज तक इस समुदाय के शायद 100 लोगों को भी रोजगार मुहैया नहीं कराया गया होगा।
सच तो यह है कि पढे.लिखे और पेशेवर डिग्रियों से लैस किन्नरों को भी सामाजिक पूर्वग्रहों की वजह से नौकरी नहीं दी जाती है। संध्या, एंजेल ग्लेडी, बानू, विद्या और कल्पना सहित ऐसे हजारों किन्नर हैं जिनके पास पेशेवर डिग्रियां होते हुए भी निजी क्षेत्रों की कंपनियों ने उन्हें यह कहकर चलता कर दिया कि आप हमसे अलग हैं इसलिए आपको साथ लेना मुश्किल है। वहीं दूसरी ओर हमारे समाज का एक तबका ऐसा भी है जो किन्नरों को समाज की मुख्य्ाधारा में शामिल करने में दिलचस्पी ले रहा है। मुंबई स्थित वेलिंगकर प्रबंधन संस्थान के छात्रों ने 2011 में एक कम्युनिटी सेंटर बनाया था, जिसका उद्देश्य किन्नर छात्रों को नौकरी के दौरान सामान्य व्य्वहार करने का प्रशिक्षण देना था। हकीकत यह भी है कि इन्हें सामान्य स्कूलों तक में दाखिला मुश्किल ही दिया जाता है। तूतीकोरिन की पोन्नी आज चेन्नै में झुग्गी.झोंपडी के बच्चों को नृत्य सिखाने के लिए एक स्कूल चलाती हैं। वे अपने बचपन को याद करती हुई कहती हैं कि स्कूल में मेरे किन्नर होने का पता चलते ही बाहर निकाल दिया गया था।
दोहा में 2006 में आयोजित एशियाई खेलों में रजत पदक जीत चुकी शांति सोंदुरराजन की नियुक्ति तमिलनाडु पुलिस में हुई थी। वह इस डर से पुलिस प्रशिक्षण काॅलेज में प्रशिक्षण लेने नहीं गई कि एक दिन उसके उभयलिंगी होने का सच सामने आने पर समस्याएं पैदा होंगी। वाकई उसके किन्नर होने का सच उजागर होने पर उसका रजत पदक छीन लिया गया। उसने मानसिक परेशानी में आकर आत्महत्य्ाा की कोशिश भी की थी, मगर शुक्र है कि शांति आज जिंदा है और 200 रुपयों प्रतिदिन की दिहाडी करके किसी तरह अपना गुजर.बसर कर रही है। शांति के प्रशिक्षक पी. रंगराजन का कहना है कि शांति बहुत गरीबी में पली-बढी थी इसलिए बाद के दिनों में खाना.पीना ठीक से मिलने की वजह से उसके हारमोन की ग्रन्थि में गडबडी पैदा होने से पुरुष होने के कुछ लक्षण उसमें आ गए होंगे। तमिलनाडु में यह सब तब है, जब वहां 2008 में ही ट्रांसजेंडर वेलफेयर बोर्ड का गठन किया जा चुका है बल्कि  देश में किन्नरों के लिए सबसे पहले बोर्ड का गठन तमिलनाडु में ही हुआ। राज्य सरकार की ओर से स्कूलों और काॅलेजों में किन्नरों के दाखिले के लिए विशेष निर्देश भी दिए जा चुके हैं। इन्हें अलग से राशन कार्ड मुहैया करायो गयो हैं। 
तमिलनाडु में हुई इस घटना के बारे में लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी कहती हैं, तमिलनाडु सरकार हमारे प्रति बहुत संवेदनशील है, मगर ऐसी घटनाएं निश्चित तौर संविधान की मूल भावना के खिलाफ है, क्योंकि वहां साफ-साफ लिखा है कि आप किसी के साथ धर्म, जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकते।
 पश्चिम बंगाल की प्रसिद्ध धावक पिंकी प्रामाणिक के साथ भी ऐसा ही हुआ था। पिंकी के एक साथी द्वारा अचानक उसमें  पुरुषोचित गुण के होने और उसके द्वारा बलात्कार करने की बात आने पर बहुत हंगामा बरपाया गया था, लेकिन बाद के दिनों में उसी महिला दोस्त ने अपने आरोप वापस ले लिए थे। पिंकी की जांच रिपोर्ट में भी उसके भीतर पुरुष होने के बहुत मामूली गुण पाए गए थे। मामला फिलहाल अदालत में है लेकिन दुनिया में ऐसे लोगों के प्रति इतनी क्रूरता बरती जाती है कि उनकी मेडिकल जांच का वीडियो तक यूट्यूब पर डाल दिया  गया था। इस वीडियो में वह पूरी तरह नग्न नजर आ रही थी।
सरकार ने तकनीकी सलाहकार समिति की सिफारिश पर 2011 में किन्नरों की गणना करवाई थी। 2011 में इनकी आबादी 5,00,000 पाई गई थी। इस गणना को लेकर समाजशास्त्रियों की राय यह है कि सरकार ने लोकतांत्रिक मांगों के दबाव में आकर गणना करवाई थी, जो बहुत आधे.अधूरे तरीके से संपन्न की गई थी। इस गणना के बाद एक बार तो लगा कि सरकारी नौकरियों के दरवाजे किन्नरों के लिए अब खुलने वाले हैं, लेकिन वास्तविक स्थिति क्या है? इस सवाल के जवाब में लक्ष्मी कहती हैं, ‘जी, हमारे लिए सिर्फ तालियां बजाने, भीख मांगने और वेश्यावृत्ति करने के दरवाजे ही अबतक खुले हुए थे। सुप्रीम फैसले के इस नए फैसले के आने से शायद अब कुछ सालों बाद हमारी और देश की तस्वीर बदली हुई नजर आएगी। सरकार अगर वाकई भ्रष्टाचार को खत्म करना चाहती है तो हमें नौकरियों में लेना शुरू कर दे। हम भ्रष्ट नहीं हो सकते क्योंकि हम परिवार की व्यवस्था में नहीं होते हैं। राजशाही के समय से लेकर आज तक हमारी प्रकृति में जमाखोरी की प्रवृत्ति नहीं पनप सकी है।’ इस फैसले से चार महीने पहले सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 के तहत गे, लेस्बियन (समानलिंगी) के बीच यौन-सुख को अपराध बताया था पर लाजिमी है कि इस फैसले के बाद उनकी आंखों में भी उम्मीद का एक दरिया जरूर फूट चुका है।
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