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विपिन चौधरी की कविताएं

विपिन चौधरी


विपिन चौधरी युवा कविता की महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं.विश्व की दूसरी भाषाओं से अपनी रुचि के साहित्य का अनुवाद भी करती रही हैं.संपर्क: vipin.choudhary7@gmail.com

( ये कवितायें प्रकृति ,प्रेम और मानव अस्तित्व की  कवितायें हैं.  युवा लेखन के इस महत्वपूर्ण स्वर के लिए इन कविताओं की चार पंक्तियों से बेहतर कोइ कथन नहीं हो सकता. इस बार नए साल को /वसंत के भरोसे छोड़ दो /बहुत हुआ अब /पंडित, जन्मपत्री और हाथ की रेखाओं का लेखा-जोखा )

1.

इन बची-खुची यादों को,
बारिश के लिए बचा कर रखो
बारिश में मन से धुँआ कुछ ज्यादा उठता है
बारिश में  छाते के साथ,
भीगने को मन करता है
बारिश में काई से अटी दीवारों पर  प्यार आने लगता है
बारिश का भरा-पूरा संसार
हमें अपने भीतर ले लेता है

2.
सूखे पौधे को निहारता हुआ
एक स्वस्थ फूल,
यूँ उदास है जैसे
उसने ही सूखे पौधे का जीवन चुराया हो
सच उदासी,
सब पर एक सी छाया डालती है

3.

ईमानदार माली,
नीचें तक जमीन को खोदता हुआ चला जाता है
ककड़, पत्थर और अवशेषों के बाहर
निकल आने के बाद
जमीन की सासें तेज़ी से चलने लगती  है
और फिर कुछ दिन बाद माली देखता है
पत्तियों में और अधिक हरापन
फूलों में और अधिक चमक

4.

तुम्हारे भीतर ही
कुछ चीज़ें बिना तुम्हारी इज़ाज़त के  भी  चली आती हैं
जैसे अभी तुम्ने कहा
‘मैंने कभी मिट्टी नहीं चखी’
लेकिन उस वक़्त भी मिट्टी तुम्हारी ज़ुबान पर थी

5.

इस बार नए साल को
वसंत के भरोसे छोड़ दो
बहुत हुआ अब
पंडित, जन्मपत्री और हाथ की रेखाओं का लेखा-जोखा

6.

वह रोशनी के लिए नहीं
पेड़ों के लिए जंगल में आया था
रोशनी तो खुद उसके पीछे लगी हुयी थी
जैसे दुःख जीवन के पीछे लग जाता है
और फिर उसे अपना हमराही बना लेता है

7.

जब पृथ्वी पर ऐसा कुछ भी नहीं था
थोड़ी नमी भी नहीं
तब भी
आकाश में एक पक्षी उड़ रहा था
जैसे देख रहा हो धरती का मरुस्थल
और सोच रहा हो कुछ
आगे की कहानी यहीं  से शुरू होती है
जब धरती पर उम्मीद नहीं थी
लेकिन आकाश तब भी उम्मीद का एक नाम था

8.

जैसे कि कल था ही नहीं
जो कुछ है वो आज ही है
ठस
पेचीदा
कुहासे भरा
कल की उम्मीद नहीं थी
आज सम्भावना ही न   था
तब शायद  पत्थरों की पौ बारह थी
जो कुछ भी था वह पत्थर जैसा
वैसा ही नुकीला चपटा और सुगंधहीन
तभी सफ़ेद कपड़ों में कुछ लोग आये
कहने लगे कल कल कल
सब्जबागों में डूबे हम
कल से मिलने को आतुर
पर कल होता तो मिलता
जो कुछ भी था आज ही था

9.

पहली बार जब नाव ने
समुन्दर की देह को
स्पर्श किया
और उसकी देह पर उसी  झुरझुरी  का पता मुझे मिला
जो हमारे प्रेम के पहले स्पर्श की तरह ही थी
तब बचपन के दिनों में पढ़ा
लिविंग और नॉन लिविंग का भेद
खत्म हो गया

10.

इस गर्मियों में उगा वह आखिरी गेंदा  था
उसके बाद गुलदावदी  का मौसम शुरू होगा
अब बाग़ के  तेवर अलग होंगे
अब गुलदावदी,
गुलदान और जुड़े में महकेगा
गेंदे के दिन पीठ मोड़ कर आगे जा चुके होंगे

11.

वह प्रेम,
जैसे  मिट्टी के जन्म के भी पहले का था
वह मौसमों की तरह ही वस्त्र बदलता था
उसकी भी अपनी दिक्कतें थी
उसे भी गर्मी के पसीना आता था
वह भी इंसानों की तरह झूठ बोलता था
वह प्रेम था आखिर एक इंसान ही
सांस लेता,
धड़कता,
कांपता,
और धरती पर आंसू टपकता हुआ

12.

छड़ी के अंत में लगी गंदगी
कुछ और नहीं
यह जताने भर की कोशिश है
कि देह और मन की  सारी गंदगी
आपके तलवों पर इक्कट्ठी हो गयी है
इसीलिए सोने से पहले अपने पांवो को
अच्छे से धो लो

13 .

तेज़ हवाएँ,
पेड़ो का इम्तिहान है
आज, फिर पेड़
इम्तिहान से गुज़रेंगे
आज फिर  पेड़ जीतेंगे

14.

पहाड़ों को फतह  करने के लिए
तुम्हे नदी से होकर गुज़ारना होगा
और जो नदी ने अपनी आँखों के आंसूं लाते हुए
तुम्हे रोक लिया
तो तुम फतह की इच्छा को खत्म कर
वापिस मैदान की राह हो लोगे

15 .

मेरी आत्मा का कद,
प्रेम के कारण  बढ़ा
मन का आयतन,
चौड़ा किया खुशबुओं ने
देह की ऊंचाई,
अनुवांशिकी ने दी
कभी मैंने आत्मा को सीढ़ी माना
कभी मन को
और  कभी देह को
और एक दिन आसमान पर जा पहुंची
जहाँ यमराज मेरी बाट में हाज़िर पाये गए

16.

जहाँ तुम नहीं थे वहां दूर तक पसरा बंजर था
और बंजर का भी एक मौसम हुआ करता है
एक बार को तो हम
कई दिनों तक बंजर के मेहमान हो गए
तुम को लगभग भूले हुए से

17.

बाग़ के बगल से यूहीं

मत गुज़रों

फूलों  को सूँघो,

कुछ देर वहीं ठहरों

जीवन की खुश्बूंओं

को अपने भीतर यूँ जगह दो

18 . .

साँझ को जब घंटी बजाती गायें घर लौट आती है
जो जैसे जीवन फिर महकने लगता है
घर की उदासी,
अपना कोना पकड़ लेती हैं
फिर बछड़ा रम्भाता हुआ
गायों के थानों से लग जाता है
शायद जीवन में बहार  इसे ही  कहते हैं
शायद जीवन का हरापन इसे ही कहते हैं

19.

उसके दुःख की परछाई बड़ी थी
तब
वह ठीक से खड़ी भी नहीं हो पाती
और अब देखो, उसका थिरकना
सच है
ख़ुशी अपने साथ नृत्य ले कर आती है

20.

उन दिनों जब गेहूं से भूसा अलग करने के दिन थे
और दिन थे हमारे बिछुड़ने के
फिर अगला मौसम था सरसों का
लेकिन भीतर का इंतज़ार जस का तस
फिर जैसे मौसम आते है वैसे ही आये और गए
सूरज और धरती का मोह बना रहा
उसने इर्द-गिर्द चक्कर लगाना नहीं छोड़ा
इसी बीच जीवन में अपनी परतें कई बार उलट- पलट की
पर इंतज़ार जैसे पत्थर हो चला था
न उसे हवा की परवाह थी
न बारिश की
एक बार इंतज़ार पत्थर हुआ तो फिर जीवन में वापिस प्रवेश न कर सका

दलित स्त्रीवाद जैसी कोई अवधारणा नहीं है : तेजसिंह

( मंगलवार का दिन दूसरी परम्परा के लिए कई बुरी खबरों का दिन था . सुबह खबर आई कि ब्लैक अधिकारों के लिए लड़ने वाली नाबेल सम्मान से सम्मानित नदीन गोर्डिमर नहीं रहीं . फिर सुप्रसिद्ध कथाकार मधुकर सिंह और थोड़ी ही देर में सुप्रसिद्ध चिंतक/लेखक तथा ‘अपेक्षा’ के संपादक तेजसिंह के परिनिर्वाण की खबर आई . इन तीनों को श्रद्धांजलि  देते हुए हम  तेज सिंह से स्त्रीकाल के सम्पादन मंडल के सदस्य राजीव सुमन की बातचीत पर आधारित यह आलेख प्रस्तुत कर रहे हैं . यह स्त्रीकाल के ‘ दलित स्त्रीवाद अंक’ में प्रकाशित हो चुका है . )

दलित स्त्री वाद अंक देखने के लिए क्लिक करें : दलित स्त्रीवाद अंक
नदीन गोर्डिमर की ११ मशहूर उक्तियाँ पढ़ने के लिए बी बी सी के इस लिंक पर क्लिक करें : नदीन गोर्डिमर की ११ मशहूर उक्तियाँ

तेज सिंह

क्या वास्तव में दलित आंदोलन में दलित स्त्रीवाद  जैसी कोई चीज है। दलित आंदोलन तो अम्बेडकरवादी आंदोलन का हिस्सा है, क्योंकि इसकी पृष्ठभूमि में अम्बेडकरवादी आंदोलन रहा है। आप जानते हैं कि इसका महाराष्ट्र में जन्म हुआ है। महाराष्ट्र में फुले से लेकर बाबा साहब तक इसका विकास हुआ। दलित स्त्री दलित प्रश्नों को लेकर काफी बातें उठती हैं फिर भी मैं मानता हूँ कि दलित स्त्रीवाद  कोई अवधारणा  नहीं है। महाराष्ट्र में 1942 के आसपास बाबा साहब ने एक भाषण दिया था। 1942 में  नागपुर में अखिल भारतीय सम्मेलन हुआ, उसमें अनुमान था कि 75000 लोगों में महिलाओं की उपस्थिति 25000 थी। मतलब एक ऐतिहासिक सम्मेलन रहा। बाबा साहब ने उसमें महिलाओं के बारे में कुछ बातें कहीं, जिसे मैं सोचता हूँ कि दलित स्त्रीवाद  आंदोलन के रूप में दावेदारी करने वाले आंदोलन को देखना जरूरी है। बाबा साहब ने कहा कि महिलाओं का एक संगठन होना चाहिए महिलाओं की तरक्की के लिए.  दूसरी बात उन्होंने ये भी कही कि वे महिला ही हैं ,जो सामाजिक बुराइयों को दूर कर सकती हैं। उनके बिना मुक्ति सम्भव नहीं हैं। सामाजिक बुराई को दूर करने में महिलाओं की बहुत बड़ी और गहरी भूमिका रही है। उसको ध्यान में रख के हम लोग बात करें तो शायद हम उस पूरे आंदोलन को समझ सकेंगे जो महाराष्ट्र से इधर आया है। डॉ. बाबा साहब ने एक बहुत अच्छी बात कही थी कि मैं समाज की प्रगति को इस बात से नापता हूँ कि उसकी महिलाओं ने कितनी प्रगति की है। महिला की प्रगति को बाबा साहब उस पूरे समाज के प्रति देखते हैं,  ये एक बहुत बड़ी बात है।

सबसे पहले जो बंगाल में नवजागरण आया, फिर महाराष्ट्र में नवजागरण आया, वह स्त्री  केन्द्रित रहा। सबने माना है कि बिना नारी शिक्षा के बिना  समाज देश प्रगति नहीं कर सकता.  एक केन्द्रीय विचार यहाँ से उठकर आया है। नारी शिक्षित होनी चाहिए, परिवार में नारी शिक्षित होगी तो परिवार का विकास होगा। फूले बार-बार कहते रहे हैं। इसलिए फूले ने ही पहली बार उस आंदोलन को आगे बढ़ाया ,नारी शिक्षा को लेकर।
इसको हम दलित स्त्रीवाद  नहीं कह सकते, इसे नारी सुधार आंदोलन कहना उचित होगा।

हम नारी अस्मिता की बात क्यों कर रहे हैं। मैं बार-बार कहता हूँ कि जब नारी चेतना नहीं आयेगी, उसकी अस्मिता भी आकार नहीं लेगी। सामाजिक-चेतना के बिना सामाजिक अस्मिता का कोई अस्तित्व नहीं होगा। आपका समाज में अस्तित्व कैसा है, उसके अनुरूप आपकी सोच बनती है, आपकी चेतना बनती है। घर का जो ढाँचा है, उसमें उसकी नारी की स्थिति क्या है, उसका सामाजिक आधार क्या है, उससे उसकी चेतना विकसित होती है। जो आधार है, उससे उसका अस्तित्व बनता है, उससे उसकी चेतना मनोनीत होती है। नारी को समानता का अधिकार चाहिए। जो अधिकार पुरुष को मिले हैं, वो अधिकार महिलाओं को भी चाहिए। इसलिए ये पूरा-पूरा आंदोलन नारी अस्मिता को लेकर आंदोलन है।

सवाल है किये दलित आंदोलन से टकराता है कि नहीं। मैं समझता हूँ कि ये नारी अस्मिता का जो आंदोलन है,वो दलित आंदोलन से टकराता नहीं है बल्कि उसका विकास करता है। ये पूरा आंदोलन अस्मिता के संघर्ष का रहा है। 1850 से देखो, 1857 के बाद पूरे भारत में अस्मिता संघर्ष शुरू हुआ, जो प्रत्येक समाज में  दिखता है। ये पूरी शताब्दी अस्मिता-संघर्ष की शताब्दी रही है।दलित अस्मिता का सवाल भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से शुरू हुआ। पहला अस्मिता आंदोलन हिन्दू परिवार को लेकर हुआ, दलित परिवार को लेकर नहीं। हिन्दू परिवार में सती प्रथा, बाल विवाह प्रथा विधवा प्रथा आदि थीं। ये तीनों समस्याएं  उच्च वर्ग की रही हैं। ये दलित-समस्या नहीं रही है। दूसरा आंदोलन जो होना चाहिए था जाति प्रथा के विरुद्ध, उसको समाज सुधारकों ने एजेण्डा नहीं बनाया। इसके विपरीत महात्मा फुले का एजेण्डा, बाबा साहब का एजेण्डा जाति प्रथा के विरुद्ध आंदोलन करना था। बहुजन समाज का एजेण्डा जाति प्रथा का उन्मूलन करना था।

दलितवाद का अर्थ क्या निकाला जाए, आज ये शब्द कामन हो गया । 10-12 साल पहले हम लोग दलित शब्द का स्वागत करते थे। दलित शब्द और दलितवाद दोनों अलग है। दलित हमारी पहचान और अस्मिता है। दलितवाद एक व्यवस्था बन जाती है। दलितवाद कहने से दलित समाज में हीनता बोध भर जाता है इसलिए मैं दलितवाद का विरोध करता हूँ। दलितवाद से निर्बल ,कमजोर, हीनता, दीनता का भाव निकल कर आता है इसलिए दलितवाद का विरोध करता हूँ। हमारे सामने दलितवाद नहीं बल्कि अम्बेडकरवाद है जो हमें चिंतन विचार देता है। दलितवाद में परिवर्तन नहीं है, बल्कि इससे दलित समाज हीनता का भाव उत्पन्न होता है। दलितवाद उसी व्यव्स्था को स्वीकार कर लेता है. हालांकि दलित शब्द और दलितवाद में अंतर जरूर है, लेकिन मैं दलितवाद का विरोध करता हूँ।

पितृसत्ता पूरे विश्व में समान रही है,लेकिन सवाल उठता है  कि एशिया की पितृसत्ता और भारत की पितृसत्ता दोनों में अंतर क्या रहा है। बाबा साहब ने बार-बार कहा ये जो पितृसत्ता बनी, उसका बड़ा कारण रहा है। अगर हम इसको देखें आर्य समाज, वैदिक काल,  बुद्ध काल और बाद में मनुस्मृति का काल देखें तो समझ में आ जायेगा कि पितृसत्ता कैसे परिवर्तित और विकसित होती रही है। इसका एक उदाहरण हमारे सामने है रामायण का। मातृसत्ता पितृसत्ता में कैसे रूपान्तरित हो रही, इसका  रामायण का उदाहरण हमारे सामने है। शूर्पनखा की जो नाक काटी जाती है। मातृसत्ता का पितृसत्ता में रूपान्तरण हो रहा है। नाक हमेशा पुरुष-महिला के अस्तित्व प्रतिष्ठा का सवाल रही है। सीधे नाक काटने का मतलब है कि मातृसत्ता का पितृसत्ता में रूपान्तरण हो रहा है। बहुत बड़ा उदाहरण है, इसलिए पुरुष शूर्पनखा की नाक काटता है उसका अपमान करता है। ये जो रामायण का प्रसंग है,ये कहीं न कहीं मातृसत्ता से पितृसत्ता में परिवर्तन का प्रसंग है।
बाबा साहब का  एक बड़ा लेख रहा : ‘ क्रान्ति-प्रतिक्रान्ति’। इसमें बड़े विस्तार से बताया है कि वैदिक काल में आर्यों में कितनी नैतिकता रही है। यौन नैतिकता का विकास वैदिक काल और पौराणिक काल में कैसा रहा। आर्यों के समाज में नैतिकता नहीं थी, बल्कि बर्बरता और अनैतिकता थी। आर्यों के समाज में एक बड़ी प्रथा थी, बहुपतित्व प्रथा। एक स्त्री  कई पति रख सकती थी। स्त्री  किसी भी पुरुष के साथ सम्भोग कर सकती थी। सेवा कर सकती थी। बाबा साहब ने कहा,वैदिक काल में आकर इस बहुपतित्व प्रथा का बहुपत्नी प्रथा में रूपान्तरण हो जाता है। ये बड़ा अन्तर है। ये बिल्कुल उल्टा है, रूपान्तरण है। ये शुरुआत है,जहां से पितृसत्ता ब्राह्मण पितृसत्ता में रूपान्तरित होती जा रही है। यहां क्योंकि पुरुष को सब अधिकार मिल जाते हैं। वहां स्त्री  को अधिकार थे मगर यहां स्त्री जो है, वो पुरुष के अधीन हो जाती है। इस व्यवस्था को मनु ने एक संस्था का रूप दे दिया, जो राजसत्ता द्वारा संचालित की गयी है। यहां से ब्राह्मण पितृसत्ता का सही रूप सामने आ जाता है, जो संस्थागत हो जाती है. इसको राजसत्ता का सहयोग मिल जाता है,क्योंकि मनु ब्राह्मण था। बाबा साहब ने कहा कि मनुस्मृति जो लिखी गयी थी वो पुष्यमित्रा के कहने से लिखी थी मनु ब्राह्मण नहीं था, लेकिन पुष्यमित्र ब्राह्मण था, उसके कहने से ही मनुस्मृति लिखी है।

आर्यों में क्षत्रिय राजा बनता था। उसको युद्ध का अधिकार था, ब्राह्मण को अधिकार नहीं था। यहां से परिवर्तन आता है कि मनु ने इसको उलट दिया। इस पूरी व्यवस्था को मनु ने उलट दिया, यहां ब्राह्मण केन्द्र में आ गया। ब्राह्मण ही राजसत्ता के केन्द्र में आ गया। राजा ब्राह्मण ही बन सकता है। मनु ने ब्राह्मण सत्ता को सत्ता का रूप दे दिया। यूरोप में पितृसत्ता लिंग के आधार पर है। ब्राह्मणी पितृसत्ता जाति और लिंग के आधार पर है। ये बड़ा अंतर है। ब्राह्मणी पितृसत्ता में जाति और लिंग है। जो शूद्रों और नारी दोनों के खिलाफ जाती है।

दलित आंदोलन को अम्बेडकरवादी आंदोलन कहना चाहिए। उसमें दलित स्त्रीवाद जैसी कोई चीज नहीं है। उसमें स्त्रीसत्ता की बात की जा रही है। हमें स्त्री  को भी पुरुष के समान बराबर का अधिकार चाहिए। समानता का आधार,आर्थिक आधार चाहिए।  हमारी लड़ाई दलित और स्त्री  के लिए समानता और बराबरी की है। बराबरी आनी चाहिए। आर्थिक बराबरी आनी चाहिए। इसलिए ये बड़ा अंतर है। दलितस्त्रीवाद की विचारधारा कौन सी है। इसकी कोई विचारधारा नहीं है। जब स्त्रीवाद कहते हैं तो इसकी विचारधारा सामने आयेगी। दलितवाद की विचारधारा सामने आयेगी। इसलिए मैं इसको दलित स्त्रीवादन कहकर, इसको स्त्री – आंदोलन कहना चाह रहा हूं।दलित स्त्री  दलित आंदोलन से पूरी तरह से जुड़ नहीं पायी है। जुड़ना चाहिए, क्योंकि उसके लिए पहली शर्त है शिक्षा की. नारियां शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। नारियां शिक्षित हो रही हैं। महाराष्ट्र में देखें  तो नारियों  में चेतना आ चुकी है। बाबा साहब ने कहा है कि बिना शिक्षा और राजनीति के बिना बराबरी का अधिकार नहीं प्राप्त होगा,इसलिए नारियों को शिक्षा और राजनीति से जुड़ना होगा, तभी बराबरी का अधिकार आ पायेगा। नहीं तो बहुत कठिन हो जायेगा।

स्त्रीवादी आंदोलन की समस्या और दलित आंदोलन की समस्या अलग है। दोनों आंदोलन की समस्या अलग है। सवर्ण हिन्दुओं का आंदोलन सवर्ण स्त्रिायों के हाथ में है। अब दलित स्त्री   कोशिश कर रही हैं कि इस से हटकर कुछ नेतृत्व लेकर,अपनी संस्था को आगे रखें। सवर्ण स्त्रिायों के हाथ से दलित स्त्री  को नेतृत्व लेना पड़ेगा, तब जाकर दलित स्त्री  आंदोलन के साथ न्याय हो पायेगा।इसका विस्तार होना चाहिए, हमें लेखन तक सीमित न होकर इसका विस्तार करना चाहिए। हमें समाज, राजनीति,धर्मक्षेत्र आदि में जाना चाहिए। सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, साहित्यिक आंदोलन बिना राजनीति के आगे बढ़ ही नहीं सकते। इसलिए मैं बार-बार कहना चाहता हूं कि ज्ञानसत्ता, धर्मसत्ता,राजसत्ता प्राप्त करनी चाहिए। अगर हमें समाज में बराबर का अधिकार चाहिए तो ज्ञानसत्ता, धर्मसत्ता,राजसत्ता पर कब्जा करना पड़ेगा, क्योंकि हजारों सालों तक ब्राह्मणों ने इन तीनों पर कब्जा रखा है। राजसत्ता को ब्राह्मणों ने अपने हित पर सपोर्ट किया है। इसलिए ये सत्ता संघर्ष है। दलित ज्ञानसत्ता में काफी आगे बढ़ चुका है, अब धीरे-धीरे धर्मसत्ता और राजसत्ता की तरफ बढ़ रहा है। लेकिन अभी ये शुरुआत है। ज्ञानसत्ता वो है, जो चोट दे सकती है। ज्ञानसत्ता ने हमेशा धर्मसत्ता और राजसत्ता को चोटें दी हैं। ब्राह्मणों ने इसलिए ज्ञानसत्ता पर कब्जा किया। ब्राह्मणों ने पहला काम क्या किया, ज्ञानसत्ता पर कब्जा किया।

कांशीराम ने जो आंदोलन खड़ा किया, उन्होंने पूरे पक्ष को लिया। कांशीराम ने बामसेफ खड़ा किया। बामसेफ का मतलब है सामाजिक आंदोलन। कोई भी राजनीतिक आंदोलन आगे नहीं बढ़ सकता, जब तक सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन खड़ा नहीं करेगा। कांशीराम ने पहला काम सामाजिक आंदोलन खड़ा किया। बाबा साहब शुरुआत कर चुके थे, फुले शुरुआत कर चुके थे। फुले का अपना आधार है, इसको बाबा साहब ने आगे बढ़ाया। बाबा साहब ने उसको बाद में जोड़ा। कांशीराम उसको राजसत्ता की तरफ ले गये। ये पूरी चेन फुले से लेकर कांशीराम तक आयी। कांशीराम ने उस राजसत्ता का स्वाद लिया। उसको मायावती के हाथ में देकर सत्ता जगायी। जब कांशीराम मरे तो अपना उत्तराधिकारी मायावती को बनाया। उन्हें उम्मीद थी कि मायावती इसे आगे ले जायेगी,लेकिन मायावती की अपनी सीमाएं हैं। वो इस समय बाहर नहीं निकल पाती हैं। पहली बात तो कि मायावती दलित बुद्धिजीवियों पर विश्वास नहीं करती हैं। अगर उस पर विश्वास करेंगी तो आगे बढ़ सकती हैं, क्योंकि बिना बुद्धिजीवी वर्ग के कोई सत्ता आगे नहीं बढ़ सकती है. हमेशा हर आवश्यकता में बुद्धिजीवी की जरूरत होती है। बिना चिंतन के विचारधारा नहीं बनेगी। विचारधारा ही आधार देती है। मायावती ने जो नारा दिया था, बहुजन से सर्वजन, वो राजनीतिक मामला था। सामाजिक मामला नहीं है। अगर ये सामाजिक आंदोलन बनता तो बेहतर होता। राजनीतिक आंदोलन समाज से मिलता है, सांस्कृतिक आंदोलन से बनता है, लेकिन मायावती ये सब काट कर देखती हैं। तो सर्वजन का नारा देना एक राजनैतिक हिस्सा, सत्ता प्राप्ति का हिस्सा है, इससे समाज में बदलाव नहीं आयेगा। राजनीतिक बदलाव नहीं आयेगा। समाज को जोड़ना पड़ेगा, संस्कृति को जोड़ना पड़ेगा, बुद्धिजीवी को जोड़ना पड़ेगा। बिना बुद्धिजीवी वर्ग के कोई भी आंदोलन आगे नहीं बढ़ सकता है।

दलित स्त्रीवाद के सन्दर्भ में स्त्रीकाल में इन आलेखों को भी पढ़ें . लिंक पर क्लिक करें :
स्त्री विरोधी लेखन दलित लेखन नहीं हो सकता : उर्मिला पवार
दलित स्त्री आन्दोलन तथा साहित्य : अस्मितावाद से आगे
डा आम्बेडकर और स्त्री अधिकार
स्त्रीवाद के भीतर दलित स्त्रीवाद

आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा : दूसरी किस्त

रमणिका गुप्ता


रमणिका गुप्ता स्त्री इतिहास की एक महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं . वे आदिवासी और स्त्रीवादी मुद्दों के प्रति सक्रिय रही हैं . ‘युद्धरत आम आदमी’ की सम्पादक रमणिका गुप्ता स्वयं कथाकार , विचारक और कवयित्री हैं . आदिवासी साहित्य और संस्कृति तथा स्त्री -साहित्य की कई किताबें इन्होने संपादित की है. इनसे इनके मोबाइल न. 9312039505 पर संपर्क किया जा सकता है.

( हम यहाँ रमणिका गुप्ता की शीघ्र प्रकाश्य आत्मकथा सीरीज ‘ आपहुदरी’ के एक
अंश किश्तों में प्रकाशित कर रहे हैं. रमणिका जी के जीवन के महत्वपूर्ण
हिस्से धनवाद में बीते , जहां वे खुदमुख्तार स्त्री बनीं, ट्रेड यूनियन की
सक्रियता से लेकर बिहार विधान परिषद् में उनकी भूमिका के तय होने का शहर है
यह. ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ से कोयलानगरी की राजनीति को समझने वाली हमारी
पीढी को यहाँ स्त्री की आँख से धनबाद से लेकर राज्य और राष्ट्रीय राजनीति
के गैंग्स्टर मिजाज को समझने में मदद मिलेगी, और यह भी समझने में कि यदि
कोइ स्त्री इन पगडंडियों पर चलने के निर्णय से उतरी तो उसे किन संघर्षों से
गुजरना पड़ता रहा है , अपमान और  पुरुष वासना की अंधी गलियाँ उसे स्त्री
होने का   अहसास बार -बार दिलाती हैं. उसे स्थानीय छुटभैय्ये नेताओं से
लेकर मंत्री , मुख्यमंत्री , राष्ट्रपति तक स्त्री होने की उसकी औकात बताते
रहे हैं . ६० -७० के दशक से राजनीति के गलियारे आज भी शायद बहुत बदले नहीं
हैं. इस आत्मकथा में अपनी कमजोरियों को अपनी ताकत बना लेनी की कहानी है
और ‘ हां या ना कहने के चुनाव’ की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष की भी कहानी
है. इस जीवन -कथा की स्त्री उत्पीडित है, लेकिन हर घटना में अनिवार्यतः
नहीं.   इस आत्मकथा के कुछ प्रसंग आउटलुक के लिए रमणिका जी के साक्षात्कार
में पहले व्यक्त हो चुके हैं.  )

पहली किस्त  पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें : (आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा : पहली क़िस्त  )

धनबाद पहुँचने के बाद
जब हम हीरापुर में कप्तान साहब के साथ रहते थे, तो कार्यालय के सामने प्रायः हर रोज़ या दूसरे-तीसरे दिन जुलूस निकला करते थे और चारों तरफ जिंदाबाद-मुर्दाबाद के नारे सुनाई देते थे। ये मुर्दाबाद मालिकों के लिए होता था और जिंदाबाद मजदूर एकता या मज़दूरों के लिए जेल जाने वाले, मार खाने वाले या आन्दोलन में मारे गये नेताओं के लिए। यानी पूरा माहौल गरम रहता था। हवा में गरमी, आवाज़ों में तल्ख़ी और बगल के कोयला खदानों में आग लगी होने के कारण शहर के वातावरण में भीषण ताप, उमस और जलन। ये गरमी केवल गरमी नहीं थी। इस गरमी में जलन थी तो खुन्नस भी थी। कभी-कभी ये गर्मी बदबूदार हो जाती थी,खून की बू भरी हवा से। कई तरह के रहस्यों से लदी-फदी थी धनबाद की हवा, जिसमें तैरती रहती थीं,सच्ची-झूठी अफवाहें और किस्से-कहानियाँ। कई तरह की कहानियां ,कभी कनफुसकियों में, तो कभी लाउडस्पीकरों पर चिल्ला-चिल्ला कर बार-बार सुनाई जाती थीं। लगता था जैसे सब आपस में टक्कर मार रहे हैं। द्वन्द्व ही द्वन्द्व था। षड़यंत्र , योजना, हत्या, दहशत, विरोध,  प्रदर्शन  और घेराव का माहौल! उस विराट लेकिन कड़े-कड़क विरोध ने, विराट संघर्ष ने,मेरे मन के दरवाज़े पर भी दस्तक दी,और मेरे मन के बन्द दरवाज़े को खटखटाया। शायद मन की परतों में दबी मुक्ति की इच्छा दस्तक सुन ले और चैखट उलांघ जाए। चारों तरफ से हर रोज़ एक नया परिवेश  सर उठाए चला आता था, जो दहशत को तोड़ कर मुक्ति के लिए छटपटाता नज़र आता था। इस मुक्ति की छटपटाहट में शहीदाना अन्दाज था, तो प्रेम और आस्था की विराटता और उदारता भी थी। इस अन्दाज़ के तीन पहलू थे! मैंने प्रेम के पहलू से शुरुआत की। शायद इसलिए भी कि प्रेम करने से वर्जित स्त्री  के लिए प्रेम की छूट ही मुक्ति की तरफ पहला सोपान होता है। बाकी तो वह फिर स्वयं अर्जित कर सकती है। दरअसल प्रेम से देह का नाता है और प्रेम करने के लिए स्वतंत्रता का अर्थ ही है देह  पर स्त्री  का अपना अधिकार होना। यह परिवेश  मुझे प्रेम का एक नया रूप निर्मित करता हुआ नज़र आता था।

बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री के बी सहाय जो अपने ख़ास लोगों से सुबह चार बजे मिलते थे , महिलाओं से भी

मजदूरों के अभाव और शोषण  व माफिया, लठैत, गुण्डे, पहलवानों से मुक्ति की छटपटाहट, उनके पर्चों, पोस्टरों में प्रायः पढ़ने को मिल जाती और मिल जाती थीं उनकी माँगे, जीने की मामूली, पर जरूरी शर्तें। व्यवस्था, डर और दहशत से मुक्ति की चाह, उनके जीने के लिए जरूरी थी। प्रेम के विकास, विस्तार, विराटता और उदात्तता के लिए भी तो जरूरी है,मुक्ति की छटपटाहट। सम्भवतः मैंने अपने जीने की, अस्तित्व की चाह को प्रेम से जोड़ कर देखना शुरू कर दिया था। मुझे दोनों एक-दूसरे के पर्याय लगने लगे थे। अस्तित्व के लिए प्रेम जरूरी है और बिना अस्तित्व प्रेम हो ही नहीं सकता। देह ही तो माध्यम है अस्तित्व का। वह प्रेम करे,संघर्ष करे या संभोग, देह की दरकार तो पड़ती ही है।सवाल यहीं पर पेचीदा हो जाता है कि अपनी देह की संचालक स्वयं स्त्री हो या कोई अन्य। जब तक स्त्री  ‘अन्य’ से संचालित होती है,कोई रार या विवाद नहीं होता। यह तो जब स्त्री  अपनी देह का संचालन स्वयं करने लगती है या उसका उपयोग अपने हित के लिए करती है, तो सब तरफ प्रश्न चिह्न  उठ खड़े होते हैं। तब नैना साहनी तंदूर में जला दी जाती है।

जब हम धनबाद पहुँचे ,उन दिनों वहाँ एक दबंग पंजाबी कोलियरी मालिक सुण्डा का मामला गर्म था। उसकी बंगाल तक में खदानें थीं। उसने मज़दूरों पर गोली चला दी थी। पुलिस, प्रशासन और पूरा श्रम विभाग, बी.पी. सिन्हा के प्रभाव में उस मालिक को बचाने के लिए जुट गया था। मालिक पंजाबी था। हमारे घर में यह बहस काफी दिनों तक चलती रही थी। प्रकाश  दुःखी था कि उसे न तो हस्तक्षेप करने दिया जा रहा है न ही बोलने! या कहें उसके सीनियरों के सामने उसका वश  नहीं चल रहा था। सारा मामला कैप्टन रंजीत सिंह, जो मुख्य श्रमायुक्त थे खुद ही डील कर रहे थे। वे बी.पी. सिन्हा के घनिष्ट मित्रा थे। बी.पी. सिन्हा कोलियरी मालिक सुण्डा को बचाने पर ज़ोर दे रहे थे। पुलिस तो मालिक के साथ थी ही ,सत्ता और श्रम विभाग भी बी.पी. सिन्हा के चलते मालिक का साथ दे रहे थे ।

कुछ दिनों बाद हमें लेपो रोड स्थित, धनबाद माइन्स बोर्ड के आफिस के पीछे वाली गली में घर मिल गया था। ऐसे तो प्रकाश  ने कुछ कवियों और शायरों से सम्पर्क कर लिया था चूंकि वह खुद भी शायरी करता था ,लेकिन फिर भी गाहे-बगाहे कभी हम उनके यहाँ और कभी वे हमारे यहाँ आने-जाने लगे थे और घर में ही छोटी-मोटी कवि गोष्ठियां  या शायरों की मजलिसें जमने लगी थीं। मेरी नृत्य-नाटिकाओं के अभ्यास भी शुरू हो गए थे। मैंने खदानों के सुरक्षा-दिवस पर एक नृत्य नाटिका तैयार की थी, जिसे हमें कई खदानों  में प्रदर्शित करना था। उसके लिए कलकत्ता से भी कुछ कलाकार हमने बुला लिये थे। नायिका का रोल मैं कर रही थी लेकिन साथ में एक और अभिनेत्री तथा अभिनेता और उनकी टीम को भी कलकत्ता से बुला लिया गया था। एक बंगाली दादा हमें तबले पर संगत देते थे। हमारा घर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का अड्डा बन गया था। हमारे आंगन में नाटक और नृत्य की रिहर्सल होती थी। ऐसे भी मेरी कविता और मेरे नृत्य की चर्चा काफी होने लगी थी। मैंने चीन की लड़ाई में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था।मेन रोड यानी लेपो रोड पर गली के ठीक सामने ‘कोलियरी मजदूर संघ’ की यूनियन और कांग्रेस का कार्यालय था और थोड़ी दूर पर एस.पी. का बंगला था। एस.पी. के बंगले के बाहर और बगल में कांग्रेस आफिस के बीच कुछ जमीन खाली थी। सड़क के उस पार लक्ष्मीनारायण ट्रस्ट द्वारा बनवाया हुआ लड़कियों का बी.ए. तक का कालेज था। इसी रोड पर कांग्रेस ऑफिस  के आगे जाकर धनबाद का जिला सचिवालय था और सरकारी अफसरों के बंगले थे। ये सरकारी अफसर हमारे घर कवि गोष्ठियों  में शामिल होने लगे थे। जिला बोर्ड के अधिकारी हों या रेवेन्यू के अधिकारी, जो कविता में रूचि रखते थे हमारे यहाँ आते थे। कई पत्राकार भी आते थे। मैंने अपनी गतिविधियाँ समाजसेवा के कार्य में भी बढ़ा ली थीं। मैं भारत सेवक समाज से भी जुड़ गई थी ,ताकि गाँव तथा शहर में स्त्रियों के लिए अतिरिक्त आय का जरिया बनाने और उन्हें तथा उनके बच्चों को शिक्षित करने के लिए कुछ किया जा सके। रेवेन्यू के अधिकारी तो मुख्यमंत्री के.बी. सहाय के रिश्तेदार  भी थे। वे अच्छे कवि थे, पर प्रेम, प्रकृति और सौंदर्य ही उनका विषय  था। मेरी उनसे बहुत पटती थी। प्रकाश  को वे पसन्द नहीं थे। पता नहीं कैसे एक दिन हम एक-दूसरे को कविता सुनते-सुनाते करीब हो गए। मैं हर रोज़ उन पर कविता लिखती,वे मुझ पर। लेपो रोड पर ही उनका बंगला था। कभी मैं उनके घर चली जाती तो कभी वे हमारे घर आ जाते।

तारकेश्वरी सिन्हा , ६० के दशक में एक कामयाब महिला राजनीतिज्ञ , जिनकी खूबसूरती की चर्चा तब की राजनीति का एक हिस्स्सा थी

इस घर के ऊपर  वाले कमरे, सड़क के लेवल में थे और आंगन सीढि़यां उतर कर नीचे था। दरअसल ये एक ढालू पहाड़ी रास्ता था और ढलान के अनुसार ही घर बना हुआ था। नीचे का आंगन खूब बड़ा था। आंगन के बाहर एक बगिया भी थी और गाड़ी रखने का एक गैराज भी। उसके थोड़ी दूर हटकर एक बस्ती थी, जिसमें स्थानीय लोग रहते थे लेकिन माइन्स बोर्ड के कुछ कर्मचारी भी किराये का घर लेकर वहाँ रह रहे थे। बाद में जाकर जब मैंने समाज सेवा करनी शुरू की, तो इस गैराज में मैंने गरीब महिलाओं को सिलाई सिखाने के लिए एक स्कूल खोल दिया, जिसमें मोहल्ले भर की महिलाएं निःशुल्क सिलाई सीखने आती थीं। यहीं से मेरे सामाजिक सरोकार शुरू हुए। मैं कविता, नृत्य और नाटक के दायरों का विस्तार कर फैल गई थी और समाज से जा जुड़ी थी, पर यहाँ आकर मेरी कविता भी सामाजिक सरोकारों से जुड़ गई। उन्हीं दिनों मैंने अपनी पहली कविता लिखी, ‘मेरी कविता का विषय  बदल गया है’.

‘आज मेरी कविता का विषय बदल गया
उसके स्वरों में गूँजती है
मशीनों की घर्र-घर्र
उसके भावों को बींध रहा है
बार-बार
मशीनों की चल रही निरन्तर सूई  पर
टिकी
किसी महिला की एकटक दृष्टि  का
गहन-तार
उसके छन्द आज
घूमती रील की गत्ते की चकरी में
थिरक रहे हैं

आज सज्जन  हो रहा है
उन गीतों का
जो बन जाते हैं प्रश्न
जीने और मरने के
इस गंदे सीलन से भरे गैरेज में
पेट के
भूख के
रोटी के
पैसे के गीत रचे जा रहे हैं
आज कविता को मिला है
नया दर्द
प्यार का नहीं
आशा  का
कुछ कर पाने का/और
सफलता की इच्छा का दर्द

आज मिला है
कविता को
नया साधन
कल्पना का नहीं
संघर्ष का!’

मेरी कविता जनसरोकारों से जुड़ती रही और जनता की बोली बोलने लगीं। सौंदर्य के प्रति मेरा अटूट मोह था। मैंने उसे जिन्दा रखा,मरने नहीं दिया। इन्हीं दिनों मेरे गीतों में प्रकृति  और सौंदर्य से लगाव, पलाश  में लाल रंग की तरह पुरजोर फूटा। जंगल के जंगल लाल-लाल हो लहलहा उठे थे लगाव के इस रंग से। इन गीतों-अगीतों से मेरी एक पुस्तक ‘गीत-अगीत’ तैयार हो गई थी। हालांकि पहले मैं ज्यादा प्रेम या प्रकृति -परक कविताएं या गीत लिखा करती थी लेकिन धनबाद में आकर मैंने चीन की लड़ाई से खुद को जोड़ा, तो देश -प्रेम की बहुत सी कविताएँ लिखीं। भगत सिंह को चीन युद्ध से जोड़कर ‘कल मैंने एक सपना देखा’ लिखी तो राम को अकाल से जोड़कर ‘हाय राम भूखा है’। मेरे मानस में सौंदर्य, प्रकृति , जनसरोकार, देश  प्रेम और शौर्य  कुछ इस तरह गुत्थमगुत्था हो रहे थे कि मुझे प्रकृति  में जन और जन में संघर्षनज़र आने लगा और संघर्ष में सौंदर्य! सौंदर्य भी संघर्षरत  ही दिखता और पृकृति  भी। ‘कौन प्रिय तुम कालिन्दी पर’ गीत में भले ही मैंने प्रकृति  के कई कोमल रूपक रचे, लेकिन वे चांदनी से जलती चिता तक छलांग लगाते हैं, तो गन्ध से मन की ग्रन्थियों को भी छू आते हैं। तुलसीदास को भी मैंने दूसरे ही अन्दाज़ में लिखा। वैचारिक और सौंदर्य की कविताओं के अतिरिक्त, मजदूर, किसान, यहाँ तक कि नर्स, होमगार्ड, जिसने भी मुझे प्रभावित किया, मैंने कविताएं लिख डालीं। लोहिया पर कविता लिखी तो नेहरू और गांधी पर भी। शायद मेरी कविता का यह पहला पड़ाव था। इस बदलाव के दौरान मेरे भीतर प्यार की प्यास और चाहत कभी कम नहीं हुई। प्रकृति  ने तो इसके उद्दीपन का ही काम किया। मेरा प्यार मन की हदें पार कर देह की हदों को भी टोहने के लिए आतुर रहने लगा या कहूँ ललकने लगा था। उसे भी मैंने कविता का विषय बनाया।

प्रभात रंजन सरकार , आनंद मार्ग का प्रणेता , तब की राजनीति में इस
स्वयम्भू बाबा की बड़ी पैठ थी . आनंद मार्गी बाबाओं के राजनीति पैठ का
वासनात्मक इतिहास इस आत्मकथा में शामिल है

कविता मुक्त हो रही थी मेरी। मैं गीतों से हटकर अतुकान्त कविताओं पर उतर आई थी। विषय विशाल हो रहा था, दृष्टि  बन रही थी, अपनी दिशा  खोज रही थी मैं। इसलिए कविता भी कई दिशाओं से होकर, कई भूल भुलैयाओं को पार करते हुए मेरे साथ-साथ भटक रही थी। कभी फुनगी पर चढ़ रही थी, तो कभी जड़ों से लिपट रही थी। कविता के कई दरवाजे़ खुल रहे थे, तो सोच की खिड़कियां भी खुल रही थीं। नये अनुभव,,नये विचार, उमड़-घुमड़ कर आ रहे थे,बरस रहे थे,उनकी बौछारों से भीग रही थी मैं। कभी नए अनुभवों की लहर पर लहर चढ़ी चली आती थी मेरे मानस के समुद्र में तो कभी हरहरा कर अनुभवों की बाढ़ उपजाउ  मिट्टी भर जाती मेरी नदी के पाड़ में। यह मेरी कविता की उड़ान थी। कविता की खेती के लिए भरपूर उर्वर जमीन थी।
मैं कविता में रम गई, रच-बस गई। नृत्य का अभ्यास जारी रखा। प्रकाश  खुद भी शायरी करता था। सो पहला मज़मा तो हमारे यहाँ शायरों और कवियों का लगने लगा। उसमें कुछ पत्रकार भी आ जाते थे। कुछ बिहार सरकार के आफिसर भी आते थे, जो कविता का शौक  रखते थे। हिन्दी के बड़े कवि सम्मेलनों में मैंने अपनी कविता पढ़नी शुरू कर दी थी। ऐसे भी स्त्रियों को लोग प्रोत्साहित करते ही हैं,बल्कि यूँ कहा जाए लोग कवयित्रियों के ज्यादा ही नज़दीक आने शुरू हो जाते हैं।

चीन के युद्ध में जाने वाले सिपाहियों के लिए मेरी कविता ‘रंग बिरंगी तोड़ चूडि़यां हाथों में तलवार गहूँगी/ मैं भी तुम्हारे संग चलूंगी, मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगी’’, काफी मशहूर हुई। जब मैंने कप्तान रंजीत सिंह के साथ रानी झांसी के रूप में डेब्यू  किया और धनबाद से झरिया तक यह कविता पढ़ते हुए गई, तो 60 हजार के करीब चन्दा मेरी झोली में आया, जो सरकारी खजाने में जमा करवा दिया। लड़कियों के कॉलेज  में भी मैंने कॉलेज  की लड़कियों को नृत्य  का प्रशिक्षण दे कर चन्दे के लिए नृत्य  शो  किए और करवाए जिससे भी काफी पैसा जमा हुआ। फिर तो मुझे चीन पर एक अलग से कवि सम्मेलन बुलाने का प्रस्ताव ही मिल गया,जिसमें देश –विदेश  के कवि आए और युद्ध, देश  प्रेम एवं शौर्य  की कविताएं पढ़ी गईं।

राजनैतिक स्तर पर मैं कांग्रेस से जा जुड़ी। मुख्यमंत्री  के.बी. सहाय के जन्म दिवस पर मैंने अखिल भारतीय कवि सम्मेलन के आयोजन की घोषणा  कर दी, जो बी.पी. सिन्हा को बहुत खली। पर मैंने अपने बल पर भारत भर के कवियों को बुलाया,चन्दा करके खर्च जुटाया। इसमें काका हाथरसी, जानकी बल्लभ शास्त्री , हँस कुमार तिवारी, गोपाल सिंह नेपाली तथा बहुत से युवा कवि आए, जो मंच पर बहुत ही जमे। बी.पी. सिन्हा नाराज़ थे कि मैंने कैसे के.बी. सहाय को बुलाने की हिम्मत की। के.बी. सहाय तो केवल उन्हीं के बुलाने पर आते थे। खैर जाते-जाते के .बी. सहाय ने मुझे कहा,
‘‘पटना आओ,जो मदद चाहिए मिलेगी।’’
सब कांग्रेसी स्तब्ध थे।
‘‘ये कल की आई औरत को मुख्यमंत्री  ने कैसे घास डाला? हम तो बरसों से लाइन में हैं? बिना साहब (बी.पी. सिन्हा) के पूछे वे तो किसी नेता से बात नहीं करते थे? ये सीधे बतिया ली वह भी मुख्यमंत्री से!’’ बौखला कर वे कहते।
खैर, कवि सम्मेलन चर्चा का विषय बन गया। उन दिनों वहाँ श्री धनोआ डिप्टी कमिश्नर  थे।
‘‘इस राजनीति में मत पड़ो,खतरा है।’’ उन्होंने मुझे बुला कर समझाया।
मैं कुछ समझी, कुछ नहीं समझी और कुछ जानबूझ कर भी नहीं समझने का नाटक करती रही। मैं जान रही थी मेरा के.बी. सहाय से सीधे बात करना गॉडफादर  को बुरा लगा है। खैर चीन के चन्दे का मामला था,लोगों ने ज्यादा दखल नहीं दिया।प्रशंसकों  से अधिक मेरे शत्रु  बन गए थे। वे प्रशंसकों  की बनिस्बत ज्यादा ताकतवर थे।

पूर्व प्रधान मंत्री वी पी सिंह और महाश्वेता देवी के साथ रमणिका गुप्ता एक सभा में

बी.पी. सिन्हा के साथ एक भूमिहार डी.एस.पी. सी.आई.डी. भी था जो लोगों को फेवर करके या डरा-धमका कर बी.पी. सिन्हा के गुट में रखता था। उसने मुझे अपने काबू में लाने के लिए सतीश  चन्द्र पत्रकार से कहकर प्रकाश  के खिलाफ अखबारों में छपवा दिया था कि प्रकाश  की उर्दू शायरी का रिश्ता पाकिस्तान से है। उसने प्रकाश  के खिलाफ यह भी प्रकाशित करवाया कि वह अपनी पत्नी को इंश्योरेंस   की एजेंसी दिलवा कर और मालिकों पर प्रभाव डालकर पालिसी  दिलवाता है और पैसा बनाता है। यह सही था कि मैंने इंश्योरेंस की एजेन्सी ले रखी थी,पर प्रकाश  के कहने पर नहीं,खुद स्वावलम्बी होने के लिए। और तब तक एक भी पालिसी साइन नहीं हो पाई थी। फिर तो मैंने एजेन्सी ही छोड़ दी। प्रकाश  के क्लाइंटों से तो मैं कभी बात भी नहीं करती थी। दरअसल यह सब मुझे धमकाने और पाने के लिए किया जा रहा था। धनबाद की संस्कृति में यह आम बात थी। मैंने उसकी शिकायत उन दिनों राज्यसभा सदस्य, जो एक बंगाली थे, से भी की और धनबाद कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष रंगलाल चैधरी से भी। एक दिन तो वह आधी रात को हमारे घर आ धमका। अपने नौकर नेपाल से मैंने कह रखा था,‘कुछ गड़बड़ हो तो, मेरे आवाज देते ही तुम अन्दर आ जाना।’ उस रात तो वह कामयाब नहीं हुआ, पर एक दूसरे मौके पर उसने मुझे वश  में कर ही लिया था। खैर, मैंने उसकी काफी शिकायत की और यह भी तय किया कि प्रकाश  अपना तबादला करवा ले। उन दिनों प्रकाश  जगजीवन नगर के घर में रहने लगे थे, चूंकि वे श्रम विभाग छोड़ कर वेल्फेयर डिपार्टमेंट में को-ऑपरेटिव सोसायटी, जो कोलफील्ड के पूरे कोयला क्षेत्र के लिए बनी थी,के अधिकारी बन गए थे।

इसी बीच मैंने सिलाई स्कूल के लिए जमीन के लिए जिला बोर्ड में अर्जी दे दी थी, जिसके अध्यक्ष शंकर दयाल सिंह थे। बागे साहब, एक आदिवासी मंत्री  थे, जो हमारे बड़े मददगार थे। दूसरी जमीन एस.पी. के घर के बाहर थी उसकी अर्जी भी मैं दे चुकी थी। वह हमें जल्दी मिल भी गई। भारत सेवक समाज के अध्यक्ष ने हमारे स्कूल को भारत सेवक समाज के तहत एक शाखा बना दिया। सरकारी ग्रान्ट मिल गई और उस पर बिल्डिंग भी हमने बनवा दी जो आज भी मौजूद है। उसमें अब एक कॉलेज  चल रहा है। उन्होंने मुझे भारत सेवक समाज की धनबाद जिला शाखा की संयोजिका बना दिया। बहुत सी स्त्रियां भर्ती हो गईं और सिलाई सीखने लगीं। उधर सोशल वेल्फेयर बोर्ड ने मुझे धनबाद की शाखा का चेयरमैन बना दिया और मैंने चार गाँवों में महिला प्रशिक्षण केंद्र एवं बालबाडि़यां खोल दीं। अकाल के दिनों में हमारा धैय्या गाँव का सेन्टर तो अकाल पीडि़तों के लिए राहत का एक बड़ा सेन्टर बन गया था। अब हमारे चार सेक्टर चल रहे थे चार गाँवों में। मैंने नये सचिवालय के कार्टरों वाली बालबाड़ी में अर्चना को शिक्षिका के पद पर पदस्थापित कर दिया था। इसे अर्चना सफलतापूर्वक चला रही थी। सभी किरानियों व आफिसरों के बच्चे वहाँ पढ़ने आते थे। मेरी बेटी तरंग भी उसी में पढ़ती थी। एस.पी. के बंगले के बाहर बनी बिल्डिंग में महिला प्रशिक्षण केंद्र चल रहा था, जिसमें 150 महिलाओं को किश्तों पर मशीनें खरीद दी गई थीं, जिसे वे आर्डर के कपड़े सिल कर, किश्तों  में उतारती थीं। डांगरियों का आर्डर हम सिन्दरी खाद फैक्ट्री से ला देते थे। ये डांगरियां ट्रेनिंग के छात्रा पहनते थे। आठ आना एक डांगरी की सिलाई मिलती थी,कपड़े काटने वाला एक दर्जी अलग से रख लिया गया था। महिलाएं कटा कपड़ा ले जाकर घर से सीकर ला देती थीं। दर्जी हीरापुर का ही एक युवा लड़का था, जिसके पिता की हीरापुर में दर्जी की छोटी-मोटी दुकान थी।

मेरी समाज सेवा की योजना चल रही थी। चीन की लड़ाई में मैंने, प्रकाश  ने और एस. पी. की पत्नी समेत, हमारे कई मित्रों ने ‘सेल्फ डिफेंस’ की ट्रेनिंग ली। मैं तो नागपुर जाकर सिविल डिफेन्स  का कोर्स भी कर आई थी। मैंने बन्दूक व जीप चलाना भी सीख लिया था। उस कोर्स में मुझे डिस्टिंक्शन भी मिली थी।
नागपुर से लौटकर मैं पटना जाकर मुख्यमंत्री के.बी. सहाय से मिली।

मेरी प्रेम-यात्राएँ : मुक्ति की छटपटाहट

मेरी प्रेम यात्राओं को ऊंचा  आयाम मिल गया। पीछे मुड़कर देखती हूँ तो महसूस होता है,मैंने जिन्दगी को भरपूर जिया। तुमुल कोलाहल-कलह के बीच भी मैंने अपने मन को कभी बनवास नहीं दिया। मेरी प्रेम-यात्राएं कभी रुकी नहीं। कच्छ यात्रा, विधान-परिषद की सदस्यता या विधानसभा के लिए चुनावी यात्राएं अथवा केदला-झारखंड की कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण  आंदोलन के लिए लंबी हड़तालें, आदिवासियों, दलितों और किसानों के विस्थापन, महिलाओं को ‘डायन’ कहकर मारने का विरोध या प्रेम-विवाहों का विरोध करने वालों को आड़े हाथों लेने की संघर्ष-यात्राओं के बरक्स, ये प्रेम-यात्राएँ भी चलती रहीं। उन्हीं की दास्तान यहाँ बयान करने की कोशिश कर रही हूँ।ये अंतरंग क्षणों की यात्राएं थीं जिसमें सहमति, असहमति, प्रेम, घृणा , दुविधा और संकल्प सब गड्डमड्ड थे। बचपन के कुछ हादसे शायद मेरे अंतर्मन में कहीं ऐसे पैठ गए थे कि मैं उनसे उबर नहीं पा रही थी। मैं यौन-शोषण , यौन-इच्छा या इसके कारण अपराध-बोध में झूलती हुई, एक रास्ते की तलाश  में थी कि अगली यात्रा पर निकल सकूं और एक दिन मैं यात्रा पर निकल पड़ी। गांधी जी की मृत्यु  के बाद उनके शवदाह में भाग लेने के लिए अंबाला से दिल्ली की ओर ट्रक में बैठ कर हम मामा-मामी तथा उनकी माँ के साथ चले, जिसमें प्रकाश  हमारे साथ गए। ये थी अपने घर में हो रहे यौन-शोषण  से निजात पाने की मुहिम को अंजाम देने की यात्रा या  यह मेरी दूसरी प्रेम  यात्रा की शुरुआत थी।

बचपन में कदम-कदम पर दैहिक शोषण  झेलती मैं इस मुकाम पर पहुँची थी। फिर प्रेम की कई सफल-असफल यात्राओं से गुजरती हुई मैं प्रेम-विवाह की हद तक पहुँच गई थी, जो मेरे संघर्शों की एक लंबी कथा है। विवाह से पहले ही मैंने अपने पहले प्रेम-प्रसंगों, पुराने संबंधों को परत-पर-परत खोलकर प्रकाश  के सामने रख दिया था और अपने दैहिक उत्पीड़न की कथा भी कह सुनाई थी। मैंने सोचा था कि बचपन में झेले इस डरावने दैहिक शोषण  का दौर खत्म हो जाएगा और विश्वास  और प्रेम के डग भरते हुए हम जिंदगी की मंजिल तय कर लेंगे। किंतु मुझे क्या पता था, मन के भेद खोलना ही मन-भेद का कारण बन जायेगा और शंका -ईश्र्या से भरा प्रकाश  मेरी उस निर्भय, निडर, मुक्त औरत के प्रेम की यात्रा में एक भारी-भरकम बोझ बनकर मुझ पर लदक जायेगा। गले में पड़े ढोल को बजाने की हम दोनों की पूरी कोशिश के बावजूद हमारे ताल-लय-सुर मिल न पाए। फिर मैंने यह सोचकर कि बेहद वफादार रहने पर भी जब मुझ पर शंका  ही होती है तो मैं क्यूँ न स्वनिर्मित बांध तोड़कर मुक्त नदी-सी बह चलूं? और मैंने सब बांध तोड़ डाले। बांध का जल सड़ने लगा था। बह जाने पर खेत उर्वर तो हो ही जाएंगे, भले बांध से सटे खेत ढह जाएं। गृहिणी की यात्रा पर विराम लग गया। चैराहा मेरे सामने था। लौट नहीं सकती थी, चूंकि प्रेम-विवाह किया था। शिकायत किससे करती? क्या हक था मुझे शिकायत करने का? मैंने अपनी मर्जी से विवाह रचाया था। इसलिए पापाजी, बीबीजी से कभी शिकायत नहीं की मैंने और न ही प्रकाश  को उनसे शिकायत करने की इजाज़त दी। ‘‘अपना मामला हम दोनों को ही सुलझाना होगा चूंकि हमने खुद से यह रिश्ता  जोड़ा है। इसलिए हम खुद ही अपने फैसले करेंगे।’’ मैंने प्रकाश  के थप्पड़ों का जवाब थप्पड़ों से देना शुरू कर दिया था।

संसद में ३३ % आरक्षण की मांग , शायद स्थिति में तब फर्क आये

तीसरी यात्रा शुरू  हुई फरीदकोट में, जिसमें कई ऐसी पगडंडिया थीं जो अंधी गलियों में बदल जाती थीं। कुछ तो दूर तक जाकर चैराहे बन गईं और कुछ कई तंग गलियों का मुहाना। यह यात्रा लक्ष्यहीन थी या कहूँ लक्ष्य की खोज की यात्रा थी। शायद कुछ हद तक यह भी सच है कि मुझे लक्ष्य ही नहीं मालूम था। एक बंधन, जो मैंने स्वयं गले में डाला था, उससे मुक्ति की छटपटाहट में कभी आगे, कभी पीछे बढ़ते-हटते कदम। शायद स्वच्छंदता की खोज या बंधनों की ऊब, पांव टिकने नहीं दे रही थी। चूंकि प्रचलित रास्तों से ये भिन्न रास्ता था, इसलिए झाड़-झंकार से लहूलुहान भी हो रही थी मैं। हर रास्ता प्रेम का रास्ता नजर आता था, पर प्रेम नहीं था वहाँ। बस एक ललक थी।

कई अंधी गलियों में जाकर माथा पटकती रही, लौटती रही फिर भी मैंने पढ़ाई नहीं छोड़ी। एम.ए. कर लिया फिर बी.एड. भी कर ली। मैं नौकरी करने के काबिल तो हो गई थी, पर मैंने अपने जीवन में आज तक तीन महीने छोड़कर, कभी नौकरी नहीं की। अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए भी  कईयों से मेरे रिश्ते  बनते-बिगड़ते रहे। यह यात्रा भटकाव की यात्रा थी। बैले नर्तकी बनने शौक  था मुझे, पर मैंने सीखा मद्रास (चन्नई) में गौरी अम्मा की एक शिष्या  से भरतनाट्यम और मुंबई में गोपीकृष्णा  से कथक।कई सच्चे, कई वक्ती मित्र आए और गए, पर मेरी यात्रा जारी रही। दरअसल तब तक मैं यह समझ न पाई थी कि यह जद्दोजहद मेरी अस्मिता की ललक का अंग है। पहचान (IDENTITY ) यानी ‘मैं हूँ’. प्रकाश  की पत्नी नहीं, कर्नल की बेटी नहीं, दीवान साहब की नातिन नहीं, गुरुओं की पौत्री नहीं, मैं रमणिका हूँ। लोग मुझे पहचानें, खुद मुझे, बस,किसी से जोड़कर नहीं जानें! यह धुन मुझ पर सवार हो गई थी। शायद इसी पहचान के चक्कर में मैं जोखि़म उठाती रही। बचपन में अभिनय का शौक था। कई नाटक भी किए व्यवस्था के खिलाफ। आजादी की लड़ाई में सुभाष, जयप्रकाश  और अरुणा आसफअली से मैं बहुत प्रभावित रहती थी, इसलिए राजनीति की यात्रा भी मेरी प्रेम-यात्रा के साथ-साथ जारी रही। चैदह वर्ष  की आयु में मैंने खादी पहननी शुरू  कर दी थी जो शादी  के काफी बाद छोड़ी थी।

इस बीच की अंधी गलियों की दौड़ के बाद, मैंने राजनीति की राह की तरफ समाज-सेवा और साहित्य के दरवाजे से होकर रुख किया। मुझे साहित्य सदैव प्रिय था। लेखनी चलती ही रहती थी पर दिशा  निश्चित  नहीं थी। कभी प्रेम तो कभी प्रकृति । कभी अकाल तो कभी चीन का युद्ध या फिर पत्तल चाटते भिखारी मेरी कविता का विषय  बनते रहे। पर प्रकृति  का अटूट मोह भी षब्दों को अपनी गिरफ्त में लेने से नहीं चूका।
धनबाद में मैंने कला, साहित्य, समाज-सेवा और राजनीति के दरवाजे एक साथ खोल दिए। मैं चल पड़ी थी संघर्श की उन राहों पर, जो एक-दूसरे की प्रेरक थीं, एक-दूसरे से ऊर्जा लेती थीं। अपने प्रेम-संबंधों से या जबरन थोपे जाने वाले प्रेम-संबंधों से या उसकी खिलाफत करने की अपनी ऊर्जा से, मैंने जोखि़म भरी राजनीति की राह चुनी और यह मेरी प्रतिबद्धता की मानसिकता से जुड़ गई। नृत्य  और नाटक चीन की लड़ाई में चंदा करने के लिए किए तो उस मुहिम में कविता ने मेरी जिह्वा  पर बैठकर जन-मानस से धन-जन-बल तीनों जुटाए।
राजनैतिक स्तर पर मैं कांग्रेस से जा जुड़ी। मुख्यमंत्री  के जन्म-दिवस पर धनबाद में बड़ा कवि-सम्मेलन करवाया। हजारों लोग जुटे। बड़ा शामियाना था और सबकी उम्मीदों के खिलाफ एक नामी श्रमिक नेता, जो मुख्यमंत्री के दाहिना हाथ कहलाते थे,के विरोध के बावजूद, मुख्यमंत्री मेरे द्वारा आयोजित कवि-सम्मेलन का उद्घाटन करने आए थे। उन दिनों श्री धनोआ (जो सिख थे) धनबाद के उपायुक्त थे। इस कवि-सम्मेलन में जानकी वल्लभ शास्त्री , हँस कुमार तिवारी, काका हाथरसी और नेपाली जैसे सभी दिग्गज कवि जुटे थे। मुख्यमंत्री ने मंच से उतरते वक्त मुझसे कहा था,‘‘पटना आओ, तुम्हें कुछ काम सौंपा जाएगा।’’ सभी हतप्रभ थे। एक नई महिला, जो बिहार की रहने वाली भी नहीं, जो नेताओं के किसी गुट में भी शामिल नहीं, जिसका नामी श्रमिक नेता विरोध करते हैं, उसे मुख्यमंत्री ने खुद पटना आने को कहा। मैं भी अपनी इस पहचान पर मुग्ध थी। राजनीति में यह मेरी पहली कामयाब दस्तक थी।

हालाकि इससे पहले मैं दिलीप नामक युवक ,जो आनन्द मार्गी था, उसके और लोकेश  झा जो विनोदानंद झां मुख्यमंत्री के मंत्रीमंडल  में एक राज्यमंत्री  के हाथों काफी जिल्लत उठा चुकी थी। सबसे पहले मेरा राजनीतिक शोषण  इसी मंत्री  ने किया। उन्होंने मुझे झूठ-मूठ बताया कि उन्होंने मुझे केन्द्र सरकार की एक कमेटी का सदस्य बना दिया है, जिसके वे चेयरमैन है।
एक दिन अचानक मेरे घर आये और कहा, ‘मै आज दिल्ली जा रहा हूँ कमेटी की बैठक है तुम्हें भी भाग लेना है।’
‘पर चिट्ठी तो मुझे नहीं आई?’ मैने पूछा।
‘मै अध्यक्ष हूँ मैं  ही तो चिट्ठी देता हूँ, मैं ही तुम्हें कह रहा हूँ। अब और कौन सी चिट्ठी चाहिए।’
मैं बिना सवाल किये उनके साथ दिल्ली जाने को तैयार हो गई। हम तीनों प्रथम श्रेणी के कूपे मैं बैठे। काफी देर तक बातें हुई। फिर अचानक झा जी ने प्रेम प्रदर्शन शुरू कर दिया। मैं समझ नहीं पा रही थी कि क्या करूँ । ट्रेन से कूदा तो नहीं जा सकता था, वे एक नहीं दो थे। मैंने दिलीप की उपस्थिति पर आपत्ति की तो उन्होंने  कहा हम दोनों में कोई फर्क नहीं। बाद में वे मुझे रास्ते भर लेक्चर पिलाते गए,‘राजनीति में आयी हो तो राजनीति के ढंग सीखो। यहाँ यह सब होना मामूली बात है।’ हम लोग अगले दिन सवेरे दिल्ली पहुंचे । बिहार भवन में ठहरे। हर रोज़ सुबह उठकर मैं पूछती ‘मीटिंग कब होगी? कहाँ जाना होगा हमें?’ मुस्कुराकर कभी दिलीप व कभी झा जी कहते,‘क्या जल्दी है? होगी ना मीटिग?’ और में तीन दिन तक उस मीटिग में जाने के लिए इंतजार करती रही जो कभी हुई ही नहीं। अंतिम दिन जब हमें लौटना था तो मैंने पूछा, ‘मीटिग तो हुई नहीं और हम लौट रहे हैं?’‘अरे मीटिग तो की ना हम तीनों ने। क्या दरकार है किसी और की? हम तीनों एक साथ रहे यही मीटिग है,यही राजनीति है।’ मैं अवाक् और दुखी भी और मन ही मन गुस्सा भी। पर धनबाद वापस लौटने तक मैं यह गुस्सा व्यक्त नहीं कर सकती थी क्योंकि मुझे यह आभास  मिल गया था कि वे खतरनाक भी सिद्ध हो सकते हैं। धनवाद में लौटते ही स्टेशन पर ही मैंने अपने मन की भड़ास निकाली और अलग से वाहन लेकर अपने घर आ पहुँची। मैं ये सारा किस्सा किसे बताऊँ  समझ नहीं आ रहा था? दिलीप ने मुझे तंग करना शुरू कर दिया था और बिना बताए एक दिन वह घर आ टपका। मैंने उसे लताड़कर लौटा दिया पर उसने घमकियां देनी बंद नहीं की। बाद में पता चला कि लोकेश  झा अन्नपूर्णा देवी (पूर्व विधायक, बिहार विधान सभा) की बेटी जो उन्हें स्टेशन पर छोड़ने आई थी, को जबरन गाड़ी में बैठाकर दिल्ली तक उसे भोगते हुए गए थे। मैंने इनकी शिकायत रांची वाले प्रोफेसर अनिरूद्व मिश्रा से टेलीफोन पर की तो उन्होंने दोनों को कुछ हिदायत दी। यही दिलीप मिश्रा धनबाद में रहता था और आनंदमार्गी होने के कारण बाद में गिरफ्तार भी हुआ था। बिहार में आनंदमार्गियों  द्वारा हत्याओं के कई मामले प्रकाश  में आ चुके थे। ललितनारायण मिश्रा की हत्या में भी इन्हीं आनंदमार्गियो के हाथ होने की ख़बर भी बिहार में छायी रही थी।

कवि सम्मेलन में मुख्यमंत्री के.बी.सहाय द्वारा मुझे आमंत्रित करने पर धनबाद के गॉडफादर  कहलाने वाले सभी नेताओं में हड़कंप मच गया। लगा इंद्र का सिंहासन डोल गया है। मुझपर कई तरफ से दबाव डलवाने की कोशिशकि मैं इस पचड़े में ना पडूं यहाँ तक कि उपायुक्त ने मुझे बुलाया और समझाने की कोशिश की कि मैं मुख्यमंत्री से न मिलूं चूंकि यह श्रमिक नेता से वैर मोल लेना समझा जाएगा। पर मुझमें तो विरोध होने पर उस विरोध का मुकाबला करने की आदत हमेशा  जिद की हद तक पहुँच जाया करती रही है। सो इस विरोध ने मुझमें एक जिद पैदा कर दी और जोखिम को समझते हुए भी मैं पटना गई। राजनीति में आने वाली औरतों के लिए जोखिम के खिलाफ एक सुरक्षा-कवच की भी जरूरत होती है। दरअसल राजनीति में जितनी भी गुटबाजियां होती हैं, वे सब वर्चस्व और असुरक्षा की भावनाओं के कारण ही होती हैं। तब मुझे पता चला कि श्रमिक नेता के विरोधियों का भी एक गुट है, जो रंगलाल चैधरी एडवोकेट के नेतृत्व  को मानता है। यह वकील साहब बहुत ही भक्त किस्म के व्यक्ति माने जाते थे। वे भी भूमिहार ही थे, पर उक्त नेता को ज्यादा तरजीह देने या उनका धनबाद में एकछत्र राज चलने देने के कारण, वे लोग मुख्यमंत्री से भी नाराज थे। इसके पीछे राज़ यह था कि हर मुख्यमंत्री के लिए कोलियरी मालिकों से चंदे का पूरा इंतजाम वही श्रमिक नेताजी ही करते थे। उनके घर पर हर दिन सांझ को पीने में साझेदारी करने के लिए लोग जुटते थे, जिसमें अफसर भी होते थे, व्यापारी भी, कोलियरी मालिक भी और लेबर लीडर भी। कोलियरियों के अंग्रेज मालिक भी आते थे उनके यहाँ। श्रमिक नेताजी की दूसरी पत्नी पूर्णतया आधुनिक थीं। वे क्रिश्चन  थीं। पीने और मालिकों को पटाने में वे उनका साथ देती थीं। कई काम उनके कारण भी हो जाते थे। पर थीं वे अत्यंत संवेदनशील  महिला। उस औरत की कुंठा और त्रासदी को मैं उक्त नेता की हत्या के कुछ अरसा पहले ही जान सकी थी।
जिले भर के अफसर उक्त श्रमिक नेताजी से डरते थे। राजपूत लठैतों को भी नेताजी पैसे और ठेके दिलवाकर अपना गुलाम बनाए रहते थे। मजदूरों की माँग कभी-कभार दिलवा दी जाया करती थी लेकिन उनकी माँगों पर सौदेबाजी खूब किया करते थे उनके साथी इंटक के नेतागण। यह उनका पेशा  या धंधा जो कह लें, था।
प्रकाश  ने धनबाद में सहायक श्रमायुक्त के पद पर ज्वाइन किया था और बाद में वे वहीं पर रीजनल लेबर कमिश्नर  हो गए थे। वे प्रायः इन लोगों के किस्से घर आकर मुझे बताते थे। जीवन लाल सुंडा जैसे मालिक, जिन्होंने अपने मजदूरों की गोली मारकर हत्या कर डाली थी, को इन नेताजी ने कैसे मर्डर केस से बचाने में मदद की थी, यह सुनकर मुझे यूनियन वालों से घृणा -सी हो गई थी। हम लोग भी प्रकाश  के बॉस  कप्तान रंजीत सिंह के साथ उनके यहाँ दावतों में जाते थे। उनकी पत्नी कवयित्री  भी थीं। वे अंग्रेजी में कविताएं लिखती थीं और अपना दूसरी औरत होने का दर्द वे मुझसे बांट लेती थीं। मैं भी कविताएं लिखती थी इसलिए दोनों में एक प्रकार की निकटता आ गई थी। उन्होंने अपने पति द्वारा मेरा विरोध करने के बावजूद कभी मेरा विरोध नहीं किया, न ही मैंने उसके प्रति कभी दुर्भावना पाली। मैं उनके दूसरी औरत होने के दर्द के प्रति काफी संवेदनशील थी। बाद में तो हम दोनों मित्र भी बन गई थीं और उनकी मित्रताके कारण ही मैंने उक्त नेताजी के हत्यारों को पकड़वाने के लिए जोखि़म उठाए और  सूरजदेव सिंह जैसे एक नामी माफिया, जो धनबाद का डॉन  बन चुका था, से बैर मोल लिया। वैसे उनकी हत्या के कुछ दिन पहले ही उनके व्हाइट हाउस (नेताजी का नव-निर्मित घर जो सफेद था, उसे लोग इसी नाम से पुकारते थे) में एक बार मैंने उनकी पत्नी के सामने ही उन्हें उस माफिया डॉन  से बच के रहने को कहा था, पर उस समय वे मेरी बात से सहमत नहीं हुए।
मैं मुख्यमंत्री से मिलने पटना पहुँची। वे सवेरे चार बजे उठकर फाइल देखते थे और उसी समय अपने खास मिलने वालों को बुलाते थे, जिनमें औरतें भी शामिल होती थीं। छह बजे के लगभग वे सैर को निकलते थे। रास्ते में भी पैरवीकार उनसे बातें करते चलते थे। वे मुख्यमंत्री के पुराने निवास में ही रहते थे, जहाँ पहले बिहार के प्रथम मुख्यमंत्रीरहा करते थे। कभी-कभी गंभीर राजनीतिक वार्ताएं भी उसी सैर के दौरान वे किया करते थे।

मैं सवेरे चार बजे मिलने वालों  की सूची में थी। मैं गई। फाइलों से सर उठाकर उन्होंने सराहना भरी नजर से मुझे देखा। ‘‘तुम्हारा प्रोग्राम तो बहुत अच्छा था’’, कहते हुए वे उठे। मैं खड़ी थी। उनका पी.ए. जा चुका था। मेरी तरफ आते हुए वे हाथ फैला कर बोले, ‘‘बोलो क्या चाहिए, बिहार का मुख्यमंत्री तुमसे कह रहा है।’’ मैं स्तब्ध थी। अचानक मुंह से निकला,‘‘महिलाओं के प्रशिक्षण  के लिए भवन बनाने के लिए धनबाद में कांग्रेस ऑफिस  के बगल वाली जमीन चाहिए।’’ ”अरजी लाई हो?“ उन्होंने पूछा। ‘‘जी।’’ मैंने कहा। उन्होंने अर्जी लेकर जमीन आबंटन की प्रक्रिया पूरी करने का आदेश  जिला-परिषद के मंत्री  को लिख दिया, जो एक आदीवासी थे। जिला परिषद धनबाद का अध्यक्ष उन दिनों एक कोलयरी का मालिक था, जो वास्तव में एक लठैत बनकर धनबाद आया था। वह मालिक सह लेबर लीडर भी था। वह राजपूत था। चूंकि मुख्यमंत्री नेताजी को, जो जाति के भूमिहार थे, तरजीह देते थे, इसलिए पूरा राजपूत वर्ग उनका भी विरोधी था। बिहार में भूमिहार और राजपूत परस्पर विरोधी जातियाँ रही हैं । दोनों जमींदार वर्ग की हैं। हालांकि कायस्थों का समझौता बिहार में प्रायः राजपूतों के साथ होता था, पर उक्त नेताजी उसमें अपवाद थे।भले आज लाल सेना के खिलाफ रणवीर सेना के झंडे तले दोनों जातियाँ एक होकर खड़ी होने को मजबूर हैं, पर आपसी रिश्तों  में उनका जातीय वैर बरकरार है।मैं सपना-सा देख रही थी। वे बोले, ‘‘जाओ ये पत्र लेकर राजा बाबू से मिलो, वे तुम्हें बी.पी.सी.सी. का सदस्य मनोनीत कर देंगे। तुम कांग्रेस पार्टी का काम करो। मेरा मन तो तुमने जीत ही लिया है।’’ यह कहते हुए उन्होंने मुझे आगोश  में लेकर चूम लिया। मैं विरोध नहीं कर सकी या शायद मैंने विरोध करना नहीं चाहा। ऐसे भी क्षण आते हैं जीवन में, जब अचानक, अनअपेक्षित लादे गए अहसानों का अहसास किसी भी ऐसी हरकत को नजरअंदाज करने में सहायक बन जाता है। राजनीति में ऐसे ही अहसानों में कमी आने पर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चल जाता है। तनावग्रस्त राजनेता महिला कार्यकर्ताओं से शारीरिक सुख पाकर तनाव-मुक्त होने को अहसान के रूप में लेता है तो राजनीतिक महिलाएं बदले में सुरक्षा और वर्चस्व के फैसले अपने पक्ष में हासिल करती हैं । जो महिलाएं राजनीतिक नहीं होतीं, वे पैसे या भौतिक उपहारों से संतुष्ट  हो जाती हैं या पुरुषों की तरह ही ट्रांसफर-पोस्टिंग में कमाई करती हैं। उनके पति भी इसमें दलाली करते हैं। अब मैं कहूँ कि वह मेरा शोषण था ,तो शायद यह गलतबयानी होगी। क्योंकि राजनैतिक सीढि़यों पर चढ़ने वाले हर व्यक्ति को, औरत हो या मर्द, सुरक्षा-कवच चुनने होते हैं। मुझे मुख्यमंत्री का सुरक्षा कवच मिल रहा था। शायद यह ज्यादा भरोसेमंद था छदम् नैतिकता से! यह मुझे राज्यमंत्री लोकेश  झा या दिलीप जैसे दरिंदों के हाथ में पड़ जाने से बेहतर लग रहा था। इसमें स्नेह भी झलकता था। हो सकता है इसमें दोनों को एक-दूसरे का फायदा नज़र आता था। पर यह बिल्कुल व्यापार नहीं होता। कुछ न कुछ लगाव भी रहता है। लगाव के साथ-साथ कहीं-कहीं लक्ष्य भी एक होता है। क्या इसे व्यवहारिकता नहीं कहा जा सकता? शायद हाँ! इसे समझौता भी कह सकते हैं। पर समझौता किससे? इसे मंत्रामुग्धता की पराकाष्ठा  भी कह सकते हैं। जब कोई औरत या पुरुष किसी ऐसे व्यक्तित्व की प्रेमाभिव्यक्ति से अपने को गौरवान्वित समझे। कुछ भी हो सकता है यह। पर प्रायः ऐसा होता है और शायद आज तक यही होता आया है। सभ्यता का पूरा इतिहास ऐसे समझौतों, विरोधों और गौरवानुभूतियों या अपराध-बोधों का दस्तावेज़ है। मातृसत्ता की समाप्ति के बाद बाद से औरतों की पूरी जिंदगी इन समझौतों के स्वीकार या नकार की ही रही है। ऐसे संबंध, जहाँ कोई उन्हें सरल-सुलभ प्राप्य वस्तु मानने लगे तो उनके स्वाभिमान को ठेस पहुँचाती है, तब वे उसे नकारती हैं। पर सहमति से बने संबंध को प्रेम भी कह सकते हैं। भले समाज उन्हें व्यभिचार की श्रेणी में रखता है। असहमति जरूर बलात्कार बन जाती है।
आगे जारी

पंकज चौधरी की कविताएं

पंकज चौधरी


पंकज चौधरी मूलतः कवि और पेशे से पत्रकार हैं . कविता संग्रह ‘उस देश की कथा’ प्रकाशित। सम्‍मान/पुरस्‍कार- प्रगतिशील लेखक संघ का ‘कवि कन्‍हैया स्‍मृति सम्‍मान’, बिहार राष्‍ट्रभाषा परिषद का ‘युवा साहित्‍यकार सम्‍मान’ और पटना पुस्‍तक मेला का ‘विद्यापति सम्‍मान’ ।कविताएं गुजराती और अंग्रेजी में अनूदित। संपर्क: 09910744984

( पंकज चौधरी की कविताओं के अभिधात्मक , सपाट वाक्यों को पढ़ते हुए  पाठक के भीतर आक्रोश , क्रोध , दुःख , जुगुप्सा , खुशी , आत्मविश्वास के प्रबल भाव बनते जाते हैं – सहज वाक्यों , शब्दों में कही गई इन कविताओं की व्यंजनात्मक व्याप्ति बहुत तीव्र है )

1. कैसा देश, कैसे-कैसे लोग

कल तक जो बलात्कार  करते आया है
और बलत्कृत  स्त्री  के गुप्तांगों में बंदूक चला देते आया है
कल तक जो अपहरण करते आया है
और फिरौती की रकम न मिलने पर
अपहृत की आंखें निकालकर
और उसको गोली मारकर
चौराहे के पैर पर लटका देते आया है

कल तक जो राहजनी करते आया है
और राहगीरों को लूटने के बाद
उनके परखचे उड़ा देते आया है

कल तक जो बात की बात में
बस्तियां दर बस्तियां फूंक देते आया है
और विरोध नाम की चूं तक भी होने पर
चार बस्तियों को और फूंक देते आया है

कल तक जिसे
दुनिया की तमाम बुरी शक्तियों के समुच्चय के रूप में समझा जाता रहा है
और लोग-बाग जिसके विनाश के लिए
देवी-देवताओं से मन्नितें मांगते आया है
आज वही छाती पर
कलश जमाए लेटा हुआ है दुर्गा की प्रतिमा के सामने

उसकी बगल में
दुर्गा सप्तशती का सस्व र पाठ किया जा रहा है
भजन और कीर्तन हो रहे हैं
लोग भाव-विभोर नृत्य  कर रहे हैं
उसकी आरती उतारी जा रही है
अग्नि में घृत, धूमन और सरर डाले जा रहे हैं
घंटी और घंटाल बज रहे हैं
दूर-दूर से आए दर्शनार्थी
अपने हाथों में फूल, माला, नारियल आदि लिए
उसकी परिक्रमा कर रहे हैं

उसके पैरों में अपने मस्तक को टेक रहे हैं
और करबद्ध ध्यानस्थ
एकटंगा प्रतीक्षा कर रहे हैं
उससे आशीर्वाद के लिए

ये कैसा देश है
और यहां कैसे-कैसे लोग हैं !

लहर है ……

लहर है
झूठ और फरेब की सवारी गांठने वालों की लहर है

लहर है
नफरत और घृणा का विष बोने वालों की लहर है

लहर है
पाखंड के टट्टुओं  की लहर है

लहर है
कच्चा गोश्त खाने वाले आदमखोरों की लहर है

लहर है
विज्ञान का तंत्रीकरण, मंत्रीकरण और जोशीकरण करने की लहर है

लहर है
चंद्रगुप्त  मौर्य को चंद्रगुप्त द्वितीय बताने वालों की लहर है

लहर है
तक्षशिला को भारत में करने की लहर है

लहर है
देश को ‘हिन्दुस्थान’ बनाने की लहर है

लहर है
हाशिमों, अब्दुल्लों, रहमानों को टुकड़े-टुकड़े कर देने की लहर है

लहर है
अंसारियों, कुरेशियों से बदला लेने की लहर है

लहर है
नाजनीनों की कोख में त्रिशूल भोंक देने की लहर है

लहर है
दिलीप कुमारों को पाकिस्तानी एजेंट बताने वालों की लहर है

लहर है
ग्राहम स्टेन्स और उनके मासूमों को जिंदा जला देने की लहर है

लहर है
जसोदा बेनों को वनवासों में भेजने की लहर है

लहर है
पिछड़ों को हनुमान बना देने की लहर है

लहर है
वाल्मींकियों को ‘कर्मयोग’ का पाठ पढ़वाने की लहर है

लहर है
बाबासाहेब को झूठे देवता बताने वालों की लहर है

लहर है
पुष्यमित्र शुंगों के लौटने की लहर है

लहर है
मनु की औलादों की बाढ़ आने की लहर है

लहर है
कबीर पर हंसने वालों की आमद बढ़ने की लहर है

लहर है
चार्वाकों को जिंदा जला देने की लहर है

लहर है
महात्माो बुद्ध पर शंकराचार्यों को बिठाने की लहर है

लहर है
भारत को आग का दरिया बना देने की लहर है

लहर है
अल्लाैह के विध्वंसकों की लहर है

लहर है
गांधी के हत्याहरों की लहर है

लहर है
पूरे देश को हाफ पैंट पहना देने की लहर है।

3. गरमी
भीषण गरमी है
आग के गोले बरस रहे हैं
पत्ता  तक नहीं हिल रहा

पाताल भी सूख गया होगा
पिछले पच्चीस सालों का रिकार्ड भंग हो रहा है …………………………………………………..
बड़े-बूढ़ों की गरमी
ऐसे ही निकल रही थी
और दूधमुंहे बच्चों  की गरमी घमोरियों में निकल रही थी !

4. ईसा और भगवान के लिए

जहां सबसे  ज्यादा प्रभु होंगे
शैतान भी वहीं सबसे ज्यादा होंगे

जहां सबसे ज्यादा नायक होंगे
खलनायक भी वहीं सबसे ज्यादा होंगे

जहां सबसे ज्यादा नम्रता होगी
उदंडता भी वहीं सबसे ज्यादा होगी

जहां सबसे ज्यादा दरियादिली होगी
क्षुद्रता भी वहीं सबसे ज्यादा होगी

जहां सबसे ज्यादा शंकराचार्य होंगे
व्यंभिचारी भी वहीं सबसे ज्यादा होंगे

जहां सबसे ज्यादा धर्म होगा
धर्म की हानि भी वहीं सबसे ज्यादा होगी

जहां सबसे ज्यादा जनता होगी
जनता के नाम पर लूट भी वहीं सबसे ज्यायदा होगी

जहां सबसे ज्यादा नास्तिक होंगे
आस्तिक भी वहीं सबसे ज्यादा होंगे

जहां सबसे ज्यादा पूजा होगी
कर्मकांड भी वहीं सबसे ज्यादा  होंगे

जहां जातिवाद का विरोध सबसे ज्यादा होगा
जातिवाद भी वहीं सबसे ज्यादा होगा

जहां सत्य के सबसे ज्यादा प्रयोग होंगे
सत्य  के पाखंड भी वहीं सबसे ज्यादा होंगे

जहां सबसे ज्यादा विचार होंगे
बेईमानी की गुंजाइश भी वहीं सबसे ज्यादा होगी

और जहां विचार कम से कम होंगे
ईमानदारी भी वहीं सबसे ज्यादा होगी।

5. मैं हार नहीं मानूंगा, तो तुम जीतोगे कैसे

मैं हार नहीं मानूंगा
तो तुम जीतोगे कैसे

मैं रोउंगा नहीं
तो तुम हंसोगे कैसे

मैं दुखी दिखूंगा ही नहीं
तो तुम सुख की अनुभूति करोगे कैसे

मैं ताली ही नहीं बजाउंगा
तो तुम ताल मिलाओगे कैसे

मैं अभिशप्त नायक ही सही
लेकिन तू तो खलनायक से भी कम नहीं

मैं खुददारी की प्रतिमूर्ति ही सही
लेकिन तू तो किसी पतित से कम नहीं

माना कि प्रकृति भी मेरे साथ नहीं
लेकिन प्रकृति भी तो सदैव तेरी दास नहीं

तुम मुझे क्या  अपमानित करोगे
तुम तो खुद सम्मा‍नित नहीं

तुम मुझे औकात में क्या रखोगे
तुम्हारी खुद की तो कोई औकात नहीं

तुम मुझे क्याा डराओगे
तुम तो मुझसे खुद डरते हो

मेरे उपर तुम क्या शक करोगे
विश्वापस तो तुझे खुद अपने उपर भी नहीं

तुम मेरा रास्ता  क्या  रोकेगे
तुम्हारा रास्ता तो अपने आप है बंद होने वाला

मेरी इज्जरत तुम क्या  उतारोगे
तुम्हाजरी इज्जत तो खुद है तार-तार

तुम मेरा इतिहास क्या खंगालोगे
तुम्हारा इतिहास तो खुद है दाग-दाग

मैं राहु का वंशज ही सही
लेकिन तुम भी तो चंद्रमा के रिश्तेदार नहीं।

आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा -पहली किस्त

रमणिका गुप्ता


रमणिका गुप्ता स्त्री इतिहास की एक महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं . वे आदिवासी और स्त्रीवादी मुद्दों के प्रति सक्रिय रही हैं . ‘युद्धरत आम आदमी’ की सम्पादक रमणिका गुप्ता स्वयं कथाकार , विचारक और कवयित्री हैं . आदिवासी साहित्य और संस्कृति तथा स्त्री -साहित्य की कई किताबें इन्होने संपादित की है. इनसे इनके मोबाइल न. 9312039505 पर संपर्क किया जा सकता है.

( हम यहाँ रमणिका गुप्ता की शीघ्र प्रकाश्य आत्मकथा सीरीज ‘ आपहुदरी’ के एक अंश किश्तों में प्रकाशित कर रहे हैं. रमणिका जी के जीवन के महत्वपूर्ण हिस्से धनवाद में बीते , जहां वे खुदमुख्तार स्त्री बनीं, ट्रेड यूनियन की सक्रियता से लेकर बिहार विधान परिषद् में उनकी भूमिका के तय होने का शहर है यह. ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ से कोयलानगरी की राजनीति को समझने वाली हमारी पीढी को यहाँ स्त्री की आँख से धनबाद से लेकर राज्य और राष्ट्रीय राजनीति के गैंग्स्टर मिजाज को समझने में मदद मिलेगी, और यह भी समझने में कि यदि कोइ स्त्री इन पगडंडियों पर चलने के निर्णय से उतरी तो उसे किन संघर्षों से गुजरना पड़ता रहा है , अपमान और  पुरुष वासना की अंधी गलियाँ उसे स्त्री होने का   अहसास बार -बार दिलाती हैं. उसे स्थानीय छुटभैय्ये नेताओं से लेकर मंत्री , मुख्यमंत्री , राष्ट्रपति तक स्त्री होने की उसकी औकात बताते रहे हैं . ६० -७० के दशक से राजनीति के गलियारे आज भी शायद बहुत बदले नहीं हैं. इस आत्मकथा में अपनी कमजोरियों को अपनी ताकत बना लेनी की कहानी है  और ‘ हां या ना कहने के चुनाव’ की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष की भी कहानी है. इस जीवन -कथा की स्त्री उत्पीडित है, लेकिन हर घटना में अनिवार्यतः नहीं.   इस आत्मकथा के कुछ प्रसंग आउटलुक के लिए रमणिका जी एक इन्टरव्यु में पहले व्यक्त हो चुके हैं )

दहशतजदा धनबाद और मुक्ति की छटपटाहट

धनबाद! कोयले की नगरी धनबाद! मज़दूरों और मालिकों की नगरी धनबाद! गरीबी और अमीरी के मापदण्ड तोड़ती, माफिया और पहलवानों के भय को भोगती,भ्रष्टाचार  के बटखरे पर सबसे भारी उतरने वाली,राजनीति की बड़ी-बड़ी हस्तियों का आकर्षण  केंद्र,आकांक्षाओं की धुरी,पैंतरेबाजी के लिए प्रसिद्ध अखाड़ा,सरकारों को बदलने, उलटने-पलटने, मन्त्रिायों के विभाग और मुख्यमंत्रियों के बनने-बनाने, हटने-हटाने की मंत्रणाओं का गढ़। इनके कार्यान्वयन हेतु धन जुटाने का अजस्र स्रोत  भी यही धनबाद। इस शहर में गॉडडफादर भी जबरदस्त थे। सबसे बड़े गॉडडफादर थे बी.पी. सिन्हा,मज़दूर नेता। आई.एन.टी.यू.सी.,कांग्रेस पार्टी (सत्ता पार्टी) से सम्बद्ध ‘कोलियरी मजदूर संघ’ यूनियन के अध्यक्ष थे। उनके विरोधियों का भी एक भारी-भरकम मजमा था। सारी नौकरशाही इन गॉडडफादरों  की ताबेदारी करती थी, खासकर बी.पी. सिन्हा की। दरअसल कोयला एशिया  में सबसे बड़ा रोजगार देने वाला उद्योग था, जहाँ मजदूर लाखों की तादाद में काम करते थे। वहाँ सैकड़ों की तादाद में नेता थे और हजारों की तादाद में दलाल। नौकरशाही की भी एक बड़ी फौज़ थी। इन सबसे तालमेल रखने वाले थे गॉडडफादर । नेता और अफसर, अक्सर इनके तलवे चाटते थे। मजदूर एवं उन मजदूरों के छोटे-बड़े नेता इनकी जागीर थे। ये उन्हें जितना ज्यादा से ज्यादा भुना सकते थे, भुनाते थे। मालिकों का नुकसान न हो,मजदूरों को भी कुछ टुकड़े मिलते रहें,यही यहाँ के नेताओं, अफसरों और दलालों की तिकडि़यों का धन्धा था। मजदूरों की गरीबी पर ये दिन-प्रतिदिन अमीर से अमीर हो रहे थे। दिनों-दिन रूतबा बढ़ रहा था इनका। कभी-कभार कोई चालाक अफसर इन दोनों गुटों को लड़वा भी दिया करता था पर प्रायः अफसर इनके बाहर नहीं जा सकते थे। ट्रांसफर, पोस्टिंग, प्रमोशन सब के पैरवीकार यही गॉडडफादर थे। ये राजधानी पटना के एजेन्ट थे। कोई भी नया अफसर आता, खासकर श्रम विभाग काµउसे बी.पी. सिन्हा के यहाँ हाजरी देनी ही होती थी। उनके यहाँ आयोजित रात्रि भोज और शराब पार्टियों में जाकर, साथ में शराब पीना और आगे की राजनीति, स्ट्रेटेजी या यूनियन की कार्यनीति, सभी तो इनके यहाँ तय होती थी। यहाँ कोयले की सबसे बड़ी यूनियन ‘इन्टक’ से सम्बद्ध ‘कोलियरी मजदूर संघ’ थी, जिसके सिरमौर बी.पी. सिन्हा ही थे। (बाद में इसका नाम बदल कर राष्ट्रीय  कोलियरी मजदूर सभा कर दिया गया जो आज तक चला आ रहा है) बी.पी. सिन्हा के यहाँ आयोजित पार्टियों में कोलियरी मालिक भी शामिल रहते थे, इसलिए मालिकों से सम्बन्धों के संदर्भ में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सभी हिदायतें, इन्हीं पार्टियों में दी जाती थीं। पुराने अफसरों के जरिए  भी नये अफसरों को यह हिन्ट मिल जाता था कि क्या करना है,किस मालिक से कैसे पेश  आना है और किस हद तक मज़दूरों के मुद्दों की पक्षधरता करनी है।

बड़ा चन्दा करना हो तो पटना के सभी लीडर-जन बी.पी. सिन्हा के घर आ जाते थे,वहीं कोलियरियों के मालिक व ठेकेदार, जिनमें ज्यादा यूनियन के लीडर ही होते थे,जमा हो जाते,और तय राशि पटना से आए नेताओं को दे दी जाती थी. कुछ सिन्हा साहब भी रख लेते थे ,अपने छुटभैयों में बांटने के लिएु, बाकी अपने या अपने खास लोगों के लिए।सबसे पहले जयप्रकाश  नारायण ने धनबाद में ‘हिन्द मज़दूर सभा’ (एच.एम.एस.) से सम्बद्ध यूनियन का गठन किया था। बाद में उन्होंने इस यूनियन की दो शाखाएं बर्ड कम्पनी की दोकोलियरियों,सिरका तथा अरगड्डा,जो हजारीबाग जिला में पड़ती हैं, में भी खोल दी थीं। उन दिनों इमामुल हई खान भी उनके साथ थे। बाद में बी.पी. सिन्हा ने उनसे अलग होकर इन्टक से सम्बद्ध कोलियरी मजदूर संघ नामक यूनियन बना ली। कुछ कोलियरियों पर इमामुल हई खान का भी दबदबा बना रहा। हई खान की यूनियन एच.एम.एस. से सम्बद्ध थी।

फ्लोरा स्मिथ का रेखांकन

इसी धनबाद में एक बंगाली लेबर लीडर को काले पानी की सजा हुई थी। वे एक ईमानदार नेता थे, जो मालिकों के आगे बिके नहीं थे। मारपीट में मालिक के अतिरिक्त मारे तो ज्यादा मजदूर ही गये थे, पर वे मालिकों पर मजदूरों की हत्या करने का जुर्म साबित नहीं कर सके थे। उलटे लेबर लीडर को ही सजा भोगनी पड़ी थी।
इन्टक में ही दो खेमे थे, जिनमें प्रायः हिंसक संघर्ष  भी हो जाया करते थे। हत्या तो आम बात थी। इन्टक चूंकि कांग्रेस से सम्बद्ध थी, इसलिए सत्ता में उसका दखल था। पटना किसके हाथ में रहे,लड़ाई यही थी। मालिक किसका आदेश  मानें,झगड़ा यहाँ था। जहाँ तक मज़दूरों के हक का सवाल था,वह इंटक के लिए खास मायने नहीं रखता था। मालिक ही मज़दूरों का चन्दा और यूनियन की सदस्यता काट कर दफ्तर में भिजवा देते थे। दरअसल यूनियन के प्रायः सभी नेता व कई सरकारी अफसर भी, सच कहा जाए तो बी.पी. सिन्हा के प्रति ही वफादार थे और उन्हीं की कृपा  से ठेकेदारियां भी करते थे। बस, जो साहब (बी.पी. सिन्हा को सभी साहब कह कर सम्बोधित करते थे) ने एग्रीमेंट कर दिया ,वह मज़दूर से लेकर मालिक, ठेकेदार, अफसर और सरकारी श्रम मशीनरी को मंजूर करना पड़ता था। बड़े-बड़े लठैत यूनियन के कार्यकर्ता थे,उनके खिलाफ बेचारा कौन मजदूर बोलेगा? जो बोलेगा पिट जाएगा या नौकरी से बर्खास्त हो जाएगा।

कांग्रेस पार्टी में बी.पी. सिन्हा के खिलाफ रंगलाल चैधरी सक्रिय थे, जो धनबाद कांग्रेस के अध्यक्ष भी थे। वे एकदम विशुद्ध  शाकाहारी भूमिहार नेता थे। यूनियन के भीतर राम नारायण शर्मा ,जो लोकसभा सदस्य भी चुने जा चुके थे,बी.पी. सिन्हा के विरोधी गुट में थे। वे यूनियन के जनरल सेक्रेटरी थे। बी.पी. सिन्हा अध्यक्ष थे। राम नारायण शर्मा ईमानदारी के लिए मशहूर थे और वे बी.पी. सिन्हा के गलत समझौतों का विरोध भी करते थे। कान्ती भाई (गुजराती) और दास गुप्ता भी यूनियन में थे और बी.पी. विरोधी थे,पर वे मुखर नहीं हो पाते थे। उन्होंने बाद में कोयला की फेडरेशन बनाकर खुद को फेडरेशन का अध्यक्ष और दासगुप्ता को महामन्त्री बना दिया था। वे असन्तुष्ट , यानी बी.पी. लॉबी के विरोधियों तथा बिहार के बाहर के कोयला प्रतिनिधियों के समर्थन से जीत जाते थे। फेडरेशन के स्तर पर वे ठेकेदारों को यूनियन में लाने के विरोधी थे,पर जहाँ सारा संगठन ही ठेकेदारों को हाथ में हो, तो वहाँ फेडरेशन के एक-दो नेताओं की कौन परवाह करता?ऐसे एक बार बी.पी. सिन्हा ने धनबाद से बर्ड कम्पनी के एक बड़े अफसर प्राण प्रसाद को धनबाद से सांसद का चुनाव लड़वाया था। उस चुनाव में लोगों को साइकिल भी बांटे थे। इस पर भी प्राण प्रसाद बुरी तरह पराजित हुए थे और उनकी जमानत जब्त हो गई थी। रामनारायण शर्मा ही सदैव कांग्रेस से जीतते थे,वे ही अन्ततः जीते। बी.पी. सिन्हा की जनता में नहीं चली।

बड़ी-बड़ी अंग्रेजी कम्पनियों  के अतिरिक्त वोरा, चंचनी और अग्रवाल बड़े खदान मालिकों में थे। कुछ ठाकुर,कुछ भूमिहार, जो पहले ठेकेदारों के यहाँ पहलवानी करने आए थे,छोटी-मोटी ठेकेदारियां लेकर बाद में मालिकों को भ कर खुद ही मालिक बन बैठे थे। वे लेबर लीडर भी थे। शंकर दयाल सिंह, सतदेव सिंह, सूरजदेव सिंह आदि पहले पहलवान के रूप में ही बी.पी. सिन्हा की शरण में धनबाद आए थे,फिर ठेके लिए और बाद में खदानें हड़प कर मालिक बन गए।अन्त में तो अपनी स्वतन्त्रा सत्ता कायम करने के बाद, सभी के सभी मुख्यतः जातीय आधार पर या जिला-जवार के नाम पर बी. पी. सिन्हा के खिलाफ हो गये या इन्होंने अपने स्वतंत्र गुट व खेमे बना लिये। इन सबके तार पटना से जुड़े थे। धीरे-धीरे इन्होंने राजनीति में भी हिस्सा लेना शुरू कर दिया और कांग्रेस पार्टी में अपनी जाति के नेताओं और मंत्रियों से जुड़कर अपनी पैठ बना ली। शंकरदयाल सिंह जैसे लोग, तो न केवल जिला बोर्ड के अध्यक्ष बन गये बल्कि बिहार सरकार में केबिनेट मंत्री  भी बन गये थे। उनके भाई सतदेव सिंह कोलयरियों के मालिक थे और शंकर दयाल सिंह मालिक तो थे ही, मजदूर नेता और सरकार में मंत्री  भी थे। धनबाद एवं उसके आस-पास के क्षेत्रों, बल्कि कहा जाए बंगाल तक बड़ी-बड़ी अंग्रेजी कंपनियों के अतिरिक्त राजस्थान के मारवाड़ी और गुजरात के चंचनी और व्होरा ग्रुप की भी कई-कई खदानें थीं। खदानों में स्थानीय लोगों की बजाय बाहरी लोग ज्यादा थे। खासकर प्रबन्धन में या ठेकेदारियों में आरा, छपरा, बलिया, भोजपुर, दरभंगा और गया के लोग थे या फिर पंजाबी, गुजराती, मारवाड़ी और बंगाली। इनके सारे के सारे मजदूर या तो स्थानीय होते थे या फिर मध्य प्रदेश  के रायगढ़, बिलासपुर, उड़ीसा के गंजाम जिला, बंगाल के पुरूलिया और उत्तर प्रदेश  के गोरखपुर से लाए जाते थे।  प्रायः बिहार के पलामू, गया, भोजपुर, आरा, छपरा व मुंगेर से भी मजदूर लाए जाते थे, जो मजदूर-कम-लठघर (ठेकेदारों की तरफ से) दोनों होते थे अपने डील-डौल के कारण, खास कर गोरखपुर और पलामू के लेबर मालिक के लिए लठैती भी करते थे। छोटानागपुर के लोग यानी वर्तमान झारखण्ड के लोग प्रायः ठेकेदारियों में खटते थे।
सब ठेकेदार अपने-अपने पहलवान रखते थे, जिनका मकसद था यूनियनों को उभरने न देना, खासकर इन्टक विरोधी यूनियनों को। इन्टक सम्बद्ध यूनियनों में प्रायः ठेकेदार ही यूनियन के लीडर होते थे।

जब हम 1960 में धनबाद आए तो बी. पी. सिन्हा इन्हीं जमातों के नेता थे और इनके मार्फत कोलियरी मलिकों और मजूदरों, दोनों पर अपना दबदबा बनाए रखते थे। लेकिन धीरे-धीरे सबने अपनी स्वतन्त्र सत्ता कायम करनी शुरू कर दी। के. बी. सहाय के बाद संविद की सरकारें बननी शुरू हो गईं और इनमें से कुछ नेता कांग्रेस और इन्टक छोड़कर जनता दल में भी चले गये। कांग्रेसी सरकार में तो पांच साल में दो-दो तीन-तीन बार मुख्यमंत्री बदलने लगे थे, यानी राजनीति में अस्थिरता आ गई थी। कांग्रेस की केन्द्र सरकार ने खासकर मोहन कुमार मंगलम, जो कोयला मंत्री  थे और इंदिरा गांधी, दो बातों से काफी विचलित थे। एक बात तो यह कि धनबाद, जो कोयला क्षेत्र का केन्द्र था, के पैसे का पटना की कांग्रेस सरकारों के मुख्यमंत्रियों या सरकारों को हटाने या बनाने में जबरदस्त दखल था। बाद में दूसरे दलों के लोग भी धनबाद के खजाने में हिस्सा बंटा कर सरकार को बनाने-गिराने लगे थे। कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के लिए इस ‘सरकार भंजक केन्द्र’ को तोड़ना जरूरी हो गया था।

नोट: इसी बीच में संसोपा से कुज्जू माँडू चुनाव लडने पहुँची

दूसरा महत्वपूर्ण कारण यह था कि देश  के विकास के लिए बिजली की सख्त जरूरत थी, रेलों के विस्तार की जरूरत थी, जिसके लिए उर्जा का एकमात्र स्रोत  कोयले की खदानें थीं, जिनके विस्तार की बहुत आवश्यकता  थी। इसकी पूर्ति के लिए धन की जरूरत थी। सरकार ने कोलियरी मालिकों से कोयला खदानों के विस्तार की पेशकश  की थी। कोयला बोर्ड में सरकारी नुमाइंदों के अतिरिक्त कोलियरी मालिक भी शामिल  होते थे और मजदूर नेता भी। कोलियरी मालिकों ने कोलियरियों के विस्तार के लिए पर्याप्त पूंजी लगाने में असमर्थता जाहिर की थी। ऐसे भी सरकार के पास ये रिपोर्ट थी कि कोलियरी मालिक कोलियरियों का उत्खनन बहुत ही अवैज्ञानिक ढंग से कर रहे हैं। वे कम पूँजी लगाकर ज्यादा मुनाफा पाने के लिए ऊपर  की परतों से कोयला निकाल कर, नीचे बची हुई परतों को ओवरवर्डेन से ढक देते थे और अंडरग्राउंड खदानों के कोयले में आग लगने अथवा पानी भर जाने से बचाने की बजाय उन्हें ढँक कर नया मुहाना खोल देते थे। खदानों की कटाई भी वर्टिकल होती थी और भूगर्भ खदानों को बालू भरे बिना छोड़ दिया जा रहा था। आग बुझाने के लिए भी बालू केवल कागजों में ढोया जाता था।

ऐसे हालात में सरकार ने खदानों के सरकारीकरण का फैसला किया। चूंकि  स्टील कारखानों के लिए कोयले की सख्त जरूरत थी ,जिसमें केवल कोकिंग कोल ही इस्तेमाल हो सकता था, इसलिए सरकार ने सन् 1970 में पहले केवल कोकिंग कोल वाली खदानों का ही सरकारीकरण किया, जिसमें धनबाद की सारी और बंगाल की अधिकांश  खदानें चली गईं। इस प्रकार धनबाद में ‘भारत कोकिंग कोल लिमिटेड’ (बी.सी.सी.एल.) बनी।
इन्टक का नेतृत्व  भौंचक रह गया, क्योंकि उनकी सारी कमाई तो कोलियरी मालिकों से होती थी। इन्टक के जितने भी ठेकेदार या मजदूर लीडर थे वे सब के सब रातों-रात कोलियरियों के स्टाफ बन गये। सबके भाई-भतीजे और लठैत-पहलवान, मुंशी  या मजदूर बन गये। असली मज़दूर खदेड़े जाने लगे। अफसर, पुलिस और प्रशासन की मदद से, यहाँ तक कि कोर्ट के जजों की मदद से नये-नये लोग काम पाने लगे और पुराने लोग भगाये जाने लगे। नौकरी की इस भ्रष्ट  मिलीभगत में लाखों रुपए के वारे-न्यारे होने लगे। स्थानीय और असली मजदूर हक्के-बक्के रह गए। उनकी आँखों के सामने लूटी जा रही थी उनकी नौकरियाँ और वे कुछ नहीं कर पा रहे थे। उनके अपने ही नेता उन्हें बेच रहे थे। बस, एक दिन सब्र का बाँध फूट गया,खासकर स्थानीय मजदूरों और किसानों का। मजदूर स्पष्ट  रूप से दो खेमों में बंट गया,बाहरी और स्थानीय अर्थात् देशज ।
ठेकेदारी के जमाने से ही ए. के. राय की यूनियन धनबाद में अपने पाँव पसार चुकी थी और इन्टक की कोलियरी मजदूर संघ (बाद में राष्ट्रीय  कोलियरी मजदूर संघ) एवं ‘बिहार कोलियरी मजदूर सभा’ में प्रायः रोज हिंसक झड़पें होने लगी थीं। इन्टक के अधिकांश  लीडर सूदखोर थे। ए. के. राय की यूनियन, जो सी. आई. टी. यू. से सम्बद्ध  थी, ठेकेदारी और सूदखोरी के विरुद्ध लड़ाई के साथ-साथ लोकल की बहाली और विस्थपितों की लड़ाई भी लड़ रही थी। ए. के. राय पहले पेशे  से इंजीनियर थे लेकिन मजदूरों की दुर्दशा  देख कर वे नौकरी छोड़ कर मजदूर संगठन से जुड़ गए। उन दिनों विनोद बिहारी महतो एक नामी वकील थे और शिबू  सोरेन छोटानागपुर के उभरते आदिवासी नेता, जो अलग झारखण्ड की माँग कर रहे थे। तीनों एकजुट हुए और एक बड़ा संघर्ष  चला। खासकर कोलियरियों के सरकारी होने के बाद। इस संघर्ष  के नारे थे स्थानीय लोगों को नौकरी दो, विस्थापितों  का पुनर्वास करो, नौकरी दो। ये लड़ाइयाँ बहुत लम्बी चलीं। हालांकि बाद में शिबू  सोरेन ए.के. राय से अलग हो गये लेकिन विनोद बिहारी महतो आजीवन ए. के. राय के साथ रहे।
मैं इन स्थितियों का वर्णन इसलिए कर रही हूँ कि धनबाद में एक गॉडडफादर से कई गॉडडफादरों  का बनना, आपस में लड़ना, मारा जाना, मजदूर शक्तियों का उभरना, पटना में सत्ता केन्द्रों का बदलना या केन्द्र में नीतियों का बदलना, बहुत हद तक धनबाद की धरती से ही जुड़ा था। इस तिकड़म, षड़यंत्र , धोखाधड़ी, हत्या और दूसरी तरफ विद्रोह, बलिदान, हक, पहचान और क्रांति की उभरती हुई इच्छा,एक साथ घटते-बढ़ते हुए सुदृढ़  हो रही थी। मैं उसी माहौल में एक बहुत छोटी-सी इकाई के रूप में उभरी और मैंने अपना एक छोटा सा केन्द्र कायम किया। लोग मुझसे जुड़ने लगे या कहूँ मेरे गिर्द जमा होने लगे। मेरे घेरे का दायरा विस्तृत होता गया।

हाँ, तो मैं चर्चा कर रही थी कि गॉडडफादर जब आपस में लड़-लड़कर कमज़ोर हो गए, तो खुले मंच पर जनता के बीच ही एक-दूसरे का गला पकड़ने लगे। एक बार तो कतरास में हो रही इन्टक की बहुत बड़ी सभा में, जो शंकर  दयाल सिंह ने बुलाई थी और जिसमें राष्ट्रीय  कोलियरी मजदूर संघ के अध्यक्ष बी. पी. सिन्हा, महासचिव बिन्देश्वरी  दुबे और कार्यकारिणी के सदस्य सूर्यदेव सिंह भी उपस्थित थे, में मंच पर ही हाथापाई शुरू हो गई। सूर्यदेव सिंह ने मंच पर ही बी. पी. सिन्हा का गिरेबां पकड़ कर उन्हें झकझोर दिया था। बिन्देश्बरी  दुबे तटस्थ बने बैठे रहे थे, जबकि वे महासचिव थे। दरअसल भूमिहार और राजपूत की लड़ाई में ब्राहमणों  की आदत है, दूसरों को लड़ा कर अपने नेता बने रहना, कोई फैसला ही नहीं होने देना। मेरी और दामोदर पाण्डेय की लड़ाई में भी दुबे जी प्रायः चुप्पी साध लेते थे, जबकि एकांत में वे मुझे कहते थे कि मैं ही ठीक हूँ। मैं उन्हें हमेशा  कहती,‘‘हम दोनों की लड़ाई में दोनों कैसे ठीक हो सकते हैं ,कोई एक तो गलत होगा। आप हममें से किसी एक को गलत बता कर लड़ाई का समाधान कीजिए। दोनों को सही बता कर आप खुद तो नेता बने रहते हैं पर हमारी लड़ाई का समाधान नहीं करते।’’

सूर्यदेव सिंह द्वारा बी. पी. सिन्हा को अपमानित करने का असर यह हुआ कि इन्टक के जिस भी नेता ने बी.पी. सिन्हा के अपमान के बारे में सुना वह मजदूरों को लेकर इन्टक कार्यालय धनबाद में आ जुटा। मैं भी लगभग दस हजार मजदूर लेकर बी. पी. सिन्हा के समर्थन में हजारीबाग से धनबाद पहुँच गई। उन दिनों मैं इन्टक में थी और ‘राष्ट्रीय  कोलियरी मजदूर संघ’ की उपाध्यक्ष थी।बरसों से बी. पी. सिन्हा के नेतष्त्व में चला आ रहा भूमिहार और राजपूतों का मेल और संगठन उस दिन दो फाड़ हो गया। हालांकि संगठन में नेतृत्वकारी  भूमिका में या हस्तक्षेप करने की क्षमता रखने वालों में भूमिहार ही ज्यादा थे। राजपूत या पिछड़ा फैक्टर हमेशा  कम था। विडम्बना यह थी कि बी .पी. सिन्हा का विरोध राजपूतों से ज्यादा भूमिहार ही किया करते थे। इसका एक कारण तो यह था कि मालिकों और सत्ता में दबदबे के कारण और राजपूत लठैतों के बल पर बी.पी. सिन्हा दूसरे भूमिहार नेतृत्व  को पीछे धकेल देते थे और मजदूरों की बलि चढ़ा कर अकेले धन-सुख और सत्ता-सुख भोग रहे थे। हालांकि  धनबाद से हमेशा  रामनारायण शर्मा, जो भूमिहार ही थे, सांसद चुने जाते थे। वे राष्ट्रीय  कोलियरी मजदूर संघ के महासचिव भी थे। वे ईमानदार माने जाते थे। वे बी. पी. सिन्हा की गतिविधियों में भाग नहीं लेते थे। या यह कहा जाए कि वे बी. पी. विरोधी थे। बी. पी. सिन्हा ने उन्हें हटाकर राष्ट्रीय  कोलियरी मजदूर संघ का महासचिव बिन्देश्बरी  दुबे को बना दिया था। विडम्बना यह हुई कि एक ब्राहमण के आ जाने से बी. पी सिन्हा द्वारा निर्मित किया गया वर्षों  पुराना राजपूत-भूमिहार-पिछड़ा समीकरण बिगड़ गया और बी. पी. सिन्हा कमज़ोर पड़ गये। हालांकि  संकट की इस घड़ी में उनके कट्टर विरोधी राम नायायण शर्मा (बिरादरी द्वारा) उनके साथ जुड़ने को बाध्य कर दिये गये।

सूर्यदेव सिंह जनता पार्टी के विधायक बन गये। बाद में उसने बी.पी. सिन्हा की हत्या भी करा दी। मैं कई बार बी. पी सिन्हा को चेतावनी दे चुकी थी। बिहार विधान परिषद के सदस्य होने के नाते मैंने कतरास में हुए इंटक के कार्यकर्ता की हत्या पर प्रश्न  उठाए थे, जिसमें सूर्यदेव सिंह और उनके साथियों का हाथ था। तब भी मैंने सिन्हा साहब को उनकी पत्नी डोरोथी के माध्यम से और प्रत्यक्ष रूप से चेताया था। मैंने कहा था,
‘‘देखिए, यह सूर्यदेव सिंह ही आपके लिए खतरनाक साबित होगा। वह आपके लिए खतरा है क्योंकि वह हत्यारा है। उससे स्वयं को बचा कर रखिए।’’ बी. पी. सिन्हा हँस दिया करते थे चूंकि उन दिनों सूर्यदेव सिंह उनके यहाँ बहुत आता था। बी. पी. सिन्हा की पत्नी मुझसे सहमत थी.’ ‘‘रमणिका सही कह रही है, बी केयरफुल ऑफ़  हिम।’’

वर्षों  से बी. पी. सिन्हा की पहली पत्नी उनके यहाँ नहीं आती थी। बी.पी. सिन्हा स्वयं ही गाँव हो आया करते थे। इनका बेटा जवान हो चुका था पर वह घर पर ही रहता था। उसकी पढ़ाई और हॉस्टल का खर्च बी.पी. सिन्हा भेज देते थे। शायद असुरक्षित महसूस होने के कारण ही अपनी हत्या के पहले यानी अपने अन्तिम दिनों में बी. पी सिन्हा ने अपनी पत्नी और बेटे को अपने पुराने घर में आने की इजाजत दी, जहाँ वे अपना दरबार लगाते थे। बी. पी सिन्हा की पकड़ अन्त में अपने कार्यकर्ताओं पर भी ढीली हो गई थी।उनकी पत्नी डोरोथी, जो पार्टियों की रौनक और अंग्रेजी की अच्छी-खासी कवयित्री थीं, से मेरी काफी घनिष्टता  थी। मैं काफी मुंहफट थी। साफ-साफ बात कर दिया करती थी। बी.पी. सिन्हा के कई भूमिहार कार्यकर्ताओं को डोरोथी पसन्द नहीं करती थी, खासकर उमा बाबू को,चूंकि बी.पी. सिन्हा राजनीति में जब कमज़ोर पड़ गए, तो उनके उमा बाबू जैसे चेले-चमचे,काफी अश्लील  हरकतें करके डोरोथी को अपनी ओर आकर्षित  करने की कोशिश  करते थे। डोरोथी मुझसे बताती,बी.पी. सिन्हा से शिकायत भी करती, पर शायद  वे अपनी अक्षमता और उन चमचों को अपनी रक्षा हेतु जरूरी समझ कर, कुछ बोलते नहीं थे। ये काफी बाद की बात है। जब 1960 में मैं धनबाद पहुँची थी तब सभी उनसे बहुत डरते थे।

उपरोक्त परिदृश्य  धनबाद और बिहार के इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। मेरे साथ आगे घटने वाली घटनाओं की पृष्ठभूमि  का भी यह एक महत्वपूर्ण अंग है। मैंने 1960 से लेकर 1980-82 तक का एक संक्षिप्त या कहूँ अधूरा-सा ब्योरा दिया है। मैं स्वयं इसका हिस्सा थी। 1967 में, जब तक मैं धनबाद में रही तब तक बी.पी. सिन्हा की दखलन्दाजी मेरे कार्यों में रही,हालांकि उनकी वर्चस्वता को भी तोड़कर अपनी स्वतंत्र पहचान कायम करने की, उनकी नज़र में हिमाकत,अपनी नज़र में हिम्मत, मैंने की थी। इसके बाद मैं हजारीबाग चली गई, माण्डू से सोशलिस्ट पार्टी का चुनाव लड़ने। 1960 से 1967-68 तक धनबाद में मेरी राजनीति में मेरी सक्रियता विकसित हुई और लक्ष्य पनपा। यह परिदृश्य  आगे घटी घटनाओं के संदर्भ में कई मायने में महत्वपूर्ण रहा। मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि धनबाद में इन सबसे जूझने के लिए जहाँ मेरी जिद ने साथ दिया, वहाँ मैंने अपने समर्थकों का सहारा लेकर भी अपना साध्य साधा। मैंने उनके दुष्मनों का इस्तेमाल भी किया। जहाँ मैंने नेताओं का सहयोग लिया,वहीं उनका उपयोग भी किया। उन्होंने भी मेरा कम दोहन नहीं किया। राजनीति में ऐसा होना आम बात है,फिर मैं उससे कैसे बच सकती थी?आइए अब देखें क्या हुआ जब 1960 में हम धनबाद पहुँचे।

हम धनबाद पहुँचे

हम धनबाद पहुँचे! रहने को कोई घर नहीं था। हम लोग रीजनल लेबर कमिश्नर  रंजीत सिंह के कार्यालय में ही उनके साथ रहने लगे। वे भी कार्यालय के एक हिस्से में रहते थे। उनके पास तीन कमरे थे। उनमें से उन्होंने एक हमें रहने के लिए दे दिया। हमारा किचन साझा था। उनकी पत्नी और छोटी बच्ची हमारी बहुत मदद करती थीं।

धनबाद में मैं नई उड़ान की चाह लिए पहुँची थी। अब तक मैं धरती पर से ही सपने देखती थी,धनबाद में मैंने मुंडेर पर बैठ कर नीचे धरती और ऊपर  आकाश  को देखना शुरू  किया। मुंडेर को ही अपनी उड़ान का प्रस्थान बिन्दु बना कर, आकाश  के पार जाकर आने की, आकाश  गंगाओं को खंगालने की सपना साकार करने की धुन मुझ पर सवार हो गई । ‘मुंडेर’ अगर दूसरे की हो या कमज़ोर हो, तो डर बना रहता है,मुंडेर ढह या छिन गई, तो क्या होगा? कई मुंडेरों के दरकने, ढहने, कमज़ोर पड़ जाने या छिन जाने के बाद मैंने सीखा था,‘खुद ही अपनी मुंडेर बनाना,जो मदद करना चाहे उससे मदद लेना, मुंडेर ढहाने वालों से लोहा लेना!’ और फिर तो! मैं अपनी मुंडेर खुद बन गई। मदद लेना स्वीकार है,पर अहसान नहीं ! तोड़ना चाहते हो, तो आओ, हाथ आज़माओ! जूझने को तैयार हूँ! फिर मैंने इस मुद्रा में और शुरुआत की! प्रकाश  की अफसरी का मैंने कभी सहारा नहीं लिया, उलटे उसकी पत्नी होने के कारण मेरे सब दुश्मन  उसके भी दुश्मन  बन गए थे। खैर! धनबाद धनबाद ही था,है और रहेगा भी!

खैर, जब मैं उससे उबरी और मेरी स्त्री  ने अपनी खोज-खबर लेनी शुरू  की तो मेरी स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ लौटने लगीं और मेरी देह में देह की जरूरतें भी हरकत करने लगी थीं। बेरोक-टोक और असीमित प्यार की एक भूख-सी जगने लगी। ऑपरेशन से पहले तो न जाने क्यों जैसे ही प्यार की भूख जगती, मेरे भीतर से डर का एक पुतला स्प्रिंग लगे खिलौने की तरह उछल कर खड़ा हो जाया करता था। वह बार-बार सिर हिला कर पूछने लगता,‘कहीं फिर माँ बन गई तो?’ यह प्रश्न  मेरे प्यार की भूख को ही खा जाता। स्त्री  के लिए यह डर बहुत मारक होता है। अन्तिम क्षणों तक पहुँचते-पहुँचते कभी-कभी इसी भय के कारण वह एक दम ठण्डी पड़ जाती है, शायद यद प्यासी भी रह जाती है। जैसे खड़ी फसल में लगे कनकउए को देखकर चिडि़याँ उड़ जाती हैं, उसी तरह इस डर के कनकउए को देख मेरे आवेश  और जोश  की चिडि़याँ भी उड़ जाया करती थीं। शायद इसी डर से सजग स्त्रियाँ प्रायः अधूरी रह जाती हैं। ऑपरेशन के बाद मुझे बड़ी राहत मिल गई थी। एक विश्वास  जग गया था कि अब नहीं रहूँगी प्यासी,शायद मैं अधूरेपन को भी पूर्णता दे सकूँ।

मैं बच्चा होने के भय से मुक्त हो चुकी थी। मुझे नृत्य  और अभिनय का बड़ा शौक  था उन दिनों। बच्चे नहीं होंगे,तो मुझे अपने शौक  पूरे करने, नृत्य  सीखने और करने का मौका मिलेगा। अभिनय और साहित्य के विकास के लिए समय मिलेगा। हर समय एक डर-सा बना रहता था कि कहीं गड़बड़ हो गई, तो बच्चा पैदा करने और उसे पालने के लिए घर में कैद रहना पड़ेगा। अब वह भी खत्म हो गया था। अनचाहे गर्भ से मुक्ति पाने की सात त्रासदियों से गुजरने के जोखि़म मैं उठा चुकी थी। माँ बनने का डर मनचाहे प्यार-प्रणय की छूट तो देता ही नहीं,उल्टे भविष्य  को भी एक ढर्रे में बांध देता है। स्त्री  को अपना पूरा अस्तित्व आने वाले अस्तित्व के निमित्त खत्म करना पड़ जाता है, चूँकि माँ बनते ही स्त्री  स्त्री  न रह कर माँ में बदल जाती है। माँ के साथ ममता का नाभि-नाल का सम्बन्ध जुड़ा। सच तो यह है कि ममता ही स्त्री  को माँ बनाती है। वह अपनी अन्य पहचानें खो कर, उसी में इतना रम जाती है कि उसे अपने होने की खबर तक नहीं रहती। मैं इस दौर से गुजर चुकी थी। टूटू के पैदा होने के बाद मैं अपना होना ही भूल गई थी।

बच्चे न होने के अहसास ने मुझे स्त्री -सुलभ वर्जनाओं और अनिवार्यताओं से मुक्ति दिलाई थी। अब तो केवल जन्मे हुए बच्चों को पालना है,स्कूल भेजना है। इस आभास ने ही मुझे स्वतंत्राता और निडरता का अहसास करवाया। ‘अब समय पर मेरा अधिकार रहेगा’,यह एहसास मुझे गुदगुदाने लगा। अब माँ पर स्त्री  हावी हो रही थी या कहूँ, अब स्त्री  मुक्त हो रही थी थोपे गये स्त्रीत्व  से और ममत्व की मजबूरियों से। शायद  उर्वशी  की दुविधा भी कुछ ऐसी ही होगी, जब उसने प्यार का अनन्त रास्ता चुना,पुरूरवा के बदले अपने पुत्र के प्यार को चुना। मैंने भी प्यार की प्रक्रिया को चुना। व्यक्ति गौण था मेरे लिए। वह कौन होगा,यह मेरा निर्णय होगा? प्यार का ढंग क्या होगा,वह भी मैं ही तय करूँगी?  मैं खुद को प्रकाश  से मुक्त करने का प्रयास करने लगी थी।
अब मेरी देह मेरी देह बन गई थी और एक औरत की देह को मुक्त प्यार ही पूर्णता दे सकता है।मैं अब मुक्त थी। भय मुक्त ! निडर! मेरे आवेश  पर कोई रोक नहीं थी। यह आवेश  ही तो स्त्री  को पूर्ण करता है। पुरुष  के लिए इस डर के कोई मायने नहीं होते। मैं अब सब परिधियाँ लाँघ सकती थी,सीमाएँ तोड़ सकती थी। दरअसल सीमा में रहना मुझे सदैव कचोटता है, इसलिए सीमा को तोड़ने मात्रा का आभास ही मुझे अत्यधिक सुखकारी लगता है। मैं वर्जनाएँ तोड़ सकती हूँ,इसी की अनुभूति मुझे सुकून देती है। सीमा तोड़ना, मर्यादा उलाँघना, वर्जनाओं को नकारना, मुझे एक विश्वास  देता है कि अपनी देह की मैं खुद मालिक हूँ। मैं संचालक हूँ, संचालित नहीं। स्त्री  के लिए ममत्व एक बहुत ही कोमल-स्नेहसिक्त अहसास है,तो यह एक कड़ा और कठिन बन्धन भी है। इस ऑपरेशन  के बाद मैं उस ढर्रे से मुक्त हो गई, बस रह गया अपने बच्चों के प्रति केवल ममत्व का कोमल अहसास।
(आगे भी जारी )

हरियाणा की मनीपुरी बहुएं

अफ़लातून अफलू


अफ़लातून समाजवादी चिन्तक हैं . समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय सचिव हैं ,इनसे इनके ई मेल आई डी : aflatoon@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है

( विकास के सूचकांक में शीर्षतम राज्यों में शामिल हरियाणा में स्त्रियों के प्रति घोर पुरुषवादी नजरिया व्याप्त है . हाल के दिनों में हरियाणा में कुंवारे लड़कों की शादी बिहारी लड़कियों से जीत के मूल्य के रूप में करवा देने की घोषणा भी हुई . इस छोटे से आलेख में अफ़लातून अफलू हरियाणा की इसी पुरुषवादी व्यवस्था ,पतित राजनीति और विकास के मिथ का जायजा ले रहे हैं .) 


स्त्री-पुरुष विषमता को लोहिया आदि-विषमता कहते थे। जाति जैसा ठहरा हुआ वर्ग भी स्त्री-पुरुष विषमता के खत्म होने के पहले टूट सकता है यह अब सिर्फ अनुमान अथवा कल्पना की बात नहीं रही। हरियाणा की खाप-पंचायतों द्वारा अन्तरजातीय  विवाहों का अनुमोदन इसका जीता जागता नमूना है।जातियों का अस्तित्व रोटी-बेटी संबंध से टिका रहता है। जाति के हितों की रक्षा के लिए बनी ये खाप पंचायतें भी हरयाणवी समाज में लुप्त हो रही बेटियों के दुष्परिणाम से घबड़ा कर जाति-बन्धन शिथिल करने के आदेश दे रही हैं। मुख्य तौर पर कन्या-भ्रूण हत्या के कारण हरियाणा में लिंगानुपात लगातार कम होता जा रहा है। अतिशय चिन्ताजनक लिंगानुपात के कारण गरीब राज्यों से बहुएं ब्याह कर हरियाणा लाई जा रही हैं।   हरित क्रांति से समृद्ध बने प्रान्तों में हरयाणा की भी गिनती होती है। हमारे देश के गैर-बराबरी  बढ़ाने वाले विकास के कारण , बिहार, झारखण्ड,ओडीशा,उत्तर बंग,पूर्वी उत्तर प्रदेश के देहाती बेरोजगार पंजाब ,हरियाणाके खेतों में मजदूरी करने जाते हैं । अब लुप्त हो रही स्त्रियों के कारण इन्हीं राज्यों से हरयाणा में बहुएं भी लाई जा रही हैं। इस प्रकारहरियाणावी  समाज ने अपने प्रान्त की लुप्त की गई स्त्रियों को बचाने का कोई सामाजिक आन्दोलन चलाने के बजाए पिछडे प्रान्तों की बहुओं को लाकर तथा उनसे विवाह करने में जाति के बन्धन छोड़ने की छूट देने को बेहतर समझा है।

इस सन्दर्भ मेंस्त्रीकाल में प्रकाशित अमृता ठाकुर का लेख अवश्य पढ़ें : क्लिक करें : बदलाव की बयार : जद्दोजहद अभी बाकी है

मेरे एक हरियाणावी मित्र की माताजी श्रीमती निर्मला देवी ने बताया कि सभी पर-प्रान्तीय बहुओं को ‘मनीपुरी बहु’ कहा जाता है। गौरतलब है कि इस नामकरण का मणिपुर राज्य से संबध नहीं है अंग्रेजी के शब्द ‘मनी’ से संबंध है। शादी-विवाह के मौकों पर गाए जाने वाले लोक-गीतों को मनीपुरी बहुएं नहीं गा पाती। मुझे यकीन है कि कुछ ही वर्षों में इन लोक गीतों को मनीपुरी बहुएं भी सीख जाती होंगी। पर-प्रान्त में विवाह करने वाली मेरी नानी,मामी,मां और भाभियों द्वारा नई भाषा सीख लेने में गजब की निपुणता प्रकट होती थी।

करीब १८ वर्ष पहले रेवाड़ी जिले के एक गांव में चार पांच दिवसीय कार्यक्रम में शरीक होने का मौका मिला था। गांव के बाहर लगी एक सरकारी सूचना को देख कर मैं चौका था। उस सरकारी बोर्ड में गांव में स्त्रियों और पुरुषों की संख्या में अन्तर चौंकाने वाला था।लिंगानुपात राष्ट्रीय औसत से काफी कम था। अनुसूचित जाति के स्त्री-पुरुषों की संख्या भी राष्ट्रीय औसत की तुलना में विषम जरूर थी किन्तु गैर – अनुसूचित तबकों से बेहतर थी। मैंने लौट कर मेजबान साथी को इस विषय में एक पत्र लिखा। बहरहाल , २००१ की जनगणना के बाद से हरियाणा में चिन्ताजनक तौर पर घट रहा लिंगानुपात शैक्षणिक चर्चा का विषय बन गया है।

हरियाणा भाजपा के एक नेता द्वारा मुफ्त में बिहारी बहुएं दिलाने के वायदे  से बिहार के कई नेता आहत होकर बयान दे रहे हैं ।हरियाणा में लुप्त हो रही स्त्रियों और पर-प्रान्त की दारिद्र्य झेल रही स्त्रियों के हरियाणा में मनीपुरी बहु बन कर जाने की बाबत इन बयानों में गहराई से चर्चा नहीं की जा रही है और न ही कोई संवेदना प्रकट हो रही है।हरियाणा में यह समझदारी बन चुकी है कि मनीपुरी बहुओं के न आने से वहां कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ जाएगी। इस समझदारी के व्यापक होने के कारण इस प्रकार के विवाह रुक जाएं यह हरियाणा का कोई भी दल अथवा खाप पंचायत नहीं कहेगी । बिहार के नेता इस संबंध के मुफ्त न होने और विधान सभा चुनाव बाद मुफ्त कर दिए जाने के आश्वासन से अपमान-बोध कर रहे हैं।
हमारे देश की विकास नीति कई बार सामाजिक पहेलियां भी गढ़ देती है। यह विदित है कि केरल और नागालैन्ड में लिंगानुपात स्त्री के हक में है। इन राज्यों की साक्षरता और किसी जमाने में प्रचलित मातृ सत्तात्मक समाज की इस सन्दर्भ में शैक्षिक जगत में चर्चा हो जाया करती है। हकीकत यह है स्त्री-उत्पीड़न और हिंसा के मामलों में अब केरल भी पीछे नहीं रहा । पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में स्त्री बहुलता वाला लिंगानुपात पाया गया है । पहली नजर में यह अबूझ पहेली लगता है। जनगणना की जिला रपटों के आधार पर स्थानीय अखबारों में इस बाबत कुछ ऊलजलूल सुर्खियां भी प्रकट हो गई थीं। इस तथ्य के बहाने दावा किया जाने लगा कि यह सूचकांक स्त्री की बेहतर हो रही स्थिति का द्योतक है। वास्तविकता यह है कि भारी तादाद में  प्रवासी पुरुष मजदूरों के कारण जनगणना के दौरान लिंगानुपात स्वस्थ हो जाता है ।

भारतीय समाज की यह विडंबना है कि विकास की दौड़ में जिस राज्य को लाभ पहुंचा वहां औरत की स्थिति इतनी चिन्ताजनक है। राजनीति इतने पतनशील दौर से गुजर रही है कि सामाजिक और क्षेत्रीय गैर-बराबरी के मूल मसलों के समाधान की बात तो दूर उन्हें समझना भी नहीं चाहती । किसी रचनात्मक पहल से उम्मीद बचती है।
अमर उजाला से साभार

थेरीगाथा , बौद्ध धर्म और स्त्रियाँ

रजनीश कुमार


रजनीश कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय में बौद्ध अध्ययन विभाग में शोधरत हैं. रजनीश से इनके मोबाइल न 09911639095 पर संपर्क किया जा सकता है

( महात्मा बुद्ध के द्वारा स्त्रियों का संघ में प्रवेश की अनुमति एक युगांतकारी घटना थी . प्रव्रज्या प्राप्त स्त्रियाँ थेरी कहलाती थीं , जिन्होंने कविता में अपनी गाथाएँ लिखीं . थेरी गाथाएँ  तत्कालीन समाज में स्त्री की स्थिति  की समझ के लिए महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज हैं . रजनीश कुमार बौद्ध कालीन इस सामाजिक क्रान्ति की व्याख्या कर रहे हैं इस आलेख में. स्त्रीकाल के दलित स्त्रीवाद अंक में प्रकाशित आलेख का यह एक बड़ा हिस्सा है   )

भगवान बुद्ध  ने संघ में जातिवाद या लिंग भेद को कोई स्थान नहीं दिया। उनकी दृष्टि में सभी लोग समान थे, भगवान बुद्ध ने चुल्लवग्ग में स्पष्ट कहा था, ‘ हे! भिक्षुओं! जिस प्रकार महानदियाँ, महासमुद्र में  मिलकर अपने पहले नाम गोत्र को छोड़ देती हैं ,अर्थात महासमुद्र के ही नाम से ही प्रसिद्ध होती हैं ऐसे ही भिक्षुओ! विभिन्न जाति वर्णों के लोग तथागत द्वारा बतलाये गये। धर्म -विनय में प्रव्रजित होकर पूर्व के नाम गोत्र को छोड़ देते हैं।  अर्थात् दीक्षा लेकर यह भूल जाते हैं कि हमारा अमुक वर्ण था अमुक वंश था।‘
तत्कालीन भारतीय समाज में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति काफी निम्नस्तर की थी, उन्हें  सम्मान प्राप्त न था, उसको देखते हुये भिक्षुणी संघ की स्थापना एक बड़ा ऐतिहासिक और साहसिक निर्णय था.  भिक्षुणी संघ की स्थापना कराने में आनन्द का विशेष योगदान रहा- उन्होंने ही भगवान बुद्ध से महिलाओं को संघ में दीक्षित करने के लिए प्रार्थना की थी और तर्क सहित प्रेरित भी किया था।

आनन्द भगवान बुद्ध  के चचेरे भाई थे। इनकी माता का नाम विदेह कुमारी था तथा पिता का नाम अमितोदन था- जो शुद्धोदन  भगवान बुद्ध  के पिता से छोटे थे। बुद्धत्व  प्राप्ति के दूसरे साल भिक्षु आनन्द की प्रव्रज्या हुयी थी। आनन्द पच्चीस वर्ष तक छाया की तरह भगवान बुद्ध  की सेवा करते रहे। आनन्द को चैरासी हजार धर्मस्कंध याद थे। पहली बौद्ध  संगीति में ध्म्म का ज्ञाता होने के कारण उन्हें ‘धम्मधर’ की उपाधि से विभूषित किया गया था .  इन्होंने इस संगीति में मुख्य रूप से भाग लेकर ध्म्म का संगायन किया।
भिक्षुणी-संघ की स्थापना का विवरण  चुल्लवग्ग में मिलता है वह महत्वपूर्ण व ऐतिहासिक है-‘उस समय भगवान बुद्ध  शाक्यों के देश में कपिलवस्तु के न्योग्राधराम में विहार कर रहे थे। तब महाप्रजापतीगौतमी ने भगवान के सम्मुख जाकर निवेदन पूर्वक याचना की , ‘ भन्ते! अच्छा हो यदि स्त्रियाँ भी तथागत के दिखाये धर्म – विनय में प्रव्रज्या पायें.’                  पूरा आलेख पढ़ने के लिए क्लिक करें ( स्त्रीकाल अंक ९ )

गौतमी ने तीन बार प्रार्थना की, भगवान बुद्ध  ने तीनों बार प्रार्थना अस्वीकार कर दी और वहाँ से वे वैशाली चले गये और वैशाली जाकर महावन की कूटागार शाला में विहार करने लगे। कुछ समय पश्चात् महाप्रजापती गौतमी अपना सिर मुड़वाकर पाँच सौ शाक्य स्त्रियों को साथ लेकर  भगवान बुद्ध के पास वैशाली आ गयीं। यात्रा करते-करते उनके पैर फूल गये थे, शरीर धूल से भर गया था और काफी दुःखी व उदास लग रही थीं। जब यहाँ स्थविर आनन्द ने उनकी उदासी का कारण पूछा तो महाप्रजापती गौतमी ने आनन्द को बताया कि ‘स्त्रिायों को बौद्ध  संघ में प्रव्रज्या देने के लिये भगवान आज्ञा नहीं दे रहे,  इसलिये मैं उदास हूँ। तब आनन्द ने भगवान बुद्ध  के पास जाकर स्त्रिायों को संघ में प्रव्रजित करने के लिये तीन बार आग्रह किया ,परंतु भगवान ने तीनों बार अस्वीकार कर दिया। तब आनन्द ने दूसरी प्रकार से भगवान से अनुज्ञा माँगते हुये कहा कि ‘भन्ते! क्या तथागत प्रवेदित धर्म   घर से वेघर,  प्रव्रजित हो स्त्रिायाँ स्रोतापत्ति फल,  सक्रदागामिफल, अनागामि फल तथा अर्हत्व का साक्षात् कर सकती हैं?  भगवान ने कहा, ‘साक्षात् कर सकती हैं, आनन्द !
तब आनन्द ने पुनः कहा, ‘ भन्ते! यदि तथागत-प्रवेदित धर्म -विनय में प्रव्रजित होकर स्त्रियाँ साक्षात् कर सकने योग्य हैं। तो भन्ते! जो अभिभाविका हैं,पोषिका हैं, वह भगवान की मौसी महाप्रजापति गौतमी बहुत उपकार करने वाली हैं, उन्होंने माँ की मृत्यु के बाद भगवान का पालन पोषण किया है। भन्ते! अच्छा हो यदि महिलाओं को प्रव्रज्या की आज्ञा मिले।‘ और तब भगवान बुद्ध ने उत्तरदायित्व पूर्ण नियमों के साथ महाप्रजापतीगौतमी व अन्य पाँच सौ शाक्य महिलाओं को प्रव्रज्या की अनुमति दे दी।

थेरीगाथा-

थेरीगाथाओं में 73 भिक्षुणियों की 522 गाथाओं  का संग्रह किया गया है, जो कि 16 भागों में विभक्त हैं। कुछ  गाथाओं का संग्रह सामूहिक रूप में किया गया है। ये सभी भिक्षुणियाँ बुद्ध कालीन थीं और उनकी शिष्यायें भी थीं। अत्यन्त संगीतात्मक भाग में आत्म अभिव्यंजना पूर्ण गीत काव्य शैली के  आधर पर भिक्षुणियों ने अपने जीवन अनुभव को बताया है.  नैतिक सच्चाई और भावनाओं की गहनता की विशेषता ही उसका काव्यगत सौन्दर्य है। भिक्षुणियाँ निराशावदी नहीं है। निर्वाण की परम शक्ति का वे खुशी से वर्णन करती हैं- ‘अहो सुखं ति सुखो झायामी ‘ ‘अहो! मैं कितनी सुखी हूँ! मैं कितने सुख से ध्यान करती हूँ’ यह उद्गार आत्मध्वनि को प्रदर्शित करते हैं। बार-बार उनका यही प्रसन्न उद्गार होता है, ‘सीतिभूतम्हि निब्बुता’ अर्थात ‘ निर्वाण को प्राप्त कर मैं परम शांत हो गई,  निर्वाण की परम शांति का मैंने साक्षात्कार कर लिया है।‘  थेरीगाथा के स्वरूप को आम्रपाली की गाथाओं  में सन्निहित उद्गारों से समझा जा सकता है-‘ पुष्पराशि से सुगन्ध्ति मेरे केश सुगन्ध् से परिपूर्ण मंजूषा के  समान महकते थे। परंतु आज इनमें खरगोश के  रोमों की सी दुर्गन्ध् आती है। सत्यवादी बुद्ध  के  वचन कभी मिथ्या नहीं होते।‘ इस प्रकार अन्य उत्कृष्ट उद्गारों के  साथ आम्रपाली ने अपनी वृद्धावस्था में अपने शरीर के  प्रति विचार प्रकट किये हैं। इसी तरह के  सभी उदाहरण साहित्यिक दृष्टि से काव्य के  सर्वोत्तम उदाहरण हैं। थेरीगाथा के  संबंध् में  डा.रायस डैविड्स का कथन है कि ‘थेरीगाथा की बहुत सी गाथायें न केवल उनके  बाह्य रूप की दृष्टि से अत्यंत मनोरम हैं बल्कि वे उस उँची आध्यात्मिक साध्ना की भी गवाही देती हैं, जिसका आदर्श बौद्ध  जीवन से  सम्बन्ध् था। जिन स्त्रियों ने भिक्षुणी की दीक्षा ली , उनमें से अधिकांश उँची आध्यात्मिक पहुँच के  लिए और नैतिक जीवन के  लिए प्रसिद्ध  हुईं। कुछ स्त्रियाँ तो न केवल पुरुषों की शिक्षिका तक बन गईं ध,र्म की बारीकियों को समझा सकने वाली, बल्कि उन्होंने उस चिरन्तन शन्ति को भी प्राप्त कर लिया था, जो आध्यात्मिक उड़ान और नैतिक साध्ना के  ही पफलस्वरूप प्राप्त की जा सकती है।‘

थेरीगाथा ग्रंथ की महत्ता इस संबंध् में और अधिक  बढ़ जाती है , जब हमें उसमें इतिहास के  उस कालखण्ड की विशेष जानकारी मिल जाती है, जहाँ भगवान बुद्ध  ने एक ऐसे समय में महिलाओं को आध्यात्म का रास्ता बताया, जब समाज में महिलाओं की भूमिका काफी सीमित व निम्न स्तर की रही हो ,व विश्व की रचना व प्रगति में महिलाओं को भागी मानने के  बजाय पुरुषों ने उन्हें बाधक  के  रूप में देखा हो, तथा ग्रंथ द्वारा यह भी जानकारी उपलब्ध् होती है कि स्त्रियाँ किसी भी दृष्टि से पुरुषों से कम नहीं होती और वे बहन, माँ, पत्नी के  अतिरिक्त एक कुशल शिक्षिका व उपदेशकर्ता भी बन सकती हैं। थेरी शुक्ला द्वारा राजगृह निवासियों को ध्म्म उपदेश देना , थेरी नन्दउत्तरा द्वारा निग्र्रन्थ साधुओं के  साथ तर्क  करना, सोणा भिक्षुणी को स्वयं भगवान बुद्ध  ने भिक्षुणी – साधिकाओं में अग्रणी उद्घोषित किया था, पटाचारा भिक्षुणी द्वारा अपनी भिक्षुणी-शिष्याओं को कुशलता से उपदेशित करना, किसा गौतमी तथा अन्य और बहुत सारी भिक्षुणियों का समाज में अग्रणी भूमिका निभाने का साक्ष्य मिलता है। जो ऐतिहासिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है।
संघ में सभी वर्णों की महिलायें दीक्षित हुई थीं, इससे यह स्पष्ट होता है भगवान बुद्ध  ने सभी के लिये समान रूप से संघ में प्रवेश को बल दिया था। थेरीगाथा में संदर्भ मिलता है कि भिन्न-भिन्न जाति, कुल ,धर्म से प्रव्रजित होने वाली महिलाओं में ब्राह्मण कुल  से- कुल अट्ठारह थेरी  मैत्रिका, दंतिका, सोमा, भद्राकापिलायिनी,नंदउत्तरा, मुक्ता-१ , मुक्ता-2, उत्तमा-2, मित्तकाली, सवुफला,चन्द्रा,गुप्ता, चाला,उपचाला, शीर्षोपचाला, रोहिणी,सुन्दरी,शुभा-2 सम्मिलित थीं। क्षत्रिय वुफल से दो थेरीयाँ, आतरा और सिंहा थीं। पूर्णा, तिष्या-1,तिष्या 2, अभिरूपानन्दा,  मित्रा, सुंदरीनंदा,महाप्रजापतीगौतमी, ये सभी शाक्य कुल  से सात-थेरी संबंध् रखती थी,वैश्य कुल  की सात-थेरी- महिलाओं में ध्म्मदिन्ना, उत्तमा-1, भद्राकुण्डलवेफशा, पटाचारा, सुजाता, अनुपमा, दासी सम्मिलित थीं। जबकि राजवंशों की चार-थेरी- महिलाओं में सुमना-2 ,वृद्ध आलविका ,शैला, क्षेमा, सुमेध आदि थीं। अड्ढकासी और विमला वैश्यायें थीं तो पद्मावती और आम्रपाली जैसी गणिकाओं ने भी संघ में दीक्षा ली थी. इसके अतिरिक्त उच्चकुल -प्रतिष्ठित व कुलीन घरों की महिलाओं की संख्या भी काफी थी यदि पूर्णिका दासी की पुत्री थी तो चापा बहेलिया सरदार की  और शुभा-1 सुनार की पुत्री थी। सारांश यह है कि अनेक जाति-कुलों से आकर महिलाओं ने बुद्ध शासन में दीक्षा ग्रहण की थी, यह एक क्रांन्तिकारी सफलता थी कि महिलाऐं मुक्ति की खोज में स्पष्ट रूप से शामिल थीं,  दूसरे शब्दों में भगवान बुद्ध  व उनके  शिष्य आनन्द- जैसे कुछ  अन्य शिष्यों का यह स्पष्ट मानना था कि जाति की तरह लिंग भी किसी व्यक्ति द्वारा दुःख से छुटकारा पाने के  लक्ष्य में बाधा नहीं हो सकता।

सामाजिक जीवन में ‘स्त्री जीवन  की यदि बात की जाये तो ग्रंथ में तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के विषय में संपूर्ण जानकारी मिलती है,  थेरीगाथा में सम्मिलित गाथाओं के आधर पर तत्कालीन स्त्री  की स्थिति, घर परिवार की जानकारी, दास-प्रथा, वैश्यावृत्ति,पुनर्विवाह,जाति-वर्ग,अश्पृश्यता आदि को लेकर समाज में क्या मान्यतायें थी, क्या रूढि़याँ थी, सभी का विश्लेषण करने का प्रयास किया है। महिलाएँ घर से बाहर निकल कर उपदेशकर्ता गुरु के रूप में स्वीकारी गयीं ,जो संघ कि में आकर संभव हो सका। उनको संपूर्ण स्वतंत्राता के साथ पूर्ण विकास का माहौल लगभग शत प्रतिशत संघ में मिला, पर यदि बुद्ध  से पूर्व और बुद्ध  काल के सामाजिक जीवन के चिह्न  तलाशें जाएँ तो थेरीगाथा में बहुतायत में मिलते हैं जिनका सहज अनुमान किये गये विश्लेषण के आधर पर लगाया जा सकता है-

गृहकार्यो और उनके कारण उत्पन्न-दुखों से उद्विग्न होकर मुक्ता, गुप्ता और शुभा जैसी स्त्रियों ने घर छोड़कर सन्यास ले लिया था। इसके अतिरिक्त हमें थेरीगाथा से पता चलता है कि इस समय पर दास प्रथा लागू थी। धनिकों  की औरतें अपने घरों का काम नहीं करती थीं,  उनके घर का काम दासियाँ करती थीं। पुण्णिका ऐसी ही दासी थी, वह अपनी गाथा में कहती है- ‘मैं पनहारिन थी। सदा पानी भरना ही मेरा काम था। स्वामिनियों के दण्ड के भय से,उनकी क्रोध् भरी गलियों से पीडि़त होकर मुझे कड़ी सर्दी में भी सदा पानी में उतरना पड़ता था।‘

थेरी सुमंगल माता अपनी गाथा में कहती हैं ‘ सुमुत्तिका सुमुत्तिका, साधुमुत्तिकाम्हि मुसलस्स। अहिरिको मे छत्तकं वा पि, उक्खलिका में देड्डुभं वा ति।।  ‘अहो! मैं मुक्त नारी हूँ। मेरी मुक्ति कितनी ध्न्य है! पहले मैं मूसल ले कर धान कूटा करती थी, आज मैं उससे मुक्त हो गई हूँ। मेरी दरिद्रावस्था के वे छोटे-छोटे ,खाना पकाने ,  बरतन धोने के कामों से मैं मुक्त हो गई हूँ , मेरा निर्लज्ज पति मुझे उन छातों की छतरी से भी तुच्छ समझता था, जिन्हें वह अपनी जीविका के लिए बनाता था।‘

मुत्ता थेरी की अपनी गाथा इस प्रकार है– ‘सुमुत्ता साधुमुत्ताहि, तीहि खुज्जेहि मुत्तिया, उदुक्खलेन मुसलेन, पतिना खुज्जकेन च। मुत्ताम्हि जातिमरणा, भवनेत्तिसमूहता ति।। ‘मैं अच्छी तरह से विमुक्त हो गई हूँ। तीन टेढ़ी चीजों से ओखली से, मूसल से और अपने कुबड़े स्वामी से, मैं अच्छी तरह मुक्त हो गई हूँ। मैं आज…..जाति और मरण से भी मुक्त हो गई हूँ। मेरी संसार-तृष्णा ही समाप्त हो गई है।‘
गुत्ता थेरी  ने पुत्र और धन  संग्रह आदि भौतिक ऐश्वर्यों को त्याग कर प्रव्रज्या ग्रहण की थी- गुत्ते यदत्थं पब्बज्जा, हित्वा पुत्तं वसुं पियं.’

सुनार की बेटी सुभा थेरी  ने क्या-क्या छोड़ा, गाथा में उत्तर इस प्रकार है- ‘मैं अपने सभी भाई-बंधु, सम्बन्धी  जनों,दास, सेवक, ग्राम, विस्तृत और समृदद्ध  खेत, जीवन की सभी रमणीय प्रमोदकारी वस्तुएँ और विपुल सम्पत्ति आदि सब को छोड़ कर प्रव्रजित हो गई।‘

संघा थेरी  इस मामले में मनोवैज्ञानिक बात कहती हुई वर्णन करती है- ‘प्रव्रज्या ले कर मैंने घर छोड़ा, अपनी प्रिय सन्तान को छोड़ा, अपने प्रिय पशुओं को छोड़ा। राग और द्वेष को छोड़ा, अविद्या को छोड़कर विरक्त हुई। तृष्णा को समूल नष्ट कर अब मैंने निर्वाण की परम शक्ति का अनुभव किया है। निर्वाण का अनुभव करके मैं परम शान्त हो गई हूँ।’ थेरी इसिदासी की गाथाओं में असमान समाज-व्यवस्था और परिवार में अपने ही पति द्वारा तिरस्कृत-स्त्री  की कथा मिलती है। वह निर्दोष व सदाचारिणी रूप में रहकर दासी के समान सबकी सेवा करती रही। जिस पुरुष की उसने सेवा की उसी ने उपेक्षा की और तिरस्कृत किया और अपमानपूर्वक त्याग भी दिया था। इसी वितृष्णा से पूर्ण इसिदासी ने उसी को छोड़कर सभी वासनाओं पर मुक्ति पा ली थी,  और उसी अन्याय से क्षुब्ध् होकर उसने उपसम्पदा ग्रहण की और भिक्षुणी-संघ में प्रवेश लिया था। अतः नारी की समाज में क्या स्थिति थी कुछ हद तक इसका साक्षात् प्रतिबिम्ब इसिदासीथेरी की गाथाओं में वर्णित है।

सोमा थेरी श्यामा ने अपनी प्रिय सखी की मृत्यु के कारण शोक  मग्न होकर प्रव्रज्या ली और चित्त की शान्ति प्राप्त करने में सपफल रही। उब्बिरी थेरीगाथा में उब्बिरी के रूप में उस स्त्री  की करुण स्वर है जो पसेनदि राजा की राजमहिषी होने के उपरान्त भी अपनी कन्या की मृत्यु के कारण निरन्तर श्मशान में विलाप करती थी। पुत्री  से पुत्रा की श्रेष्ठता तो युगीन सामाजिक-सन्दर्भों की अपनी विशेषता थी। तथागत के उपदेश से उब्बिरी ने अपनी शोक-विमुक्ति की उद्घोषणा की थी। कठोर-साध्नारत चीरवरधरिणी भिक्षुणियों में प्रधान  मानी जाने वाली किसागोतमी थेरी की गाथा में दुःख का अनुभव करने वाली सहस्रों उन अनेक स्त्रिायों की मानसिक-वेदनाओं की यातना भरी है जो सदैव दुखमय-जीवन की यात्रा में ही अपनी नियति देखती है।
शाक्यवंशीय सुन्दरी नन्दा अपने परिवारजनों के प्रव्रजित होने के कारण भिक्षुणी-संघ में सम्मिलित हुई थी। तथागत ने जिस मानव-मुक्ति का द्वार खोला, उसके प्रभाव से उसके सभी परिवार जन बौद्ध  ध्म्म में दीक्षित हो बुद्ध  के अनुयायी बन गए। तब नन्दा ने सोचा- ‘इस सांसारिक जीवन का मेरे लिए भी क्या महत्व है!  बाद में भगवान ने जिस रूप की अनित्यता का उपदेश दिया था उसके कारण उसका स्वयं के प्रति भी आकर्षण नहीं रहा। जीवन की अनित्यता और दुःख के कारण नन्दा का चित्त वैराग्य में स्थित हुआ और देह-सौन्दर्य से विमुख उस नन्दा ने अपनी ही प्रज्ञा से शाश्वत-सत्य का अवलोकन किया व निर्वाण प्राप्त किया।

पटाचाराथेरी की मर्मान्तक वेदना कठोर से कठोर चित्त वाले के हृदय को विचलित करने वाली वेदना की कथा है। धनी  श्रेष्ठि-परिवार की कन्या पटाचारा अपने दुःखों को सहती अकेली विक्षिप्त सी घूमती रही थी। सब कुछ अनित्य है इस तथ्य का बोध् होने पर पटाचारा की चित्त-साध्ना निर्वाणोन्मुख दीपशिखा की भांति पूर्ण निवृत्त रूप में उसके उद्गारों में व्यंजित हुई है। महाप्रजापतीगौतमी भारतीय नारी-जीवन के इतिहास में युगान्तरकारी चेतना की अग्रदूत बनीं। अनेक जाति-संस्कार से विमुक्त होकर प्रजापति द्वारा भगवान् बुद्ध  के दर्शनोपरान्त भाव-विभोर होकर की गयी वन्दना निश्चय ही पालि-साहित्य का उत्कृष्ट अंश है। अतः सर्वोत्तम व कालजयी ऐसे ही उद्गार अन्य थेरियों ने भी व्यक्त किये हैं। बौद्ध भिक्षुणियों द्वारा व्यक्त की गई सभी गाथाएँ मानव इतिहास की सबसे सशक्त अभिव्यक्तियाँ हैं।

भगवान बुदद्ध स्त्रिायों को संघ में ऐतिहासिक प्रव्रज्या देकर, शिक्षा के अध्किार की दृष्टि से उनके ज्ञान प्राप्ति में सहयोगी बने थे। अतः स्त्रियों के सम्पूर्ण उत्थान पतन के लिये भगवान बुद्ध  से पूर्व काल से लेकर आधुनिक काल तक की स्थिति पर ध्यान देना आवश्यक है। आदिकाल से लेकर इतिहास के सभी कालखडों में विभिन्न रूपों में स्त्री  की स्थिति में बहुत परिवर्तन हुये हैं ,समाज में उसे कभी तो मानवीय तथा कभी अमानवीय दृष्टियों से देखा गया। जिनका सम्पूर्ण  प्रभाव स्त्री की शिक्षा, विवाह, परिवार, संपत्ति और सत्ता संबंधी  अध्किारों पर पड़ा है। इन अधिकारों के प्रकाश में किसी भी समाज में स्त्री  की सामान्य स्थिति को परखा जा सकता है। लेकिन समाज में स्त्री  का स्थान और स्वरूप जानने के लिये उसकी दीर्घ जीवन परम्पराओं को देखना जरूरी है। और इसके लिये सभी उपलब्ध् ऐतिहासिक ग्रंथों , दस्तावेजों और साहित्यिक रचनाओं को ही आधर माना जा सकता है। थेरीगाथा ग्रन्थ  व सम्पूर्ण पालि साहित्य इसी क्रम की महत्वपूर्ण कड़ी हैं।

कर्मानन्द आर्य की कवितायें

कर्मानन्द आर्य


कर्मानन्द आर्य मह्त्वपूर्ण युवा कवि हैं. बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हिन्दी पढाते हैं.इनसे इनके मोबाइल न 8092330929 पर संपर्क किया जा सकता है

( कर्मानन्द आर्य ने स्त्रीकाल के आग्रह पर अपनी कई कवितायें भेजी . इस मह्त्वपूर्ण युवा कवि को प्रकाशित कर हमें खुशी हो रही है , समय -समय पर इनकी और कवितायें ह्म यहां प्रकाशित करते रहेंगे. )

1. इस बार नहीं बेटी

मैं तुम्हें प्रेम की इजाजत देता हूँ
और काँपता हूँ अपने व्यक्तिगत अनुभवों से
अपने जीवन की सबसे अमूल्य निधि तुम्हें भी मिलनी चाहिए

देखता हूँ तुम तल्लीनता में खोई रहती हो
निश्चित तौर पर प्रेम बढ़ाएगा तुम्हारा अनुभव
तुम चाहो तो जी भरकर प्रेम करो

प्रेम करो इसलिए नहीं कि प्रेम पूजा है
प्रेम पर टिकी हुई है दुनिया
इसलिए क्योंकि सबसे बुरा अनुभव मिल सकता है प्रेम से
मिल सकता है रूठने मनाने का हुनर

जिसने सीखा है अपने अनुभवों से
वह जिन्दगी में कभी असफल नहीं हो सकता
कभी टूट नहीं सकता रूठने मनाने वाले का घर

प्रेम प्रयोग की वस्तु है
प्रेम करो और बताओ अपनी सहेलियों को
अपनी माँ को बताओ अपनी मूर्खताएं

वह सब करो जो किया है मैंने
जो मैंने जिया तुम भी जी सकती हो
पर सीखना अपनी माँ से भी

वह प्रेम में हारकर सब हार गई

2 . सार्त्र और सिमोन दि बोउवार

एक :
जब सात्र ने उसे मुखाग्नि दी
वह लिपटकर बहुत रोई

वह राख से रोई
वह आग में सिमटती रही
जब तक प्रेम जला

एकान्त में उसने देखा
प्रेमी की आँखों में जल रही थी एक चिता

धुएं जैसा धुँआ
आग जैसे आग
प्रेम जैसा प्रेम
उसने पहले भी महसूस किया था

उसने हर पल प्यार किया था
अनुभव की थी सात्र की गंध

सात्र ने उसको देखा था
उसने सात्र को जिया था प्राण देकर
दो :
दफ़न होने के ठीक पहले उसका प्रेम जिन्दा था
खेलता था
नहाता था
खाता था

रगों में दौड़ता था खून बनकर
किताबों में अक्षर बन फैल जाता था

उसकी खुशबू फैली थी रसोई में
बाग़ में फूलों में
खेत में

उसने किया था नौका विहार भी
वह गया था लांग ड्राइव

उपेक्षिता उसकी नियति नहीं
सिमोन को पता लग गया था बहुत पहले

उसने मृत्यु के साए में जिया था प्रेम
किया था युद्ध पहले समाज से
फिर स्वयं अपने खिलाफ

रोज हार जाती थी
वह रोज हार जाती थी
प्रेम का खेला

तीन :

उस सदी में वह अकेली औरत थी
जिसने किया था प्रेम
बहुत पढ़े-लिखे आदमी से

आदमी के देखने, चलने, सोचने
सबसे उठती थी मीठी खुशबू

उसकी रगों में प्रेम मृत्यु के बाद भी जिन्दा था
जवानी थी सुख भरी
सात्र उसकी जिन्दगी था

मृत्यु कुलबुला रही थी भीतर
वह जब-जब उससे मिली थी
वह मिली थी जब जब खुद से

सात्र की हथेलियों ने पहली बार छुआ था
औरत के फौलादी हाथ
जो लोहा पिघलाते थे

वे खुरदुरे हो गए थे प्रेम के कारण
प्रेम उन्हें जगह देता था

प्रेम फुदकता था
मृत्यु की छाया में
जीवन खेलता था अठखेलियाँ

सात्र ने तैरना सीख लिया था माँ के गर्भ में
चौबीस कैरेट का होना उसने जान लिया था

अक्सर होने और खत्म हो जाने के बाद भी
अनजान रहते कि उनके भीतर कोई दिल भी था

सिमोन जानती थी
उसके पास अपनी जान के सिवाए कुछ नहीं है,
प्यार तो मरते दम तक (…शायद मरने के बाद भी) रहेगा.

3. देह बहकती है देह साधो योगिनी
………………………………………………………

उसको साधो जो मिट्टी का बना है
हवा को साधो
पानी और आग से बनी इस काया में
थोड़ा निर्वात रहने दो

तुम्हारे समर्पण का नाम है प्रेम
तुम्हारे झुक जाने का नाम है श्रद्धा
झुको नहीं काया फूट पड़ती है

यम नियम सबसे ज्यादा तुम साधती हो
पुरुष साधता है आसन
फिर तुम्हें धकेल देता है विस्तर से नीचे

तुम नीचे और नीचे झुकती जाती हो
जब तक तुम लगा लो न वज्रासन

प्राणायाम तुम्हारे लिए नहीं हैं
नहीं हैं कुंजल क्रियाएं
नेति और धोती भी नहीं है तुम्हारे लिए

समझो जिसे तुम छुपाती हो
वही मिट्टी तुम्हारे जीवन को नरक बनाती है

नरक बनो स्त्री
नरक का द्वार तुम्हारे लिए नहीं है

4. घायल देश के सिपाही

(इरोम शर्मिला के लिए जिसने मृत्यु का मतलब जान लिया है)

लड़ रही हूँ की लोगों ने लड़ना बंद कर दिया है
एक सादे समझौते के खिलाफ
कि “क्या फर्क पड़ता है”
मेरी आवाज तेज और बुलंद हुई है इन दिनों
घोड़े की टाप से भी खतरनाक

मुझे जिन्दगी से बहुत प्यार है
मैं मृत्यु की कीमत जानती हूँ
इसलिए लड़ रही हूँ

लड़ रही हूँ की बहुत चालाक है घायल शिकारी
मेरे बच्चों के मुख में मेरा स्तन है
लड़ रही हूँ जब मुझे चारो तरफ से घेर लिया गया है
शिकारी को चाहिए मेरे दांत, मेरे नाख़ून, मेरी अस्थियाँ
मेरे परंपरागत धनुष-बाण
बाजार में सबकी कीमत तय है
मेरी बारूदी मिट्टी भी बेच दी गई है

मुझे मेरे देश में निर्वासन की सजा दी गई है
मैं वतन की तलाश कर रही हूँ

जब मैं फरियाद लिए दिल्ली की सड़को पर घूमती हूँ
तो हमसे पूछा जाता है हमारा देश
और फिर मान लिया जाता है की हम उनकी पहुँच के भीतर हैं
वो जहाँ चाहें झंडें गाड़ दे

हमारी हरी देहों का दोहन
शिकारी को बहुत लुभाता है
कुछ कामुक पुरुषों को दिखती नहीं हमारी टूटी हुई अस्थियाँ
सेना के टापों से हमारी नींद टूट जाती है
उन्होंने हमें रण्डी मान लिया है

उन्हें हमारे कृत्यों से घृणा नहीं होती है
उन्हें भाता है हमारा लिजलिजापन
वह कम प्रतिक्रिया देता है
सोचता है मैं हार जाउंगी

घायल शिकारिओं आओ देखो मेरा उन्नत वक्ष
तुम्हारे हौसले से भी ऊँचा और कठोर
तुम मेरा स्तन पीना चाहते थे न
आओ देखो मेरा खून कितना नमकीन और जहरीला है

आओ देखो राख को गर्म रखने वाली रात मेरे भीतर जिन्दा है
आओ देखो ब्रह्मपुत्र कैसे हंसती है
आओ देखो वितस्ता कैसे मेरी रखवाली करती है
देखो हमारे दर्रे से बहने वाली रोसनाई
कितनी लाल और मादक है

क्या सोचते हो मेरा पुनर्जन्म नहीं होगा
मैं अपनी पीढ़ियों में कायम हूँ
मैं इरोम हूँ इरोम
इरोम शर्मिला चानू

पूनम शुक्ला की कवितायें

पूनम शुक्ला


पूनम शुक्ला कवितायें , कहानियाँ और गजल लिखती हैं . हिन्दी की प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं . गुडगाँव में रहती हैं . पूनम से उनके ई मेल आई डी : poonamashukla60@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है

1.  इच्छा -1

मौन भी एक हथियार है मेरे पास
पर उसका इस्तेमाल करते-करते
थक चुकी हूँ मैं
अब चीखना चाहती हूँ बहुत जोर से
ताकि गूँज उठे पूरा ब्रह्मांड ।

2.   इच्छा- 2

कहाँ सुनी गईं
हमारी धीमी आवाज़ें
कभी रिरियाना
कभी मौन
याचना,प्रार्थना
सिसकना, रोना
अब जोर से बोलना चाहती हूँ
खूब जोर से हँसना चाहती हूँ
पर पहले चीखूँगी
इस निढ़ाल पड़े शरीर
और मस्तिष्क को
इस स्नायु तंत्र को
मौन ने जकड़
कर दिया है संवेदनहीन
स्पंदित तो हो पहले
ऊर्जा का स्रोत
आओ मिलकर चीखें ।

3.   इच्छा – 3

जब भी आते हो घर में
झल्ला ही पड़ते हो
पता नहीं कहाँ से
कुछ न कुछ
दिख ही जाता है तुम्हें
तुम्हारा चीखना
पुश्तैनी हथियार है
या पुरुषत्व की धार
पर अब चाहती हूँ
तुम्हारा मौन
अब मैं चीखना चाहती हूँ ।

४ . जीवन एक युद्ध है

नजर आता है
हर तरफ
एक युद्ध
अंदर बाहर
घर में गली में
दुकानों में,माल्स में
अस्पतालों,दफ़्तरों ,बैंकों की
लंबी कतारों में
अपने उनके सबके विचारों में
खुद के विचारों में

इस शरीर के भीतर भी
युद्ध ही है
लड़ती हैं सैकड़ों कोशिकाएँ
आक्रमण,संक्रमण के खिलाफ

हर दिन लोहा लेती है
एक स्त्री
विभिन्न विचारों
विभिन्न अनिच्छित कार्यों
विभिन्न जुल्मों के खिलाफ
पर लोहा लेते हुए
कम हो जाता है
उसके रुधिर में
लोहे का स्तर

एक स्त्री
नव सृजन को
दे देती है
अपनी मजबूत हड्डियों का
एक अंश
फिर थोड़ी कमजोर हुई
हड्डियों के सहारे
अपने शरीर का बोझ उठाते
चलती रहती है
सुबह से रात तक
साथ छोड़ने लगती हैं हड्डियाँ
कहीं पोली ,
कहीं आकृति बदलने लगती हैं हड्डियाँ
औरत फिर लड़ती है
अपनी ही हड्डियों के खिलाफ

कैल्शियम और आयरन की
गोलियाँ गटकती हुई
बखूबी जानती है
आज की औरत
जीवन एक युद्ध है ।

५. . सुनने में

मैं सुनती हूँ
ये सभी बोलते हैं
और मैं बस सुनती हूँ ।

एक बार मेरे शिक्षक नें
कहा था मुझसे
तुम बहुत ध्यान से सुनती हो
तुम एक अच्छी श्रोता हो

तब से सुनने की
आदत ही डाल ली है
लगता है कि शायद
ये एक बहुत बड़ी कला है
एक अच्छे श्रोता से
अच्छा ,भला और क्या है

पर हरदम बोलने वाले
ये नहीं जानते
कि सुनना भी
एक कला है
वे बस बोलते है
बस बोलते ही जाते हैं
और मैं सुनती हूँ
मैं एक-एक शब्द सुनती हूँ
इनकी तेज आवाजें
इनकी सिरफिरी बातें
इनके खून का उबाल
जबान का तीखापन
हँसी भी आती है
कि ये कितना बोलते हैं

पर इसी सुनने में
मैं पा जाती हूँ
सुलझी हुई गुत्थियाँ
एक नया रास्ता
कँटीले रास्तों पर
चलने का नायाब तरीका
इस गुत्थमगुत्थ रहस्यमयी
जीवन का रहस्य
और ये ………
बस बोलते हैं ।

स्केच / सुनीना

६. . नया मिश्रण

भरा हुआ था
कल से ही भीतर
कुछ खौलता सा
आज फिर एक और चिन्गारी
और चिल्ला उठी वो
पर तभी एक आवाज़

चुप बोलना नहीं
ऊँची आवाज़ में
नहीं तो …….

उफनते दूध को
किसी तरह
समेट लिया उसने
वरना गिरता
फैलता,जलता
दुर्गंध ही फैलाता

पर उसकी आँखों में
उमड़ आया सैलाब
जोर की एक हिचकी और

चुप ……..
रोना नहीं…..
मेरे सामने नौटंकी नहीं

रोक लिया उसने
उफनते सैलाब को भी
खारा सैलाब
उफनता दूध
दोनों को समेट लिया है
उसने भीतर
उसे भी नहीं पता
क्या होगा
इस नए मिश्रण का
नया परिणाम ।

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ आगे आये महिला संगठन

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दहेज़ कानूनों के दुरुपयोग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय के खिलाफ चारो ओर आक्रोश है . आज पटना में भी ८ महिला संगठनो ने सर्वोच्च न्यायालय से इस पर पुनर्विचार की अपील की है और बिहार सरकार से भी अपील की है कि वह सर्वोच्च न्यायालय में एक पुनर्विचार याचिका दाखिल करे .

क्या है पूरा फैसला :  पढने के लिए क्लिक करें ; अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य 

फैसले के मुख्य बिंदु को हिंदी में पढ़ने के लिए क्लिक करें : हम चार दशक पीछे चले गए हैं 

महिला संगठनो की अपील :

माननीय सर्वोच्च न्यालय का 498(A) से संबंधित फैसला चिंताजनक

महिला आंदोलन के लंबे संघर्ष का नतीजा था कि महिला उत्पीडन के खिलाफ सख्तकानून बने, इन्ही कानूनों में था 498(A). पर 2 जुलाई 2014 को 498(A) सेसंबंधित जो फैसला माननीय सर्वोच्च न्यालय ने दिया वह महिलाओं के आंदोलनके  दशकों के संघर्ष के लिए एक बड़ा धक्का है. यह फैसला ऐसे वक्त में आया जब दहेज विरोधी आन्दोलन की एक नेत्री सत्य रानी चड्ढा अब हमारे बीच नहीं रहीं. सत्य रानी चड्ढा का संघर्ष उनकी बेटी के लिए न्याय से शुरू हुआ. जिसकी ह्त्या दहेज के लिए 1979 में की गयी, और दिल्ली उच्च न्यायालय से उन्हें 2013 में न्याय प्राप्त हुआ जब उनके दामाद को दोषी पाया गया.

इस सन्दर्भ में आज 8 महिला एवं सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों की बैठक हुई जिसमें यह चिंता व्यक्त की गयी की 2 जुलाई 2014 को ‘अर्नेश कुमार बनाम बिहार सरकार’ के मामले में जो फैसला माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने दिया उस से महिलाओं को न्याय पाने में अब अधिक कठिनाई का सामना करना पडेगा क्यूंकि यह आदेश सिर्फ इस वाद तक सीमित नहीं बल्कि इस का असर हर महिला उत्पीडन के मामले पर होगा. इसका अनुपालन न होने पर माननीय सर्वोच्च न्यालय की अवमानना का मामला दर्ज होगा.

दुखद यह है की जिस तरह की भाषा का इस्तमाल इस आदेश में किया गया है वह हिंसा का सामना कर रही महिलाओं को नीचा दिखाता है. उदाहरण के लिए आदेश में कहा गया है कि 498(A) को “असंतुष्ट पत्नियों” द्वारा एक “हथियार” के रूप में इस्तमाल किया जा रहा है. साथ ही यह आदेश एक संज्ञेय अपराध को गैर-संज्ञेय अपराध बनाने की दिशा में एक कदम है. यह गौरतलब है कि आपराधिक दंड संहिता की धारा 41 (A) के हम सब पक्षधर हैं क्यूंकि यह सुनिश्चित करता है की कोई भी गिरफ्तारी बिना सोचे समझे नहीं की जानी चाहिए और यही आदेश के बिंदु 1 से 4 में दिया गया है हमारी आपत्ति  बिंदु 5 से है जिस से यह कानून संज्ञेय से लगभग असंज्ञेय हो जाता है और यह पुलिस की गिरफ्तारी करने की ताकत को छीन लेता है. न्यायालय
को एक संज्ञेय अपराध को असंज्ञेय बनाने का अधिकार नहीं है ऐसा करना लोक सभा का अधिकार है.

माननीय सर्वोच्च न्यालय के फैसले में उन लोगों के लिए चिंता व्यक्त की गयी है जिन्हें 498(A) के झूठे मामलों में गिरफ्तारी का असम्मान सहना पड़ा, हम भी ऐसे मामलों में सहानुभूति रखते हैं, पर साथ ही यह पूछना चाहते हैं कि क्या इस सदर्भ में एक वैज्ञानिक शोध की आवश्यकता माननीय सर्वोच्च न्यालय को नहीं लगती? क्या कुछ व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर हिंसा की शिकार हज़ारों महिलाओं को सिर्फ “असंतुष्ट पत्नियां” कह कर उचित न्याय से वंचित रखा जाएगा? इस सन्दर्भ में हम सभी प्रतिनिधि मांग करते हैं कि :

.             माननीय सर्वोच्च न्यायालय अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे
२.             बिहार सरकार इस निर्णय में “review petition” सर्वोच्च न्यायालय में दायर करे

सुधा वर्घीज़ (नारी गुंजन), निवेदिता, शरद, अनिता मिश्रा (बिहार महिला समाज), अमृता भूषनण (लायंस क्लब), शशि यादव, अनीता सिन्हा (ऐपवा), संजू सिंह (महिला हेल्पलाइन), सुधा (शक्तिवर्धिनी), मोना (रंगकर्मी), कामायनी (NAPM)आदि के द्वारा जारी इस अपील के साथ यह निर्णय भी लिया गया है कि महिलाओं का एक प्रतिनिधि मंडल इस मसाले पर बिहार सरकार से बात करेगा. इस फैसले की सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ताओं ने भी आलोचना की है .

फैसले पर अरविंद जैन के द्वारा  वृहद्  आलोचनात्मक टिप्पणी को पढ़ने के लिए क्लिक करें : न्याय व्यवस्था में दहेज़ का नासूर